Song 1 — Hindi
401.नहीं तेरा है देश यह, मेरी प्यारी सजनी।।
सत पद तेरा निज अस्थाना, आन पड़ी परदेश यह मेरी प्यारी
कठिन कमे के काट दे बन्धन, धार सहज उपदेश यह मेरी।।
इन्द्री मन नहीं रूप हैं तेरे, सब माया के भेस यह मेरी।।
घट में शब्द धार जो प्रगटी, सोई सत्त संदेश यह मेरी।।
राधास्वामी सहजयोग बिधि गाई,नहीं कठिन लवलेश यह मेरी।।
Song 2 — Hindi
402.भूल भरम सब त्याग री, मेरी प्यारी सहेली।।
इसका विष चढ़कर नहीं उतरे, जग है काला नाग री मेरी
प्यारी शब्द डोर गह घट में चढ़ चल, जागे भाग सुभाग री मेरी।।
त्रिकुटी में लव गुरु की मूरत, चरन कमल में लाग री मेरी।।
सुन्न में सहज समाध रचाले, दुचिता को दे आग री मेरी।।
राधास्वामी दया के सागर, देगे अचल सुहाग री मेरी।।
Song 3 — Hindi
- प्रेम भाव उर धार री, मेरी प्यारी सरतिया।।
टेक। अंतर में गुरु की संगत कर, दरस परस सत्कार री मेरी प्यारी
तिलपट मध्ये अद्भुत मूरत, अचरज अगम अपार री मेरी प्यारी
मन माथे दे तिलक केरिया, डाल गये बिच हार री मेरी।।
तिल की जोत में साधले आरत, जगमग रूप निहार री मेरी।।
घट में पूजा घट में सेवा, घट में भक्ति बहार री मेरी।।
घंटा शंख बजे मन मन्दिर, अनहद धुन झनकार री मेरी।।
सुमिरन भजन ध्यानकर मन में,राधास्वामी की बलिहार री मेरी।।
Song 4 — Hindi
404.गुरु चरनन चित धार री, मेरी प्यारी सुरतिया।।
टेका। अपने स्वारथ वश लिपटाने, कुल कुटुम्ब परिवार री मेरी
प्यारी एक में सुख और अनेक में दुख है, टेक एक की धार री मेरी।।
कर्म की गठरी को हलकी करले, राख न सिरपर भार री मेरी।।
एक आस विश्वास गुरु का, भक्ति ज्ञान का सार री मेरी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,होजा द्वन्द के पार री मेरी।।
Song 5 — Hindi
405.भोग वासना भूल री, अलबेली सहेली।।
दुख कलेश को मेट दे संशय, प्रेम हिंडोले झूल री।।अलबेली
क्यों मुरझाई सुख से खुलजा, जैसे हँसता फल री।।अलबेली
जो प्रतिकूल पन्थ नहीं पग दे, तिसके सब अनुकूल री।।अलबेली
लत फिरे भरम वश प्रानी, ममता नर का झूल री।।अलबेली
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हो पदकमल की धूल रीअलबेली
Song 6 — Hindi
406.प्रेम का कर सरकार री, मेरी सुरत सुशीला।।
टेका। प्रेम है भूषण सन्दर बस्तर, प्रेम का कर सिंगार री मेरी।।
सुरत प्रेम ही मूल तत्व है प्यारी, प्रेम का कर त्र्यौहार री मेरी।।
सुरत प्रेम प्रेम कर प्रेम को चित दे, प्रेम का पन्थ संवार री मेरी।।
सरत प्रेम योग है प्रेम है भक्ति, प्रेम का आसन मार री मेरी।।
प्रेम ज्ञान का सच्चा साथी, प्रेम विवेक विचार री मेरी।।
सुरत प्रेम की हाट में प्रेम का सौदा, प्रेम बनजि व्यौपार री मेरी।।
सुरत राधास्वामी प्रेम रूप धर आये, परम सन्त औतार री मेरी।।सुरत
Song 7 — Hindi
- चल गुरु के सतसंग री, मेरी सुरत सहेली।।
सतसंगत अमृत जल बरसे, सतसंग निर्मल गंग री मेरी सखी
सतसंग प्रेम सिंध है सजनी, उमड़े प्रीत तरंग री मेरी।। सखी
बास सुबास मिले सत संगत, पाचे रंग सुरंग री मेरी।।सखी
सतसंगत को ध्यान रहे नित, कीट सहज हो भृग री मेरी।।सखी
राधास्वामी गुरु की कर सतसंगत, काल करम कर भंग री मेरी।।सखी
Song 8 — Hindi
- गुरु पद का करले ध्यान री, मेरी सुरत सहेली
आज गुरु की शरणागत में, सब विधि हो कल्यान री मेरी।।
सुरत चिंता त्याग त्याग दे चिंता, यही है सच्चा ज्ञान री मेरी।।
सुरत जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज को परख सुजान री मेरी।।
सुरत अंतर में तेरे सतगुरु बसते, घट में रूप पिछान री मेरी।।
सुरत गुरु के चरन शरन जो आया, नहीं उनकी हो हान री मेरी।।
सुरत सुमिरन ध्यान भजन कर सजनी शब्दयोग की जान री मेरी।।
सुरत राधास्वामी नाम जो कोई सुभिरे, जीते जी निवन री मेरी।।सुरत
Song 9 — Hindi
- करले अपना काम अब, मेरी चतुर सरतिया।।
आलस तज निद्रा को तजदे, तज मद मोह निकाम अब।।
मेरी समिरन ध्यान भजन नित करना, सुमिर सुमिर गुरुनाम अब।।
मेरी गुरु से पावे चार पदारथ, मोक्ष धर्म धन काम अब।।
मेरी जो आया गुरु की शरणागत, सब विधि पूरन काम अब।।
मेरी जीते यश कीर्ती इस जग में, पीछे राधास्वामी धाम अब।।मेरी
Song 10 — Hindi
- थिर नहीं वह संसार री, सुन सखी सहेली।।टेका।
जो आये हैं जायंगे सजनी, कुछ अब सोच विचार री सुन।।सखी
बन्धन काट मोह माया के, यह उसके परिवार री सुन।।सखी
संगी साथी कोई नहीं है, यह अपने चित धार री सुन।।सखी
मिथ्या है सब जगत पसारा, मिथ्या में क्या सार री सुन।।सखी
राधास्वामी नाम सुमिर घट भीतर,मानुष जनम सुधार री सुन।।सखी
Song 11 — Hindi
411.अपनी ओर निहार री, अलबेली सुरतिया।।
औरन को क्या निरखे सजनी, तू है सबका सार री।।अलवेलीं
घट में तेरे प्रीतम बसता, हित चित से कर प्यार री।।अलबेली
तू है प्रेम की मूरत प्यारी, प्रेम की तू भंडार री।।अलबेली
सब कुछ तेरे घट में बसत है, घट के नैन उघार री।।अलबेली
बाहर की सब आसा तज दे, अंतर दृटि पसार री।।अलबेली
घट चेला गुरु गगन विराजे, सुरत से मन में विचार री।।अलबेली
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, चरन कमल सिर धार री।।अलबेली
Song 12 — Hindi
412.गुरु संग नेह लगाओ री, मेरी प्यारी सुरतिया।।टेका।
सुमिरन भजन ध्यानकर चित में, मोक्ष पदारथ पाओ री मेरी।सुरत
गुरु का रूप बसा तेरे अंतर, उस पर वृत्ति जमाओ री मेरी।।सुरत
लख लख अलख दशा घट भीतर,अनहद धुन नित गा र मेरी।।
सुमिरन सबका सार है प्यारी, सुमिरन सहज उपाओ री मेरी।।सुरत
ध्यान गुरु का रूप है सजनी, रूप अनूप को ध्याओ री मेरी।।सुरत
नाम का तार गूज रहा अंतर, सुन मुख आनन्द पाओ री मेरी।।सुरत
दुख को त्याग हर्ष नित बाढ़, उसकी चाह बढ़ाओ री मेरी सूरत
भंवर में जीवन नाव पड़ी है, तट पर उसको लाओ री मेरी।।सुरत
राधास्वामी गुरु का दयाभाव ले, चरन शरन में जाओ री मेरी।।सुरत
Song 13 — Hindi
413.अपना रूप सँभार री, तू रंगीली बहुरिया।।
शील क्षमा का भूपन सुन्दर, पहर के करले सिंगार री
तू रंगीली मीठे बचन मधुर रस बानी, मुख से सदा निकार री तू।।
दया भाव की ओढ़ चुनरिया, अपने आप संवार री तू।।
कर्म बचन मन से सब का हित, कर सजनी उपकार री तू।।
साँच चदरिया तन पर सोहे, काम क्रोध मद मार री तू।।
सब कोई हर्ष से करे बड़ाई, यह सुन्दर बरनार री तू।।
राधास्वामी पंथ ठुमक कर पगदे, सतगुरु नाम उचार री तू।।
Song 14 — Hindi
- कर दो भव सागर पार, तुम मेरे सतगुरु दाता।।
डूबत कोई न संग न साथी, काढ़ो आज किनारे तुम।।
मेरे मैं अचेत अज्ञान की मूरत, ज्ञानी पुरुष अपार तुम।।
मेरे मैं बिलपू भर दुख के कारन, देखो नैन निहार तुम।।
मेरे असा बासा सब की त्यागी, हो साँचे रखवार तुम।।
मेरे राधास्वामी दीन दयाला, सृष्टि के आधार तुम।। मेरे
Song 15 — Hindi
415.बंसी की धुन सुन कान, सुरत मेरी गगन चढ़ी।।
सहस कमलदल घंटा बाजा, जब तिल को दिया तान सुरत।।
मेरी त्रिकुटी ओंकार धुन मृदंग, सुन हुआ चतुर सुजान सुरत।।
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, किंगरी शब्द प्रमान सुरत।।
भंवर गुफा सोहंगम वंसी, बंसीधर लिया जान सुरत।।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, पहुँची ठौर ठिकान सुरत।।
36-415 बंसी की धुन सुन कान, सुरत मेरी गगन चढ़ी ॥टेक।।
सहस कमलदल घंटा बाजा, जब तिल को दिया तान सुरत ।मेरी
त्रिकुटी ओंकार धुन मृदंग, सुन हुआ चतुर सुजान सुरत ।।
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, किंगरी शब्द प्रमान सुरत ।।
भंवर गुफा सोहंगम वंसी, बंसीधर लिया जान सुरत ।।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, पहुँची ठौर ठिकान सुरत ।”
Song 16 — Hindi
37-416 ।। सोच विवेक विचार, जो तू सच्चा ज्ञानी ।।टेक।।
मन के अटपट खटपट सूझी, झटपट ताहि सुधार जो
तू सच्चा बिन साधन अनुभव नहिं जागे, साधन से कर प्यार जो ।।तू सच्चा202 ।।
वाचक ज्ञान से काम बने नहीं, वाच वो लक्ष्य सँभार जो ।।तू सच्चा
तत्व भेद सतसंग में पाले, सतसंग सबका सार जो ।। ।।
प्रीत प्रतीत के पंथ में पग दे, प्रेम का पंथ सँवार जो ।। ।।
जीत काम मद मोह लोभ को, मार अहम् अहंकार जो ।। ।।
सुरत शब्द का सहज है साधन, सहज सहज निवर जो । ”
घर में रह घर का उद्यम, घट में कर दीदार जो ।। ।।
राधास्वामी जीव चितवन आये, धार सन्त अवतार जो ।।तू सच्चा
उनकी शरन में जल्दी आजा, कर अपना उपकार जो तू सच्चा
राधास्वामी योग की बने कमाई, जा भवसागर पार जो तू सच्चा
कोइ न तेरा तू न किसी का, कुल कुटुम्ब परिवार जो तू सच्चा
राधास्वामी नाम सुमिर नित, जीवन का आधार जो ।। तू सच्चा
Song 17 — Hindi
38-417 सतगुरु परम दयाल री, कोई कदर न जाने टेका।।
देह धरे जीव भार उठावे, काटें यम का जाल री कोई कदर
जीव अनाड़ी जग झकमारे, दुख सुख संग बेहालरी कोई ।।कदर
दया मेहर निज बचन सुनावे, मेटें घट दुख सालरी कोई कदर
छूटन की वह युक्ति बतावे, घट में चलावें चल री कोई कदर
दया मेहर से करनी करावे, करदे मालामाल री कोई कदर
घट के बैरी सभी नसावे, मारे काल कराल री कोई ।।
कदर निस दिन तेरी दया बिचारें, जस माता संग बालरी कोई कदर
अन्त समय जब तेरा आवे, आप हुये रखवाल री कोई कदर
घट तेरे में प्रगट करावे, अपना रूप विशाल री कोई कदर
पकड़ चरन तू निज घर जावे, काल करम पामोल री कोई कदर
राधास्वामी सतगुरु मोहि अस भेटे, होगई मैं खुशहाल री कोई।।कदर
Song 18 — Hindi
36-418 गुरु मूरत हिये में धारो री, गुरु मूरति ।।टेक।
गुरु बिन काल नहीं पड़त घड़ी एक, छिन छिन रूप निहारो री ।।गुरु।।
काम क्रोध मद लोभ ईर्षा, घट से सकल निकारो री ।।गुरु मूरति
कोटिन चन्द सूर उदय तारे, तिमिर विकार निकारो री ।।गुरु मूरति
गुरु की आसा चित्त बसाओ, जगत वासना जारो री गुरु मूरति
तिल को उलट करो नित दर्शन, सहज ही होत उजारो री गुरु मूरति
वन्धन काटो मोह मया के, गुरु का नाम पुकारो री ।।
गुरु मूरति राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु चरनन मन बारोरी।।गुरु मूरति
Song 19 — Hindi
36-419 सुरत चढ़ी आकास री, अपने अन्तर घट ।।टेक।
सहस कमल दल दृष्टि डाली, गुरु दरशन की आस री,
खोला निज तिलपट ।। सुरत
त्रिकुटी गुरु मूरति लख पाई, कर अज्ञान को नास री,
तज मन के खटपट ।।
सुरत सुन्न में सहज समाध रचाई, आई गिरि कैलास री,
हंसन के जमघट । सुरत
भंवर गुफा सोहंग धुन बंसी, माया काल विलास री,
सत धाम अधर बट । सुरत
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी पद में बास री,
| दर्शन कर झटपट । सुरत
Song 20 — Hindi
40-420 | राधास्वामी नाम प्रभाव री सुख जीवन मिलना ।।टेक।
राधास्वामी शब्द गूज रहा घट में, चित की वृत्ति लगाव री,
सुरत कान से सुनना ।।राधा0
राधास्वामी रूप लगे अति प्यारा, अन्तर दृष्टि जमाव री,
ले रूप का झरना ।।राधा0
राधास्वामी पद परसा जब घट ने, मिला आनंद का दाव री,
मुख से क्या कहना ।।राधा0
राधास्वामी बस सुबास बसा हूँ, प्रेम के फल चढ़ाव री,
सेवा न बिसरना ।।राधा0
राधास्वामी चरनामृत नित पीना, सत प्रसादी खाद री,|
आनन्द से जीना ।।राधा0
Song 21 — Hindi
41-421 साज के सन्त समाज री, सतगुरु हुये परगट ।।टेक।।
घट के अन्तर मन मन्दिर में, ठाड़े गुरु महाराज री,
भूमध्य के तिल पट ।।साज
सहस जोत का दीवा बाला, चांद सूरज दोऊ लाज री,
जोती के जमघट ।।साज
सखियां आरत मंगल गावे, मन ममता को मांज री,
तज मन के खटपट ।।साज
दया क्षमा करुना चित बाढ़ी, जुड़ा विचित्र समाज री,
अपने अन्तर घट ।।साज
राधास्वामी का दर्शन कर चित से, छोड़ कुटुम्ब कुल लाज री,
चढ़ बैंक के अधट ।। साज
Song 22 — Hindi
42-422 आये गुरु महाराज री, अपने दासी घरे ।।टेक।।
लाई प्रेम की थाली दासी, मंगल आरत साज री, ।
लख गुरु प्रतम वर ।। आये
प्रीति प्रतीति के भूषन बस्तर, अरपे सन्त समाज री,
मन धन न्यौछावर । आये
चरन कमल लग उमंग बढ़ाया, मनमानो कियो काज री,
मांगा भक्ति वर ।। आये,
शबरी के बेर राम बन खाये, रखली दया से लाज री,
करुणा के सागर । आये
राधास्वामी दीन दयाला, हुए प्रसन्न चित आज री,
दासी के ऊपर ।। आये। |
Song 23 — Hindi
43-423 चल सतगुरु के देस तू, मेरी सुरत सहेली ।।टेका।
माया मंडल दुख अस्थाना, क्यों सहे बिपत कलेस तू,
योनी की खानी । चल
द्वन्द जगत मन का विस्तारा, मन की न सुन लवलेस तू,
हो गुरु गम ज्ञानी । चल
घट में भोग अघट रेस भक्ति, धार प्रेम का भेस तू,
रह नित हरखानी । चल
नींद भूख परमाद त्याग दे, धर चित गुरु उपदेस तू,
तजे मान गुमानी ।।
चल दे बिखेर राधास्वामी दया से, काल करम के केस तू,
ले पद निर्वानी ।। चल
Song 24 — Hindi
44-424 | आई राधास्वामी धाम री, तज जग की आसा ।।टेका।
पहिले पहुँची सहस कमल दल, जगमग जोत की ठाम री,
ज्यों दीप उजासा ।।आई
फिर त्रिकुटी में डेरा डाला, ओम् को लेकर नाम री,
ब्रह्मरेन्द्र निवासा ।।आई
ताके आगे सुन्न मैदाना, हंसन का विश्राम री,
गिरवर कैलासा ।।आई
भंवर गुफा की खिड़की खोली, माया काल को थाम री,
गुरु बल विश्वासा ।।आई
सत पद अलख अगम जा पहुँची, पूरा करलिया काम री,
राधास्वामी पद बासा ।। आई
Song 25 — Hindi
45-425 राधास्वामी धुन नित गाज री, अपने अन्तर घट ।।टेक।।
राधास्वामी दर्शन भाग से पाया, सहसे कमल दल आज री,
जब उलटा तिलपट । राधा
राधास्वामी ओम रूप गढ़ त्रिकुटी, सौभा सहित विराज री,
तज मन के खटपट ।। राधा0
राधास्वामी शून्य पुरुष सुन मंडल, संग ले हंस समाज री,
मानसरोवर के तट ।। राधा0
राधास्वामी सोहंग भंवर गुफा में, कोटि कृष्ण छवि लाज री,
सच्चे बंसी बट ।। राधा0
राधास्वामी सतपद अलख अगम में, दरस परस किया काज री,
बच काल के औचट । राधा0
Song 26 — Hindi
46-426 जागे पूरन भाग री, नर जनम बनाया ।।टेक।
माया ममता छल चतुराई, सब को दीना त्याग री,
जब गुरु संग पाया । जगे
सुरत कुवारी शब्द से ब्याही, सहित सुभाग सुहाग री,
सिंगार कराया । जागे
नाक के सीध लगाई कंवी, काही चित की मांग री,
संदूर भराया। जागे माथे बिंदी जगमग झूमर, लड़ मोतिन की मांग री,
निज रूप सजाया । जागे
घंटा बीन मरंग बाजी, अनहद मंगल राग री,
राधास्वामी गाया ।। जागे
Song 27 — Hindi
47-427 अनहद बाजे बाज री, सुन सुरत के काना ।।टेक।।
सहस कमल दल घन्टा बाजे, धुन रही चहुँ दिस गाज री,
क्या करू बखाना ।।अनहद
थाप मृदंग पखावज त्रिकुटी, साधू जन के समाज री,
गुरु पद अस्थाना ।।अनहद
रारंग सारंग सुम्न में सरंगी, हंस मंडली साज री,
अमृत जल पाना ।।अनहद
भंवर गुफा में मुरली बंसी, महाकाल के राज री,
कोई मर्म न जाना ।अनहद
सतपद बीन मधुर मुद मंगल, यहां किया अपना काज री;
राधास्वामी धर ध्याना ।अनहद
Song 28 — Hindi
48-428 | चल राधास्वामी धाम री तज काया कासी ।।टेक।।
सहसे कमल हरद्वार की पौड़ी, ले सतगुरु का नाम री, ।
नित भज अविनासी ।। चल
राज प्रयाग ब्रह्म गढ़ त्रिकुटी, ओंकार गुरु ठाम री,
सत चित सुखरासी । चल
सुन्न मानसर गिरि कैलासा, हंसन का विश्राम री,
नहीं चित में उदासी । चल
महासुन्न को ऊँचा परवत, सहज समाध अकाम री,
सुरत भई अकासी ।।
चल भंवर गुफा घाटी अति सुन्दर, महाकाल को ग्राम री,
माया हुई दासी ।। चल
सत सुमेर सतपद अस्थाना, आनन्द आठों याम री,
नहीं आस निरासी । चल
अलख अनाम अगम के पारा, राधास्वामी धाम से काम री,
निज रूप प्रकाशी ।। चल
Song 29 — Hindi
46-429 मेरी सुरत सहेली आओ री, सतगुरु के चरना ।।टेक।।
जग में प्रगट भये राधास्वामी, दरस परस चित लाओ री,
आ उनके शरना । मेरी
जुगन जुगन का प्यासा मनुआ, गुरु उपदेश चिताओ री,
क्यों आलस करना । मेरी
सत संगत की अमृत बानी, सुनकर जनम बनाओ री,
सहज भव तरना । मेरी
कुछ दिन सतसंग वचन विलासा, फिर निज घट में न्हाओ री,
सुरत शब्द के झरना । मेरी
जीते जी जीवन मुक्ति फल, राधास्वामी दया से पाओ री,
अवसर न बिसरना । मेरी
Song 30 — Hindi
50-430 | राधास्वामी धाम सिधार री, सखी सुरत सियानी ।।टेक।।
नहीं वहाँ काल कलेस न माया, नहीं सिर कर्म का भार री,
आनन्द की खानी ।। राधा0
नहीं वहां तीन ताप का भय दुख, नहीं यम का अधिकार री, ।
वह पद निवनी ।। राधा0
द्वन्द द्वत पाखंड विवादा, नहीं सत असत विचार री,
जाये मन नहीं बानी ।। राधा0
तीन त्रिलोकी काल रचाई, वह है इसके पार री,
अनुभव गति जानी ।।
राधा राधास्वामी आये दिया संदेशा, सुरत का पाऊँ उभार री,
हो धुर अस्थानी ।। राधा0
बिनती
Song 31 — Hindi
431 दया दृष्टि कीजे, मुझे तार लीजे ।
लगा अपने चरनों में, भव पार कीजे ।
रहे वासना नाम को, भी न मन में ।
कटे दिन मेरा, भक्ति में और भजन में ।।
सदा सर्वदा, नाम ही की लगन हो ।
तुम्हारा ही सुमिरन, तुम्हारा मनन हो ।
तजी वासना, और चरनों में आया ।
न व्यापे मुझे, जगत की मोह माया ।।
जपूँ जागते सोते, मैं राधास्वामी ।।
कहूँ पद में झुककर, नमामी नमामी ।।
प्रार्थना
Song 32 — Hindi
432 दया दृश्टि से, खोलदे आँख मेरी ।।
रहे वासना, मन में भक्ति की तेरी ।।
तेरी आस है, और तेरा ही सहारा ।
शरण देके कर, सिंधु से भव के पारा ।।
करू तन से और मन से, मै काम तेरा ।
रहे रात दिन, होठों पर नाम तेरा ।।
सदा सर्वदा मन में, हो ध्यान तेरा ।
तेरा ही हो अनुमान, और ज्ञान तेरा ।।
जपू राधास्वामी, भज़ राधास्वामी ।
पढ़, राधास्वामी, लिखें राधास्वामी ।।
सातवी धुन
Song 33 — Hindi
1-433 | कैसे अपना भाग सराहूँ ।।टेक।।
प्रेम प्रीति परतीति पदारथ, प्राप्त भये अब कुछ नहीं चाहूँ ।। कैसे
श्रद्धा भक्ति हो टेक गुरु की, जीते जी यह परन निबाहूँ । कैसे
चरण न छूटे तन चाहें छूटे, अब तो राधास्वामी शरन पड़ा हूँ।। केसे
निरख परख कर घट की लीला, सत्तलोक की ओर चला हूँ ।। कैसे
राधास्वामी धाम में बासा पाया, चौरासी के भय से छुटा हूँ ।।
Song 34 — Hindi
2-434 मैं तो होगया नाम दिवाना ।।टेक।
सांसों सांस नाम का सुमिरन, यही मेरा है पानी दाना । मैं तो
नहीं कोई जाने नाम महातम, जो जाने सो चतुर सुजाना ।। मैं तो
चलते फिरते सोते जगते, जपत हिया जिया हरषाना । मैं तो
धर्म कर्म संयम तप किरिया, भूल गये नहीं नाम भुलाना । मैं तो
राधास्वामी नाम जो कोई सुमिरे,सहज ही पावे पद निवना ।। मैं तो
Song 35 — Hindi
3-435 नित प्रति गुरु की अस्तुति गाना ।।टेका।
परनिन्दा की ओर न चित दू, मन तो गुरु गुन मांहिं लुभाना ।।नित
अन्तर प्रगटी अद्भुत मूरत, देखि देखि तेहि जिया ललचाना ।।नित
जगमग जोत सहसइल निरखी, त्रिकुटी पद ओंकार लखाना ।।नित
सुन्न महासुन्न स्वेत प्रकाशा, भवर गुफा सूरज दरसाना नित
सतपद अलख अगम राधास्वामी,मिलगया सुरत को शब्द ठिकाना ।”
Song 36 — Hindi
4-436 प्रगटी अनहद धुन घट अंतर ।।टेक।
सहसकमलदल घंट शंख सुनि, त्रिकुटी पद ओंकार का मंतर ।।प्रगटी
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, भंवर में सोहंग बंसी जंतर ।।प्रगटी
सत में बीन मधुर धुन गाजी, अलख अगम का सूझा तंतर ।।प्रगटी
राधास्वामी बल जब पाया, निबल सहज भयो बलवंतर ।।प्रगटी
धनधन राधास्वामी सतगुरु पूरे, जीव दुखी के सुखी करंतर ।।प्रगटी
Song 37 — Hindi
5-437 राधास्वामी सत चित आनन्द मूरत ।।टेक।।
जा दिन गुरु पद सीस झुकाया, समझो आया शुभ महूरत ।।राधा0
सत भी पाया चित भी पाया, देखी आनन्द वाली मूरत ।।राधा0
गुरु भक्ति को दीवा वाला, प्रेम प्रति की बाती पूरत ।।राधा0
कर्म धर्म संयम जप तप की, मुझको अब नहीं रही जरूरत ।।राधा0
राधास्वामी मौज दिखाई, मिट गई मन की सभी कदूरत ।।राधा0
Song 38 — Hindi
6-438 कैसे गुरु के मैं गुन गाउँ ।।टेक।।
जग के आस फन्द सब काटे, ऐसी दया पर बलि बलि जाऊँ कैसे
बिपत पड़ी रक्षा गुरु पाई, अब क्यों दूजा देव मनाऊँ ।”
नाम दान दे किया निहाला, अब नहीं जग की आस बढ़ाऊँ ।”
पकड़ी बांह दया से मेरी, चरन कमल लग नित लपटाऊँ ।”
राधास्वामी दीन दयाला, तुम्हरी दया पार भव जाऊँॐ ।।
Song 39 — Hindi
7-439 बरसे गगन बदरिया रसीले ।।टेक।
श्याम कुञ्ज में बिजली चमके, ठहरे नाहिं नजरिया रसीले ।।
बरसे जोत निरंजन श्याम घटा में, सूझे कैसे डगरिया रसीले ।।
बरसे त्रिकुटी सुन्न भैंबर को निरखा, नहीं यह तेरी नगरिया रसीले ।।
बरसे पन्थ में आई हूँ आसा लेकर, पहुँचें सत की सिजरिया रसीले ।।
बरसे अमृत बन्द प्रेम से भरदे, सुरत निरत की गगरिया रसीले ।।
बरसे प्रीति की धार बहादे प्यारे, भीजे तन की चुनरिया रसीले बरसे
राधास्वामी तेरी खातिर, माया काल से झगरिया रसीले ।बरसे
Song 40 — Hindi
8-440 रंगदे मन की साड़ी रंगीले ।।टेक।।
जनम जनम की मैली साड़ी, मैल बोझ से भारी रंगीले ।।
रंगदे काम क्रोध कीचड़ में लतपत, होगई फूहड़ नारी रंगीले ।।
रंगदे सतसंग शिला ज्ञान का साबुन, मलमल धो साड़ी कारी रंगीले।।
रंगदे प्रेम का रंग सुहाना लगादे, अब न फिरू मारी मारी रंगीले ।।
रंगदे राधास्वामी प्रीतम अंग लगाले, तेरी हो जाऊँ प्यारी रंगीले रंगदे
Song 41 — Hindi
6-441 छबि अद्भुत दिखलादे छबीले ।।टेका।
मैं प्यासी तेरे दर्शन जल की, अमृत बून्द पिलादे छबीले । छबि
मन बुद्धि की सुकड़ी कली को, हँसी खुशी से खिलादे छबीले ।छबि
बिरह के काँटे से फटा कलेजा, भक्ति टाँका सिलादे छबीले । छबि
काल करम माया की मारी, अपनी दया से जिलादे छबीले । छबि
राधास्वामी सतगुरु दाता, प्रेम की दात दिला दे छबीले ।। छवि
Song 42 — Hindi
10-442 रंग दे चूनर मोरी रंगरेजवा ।।टेक।
शब्द सुरत का ताना बाना, सुरत चूनर मोरी कोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
चुन्नट देदे गोट लगादे, करा दे शब्द की डोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
पैयाँ परूगी गुन मानेगी, अस्तुति करूगी तोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
प्रीत के कुड प्रेम रंग भरकर, बोर के दे झकझोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
ठुमक ठुमक पिया के घर जाऊँ,माया काल की चोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
ऐसी सजीली चूनर निकसे, कोई करे न ठिठोली रंगरेजवा ।।रंगदे
पहर ओढ़ राधास्वामी रिझाऊँ, खेलू भक्ति की होरी रंगरेजवा ।।रंगदे
बिनती।
Song 43 — Hindi
443 न मन में हो भव भय, न आशा किसी की ।
न चिन्ता न दुविधा, न त्रासा किसी की ।
न अभिमान मद मान, का भाव भावे ।
न द्वष ईष मेरे, चित को सतावे ।।
कमल पद की लू, छाँह में नित बसेरा ।
मेरे मन के भीतर, रहे तेरा डेरा ।।
भजन ध्यान सुमिरन, करू चलते फिरते ।
चलू पन्थ पर तेरे, मैं गिरते पड़ते ।।
कहूँ राधास्वामी, सुन राधास्वामी ।
लिखू राधास्वामी, गुन् राधास्वामी ।
प्रार्थना
Song 44 — Hindi
444 साज मंगल साज आये, जगत गुरु दातार ।
भक्त काज समाज साजी, धन्य पतित उधार ।।
शब्द नाव चढ़ाये जन को, किया भव जल पार ।
दीन हीन अधीन की सुध, लीन कृपा धार ।।
भक्ति भाव की रीति निर्मल, जाने क्या संसार ।
आप सतगुरु ने सिखाई, धार सन्तु अवतार ।।
नाथ बिनती सुनो मेरी, तुम हो परम दयार ।
जो न पकड़ो बाँह को तुम, बृढ़ काली धार ।।
सर्व समरथ साईयाँ, दुख बिपत मेटनहार ।
राधास्वामी कृपा सागर, तुम मेरे रखवार ।
आठवी धुन
Song 45 — Hindi
1-445 भरोसा तेरी है तेरी आस मन में ।
लगा रहता हूँ तेरे सुमिरन भजन में ।
यही है जतन और यही काम मेरा ।
जपा करता हूँ रात दिन नाम तेरा ।।
तेरी मौज में रह के निस दिन सुखी हूँ।
नहीं भय न चिंता न जग से दुखी हूँ ।।
खुली आँख से तेरा दर्शन जो पाया।
मिटे सहज में मान मद मोह माया ।।
न जोगी न साधु न ज्ञानी बना मैं ।
न भोगी असाधु न मानी बना मैं ।।
जो था पहले अब भी वही रूप मेरा ।।
न व्यापा मुझे काल का हेरा फेरा ।।
न जागा न सोया ने सुषुप्ति में आया ।।
न आसा निरासा के भय ने सताया ।
न दौड़ा न बैठा न लेटा कभी मैं।
न माता पिता और न बेटा कभी मैं ।।
नहीं ब्रह्म माया का है द्वन्द मुझको ।
न उलझा सका कर्म का फन्द मुझको ।
सहज रूप है और सहज कर्म बानी ।
सहज में सहज की सहज हो निशानी ।।
सहसदल अनेक और त्रिकुटी की त्रिपुटी ।।
दशा द्वैत की सुन्न में भी न प्रगटी ।
महासुन्न अद्वैत का भाव छूटा ।
भंवर में नहीं काल माया ने लूटा ।।
अलख हूँ अगम हूँ अनामी बना हूँ ।।
कहूँ कैसे कैसा कहाँ और क्या हूँ ।।
गुरु राधास्वामी ने आकर चिताया।
मेरा रूप मुझको सहज में लखाया ।।
Song 46 — Hindi
2-446 । जहाँ आँख खोली वहीं तुझको पाया ।।
कहीं ज्योति था तू कहीं था तू छाया ।
कमल है कमल का बना रूप तुझसे ।।
हुआ भंवरा और बास तू लेने आया ।।
पवन है अकास आग मिट्टी है पानी ।।
तू सब कुछ है और सब में है छाया ।।
कहीं होके परगट दिया सबको दर्शन ।।
कहीं छुपगया छुपके छबि को छुपाया ।।
छुपा आग के रूप चकमक में बैठा ।
हरी मेंहदी में लाली का रंग लाया ।।
जिधर देखता हूँ तुझे देखता हूँ।
मेरी दृश्टि में आप तू ब्रह्म माया ।।
दया राधास्वामी की मुझ पर हुई अब ।
परम सन्त औतार धरकर चिताया ।।
Song 47 — Hindi
3-447 तेरा आसरा है तेरा है सहारा ।।
शरण में पड़ा तेरे तू है हमारा ।।
निरास हूँ जग से मैं आसा तेरी है ।
दया की हो दृश्टि मिटे कष्ट सारा ।।
खुली आँख से मैं करू तेरा दर्शन ।
चला जाऊंगा फिर मैं भव सिंधु पारा ।।
अमृत पिला मुझको दे सत का जीवन ।।
काल और करम का हूँ मैं मारा मारा ।।
साहस नहीं दिल में शक्ति नहीं है।
संग्राम में जग के सच से है हारा ।।
माया मुखी होके मन से दुखी हूँ ।।
समेट अपनी माया को घट चमके तारा ।।
सुरत शब्द से मेरा घट हो उजाला ।
मेरे मैट अज्ञान का अंधकारा ।।
अलख और अगम के परे धाम तेरा ।।
मैं चढ़ जाऊँगा जो तू देगा सहारा ।।
गुरु राधास्वामी की हम पर दया हो ।
हमें तार दो समझे तुम जग को तारा ।।
Song 48 — Hindi
4-448 दया दृष्टि हो नित दया हो दया हो ।
मेरे अवगुणों पर तुम्हारी क्षमा हो ।।
नहीं ज्ञान भक्ति नहीं कर्म सेवा ।।
न मन का मिटा आज लग भर्म भेवा ।।
विवेकी नहीं हूँ न पंडित न ज्ञानी ।
बना हूँ सकल विधिं से अज्ञान खानी ।।
पड़ा हूँ शरण में शरण दीजिये अब ।।
मुझे छांह में चरनों के लीजिये अब ।।
दया अद्भुती कीजिये राधास्वामी ।।
तुम्हारे चरन में नमाम नमामी ।।
Song 49 — Hindi
5-449 न काशी न काबा न कैलास में है ।
तू देख अपने घट में तेरे पास में है ।।
तेरे घट के भीतर वह मालिक बसा है।
न मसजिद न मन्दिर न आकास में है ।।
नहीं खाली उससे यह सारा जहां है ।
कहां देखता किसकी तलास में है ।।
लगा बन्द तीनों सुरत को चढ़ाओ ।।
अनहद की धुन घट के आकाश में है ।।
गंगा के जल से नहीं होगी तृप्ति ।
चलो घाट मन के जो तू प्यास में है ।।
वह व्यापक हो रग रग में आकर समाया।
तेरी जान तन में तेरी सांस में है ।।
भरम में पड़ा तू किधर हूँढ़ता है।
गुरु तेरे अन्तर वह परकाश में है ।।
कहीं नाम है और कहीं बेनिशां है।
हमारे ही मन के वह विश्वास में है ।।
राधास्वामी ने भेद अपना बताया ।
उसे मिलने की युक्ति अभ्यास में है ।।
Song 50 — Hindi
6-450 सदा नाम से लौ लगाया करो तुम ।।
सुफल अपना जीवन बनाया करो तुम ।।
बसाकर गुरु मूरती मन के मन्दिर ।।
सिर्फ प्रेम दीपक जलाया करो तुम ।।
कभी तो उन्हें भी खबर हो रहेगी ।
करुणा राग अपना सुनाया करो तुम ।।
वह दाता दयालु अवश्य देंगे दर्शन ।
सदा ध्यान उनको लगाया करो तुम ।।
भजन ध्यान से यह भटकने न पावे ।।
निठुर मन को निसदिन चिताया करो तुम ।।
मिलेंगे गुरु अपने जीवन के साथी ।
तड़प मन में दर्शन बढ़ाया करो तुम ।।
मनोकामना होगी पूरन तुम्हारी ।।
राधास्वामी का नाम गाया करो तुम ।।
Song 51 — Hindi
7-451 मुझे रूप का अपने निज ज्ञान दीजे । |
वह क्या कैसा है उसका परमान दीजे ।।
जो यह ज्ञान का चन्द्र रूप साई ।।
पड़ी दुख की इस जोति में कैसे झांई ।।
कहा करते हैं ज्ञानी माया नहीं है।
जो माया न होगी तो काया नहीं है ।।
बिना काया कैसे यह संभव कथन है ।
असंभव सभी योग युक्ति मथन है ।।
श्रवण और मनन कैसे फिर होंगे दाता ।।
बिना इसके मन ध्यान किसमें लगाता ।।
है क्या भेद मन और माया में प्यारे ।
बतादो मैं समझे उसी के सहारे ।।
बतादो मुझे सार तुम राधास्वामी ।।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
Song 52 — Hindi
8-452 । सुनो मेरे भाई कथा यह पुरानी ।
नहीं जानते आज कल जिसको ज्ञानी ।।
नहीं ब्रह्म माया में है भेद कोई ।
जो है ब्रह्म माया भी है वस्तु सोई ।।
जो सत है वही सुख वही चित है प्यारे ।।
कथन के लिये तीन हैं एक सारे ।।
करम सत में और चित में है ज्ञान की गम ।
यही आत्मा में है आनन्द उत्तम ।।
जहाँ सत वहीं वहीं सुख है व्याया।
जो तीनों को समझे लखे अपना आपा ।।
इसी आये का रूप अपना समझना ।।
समझकर ने अज्ञान में फंस भटकना ।6।।
करे गुरु की संगत समझ तब यह आवे ।
मिले राधास्वामी जुगत जोग पावे ।।
Song 53 — Hindi
6-453 मेरे अवगुणों की करो तुम न गिनती ।
सुनो करके करुणा मेरे मन की विनती ।।
दया रूप हो तुम दया दृष्टि कीजे ।
मेरी भावनाओं की शुभ सृष्टि कीजे ।।
कमल पद की अपने मुझे छह दीजै ।।
मेरी बाँह में अपनी अब बाँह दीजे ।।
तुम्ही मेरे दाता तुम्ही मेरे स्वामी ।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
बनादो मुझे तुम दया से सुशीला ।।
से देखें संतोष भक्ति की लीला ।।
सदा सर्वदा मन में सुमिरन भजन हो ।
तुम्हारी दया बानी का नित कथन हो ।।
दयासिंधु हो राधास्वामी दयाला ।
करो दीन दुखियों का अब प्रतियाला ।।
Song 54 — Hindi
10-454 नहीं सिर्फ शहरों में तू कूबकू है।
जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ।।
मेरे दायें बायें मेरे आगे पीछे ।
मेरे साथ में है मेरे रूबरू है ।।
मेरी साँस साँस और दम का हमदम ।।
मेरी जान तन है मेरे दुबदू है ।।
है कसरत में वहदत में खिल्लत में जाहिर ।
बनों का है बातिन तुही मूबसू है ।।
खियाबाने गुलशन में है तू तरावत ।।
नमू बर्ग में और फूलों में बू है ।।
तेरी ही है रग रग में रेशा रवानी ।
तू खुद मैं में मैं है तू ही तू में तू है ।।
अगर नैकदे का है पीरेमु माँ तू ।
तो तू मैं है और जाम मीना सुबू है ।।
राधास्वामी ने भेद मुझको बताया।
तेरी जाँ की जाँ है तेरी रूह की रूह है ।।
Song 55 — Hindi
11-455 निहाँ में अयाँ है अयाँ में निहाँ है।
बताऊँ मैं क्या तू यहाँ है वहाँ है ।।
मुहीते गुजो कुल है कुल और जुज है।
भरा हर जगह तुझसे सारा जहाँ है ।।
कहीं हद कहीं तू बना आप बेहद ।।
कही बामकाँ है कहीं लामकाँ है ।।
गुलिस्ताँ में गुलबर्ग गुल की नजाकत ।
बना कोयल और बाग में नग्मेख्वाँ है ।।
समाया मेरे रंग में रेशे में आकर ।
नहीं तुझसे खाली मेरा जिस्म जाँ है ।।
यह जो सूरतें हैं तेरी सूरतें हैं ।
कहीं नाम है तू कहीं तू निशाँ है ।।
जहाँ मैंने देखा फक्त तुझको देखा ।।
हजारों ही शक्लों में जल्वा कुना है ।।
लतीफा है जौहर खुलासा है सबको ।
सताइश में हर नुक्तेदाँ तर जुबा है ।।
मुकद्दर है मकदुर खुदरत बना तू ।
यह खादिर हमेशा तेरा मदहरूवाँ है ।।
वह हैरत बना आप खुद राधास्वामी ।
जो मुर्शद के फज्लोकरम में अयाँ है ।।
Song 56 — Hindi
12-456 गुरु ने सहजयोग आकर सिखाया, परमार्थ पुरुषार्थ को गुर बताया ।
संचाई के अनुभव का मारग दिखाया, कृपा दृष्टि की रास्तेपर लगाया ।।
जगाया उठे नींद से सोने वाले ।
वह संभले जो पहले न संभले संभाले ।।
कटे मोह के और अविद्या के बंधन,नहीं अब कहीं नाम को भी है उलझन
बचन सुनते ही शब्द का भाया साधन, मिला सच्चिदानंद का घट में दर्शन
थे बाहरमुखी जो वह अन्तरमुखी है ।।
मिटा दुख कलेश और अब वह सुखी है ।।
सहारा दिया संग को अपने आकर ।
लगाया कमल पद में चित से चिताकर ।।
दया के क्षमा के बचन निज सुना कर ।।
सरल भाव भक्ति की महिमा जताकर ।
भजन ध्यान सुमिरन की युक्ति बताई।
खुली आँख से जग की दुरगति दिखाई ।।
नहीं द्रुतवादी के उलझन फंसे हम ।।
न अद्वैतादी के दलदल से हम ।।
चरन की मिली छाँह उसमें बसे इम ।।
स्वरूप अपना देखा सहज में हसे हम ।।
किनारे लगी आके नौका हमारी ।।
है अब भक्ति की रीति मन को पियारी ।।
सहज रूप हैं और सहज कर्म बानी ।
सहज ज्ञान के हम सहज ही हैं ज्ञानी ।।
नहीं पक्ष के और नहीं मत के मानी ।।
कमल पत्र सम तेरे भवनिधि के पानी ।।
कहाँ ब्रह्म माया का है द्वन्द हम में ।
न बन्धन न उलझन का है फन्द हम में ।।
सहसदलकमल तीसरे तिल को फोड़ा ।
चढ़े त्रिकुटी ओम् से नाता जोड़ा ।
महासुन और सुन मद मोह छोड़ा }
भंवर में महाकाल का मान तोड़ा ।।
पहुँचकर अधर सत की सत्ता लखी जब ।।
सुफल अपना जीवन सहज में किया तब ।।
अलख लख अगमलोक के ठहरे बासी ।
हुये सुख के रूप और आनन्द रास ।।
नहीं धृथवीं के हम न हम हैं अकासी । ।
हैं भत्र द्वन्द की ओर से अब उदास ।
दया अद्भुती तुमने की राधास्त्राम ।।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
.
बिनती
Song 57 — Hindi
457 सुनो विनती नाथ मेरी, जीव सहत कलेश ।
भच का बन्धन काट इनके, दया करो विशेष ।।
तरन तारन नाम धारा, तार दीजे आज ।
है तुम्हारे हाथ अब तो, स्वामी सब की लाज ।।
रोग भोग वियोग में, नहीं भक्ति साधन जोग ।
दीन बन्धु बख्श दीजे, शरन का संजोग ।
नाम दीजे काम कीजे, लीजे चरन लगाय ।
सब भिखारी हैं तुम्हारे, इनकी कीजे सहाय ।।
पतित पावन भय मिटावन, यह कहूँ कर जोर ।
राधास्वामी की मेहर से, छूटे मोर और तोर ।।
प्रार्थना
Song 58 — Hindi
458 कृपा सिंधु पूरन धनी, तुम सब के हितकारी ।
मंगल मय मंगल सदन, गुरु मंगलकारी ।।
दीन बन्धु करुना अयन, करुना के सागर ।
सगुन अगुन गुनवान हो, नागर गुन आगर ।
नहीं कोई महिमा कह सके, तुम अपरम्पारा ।
दया दृष्टि से देखिये, दे अपना सहारा ।
नाम रूप के जगत से, प्रभु तुम हो न्यारे ।।
नाम रूप दरसाय कर, बने सत्र के प्यारे ।।
भक्ति दान को दान दे, अपना कर लीजे ।
राधास्वामी नाम धन, कृपा मोहे दीजे ।।
नवी धुन
Song 59 — Hindi
1-459 प्रेम नगर के डमर में सजनी, सिरके बल तू आवरी ।।टेक।
प्रत रीति अमृत रस मीठा, हित चिंत. मन कर्म पावरी ।
जग का फीका स्वाद त्याग दे, मन बचन मेरा बाबरी ।।प्रेमनगर
मानुष देह दया से पाया, फिर नहीं ऐसा दाव री ।।
नर शरीर सुर को भी दुर्लभ, सुगम सुसाध सुभाव री ।।प्रेमनगर
जैसे बने तैसे करले कमाई, मन धर भक्ति का भाव री ।
घट में परगट गुरु की लीला, निरख निरख हरषाव री ।।प्रेमनगर
अन्तर में तेरे नौबत झड़ती, धम चल सहित हियाव री ।
अनहद बानी मंगल खानी, नित प्रति निसदिन गाव री ।।प्रेमनगर
राधास्वामी दया की मुरत, सांच दिल दरयाव री ।
चरण कमल की ओट पकड़ले, सूझे सुगम उपाव री ।।प्रेमनगर
Song 60 — Hindi
2-460 | पृथवी मंडल छोड़ के सजनी, उलट के चल असमान री ।।टेक।
सीधा मारग त्याग दे चित से, उलटे का कर ध्यान री ।
उलटे पन्थ है घर का रस्ता, कहना मेरा मान री ।।पृथवी
पृथ्वी गगन मंडल में सहस कमलदल, ओंकार अस्थान री ।।
घंटा शंख पखावज बाजे, सुन अनहद के कान री ।।पृथवी
सुन्न में गंग जमुन की धारा, तिरबेनी अस्नान री । ।
मान सरोवर हंस केल करे, नीर क्षीर को छान री ।।पृथवी
भंवर गुफा सोहंग धुन बंसी, कोटि कृष्ण करें गान री ।।
कोई कोई अवधू ज्ञानी समझे, गोपी गोप का तान री ।।पृथवी
सत्त धाम में बीन सुहानी, सुख आनन्द की खान री ।।
अलख अगम राधास्वामी पद ऊँचा, पहुँचे संत सुज्ञान री ।।पृथवी
उलट के अन्तर लख घट लीला, तब पावे गुरु ज्ञान री ।।
दहि जगत की सुख सब झूठा, अपनी बुद्धि पहचान री ।।पृथवी
धृथवी गुरु गम सुगम सुहावन प्यारी, कैसे करू बखान री ।
राधास्वामी दया करे जब पूरी, सूझे पद निरवान री ।।पृथवी
Song 62 — Hindi
462 त्याग भरोसे जगत को प्यारी, धार गुरु की असि तू ।।टेक।।
गुरु को खोज चरन में लगजा, भजे गुरु साँसों साँस तू ।
गुरु समन कोई देव न दूजा, देखले धरन अकोस तू ।।
त्यान गुरु की देयी जीते जी पाले, आनन्द हर्ष हुलास री ।
तन के चिछड़े सत्तधाम में, करे सदा सहवास तू त्याग
सोच समझ कुछ मन में अपने, जग में रही निवास तू ।।
स्वारथ बस सब कुटुम्ब कबीले, इनसे भई उदास तू ।।
त्याग बिपत पड़े तन मन सब बैरी, उरझी चिंता फाँस तु ।
असो तृणो मोह मयो सब, समझे काल को अस तू त्यांग
राधास्वामी सदा सहाई, आजा उनके पास तू ।
हो सतसंग विवेक सहित नित, कर अज्ञान का नास तू ।।त्याग
Song 63 — Hindi
4-462 ।। बिरह आगे कलेजे भड़की, निस दिन सोच रहे मन में री ।।टेक।
जा दिन पियो से भयो विछोहा, आये पड़ी पिंजरे तन में री ।।
बिलपू तड़पू पिया के कारन, मृगनी भटकी ज्यों बन में री ।।बिरह
अखियन नीर बहे जल धारा, जीत नहीं मेरे नैनन में री ।
काँटा विरह को उरमें साले, कैसी फैसी हूँ उलझन में री ।।
विरह बाँती छ । जस रटत पपिहरा, मैं रटती पिया छिन छिन में री ।
पिया बिन कोई नर मोहि सुहावे,सुख नहिं विन पिया जीवन में री बिरह
मैं धृथवी पियो गगन विराजे, कैसे मिले सजनी छिन में री ।।
पैसे नहीं जो उड़कर चालू, जीव पड़ा नित चिंतन में री ।।विरह
राधास्वामी दया के सागर, दया करो प्रभू इस पन में री ।
पल में चाहो पिया से मिलावो, सुरत शब्द के साधन में री ।।विरह
Song 64 — Hindi
5-463 आये पड़े भव के दुख सागर, डूब रही मॅझधार में रे ।।
टेका। गोते खाते बिकल शरीरा, कष्ट अधिक संसार में रे ।
है कोई ऐसा चतुर खिवय्या, करदे काढ़ किनार में रे ।।
आये अपना बल कुछ काम न आवे, चित है सोच विचार में रे ।।
कौन सुने मेरी किसको सुनाऊँ, शक्ति नहीं है पुकार में रे ।
आये संकट भारी बिपत घनेरी, रहा न वार न पार में रे ।।
बुड़त का कोई संग न साथी, कुल कुटुम्ब परिवार में रे ।
आये हाय हाय मैं केहि विधि निक, बैरी काल शिकार में रे ।
एक भरोसा राधास्वामी का, संत जीव उपकार में रे ।
आये राधास्वामी दाता दया बिचारो, मैं नहीं वार न पार में रे ।
बाँह पकड़ मोहि आप बचाओ, खींचो निज दरबार में रे । आये
बिनती।
Song 65 — Hindi
464 आदि अनादि अनन्त अमाया, निःकाया महिमा भारी ।
देव दनुज नर किन्नर करता, सन्त जनन के हितकारी ।।
क्या कोई जाने तुम्हारी लीला, अगम अपार अरूप हो तुम ।
भेद न पावे ऋषि मुनि कोई, सारे जगत के भूप हो तुम ।।
सुनत कान बिन लखत नैन बिन, चलत बिना पद निस बासर ।
बिन जिभ्या बोले बहु बानी, ग्रहन करत सब कुछ बिन कर ।।
प्रार्थना
Song 66 — Hindi
466 मंगल मय गुरु चरन, ताप त्रय हर लेने वाले ।
भव दुख सकल मिटाय, शान्त पद देने वाले ।।
भव सागर अति अगम पन्थ, नहीं सूझे कोई ।।
शब्द जहाज चढ़ाय, पार गुरु कीन्हा सोई ।।
बूढ़त रहे मॅझधार, मिला नहीं कोई सहाई ।
आये गुरु दातार, बाँह गह मेरी ठौर लगाई ।।
नाम रूप का भेद दिया, भरम भेद मिटाया ।
पद अभेद दरसाय, भेद को फन्द छुड़ाया ।।
राधास्वामी पद कमल, मन मधुप लुभाना ।
मने बानी के परे, मिला धुर पद निरवाना ।।
दसवी धुन
Song 67 — Hindi
1-467 राधास्वामी नाम की बलिहारी, गुरु नाम महा मंगलकारी ।।टेका।
राधास्वामी नाम को, जो गावे तर जाय।
कलि कलेश सब नाश हों, सुख पावे दुख जाय ।।
हो सहज सहज भवजल पारी । राधास्वामी
ऐसा नाम अपार, कोई न जाने भेद ।।
जो जाने सो पार हो, सहे न योनि का खेद ।।
जीवन न बने कभी संसारी ।। राधास्वामी
राधास्वामी गाय कर, जनम सुफल करले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने धरले ।।
यही नाम है सच्चा हितकारी ।। राधास्वामी0
राधा सुरत का मूल है, स्वामी शब्द का मूल ।
सब आये इस वृक्ष में, डाल पात फल फूल ।।
राधास्वामी नाम है सरकारी ।। राधास्वामी0
बैठक स्वामी अद्भुती, राधा निरखन हार ।
और न कोई लख सके, शोभा अगम अपार ।।
शोभा ही बने शोभा धारी ।। राधास्वामी0
गुप्त रूप जहाँ धारिया, राधास्वामी नाम ।
बिना मेहर नहिं पावई, जहाँ कोई विश्राम ।।
कोई समझे रहस्य को अधिकारी ।। राधास्वामी0
राधास्वामी सुमरिये, राधास्वामी गाय ।
राधास्वामी ध्याइये, मन चित बुद्धि लगाय ।।
गुरु देव करें तेरी रखवारी ।। राधास्वामी0
Song 68 — Hindi
2-468 राधास्वामी नाम की बलिहारी, गुरु नाम महा मंगलकारी ।।टेक।
राधास्वामी नाम को, जो गावे तर जाय ।
कलि कलेश सब नाश हों, सुख पावे दुख जाय ।।
इस नाम की महिमा है भारी ।। राधास्वामी0
ऐसा नाम अपार यह, भेद न कोई जान ।
जो जाने सो पार है, जग नहीं जन्मे आन ।
मिलती है बन्ध से छुटकारी ।। राधास्वामी
राधास्वामी गायकर, जनम सुफल करले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने धर ले ।।
नहीं कृत्रिम नाम हो हितकारी ।।
राधास्वामी0 राधा सुरत का मूल है, स्वामी शब्द का मूल ।
निज स्वरूप के वृक्ष में, डाल पात फल फल ।।
यह नाम नहीं है संसारी ।। राधास्वामी
बैठक स्वामी अद्भुति, राधा निरखनहार ।
और न कोई लख सके, शोभा अगम अपार ।।
निज सुरत है शब्द की दरबारी ।। राधास्वामी0
गुप्त रूप जहाँ धारिया, राधास्वामी नाम ।
बिना मेहर नहीं पावई, जहाँ कोई विश्राम ।।
बड़ भागी कोई हो अधिकारी ।। राधास्वामी0
अलख अगस अनाम का, राधास्वामी नाम ।।
तिरलोकी के है परे, राधास्वामी धाम ।।
वहाँ रंग न रूप न रेखा री ।। राधास्वामी0
Song 69 — Hindi
3-469 तेरी दया का दृढ़ विश्वास हुआ, चरनों में पड़ा निज दास हुआ ।।टेक।
करू बनती दोऊ कर जोरी, अरज सुनो राधास्वामी मोरी ।
संसार से सहज उदास हुआ ।। तेरी दया0
सत्त पुरुष तुम सतगुरु दाता, सब जीवन के पितु और माता ।
ढारस बाँधी घट में उजास हुआ । तेरी दया0
दया धार अपना कर लीजे, काल जाल से न्यारा कीजे ।
तब समझे गा माया को नास हुआ ।। तेरी दया0
सतयुग त्रेता द्वापर बीता, काहु न जानी शब्द की रीता ।
सब में अज्ञान का बास हुआ ।तेरी दया0
कलयुग में स्वामी दया बिचारी, परगट करके शब्द पुकारी ।
विद्या संत ज्ञान को भास हुआ ।। तेरी दया0 ।
जीव काज स्वामी जग में आये, भव सागर से पार लगाये ।
तब दुखी जीव सुख रास हुआ ।। तेरी दया0
तीन छोड़ चौथा पद दीना, सतनाम सत गुरु गति चीन्हा ।।
अनुभव का आप विकास हुआ ।। तेरी दया0
जगमग जोत होत उजियारा, गगन सोत पर चन्द्र निहारा ।
घट ब्रह्मरेन्द्र कैलास हुआ ।। तेरी दया0 ।
स्वेत सिंघासन छत्र बिंराजे, अनहद शब्द गैव धुन गाजे ।
हिंया उमगा हर्ष हुलास हुआ ।। तेरी दया0
क्षर अक्षर निह अक्षर पारा, बिनती करे जहाँ दास तुम्हारा ।।
पृथवी छूटी गुजर आकास हुआ ।। तेरी दया0
लोक अलोक पाऊँ सुख धामा, चरन शरन दीजे विश्रामा ।
राधास्वामी चरन निवास हुआ ।। तेरी दया0
Song 70 — Hindi
4-470 तुझे किसने कहा कि वह पास नहीं, वह तुझमें है कासी कैलास नहीं टेक
हूँढ़त हूँढ़त थक गये, पता न देने कोय ।
सन्तों के सतसंग में, उसका दर्शन होय ।
यह समझ ले पृथ्वी आकाश नहीं ।। तुझे0
घट में हैं सूझे नहीं, घट नहीं हूँढे कोय ।
चारों धाम में थक गये, अपना आपा खोय ।
निगुरा क्या पाच वह दास नहीं ।। तुझे0
साँस साँस में रम रहा, सबको रमता राम ।
आँख खुले दर्शन मिले, घट में जपे जब नाम । |
वह करम धरम अभ्यास नहीं ।। तुझे
अपना आपा परख ले, सुरत शब्द की चाल ।
अपने आप में वह रहे, समझो के हो तू निहाल ।
इसे कैसे मिले जिसे आस नहीं ।। तुझे
राधास्वामी नाम ले, घट में बंद लगाय ।
तब तत छिन दर्शन मिले, भ्रान्ती भरम भुलाय ।
वह तीरथ बरत उपवास नहीं ।। तुझे
Song 71 — Hindi
5-471 क्या करना था क्यों मैंने किया, संसार को क्यों चित अपना दिया ।।टेक
भूली भूली क्यों फिरी, फूली काम के संग ।।
बिसराया गुरुदेव को, अपना मन किया भंग ।।
नहीं घट में जलाया भक्ति दीया । संसार को
मान ईर्षा द्वेष की, अन्तर में खुली खान ।
ज्ञान रतन परखा नहीं, व्याप रहा अज्ञान ।
क्या लेना था, क्या मैंने लिया है। संसार को
प्रेम पियाला पटक कर, विषय घुट क्यों पी ।।
जो कोई विष को पिये, वह फिर कैसे जी ।।
नित विषय के विष को घोल पिया ।।
संसार को जीना उसका सुफल है, जिये जो प्रेम के कोज ।
नहिं तो मरजाना भला, यहि जीवन को लाज ।
जिया अपने लिये तो क्या वह जिया ।।
संसार को राधास्वामी दीन हित, कीजे मेरी सहाय ।
रहूँ चरन की ओट में, त्याग भरम समुदाय ।।
तुम ही हो प्यारे सच्चे पिया । संसार को
Song 72 — Hindi
6-472 संसार महा दुखदाई है, क्यों धोखे में मेरे भाई है ।।टेक।।
क्यों आया क्या कर चला, क्या लिया अपने साथ ।।
गये जो क्या लेकर गये, क्या था उनके हाथ ।
कर ध्यान तू क्या सौदाई है ।। संसार
मेरा तेरा कर मरा, कोई गया नहीं संग ।
देह तजी चलते समय, ज्यों केचुली भुजंग ।।
अब भी तुझे समझ न आई है ।।संसार
फूल खिले मुरझो गये, कुमलाये गये सुख ।
ऐसे ही सबकी दशा, डाली जड़ और रूखे ।
यहाँ जो है अगमा पाई है ।। संसार
जगमग तारे रात के कहने लगे प्रभात ।
मंद दशा अपनी हुई, क्या कह मुख से बात ।
क्यों आलस तुझको भाई हैं। संसार
पंच तत्व के मेल से, बना है नर को शरीर ।
पाँच, पाँच में मिलेंगे, कैसे आवे धीर ।
यह दशा तो सब पर आई है। संसार
प्रान देह के संग को, देख है कैसा मेल ।
प्रान देह तजकर चला, क्या विचित्र है खेल ।
कोई यहां न संग सहाई हैं । संसार
राधास्वामी संग में, करने अपना काज ।
काल सदा सिर पर खड़ा, सज चलने का साज ।
सत संगत ही सुखदाई है ।। संसार
Song 73 — Hindi
7-473 दुर्लभ अधिकारी को क्या है जी, अधिकार बिना क्या मिला है जी टेक
खोजी तो कोई नहीं, सब करें वाद विवाद ।
बिंन करन केसे मिले, निकट प्रेम का स्वाद ।।
बातों में न कुछ भी धरा हैं जी ।। दुर्लभ
आरत अधिकारी मिले, साधु होय दयाल ।
कुञ्जी भेद की दान दे, छिन में करे निहाल ।।
फिर तीर निशाने लगा है। जी ।। दुर्लभ
शम दम सावधान मन, युक्ति की हो चित चाह ।।
दयावंत गुरुदेव तब, आप लखावें राह है
अधिकार का उनको पता है। जी ।। दुलझ
आये समुन्दर के निकट, मन में धार उमंग ।।
मोती तो उसको मिले, डूबे सिंध अभंग ।
तटवासी निराश रहा है जी ।। दुर्लभ
प्रेम पियाला वह पिये, तन की छाँड़े आस ।।
तन का प्यार जिसे रहा, अंत में हुआ उदास ।।
राधास्वामी ने भेद दिया है जी ।। दुर्लभ
Song 74 — Hindi
8-474 भव जनम का हेरा फेरा है, क्यों तुझको संशय ने घेरा है ।।टेक।
नहीं आई अब तक समझ, अब कुछ समझले मीत ।।
आलस निद्रा छोड़ अब, आयु जायेगी बीत ।
झूठा सब मेरा तेरा है ।। भव
आये है सो जायेंगे, जाना बिस्वा बीस ।
जनम मरन चक्की चले, डालेगे उनको पीस ।।
यहाँ कोई सहाई न तेरा है ।। भव
पन्थी आया पन्थ में, एन्थाई के भाव ।
आगे को पग दे नहीं, कैसे सूझे उपाव ।
दुविधा दुचिता का डेरा है । भव
दस दिन जीना जगत में, जीने की नहीं आस ।।
इसकी आसा क्या करे, गुरुमुख गुरु का दास ।
जग चिड़िया रैन बसेरा है. ।। भव
काल शिकारी ताक में, तू है वारा बाट ।
सोच सोच कुछ सोचले, कर चलने का ठाठ ।।
क्यों बाढ़ का राह में डेरा है ।। भव
ज्ञान सूर परकाश से, करले अपना काम ।
काम सहज है बंधुआ, भज भज गुरु का नाम ।
आगे फिर घोर अंधेरा है ।।भव
सुमिरन भजन और ध्यान में अपना लगाले चित ।
राधास्वामी की दया, कुछ तो कर निज हित ।
उठ जाग तु अभी सवेरा है ।। भव
Song 75 — Hindi
8-475 गुरु चरणों में ठौर ठिकाना मिले;पदकमल की छाँह में आना मिले ।।टेक।।
देखा माना जान लिया, दुखदाई संसार ।।
भव सागर गम्भीर अति, सूझे वार न बार ।।
तरने को इससे बहाना मिले ।।
गुरु भक्ति मिले परतीत मिले, निश्चय श्रद्धा पाय ।।
प्रेम मगन मन निस रे, तन का सोच भुलाय ।
जो दिवाना बनाये दिवाना मिले ।।गुरु
नशा चढ़े इस ढंग का, उतरे नहीं खुमार ।।
नाम अटल माता रहे, पिये अभी रस धार ।
दे मस्ती ऐसी मस्ताना मिले । गुरु
भूखा प्रेम अहार का, प्यासा प्रेम के नीर ।।
भूख प्यास सब दूर हों, रहे निश्चित शरीर ।
ऐसा मुझे पानी दाना मिले । गुरु
राधास्वामी आदि गुरु, दया क्षमा भंडार ।
दया दृष्टि अब कीजिये, मेरा हो उद्धार ।
तुम जैसा कोई सियाना मिले । गुरु
Song 76 — Hindi
10-476 गुरु गहकर हाथ संभालो मुझे, भव जाल फैसा हूँ निकालो मुझे ।।टेक।।
पाँच शत्रु पीछे लगे, करें सदा उत्पात ।।
तुम मेरी रक्षा करो, देकर नाम का दान ।
समरथ गुरु उनसे बचालो मुझे ।। गुरु गह0
दीन अधीन मलीन चित, चंचल मूढ़ कुचाल ।
गुरु दात दुख भंजना, काटो यह जंजाल ।
हूँ मौत के मुंह में बचालो मुझे ।। गुरु गह
एक तुम्हारी आस है, ओस किसी की नाँह ।
शक्ति नहीं असक्त हैं, पकड़ो मेरी बाँह ।।
पद कमल की छाँह में पालो मुझे ।। गुरु गह
मेरे दिल में नित बसो, रख कर अपने संग ।
हिया जिया में बाढ़ सदा, प्रेम प्रतीत उमंग ।।
भव भय के भंवर से, उछालो मुझे ।। गुरु गह
विनती कब तक मैं करू, आयु बीती जाय ।
राधास्वामी दीन् हित, अब तो करो सहाय ।।
दुखदाई दसा से हटालो मुझे ।। गुरु गह
Song 77 — Hindi
11-477 अज्ञान का फन्द कटा देना, गुरु ज्ञान की जोति दिखा देना ।।टेक।
क्या हूँ कहाँ हैं कौन हूँ, कहाँ से आया भाग ।।
तुम कैसे मिले अब मुझे, क्यों चित बड़ा अनुराग ।।
यह अकथ कहानी सुना देना । अज्ञान
विद्या अविद्या वस्तु क्या, जनम मरन क्यों होय ।
ईश जीव सम्बन्ध क्या, समझे क्योंकर कोय ।।
भली भाँति यह मरम समझा देना । अज्ञान
जनम न लेना हानि क्या, जनम लिया तो लाभ क्या ।
जनम मरन में दुख महा, कौन उसे है चाहता ।।
बस गुत्थी को तुम सुलझा देना ।। अज्ञान
परमारथं व्यौहार क्या, क्या है इसमें भेद ।
किस विधि बरतें यह विषय, शास्त्र स्मृति भेद ।।
जो तत्व हो उसे बता देना । अज्ञान
भरम जाल के फाँस में, हँस पाया बहु दुख ।
अब गुरु का संग मिला, मन कुछ पावे सुख ।।
राधास्वामी निज पंथ लखा देना ।। अज्ञान
Song 78 — Hindi
12-478 दो दिन का मेला ठेला है, फिर क्या है तू आप अकेला है ।।टेक।।
तिरिया बोली पुरुष से, तू है जनम का मीत ।
अन्त समय नहीं संग हुई, यही यहाँ की रीत ।।
यह मिथ्या सारा झमेला है ।। दो दिन
माता बोली पुत्र से, पुत्र पुत्र है तू ।।
| घर को बसा व्यौहार कर, सुन्दर आवे बहू ।।
सबने इस खेल को खेला है ।। दो दिन
बाप कहे बेटा मेरा, स्वारथ बस लपटान ।
बिन स्वारथ बेटा नहीं, कर न उसका ध्यान ।।
फिर बेटा नहीं मिट्टी का ढेला है ।। दो दिन
धन दौलत सब हैं भरे, यह नर का अभिमान ।
चलते समय विचार कर, सब हैं धूल समान ।।
नहीं संग छदाम न धेला है ।। दो दिन
परमारथ व्यौहार में, देखा यह व्यौहार ।
बाप पुत्र चेला गुरु, इनमें कहाँ कुछ सार ।।
नहीं गुरु यहाँ कोई न चेला है ।। दो दिन
जहाँ स्वारथ तहां जगत है, कही सुनी मतं मान ।
अपनी आँखों देख लो, जान मान पहचानं ।।
नहीं समझ तो दुख नित झेला है। दो दिन
राधास्वामी संग में, तत्व को मरम को बूझ ।
शब्द योग अभ्यास कर, ले अनुभव की सूझ ।।
यह साधनं सुगम सुहेला है। दो दिन
Song 79 — Hindi
13-479 जब चढे सुरत नभ के मंडल, नहीं चित भंग न मन चंचल ।।टेक।।
मन के तीन स्वरूप हैं, मूढ़ अबुद्धि कुचाल ।
यह सुधरे छिन में अभी, जब हों गुरु दयाल ।
फिर फंसे न माया के दल दल । जब चढ़े0
गुरु पद परस के शान्त हो, अब नहीं श्रान्ती न भर्म ।।
चाह मिटी चिंता गई, कटे जनम को कर्म ।।
चले सत की ओर हो सँभल संभल ।। जब चढ़े0
अलख लखा वो अगम गम, अकथ की कथा विचार ।
निज घट में बासा किया, सतगुरु की बलिहार ।।
अन्तर में धंसा, बाहर से मचल । जब चढ़े0
मैं क्या हैं और क्या तज़, नहीं गहन नहीं त्याग ।
इत्ते तोड़ा भात्र को, उतकी ओर को भाग ।।
यहाँ से वहाँ पहुँचा सहज निकल ।। जब चढे0
राधास्वामी की दया, सुफल भई नर देह ।
अब क्यों भरमावे मुझे, कुल परिवार और गेह ।
मिले गुरु भक्ति का यह है फल ।। जब चढ़0
आप ही आप मिले सकल, भक्ति मुक्ति सतज्ञान।
हो मस्त जो पिये प्रतीति भंग !
Song 81 — Hindi
[19-486 ] तुमने सतसंग से क्या पाया, नहीं समझ में सार तत्व आया ॥टेका।
सुमिरन ध्यान भजन का, प्रगटा नहीं प्रभाव ।
फिर क्या लाभ भया तुम्हें, हाथ पड़ा नहीं दाव ।
यूँ ही भरमे और भरमाया ॥तुमने
सहसकमल भ्रमध्य की, समझ न आई बात ।
त्रिकुटी पद परखा नहीं, मन का मचा उत्पात ।
कहाँ सुन्न समाध में लव लाया ॥
तुमने शब्दार्थ के ज्ञान की, नहीं पाई कुछ गम ।
समय अमोलक खोगया, नहीं दम है नहीं शम ।
क्या हुआ जो शब्द भजन गाया ॥
तुमने0 आसन मारे क्या हुआ, नहीं समाहित चित ।
तुमने गुरु के संग में, किया न अपना हित ।
माया और काल ने अटकाया ॥
तुमने चेत चेत अब चेत ले, चेत के करले काम ।
सोच सोच कुछ सोच मन, सोच के जप गुरुनाम ।
राधास्वामी ने सब विधि समझाया ॥तुमने
Song 82 — Hindi
[20-487 ] जब ओढ़ी सत की कामरिया, सुनी भँवर सोहंगम बाँसुरिया ॥टेक॥
सोहम् सोहम् धुन उठी, गूज रही चहुँ ओर ।
बंसी की धुन मधुर सुन, मगन हुआ मन मोर ।
सुरत नाहीं रही गांवरिया । जब0
जब माया काल की लख दशा, अब न पड़ अज्ञान।
सुन बंसी की तान को, सत के चलू मैदान ।
सतगुरु संग फिरे मेरी भाँवरिया ॥जब0
आँख खुली दर्शन मिला, चमका सत का नूर ।
निकट हुई गुरुदेव से, अब तो रही न दूर ।
दुविधा की भागी चामरिया ॥जब0
योग ज्ञान संजोग से, प्रगट भये गुरुदेव ।
चरन कमल चित जोड़कर, करुं निरंतर सेव ।
मिला मुझको मेरा साँवरिया ॥जब0
राधास्वामी भज सदा, मेटा मन का विकार ।
जहाँ देखू गुरुदेव हैं, महिमा अगम अपार ॥
हुई सूर सुरत मेरी पामरिया ॥जब ओढ़ी0
सुमिरन भजन न ध्यान में, मन चंचल ठहराये ।
फिर तू बतादे बाबले, कैसे आनन्द पाये।
करनी करो लो गुरु शरनी ॥
यह समझ गुरु के संग में जाय कर, सीख शब्द अभ्यास ।
आप ही प्रगटे हिये में, उज्जल विमल प्रकाश !
इस विधि भव सागर से तरनी ॥
यह समझ बिन गुर ज्ञान न भक्ति है, विन गुरु नहीं परतीत ।
बिन गुरु भरमत क्यों फिरे, यह नहीं अच्छी रीत ।
अब आओ राधास्वामी की चरनी ॥
यह समझ
Song 83 — Hindi
[17-484 ] सीखो नित प्रेम का रंग ढंग, यह समझलो गुरु है अंग संग टेका।
धीरज समता में रहे, शान्ति रहे भरपूर ।
घट में उगे अनेक विधि, ज्ञान के चन्द्र और सूर ।
बाढ़े प्रतीति और उमंग ॥सीखो नित
नद नाले बह वह बहे, फूटी अटूटी धार ।
निर्मल होगये आप ही, मैल अशुद्धि टार ।
मिले आकर जब वह संग गंग ॥सीखो नित
आँखें ठहरी रूप में, लगे जो सच्चा ध्यान ।
अनहद धुन प्रगटे विमल, उसी ओर रहे कान ।
घट में लगे बजने मोर चंग ॥सीखो नित
सहस कमल के मध्य में, श्याम कंज भ्रमध्य ।
चित अपनी बैठक करें, फिर नर क्यों हो बद्ध ।
निरवान की शोभा दे तरंग ॥सीखो नित
राधास्वामी आदि गुरु, सदा करे कल्यान !
आप ही आप मिले सकल, भक्ति मुक्ति सतज्ञान।
हो मस्त जो पिये प्रतीति भंग !
Song 84 — Hindi
[18-485 ] तुम्हें चिंता नहीं है क्या मेरी, जो दया में ऐसी हुई देरी ॥टेक।।
दिन को सुख आनन्द नहीं, नींद न आवे रात ।
दबा हृदय छाती फटे, कैसे कहूँ कुछ बात ।
चहुँ ओर से बिपता ने लिया घेरी ॥
तुम्हें रात गई दिन भी गये, बीते बरस और मास ।
पिया निर्दई न दया करे, किसकी राखू आस ।
मेरे पांव पड़ी दुख की बेड़ी ॥
तुम्हें आँखों से आंसू बहे, जैसे मेघ की धार ।
तड़प तड़प तड़पी बहुत, तड़प का वार न पार ।
कोई मुझसा दुखी नहीं जग हेरी ॥
तुम्हें तड़पे जल से निकल कर, जैसे निर्जल मीन ।
तैसे ही गति है मेरी, होगई दीन अधीन ।
हो विकल करूँ हेरा फेरी ।।
तुम्हें गीली लकड़ी आग में, पड़ी सदा धुदवाय ।
जली बरी जल बर मरी, बचन का कौन उपाय ।
हुई राख की भारी मैं ढेरी ॥
तुम्हें राधास्वामी परम हित, दया दृष्टि से देख ।
मेटो दुखदाई दशा, कटे करम का लेख ।
गुरु दर की अब तो बनी चेरी ॥तुम्हें
Song 85 — Hindi
[19-486 ] तुमने सतसंग से क्या पाया, नहीं समझ में सार तत्व आया ॥टेका।
सुमिरन ध्यान भजन का, प्रगटा नहीं प्रभाव ।
फिर क्या लाभ भया तुम्हें, हाथ पड़ा नहीं दाव ।
यूँ ही भरमे और भरमाया ॥तुमने
सहसकमल भ्रमध्य की, समझ न आई बात ।
त्रिकुटी पद परखा नहीं, मन का मचा उत्पात ।
कहाँ सुन्न समाध में लव लाया ॥
तुमने शब्दार्थ के ज्ञान की, नहीं पाई कुछ गम ।
समय अमोलक खोगया, नहीं दम है नहीं शम ।
क्या हुआ जो शब्द भजन गाया ॥
तुमने0 आसन मारे क्या हुआ, नहीं समाहित चित ।
तुमने गुरु के संग में, किया न अपना हित ।
माया और काल ने अटकाया ॥
तुमने चेत चेत अब चेत ले, चेत के करले काम ।
सोच सोच कुछ सोच मन, सोच के जप गुरुनाम ।
राधास्वामी ने सब विधि समझाया ॥तुमने
Song 86 — Hindi
[20-487 ] जब ओढ़ी सत की कामरिया, सुनी भँवर सोहंगम बाँसुरिया ॥टेक॥
सोहम् सोहम् धुन उठी, गूज रही चहुँ ओर ।
बंसी की धुन मधुर सुन, मगन हुआ मन मोर ।
सुरत नाहीं रही गांवरिया । जब0
जब माया काल की लख दशा, अब न पड़ अज्ञान।
सुन बंसी की तान को, सत के चलू मैदान ।
सतगुरु संग फिरे मेरी भाँवरिया ॥जब0
आँख खुली दर्शन मिला, चमका सत का नूर ।
निकट हुई गुरुदेव से, अब तो रही न दूर ।
दुविधा की भागी चामरिया ॥जब0
योग ज्ञान संजोग से, प्रगट भये गुरुदेव ।
चरन कमल चित जोड़कर, करुं निरंतर सेव ।
मिला मुझको मेरा साँवरिया ॥जब0
राधास्वामी भज सदा, मेटा मन का विकार ।
जहाँ देखू गुरुदेव हैं, महिमा अगम अपार ॥
हुई सूर सुरत मेरी पामरिया ॥जब ओढ़ी0
Song 87 — Hindi
[ 21-488] सतगुरु की दया करे रखवारी, नहीं अब होता मैं संसारी ॥टेक।।
कमल नीर में ज्यों रहे, मैं बिचकै संसार ।
दुख सुख कुछ व्यापे नहीं, गुर के चरन अधार ।
गुर दरस की आसा चित धारी ।। सत गुरु की0
घर में रहकर भक्ति करू , नहीं विवेक विचार ।
गृह त्याग सब भर्म है, मन को रखू सँभार ।
उपदेश दिया गुरु हितकारी ॥सत गुरु की0
बाहर भीतर एक रस, व्याप रहा गुरुज्ञान ।
आनन्द सुख का जीवना, इसी में है कल्यान ।
मेरी दशा रहे सब से न्यारी ॥सत गुरु की0
सत्त नाम को सुमिर नित, बुद्धि मन ठराय ।
परख ले महिमा अगम की,नहीं माया भरमाय ।।
नहीं चिन्ता सतावेगी भारी ॥सत गुरु की0
राधास्वामी दीन हित, सच्चे दीन दयाल ।
रक्षक मेरे होगये, अब क्यों व्यापे काल |
__राधास्वामी चरन की बलिहारी । सत गुरु की0
Song 88 — Hindi
[ 22-489 ] मुझे दीन दयाल शरन दीजे, गहुँ ओट चरन की शरन दीजे ॥टेक।।
तुम्हें न भूलू रात दिन, भूलू अपनी देह ।
नाम में लवलागी रहे, त्यागे जग का नेह ।।
करे सुमिरन ध्यान वह मन दीजे ॥मुझे दीन0
बल शक्ति से हीन हूँ, चित का महा मलीन ।
दया कीजिये दीन पर, आपके हैं आधीन ॥
सुधरे सँभले वह यतन दीजे ॥
आज तुम्हारी कृपा से, जग से हुआ निरास ।
नहीं भरोसा किसी का, आपका हुआ विश्वास ॥
भक्ति का दिव्य रतन दीजे ॥मुझे दीन0
आरत की यह बीनती, सुनिये दयाल कृपाल ।
संयम भरम को मेट कर, तन छिन करो निहाल ॥
निर्धन को प्रेम का धन दीजे ॥मुझे दीन0
एक तुम्हारी चाह हो, और न कोई चाह ।
सब विधि हो रहूँ आपका, सहित उमंग उत्साह ॥
मन सधे वही साधन दीजे ॥मुझे दीन0
मुझे दीन0 दृष्टि में आओ मेरे, दर्शन घट में नित ।
यही है सच्ची लालसा, इसी से मेरा हित ॥
दृढ़ प्रेम हो ऐसा बचन दीजे ॥मुझे दीन0
मुझे दीन0 राधास्वामी जगत के, तुम हो पितु और मात ।
बने काम एक दृष्टि से, मिटे सकल उत्पात ॥
सत पद का सत जीवन दीजे ।
Song 89 — Hindi
[23-490 ] मेरे घट में गुरु अविनासी बसे, मन बुद्धि भक्ति के रस से रसे ॥टेक।।
बाग में फूल गुलाब का, खिल कर शोभा दे।
सिंध में मोती सीप हो, जो जिसका होले ॥
सब अपने अपने भाव लसे ॥मेरे घट में
बन में नाचे मोरगन, फूले फले बन राय ।
जिसकी जैसी गति रुचे, गति मति से हर्षाय ॥
प्राकृत दशा से सकल हँसे । मेरे घट में
चाह नहीं संसार की, भक्ति प्रेम की चाह ।
राधास्वामी की दया, गुरु के हाथ निबाह ॥
बरसा प्रेम की घट बरसे । मैं घट में
Song 90 — Hindi
[24-491 ] तुम भूले भूले भूल गये, मन ममता में पड़ कर फूल गये ।।टेक।।
मन मत में गुरुमत रहे, मन मत है अहंकार ।
अहम् भाव हृदय बसा, अपना किया अपकार ।
माया के हिन्डोले भूल गये ॥तुम भूले0
दो दिन का रहना यहाँ, गुरु से करलो हेत।
भव दारुन से तरन का, यही सुगम है सेत ।।
यहाँ से प्रतिकूल अनुकूल गये । तुम भूले0
भूल भुलैय्याँ जगत है, भूले बहु विधि भूल ।
अन्त काल सिर सहेंगे, दुखदाई त्रिसूल ॥
लघु भूल गये बहु भूल गये । तुम भूले0
भव सागर उमड़े सदा, उठे लहर अपार ।
गुरु के साथ में मानुवा, सहज उतरजा पार ॥
नहीं जो समझे जड़ मूल गये ॥तुम भूले0
राधास्वामी दीन हित, दीन दयाल महान ।
कर उनका सतसंग नित, आनन्द का हो भान ।।
सतसंग से भव के मूल गये ।। तुम भूले0
[ 25-492 ] मैं आई सतगुरु की शरनी, नर जनम सुफल भया अब सजनी ॥टेक।।
नहीं सुख बाद विवाद में, पक्षपात सुख नाँहिं ।
द्वष ईर्षा सुख कहाँ, सुख भक्ति के माँहि ॥
तज सबको करूं प्रेम करनी ॥मैं आई0
ग्रंथी ग्रंथन की खुली, पच पच मरी पढ़ ग्रन्थ ।
गुरु मिले शीतल भई, लख सत पद का पन्थ ॥
नहीं भूल करूँ कथनी बदनी ॥मैं आई0
भाग जगा सोया मेरा, दया करी गुरु देव ।
सब की आसा त्याग कर, मेटा मन का मेव ।।
क्यों मृत्यु लोक में नित मरनी ॥मैं आई0
अवश्यमेव भोक्तव्यम्,, कृतकर्म शुभाशुभम् ।
गुरु चरणम् नमस्तव्यम्, सद्गुरुम सब परम् ॥
जैसी करनी वैसी भरनी ॥मैं आई0
विज्ञानं सद्प्रसादेना, गुरु बिन शब्द न कथ्यते ।
जपस्तपो ब्रतं तीर्थ, बिन गुरुपद न लभ्यते ॥
राधास्वामी नाम सदा भजनी ॥मैं आई0
Song 91 — Hindi
[ 29-493 ] पहुँचादो प्रेम नगरियाजी, मैं तो भूल गई हूँ डगरियाजी ॥टेका।
चलते चलते थक गई, और न सूझे छोर ।
कहाँ को चली हूँ सुध नहीं, बहका मन चित चोर ।।
रस्ते में पाऊँ रगरिया जी ॥पहुँचादो
चलते चलते दिन गया, साँझ आई और रात ।
कहाँ ठहरूँ जाऊँ कहाँ, समझ न आई बात ॥
हो सके तो करदो उजरियाजी ॥पहुँचादो
मैं तुमको भूली नहीं, भूली अपनी देह ।
ऐसी भूली सुध नहीं, कहाँ ग्राम कहाँ गेह ।।
तुम कैसे मुझको बिसरियाजी ॥पहुँचादो
नाम तुम्हारा हॉट पर, मन में तुम्हारा ध्यान ।
देह पड़ी है पन्थ में, निकट तुम्हारे प्रान ॥
क्या कहूँ जो मुझ पे, गुजरिया जी ॥पहुँचादो
भूखी प्रेम के स्वाद की, प्यासी प्रेम के नीर ।
प्रेम ज्ञान गुरु दीजिये, जो तुम धार गम्भीर ।
भरो घट की प्रेम गगरिया जी ॥पहुँचादो
पन्थ में नंगे पांव हूँ, दुख से रही घबराय ।
काँटा लगा बिरह का, तड़प तड़प अकुलाय ॥
क्यों लेते नहीं हो खबरिया जी ॥पहुँचादो
राधास्वामी इष्ट पद, धुर पद सर्वाधार ।
कब पहुँचूगी चरन में, भव के दुख सुख टार ।।
भोगूगी सत की सेजरिया जी ॥पहुँचादो
Song 92 — Hindi
[ 27-494 ] नहीं कर्मी हुई नहीं ज्ञानी हुई, मैं अपने गुरु की अभिमानी हुई ।।टेक।।
गुरु गम निगमागम मता, है रहस्य का भेद ।
जो कोई जाने भेद यह, सहे न भव का खेद ।।।
गुरु मिले सहज निर्वानी हुई ॥
नहीं कर्मी निश्चल जप तप यम नियम, संयम ज्ञान विचार ।
जब लग गुरु का संग नहीं, कठिन जीव उद्धार ॥
गुरु भक्ति विवेक की खानी हुई ॥
नहीं कर्मी गुरु मूरति हृदय बसी, ध्यान धारना पाय ।
समता आई चित्त में, यह समाधि समुदाय ।।
कर योग यतन गुरु ध्यानी हुई ।।
नहीं कर्मी समता गुरु के रूप में, लख लख गुरु का रूप ।
समदर्शी मैं होगई, तज चंचलता कूप ।
गुरु प्रेमी बनी मस्तानी हुई ॥
नहीं कर्मी गुरु अखंड है सिंधगति, जीव है बुन्द समान ।
राधास्वामी की दया, लिया रहस्य पहिचान ॥
पड़ सागर पानी पानी हुई ॥नहीं कर्मी
Song 93 — Hindi
[ 28-495 ] निज दरस दिखादो अपना पिया, मेरा तरस रहा है बहुत जिया टेक॥
आँखों में भाई पड़ी, राह निहार निहार ।
जिव्हा में छाले पड़े, नाम पुकार पुकार ।
किसने कभी जप तप ऐसा किया ॥
निज दरस सहस्त्र नेत्र देखू तुम्हें, सहस कमल भ्रमध्य ।
सहस जोत निरखत रहूँ, दोऊ आँख कर बंद ।
दर्शन बिन नित अकुलाय हिया ॥
निज दरस त्रिकुटी चढ़ छवि को लखू, लाल का अपने रूप ।
अँखियन में लाली खुबे, ओम ओम कहूँ भूप ।
लाली जोती का बालू घट में दिया ॥
निज दरस सुन्न सरोवर स्नान कर, चन्द्रकार मुख लेख ।
तन मन बुद्धि चित खो रहे, रूप तुम्हारा देख ।
तब मानू गी दरस का चैन लिया ॥
निज दरस अँखियाँ एकटक घूम रहीं, अंशा अंशी समान ।
भंवर गुफा सोहंगमा, सोहंग सोहंग भान ।
अब दरस अमी रस घोल लिया ॥
निज दरस देख लिया भ्रान्ती गई, सत सरूप तुम पीव ।
भर्म मिटा दो एक का, नहीं ब्रह्म नहीं जीव ।
राधास्वामी ने मेरा उपकार किया ॥
निज दरस अलख अगम अद्वत तुम, अकह अपार अनाम ।
अकथ कथा विचार कर, चुप हुई सुरत सुजान ।
राधास्वामी हिये का टाँका सिया ॥निज दरस
Song 94 — Hindi
[29-496 ] कहीं है यहां सत की बजरिया जी, मुझे लेनी है प्रेम चदरिया जी ॥टेका।
मोल तोल नहीं करूंगी, प्रेम वस्तु अनमोल । ॥ ॥
सीस काट दूंगी अभी, सुनकर प्रेम का बोल ।
__ मैं ओढ़ के बने गी गुजरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने भेद ।
सौदा करे जो प्रेम का, सहज मिटे भव खेद ।
माया की पड़े न नजरिया जी ॥कहीं है।
एक प्रेम की चाह है, और न दूजी चाह ।
प्रेम रतन जिसको मिले, जग में शाहन्शाह ।
कोई प्रेम के पन्थ न परियो जो ॥कहीं है।
बाढ़े पाकर भक्त जल, जैसे कमल की नाल ।
घटे न तिलभर वह कभी, प्रेम की ऐसी चाल ।
जिसे प्रेम मिले नहीं मरिया जी ॥कहीं है।
प्रेमी हूँढ़त मैं फिरू, प्रेमी मिले न कोय ।
प्रेमी से प्रेमी मिले, प्रीतम प्रगटे सोय ।
जप तप में आयु गुजरिया जी ॥
कहीं है घटे बढ़े रोये हँसे, उसे न कहना प्रेम ।
प्रेमभाव मन में बसा, नहीं तप संयम नेम ।
बसे छिन में प्रेम नगरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम पियाला जो पिये, काटे अपना सीस ।
तब प्रीतम का स्वाद ले, निकट हो विश्वा बीस ।
नहीं किसी को उसकी खबरिया जी ॥
कहीं है आपा अपना लख पड़े, घट जब प्रेम बसाय ।
राता माता नाम मद, नहीं कहीं आवे जाय ।
क्यों भरम के कूप में गिरिया जी ।। कहीं है।
एक रस प्रेम का स्वाद है, पीते करे निहाल ।
इसका पीना कठिन है, माँगे सीस कलाल।
नहीं माया की वह कलवरिया जी ॥कहीं है।
पन्थ सम्प्रदा बहुत हैं, मत और धर्म अनेक ।
प्रेम का रस्ता किधर है, जो नित परखे एक ।
बन्दू चलकर प्रेम नगरिया जी॥कहीं है।
वाद विवाद में प्रेम कहां, पक्षपात नहीं होय ।
प्रेम दिवानी हो रहूँ, मन की दुविधा खोय ।
तन मन धन को बिसरिया जी ॥
कहीं है पढ़ पढ़ कर मर मर गये, लाखन पोथी ग्रन्थ ।
लख नहीं पाया एक ने, प्रेम का सच्चा पन्थ ।
द्वष अग्नि में जर जर मरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम का मारा नहीं जिये, कितना करो उपाय ।
जनम मरन के टाट को, उलट दिया सिमटाय ।
किसे कभी लगी प्रेम कटरिया जी ॥कहीं है।
काम क्रोध मद लोभ सब, छिन में जावे भाग ।
भसम करे माटी करे, प्रेम प्रचन्ड की आग ।
दुविधा दुचिता सब टरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम प्रेम नित प्रेम हो, प्रेम की बन्धी टेक ।
प्रेम महा बलवान है, लखे न एक अनेक ।
इस प्रेम से कोई न लरिया जी ॥कहीं है।
सुरत शब्द में प्रेम है, शब्द सुरत में प्रम।
अन्धकार मेटे सकल, घट में जरे सब टेम ।
सब विद्या अविद्या विसरिया जी ॥
कहीं है ढूँढ़त हूँढ़त थक गई, मिला न प्रेम का घाट ।
घर बाहर की ना रही, हो गई बारह बाट ।
मिला प्रेमी पुरुष न तिरिया जी ॥कहीं है।
आई हूँ जाऊँ नहीं, रगर प्रेम की धार ।
जो होना हो हो रहे, मरूंगी तीन को मार ।
नहिं छोडूगी अब तो रगरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम चदरिया ओढ़ कर, अब तो चली दरबार ।
सुरत सहेली सुहावनी, पायेगी दीदार ।
राधास्वामी नितनाम सुमिरया जी ॥कहीं है।
Song 95 — Hindi
[ 30-497 ] गुरु का नहीं सीखा रंग ढंग, माया ने कर दिया चित को भंग ।।टेका
क्या करना था क्या किया, करता धरता बन ।
कहाँ से कहाँ को ले गया, बहका कर यह मन ।
सूझी उसे देखो क्या तरंग ॥
माया ने शुक आया गुरुदेव हो, सुनो परीक्षित बात ।
करले अपने काम को, नहीं यम करे उत्पात ॥
दिन सात में काटे फिर भुजंग ॥
माया ने0 पड़े परीक्षा कठिन है, पूरा उतरे जो।
वही परीक्षित शिष्य है, शुक का गुरु मुख सो॥
मन में रहे नित भक्ति उमंग ॥
माया ने समय मिला अवसर मिला, खोया समय अमोल ।
देख देख अचरज महा, मुखनहीं आवे बोल ।।
इस दशा को लख हुआ हृदय दंग ॥
माया ने भरमा भरमा भटक कर, जनम को दिया गवाय ।
अब पछताये क्या बने, हाथ न कुछ भी आय ॥
क्यों पीली भरम की घोल भंग ॥
माया ने0 चलना है दस दिवस में, रहना नहीं है मीत ।
तजो न माया उलझ कर, भक्ति भाव की रीत ॥
गुरु देव को करलो अंग संग ॥माया ने0
दरस परस मंजन करो; पियो प्रेम का नीर ।
राधास्वामी की दया, मन के बनो गम्भीर ।।
देखो देखो है बहती प्रेम गंग ॥माया ने
Song 96 — Hindi
[31-498 ] घट में खुली प्रेम की क्यारी जी, निरखू नित छबि फुलवारी जी ॥टेक॥
श्रद्धा फूल गुलाब का, जूही दया का फूल ।
देख देख आनन्द लहूँ, तन मन की सुध भूल ॥
यह हृदय हुआ सुखकारी जी ॥
घट में खुली0 मन लोभी भंवरा बना, लोभा देख बिलास ।
रात दिवस हर्षत उड़े; त्याग जगत की आस ॥
यह दशा है अति ही भारी जी ॥
घट में खुली0 फली फली मैं फिरू, सदा मगन मन माँहि ।
अब किस की चिंता करू, चिंता कोई नाहि ॥
भक्ति लगी चित को प्यारी जी ॥
घट में खुली बास सुवास को पाल कर, अब क्यों रहूँ उदास ।
बसी बसी बस बस गई, बसी प्रेम की बास ॥
नहीं फिरूंगी मारी मारी जी ॥
घट में खुली0 सत चित आनन्द बाटिका, अन्तर शोभा दे।
नित सुख और मंगल लहूँ, प्रेम का सौदा ले ।
करूँ पल पल में रखवारी जी ॥
घट में खुली धन्य भाग सतगुरु मिले, दिया प्रेम का दान ।
दान पाय धनवान हूँ, खुली प्रीत की खान ।।
प्रगटी उभरी उजियारी जी ॥
घट में खुली राधास्वामी की दया, पाई बिमल बहार ।
सीचू क्यारी को सदा, दुर्मति दुर्गति टार ॥
बनवारी की हूँ दरवारी जी ॥घट में खुली0
Song 97 — Hindi
[ 32-499 ] जग बहती है भक्ति की देखो गंग, तुम निर्मल करलो अपना अंग ।।टेक।।
दरस परस मंजन करो, पियो प्रेम का नीर ।
मेटो दुख प्रय ताप को, ठंडा करो शरीर ।
भूलो नहीं करलो सत का संग ॥जग बहती है।
आँखें हर्षी देख कर, चित बाढ़े अनुराग ।
सुमिरन ध्यान में मन लगे, दुचिताई को त्याग ।
उठे प्रेम प्रतीत की नित तरंग ।। जग बहती है।
गंगा के तट आय कर, बिन नहाये नहीं जाओ।
भव सागर के तरन का, यही है एक उपाओ।
रहे हिया जिया में सच्ची उमंग ॥जग बहती है।
नर शरीर के मल हैं, काम क्रोध अभिमान ।
छूटेंगे जब करोगे, गुरु संग गंगा स्नान ।
आलस का न आने पाये ढंग ॥
जग बहती है ढारस श्रद्धा भाव की, रहे हिये में छाय ।
राधास्वामी की दया, भव दारुण न सताय ॥
यह समझलो गुरु है अंग संग ॥जग बहती है
Song 98 — Hindi
[33-500 ] मेरे घट की क्यारी हरी रहे, क्यों हरी अकेली भरी रहे ॥टेका।
खिले गुलाब प्रतीत का, शोभा क्यारी दे।
फले सुगंधी प्रेम की, सब कोई आनन्द ले ।
अँखियों को दृश्य की तरी रहे ॥
मेरे घट0 चंपा दया का फल दे, फूल दया के फूल ।
भरम का भंवरा सन्निकट, कभी न आवे भूल ॥
फूलों की निरंतर झरी रहे ॥मेरे घट0
सेवति केतकी मोतिया, शान्ती जूही कुन्द ।
एक रूप भासें सदा, मेट कुरंगी द्वन्द ।।
सम दृष्टि चमेली खरी रहे ॥
मेरे घट0 भक्ति अनार में फूल लगे, फूटी लाली नित ।
बिगसें कमल उमंग के, देख के उमगे चित ॥
माया की बेली मरी रहे ।
मेरे घटक सुरत मालिनी गूधकर, लाये भाव का हार ।
हरषे आनन्द सुख लहे, राधास्वामी गले डार ॥
दुष्कर्म कटेली जरी रहे ॥मेरे घट0
Song 99 — Hindi
[34-501 ] अब दरस की चाह उठी भारी, मुझे दरस दे हरो विपता सारी ।।टेका।
दृष्टि जमाऊँ रूप में, रूप में चित ठैराय ।
करो दया से मेरी रखवारी ।
अब दरस आँखों में मेरे बसो, देखू तुमको नित ।
इसी दरस के आसरे, सच्चा मेरा हित ॥
हो दुखियों के तुम हितकारी ॥
अब दरस एक टक देखू आँख भर, पलक न कभी झपाय !
जीवन मेरा सुफल हो, सत गुरु करो सहाय ॥
सहज में जाऊँ पारी || अब दरस चित चकोर चन्दा बने, चन्द्र मेरे गुरु देव ।
देवी देव को त्याग कर, करूं तुम्हारी सेव ।।
लखू अन्तर में सुरत प्यारी ।
अब दरस खुली आँख देखू तुम्हें, घट की आँखें खोल ।
राधास्वामी दीन हित, चित को करो अडोल ।।
चरन शरन की बलिहारी । अब दरस
Song 100 — Hindi
[35-502 ] मुझे तार दो मेरी है बारी, तुम हो गुरु सच्चे हितकारी ॥टेक॥
त्राहि त्राहि चरनों पड़ी, व्याकुल जिया घबराय ।
दीन दुखी की ओर लख, सतगुरु बनो सहाय ।
काटो जग का संकट भारी ॥
मुझे तार भव समुद्र का पार नहीं, उठे लहर अपार ।
साथी संगी कोई नहीं, नाव पड़ी मझधार ।
अब तक मैं फिरी मारी मारी ॥
मुझे तार किसी का नहीं है आसरा, नहीं कोई आधार ।
तुम बिन कोई सूझे नहीं, करे जो मेरी संभार ।
गुरु तुम हो सच्चे हितकारी ॥
मुझे तार सहजो तरी दया तरी, मीरा तर गई नाथ ।
शबरी तर गई भीलनी, पकड़ तुम्हारा हाथ ।
मेरी ओर करो दृष्टि न्यारी ।
मुझे तार राधास्वामी दीन हित, निहकामी निज देव ।
संकट काटो दुख हरो, मेटो मन का भेव ।
मैं जाऊँ सहज भव जल पारी ॥मुझे तार







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