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Song 0 — Hindi
(111) अब मोहे समझ पड़ी गुरु बानी ।।टेक।
गुरु बानी है ज्ञान की खानी, गुरु बानी सहदानी।।
गुरु बानी है मंगल दानी, सूझे पद निरवानी।
अब0 बानी में है शक्ति अनूपम, कोई कोई बिरला जानी।।
इस बानी की महिमा न्यारी, बानी अगम निशानी।
अब0 निराकार साकार है बानी, आवागवन मिटानी ।।
जो कोई बानी सार पिंछाने, पड़े न भव की खानी।
अब0 गुरुमुख बानी सहज सिंयानी, सुन सुन कर मन मानी।
बानी तो भव दुख सब नासे, बख्शे ठौर ठिकानी।।
अब0 साध की संगत गुरु की सेवा, आय मिले जब प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगये ज्ञानी ध्यानी।
अब0
गुरु बानी है ज्ञान की खानी, गुरु बानी सहदानी।।
गुरु बानी है मंगल दानी, सूझे पद निरवानी।
अब0 बानी में है शक्ति अनूपम, कोई कोई बिरला जानी।।
इस बानी की महिमा न्यारी, बानी अगम निशानी।
अब0 निराकार साकार है बानी, आवागवन मिटानी ।।
जो कोई बानी सार पिंछाने, पड़े न भव की खानी।
अब0 गुरुमुख बानी सहज सिंयानी, सुन सुन कर मन मानी।
बानी तो भव दुख सब नासे, बख्शे ठौर ठिकानी।।
अब0 साध की संगत गुरु की सेवा, आय मिले जब प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगये ज्ञानी ध्यानी।
अब0
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Song 1 — Hindi
(112)बल बल जाऊँ गुरु उपकार ।।टेक।।
मानुष रूप धरा सतगुरु ने, जीव उबारन हार।
तिनकी कृपा अविद्या नासे, घट में भानु उजार ॥
बल बल0 मोह मया में लम्पट निस दिन, सूझे वार न पार।
कहीं दारा सुत आन फंसाने, कहीं कुल कहीं परिवार ।
सोतो भरम मिटा छिन पल में, जब मिले गुरु दातार।
राधास्वामी चरन शरन चलिहारी, छूटा यम का द्वार।
बल बल0
मानुष रूप धरा सतगुरु ने, जीव उबारन हार।
तिनकी कृपा अविद्या नासे, घट में भानु उजार ॥
बल बल0 मोह मया में लम्पट निस दिन, सूझे वार न पार।
कहीं दारा सुत आन फंसाने, कहीं कुल कहीं परिवार ।
सोतो भरम मिटा छिन पल में, जब मिले गुरु दातार।
राधास्वामी चरन शरन चलिहारी, छूटा यम का द्वार।
बल बल0
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Song 2 — Hindi
(113)साधु तान सुनो धुन पूरे का ॥टेक।।
मन मन्दिर में आन बिराजो, शोर मचा तंबूरे का।।
बाजत बीन मृदंग बांसुरी, राग रंग घट स्वरे का।
साधु0 सुन सुन सुन मन अति हरषाया, छोड़ समाज अधूरे का।
रंग जमा अखियां मतवारी, ध्यान न भंग धतूरे का।।
साधु0 घट में नाचत सुरत अप्सरा, सुन धुन अन्तर तूरे का।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,बल पाया गुरु पूरे का ।
मन मन्दिर में आन बिराजो, शोर मचा तंबूरे का।।
बाजत बीन मृदंग बांसुरी, राग रंग घट स्वरे का।
साधु0 सुन सुन सुन मन अति हरषाया, छोड़ समाज अधूरे का।
रंग जमा अखियां मतवारी, ध्यान न भंग धतूरे का।।
साधु0 घट में नाचत सुरत अप्सरा, सुन धुन अन्तर तूरे का।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,बल पाया गुरु पूरे का ।
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Song 3 — Hindi
(114)गुरु प्रेम का रंग जमा दो जी ॥टेक।।
संग किया चरनों में पड़ी, निहसंग को संग लगा दो जी।।
मेरा संगी साथी कोई नहीं, निज संग की महिमा दिखादो जी ॥गुरु0
जब जप तप तीरथ बरत तजे, तब अपना स्वरूप दिखादो जी।।
कुल लाज मिटी परिवार छुटा, भक्ति का साज सजादो जी ।।गुरु0
नही ज्ञान न ध्यान न सेवा यतन, बिगड़ी हुई बात बनादो जी।।
राधास्वामी अब कर दया की नजर, भवजाल से आन छुड़ादो जी ॥’
संग किया चरनों में पड़ी, निहसंग को संग लगा दो जी।।
मेरा संगी साथी कोई नहीं, निज संग की महिमा दिखादो जी ॥गुरु0
जब जप तप तीरथ बरत तजे, तब अपना स्वरूप दिखादो जी।।
कुल लाज मिटी परिवार छुटा, भक्ति का साज सजादो जी ।।गुरु0
नही ज्ञान न ध्यान न सेवा यतन, बिगड़ी हुई बात बनादो जी।।
राधास्वामी अब कर दया की नजर, भवजाल से आन छुड़ादो जी ॥’
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Song 4 — Hindi
(115)साधु मन की सूझ सुझाओ ।टेक।।
मन को सोधो मन परवोधो, मन ही लगाम लगाओ।
मन की दुविधा दूर निकारो, चंचल मन ठेराओ।
साधु0 मन की खटपट सकल मिटाओ, उलझा मन सुलझाओ।।
मन है अटपट मन है लटपट, झटपट मन बिलगाओ ॥
साधु0 शुम संकल्प की राह बाट में, मन का घोड़ा कुदाओ।
गह रुकाना गुरु से पूछो मन की चाल न जाओ।।साधु0
प्रथम सहसदल कमल निहारो, दूजे त्रिकुटी धाओ।
तीजे सुन्न महासुन्न निरखो, भंवर में बंसी बजाओ।।
साधु0 सत्य लोक चढ़ सुनो बीन धुन, मंगल साज सजाओ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अजर अमर पद पाओ ॥साधु0
मन को सोधो मन परवोधो, मन ही लगाम लगाओ।
मन की दुविधा दूर निकारो, चंचल मन ठेराओ।
साधु0 मन की खटपट सकल मिटाओ, उलझा मन सुलझाओ।।
मन है अटपट मन है लटपट, झटपट मन बिलगाओ ॥
साधु0 शुम संकल्प की राह बाट में, मन का घोड़ा कुदाओ।
गह रुकाना गुरु से पूछो मन की चाल न जाओ।।साधु0
प्रथम सहसदल कमल निहारो, दूजे त्रिकुटी धाओ।
तीजे सुन्न महासुन्न निरखो, भंवर में बंसी बजाओ।।
साधु0 सत्य लोक चढ़ सुनो बीन धुन, मंगल साज सजाओ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अजर अमर पद पाओ ॥साधु0
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Song 5 — Hindi
(116)छोड़ो मन के ताना बाना ।।टेका।।
जब लग दुविधा बसे हिये में, तब लग नर दीवाने।
जो इस दुविधा को तज भागे, सो हैं चतुर सियाने ॥
छोड़ो0 अपने भाव आप सब भूले, फिरते हैं। भरमाने।।
दोष लगावे सृष्टि कर्म को, सार भेद नहीं जाने।।
मन के खट पट उमर गंवाई, मन की गति न पिछाने।
छल बल कपट सियानत झूठे, इसकी फांस फंसाने।
बीन शब्द में झूमत डोले, ज्यों भुजंग लहराने।
तैसे माया ममता में सब, अधम रहें लपटाने।।
मनो राज की अटपट लीला, क्या कोई बरन बखाने।
राधास्वामी मेहर बिना यह प्रानी, यम के हाथ बिकाने।
जब लग दुविधा बसे हिये में, तब लग नर दीवाने।
जो इस दुविधा को तज भागे, सो हैं चतुर सियाने ॥
छोड़ो0 अपने भाव आप सब भूले, फिरते हैं। भरमाने।।
दोष लगावे सृष्टि कर्म को, सार भेद नहीं जाने।।
मन के खट पट उमर गंवाई, मन की गति न पिछाने।
छल बल कपट सियानत झूठे, इसकी फांस फंसाने।
बीन शब्द में झूमत डोले, ज्यों भुजंग लहराने।
तैसे माया ममता में सब, अधम रहें लपटाने।।
मनो राज की अटपट लीला, क्या कोई बरन बखाने।
राधास्वामी मेहर बिना यह प्रानी, यम के हाथ बिकाने।
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Song 6 — Hindi
(117) मन तू सोच समझ पग धार ॥टेका।
बिन समझे कोई सार न पावे, भटके बारम्बार।।
संशय दुविधा और चतुराई, यह अज्ञान बिकार।
मन तू0 कोई नर पशु है कोई तिरिया पशु, गुरु पशु कोई गवार।।
वेद पशु है सब संसारा, बिना विवेक विचार ॥
माया पशु माया का बंधुआ, मुक्ति पशु स्वीकार।।
भक्ति पशु बन्धन नहीं काटे, बूड़ा काली धार ॥
ज्ञान पशु की क्या करू निन्दा, वह ग्रथन के लार।।
जड़ चेतन के गाँठ न खोले, उरझ उरझ रही हार ॥
योग पशु बँधे योग की रसरी, बैठे आसन मार।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवकं हुआ भवपार ।मन तू0
बिन समझे कोई सार न पावे, भटके बारम्बार।।
संशय दुविधा और चतुराई, यह अज्ञान बिकार।
मन तू0 कोई नर पशु है कोई तिरिया पशु, गुरु पशु कोई गवार।।
वेद पशु है सब संसारा, बिना विवेक विचार ॥
माया पशु माया का बंधुआ, मुक्ति पशु स्वीकार।।
भक्ति पशु बन्धन नहीं काटे, बूड़ा काली धार ॥
ज्ञान पशु की क्या करू निन्दा, वह ग्रथन के लार।।
जड़ चेतन के गाँठ न खोले, उरझ उरझ रही हार ॥
योग पशु बँधे योग की रसरी, बैठे आसन मार।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवकं हुआ भवपार ।मन तू0
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Song 7 — Hindi
(118) साधू छोड़ो भरम कहानी ॥टेक॥
सोच समझ कुछ मन में अपने, पाओ मरम निशानी।
विन सोचे नहीं सार की सुध बुध, मिटे न आना जानी ॥साधू0
कथा सुने बहु ध्यान लगाया, बिन विवेक अज्ञानी।।
बगला भक्त की कौन बड़ाई, जो सत नहीं पहचानी।।
कोई सिद्धि कोई शक्ति में भूले, कोई मन फांस फँसानी।
क्या होवे नर भेस बनाये, भेस भरम की खानी।।
वाद विवाद से क्या फल पाया, दिन दिन अवधि सिरानी।
निज अनुभव से काम न जिसको, वह तो निपट अभिमानी।।
कर सतसंग विवेक राख चित, तब मिटे द्वन्द गलानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पद परसा मन बानी ॥
सोच समझ कुछ मन में अपने, पाओ मरम निशानी।
विन सोचे नहीं सार की सुध बुध, मिटे न आना जानी ॥साधू0
कथा सुने बहु ध्यान लगाया, बिन विवेक अज्ञानी।।
बगला भक्त की कौन बड़ाई, जो सत नहीं पहचानी।।
कोई सिद्धि कोई शक्ति में भूले, कोई मन फांस फँसानी।
क्या होवे नर भेस बनाये, भेस भरम की खानी।।
वाद विवाद से क्या फल पाया, दिन दिन अवधि सिरानी।
निज अनुभव से काम न जिसको, वह तो निपट अभिमानी।।
कर सतसंग विवेक राख चित, तब मिटे द्वन्द गलानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पद परसा मन बानी ॥
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Song 8 — Hindi
(119) नाम प्रताप सुरत मेरी जागी ॥टेक।।
दुख सुख एक समान भये हैं, भक्ति अमीरस पागी।
चाह मिटी चिता गई चित से, सहज बनी वैरागी।।
नाम0 सोबत जागत कबहुँ न विसरू, मन चरनन रहे लागी ।
आप अचेत नहीं सुरत सचेती, भव दारुन तज भागी।
निर्मल बिमल अमले मगनानी, रहत सदा अनुरागी ।
यह तो गुन कोई विरला समझे, साध विवेकी त्यागी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अचल वर मांगी।
गुरु के पद सरोज में निस दिन, मेरी लव रहे लागी।
दुख सुख एक समान भये हैं, भक्ति अमीरस पागी।
चाह मिटी चिता गई चित से, सहज बनी वैरागी।।
नाम0 सोबत जागत कबहुँ न विसरू, मन चरनन रहे लागी ।
आप अचेत नहीं सुरत सचेती, भव दारुन तज भागी।
निर्मल बिमल अमले मगनानी, रहत सदा अनुरागी ।
यह तो गुन कोई विरला समझे, साध विवेकी त्यागी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अचल वर मांगी।
गुरु के पद सरोज में निस दिन, मेरी लव रहे लागी।
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Song 9 — Hindi
| 120)सतगुरु ने पार लगाया ॥टेक।
मैंने तेरो चरन गहा है, तूने बांह गही।
मेरी लाज तुझे है साई, सच्ची बात कही।।
सतगुरु : मैं अपराधी जनम जनम का, तू तो तारन हारा।।
भव जल में नहीं डुबु गा मैं, तू करदेगा पारा।।
रात दिवस तेरा है ध्याना, तेरे सिवा न दूजा।।
तेरा सुमिरन तेरा भजन है, तेरी ही गुरु पूजा।
सब में तेरा रूप है व्यापा, जड़ चेतन में साई।।
ब्रह्म में छाया तेरी निरखी, माया में रही झांई।
सुरत शब्द की करू कमाई, ज्ञान ध्यान निधि पाऊ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हरख हरख गुन गाऊँ।
मैंने तेरो चरन गहा है, तूने बांह गही।
मेरी लाज तुझे है साई, सच्ची बात कही।।
सतगुरु : मैं अपराधी जनम जनम का, तू तो तारन हारा।।
भव जल में नहीं डुबु गा मैं, तू करदेगा पारा।।
रात दिवस तेरा है ध्याना, तेरे सिवा न दूजा।।
तेरा सुमिरन तेरा भजन है, तेरी ही गुरु पूजा।
सब में तेरा रूप है व्यापा, जड़ चेतन में साई।।
ब्रह्म में छाया तेरी निरखी, माया में रही झांई।
सुरत शब्द की करू कमाई, ज्ञान ध्यान निधि पाऊ।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हरख हरख गुन गाऊँ।
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Song 10 — Hindi
| 121)अरे मन भूला रे भूला ॥टेका।
शीश महल बिच पड़ा स्वान ज्यों, देखी निज परछाई।
भोंक भोंक कर प्रान तजो है, अपनी राम कुछ नाहीं।।
अरे0 छाया देख डरा ज्यों बालक, समझ न ताको आई।।
मात पिता सब दुखित भये हैं, क्या गति बरनू भाई ॥
अरे मुट्ठी बँधे बेर को निरखा, हाथ डाल ताहि पकड़ा ।।
खुले न हाथ विवश भया बानर, भरम करम में जकड़ा ॥
अरे रस्सी बीच सांप दरसाना, भय वश बुद्धि हराई।।
भरम फाँस में यू जीव भरमा, भरमे ऋषि मुनिज्ञानी ॥
अरे हैंठ मध्य ज्यों भूत दिखाया, रोग सोग उपजाया।।
चतुर बैद्य सब औषधि लाये, मूरख प्रान गंवाया।।
अरे चरखी ऊपर चढ़ा सुचना, अधर में निसदिन झूला।।
केहि विधि वाको हो छुटकारा, सहे काल का स्वला।।अरे
झूठा जग झूठा व्यौहारा, झूठी है सब माया।
राधास्वामी चरन शरन ले प्रानी, क्यों माया भरमाया।।अरे0
शीश महल बिच पड़ा स्वान ज्यों, देखी निज परछाई।
भोंक भोंक कर प्रान तजो है, अपनी राम कुछ नाहीं।।
अरे0 छाया देख डरा ज्यों बालक, समझ न ताको आई।।
मात पिता सब दुखित भये हैं, क्या गति बरनू भाई ॥
अरे मुट्ठी बँधे बेर को निरखा, हाथ डाल ताहि पकड़ा ।।
खुले न हाथ विवश भया बानर, भरम करम में जकड़ा ॥
अरे रस्सी बीच सांप दरसाना, भय वश बुद्धि हराई।।
भरम फाँस में यू जीव भरमा, भरमे ऋषि मुनिज्ञानी ॥
अरे हैंठ मध्य ज्यों भूत दिखाया, रोग सोग उपजाया।।
चतुर बैद्य सब औषधि लाये, मूरख प्रान गंवाया।।
अरे चरखी ऊपर चढ़ा सुचना, अधर में निसदिन झूला।।
केहि विधि वाको हो छुटकारा, सहे काल का स्वला।।अरे
झूठा जग झूठा व्यौहारा, झूठी है सब माया।
राधास्वामी चरन शरन ले प्रानी, क्यों माया भरमाया।।अरे0
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Song 11 — Hindi
(122) इस घट का मन्दिर देखा ॥टेक।।
इस मन्दिर में दस दरवाजे, एक एक से भारी।
झिलमिल ज्योत जगे छिन पलपल, निरखत लागे तारी।
इस0 घट में काशी घट में द्वारका, घट हरद्वार की माया।
घट में मथुरा घट में पुरी है, घट सुमेर की छाया।
इस घट में मानसरोवर निरखा, निरख किया अस्नाना।
अमल विमल निर्मल भयो हंसा, उपजा सत मत ज्ञाना।।
इस ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, जब गुरु ध्यान लगाया।।
माया ममता सकल बिनासी, सुन्न समधि रचाया।
इस नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, जप तप भरम विकारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट लख मिटा संसारा।इस
इस मन्दिर में दस दरवाजे, एक एक से भारी।
झिलमिल ज्योत जगे छिन पलपल, निरखत लागे तारी।
इस0 घट में काशी घट में द्वारका, घट हरद्वार की माया।
घट में मथुरा घट में पुरी है, घट सुमेर की छाया।
इस घट में मानसरोवर निरखा, निरख किया अस्नाना।
अमल विमल निर्मल भयो हंसा, उपजा सत मत ज्ञाना।।
इस ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, जब गुरु ध्यान लगाया।।
माया ममता सकल बिनासी, सुन्न समधि रचाया।
इस नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, जप तप भरम विकारा।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट लख मिटा संसारा।इस
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Song 12 — Hindi
(123)इस घट का मन्दिर सूना है ॥टेक।।
गुरु मूरति पधराई नाहीं, घंटा शंख न बाजे।
जगमग ज्योत दृष्टि नहीं आवे, अनहद नाद न गाजे।
इस0 किसकी आरति किसकी सेवा, पूजा किसकी धारू।
किस विधि किसका ध्यान लगाऊँ, किसके बल मन मारू ॥
भाव फूल की माला बनी है, किसके गले पहनाऊ।।
किसे सुनाऊँ किसे रिझाऊँ, किसकी अस्तुति गाऊँ ॥
चरनामृत की प्यास है चित में, भूक प्रसाद की बाढ़ी।।
भोग लगे किस विध मूरति का, सोच फिकर मोहि गाढ़ी।।
सुमिरन भजन ध्यान सब निष्फल, जब गुरु चित्त न आवे।।
राधास्वामी मेहर करें जब जन पर, तब मेरी वन आवे।
गुरु मूरति पधराई नाहीं, घंटा शंख न बाजे।
जगमग ज्योत दृष्टि नहीं आवे, अनहद नाद न गाजे।
इस0 किसकी आरति किसकी सेवा, पूजा किसकी धारू।
किस विधि किसका ध्यान लगाऊँ, किसके बल मन मारू ॥
भाव फूल की माला बनी है, किसके गले पहनाऊ।।
किसे सुनाऊँ किसे रिझाऊँ, किसकी अस्तुति गाऊँ ॥
चरनामृत की प्यास है चित में, भूक प्रसाद की बाढ़ी।।
भोग लगे किस विध मूरति का, सोच फिकर मोहि गाढ़ी।।
सुमिरन भजन ध्यान सब निष्फल, जब गुरु चित्त न आवे।।
राधास्वामी मेहर करें जब जन पर, तब मेरी वन आवे।
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Song 13 — Hindi
(124) मनुआ बहुत किया अन्धेर ॥टेका।
कहां जाऊँ आनन्द सुख पाऊँ, शान्ती सावधान चितलाऊँ।
गुरु गुन मनन भाव नित गाऊँ, तू है बड़ा भट भेर।।
मनुआ0 कहत न माने झगड़ा ठाने, सत और असत नहीं पहचाने।
अनुचित उचित सभी नहीं जाने, डाले हेरा फेरा।
मनुआ क्रोध की अग्नी प्रचंड चलावे, द्वेष ईर्षा डाह मचावे ।।
आप जले और मुझे जलावे, चारों दशा को घेर ॥
मनुआ जीतेजी दिया नरक में बासा, सबको दिखाये मेरा तमाशा।।
बुद्धि ज्ञान सभी तुम नासा, ढीट कुबुद्धि दिलेर ॥
मनुआ हाय उपाय नहीं कोई सूझे, मनुआ सत मत सार न बुझे।
बिना प्रयोजन सब से जूझे, झगड़ा लड़ाई हेर ॥
मनुआ अशुभ विचार अशुभ मुख बानी, कामी लोभी लम्पट मानी।
तू क्यों ऐसा बना अज्ञानी, करम बोझ सिर ढेर ॥
मनुआ बैरी मनुआ अब तो मानजी, कुछ प्रतीत प्रीत घट मेला।
सीधे सच्चे मारग में आ, राधास्वामी राधास्वामी टेर।
मनुआ
कहां जाऊँ आनन्द सुख पाऊँ, शान्ती सावधान चितलाऊँ।
गुरु गुन मनन भाव नित गाऊँ, तू है बड़ा भट भेर।।
मनुआ0 कहत न माने झगड़ा ठाने, सत और असत नहीं पहचाने।
अनुचित उचित सभी नहीं जाने, डाले हेरा फेरा।
मनुआ क्रोध की अग्नी प्रचंड चलावे, द्वेष ईर्षा डाह मचावे ।।
आप जले और मुझे जलावे, चारों दशा को घेर ॥
मनुआ जीतेजी दिया नरक में बासा, सबको दिखाये मेरा तमाशा।।
बुद्धि ज्ञान सभी तुम नासा, ढीट कुबुद्धि दिलेर ॥
मनुआ हाय उपाय नहीं कोई सूझे, मनुआ सत मत सार न बुझे।
बिना प्रयोजन सब से जूझे, झगड़ा लड़ाई हेर ॥
मनुआ अशुभ विचार अशुभ मुख बानी, कामी लोभी लम्पट मानी।
तू क्यों ऐसा बना अज्ञानी, करम बोझ सिर ढेर ॥
मनुआ बैरी मनुआ अब तो मानजी, कुछ प्रतीत प्रीत घट मेला।
सीधे सच्चे मारग में आ, राधास्वामी राधास्वामी टेर।
मनुआ
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Song 14 — Hindi
(125) मन मूरख क्यों तु सोच करे ॥टेका।
शून्य 6स से सब कुछ प्रगटा, शून्य लौट कर जाई।
माया का प्रपंच है ऐसा, देखत थिर न रहाई ॥
मन0 आये हैं सो जायंगे एक दिन, जाना निससन्देह।।
दो दिन की लीला है जग की, अन्त में सब कुछ खह।।
मन बीज से वृक्ष वृक्ष से डाली, फूल पात सब आये।।
उलट पलट कर बीज बने सोई, भरमे भरम रहाये।
मन अणु परमाणु सिमिट सिमिट कर, बड़े रूप को धारा।।
काल की चक्की पिसते पिस कर, सब वही अनु विस्तारा।।मन
राधास्वामी की संगत कर, तज आपा मद माना।
मानुष जनम का सार प्राप्त कर, पाकर सतगुरु ज्ञाना।।मन0
शून्य 6स से सब कुछ प्रगटा, शून्य लौट कर जाई।
माया का प्रपंच है ऐसा, देखत थिर न रहाई ॥
मन0 आये हैं सो जायंगे एक दिन, जाना निससन्देह।।
दो दिन की लीला है जग की, अन्त में सब कुछ खह।।
मन बीज से वृक्ष वृक्ष से डाली, फूल पात सब आये।।
उलट पलट कर बीज बने सोई, भरमे भरम रहाये।
मन अणु परमाणु सिमिट सिमिट कर, बड़े रूप को धारा।।
काल की चक्की पिसते पिस कर, सब वही अनु विस्तारा।।मन
राधास्वामी की संगत कर, तज आपा मद माना।
मानुष जनम का सार प्राप्त कर, पाकर सतगुरु ज्ञाना।।मन0
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Song 15 — Hindi
(126)| मनुआ चित से कर सतसंग ॥टेक।
चंचलता तज होजा निश्चल, छोड़ दे चित की पुरानी हलचल।।
क्यों फसता है माया के दलदल, धार गुरु का रंग ॥
मनुआ0 सुमिरन नाम का साँससाँस हो, ध्यान में गुरु की मूरति पास हो।
भजन में आनन्द हर्ष हुलास हो, ऐसा सीख ले ढंग।।
मनुआ0 सहस कमल तज त्रिकुटी आजा, सुन्न में सहज समाध रचाजा।।
तीन सुन्न के आगे आजा, सुन सतगुरु प्रसंग ॥
मनु0 राधास्वामी दया से काज बनाले, क्यों पड़ता है काल के पाले।
दया गुरु की दया सदा ले, पीले प्रेम की भंग ॥मनु0
चंचलता तज होजा निश्चल, छोड़ दे चित की पुरानी हलचल।।
क्यों फसता है माया के दलदल, धार गुरु का रंग ॥
मनुआ0 सुमिरन नाम का साँससाँस हो, ध्यान में गुरु की मूरति पास हो।
भजन में आनन्द हर्ष हुलास हो, ऐसा सीख ले ढंग।।
मनुआ0 सहस कमल तज त्रिकुटी आजा, सुन्न में सहज समाध रचाजा।।
तीन सुन्न के आगे आजा, सुन सतगुरु प्रसंग ॥
मनु0 राधास्वामी दया से काज बनाले, क्यों पड़ता है काल के पाले।
दया गुरु की दया सदा ले, पीले प्रेम की भंग ॥मनु0
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Song 16 — Hindi
(127)प्रेमिन चल सतगुरु दरबार ।।टेक।।
जग में कलह कलेश महाना, दुखिया सब संसार।
सत संगत के बचन प्रेम के, हृदय सदा विचार।।
प्रेमिन0 कथनी तज करनी चित देना, रहनी का व्यौहार।।
सुमिरन भजन ध्यान की किरिया, करले अपना सुधार ॥
प्रेमिन0 नर जीवन निष्फल नहीं जावे, टेक इष्ट की धार।
राधास्वामी तेरे सहाई, करेंगे भव से पार।।प्रेमिन0
जग में कलह कलेश महाना, दुखिया सब संसार।
सत संगत के बचन प्रेम के, हृदय सदा विचार।।
प्रेमिन0 कथनी तज करनी चित देना, रहनी का व्यौहार।।
सुमिरन भजन ध्यान की किरिया, करले अपना सुधार ॥
प्रेमिन0 नर जीवन निष्फल नहीं जावे, टेक इष्ट की धार।
राधास्वामी तेरे सहाई, करेंगे भव से पार।।प्रेमिन0
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Song 17 — Hindi
(128) ज्ञानी समझ बूझ कथ ज्ञान ॥टेक॥
ब्रह्म बना तो क्या हुआ, ब्रह्म न जाना जान।
बिन जाने क्या लाभ है, जान से हो पहचान ॥
ज्ञानी0 ब्राकार जो वृत्ति नहीं, ज्ञान से होगी हान।।
जीव ब्रह्म को ले परख, अपने निज अनुमान।।
अपनी आंखों देख सब, कही सुनी मत मान।
कही सुनी जुग जुग चले, आवागवन बंधान ॥
ज्ञानी0 गुरु सतसंग में जाय कर, वचनामृत का पान।
पानी पीछे तू पिये, पहले उसको छान ॥
कथनी तज करनी सहित, करनी सबकी जान।।
राधास्वामी की दया, गुरु मत है परमान।।
ब्रह्म बना तो क्या हुआ, ब्रह्म न जाना जान।
बिन जाने क्या लाभ है, जान से हो पहचान ॥
ज्ञानी0 ब्राकार जो वृत्ति नहीं, ज्ञान से होगी हान।।
जीव ब्रह्म को ले परख, अपने निज अनुमान।।
अपनी आंखों देख सब, कही सुनी मत मान।
कही सुनी जुग जुग चले, आवागवन बंधान ॥
ज्ञानी0 गुरु सतसंग में जाय कर, वचनामृत का पान।
पानी पीछे तू पिये, पहले उसको छान ॥
कथनी तज करनी सहित, करनी सबकी जान।।
राधास्वामी की दया, गुरु मत है परमान।।
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Song 18 — Hindi
(129)चंचलमन तत्व को समझ गया ॥टेका।
काम क्रोध मद लोभ के बस हो, आप ही बना दुखारी।।
पांचों के जब संग को त्यागा, तब वह बना सुखारी।।
चंचल0 दुर्मति दुचिता दुविधा तज दे, दुख कलेश की खानी ।
आपही आप हटे जब यह सब, भया गुरु अभिमानी।।
द्वष दृष्टि और डाह ईर्षा, नित उसको भरमाते ।।
जव गुरु चरनन बासा पाया, अब कोई निकट न आते।।
पहले जब था काग दशा में, हिंसक जीवन घाती।।
हंस भयो मोती चुन खाता, लहे आनन्द दिन राती ॥
हठ को त्याग हठधरमी त्यागी, पक्षपात को त्यागा।
सबको आय में आपको सब में, निरख के भया सुभागा।।
बन्धन काटे काल माया के, कटी कर्म की फांसी।
जीवन मुक्त दशा में बरते, भजे गुरु अधिनासी।।
राधास्वामी की संगत पाई, संगत का फल पाया।
कमल नीर की रहनी सोहे, मन विचार हरषाया।।
काम क्रोध मद लोभ के बस हो, आप ही बना दुखारी।।
पांचों के जब संग को त्यागा, तब वह बना सुखारी।।
चंचल0 दुर्मति दुचिता दुविधा तज दे, दुख कलेश की खानी ।
आपही आप हटे जब यह सब, भया गुरु अभिमानी।।
द्वष दृष्टि और डाह ईर्षा, नित उसको भरमाते ।।
जव गुरु चरनन बासा पाया, अब कोई निकट न आते।।
पहले जब था काग दशा में, हिंसक जीवन घाती।।
हंस भयो मोती चुन खाता, लहे आनन्द दिन राती ॥
हठ को त्याग हठधरमी त्यागी, पक्षपात को त्यागा।
सबको आय में आपको सब में, निरख के भया सुभागा।।
बन्धन काटे काल माया के, कटी कर्म की फांसी।
जीवन मुक्त दशा में बरते, भजे गुरु अधिनासी।।
राधास्वामी की संगत पाई, संगत का फल पाया।
कमल नीर की रहनी सोहे, मन विचार हरषाया।।
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Song 19 — Hindi
(130) कर तू मोर न तोर मनुआ ॥टेका।।
मोर तोर है रसरी भारी, उससे बँधे सकल संसारी।।
कोई विकारी कोई व्यभिचारी, कोई भक्ति के चूर।।मनुआ0
मोर तोर में करता धरता, अहंकार का रूप सो भरता।
त्रिविधि ताप में निसदिन जरता, दुख का ओर न छोर ॥
मनुआ0 मोर तोर तृष्णा की खानी, दुख कलेश आपति की निशानी।
यही है चार योनि की खानी, व्यापा काल घन घोर ॥
मोर तोर क्यों करे अभागी, क्या तू गहेगा किसको त्यागी।।
हो गुरु चरन प्रेम अनुरागी, गुरु हैं बंदी छोर ॥
मोर तोर में माया व्यापी, यह माया दुखदा संतापी।
इससे उपजे आपा तापी, जो राधास्वामी की ओर ॥
मोर तोर है रसरी भारी, उससे बँधे सकल संसारी।।
कोई विकारी कोई व्यभिचारी, कोई भक्ति के चूर।।मनुआ0
मोर तोर में करता धरता, अहंकार का रूप सो भरता।
त्रिविधि ताप में निसदिन जरता, दुख का ओर न छोर ॥
मनुआ0 मोर तोर तृष्णा की खानी, दुख कलेश आपति की निशानी।
यही है चार योनि की खानी, व्यापा काल घन घोर ॥
मोर तोर क्यों करे अभागी, क्या तू गहेगा किसको त्यागी।।
हो गुरु चरन प्रेम अनुरागी, गुरु हैं बंदी छोर ॥
मोर तोर में माया व्यापी, यह माया दुखदा संतापी।
इससे उपजे आपा तापी, जो राधास्वामी की ओर ॥
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Song 20 — Hindi
(131)बना रे अभिमानी मन अज्ञानी ।।टेक।।
जड़ शरीर से बांधा नाता, काम क्रोध संग फिरे मदमाता।।
भव दुख से कभी चैन न पाता, भोगे नरक निदानी ॥
बना0 बिन कारन नित भरमत डोले, अनुचित बैना मुख से बोले।
धरन अकास की नाड़ी टटोले, भटक भटक भटकानी।
बना लोक लाज व्यौहार में लम्पट, सदा मचावे मिथ्या खटपट।
कभी करे अटपट कभी करे सटपट, सहे द्वन्द की गलानी ॥
बना चंचल मूढ़ निपट अविवेकी, नाशवान तन का बना टेकी।
बदी गहे धारे नहीं नेकी, भूला मन कर्म बानी ॥
बना राधास्वामी बनो सहाई, अब तो यह मन बड़ा दुखदाई।।
दया करो लो चरन लगाई, नाम दान दो दानी।।बना
जड़ शरीर से बांधा नाता, काम क्रोध संग फिरे मदमाता।।
भव दुख से कभी चैन न पाता, भोगे नरक निदानी ॥
बना0 बिन कारन नित भरमत डोले, अनुचित बैना मुख से बोले।
धरन अकास की नाड़ी टटोले, भटक भटक भटकानी।
बना लोक लाज व्यौहार में लम्पट, सदा मचावे मिथ्या खटपट।
कभी करे अटपट कभी करे सटपट, सहे द्वन्द की गलानी ॥
बना चंचल मूढ़ निपट अविवेकी, नाशवान तन का बना टेकी।
बदी गहे धारे नहीं नेकी, भूला मन कर्म बानी ॥
बना राधास्वामी बनो सहाई, अब तो यह मन बड़ा दुखदाई।।
दया करो लो चरन लगाई, नाम दान दो दानी।।बना
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Song 21 — Hindi
(132)कहा नहीं माने मन अज्ञानी ॥टेक।।
जग के मरुथल भूमि में आया, मृगतृष्णा की चाह उठाया।
प्यास न बुझी नीर नहीं पाया, भटक भटक भटकानी।।
कहा0 भूल भरम लग सत को त्यागी, असत वस्तु के पीछे लागा।
मोर तोर कर मरा अभागा, सार असार न जानी।।कर
माया छाया एक समाना, कहने को केवल नाम निशाना।
मिथ्या उनको करे अभिमाना, भ्रान्ती के फंद फैशानी।।
कहा हृदय छाज में धूल भराई, फटक पिछोड़े उड़ा उड़ जाई।
हाथ न उसके कुछ भी आई, मिथ्या करम कराई।कहा
आँख ने खोले बन रहा अन्धा, पड़ा जगत के गोरख धन्धा।
चौरासी को गले में फन्दा, योनि योनि भरमानी।।
कहा विषय भोग में आयु खोई, संगी साथी हुआ न कोई।
मरा जनम को अन्त में रोई, चेत न अब भी आनी।।
कहा राधास्वामी दीनबन्धु प्रतिपाला, तुम दयाल तुम सहज कृपाला।।
इस मन की अब करो संभाला, मेरा कहन न मानी।।
कहा
जग के मरुथल भूमि में आया, मृगतृष्णा की चाह उठाया।
प्यास न बुझी नीर नहीं पाया, भटक भटक भटकानी।।
कहा0 भूल भरम लग सत को त्यागी, असत वस्तु के पीछे लागा।
मोर तोर कर मरा अभागा, सार असार न जानी।।कर
माया छाया एक समाना, कहने को केवल नाम निशाना।
मिथ्या उनको करे अभिमाना, भ्रान्ती के फंद फैशानी।।
कहा हृदय छाज में धूल भराई, फटक पिछोड़े उड़ा उड़ जाई।
हाथ न उसके कुछ भी आई, मिथ्या करम कराई।कहा
आँख ने खोले बन रहा अन्धा, पड़ा जगत के गोरख धन्धा।
चौरासी को गले में फन्दा, योनि योनि भरमानी।।
कहा विषय भोग में आयु खोई, संगी साथी हुआ न कोई।
मरा जनम को अन्त में रोई, चेत न अब भी आनी।।
कहा राधास्वामी दीनबन्धु प्रतिपाला, तुम दयाल तुम सहज कृपाला।।
इस मन की अब करो संभाला, मेरा कहन न मानी।।
कहा
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Song 22 — Hindi
(133) काशी तीन लोक से न्यारी ॥टेक।।
काया नर शरीर है काशी, उत्तम मंगल कारी।
रज सत तम त्रयगुन त्रिपुर, मन जो बने त्रिपुरारी।
काशी0 पारवती परवत सम विरती, नन्दी आनन्द भारी।।
निर्मल गंग भक्ति की धारा, जाने कोई अधिकारी।।
,, गुरु पद रज की सहज बिभूती, ले तन सीस में धारी।।
रोग सोग जग के सब नासे, कबहुँ न होवे दुखारी।।
ओजस क्रान्ती ललाट की शोभा, चन्द्र समान उजारी।।
मुन्ड माल की चित्त सुमरनी, सुमिरे नाम अपारी ॥
), घट मन्दिर में ज्योत प्रकाशे, जगमग लिंगाकारी।।
सुरत अर्घ बन पात्र में राखे, शब्द स्वरूप विचारी ॥
डमरू मधुर सुहाना बाजे, सोई अनहद झनकारी।।
मुक्ति दायिनी काशी नगरी, राधास्वामी की बलिहारी।
काया नर शरीर है काशी, उत्तम मंगल कारी।
रज सत तम त्रयगुन त्रिपुर, मन जो बने त्रिपुरारी।
काशी0 पारवती परवत सम विरती, नन्दी आनन्द भारी।।
निर्मल गंग भक्ति की धारा, जाने कोई अधिकारी।।
,, गुरु पद रज की सहज बिभूती, ले तन सीस में धारी।।
रोग सोग जग के सब नासे, कबहुँ न होवे दुखारी।।
ओजस क्रान्ती ललाट की शोभा, चन्द्र समान उजारी।।
मुन्ड माल की चित्त सुमरनी, सुमिरे नाम अपारी ॥
), घट मन्दिर में ज्योत प्रकाशे, जगमग लिंगाकारी।।
सुरत अर्घ बन पात्र में राखे, शब्द स्वरूप विचारी ॥
डमरू मधुर सुहाना बाजे, सोई अनहद झनकारी।।
मुक्ति दायिनी काशी नगरी, राधास्वामी की बलिहारी।
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Song 23 — Hindi
(134)माया मेरे मन में समाई ॥टेक।।
नहीं जानू तेरा रूप है कैसा, कहाँ से तू चल आई।
क्यों आई किसने तुझे भेजा, क्यों मुझे जाल फेसाई ॥
माया0 माया है छल बल चतुराई, माया मान बड़ाई।
जीव जन्तु सब बस में कीन्हे, मारे मुनि समुदाई।।
माया दुविधा दुर्मति द्वन्द पसारा, माया है दुचिताई।
अपनी बुधि अनुसार बखानू, सांचा भेद न पाई ॥
माया भागू तो पाछे लगी डोले, सन्मुख आँख दिखाई।
भय दिखलाचे भर्म भुलावे, आस भरोस दिलाई ॥
माया माया पर मेरा दाव चले नहीं, कोटिन करू उपाई।
हार हार गुरु चरन पड़ा तब, मिली राधास्वामी शरनाई।
माया
नहीं जानू तेरा रूप है कैसा, कहाँ से तू चल आई।
क्यों आई किसने तुझे भेजा, क्यों मुझे जाल फेसाई ॥
माया0 माया है छल बल चतुराई, माया मान बड़ाई।
जीव जन्तु सब बस में कीन्हे, मारे मुनि समुदाई।।
माया दुविधा दुर्मति द्वन्द पसारा, माया है दुचिताई।
अपनी बुधि अनुसार बखानू, सांचा भेद न पाई ॥
माया भागू तो पाछे लगी डोले, सन्मुख आँख दिखाई।
भय दिखलाचे भर्म भुलावे, आस भरोस दिलाई ॥
माया माया पर मेरा दाव चले नहीं, कोटिन करू उपाई।
हार हार गुरु चरन पड़ा तब, मिली राधास्वामी शरनाई।
माया
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Song 24 — Hindi
(135)साधु अद्भुत लीला देखी ।।टेक।।
बंझा ने एक बालक जाया, गधे की सींग बजाई।
जिस जिसने सुनी सींग की धुन को,सुधबुध तन की गंवाई।
साधु0 चिउँटी उड़ असमान को धाई, गगन की तोल तुलाई।
पंख नहीं बिन पंख उड़ाई, कैसे कोई पतियाई।साधु
औंधा कुवाँ गगन थल पानी, पनिहारी उड़ धावे।
बिना जीभ मुख कंठ के नारी, राग सुहाना गावे।।साधु
ऋतु बसन्त चहुँ ओर में फूली, फूल अकास में फूले।
बिना खम्ब के गढ़ा हिंडोला, चांद सूरज दोऊ भूले।
साधु विन जल बरसत मेघ अखंडो, नहीं मीठा नहीं खारी।।
बिना नैन के मोती पोहे, अन्धी आंख की नारी ॥
साधु पिंगला बन और परवत लांघे, चढ़ा सुमेरु कैलासा।।
गंगा मधुरी बात सुनावे, उपजे हर्ष हुलासा ॥साधु
यह लीला आंखों से देखी, कैसे बरन सुनाऊँ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देखी काह दिखाऊँ।साधु0
बंझा ने एक बालक जाया, गधे की सींग बजाई।
जिस जिसने सुनी सींग की धुन को,सुधबुध तन की गंवाई।
साधु0 चिउँटी उड़ असमान को धाई, गगन की तोल तुलाई।
पंख नहीं बिन पंख उड़ाई, कैसे कोई पतियाई।साधु
औंधा कुवाँ गगन थल पानी, पनिहारी उड़ धावे।
बिना जीभ मुख कंठ के नारी, राग सुहाना गावे।।साधु
ऋतु बसन्त चहुँ ओर में फूली, फूल अकास में फूले।
बिना खम्ब के गढ़ा हिंडोला, चांद सूरज दोऊ भूले।
साधु विन जल बरसत मेघ अखंडो, नहीं मीठा नहीं खारी।।
बिना नैन के मोती पोहे, अन्धी आंख की नारी ॥
साधु पिंगला बन और परवत लांघे, चढ़ा सुमेरु कैलासा।।
गंगा मधुरी बात सुनावे, उपजे हर्ष हुलासा ॥साधु
यह लीला आंखों से देखी, कैसे बरन सुनाऊँ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देखी काह दिखाऊँ।साधु0
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Song 25 — Hindi
(136) नटनी नाचे नाच अपार ॥टेक॥
नगर में नाचे बन में नाचे, नाचे खोह पहार।
भीतर बाहर नाच रचा है, नाच का वार न पार ॥
नटनी0 तीरथ नाचे पत्थर पानी, बरत नाच फलहार।।
धर्म में नाचे पक्षपात बन, ज्ञान में तर्क बिचार ॥
भुजा छाप गले तुलसी की माला, तिलक ललाट मॅझार।।
संयम में पखंड आचारा, परमारथ हंकार।।
नट भयो गुप्त प्रगट जग नटनी, व्याप रही संसार।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, माया का भेद अपार।।
नगर में नाचे बन में नाचे, नाचे खोह पहार।
भीतर बाहर नाच रचा है, नाच का वार न पार ॥
नटनी0 तीरथ नाचे पत्थर पानी, बरत नाच फलहार।।
धर्म में नाचे पक्षपात बन, ज्ञान में तर्क बिचार ॥
भुजा छाप गले तुलसी की माला, तिलक ललाट मॅझार।।
संयम में पखंड आचारा, परमारथ हंकार।।
नट भयो गुप्त प्रगट जग नटनी, व्याप रही संसार।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, माया का भेद अपार।।
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Song 26 — Hindi
(137) | तारा तारा तरा और तारा ॥टेक॥
आप तरा औरों को तारा, तारा कुल परिवार।
भव के दुख सागर से लाया, जनम की नौका किनारा।
तारा0 आलस तज निद्रा को त्यागा, छोड़ा भर्म अहंकारा।
खींच लगाया तट पर सहज ही, नाव जो थी मॅझधारा ॥
प्रेम प्रतीत प्रीति घट छाई, पहुँची गुरु दरबारा।।
राधास्वामी गुरु ने अङ्ग लगाया, बख्शा अपना सहारा।
आप तरा औरों को तारा, तारा कुल परिवार।
भव के दुख सागर से लाया, जनम की नौका किनारा।
तारा0 आलस तज निद्रा को त्यागा, छोड़ा भर्म अहंकारा।
खींच लगाया तट पर सहज ही, नाव जो थी मॅझधारा ॥
प्रेम प्रतीत प्रीति घट छाई, पहुँची गुरु दरबारा।।
राधास्वामी गुरु ने अङ्ग लगाया, बख्शा अपना सहारा।
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Song 27 — Hindi
(138)चित ने चित्र विचित्र बनाया ।।टेक।।
आंख कान मुख बन्द लगाया, विरती धार उलटाई।।
सहसकमलदल चढ़ त्रिकुटी गढ़, गुरु का चित्र खिंचाई।
चित ने0 चित्र देख कर सूरत मोही, मुख नहीं आवे बानी।।
ओम ओम कह भाव बताया, अन्त में हुआ निरबानी ॥
परिचय भिला हर्ष घट आया, सोया अनुभव जागा।
गुरु मूरत का दर्शन पाकर, बड़ा प्रेम अनुराग ॥
चित ने0 बाहर गुरु भीतर मेरे गुरु है, भिन्न रूप यह कैसा।।
बाहर तो अस्थूल प्रकाशा, अन्तर सूक्षम जैसा ॥
बाहर दरसे परस से श्रद्धा, अन्तर आवे प्रानी।
तब देखे घट चित्र गुरु का, राधास्वामी की सहानी।।
आंख कान मुख बन्द लगाया, विरती धार उलटाई।।
सहसकमलदल चढ़ त्रिकुटी गढ़, गुरु का चित्र खिंचाई।
चित ने0 चित्र देख कर सूरत मोही, मुख नहीं आवे बानी।।
ओम ओम कह भाव बताया, अन्त में हुआ निरबानी ॥
परिचय भिला हर्ष घट आया, सोया अनुभव जागा।
गुरु मूरत का दर्शन पाकर, बड़ा प्रेम अनुराग ॥
चित ने0 बाहर गुरु भीतर मेरे गुरु है, भिन्न रूप यह कैसा।।
बाहर तो अस्थूल प्रकाशा, अन्तर सूक्षम जैसा ॥
बाहर दरसे परस से श्रद्धा, अन्तर आवे प्रानी।
तब देखे घट चित्र गुरु का, राधास्वामी की सहानी।।
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Song 28 — Hindi
(139) | आये गुरु शरनागत आये ॥टेक।।
यह संसार मोह भंडारा, मोह मया की खानी।।
जीव जन्तु की कौन चलावे, मोहे ज्ञानी ध्यानी।।
आये0 यह संसार आग की भट्टी, जर भुन मर मिटे सारे।
काम क्रोध मद लोभ ईर्षा, भड़क रहे अंगारे।
आये यह संसार है दुख का सागर, डूब मरे सुर देवा।।
जिसको देखा दुख को मारा, दुख का मिला न भेवा।।
आये यह संसार है अगमा पाई, बादर की परछाँई।
छिन पल का नहीं ठौर ठिकाना, रेत की भीत बनाई।।आये।
यह संसार भरम विस्तारा, देख चित्त घबराया।।
राधास्वामी दीनबन्धु लख पाये, गही चरनन की छाया।आये
यह संसार मोह भंडारा, मोह मया की खानी।।
जीव जन्तु की कौन चलावे, मोहे ज्ञानी ध्यानी।।
आये0 यह संसार आग की भट्टी, जर भुन मर मिटे सारे।
काम क्रोध मद लोभ ईर्षा, भड़क रहे अंगारे।
आये यह संसार है दुख का सागर, डूब मरे सुर देवा।।
जिसको देखा दुख को मारा, दुख का मिला न भेवा।।
आये यह संसार है अगमा पाई, बादर की परछाँई।
छिन पल का नहीं ठौर ठिकाना, रेत की भीत बनाई।।आये।
यह संसार भरम विस्तारा, देख चित्त घबराया।।
राधास्वामी दीनबन्धु लख पाये, गही चरनन की छाया।आये
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Song 29 — Hindi
(140) सजनी मन चिन्ता नहीं लाना ।।टेका।
तेरे घट में तेरा प्रीतम, उसका ध्यान लगाना।
दुविधा दुर्मति तज दुचिताई, अन्तर दर्शन पाना।।
सजनी0 आस भरोस रहे गुरु चरनन, चंचल चित्त दबाना।
तिल को उलट इटि घट खोलो, रूप निरख हरखाना ।।।
सुमिर सुमिर नित नाम सुरत से, नाम न कभी भुलाना।।
नाम से काज बनेगा पूरा, नाम भक्ति धन कमाना ॥
ॐनाम है योग युक्ति जप क्रिया, नाम प्रीत सत ज्ञाना।
एक नाम है सब की कुजी, नाम में नहिं अलसाना।।
सजनी0 नाम है सुमिरन नाम भजन है, नाम में गुरु का ध्याना।।
राधास्वामी नाम जो सुमिरे प्रानी, नसे भर्म अज्ञाना ।।।
तेरे घट में तेरा प्रीतम, उसका ध्यान लगाना।
दुविधा दुर्मति तज दुचिताई, अन्तर दर्शन पाना।।
सजनी0 आस भरोस रहे गुरु चरनन, चंचल चित्त दबाना।
तिल को उलट इटि घट खोलो, रूप निरख हरखाना ।।।
सुमिर सुमिर नित नाम सुरत से, नाम न कभी भुलाना।।
नाम से काज बनेगा पूरा, नाम भक्ति धन कमाना ॥
ॐनाम है योग युक्ति जप क्रिया, नाम प्रीत सत ज्ञाना।
एक नाम है सब की कुजी, नाम में नहिं अलसाना।।
सजनी0 नाम है सुमिरन नाम भजन है, नाम में गुरु का ध्याना।।
राधास्वामी नाम जो सुमिरे प्रानी, नसे भर्म अज्ञाना ।।।
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Song 30 — Hindi
(141) साधु जहाँ चाहे सम धार ।।टेक॥
सिर तू बा और तन है दंडी, नस नाड़ी सब तार।
सच कहूँ तो कोई न माने, तेरी देह सितार।।
साधु0 हृदय सोलह चक्र हैं अन्तर, मेरु दंड ‘बिस्तार।
भाव की हाथ पहन मुन्दरी, छेड़ प्रेम गत सार।
साधु सात तत्व के साथ ही स्वर है, परदों के आधार।।
मुदरी पहन उन्हें जो छेडे, सहज में बजे सितार ॥
साधु स्वर सोम मंगल वृहस्पति, बुद्ध शुक्र शनिवार।।
सात यह सुर अन्तर सब रहते, पिंडी जीव अधार।।
साधु कर सतसंग भक्ति ज्ञान से, शब्द योग चित धार।
सम को साध शब्द मारग चल, राधास्वामी की बलिहार।साधु
सिर तू बा और तन है दंडी, नस नाड़ी सब तार।
सच कहूँ तो कोई न माने, तेरी देह सितार।।
साधु0 हृदय सोलह चक्र हैं अन्तर, मेरु दंड ‘बिस्तार।
भाव की हाथ पहन मुन्दरी, छेड़ प्रेम गत सार।
साधु सात तत्व के साथ ही स्वर है, परदों के आधार।।
मुदरी पहन उन्हें जो छेडे, सहज में बजे सितार ॥
साधु स्वर सोम मंगल वृहस्पति, बुद्ध शुक्र शनिवार।।
सात यह सुर अन्तर सब रहते, पिंडी जीव अधार।।
साधु कर सतसंग भक्ति ज्ञान से, शब्द योग चित धार।
सम को साध शब्द मारग चल, राधास्वामी की बलिहार।साधु
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Song 31 — Hindi
(142)मन की मेरे बलिहारी ॥टेका।
पहले मन में काम क्रोध थे, लोभ मोह हंकारा।।
दया क्षमा करुना चित भाई, मन भया सुख भंडारा ॥
मनकी0 स्वारथ बस हो पाप कमाना, जग माया में फसता।।
परमारथ की चाह बर आई, उपकारी बन हँसता।
मनकी विषय भोग में लम्पट रहता, वृथा समय गंवाता।
भक्ति भाव की उसे जो सूझी, गुरु प्रेम रस माता।।
मनकी पक्षपात बस हिंसा करता, सब का हृदय दुखाता।
अब नहीं हटधरमी मेरा मनुआ, मीठे बचन सुनाता ॥मनकी
जब से संगत गुरु की पाई, सुखी भयो मन मेरा।
बन्धन काट मुक्ति पद लागा, राधास्वामी का चेरा।।मन की0
पहले मन में काम क्रोध थे, लोभ मोह हंकारा।।
दया क्षमा करुना चित भाई, मन भया सुख भंडारा ॥
मनकी0 स्वारथ बस हो पाप कमाना, जग माया में फसता।।
परमारथ की चाह बर आई, उपकारी बन हँसता।
मनकी विषय भोग में लम्पट रहता, वृथा समय गंवाता।
भक्ति भाव की उसे जो सूझी, गुरु प्रेम रस माता।।
मनकी पक्षपात बस हिंसा करता, सब का हृदय दुखाता।
अब नहीं हटधरमी मेरा मनुआ, मीठे बचन सुनाता ॥मनकी
जब से संगत गुरु की पाई, सुखी भयो मन मेरा।
बन्धन काट मुक्ति पद लागा, राधास्वामी का चेरा।।मन की0
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Song 32 — Hindi
(143) साधु समझ करो कुछ करनी ॥टेका।
नहाया धोया टीका लगाया, घंटा शंख बजाया।।
आरत साजी मन्दिर जाकर, क्या इससे फल पाया ॥
साधु0 आसन मारा धूनी रमाई, कफनी पहन के डोले।
मांगी भीख मिला क्या तुमको, भाई तुम तो भूले।।
साधु गले में माला डाल के आये, भेस भयानक भाई।
शान्ति चैन की गम नहीं पाई, भूल में उमर बिताई।।
साधु अंग भभूत कमर मृगछाला, जटाजूट सिर बांधे।।
क्या समझा क्या हाथ लगा है, काल बोझ धरा कांधे ॥
साधु कर सतसंग सार कुछ बूझो, सार में साँची भलाई।
राधास्वामी दया करेंगे, लो उनकी शरनाई ॥साधु
नहाया धोया टीका लगाया, घंटा शंख बजाया।।
आरत साजी मन्दिर जाकर, क्या इससे फल पाया ॥
साधु0 आसन मारा धूनी रमाई, कफनी पहन के डोले।
मांगी भीख मिला क्या तुमको, भाई तुम तो भूले।।
साधु गले में माला डाल के आये, भेस भयानक भाई।
शान्ति चैन की गम नहीं पाई, भूल में उमर बिताई।।
साधु अंग भभूत कमर मृगछाला, जटाजूट सिर बांधे।।
क्या समझा क्या हाथ लगा है, काल बोझ धरा कांधे ॥
साधु कर सतसंग सार कुछ बूझो, सार में साँची भलाई।
राधास्वामी दया करेंगे, लो उनकी शरनाई ॥साधु
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Song 33 — Hindi
(144) बहना खोल के देखो नैना ॥टेक।।
धन सम्पति और हॉट हवेली, इनमें कहां सुख चैन।
काल जो आया सबही छूटे, दिन अब होगया रैना ॥
बहना0 सपने का है खेल तमाशा, देता काल है सैना।
सैन बैन कोई बुझे नहीं, कहूँ खोल क्या बैना।।
बहना सखी सहेली का संग बिछड़ा, जो थी अब वह है ना।
कोई रहा ना नाम लेन को, तोता तोती मैना।।
बहना मैं मैं तू तू में उमर बिताई, आगे तू तू मैं ना।
पक्षी पखेरू तक नहीं बचते, काल उखाड़े ड्यना ॥
बहना भज गुरु नाम भजन के अवसर, भजन भाव में भय ना।
राधास्वामी चरन शरन वलिहारी, जग है काल चना।।बहना
धन सम्पति और हॉट हवेली, इनमें कहां सुख चैन।
काल जो आया सबही छूटे, दिन अब होगया रैना ॥
बहना0 सपने का है खेल तमाशा, देता काल है सैना।
सैन बैन कोई बुझे नहीं, कहूँ खोल क्या बैना।।
बहना सखी सहेली का संग बिछड़ा, जो थी अब वह है ना।
कोई रहा ना नाम लेन को, तोता तोती मैना।।
बहना मैं मैं तू तू में उमर बिताई, आगे तू तू मैं ना।
पक्षी पखेरू तक नहीं बचते, काल उखाड़े ड्यना ॥
बहना भज गुरु नाम भजन के अवसर, भजन भाव में भय ना।
राधास्वामी चरन शरन वलिहारी, जग है काल चना।।बहना
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Song 34 — Hindi
(145) मिथ्या यह संसार सुरत प्यारी ॥टेक।
स्वारथ के सब संगी साथी, कुल जाती परिवार।
अन्त समय कोई काम न आवे, मन में सोच बिचार।।
सुरत0 यह संसार स्वप्नवत लीला, अल्प काल व्यौहार।
अन्त काल काज जब पहुँचा, फिर सब असत असार।।
सुरत यह संसार है सचमुच प्रानी, बालू की दीवार।
रुचि रुचि लाख बनावे कोई, बिनसत लगे न वार।
सुरत यह संसार बदर की छाई, देख ले दृष्टि पसार।
छिन में है छिन में नहीं है, जनम जुआ मत हार।।
सुरत यह संसार पूछ कुत्ते की, परख ले नैन उघार।
सीधी कोई चाहे करे कितनी, टेढ़ी रहे हर बार ॥
सुरत यह संसार मरुथल भूमी, मृग तृष्णा जल धार।
जल नहीं मिले प्यासे नहीं जावे, डूबे दौड़ गॅवार ॥
सुरत यह संसार धोके की टट्टी, इन्द्रजाल परचार।
बाजीगर ने थाट समेटा, सब झूठा व्यौहार।।
सुरत समझ बूझ कुछ करले कमाई, जा गुरु के दरबार।।
सतसंगत में काम बना ले, राधास्वामी कहे पुकार।।सुरत
स्वारथ के सब संगी साथी, कुल जाती परिवार।
अन्त समय कोई काम न आवे, मन में सोच बिचार।।
सुरत0 यह संसार स्वप्नवत लीला, अल्प काल व्यौहार।
अन्त काल काज जब पहुँचा, फिर सब असत असार।।
सुरत यह संसार है सचमुच प्रानी, बालू की दीवार।
रुचि रुचि लाख बनावे कोई, बिनसत लगे न वार।
सुरत यह संसार बदर की छाई, देख ले दृष्टि पसार।
छिन में है छिन में नहीं है, जनम जुआ मत हार।।
सुरत यह संसार पूछ कुत्ते की, परख ले नैन उघार।
सीधी कोई चाहे करे कितनी, टेढ़ी रहे हर बार ॥
सुरत यह संसार मरुथल भूमी, मृग तृष्णा जल धार।
जल नहीं मिले प्यासे नहीं जावे, डूबे दौड़ गॅवार ॥
सुरत यह संसार धोके की टट्टी, इन्द्रजाल परचार।
बाजीगर ने थाट समेटा, सब झूठा व्यौहार।।
सुरत समझ बूझ कुछ करले कमाई, जा गुरु के दरबार।।
सतसंगत में काम बना ले, राधास्वामी कहे पुकार।।सुरत
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Song 35 — Hindi
(146) सतगुरु ने भेद बताया, घर अधर मर्म जतलाया ।।टेक।।
घर बने परबत एक दिखाना, भेद अभेद का रूप लखाना।
सतपद धुरपद मिला निशाना, सम प्रकाश और छाया ।सतगुरु0
जो जो कथं वही निज ज्ञाना, जो जो करू सो सत्य प्रमाना।
मिल गया जीते जी निरवाना, व्यायै ब्रह्म न माया ॥
जाग्रत स्वप्न एक कर देखा, सुषुप्ति तुर्या किया परेवा।।
तुर्यातीत को गहा विशेषा, जो खोया था पाया।।
काम क्रोध मद लोभ न व्यापे, मिट गया अहंकार मद अपि।।
अब न सतावे जग त्रय ताप, भव भर्म सकल नसाया ।सतगुरु
सहज अवस्था सहज सुबानी, सहज कर्म सो सहज सुहानी।।
मिल गये राधास्वामी अगन ठिकानी, सहज दृष्टि दरसाया ॥
घर बने परबत एक दिखाना, भेद अभेद का रूप लखाना।
सतपद धुरपद मिला निशाना, सम प्रकाश और छाया ।सतगुरु0
जो जो कथं वही निज ज्ञाना, जो जो करू सो सत्य प्रमाना।
मिल गया जीते जी निरवाना, व्यायै ब्रह्म न माया ॥
जाग्रत स्वप्न एक कर देखा, सुषुप्ति तुर्या किया परेवा।।
तुर्यातीत को गहा विशेषा, जो खोया था पाया।।
काम क्रोध मद लोभ न व्यापे, मिट गया अहंकार मद अपि।।
अब न सतावे जग त्रय ताप, भव भर्म सकल नसाया ।सतगुरु
सहज अवस्था सहज सुबानी, सहज कर्म सो सहज सुहानी।।
मिल गये राधास्वामी अगन ठिकानी, सहज दृष्टि दरसाया ॥
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Song 36 — Hindi
(147) यह जग नाटकशाला साधु, यह जग नाटकशाला ।।टेक।।
राजा रंक फकीर औलिया, दृष्य विचित्र विशाला।।
कोई ओढ़े शाल दुशाला, कोई सिर कम्बल काला ॥
साधु0 सुरत ने अद्भुत भेष बनाये, नाचे नाच रसाला।।
गावें भाव दिखावे छिन छिन, खेलें खेल रसाला ॥
ब्रह्मा वेद से रचा जगत को, विष्णु गदा ले पाला।।
शिव संहार का साज सजावे, साथ भूत बैताला ॥
नाचे कमला दुर्गा सारद, काली छबि बिकराला।।
सावित्री का राग गायत्री, सैन बैन का जाला।।
शंखनाद की धूम मची है, डमरू शोर कराला।।
रारंग सारंग बजी सरंगी, बीन सितार सुहाला।।
श्रति धुन है उद्गीत है बानी, ओम ओम का ताला।।
श्रोतागन सब सुनने आये, मन में भये बिहाला ॥
साधु दृष्टि साक्षी रूप है, सुख दुख मन से टाला।
जिसने अपना रूप बिसारा, उर उपजा दुख साला ॥
साक्षी देखे विमल तमासा, चित रहे सुखी सुखाला।।
भूल भर्म में जो कोई आया, सहे कर्म का भाला।।
रैन सपना है जग की लीला, सपना धन और माला।।
आंख खुली तब कुछ नहीं दरसा, गुप्त जो देखा भाला ॥
राधास्वामी संत रूप धर आये, दीनबन्धु सुदयाला।।
प्रेम पियाला हमें पिलाया, सहज किया मतवाली ॥
राजा रंक फकीर औलिया, दृष्य विचित्र विशाला।।
कोई ओढ़े शाल दुशाला, कोई सिर कम्बल काला ॥
साधु0 सुरत ने अद्भुत भेष बनाये, नाचे नाच रसाला।।
गावें भाव दिखावे छिन छिन, खेलें खेल रसाला ॥
ब्रह्मा वेद से रचा जगत को, विष्णु गदा ले पाला।।
शिव संहार का साज सजावे, साथ भूत बैताला ॥
नाचे कमला दुर्गा सारद, काली छबि बिकराला।।
सावित्री का राग गायत्री, सैन बैन का जाला।।
शंखनाद की धूम मची है, डमरू शोर कराला।।
रारंग सारंग बजी सरंगी, बीन सितार सुहाला।।
श्रति धुन है उद्गीत है बानी, ओम ओम का ताला।।
श्रोतागन सब सुनने आये, मन में भये बिहाला ॥
साधु दृष्टि साक्षी रूप है, सुख दुख मन से टाला।
जिसने अपना रूप बिसारा, उर उपजा दुख साला ॥
साक्षी देखे विमल तमासा, चित रहे सुखी सुखाला।।
भूल भर्म में जो कोई आया, सहे कर्म का भाला।।
रैन सपना है जग की लीला, सपना धन और माला।।
आंख खुली तब कुछ नहीं दरसा, गुप्त जो देखा भाला ॥
राधास्वामी संत रूप धर आये, दीनबन्धु सुदयाला।।
प्रेम पियाला हमें पिलाया, सहज किया मतवाली ॥
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Song 37 — Hindi
(148 ! जिन ढूंढा तिन पाया साधु, नाम रतन धन खानी ।।टेक।
मन परवत में खान खुली है, सतगुरु की सहदानी।।
ले कुदाली कर भक्ति प्रेम की, खोदे कोई नर ज्ञानी।
साधु0 मन को खोद रतन धन पावे, नाम रतन सुखदानी।।
दुख दरिद्र फिर निकट न आवे, मन रहे बहु हरषानी ॥
चल सतसंग भेद ले गुरु से, छोड़ कुसंगत प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मैं तो हुआ विज्ञानी।।
मन परवत में खान खुली है, सतगुरु की सहदानी।।
ले कुदाली कर भक्ति प्रेम की, खोदे कोई नर ज्ञानी।
साधु0 मन को खोद रतन धन पावे, नाम रतन सुखदानी।।
दुख दरिद्र फिर निकट न आवे, मन रहे बहु हरषानी ॥
चल सतसंग भेद ले गुरु से, छोड़ कुसंगत प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मैं तो हुआ विज्ञानी।।
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Song 38 — Hindi
| 149) सुहागिन चेत के चल, पिया प्रेम नगर की राह ॥टेक॥
नैहर देश बिराना सजनी, कर प्रीतम की चाह।।
त्याग मोह आलस छल निद्रा, मैं समझाऊँ काह ।।सुहागिन
जग पितु मात शोक उपजावे, राह से हो न कुराह।
सत की चूनर पहर भाव से, बिछुवे हिये की दाह ।।सुहागिन
शील संदूर से मांग भरा ले, अपना भाग सराह।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु के हाथ पनाह ।।सुहागिन
नैहर देश बिराना सजनी, कर प्रीतम की चाह।।
त्याग मोह आलस छल निद्रा, मैं समझाऊँ काह ।।सुहागिन
जग पितु मात शोक उपजावे, राह से हो न कुराह।
सत की चूनर पहर भाव से, बिछुवे हिये की दाह ।।सुहागिन
शील संदूर से मांग भरा ले, अपना भाग सराह।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु के हाथ पनाह ।।सुहागिन
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Song 39 — Hindi
| 150) भक्ति महा सुखदाई साधु, भक्ति महा सुरवदाई ।।टेक।
प्रेम भाव जब चित में उपजा, चित चरनन लव लाई।
लगी समाधि अखंड अपारा, सो टूटे बरियाई।।
साधु0 कहां का ज्ञान कहां का जप तप, केसी बुद्धि चतुराई।।
जब मन भक्ति भाव रस पाया, भव दुख सहज नसाई।।
साधु एक आस विश्वास गुरु का, एक अटल शरनाई।
दुविधा मिटी गई सब चिन्ता, छाई बेपरवाई।।
साधु जीवन मुक्त दशा नित बरते, सहज भक्त समुदाई।।
कमल नीर सम रहनी सहनी, माया काल लजाई।साधु
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अटल बर पाई।
अब नहीं खटका मोह जाल का, गुरु ने लिया छुड़ाई ॥साधू0
प्रेम भाव जब चित में उपजा, चित चरनन लव लाई।
लगी समाधि अखंड अपारा, सो टूटे बरियाई।।
साधु0 कहां का ज्ञान कहां का जप तप, केसी बुद्धि चतुराई।।
जब मन भक्ति भाव रस पाया, भव दुख सहज नसाई।।
साधु एक आस विश्वास गुरु का, एक अटल शरनाई।
दुविधा मिटी गई सब चिन्ता, छाई बेपरवाई।।
साधु जीवन मुक्त दशा नित बरते, सहज भक्त समुदाई।।
कमल नीर सम रहनी सहनी, माया काल लजाई।साधु
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अटल बर पाई।
अब नहीं खटका मोह जाल का, गुरु ने लिया छुड़ाई ॥साधू0







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