Shiva Shabdasagar Part II-61 to 150

(61) आली री गुरु दरस मिला नहीं, कैसे करू ॥टेक।।

दर्शन बिन मोहि चैन न आवे, रह रह कर मेरा जियो घबरावे।।

विरह की आग की तपन सतावे, रात दिवस यह अग्नि जरूरी ॥1॥

दिन गये पक्ष मास गये सजनी, बरस गया नहीं अवसर मिलनी।

तड़प तड़प बिरहा दुख सहनी, इसी सोच में हाय मरू री ॥2॥

जल बिन मछली की गतिमेरी, गुरु ने दया दृटि नहीं फेरी।।

चिन्ता ने लिया मन को घेरी, सिर पर बिपत का भार धरू री ॥3॥

जीवन की क्या आस सखी री, पल पल साँस दुधारी खिसी री।।

क्या जानू कब जीव निकसीरी, माया काल से अधिक रू री ॥4॥

राधास्वामी दीन दयाल सहाई, जब दी तुमने चरन शरनाई।।

दर्शन दे मेरी करो भलाई, तुम्हरे पद लग भव से तरू री ॥5॥

(62) | मेरी सुरत सुहागिन नार, सजनी पड़ी काल के पाले ।।टेक।।

चेत चेत ले चैत ले सजनी, कथनी तज कुछ करले करनी।

करनी से तुझे मिलेगी रहनी, रहनी चित्त बसाले।

मानुष जनम भाग से पाया,कोटि जनम धोका जब पाया।।

सतगुरु अब तो चितवन आया, जीवन सुफल कराले।

भव भय भरम से भई भ्रान्ती, आई चिन्ता भागी शान्ती।।

लख गुरु मूरति की तू क्रान्ती, घट में ध्यान जमाले।।

सुमिरन ध्यान भजन अभ्यासा,सुरत शब्द को करले विलासा।

अन्तरमुख लख बिमल तमासा, बाहरी दृष्टि हटाले।।

ॐराधास्वामी दाता सतगुरु ज्ञानी, बख्शें मेहर से पद निरवानी।।

छुटे जगत की द्वन्द गिलानी, पाना हो सो पाले।मेरी0

(63) मेरी प्यारी सुहागन नार, अपने पिया को रिझाले री ।।टेक॥

भाग जगा पिया दर्शन पाया, प्रीतम प्यारे ने अंग लगाया।।

शोभा रूप अनूप दिखाया, देर न कर अपनाले री ॥

प्रीत प्रतीत के सुन्दरभूषण, अंग अंग साजलेतू मन का तन।

तन मन धन कर पिया के अरपन, रूठे पिया को मनाले री ॥

तू पृथ्वी पिया ऊँचे मण्डल, तू चंचल तेरा पिया है निश्चल।।

सुरत शब्द के मारग में चल, महल का उसके पता ले री ॥

सहस कमल त्रिकुटी के पारा, सुन्न भंवर के धाम से न्यारा।।

सतपद में तेरा प्रीतम प्यारा, सीस से चरन लगाले री ॥

राधास्वामी गुरु ने भेद जताया, सुरत निरत का तत्व बताया।।

शब्द सार को निज धुन गाया, सुन सुन मन को चिंताले री ।।

(64) बरसत अमी धार नित अन्तर, भीज रही सुरत मतवारी ।।टेक।।

रिमझिम रिमझिम बादर बरसे, एक तार की लगा झरी।।

निसदिन बरसे पल छिन बरसे, व्याप रही काया में तरी ॥बरसत0

ज्योत की सोत से बरसे पानी, नहीं तीखा नहीं खारा वह।।

गुरुमुख पिये प्यासा निगुरा, गुरु गम से है न्यारा वह।।

वरषा अद्भुत झड़ी अनोखी, बाहर दृष्टि नहीं आवे।।

इसकी समझ कोई कोई पावे, जो घट गुरु का ध्यान लगावे।

ऊँचा पिये पिये नहिं नीचा, सुरत बनी असमानी जब।।

पृथवी त्याग गगन चित ध्यावे, पावे निर्मल पानी तब।।

राधास्वामी सतगुरु पूरे, जीव दीन को चिताया है।

शब्द सुरत की बरषा की धुन, खुली रीति से गाया है ।।

(65) तुम चलो गुरु के संग, रंग देखो अपने अन्तर का ।।टेक॥

घट भीतर ज्योत उजारा, ज्योती झलक अपारा।

अनहद धुन का झनकारा, बाजे मृदंग में ओम् ढंग।।

घट भीतर हर्ष हुलासा,आनन्द सुख चैन बिलासा।।

नहीं माया काल का त्रासा, मन को नहीं किंचित अंग भंग।।

तुम घट भीतर भजन और ध्याना, सुमिरन श्रवण सत ज्ञाना।

साधु दुरवीन निशाना, त्यागो माया का द्वन्द जंग।।

तुम घट भीतर धंसकर जाओ, सुन्न मंडल जाय समाओ।।

सोई हुई सुरत जगाओ, पियो भक्ति की बहती भंग गंग।।

तुम घट भीतर गुफा में अओि, बिगड़ी हुई बात बनाओ।

सतपद राधास्वामी पाओ, दर्शन करो सहित उमंग चंग ॥तुम

(66) चेत प्यारे चेत के अवसर ॥टेक।।

दिन तो बीता खेल कूद में, रात पेट भर खाया ।।

आलस निद्रा लगे सताने, कैसा समय गंवाया।।

बालपना गया आई जवानी,गई जवानी आया बुढ़ापा।

रोग सोग तुझे ग्रासा, दुख चहुँदिशा में व्यापा ।।चेत0

करम के समयकरम नहीं करिया, ज्ञान के समय न ज्ञाना।।

अब उपासना का है अवसर, चेत जो चतुर सुजाना ।।चेत0

टूटे दाँत ज्योत नहीं आंखी, शब्द सुने नहिं कानी।

अब भी तू नहीं समझा भाई; क्या होगया दिवाना ।।चेत0

सुमिरन भजन ध्यान विसराया, चंचल मन के बस हो।

अब की चेत चेत के अवसर, समय अमोल को मत खो ।चेत0

कर सतसंग बचन सुन गुरु का, श्रवन मनन निदिध्यासन।

कहता हूँ अब सोच समझ कुछ कर गुरु का आराधन ।।चेत0

भूल भूल भूला और भरमा, पड़ अज्ञान के पाले।।

अब सुन मेरी अन्तकाल है, राधास्वामी की दयाले ।।चेत0

(67)भाई गुरुमत मनमत मेंहै भेद ॥टेक।।

गुरु मत तो है सतगुरु का मत, मनमत मन मत भाई।

अहं भाव की जड़ है एक में, दूजा अहम नसाई।।

गुरु गम निरख परख करचलना, गुरु मत केअनुसारा।।

मनमत चाल चले जो कोई, चित बाड़े हंकारा ॥

भाई0 माया काल करम की जड़ है अहं में, सतगुरु ने बतलाया।

जो कोई इसके धोके में आया, जीता बाजी गंवाया।

खङ्ग की धार चले जोकोई, सँभले कैसे मगमें।।

गिरत पड़त कुछ देखन लागे, चोट सहे पग पग में।।

राधास्वामी की गुरुमत बानी, साधन साधके साधा।

गुरु की दया सहारा पाया, मेटा सकल उपाधा।।भाई0

(68)गुरु भक्ति चित धार मनुआ ॥टेका।।

प्रेम प्रीत के रस में पगजा, सुमिरन भजन ध्यान में लगजा।

काम क्रोध के मग से अलगजा, भक्ति प्यार प्रतीत के लगजा।

कर जीवन से पार, मनुआ गुरु भक्ति चितधार ॥

मनुआ कोमल हृदय शान्ति के बैना, अपनी भलाई परख निज नैना।

समझ सोच सतसंग के सैना, लाख विवेक विचार ॥

मनुआ राधास्वामी नाम रहे होंठों पर, इस नौके से तर भव सागर।

नाम प्राप्ति का कुछ साधन कर, गुरुबल होजा पार।।

मनुआ

(69) भया रे यह मनुआ अति उत्पाती ॥टेक।।

चढ़ा भरम अज्ञान हिंडोला, काम क्रोध को सहे झकोला ।

छिन भर भी नहीं रहे अडोला, भ्रान्ती के बस दिन राती ॥भयारे0

बिन कारन उत्पात मचावे, आप दुखी औरनहु दुखावे।।

करनी कथनी का फल पावे, ऐसा कुबुद्ध मदमाती ॥

भयारे0 समझे नहीं मैं थक कर हारी, निज स्वरूप का ध्यान बिसारी।।

अपना आप बना अपकारी, सचमुच आतमघाती।।

मिथ्या करनी का फल पाया, है मन पापी फंसा मद माया।।

क्यों नहीं गुरु की शरन में आया, कुटिल कुचाल कुजाती।।

राधास्वामी दाता दया बिचारो, इस मनुओं को आय सँभारो।।

चाहे जिलाओ चाहे मारो, मैं कहीं आती न जाती।।

(70) सतगुरु दाता दुख से बचा जा ॥टेक।।

आठ आठ आंसू दिन रोना, रात को तम की नींद में सोना।।

रो सोकर आयु को खोना, अनुचित बान यह मेरी छुड़ाजा ।सतगुरु

रसना पर निन्दा रस राती, कान को ऐसी ही बात सुहाती।

यहि विधि हाय मैं जनम गंवाती, तू सुधार की युक्ति बताजा ।सतगुरु

पड़ी कुमति दुर्मति के पाले, नित मेरी छाती हूले भाले।

कौन मेरी यह दशा सँभाले, सतगुरु दाता आके चिताजा ।।सतगुरु

तू सच्चिदानन्द है प्यारे, कितने पतित अधम नित तारे ।

ले अब अपने चरन सहारे, दुखिया को दुख फंद कटाजा।।

राधास्वामी दीन सहाई, तेरी दया की बजी है बधाई।।

दर्शन मिला मेरी बन आई, हित उपदेश ने बचन सुनाजा ॥

(71) | सतसंग काज बनाई, साधु सतसंग काज बनाई।।

कहां चन्दन कहां रेंड बापुरो, बास सुबास सुहाई।

संगत को परताप महातम, चन्दन रेड कहाई।।

साधु0 कहां गंगा कहां नद और नाले, मेलो नीर बहाई ।।

गंगा से मिल गंग भये दोऊ, संगत की अधिकाई ॥

साधु0 कहां सुदामा रंक भिकारी, कहां गोपाल कन्हाई।।

उत्तम संग उत्तम बन आयो, संगत की प्रभुताई।।

साधु काठ की नाव का बेड़ा बना है, बोझो लोह गड़ाई।।

काठ के संग लोह तरजावे, देखा अचरज आई।

साधु कहां भालु कपि निश्चर पापी, कहां राम सुखदाई।

राम के संग राम गुन पाया, चहुँ दिस कीरति छाई।

साधु कहाँ कीट निर्बल दुखियारा, कहां भृगी समुदाई।

कीट भृगी भया संगत के बल, महिमा बरनी न जाई।

साधु गुरु का संग करो निस वासर, गुरु के रंग रंगाई।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अधम पतित तरजाई ।साधु

(72) क्यों भरमत डोले प्रानी वह तो तेरे पास में ॥टेक।

ना वह ज्ञान ध्यान नत भाई, ना वह योग अभ्यास में।।

ना वह करम धरम संयम में, ना विरक्त सन्यास में।।

 फर्श पर पता नपाया, ना कासी कैलासमें।

माया मोह की गम नहीं उसमें, उदासीन न निरास में।।

क्यों0 हूँढत ढूंढत ढूंढ़ थके जब, अन्तर झुके तलाश में ।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, वह सांसों के सांस में। क्यों

(73) सार तत्व की आसा साधु, सार तत्व की आसा ॥टेका।

माया छाया छाया माया, छाया माया बासा।।

माया में रहे घोर अंधेरा, तत्व में होत उजासा ॥साधु0

रात अंधेरी पंथ न सूझे, मन में बसे दुखासा।

जो कोई ताते नेह लगावे, निस दिन हो त निरासा ॥साधु0

तम में तम का भय अति दुस्तर, माया लाये लासा ।

सत पद में प्रकाश घनेरा, कर सत प्रथम निवासा।।

या विधि यतन करे जोकोई, छूटे जग कीत्रासा।

त्रासा छुटी तो माया नाहीं, तत्व सार जब पासा।।

सुख सनेह और भोग विषयमें, रहे न तोलामासा।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होजा सबसे उदासा ॥साधु0

(74)साधु पुरुष पुरुषारथ गाओ ।।टेका।

दुख से छूटो सुख हित लाओ, दुख सुख सकल भुलाओ।

द्वन्द जगत की मेंट कल्पना, निज स्वरूप चितलाओ ।साधु0

तुम नहीं देह न इन्द्री मन हो, इनसे ध्यान हटाओ।।

तुम सच्चिदानन्द की मूरत, अहं ब्रह्म गति पाओ।।

अहं ब्रह्म में अहंको त्यागो, ब्रह्ममें वृती जमाओ।

लगे अखंड समाधि सुन्न में, निराधार हो जाओ।।

सत्य असत्य का झगड़ाछोड़ो, द्वन्द विचारहटाओ।

द्वत प्रपंच को मिथ्या मानो, पद अद्वैत जमाओ ॥

साधु0 यह है ज्ञान की मूल अवस्था, ज्ञानवान बन जाओ।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आनन्द भोग कमाओ।।साधु0

(75) ज्ञानी का व्यौहार, क्या कोई बरने पार ।।टेक।

जैसे जल में कमल बिराजे, जल से थल से न्यारा।।

तैसे ही ज्ञानी हैं जग में, व्याये नहीं संसारा।।

ज्ञानी0 कमठ है पानी के भीतर, रेत में अण्डे देवे।।

दृष्टि सृष्टि का भरम न जाने, दूर से उनको सेवे ॥

ज्ञानी0 करम करे करता न कहावे, करम का फल नहीं चाखे।

भोग सोग रोग नहीं लाये, अधर सोहंगम भाखे।ज्ञानी

कोई कोई भृगी कीट फेसावे, अपने रूप बनावे।

कीट न जाने भूगी करम को, गुरु यू शिष्य चितावे ॥

ज्ञानी0 जल में खेले कमल निरंतर, जल थल में मुरगावी।।

गोते मारे पर नहीं भीगे, ज्ञानी सोई प्रतापी ॥

अंग अंग में बहु रंग बहाये, गिरगिट चतुर सुजाना।।

किसी रंग में दृढ़ता नाहीं, सो ज्ञानी परमाना ।।।

एक जो कहिये शुक आजारज, गर्म से माया त्यागी।

दुजे वामदेह ऋषि सांचा, गर्भहि में अनुरागी ॥

तीजे दत्त महामुनि योगी, देख देख संसारा।।

गुरु मय जगत दृटि प्रतीती, महिमा अगम अपार ॥

चौथे ज्ञान वशिष्ठ कहावे, शम दम से लव लीना।।

विश्वामित्र बेरी बन आये, ‘अन्त गुरु पद चीन्हा।।

पंचम ज्ञान ध्यान की मूरत, जनक प्रजापति राजा।।

भोग योग दोनों सम बरते, साज राज का साजा ॥

छटे जो कहिये कृष्ण महाप्रभु, भारत आन लड़ाये।

दरपन की सुन्दरी बन आये, हँसे न काहू फंसाये।।

सप्तम सनकादिक नर ज्ञानी, बाल अवस्था प्यारी।।

परमहंस की अद्भुत लीला, अनहित ना हितकारी।।

वाचक ज्ञानी ज्ञान न जाने, ग्रन्थी ग्रन्थन भटके।।

कह दयाल सोचो यह प्राणी, यम के फांस में अटके।।

(76) साधु एक रूप है सब में ।।टेक।

बुद बूद में भेद नहीं है, सिंध बूद दोऊ एका।

बद में सिंध सिंध बृ दवत, यही है सार विवेका ॥

साधु0 बूद के पीछे सिंध है व्यापा, सिंध बूद आधार।

सिंध आधार बुद रसाना, सच्चा तत्व बिचारा ॥साधु0

भर्म कल्पना मन में उपजी, सिंध बूद बिलगाने।

मिटे कल्पना ज्ञान के बल से, तब कोई भेद पिछाने।

ज्ञानी0 मिथ्या भर्म कल्पना मिथ्या, मिथ्या जग व्यौहारा।।

जब वह मिथ्या समझ में आवे, मिटे द्वन्द विस्तारा ।

आप आप को आप पिछानो, बनो तत्व विज्ञानी।।

कहा और का नेक न मानों, राधास्वामी की है बानी ।।

(77) शब्द की महिमा भारी, समझे कोई अधिकारी ॥टेक।

शब्द शब्द का सकल पसारा, शब्द शब्द आधार।

जो कुछ देखा शब्द ही देखा, शब्द शब्द निरवारी।

शब्द0 शब्द ही मारे शब्द जियाने, शब्द करे रखवारी।

शब्द से राज काज सब सूझे, शब्द विराग विचारी ॥

शब्द ब्रह्म है शब्द जीव है, शब्द ही देव पुजारी।।

शब्द ज्ञान और शब्द ध्यान है, शब्द रूप विस्तारी।।

शब्द प्रकाश ज्योति परछाई, शब्द शब्द चमकारी।।

शब्द प्रकाश पवन और अग्नी, जल थल शब्द मॅझारी।।

राधास्वामी संग शब्द को निरखा, शब्द स्वरूप बिचारी।।

सुरत शब्द सा धन चित भयो, मन प्रसन्न सुखारी ।।

(78) आशा पूरी नहीं हुई मेरी ॥टेक।।

असा लग मैं भव में अटकी, फिरी भरम की फेरी।।

भूली भटकी पन्थ में आई, की उपाय बहुतेरी ॥आसा0

एक आस से लाख आस हैं, आस में आस घनेरी।

कभी उदास कभी हर्ष हुलासा, कभी निराश चित फेरी ॥

राज मिला धन सम्पत पाई, लगी सामग्री की ढेरी।

फिर भी नहीं सन्तोष हुआ मन, आसा में रही घेरी।।

पुत्र कुपुत्र की चिन्ता व्यापी, मिलत न लागी देरी।।

सब कुछ पाया कुछ नहीं पाया, रही आसा की चेरी ॥

आसा0 ज्ञान ध्यान जप तप की सूझी, सब निश्चल रे री।।

अन्त में रूप समझ सुख पाया, राधास्वामी संगत हेरी।।आसा0

(79)सतसंग तीरथ राज प्रयाग॥टेक।।

गंग भक्ति बहे निर्मल धारा, सरस्वती ज्ञान विराग।।

जमुना करम धरम व्यौहारा, प्रेम प्रीत अनुराग ।सतसंग0

बट विश्वास इष्ट पद दृढ़ता, गुरु पद यूरन राग।।

तीन त्रिवेनी कर अस्नाना, जागा सोया भाग ॥

सुगम सहज सुख मंगल दाता, सुलभ जो से लाग।।

नहाये धोये निर्मल हो मन चित, छूटें कलि मल दाग।।

बगला विरति हंस गति पाने, कोमल बानी काग।।

जीतेजी तत छिन फल देने, इच्छा होय सो मांग।।

काम अर्थ धर्म मोक्ष जो चाहे, ऐसे तीरथ भाग।।

राधास्वामी दया से पूरन कामा, गुरु संगत नित जाग ॥

(80) | अब तेरी गति जानी रे मन, अब तेरी गति जानी ।।टेक।

सबही नचावत नाच अनौखा, सुर नर मूरख ज्ञानी।

एक बचा नहीं जाल से तेरे, भक्त तपस्वी ध्यानी ॥

अब0 तू समुद्र सम गहरा छिछला, थाह न कोई पानी।

संशय वायु प्रचंड बहे जब, लहर लहर लहरानी।

अब0 लोभी मोही द्रोही लम्पट, कामी क्रोधी मानी।।

छिन में पवन आग बन जाने, छिन में पृथ्वी पानी।

अब0 द्वन्द रूप द्वन्द आसन द्वदी, द्वैत अद्वैत की खानी।

अपने जाल से जग भरमाया, तेरी अकथ कहानी ॥अब0

मन मतंग है मन गयंद है, किसी के बस नहीं आनी।

राधास्वामी दया होय जब जन पर, ज्ञान का अंकुस मानी ।अब तेरी

(81) | साधन की प्रभुताई, मन साधे सोध कहाई टेक।।

मन साधे तो सब सधे, बिन साधे नहीं सोध।

सोध कहावन कठिन है, साध को मता अगाध ॥साधन

आंख कान मुख बन्द कर, सुन अनहद धुन तान।।

तीन बन्द जब घट लगे, तब प्रगटे संत ज्ञान ॥

साधन0 जो साधन सम्पन्न नहीं, नहीं अनुभव सम्पन्न।

बिन अनुभव सम्पन्नता, नहीं सतगुरु प्रसन्न ॥

साधन0 साधन की सम्पन्नता, हो अनुभव सम्पन्न।

जो अनुभव सम्पन्न है, सो सतगुरु प्रसन्न।।

साधन0 राधास्वामी दीन हित, दीनानाथ दयाल।।

दया रूप धर कह गये, बानी सरस रसाल ॥साधन0

(82) हम नहीं जोगी ज्ञानी साधु, हम नहीं जोगी ज्ञानी ।।टेका।

करता बनकर कर्म करें नहीं, नहीं अकर्म रहानी।

हमरे धर्म भर्म नहीं करमा, धर्म न कर्म भुलानी ॥

साधु0 योग भोग में भेद न जानें, नहीं योगी नहीं भोगी।

हमरे रोग सोग नहीं कोई, नहीं हम रोगी सोगी ॥

साधु बिन पग चले चाल निस बासर, विन जिभ्या रस बानी।।

बिना नैन के दृष्टा सृष्टा, बिना मान के मानी।।

साधु मन नहीं अमन न बुद्धि न युक्ति, चित हंकार न जानी।।

उनमन सहज समाध के बासी, बिना ध्यान के ध्यानी।।

साधु भक्ति ज्ञान और कर्म न मानें, मानें मान न मानी।

सब को जानें कुछ नहीं जानें, बिन जाने पहचानी ॥साधु

गुरु ने रूप का भेदलखाया, अधिष्ठानअभिमानी।

साक्षी शब्द शब्द बिन साक्षी, सुरत शब्द पहचानी।।

साधु0 हम सब हैं और कुछ भी नहीं हैं, कैसे करे बखानी।।

हम जैसा हमको कोई समझे, पड़े न भव की खानी।।

साधु बुन्द सिंध गति मर्म है न्यारा, धरती आकास समानी।

राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, प्रेम के पंथ चलानी।।साधु

(83) प्रेम के कु ड नहाले सजनी, प्रेम के कुड नहालेरी ।।टेक॥

मैले वस्त्र उतार देह से, नहा नहीं जस प्रीत मेह से।।

सज अङ्ग भूषण प्रेम नेह से, पिया को अपने रिझालेरी।।

सजनी0 समय मिला अवसर शुभ पाया, प्रीतम प्यारा तेरे हिंग आया।

सोया मनुआ लिया जगाया, अब उसको अपनाले ॥

सजनी तन जोवन सब है दस दिन का, धन सम्पत हुआ किसका किनका।।

जगत मोह का तोड़ के तिनका, पिया को अङ्ग लगाले।।

सजनी सुरत सहेली शब्द से ब्याही, माया जाल फस भई कुराही।।

विभिचारी बन किया तबाही, अब तो सँभल सँभाले ॥

सुमिरन ध्यान भजन सिंगारा, शील सेंदूर भर मस्तक सारा।।

राधास्वामी तेरा प्रीतम प्यारा, घट में उसे बसाले।

(84) कर पहले से कुछ जतन मीत, इस जगत से न्यारा होना है ॥टेक।।

और युक्ति कोई काम न आवे, इनमें जनम को खोना है।

गुरु की भक्ति सदा हितकारी, बीज भक्ति मन बोना है।।

कर सकल रसायन छोड़ दे भाई, भक्ति सार का होना है।

भक्ति का साबुन गुरु से पावे, करम चदरिया धोना है ॥

कर तज दे मोह नींद का आलस, अन्त समय फिर सोना है।

राधास्वामी चरन बांध दृढ़ प्रीती, नहीं फिर अन्त में रोना है ॥

(85) मेरा बांका रंगीला मनुआ, गुरु भक्ति रस में पागा ॥टेक॥

पहले बोलत बचने कठोरा, द्वेष ईर्षा लागा।।

अब तो बोले मधुरी बानी, हंस बना है कागा।।

मेरा0 बैर भाव की दुर्मति नासी, चित उपजा अनुरागी।

ममता मोह मान मद छलबल, काम क्रोध सब त्यागा।।

मेरा0 गुरु के चरन झुकावत माथा, भरम भाव भये भागा।

जनम जनम का सोया मनुआ, राधास्वामी दया से जागा।।मेरा

(86) सुमिरू नित गुरु का नाम, छिन प्रतिछिन आठों याम ॥टेक॥

त्यागू मद मोह काम, दारा सुत धान धाम।।

लोक लाज साजे काज, राज काज से न काम ॥सुमिरू0

गाये गाये ध्याये ध्याये, चरनन चित लाये लाये।

गुरु मूरत हृदय बसाये, शम दम साहस बढ़ाये ॥

समझ बूझ कर विवेक, तज दे चिंता अनेक।।

मन में बसे तेरे एक, राधास्वामी बांध टेक ॥

(87) साधु अपना आपा खोजो ॥टेक।।

पढ़ा लिखा अज्ञान कमाया, ज्ञान की समझ न आई।

चेतन रूप भुलाया अपना, आई चित जड़ताई।

साधु0 तुम में सब कुछ तुम सब कुछ हो, तुम से सब कुछ भाई।

पोथी ग्रंथ पढ़े बहुतेरे, अपनी परख नहीं आई ॥

ज्यों समुद्र में लहर उठत है, ब द बुदबुदे लाखों।।

तेसे ही तुम में सब कुछ है, देखो अपनी आंखों ॥

तुम ब्रह्मा विष्णु महेशा, तुम में ब्रह्म है माया।

तुम निज रूप प्रकाश की मूरत, दूजा सब है छाया ।।।

राधास्वामी परम सन्त ने, सच्चा भेद बताया।

जो कोई सतसंग में आया, तत्व सार समझाया ॥साधू0

(88) सुरत का खेल खिलाया गुरु ने, सुरत का खेल खिलाया ।।टेक।

काया माया छाया भूला, मोह भरम लपटाया।

गुरु ने बांह गही मेरी आकर, चित दे चेत चिताया।

गुरु ने0 काया मध्ये सोया मनुआ, सोये आयु गंवाया।।

गुरु ने चितावनी देके जगाया, उठा विकल घबराया ॥

अन्तरमुख विरती को साधा, अपने अन्तर आया।

सहस कमलदल बैठक ठानी, घंटा शंख बजायो।

तज अनेक गति त्रिकुटी की सूझी, त्रिकुटी मंडल आया।

अ उ म ओंमकार की बानी, सुन मृदंग हरपाया ॥

सुन्न महासुन्न मान सरोवर, तीन त्रिवेनी नहाया।

हंस गति रारंग धुन सुनकर, क्षीर नीर बिलगाया ॥

चौथे भंवर गुफा की घाटी, खिड़की जाय खुलाया।

सोहं सोहं बंसी की गति, प्रगटी प्रगट सुनाया।

पंचम सत गति बीन की बानी, सतनाम दरसाया।।

अलख अगम चढ़ काज बनाया, राधास्वामी के गुन गाया।।

यह सब साधन घट के भाई, घट में अघट लरवाया।।

आनन्द सुख हुई सुरत सियानी, नर जीवन फल पाया।

सुमिरन भजन ध्यान की किरिया, अजपाजाप जपाया।

राधास्वामी की करुना से, कटे काल कर्म माया।।

(89) साधु शब्द योग चित दीजे ॥टेका।

सुगम सहज है कठिन नहीं है, घट के शब्द का सुनना।

सुन सुन सुरत होय अति निर्मल, अन्तर बैठ के गुनना ॥साधु0

कुछ दिन संगत गुरु की कीजे, बचन विचार विलासा।

ज्ञान तत्व की समझ जो आवे, उपजे हर्ष हुलासा।।

साधु0 प्रेम प्रीत प्रतीत पदारथ, गुरु संगत मिल पाना।।

भक्ति युक्ति का सार समझकर, सोया मनुआ जगाना ॥

जनम जनम का भूला यह मन, घट के पंथ न चाले।।

गुरु मिले तब भेद बतायें, अन्तर देखे भाले ॥

भेद पाय जीते कर्म बानी, पूछे प्रश्न अनेका।।

तज अनेक विधि वस्तु अनेका, धारे एक की टेका ॥

एक की टेक धार मन अपने, अन्तर मुख को लावे।।

सुरत शब्द साधन तब सीखे, घट में वृति जमावे।।

भौं के बीच में आसन मारे, तिल तीसरा खुलाचे।।

निरखं सहस कमलदल लीला, घंटा शंख बजावे।

त्रिकुटी गढ़ ओम्कार का दर्शन, गुरु गम ओम की बानी।

बाजे मन्त्र प्रणव का सुमिरन, तीन गुणों की खानी।।

सुन्न शिखर ब्रह्मरेन्द्र की चोटी, मानसरोवर थाना।

हंस गति रंग धुन सुनना, क्षीर नीर बिलगाना ॥

सहज सहज में सहज वृत्ति हो, सहज सहज हो जाई।।

सहज समाध सहज गति साधी, सहज में सहज समाई।

आगे चली सुरत मतवाली, भंवर सोहंगम घाटी।

माया काल की निरख परख कर, ठाठ सुठाठ ही ठाठी।।

सत पद जाय सत्त लख पाया, सत का बीन बजाया।

सत पद अलख अगम ठेराया, रूप रेख नहीं काया।

राधास्वामी अनाम अपारा, मध्य आदि और अन्ता।।

इस पद में कोई बिरला पहुंचे, साध हंस और सन्ता।।

(90) सजनी शील क्षमा चित्त धार ॥टेक।

जग में आई नर तन पाया, अवसर मिला अपार।

सुमिरन भजन ध्यान गुरु करले, जा भव जल के पार।।

सजनी0 प्रेम प्रीति के मारग पग धर, सब से प्रेम पियार।

तू तो तरी चरन लग गुरु के, तार दे कुल परिवार ॥

मीठे वचन बोल नित मुख से, मन रहे बुद्धि विचार।।

दृष्टि हो तिल के तिलपट में, साध परमारथं सार।

गुरु का नाम न भूले चित से, आठ पहर हुशियार।।

परमारथ का गुर है प्यारी, ऐसा कर व्यौहार ॥

आनन्द सुख का जीवन जैसा, दुख न हिये में धार।।

राधास्वामीदया संभल कर रहना, द्वेषभाव को टार ॥

(91) जगत का लेखा देख लिया ॥टेका।

असा बाँधी हुए निरासा, आसा लग पछताना।।

असा तृष्णा माया फाँसी, सोच समझ अब जाना ॥

जगत0 मुट्ठी बांधे सब आये हैं, मुट्ठीं बांधे जाना।

हाथी घोड़े माल खजाने, संग नहीं ले जाना।।

एक लख पूत सवा लख नाती, रावन गया अकेला।।

राम गये सीता गई रानी, यह सब काल का खेला ॥

मान बड़ाई राज दुहाई, किसी के काम न आई।।

दो दिन के सब खेल तमाशे, अन्त मांटी मिल जाई।।

,, राधास्वामी दीन दयाला, तुम हो सदा सहाई।।

ऐसी कृपा करो मेरे दाता, माया न हो दुखदाई।।

(92) प्रेम बिना बेकाम स्वाँग सब, करम धरम का ॥टेका।

प्रेम भाव की महिमा भारी, भेष धरे कोई कैसा।।

घर बन परबत एक समान हों, रहे जैसे को तैसा।।

प्रेम0 प्रेम पियाला जो जन पीवे, सीस दान में देवे।।

तन मन सीस जो अरपे नाहीं, रस नहीं प्रेम का पीवे ॥

प्रेम प्रेम प्रेम सब कहते डोले, प्रेम का सार न जाने।

बिना प्रेम के सब पात्रंड है, क्यों प्रीतम पहचानें।

प्रेम राधास्वामी सतगुरु दाता, प्रेम का राग सुनाया।

चरन कमल में झुके तो हम भी, प्रेम दात में पाया।प्रेम

(93)माई झूठा जग व्यौहार ।।टेक।।

 बालक हाथ से पकड़न दौड़ा, देख अपनी परछाँई।।

परछाँई तो हाथ न आई, व्याकुल चित चिल्लाई।।

माई0 यह जंग मिथ्या रैन का सपना, सपना चित नहीं दीजे।।

सांचा नाम गुरु का भाई, गुरु शरनागत लीजे ॥

माई0 चार दिना के संगी साथी, कुल कुटुम्ब परिवारा।।

अन्त समय कोई काम न आवे, सब न्यारे का न्यारा ॥

माई0 देह प्रान के संग रहत है, छिन भर छोड़े नाहीं।

मौत नगाड़ा जिस दिन बाजे, देह प्रान बिलगाहीं ॥

माई0 सांस सांस जप नाम गुरु का, सांस का नहीं भरोसा।

राधास्वामी चरन प्रेम से गहले, फिर नहीं कुछ अफसोसा। माई0

(94)साधु मन में करो विचारा ॥टेक॥

मन बच कर्म धर्म शुभ करनी, नासो मूल विकारा।

फिर नहीं व्यारे कष्ट कलेसा, सहज ही हो छुटकारा।।साधु0

हिये का बरतन मांज के भाई, भरलो अमृत सारा।

अमृत सार नाम है गुरु का, नाम का लेओ सहारा ॥

साधु0 घट का घाट बदल दो प्यारे, अवघट गहो किनारा।।

त्यागो भव दुरमति की दुर्गति, गहो चरन आधारा ॥

जनम जनम के करम कमाये, सिर पर धारा भारा।।

हलका बोझ शब्द से होगा, घट में बजे दुतारा।।

राधास्वामी दया निरख अन्तर में, मौज में करो गुजारा।।

दुख आपति आपहि सब भागे, अन्तर सुख का नजारा ॥

(95) साधु भेद बतादो घट का टेका।

घट की लीला समझ न आवे, रहे जिया में खटका।

खटका बस खटके में अटके, चोट सहे अवचट का ॥

साधु0 घट में अटपट घट में खटपट, घट का लागे झटका।।

झटके से संशय मन जागे, मन रहे अधर में अटका।।

अटका झूले मोह हिंडोले, नहीं वह तट का पट का।

भोग रोग और सोग में लम्पट, भरम मोह का मटका।।

दया करो अज्ञान मिटाओ, देदो सहज सा लटका ।।

लटका पाय द्वन्द सब भागे, खेल खिलाओ नट का।।

 परदा खुले मौज से अबकी, हिया जिया के तिलपट का।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब न फिरू जग भटका ॥

(96) सतगुरु भेद बताया न्यारा ।।टेक।।

 काम क्रोध मद मोह विसारा, प्रेम का किया विस्तारा।

रूप अरूप की गम कुछ पाई, मन मंसा को मारा ॥

सतगुरु0 सत की संगत सत सुध पाई, सत का भया निरवार।

अब नहीं काम असत से हमको, गुरु का मिला सहारा।

काम को समझा धरम को समझा, मेटा हिये का विकारा।

गुरु की दया से अब लख पाया, अर्थ तत्व का सारा।।

सतगुरु बिन सतसंग विवेक न सूझे, संगत गुरु दरबारा।

ज्ञान गुरु के रहे सहारे, गुरु मत अगम अपारा।।

राधास्वामी जग में आये, धार सन्त अवतारा।

‘शालिगराम’ ने अलख लखाया, खोला मर्म का द्वारा ॥

(97) साधु सतगुरु भेद बताया ।।टेक।।

 धर्म अर्थ और काम मोक्ष का, सार मर्म प्रगटाया।

जड़ चेतन की ग्रंथी खोली, तत्व का तत्व सुझाया।

साधु0 दुबिधा भागी दुर्मति त्यागी, भव भय भरम मिटाया।

अब नहीं संशय मोहि सतावे, भ्रान्ती बीज नसाया।

आसा लग मद लोभ मोह में, अपना रूप भुलाया।

सत संगत में समझ बूझ भई, आप में आपा पाया ॥

बीज में अंकुर अंकुर डाली, डाली फूल खिलाया।

फूल से फल का रूप दिखाया, फल में बीज लखाया ॥

काल चक्र सृष्टि और प्रलय, जो भूला भरमाया।।

राधास्वामी सतगुरु बन कर, निज स्वरूप समझाया।।

(98)साई भवनिधि के पार लगा ॥टेका।

अगम अपार जगत का सागर, डूबे अवगुनी और गुन अगर।

तोड़े सकल चतुर नर नागर, पाया कष्ट महा।।

साई0 रात अंधेरी पंथ न सूझे, डगमग नाव लहर से जूझे।

कोई अपना दुख नहीं बुझे, खेवटिया तू कहां रहा ॥

साई0 पवन बहे चहुँ दिस झक झोरी, भंवर करे बहु जोरा जोरी ।

चाहत है नय्या मोरी बारी, अब तो मन में धारा।।

साधु0 बेड़ा आन पड़ा मंझधारा, नजर न आवे हाय किनारा।।

रहा किसी का नाहिं सहारा, साहेब मेरे तेरे सिवा।

औरन को तारा बरयारी, अब क्यों देर हमारी बारी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, डूबत को ले आज बचा।।

(99) बांह गहो मेरी नाथ सँभारो ॥टेक।।

 जो मैं दीन अधीन दया निधि, मेरी ओर निहारो।

तुम बिन और न दूजा जानू, मेरा करो निस्तारो ॥

बांह0 दीनदयाल परम हितकारी, दाता नाम तुम्हारो।

राखो लाज काज करो स्वामी, अब की बेर उधारो ॥

बांह0 धर्म न भक्ति भाव नहीं साधन, नहीं कुछ ज्ञान बिचारो।।

पतित कुटिल क्रोधी अति कामी, मन में भरा होकारो ॥

बांह0 माया लोभ मोह बहु तृष्णा, मेरा जनम बिगारो।।

किस विधि बिनती करू प्रभु तुम्हारी, बिगड़ी सकल सुधारो ।।बांह0

तुम समरथ तुम हो दुख भंजन, तुम सब के रखबारो।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आज अधम को तारो।।बांह0

(100) मेरे दाता दीन दयाल ॥टेका।

तू करुणा मय जगत आधारा, तू सब का है प्रतिपाला।।

तू स्वामी हम सेवक तेरे, नहीं है अब कोई रखवारा ॥

मेरे0 तू दुख भंजन जन मन रंजन, काट भरम यह जंजाला।

मात पिता तू हित सम्बन्धी, मैं तेरा बाल गोपाला।।

तू अथाह सागर है स्वामी, जीव नदी है और नाला।।

अन्धकार में बहु दुख पाया, करदे आज उजाला ।।।

तूने पाला तूने पोसा, छिन छिन तूने संभाला ।।

दीनबन्धु रक्षा कर मेरी, पड़ा है करमन से पाला।मेरे0

ना बल पौरुष ना मेरे बुद्धि, कठिन है काल कराला।।

बल दे करू भक्ति तेरी निश दिन, फेरू नाम की मैं माला।।

मेरे तीन ताप मोहि अधिक सतावे, नाम से करदे सुखाला।।

केसे दरसे परस करू तेरा, हिये में लगा है मेरे ताला ॥

मेरे दे दे दे अब देर न कर तू , अमृत नाम रसाला ।।

आपको विसरू जग को भुलाऊँ, पीलू प्रेम पियाला।

मेरे मांगू मान न मांगू सम्पत, चाहूँ न घोड़ न घुड़शाला।।

राधास्वामी समरथ सतगुरु दाता, करदे मोहि निहाला ॥

मेरे

(101)अब मैं गुरु से नेह लगाऊ ॥टेक।

करू हाथ से गुरु की सेवा, सतसंग चल कर जाऊँ।

जिभ्या से गुरु नाम का सुमिरन, वृति हिये में बसाऊँ।

अब मैं0 घट में दरस परस सतगुरु को, घट में तारी लगाऊँ।

घट में भजन ध्यान निस बासर, घट में ज्योति जगाऊँ।

,, करू आरती घट हित चित से, मंगल साज सजाऊँ।

स्तुति करू उमंग प्रेम से, राग सुहावन गाऊँ।

, आंख कान जिभ्या रस त्यागू, अमी भोग नित खाऊँ।

बाहर के पट देकर सजनी, अन्तर के खुलवाऊँ ॥

गुरु का रूप लगे अति प्यारा, देख न पलक झपाऊँ।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु को आज रिझाऊँ।

(102) | मुझे प्रेम की डगर दिखादो जी ॥टेक।।

रात अधेरी पन्थ न सूझे, हाथ पकड़ कर बतादो जी।

जिया घबरावे हिया अकुलाये, दिल का दर्द मिटा दो जी।।

मुझे0 पीर विरह की कलेजे साले, मेरे पिया से मिलादो जी ।

निस दिन तड़पू निस दिन तरसू, प्रेम नगर पहुँचा दो जो ॥

मुझे0 भूख प्यास दुख अधिक सतावे, अमृत डार हिलादो जी।

फल मीठे मोहि मिलें दया से, बूद अमी की पिलादो जी।।

हाय हाय पिय केहि विधि पाऊँ, कोई यतन जतादो जी।।

व्याकुल हो चहुँदिस मैं भटकी, भूल भरम को घटादो जी ॥।

पिया का बोल सुहावन लागे, अनहद तूर बजा दो जी।।

चिरहन देत संदेसा अपना, मेरे पिया को सुना दो जी ॥

अखियन नीर बहे जल धारा, बिरह की आग बुझादो जी।।

घर की हुई न राह बाट की, हिया कष्ट हटा दो जी।।

आसा तृष्णा बहु विधि मेटो, धुर पद आके लेखा दो जी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, यम का जाल कटादो जी।।

(103) मुझे प्रेम का पियाला पिलादो जी ॥टेक।।

 हिय उमगे जिया सुख रस भोगे, कष्ट कलेश भुलादो जी।।

भेद अभेद को चित नहीं लावे, निज मतवाला बनादो जी ।।मुझे0

तन मन धन सब गुरु पद अरपन, सीस से चरन लगादो जी।

शब्द रसीले राग रंगीले, अनहद तूर बजादो जी।।

रूर अरूप लखे वट भीतर, हिया का परदा हटादो जी।।

प्रीतम प्यारे 1 बलबल जाऊँ, अमी का घुट दिलादो जी ॥

कँवल खिले अमृत झर लागे, संशय का भूत भगादो जी।।

अभय दान दो निर्भय करदो, भक्ति का पंथ दिखादो जी।।

झूम झूम गिरे उठ उठ धावे, अचरज नाच नचादो जी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आंखों में सरस पिलादो जी ।।,,

(104) मुझे प्रेम के पेंग झुला दो जी ॥टेक।

भक्ति भाव का पड़ा है हिंडोला, आकर मुझको बिठादो जी ।

अचरज बानी गीत सुहानी, मंगल खानी खुलादो जी ।।मुझे0

बरखा ऋतु बरसे जल रिम झिम, प्रेम की धार बहादो जी।

तन मन भीगे अग्नी विरह की, अपनी दया से बुझादो जी।।

सोया मनुआ अचेत पड़ा है, हाथ पकड़ के जगादो जी।।

रात दिवस गुरु ध्यान लगावे, ऐसी सूझ सुझादो जी ॥

, दादुर मोर पपीहा बोलें, अद्भुत शोर मचादो जी।

सखी सहेली हिल मिल गाउँ, प्रीत की रीत चलादो जी ।।11 पचरंग चुनरी सुहागिन राग की, सुरत निरत को उड़ादो जी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, निज महिमा समझादो जी ॥,

(105) चरन शरन की छाया दीजे, चरन शरन की छाया ॥टेक।।

 मैं तो दीन अधीन दयामय, मोह जाल लपटाया।।

तुम प्रभु जीव उबारन आये, कीजे पतित पर दाया ।।

दीजे चरन दुविधा संशय छल चतुराई, भूल भरम भरमाया।

भोग सोग में निस दिन रहता, व्यापा काम मद माया।।

दीजे0 अगम अगोचर रूप तुम्हारा, कोई भेद न पाया।

मैं अजान कुछ मर्म न जानू, महिमा क्या कहूँ गाया।

दीजे0 मुझ सम पापी और न कोई, मन बच कर्म और काया।

नाम दान की ऋद्धि निधि दे, भिक्षा माँगन आया।

दीजे0 ज्ञान ध्यान भक्ति गुरु सेवा, श्रुति स्मृति बहु गाया।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने आन चिताया।।

106)मेरेघट का मन्दिर खुल गया ।।टेक।।

गुरु मूरत का दर्शन पाया, जग मग ज्योति जगाया ।।

आरती साजी प्रेम भक्ति की, उमगा मन हरखाया।।मेरे0

ॐघंटा शंख बजे मन्दिर में, धुन मृदंग की गाजी।।

बीन बांसुरी बजे सरंगी, सुन सूरत हुई राजी ॥मेरे0

या मुरत की महिमा भारी, उपमा कही न जावे।।

चाँद सूरज की चौरी लेकर, प्रीत के हाथ डुलावे।।

मेरे0 शेष सहस मुख अस्तुति गावे, ब्रह्मा वेद सुनावे।।

शिव के हाथ में डमरू सोहे, विष्णु शंख बजावे ॥

मेरे0 रोम रोम में प्रगटे देवा, शारद इन्द्र धनेशा।।

कहीं कमला कहीं दुर्गा नाचे, गावे शब्द गनेशा।।

मेरे0 गुरु के चरन निरंजन बासा, हृदय ब्रह्म निवासा।।

परब्रह्म छबि अद्भुत शोभा, सोहंग करे उजासा ॥

मेरे0 सत्त पुरुष लख अलख को देखा, अगम का किया परेखा।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिटगया यम का लेखा ।।मेरे0

(107) पाया पद निरदान साधु, पाया पद निरवान ।।टेक।

नहीं वह करम न भक्ति भाव कुछ, नहीं वह सूखा ज्ञान।

गुरु की दया से लखी गुरु मूरति, घट में सब दरसान।।

पाया0 बजत बांसुरी बीन चिकारा, सुन सुन मन हरषान।।

झलकत झिलमिली चमकत बिजली, माया काल पछतान ॥

अगम पन्थ में अगम विराजा, अगम में मिला ठिकान।।

ऊँचे चढ़ सुरत भई मतवाली, लिया प्रीतम पहचान ॥

? जहां जहां चलू वहीं मेरा तीरथ, जो जो करू सो ध्यान।

जाग्रत स्वप्न एक सम लेखू, खुले नैन विज्ञान।।

बन परवत घर भीतर बाहर, जंगल और मैदान।।

जहां जहां देखें अद्भुत लीला, क्योंकर करू बखान ॥

फल में बास मेंहदी में लाली, जीव जन्तु में प्रान।।

चकमक मध्ये आग दिखाई, अलख ज्योति झलकान।।

कहां के योग कहां के जप तप, कहां के संयम ध्यान।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिटगया मन का मान ॥

पाया0

(108) गुरु ने आन छुड़ाया साधु, गुरु ने आन छुड़ाया ॥टेक।।

माया काल की बड़ी जेवरी, बन्धन बांध बंधाया।

गुरु की दया से बन्धन छूटा, यम का फांस कटायो।

गुरु0 भव की नदी अथाह भई है, डूब गया जो आया।

गुरु की कृपा शब्द का बेड़ा, भाग जगे तब पाया।

एक आस विश्वास गुरु को, गुरु ने पार लगाया।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु गुन चित से गाया ॥

(109)| साधुसतगुरु मर्म जताया ।।टेका।।

आसन मारा घट के भीतर, कहीं गया नहीं आया।

हाथ पांव को कौन हिलाबे, सहज में योग कमाया।।

साधु0 पिंगला बनकर परबत लांघे, ब्रह्म सिखर चढ़ आया।

गू गा बहु विधि बानी बोले, अनहद नाद बजाया ।।।

बिन कर कर्म करू मैं सब विधि, बिन पद पन्थ में आया।

बिन जिभ्या रस स्वाद लेत हूँ, सतगुरु कीनी दाया।

जहां मन जाये लगे तहां उन्मन, सुन्न समाध रचाया ।’

भंवर गुफा की दुर्गम घाटी, तोड़ सत पद पाया।

भव दुख से नहीं रहूँ दुखारी, गुरु पूरे का आज्ञाकारी।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति साज सजाया।।

(110) मनसा मन से निकली साधु, मनसा मन से निकली ॥टेक।

मनसा मन से वैसे ही प्रगटी, ज्यों बादल में बिजली।।

मकर तार गति उसको जानो, वह नकली नहीं असली।।साधु0

आदि अन्त में ठौर ठिकाना, झूठ अवस्था बिचली।

बिचली दशा जो चित नहीं व्यापे, मन नहीं आवे विकली ॥

साधु0 रेशम का कीड़ा अज्ञानी, गले फन्द की हंसली।।

छोड़े तार मुक्ति गति पाये, ज्यों भुजंग निज कचली।।

सोच समझ मूढ़ अविवेकी, बातें अगली पिछली।।

हृदय विवेक भाव जब प्रगटे, यम नहीं तोड़े पसली।

” राधास्वामी गुरु की दया भई जब, सुरत निरवानी पद ली।।

बंध मुक्ति का संशय छूटा, अब तो अवस्था बदली।

(111) अब मोहे समझ पड़ी गुरु बानी ।।टेक।

गुरु बानी है ज्ञान की खानी, गुरु बानी सहदानी।।

गुरु बानी है मंगल दानी, सूझे पद निरवानी।

अब0 बानी में है शक्ति अनूपम, कोई कोई बिरला जानी।।

इस बानी की महिमा न्यारी, बानी अगम निशानी।

अब0 निराकार साकार है बानी, आवागवन मिटानी ।।

जो कोई बानी सार पिंछाने, पड़े न भव की खानी।

अब0 गुरुमुख बानी सहज सिंयानी, सुन सुन कर मन मानी।

बानी तो भव दुख सब नासे, बख्शे ठौर ठिकानी।।

अब0 साध की संगत गुरु की सेवा, आय मिले जब प्रानी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगये ज्ञानी ध्यानी।

अब0

(112)बल बल जाऊँ गुरु उपकार ।।टेक।।

 मानुष रूप धरा सतगुरु ने, जीव उबारन हार।

तिनकी कृपा अविद्या नासे, घट में भानु उजार ॥

बल बल0 मोह मया में लम्पट निस दिन, सूझे वार न पार।

कहीं दारा सुत आन फंसाने, कहीं कुल कहीं परिवार ।

सोतो भरम मिटा छिन पल में, जब मिले गुरु दातार।

राधास्वामी चरन शरन चलिहारी, छूटा यम का द्वार।

बल बल0

(113)साधु तान सुनो धुन पूरे का ॥टेक।।

 मन मन्दिर में आन बिराजो, शोर मचा तंबूरे का।।

बाजत बीन मृदंग बांसुरी, राग रंग घट स्वरे का।

साधु0 सुन सुन सुन मन अति हरषाया, छोड़ समाज अधूरे का।

रंग जमा अखियां मतवारी, ध्यान न भंग धतूरे का।।

साधु0 घट में नाचत सुरत अप्सरा, सुन धुन अन्तर तूरे का।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,बल पाया गुरु पूरे का ।

(114)गुरु प्रेम का रंग जमा दो जी ॥टेक।।

 संग किया चरनों में पड़ी, निहसंग को संग लगा दो जी।।

मेरा संगी साथी कोई नहीं, निज संग की महिमा दिखादो जी ॥गुरु0

जब जप तप तीरथ बरत तजे, तब अपना स्वरूप दिखादो जी।।

कुल लाज मिटी परिवार छुटा, भक्ति का साज सजादो जी ।।गुरु0

नही ज्ञान न ध्यान न सेवा यतन, बिगड़ी हुई बात बनादो जी।।

राधास्वामी अब कर दया की नजर, भवजाल से आन छुड़ादो जी ॥’

(115)साधु मन की सूझ सुझाओ ।टेक।।

 मन को सोधो मन परवोधो, मन ही लगाम लगाओ।

मन की दुविधा दूर निकारो, चंचल मन ठेराओ।

साधु0 मन की खटपट सकल मिटाओ, उलझा मन सुलझाओ।।

मन है अटपट मन है लटपट, झटपट मन बिलगाओ ॥

साधु0 शुम संकल्प की राह बाट में, मन का घोड़ा कुदाओ।

गह रुकाना गुरु से पूछो मन की चाल न जाओ।।साधु0

प्रथम सहसदल कमल निहारो, दूजे त्रिकुटी धाओ।

तीजे सुन्न महासुन्न निरखो, भंवर में बंसी बजाओ।।

साधु0 सत्य लोक चढ़ सुनो बीन धुन, मंगल साज सजाओ।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अजर अमर पद पाओ ॥साधु0

(116)छोड़ो मन के ताना बाना ।।टेका।।

जब लग दुविधा बसे हिये में, तब लग नर दीवाने।

जो इस दुविधा को तज भागे, सो हैं चतुर सियाने ॥

छोड़ो0 अपने भाव आप सब भूले, फिरते हैं। भरमाने।।

दोष लगावे सृष्टि कर्म को, सार भेद नहीं जाने।।

मन के खट पट उमर गंवाई, मन की गति न पिछाने।

छल बल कपट सियानत झूठे, इसकी फांस फंसाने।

बीन शब्द में झूमत डोले, ज्यों भुजंग लहराने।

तैसे माया ममता में सब, अधम रहें लपटाने।।

 मनो राज की अटपट लीला, क्या कोई बरन बखाने।

राधास्वामी मेहर बिना यह प्रानी, यम के हाथ बिकाने।

(117) मन तू सोच समझ पग धार ॥टेका।

बिन समझे कोई सार न पावे, भटके बारम्बार।।

संशय दुविधा और चतुराई, यह अज्ञान बिकार।

मन तू0 कोई नर पशु है कोई तिरिया पशु, गुरु पशु कोई गवार।।

वेद पशु है सब संसारा, बिना विवेक विचार ॥

माया पशु माया का बंधुआ, मुक्ति पशु स्वीकार।।

भक्ति पशु बन्धन नहीं काटे, बूड़ा काली धार ॥

ज्ञान पशु की क्या करू निन्दा, वह ग्रथन के लार।।

जड़ चेतन के गाँठ न खोले, उरझ उरझ रही हार ॥

योग पशु बँधे योग की रसरी, बैठे आसन मार।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवकं हुआ भवपार ।मन तू0

(118) साधू छोड़ो भरम कहानी ॥टेक॥

सोच समझ कुछ मन में अपने, पाओ मरम निशानी।

विन सोचे नहीं सार की सुध बुध, मिटे न आना जानी ॥साधू0

कथा सुने बहु ध्यान लगाया, बिन विवेक अज्ञानी।।

बगला भक्त की कौन बड़ाई, जो सत नहीं पहचानी।।

कोई सिद्धि कोई शक्ति में भूले, कोई मन फांस फँसानी।

क्या होवे नर भेस बनाये, भेस भरम की खानी।।

वाद विवाद से क्या फल पाया, दिन दिन अवधि सिरानी।

निज अनुभव से काम न जिसको, वह तो निपट अभिमानी।।

कर सतसंग विवेक राख चित, तब मिटे द्वन्द गलानी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पद परसा मन बानी ॥

(119) नाम प्रताप सुरत मेरी जागी ॥टेक।।

दुख सुख एक समान भये हैं, भक्ति अमीरस पागी।

चाह मिटी चिता गई चित से, सहज बनी वैरागी।।

नाम0 सोबत जागत कबहुँ न विसरू, मन चरनन रहे लागी ।

आप अचेत नहीं सुरत सचेती, भव दारुन तज भागी।

निर्मल बिमल अमले मगनानी, रहत सदा अनुरागी ।

यह तो गुन कोई विरला समझे, साध विवेकी त्यागी ॥

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अचल वर मांगी।

गुरु के पद सरोज में निस दिन, मेरी लव रहे लागी।

| 120)सतगुरु ने पार लगाया ॥टेक।

मैंने तेरो चरन गहा है, तूने बांह गही।

मेरी लाज तुझे है साई, सच्ची बात कही।।

सतगुरु : मैं अपराधी जनम जनम का, तू तो तारन हारा।।

भव जल में नहीं डुबु गा मैं, तू करदेगा पारा।।

रात दिवस तेरा है ध्याना, तेरे सिवा न दूजा।।

तेरा सुमिरन तेरा भजन है, तेरी ही गुरु पूजा।

सब में तेरा रूप है व्यापा, जड़ चेतन में साई।।

ब्रह्म में छाया तेरी निरखी, माया में रही झांई।

 सुरत शब्द की करू कमाई, ज्ञान ध्यान निधि पाऊ।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हरख हरख गुन गाऊँ।

| 121)अरे मन भूला रे भूला ॥टेका।

शीश महल बिच पड़ा स्वान ज्यों, देखी निज परछाई।

भोंक भोंक कर प्रान तजो है, अपनी राम कुछ नाहीं।।

अरे0 छाया देख डरा ज्यों बालक, समझ न ताको आई।।

मात पिता सब दुखित भये हैं, क्या गति बरनू भाई ॥

अरे मुट्ठी बँधे बेर को निरखा, हाथ डाल ताहि पकड़ा ।।

खुले न हाथ विवश भया बानर, भरम करम में जकड़ा ॥

अरे रस्सी बीच सांप दरसाना, भय वश बुद्धि हराई।।

भरम फाँस में यू जीव भरमा, भरमे ऋषि मुनिज्ञानी ॥

अरे हैंठ मध्य ज्यों भूत दिखाया, रोग सोग उपजाया।।

चतुर बैद्य सब औषधि लाये, मूरख प्रान गंवाया।।

अरे चरखी ऊपर चढ़ा सुचना, अधर में निसदिन झूला।।

केहि विधि वाको हो छुटकारा, सहे काल का स्वला।।अरे

झूठा जग झूठा व्यौहारा, झूठी है सब माया।

राधास्वामी चरन शरन ले प्रानी, क्यों माया भरमाया।।अरे0

(122) इस घट का मन्दिर देखा ॥टेक।।

इस मन्दिर में दस दरवाजे, एक एक से भारी।

झिलमिल ज्योत जगे छिन पलपल, निरखत लागे तारी।

इस0 घट में काशी घट में द्वारका, घट हरद्वार की माया।

घट में मथुरा घट में पुरी है, घट सुमेर की छाया।

इस घट में मानसरोवर निरखा, निरख किया अस्नाना।

अमल विमल निर्मल भयो हंसा, उपजा सत मत ज्ञाना।।

इस ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, जब गुरु ध्यान लगाया।।

माया ममता सकल बिनासी, सुन्न समधि रचाया।

इस नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, जप तप भरम विकारा।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट लख मिटा संसारा।इस

(123)इस घट का मन्दिर सूना है ॥टेक।।

गुरु मूरति पधराई नाहीं, घंटा शंख न बाजे।

जगमग ज्योत दृष्टि नहीं आवे, अनहद नाद न गाजे।

इस0 किसकी आरति किसकी सेवा, पूजा किसकी धारू।

किस विधि किसका ध्यान लगाऊँ, किसके बल मन मारू ॥

भाव फूल की माला बनी है, किसके गले पहनाऊ।।

किसे सुनाऊँ किसे रिझाऊँ, किसकी अस्तुति गाऊँ ॥

चरनामृत की प्यास है चित में, भूक प्रसाद की बाढ़ी।।

भोग लगे किस विध मूरति का, सोच फिकर मोहि गाढ़ी।।

सुमिरन भजन ध्यान सब निष्फल, जब गुरु चित्त न आवे।।

राधास्वामी मेहर करें जब जन पर, तब मेरी वन आवे।

(124) मनुआ बहुत किया अन्धेर ॥टेका।

कहां जाऊँ आनन्द सुख पाऊँ, शान्ती सावधान चितलाऊँ।

गुरु गुन मनन भाव नित गाऊँ, तू है बड़ा भट भेर।।

मनुआ0 कहत न माने झगड़ा ठाने, सत और असत नहीं पहचाने।

अनुचित उचित सभी नहीं जाने, डाले हेरा फेरा।

मनुआ क्रोध की अग्नी प्रचंड चलावे, द्वेष ईर्षा डाह मचावे ।।

आप जले और मुझे जलावे, चारों दशा को घेर ॥

मनुआ जीतेजी दिया नरक में बासा, सबको दिखाये मेरा तमाशा।।

बुद्धि ज्ञान सभी तुम नासा, ढीट कुबुद्धि दिलेर ॥

मनुआ हाय उपाय नहीं कोई सूझे, मनुआ सत मत सार न बुझे।

बिना प्रयोजन सब से जूझे, झगड़ा लड़ाई हेर ॥

मनुआ अशुभ विचार अशुभ मुख बानी, कामी लोभी लम्पट मानी।

तू क्यों ऐसा बना अज्ञानी, करम बोझ सिर ढेर ॥

मनुआ बैरी मनुआ अब तो मानजी, कुछ प्रतीत प्रीत घट मेला।

सीधे सच्चे मारग में आ, राधास्वामी राधास्वामी टेर।

मनुआ

(125) मन मूरख क्यों तु सोच करे ॥टेका।

शून्य 6स से सब कुछ प्रगटा, शून्य लौट कर जाई।

माया का प्रपंच है ऐसा, देखत थिर न रहाई ॥

मन0 आये हैं सो जायंगे एक दिन, जाना निससन्देह।।

दो दिन की लीला है जग की, अन्त में सब कुछ खह।।

मन बीज से वृक्ष वृक्ष से डाली, फूल पात सब आये।।

उलट पलट कर बीज बने सोई, भरमे भरम रहाये।

मन अणु परमाणु सिमिट सिमिट कर, बड़े रूप को धारा।।

काल की चक्की पिसते पिस कर, सब वही अनु विस्तारा।।मन

राधास्वामी की संगत कर, तज आपा मद माना।

मानुष जनम का सार प्राप्त कर, पाकर सतगुरु ज्ञाना।।मन0

(126)| मनुआ चित से कर सतसंग ॥टेक।

चंचलता तज होजा निश्चल, छोड़ दे चित की पुरानी हलचल।।

क्यों फसता है माया के दलदल, धार गुरु का रंग ॥

मनुआ0 सुमिरन नाम का साँससाँस हो, ध्यान में गुरु की मूरति पास हो।

भजन में आनन्द हर्ष हुलास हो, ऐसा सीख ले ढंग।।

मनुआ0 सहस कमल तज त्रिकुटी आजा, सुन्न में सहज समाध रचाजा।।

तीन सुन्न के आगे आजा, सुन सतगुरु प्रसंग ॥

मनु0 राधास्वामी दया से काज बनाले, क्यों पड़ता है काल के पाले।

दया गुरु की दया सदा ले, पीले प्रेम की भंग ॥मनु0

(127)प्रेमिन चल सतगुरु दरबार ।।टेक।।

 जग में कलह कलेश महाना, दुखिया सब संसार।

सत संगत के बचन प्रेम के, हृदय सदा विचार।।

प्रेमिन0 कथनी तज करनी चित देना, रहनी का व्यौहार।।

सुमिरन भजन ध्यान की किरिया, करले अपना सुधार ॥

प्रेमिन0 नर जीवन निष्फल नहीं जावे, टेक इष्ट की धार।

राधास्वामी तेरे सहाई, करेंगे भव से पार।।प्रेमिन0

(128) ज्ञानी समझ बूझ कथ ज्ञान ॥टेक॥

ब्रह्म बना तो क्या हुआ, ब्रह्म न जाना जान।

बिन जाने क्या लाभ है, जान से हो पहचान ॥

ज्ञानी0 ब्राकार जो वृत्ति नहीं, ज्ञान से होगी हान।।

जीव ब्रह्म को ले परख, अपने निज अनुमान।।

अपनी आंखों देख सब, कही सुनी मत मान।

कही सुनी जुग जुग चले, आवागवन बंधान ॥

ज्ञानी0 गुरु सतसंग में जाय कर, वचनामृत का पान।

पानी पीछे तू पिये, पहले उसको छान ॥

कथनी तज करनी सहित, करनी सबकी जान।।

राधास्वामी की दया, गुरु मत है परमान।।

(129)चंचलमन तत्व को समझ गया ॥टेका।

काम क्रोध मद लोभ के बस हो, आप ही बना दुखारी।।

पांचों के जब संग को त्यागा, तब वह बना सुखारी।।

चंचल0 दुर्मति दुचिता दुविधा तज दे, दुख कलेश की खानी ।

आपही आप हटे जब यह सब, भया गुरु अभिमानी।।

द्वष दृष्टि और डाह ईर्षा, नित उसको भरमाते ।।

जव गुरु चरनन बासा पाया, अब कोई निकट न आते।।

पहले जब था काग दशा में, हिंसक जीवन घाती।।

हंस भयो मोती चुन खाता, लहे आनन्द दिन राती ॥

हठ को त्याग हठधरमी त्यागी, पक्षपात को त्यागा।

सबको आय में आपको सब में, निरख के भया सुभागा।।

 बन्धन काटे काल माया के, कटी कर्म की फांसी।

जीवन मुक्त दशा में बरते, भजे गुरु अधिनासी।।

राधास्वामी की संगत पाई, संगत का फल पाया।

कमल नीर की रहनी सोहे, मन विचार हरषाया।।

(130) कर तू मोर न तोर मनुआ ॥टेका।।

मोर तोर है रसरी भारी, उससे बँधे सकल संसारी।।

कोई विकारी कोई व्यभिचारी, कोई भक्ति के चूर।।मनुआ0

मोर तोर में करता धरता, अहंकार का रूप सो भरता।

त्रिविधि ताप में निसदिन जरता, दुख का ओर न छोर ॥

मनुआ0 मोर तोर तृष्णा की खानी, दुख कलेश आपति की निशानी।

यही है चार योनि की खानी, व्यापा काल घन घोर ॥

मोर तोर क्यों करे अभागी, क्या तू गहेगा किसको त्यागी।।

हो गुरु चरन प्रेम अनुरागी, गुरु हैं बंदी छोर ॥

मोर तोर में माया व्यापी, यह माया दुखदा संतापी।

इससे उपजे आपा तापी, जो राधास्वामी की ओर ॥

(131)बना रे अभिमानी मन अज्ञानी ।।टेक।।

 जड़ शरीर से बांधा नाता, काम क्रोध संग फिरे मदमाता।।

भव दुख से कभी चैन न पाता, भोगे नरक निदानी ॥

बना0 बिन कारन नित भरमत डोले, अनुचित बैना मुख से बोले।

धरन अकास की नाड़ी टटोले, भटक भटक भटकानी।

बना लोक लाज व्यौहार में लम्पट, सदा मचावे मिथ्या खटपट।

कभी करे अटपट कभी करे सटपट, सहे द्वन्द की गलानी ॥

बना चंचल मूढ़ निपट अविवेकी, नाशवान तन का बना टेकी।

बदी गहे धारे नहीं नेकी, भूला मन कर्म बानी ॥

बना राधास्वामी बनो सहाई, अब तो यह मन बड़ा दुखदाई।।

दया करो लो चरन लगाई, नाम दान दो दानी।।बना

(132)कहा नहीं माने मन अज्ञानी ॥टेक।।

 जग के मरुथल भूमि में आया, मृगतृष्णा की चाह उठाया।

प्यास न बुझी नीर नहीं पाया, भटक भटक भटकानी।।

कहा0 भूल भरम लग सत को त्यागी, असत वस्तु के पीछे लागा।

मोर तोर कर मरा अभागा, सार असार न जानी।।कर

माया छाया एक समाना, कहने को केवल नाम निशाना।

मिथ्या उनको करे अभिमाना, भ्रान्ती के फंद फैशानी।।

कहा हृदय छाज में धूल भराई, फटक पिछोड़े उड़ा उड़ जाई।

हाथ न उसके कुछ भी आई, मिथ्या करम कराई।कहा

आँख ने खोले बन रहा अन्धा, पड़ा जगत के गोरख धन्धा।

चौरासी को गले में फन्दा, योनि योनि भरमानी।।

कहा विषय भोग में आयु खोई, संगी साथी हुआ न कोई।

मरा जनम को अन्त में रोई, चेत न अब भी आनी।।

कहा राधास्वामी दीनबन्धु प्रतिपाला, तुम दयाल तुम सहज कृपाला।।

इस मन की अब करो संभाला, मेरा कहन न मानी।।

कहा

(133) काशी तीन लोक से न्यारी ॥टेक।।

काया नर शरीर है काशी, उत्तम मंगल कारी।

रज सत तम त्रयगुन त्रिपुर, मन जो बने त्रिपुरारी।

काशी0 पारवती परवत सम विरती, नन्दी आनन्द भारी।।

निर्मल गंग भक्ति की धारा, जाने कोई अधिकारी।।

,, गुरु पद रज की सहज बिभूती, ले तन सीस में धारी।।

रोग सोग जग के सब नासे, कबहुँ न होवे दुखारी।।

ओजस क्रान्ती ललाट की शोभा, चन्द्र समान उजारी।।

मुन्ड माल की चित्त सुमरनी, सुमिरे नाम अपारी ॥

), घट मन्दिर में ज्योत प्रकाशे, जगमग लिंगाकारी।।

सुरत अर्घ बन पात्र में राखे, शब्द स्वरूप विचारी ॥

डमरू मधुर सुहाना बाजे, सोई अनहद झनकारी।।

मुक्ति दायिनी काशी नगरी, राधास्वामी की बलिहारी।

(134)माया मेरे मन में समाई ॥टेक।।

 नहीं जानू तेरा रूप है कैसा, कहाँ से तू चल आई।

क्यों आई किसने तुझे भेजा, क्यों मुझे जाल फेसाई ॥

माया0 माया है छल बल चतुराई, माया मान बड़ाई।

जीव जन्तु सब बस में कीन्हे, मारे मुनि समुदाई।।

माया दुविधा दुर्मति द्वन्द पसारा, माया है दुचिताई।

अपनी बुधि अनुसार बखानू, सांचा भेद न पाई ॥

माया भागू तो पाछे लगी डोले, सन्मुख आँख दिखाई।

भय दिखलाचे भर्म भुलावे, आस भरोस दिलाई ॥

माया माया पर मेरा दाव चले नहीं, कोटिन करू उपाई।

हार हार गुरु चरन पड़ा तब, मिली राधास्वामी शरनाई।

माया

(135)साधु अद्भुत लीला देखी ।।टेक।।

 बंझा ने एक बालक जाया, गधे की सींग बजाई।

जिस जिसने सुनी सींग की धुन को,सुधबुध तन की गंवाई।

साधु0 चिउँटी उड़ असमान को धाई, गगन की तोल तुलाई।

पंख नहीं बिन पंख उड़ाई, कैसे कोई पतियाई।साधु

औंधा कुवाँ गगन थल पानी, पनिहारी उड़ धावे।

बिना जीभ मुख कंठ के नारी, राग सुहाना गावे।।साधु

ऋतु बसन्त चहुँ ओर में फूली, फूल अकास में फूले।

बिना खम्ब के गढ़ा हिंडोला, चांद सूरज दोऊ भूले।

साधु विन जल बरसत मेघ अखंडो, नहीं मीठा नहीं खारी।।

बिना नैन के मोती पोहे, अन्धी आंख की नारी ॥

साधु पिंगला बन और परवत लांघे, चढ़ा सुमेरु कैलासा।।

गंगा मधुरी बात सुनावे, उपजे हर्ष हुलासा ॥साधु

यह लीला आंखों से देखी, कैसे बरन सुनाऊँ।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देखी काह दिखाऊँ।साधु0

(136) नटनी नाचे नाच अपार ॥टेक॥

नगर में नाचे बन में नाचे, नाचे खोह पहार।

भीतर बाहर नाच रचा है, नाच का वार न पार ॥

नटनी0 तीरथ नाचे पत्थर पानी, बरत नाच फलहार।।

धर्म में नाचे पक्षपात बन, ज्ञान में तर्क बिचार ॥

भुजा छाप गले तुलसी की माला, तिलक ललाट मॅझार।।

संयम में पखंड आचारा, परमारथ हंकार।।

नट भयो गुप्त प्रगट जग नटनी, व्याप रही संसार।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, माया का भेद अपार।।

(137) | तारा तारा तरा और तारा ॥टेक॥

आप तरा औरों को तारा, तारा कुल परिवार।

भव के दुख सागर से लाया, जनम की नौका किनारा।

तारा0 आलस तज निद्रा को त्यागा, छोड़ा भर्म अहंकारा।

खींच लगाया तट पर सहज ही, नाव जो थी मॅझधारा ॥

प्रेम प्रतीत प्रीति घट छाई, पहुँची गुरु दरबारा।।

राधास्वामी गुरु ने अङ्ग लगाया, बख्शा अपना सहारा।

(138)चित ने चित्र विचित्र बनाया ।।टेक।।

 आंख कान मुख बन्द लगाया, विरती धार उलटाई।।

सहसकमलदल चढ़ त्रिकुटी गढ़, गुरु का चित्र खिंचाई।

चित ने0 चित्र देख कर सूरत मोही, मुख नहीं आवे बानी।।

ओम ओम कह भाव बताया, अन्त में हुआ निरबानी ॥

परिचय भिला हर्ष घट आया, सोया अनुभव जागा।

गुरु मूरत का दर्शन पाकर, बड़ा प्रेम अनुराग ॥

चित ने0 बाहर गुरु भीतर मेरे गुरु है, भिन्न रूप यह कैसा।।

बाहर तो अस्थूल प्रकाशा, अन्तर सूक्षम जैसा ॥

बाहर दरसे परस से श्रद्धा, अन्तर आवे प्रानी।

तब देखे घट चित्र गुरु का, राधास्वामी की सहानी।।

(139) | आये गुरु शरनागत आये ॥टेक।।

 यह संसार मोह भंडारा, मोह मया की खानी।।

जीव जन्तु की कौन चलावे, मोहे ज्ञानी ध्यानी।।

आये0 यह संसार आग की भट्टी, जर भुन मर मिटे सारे।

काम क्रोध मद लोभ ईर्षा, भड़क रहे अंगारे।

आये यह संसार है दुख का सागर, डूब मरे सुर देवा।।

जिसको देखा दुख को मारा, दुख का मिला न भेवा।।

आये यह संसार है अगमा पाई, बादर की परछाँई।

छिन पल का नहीं ठौर ठिकाना, रेत की भीत बनाई।।आये।

यह संसार भरम विस्तारा, देख चित्त घबराया।।

राधास्वामी दीनबन्धु लख पाये, गही चरनन की छाया।आये

(140) सजनी मन चिन्ता नहीं लाना ।।टेका।

तेरे घट में तेरा प्रीतम, उसका ध्यान लगाना।

दुविधा दुर्मति तज दुचिताई, अन्तर दर्शन पाना।।

सजनी0 आस भरोस रहे गुरु चरनन, चंचल चित्त दबाना।

तिल को उलट इटि घट खोलो, रूप निरख हरखाना ।।।

सुमिर सुमिर नित नाम सुरत से, नाम न कभी भुलाना।।

नाम से काज बनेगा पूरा, नाम भक्ति धन कमाना ॥

ॐनाम है योग युक्ति जप क्रिया, नाम प्रीत सत ज्ञाना।

एक नाम है सब की कुजी, नाम में नहिं अलसाना।।

सजनी0 नाम है सुमिरन नाम भजन है, नाम में गुरु का ध्याना।।

राधास्वामी नाम जो सुमिरे प्रानी, नसे भर्म अज्ञाना ।।।

(141) साधु जहाँ चाहे सम धार ।।टेक॥

सिर तू बा और तन है दंडी, नस नाड़ी सब तार।

सच कहूँ तो कोई न माने, तेरी देह सितार।।

साधु0 हृदय सोलह चक्र हैं अन्तर, मेरु दंड ‘बिस्तार।

भाव की हाथ पहन मुन्दरी, छेड़ प्रेम गत सार।

साधु सात तत्व के साथ ही स्वर है, परदों के आधार।।

मुदरी पहन उन्हें जो छेडे, सहज में बजे सितार ॥

साधु स्वर सोम मंगल वृहस्पति, बुद्ध शुक्र शनिवार।।

सात यह सुर अन्तर सब रहते, पिंडी जीव अधार।।

साधु कर सतसंग भक्ति ज्ञान से, शब्द योग चित धार।

सम को साध शब्द मारग चल, राधास्वामी की बलिहार।साधु

(142)मन की मेरे बलिहारी ॥टेका।

पहले मन में काम क्रोध थे, लोभ मोह हंकारा।।

दया क्षमा करुना चित भाई, मन भया सुख भंडारा ॥

मनकी0 स्वारथ बस हो पाप कमाना, जग माया में फसता।।

परमारथ की चाह बर आई, उपकारी बन हँसता।

मनकी विषय भोग में लम्पट रहता, वृथा समय गंवाता।

भक्ति भाव की उसे जो सूझी, गुरु प्रेम रस माता।।

मनकी पक्षपात बस हिंसा करता, सब का हृदय दुखाता।

अब नहीं हटधरमी मेरा मनुआ, मीठे बचन सुनाता ॥मनकी

जब से संगत गुरु की पाई, सुखी भयो मन मेरा।

बन्धन काट मुक्ति पद लागा, राधास्वामी का चेरा।।मन की0

(143) साधु समझ करो कुछ करनी ॥टेका।

नहाया धोया टीका लगाया, घंटा शंख बजाया।।

आरत साजी मन्दिर जाकर, क्या इससे फल पाया ॥

साधु0 आसन मारा धूनी रमाई, कफनी पहन के डोले।

मांगी भीख मिला क्या तुमको, भाई तुम तो भूले।।

साधु गले में माला डाल के आये, भेस भयानक भाई।

शान्ति चैन की गम नहीं पाई, भूल में उमर बिताई।।

साधु अंग भभूत कमर मृगछाला, जटाजूट सिर बांधे।।

क्या समझा क्या हाथ लगा है, काल बोझ धरा कांधे ॥

साधु कर सतसंग सार कुछ बूझो, सार में साँची भलाई।

राधास्वामी दया करेंगे, लो उनकी शरनाई ॥साधु

(144) बहना खोल के देखो नैना ॥टेक।।

 धन सम्पति और हॉट हवेली, इनमें कहां सुख चैन।

काल जो आया सबही छूटे, दिन अब होगया रैना ॥

बहना0 सपने का है खेल तमाशा, देता काल है सैना।

सैन बैन कोई बुझे नहीं, कहूँ खोल क्या बैना।।

बहना सखी सहेली का संग बिछड़ा, जो थी अब वह है ना।

कोई रहा ना नाम लेन को, तोता तोती मैना।।

बहना मैं मैं तू तू में उमर बिताई, आगे तू तू मैं ना।

पक्षी पखेरू तक नहीं बचते, काल उखाड़े ड्यना ॥

बहना भज गुरु नाम भजन के अवसर, भजन भाव में भय ना।

राधास्वामी चरन शरन वलिहारी, जग है काल चना।।बहना

(145) मिथ्या यह संसार सुरत प्यारी ॥टेक।

स्वारथ के सब संगी साथी, कुल जाती परिवार।

अन्त समय कोई काम न आवे, मन में सोच बिचार।।

सुरत0 यह संसार स्वप्नवत लीला, अल्प काल व्यौहार।

अन्त काल काज जब पहुँचा, फिर सब असत असार।।

सुरत यह संसार है सचमुच प्रानी, बालू की दीवार।

रुचि रुचि लाख बनावे कोई, बिनसत लगे न वार।

सुरत यह संसार बदर की छाई, देख ले दृष्टि पसार।

छिन में है छिन में नहीं है, जनम जुआ मत हार।।

सुरत यह संसार पूछ कुत्ते की, परख ले नैन उघार।

सीधी कोई चाहे करे कितनी, टेढ़ी रहे हर बार ॥

सुरत यह संसार मरुथल भूमी, मृग तृष्णा जल धार।

जल नहीं मिले प्यासे नहीं जावे, डूबे दौड़ गॅवार ॥

सुरत यह संसार धोके की टट्टी, इन्द्रजाल परचार।

बाजीगर ने थाट समेटा, सब झूठा व्यौहार।।

सुरत समझ बूझ कुछ करले कमाई, जा गुरु के दरबार।।

सतसंगत में काम बना ले, राधास्वामी कहे पुकार।।सुरत

(146) सतगुरु ने भेद बताया, घर अधर मर्म जतलाया ।।टेक।।

 घर बने परबत एक दिखाना, भेद अभेद का रूप लखाना।

सतपद धुरपद मिला निशाना, सम प्रकाश और छाया ।सतगुरु0

जो जो कथं वही निज ज्ञाना, जो जो करू सो सत्य प्रमाना।

मिल गया जीते जी निरवाना, व्यायै ब्रह्म न माया ॥

जाग्रत स्वप्न एक कर देखा, सुषुप्ति तुर्या किया परेवा।।

तुर्यातीत को गहा विशेषा, जो खोया था पाया।।

काम क्रोध मद लोभ न व्यापे, मिट गया अहंकार मद अपि।।

अब न सतावे जग त्रय ताप, भव भर्म सकल नसाया ।सतगुरु

सहज अवस्था सहज सुबानी, सहज कर्म सो सहज सुहानी।।

मिल गये राधास्वामी अगन ठिकानी, सहज दृष्टि दरसाया ॥

(147) यह जग नाटकशाला साधु, यह जग नाटकशाला ।।टेक।।

राजा रंक फकीर औलिया, दृष्य विचित्र विशाला।।

कोई ओढ़े शाल दुशाला, कोई सिर कम्बल काला ॥

साधु0 सुरत ने अद्भुत भेष बनाये, नाचे नाच रसाला।।

गावें भाव दिखावे छिन छिन, खेलें खेल रसाला ॥

ब्रह्मा वेद से रचा जगत को, विष्णु गदा ले पाला।।

शिव संहार का साज सजावे, साथ भूत बैताला ॥

नाचे कमला दुर्गा सारद, काली छबि बिकराला।।

सावित्री का राग गायत्री, सैन बैन का जाला।।

शंखनाद की धूम मची है, डमरू शोर कराला।।

रारंग सारंग बजी सरंगी, बीन सितार सुहाला।।

श्रति धुन है उद्गीत है बानी, ओम ओम का ताला।।

श्रोतागन सब सुनने आये, मन में भये बिहाला ॥

साधु दृष्टि साक्षी रूप है, सुख दुख मन से टाला।

जिसने अपना रूप बिसारा, उर उपजा दुख साला ॥

साक्षी देखे विमल तमासा, चित रहे सुखी सुखाला।।

भूल भर्म में जो कोई आया, सहे कर्म का भाला।।

रैन सपना है जग की लीला, सपना धन और माला।।

आंख खुली तब कुछ नहीं दरसा, गुप्त जो देखा भाला ॥

राधास्वामी संत रूप धर आये, दीनबन्धु सुदयाला।।

प्रेम पियाला हमें पिलाया, सहज किया मतवाली ॥

(148 ! जिन ढूंढा तिन पाया साधु, नाम रतन धन खानी ।।टेक।

मन परवत में खान खुली है, सतगुरु की सहदानी।।

ले कुदाली कर भक्ति प्रेम की, खोदे कोई नर ज्ञानी।

साधु0 मन को खोद रतन धन पावे, नाम रतन सुखदानी।।

दुख दरिद्र फिर निकट न आवे, मन रहे बहु हरषानी ॥

चल सतसंग भेद ले गुरु से, छोड़ कुसंगत प्रानी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मैं तो हुआ विज्ञानी।।

| 149) सुहागिन चेत के चल, पिया प्रेम नगर की राह ॥टेक॥

नैहर देश बिराना सजनी, कर प्रीतम की चाह।।

त्याग मोह आलस छल निद्रा, मैं समझाऊँ काह ।।सुहागिन

जग पितु मात शोक उपजावे, राह से हो न कुराह।

सत की चूनर पहर भाव से, बिछुवे हिये की दाह ।।सुहागिन

शील संदूर से मांग भरा ले, अपना भाग सराह।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु के हाथ पनाह ।।सुहागिन

| 150) भक्ति महा सुखदाई साधु, भक्ति महा सुरवदाई ।।टेक।

प्रेम भाव जब चित में उपजा, चित चरनन लव लाई।

लगी समाधि अखंड अपारा, सो टूटे बरियाई।।

साधु0 कहां का ज्ञान कहां का जप तप, केसी बुद्धि चतुराई।।

जब मन भक्ति भाव रस पाया, भव दुख सहज नसाई।।

साधु एक आस विश्वास गुरु का, एक अटल शरनाई।

दुविधा मिटी गई सब चिन्ता, छाई बेपरवाई।।

साधु जीवन मुक्त दशा नित बरते, सहज भक्त समुदाई।।

कमल नीर सम रहनी सहनी, माया काल लजाई।साधु

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्ति अटल बर पाई।

अब नहीं खटका मोह जाल का, गुरु ने लिया छुड़ाई ॥साधू0

Updated: April 24, 2021 — 5:07 pm

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