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[४-७६३ ] धन दुख हरन धन सुख करन, मंगल भवन पूरन धनी ॥धन पतित पावन भव नसावन, ताप त्रय गंजन धनी ॥त्रय लोकनाथ अनाथ बन्धू, दीन सुखदायक प्रभू ॥धन प्रणतपाल दयाल मायातीत, सुरनायक प्रभू
[४-७६३ ] धन दुख हरन धन सुख करन, मंगल भवन पूरन धनी ॥
धन पतित पावन भव नसावन, ताप त्रय गंजन धनी ॥
त्रय लोकनाथ अनाथ बन्धू, दीन सुखदायक प्रभू ॥
धन प्रणतपाल दयाल मायातीत, सुरनायक प्रभू ।॥
तुम अपरम्पार अपार सतगुरु, ब्रह्म रूप अगोचरम् ॥
तुम दीनबन्धु दयाल स्वामी, जगत हित धरनी धरम् ।॥
तुम आदि कारन कर्म करता, दीन हितकारी प्रभू ॥
तुम आदि अन्त अनन्त रक्षक, हरहु दुख . भारी प्रभू ।॥
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[५-७६४ ] धन भक्त वत्सल नाथ करुणा, पुज धन धरनी धरम् ॥धन कमल नयन कपाल रूप, अनूप धन धन सद्गुरुम् ॥कोई जाने माया तेरी क्योंकर, नेति नेति अगम कहे ॥तेरा नाम गावे भक्त निस दिन, परम सुख आनन्द लहे
[५-७६४ ] धन भक्त वत्सल नाथ करुणा, पुज धन धरनी धरम् ॥
धन कमल नयन कपाल रूप, अनूप धन धन सद्गुरुम् ॥
कोई जाने माया तेरी क्योंकर, नेति नेति अगम कहे ॥
तेरा नाम गावे भक्त निस दिन, परम सुख आनन्द लहे ।॥
पतित पावन भव नसावन, भक्त मन भावन प्रभू ॥
संशय मिटावन नाम तेरा, धन सदा धन सतगुरु ॥
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[ 6-765 ] हाथ जोड़ नवाय मस्तक, चरन कमल की बंदना ॥शुद्ध मन से ध्यान सुमिरन, जनम को लूँ मैं बना ॥नींद में हो दण्डवत, जाग्रत परिकरमा मेरा ॥जब सुषप्ती का समय हो, हृदय में हो घर तेरा
[ 6-765 ] हाथ जोड़ नवाय मस्तक, चरन कमल की बंदना ॥
शुद्ध मन से ध्यान सुमिरन, जनम को लूँ मैं बना ॥
नींद में हो दण्डवत, जाग्रत परिकरमा मेरा ॥
जब सुषप्ती का समय हो, हृदय में हो घर तेरा ।॥
देखू तेरा रूप पल पल, गाऊँ तेरे नाम को ॥
रूप नाम के आसरे गुरु, पाऊँ मैं बिसराम को॥
नाम का रसना में रस हो, कान अनहद धुन सुनें ॥
तेरी लीला की कथा को, बुद्धि मन चित सब गुर्ने ॥
बोलू जब तेरा कथन हो, चुप रहूँ तेरा मनन ॥
मेरा सब कुछ तुझपे अरपन, देह बानी चित्त मन ॥
दृष्टि दे ऐसी मुझे यह, जगत तेरा रूप हो ॥
गोते मारू तुझ में छिन छिन, तू अमी का कूप हो ॥
तृ हो मेरा मैं हूँ तेरा, और से क्या काम है॥
तेरा सेवक जब हुआ, होठों पे तेरा नाम है॥
तू है दाता तू विधाता, तेरी केवल आस है॥
हो गया भंवरा कमल पद का, चरन में बास है॥
देख अबगुन को न मेरे, मैं हूँ अवगुन से भरा॥
तू गुनागर है दयामय, दे चरन का आसरा ।॥
प्रम तेरा तेरी भक्ति, तेरी सेवा ध्यान हो॥
तेरा सुमिरन और भजन हो, तेरा अन्तर ज्ञान हो॥
राधास्वामी सतगुरु, करतार संकट काट दे॥
छीन ले सब सम्पदा, भक्ति का मुझको ठाठ दे ।॥
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[7-766 ] कोट स्तुती बन्दना करूं, सीस चरन झुकाय ॥हृदय भंवरा पद कमल स्वामी, छोड़ अन्त न जाय ॥ऋद्धि सिद्धि न माँगू नौ निधि, चित्त नित्य उदास ॥चरन शरन की सेव निस दिन, रहे मन की आस
[7-766 ] कोट स्तुती बन्दना करूं, सीस चरन झुकाय ॥
हृदय भंवरा पद कमल स्वामी, छोड़ अन्त न जाय ॥
ऋद्धि सिद्धि न माँगू नौ निधि, चित्त नित्य उदास ॥
चरन शरन की सेव निस दिन, रहे मन की आस ।॥
भजन सुमिरन ध्यान पूजा, ज्ञान कर्म न जान ॥
प्रीत रीति का सार प्रभु क्या, जाने यह अनजान ॥
दीन हीन अधीन सब विधि, त्याग सबकी आस ॥
आय चरनन में पड़ा, तुम दीजो चरन निवास ॥
प्रेम धार बहाये खोलो, आज अमृत खान ॥
ज्ञान र प्रकाश पावे, मेटो तुम अज्ञान ॥
चढ़े सुरत आकाश मेरी, करे शब्द बिलास ॥
आस केवल गुरु चरन की, जग से सदा निरास ।॥
नाम रत्न का दान दीजे, साधु संग बिहार ॥
राधास्वामी दया कीजे, तुम हो पतित उधार ॥
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[8-767 ] गुरु के पत में आयकर, गुरु मत ले पहचान ॥यह अवसा और यह समय, बहुर न देखे आन ॥गुरू मत
[8-767 ] गुरु के पत में आयकर, गुरु मत ले पहचान ॥
यह अवसा और यह समय, बहुर न देखे आन ॥
गुरू मत. गुरू भेदी लखे, तासों मन पतियाय ॥
पढ़ा लिखा जाना बहुत, यह नहीं ठीक उपाय ॥
नाम तो तेरे घट बसे, नाम से तू रहे लाग ॥
राधास्वामी गुरू कृपा, पावे पूरन भाग ॥
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-768 ] तू क्यों सोवे मोह नींद में, जाग जाग सूरत प्यारी ॥निरख परख कर मन अपने की, आठ पहर की रखवारी ॥यह संसार है दुख की खानी, सोच सोच मन में अपने ॥चिड़िया रैन बसेरा है जग, कुल कुटुम्ब मिथ्या सपने ॥एक आस विश्वास गुरू की, और सकल भ्रमजाल महा ॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक गुरु की शरन गहा ॥mam बिनती
-768 ] तू क्यों सोवे मोह नींद में, जाग जाग सूरत प्यारी ॥
निरख परख कर मन अपने की, आठ पहर की रखवारी ॥
यह संसार है दुख की खानी, सोच सोच मन में अपने ॥
चिड़िया रैन बसेरा है जग, कुल कुटुम्ब मिथ्या सपने ॥
एक आस विश्वास गुरू की, और सकल भ्रमजाल महा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक गुरु की शरन गहा ॥
mam बिनती
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[ 769 ] दीन हीन शरन में आया, कीजे आप सहाय ॥काल का भय सहज मेटो, अपने चरन लगाय
[ 769 ] दीन हीन शरन में आया, कीजे आप सहाय ॥
काल का भय सहज मेटो, अपने चरन लगाय ।॥
सिंधु भव अति अगम दुस्तर, सूझे वार न पार ॥
हो दया की दृष्टि साई, नाव है मंझधार ॥
पतित पावन तरन तारन, यह तुम्हारा नाम ॥
बाल विनती सुनो चित से, मन को दो विश्राम ॥
ज्ञान नहीं निरवान नहीं, अनुमान से नहीं काम ॥
शब्द का दे आसरा प्रभु, बख्श दीजे नाम ।॥
नाम दान प्रदान कीजे, नाम रतन महान ॥
राधास्वामी दया सागर, कीजिये कल्यान ॥
राधास्वामी सतगुरु, करतार संकट काट दे॥
छीन ले सब सम्पदा, भक्ति का मुझको ठाठ दे ।॥
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प्रार्थना [ 770 ] धन्य सतगुरु दीन बन्धु, धन्य जग हित सतगुरुम् ॥धन्य कासी तेरी काया, धन्य काली विश्वेश्वरम्
प्रार्थना
[ 770 ] धन्य सतगुरु दीन बन्धु, धन्य जग हित सतगुरुम् ॥
धन्य कासी तेरी काया, धन्य काली विश्वेश्वरम् ।॥
धन्य चित शक्ति उमा और, धन्य बास हिमाचलम् ॥
धन्य नन्दी शिव सेवक, धन्य आसन निश्चलम् ॥
धन्य. यह कैलास मानस, धन्य हंसन ब्रथ है ॥
धन्य धन्य बैताल योगी, सिद्ध ऋषि जन जूथ है ॥
हम गनेश के रूप तेरे, बाल शरनागत हुये॥
धन्य तू बिस्माध मूरति, आये संगत किये ।॥
सुन्न सहज समाध साधी, धर्म की शिक्षा मिली॥
राधारानी की दया से, काल को आरत टली ।॥
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उन्नीसवी धुन [1-771 ] दर्शन की मैं प्यासी गुरु, मेरे दर्शन की मैं प्यासी ॥टेका॥दर्शन दीजे अपना कीजे, बनू चरन की दासी ॥गुरु मेरे दर्शन की रहे
उन्नीसवी धुन
[1-771 ] दर्शन की मैं प्यासी गुरु, मेरे दर्शन की मैं प्यासी ॥टेका॥
दर्शन दीजे अपना कीजे, बनू चरन की दासी ॥
गुरु मेरे दर्शन की रहे. आस घनेरी, सब से रहूँ निरासी ॥
गत अंधेरी पन्थ न सूझे.. कर दो सहज उजासी॥
सा. को देखा किया परेखा, ज्ञानी ध्यानी उदासी ॥
मेरी लाज तुम्हें है साई, करो न जग में हाँसी ॥
दुख से दुखित रहुँ निस बासर, तुम ही हो सुखरासी॥
महिमा अगम अपार तुम्हारी, अजर अमर अविनासी ॥
मेरे घट में आन बिराजो, तुम घट घट के बासी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काटो यम की फाँसी ॥
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[2-772 ] बाँह गहे की लाज, सतगुरु बाँह गहे की साज
[2-772 ] बाँह गहे की लाज, सतगुरु बाँह गहे की साज ।।टेक॥
आया दीन हीन चरनन में, परमारथ के काज ।॥
सतगुरु नाम दान दे अपना कीजे, माँगू मान न राज ।॥
सतगुरु ज्ञान ध्यान योग नहीं क्रिया, भक्ति साजन साज ।॥
सतगुरु शरनागत की लज्जा राखो, नहिं तो होवे अकाज ॥
सतगुरु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जग से आया भाज ।॥सतगुरु
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773-शरनागत की लाज स्वामी, शरनागत की लाज ॥टेक
773-शरनागत की लाज स्वामी, शरनागत की लाज ॥टेक।॥
तुम तो आये नरः देही में, शरनागत के काज ।॥
स्वामी मैं हूँ दीन अधीन तुम्हारा, तुम राजों के राज ॥
स्वामी ज्ञान करम की विधि नहीं जानू , नहीं भक्ति का साज ।॥
मामी भव भय अधिक सतावे मो. को, महा काल सिर गाज ॥
सामी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, दास को तारो आज ॥ स्वामी
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[4-774 ] तुम मेरे प्रान अधारे दाता, तुम मेरे प्रान अधारे
[4-774 ] तुम मेरे प्रान अधारे दाता, तुम मेरे प्रान अधारे ।टेक।॥
तन मन धन चरनन पर अरपू, जीऊ तुम्हारे सहारे ॥
दाता तुम बिन मेरा और न कोई, कुल कुटुम्ब परिवारे ॥
दाता मुझको भी दो चरन निवासा, बहु जीवन को तारे ।॥
दाता हाथ पकड़ भव भवर से स्वामी, जल्दी करदो किनारे ।॥
दाता राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम ही हो रखवारे ॥दाता
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[ 5-775 ॥चरन कमल की धूर बन्दशो, चरन कमल की धूर टिक॥यह धूरी जीवन की मूरी, करे रोग भव दूर ॥बख्शो
[ 5-775 ॥चरन कमल की धूर बन्दशो, चरन कमल की धूर टिक॥
यह धूरी जीवन की मूरी, करे रोग भव दूर ॥
बख्शो . माँज माँज मन मकुर का दरपन, देखू सतपद नूर ॥
आँख लगाऊँ अंजन निर्मल, मिटे तिमिर भरपूर ॥
“दिव्य दृष्टि की जोत अनूपम, ज्ञान ध्यान का सूर ॥
बख्शो0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, निरखू रूप हजूर ॥
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6-776 ॥हम तो निस दिन गुरु रंग राते ॥टेक॥गुरु की सेवा भजन बंदगी, कहीं नहीं आते जाते ॥हम तो गुरु का बल ले गुरु की दया से, करम के फन्द कटाते ॥उठत बैठत कबहूँ न बिसरें, ध्यान गुरु का लाते
6-776 ॥हम तो निस दिन गुरु रंग राते ॥टेक॥
गुरु की सेवा भजन बंदगी, कहीं नहीं आते जाते ॥
हम तो गुरु का बल ले गुरु की दया से, करम के फन्द कटाते ॥
उठत बैठत कबहूँ न बिसरें, ध्यान गुरु का लाते ।।
जब जागें तब गुरु का सुमिरन, नींद में गुरु संग पाते ॥
खुली आँख गुरु मूरत निरखें, बन्द तो मन बीच लाते ॥
छिन छिन पल पल दरस दिवाने, दरशन में मगनाते ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बल बल गुरु पर जाते ॥
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[7-777 ] प्रेम की डगर बता दो साई, तुमसे लगी मेरी नेह हो ॥टेक
[7-777 ] प्रेम की डगर बता दो साई, तुमसे लगी मेरी नेह हो ॥टेक।॥
जग नहीं भावे सुख न सुहावे, भूले सुध बुध देह हो ॥
साई0 छूटे सकल कुटुम्ब परिवारा, छूटे माया गेह हो॥
तन मन अरपू तुम्हरे चरनन, मन न रहे सन्देह हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, ऐसा सिखावन देह हो॥
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[8-778 ] प्रेम अधिक सुख दाई साधु, प्रेम अधिक सुखदाई ॥टेका॥काम क्रोध मद मोह शोक सब, तज दे छल चतुराई ॥साधु करम धरम का काट दे बन्धन, गुरु पद प्रेम जगाई ॥साधु माया काल करे नहीं हानी, गुरु संगत जब पाई ॥साधु धन सम्पत सुख दाम बड़ाई, अन्त काम नहीं आई ॥साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु अलख लखाई
[8-778 ] प्रेम अधिक सुख दाई साधु, प्रेम अधिक सुखदाई ॥टेका॥
काम क्रोध मद मोह शोक सब, तज दे छल चतुराई ॥
साधु करम धरम का काट दे बन्धन, गुरु पद प्रेम जगाई ॥
साधु माया काल करे नहीं हानी, गुरु संगत जब पाई ॥
साधु धन सम्पत सुख दाम बड़ाई, अन्त काम नहीं आई ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु अलख लखाई।
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[6-779 ] मैं तोरे रंग राती रे मोहना, मैं तोरे रंग राती ॥टेका॥छिन छिन पल पल गुन तेरा गाती, बन बन फिरू मत माती रे मोहना मेरे हिये तू निस दिन रहता, जैसे दिया में बाती रे मोहना तेरे कारन सब बज डासै, भाई बन्धु कुल जाती ॥रे मोहना मन मोहन की छवि अति अद्भुत, जिया को अधिक सुहाती॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देख देख हरपाती ॥
[6-779 ] मैं तोरे रंग राती रे मोहना, मैं तोरे रंग राती ॥टेका॥
छिन छिन पल पल गुन तेरा गाती, बन बन फिरू मत माती रे मोहना
मेरे हिये तू निस दिन रहता, जैसे दिया में बाती रे मोहना तेरे
कारन सब बज डासै, भाई बन्धु कुल जाती ॥
रे मोहना मन मोहन की छवि अति अद्भुत, जिया को अधिक सुहाती॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देख देख हरपाती ॥
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[10-780 ] तुम ही प्रान आधारे सतगुरु, तुम ही प्रान आधारे ॥सतगुरु हम तो दीन अधीन सकल विधि, साई तुम रखवारे ॥भव जल नाव पड़ी मझधारा, लीजो काढ़ किनारे ॥भजन बन्दगी भक्ति न जानी, जियें तुम्हारे सहारे ॥जब जब विपत कष्ट दुख पाया, तब तब तुमही संभारे ॥मात पिता भाई सुत बन्धु, कोई नाहिं हमारे ॥तुम समान रक्षक नहिं कोई, देखे हृदय बिचारे ॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हम सों पतित उद्धारे ॥
[10-780 ] तुम ही प्रान आधारे सतगुरु, तुम ही प्रान आधारे ॥
सतगुरु हम तो दीन अधीन सकल विधि, साई तुम रखवारे ॥
भव जल नाव पड़ी मझधारा, लीजो काढ़ किनारे ॥
भजन बन्दगी भक्ति न जानी, जियें तुम्हारे सहारे ॥
जब जब विपत कष्ट दुख पाया, तब तब तुमही संभारे ॥
मात पिता भाई सुत बन्धु, कोई नाहिं हमारे ॥
तुम समान रक्षक नहिं कोई, देखे हृदय बिचारे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हम सों पतित उद्धारे ॥
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[11-781 ] रटन लगी गुरु नाम की छिन पल पल में टेका॥क्रोध न व्यापे मोह न मोहे, चिन्ता नहीं कुछ काम की || छिन इन्द्री थकत गलत तन मन सब, अब सूझे विश्राम की ॥छिन मुरत निरत ने अखियाँ फेरी, दृष्टि नहीं है चाम की ॥छिन घट में नाम रतन जब पाया, फिकर नहीं धन धाम की ॥छिन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी आठों याम की || छिन
[11-781 ] रटन लगी गुरु नाम की छिन पल पल में टेका॥
क्रोध न व्यापे मोह न मोहे, चिन्ता नहीं कुछ काम की ||
छिन इन्द्री थकत गलत तन मन सब, अब सूझे विश्राम की ॥
छिन मुरत निरत ने अखियाँ फेरी, दृष्टि नहीं है चाम की ॥
छिन घट में नाम रतन जब पाया, फिकर नहीं धन धाम की ॥
छिन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी आठों याम की || छिन
Hindi
[12-782] मेरा पल्ला न पकड़ोजी, गुरु का दास बना ॥टेक॥सोबत जागत कबहुँ न विसरू, नाम तो जीवन साँस बना
[12-782] मेरा पल्ला न पकड़ोजी, गुरु का दास बना ॥टेक॥
सोबत जागत कबहुँ न विसरू, नाम तो जीवन साँस बना ।॥
मेरा मान मनी अपमान नहीं मन, दीन हीन ज्यों घाँस बना ॥
मेरा राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आम नहीं अब खास बना ॥मेरा
Hindi
[13-783 ] गुरु प्यारे ने दिया, मोहे भक्ति दान ॥टेक
[13-783 ] गुरु प्यारे ने दिया, मोहे भक्ति दान ॥टेक।॥
छूटी जग की छल चतुराई, छूटे मान अपमान ॥
गुरु. सत्त असत्त का भेद पिछाना, समझा ज्ञान अज्ञान ॥
गुरु0 काम क्रोध और लोभ ईर्षा, होय न इनसे हान ॥
गुरु0 प्रेम प्रीति का मारग पाया, खुली ज्ञान की खान ॥
गुरु0 राधास्वामी गुरु पर बलि बलि जाऊँ,वारू जान और प्रान॥
Hindi
[14-784 ] गुरु की दया से बन्ध छुट जावे ॥टेक॥मन से नाम जपे निस बासर, ध्यान गुरु के पद में लावे ॥गुरु0 अनहद शब्द सुने घट अन्तर, सुरत निरत को अधर चढ़ावे ॥गुरु छोड़ कुसंग सुसंग करे नित, सतसंगत में भक्ति कमाये ॥गुरु राधास्वामी दया परख हिये अपने, जनम को सुफल करावे ॥गुरु
[14-784 ] गुरु की दया से बन्ध छुट जावे ॥टेक॥
मन से नाम जपे निस बासर, ध्यान गुरु के पद में लावे ॥
गुरु0 अनहद शब्द सुने घट अन्तर, सुरत निरत को अधर चढ़ावे ॥
गुरु छोड़ कुसंग सुसंग करे नित, सतसंगत में भक्ति कमाये ॥
गुरु राधास्वामी दया परख हिये अपने, जनम को सुफल करावे ॥
गुरु
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[15-785 ] गुरु की महिमा अगम अपार, नित सतसंगत जाना हो ॥टेक॥सुन सुन बचन प्रीति हिय बाढ़ी, भक्ति भाव कमाना हो ॥गुरु0 श्रवण मनन और निध्यासन कर तब,उपजा सत का ज्ञाना हो॥भेद भरम की दुर्मति त्यागी, मूल तत्व दरसाना हो॥सत्त असत्त का निर्णय कीना, निश्चय कर मन माना हो ॥यह तो लीला अद्भुत अचरज, जाने साधु सुजाना हो ॥तन मन धन अरपे गुरू चरना, तिमिर मिटे अज्ञाना हो ॥गुरू मेरे परमदयाल कृपाला, नाम दान दिया दाना हो ॥दान पाये निरधनता भागी, भया ज्ञान धनवाना हो ॥गुरू की मूरत गुरू की मूरत, यह दर्पन प्रगटाना हो ॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पाया पद निरवाना हो ॥
[15-785 ] गुरु की महिमा अगम अपार, नित सतसंगत जाना हो ॥टेक॥
सुन सुन बचन प्रीति हिय बाढ़ी, भक्ति भाव कमाना हो ॥
गुरु0 श्रवण मनन और निध्यासन कर तब,उपजा सत का ज्ञाना हो॥
भेद भरम की दुर्मति त्यागी, मूल तत्व दरसाना हो॥
सत्त असत्त का निर्णय कीना, निश्चय कर मन माना हो ॥
यह तो लीला अद्भुत अचरज, जाने साधु सुजाना हो ॥
तन मन धन अरपे गुरू चरना, तिमिर मिटे अज्ञाना हो ॥
गुरू मेरे परमदयाल कृपाला, नाम दान दिया दाना हो ॥
दान पाये निरधनता भागी, भया ज्ञान धनवाना हो ॥
गुरू की मूरत गुरू की मूरत, यह दर्पन प्रगटाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पाया पद निरवाना हो ॥
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[16-786 ] गुरु पद सीस झुकाई, साधु गुरू पद सीस झुकाई ॥टेक
[16-786 ] गुरु पद सीस झुकाई, साधु गुरू पद सीस झुकाई ॥टेक।॥
सीस झुकावत डहा मानगढ़, ममता मोह गिराई ॥साधु0
भय बिसरा दारुण दुख विसरे, यम भूला चतुराई ।॥साधु0
जनम जनम का सोया मनुवा, गुरू ने आन जगाई ॥ साधु0
सिर पर हाथ दया का फेरा, अपने चरन लगाई ॥साधु0
कबहु न त्यागू कबहुँ न छोड़, पद सरोज लिपटाई ॥ साधु0
पल पल ध्यान ज्ञान रहे निस दिन, छिन छिन गुरु गुन गाई॥
… गुरु मेरे जान प्रान से प्यारे, मूरत हिये में बसाई ॥ साधु0
सेवा करू नित्य हित चित से, गुरू को लेऊ रिझाई ॥
साधु0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्तिसार अब पाई॥साधु0
[ 17-787 ] गुरु शरणागत आओ, साधु गुरू शरणागत आओगटेक॥
बिन गुरु दया विवेक न मुझे, ज्ञान गुरु संग पाओ ॥ गुरु0
तज अनेक को एक लखो तुम, एक में चित ठराओ ॥ गुरु0
एक को त्यागो ज्ञान दृष्टि से, सत पद ध्यान जमाओ ।॥गरु0
सत में एक अनेक कहाँ है, भरम मोह बिसराओ ।॥गरु0
द्वत अद्वैत में भूल भरम है, चित से भरम मिटाओ ॥ गरु0
भरम मिटे तब सार लखे कोई, सतसंग भरम मिटाओ ॥गुरु0
सुरत शब्द का साधन सीखो, घट मे नाद बजाओ ॥ गुरु0
झलके ज्योति की अन्दर धारा, देख देख हरषाओ ॥ गुरु0
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पद सीस झुकाओ ॥गुरु0
[18-788 ] बनत बनत बन जाई साधु, बनत बनत बन जाई ।।टेका॥
टेक न छोड़ो मुंह नहीं मोड़ो, प्रेम डगर में आई ॥
साधु0 निस बासर रहे गुरु का सुमिरन, प्रीति की रीति दृढ़ाई ।॥
साधु0 सेवा भजन में ज्ञान ध्यान में, गुरु के चरन लव लाई ॥साधु0
Hindi
[26-796 ] करलो गुरु का ध्यान, साधु करलो गरु का ध्यान ॥टेक
[26-796 ] करलो गुरु का ध्यान, साधु करलो गरु का ध्यान ॥टेक।॥
अखियाँ उलट तमाशा देखें, तिल का लिये निशान ||
साधु तिल में ज्योत ज्योत में जगमग, ज्योत देख हरषान ॥
साधु पचरंगी फुलवारी निरखी, भंवरा ताहि लुभान ॥
साधु चिल्ला चढ़ाओ सुरत निरत का, तोड़ो शिव की कमान ।॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, ध्यान रहा मन मान ॥ साधु
Hindi
[27-797 ] पारख शब्द विचारे, साधु पारख शब्द विचारे
[27-797 ] पारख शब्द विचारे, साधु पारख शब्द विचारे ।।टेक॥
जौहरी ज्यू हीरे को परखे, साधु शब्द निवारे ॥
साधु निरख परख चले घट के मारग, जाय द्वन्द से पारे ॥
साधु अपनी करनी पार उतरनी, कथनी सब तज डारे ॥
साधु रहनी से जो ध्यान लगावे, काल करम नहीं मारे ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहे गुरु के सहारे ॥ साधु
Hindi
[28-798 ] गुरु गन पल पल गाओ, फकीरवा गुरु गन पल पल गाओगटेक
[28-798 ] गुरु गन पल पल गाओ, फकीरवा गुरु गन पल पल गाओगटेक।॥
भव दारुण से बहु दुख पाया, भया कलेजे घाव ॥
फकीरवा रोग सोग की गरु प औषधि, उन शरनागत जाव ॥
फकीरवा मानुष देह मिली किरपा से, फिर नहीं ऐसा दाव ॥
फकीरवा वृथा जन्म मत खो तू अपना, भक्ति पदारथ पाव ॥
फकीरवा गरु खेवटिया पार लगावें, मँझ पड़ी तेरी नाव ॥फकीरवा
कंचन देह को कुन्दन करले, दे भक्ति का ताव ॥
फकीरवा सतसंग चेत करो सतगुरु का, उपजे प्रेम का भाव ॥
फकीरवा राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पद सरोज चितलाव ।॥
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[26-799 ] क्यों भरमा फकीर क्यों भरमा फकीर, काहे दिवाना होगया
[26-799 ] क्यों भरमा फकीर क्यों भरमा फकीर, काहे दिवाना होगया।टेक।॥
गुरू चरन गहा गुरू चरन गहा, ले ठौर ठिकाना होगया ।क्यों नहीं होय अकाज नहीं होय अकाज, यम फन्द कटाना होगया क्यों क्यों विकल रहे क्यों विकल रहे, अब तो मस्ताना होगया ॥
क्यों तन विमल हुआ तन विमल हुआ, गंगा स्नाना होगया क्यों सतसंग में आ सतसंग में आ, जप तप और ध्याना होगया क्यों क्या नियम धर्म क्या नियम धर्म, जब सत का ज्ञाना होगया क्यों नित नित का कर्म नित नित का कर्म राधास्वामी गुनगाना होगया ।॥
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[30 800 ] नर रूपी सुगना सत्त नाम रौं बोल ॥टेका॥ कर्म ज्ञान के तेरे पंख हैं, उड़जा पर को खोल
[30 800 ] नर रूपी सुगना सत्त नाम रौं बोल ॥टेका॥
कर्म ज्ञान के तेरे पंख हैं, उड़जा पर को खोल ।॥नर0
तन के पिंजरे से बाहर हो, घट मैदान में डोल ।॥नर0
घट में निस दिन अनहद बाजे, बीन बाँसुरी ढोल ॥ नर;
सुरत शब्द के गगन मंडल में, नहीं ममता का झोल ॥ नर0
चुग चुग गुरू वचनों का दाना, होजा अब अनमोल ॥ नर0
तज असार जो सार गहे फिर, तेरा मोल न तोल ॥ नर0
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुगना भया अतोल ॥ नर0
Hindi
[31 801 ] भजले सतगुरू नाम, सदा ही भजले सतगुरू नाम ॥टेक॥ आनन्द दायक सर्व सहायक, भज भज आठों याम ॥ सदा ही0 भव भय गंजन दोष निकंदन, व्यापे क्रोध न काम ॥ सदा ही नाम बिना नर जीवन सब विधि, निष्फल और बेकाम ॥ संदा ही नाम प्रताप काम से बाचे, दोनों नहीं एक ठाम ॥ सदा ही सुमिर मुभिर भज भज गुरु नामा, चल सत गुरू के धाम ॥ सदा ही माया मोह पर कर असबारी, दे दे मुंह में लगाम ॥ सदा ही राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक हुआ बेदाम ॥ सदा ही
[31 801 ] भजले सतगुरू नाम, सदा ही भजले सतगुरू नाम ॥टेक॥
आनन्द दायक सर्व सहायक, भज भज आठों याम ॥
सदा ही0 भव भय गंजन दोष निकंदन, व्यापे क्रोध न काम ॥
सदा ही नाम बिना नर जीवन सब विधि, निष्फल और बेकाम ॥ संदा ही
नाम प्रताप काम से बाचे, दोनों नहीं एक ठाम ॥
सदा ही सुमिर मुभिर भज भज गुरु नामा, चल सत गुरू के धाम ॥
सदा ही माया मोह पर कर असबारी, दे दे मुंह में लगाम ॥
सदा ही राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक हुआ बेदाम ॥ सदा ही
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[32 802 ] सय्याँ बेदरदी रे मेरी सुध लेत नहीं ॥टेक
[32 802 ] सय्याँ बेदरदी रे मेरी सुध लेत नहीं ॥टेक।॥
मैं तो बिरह अग्नि तन जारू, मेरी और चित देत नहीं ।
सय्याँ तर तड़पू पिया तुम कारन, तुमको मुझसे हेत नहीं ॥
सय्याँ अखियाँ आँसू बहे जल धारा, तन मन धन को चेत नहीं ।।
सय्याँ दरस दिवानी को दरशन दीजे, सब कुछ लीजे संत नहीं ॥
सय्याँ भव निधि राधास्वामी नाम का बेड़ा, तरने को कोई सेत नहीं।
Hindi
[33 803 ] हम जैसा बन आया, साधु हम जैसा बन आया
[33 803 ] हम जैसा बन आया, साधु हम जैसा बन आया ।टेका॥
रूप स्वरूप धरी नर मूरती, नर बन जीव चिताया ॥ साधु0
नर की रूप की शोभा भारी, नरतन महिमा गाया ॥
घर में प्रेम प्रीत सिखलाया, भक्ति का पन्थ चलाया ॥
सहज ही काटी यम की फाँसी, मरम अज्ञान मिटाया।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरू पद सीस मुकाया ॥
Hindi
[34 804 ] सुमिर मधुर गुरु नाम, साधु सुमिर मधुर गुरु नाम ॥टेका॥ तीन लोक सब काल पसारा, चौथे पद बिसराम || साधु भूल चूक में भरमे पानी, भोगे नरक निकाम ॥ "धन सम्पत और कुल परिवारा, सरे न इनसे काम ॥ श्री गुरु पद में ध्यान लगाओ, भक्ति करो, निष्काम ॥ छिन छिन अवध घटत निस बासर, त्यागो लोभ मद काम ॥ अन्तर में नौवत धुन झड़ती, सुनलो आठों याम ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जाओ धुरपद धाम ॥
[34 804 ] सुमिर मधुर गुरु नाम, साधु सुमिर मधुर गुरु नाम ॥टेका॥
तीन लोक सब काल पसारा, चौथे पद बिसराम ||
साधु भूल चूक में भरमे पानी, भोगे नरक निकाम ॥
“धन सम्पत और कुल परिवारा, सरे न इनसे काम ॥
श्री गुरु पद में ध्यान लगाओ, भक्ति करो, निष्काम ॥
छिन छिन अवध घटत निस बासर, त्यागो लोभ मद काम ॥
अन्तर में नौवत धुन झड़ती, सुनलो आठों याम ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जाओ धुरपद धाम ॥
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[35 805 ] सुरत प्यारी अधर धुर धाम चली ॥टेक
[35 805 ] सुरत प्यारी अधर धुर धाम चली ॥टेक।॥
मिला अभय बल गुरु कृपा से, अबला से अब हुई बली ॥
सुरत0 दया क्षमा की खङ्ग हाथ ले, हिंसा की तोड़ी पसली ॥
सुरत माथे झूमर भक्ति का पहना, प्रेम की डाली गले हसली ॥
सुरत माया ठगनी ठगत जगत को, ठगनी को ठगनी ठगली ॥
सुरत सहसकमल धस त्रिकुटी आई, सुन्न की गोद में जाय पली ॥
सुरत भंवरगुफा में काल को जीता, सताद उमंग सहित उछली ॥
सुरत अलख अगम राधास्वामी धाम चल, सतगुरु चरन कमल मचली।
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[36 806 ] तुझे कभी न बिसारूँ रे गुरु दाता ॥टेक
[36 806 ] तुझे कभी न बिसारूँ रे गुरु दाता ॥टेक।॥
बड़े भाग से दर्शन पाया, सब तन मन धन बारूँ रे गुरुदाता ॥
तुझे जनम जनम रहे तेरी आसा, सकल वासना जारूँ रे गुरुदाता ॥
तुझे मैं तो तेरे चरन लग स्वामी, कुल कुटुम्ब भी तारूँ रे गुरुदावा ॥
तुझे गुरु की टेक बसालू चित में, काम क्रोध मद मारू रे गुरुदाता ॥
तुझे प्रगटे ज्योत नयन में मेरे, प्रेम दीप घट बारू रे गुरुदाता ॥
तुझे घट में ध्यान जमाऊँ गाढ़ा, तृष्णा मोह निकारू रे गुरुदाता ॥
तुझे राधास्वामी राधास्वामी नाम का सुमिरन,चरन सरोज पखारू रे गुरुदाता
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[ 37 807 ] तेरे रूप लुभानी रे मन मोहना ॥टेक॥ तेरा रूप लगे अति प्यारा, केहि विधि करूँ बखानी ॥ रे मन रूप की महिमा अकथ कहानी, अलसाने मन बानी रे मन निरखू छवि एक टक नयनन से, गति मति भई दिवानी ॥ रे मन आँख बिचारी जनम की गूंगी, बिन बोले ललचानी ॥ रे मन बानी बिचारी जन्म की अन्धी, बिन देखे न बखानी ॥ रे मन मन मन्धा बहरा और गूगा, सोच समझ मन मानी गरे मन बुद्धि विवेकी अटपट वाली, भूल भरम भरमानी रे मन मोहना रूप अरूप स्वरूप एक हैं, अगुन सगुन की खानी ॥ निराकार साकार है क्या है, समझे कोई नर ज्ञानी ॥ रूप निरख घर परबत बन में, फिरू सदा मस्तानी ॥ योगी योग कर क्या फल पाया, ज्ञान कथे बहु ज्ञानी ॥ राधास्वामी रूप सुहाना लागा, तत्व विवेक निशानी ॥
[ 37 807 ] तेरे रूप लुभानी रे मन मोहना ॥टेक॥
तेरा रूप लगे अति प्यारा, केहि विधि करूँ बखानी ॥
रे मन रूप की महिमा अकथ कहानी, अलसाने मन बानी रे
मन निरखू छवि एक टक नयनन से, गति मति भई दिवानी ॥
रे मन आँख बिचारी जनम की गूंगी, बिन बोले ललचानी ॥
रे मन बानी बिचारी जन्म की अन्धी, बिन देखे न बखानी ॥
रे मन मन मन्धा बहरा और गूगा, सोच समझ मन मानी गरे मन
बुद्धि विवेकी अटपट वाली, भूल भरम भरमानी रे मन
मोहना रूप अरूप स्वरूप एक हैं, अगुन सगुन की खानी ॥
निराकार साकार है क्या है, समझे कोई नर ज्ञानी ॥
रूप निरख घर परबत बन में, फिरू सदा मस्तानी ॥
योगी योग कर क्या फल पाया, ज्ञान कथे बहु ज्ञानी ॥
राधास्वामी रूप सुहाना लागा, तत्व विवेक निशानी ॥
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[38 808 ] गुरु के रंग मदमाती रे गुजरिया ॥टेक॥ गुरु के चरन कमल में लग लग, मंद मंद मुस्काती रे गुजरिया प्रेम पियाला पिया तो होगई, मतवारी मदमाती ॥ सुमिरन भजन ध्यान में रहती, पल पल और दिन राती ॥ दीपक ज्ञान हृदय में बारा, पूर प्रेम की बाती ॥ अमृत नाम बद जब पाया, हित चित से तप्ताती ॥ दुख दारुण का तागा तोड़ा, अब तो फिरे मगनाती ॥ राधास्वामी धाम में बासा पाया, अब कहीं आती न जाती
[38 808 ] गुरु के रंग मदमाती रे गुजरिया ॥टेक॥
गुरु के चरन कमल में लग लग, मंद मंद मुस्काती रे
गुजरिया प्रेम पियाला पिया तो होगई, मतवारी मदमाती ॥
सुमिरन भजन ध्यान में रहती, पल पल और दिन राती ॥
दीपक ज्ञान हृदय में बारा, पूर प्रेम की बाती ॥
अमृत नाम बद जब पाया, हित चित से तप्ताती ॥
दुख दारुण का तागा तोड़ा, अब तो फिरे मगनाती ॥
राधास्वामी धाम में बासा पाया, अब कहीं आती न जाती।
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[ 36 809 ] घट प्रगट शब्द की धुन, कानों क्यों न सुने
[ 36 809 ] घट प्रगट शब्द की धुन, कानों क्यों न सुने ।।टेका॥
घंटा शंख बजे तेरे अन्तर, सुरत लगा कर मुन ।कानों
क्यों0 बाजे बीन पखावज बंसी, सुन गह शब्द का गुन ॥
भौतिक शब्द में चित न लगाना, गुरु के बताये चुन ॥
शब्द सुने जो नित प्रति घट में, चढ़ बैठे महासुन्न ॥
राधास्वामी दया से काज बनाले, भक्ति का बाना बुन ।॥
Hindi
[40 810] नाम सुमिर तरजाना, भवनिधि नाम सुमिर तर जाना टेका यह संसार बिपत की खानी, व्याप रहा दुख नाना
[40 810] नाम सुमिर तरजाना, भवनिधि नाम सुमिर तर जाना टेका
यह संसार बिपत की खानी, व्याप रहा दुख नाना ।॥
भवनिधि0 पार जो चाहो इसके जाना, नाम का सेत बनाना ॥
नाम से योग भक्ति का सारा, साधन सुगम सुहाना भवनिधि
सुमिरन सहज सहज है जपना, नाम से लव को लगाना ॥
, राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, नाम की भक्ति कमाना ।।,
Hindi
[ 41 811 ] साधु साधन सहज करीजे ॥टेक
[ 41 811 ] साधु साधन सहज करीजे ॥टेक।॥
बिन साधन कुछ हाथ न आवे, साधन भरम सुनी जे ॥
साधु0 जग व्यौहार न हो बिन साधन, परमारथ न बनीजे ॥
संस्कार और कर्म की लीला, फल के रूप पतीजे ॥
जैसी करनी वैसी भरनी, करनी सहित भरीजे ॥
कथनी बदनी काम न आवे, करनी को चित दीजे ॥
माना रूप प्राप्त है अपना, भर्म प्रभाव भुलीजे ॥
बिन साधन यह भर्म न जावे, साधन भर्म मिटीजे ॥
साधन सहज है शब्द योग का, उसकी रीति सिखीजे ॥
मन का मैल विकार मिटे जब, तब निज रूप लखीजे ॥
सहज ही सहज कमाई करना, भव जल पार चलीजे ॥
राधास्वामी की कृपा से, कारज सुफल करीजे ॥
Hindi
[42 812 ] मंगल गुरु के चरन कमल में, मंगल साज सजाओ ॥टेका॥ सुमिरन भजन ध्यान रहे छिन छिन, सुरत निरत ठेराओ ॥ मंगल अन्तर में लख गुरु की मूरत, ज्योत में ज्योत मिलाओ ॥ मंगल ज्योत अपार देह है घट में, ज्योत निरख हरषाओ॥ मंगल अनहद शब्द गूज रहा अंतर, सुन सुन चित्त लगाओ ॥ मंगल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धुरपद बासा पाओ ॥ मंगल
[42 812 ] मंगल गुरु के चरन कमल में, मंगल साज सजाओ ॥टेका॥
सुमिरन भजन ध्यान रहे छिन छिन, सुरत निरत ठेराओ ॥
मंगल अन्तर में लख गुरु की मूरत, ज्योत में ज्योत मिलाओ ॥
मंगल ज्योत अपार देह है घट में, ज्योत निरख हरषाओ॥
मंगल अनहद शब्द गूज रहा अंतर, सुन सुन चित्त लगाओ ॥
मंगल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धुरपद बासा पाओ ॥ मंगल
Hindi
[ 43 813 ] चल कीजे गुरु संगत, जहाँ प्रेम अमी जल बरसे ॥टेक॥ जो पावे गुरु पद भक्ति, यम फंद कटावे जरसे ॥ जेहि मिले नाम की दौलत, निरधनता से नहीं तरसे ॥ चल भव भय की रहे न चिन्ता, गुरु चरन कमल के परसे ॥ चल मद मोह काम दल भागे, भक्ति श्रद्धा के डर से ॥ चल राधास्वामी धुरपद सत पद, सतसंग के फल से दर से ॥ चल
[ 43 813 ] चल कीजे गुरु संगत, जहाँ प्रेम अमी जल बरसे ॥टेक॥
जो पावे गुरु पद भक्ति, यम फंद कटावे जरसे ॥
जेहि मिले नाम की दौलत, निरधनता से नहीं तरसे ॥
चल भव भय की रहे न चिन्ता, गुरु चरन कमल के परसे ॥
चल मद मोह काम दल भागे, भक्ति श्रद्धा के डर से ॥
चल राधास्वामी धुरपद सत पद, सतसंग के फल से दर से ॥ चल
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[ 44 814 ] गुरु समरथ दाता तारेंगे, गुरु समरथ
[ 44 814 ] गुरु समरथ दाता तारेंगे, गुरु समरथ ।टेक।॥
मन में सोच करे क्यों मूरख, बिगड़ी तेरी सुधारेंगे ॥
गुरु0 भूल चूक की चिंता क्यों है, करनी तेरी बिसारेंगे ॥
गोते खाते बहु दिन बीते, भव जल पार उतारेंगे ॥
दृष्टि नहीं तेरे करतब पर, अपनी ओर निहारंगे ॥
राधास्वामी शरन में जो नहीं आये, जीती बाजी हारेंगे॥
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[ 45 815 ] मेरी सुन्दर नार सुहेली, पिया को रिझाले तू ॥टेक
[ 45 815 ] मेरी सुन्दर नार सुहेली, पिया को रिझाले तू ॥टेक।॥
तेरा प्रीतम तेरे घट में, सुन्दर सेज बिछाले तू मेरी0
देख देख छवि अद्भुत पी की, प्रेम भाव उमगाले तू मेरी
गावत सुरत अनाहद मंगल, गाय गाय हरषाले तू ॥
मेरी शब्द गूंज घट में सुन प्यारी, अनहद नाद बजाले तू मेरी
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जनम को मुफल कराले तू ॥







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