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Song 0 — Hindi
(151) मेरे प्यारे रंगीले सतगुरु, दो नामदान का दान ॥टेक।
दर पर खड़ा भिखारी तुम्हरे, मांगे भीख निदाना।।
मेरे0 भक्ति भाव नहीं ज्ञान दाव नहीं, नहीं मैं चतुर सियाना।।
तुम्हरी शरन में निशदिन रहकर, रहूँ अनाम अमाना।
बांधू दाम न गांठी अपने, कल की सोच न धारू।।
तन मन प्रान बुद्धि और युक्ति, चरन कमल पर चारू ॥
? काले कर्म ने बहुत सताया, माया जाल बंधाना।
मेरा पाप एक है प्यारे, तुम से बहक भुलाना।।
तुम तो आये नर देही में, मुझको आप चितवन।।
राधास्वामी मेहर दया भई, मिट गये सकल गुनावन ॥
दर पर खड़ा भिखारी तुम्हरे, मांगे भीख निदाना।।
मेरे0 भक्ति भाव नहीं ज्ञान दाव नहीं, नहीं मैं चतुर सियाना।।
तुम्हरी शरन में निशदिन रहकर, रहूँ अनाम अमाना।
बांधू दाम न गांठी अपने, कल की सोच न धारू।।
तन मन प्रान बुद्धि और युक्ति, चरन कमल पर चारू ॥
? काले कर्म ने बहुत सताया, माया जाल बंधाना।
मेरा पाप एक है प्यारे, तुम से बहक भुलाना।।
तुम तो आये नर देही में, मुझको आप चितवन।।
राधास्वामी मेहर दया भई, मिट गये सकल गुनावन ॥
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Song 1 — Hindi
(152) | फकीरा सोच समझ पग धार ।।टेक।
बिन समझे कोई सार न पावे, भटके बारम्बार।।
संशय दुविधा और चतुराई, यह अज्ञान विकार ॥फकीरा0
कोई नर पशु है कोई त्रिया पशु, गुरु पशु कोई गवार।।
वेद पशु हैं सब संसारा, बिना विवेक विचार ॥फकीरा
माया पशु माया को बन्धुआ, मुक्ति पशु स्वीकार।।
भक्ति पशु बन्धन नहीं काटे, बड़ा काली धार ।फकीरा
ज्ञान पशु की क्या करू निंदा, वह ग्रन्थन के लार।।
जड़ चेतन की गांठ न खोले, उरझ उरझ रहा हार ।।फकीरा
योग पशु बंधे योग की रसरी, बैठे आसन मार।
गधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक हुआ भव पार ।।फकीरा
बिन समझे कोई सार न पावे, भटके बारम्बार।।
संशय दुविधा और चतुराई, यह अज्ञान विकार ॥फकीरा0
कोई नर पशु है कोई त्रिया पशु, गुरु पशु कोई गवार।।
वेद पशु हैं सब संसारा, बिना विवेक विचार ॥फकीरा
माया पशु माया को बन्धुआ, मुक्ति पशु स्वीकार।।
भक्ति पशु बन्धन नहीं काटे, बड़ा काली धार ।फकीरा
ज्ञान पशु की क्या करू निंदा, वह ग्रन्थन के लार।।
जड़ चेतन की गांठ न खोले, उरझ उरझ रहा हार ।।फकीरा
योग पशु बंधे योग की रसरी, बैठे आसन मार।
गधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक हुआ भव पार ।।फकीरा
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Song 2 — Hindi
(153) उलटा मारग सन्तमता है, समझे कोई सुजाना हो ॥टेक॥
उलटा नाम जपे अन्तर में, उलटी चाल चलाना हो।
यह उलटा मत तब कोई जाने, जब गुरु मिले सियाना हो ।।उलटा0
घट में सुमिरन भजन ध्यान हो, घट में भक्ति विधाना हो।
गुरु की दया साध की संगत, पावे राह रुकाना हो।
पृथ्वी मंडल का संग त्यागे, उलट चले असमाना हो।
सुरत शब्द की करे कमाई, तब प्रगटे यह ज्ञाना हो।
साधन सुगम सहज है रीती, कठिन पन्थ नहीं जाना हो।
बाहर के पट जब कोई देवे, अन्तर घट दरसाना हो ॥
घट में सूर चन्द्र और तारे, जगमग ज्योत जगाना हो।
गंग जमन और सरस्वती घट में, घट ही कर अस्नाना हो।
सहसकमलदल लीला परखो, त्रिकुटी ओम निशाना हो।
सुन्न सरोवर आसन मारो, सहज समाध रचाना हो।।
भंवर गुफा चढ़ बजे बांसुरी, माया काल दिखाना हो।
सतपद सत धुन बीन सुहावन, अनहद राग सुनाना हो।।
बिन बादल जहां पानी बरसे, बिन सुर शब्द महाना हो।
बिना नैन के सबको दरसे, बिन पग पन्थ में आना हो।
रूप रंग रेखा से न्यारा, अलख अगम से न्यारा हो।
राधास्वामी धाम मिले जब, सोई पद निरवाना हो ।
उलटा नाम जपे अन्तर में, उलटी चाल चलाना हो।
यह उलटा मत तब कोई जाने, जब गुरु मिले सियाना हो ।।उलटा0
घट में सुमिरन भजन ध्यान हो, घट में भक्ति विधाना हो।
गुरु की दया साध की संगत, पावे राह रुकाना हो।
पृथ्वी मंडल का संग त्यागे, उलट चले असमाना हो।
सुरत शब्द की करे कमाई, तब प्रगटे यह ज्ञाना हो।
साधन सुगम सहज है रीती, कठिन पन्थ नहीं जाना हो।
बाहर के पट जब कोई देवे, अन्तर घट दरसाना हो ॥
घट में सूर चन्द्र और तारे, जगमग ज्योत जगाना हो।
गंग जमन और सरस्वती घट में, घट ही कर अस्नाना हो।
सहसकमलदल लीला परखो, त्रिकुटी ओम निशाना हो।
सुन्न सरोवर आसन मारो, सहज समाध रचाना हो।।
भंवर गुफा चढ़ बजे बांसुरी, माया काल दिखाना हो।
सतपद सत धुन बीन सुहावन, अनहद राग सुनाना हो।।
बिन बादल जहां पानी बरसे, बिन सुर शब्द महाना हो।
बिना नैन के सबको दरसे, बिन पग पन्थ में आना हो।
रूप रंग रेखा से न्यारा, अलख अगम से न्यारा हो।
राधास्वामी धाम मिले जब, सोई पद निरवाना हो ।
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Song 3 — Hindi
(154)बसे मेरे घट में गुरु पूरे ।।टेक।।
जगमग ज्योति जरे दिन राती, देख देख मन में हरषाती।।
चित्त चरन में जोड़ लगाती, मस्तक धारा पद् धूरे ॥
बसे0 काम क्रोध मद लोभ निकारा, तृष्णा असा सकल विकारा।।
इन सब से अब मिला छुटकारा, जर मर बैरी होगये चूरे ॥
बसे0 राग सुहाना कान में आया, सुन सुन मेरा जिया ललचाया ।
नहीं अब त्यागू चरन की छाया, गाजे घट में अनहद तूरे ॥
बसे0 गुरु मेरे सब विधि हैं हितकारी, गुरु पर जान प्रान सब वारी।।
राधास्वामी चरन शरन हितकारी, कायर को गुरु कर लिया सूरे ।‘
जगमग ज्योति जरे दिन राती, देख देख मन में हरषाती।।
चित्त चरन में जोड़ लगाती, मस्तक धारा पद् धूरे ॥
बसे0 काम क्रोध मद लोभ निकारा, तृष्णा असा सकल विकारा।।
इन सब से अब मिला छुटकारा, जर मर बैरी होगये चूरे ॥
बसे0 राग सुहाना कान में आया, सुन सुन मेरा जिया ललचाया ।
नहीं अब त्यागू चरन की छाया, गाजे घट में अनहद तूरे ॥
बसे0 गुरु मेरे सब विधि हैं हितकारी, गुरु पर जान प्रान सब वारी।।
राधास्वामी चरन शरन हितकारी, कायर को गुरु कर लिया सूरे ।‘
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Song 4 — Hindi
(155) करो कोई संगत गुरु की आये ।।टेक।
द्व त में भूले नर अभिमानी, और अद्वैत में ज्ञानी ध्यानी।
द्वत अद्वत का झगड़ा ठानी, यह रहे भव फंद फंसाये।।
कोई0 सगुन अगुन दोनों मन का खेल, मुक्ति बंध है मेल अमेल।।
अन्धा अन्धे को रहा ठेल, आप गिरे औरों को गिराये।
कोई जोग जुगत की करे कमाई, शक्ति सिद्धि में माया आई।
मंत्र से लिया सहज भरमाई, एक पुरुष बचने नहीं पाये।
कोई तीरथ गये तो पूजा पानी, मंदिर में पाखान बखानी।
ब्रत है अटसट कर्म कहानी, मानुष जनम को लिया नसाये।
कोई सन्त आयकर जीव चितावे, छूटन की विधि युक्ति बतायें।
सतसंग में सबको अपनावें, धन धन जो राधास्वामी गुन गाये ।
द्व त में भूले नर अभिमानी, और अद्वैत में ज्ञानी ध्यानी।
द्वत अद्वत का झगड़ा ठानी, यह रहे भव फंद फंसाये।।
कोई0 सगुन अगुन दोनों मन का खेल, मुक्ति बंध है मेल अमेल।।
अन्धा अन्धे को रहा ठेल, आप गिरे औरों को गिराये।
कोई जोग जुगत की करे कमाई, शक्ति सिद्धि में माया आई।
मंत्र से लिया सहज भरमाई, एक पुरुष बचने नहीं पाये।
कोई तीरथ गये तो पूजा पानी, मंदिर में पाखान बखानी।
ब्रत है अटसट कर्म कहानी, मानुष जनम को लिया नसाये।
कोई सन्त आयकर जीव चितावे, छूटन की विधि युक्ति बतायें।
सतसंग में सबको अपनावें, धन धन जो राधास्वामी गुन गाये ।
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Song 5 — Hindi
(156) साधु अचरज अकथ कहानी ॥टेक।।
रूप न रंग न रेखा वाके, निराकार निरबानी।
कोई कहे तो कहे किस मुख से, नहीं वहां मन बानी ॥
साधु0 पार अार वार नहीं बाका, अपरम्पार निशानी।
बिन पग चले बिना अंग डोले, बिन जिभ्या मृदुबानी ॥
भेद अभेद नहीं वहाँ कुछ भी, केसे कोई पहचानी।।
हम तो सार शब्द लख पाया, सतगुरु की सहदानी।।
नहीं आवे नहीं जावे कहीं वह, निश्चल अमन अमानी।।
जड़ चेतन विवेक कहो कैसा, केहि विधि तेहि अलगानी।।
वह अनाम वह अगति अमाया, माया नाम रहानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जागे गुरुमुख ज्ञानी।
रूप न रंग न रेखा वाके, निराकार निरबानी।
कोई कहे तो कहे किस मुख से, नहीं वहां मन बानी ॥
साधु0 पार अार वार नहीं बाका, अपरम्पार निशानी।
बिन पग चले बिना अंग डोले, बिन जिभ्या मृदुबानी ॥
भेद अभेद नहीं वहाँ कुछ भी, केसे कोई पहचानी।।
हम तो सार शब्द लख पाया, सतगुरु की सहदानी।।
नहीं आवे नहीं जावे कहीं वह, निश्चल अमन अमानी।।
जड़ चेतन विवेक कहो कैसा, केहि विधि तेहि अलगानी।।
वह अनाम वह अगति अमाया, माया नाम रहानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जागे गुरुमुख ज्ञानी।
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Song 6 — Hindi
(157 } देखा देखा देखा, अगम अगोचर रूप गुरू को | गुरु की दया से देखा ॥टेक।।
नहीं अनेक और एक नहीं है, नहीं वह ज्ञान विवेक नहीं हैं।
पक्ष नहीं और टेक नहीं है, सबका होगया लेखी ॥देखा0
सत्त असत्त से न्यारा पाया, ज्ञान ध्यान से रही अलगाया।
वह अकाम वह अगम अमाया, अद्भुत रूप परेखा।
नहीं वह ज्ञान विषय तुयतित, नहीं वह गत और नहीं वह अवगत।
भूल भरम में पड़े जग के मत, भुले ज्ञानी भेषा।।
नहीं सुख रूप न होत दुखारी, नहीं अनहित और नहीं हितकारी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अगम अगाध अलेखा।
नहीं अनेक और एक नहीं है, नहीं वह ज्ञान विवेक नहीं हैं।
पक्ष नहीं और टेक नहीं है, सबका होगया लेखी ॥देखा0
सत्त असत्त से न्यारा पाया, ज्ञान ध्यान से रही अलगाया।
वह अकाम वह अगम अमाया, अद्भुत रूप परेखा।
नहीं वह ज्ञान विषय तुयतित, नहीं वह गत और नहीं वह अवगत।
भूल भरम में पड़े जग के मत, भुले ज्ञानी भेषा।।
नहीं सुख रूप न होत दुखारी, नहीं अनहित और नहीं हितकारी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अगम अगाध अलेखा।
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Song 7 — Hindi
(158) साधो समझ परी गुरु बानी ॥टेका।
सतगुरु दया साध की संगत, लख लिया ज्योत निशानी।
ज्योत अज्योत दोङ तज डारा, पाया पद निरवानी ॥
साधो0 जब लग गुरु से नाता नाहीं, रहा मूढ़ अज्ञानी।।
सिर पर हाथ गुरु ने फेरा, चरनन चित्त बसानी ॥
साधी तीरथ बरत नियम आचा, डारत भव की खानी।।
रूप अनून हिये जब दरसा, जान भये अनजानी।।
साधो वचन सुनाया प्रेम बढ़ाया, सैन बैन से जानी ,
मैं तो गुरु का सेवक साँचा, रहूँ चरन लिपटानी।।
साधो गुरु का सब विधि आज्ञाकारी, नहीं भावे सुत धन बित नारी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काल करे नहीं होनी ॥साधो
सतगुरु दया साध की संगत, लख लिया ज्योत निशानी।
ज्योत अज्योत दोङ तज डारा, पाया पद निरवानी ॥
साधो0 जब लग गुरु से नाता नाहीं, रहा मूढ़ अज्ञानी।।
सिर पर हाथ गुरु ने फेरा, चरनन चित्त बसानी ॥
साधी तीरथ बरत नियम आचा, डारत भव की खानी।।
रूप अनून हिये जब दरसा, जान भये अनजानी।।
साधो वचन सुनाया प्रेम बढ़ाया, सैन बैन से जानी ,
मैं तो गुरु का सेवक साँचा, रहूँ चरन लिपटानी।।
साधो गुरु का सब विधि आज्ञाकारी, नहीं भावे सुत धन बित नारी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काल करे नहीं होनी ॥साधो
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Song 8 — Hindi
(159) साधू चाल सन्त की न्यारीं ॥टेका।।
जो कोई आवे प्रेम भाव से, ताको अंग लगावे।।
अधिकारी को तत्व बतायें, भूल ज्ञान समझायें।साधो,
जामें प्रेम प्रीत नहीं देखें, ताका चित न दुखावें।।
दया रूप धारा संत ने, बिगड़ी बात बनावें ॥
साधो0 निंदा अस्तुति की नहीं चिन्ता, जीव उद्धार करावे।।
प्रेमीजन को अंग लगावें, सत्त रूप दिखलावें ॥
साधो करुन सागर सब गुन आगर, शब्द जहाज लगावें।।
खेवटिया होय तारें सबको, भव के पार करावें ॥
साधो मिले असाधु मौन बन जावे, साध को बचन सुनावे ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, शब्द सुनाये चितावें।
जो कोई आवे प्रेम भाव से, ताको अंग लगावे।।
अधिकारी को तत्व बतायें, भूल ज्ञान समझायें।साधो,
जामें प्रेम प्रीत नहीं देखें, ताका चित न दुखावें।।
दया रूप धारा संत ने, बिगड़ी बात बनावें ॥
साधो0 निंदा अस्तुति की नहीं चिन्ता, जीव उद्धार करावे।।
प्रेमीजन को अंग लगावें, सत्त रूप दिखलावें ॥
साधो करुन सागर सब गुन आगर, शब्द जहाज लगावें।।
खेवटिया होय तारें सबको, भव के पार करावें ॥
साधो मिले असाधु मौन बन जावे, साध को बचन सुनावे ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, शब्द सुनाये चितावें।
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Song 9 — Hindi
(160 1साधु जीवन ही मर रहना ॥टेक॥
सुरत शब्द का साधन करना, दुख सुख सिर पर सहना।।
करते करम अकर्मक होना, नहीं कुछ सुनना कहना ॥
साधु0 जल में कमल मुर्गाबी रहते, जल को अंग न गहना।
यह गति तो गुरु मुख कोई पावे, तीन ताप नहीं दहना ॥
साधु सुखमन के मध्य तिल का मारग, जाओ न बाये दहना।।
मध्य सुरत चले गुरु की दाया, प्रेम भक्ति धन लहना।।
साधु काम क्रोध अहंकार त्याग कर, गुरु मिल जग से निभना।
चेत चेत कर अन्दर धंसना, भव के धार न बहना ॥
साधु नहीं वह ज्ञान न तुर्यातित है, इनको नहीं कोई चहना।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम बस्त्र अब पहना ॥
साधु
सुरत शब्द का साधन करना, दुख सुख सिर पर सहना।।
करते करम अकर्मक होना, नहीं कुछ सुनना कहना ॥
साधु0 जल में कमल मुर्गाबी रहते, जल को अंग न गहना।
यह गति तो गुरु मुख कोई पावे, तीन ताप नहीं दहना ॥
साधु सुखमन के मध्य तिल का मारग, जाओ न बाये दहना।।
मध्य सुरत चले गुरु की दाया, प्रेम भक्ति धन लहना।।
साधु काम क्रोध अहंकार त्याग कर, गुरु मिल जग से निभना।
चेत चेत कर अन्दर धंसना, भव के धार न बहना ॥
साधु नहीं वह ज्ञान न तुर्यातित है, इनको नहीं कोई चहना।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम बस्त्र अब पहना ॥
साधु
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Song 10 — Hindi
(161) मैं पाया पाया पाया, गुरु नाम अमीरस पाया ॥टेक।
जब से कृपा भई सतगुरु की, छटे काल कर्म माया।।
चिन्ता डायन अब, न सतावे, निस दिन रहूँ हर्षाया।
मैं पाया वाचक ज्ञान में ज्ञानी भूले, योगी योग भरमाया।।
में तो गुरु का सेवक पूरा, रहूँ चरन की छाया।।
तीरथ बरत नेम नहीं धारू, सोधू न तन और काया।।
प्रेम भाव की ताड़ी लागी, सहजे मन ठहराया है।
मैं पाया जानेंगे कोई साध विवेकी, जिन पर गुरु की दाया।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सार का सार बताया ॥मैं पाया
जब से कृपा भई सतगुरु की, छटे काल कर्म माया।।
चिन्ता डायन अब, न सतावे, निस दिन रहूँ हर्षाया।
मैं पाया वाचक ज्ञान में ज्ञानी भूले, योगी योग भरमाया।।
में तो गुरु का सेवक पूरा, रहूँ चरन की छाया।।
तीरथ बरत नेम नहीं धारू, सोधू न तन और काया।।
प्रेम भाव की ताड़ी लागी, सहजे मन ठहराया है।
मैं पाया जानेंगे कोई साध विवेकी, जिन पर गुरु की दाया।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सार का सार बताया ॥मैं पाया
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Song 11 — Hindi
(162) घट का भेद नियारा साधु, वट का भेद नियारा ॥टेका।
इस घट भीतर बिजली चमके, बरसे अखंडित धारा।
घट के भीतर सूरज चांद है, घट में लाखों तारा।।
साधु0 घट में विष्णु करे जग पालन, घट में शम्भु सिंधारा।।
घट में ब्रह्मा वेद बखाने, घट में ज्ञान विचारा ।।।
घट में हिरण्यगर्भ अव्याकृत, घट बराट पसारा।।
घट में तर जन महर लोक हैं, घट सबका भण्डारा ॥
? घट के अन्दर उन्मनि लागी, घट भीतर संसारा।।
घट उपजे और घट ही बिनसे, घट ही सार असारा ॥
? घट का भेद समझ में आवे, जो गुरु देवे सहारा।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु छबि तन मन वारा।।
इस घट भीतर बिजली चमके, बरसे अखंडित धारा।
घट के भीतर सूरज चांद है, घट में लाखों तारा।।
साधु0 घट में विष्णु करे जग पालन, घट में शम्भु सिंधारा।।
घट में ब्रह्मा वेद बखाने, घट में ज्ञान विचारा ।।।
घट में हिरण्यगर्भ अव्याकृत, घट बराट पसारा।।
घट में तर जन महर लोक हैं, घट सबका भण्डारा ॥
? घट के अन्दर उन्मनि लागी, घट भीतर संसारा।।
घट उपजे और घट ही बिनसे, घट ही सार असारा ॥
? घट का भेद समझ में आवे, जो गुरु देवे सहारा।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु छबि तन मन वारा।।
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Song 12 — Hindi
(163)नित जीवन की आसा साधु, नित जीवन की आसा ॥टेका।
यह तो देह है अगमापाई, ज्यों जल बीच बतासा।।
बालू भीत बनाई रचि पचि, दिन दस का है तमासा।।
साधु0 तारा भी बिनसे चन्दा भी विनसे, विनसें धरन अकासा।।
जल अग्नी की कौन चलावे, बिनसे ब्रह्म का सांसा ॥
? लोक परलोक विनस जांय पल में, दिनसे सूर प्रकाशा।।
समझ देख तू मन में अपने, यहां काल का बासा।।
आसा तृष्णा आय भुलाना, एक दिन होय उदासा।।
धन दौलत से देह लगा कर, सुब गये अन्त निरासा।।साधु 0
जहाँ जहाँ दृष्टि जाय सब बिनसे, गले पड़ा यम का फाँसी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जियें सन्त के दासा ॥साधु0
यह तो देह है अगमापाई, ज्यों जल बीच बतासा।।
बालू भीत बनाई रचि पचि, दिन दस का है तमासा।।
साधु0 तारा भी बिनसे चन्दा भी विनसे, विनसें धरन अकासा।।
जल अग्नी की कौन चलावे, बिनसे ब्रह्म का सांसा ॥
? लोक परलोक विनस जांय पल में, दिनसे सूर प्रकाशा।।
समझ देख तू मन में अपने, यहां काल का बासा।।
आसा तृष्णा आय भुलाना, एक दिन होय उदासा।।
धन दौलत से देह लगा कर, सुब गये अन्त निरासा।।साधु 0
जहाँ जहाँ दृष्टि जाय सब बिनसे, गले पड़ा यम का फाँसी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जियें सन्त के दासा ॥साधु0
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Song 13 — Hindi
(164)एक दिन जाना है जरूर ॥टेका।
आय पड़े भव जाल फँसाने, घर से होगये दूर।।
गति मति भूली सत पद खोया, जग के भये मजूर ।एक दिन0
काल करम ने बहु उरझाया, काटे फन्द कोई सूर।।
मिटे अविद्या का अँधियारा, चमके घट सत नूर ॥
टम लगी जब मन दरपन में, होगया चकनाचूर।
रूप अनूप लखे कोई कैसे, अन्धकार भरपूर ॥
ब्याकुल हिया जिया रहा निरंतर, प्रगटे पुरुष हजूर।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, दी चरनन की धूर ॥
आय पड़े भव जाल फँसाने, घर से होगये दूर।।
गति मति भूली सत पद खोया, जग के भये मजूर ।एक दिन0
काल करम ने बहु उरझाया, काटे फन्द कोई सूर।।
मिटे अविद्या का अँधियारा, चमके घट सत नूर ॥
टम लगी जब मन दरपन में, होगया चकनाचूर।
रूप अनूप लखे कोई कैसे, अन्धकार भरपूर ॥
ब्याकुल हिया जिया रहा निरंतर, प्रगटे पुरुष हजूर।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, दी चरनन की धूर ॥
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Song 14 — Hindi
(165) संगत की बलिहारी साधु, संगत की बलिहारी ।।टेक।।
पारस के लोहा जब संग भयो, होगया कुन्दन रूप।
गजा के संग मिला दरिद्री, सब कोई समझे भूप।।
साधु0 माध संग से सब ही तर गये, कुटिल कुभाव कुचाल।
मन बच कर्म साध गति पाई, होगये सहज निहाल।
साधु आग की संगत पड़कर जल गये, कूड़ा करकट घास।
बाद बने क्यारी में आये, निकसा बास सुबास।।
साधु नद नाले का जल अति घृणित, गंगा आन मिलाया।
गंगा मिल गंगा भया सारा, नाम गंगोदक पाया ॥
साधु काट की नाव बनी अति हलकी, लादे पाथर लोहा।।
नाके संग तरे किस विधि सब, देख मेरा मन मोहा ॥
साधु | चंदन के हिंग रहत सदाही, नीम बबूल पलासा ।।
मन ही रूप आपना त्यागा, आवे चन्दन बासा ॥साधु
माया मोह में रहत फंसाना, मन मूरख अज्ञाना।
राधास्वामी चरन शरन जब धाया, होगया चतुर सुजाना।।
साधु0
पारस के लोहा जब संग भयो, होगया कुन्दन रूप।
गजा के संग मिला दरिद्री, सब कोई समझे भूप।।
साधु0 माध संग से सब ही तर गये, कुटिल कुभाव कुचाल।
मन बच कर्म साध गति पाई, होगये सहज निहाल।
साधु आग की संगत पड़कर जल गये, कूड़ा करकट घास।
बाद बने क्यारी में आये, निकसा बास सुबास।।
साधु नद नाले का जल अति घृणित, गंगा आन मिलाया।
गंगा मिल गंगा भया सारा, नाम गंगोदक पाया ॥
साधु काट की नाव बनी अति हलकी, लादे पाथर लोहा।।
नाके संग तरे किस विधि सब, देख मेरा मन मोहा ॥
साधु | चंदन के हिंग रहत सदाही, नीम बबूल पलासा ।।
मन ही रूप आपना त्यागा, आवे चन्दन बासा ॥साधु
माया मोह में रहत फंसाना, मन मूरख अज्ञाना।
राधास्वामी चरन शरन जब धाया, होगया चतुर सुजाना।।
साधु0
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Song 15 — Hindi
(166) साधु सुरति का खेल है न्यारा ॥टेक।।
जब लग सुरत की लगन लगी है, तब लग सुख की आसा।
सुरत हटी लव किस विधि लागे, मन अब भया उदासा।।
साधु0 धन सम्पत जब चित्त बसे तब, सुख आनन्द बिलसाने।
अब तो सुरत की दृष्टि फेरी, वह दुख रूप दिखाने।
साधु पुत्र कलत्तर से लौ लाये, भरम में रहे हँसाने।
अपना रूप समझ जब आया, सब से सुरत हटाने।।
साधु अपने बन्धन आय फंसे हम, ज्यों रेशम का कीड़ा।
सुरत का सार गुरु समझाया, मुक्ति उठाया बीड़ा।
साधु सुरत की मुक्ति सुरत का बन्धन, सुरत का सकल पसारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत को देखा नजारा ॥साधु
जब लग सुरत की लगन लगी है, तब लग सुख की आसा।
सुरत हटी लव किस विधि लागे, मन अब भया उदासा।।
साधु0 धन सम्पत जब चित्त बसे तब, सुख आनन्द बिलसाने।
अब तो सुरत की दृष्टि फेरी, वह दुख रूप दिखाने।
साधु पुत्र कलत्तर से लौ लाये, भरम में रहे हँसाने।
अपना रूप समझ जब आया, सब से सुरत हटाने।।
साधु अपने बन्धन आय फंसे हम, ज्यों रेशम का कीड़ा।
सुरत का सार गुरु समझाया, मुक्ति उठाया बीड़ा।
साधु सुरत की मुक्ति सुरत का बन्धन, सुरत का सकल पसारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत को देखा नजारा ॥साधु
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Song 16 — Hindi
(167) पड़ा हिंडोला गगन में, झूले सब कोई आय ॥टेका।
ब्रह्मा झूले रचना, के, शिव झूले संहार।।
विष्णु झूले पालन पोषण, शेष सीस के भार ॥
पड़ा0 तारा मंडल ऋषिगण झूले, झूले चांद और सूर।
देव दनुज की गति क्या वरनू, झूले छाया नूर ॥
पड़ा0 एक दशा में कोई न देखा, क्या ज्ञानी अज्ञानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु कृपा से जानी ॥पड़ा0
ब्रह्मा झूले रचना, के, शिव झूले संहार।।
विष्णु झूले पालन पोषण, शेष सीस के भार ॥
पड़ा0 तारा मंडल ऋषिगण झूले, झूले चांद और सूर।
देव दनुज की गति क्या वरनू, झूले छाया नूर ॥
पड़ा0 एक दशा में कोई न देखा, क्या ज्ञानी अज्ञानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु कृपा से जानी ॥पड़ा0
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Song 17 — Hindi
(168) घट में करले कमाई साधू , घट में करले कमाई ॥टेका।
पहले तिल का परदा फाड़ो, घंटा शंख बजाई।।
फिर त्रिकुटी में आन विराजो, धुन मृदंग लौ लाई।।साधु
सुन्न मंडल में आसन मारो, किंगरी शब्द समाई।
भंवर गुफा में मुरली बजाओ, मन की दुविधा मिटाई ॥
साधु0 सते चढ़ अलरव अगम पद निरखो, तब निज रूप दिखाई।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आवागवन नसाई।
पहले तिल का परदा फाड़ो, घंटा शंख बजाई।।
फिर त्रिकुटी में आन विराजो, धुन मृदंग लौ लाई।।साधु
सुन्न मंडल में आसन मारो, किंगरी शब्द समाई।
भंवर गुफा में मुरली बजाओ, मन की दुविधा मिटाई ॥
साधु0 सते चढ़ अलरव अगम पद निरखो, तब निज रूप दिखाई।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आवागवन नसाई।
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Song 18 — Hindi
(169) आयो आयो आया, मैं गुरु चरनन में आया ।।टेक॥
तिल में धंसा विराट को देखा, रचना न्यारी न्यारी।।
परगट विनसत छिन छिन पल पल, सो नहीं लगी प्यारी ।आया0
अव्याकृत त्रिकुटी में निरखा, रूप अनूप बिचारी।
वह स्थूल यह सूक्ष्म दिखाना, धोका भरम है भारी ॥आया
मुन्न महासुन्न हिरण्यगर्भ है, परखा नैन उघारी।
मोहे कारन ब्रह्म अवस्था, सब विधि परख निहारी ।।आया
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ब्रह्म की, ब्रह्मा विष्णु त्रिपुरारी।।
जैसा जीव ब्रह्म तस दरसा, मन बहु भया दुखारी ।।आया
मोहंग पुरुष भंवर दरसाना, सत्ता की छायारी।।
इसको छोड़ चली सुरत आगे, झिलमिल ज्योत जगारी ।आया
मत पद अलख अगम की लीला, देख देख हर्षारी।
गुरु की दया से अमर पद पाया, राधास्वामी पर बलिहारी ॥आया
तिल में धंसा विराट को देखा, रचना न्यारी न्यारी।।
परगट विनसत छिन छिन पल पल, सो नहीं लगी प्यारी ।आया0
अव्याकृत त्रिकुटी में निरखा, रूप अनूप बिचारी।
वह स्थूल यह सूक्ष्म दिखाना, धोका भरम है भारी ॥आया
मुन्न महासुन्न हिरण्यगर्भ है, परखा नैन उघारी।
मोहे कारन ब्रह्म अवस्था, सब विधि परख निहारी ।।आया
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ब्रह्म की, ब्रह्मा विष्णु त्रिपुरारी।।
जैसा जीव ब्रह्म तस दरसा, मन बहु भया दुखारी ।।आया
मोहंग पुरुष भंवर दरसाना, सत्ता की छायारी।।
इसको छोड़ चली सुरत आगे, झिलमिल ज्योत जगारी ।आया
मत पद अलख अगम की लीला, देख देख हर्षारी।
गुरु की दया से अमर पद पाया, राधास्वामी पर बलिहारी ॥आया
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Song 19 — Hindi
(170 ।दया मय अब तो कीजे दाया ।।टेका।
माया करम से जीव दुखारी, भव के फांस फँसायो।
छूटन की कोई राह न सूझे, भूल भरम भरमाया।।
दयामय0 अबल निबल में शक्ति कहां है, वह तो दीन दुखारी।
अपने बल तुम आन छुड़ाओ, जग जीवन हितकारी।।
दयामय शाह शाह कर चरन कमल में, होय अचेत प्रभु आयो।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, यम को फंद कटाओ।।दयामय
माया करम से जीव दुखारी, भव के फांस फँसायो।
छूटन की कोई राह न सूझे, भूल भरम भरमाया।।
दयामय0 अबल निबल में शक्ति कहां है, वह तो दीन दुखारी।
अपने बल तुम आन छुड़ाओ, जग जीवन हितकारी।।
दयामय शाह शाह कर चरन कमल में, होय अचेत प्रभु आयो।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, यम को फंद कटाओ।।दयामय
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Song 20 — Hindi
{ 171 } समझे नाहीं गॅवारा, सुरत का भेद अपारा ।।टेका।
सुख के कारन भूले भटके, भरमा बारम्बारा।।
कभी इन्द्री कभी मन बस होता, फिरता मारा मारा।।
समझे0 पुत्र कलत्र और मान बड़ाई, यह सब जाल पसारा।
इनमें सुख दें दे अज्ञानी, सुख इन सब से न्यारा।।
समझे नहीं नहीं यह करम धरम में, नहीं तत्व ज्ञान विचारा।।
यह तो भेद कोई गुरुमुख जाने, राधास्वामी चरन दुलारा ॥समझे
तीरथ बरत नियम और संयम, बहु की ये चार अचारा।।
फेरा फेरी में जनम गंवाया, हाथ लगा नहीं सारा।।
समझे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने दिया इशारा।।
मिट गया द्वन्द अचल हुई काया, सतगुरु के उपकारा ॥
समझे
सुख के कारन भूले भटके, भरमा बारम्बारा।।
कभी इन्द्री कभी मन बस होता, फिरता मारा मारा।।
समझे0 पुत्र कलत्र और मान बड़ाई, यह सब जाल पसारा।
इनमें सुख दें दे अज्ञानी, सुख इन सब से न्यारा।।
समझे नहीं नहीं यह करम धरम में, नहीं तत्व ज्ञान विचारा।।
यह तो भेद कोई गुरुमुख जाने, राधास्वामी चरन दुलारा ॥समझे
तीरथ बरत नियम और संयम, बहु की ये चार अचारा।।
फेरा फेरी में जनम गंवाया, हाथ लगा नहीं सारा।।
समझे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने दिया इशारा।।
मिट गया द्वन्द अचल हुई काया, सतगुरु के उपकारा ॥
समझे
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Song 21 — Hindi
(172)आया सतगुरु के दरबारा ।।टेका।
मिट गई पीर पुरानी मन की, भव से मिला छुटकारा ॥टेक।
पोथी पत्रा सेवा पूजा, सब ही भरम पसारा।।
जड़ चेतन की ग्रन्थी ग्रन्थ है, नैनो देख विचांरा।।
आया0 भक्ति भाव की गम अब पाई, गुरु चरनन के सहारा।।
न्हाये धोये काम न निकसे, भूल रहा संसारा ॥
आया नौ को छोड़ चले घट अन्तर, नजर पड़ा दस द्वारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तन मन गुरु पर वारा ॥
आया
मिट गई पीर पुरानी मन की, भव से मिला छुटकारा ॥टेक।
पोथी पत्रा सेवा पूजा, सब ही भरम पसारा।।
जड़ चेतन की ग्रन्थी ग्रन्थ है, नैनो देख विचांरा।।
आया0 भक्ति भाव की गम अब पाई, गुरु चरनन के सहारा।।
न्हाये धोये काम न निकसे, भूल रहा संसारा ॥
आया नौ को छोड़ चले घट अन्तर, नजर पड़ा दस द्वारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तन मन गुरु पर वारा ॥
आया
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Song 22 — Hindi
| 173) मैं हूँ दास तुम्हारा प्रभु जी, मैं हूँ दास तुम्हारा ॥टेक।
तुम मेरे स्वामी तुम मेरे दाता, तुम मेरे भरतारा।।
तुम से आस लगी है निस दिन, तुम्हरा मुझे सहारा ॥
प्रभुजी0 भव सार,र अति गहर गम्भीरा, सूझे बार न पारा ।
दया करो करुना चित लाओ, नाव पड़ी मॅझधारा।।
प्रभुजी0 मेरी ओर न देखो स्वामी, मैं हूँ अधम अकारा।।
पतित उधारन नाम तुम्हारो, मन में करो बिचारा ।।।
काम क्रोध मद लोभ भुलाना, रोम रोम हंकारा।।
पचलड़ सतलड़ अठलड़ रसरी, केहि विधि हो छुटकारा।
तुम देखत नित अवगुन करता, सुध बुध सकल बिसारा।।
विनती कैसे करू दयामय, मेन से अति ही हारा ।।।
प्रेम प्रीति की रीति न जानी, चखा न अमृत सारा।
भक्ति भाव से परिचय नाहीं, काल कर्म ने मारा ।।।
राधास्वामी दया के सागर, करुनामय करतारा।
वाह वाह चरन बलिहारी, आन करो निस्तारा।
तुम मेरे स्वामी तुम मेरे दाता, तुम मेरे भरतारा।।
तुम से आस लगी है निस दिन, तुम्हरा मुझे सहारा ॥
प्रभुजी0 भव सार,र अति गहर गम्भीरा, सूझे बार न पारा ।
दया करो करुना चित लाओ, नाव पड़ी मॅझधारा।।
प्रभुजी0 मेरी ओर न देखो स्वामी, मैं हूँ अधम अकारा।।
पतित उधारन नाम तुम्हारो, मन में करो बिचारा ।।।
काम क्रोध मद लोभ भुलाना, रोम रोम हंकारा।।
पचलड़ सतलड़ अठलड़ रसरी, केहि विधि हो छुटकारा।
तुम देखत नित अवगुन करता, सुध बुध सकल बिसारा।।
विनती कैसे करू दयामय, मेन से अति ही हारा ।।।
प्रेम प्रीति की रीति न जानी, चखा न अमृत सारा।
भक्ति भाव से परिचय नाहीं, काल कर्म ने मारा ।।।
राधास्वामी दया के सागर, करुनामय करतारा।
वाह वाह चरन बलिहारी, आन करो निस्तारा।
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Song 23 — Hindi
(174)दया मय क्यों इतनी देर लगाई ॥टेक।।
मैं तो पतित निकारा, अङ्ग अङ्ग में जड़ताई।
अपनी जड़ता सोच समझ मन, ली चरनन शरनाई ।।दया0
भव सागर में नाव पड़ी है, नहीं कोई संग सहाई।
त्राह त्राह स्वामी नित्त पुकारू, दुख संकट कटजाई ॥दया।
मेरी ओर न देखो कब ही, मुझ में कहाँ भलाई।
अपनी दया की ओर निहारो, तुम में दया अधिकाई ।।दया
नहीं पुरुषारथ नहीं बलमोरे, नहीं धन धाम बड़ाई।
दीन अधीन शरन में आया, चरनन चित्त बसाई ॥
दया देर भई बहु देर भई है, काल महा दुखदाई।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,लो भव भेद मिटाई ।
मैं तो पतित निकारा, अङ्ग अङ्ग में जड़ताई।
अपनी जड़ता सोच समझ मन, ली चरनन शरनाई ।।दया0
भव सागर में नाव पड़ी है, नहीं कोई संग सहाई।
त्राह त्राह स्वामी नित्त पुकारू, दुख संकट कटजाई ॥दया।
मेरी ओर न देखो कब ही, मुझ में कहाँ भलाई।
अपनी दया की ओर निहारो, तुम में दया अधिकाई ।।दया
नहीं पुरुषारथ नहीं बलमोरे, नहीं धन धाम बड़ाई।
दीन अधीन शरन में आया, चरनन चित्त बसाई ॥
दया देर भई बहु देर भई है, काल महा दुखदाई।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,लो भव भेद मिटाई ।
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Song 24 — Hindi
(175) मन भजरे साहेब करतार ॥टेक।
उमर बिताई समय गंवाया, मिला न ठौर ठिकाना।
प्रेम भक्ति की रीति न जानी, जग धंदै भरमाया।
मन रे0 दो दिन का रहना है प्रानी, दो दिन का व्यौहार।।
दो दिन का यह सकल पसारा, दो दिन कुल परिवार ॥
मन रे0 जो आये हैं जायेगे एक दिन, कैसा घर और डेरा।
मूरख सोच समझ मन अपने, चिड़िया रैन बसेरा ॥
मन रे0 रात विषय में लम्पट रहता, दिन को खाना पीना।।
ऐसे प्रानी पशु है जग में, धिक धिक उनका जीना ॥मने रे0
सतगुरु राधास्वामी पाये, सार मेद समझाया।।
अब नहीं पड़ करम के धंदे, भक्ति स्वाद रस पायो।मन रे0
उमर बिताई समय गंवाया, मिला न ठौर ठिकाना।
प्रेम भक्ति की रीति न जानी, जग धंदै भरमाया।
मन रे0 दो दिन का रहना है प्रानी, दो दिन का व्यौहार।।
दो दिन का यह सकल पसारा, दो दिन कुल परिवार ॥
मन रे0 जो आये हैं जायेगे एक दिन, कैसा घर और डेरा।
मूरख सोच समझ मन अपने, चिड़िया रैन बसेरा ॥
मन रे0 रात विषय में लम्पट रहता, दिन को खाना पीना।।
ऐसे प्रानी पशु है जग में, धिक धिक उनका जीना ॥मने रे0
सतगुरु राधास्वामी पाये, सार मेद समझाया।।
अब नहीं पड़ करम के धंदे, भक्ति स्वाद रस पायो।मन रे0
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Song 25 — Hindi
(176 कुल सं0 1081)
तेरी अस्तुति क्या करू देवा, मनवानी के पार है तू।
परम तत्व आनन्द परम धन, परमारथ का सार है तू ॥
अगम अनाम अकाम अमाया, अन्तर बाहर व्यापा है।
अकथ अथाह अरूप अगोचर, आप आपका आपा है।।
अगुन सगुन अद्वैत द्वैत में, सब में सब से न्यारा है।
सब में रमा निरंतर बासी, सब से अपरम्पारा है।
मंगलमये मंगल की खानी, ज्ञान बुद्धि भंडारा है।।
अलख अलौकिक अमर अजर विभो,शब्द ज्योति टकसारा है।।
वेद न जाने भेद अनुपम, किंस विधि बरन कहूँ देवा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु स्वरूप की करू सेवा ।।
इक्कीसवी धुन
तेरी अस्तुति क्या करू देवा, मनवानी के पार है तू।
परम तत्व आनन्द परम धन, परमारथ का सार है तू ॥
अगम अनाम अकाम अमाया, अन्तर बाहर व्यापा है।
अकथ अथाह अरूप अगोचर, आप आपका आपा है।।
अगुन सगुन अद्वैत द्वैत में, सब में सब से न्यारा है।
सब में रमा निरंतर बासी, सब से अपरम्पारा है।
मंगलमये मंगल की खानी, ज्ञान बुद्धि भंडारा है।।
अलख अलौकिक अमर अजर विभो,शब्द ज्योति टकसारा है।।
वेद न जाने भेद अनुपम, किंस विधि बरन कहूँ देवा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु स्वरूप की करू सेवा ।।
इक्कीसवी धुन
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Song 26 — Hindi
प्रार्थना (177 संख्या 1082)
गुरु समरथ दाता, नमो नमो ।
सुर नर मुनि त्राता, नमो नमो।
हितकर पितु माता ज्ञानी ज्ञाता, जगत बिधाता नमो नमो।
गुरु नववंश विभूषन जन मन पौषने, सरसिज सम लोचन नमो नमो।
अवलोक्य सहायक बहु सुख दायक, सन्तन कुल नायक नमो नमो।
आनन्द घटरासी घट घट बासी, सत चित अबिनासी नमो नमो।
राधास्वामी दयाला सहज कृपाला, उर बिमल विशाला नमो नमो ॥
गुरु समरथ दाता, नमो नमो ।
सुर नर मुनि त्राता, नमो नमो।
हितकर पितु माता ज्ञानी ज्ञाता, जगत बिधाता नमो नमो।
गुरु नववंश विभूषन जन मन पौषने, सरसिज सम लोचन नमो नमो।
अवलोक्य सहायक बहु सुख दायक, सन्तन कुल नायक नमो नमो।
आनन्द घटरासी घट घट बासी, सत चित अबिनासी नमो नमो।
राधास्वामी दयाला सहज कृपाला, उर बिमल विशाला नमो नमो ॥
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Song 27 — Hindi
(1-178) इस घट का परदा खोलरी, घट जगत पसारा ॥टेक।
घट में कासी घट में फाँसी, घट में यम का द्वारा।
घट में ज्ञान ध्यान सन्यासी, घट ही में निस्तारा।
घट में घट को तोलरी, घट अगम अपारा।
इस0 घट में ब्रह्मा वेद बिचारे, घट में विष्णु करतारा।।
घट में शिव शक्ति का बासा, घट ही में संहारा।
घट में शब्द अनमोल री, घट का ले सहारा।।
इस0 घट का घाट पाट (हचानो, पिंड देस दस द्वारा।।
घट में खेल खिलाड़ी जानो, घट में जीत और हारा।
घट के बीच तू डोलरी, घट सब से न्यारा।
इस0 घट में अटपट घट में सटपट, घट में मोह हंकारा।
घट में खटपट घट में चटपट, घट में ब्रह्म उजियारा।
घट की बानी बोलरी, घट अधिक पियार।।इस0
घट की निरख परख रखवारी, घट का करे विचारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट का लखे किंवारा।
बाजत अनहद ढोलरी, चमका घट तारा ॥इस0
घट में कासी घट में फाँसी, घट में यम का द्वारा।
घट में ज्ञान ध्यान सन्यासी, घट ही में निस्तारा।
घट में घट को तोलरी, घट अगम अपारा।
इस0 घट में ब्रह्मा वेद बिचारे, घट में विष्णु करतारा।।
घट में शिव शक्ति का बासा, घट ही में संहारा।
घट में शब्द अनमोल री, घट का ले सहारा।।
इस0 घट का घाट पाट (हचानो, पिंड देस दस द्वारा।।
घट में खेल खिलाड़ी जानो, घट में जीत और हारा।
घट के बीच तू डोलरी, घट सब से न्यारा।
इस0 घट में अटपट घट में सटपट, घट में मोह हंकारा।
घट में खटपट घट में चटपट, घट में ब्रह्म उजियारा।
घट की बानी बोलरी, घट अधिक पियार।।इस0
घट की निरख परख रखवारी, घट का करे विचारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट का लखे किंवारा।
बाजत अनहद ढोलरी, चमका घट तारा ॥इस0
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Song 28 — Hindi
(2-179) आई देश बेगानी, तू मेरी सुरत सियानी ॥टेक।।
माया ने की कल्पित रचना, देख के तू भरमानी।
सार असार की गम नहीं तुझको, लीला निरख लुभानी।।
मन में उपजी गलानी ॥
दस इन्दिन संग भोग विलासा, ले इच्छा लपटानी।।
बन्धन की पड़ी गले में फाँसी, उरझ उरझ उरझानी।
नहीं गुत्थी सुलझानी ।।
आई0 काम क्रोध मद मोह लोभ लग, अपना रूप बुलानी।
ऐसा मित्र मिला नहीं कोई, जो सत मर्म लखानी।
हो सच्चा ज्ञानी ध्यानी ।।
आई0 धर्म कर्म की राह चली जब, अटकी पत्थर पानी।
थक थक ज्ञान विचार में आई, भरमी मान गुमानी।
समझ नहीं आई बानी ।।
आई0 ऐसी दशा देख राधास्वामी, मन में दया समानी।
सुरत शब्द का पन्थ लखाया, अब तो चेत अज्ञानी।
तत्व को ले पहचान ।
माया ने की कल्पित रचना, देख के तू भरमानी।
सार असार की गम नहीं तुझको, लीला निरख लुभानी।।
मन में उपजी गलानी ॥
दस इन्दिन संग भोग विलासा, ले इच्छा लपटानी।।
बन्धन की पड़ी गले में फाँसी, उरझ उरझ उरझानी।
नहीं गुत्थी सुलझानी ।।
आई0 काम क्रोध मद मोह लोभ लग, अपना रूप बुलानी।
ऐसा मित्र मिला नहीं कोई, जो सत मर्म लखानी।
हो सच्चा ज्ञानी ध्यानी ।।
आई0 धर्म कर्म की राह चली जब, अटकी पत्थर पानी।
थक थक ज्ञान विचार में आई, भरमी मान गुमानी।
समझ नहीं आई बानी ।।
आई0 ऐसी दशा देख राधास्वामी, मन में दया समानी।
सुरत शब्द का पन्थ लखाया, अब तो चेत अज्ञानी।
तत्व को ले पहचान ।
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Song 29 — Hindi
| 3-180।।सुख मंगल की खानी, अयोध्या दशरथ की रजधानी ।।टेक।।
दस इन्द्रिन का रथ बनवाया, दशरथ आप कहूया।
सतरज तम के तीन गुनन संग, भोग विलास मचाया।यही तीनों हुई रानी ॥
दशरथ कुल में चार पुत्र हुये, मन चित बुद्धि हंकारा।।
भरत शत्रुहन राम लखन सोई, एक एक से न्यारा ॥बली मानी अभिमानी ॥2॥
दस इन्द्रिन से भये उदासी, राम लखन बनबासी।
अवध शरीर पिंड का त्यागा, हुये ब्रह्मांड निवासी ॥बन तपसी विज्ञानी ॥3॥
सीता सती को साथ लिये सोई, बन में आसन मारा।
रज रावण सीता हर लीनी, रच माया विस्तारा ॥राम मन उपजी गलानी ॥4॥
मान हना हनुमान बना वह, लंक की ओर सिधारा।
सिंध में सेत बांध कर लाँधा, ज्ञान से रावण मारा ।।लाया सीता महारानी ।।5।।
वानर रीछ असुर दल साजा, सत रज तम गुनवानी।
त्रिकुटी गढ़ लंका तब जीता, मेघ ओम् सुन बानी ॥जीत से अति सुख मानी ॥6॥
गुप्त भया गुप्तार घाट में, ब्रह्म रूप की धारा।
सोई सरयू निरमल जानो, समझ के करो विचारा।।राधास्वामी कहत बखानी ॥7॥
दस इन्द्रिन का रथ बनवाया, दशरथ आप कहूया।
सतरज तम के तीन गुनन संग, भोग विलास मचाया।यही तीनों हुई रानी ॥
दशरथ कुल में चार पुत्र हुये, मन चित बुद्धि हंकारा।।
भरत शत्रुहन राम लखन सोई, एक एक से न्यारा ॥बली मानी अभिमानी ॥2॥
दस इन्द्रिन से भये उदासी, राम लखन बनबासी।
अवध शरीर पिंड का त्यागा, हुये ब्रह्मांड निवासी ॥बन तपसी विज्ञानी ॥3॥
सीता सती को साथ लिये सोई, बन में आसन मारा।
रज रावण सीता हर लीनी, रच माया विस्तारा ॥राम मन उपजी गलानी ॥4॥
मान हना हनुमान बना वह, लंक की ओर सिधारा।
सिंध में सेत बांध कर लाँधा, ज्ञान से रावण मारा ।।लाया सीता महारानी ।।5।।
वानर रीछ असुर दल साजा, सत रज तम गुनवानी।
त्रिकुटी गढ़ लंका तब जीता, मेघ ओम् सुन बानी ॥जीत से अति सुख मानी ॥6॥
गुप्त भया गुप्तार घाट में, ब्रह्म रूप की धारा।
सोई सरयू निरमल जानो, समझ के करो विचारा।।राधास्वामी कहत बखानी ॥7॥
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Song 30 — Hindi
(4-181) कर आंख बन्द घट में तब दर्शन, गुरु स्वामी का पावेगा ॥टेका।
दह में आंख आंख में तिल है, तिल में ज्योत उजाला।
ज्योत निरख कर ज्योत में दर्शन, ज्योत को बोल है बाला।।
बिन आंख बन्द किये लाख यतन कर,कुछ भी नजर न आवेगा।।कर0
में कान कान आकाशा, शब्द आकाश का बासी।
शब्द को सुनकर भजन शब्द का, बस सुख मन सुखरासी।
बिना कान बन्द किये अनहद धुन को, कैसे प्रगट करावेगा ।।कर
ॐदेह में रसना अग्नी, अग्नी नाम पसारा।
रूप से पहिले नाम का सुमिरन, नाम का भेद अयारा ॥
बिन जीभ बन्द किये अजपा जाप की,विधि क्या कोई समझावेगा ।
कर देह में मन मन चित हंकारा, अहंकार बुद्धि खानी।।
मन को बस कर शर्म दम साधन, तभी बने गुरु ज्ञानी ॥
बिन इस मन साधन के प्रानी, काल करम भरमावेगा।
कर0 देह में सिंध सिंध में धारा, धार में बुन्द पसारा।
दरिया लहर बुद लख लीला, जो भव जल के पारा।।
बिना बुन्द सिंध गति समझे, तत्व हाथ नहीं आवेगी।
कर0 देह में आंख कान और जिभ्या, मन तीनों में व्यापा।
तीन बंद जब लग न लगाये, कैसे स्वझे आपा ॥
विना बन्द यह तीन लगाये, आपा लखा न जावेगा ॥
कर0 देह में सब कुछ देह में संगत, संगत सतसंगी प्यारे।।
सतसंगी मन प्रेम परख हो, राधास्वामी के मतवारे।
बिन सतसंग विवेक न होगा, सतसंग काम बनावेगा।कर0
दह में आंख आंख में तिल है, तिल में ज्योत उजाला।
ज्योत निरख कर ज्योत में दर्शन, ज्योत को बोल है बाला।।
बिन आंख बन्द किये लाख यतन कर,कुछ भी नजर न आवेगा।।कर0
में कान कान आकाशा, शब्द आकाश का बासी।
शब्द को सुनकर भजन शब्द का, बस सुख मन सुखरासी।
बिना कान बन्द किये अनहद धुन को, कैसे प्रगट करावेगा ।।कर
ॐदेह में रसना अग्नी, अग्नी नाम पसारा।
रूप से पहिले नाम का सुमिरन, नाम का भेद अयारा ॥
बिन जीभ बन्द किये अजपा जाप की,विधि क्या कोई समझावेगा ।
कर देह में मन मन चित हंकारा, अहंकार बुद्धि खानी।।
मन को बस कर शर्म दम साधन, तभी बने गुरु ज्ञानी ॥
बिन इस मन साधन के प्रानी, काल करम भरमावेगा।
कर0 देह में सिंध सिंध में धारा, धार में बुन्द पसारा।
दरिया लहर बुद लख लीला, जो भव जल के पारा।।
बिना बुन्द सिंध गति समझे, तत्व हाथ नहीं आवेगी।
कर0 देह में आंख कान और जिभ्या, मन तीनों में व्यापा।
तीन बंद जब लग न लगाये, कैसे स्वझे आपा ॥
विना बन्द यह तीन लगाये, आपा लखा न जावेगा ॥
कर0 देह में सब कुछ देह में संगत, संगत सतसंगी प्यारे।।
सतसंगी मन प्रेम परख हो, राधास्वामी के मतवारे।
बिन सतसंग विवेक न होगा, सतसंग काम बनावेगा।कर0
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Song 31 — Hindi
(5-183) सखियो आओ अब सतसंग में, राधास्वामी के नित ।।टेका।
यह संसार बिपत की खानी, नित उठ कलह कलेश सहानी।
वृथा जीवन समय बितानी, नर देही की सार न जानी।।
हित तज भया अनहित ॥1॥
भक्ति प्रेम से नहीं लव लागी, स्वारथ वश परमारथ त्यागी।
बाहर भीतर भरम की आगी, भड़की आग चल जल्द अभागी ॥
धर गुरु बानी चित ॥2॥
बचन प्रभाव समझ जब पाओ, सुरत शब्द घट योग कमाओ।
अन्तर मुख विरती ठेराओ, बाहर मुख की दशा भुलाओ।
भजन हो प्रेम सहित ॥3॥
युक्ति सहज सुगम है प्यारी, नहीं कठिन नहीं कुरस न खारी।।
अन्तर लगे सुरत की तारी, अपही नसे भाव संसारी ॥
जीते जी का हित ।।4।।
राधास्वामी दाता जग हितकारी, परमारथी परम उपकारी।
जग जीवन को देख दुखारी, धारा संत रूप अवतारी ॥
राधास्वामी मात और पित ॥5॥
(6-183) सखियो लाओ री आनन्द से सुख भक्ति गजरा ॥टेक।।
घट में खुली प्रेम की क्यारी, अद्भुत अनुपम प्यारी प्यारी।
एदय देख के भया सुखारी, सुरत मालिनी गूदे आरी ॥मुमती गजरा ॥1॥
श्रद्धा गेंदा भाव चमेली, दया केतकी क्षमा की बेली।
खिली सेवती प्रीत अलबेली, जूही उमंग हरष हरयेली ॥शक्ति गजरा ॥2॥
सुरत शब्द के तार गुथाओ, ध्यान ज्ञान के गिरह दिलाओ।
चित की वृत्ति सुमेर बनाओ, राधास्वामी गले अन पहनाओ।मुक्ति गजरा ॥3॥
यह संसार बिपत की खानी, नित उठ कलह कलेश सहानी।
वृथा जीवन समय बितानी, नर देही की सार न जानी।।
हित तज भया अनहित ॥1॥
भक्ति प्रेम से नहीं लव लागी, स्वारथ वश परमारथ त्यागी।
बाहर भीतर भरम की आगी, भड़की आग चल जल्द अभागी ॥
धर गुरु बानी चित ॥2॥
बचन प्रभाव समझ जब पाओ, सुरत शब्द घट योग कमाओ।
अन्तर मुख विरती ठेराओ, बाहर मुख की दशा भुलाओ।
भजन हो प्रेम सहित ॥3॥
युक्ति सहज सुगम है प्यारी, नहीं कठिन नहीं कुरस न खारी।।
अन्तर लगे सुरत की तारी, अपही नसे भाव संसारी ॥
जीते जी का हित ।।4।।
राधास्वामी दाता जग हितकारी, परमारथी परम उपकारी।
जग जीवन को देख दुखारी, धारा संत रूप अवतारी ॥
राधास्वामी मात और पित ॥5॥
(6-183) सखियो लाओ री आनन्द से सुख भक्ति गजरा ॥टेक।।
घट में खुली प्रेम की क्यारी, अद्भुत अनुपम प्यारी प्यारी।
एदय देख के भया सुखारी, सुरत मालिनी गूदे आरी ॥मुमती गजरा ॥1॥
श्रद्धा गेंदा भाव चमेली, दया केतकी क्षमा की बेली।
खिली सेवती प्रीत अलबेली, जूही उमंग हरष हरयेली ॥शक्ति गजरा ॥2॥
सुरत शब्द के तार गुथाओ, ध्यान ज्ञान के गिरह दिलाओ।
चित की वृत्ति सुमेर बनाओ, राधास्वामी गले अन पहनाओ।मुक्ति गजरा ॥3॥
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Song 32 — Hindi
(7-184) सखी घट देवल में चलकर, कीजो गुरु ध्याना ॥टेक।
देवल बनी सुहाना प्यारी, अद्भुत अगम विचित्र अपारी।
स्खु र खूट में देव पुजारी, शोभा धामी शोभा धारी ॥मुरबाना ॥1॥
3वल गुरु मूरत की शोभा, आनन्द छवि चेतन छबि छोभा।
निरख सुरत नैन चित लोभा, मन की उमंग हर्ष कर चोभा ॥भर ध्याना ।।2।।
) कमल नेत्र कर कमल समाना, कमल अकार चरन लखे जाना।
सेत कमल शरीर अनुमाना, सेत वस्त्र का पहरे बाना।मन माना ॥3॥
बिन दीवा बाती जल ज्योती, ज्योत ज्योत में ज्योत की सोती।
जगमग पन्ना हीरा मोती, ज्योत तार में ज्योत पिरोती।।परमाना ॥4॥
बाजे घट शंख मृदंगा, बंसी बीन सरंग सरंगा।
राधास्वामी धुन में राग सरंगा, विधि पूजा सीखी सतसंगा।हर्षाना ।।5।।
देवल बनी सुहाना प्यारी, अद्भुत अगम विचित्र अपारी।
स्खु र खूट में देव पुजारी, शोभा धामी शोभा धारी ॥मुरबाना ॥1॥
3वल गुरु मूरत की शोभा, आनन्द छवि चेतन छबि छोभा।
निरख सुरत नैन चित लोभा, मन की उमंग हर्ष कर चोभा ॥भर ध्याना ।।2।।
) कमल नेत्र कर कमल समाना, कमल अकार चरन लखे जाना।
सेत कमल शरीर अनुमाना, सेत वस्त्र का पहरे बाना।मन माना ॥3॥
बिन दीवा बाती जल ज्योती, ज्योत ज्योत में ज्योत की सोती।
जगमग पन्ना हीरा मोती, ज्योत तार में ज्योत पिरोती।।परमाना ॥4॥
बाजे घट शंख मृदंगा, बंसी बीन सरंग सरंगा।
राधास्वामी धुन में राग सरंगा, विधि पूजा सीखी सतसंगा।हर्षाना ।।5।।
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Song 33 — Hindi
(8-185) आली री गुरु भक्ति बिना, नर जीवन निष्फल ।।टेक।।
मानुष तन का भक्ति है भूषण, प्रेम प्रीति सिंगारा।।
श्रद्धा दया क्षमा चित बाढ़, सूझे पर उपकारा।।
बुद्धि मन सब हों निर्मल ॥1॥
काम क्रोध और लोभ मोह मद, त्याग डाह हंकारा।
जो निष्काम करे गुरु भक्ति, सूझे ज्ञान विचारा ॥
फसे नहीं जग के दलदल ॥2॥
परमारथ के मग में पग धर, सुधर जाये व्यौहारा।
लोक में यश परलोक से आनन्द, जीवन मुक्ति बिहारा।।
काल माया करम निर्बल ॥3॥
जीतेजी तन रहते पावे, निज स्वरूप का दर्शन।
जब यहां दर्शन तत्व प्राप्त हो, आगे भी वही लक्षण।।
मिला मानुष तन का फल ॥4॥
राधास्वामी गुरु में मौज दिखाई, सतसंग सार सुझाया।
अपनी आंखों देख लिया सेब, भक्ति मुक्ति का सारा।।
भया सत मत में निश्चल ॥5॥
मानुष तन का भक्ति है भूषण, प्रेम प्रीति सिंगारा।।
श्रद्धा दया क्षमा चित बाढ़, सूझे पर उपकारा।।
बुद्धि मन सब हों निर्मल ॥1॥
काम क्रोध और लोभ मोह मद, त्याग डाह हंकारा।
जो निष्काम करे गुरु भक्ति, सूझे ज्ञान विचारा ॥
फसे नहीं जग के दलदल ॥2॥
परमारथ के मग में पग धर, सुधर जाये व्यौहारा।
लोक में यश परलोक से आनन्द, जीवन मुक्ति बिहारा।।
काल माया करम निर्बल ॥3॥
जीतेजी तन रहते पावे, निज स्वरूप का दर्शन।
जब यहां दर्शन तत्व प्राप्त हो, आगे भी वही लक्षण।।
मिला मानुष तन का फल ॥4॥
राधास्वामी गुरु में मौज दिखाई, सतसंग सार सुझाया।
अपनी आंखों देख लिया सेब, भक्ति मुक्ति का सारा।।
भया सत मत में निश्चल ॥5॥
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Song 34 — Hindi
(6-186) मैं दिवानी हो गई ।।टेक।।
गुरु के रूप का भेद बताया, अपनी कृपा से अंग लगाया।
ढारस दे दे दासी बनाया, दुख दारुन से खोट छुड़ाया।।
निज ज्ञान से ज्ञानी होगई ॥1॥
सुमिरन ध्यान की विधि समझाई, भजन प्रभाव की गति लखाई।
सतसंगत की बानी सुनाई, दृष्टि के अन्दर दृष्टि खुलाई।।
सुख से मगनानी होगई ।।2।।
जब से देखी सोहंग की लीला, वज कुशील को भई सुशीला।।
त्रिकुटी का घट प्रगटा टोला, राधास्वामी पन्थ चली फुरतीला।
सहज निरवानी हो गई ॥3॥
गुरु के रूप का भेद बताया, अपनी कृपा से अंग लगाया।
ढारस दे दे दासी बनाया, दुख दारुन से खोट छुड़ाया।।
निज ज्ञान से ज्ञानी होगई ॥1॥
सुमिरन ध्यान की विधि समझाई, भजन प्रभाव की गति लखाई।
सतसंगत की बानी सुनाई, दृष्टि के अन्दर दृष्टि खुलाई।।
सुख से मगनानी होगई ।।2।।
जब से देखी सोहंग की लीला, वज कुशील को भई सुशीला।।
त्रिकुटी का घट प्रगटा टोला, राधास्वामी पन्थ चली फुरतीला।
सहज निरवानी हो गई ॥3॥
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Song 35 — Hindi
(10-187) भया रे मेरा मनुआ अब गुरु ज्ञानी ।।टेका।
पहले यह था निपट संसारी, तज असार को होगया सारी।
सहजे जनम को लिया सुधारी, भवसागर से उतरा पारी।।
हुआ आनन्द सुख खानी ॥1॥
प्रेम भक्ति का पहना बाना, गुरु के प्रेम में सदा दिवाना।
तोड़ा माया का ताना बाना, कैसे यह मन भया सियाना।
मेटो द्वन्द गलानी ॥2॥
पृथवी तज नभ मंडल डोले, काल के अब नहीं सहे झकोले।
हँस हँस मधुरी बानी बोले, अपने आप में रहे अडोले।।
गुरु का प्रेम अभिमानी ॥3॥
गुमिरन भजन ध्यान नित करता, सिर पर कर्म का भार न धरता।
अब नहिं जनमा अब नहीं मरता, कमल पत्र सम भव जल तरता।
जीते जी निरवानी ।।4।।
ॐधन धन धन राधास्वामी, तुम्हरे चरन में कोटि नमामी।।
तुम हो सच्चे अन्तरयामी, तुम्हरी दया मन हुआ अकामी।
बार बार बल जानी ॥5॥
पहले यह था निपट संसारी, तज असार को होगया सारी।
सहजे जनम को लिया सुधारी, भवसागर से उतरा पारी।।
हुआ आनन्द सुख खानी ॥1॥
प्रेम भक्ति का पहना बाना, गुरु के प्रेम में सदा दिवाना।
तोड़ा माया का ताना बाना, कैसे यह मन भया सियाना।
मेटो द्वन्द गलानी ॥2॥
पृथवी तज नभ मंडल डोले, काल के अब नहीं सहे झकोले।
हँस हँस मधुरी बानी बोले, अपने आप में रहे अडोले।।
गुरु का प्रेम अभिमानी ॥3॥
गुमिरन भजन ध्यान नित करता, सिर पर कर्म का भार न धरता।
अब नहिं जनमा अब नहीं मरता, कमल पत्र सम भव जल तरता।
जीते जी निरवानी ।।4।।
ॐधन धन धन राधास्वामी, तुम्हरे चरन में कोटि नमामी।।
तुम हो सच्चे अन्तरयामी, तुम्हरी दया मन हुआ अकामी।
बार बार बल जानी ॥5॥
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Song 36 — Hindi
(11-188) काल ने आकर घेरा, चेत ले चैत सबेरा ।।टेक।।
किसका कौन कौन है किंसका, कोई न संगी साथी।
माल खजाना संग न जावे, संग न थोड़े हाथी।
कौन है इन में तेरा ॥1॥
कुटुम्ब कबीला निज मतलब के, स्त्र रथ बस लिपटाने।
बिन स्वारथ नहीं साथ कभी दें, यह सब कोई जाने ।
जान कर चित नहीं फेरा ॥2॥
मैं समझ यह देह है मेरी, हाथ पवि हैं अपने।
चलते समय से थि नहीं कोई, क्या यह रात के सपने।।
सोच ले सोच का बेरा ॥3॥
छूटे प्राण सांस भी छूटें, छूटे नस और नाड़ी।
इनके फांस फसा है क्यों हैं, क्या अज्ञानी अनारी ॥
व्याप रहो भर्म अन्धेरा ॥4॥
राधास्वामी की जा संगत में, कर कुछ बचन बिलासा।
सैन बैन से रूप समझ ले, शब्द योग अभ्यासा।।
डाल सतलोक में डेरा ॥5॥
किसका कौन कौन है किंसका, कोई न संगी साथी।
माल खजाना संग न जावे, संग न थोड़े हाथी।
कौन है इन में तेरा ॥1॥
कुटुम्ब कबीला निज मतलब के, स्त्र रथ बस लिपटाने।
बिन स्वारथ नहीं साथ कभी दें, यह सब कोई जाने ।
जान कर चित नहीं फेरा ॥2॥
मैं समझ यह देह है मेरी, हाथ पवि हैं अपने।
चलते समय से थि नहीं कोई, क्या यह रात के सपने।।
सोच ले सोच का बेरा ॥3॥
छूटे प्राण सांस भी छूटें, छूटे नस और नाड़ी।
इनके फांस फसा है क्यों हैं, क्या अज्ञानी अनारी ॥
व्याप रहो भर्म अन्धेरा ॥4॥
राधास्वामी की जा संगत में, कर कुछ बचन बिलासा।
सैन बैन से रूप समझ ले, शब्द योग अभ्यासा।।
डाल सतलोक में डेरा ॥5॥
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Song 37 — Hindi
| 12-186) ममता जात नहीं मेरे मन से ।।टेका।।
मेरा कोई न मैं हूँ किसी का, मुझमें कुछ नहीं मेरा।
समझ बूझ ऐसी काम न आई, करता हूँ मेरा तेरा।।
मिटे न यह लाख यतन से ॥1॥
साथ न लाया अपने कुछ भी, साथ नहीं कुछ जावे।
बीच की दशा में साथ हुआ है, समझ में बात यह आवे।
मनन श्रवण से कथन से ॥2॥
मेरे तेरे पने को बन्धन, मिथ्या बन्ध बँधाया।
यह बन्धन नहिं काटे कटता, कितना उपाय कराया।।
योग युक्ति साधन से ।।3।।
क्या ले आया क्यों ले जायेगा, यह जाने सब कोई।
जान जान अनजान बना है, अचरज अचरज होई।।
छुटा नहीं कोई यह बन्धन से ।।4।।
तन मन धन साधन में ममता, योग ज्ञान में ममता।
राधास्वामी अब तो दया करो तुम, चित में आवे समता।।
जाये ममता जीवन से ।।5।।
मेरा कोई न मैं हूँ किसी का, मुझमें कुछ नहीं मेरा।
समझ बूझ ऐसी काम न आई, करता हूँ मेरा तेरा।।
मिटे न यह लाख यतन से ॥1॥
साथ न लाया अपने कुछ भी, साथ नहीं कुछ जावे।
बीच की दशा में साथ हुआ है, समझ में बात यह आवे।
मनन श्रवण से कथन से ॥2॥
मेरे तेरे पने को बन्धन, मिथ्या बन्ध बँधाया।
यह बन्धन नहिं काटे कटता, कितना उपाय कराया।।
योग युक्ति साधन से ।।3।।
क्या ले आया क्यों ले जायेगा, यह जाने सब कोई।
जान जान अनजान बना है, अचरज अचरज होई।।
छुटा नहीं कोई यह बन्धन से ।।4।।
तन मन धन साधन में ममता, योग ज्ञान में ममता।
राधास्वामी अब तो दया करो तुम, चित में आवे समता।।
जाये ममता जीवन से ।।5।।
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Song 38 — Hindi
(13-190)मेरी मंसा हुई अब पूरी ॥टेका।
जनम जनम चौरासी भटके, मनुष तन अब पायो।
गुरु पद कमल परस सुख व्यापा, जनम को सुफल कराया।।
सुरत कायर बनी सूरी ॥1॥
मन मोह की दुर्गम घाटी, चढ़ चढ़ छाई उदासी।
भूल भरम लग विपती भोगी, अब मिले गुरु अविनासी ॥
मोह मया भई चूरी ॥2॥
श्रान्ती से चित में आई अशान्ति, सार असार न जाना।
साध की संगत गुरु की सेवा, निज स्वरूप पहचाना।
मृग के घट कस्तूरी ॥3॥
बन बन हूँ हा परवत दू हा हूँढ़ा देवल मन्दिर।
दुइ दुइ मन आई उदासी, दरस मिला घट अन्तर ॥
बनी गुरु चरनन की धूरी ॥4॥
सुरत शब्द मत गुरु ने सिखाया, सुगम सहज सुखरासी।
राधास्वामी दया से आपा चीन्हा, हुई सतधाम निवासी।
नहीं कोई करम मजूरी ॥5॥
जनम जनम चौरासी भटके, मनुष तन अब पायो।
गुरु पद कमल परस सुख व्यापा, जनम को सुफल कराया।।
सुरत कायर बनी सूरी ॥1॥
मन मोह की दुर्गम घाटी, चढ़ चढ़ छाई उदासी।
भूल भरम लग विपती भोगी, अब मिले गुरु अविनासी ॥
मोह मया भई चूरी ॥2॥
श्रान्ती से चित में आई अशान्ति, सार असार न जाना।
साध की संगत गुरु की सेवा, निज स्वरूप पहचाना।
मृग के घट कस्तूरी ॥3॥
बन बन हूँ हा परवत दू हा हूँढ़ा देवल मन्दिर।
दुइ दुइ मन आई उदासी, दरस मिला घट अन्तर ॥
बनी गुरु चरनन की धूरी ॥4॥
सुरत शब्द मत गुरु ने सिखाया, सुगम सहज सुखरासी।
राधास्वामी दया से आपा चीन्हा, हुई सतधाम निवासी।
नहीं कोई करम मजूरी ॥5॥
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Song 39 — Hindi
(14-191) दुर्गम काल के गढ़ को तोड़ा ।।टेक।।
माया काल ने फांस फंसाया, हँस हँस भर्म भुलाना।
मोह जाल में रहा उरझाना, छूटन विधि नहीं जाना।
सहे यमदूत का कोड़ा ॥1॥
इत उत भटका उपजा खटका, घर ब्यौहार न तटका।
ढूंढ़ फिरा कोई वैद न पाया, जाने भेद जो घटका।।
भया मेरे मन में फोड़ा ॥2॥
दुर गया कभी निकट गया कभी, रोग को नहीं पहचाना।
सत गुरु रोग के मेदी आये, सत संगत दिया ज्ञाना।
नेह गुरु से जोड़ा ॥3॥
खङ्ग ज्ञान ले हाथ में अपने, भक्ति की ढाल सजाई।
भर्म का बाना अंग में पहना, बन गया बांका सिपाही।
रान तले मन का घोड़ा ।।4।।
रोग हटा तन मन भया निंर्मल, साहस पौरुष बाढ़ा।
राधास्वामी बल से किया चढ़ाई, रन पग रोपा गाढ़ा है।
काल के सीस को फोड़ा ।।5।।
माया काल ने फांस फंसाया, हँस हँस भर्म भुलाना।
मोह जाल में रहा उरझाना, छूटन विधि नहीं जाना।
सहे यमदूत का कोड़ा ॥1॥
इत उत भटका उपजा खटका, घर ब्यौहार न तटका।
ढूंढ़ फिरा कोई वैद न पाया, जाने भेद जो घटका।।
भया मेरे मन में फोड़ा ॥2॥
दुर गया कभी निकट गया कभी, रोग को नहीं पहचाना।
सत गुरु रोग के मेदी आये, सत संगत दिया ज्ञाना।
नेह गुरु से जोड़ा ॥3॥
खङ्ग ज्ञान ले हाथ में अपने, भक्ति की ढाल सजाई।
भर्म का बाना अंग में पहना, बन गया बांका सिपाही।
रान तले मन का घोड़ा ।।4।।
रोग हटा तन मन भया निंर्मल, साहस पौरुष बाढ़ा।
राधास्वामी बल से किया चढ़ाई, रन पग रोपा गाढ़ा है।
काल के सीस को फोड़ा ।।5।।
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Song 40 — Hindi
(15-192)गुरु सत्र के प्रीतम प्यारे टेका।
आप ही माली आप बगीचा, आप फूल फल पानी।
आप ही क्यारी आप कुदाली, रंग बास की खानी।
सब में सब के सहारे ॥1॥
आप ही कुजी आप ही ताला, आप ही खोलन वाले।
आप ही मद मर्द पीने वाले, आप कलाल पियाले।
सब में सब से न्यारे ॥2॥
सुरत में शब्द में सूरत शब्द योग सुख रासी।।
ज्ञानी ध्यानी वक्ता श्रोता, ऋषि मुनि सहज उदासी।
अस्तुति गो गो हारे ॥3॥
एक अनेक बुन्द सुख सागर, ब्रह्मा विष्णु महेशा।
तुरिया तुरियातीत न होवे, बानी बचन संदेसा।
चांद सूर नभ तारे ॥4॥
राधास्वामी चरन शरन चलिहारी, सैन जैन कोई बुझे।
बन्ध मुक्ति का झगड़ा मेटे, सत्य नाम पद सके।
जावे भवजल पारे ।।5।
आप ही माली आप बगीचा, आप फूल फल पानी।
आप ही क्यारी आप कुदाली, रंग बास की खानी।
सब में सब के सहारे ॥1॥
आप ही कुजी आप ही ताला, आप ही खोलन वाले।
आप ही मद मर्द पीने वाले, आप कलाल पियाले।
सब में सब से न्यारे ॥2॥
सुरत में शब्द में सूरत शब्द योग सुख रासी।।
ज्ञानी ध्यानी वक्ता श्रोता, ऋषि मुनि सहज उदासी।
अस्तुति गो गो हारे ॥3॥
एक अनेक बुन्द सुख सागर, ब्रह्मा विष्णु महेशा।
तुरिया तुरियातीत न होवे, बानी बचन संदेसा।
चांद सूर नभ तारे ॥4॥
राधास्वामी चरन शरन चलिहारी, सैन जैन कोई बुझे।
बन्ध मुक्ति का झगड़ा मेटे, सत्य नाम पद सके।
जावे भवजल पारे ।।5।
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Song 41 — Hindi
(16-193) कुछ सोच मना तेरी उमर अकारथ जाय ॥टेक।।
जब लग तेल दिया में बाती, तब लग हैं सच संगी साथी।
जल गयो तेल बुझ गई बाती, अब नहीं दृष्टि में घोड़े हाथी।
सपने का भाव दिखाय ॥11॥
चुद्धि चतुराई काम नहीं आवे, धन सम्पत कोई संग न जावे।
अन्त समय नर बहु पछतावे, रोवे के और चिल्लावे।
कोई न होये सहाय ॥2॥
राजा रंक अमीर भिकारी, सब के पीछे काल शिकारी।
धीर सर योधा नरनारी, भलेंगे अपनी हुशियारी।
एक न बचने पोय ॥3॥
जो आये सो एक दिन जावे, रहने को कोई यहां न आवे ।
र दिनी उत्पात मचाचे, अपनी करनी का फल पावें।
पम के धक्के खाय ।।4।।
ॐसोच सोच कुछ सोच मना, नहीं तेरा अपना कोई जना।
राधास्वामी चरन में काज बना, भूल भुलादे अपना पना।
गुरु के गुन पल पल गाय ।।।।
जब लग तेल दिया में बाती, तब लग हैं सच संगी साथी।
जल गयो तेल बुझ गई बाती, अब नहीं दृष्टि में घोड़े हाथी।
सपने का भाव दिखाय ॥11॥
चुद्धि चतुराई काम नहीं आवे, धन सम्पत कोई संग न जावे।
अन्त समय नर बहु पछतावे, रोवे के और चिल्लावे।
कोई न होये सहाय ॥2॥
राजा रंक अमीर भिकारी, सब के पीछे काल शिकारी।
धीर सर योधा नरनारी, भलेंगे अपनी हुशियारी।
एक न बचने पोय ॥3॥
जो आये सो एक दिन जावे, रहने को कोई यहां न आवे ।
र दिनी उत्पात मचाचे, अपनी करनी का फल पावें।
पम के धक्के खाय ।।4।।
ॐसोच सोच कुछ सोच मना, नहीं तेरा अपना कोई जना।
राधास्वामी चरन में काज बना, भूल भुलादे अपना पना।
गुरु के गुन पल पल गाय ।।।।
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Song 42 — Hindi
(17-194) मीठी बानी बोलिये मुख से, मन रहे निरमल शुद्ध शरीर ।।टेक।
कड़वा बचन कलेजा बेधे, हिंसा की तलवार।
जिभ्या बाँधे क्यों फिस्ते हो, भाला छुरी कटार ।
उर में साले सुनकर सुनने वाले, दुखी बने दिलगीर ॥
मीठी0 में ह तो बना भयानक बांबी, निकले बिच्छू सांप।।
डस डस खायें घाव करें गाढ़ा, महा समझ यह पाप।
प्रानी कुछ तो सोच समझ मन अपने, दे न पीर बेपीर।मीठी0
क्यों मुख बना नरक की खानी, दुर्गन्धी अस्थान।
जब बोले तव निकले सड़ाईंध, समझ जो चतुर सुजान।।
भाई इस करतब से जाय पड़ेगा, नरक कुड के तीर।।
मीठी0 जब बोले तन, मीठी बानी, बानी अधिक संवाद।
उत्तम पुरुष की यह है रीती, राख धर्म मरयाद।
पहनो सँवर सिंगार के तन पर, शील भाव की चीर।
मीठी0 आया जब राधास्वामीमत में, निंदा कुर्बानी त्याग।।
गाता रह आनद हूप से, शब्द का मंगल राग।
ऐसा पुरुष विवेकी कहलाता है, पंथ का साध फकीर।।मीठी0
कड़वा बचन कलेजा बेधे, हिंसा की तलवार।
जिभ्या बाँधे क्यों फिस्ते हो, भाला छुरी कटार ।
उर में साले सुनकर सुनने वाले, दुखी बने दिलगीर ॥
मीठी0 में ह तो बना भयानक बांबी, निकले बिच्छू सांप।।
डस डस खायें घाव करें गाढ़ा, महा समझ यह पाप।
प्रानी कुछ तो सोच समझ मन अपने, दे न पीर बेपीर।मीठी0
क्यों मुख बना नरक की खानी, दुर्गन्धी अस्थान।
जब बोले तव निकले सड़ाईंध, समझ जो चतुर सुजान।।
भाई इस करतब से जाय पड़ेगा, नरक कुड के तीर।।
मीठी0 जब बोले तन, मीठी बानी, बानी अधिक संवाद।
उत्तम पुरुष की यह है रीती, राख धर्म मरयाद।
पहनो सँवर सिंगार के तन पर, शील भाव की चीर।
मीठी0 आया जब राधास्वामीमत में, निंदा कुर्बानी त्याग।।
गाता रह आनद हूप से, शब्द का मंगल राग।
ऐसा पुरुष विवेकी कहलाता है, पंथ का साध फकीर।।मीठी0
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Song 43 — Hindi
(18-195) गुरु मत का मर्म लखाया लखाया लखाया,
भेदी ने भेद बताया बताया बताया।
बुन्द सिंध से रहा अलगाना, नहीं पावे कहीं ठौर ठिकाना।
माया कीचड़ में लपटाना, सिंध मिलन की राह न जाना।
सतगुरु दया मिलाया मिलाया मिलाया ॥1॥
सत वस्तु नहीं ज्ञान विचारा, कहीं धरे नहीं ध्यान हमारा।
मन में भरा मान हंकारा, हूँ इत दें ढ़त थक र्थक हारी।
गुरु ने आय जताया जताया जताया ॥2॥
माया मोह का बन्धन भारी, उरझ उरझ नहीं सुर सकारी।
भरम भ्रान्ती ने काम बिगारी,राधास्वामी चरन शरन बलिहारी।
अब तो सब लख पाया पाया पाया ॥3॥
भेदी ने भेद बताया बताया बताया।
बुन्द सिंध से रहा अलगाना, नहीं पावे कहीं ठौर ठिकाना।
माया कीचड़ में लपटाना, सिंध मिलन की राह न जाना।
सतगुरु दया मिलाया मिलाया मिलाया ॥1॥
सत वस्तु नहीं ज्ञान विचारा, कहीं धरे नहीं ध्यान हमारा।
मन में भरा मान हंकारा, हूँ इत दें ढ़त थक र्थक हारी।
गुरु ने आय जताया जताया जताया ॥2॥
माया मोह का बन्धन भारी, उरझ उरझ नहीं सुर सकारी।
भरम भ्रान्ती ने काम बिगारी,राधास्वामी चरन शरन बलिहारी।
अब तो सब लख पाया पाया पाया ॥3॥
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Song 44 — Hindi
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Song 45 — Hindi
(20-197) वह आये आये आये, नर के तारन कारने नर देही में आये ॥टेक।।
रूप अरूप अनूप सुहावन, ऋषि मुनि सुर जन का मन भावन।।
परम पवित्र शुद्ध अति पावन, हिया जिया नेत्र सुगम ललचावन।
दरस देख हुलसाये ।।1।।
प्रेम से बली कहां है कोई, निर्मल तन मन कर मल धोई।।
जगत वासना सहजे खोई, वामन रहे बलि के हित सोई ॥
द्वारपाल के भाये ॥2॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम की महिमा हुई अति भारी।
प्रेम रूप है जग उद्धारी, अब तो आई हमारी बारी ॥
गुरु ने अंग लगाये ॥3॥
रूप अरूप अनूप सुहावन, ऋषि मुनि सुर जन का मन भावन।।
परम पवित्र शुद्ध अति पावन, हिया जिया नेत्र सुगम ललचावन।
दरस देख हुलसाये ।।1।।
प्रेम से बली कहां है कोई, निर्मल तन मन कर मल धोई।।
जगत वासना सहजे खोई, वामन रहे बलि के हित सोई ॥
द्वारपाल के भाये ॥2॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम की महिमा हुई अति भारी।
प्रेम रूप है जग उद्धारी, अब तो आई हमारी बारी ॥
गुरु ने अंग लगाये ॥3॥
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Song 46 — Hindi
(21-198) हम आये आये आये, आज तुम्हारे द्वार पर प्रभु भिक्षा मांगन आये ।।टेक
क्या मांगू कुछ थिर न रहाई, सुत दारा धन अगमापाई ।
इनसे रहूँ नित चित्त हटाई, मांगत मन अति रहत लजाई।
यह हिरदे नहीं भाये ॥1॥
रूप अनूप तुम्हारा देखा, मिट गयो काल करम का लेखा।
सबको सब विधि किया परेखा, प्रेम प्रीति का यही बिसेखा ।।।
नैनों जल भर लाये ॥2॥
मांगन गये सो लौटे नाहीं, भरम रहे माया के छाई।
मन में पड़ी काल की झाई, विनती सुनो हमारी साई।
हम तो रहे सकुचाये ॥3॥
इच्छा थकित थकित मन काया, दर्शन पाय जिया ललचाया।
पद सरोज की दीजे छाया, व्यापे काम क्रोध नहीं माया।
निस दिन रहें लौ लाये ।।4।।
हित चित रहूँ आज्ञाकारी, नख सिख उर में बसो हमारी।
तुम हो दीनबन्धु हितकारी, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी।।
लो अब अंग लगाये ।।5।।
क्या मांगू कुछ थिर न रहाई, सुत दारा धन अगमापाई ।
इनसे रहूँ नित चित्त हटाई, मांगत मन अति रहत लजाई।
यह हिरदे नहीं भाये ॥1॥
रूप अनूप तुम्हारा देखा, मिट गयो काल करम का लेखा।
सबको सब विधि किया परेखा, प्रेम प्रीति का यही बिसेखा ।।।
नैनों जल भर लाये ॥2॥
मांगन गये सो लौटे नाहीं, भरम रहे माया के छाई।
मन में पड़ी काल की झाई, विनती सुनो हमारी साई।
हम तो रहे सकुचाये ॥3॥
इच्छा थकित थकित मन काया, दर्शन पाय जिया ललचाया।
पद सरोज की दीजे छाया, व्यापे काम क्रोध नहीं माया।
निस दिन रहें लौ लाये ।।4।।
हित चित रहूँ आज्ञाकारी, नख सिख उर में बसो हमारी।
तुम हो दीनबन्धु हितकारी, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी।।
लो अब अंग लगाये ।।5।।
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Song 47 — Hindi
(22-199) दाया दायो दया, सतगुरु कीजे जन पर दाया ॥टेक।।
प्रेम भाव रहे मन में छाया, करे अकाज न जंग की माया।
काले करम ने अति भरमाया, भूल भरम से दुख बहु पाया।
भिक्षा मांगन आया ।।1।।
तीन ताप से रहुँ अकुलाना, मेरा कहीं नहीं ठौर ठिकाना।।
देख फिरा सबको अस्थाना, अब तो सतगुरु दीजे दाना।।
ध्यान चरन में लाया ॥2॥
उमंग प्रीति बाड़े चित छिनछिन, सुमिरू नाम तुम्हारा गिनगिन।
लौ लागी रहे चरनों दिन दिन, देखें रूप न जग का भिन भिन।।
रहूँ असोध अमाया ॥3॥
ज्ञान योग की अकथ कहानी, समझ न आवे रहे हैरानी।
जप तप संयम एक न जानी, सुनू तुम्हारी नित मृदु बानी ॥
हिया जिया उमगाया ।।4।।
तुम तो आये जीव उबारन, नाम धरा अपना जग तारन।
प्रगट भये हो हमरे कारन, हम पापी तुम पतित उद्धारन।।
राधास्वामी भेद बताया ॥5॥
बिनती।
प्रेम भाव रहे मन में छाया, करे अकाज न जंग की माया।
काले करम ने अति भरमाया, भूल भरम से दुख बहु पाया।
भिक्षा मांगन आया ।।1।।
तीन ताप से रहुँ अकुलाना, मेरा कहीं नहीं ठौर ठिकाना।।
देख फिरा सबको अस्थाना, अब तो सतगुरु दीजे दाना।।
ध्यान चरन में लाया ॥2॥
उमंग प्रीति बाड़े चित छिनछिन, सुमिरू नाम तुम्हारा गिनगिन।
लौ लागी रहे चरनों दिन दिन, देखें रूप न जग का भिन भिन।।
रहूँ असोध अमाया ॥3॥
ज्ञान योग की अकथ कहानी, समझ न आवे रहे हैरानी।
जप तप संयम एक न जानी, सुनू तुम्हारी नित मृदु बानी ॥
हिया जिया उमगाया ।।4।।
तुम तो आये जीव उबारन, नाम धरा अपना जग तारन।
प्रगट भये हो हमरे कारन, हम पापी तुम पतित उद्धारन।।
राधास्वामी भेद बताया ॥5॥
बिनती।
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Song 48 — Hindi
(200 कुल संख्या 1104)
गुरु तुम दीन दयाल हो, जगत पति स्वामी।
तुम्हरे चरन सरोज में, शत बार नमामी।
दीन निबल के काज आप, प्रगट हुये आय।
बूड़त लिया बचाय, शब्द की नाव चढ़ाय ॥
शब्द सुरत का भेद दिया, सत पन्थ चलाया।
भटके जीव अनाथ को, मारग दिखलाया ॥
धन्य धन्य सुदयाल, धन्य आरत दुख हारन।।
धन्य धन्य प्रतिपाल, धन्य साँचे भव तारन।
नाम दान दे मेहर से, अपना कर लीजे।
राधास्वामी कृपाल, चरन की भक्ति दीजे ॥
बाईसवी धुन
प्रार्थना
गुरु तुम दीन दयाल हो, जगत पति स्वामी।
तुम्हरे चरन सरोज में, शत बार नमामी।
दीन निबल के काज आप, प्रगट हुये आय।
बूड़त लिया बचाय, शब्द की नाव चढ़ाय ॥
शब्द सुरत का भेद दिया, सत पन्थ चलाया।
भटके जीव अनाथ को, मारग दिखलाया ॥
धन्य धन्य सुदयाल, धन्य आरत दुख हारन।।
धन्य धन्य प्रतिपाल, धन्य साँचे भव तारन।
नाम दान दे मेहर से, अपना कर लीजे।
राधास्वामी कृपाल, चरन की भक्ति दीजे ॥
बाईसवी धुन
प्रार्थना
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Song 49 — Hindi
(201) धन धन धन जग त्राता, धन त्रिभुवन स्वामी।
धन धन धन पितु माता, धन अन्तर्यामी ।
प्रभुधन अन्तर्यामी।
भक्ति भाव स्वामी पाऊँ, चरन शरन ध्याऊँ।
चरनन चित्त लगाऊँ, सेवा में धाऊँ, प्रभु सेवा में धाऊँ।
आदि गुरु परमातम, तुम मंगलकारी।
जन सेवक सुखदायक, जीवन हितकारी,
प्रभु जीवन हितकारी।
प्रेम रूप करतारा, घट घट के बासी।
मन बुद्धि से पारा, अनुपम अविनासी,
प्रभु अनुपम अविनासी।।
प्रेम दान मोहे दीजे, सन्तन की सेवा।
सत संगत फल पाऊँ, देवन के देवा,
प्रभु देवन के देवा।।
त्रिविध ताप दुख मेटो, करलो मोहे अपना।
अवगुन चित्त न लाओ, दूर करो तपना,
प्रभु दूर करो तपना।
तज तीनों जल्दी प्रभु, पद : चौथा पाऊँ।
काल जाल से भागू, राधास्वामी गुन गाऊँ,
प्रभु राधास्वामी गुन गाऊँ ॥
लावनी
धन धन धन पितु माता, धन अन्तर्यामी ।
प्रभुधन अन्तर्यामी।
भक्ति भाव स्वामी पाऊँ, चरन शरन ध्याऊँ।
चरनन चित्त लगाऊँ, सेवा में धाऊँ, प्रभु सेवा में धाऊँ।
आदि गुरु परमातम, तुम मंगलकारी।
जन सेवक सुखदायक, जीवन हितकारी,
प्रभु जीवन हितकारी।
प्रेम रूप करतारा, घट घट के बासी।
मन बुद्धि से पारा, अनुपम अविनासी,
प्रभु अनुपम अविनासी।।
प्रेम दान मोहे दीजे, सन्तन की सेवा।
सत संगत फल पाऊँ, देवन के देवा,
प्रभु देवन के देवा।।
त्रिविध ताप दुख मेटो, करलो मोहे अपना।
अवगुन चित्त न लाओ, दूर करो तपना,
प्रभु दूर करो तपना।
तज तीनों जल्दी प्रभु, पद : चौथा पाऊँ।
काल जाल से भागू, राधास्वामी गुन गाऊँ,
प्रभु राधास्वामी गुन गाऊँ ॥
लावनी
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Song 50 — Hindi
(1-202) कर निश्चय गुरु का चरन सीस पर धारा।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ॥
क्यों सोच से तू नित व्याकुल रहता है।
क्यों भरम में पड़कर दुख सुख को सहता है।
क्यों उलटी सुलटी बात बना कहता है ।।
क्यों नहीं चरन की ओट छांह गहता है।
जिस का सतगुरु रूप सदा रखवारा।
| वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।1।।
गुरु हैं हितकारी तेरे समझ ले मन में ।
तु चाहे रहे कहीं घर परबत और वन में।
रह रात दिवस गुरु देव के प्रेम लगन में ।
नहीं चिंता का ले भार भरम के यतन में।
बेखटके जो करता है।
यहाँ गुजारा ।।
| वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।।।
भृगी ने कीट को जोर से अपने पकड़ा।
और उसे बन्द छत में लाकर जकड़ा।
पहले वह भय बस भयो मोह का लकड़ा ।
फिर ध्यान से बन गया भृगी अच्छा तकड़ा।
जो लेता है गुरु देव का ऐसा सारा ।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥3॥
कर भजन ध्यान सुमिरन नित उठ कर भाई ।
इन ही बातों से होगी तेरी भलाई।
तज दे सर आलस नींद मोह कदाई।
बिगड़ी सब तेरी बनत बनत बन जई है।
जो दुविधा दुचिताई से गहे किनारा ।।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥4॥
राधास्वामी संत रूप धर जग में आये ।।
भूले भटकों को सत की राह चलाये।
जो अचेत थे दया से उन्हें चेताये ।।
सुरत शब्द मत योग का सच्चा यतन सिखाये।
शरणागत जो हुआ तरा और तारा ।
वह होगा आप एक दिन भी जल पारा ।।5।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ॥
क्यों सोच से तू नित व्याकुल रहता है।
क्यों भरम में पड़कर दुख सुख को सहता है।
क्यों उलटी सुलटी बात बना कहता है ।।
क्यों नहीं चरन की ओट छांह गहता है।
जिस का सतगुरु रूप सदा रखवारा।
| वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।1।।
गुरु हैं हितकारी तेरे समझ ले मन में ।
तु चाहे रहे कहीं घर परबत और वन में।
रह रात दिवस गुरु देव के प्रेम लगन में ।
नहीं चिंता का ले भार भरम के यतन में।
बेखटके जो करता है।
यहाँ गुजारा ।।
| वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।।।
भृगी ने कीट को जोर से अपने पकड़ा।
और उसे बन्द छत में लाकर जकड़ा।
पहले वह भय बस भयो मोह का लकड़ा ।
फिर ध्यान से बन गया भृगी अच्छा तकड़ा।
जो लेता है गुरु देव का ऐसा सारा ।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥3॥
कर भजन ध्यान सुमिरन नित उठ कर भाई ।
इन ही बातों से होगी तेरी भलाई।
तज दे सर आलस नींद मोह कदाई।
बिगड़ी सब तेरी बनत बनत बन जई है।
जो दुविधा दुचिताई से गहे किनारा ।।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥4॥
राधास्वामी संत रूप धर जग में आये ।।
भूले भटकों को सत की राह चलाये।
जो अचेत थे दया से उन्हें चेताये ।।
सुरत शब्द मत योग का सच्चा यतन सिखाये।
शरणागत जो हुआ तरा और तारा ।
वह होगा आप एक दिन भी जल पारा ।।5।।
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Song 51 — Hindi
(2-203) जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।
उसका हुआ भव सागर से बेड़ा पारा।।
नहीं साँचे भक्त किसी से कभी हैं डरते।
नहीं भय से काले करम के हैं वह मरते।।
गुरु उनकी पल पल में है रक्षा करते।
वह सहज सहज में जग के निधि से तरते ।
गुरु की कृपा से हुआ उनका निस्तारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।1।।
नहीं धरम करम से लगा किसी का ठिकाना।
नहीं संयम नियम में परमारथ का निशाना।
सब वृथा जीन ज्ञान ध्यान अनुमाना।
केवल सतगुरु की दया में है निरवाना है।
गुरु भक्ति से होगा आप ही भला तुम्हारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।2।।
मीरी गणिका रैदास और सदन कसाई।
इन सबको गुरु की भक्ति हुई सुखदाई ।
तर गया गुरु की भक्ति से पीपा नाई।
गुरु रात दिवस अपने भक्तों के सहाई ॥
सब त्याग मोह भ्रमजाल किया भक्ति से गुजारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु के बल यह मन तुम्हरे बश में आवे।।
गुरु के बल नर भव द्वन्द को सहज नसावे।।
गुरु के बल पाप प्रभाव न अपना दिखावे।
गुरु के बल प्रानी यम का फंद कटावे ॥
गुरु नर स्वरूप में धरा सन्त अवतारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु की कर जीते जी क्षण क्षण तू सेवा।
गुरु सम इस जग में नहीं है कोई देवा ॥
गुरु की कृपा मिटे सब भूल भर्म का भेवा।
गुरु शब्द जहाज के बने आप ही खेवा ॥
राधास्वामी ने बख्शा यह गुर सार का सारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ॥5॥
उसका हुआ भव सागर से बेड़ा पारा।।
नहीं साँचे भक्त किसी से कभी हैं डरते।
नहीं भय से काले करम के हैं वह मरते।।
गुरु उनकी पल पल में है रक्षा करते।
वह सहज सहज में जग के निधि से तरते ।
गुरु की कृपा से हुआ उनका निस्तारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।1।।
नहीं धरम करम से लगा किसी का ठिकाना।
नहीं संयम नियम में परमारथ का निशाना।
सब वृथा जीन ज्ञान ध्यान अनुमाना।
केवल सतगुरु की दया में है निरवाना है।
गुरु भक्ति से होगा आप ही भला तुम्हारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।2।।
मीरी गणिका रैदास और सदन कसाई।
इन सबको गुरु की भक्ति हुई सुखदाई ।
तर गया गुरु की भक्ति से पीपा नाई।
गुरु रात दिवस अपने भक्तों के सहाई ॥
सब त्याग मोह भ्रमजाल किया भक्ति से गुजारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु के बल यह मन तुम्हरे बश में आवे।।
गुरु के बल नर भव द्वन्द को सहज नसावे।।
गुरु के बल पाप प्रभाव न अपना दिखावे।
गुरु के बल प्रानी यम का फंद कटावे ॥
गुरु नर स्वरूप में धरा सन्त अवतारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु की कर जीते जी क्षण क्षण तू सेवा।
गुरु सम इस जग में नहीं है कोई देवा ॥
गुरु की कृपा मिटे सब भूल भर्म का भेवा।
गुरु शब्द जहाज के बने आप ही खेवा ॥
राधास्वामी ने बख्शा यह गुर सार का सारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ॥5॥
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Song 52 — Hindi
(3-204) नामी हुए उसी दिन जिस दिन, चित से गुरु का नाम लिया।
जीते जी यश कीर्ति प्रतिष्ठा, और पीछे सेते धाम लिया।
अर्थ लिया और धर्म लिया और, मोक्ष लिया और काम लिया।
चार पदारथ हाथ में आये, तब जाकर विश्राम लिया।
मन चंचल की दुविधा मेटी, शान्ती आठों याम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ।।1।।
जीने की नहीं मन में इच्छा, मरने का डर नहीं करते हैं।
अजर अमर है रूप हमारा, प्रेमी जन कब मरते हैं।
भार बिपति आपति और दुख का, सिर पर कभी न धरते हैं।
कमल फूल ज्यों हम भव सागर, के जल में तरते रहते हैं।
मन का घोड़ा रान के नीचे, हाथ में उसका लगाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥2॥
खाकर दाना भक्ति का हम, प्रेम का पानी पीते है।
हृष्ट पुष्ट होकर संसार में, सुख आनन्द से जीते हैं।
हम नहीं हिंसक हंस हैं पूरे, बन के सिंह ने चीते हैं।
बिरह बान से फटे कलेजे, के चीरे को सोते हैं।
गुरु भक्ति का सौदा सच्चा, विना मोल बेदाम लिया।।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥3॥
ब्राह्मण को मिला ब्रह्म, क्षत्री क्षत्रपति कहलाता है।।
वैश्य को धन है शुद्र कला, कौशल की पदवी पाता है।
गाने बजाने वाला तान से, तान को अपना भिलाता है।
योगी सिद्धि शक्ति का भूका, योग के मारग जाता है।
हमको नाम की लगन लगी, ऊँचे चढ़ नाम का ग्राम लिया।।
सिर पर चार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥4॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आये, ओम् की बानी सहज सुनी।।
सुन्न में सहज समाध रचाई, महासुन्न के बने मुनी।।
भंवरगुफा चढ़ बन्शी बजाई, अवगुण मेंट के हुए गुनी।।
मत्तधाम धुर बीन की धुन सुन, सत धुनि बीन के धुनके धनी।।
अलख अगम पर बैठक ठानी, राधास्वामी धाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ।।5।।
जीते जी यश कीर्ति प्रतिष्ठा, और पीछे सेते धाम लिया।
अर्थ लिया और धर्म लिया और, मोक्ष लिया और काम लिया।
चार पदारथ हाथ में आये, तब जाकर विश्राम लिया।
मन चंचल की दुविधा मेटी, शान्ती आठों याम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ।।1।।
जीने की नहीं मन में इच्छा, मरने का डर नहीं करते हैं।
अजर अमर है रूप हमारा, प्रेमी जन कब मरते हैं।
भार बिपति आपति और दुख का, सिर पर कभी न धरते हैं।
कमल फूल ज्यों हम भव सागर, के जल में तरते रहते हैं।
मन का घोड़ा रान के नीचे, हाथ में उसका लगाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥2॥
खाकर दाना भक्ति का हम, प्रेम का पानी पीते है।
हृष्ट पुष्ट होकर संसार में, सुख आनन्द से जीते हैं।
हम नहीं हिंसक हंस हैं पूरे, बन के सिंह ने चीते हैं।
बिरह बान से फटे कलेजे, के चीरे को सोते हैं।
गुरु भक्ति का सौदा सच्चा, विना मोल बेदाम लिया।।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥3॥
ब्राह्मण को मिला ब्रह्म, क्षत्री क्षत्रपति कहलाता है।।
वैश्य को धन है शुद्र कला, कौशल की पदवी पाता है।
गाने बजाने वाला तान से, तान को अपना भिलाता है।
योगी सिद्धि शक्ति का भूका, योग के मारग जाता है।
हमको नाम की लगन लगी, ऊँचे चढ़ नाम का ग्राम लिया।।
सिर पर चार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ॥4॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आये, ओम् की बानी सहज सुनी।।
सुन्न में सहज समाध रचाई, महासुन्न के बने मुनी।।
भंवरगुफा चढ़ बन्शी बजाई, अवगुण मेंट के हुए गुनी।।
मत्तधाम धुर बीन की धुन सुन, सत धुनि बीन के धुनके धनी।।
अलख अगम पर बैठक ठानी, राधास्वामी धाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया, काल चक्र को थाम लिया ।।5।।
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Song 53 — Hindi
(4-205) घर छोड़ा और देश देश में, घूम फिरे मारे मारे।
मन तपवन उपवन मधुबन सब, देख लिये न्यारे न्यारे।
परबत और पहाड़ की चोटी, चढ़ चढ़कर थक थक हारे।
गरे प्रेम में प्रीतम प्यारे, अन्त में पाया तुझे वारे ।
ॐघट का परदा खोल के गुरु ने, तेरे रूप को दरसाया।।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥1॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता, नहीं काशी का तू बासी।।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी, कहां बसा है अविनासी।
तू नहीं जपी तपी बन चंडी, नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी, कैसे कहे कोई आकासी।।
सत संगत के सुने बैन, समझाने वाले ने समझाया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥2॥
खट पट में पोथियों के पड़कर, अटपट चाल चले दिन दिन।
सार मिला नहीं जी घबराया, तत्वों की गिनती गिन गिन।।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में, द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन।
जिसको देखा पक्षपात बस, करता रहता है भिन भिन।
गुरु मिले निज बचन सुनाया, अनुभव गम गति लखदाया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥3॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि, शक्ति के मारग भरमाने।
मन को सोधा तन को साधा, साधन कर कर उक्ताने।
आसन मारा साँस को रोका, यतन किये बहु मन माने।
लगी समाध तुझे नहीं पाया, कैसे कोई तुझको जाने।
आप आप में आप समाया, अपना आपा बन आया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ।।4।।
साध की संगत गुरु की सेवा, सहज रीति जब बन आई।
सहज में सहज सहज में साधन, सहज भावना चितलाई।
सहज रूप है सहज नाम में, सहज काम नहीं कठिनाई।।
राधास्वामी की सत संगत में, सहज दृटि मैंने पाई।।
सहज दृष्टि में सहज रूप का, सहज ज्ञान सहजे छायो।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ।।5।।
मन तपवन उपवन मधुबन सब, देख लिये न्यारे न्यारे।
परबत और पहाड़ की चोटी, चढ़ चढ़कर थक थक हारे।
गरे प्रेम में प्रीतम प्यारे, अन्त में पाया तुझे वारे ।
ॐघट का परदा खोल के गुरु ने, तेरे रूप को दरसाया।।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥1॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता, नहीं काशी का तू बासी।।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी, कहां बसा है अविनासी।
तू नहीं जपी तपी बन चंडी, नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी, कैसे कहे कोई आकासी।।
सत संगत के सुने बैन, समझाने वाले ने समझाया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥2॥
खट पट में पोथियों के पड़कर, अटपट चाल चले दिन दिन।
सार मिला नहीं जी घबराया, तत्वों की गिनती गिन गिन।।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में, द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन।
जिसको देखा पक्षपात बस, करता रहता है भिन भिन।
गुरु मिले निज बचन सुनाया, अनुभव गम गति लखदाया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥3॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि, शक्ति के मारग भरमाने।
मन को सोधा तन को साधा, साधन कर कर उक्ताने।
आसन मारा साँस को रोका, यतन किये बहु मन माने।
लगी समाध तुझे नहीं पाया, कैसे कोई तुझको जाने।
आप आप में आप समाया, अपना आपा बन आया।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ।।4।।
साध की संगत गुरु की सेवा, सहज रीति जब बन आई।
सहज में सहज सहज में साधन, सहज भावना चितलाई।
सहज रूप है सहज नाम में, सहज काम नहीं कठिनाई।।
राधास्वामी की सत संगत में, सहज दृटि मैंने पाई।।
सहज दृष्टि में सहज रूप का, सहज ज्ञान सहजे छायो।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ।।5।।






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