Song 0 — Hindi
मंगलम् गुरुदेव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।
मंगलम् अव्यक्त अनुपम, मंगलम् भव गंजनम् ॥
मंगलम् धुरपद निवासी, मंगलम् सत् आसनम् ।
मंगलम् निर्वाण सद्गति, मंगलम् जन रन्जनम् ॥
मंगलम् ज्ञान स्वरूपम्, मंगलम् आनन्द रूप ।
मंगलम् चैतन्य सदनम्, मंगलम् सत सत्य भूप ।।
मंगलम् योगीन्द्र माया, तीत मंगल दायकम् ।
मंगलम् संसार सारम्, अद्भुतम् मुनि नायकम् ॥
मंगलम् त्रय गुण रहित,अपरोक्ष परोक्ष निवासनम् ।
मंगलम् त्रय काल ज्ञाता, मंगलम् भव नाशनम् ।।
आदि कारण मूल कारण, मध्य आदि अनन्त जो ।
मंगलम् करुणा सदन, शुभ तत्व परम जगत प्रभो ।।।
आप प्रगटे इस जगत में, जीव काज सुधारने।
शब्द नाव बनाये सुन्दर, जीव दुखिन उबारने ।
प्राण तन मन कर्म बानी, सबही अपेण लीजिये ।
में हूँ शरणागत तुम्हारा, दास अप्रना कीजिये ।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
न्याग जंग के मोह धन्धे, पाऊँ भक्ति सम्पदा ।।
Song 1 — Hindi
तेरे ध्यान में हिय जिय उमगाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
गुरु रूप में प्रगट हुआ जग में, जीवों को चिताके किया मग में।
है विनय तेरा दर्शन पाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
मंगल मय मंगल की खानी, मंगल स्वरूप मंगल दानी ।
क्षण प्रतिक्षण मैं तुझको ध्याऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
तू सब में है सब से न्यारा, तेरा रूप लगे अति ही प्यारा।
तेरा चरण छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन घन घन राधास्वामी ॥॥
तू निस दिन मेरे मन में बसे, अब मन नहीं माया मोह फँसे ।।
राधास्वामी नाम जय हरपाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
Song 2 — Hindi
गुरु दरस पाय मन मगनाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
गुरु रूप में दरस दियो जग में, अपना के कियो मुझको मग में ।
तेरा चरणा छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन धन घन राधास्वामी ॥॥
तेरा सुमिरन ध्यान भजन नित हो, तेरा श्रवण मनन निध्यासन हो ।
धारू मन में तेरा रूप सदा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
तू दाता दीन दयाला है, भक्तों का तू प्रतिपाला है।
तेरे चरण में तन मन बिसरा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
राधास्वामी ने की है दया भारी, गुरु चरण कमल पर बलिहारी।
गुरु वचन सुनू और नित गाऊ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
चमका घट भक्ति का तारा, धन धन धन धन राधास्वामी ।
जीते जी हुआ भव जल पारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
नहीं काम क्रोध के भये मन में, नहीं रोग सोग व्यापा तन में ।
हुआ करम भरम से मैं न्यारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
दुविधा न रही चिन्ता न रही, माया न रही ममता न रही ।।
सतगुरु मेरा हो गया रखवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
जब आँख खुली तब पहिचाना, गुरु गम गति लख मन ने माना।
भरमू नहिं सुख घर परिवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
सुरत सखी नभ चढ़ आई, गुरु मूरति ने छवि दरसाई ।।
धुरपद का खुला घट में द्वारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
Song 3 — Hindi
सब नामों से है। यह न्यारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
दल सहस कमल सुमिरन साधा, त्रिकुटी चढ़ ध्यान को आराधा ।
मृग्न महासुन दुचिता जारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
मुरत शब्द जोग मत अति है सुगम, कोई अधिकारी पाता है गम ।
गुरु ने मुझे दिया मरम सारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
जगमग जगमग ज्योती दमकी, ज्योती विचित्र घट में चमकी ।
है, मगन जो देखा चमकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
महम कमल घंटा बाजा, और शून्य में रारंग धुन गाजा ।।
पद में गरजा कारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
की थी यह त्रिलोकी, यह त्रिलोकी मैंने छोड़ी ।।
सूरत को गारा, राधास्त्रामी, राधास्वामी ॥।।
नाम की धुन पाई, प्यारी धुन यह मुझको भाई।
मुना में भेवर पद से पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
सतलोक में बीन की गति प्रगटी, निरखी वहां सतगुरु की भृकुटी ।
सतगुरु मेरे हो गये रखवारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
लख अलख की शोभा बेहु न्यारी, गम अगम की महिमा थी प्यारी ।
ऊँचे चढ़ हो गया भव पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
गुरु नाम की धुन पहचान लिया, प्रकाश में रूप को जान लिया।
मिल गया काल से छुटकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी मैं गाता हूँ।
मैं तरा साथ सब को तारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
Song 4 — Hindi
तुम जग में आये औरों का, और अपना काम बनाने को ॥॥
कथनी बदनी से लाभ नहीं, करनी से चित को लगा रखना ।।
करनी में सुख आनन्द रहते, कथनी है मन बहलाने को ॥॥
कथनी के सूरे बहुत मिले, करनी से उनको काम नहीं ।।
उनका जीवन है बातों को, यह जन्मे बात बनाने को ॥॥
पुस्तक पोथी के ज्ञानी हैं, और झूठे ज्ञान के मानी हैं।
अनुभव नहीं नहीं रहनी बदलो, भरमे आये भरमाने को ॥॥
जग को यह मिथ्या कहते हैं, जग की आशा में रहते हैं ।
बातों से रूप को सिद्ध किया, पहुँचे नहीं ठौर ठिकाने को ।।।।
कथनी तज करनी करो भाई, करनी से बना रहनी अपनी ।
करनी से रहनी पाओगे, करनी है रहनी पाने को ॥॥
राधास्वामी यू कहते हैं, करनी से मिलती है रहनी ।।
अभ्यास शब्द का नित करना, चित वृती के ठहराने को ।।।।
Song 5 — Hindi
जिसने परचे पाया गुरु का, वह आस से कभी निरास नहीं ॥॥
गुरु तेरे पितु और माता हैं, गुरु करता धरता विधाता हैं।
गुरु सम्बन्धी और भ्राता हैं, क्या पल छिन तेरे पास नहीं ॥।।
घट तेरे गुरु का धाम बना, घट सुमिरन आठों जाम बना ।
गुरु नाम से निज विसराम बना, गुरु काशी नहीं कैलाश नहीं ॥॥
भज नाम गुरु का नित प्रतिछन, कर गुरु का सुमिरन रात और दिन ।
ले जग जस कीरति को गिन गिन, गुरु तुझमें भूमि आकाश नहीं ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी राधास्वामी, जो नहीं भजता है दास नहीं ॥॥
Song 6 — Hindi
है सत चित आनन्द रूप हमारा, धोके में आते भी नहीं ॥॥
गुन कर्म स्वभाव ज्ञान सारे, रहते हैं अपने सहारे सव ।
हम यह नहीं यह हमसे हैं अलग, यह हमें छोड़ जाते भी नहीं ॥॥
यह कर्म ज्ञान आनन्द हमारे, भोग हैं भोग से क्यों डर हो ।
जब रूप को अपने जोन लिया, धोका भव का खाते भी नहीं ॥॥
की साध की संगत हित चित से, तब रूप की अपने समझ आई।
इस रूप में स्थिरताई है, चिन्ता चित में लाते भी नहीं ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
इस राग को छोड़ राग दूसरा, भूल के हम गाते भी नहीं ।।।।
Song 7 — Hindi
मैं किससे पूजू पथिक राह में, केसे सुख दुख पाते हैं ॥।।
अब आये हाथ न था कुछ भी, जब गये तो हाथ नहीं कुछ था ।
क्यों जाते समय है दुख इनको, कारन नहीं कोई बताते हैं ॥॥
मान लोभ में भूल गये, और भरम हिंडोले झूल गये ।
अह कार से फूल गये, और अन्त काल पछताते हैं ॥॥
जो आये हैं बह जायेंगे, जो भिले बिछुड़ना है उनको ।
जो समझ गये वह भूल के भी, चिन्ता नहीं मन में लाते हैं ।।।।
संसार नहीं स्थिर भाई, है इसमें नहीं स्थिरताई ।।
ज्ञानीं इस दशा को समझ गये, इसमें नहीं चित को लगाते हैं ॥॥
जो करना धरना है तुम को, वह करो और अपनी राह लगो ।
डरते हो काल से माया से, यह जीव को फाँस हँसाते हैं ॥॥
यह जान लो कोई नहीं अपना, संसार रैन का सपना है ।
सोचो विवेक से निज मन में, भूठे सब रिस्ते नाते हैं ॥॥
दिन ढला रात की बारी है, कर सोने की अब तय्यारी ।
आयु गई नाम जो लेते हैं, भव सागर से तर जाते हैं ।।।।
सत संगत में सतगुरु के जा, कुछ दिनों शब्द का साधन कर ।
राधास्वामी की कृपा से, सेवक नहीं धोखा खाते हैं ॥॥
Song 8 — Hindi
जब ब्रह्मरेन्द्र पर चढ़ आया, फिर सिखर मेरु कैलास चढ़ा ॥॥
माया ममता घट से भागी, सोई हुई सुरत जागी ।
मिट गयी अंधेरा अविद्या का, फिर विद्या के प्रकाश चढ़ा ।।।।
चढ़ने चलने की तय्यारी की, सतगुरु ने मेरी रखवारी की ।
दृढ़ता से उदान का आसरा ले, घट गगन में सांसों सांस चढ़ा ॥॥
सुन्न महासुन के पार गया, फिर भवर की खिड़की जाके घुसा ।।
सतपद में सतगुरु का दर्शन, ले मन में सच्ची आस चढ़ा ।।।।
लख अलख अगम की गम पाई, ली राधास्वामी की शरनाई ।।
ऊचा शब्द का डोर पकड़े, राधास्वामी का दास चढ़ा ।।॥
Song 9 — Hindi
आसा का बन्धन काटे वह, गुरुमुख है गुरु विश्वासी है ॥॥
आसा वाले को चैन कहाँ, आसा के साथ है त्रास धनी ।
मंगल आनन्द का भागी वह, संसार से जिसको उदासी है ॥॥
जैसी आसा वैसी बासी, जब लग आसा तब लग बासा ।।
जो आसा का बन्धन काटे, सत मत का वह अभ्यासी है ॥॥
आसा है जन्म मरन प्यारे, आसा तज दे फिर मुक्ति है।
आसा को सोच विचार ले तू, जड़ चेतन ग्रन्थि की गांसी है ॥॥
आसा में दुविधा दुचिताई, असा में भय लज्जा रहते ।।
यह तीनों पाप अवस्था हैं, तज इनको फिर सुखरासी है ।।॥
आसा त्रिगुण की खानी है, यह सत रज तम की है रस्सी ।।
रजे ब्रह्मा सत है विष्णु बली, तम शिव शम्भू केलाशी है ॥॥
आशा है काम क्रोध लालच, असा मद मोह द्वेष की जड़।
क्यों आस में पड़ के निराश हुआ, तेरा रूप अजर अविनाशी है ॥॥
सतसंगत में सतगुरु के जा, सुन हित चित से गुरु की बानी ।।
बानी सुन सुन निर्बानी हो, गुरु बानी सर्व प्रकाशी है ॥॥
राधास्वामी ने समझाया, घट ही में है तेरे सब कुछ।
घट में धंस आप अपना परख, जल में क्यों मीन पियासी है ॥॥
Song 10 — Hindi
मैं सच सच तुझसे कहता हूँ, यह भूल भरभ और धोका है ॥॥
नहीं एक न दो नहीं तीन चार, नहीं सौ पचास नहीं सहस्रार ।
तू जैसा चाहे माना कर, इस मान से किसने रोका है ॥॥
जैसा है तैसा समझ उसे, नहीं वह ऐसा नहीं वह वैसा ।
नहीं एति न नेति न सत न असत,न असोक सोक नहीं सोका है ॥॥
बातों के फेर पड़े ज्ञानी, अभिमानी मानी गमानी बने ।
ह ज्ञान नहीं अज्ञान नहीं, नहीं बन्द न खुला झरोका है ।।।।
ना कुछ दिन कर संगत गुरु की, तब सार तत्व को जानेगा ।
किसने उसे जाना बूझा है, और जान बूझकर ठोका है ॥॥
सब कुछ है और कुछ भी नहीं, लव अलख अगम गम है दोनों ।।
वह वार न पार न आदि अंत, नहीं सिरा है और न नूका है ॥॥
राधास्वामी की शरन में आ, तब अनुभव से कुछ जानेगा ।
वह रुद्र वसु आदित्य नहीं, नहीं नीर पवन का झोंका है ॥॥
Song 11 — Hindi
मुभु दीन अधीन को ठौर ठिकाने, लगा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
संसार महा दुखदाई था, नहीं अपना कोई सहाई था ।
निज दया से मेरा बिगड़ा काम, बना दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
मन चंचल था अज्ञानी था, अभिमानी मानी गुमानी था ।
सुरत शब्द योग विधि से निश्चल, करवा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
घट अघट का भेद दिया मुझको, चरणों में अपने लिया मुझको ।
सतसग के अमृत बचन सुना, के चिता दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
मैं अब चरणों की बनी दासी, सुख पाकर हो गई सुखरासी ।
राधास्वामी धाम का देके पता, पहुँचा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
Song 12 — Hindi
चेतन घन अमल विमल निर्मल, सत सदन परम सुखरासी है ॥॥
कोई अगन कहे कोई सगुन कहे, कोई निराकार साकार कहे ।।
तू सब कुछ है और कुछ भी नहीं, धुरपद धुरधाम निवासी है ॥॥
नहीं मन ने थाह कभी पाई, नहीं बुद्धि में आई चतुराई ।
चित चिंतन कैसे करे तेरा, तू द्वैत अद्वेत प्रकाशी है ॥॥
मन बना बिह गम मीन मकर, मरकट बनकर कूदा अन्दर ।
चींटी की चाल चला घट में, कह उठा तू अगम उदासी है ।।।।
राधास्वामी रूप में प्रकट हुआ, दर्शन देकर कृतार्थ किया ।
निज शब्द से अपना भेद दिया, घट अघट का सत्य निवासी है ॥॥
Song 13 — Hindi
मद मोह मान का महा जाल, कटवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
चहकी भरमी भूली भटकी, झिझकी ठिठकी अटकी लटकी ।।
इन संस्कारों की गुत्थी को, सुलझा दिया राधास्वामी ने ॥॥
निज घट का मारग दिखलाया, सत सार शब्द मत दरसाया ।
बाहर मुखता के अवगुण को, छुड़वा दिया राधास्वामी ने ॥॥
जब सहसकमल दल चढ़ आई, शिवनेत्र की ज्योती झलकाई ।।
घंटा और शंख के काजों को, बजवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
त्रिकुटी में ऊँ राग गाया, मृदंग की धुन को लखवाया ।
ऋग्वेद की ऋचा की बाणी को, सुनवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
एक अक्षर मंत्र का जाप किया, तब शून्य में सहज समाध लिया ।।
अद्भुत निर्मल शशि मस्तक पर, प्रकटा दिया राधास्वामी ने ॥॥
सतगुरु ने मुझको तार दिया, सहजे भवसागर पार किया ।।
पद कमल की शरन दया से दिया, अपनालिया राधास्वामी ने ।।।
Song 14 — Hindi
यहां कोई किसी का कभी नहीं, झूठा सब मेरा तेरा है ॥॥
तू भूल भर्म में भूला है, अज्ञान हिंडोले झूला है।
क्यों मान गुमान में फूला है, ले चेत चेत को बेरा है ॥॥
झूठा रिश्ता और नाता है, कोई किसी के काम न आता है।
जो आता है वह जाता है, यह काल का हेरा फेरा है ॥॥
भत्र दारुण अति दुखदाई है, जीवन में बड़ी कठिनाई है।
जो है वह अंगमापाई है, तू संभल जा अभी सबेरा है ॥॥
भव सागर से तारा गुरु ने, दे प्रेम किया प्यारा गुरु ने ।
राधास्वामी अमृत नाम पिया, माया ने उसे नहीं घेरा है ॥॥
Hindi
()स्वामी मौज करो तुम ऐसी, कटे दुख दारुन बेरी।
। मेहर दया के काज में कुछ, लाओ ना देरी ॥टेक। तुम समरथ मेरे साईयाँ, मैं दीन अधीना। मुझ से क्या हो तुम जगत में, अतिः परवीना ॥ त्राह त्राह कर त्राह कर, चरनों में आया। अपनी सेवक जान कर, प्रभु कीजे दाया ॥ विपत पड़ी सिर आन कर, सब विकल शरीर ।, विनय करू कर जोड़ कर, काटो तन पीरा। दीन दयाल कृपाल तुम, मेरी यह आसा। दूर करो त्रय ताप को, दे शरन दिलासा।। संकट भारी पड़ गया, मुझे नहिं कोई।। राधास्वामी तुम सम दीन हित, कोई और न होई।।स्वामी
Hindi
()दुखियों का तू सहारा स्वामी, नाम तेरा है करतारा ।।टेक।
। निगुन सगुन रूप प्रभु तेरा, निराकार और साकारा। बार पार कोई कैसे पावे, वेद कहे अपरम्पारा अन्तरयामी घट घट बासी, अविनासी जगदाधारा। जबलग दया दृष्टि नहीं तेरी, जायेन कोई भवजल पारा ॥ पतित उद्धारन भव भय तारन, कारन कारज करतारा। दीनबन्धु करुना के सागर, अगर अद्भुत रखवारा।। टूटी नाव पड़ी भवसागर, आन पड़ी है मॅझधारा ।। काढ़ निकारो करुना सिंधु, वेग सुनो मेरी भरतारा ।। रात अंधेरी डगर न सूझे, बड़त हूँ भव जल धारा। राधास्वामी दया के सागर, अब तो करो मेरा निस्तारा ॥
Hindi
()गुरु भक्ति रहे मेरे अंग संग, करू काल करम को अंग भंग ॥टेक।
। व्यारे नहिं माया मोह आन, निज रूप को बख्शो अपना ज्ञान। लगे चरन कमल में मेरा ध्यान, चढ़ परमारथ का रंग ढंग।। संसार है यह दुर्मति की खान, दुख से हूँ मैं दुखित महान। तुम दाता हो सतगुरु सुजान, बस में करदो मेरा मन मतंग ॥॥ घट का पट खोलो दया से आज, साजू भक्ति का प्रेम साज।। सुख सम्पत चहुँ दिस रहे गाज, सुरत उड़े गगन में ज्यों पतंग ॥ दुविधा चतुराई जाये नास, रहूँ निस दिन पद सरोज पास।। प्रगटे सुख आनन्द हुलास, बाढ़ हिया जिया में उमंग ॥॥ चढ़ सहसकमलदल त्रिकुटी आये, सुन्न में गुरु मूरति ध्यान पाये।। बंसी धुन भंवर गुफा बजाये, दिखला दो सतपद का सुरंग।। लख अलख अगम की राह बाट, पहुँचू राधास्वामी अघट घाट। उलट जनम मरने का टोट, घट में मेरे बाजे मोर चंग।।
Hindi
()वह आया आया आया, गुरु रूप में दरस दिखाया दिखाया॥टेक॥ शब्द स्पर्श गंध रस रूपा, पवन आकाश अग्नि जल कूपा।
। आय विराजा जग का भूपा, भेद अपार बताया बताया।। बताया।। अजर अमर अविनाशी प्यारा, सत्र में है सबसे है न्यारा । निराधार वह जगदाधारा, आप को आप लखाया लखाया लवाया। वह घट के घाट पर बैठक ठानी, प्रान के रूप बना है प्रानी। त्वचा आँख कान मृदु बानी, सब में रमाया रमाया रमाया ॥ सुरत में शब्द शब्द में सूरत, निराकार साकार की मूरत।। ग्रह नक्षत्र और रास महूरत, कोई कोई भेद यह पाया पाया। पाया। वह दया सिंधु है सहज कुपाला, दीन बन्धु है दीन दयाला। भक्ति पन्थ का निज प्रतिपाला,राधास्वामी नाम सुनाया सुनाया। सुनाया। ()सतगुरु प्यारे ने बताया भेद निराला हो ॥टेक।। ना कोई साथी ना कोई संगी, ना कोई सगा न कोई अरधंगी। माया काल सकल छिनभंगी, सबका छिन में दिवाला हो । मन मन्दिर में आजा बन्दे, कर कुछ योग विचार के धन्दे।। छुढे करम के दारुन फंदे, घट में भानु उजाला हो। प्रीति प्रतीत की राह में आजा, भूठे मोह का जाल कटाजा। बिगड़ी अपनी बात बनाजा, पीजा प्रेम पियाला हो। तीन ताप की त्याग गलानी, तज असत्त की भरम कहानी। गुरु गेम सत मत ले पहचानी, मार काल सिर भाला हो। अवसर बीते फिर पछताना, नहीं मिलेगी ठौर ठिकाना।। क्यों तू है मूरख दीवाना, राधास्वामी का मतवाला हो।।
Hindi
()भव का टाट समेट कर भक्ति रस पाया ॥टेक॥ इत से तोड़ा उत को मोड़ा, गुरु चरनन में आया
। संशय चिंता सकल मिट्टी जब, सत पद नेह लगाया ॥ कहाँ का आना कहां का जाना, आवागवन नसाया। अपने घट में ज्ञान प्रकाशा, सहज ही योग कमाया ॥ सुमिरन भजन ध्यान गुरु सेवा, सब अन्तर प्रगटाया। देखा रूप अरूप अगोचर, अनहद तूर बजाया ॥ जप तप संयम ध्यान भजन जो, सब का सार लखपाया। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब नहिं व्याने माया ॥
Hindi
() सतगुरु प्यारे ने सुनाया मर्म कहानी हो ॥टेक।
। बूझ अबूझ का सार सुझाया, सूझ असूझ की बात बताया। तब सत पद का भेद लखाया, मिल गया पद निरवानी हो।। सुरत शब्द की राह दिखाई, सन्त पन्थ की डगर चलाई। सहज ही अब अपनी बन आई, होगये ठौर ठिकानी हो । जीव ब्रह्म का रूप पिछाना, उपजा हृदय सत मत ज्ञाना। घटका मिटा तिमिर अज्ञाना, पाई अगम निशानी हो । अहंकार मद लोभ त्यागा, क्रोध मोह का टूटा धागा। सोया भाग आप अब जागा, छूटी आनी जानी हो ॥ सहस केवल गढ़ सुरत से तोड़ा, त्रिकुटी ब्रह्म से नाता जोड़ा। ब्रह्म गुफा माया मद फोड़ा, राधास्वामी धाम लखाई हो ॥
Hindi
()अजी सय्यां से मिलाना होगया ॥टेक
। बहु दिन भूले मोह भर्म में, भटका खाया कर्म धर्म में। अब तो रम रहा सत के मर्म में, ठौर ठिकाना होगया ।। तीन ताप से व्याकुल रहता, सुख दुख जग के सिर पर सहता। कभी माया कभी काल को गहता, अब घट ज्ञाना होगया । बिरह अग्नी में निश दिन जरता, जीते ही जी नित में मरता। सब का बोझ सीस पर धरता, आँसू बहाना होगया ।। सतगुरु मिले दीन हितकारी, काल फेंद से दिया छुटकारी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु का दिवाना हो गया ॥
Hindi
() सोच समझ जड़ प्रानी, तेरा नर तन बीता जात रे ॥टेक।
। खान पान निद्रा में भूला, भक्ति भजन अलसातं रे। पल से बिनस जाये यह देही, ज्यों तारा परभात रे ॥ तीरथ राज समाज गुरु का, क्यों नहीं संगत जात रे। भूल भरम तज काम क्रोध तज, लख लख यम का घात रे ॥ भव सागर एक अगम पंथ है, त्रिय ता का उत्पात रे।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतपद मग दरसात रे ।
Hindi
()गुरु ही तेरे सहाई रे मन, गुरु ही तेरे सहाई ।।टेका
। सपने में तोहि राज मिल्यो है, सम्पत मान बड़ाई।। अाँख खुली त स ही दिन से, ज्यों सपना रैनाई ॥ झूठ झूठ में सांचा बरते; सांच से चित न लगाई। जग असार में मन भरमाया, गुरु मूरत बिसराई ।। नैन उवार दृष्टि भर देखा, नहीं कोई संगी सहाई ।। अन्त अकेला हंस सिधारा, तज अभिमान बड़ाई ॥ गुरु यह जग बालु भीत सम जानो, ज्यों बादर की छांई। विनसत देर लगे नहिं याको, ता में कौन भलाई ॥ अवसर सुगम समय भल आया, मानुष देही पाई। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, ले सतगुरु शरनाई ।।
Hindi
()मानुष जनम सुधारो साधू मानुष जनम सुधारो ॥टेका
। अपनी करनी पार उतरनी, मन में समझ विचारो। जैसी करनी वैसी भरनी, जनम जुवा मत हारो ॥ धन सम्पत और हाट हवेली, एको काम न आवे। यह बन्धन है यम की फांसी, अन्तकाल पछतावे। मात पिता भाई सुत बन्धु, संग न कोई सहाई। गुरु की दया से काज सँवारो, बनत बनत बन जाई ॥ अवसर पाया नरतन पाया, दुर्लभ अधिक अनूपा। कर सतसंग सार कुछ समझो, निरखो अपना रूपा।। साधु राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाओ।। राधास्वामी चरनन ध्यान लगाकर, धुरपद जाये समाओ।।
Hindi
() तु फकीर है कैसा, गुरु रंग से रंगजी प्यारे ।।टेक।
। सुमिरन ध्यान गुरू का मन में, हरदम सांझ सकारे। जहाँ देखे तहाँ गुरु की लीला, या विधि चल भव पारे ।। तू फकीर चन परबत नद शेल अपारा, नभ जल थल गुरु रूपा।। यह जग सुत्त पुरुष की छापा, सतगुरु भूप अनूपा।। तू फकीर साँस सॉस में नाम गुरु का, रसना रस को पावे।। ‘मन में पल पल ध्यान सँभारे, सहजे तारी लावे ।।तू फकीर जो जो करे सो गुरु की सेवा, जो खावे परसादी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरुमुख रहे समाधी ।।तू फकीर
Hindi
() होजा मेरे प्यारे आज तू फकीर सांचा टेका।
। गुरु की अब पकड़ ओट, त्याग जगत भाव खोट। सही घनी यम की चोट, अब न लगे आंचा।। होजा सार गह तज असार, भूठी जग की बहार।। सतगुरु को करले यार, सांच मत जांचा।। होजा राधास्वामी राधास्वामी, सतगुरु है तेरे हामी। राधास्वामीपद नमामी, गह चरनबांचा।होजा
Hindi
()आ ओ गुरु के शरन फकीरवा ॥टेक
। तू पपीहा गुरु स्वाँती के जल, गगन गुरु तू बसे रसातल। शब्द डोर गह गगन मंडल चल, धार दिये गुरु चरन फकीरवा आआ कथनी बदनी तज मेरे भाई, करनी कर कुछ होये भलाई।। तब रहनी से लव रहे लाई, यह सतगुरु का बचन फकीरवा।। आ उठत बैठत सोया जागा, मन रहे इष्ट ध्यान में लागा।। उपजे दृढ़ चित में अनुरागा, कर निस दिन यह यत्न फकीरवा ।। आआ सहस कॅवल चढ़ त्रिकुटी आजा, सुन्न महासुन्न तारी लगाजा।। भंवरगुफा में मुरली बजाजा, सत रहे बीन की लगन फकीरवा ॥ आआ तू सतगुरु का आज्ञाकारी, तू सारी है नहीं संसारी।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक का यही चलन फकीरचा ।
Hindi
()मोह नींद तज उठ मन पापी, अन्त समय पछतावेगा ।।टेक
। दौलत दुनिया माल खजाना, माया का सब ताना बाना।। इन सबका कुछ नहीं ठिकाना, कोई काम नहीं आयेगा। मोह0 क्या बैठा है झूला झूला, क्यों अपने अज्ञान में भूला। क्यों संसार हिंडोले भूल, ऊपर नीचे जावेगा। मोह0 सत और असत नहीं पहिचाना, रैन दिवस रहा सोना खाना।। मानुष जनम सार नहीं जाना, यम के जाल बंधावेगा। मोह0 यह संसार सपन की माया, झूठा तन मन झूठी काया। सच्चा जान वृथा भरमाया, दौड़ दौड़ मर जावेगा। मोह0 मोह नींद में हो मतवारा, निज स्वरूप का ध्यान बिसारा।। राधास्वामी का घट कर दीदारा, जाग जाग फल पावेगा।मोह0
Hindi
()सैय्यां मिलने की विरियाँ आगई ।।टेक॥ यह संसार मेघ की छाया, कभी गुप्त कभी प्रगट जनायो
। दुविधा दुचिताई है माया, सुन धुन और समा गई ॥ सय्यां महल रचाया रंग बिरंगी, मैं भई कीट पिया भये भूगी। रंग पाये नहीं बनू कुरंगी, भेद अगम को पागई ॥ सय्यां इस मन्दिर में नौबत झड़ती, भूल भरम में मैं नहीं पड़ती। नौ दर छोड़ दसम दर उड़ती, सुन्न अटा सुरत छागई ॥ सय्यां विषय भोग की धूर उड़ाई, सार शब्द से लव को लगाई। नहीं कहीं आई नहीं कहीं जाई, आवागवन नसाइ गई। सय्या आसा छोड़ी मनसा छोड़ी, काल करम से नाता तोड़ी। राधास्वामी चरन से चित को जोड़ी, भरम अज्ञान मिटा गई।
Hindi
()एक दिन माटी में मिल जाना ॥टेक
। तेल फुलेल केवड़ा चन्दन, भूषण वसन और काया मंजन।। वृथा हैं सब सोच समझ मन, यह तन भस्म समाना । एक दिन चार जना मिल तोहि उठावं, अब घट मरघट ले पहुँचाई।। भस्मीभूत कर घर फिर आवे, हंस अकेला जाना । एक दिन कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी, धन सम्पति और घोड़ा घोड़ी। बीत गई आयु रही थोड़ी, चेत मैं तोहि चिताना । एक दिन लट खोले घर तिरिया रोवे, मात पिता सुत सुध बुध खोवे। प्राण बिहीन खाट नर सोवे, या दिन सब ही आना । एक दिन भव सागर में गोता खाया, भोग विषय नर जनम गंवाया। झूठी माया झूठी काया, इन संग क्यों भरमाना ।। एक दिन ऊँची जाति नाम जग पाया, झूट साँच कह सच ही बुझाया। आप हँसा, औरनहु फंसाया, वृथा जनम बिताना एक दिन छिन छिन आयु घटत दिन राती, किसके पूत हैं किसके नाती। मरन समय कोई संग न साथी, तोहि अकेले जाना । एक दिन माया फांस गले में डारी, काहू विध उतरे नहीं पारी । ॐधन दौलत बंधु सुत नारी, कोई साथ न जाना ॥ एक दिन ध्यानी भये मोह नहीं छूटा, ज्ञानी भये भरम नहीं टूटा। निस दिन बंधे यमराज के खूटा, धिक नर पशू समाना ।एक दिन
Hindi
()मन अन्त काल जब आता है
। धन सम्पति और मान बड़ाई, साथ नहीं कुछ जाता है ।।टेक।। किसका कौन पुत्र हुआ उस दिन, कौन बन्धु हित भ्राता है। कुटुम्ब कबीला काम न आवे, झूठा जग का नाता है ॥ मन0 बाये तिरिया आंसू बहावे, दायें सुत पितु माता है। चलते समय न संग हो कोई, हंस अकेला जाता है। मन बस्ती छोड़ मोड़ में है सबसे, ऊजड़ ग्राम बसाता है। कोई गाड़े कोई मांटी मिलावे, कोई आग जलाता है। मन वा दिन की कुछ सुध कर मन में, क्यों भूला भरमाता है। जो नहिं चेत करे गुरु संगत, रोता और पछताता है। मन काल करम की डगर कठिन है, यम उत्पात मचाता है। पंथ न सूझे रात अँधेरी, मारग कौन दिखाता है। मन इस जग में रहना दो दिन का, जो आया सो जाता है। राजा रंक भिकारी पंडित, काल सबन को खाता है। मन भज गुरुनाम लाग गुरु सेवा, गुरु संग काज बनाता है। राधास्वामी चरन बलिहारी, सेवक गुरु गुन गाता है।मन
Hindi
()मरघट की सुध क्यों भूली है ॥टेक
। कर्म फांस में जीव हँसाने, छूटन की कोई राह न जाने। काल सीस पर डे : ताने, जनम मरन एक सूली है। मरघट हाथ पांव सब ऐठन लागे, हिचकी लेत प्रान तेज भागे। मन इन्द्री न जगाये जागे, काया मध्य में झूली है।मरघट रोबत मात पिता सुत भाई, काम न आये सगा सहाई। तिरिया बिलये लट छटकाई, सूई काल ने गोली है। मरघट चार जने मिल खाट उठाया, औघट घाट में ले पहुँचाया। अग्नी प्रचंड में देह जरायो, जैसे धान की पूली है ॥ मरघट एक घड़ी घर में नहीं राखे, भय बस भूत प्रेत सब आखे। बिना बिचारे मुख से भाखे, बुद्धि चचु में फूली है ॥ सरधट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कहता हूँ यह सोच बिचारी।। गुरु करदे भव सागर पारी, ज्ञान अंकुश दे फूली है।मरघट
Hindi
() महिमा बरनी न जाये, साधु महिमा बरनी न जाये ॥टेक
। भव सागर एक अगम पंथ है, बड़े, सकल जग जाई।। नीको शब्द बनाया गुरु ने, जन को लीन चढ़ाई।। साधु माया जाल फैसा है भारी, ऋषि मुनी सकल बंधाई।। योग युक्ति की खङ्ग हाथ दे, काट दई बरियाई। साधु : जड़ चेतन की ग्रंथी अद्भुत, छूटत अति कठिनाई । गुरु मत ज्ञान से गाँठ खुली है, मन रहा बहु हरषाई। साधु जहाँ देखें अज्ञान पसारा, सब ही अविद्या छाई।। ज्ञान कटारी गुरु ने दीन्हीं, ताको मार गिराई।साधु। गुरु बल से रिपुदल हम मारे, सतगुरु हुये हैं सहाई।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु महिमा क्या गाई।साधु
Hindi
() बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं, साधु ज्ञान है गुरु धारा ॥टेक।
। करम भरम में जीव फसाना, भटका बारम्बारा ।! जब गुरु मिले तो भेद बतावे, अन्तर देके सहा। धुि तीरथ चरत में भरमे प्रानी, सूझे न सार असार।।। जब गुरु मिले तो भेद बतायें, करें सज़ा छुटकारा।।साधु) ॐज्ञान ध्यान की समझ नहीं है, नहीं विवेक विचारा। जब गुरु मिले तो भेद बतावे, होये जीव उपकारा। साधु योग युक्ति का कर्म कठिन है, क्या कोई जाने गॅवारा।। जब गुरु मिले तो भेद बताई, यू ही हो निस्तारा ॥ साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धरा सन्त अवतारा।। जब गुरु मिले तो भेद बतावे, अन्तर शब्द भंडारा।।
Hindi
() लख न परे तेरी माया, स्वामी लख न परे तेरी माया ॥टेक
। जित देखु तित तेरी लीला, धूप अन्ध अरु छाया।। रज सत तम में रहत निरंतर, अगम अनाम अमाया ॥ स्वामी जनम मरन संसार से न्यारा, नही आया नहीं जाया। जीव अजीव में डोलत घूमे, वार पार नहीं पाया।। स्वामी निराकार सर्वज्ञ निरूपम, रूप प्रेम अरु दाया। त्राह त्राह तेरो चरन नमामी, काम क्रोध भरमाया ॥ स्वामी निगुण सगुन सकल तेरी रचना, सब के पार रहाया। भक्त जनन प्रेम की मूरत, सत संगत कुछ पाया ॥ स्वामी बार बार चरनन बलजाऊँ, वारू प्राण अरु काया। आजा घट में मेरे बसजा, निस दिन प्रीत लगाया ॥स्वामी
Hindi
() नाम दान मोहि दीजो सतगुरु, नाम दान मोहि दीजो ॥टेक
। अर्पण करू तन मन तुझ पर, महिमा तेरी गाऊँ। सुमिरन ध्यान भजन में नित प्रति, नाम पदारथ पाऊँ ।।सतगुरु . अमृत नाम घुट पिऊँ निस दिन, भोग प्रीत से लगाऊँ। आपा बिसर सकल जग बिसरू, नाम की तारी लाऊँ ।सतगुरु भोग वासना जग की त्यागू, हिये से सकल भुलाऊँ। प्रीति नाम से लगे मेरी अन्तर, चरन कमल मिल जाऊँ ।सतगुरु
Hindi
() कैसे मन ठराऊँ, साधु कैसे मन ठराऊ ॥टेका
। मेरा मन मेरे हाथ न आवे, मन ही मन पछताऊँ। सोया मनुआ मोह नींद में, केहि विधि ताहि जगाऊ।। साधु कर्म न धर्म ज्ञान नहीं पूजा, भजन में कैसे लगाऊँ। मन के मारे बन में जाऊँ, बन तज बस्ती आऊँ। साधु चंचल मूढ़ निपट अज्ञानी, कहां याको लिये जाऊँ। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु चरनन लिपटाऊँ ॥
Hindi
() मेरा मन बांका गुरु चरनन लागा ॥टेक।
। जा दिन चरन कमल गुरु परसे, बड़ा प्रेम अनुरागा। अब नहीं सोवे मोह नींद में, जागी जागा जागा ।मेरा मन0 भाव भक्ति में मगन रहे नित, विषय भोग तज भागा।। केहि विधि आज सराहूँ मन को, हंस बना है कागा ।।मेरा मन सुरत शब्द की करत कमाई, गावत अनहद रागा। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जागा मेरा भागा ।।मेरा मन
Hindi
() कौन तुझे समझावै रे मन, कौन तुझे समझावे ।।टेक
। धन सम्पत दारा सुत नाती, कोई काम न आवे।। इनकी मोह मया में भूला, भरम भरम भरमावे।। रेमन0 ज्ञानी ज्ञान जाल का लम्पट, योगी सिद्धि दिखावे। ज्ञान सिदि दोऊ काल के चेरे, यम की फांस फेसावे।। रेमन एक तो झूठी भक्ति सिखावे, दूजा करम करावे। तीजा वाचक ज्ञान कथे नित, वाक बिचित्र सुनावे।। रेमन कर्म ज्ञान और भक्ति महातम, इनकी सूझ न आवे। यह भी बन्धन वह भी बन्धन, बन्धन बन्ध बन्धावे।। सार शब्द बिन राह न कोई, और बाट भटकावे।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु शब्द लखावे ॥रेमन0
Hindi
() कौन कुमति उरझाना रे मन, कौन कुमति उरझाना ॥टेका
। दुख में दुखी रहे निस बसिर, सुख में रहत भुलाना। दुख सुख एक एक कर जाना, तब निजरूप लखाना।।रे मन आसा तृष्णा मोह मया मद, काम क्रोध अभिमाना। इनसे काम सरे नहीं तेरा, मिले न ठौर ठिकाना ॥ रे मन मैं तो हि देऊँ सिखावन गुरु का, मन का चित चिताना।। सुरत शब्द की करले कमाई, मन में मन उरझाना।। रे मन नहीं यह जप तप संयम भारी, नहीं यह वाचक ज्ञाना। सुमिरन ध्यान है घट के भीतर, तिल की ओट अस्माना।। रे मन गगन मंडल में अनहद बाजे, गगन में राह रुकानी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु मूरत हिये आना ॥रे मन
Hindi
()अरे मन तेरी गति है न्यारी ।।टेका
। पल में मरे पल ही में जीवे, पल पल होत विकारी।। पल में दाता दानी टैरे, पल में सहज भिकारी ।।अरे मन डोले गगन मंडल में क्षण क्षण, क्षण में जाये पताला। क्षण में दीन दुखी हो जावे, क्षण ही में प्रतिपाला ।।अरे मन साधक बन बन मांहि लुकाना, गुफा रुचे है न्यारी। बन को तज बस्ती जब आत्रे, तब मन है घरवारी ।।अरे मन धर बहुरूप दिखावे लीला, अपरम्पार अपारा। नाना रंग तरंग बहे नित, गंग जमुन की धारा ।।अरे मन जो कोई याके फंद फसाना, सौ सौ नाच नचावे।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु बल मन बस आवे ।।अरे मन
Hindi
() मन की अकथ कहानी साधु, मन की अकथ कहानी ॥टेक॥ मन में दुख सुख सभी भरे है, मन है भव की खानी।
। मन ही पित्टी और देवियान हैं, मन है पद निरवानी ॥ साधु मन है दुखी रंक विपरीती, मन राजा मन रानी।। मन योगी और मन संसारी, मन ज्ञाता मन ज्ञानी ॥ साधु मन ही से उपजी सकल वासना, करम बचन और बानी। मन आकाश और पवन अग्नि है, मन पृथवी मन पानी।। साधु गगन चढ़े मन अधर बिराजे, लखे विचित्र निशानी। गिरे पताल समन्दर डूबे, काम क्रोध मद सानी।। साधु कर सतसंग साधु की सेवा, ताके गुन पहचानी। राधास्वामी गुरु की दया मेहर से, कछुक मरम हम जानी ॥साधु
Hindi
() कुछ सोच समझ मन अपने, यह सब रैन के सपने ॥टेक।
। जग के धंदे काल के फंदे, इन से नहीं छुटकारा।। क्यों तू सोवे मोह नींद में, जाग भया संसारा।। कुछ0 सपने में धन दौलत पाया, राज समाज बड़ाई। अखि खुली फिर कुछ नहीं दरसा, यह जग अगमापाई।। कुछ भरम में भूल भूल भय उपजे, भय से भव उत्पाना ! निर्भय पद गुरु संगत पावे, तब भागे अज्ञाना।। कुछ मूढ़ न समझे भेद तत्व का, केहि विधि कहूँ बताई। जाके सुमिरे भिले परमगति, नेह न तास लगाई। कुछ साध की संगत गुरु की सेवा, भक्ति पदारथ पावे।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बनत बनत बन जावे।।
Hindi
() सब मन की प्रभुताई साधु, सब मन की प्रभुताई ॥टेक॥ मन ही आवे गर्भ बास में, जननी गोद खिलाई
। मन ही धरे किशोर अवस्था, मन ही में तरुणाई।। साधु मन ही नारी संग भरमाना, विषय भोग लिपटाई। मन ही सुत बनिता उपजावे, मन व्यौहार कराई ॥ साधु वृद्ध अवस्था मन ही जो व्यापे, भई आलस कदराई।। मने नहीं मरे मार सब डारे, चिता की आग जराई। साधु मन ही भजन ध्यान मन सुमिरन, मन ही बुद्धि रहाई।। काम क्रोध मद लोभ फंसाना, मन में मान बड़ाई।। साधु मन का रूप लखे नहिं कोई, मन सब खेल खिलाई। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मन का भेद जनाई।।साधु
Hindi
() मन से होजा न्यारा साधू, मन से होजा न्यारा ॥टेका
। मन से बीज बीज से अंकुर, अंकुर फुले फुला। फूल से फल फल मीठा लागा, मीठ मीठ प्रतिकूला ॥ साधु मन ब्रह्मा मन विष्णु महेशा, मन माया का रूपा। जो कोई मन के बंध बंधाने, सो बड़े भव कृपा ॥ साधु देखे अनदेखे को देखें, लेख अलेख विचार। जिये मरे मर मर फिर जीवे, आवागवन मैझारा ॥ साधु नजर न आवे अगम कहावे, मन काहू नहिं देखा।। जो कोई देख बिचारे मनको, सूझ परे तब लेखा ॥ साधु दूर से दूर निकट रह सबके, घेरे पास न आवे। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब मन मोहि न सतावे ।।
Hindi
() गुरु हैं तेरे पास फकीरवा, गुरु हैं तेरे पास ॥टेक।
। त्याग भरम विचार मन का, छोड़ जग की आस । आस कर एक गुरु चरन की, सब से होय निरास फकीरवा तेरे मन में तेरे तन में, तेरे साँसो सांस।। गुरु बर्स दिन रात प्यारे, धर चरन विश्वास ॥ फकीरवा गुरु नहीं तीरथ बरत में, गुरु न योग अभ्यास। हूँ है अपने हृदय में नित, वहां उनको बास ।। फकीरबा करम में माया है व्यापी, धरम यम की फांस। बन में अनबन देखी मन में, भरम था सन्यास ।। फकीरवा तेरी चिंता गुरु को होगी, क्यों है तुझको त्रास।। राधास्वामी चरन गह, अज्ञान का कर नास ।।फकीरवा
Hindi
() सोच समझ कर जतन फकीरवा ॥टेक।
। छिन छिन उमर घटत दिन राती, कभी सांझ कभी प्रभाती। माया मोह महा उत्पाती, इनसे लगा मत लगन फकीरवा ।सोच0 मुख सम्पत धन माल खजाना, इन्हें देख क्यों जिया ललचाना।। भूठे हैं सब नाम निशाना, तासों उपजे पतन फकीरा ।।सोच गुरु भक्ति है सब का सारा, देखा सोची समझ बिचारा।। जानेगा कोई गुरु मुख प्यारा, मान मान यह बचन फकीरा ।सोच। माया मोह जाल अति भारी, तीन ताप से जगत दुखारी।। गधास्वामी चरन शरन बलिहारी,अब बुझी मन की जलन फकीरवा ।।
Hindi
() ठगनी तू क्या रूप दिखावे, गुरु भक्त न धोका खाने ।।टेक।
। पांव में घुगर हाथ में छल्ले, सुन्दरी पहन रिझाये।। भर में नाचे थिक थिक थई थई, बाहर ताल बजाने।।ठगनी हाथों में मेंहदी लाये के बाघन, तीन लोक खाजा ।। आँख में सुरमा भरम का डाले, तक तक नजर चलाये ॥ ठगनी गले में हार नौलखा पहने, मांग सेंदूर भरावे।। नाक में बेसर कान में झुमके, ठुमके ठुमक फेसावे।। ठगनी कमर करधनी पेच है अड़बड़, लचक के चाल दिखाने। घूघट काढ़ हाथ मटकाने, आँखों सेन बुझाने। ठगनी जोशन बाजू जुगनू पहुँची, छागड़ झांझ सजावे। पोर पोर से आप बंधी है, बध बध बन्ध बन्धाचे ॥ ठगनी बैरी मारे दाव पेच से, यह हँस तीर चलाते।। रोये गाने रोये गाय कर, कोई बचन न पाने। ठगनी माया जाल कठिन है भारी, द्वन्द अनर्थ मचाने। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु आन छुड़ाये।ठगनी
Hindi
() आ जाये सो माया, माया माया साधु ।।टेक॥ अकथ अलौकिक अगम अपारी, वर पार से निस दिन न्यारी।
। कभी सुरझी कभी रही उरझारी, माया ने भरमाया ॥साधु कभी सामान्य विशेष कहीं है, कहीं विष्णु और शेष कहीं है। कहीं ब्रह्मा महेश कहीं है, बिरला कोई लख पाया ।साधु निराकार साकार की खानी, अगुन सगुन के रूप दिखानी।। सत्त असत से रही बिलगानी, कहीं घूप कहीं छाया ।।साधु काल रूप होय जग को फाँसी, कभी आस करे निवासी।। रूप अरूप का अजब तमासा, निहबेरी भिरदाया ।।साधु छिन में गुप्त प्रगट छिन भीतर, दिन में रात रात दिन भीतर। बाहर गिन गिन गिन गिन भीतर, ऋषि मुनि भेद न पाया ॥साधु माया तो घट घट की बासी, अचरज अद्भुत कौतक रासी। देख वियोग में सहज उदासी, सतगुरु मर्म लखाया ।।साधु सुन दरपन की सुन्दर रानी, लख नहीं परे लखे कोई ज्ञानी। मन में बसा फिरे बिलगानी, राधास्वामी आप जनाया।।साधु
Hindi
() नाम गुरु नित गाओ मेरे साधु, नाम गुरु नित गाओ ।टेका
। नाम ही ज्ञान ध्यान पुन नाम ही, नाम ही गाय सुनाओ। नाम ही पाट नाम है पूजा, नाम से नेह लगाओ।। साधु नाम योग और नाम ही मुद्रा, नाम की ताड़ी लाओ। नामी नाम में अन्तर नहीं कुछ, भेद अलौकिक पाओ।। साधु नाम की महिमा क्या कोई जाने, नाम जपो जपवाओ।। नौका नाम नाम पुन खेवट, नाम से तरो तराओ ॥ साधु नाम दरस और नाम परस है, नाम रूप दरसाओ।। नाम सेतबंध रामेश्वर, नाम से लंक जिताओ।। साधु लव लगी रहे नाम से निस दिन, नाम पदारथ पाओ।। जप तप तीरथ सब कुछ त्यागो, नाम की ज्योत जगाओ।। साधु नाम से रूप हिये गुरु दरसे, नाम से अलख लखाओ। नाम द्वैत को भर्म बिनासे, पद अद्वैत में आओ।। साधु प्रेम प्रतीत रहे हिये अन्तर, नाम भजो भजवाओ। नाम सार : है घट के भीतर, नाम की धूनी रमाओ ॥ साधु नाम अमीरस प्रेम पियाला, अमृत नाम चखाओ। नाम की बंसी नाम की मुरली, नाम का शंख बजाओ।। साधु मोर तोर की कठिन जेवरी, नाम से बंध कटाओ।। गत दिवस गुरु संग रहोगे, नाम की रटन लगाओ। साधु दाह जगत से चित्त हटा दो, घट में शोर मचाओ।। राधास्वामी नाम दान है गुरु का, नाम हिये में बसाओ।।साधु
Hindi
() गुरु नाम का भेद बताया, बताया बताया ॥टेक॥ मन नाम है सच का सारा, नाम है नामी का है पसारा ।
। ॐनामी नाम का है भंडारा, नाम से नामी पाया पाया पाया ।।गुरु परा त्याग अपरा चढ़ आया, अपरा जब चित ठराया। जड़ चेतन की ग्रंथी खुलाया,हरष हरष गुन गाया गाया गाया ।गुरु अन्तर प्रगटी नाम की बानी, सुन सुन सुरत भई मस्तानी। छूट गई दुबिधा हैरानी, यम का जाल कटाया कटाया कटाया गुरु त्रिकुटी ओंकार सुन पाई, सुन्न में सुन्न समाध रचाई ।। छूट गया जग अगमापाई, दुख का चिन्ह मिटाया मिटाया मिटाया।” कुछ दिन जीवन मुक्ति की आसा, फिर विदेह गति लखा तमाशा।। राधास्वामी धाम में किया निवासा,चरन शरन में समाया समाया।
Hindi
() नामअमीरस पाया पाया पाया, गुरुप्रेम पियाला पिलाया ॥टेक
। सहस कमल दल घंटा बाजा, त्रिकुटी ओम् शब्द बहु गाजा।। सारंग साज सुन सूरत गाजा, सोवत मनुआ जगाया जगाया ॥ नाम भंवर गुफा बंसी धुन पाई, सुन सुन सुरत हर्ष मुस्काई।। माया काल की गई ठकुराई, यम का फंद कटाया कटाया ॥ नाम सतपद बीन मधुर धुन भाई, अलख अगम की रागनी गाई।। राधास्वामी चरन की गही शरनाई, सेवक साँच कहाया कहाया ॥
Hindi
() सुमिर गुरु का नाम प्यारे, सुमिर गुरु का नाम ॥टेक॥ चलना है रहना नहीं, चलना निस्सन्देह।
। एक दिन ऐसा आयेगा, खेह होयगी देह।।सुमिर0 आये हैं जो जायेंगे, जो आये सो जाँय। साधु वह नर धन्य हैं, जो नहीं आयें न जाये।। सुमिर मन की सारी कल्पना, बंध मुक्ति का सांग। इनसे बच कर साधुवा, गुरु भक्ति तू मांग ॥सुमिर दो ही दिन के हैं सभी, कुल कुटुम्ब और मीत।। तज सब बुद्धि बिचार से, गह गुरु चरनन प्रीत ।।सुमिरो दुनिया में भूले सभी, राजा रंक फकीर।। अपने ही स्वारथ बँधे, नहिं समझे पर पीर ॥सुमिरो रात गंवाई नींद में, दिवस जगत व्यौहार। अब लग सोच विचार का, हिये न आया बार ।।सुमिरो चेत चेत नर चेत ले, चेत चेत दिन रात।। अन्त समय पछतायेगा, यम खूदेंगे लात।।सुमिरो
Hindi
() तुम ही अन्तरयामी, तुम चरन सरोज नमामी ।।टेका
। राह रुकाना घट को बताया, खटका हिये को छुड़ाया। डुवत भव जल पार लगाया, भक्ति भाव सिखलाया। तुम ज्ञाता तुम ज्ञानी पूरे, तुम ही ज्ञान स्वरूपम्।। करुणा सागर सब गुन आगर, धारा अद्भुत रूपम्।। सत्त पुरुष सत धाम निवासी, सब के घट घट बासी। सत्य रूप सत पद के दाता, सत चित आनन्द रासी। सुरत शब्द को पंथ चलाया, मारग अगम बताया। सुरत में शब्द शब्द में सूरत, सुरत का रूप दिखाया।। तुम अनहद नूर गाज रहा घट में, अलख ध्वजा फहराई। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धुरपद आन समाई।तुम
Hindi
() गुरु प्यारे ने लखाया पद निरवाना हो ॥टेका
। दृष्टि सृष्टि का भेद बताया, करम धरम विधि सब समझाया। दया मेहर से चरन लगाया, छूट गया अज्ञाना हो। गुरु बहु दिन की सोई सुरत जागी, माया जाल परख हिये भागी।। दृचिताई की दुर्मति त्यागी, मिल गया ठौर ठिकाना हो।गुरु उर्ध मारग की राह दिखाई, सहज किंया भव की कठिनाई। दे निज चरनन की शरनाई, बख्शा नाम खजाना हो। गुरु सुरत शब्द का योग जताया, भक्ति पंथ का मर्म बताया। घट औवट की ओर चलाया, राधास्वामी पद दरसाना हो।गुरु
Hindi
() कोई बतादे कैसे गुरु को रिझाऊँ ।
। गुरु को रिझाऊँ, प्यारे गुरु को रिझाऊँ ॥टेका। मेरे मन में मेरे तन में, छिन छिन पल पल मेरे पन में। घर बाहर परवत में बन में, ठौर ठौर गुरु पाऊँ। कोई0 दिन प्रति दिन और सांझ प्रभाती, गुरु मूरति हिये व्यापक पाती। गुरु है तेल दिया गुरु बाती, आरति किस की सजाऊँ। कोई पात पात में गुरु का बासा, फूल फूल में गुरु विलासा।। अचरज अद्भुत अजब तमासा, क्या मैं फूल चढ़ाऊँ। कोई मसजिद मन्दिर काबा कासी, सब में रमे गुरु अविनासी। गुरु सो तीरथ बरत उजासी, अब किस धाम को जाऊँ। कोई भक्ति सम्पदा गुरु ने साजी, चर और अचर में रहे विराजी। मैं तोहि पूडू पंडित काजी, केहि विधि ध्यान लगाऊँ। कई गुरु तो व्याप रहे घट घट में, गुरु ही बसे घट पट और तट में।। कौन पड़े जग की खट पट में, किसका नाम सुनाऊँ। कोई निराधार गुरु जगदाधारी, हित अनहित सब के हितकारी । राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, निरख निरख हरपाऊँ।कोई
Hindi
() गुरु अचरज खेल दिखाया दिखाया दिखाया
। | घट अद्भुत रूप लखाया लखाया लखाया ॥टेक। सार असार सार संसारा, सार में निरखा जगत पसारा। ईश्वर जीव ब्रह्म विस्तारा, देख देख सुख भा या भाव। भा ।। वृक्ष में बीज बीज अंकुरी, अन्तर डाल फूल भरपूरी। कोई नेड़े कोई दूरी दूरी, भेद अनूपम पाया पाया पाया।। गुरु अक्षर शब्द शब्द में अक्षर, अक्षर में व्यापा निःअक्षर।। जो बाहर सोई प्रगटा अन्तर, चहूँ दिस छाया छाया छाया।। गुरु माया ब्रह्म ब्रह्म में माया, एक प्रकाश एक निज साया।। धूप छाँह का मर्म जनाया, भव का फंद कटाया कटाया कटाया। एक में एक अनेक का मेला, कोई सुहीला कोई दुखीला।। राधास्वामी सतगुरु ने दिया हेला, चरन शरन में आया ।।गुरु
Hindi
() अरे मन जाना रे जाना ।।टेका
। तरवर एक दोय फल लागे, एक कड़वा एक मीठा। जो पंछी ता फल को खावे, यम ताहि बांध घसीटा ।।अरे मन0 तरवर एक पक्षी दोय बैठे, एक उजला एक काला। एक के गले बिच फाँसी लागी, दुजा रहे निराला ॥अरे मन नारी एक बहु रंगी चंगी, मोहे नर मुनि ज्ञानी।। ता नारी के आंख न सूझे, रंग रूप की खानी ।।अरे मन बझि गर्भिणी सुत उपजाया, कुल परिवार बढ़ाया।। रच प्रपंच ऋषि मुनि भुलावे, भेद न काहू पाया ॥अरे मन गुरु की दया साध की संगत, आंख खुली तब देखा। सोच समझ चिंता मन बौरे, यह है अटपट लेखा ॥अरे मन
Hindi
()बात बात में बात साधु, बात बात में बात ॥टेक
। ज्यों केले के बीच छुपे हैं, पात पात में पात। जैसे ही माया के पट में, व्याप रहा उत्पात ॥ साधु गुरु की बानी समझ परे जब, तब सत पद दरसात। समझबूझ नि क्या कोई पावे, जनम अकारत जात् ।।साधु यह प्रपंच है दुख का कारन, समझे से समझात। पुरुष विवेकी सत संगत में, लख बाको हरषात ॥ साधु चिंता दुविधा और दुचिताई, भूल भरम भरमात।। एक भरम में लाख भरम ज्यों, बरस में सांझ प्रभात ॥ साधु भागहीन नर सूझे नांही, जग भ्रम रूप दिखात। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,मिली मुक्ति की दात साधु
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() घट अद्भुत राग सुनाया सुनाया सुनाया ॥ सुरत अनहद तूर बजाया बजाया बजाया ।।टेक॥ घंटा शंख सहस दल बाजे, धुन मृदंग नभ त्रिकुटी गाजे।
। सुन्न महासुन्न चार गत साजे, सुख आनन्द रचाया रचाया ॥घट बंसी भंवरगुफा सुन पाई, सतपद नाद बीन चितलाई।। अलख अगम के पार सिधाई, राधास्वामी गाया गाया गाया ॥घट मीठा राग मधुर मृदु बानी, मंगलमय मंगल की खानी।। अचरज अकथ अार कहानी, धुरपद ध्यान लगाया लगाया ।।घट नाचत गावत धूम मचावत, हरखत हरख हरख रखावत।। गुप्त भेद निज घट में पवित,सार शब्द लख पाया पाया पाया ।घट सत्र का द्वन्द सहज में नासा, जग का मिटगया भरम त्रासा।। राधास्वामी चरन शरन की आसा, नर तन सुफल कराया ॥घट
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() गुरु मत समझ न आवे साधु, गुरु मत समझ न आवे ।।टेका
। क्या कोई उसकी महिमा जानी, वह तो अगम अपार।। करता धरता कहो सो नाहीं, वह ही है करतारा।। गुरु आप ही दाता आप हो दानी, आप ही बना भिखारी।। आप ही अन बन खेल खिलावे, आप श्याम बनवारी।।गुरु आप ही रोगी सोग वियोगी, आप वैद बन आया। आप ही जोगी जंगम साधू, योग युक्ति बतलाया ॥ गुरु निराधार जग का आधारा, सब को देवे सहारा है। जो कोई उसकी शरन में आवे, उसका है रखवारा ॥ गुरु फल मध्य ज्यों बास बिराजे, आप बना फुलवारी । आप ही माली आप ही उपवन, सींचे आप कियारी ॥ गुरु चकमक में ज्यों आग समाना, अग्नि मध्य ज्यों पानी।। बिन जिभ्यो बानी बहु बोले, बोल बोल निरबानी ॥ गुरु हरी हरी मेंहदी में लाली, लाली बीच अंगारा ।। क्या कोई उसका भेद बतावे, कहन सुनन से न्यारा। गुरु मतवारा होय सत सत भाखे, मति सुमति की खानी ।। आप ही आप मिले जब चाहे, उसकी अकथ कहानी ॥ गुरु दें ढ़ा बहुत हाथ नहीं आया, देस देस भरमाया। दया हुई मन करुणा आई, धर गुरु रूप दिखाया। गुरु शब्द अशब्द शब्द भण्डारा, सार शब्द की रासी। सबसे न्यारा सबका प्यारा, सबके घट घट बासी ॥ गुरु सुरत विहंगम चढ़े अधर को, गगन पार पद लीना।। सतगुरु कृपा मौज भई भारी, अलस्त्र अगोचर चीन्हा।। गुरु औंधा कुवाँ भरा जल निरमल, उलट भरे पनिहारी।। घट के ऊपर घट दरसाना, औघट घाट संवारी।। गुरु सुरत निरत अद्भुत लीला, गुरमुख होय सो जाने। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, निरख निरख मन माने ।।गुरु
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() मन्दिर की शोभा भारी, समझे गुरु आज्ञाकारी ।।टेक
। म्वृ ट खुट में देव विराजे, ब्रह्मा विष्णु त्रिपुरारी।। हृदय गुफा जब बैठक कीन्हा, सहज ही लग गई तारी मन्दिर घट मन्दिर जो आन समाया, देखा अद्भुत लीला। रूप रंग रेखा सब दरसा, जड़ चेतन का केला ।। मन्दिर घट के ज्योत में खोले घाँटी, सुख दुख सकल बिनासा।। पद निर्वान निरख बहु हरखा, घन आनन्द बिलासा ।।। ज्ञान ध्यान जप तप अनुरागा, सबका फल मिला घट में। आंख खुली हिये की मेरी, सब प्रगटा तिल पट में ।।। कोटि ग्रन्थ पढ़ पढ़कर क्या मरना, वृथा योग बिचारा।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,मिला शब्द रस सारा।
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()घट का भेद अपार है, कोई समझे ज्ञानी ॥टेक।
। घट के भीतर देवी देवा, वट में रहकर करते सेवा।। घट से उपजे भरम के भेवा, घट में तत्व निशानी।। घट0 घट में ब्रह्मा घट ही में माया, घट में ज्योती घट में छाया।। घट में क्रोध काम मद माया, घट में सब की खानी ॥ घट0 घट उपजे घट विनसे छिन छिन, घट में चाँद सूर हैं निसदिन। घट अभेद और घट ही भिन भिन, घट है अकथ कहानी ॥ घट0 घट समुद्र में लहर उठाई, बुन्द सिंध नहीं रहे अलगानी।। घट से निकस घट माहिं समानी, घटकी लीला जानी।। घट0 घट आज्ञा घट आज्ञाकारी, घट ही जग घट जगदाधारी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु मर्म बखानी।घट0
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()अपना आपा सोधो, आपा सोधो मन परबोधो ।।टेक।
। सर्व व्यापी सदा अलेपा, निज घट में नित बसता।। घट ही में हैं हो तब पाओ, माहीं मिलन का रस्ता ॥ अपना नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, नहीं कुछ करना धरना। अपने आप की सूझ बूझ से, मिटे जनम और मरना।अपना तीरथ बरत ध्यान और सेवा, यह सब भरम कहानी। सतगुरु मिले तो भेद बतावं, सूझे अगम ठिकानी। अपना धोके में सब जगत बंधा है, धोके धोक समाया। धोका लोक परलोक भी धोका, धोका माया काया ॥ अपना अपने हृदय आप विचारो, कौन किसी का भाई। अन्तकाल साथी नहिं कोई, झूठे सगी सगाई ॥ अपना मारग चलते मिले मुसाफिर, नाता बांधा झूठा। निज अस्थान में जब सब पहुंचे, नाता रिश्ता छूटा। अपना बिन गुरु ज्ञान न उपजे सत बुधि, जीव अधीन दुखारी।। गुरु कृपा से बन्धन काटो, राधास्वामी की बलिहारी।।अपना
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() | दीन मुझे अति प्यारे लागे मैं दोनों का प्यारा ॥टेक।
। जो कोई मेरी शरन में आवे, मैं उसका रखवारा। करम धरम की आस न राखे, राखे मेरा सहारा ॥ दीन0 किस का योग कहां का जप तप, कैसा ज्ञान विचारा । जो कोई मुझको भजे निरंतर, वह आँखों का तारा ॥ दीन0 मैं दोनों के मन में बसता, और है भरम पसारा।। वह तो मेरे प्राण के प्यारे, मैं उनका आधारा ॥दीन0
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() तेरे भक्तों के बलिहार, साई तेरे भक्तों के बलिहार ।।टेक।
। माया चाम है काया चाम है, चाम है यह संसार। जो कोई चाम की दृष्टि मेटे, सच्चा भक्त बिचार ॥ तेरे इनको त्यागे उनको लागे, छोड़ा नरक दुआर।। स्वर्गलोक की इच्छा नाहीं, दोनों में नहीं सार।। तेरे सार सग जो चहुँदिस भासे, सोई है संसार।। मार पाये संसार को छोड़ा, सार से राखे प्यार।। दृष्टि सृष्टि का मरम पिछाना, समझा मूल विकार।। आवागवन का टाट समेटा, डाला जग पर छार ॥ तेरे एक आस विश्वास गुरु का, दूजा और न कार।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मेटा द्वन्द पसार।।तेरे
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() दया करो करतार, मेरा करदो आप सुधार ॥टेक
। भव सागर में गोता खाती, कभी नीचे कभी ऊपर जाती।। माया नित भरमाती सताती, सूझे बार न पार ॥ दया आसा तृष्णा बन्ध बन्धाना, माया मोह फांस लपटाना। छूटन की कोई विधि नहीं जाना, मन व्याया हंकार।। दया बुद्धि नहीं ठिकाने मेरी, चित रहती है हेरा फेरी।। चंचलता ने चहुँ दिस घेरी, उरझ रहा संसार। दया शरन भी लेना नहीं मैं जानू, शरनागत गति नहीं पहचानू। किसको मानू किसको न मानू , भरम से अब गया हार ॥ दया कैसे सच्ची बिनती करता, औगुन में नित खपता मरता। बोझ विपत का सिर पर धरता, अब होगया लाचार ॥ दया दिन को खाना रात को सोना, समय पड़े आपति से रोना। द्वेष बीज घट घट में बोना, यही उत्तम व्यौहार।। दया करम धरम नहीं सुमिरन ध्याना, नहीं भक्ति न विवेक ने ज्ञाना।। अब तो दे मुझे ठौर ठिकाना, राधास्वामी की बलिहार ॥ दया
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() सुनो संत मत सार, मन अपने करो विचार ॥टेक॥ ति न के अन्दर तेल बनाओ, सुमिरन ध्यान का दिया जलाओ
। गुरु के रूप में नेत्र जमाओ, चढ़ जाओ सहस्रार ॥ मन में कुछ दिन पीछे त्रिकुटी आना, गुरु संगत मिल ज्ञान को पाना।। शंख छोड़ मृदंग बजाना, दरस परस कार।।मन में गुरु को बल ले आगे जाना, सुन्न में सहज समाध रचाना। मान सरोवर अमी नहाना, सुन सुन रारंगकार ॥मन में सुन्न महासुन्न तर्ज देना, भंवरगुफा की खिड़की लेना। सतसंगत से चित को सीना, गाना सोहंगकार ॥मन में इसके आगे सतपद बानी, सत सत सत सत सत्य निशानी। सत की सत्ता बीन में जानी, होजा सत्याकार मन में अलख अगम के पार ठिकाना, संतों का है पद निरवाना। राधास्वामी राधास्वामी राग पुराना, गाना ममता मार ॥मन में जो कोई इतने ऊँचे आवे, माया काल न फिर भरमावे। आवागवन का बीज जलावे, पार से पहुँचे वार ॥मन में
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()मेरी लगन गुरु से लागी ॥टेका
। प्रेम प्यार अन्तर घट धस गया, भक्ति रस में पागी ।। आनन्द हर्ष हिये में छाया, हुई सच्ची अनुरागी। मेरी सारा जगत गुरु में भासा, सुरत निरत उठ जागी। जहां दृष्टि पड़े गुरु लीला, किसे गहूँ क्या त्यागी।। मेरी सोवत जागत कबहुँ न बिसरेसुनो अनाहद रागी। राधास्वामी दयाल की दया भई है, मैं होगई बड़भागी।मेरी
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()अब मैं गुरु के चरन पखारू ॥टेका।
। चिंता त्यागे दुविधा मेटू, काम क्रोध मद मारू। हिये का बासन शुद्ध करू तब, चरनामृत मुख डारू। अब सोबत बैठत नाम का सुमिरन, तरू कुटुम्ब सब तारू। यह मेरी पूजा यही बंदगी, काल करम को मारू। अब दुख नहिं व्याये बिपत न आत्रे, भक्ति भाव चित धारू।। राधास्वामी दया से काज बनेगा, गिड़ी सकल सुधारू ।।अव0
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() कहां चली जाऊॐ रे मन अज्ञानी, मैं कहाँ चली जाऊँ ।टेक
। तू नहीं समझे न राह में आवे, उठते बैठते द्वन्द मचावे। भरमे आप सब ही भरमावे, करे आनाकानी रे अज्ञानी ॥कहां एक दशा में क्यों नहीं रहता, क्यों नित आपति बिपति सहता। ज्ञान अनमोल रतन नहीं लहता, माया मोह फंसानी रे अज्ञानी ।‘ कबहुँ अकाश ओर सिधावे, कबहुँ पताल की थाह लगावे।। इससे क्या तेरे हाथ में आवै, भरम भरम भरमानी रे अज्ञानी ।‘ भजे न सतगुरु चरन न सेवे, सुमिरन ध्यान को चित्त न देवे।। भार कष्ट का सिर पर लेवे, भटक भटक भटकानी रे अज्ञानी ॥ राधास्वामी तेरे सदा सहाई, कर संगत तेरी बन आई।। अब तो सहज में करले कमाई, फिर अवसर नहीं पाई रे अज्ञानी ।।
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() उलट के घर को जाना, सुरत चढ़ हरष असमाना ॥टेक।
। भ्रमध्य बैठो चित देकर, शब्द ज्योति ठेराना।। जब गुरु का बल मन में बाढ़, त्रिकुटी पद चढ़ जाना ॥उलट ओम्कार धुन घट में सुनना, रूप में हिंया बसाना। सुन्न सिखर चढ़ आसन लाना, सहज समाध रचाना ।।। विधि से करो नित यह करनी, परिचय पा हरषाना। फिर आगे का पन्थ सुगम है, राधास्वामी धाम पयाना ।
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()कैसी करू माने नहिं मनुआ ।।टेका।
। दुर्मति दुर्गति से कर प्रीती, सीखी नीच भाव की रीती।। गुरु चरनन की नहीं प्रीती, सार तत्व जाने नहिं मनुआ ॥ कैसी कामी क्रोधी लोभी मानी, मोह मया के फांस फंसानी।। भजनभाव रहे नित अलसानी, गुरुगमपहचाने नहीं मनुआ ॥ छिनमें गगन आकास को धावे, छिनमें सिंघ पताल को धावे। छिन में रोवे छिन में गावे, गुरु की टेक माने नहीं मनुआ ।।कोई0 कभी ज्ञान की बात बतावे, कभी शील की महिमा जतावे।। शील ज्ञान को चित नहीं लावे,राधास्वामी मन आने नहीं मनुआ ॥






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