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Song 0 — Hindi
504. अपने आपका धारो प्रेम ।
तब समझोगे प्रेम के नम । ।
अपनी समझ आप जब आवे ।
तब परमारथ गुरु लखावे ॥
अपना भला आप तुम करो ।
औरन के पीछे न मरो । ।
अपनी आंख खुले जब भाई ।
तब ही गगन प्रकाश दिखाई ॥
अपनी मौत स्वर्ग का दर्शन ।
बाकी सब मिथ्या है भाषन ॥
आप जिये तब ही जग जिया ।
आप मरे पीछे क्या रहा ।
आप आपको आप सँबारो ।
अपनी बिगड़ी आप सुधारो ॥
तब गुरु पूरे होंय सहाई ।
बनत बनत तेरी बन आई ।
जो नहीं समझेगा यह बानी ।
सो तो मूढ़ गूढ़ अज्ञानी ॥
राधास्वामी दीन दयाल ।
सार सुझाकर किया निहाल ॥
दोहाविना ओम् शनी सुने, ज्ञान न पाओ मीत ।
ऋषि मुनि या को कहें, घट का निज उद्गीत । ।
ओम् पाय सुरत हरखाई ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी धाई ।
लखा अविद्या का तहां रूप ।
प्रगटा काल जगत का भूप ॥
गुरु के नाम तिमिर सब नासा ।
चन्द्र जोत का भयो उजासा ॥
सुन्न महामुन्न लखा पसारा ।
मान सरोवर आसन मारा ॥
ज्ञान ध्यान असनान कराई ।
सुरत हंस गति पा हरखाई । ।
दोहाहंस ब्रह्म छवि अद्भुति, शोभा अमल अपार ।
लख लख अलख महान गति, सूझा अमल अपार ॥
आपा बिसरा जगत मुलाना ।
मिटा काम मद भया अमाना ॥
यकटक रूप दृष्टि जब आया ।
तेज पुज प्रकाश सुहाया ।
वानी चार गुप्त धुन जागी ।
सुरत प्रेम भक्ति रस पागी ।
सरंग सारंग सरंग सारंग ।
मंत्र एकाक्षर शिव मन धारंग ॥
मुनत सुनत मन भया बिस्माध ।
सुन्न महा उन्न लगी समाध । ।
दोहादेह गेह की सुध गई, हंस की आई चाल ।
दशा सुहानी पाय कर, सूरत भई निहाल ।। ।
कुछ दिन सुन्न समाध रचानी ।
मिला ज्ञान तब हुई बिज्ञानी ।
आगे को फिर किया पयाना ।
भैपर गुफा की ओर ठिकाना ॥
छाया माया माया छाया ।
अपना निज आकार दिखाया ।
झांई में निरखी परछाई ।
सोई परे का ब्रह्म गोसाई ॥
परछाई की जोति अनूपम ।
लख लख चन्द्र सूर से उत्तम । ।
दोहामुरली बाजी गुफा में, सोहंग से हंग धुन ।
विस्माधि बिसमत सुरत, अभय भई तेहि संग । ।
खिड़की निरख चली आगे को ।
पांव न धरे भूल पाछे को । ।
प्रगटा तब सत का मेहाना ।
बीन मधुर धुन आई काना ।
सत्त पुरुप का दर्शन पाया ।
कोटिन सूरज चन्द्र लजाया । ।
जगमग जगमग जगमग होई ।
दरस परस पावे नर कोई ॥
बड़भागी जो यह पद भाये ।
आगमन सकल विधि नाये । ।
दोहासतपद निरख परख कर, गई अलख के द्वार ।
अगम अनाम के पार चढ़, राधास्वामी दरबार ॥
तब समझोगे प्रेम के नम । ।
अपनी समझ आप जब आवे ।
तब परमारथ गुरु लखावे ॥
अपना भला आप तुम करो ।
औरन के पीछे न मरो । ।
अपनी आंख खुले जब भाई ।
तब ही गगन प्रकाश दिखाई ॥
अपनी मौत स्वर्ग का दर्शन ।
बाकी सब मिथ्या है भाषन ॥
आप जिये तब ही जग जिया ।
आप मरे पीछे क्या रहा ।
आप आपको आप सँबारो ।
अपनी बिगड़ी आप सुधारो ॥
तब गुरु पूरे होंय सहाई ।
बनत बनत तेरी बन आई ।
जो नहीं समझेगा यह बानी ।
सो तो मूढ़ गूढ़ अज्ञानी ॥
राधास्वामी दीन दयाल ।
सार सुझाकर किया निहाल ॥
दोहाविना ओम् शनी सुने, ज्ञान न पाओ मीत ।
ऋषि मुनि या को कहें, घट का निज उद्गीत । ।
ओम् पाय सुरत हरखाई ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी धाई ।
लखा अविद्या का तहां रूप ।
प्रगटा काल जगत का भूप ॥
गुरु के नाम तिमिर सब नासा ।
चन्द्र जोत का भयो उजासा ॥
सुन्न महामुन्न लखा पसारा ।
मान सरोवर आसन मारा ॥
ज्ञान ध्यान असनान कराई ।
सुरत हंस गति पा हरखाई । ।
दोहाहंस ब्रह्म छवि अद्भुति, शोभा अमल अपार ।
लख लख अलख महान गति, सूझा अमल अपार ॥
आपा बिसरा जगत मुलाना ।
मिटा काम मद भया अमाना ॥
यकटक रूप दृष्टि जब आया ।
तेज पुज प्रकाश सुहाया ।
वानी चार गुप्त धुन जागी ।
सुरत प्रेम भक्ति रस पागी ।
सरंग सारंग सरंग सारंग ।
मंत्र एकाक्षर शिव मन धारंग ॥
मुनत सुनत मन भया बिस्माध ।
सुन्न महा उन्न लगी समाध । ।
दोहादेह गेह की सुध गई, हंस की आई चाल ।
दशा सुहानी पाय कर, सूरत भई निहाल ।। ।
कुछ दिन सुन्न समाध रचानी ।
मिला ज्ञान तब हुई बिज्ञानी ।
आगे को फिर किया पयाना ।
भैपर गुफा की ओर ठिकाना ॥
छाया माया माया छाया ।
अपना निज आकार दिखाया ।
झांई में निरखी परछाई ।
सोई परे का ब्रह्म गोसाई ॥
परछाई की जोति अनूपम ।
लख लख चन्द्र सूर से उत्तम । ।
दोहामुरली बाजी गुफा में, सोहंग से हंग धुन ।
विस्माधि बिसमत सुरत, अभय भई तेहि संग । ।
खिड़की निरख चली आगे को ।
पांव न धरे भूल पाछे को । ।
प्रगटा तब सत का मेहाना ।
बीन मधुर धुन आई काना ।
सत्त पुरुप का दर्शन पाया ।
कोटिन सूरज चन्द्र लजाया । ।
जगमग जगमग जगमग होई ।
दरस परस पावे नर कोई ॥
बड़भागी जो यह पद भाये ।
आगमन सकल विधि नाये । ।
दोहासतपद निरख परख कर, गई अलख के द्वार ।
अगम अनाम के पार चढ़, राधास्वामी दरबार ॥
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Song 1 — Hindi
505. रूप अरूप सरूप नहीं तू ।
नहीं परजा और भूष नहीं तू ॥
ब्रह्म न माया ब्रह्म पसारा ।
त्रिलोकी की हद से पारा ।
परब्रह्म पद से भी परे ।
सत्त असत्त दोनों के बरे ॥
नूर कलाम न धूप न छाई ।
कैसे तुझको लखू गोसाई ॥
ॐ रमेनी ॐ
नहीं परजा और भूष नहीं तू ॥
ब्रह्म न माया ब्रह्म पसारा ।
त्रिलोकी की हद से पारा ।
परब्रह्म पद से भी परे ।
सत्त असत्त दोनों के बरे ॥
नूर कलाम न धूप न छाई ।
कैसे तुझको लखू गोसाई ॥
ॐ रमेनी ॐ
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Song 2 — Hindi
506. बन्धन देह गेह भी बन्धन ।
बन्धन द्वष नेह भी बन्धन । ।
सुयश कर्म बन्धन ही बन्धन ।
कुजश मर्म बन्धन ही बन्धन ॥
सुत पितु मात त्रिया सम्बन्धी ।
समझो इन सबको बन्धन भी ॥
काम बन्ध बन्धन है धर्म ।
अर्थ बन्ध बन्धन है मर्म ॥
विद्या ज्ञान दान सब बन्धन ।
जान पिछान मान सब बन्धन । ।
बन्धन दुख कलेश की खानी ।
बन्धन तोड़े कोई कोई प्रानी ॥
बन्ध न कटे मुक्ति क्यों पावे ।
बिन मुक्ति सुख चैन न आवे ॥
( साखी )
बन्धन द्वष नेह भी बन्धन । ।
सुयश कर्म बन्धन ही बन्धन ।
कुजश मर्म बन्धन ही बन्धन ॥
सुत पितु मात त्रिया सम्बन्धी ।
समझो इन सबको बन्धन भी ॥
काम बन्ध बन्धन है धर्म ।
अर्थ बन्ध बन्धन है मर्म ॥
विद्या ज्ञान दान सब बन्धन ।
जान पिछान मान सब बन्धन । ।
बन्धन दुख कलेश की खानी ।
बन्धन तोड़े कोई कोई प्रानी ॥
बन्ध न कटे मुक्ति क्यों पावे ।
बिन मुक्ति सुख चैन न आवे ॥
( साखी )
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Song 3 — Hindi
507. साध मिले जग के टले, आपत विपत कलेस ।
धन साधु का भाव है, धन साधु का भेस ॥1 ॥
दुख तो अपने सिर सह, सेवक को सुख दे ।
ऐसी दया के बदल में, साधु कुछ नहीं लें ॥2 ॥
धन साधु का रूप है, धन साधु का ढंग । ।
साई हमको दे सदा, साधु जन का संग ॥3 ॥
साथ कपास समान हैं, सहें कोटि तन पीर ।
औरन के अवगुन ढके, ऐसे धीर गम्भीर ॥4 ॥
आप जले दुख अग्नि में, जलते को दें नीर ।
साधु की महिमा बड़ी, साधु सम नहीं बीर ॥5 ॥
पर स्वारथ के काम में, साधु करें न देर ।
साध को अपने द्वार से, खाली हाथ न फेर ॥6 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, सारद शेष गनेश ।
महिमा जाने साध की, बरनत बने न लेस ॥7 ॥
साधु का दर्शन किया, अन्तर व्याये राम ।
नन्दु साधु पांव की, जूती मेरा चाम ॥8 ॥
साधू का दर्शन लहूँ, साध का निसदिन संग ।
आँसू प्रेम के नीर से, चरन पखारूँ अंग ॥6 ॥
साथ बड़े परमारथी, तर बर सरवर रूप ।
दया मेहर उपकार धन, महिमा अगम अनूप ॥10 ॥
ऋद्धि सिद्धि दे नहीं, दर्शन साध का दे ।
साध दरस की लालसा, और सकल ले ले ॥11 ॥
निर बन्धन होय बन्ध रहे, दुखी जीव के काज। ।
साधु महिमा गावते, नन्दू आवे लाज ॥12 ॥
क्या मुख ले अस्तुति करू, साधु अगम अपार । ।
नन्दू साधु दरसते, जा भव सागर पार ॥13 ॥
नहीं सीतल है चन्द्रमा, नहीं रवि में प्रकाश ।
नन्दू साध स्वरूप का, सीतल महा उजास ॥14 ॥
नन्दू सेवक साध का, स्वामी मेरे साध ।
सेवक स्वामी संग मिला, कटा कंदि अपराध ॥15 ॥
साध गुरु के रूप हैं, सत स्वरूप सत धाम ।
नन्दु साध के दरस से, मुख आवे सतनाम ॥16 ॥
धन साधु का भाव है, धन साधु का भेस ॥1 ॥
दुख तो अपने सिर सह, सेवक को सुख दे ।
ऐसी दया के बदल में, साधु कुछ नहीं लें ॥2 ॥
धन साधु का रूप है, धन साधु का ढंग । ।
साई हमको दे सदा, साधु जन का संग ॥3 ॥
साथ कपास समान हैं, सहें कोटि तन पीर ।
औरन के अवगुन ढके, ऐसे धीर गम्भीर ॥4 ॥
आप जले दुख अग्नि में, जलते को दें नीर ।
साधु की महिमा बड़ी, साधु सम नहीं बीर ॥5 ॥
पर स्वारथ के काम में, साधु करें न देर ।
साध को अपने द्वार से, खाली हाथ न फेर ॥6 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, सारद शेष गनेश ।
महिमा जाने साध की, बरनत बने न लेस ॥7 ॥
साधु का दर्शन किया, अन्तर व्याये राम ।
नन्दु साधु पांव की, जूती मेरा चाम ॥8 ॥
साधू का दर्शन लहूँ, साध का निसदिन संग ।
आँसू प्रेम के नीर से, चरन पखारूँ अंग ॥6 ॥
साथ बड़े परमारथी, तर बर सरवर रूप ।
दया मेहर उपकार धन, महिमा अगम अनूप ॥10 ॥
ऋद्धि सिद्धि दे नहीं, दर्शन साध का दे ।
साध दरस की लालसा, और सकल ले ले ॥11 ॥
निर बन्धन होय बन्ध रहे, दुखी जीव के काज। ।
साधु महिमा गावते, नन्दू आवे लाज ॥12 ॥
क्या मुख ले अस्तुति करू, साधु अगम अपार । ।
नन्दू साधु दरसते, जा भव सागर पार ॥13 ॥
नहीं सीतल है चन्द्रमा, नहीं रवि में प्रकाश ।
नन्दू साध स्वरूप का, सीतल महा उजास ॥14 ॥
नन्दू सेवक साध का, स्वामी मेरे साध ।
सेवक स्वामी संग मिला, कटा कंदि अपराध ॥15 ॥
साध गुरु के रूप हैं, सत स्वरूप सत धाम ।
नन्दु साध के दरस से, मुख आवे सतनाम ॥16 ॥
साहेब साहेब क्या करू, साहेब मेरे साध ।
साहेब को हूँ हूँ कहां, साध से मिटे उपाध ॥17 ॥
अलख पुरुष की आरसी, साधु जिनका रूप ।
नन्द लख ले अलख को, अलख में साध अनूप ॥18 ॥
रमेनी
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Song 4 — Hindi
508. नहीं ब्रह्मा नहीं विष्णु महेश ।
नहीं नारद सारद नहीं शेष ॥
नहीं गोलोक नहीं साकेत ।
नहीं किसी से राग न हेत । ।
तीरथ बरत कर्म नहीं धर्म ।
संजय नेम न यम नहीं मर्म । ।
कुशल क्षेम ऐको कछु नाहीं ।
यह सब काल बली की छाई ॥
माया कर्म काल नहीं सोई ।
बिरला यह गति जाने कोई ॥
साखीराधास्वामी ने कही, खोल मर्म विस्तार ।
__कोई सतसंगी सुने, सार का करे विचार ॥
नहीं नारद सारद नहीं शेष ॥
नहीं गोलोक नहीं साकेत ।
नहीं किसी से राग न हेत । ।
तीरथ बरत कर्म नहीं धर्म ।
संजय नेम न यम नहीं मर्म । ।
कुशल क्षेम ऐको कछु नाहीं ।
यह सब काल बली की छाई ॥
माया कर्म काल नहीं सोई ।
बिरला यह गति जाने कोई ॥
साखीराधास्वामी ने कही, खोल मर्म विस्तार ।
__कोई सतसंगी सुने, सार का करे विचार ॥
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Song 5 — Hindi
509 राधास्वामी अगुन सगुन राधास्वामी ।
राधास्वामी शब्द है धुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अन्त राधास्वामी ।
राधास्वामी साध सन्त राधास्वामी ॥
साध आदि के सहित रहाया ।
सन्त अन्त के मध्य समाया ॥
राधास्वामी किरन सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी निकट दूर राधास्वामी । ।
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी अब हैं तब राधास्वामी ।
साखीराधास्वामी की दया, पाया भेद अभेद ।
राधास्वामी गुरु मिले, मिटा भर्म भव खेद । ।
राधास्वामी शब्द है धुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अन्त राधास्वामी ।
राधास्वामी साध सन्त राधास्वामी ॥
साध आदि के सहित रहाया ।
सन्त अन्त के मध्य समाया ॥
राधास्वामी किरन सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी निकट दूर राधास्वामी । ।
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी अब हैं तब राधास्वामी ।
साखीराधास्वामी की दया, पाया भेद अभेद ।
राधास्वामी गुरु मिले, मिटा भर्म भव खेद । ।
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Song 6 — Hindi
510. जब नहीं नाम अनाम सनामी ।
तब मे सत्तपुरुष राधास्वामी ॥
वेद न ब्रह्मा काल न माया ।
शब्द न सुरत न धूप न छाया ।
रूप रंग रेखा नहीं होई ।
राधास्वामी नाम न कोई ॥
आप आप में आप बिराजा ।
सृष्टि प्रलय का दल नहीं साजा ॥
पुहुप मध्य ज्यों बास सुवासा ।
उनमनि रूप अगोचर भासा ॥
मौज हुई धारा बह निकली ।
अगम अलख सतपद आ ठहरी ॥
प्रगटा काल कला बन आई ।
भँवर गुफा माया रही छाई ॥
माया बंसी तपा पुनि काल ।
तप कर सोहंग सोहंग चाल ॥
बंसी बजी फंक ज्यों बानी ।
पवन धूम अग्नि खम पानी ॥
नहीं तत्व पर तत्व का बीजा ।
भाप रूप ज्यों रहे पसीजा ॥
धार फुटी नीचे चल आई ।
जड़ अचेत की भांति रहाई ॥
सोई सुन्न महासुन्न कहावे ।
रारंग सारंग बानी गावे ॥
धारा फुटी त्रिकुटी में आई ।
सूक्ष्म तत्व गुन तीन रचाई ॥
संपुट मार आप में आपा ।
अ उ म त्रिलोकी नापा ॥
सो पुन दशा ब्रह्मांडी मन ।
ओंकार का प्रगटा तन । ।
फिर सोई सहस कवलदल उतरा ।
काली कला जोत छबि सुथरा । ।
साखीयह विराट का देह है, महानन शत सीस ।
प्रगटे पाँचों तत्व यहाँ, और प्रगटी पचीस ॥
तब मे सत्तपुरुष राधास्वामी ॥
वेद न ब्रह्मा काल न माया ।
शब्द न सुरत न धूप न छाया ।
रूप रंग रेखा नहीं होई ।
राधास्वामी नाम न कोई ॥
आप आप में आप बिराजा ।
सृष्टि प्रलय का दल नहीं साजा ॥
पुहुप मध्य ज्यों बास सुवासा ।
उनमनि रूप अगोचर भासा ॥
मौज हुई धारा बह निकली ।
अगम अलख सतपद आ ठहरी ॥
प्रगटा काल कला बन आई ।
भँवर गुफा माया रही छाई ॥
माया बंसी तपा पुनि काल ।
तप कर सोहंग सोहंग चाल ॥
बंसी बजी फंक ज्यों बानी ।
पवन धूम अग्नि खम पानी ॥
नहीं तत्व पर तत्व का बीजा ।
भाप रूप ज्यों रहे पसीजा ॥
धार फुटी नीचे चल आई ।
जड़ अचेत की भांति रहाई ॥
सोई सुन्न महासुन्न कहावे ।
रारंग सारंग बानी गावे ॥
धारा फुटी त्रिकुटी में आई ।
सूक्ष्म तत्व गुन तीन रचाई ॥
संपुट मार आप में आपा ।
अ उ म त्रिलोकी नापा ॥
सो पुन दशा ब्रह्मांडी मन ।
ओंकार का प्रगटा तन । ।
फिर सोई सहस कवलदल उतरा ।
काली कला जोत छबि सुथरा । ।
साखीयह विराट का देह है, महानन शत सीस ।
प्रगटे पाँचों तत्व यहाँ, और प्रगटी पचीस ॥
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Song 7 — Hindi
511. कंठ करे आकास निवास ।
हृदय पवन धारे निज भास ॥
नाभी अग्नि इन्द्री जल ठहरा ।
गुदा पृथ्वी का मंडल पहरा । ।
दुरगा कंठ हृदय शिव धामा ।
नाभी विषणु पाया विश्रामा ।
इन्द्री ब्रह्मा रचे शरीरा ।
गुदा गनेश बसे मति धीरा ॥
पंच देव सो विराट रहावें ।
पंच तत्व तन माँह समावे ॥
यह रचना का भेद सुनाया ।
जैला ब्रह्म जीव तस गाया ॥
ब्रह्म तीन गुन तीन ही नाम ।
जीवह करे ब्रह्म के काम ॥
वह विराट अव्याकृत भाई ।
यही हिरण्यगर्भ कहलाई ॥
जाग्रत धरे विराट को भेस | स्वप्न में अव्याकृत का देस । ।
सुषप्ति हिरण्यगर्भ सोई भया ।
नहीं तामे कछु मोह और मया । ।
जीव के तीन नाम अब जानो ।
ब्रह्म जीव का भेद पिछानो ।
जाग्रत विश्व स्वप्न में तेजस ।
सुख पति सोई प्राग्य नाम तस । ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
यह वेदान्त का निश्चय ज्ञान । ।
यहां लग गम वेदान्त की भाई ।
आगे की कुछ खबर न पाई ॥
शौच लक्षना भाग और त्याग ।
वह नित गावे ज्ञान का राग । ।
दोहानेति नेति पुन कह सदा, चेतन रहा समाय ।
जीव ब्रह्म का भेद तज, चेतन भाग वताय ।
हृदय पवन धारे निज भास ॥
नाभी अग्नि इन्द्री जल ठहरा ।
गुदा पृथ्वी का मंडल पहरा । ।
दुरगा कंठ हृदय शिव धामा ।
नाभी विषणु पाया विश्रामा ।
इन्द्री ब्रह्मा रचे शरीरा ।
गुदा गनेश बसे मति धीरा ॥
पंच देव सो विराट रहावें ।
पंच तत्व तन माँह समावे ॥
यह रचना का भेद सुनाया ।
जैला ब्रह्म जीव तस गाया ॥
ब्रह्म तीन गुन तीन ही नाम ।
जीवह करे ब्रह्म के काम ॥
वह विराट अव्याकृत भाई ।
यही हिरण्यगर्भ कहलाई ॥
जाग्रत धरे विराट को भेस | स्वप्न में अव्याकृत का देस । ।
सुषप्ति हिरण्यगर्भ सोई भया ।
नहीं तामे कछु मोह और मया । ।
जीव के तीन नाम अब जानो ।
ब्रह्म जीव का भेद पिछानो ।
जाग्रत विश्व स्वप्न में तेजस ।
सुख पति सोई प्राग्य नाम तस । ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
यह वेदान्त का निश्चय ज्ञान । ।
यहां लग गम वेदान्त की भाई ।
आगे की कुछ खबर न पाई ॥
शौच लक्षना भाग और त्याग ।
वह नित गावे ज्ञान का राग । ।
दोहानेति नेति पुन कह सदा, चेतन रहा समाय ।
जीव ब्रह्म का भेद तज, चेतन भाग वताय ।
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Song 8 — Hindi
512. राधास्वामी भेद बताया ।
बिरला जीव की समझ में आया ।
पढ़ पढ़ ग्रन्थ ग्रन्थि भई गाढ़ी ।
मति दुर्मति सुमति अति बाढ़ी ॥
अहं ब्रह्म तत्वमसि भाखा ।
अहं प्रज्ञानं धर साखा ॥
अयं आत्मा ब्रह्म कहाना ।
चार बाक महावाक्य प्रमाना । ।
संतन की बातें नहीं जानी ।
बिन जाने सब भये अभिमानी । ।
जड़ चेतन में गये भुलाई ।
वह उपेक्षा बानी भाई । ।
नहीं वह जड़ नहीं चेतन नामा ।
जड़ चेतन है द्वत सकामा । ।
नहीं यह पद अहत द्वत यह ।
हत भाव ले दुख सुख को सह । ।
कोई ब्रह्म जाय करे निवास ।
कोई सुमेर गिरवर कैलास । ।
कोई समाने तत्व मंझार ।
कोई तत्व का लखा न सार ।
नन्द करो सन्त का संग ।
तब कुछ लखो सार का ढंग । ।
बिन सतसंग विवेक न जागे ।
बिन विवेक अनुभव नहीं पागे । ।
बिन अनुभव पद की गम नाहीं ।
यह सब भरम जोनि भरमाहीं ।
शालिगराम ने अनुभव भावा ।
अनुभव गति सर्वोपरि रावा । ।
दया दृष्टि से मोहि बताई ।
सो सब आज तोहि समझाई ॥
मुक्ति पदारथ सतसंग है ।
संगत करे सो तिसको है ।
दोहाआदि अन्त उत्पति कथा, आज सुनाया तोहि ।
जो सुनकर चिन्तन करे, मिटे भरम और मोह ॥
बिरला जीव की समझ में आया ।
पढ़ पढ़ ग्रन्थ ग्रन्थि भई गाढ़ी ।
मति दुर्मति सुमति अति बाढ़ी ॥
अहं ब्रह्म तत्वमसि भाखा ।
अहं प्रज्ञानं धर साखा ॥
अयं आत्मा ब्रह्म कहाना ।
चार बाक महावाक्य प्रमाना । ।
संतन की बातें नहीं जानी ।
बिन जाने सब भये अभिमानी । ।
जड़ चेतन में गये भुलाई ।
वह उपेक्षा बानी भाई । ।
नहीं वह जड़ नहीं चेतन नामा ।
जड़ चेतन है द्वत सकामा । ।
नहीं यह पद अहत द्वत यह ।
हत भाव ले दुख सुख को सह । ।
कोई ब्रह्म जाय करे निवास ।
कोई सुमेर गिरवर कैलास । ।
कोई समाने तत्व मंझार ।
कोई तत्व का लखा न सार ।
नन्द करो सन्त का संग ।
तब कुछ लखो सार का ढंग । ।
बिन सतसंग विवेक न जागे ।
बिन विवेक अनुभव नहीं पागे । ।
बिन अनुभव पद की गम नाहीं ।
यह सब भरम जोनि भरमाहीं ।
शालिगराम ने अनुभव भावा ।
अनुभव गति सर्वोपरि रावा । ।
दया दृष्टि से मोहि बताई ।
सो सब आज तोहि समझाई ॥
मुक्ति पदारथ सतसंग है ।
संगत करे सो तिसको है ।
दोहाआदि अन्त उत्पति कथा, आज सुनाया तोहि ।
जो सुनकर चिन्तन करे, मिटे भरम और मोह ॥
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Song 9 — Hindi
513. पृथ्वी मंडल सुरत से त्यागो ।
मन को उलट गगन को भागो ।
बाहर के पट बंद कराओ ।
अन्तर से तिलपट खुलवाओ ॥
सहसकमलदल देखो जोत ।
घंटा शंख सुनो धुन सोत ॥
अनहद बानी सुन सुन रीझो ।
अमी धार के रस में भीजो ॥
चित को साधो ध्यान जमाओ ।
सुमिरन भजन साथ लौ लाओ ॥
दोहा तीन बन्द लगाय कर, आंख कान मुख मू द ।
शब्द के सिंध नहाय सुरत, सुरत शब्द की चू द । ।
मन को उलट गगन को भागो ।
बाहर के पट बंद कराओ ।
अन्तर से तिलपट खुलवाओ ॥
सहसकमलदल देखो जोत ।
घंटा शंख सुनो धुन सोत ॥
अनहद बानी सुन सुन रीझो ।
अमी धार के रस में भीजो ॥
चित को साधो ध्यान जमाओ ।
सुमिरन भजन साथ लौ लाओ ॥
दोहा तीन बन्द लगाय कर, आंख कान मुख मू द ।
शब्द के सिंध नहाय सुरत, सुरत शब्द की चू द । ।
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Song 10 — Hindi
514. फिर त्रिकुटी में गुरु का दरस ।
चरन कमल मानसिक हो परस ॥
ओंकार मृदंग का साज ।
धुन जहां ओम् शब्द रही गाज । ।
वेद ज्ञान का यह अस्थान ।
बीज मंत्र का मिले निशान ॥
पाय निशान सुरत मन जागे ।
भक्ति प्रेम के रस में पागे ।
स्वामी सेवक यक मत होय ।
मनकी दुविधा जावे खोय ॥
दोहातीन बंद मध्य में लगे, प्रगटा गुरु का नाम ।
शब्द अनुमान प्रमान को, अन्तर देखा आन ॥
चरन कमल मानसिक हो परस ॥
ओंकार मृदंग का साज ।
धुन जहां ओम् शब्द रही गाज । ।
वेद ज्ञान का यह अस्थान ।
बीज मंत्र का मिले निशान ॥
पाय निशान सुरत मन जागे ।
भक्ति प्रेम के रस में पागे ।
स्वामी सेवक यक मत होय ।
मनकी दुविधा जावे खोय ॥
दोहातीन बंद मध्य में लगे, प्रगटा गुरु का नाम ।
शब्द अनुमान प्रमान को, अन्तर देखा आन ॥
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Song 11 — Hindi
515. चित चकोर की दशा बताई ।
सुन्न महासुन्न तारी लाई । ।
हंस हंस की गति लख पाई ।
तिमिर त्याग प्रकाश को धाई । ।
उज्जल चन्द्र प्रकासा अन्तर ।
देह गेह सुध भूली दुस्तर । ।
सुन्न समाध की अकथ कहानी ।
समझत बने न जावे बखानी । ।
गरंग सारंग शब्द मुहाना ।
गढ़ सुमेर में गाड़ा थाना ।
दोहातीन बंद प्रताप से, बन्धन गया हराय ।
चिंता दुविधा मिट गई, मुक्ति पदारथ पाय ॥
सुन्न महासुन्न तारी लाई । ।
हंस हंस की गति लख पाई ।
तिमिर त्याग प्रकाश को धाई । ।
उज्जल चन्द्र प्रकासा अन्तर ।
देह गेह सुध भूली दुस्तर । ।
सुन्न समाध की अकथ कहानी ।
समझत बने न जावे बखानी । ।
गरंग सारंग शब्द मुहाना ।
गढ़ सुमेर में गाड़ा थाना ।
दोहातीन बंद प्रताप से, बन्धन गया हराय ।
चिंता दुविधा मिट गई, मुक्ति पदारथ पाय ॥
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Song 12 — Hindi
516. सुन्न समाध का भया उथान ।
चली सुरत सोहंग अस्थान ।
बन्सी सोहंग भवर में बाजी ।
सूर प्रकाश देख भई राजी ॥
यहां से सहज समाध की बारी ।
जीवन मुक्त की दशा सवारी ॥
हँस चुने मोती मुक्ता मन ।
अपना भाग सराहे धन धन ॥
मस्ती छाई उमगा प्रेम ।
जग व्यवहार का तोड़ा नेम । ।
दोहातीन बन्द के तीन गुन, सुमिरन ध्यान भजन ।
भंवर गुफा प्रगटे सभी, हरख उठा तन मन ॥
चली सुरत सोहंग अस्थान ।
बन्सी सोहंग भवर में बाजी ।
सूर प्रकाश देख भई राजी ॥
यहां से सहज समाध की बारी ।
जीवन मुक्त की दशा सवारी ॥
हँस चुने मोती मुक्ता मन ।
अपना भाग सराहे धन धन ॥
मस्ती छाई उमगा प्रेम ।
जग व्यवहार का तोड़ा नेम । ।
दोहातीन बन्द के तीन गुन, सुमिरन ध्यान भजन ।
भंवर गुफा प्रगटे सभी, हरख उठा तन मन ॥
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Song 13 — Hindi
517. फिर आगे की करी तैयारी ।
चली झूम सुरत मतकारी ॥
सत्त लोक का पाया नाका ।
कोटिन चन्द्र सूर छबि ताका ॥
सत्त सत्त बीना धुन सुनी ।
सुन सुन धुन अन्तर में गुनी । ।
पांच नाम के पांच अस्थान ।
पाचों लख लख लख हरखान । ।
जीवन मुक्ति दशा भई गाढ़ी ।
मुक्ति अवस्था की गति बाढ़ी । ।
दोहातीन बन्द लगाय कर, आगे को पद दीन ।
अलख अगम के पार चल, राधास्वाती पद लौ लीन ॥
चली झूम सुरत मतकारी ॥
सत्त लोक का पाया नाका ।
कोटिन चन्द्र सूर छबि ताका ॥
सत्त सत्त बीना धुन सुनी ।
सुन सुन धुन अन्तर में गुनी । ।
पांच नाम के पांच अस्थान ।
पाचों लख लख लख हरखान । ।
जीवन मुक्ति दशा भई गाढ़ी ।
मुक्ति अवस्था की गति बाढ़ी । ।
दोहातीन बन्द लगाय कर, आगे को पद दीन ।
अलख अगम के पार चल, राधास्वाती पद लौ लीन ॥
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Song 14 — Hindi
518. यहां न बन्धन का भय कोई ।
मुक्ति आस लय चिंतन होई ॥
नहीं यहां काम न धर्म कहानी ।
नहीं यहाँ अर्थ न मुक्ति निशानी ॥
यह निज धाम सन्त का ऊँचा ।
बिरला सन्त यहां कोई पहुँचा ।
रूप रंग रेखा से न्यारा ।
त्रिलोकी के रहे सो पारा ॥
सोई अपना रूप कहावे ।
अधिकारी लख ताहिं सुनावे ॥
दोहा तीन बंद सब छुट गये, पाया पद निर्बान ।
राधास्वामी की दया, मिल गया ठौर ठिकान ॥
मुक्ति आस लय चिंतन होई ॥
नहीं यहां काम न धर्म कहानी ।
नहीं यहाँ अर्थ न मुक्ति निशानी ॥
यह निज धाम सन्त का ऊँचा ।
बिरला सन्त यहां कोई पहुँचा ।
रूप रंग रेखा से न्यारा ।
त्रिलोकी के रहे सो पारा ॥
सोई अपना रूप कहावे ।
अधिकारी लख ताहिं सुनावे ॥
दोहा तीन बंद सब छुट गये, पाया पद निर्बान ।
राधास्वामी की दया, मिल गया ठौर ठिकान ॥
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Song 15 — Hindi
516. दोहाजो कोई चाहे नित्य सुख, करे गुरु का संग ।
गुरु संगत से पाइये, गुरु विवेक गुरु रंग ॥
गुरु बिन भक्ति न ज्ञान कुछ, गुरु कीजे कोई सन्त ।
परमारथ की आने समझ, जब गुरु निकट बसन्त ॥ ॥
चौपाई ॥
परमारथ का उभरे रंग ।
कर गुरु पूरे का सतसंग ॥
गुरु को खोज संग चित लाय ।
सो परमारथ युक्ति कमाय ॥
बिन गुरु भक्ति न ज्ञान न कर्म ।
बिन गुरु मिले न तत्व का मर्म ।
गुरु मत हो मन मता को त्यागे ।
ममता अहंकार सों भागे ।
गुरु संगत पावे सत ज्ञान ।
काठ की नौका तिरे पखान । ।
दोहागुरु की श्रद्धा मन बसी, उपजा दृढ़ अनुराग ।
यही राग का त्याग है, यही विवेक बिराग ॥
गुरु संगत से पाइये, गुरु विवेक गुरु रंग ॥
गुरु बिन भक्ति न ज्ञान कुछ, गुरु कीजे कोई सन्त ।
परमारथ की आने समझ, जब गुरु निकट बसन्त ॥ ॥
चौपाई ॥
परमारथ का उभरे रंग ।
कर गुरु पूरे का सतसंग ॥
गुरु को खोज संग चित लाय ।
सो परमारथ युक्ति कमाय ॥
बिन गुरु भक्ति न ज्ञान न कर्म ।
बिन गुरु मिले न तत्व का मर्म ।
गुरु मत हो मन मता को त्यागे ।
ममता अहंकार सों भागे ।
गुरु संगत पावे सत ज्ञान ।
काठ की नौका तिरे पखान । ।
दोहागुरु की श्रद्धा मन बसी, उपजा दृढ़ अनुराग ।
यही राग का त्याग है, यही विवेक बिराग ॥
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Song 16 — Hindi
520 जो नहीं गुरु चरन से प्यार ।
मिथ्या है सब सोच विचार । ।
प्रेम प्रीत उपजे दृढघट में ।
सो सिष पड़े न जग खट पट में ।
वृत्ती यकटक लगे अखंड ।
सूझे अंड पिंड ब्रह्मड ॥
दरस परस सेवा सत्कार ।
करे सदा निज मति अनुसार । ।
भाव सुभाव प्रभाव भलाई ।
उमड़े प्रेम चित्त रहे छाई । ।
दोहाजब घट आवे यह दशा, जाग उठे अधिकार ।
बचन सुने सतसंग में, सेवक सहित विचार । ।
मिथ्या है सब सोच विचार । ।
प्रेम प्रीत उपजे दृढघट में ।
सो सिष पड़े न जग खट पट में ।
वृत्ती यकटक लगे अखंड ।
सूझे अंड पिंड ब्रह्मड ॥
दरस परस सेवा सत्कार ।
करे सदा निज मति अनुसार । ।
भाव सुभाव प्रभाव भलाई ।
उमड़े प्रेम चित्त रहे छाई । ।
दोहाजब घट आवे यह दशा, जाग उठे अधिकार ।
बचन सुने सतसंग में, सेवक सहित विचार । ।
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Song 17 — Hindi
521 } सोचे समझे अपने मन ।
छांट धरे हिये गुरु बचन ॥
शब्द का करे सदा अहार ।
त्यागे मिथ्या भर्म विकार । ।
जो नहीं बात समझ में आवे ।
प्रश्न करे दुर्मति नसावे ॥
ॐ दुविधा भ्रान्ति मिटे जब सारी ।
शब्द योग साधे अधिकारी ॥
सीखें रीत करे फिर जतन ।
उलटे तिल लौटावे मन । ।
दोहासुमिरन ध्यान भजन विधि, जान मान सुविवेक ।
आसन मार एकान्त में, धारे गुरु की टेक ॥
छांट धरे हिये गुरु बचन ॥
शब्द का करे सदा अहार ।
त्यागे मिथ्या भर्म विकार । ।
जो नहीं बात समझ में आवे ।
प्रश्न करे दुर्मति नसावे ॥
ॐ दुविधा भ्रान्ति मिटे जब सारी ।
शब्द योग साधे अधिकारी ॥
सीखें रीत करे फिर जतन ।
उलटे तिल लौटावे मन । ।
दोहासुमिरन ध्यान भजन विधि, जान मान सुविवेक ।
आसन मार एकान्त में, धारे गुरु की टेक ॥
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Song 18 — Hindi
522. तीसरा तिल चित वृत्ती निरोध ।
इसी योग से हो प्रबोध ॥
जब यह दशा लखे शिष अंतर ।
सहसकमलदल साधे मंतर ॥
यह कसरत विराट का थाना ।
नाका ब्रह्म अंड का जाना ॥
श्याम कंज में सूरत धरे ।
जोत लखे धुन श्रवन करे ॥
घंटा शंख मधुर धुन बानी ।
प्रगटे जोत प्रकाश निशानी ॥
दोहासुन अनहद और जोति लख, सुरत निरत हरषाय ।
बाढ़े प्रेम मगन मन, हिया जिया अति उमगाय ॥
इसी योग से हो प्रबोध ॥
जब यह दशा लखे शिष अंतर ।
सहसकमलदल साधे मंतर ॥
यह कसरत विराट का थाना ।
नाका ब्रह्म अंड का जाना ॥
श्याम कंज में सूरत धरे ।
जोत लखे धुन श्रवन करे ॥
घंटा शंख मधुर धुन बानी ।
प्रगटे जोत प्रकाश निशानी ॥
दोहासुन अनहद और जोति लख, सुरत निरत हरषाय ।
बाढ़े प्रेम मगन मन, हिया जिया अति उमगाय ॥
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Song 19 — Hindi
523. कुछ दिन सहसकमलदल बासा ।
फिर दूजी मंजिल की आसा ॥
बंकनाल चढ़ त्रिकुटी धावे ।
ओंकार का दर्शन पावे ॥
ओंकार सतगुरु प्रसाद ।
धारे चित विरती को साध ॥
यह गुरु का अस्थान सुहेला ।
अन्तर सतसंग बचन का मेला ॥
सूरज लाल लाल रंग बाना ।
ओम् मृदंग धुन आवे काना ॥
दोहाएकटक नेन जमावई, एकचित सुन धुन बेन ।
देह दशा स्थिर करे, तब आगे की सेन ॥
फिर दूजी मंजिल की आसा ॥
बंकनाल चढ़ त्रिकुटी धावे ।
ओंकार का दर्शन पावे ॥
ओंकार सतगुरु प्रसाद ।
धारे चित विरती को साध ॥
यह गुरु का अस्थान सुहेला ।
अन्तर सतसंग बचन का मेला ॥
सूरज लाल लाल रंग बाना ।
ओम् मृदंग धुन आवे काना ॥
दोहाएकटक नेन जमावई, एकचित सुन धुन बेन ।
देह दशा स्थिर करे, तब आगे की सेन ॥
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Song 20 — Hindi
524. त्रिकुटी साधन साध कमाये ।
साधु सोई जो यह पद पावे ॥
यह उपासना अन्तर भाई ।
यहां से गुरुमति चाल चलाई ॥
सुन्न मंडल की ओर सिधाये ।
द्वत सहज आसन मन भाये । ।
शीतल चन्द्र अमीरस पागा ।
जो लख पावे परम सुभागा ।
किंगरी सारंगी धुन की धूम ।
सुन सूरत रही भीतर झूम ॥
दोहासुरत निरत का रूप धर, नाच रहे सुन्न धाम ।
निरख परख अपनी दशा, पावे स्थिर विश्राम ॥
साधु सोई जो यह पद पावे ॥
यह उपासना अन्तर भाई ।
यहां से गुरुमति चाल चलाई ॥
सुन्न मंडल की ओर सिधाये ।
द्वत सहज आसन मन भाये । ।
शीतल चन्द्र अमीरस पागा ।
जो लख पावे परम सुभागा ।
किंगरी सारंगी धुन की धूम ।
सुन सूरत रही भीतर झूम ॥
दोहासुरत निरत का रूप धर, नाच रहे सुन्न धाम ।
निरख परख अपनी दशा, पावे स्थिर विश्राम ॥
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Song 21 — Hindi
525. अंधकार जहां घोर व्यापा ।
सुरत निरत नहीं चीन्हे आपा ॥
सुन्न समाध की लाई तारी ।
महासुन्न सोई अकथ अपारी ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर सुहाना ।
नाम प्रताप सुरत लख जाना ॥
जगमग सूर्य स्वेत रंग चमका ।
प्रगटी सारंगी धुन हरखा ॥
मानसरोवर कर अस्नान ।
हंस सुगति मति सुबुधि सुजान ॥
दोहा कलिमल अवगुन धोयकर, निर्मल विमल अनूप ।
क्षीर नीर को छानकर, धरा हंसन का रूप ॥
सुरत निरत नहीं चीन्हे आपा ॥
सुन्न समाध की लाई तारी ।
महासुन्न सोई अकथ अपारी ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर सुहाना ।
नाम प्रताप सुरत लख जाना ॥
जगमग सूर्य स्वेत रंग चमका ।
प्रगटी सारंगी धुन हरखा ॥
मानसरोवर कर अस्नान ।
हंस सुगति मति सुबुधि सुजान ॥
दोहा कलिमल अवगुन धोयकर, निर्मल विमल अनूप ।
क्षीर नीर को छानकर, धरा हंसन का रूप ॥
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Song 22 — Hindi
526. कुछ दिन सुन्न समाध रचाई ।
पद अद्वत पाय हरपाई ॥
देह गेह की सुधि बिसरानी ।
कहत लजाय सुसमझ सुवानी ॥
नहीं वहां सांझ न भोर प्रभाव ।
नहीं वहां दाब कुदाव सुदाव ।
नहीं वहां निरख न परख विवेक ।
व्यापा एक एक ही एक ॥
मस्ती आय जमाई रंग , झूम रही अब सुरत अभंग ॥
दोहा सुन्न महासुन्न आनंद लहा, कुछ दिन कर अभ्यास ।
जीत लिया पद सुन्न जब, प्रगटा बिमल बिलास ॥
पद अद्वत पाय हरपाई ॥
देह गेह की सुधि बिसरानी ।
कहत लजाय सुसमझ सुवानी ॥
नहीं वहां सांझ न भोर प्रभाव ।
नहीं वहां दाब कुदाव सुदाव ।
नहीं वहां निरख न परख विवेक ।
व्यापा एक एक ही एक ॥
मस्ती आय जमाई रंग , झूम रही अब सुरत अभंग ॥
दोहा सुन्न महासुन्न आनंद लहा, कुछ दिन कर अभ्यास ।
जीत लिया पद सुन्न जब, प्रगटा बिमल बिलास ॥
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Song 23 — Hindi
527. दृढ़ता आई उमगा मन ।
चौथी मंजिल किया जतन ॥
भंवरगुफा का नाका तोड़ा ।
सोहंग पद से नाता जोड़ा ।
बंसी बजी मधुर मृदु बानी ।
सुन सुन सुरत निरत मुसकानी ।
सोहंग सोहंग धुन सुन पाई ।
स्वत सूर सोहंग चित लाई । ।
जगमग जोत न जाय बखानी ।
लख लख सूर रोम एक जानी ॥
दोहा महाकाल का धाम यह ऊंच सिखर ब्रह्मन्ड ।
खिड़की लखे जो गुफा की, पाये हर्ष अखंड ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
चौथी मंजिल किया जतन ॥
भंवरगुफा का नाका तोड़ा ।
सोहंग पद से नाता जोड़ा ।
बंसी बजी मधुर मृदु बानी ।
सुन सुन सुरत निरत मुसकानी ।
सोहंग सोहंग धुन सुन पाई ।
स्वत सूर सोहंग चित लाई । ।
जगमग जोत न जाय बखानी ।
लख लख सूर रोम एक जानी ॥
दोहा महाकाल का धाम यह ऊंच सिखर ब्रह्मन्ड ।
खिड़की लखे जो गुफा की, पाये हर्ष अखंड ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
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Song 24 — Hindi
528. आगे चली सुरत मतवारी ।
सत्त धाम की ओर सिधारी ॥
पद अनूप अव्यक्त अपारा ।
अप्रगति गति को बरने पारा । ।
हंस बंस और अंस सहाने ।
देखे सरत स्वरूप सुबाने ।
अधिष्ठान आधार महाना ।
पुहुप बास सम ताहि पिछाना । ।
पुहुप आधार बास ठहरानी ।
माया आदि जान तेहि ज्ञानी । ।
दोहा सत्त धाम कूटस्थ धुर, रचना का आधार ।
यही सार का सार है, द्वत अत के पार ॥
॥
साखी ॥
सत्त धाम की ओर सिधारी ॥
पद अनूप अव्यक्त अपारा ।
अप्रगति गति को बरने पारा । ।
हंस बंस और अंस सहाने ।
देखे सरत स्वरूप सुबाने ।
अधिष्ठान आधार महाना ।
पुहुप बास सम ताहि पिछाना । ।
पुहुप आधार बास ठहरानी ।
माया आदि जान तेहि ज्ञानी । ।
दोहा सत्त धाम कूटस्थ धुर, रचना का आधार ।
यही सार का सार है, द्वत अत के पार ॥
॥
साखी ॥
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Song 25 — Hindi
529. मैं मैं करते दिन गया, मैं से लगी लगन ।
मैं तजने का नंदुवा, कर कुछ जोग जतन ॥1 ॥
अकड़ा अकड़ा क्या फिरे, अकड़ को दे दे आग ।
मैं छूटे तेरी अभी, गुरु चरनन से लाग ॥2 ॥
द्वष ईर्षा डाह की, मन में भड़की आग ।
नर जीवन पाये अभी, पीठ फेर कर भाग ॥3 ॥
पढ़ा लिखा सोचा बहुत, पाया नहीं गुरु ज्ञान । ।
औरन के समझावते, खोया आप निदान ॥4 ॥
गुरु परिचय ले नन्दुवा, बिन परिचय क्यों बात ।
परिचय से अनुभव मिले, अनुभव आतम जात ॥5 ॥
कर्म करे कर्ता नहीं, सोई दास सुजान ।
कर्ता बनकर कर्म विधि, नन्दु कर्म न जान ॥6 ॥
करता हूँ कर्ता नहीं, कर्म करूं दिन रात ।
कैसे बने उपाध फिर, इस जग की उत्पात ॥7 ॥
नन्दू सुख गुरु चरन में, सुख सतगुरु के ध्यान ।
सुख है सुमिरन भजन में, कोई कोई बिरला जान ॥8 ॥
जग के दुख से भागकर, आया गुरु दरवार ।
अब दुख का मेरे यहाँ, नहीं कार व्यौहार ॥6 ॥
नन्दू करनी सबल है, निरबल वाचक ज्ञान ।
कथनी तज करनी करो, अनुभव गति परमान ॥10 ॥
नन्दू कथनी हम तजी, करनी से लव लाय । ।
गुरु की दया अपार से, अनुभव गम गति पाय ॥11 ॥
पोथी अटके पाठी समझो, ग्रन्थ में अटका ग्रन्थी ।
पुस्तक वाला पुस्तक झाड़े, विरथा नीर मथन्ती॥12 ॥
कोटिन ग्रन्थन बांच के, खुले न हिय के नैन ।
नन्दू करनी मन लगा, सुन गुरु का एक वैन ॥13 ॥
सौ बातों की एक बात, नन्दु सोच विचार ।
सतगुरु सत्तनाम सत्त, करनी सतसंग में सार ॥14 ॥
अच्छे अपनी जगह पर, मन बुधि चित अहंकार ।
नन्द यह नहीं रूप हैं, करनी सहित विचार ॥15 ॥
आप आप को जान ले, आप आप को मान ।
आप आप पहिचान ले, करनी संग जो ज्ञान ॥16 ॥
अपना बैरी आप तू , जो कथनी का भर्म ।
अपना मीत है आप तू , लख करनी का मर्म ॥17 ॥
जो करनी गुरु प्रेम दे, सो करनी है मुख्य ।
ऐसी करनी जो करे, लोक परलोक में सुख ॥18 ॥
नन्दू गुरु प्रताप से, समझ में आई बात । ।
जब करनी में चित लगा, छूट गया उत्पात ॥16 ॥
सत करनी चित ज्ञान है, उप आसन आनन्द ।
मन देहि सुरत माँज ले, कटे मोह का फन्द ॥20 ॥
मैं तजने का नंदुवा, कर कुछ जोग जतन ॥1 ॥
अकड़ा अकड़ा क्या फिरे, अकड़ को दे दे आग ।
मैं छूटे तेरी अभी, गुरु चरनन से लाग ॥2 ॥
द्वष ईर्षा डाह की, मन में भड़की आग ।
नर जीवन पाये अभी, पीठ फेर कर भाग ॥3 ॥
पढ़ा लिखा सोचा बहुत, पाया नहीं गुरु ज्ञान । ।
औरन के समझावते, खोया आप निदान ॥4 ॥
गुरु परिचय ले नन्दुवा, बिन परिचय क्यों बात ।
परिचय से अनुभव मिले, अनुभव आतम जात ॥5 ॥
कर्म करे कर्ता नहीं, सोई दास सुजान ।
कर्ता बनकर कर्म विधि, नन्दु कर्म न जान ॥6 ॥
करता हूँ कर्ता नहीं, कर्म करूं दिन रात ।
कैसे बने उपाध फिर, इस जग की उत्पात ॥7 ॥
नन्दू सुख गुरु चरन में, सुख सतगुरु के ध्यान ।
सुख है सुमिरन भजन में, कोई कोई बिरला जान ॥8 ॥
जग के दुख से भागकर, आया गुरु दरवार ।
अब दुख का मेरे यहाँ, नहीं कार व्यौहार ॥6 ॥
नन्दू करनी सबल है, निरबल वाचक ज्ञान ।
कथनी तज करनी करो, अनुभव गति परमान ॥10 ॥
नन्दू कथनी हम तजी, करनी से लव लाय । ।
गुरु की दया अपार से, अनुभव गम गति पाय ॥11 ॥
पोथी अटके पाठी समझो, ग्रन्थ में अटका ग्रन्थी ।
पुस्तक वाला पुस्तक झाड़े, विरथा नीर मथन्ती॥12 ॥
कोटिन ग्रन्थन बांच के, खुले न हिय के नैन ।
नन्दू करनी मन लगा, सुन गुरु का एक वैन ॥13 ॥
सौ बातों की एक बात, नन्दु सोच विचार ।
सतगुरु सत्तनाम सत्त, करनी सतसंग में सार ॥14 ॥
अच्छे अपनी जगह पर, मन बुधि चित अहंकार ।
नन्द यह नहीं रूप हैं, करनी सहित विचार ॥15 ॥
आप आप को जान ले, आप आप को मान ।
आप आप पहिचान ले, करनी संग जो ज्ञान ॥16 ॥
अपना बैरी आप तू , जो कथनी का भर्म ।
अपना मीत है आप तू , लख करनी का मर्म ॥17 ॥
जो करनी गुरु प्रेम दे, सो करनी है मुख्य ।
ऐसी करनी जो करे, लोक परलोक में सुख ॥18 ॥
नन्दू गुरु प्रताप से, समझ में आई बात । ।
जब करनी में चित लगा, छूट गया उत्पात ॥16 ॥
सत करनी चित ज्ञान है, उप आसन आनन्द ।
मन देहि सुरत माँज ले, कटे मोह का फन्द ॥20 ॥
पहिले करनी करम गति, पीछे अनुभव ज्ञान ।
ता पाछे आनन्द है, नन्दू सुन धर ध्यान ॥21 ॥
बिना कर्म नहीं ज्ञान कुछ, बिना ज्ञान नहीं सुख ।
नन्दू सांची बात यह, समझे कोई गुरुमुख ॥22 ॥
×
Song 26 — Hindi
530. नर शरीर को पायकर, कर नर का व्यवहार ।
समता चित में धार ले, सत पथ में पग धार ॥1 ॥
जो तू फूल गुलाब का, हंसमुखता धर चित ।
रंग बास दे जगत को, यह उपकार के हित ॥2 ॥
जो तू वृक्ष समान है, सहकर धूप और मेह ।
पंछी को छाया सघन, फूल पात फल देह ॥3 ॥
जो तू गंग तरंग है, धो औरों का मेल ।
शीतलता का दाव दे, चलें जो तेरी गेल ॥4 ॥
जो तू हंस स्वरूप है, क्षीर नीर बिलगाय ।
त्याग नीर गह क्षीर को, हंस का यही स्वभाव ॥5 ॥
जो तू कमल का फूल है, रह जल जल उतराय ।
धन सम्पत कुल पायकर, मत मन में इतराय ॥6 ॥
जो तू गुरु का भक्त है, भक्ति में चित राख ।
ध्यान और का त्यागकर, गह गुरुभक्ति की साख ॥7 ॥
सन्त पन्थ में आयकर, पाल प्रेम की रीत ।
नदी नाव संजोग लख, सबके संग कर प्रीत ॥8 ॥
जो तू सीप तो स्वाति का, ज्ञान बून्द गह ले ।
मोती झलके हृदय में, शोभा सागर दे ॥6 ॥
मलियागिरि चंदन बना, बास बास से बास ।
काटे आय कुल्हाड़ जो, मुख कर बास सुवास ॥10 ॥
राधास्वामी आदि गुरु, आय चिताया तोह ।
उनकी समझ चेतावनी, त्याग मान मद मोह ॥11 ॥
समता चित में धार ले, सत पथ में पग धार ॥1 ॥
जो तू फूल गुलाब का, हंसमुखता धर चित ।
रंग बास दे जगत को, यह उपकार के हित ॥2 ॥
जो तू वृक्ष समान है, सहकर धूप और मेह ।
पंछी को छाया सघन, फूल पात फल देह ॥3 ॥
जो तू गंग तरंग है, धो औरों का मेल ।
शीतलता का दाव दे, चलें जो तेरी गेल ॥4 ॥
जो तू हंस स्वरूप है, क्षीर नीर बिलगाय ।
त्याग नीर गह क्षीर को, हंस का यही स्वभाव ॥5 ॥
जो तू कमल का फूल है, रह जल जल उतराय ।
धन सम्पत कुल पायकर, मत मन में इतराय ॥6 ॥
जो तू गुरु का भक्त है, भक्ति में चित राख ।
ध्यान और का त्यागकर, गह गुरुभक्ति की साख ॥7 ॥
सन्त पन्थ में आयकर, पाल प्रेम की रीत ।
नदी नाव संजोग लख, सबके संग कर प्रीत ॥8 ॥
जो तू सीप तो स्वाति का, ज्ञान बून्द गह ले ।
मोती झलके हृदय में, शोभा सागर दे ॥6 ॥
मलियागिरि चंदन बना, बास बास से बास ।
काटे आय कुल्हाड़ जो, मुख कर बास सुवास ॥10 ॥
राधास्वामी आदि गुरु, आय चिताया तोह ।
उनकी समझ चेतावनी, त्याग मान मद मोह ॥11 ॥
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Song 27 — Hindi
531. गुरु सम दाता कोई नहीं, देखा जगत मझार ।
दीन हीन अधीन के, गुरु सच्चे रखवार ॥1 ॥
गुरु मिले सब मिट गये, मोह भरम जंजाल ।
अब चिंता भय कुछ नहीं, जब गुरु हुये दयाल ॥2 ॥
भक्ति दान गुरु ने दिया, भक्तिदान धन खान । ।
भक्ति से सब कुछ मिला, सत चित आनंद मान ॥3 ॥
दुर्लभ भक्ति का रतन है, गुरु बिन प्राप्त न होय । ।
विन गुरु ध्यान न ज्ञान कुछ, बिन गुरु मुक्ति न होय ॥4 ॥
मनमत से ममता बढ़े, घट आवे हंकार ।
गुरुमत से ममता घटे, नासे मूल विकार ॥5 ॥
गुरु मिले शीतल भया, शान्ती आई धाय ।
भ्रान्ती दुविधा मिट गई, जब गुरु हुये सहाय ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु मिले, सतसंग बचन सुनाय ।
अब कोई चिंता नहीं, मुक्ति का मिले उपाय ॥7 ॥
आस करो गुरु देव की, ले गुरु देव का नाम ।
गुरु आसा पूरन करें, चित को दें विश्राम ॥8 ॥
चलो पंथ में रात दिन, गुरु आज्ञा सिर धार ।
गुरु समरथ की कृपा से, एक दिन बेड़ा पार ॥6 ॥
मांगो तुमको मिलेगा, पूछ के उत्तर लो ।
ठोको और पट खुलेगा, राधास्वामी भजो ॥10 ॥
दीन हीन अधीन के, गुरु सच्चे रखवार ॥1 ॥
गुरु मिले सब मिट गये, मोह भरम जंजाल ।
अब चिंता भय कुछ नहीं, जब गुरु हुये दयाल ॥2 ॥
भक्ति दान गुरु ने दिया, भक्तिदान धन खान । ।
भक्ति से सब कुछ मिला, सत चित आनंद मान ॥3 ॥
दुर्लभ भक्ति का रतन है, गुरु बिन प्राप्त न होय । ।
विन गुरु ध्यान न ज्ञान कुछ, बिन गुरु मुक्ति न होय ॥4 ॥
मनमत से ममता बढ़े, घट आवे हंकार ।
गुरुमत से ममता घटे, नासे मूल विकार ॥5 ॥
गुरु मिले शीतल भया, शान्ती आई धाय ।
भ्रान्ती दुविधा मिट गई, जब गुरु हुये सहाय ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु मिले, सतसंग बचन सुनाय ।
अब कोई चिंता नहीं, मुक्ति का मिले उपाय ॥7 ॥
आस करो गुरु देव की, ले गुरु देव का नाम ।
गुरु आसा पूरन करें, चित को दें विश्राम ॥8 ॥
चलो पंथ में रात दिन, गुरु आज्ञा सिर धार ।
गुरु समरथ की कृपा से, एक दिन बेड़ा पार ॥6 ॥
मांगो तुमको मिलेगा, पूछ के उत्तर लो ।
ठोको और पट खुलेगा, राधास्वामी भजो ॥10 ॥
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Song 28 — Hindi
532. मैं साधु के संग हूँ, साधु मेरे हैं रूप ।
मुझमें साधु में भेद नहीं, कोई न प्रजा भूप ॥1 ॥
साधहि मेरे रूप हैं, मैं साधु का दास ।
साध सेव की लालसा, मेरे मन की आस ॥2 ॥
जो कोई सेवे साध को, मेरा सेवक सोय ।
साध सेव जो ना बने, सोहि आवत है रोय ॥3 ॥
साधु मेरे आत्मा, मैं साधु के साथ ।
तन मन धन से सेव करू , चरन लगाकर माथ ॥4 ॥
साधु रूप भगवंत का, दर्शन आवे ध्यान ।
भगवत की प्रसन्नता, साधु का सन्मान ॥5 ॥
मैं नहीं भूखा द्रव्य का, नाम रतन धन पाय ।
जो कोई अरपे कुछ मुझे, साधु के हेत चढ़ाय ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, मन में भय विवेक ।
मनसा वाचा कर्मणा, साधु साहिब एक ॥7 ॥
मुझमें साधु में भेद नहीं, कोई न प्रजा भूप ॥1 ॥
साधहि मेरे रूप हैं, मैं साधु का दास ।
साध सेव की लालसा, मेरे मन की आस ॥2 ॥
जो कोई सेवे साध को, मेरा सेवक सोय ।
साध सेव जो ना बने, सोहि आवत है रोय ॥3 ॥
साधु मेरे आत्मा, मैं साधु के साथ ।
तन मन धन से सेव करू , चरन लगाकर माथ ॥4 ॥
साधु रूप भगवंत का, दर्शन आवे ध्यान ।
भगवत की प्रसन्नता, साधु का सन्मान ॥5 ॥
मैं नहीं भूखा द्रव्य का, नाम रतन धन पाय ।
जो कोई अरपे कुछ मुझे, साधु के हेत चढ़ाय ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, मन में भय विवेक ।
मनसा वाचा कर्मणा, साधु साहिब एक ॥7 ॥
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Song 29 — Hindi
533. चित चकोर चन्दा लखे, मैं लखू सतगुरु देव ।
प्रेम प्रीत परतीत से, करूँ चरन की सेव ॥1 ॥
मैं न बिसारू नाम को, नाम न भूले मोह ।
नाम बसा जब हिये में, भूला काम और कोह ॥2 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को राखो साध ।
गुरु कृपा से सहज में, मन के मिटे उपाध ॥3 ॥
आंख कान मुख मूंदकर, करो शब्द अभ्यास ।
राधास्वामी की दया, चित्त न होय उदास ॥4 ॥
प्रीत प्रतीत की चाल चल, राखो गुरु का ध्यान ।
राधास्वामी की दया, सब प्रकार कल्यान ॥5 ॥
हाथ लगा रहे काम में, मन में गुरु का ध्यान ।
इस विधि जग में जतन कर, त्याग मोह मद मान ॥6 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को लो ठहराय ।
राधास्वामी की दया, भव का दुख मिट जाय ॥7 ॥
सांसों सांसों जात है, समय तुम्हारा खोय ।
सांस सांस गुरु नाम बो, जन्म सुफल सब होय ॥8 ॥
भजन करो आलस तजो, चित में रहे गुरू नाम ।
एक दिन गुरु की दया से, पूरन जग का काम ॥6 ॥
नाम भजो सुमिरन करो, गुरु पद का चित ध्यान ।
शब्द योग साधन किये, काल करे नहीं हान ॥10 ॥
ॐ चौपाई ॐ
प्रेम प्रीत परतीत से, करूँ चरन की सेव ॥1 ॥
मैं न बिसारू नाम को, नाम न भूले मोह ।
नाम बसा जब हिये में, भूला काम और कोह ॥2 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को राखो साध ।
गुरु कृपा से सहज में, मन के मिटे उपाध ॥3 ॥
आंख कान मुख मूंदकर, करो शब्द अभ्यास ।
राधास्वामी की दया, चित्त न होय उदास ॥4 ॥
प्रीत प्रतीत की चाल चल, राखो गुरु का ध्यान ।
राधास्वामी की दया, सब प्रकार कल्यान ॥5 ॥
हाथ लगा रहे काम में, मन में गुरु का ध्यान ।
इस विधि जग में जतन कर, त्याग मोह मद मान ॥6 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को लो ठहराय ।
राधास्वामी की दया, भव का दुख मिट जाय ॥7 ॥
सांसों सांसों जात है, समय तुम्हारा खोय ।
सांस सांस गुरु नाम बो, जन्म सुफल सब होय ॥8 ॥
भजन करो आलस तजो, चित में रहे गुरू नाम ।
एक दिन गुरु की दया से, पूरन जग का काम ॥6 ॥
नाम भजो सुमिरन करो, गुरु पद का चित ध्यान ।
शब्द योग साधन किये, काल करे नहीं हान ॥10 ॥
ॐ चौपाई ॐ
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Song 30 — Hindi
534. पहिले भू लोक चित लाओ ।
भूः लोक में फिर चढ़ आओ ॥
देखो अचरज बिमल तमाशा ।
जड़ चेतन का ज्ञान प्रकासा ॥
धरे प्रकृती अचरज रूप ।
कोई भिकारी रंक कोई भूप ॥
चेतन अंश ने खेल खिलाया ।
जड़ को जैसा चाहा बनाया ॥
भुः लोक है मानुष पिंडा ।
प्रकृती का खेल अखंडा । ।
देह तजो देखो चित रूप ।
रूप देख तुम हो जाओ भूप ॥
भुवः लोक है चेतन धाम ।
व्येष्टि चित रखा उसका नाम । ।
भूः लोक में फिर चढ़ आओ ॥
देखो अचरज बिमल तमाशा ।
जड़ चेतन का ज्ञान प्रकासा ॥
धरे प्रकृती अचरज रूप ।
कोई भिकारी रंक कोई भूप ॥
चेतन अंश ने खेल खिलाया ।
जड़ को जैसा चाहा बनाया ॥
भुः लोक है मानुष पिंडा ।
प्रकृती का खेल अखंडा । ।
देह तजो देखो चित रूप ।
रूप देख तुम हो जाओ भूप ॥
भुवः लोक है चेतन धाम ।
व्येष्टि चित रखा उसका नाम । ।
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Song 31 — Hindi
535. फिर चलने की करो तैयारी ।
देखो ईश्वर आनंदकारी । ।
चढ़ चढ़ आओ स्वः लोक तुम ।
ओम् जपो तपो मोह शोक तुम । ।
पुरुष प्रकृति विराट स्वरूपम् ।
अद्भुत लीला अमित अनूपम ॥
आनंद मिल आनंद हो जाओ ।
छिन छिन ईश्वर के गुन गाओ ।
लाख हाथ और लाखों कान ।
कैसे कोई करे बखान । ।
वह सत है वह चित आनन्द ।
उसी की कृपा से छूटे द्वन्द । ।
पुरुष प्रकृती की वह जान ।
इस पद में लखो उसका ज्ञान ।
शिव शन्द सागर जोति निरंजन सन्त बताया ।
ईश्वर का यह रूप लखाया ॥
तुम चेतन व्येष्टि रूप ।
चेतन ईश समष्टि स्वरूप ॥
जड़ चेतन मिल बना है जीव ।
माया चेतन ईश्वर पीव ॥
जीव ईश का भेद बताया ।
गुप्त न राखा खुलकर गाया ।
देखो ईश्वर आनंदकारी । ।
चढ़ चढ़ आओ स्वः लोक तुम ।
ओम् जपो तपो मोह शोक तुम । ।
पुरुष प्रकृति विराट स्वरूपम् ।
अद्भुत लीला अमित अनूपम ॥
आनंद मिल आनंद हो जाओ ।
छिन छिन ईश्वर के गुन गाओ ।
लाख हाथ और लाखों कान ।
कैसे कोई करे बखान । ।
वह सत है वह चित आनन्द ।
उसी की कृपा से छूटे द्वन्द । ।
पुरुष प्रकृती की वह जान ।
इस पद में लखो उसका ज्ञान ।
शिव शन्द सागर जोति निरंजन सन्त बताया ।
ईश्वर का यह रूप लखाया ॥
तुम चेतन व्येष्टि रूप ।
चेतन ईश समष्टि स्वरूप ॥
जड़ चेतन मिल बना है जीव ।
माया चेतन ईश्वर पीव ॥
जीव ईश का भेद बताया ।
गुप्त न राखा खुलकर गाया ।
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Song 32 — Hindi
536. सुरत चढ़ी ब्रह्मांड मंझार ।
महत तत्व का खोला द्वार ।
अंडा रूप ताहि मन माना ।
हिरण्यगर्भ का रूप पिछाना ॥
यह ब्रह्मांड महत की छाया ।
ओम् महः ताहि वेद बताया ॥
सुन्दर रूप बरनि नहीं जाई ।
महा ऋषि मुनि सुर नर गाई ॥
चित एकाग्र से उसको देखा ।
तब साधु किया हमने लेखा ॥
महत तत्व का खोला द्वार ।
अंडा रूप ताहि मन माना ।
हिरण्यगर्भ का रूप पिछाना ॥
यह ब्रह्मांड महत की छाया ।
ओम् महः ताहि वेद बताया ॥
सुन्दर रूप बरनि नहीं जाई ।
महा ऋषि मुनि सुर नर गाई ॥
चित एकाग्र से उसको देखा ।
तब साधु किया हमने लेखा ॥
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Song 33 — Hindi
537. पंचम दर पंचम अस्थाना ।
ओम् जनः जन लोक ठिकाना ॥
अव्याकृत नाम सुन लीजे ।
तब उसके गुन को चित दीजे ॥
सुरत चली जन लोक में आई ।
बड़ी बनी जन पदवी पाई ॥
जो कोई इस मंडल तक आवे ।
श्रेष्ठ बने जन जनक कहावे ॥
सब में उत्तम सब में ऊँचा ।
धन्य भाग जो यहां तक पहुँचा ।
उत्तम मिल उत्तम पद पाया ।
उत्तम मिल उत्तम बन आया ।
यहां तक रूप रंग अरु रेखा ।
अब आगे का करो परेखा ॥
ओम् जनः जन लोक ठिकाना ॥
अव्याकृत नाम सुन लीजे ।
तब उसके गुन को चित दीजे ॥
सुरत चली जन लोक में आई ।
बड़ी बनी जन पदवी पाई ॥
जो कोई इस मंडल तक आवे ।
श्रेष्ठ बने जन जनक कहावे ॥
सब में उत्तम सब में ऊँचा ।
धन्य भाग जो यहां तक पहुँचा ।
उत्तम मिल उत्तम पद पाया ।
उत्तम मिल उत्तम बन आया ।
यहां तक रूप रंग अरु रेखा ।
अब आगे का करो परेखा ॥
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Song 34 — Hindi
538. छटवां तपः लोक है भाई ।
तप बल की जहां प्रभुत्ताई । ।
ओम् तपः धरा उसका नाम ।
हंस गति का वह निज ठाम ॥
हंस बने तब किया निबेड़ा ।
नीर क्षीर का मिटा बखेड़ा ॥
छोड़ा नीर क्षीर लिया मन में ।
हर्ष शोक नहीं व्यापे सुपने । ।
तप करतब बल अधिक बढ़ाया ।
संस्कार सब तप से मिटाया ।
भस्म किया शुभ अशुभ कर्म सब ।
मिटे यहां अज्ञान भर्म सब ॥
परमहंस हुई सूरत प्यारी ।
सत्त धाम की भई अधिकारी ॥
तप बल की जहां प्रभुत्ताई । ।
ओम् तपः धरा उसका नाम ।
हंस गति का वह निज ठाम ॥
हंस बने तब किया निबेड़ा ।
नीर क्षीर का मिटा बखेड़ा ॥
छोड़ा नीर क्षीर लिया मन में ।
हर्ष शोक नहीं व्यापे सुपने । ।
तप करतब बल अधिक बढ़ाया ।
संस्कार सब तप से मिटाया ।
भस्म किया शुभ अशुभ कर्म सब ।
मिटे यहां अज्ञान भर्म सब ॥
परमहंस हुई सूरत प्यारी ।
सत्त धाम की भई अधिकारी ॥
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Song 35 — Hindi
539. चल सजनी अब सतगुरु धाम ।
सन्त कह जाहि सतपद ठाम ॥
सत्त लोक की खाड़ी आई ।
सतपद में जाय सुरत समाई ॥
रूप रंग रेखा तज डार ।
भवसागर के हो जा पार ॥
जो कोई सतपद आय समाये ।
रूप रंग रेखा मिट जाये ॥
सन्तन का यह सतपद धाम ।
सत्त कबीर कहें सतनाम । ।
नानक पीर ने यह समझाया ।
तुलसी साहेब निजकर गाया ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
विद्या गुप्त बताई सारी ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी पर मैं बल बल जाऊ ॥
राधास्वामी चरन शरन अब पाई ।
राधास्वामी गूढ़ तत्व समझाई । ।
राधास्वामी दृष्टि खोल जब दीन्हा ।
तब ही गूढ़ तत्व हम चीन्हा । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी दीन बन्धु सुख दाता ।
राधास्वामी गुरु समरथ पितु माता ॥
॥
सोरठा ॥
सन्त कह जाहि सतपद ठाम ॥
सत्त लोक की खाड़ी आई ।
सतपद में जाय सुरत समाई ॥
रूप रंग रेखा तज डार ।
भवसागर के हो जा पार ॥
जो कोई सतपद आय समाये ।
रूप रंग रेखा मिट जाये ॥
सन्तन का यह सतपद धाम ।
सत्त कबीर कहें सतनाम । ।
नानक पीर ने यह समझाया ।
तुलसी साहेब निजकर गाया ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
विद्या गुप्त बताई सारी ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी पर मैं बल बल जाऊ ॥
राधास्वामी चरन शरन अब पाई ।
राधास्वामी गूढ़ तत्व समझाई । ।
राधास्वामी दृष्टि खोल जब दीन्हा ।
तब ही गूढ़ तत्व हम चीन्हा । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी दीन बन्धु सुख दाता ।
राधास्वामी गुरु समरथ पितु माता ॥
॥
सोरठा ॥
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Song 36 — Hindi
540. सत चित आनन्द रूप, बुद्धि से जानिये ।
तीनों का ले भेद, परम सुख मानिये ॥1 ॥
बुद्धि ज्ञान प्रकासिया, तब जन होय जाई ।
लहे बुद्धि निधि ज्ञान, मिले तब मान बड़ाई ॥2 ॥
कल्पित मान बड़ाई सब, मिथ्या तज डारो ।
तप से ताहि जराय, सत का लियो सहारो ॥3 ॥
सतपद ठौर ठिकान, वही सतधाम है ।
सन्तन किया बखान, सत्त सतनाम है ॥4 ॥
सुरत शब्द के जोग में, मन चित ठहराना ।
इंगला पिंडला छोड़ कर, सुखमन घर आना ||
मुखमन के घर राग, राग में अनहद पानी ।
अनहद बानी सुहावनी, सुरत शब्द निशानी ॥6 ॥
सुरत निरत यक अंग कर, मन ले ठहराई। ।
मन ही सोध ले साधुवा, तब सतपद जाई ॥7 ॥
दोहाशब्द मेद गुरु से मिले, बिन गुरु काज न होय ।
गुरु बिन ज्ञान मिले नहीं, यह भाखे सब कोय ॥
राधास्वामी दया करी, दीन्हा मेद बताय ।
मूरख जन चेते नहीं, कौन कहे समझाय ॥
तीनों का ले भेद, परम सुख मानिये ॥1 ॥
बुद्धि ज्ञान प्रकासिया, तब जन होय जाई ।
लहे बुद्धि निधि ज्ञान, मिले तब मान बड़ाई ॥2 ॥
कल्पित मान बड़ाई सब, मिथ्या तज डारो ।
तप से ताहि जराय, सत का लियो सहारो ॥3 ॥
सतपद ठौर ठिकान, वही सतधाम है ।
सन्तन किया बखान, सत्त सतनाम है ॥4 ॥
सुरत शब्द के जोग में, मन चित ठहराना ।
इंगला पिंडला छोड़ कर, सुखमन घर आना ||
मुखमन के घर राग, राग में अनहद पानी ।
अनहद बानी सुहावनी, सुरत शब्द निशानी ॥6 ॥
सुरत निरत यक अंग कर, मन ले ठहराई। ।
मन ही सोध ले साधुवा, तब सतपद जाई ॥7 ॥
दोहाशब्द मेद गुरु से मिले, बिन गुरु काज न होय ।
गुरु बिन ज्ञान मिले नहीं, यह भाखे सब कोय ॥
राधास्वामी दया करी, दीन्हा मेद बताय ।
मूरख जन चेते नहीं, कौन कहे समझाय ॥
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Song 37 — Hindi
541. दोहा
राधास्वामी सतगुरु, दिया शब्द का मेद ।
जो मानें इस शब्द को, मिटे भरम का खेद ॥
ॐ चौपाई दया मेहर गुरु उमड़त आई ।
परमारथ का पन्थ दिखाई । ।
पन्थ डगर घट भीतर दरसा ।
हुए प्रसन्न गुरु पद को परसा ॥
गुरु है समरथ अन्तर्यामी ।
गुरु के चरन सरोज नमामी ।
गुरु है परम पुरुष घट वासी ।
अमल बिमल निमेल सुखरासी ॥
गुरु मूरत निज हृदय धरना ।
गुरु का ध्यान निरंतर करना । ।
गुरु सुमिरन गुरु ही हैं ध्याना ।
गुरु है अगम सुगम गम ज्ञाना ॥
गुरु की खोज करो तुम भाई ।
गुरु की दया जाय कठिनाई ॥
गुरु का भजन गुरु की सेवा ।
गुरु समान कोई और न देवा ॥
दोहागुरु की अस्तुति बंदना, गुरु का सुमिरन ध्यान ।
गुरु के भजन से साधुवा, उपजे निर्मल ज्ञान ।
राधास्वामी सतगुरु, दिया शब्द का मेद ।
जो मानें इस शब्द को, मिटे भरम का खेद ॥
ॐ चौपाई दया मेहर गुरु उमड़त आई ।
परमारथ का पन्थ दिखाई । ।
पन्थ डगर घट भीतर दरसा ।
हुए प्रसन्न गुरु पद को परसा ॥
गुरु है समरथ अन्तर्यामी ।
गुरु के चरन सरोज नमामी ।
गुरु है परम पुरुष घट वासी ।
अमल बिमल निमेल सुखरासी ॥
गुरु मूरत निज हृदय धरना ।
गुरु का ध्यान निरंतर करना । ।
गुरु सुमिरन गुरु ही हैं ध्याना ।
गुरु है अगम सुगम गम ज्ञाना ॥
गुरु की खोज करो तुम भाई ।
गुरु की दया जाय कठिनाई ॥
गुरु का भजन गुरु की सेवा ।
गुरु समान कोई और न देवा ॥
दोहागुरु की अस्तुति बंदना, गुरु का सुमिरन ध्यान ।
गुरु के भजन से साधुवा, उपजे निर्मल ज्ञान ।
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Song 38 — Hindi
542. शब्द जोग की करो कमाई ।
चित से मेटो सब दुचिताई । ।
शब्द से भई जगत की सृष्टि ।
शब्द समष्टि शब्द है व्यष्टि ।
शब्द जीव है शब्द है ब्रह्म ।
शब्द से जावे भवका भमे ॥
शब्द आकाश का है भंडार ।
शब्द की महिमा का नहीं पार ॥
शब्द अनीह अनाहत शब्द ।
शब्द जिज्ञासा आरत शब्द ॥
शब्द ज्ञान की सूझ सुझावे ।
शब्द अर्थ और जतन बतावे । ।
शब्द शब्द का द्वार दिखावे ।
शब्द शब्द का भरम हटावे ॥
शब्दहि बानी शब्दहि सार ।
सार शब्द से हुये निस्तार ॥
दोहाशब्द शब्द में अंतरा, शब्द शब्द में भेद ।
___ सार शब्द लौ लाइये, जामे दुख न खेद ॥
चित से मेटो सब दुचिताई । ।
शब्द से भई जगत की सृष्टि ।
शब्द समष्टि शब्द है व्यष्टि ।
शब्द जीव है शब्द है ब्रह्म ।
शब्द से जावे भवका भमे ॥
शब्द आकाश का है भंडार ।
शब्द की महिमा का नहीं पार ॥
शब्द अनीह अनाहत शब्द ।
शब्द जिज्ञासा आरत शब्द ॥
शब्द ज्ञान की सूझ सुझावे ।
शब्द अर्थ और जतन बतावे । ।
शब्द शब्द का द्वार दिखावे ।
शब्द शब्द का भरम हटावे ॥
शब्दहि बानी शब्दहि सार ।
सार शब्द से हुये निस्तार ॥
दोहाशब्द शब्द में अंतरा, शब्द शब्द में भेद ।
___ सार शब्द लौ लाइये, जामे दुख न खेद ॥
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Song 39 — Hindi
543. शब्द अनाम नाम है शब्द ।
शब्द अकाम काम है शब्द ॥
शब्द अर्थ है शब्द अनर्थ ।
शब्द समर्थ शब्द असमर्थ ॥
शब्द गुरु और शब्दहि चेला ।
सब्द अनेक और शब्द अकेला ॥
साधन शब्द शब्द सिद्धान्त ।
शब्द भ्रान्त शब्द निरभ्रान्त ॥
शब्द कटावे जम की फाँसी ।
शब्द विनोद शब्द है हांसी ॥
शब्द कमावे सोई सियाना ।
शब्द न बूझे सो अज्ञाना ।
जग का शब्द जोनि ले आवे ।
गुरु के शब्द परम पद पावे ॥
शब्द का भेद गुरु से पाओ ।
बिन गुरु शब्द न कभी कमाओ ।
शब्दजोग अति सुगम है, निगम अगम गम सार ।
साधन शब्द का जो करे, देखे बिमल बहार ॥
शब्द अकाम काम है शब्द ॥
शब्द अर्थ है शब्द अनर्थ ।
शब्द समर्थ शब्द असमर्थ ॥
शब्द गुरु और शब्दहि चेला ।
सब्द अनेक और शब्द अकेला ॥
साधन शब्द शब्द सिद्धान्त ।
शब्द भ्रान्त शब्द निरभ्रान्त ॥
शब्द कटावे जम की फाँसी ।
शब्द विनोद शब्द है हांसी ॥
शब्द कमावे सोई सियाना ।
शब्द न बूझे सो अज्ञाना ।
जग का शब्द जोनि ले आवे ।
गुरु के शब्द परम पद पावे ॥
शब्द का भेद गुरु से पाओ ।
बिन गुरु शब्द न कभी कमाओ ।
शब्दजोग अति सुगम है, निगम अगम गम सार ।
साधन शब्द का जो करे, देखे बिमल बहार ॥
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Song 40 — Hindi
544. राधास्वामी दया मिला मोहि ज्ञाना ।
जो कोई माँगेंहूँ मैं दाना ॥
गुरु ने बख्शा माल खजाना ।
ले अधिकारी चतुर सुजाना । ।
कुछ दिन आये करे सतसंगा ।
मन का मोह भरम होय भंगा ॥
320. भारत जिज्ञासु नर ज्ञानी ।
अरथाप्ति वा अज्ञानी ॥
चंचल मूड़ के क्रोधी कामी ।
मानी छली निपट अभिमानी । ।
पापी पाप ग्रस्त वा रोगी ।
भोगी सोगी अथवा जोगी ।
जाको मैं अधिकारी पाऊँ ।
गुरु का भेद प्रगट कह गाऊँ ॥
गूढ तत्व सब ताहि सुनाऊँ ।
भेद न राखू प्रेम जताऊँ ।
दोहाईश वाद का कथन नहीं, नहीं निरीश्वर वाद ।
दोऊ में मम परम प्रिय, करें न वाद विवाद ॥
जो कोई माँगेंहूँ मैं दाना ॥
गुरु ने बख्शा माल खजाना ।
ले अधिकारी चतुर सुजाना । ।
कुछ दिन आये करे सतसंगा ।
मन का मोह भरम होय भंगा ॥
320. भारत जिज्ञासु नर ज्ञानी ।
अरथाप्ति वा अज्ञानी ॥
चंचल मूड़ के क्रोधी कामी ।
मानी छली निपट अभिमानी । ।
पापी पाप ग्रस्त वा रोगी ।
भोगी सोगी अथवा जोगी ।
जाको मैं अधिकारी पाऊँ ।
गुरु का भेद प्रगट कह गाऊँ ॥
गूढ तत्व सब ताहि सुनाऊँ ।
भेद न राखू प्रेम जताऊँ ।
दोहाईश वाद का कथन नहीं, नहीं निरीश्वर वाद ।
दोऊ में मम परम प्रिय, करें न वाद विवाद ॥
×
Song 41 — Hindi
545. शब्द बताऊँ सहसकमल का ।
नाद सुनाऊँ त्रिकुटी मंडल का ॥
सुन्न महासुन्न बानी चारी ।
भंवर गुफा मुरली झनकार ॥
सतपद बीन की धुनी लखाऊँ ।
अलख अगम के पार पहुँचाऊँ ।
धाम अनामी राधास्वामी ।
धुरपद पद सरोज निज धामी ॥
इतने पद सन्तों ने कहे ।
बिन गुरु मरम न कोई लहे ॥
पहिले तजो धाम नासूत ।
फिर आओ चढ़कर मलकूत ॥
ताके पार रहे जबरूत ।
इसके परे धाम लाहूत ॥
हूत पार है हूतुलहूत ।
समझे कोई ज्ञानी अवधूत ॥
दोहायह साधन योग का, नहीं विचार का काम ।
तज विचार करनी करे, तब प्रगटे सतनाम ॥
नाद सुनाऊँ त्रिकुटी मंडल का ॥
सुन्न महासुन्न बानी चारी ।
भंवर गुफा मुरली झनकार ॥
सतपद बीन की धुनी लखाऊँ ।
अलख अगम के पार पहुँचाऊँ ।
धाम अनामी राधास्वामी ।
धुरपद पद सरोज निज धामी ॥
इतने पद सन्तों ने कहे ।
बिन गुरु मरम न कोई लहे ॥
पहिले तजो धाम नासूत ।
फिर आओ चढ़कर मलकूत ॥
ताके पार रहे जबरूत ।
इसके परे धाम लाहूत ॥
हूत पार है हूतुलहूत ।
समझे कोई ज्ञानी अवधूत ॥
दोहायह साधन योग का, नहीं विचार का काम ।
तज विचार करनी करे, तब प्रगटे सतनाम ॥
×
Song 42 — Hindi
546. राधास्वामी राधास्वामी नित गुन गाऊँ ।
राधास्वामी धुन सुन सुन हरपाऊँ ।
राधास्वामी सम कोई और न दुजा ।
राधास्वामी धासै चित में पूजा । ।
राधास्वामी मेरे गुरु दातार ।
राधास्वामी संग में जाऊँ पार ॥
321 राधास्वामी परम पुरुष निरवान ।
राधास्वामी पर तन मन कुरवान ।
राधास्वामी प्रीत प्रेम उरझाया ।
राधास्वामी भक्ति में मन ठहराया ।
राधास्वामी नाम अमी रस पीना ।
राधास्वामी सत संगत चित दीना ॥
राधास्वामी की गति क्या कोई जाने ।
__राधास्वामी पद बिरला पहचाने ।
राधास्वामी नाम अनाम अमाया ।
राधास्वामी अमर अजर दिखलाया ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, व्यापा राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ॥
राधास्वामी धुन सुन सुन हरपाऊँ ।
राधास्वामी सम कोई और न दुजा ।
राधास्वामी धासै चित में पूजा । ।
राधास्वामी मेरे गुरु दातार ।
राधास्वामी संग में जाऊँ पार ॥
321 राधास्वामी परम पुरुष निरवान ।
राधास्वामी पर तन मन कुरवान ।
राधास्वामी प्रीत प्रेम उरझाया ।
राधास्वामी भक्ति में मन ठहराया ।
राधास्वामी नाम अमी रस पीना ।
राधास्वामी सत संगत चित दीना ॥
राधास्वामी की गति क्या कोई जाने ।
__राधास्वामी पद बिरला पहचाने ।
राधास्वामी नाम अनाम अमाया ।
राधास्वामी अमर अजर दिखलाया ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, व्यापा राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ॥
×
Song 43 — Hindi
547. गुरु गुरु मैं निस दिन गाता ।
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रति पाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ॥
गुरु अनाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा ॥
गुरु समदर्शी गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सतचित आनन्द की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु अपारा ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का वार न पार ।
जिन देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ।
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रति पाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ॥
गुरु अनाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा ॥
गुरु समदर्शी गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सतचित आनन्द की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु अपारा ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का वार न पार ।
जिन देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ।
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Song 44 — Hindi
548. गुरु खालिक मखलूक गुरु हैं ।
गुरु आशक माशूक गुरु है । ।
गुरु में प्रेम गुरु में भक्ति ।
गुरु समान कोई और न शक्ति ।
गुरु धुरपद गुरु हैं निरवाना ।
गुरु समान कोई और न जाना ।
गुरु की शरनागत जब आया ।
भव का सकल विकार न साया ।
गुरु की बानी अगम ठिकानी ।
गुरु प्रताप कोई विरला जानी ॥
गुरु के शरन आये जब पानी ।
गुरु की महिमा तब कुछ जानी ॥
मैं भवरा गुरु कमल प्रकाशी ।
गुरु नित गुरु मूरत अविनासी ॥
गुरु जान गुरु हैं मेरे प्रान ।
गुरु सांस गुरु शब्द की खान ॥
दोहाएक गुरु की आस कर, त्याग जगत की आस ।
राधास्वामी चरन में, धार सदा विश्वास ॥
( साखी )
गुरु आशक माशूक गुरु है । ।
गुरु में प्रेम गुरु में भक्ति ।
गुरु समान कोई और न शक्ति ।
गुरु धुरपद गुरु हैं निरवाना ।
गुरु समान कोई और न जाना ।
गुरु की शरनागत जब आया ।
भव का सकल विकार न साया ।
गुरु की बानी अगम ठिकानी ।
गुरु प्रताप कोई विरला जानी ॥
गुरु के शरन आये जब पानी ।
गुरु की महिमा तब कुछ जानी ॥
मैं भवरा गुरु कमल प्रकाशी ।
गुरु नित गुरु मूरत अविनासी ॥
गुरु जान गुरु हैं मेरे प्रान ।
गुरु सांस गुरु शब्द की खान ॥
दोहाएक गुरु की आस कर, त्याग जगत की आस ।
राधास्वामी चरन में, धार सदा विश्वास ॥
( साखी )
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Song 45 — Hindi
546. पढ़ा लिखा कुछ गुना नहीं, तोते जैसी रट ।
पेट की खटपट में रहे, यह विद्या सट पट ॥1 ॥
परमारथ करने चले, तिरिया पकड़े कान ।
पहिले घर को देख ले, पाछे कर तू ध्यान ॥2 ॥
भेस बनाये क्या भया, घर घर मांगी भीख । ।
धिक इस जीवन पर सदा, समझ न भाई सीख ॥3 ॥
चित नहीं ठहरे ध्यान में, भटक भटक भटकाय ।
खाली पेट बेरी कठिन, खुशी न हाय सुहाय ॥4 ॥
गले में कफनी डाल ली, बन स्वांगी दरवेश । ।
लानत ऐसी जिन्दगी, लानत ऐसे भेस ॥ ॥
ज्ञानी ध्यानी संजमी, रोटी के आधीन ।
मुक्ति न पावें सौ जनम, समझबूझ के हीन ॥6 ॥
पहिले लोक सुधार ले, तब पाछे परलोक ।
जो नहीं ऐसा करेगा, बहुत सहेगा शोक ॥7 ॥
कहता हूँ कह जात हूँ, कहता हूँ सौ बार ।
खाली पेट न हर भजे, मिथ्या ज्ञान बिचार ॥8 ॥
पेट की खटपट में रहे, यह विद्या सट पट ॥1 ॥
परमारथ करने चले, तिरिया पकड़े कान ।
पहिले घर को देख ले, पाछे कर तू ध्यान ॥2 ॥
भेस बनाये क्या भया, घर घर मांगी भीख । ।
धिक इस जीवन पर सदा, समझ न भाई सीख ॥3 ॥
चित नहीं ठहरे ध्यान में, भटक भटक भटकाय ।
खाली पेट बेरी कठिन, खुशी न हाय सुहाय ॥4 ॥
गले में कफनी डाल ली, बन स्वांगी दरवेश । ।
लानत ऐसी जिन्दगी, लानत ऐसे भेस ॥ ॥
ज्ञानी ध्यानी संजमी, रोटी के आधीन ।
मुक्ति न पावें सौ जनम, समझबूझ के हीन ॥6 ॥
पहिले लोक सुधार ले, तब पाछे परलोक ।
जो नहीं ऐसा करेगा, बहुत सहेगा शोक ॥7 ॥
कहता हूँ कह जात हूँ, कहता हूँ सौ बार ।
खाली पेट न हर भजे, मिथ्या ज्ञान बिचार ॥8 ॥
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Song 46 — Hindi
550. दोहाघट में काशी द्वारका, घट में गिर कैलास ।
घट में ब्रह्मा विष्णु हैं, घट है शिव का बास ॥
घट में सहसकमल दल जोती ।
घट में त्रिकुटी सिंध गति मोती ॥
घट में ओंकार विस्तारा ।
घट में निरखो ब्रह्म पसारा ॥
घट में सुन्न समाध रचाओ ।
घट में उनमुनी दशा समाओ ॥
घट में सोहंग घट में सत ।
घट में सूझे सन्त का मत ॥
अलख अगम घट की ठकुराई ।
राधास्वामी भेद बताई ॥
दोहाजो घट की लीला लखे, सूझे अगम अपार ।
बिन घट खोज न पाइये, सतगुरु का दीदार ॥
घट में ब्रह्मा विष्णु हैं, घट है शिव का बास ॥
घट में सहसकमल दल जोती ।
घट में त्रिकुटी सिंध गति मोती ॥
घट में ओंकार विस्तारा ।
घट में निरखो ब्रह्म पसारा ॥
घट में सुन्न समाध रचाओ ।
घट में उनमुनी दशा समाओ ॥
घट में सोहंग घट में सत ।
घट में सूझे सन्त का मत ॥
अलख अगम घट की ठकुराई ।
राधास्वामी भेद बताई ॥
दोहाजो घट की लीला लखे, सूझे अगम अपार ।
बिन घट खोज न पाइये, सतगुरु का दीदार ॥
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Song 47 — Hindi
551. दुखी जीव सुख के सहकारी ।
बद्ध मुक्ति के है अधिकारी ।
बिन दुख सुख की चाह न आवे ।
बिना बन्ध मुक्ति नहीं पावे । ।
एक को टेक से छुटे अनेक ।
भक्ति भाव से बड़े विवेक ।
भक्ति ज्ञान और शुद्ध विचार ।
साधन से पावे उदगार ॥
सुमिरन भजन ध्यान चित लाओ ।
तब अधिकार ज्ञान का पाओ ।
शब्द योग बिन पन नहीं निश्चल ।
बिन मन निश्चल ज्ञान न निर्मल ज्ञान बिमल जब घट नहीं आवे ।
यह मन शांती कदापि न पावे ॥
ज्ञान रूप गुरु राधास्वामी ।
अस आदर्श के चरन नमामी ॥
गुरु ही इण्ट आदर्श परमपद ।
गुरु की मेहर से छूटे आपद ॥
तीन ताप भव दुख सब कटे ।
मन बुद्धि चित गुरु में बसें ॥
आनन्द पाय जो चित ठहराय ।
सहस ही सहस समाध जगाय ॥
सहज समाध परम पद जानो ।
सन्त मते का सार पिछानो ॥
बाद विवाद काम नहीं आये ।
साध वही जो भक्ति कमावे ॥
राधास्वामी दया काम बन जावे ।
सेवक फिर भव फन्द न आवे ॥
324.
॥साखी ॥
बद्ध मुक्ति के है अधिकारी ।
बिन दुख सुख की चाह न आवे ।
बिना बन्ध मुक्ति नहीं पावे । ।
एक को टेक से छुटे अनेक ।
भक्ति भाव से बड़े विवेक ।
भक्ति ज्ञान और शुद्ध विचार ।
साधन से पावे उदगार ॥
सुमिरन भजन ध्यान चित लाओ ।
तब अधिकार ज्ञान का पाओ ।
शब्द योग बिन पन नहीं निश्चल ।
बिन मन निश्चल ज्ञान न निर्मल ज्ञान बिमल जब घट नहीं आवे ।
यह मन शांती कदापि न पावे ॥
ज्ञान रूप गुरु राधास्वामी ।
अस आदर्श के चरन नमामी ॥
गुरु ही इण्ट आदर्श परमपद ।
गुरु की मेहर से छूटे आपद ॥
तीन ताप भव दुख सब कटे ।
मन बुद्धि चित गुरु में बसें ॥
आनन्द पाय जो चित ठहराय ।
सहस ही सहस समाध जगाय ॥
सहज समाध परम पद जानो ।
सन्त मते का सार पिछानो ॥
बाद विवाद काम नहीं आये ।
साध वही जो भक्ति कमावे ॥
राधास्वामी दया काम बन जावे ।
सेवक फिर भव फन्द न आवे ॥
324.
॥साखी ॥
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Song 48 — Hindi
552. राधास्वामी सत्त है, और सकल सब झूठ ।
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खू ट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम कह, मन मनसा को त्याग ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव । ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद है, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोटि कोटि परनाम ॥5 ॥
॥
चौपाई ॥
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खू ट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम कह, मन मनसा को त्याग ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव । ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद है, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोटि कोटि परनाम ॥5 ॥
॥
चौपाई ॥
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Song 49 — Hindi
553. मन पर निसदिन हो असवार ।
यह मन डाकू यह बटमार ॥
युक्ति शक्ति से जीतो वाको ।
सोच समझ बस लाओ ताको ।
मन के मते कभी नहीं चलना ।
नहीं तो अंत हाथ का मलना । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मन के घाट से होगये पारी । ।
यह मन डाकू यह बटमार ॥
युक्ति शक्ति से जीतो वाको ।
सोच समझ बस लाओ ताको ।
मन के मते कभी नहीं चलना ।
नहीं तो अंत हाथ का मलना । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मन के घाट से होगये पारी । ।
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Song 50 — Hindi
554. कुछ दिन सतसंग की आस ।
कुछ दिन ध्यान भजन अभ्यास ॥
भजन ध्यान सुमिरन लौलीन ।
कुछ दिन गुरु चरनन में दीन ।
गुरु चरन में आपा मेटो ।
तब इस भव का टाट समेटो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति नियारी ॥
325
कुछ दिन ध्यान भजन अभ्यास ॥
भजन ध्यान सुमिरन लौलीन ।
कुछ दिन गुरु चरनन में दीन ।
गुरु चरन में आपा मेटो ।
तब इस भव का टाट समेटो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति नियारी ॥
325
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Song 51 — Hindi
555 पहिले करम करो बिधि नाना ।
मूढ़ अवस्था मिटे सुजाना ॥
तब उपासना से रज जीत ।
चंचल वृत्ति न आवे चीत ॥
सत अज्ञान का भरम मिटाओ ।
तब कहीं ज्ञान की सम्पत पाओ ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
चौथे पद की करी तय्यारी ॥
मूढ़ अवस्था मिटे सुजाना ॥
तब उपासना से रज जीत ।
चंचल वृत्ति न आवे चीत ॥
सत अज्ञान का भरम मिटाओ ।
तब कहीं ज्ञान की सम्पत पाओ ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
चौथे पद की करी तय्यारी ॥
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Song 52 — Hindi
556. मोर तोर की रसरी भारी ।
तासे बन्धे जीव संसारी ॥
बकरा ‘मैं’ कह गला कटावे ।
मैंना ‘मैं ना’ कह सुख पावे ॥
मैं मैं बुरी आग है भाई ।
‘मैं’ से जगत भया दुखदाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
‘मैं तज सेवक बना सुखारी ॥
तासे बन्धे जीव संसारी ॥
बकरा ‘मैं’ कह गला कटावे ।
मैंना ‘मैं ना’ कह सुख पावे ॥
मैं मैं बुरी आग है भाई ।
‘मैं’ से जगत भया दुखदाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
‘मैं तज सेवक बना सुखारी ॥
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Song 53 — Hindi
557. धन दे धन का पावे दान ।
विद्या दे हो विद्यावान || ज्ञान रतन जो कोई दे ।
जग में यश और कीर्ती ले ॥
भक्ति देकर भक्त कहावे ।
तारे सबहि आप तर जावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
दान की परखी महिमा भारी ॥
विद्या दे हो विद्यावान || ज्ञान रतन जो कोई दे ।
जग में यश और कीर्ती ले ॥
भक्ति देकर भक्त कहावे ।
तारे सबहि आप तर जावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
दान की परखी महिमा भारी ॥
×
Song 54 — Hindi
558. ऊँचे पानी कभी न टिके ।
नीचा होय सो भर भर पीये ॥
सिर पर चढ़े सो गिर गिर जाय ।
पांव पड़े भक्ति फल पाय ॥
दीन दयाल नाम सतगुरु का ।
दीन दुखी हो दास चरनन का ॥
राधास्वामी शरन चरन बलिहारी ।
दीन भक्त की महिमा भारी ॥
नीचा होय सो भर भर पीये ॥
सिर पर चढ़े सो गिर गिर जाय ।
पांव पड़े भक्ति फल पाय ॥
दीन दयाल नाम सतगुरु का ।
दीन दुखी हो दास चरनन का ॥
राधास्वामी शरन चरन बलिहारी ।
दीन भक्त की महिमा भारी ॥
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Song 55 — Hindi
559. प्रेम प्रीति की प्रीति अनूप ।
प्रेम से रंक दुखी होय भूप ॥
मरे जीव को प्रेम जिलावे ।
प्रेम अलौकिक वस्तु कहावे ॥
चामन प्रेम फन्द से बन्धे ।
नित बलि द्वारे निस दिन खड़े । ।
दुर्योधन का तज पकवान ।
खाया साग विदुर घर आन ॥
शवरी के बेर ससाद रस खाये ।
राम कृष्ण दोनों हाये । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
महिमा प्रेम की अकथ अपारी। ।
प्रेम से रंक दुखी होय भूप ॥
मरे जीव को प्रेम जिलावे ।
प्रेम अलौकिक वस्तु कहावे ॥
चामन प्रेम फन्द से बन्धे ।
नित बलि द्वारे निस दिन खड़े । ।
दुर्योधन का तज पकवान ।
खाया साग विदुर घर आन ॥
शवरी के बेर ससाद रस खाये ।
राम कृष्ण दोनों हाये । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
महिमा प्रेम की अकथ अपारी। ।
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Song 56 — Hindi
560. उलट सुरत को तिल में लाओ ।
रुद्र नेत्र में ताहि जमाओ ॥
मन को रोको मन परबोधो ।
मनहि सुधारो मन को सोधो ॥
वाह्य जगत की आस भुलाओ ।
आसा गुरु चरनन में लाओ ।
आसा मनसा दोनों मोड़ी ।
चरन कमल गुरु में चित जोड़ी ।
राधास्वामी नाम जीव निज घट में ।
आसन धारो तिल के पट में । ।
देखो घट में विमल तमामा ।
सहसकमल का जहां उजासा । ।
सूरज चांद की जगमग जोती ।
झलके तारे पन्ने मोती । ।
पांच रंग फुलवारी परखो ।
श्याम कंज तज जोत को निरखो ।
जगमग दीप जरे जहां भारी ।
जोत निरंजन शोभा धारी ॥
सुनो गगन का पहिला बाजा ।
अनहा शब्द तूर जहां बाजा । ।
भेद युक्ति का गुरु से लेना ।
बिन गुरु पग नहीं पंथ में देना ॥
कुछ दिन सहसकमल प्रकासा ।
फिर त्रिकुटी में करो निवासा ॥
ओंकार से लगन लगाओ ।
धुन मृदंग की गूजत पाओ ।
यह श्रति का मूल मुकाम ।
यहाँ से उपजे नूर कलाम । ।
गुरुपद का यह पहिला स्थान ।
गुरु बिन मिले न वेद का ज्ञान ।
ओंकार गुरु का है रूप ।
त्रिलोकी का अद्भुत भूप । ।
लाल भान का भया उजाला ।
अन्तर जागा शब्द रसाला ॥
जब गुरु मिलें तो भेद बतावें ।
निज स्वरूप ओंकार दिखा ।
गुरु पद पाय सुन्न को धाओ ।
महासुन चढ़ चढ़ ध्यान लगाओ । ।
परमहंस की गति है सोई ।
गंग जमन विच सरस्वति होई । ।
मानसरोवर कर अस्नाना ।
हंस गति का पाओ ज्ञान । ।
क्षीर नीर का करो निबेरा ।
गढ़ सुमेर में लागे डेरा ॥
दसवें द्वार का नाका देखा ।
कर प्रवेश फिर ताहि परेखो । ।
गुप्त चार बानी जहां रहती ।
बिन बानी सुरत दुख सुख सहती ॥
प्रथम घोर अंधियारी छाई ।
गुरु दया से ताहि नसाई ॥
चमका चन्द्र प्रकाश प्रकाशा ।
सुरत ने पाया विमल विलासा ॥
शिव शक्ति मिल एक समान ।
पुरुष प्रकृति न अंतर जान ॥
देख देख लीला अलबेली ।
आगे बढ़ी सुरत हरखेली ।
भवरगुफा की पांजी आई ।
माया काल रहे मुरझाई ॥
सोहंग सोहंग बन्सी बाजी ।
धुन बांसुरी अनूपम बाजी ।
जब कपाट घट का खुल जाय ।
तबही भवरगुफा सुरत आय ॥
जब सब मेटो मन की आसा ।
तब सतपद में पाओ बासा ॥
मन बानी के पार है सत ।
सतपद सन्तों का है तत ॥
सत सत बीन की धुन सुन पाई ।
अलख अगम के पार सिधाई ।
तिसके आगे धाम अनामी ।
सत्पुरुष सतगुरु राधास्वामी ।
रूप रंग रेखा से पारा ।
नाम अनाम दोनों से न्यारा ॥
रुद्र नेत्र में ताहि जमाओ ॥
मन को रोको मन परबोधो ।
मनहि सुधारो मन को सोधो ॥
वाह्य जगत की आस भुलाओ ।
आसा गुरु चरनन में लाओ ।
आसा मनसा दोनों मोड़ी ।
चरन कमल गुरु में चित जोड़ी ।
राधास्वामी नाम जीव निज घट में ।
आसन धारो तिल के पट में । ।
देखो घट में विमल तमामा ।
सहसकमल का जहां उजासा । ।
सूरज चांद की जगमग जोती ।
झलके तारे पन्ने मोती । ।
पांच रंग फुलवारी परखो ।
श्याम कंज तज जोत को निरखो ।
जगमग दीप जरे जहां भारी ।
जोत निरंजन शोभा धारी ॥
सुनो गगन का पहिला बाजा ।
अनहा शब्द तूर जहां बाजा । ।
भेद युक्ति का गुरु से लेना ।
बिन गुरु पग नहीं पंथ में देना ॥
कुछ दिन सहसकमल प्रकासा ।
फिर त्रिकुटी में करो निवासा ॥
ओंकार से लगन लगाओ ।
धुन मृदंग की गूजत पाओ ।
यह श्रति का मूल मुकाम ।
यहाँ से उपजे नूर कलाम । ।
गुरुपद का यह पहिला स्थान ।
गुरु बिन मिले न वेद का ज्ञान ।
ओंकार गुरु का है रूप ।
त्रिलोकी का अद्भुत भूप । ।
लाल भान का भया उजाला ।
अन्तर जागा शब्द रसाला ॥
जब गुरु मिलें तो भेद बतावें ।
निज स्वरूप ओंकार दिखा ।
गुरु पद पाय सुन्न को धाओ ।
महासुन चढ़ चढ़ ध्यान लगाओ । ।
परमहंस की गति है सोई ।
गंग जमन विच सरस्वति होई । ।
मानसरोवर कर अस्नाना ।
हंस गति का पाओ ज्ञान । ।
क्षीर नीर का करो निबेरा ।
गढ़ सुमेर में लागे डेरा ॥
दसवें द्वार का नाका देखा ।
कर प्रवेश फिर ताहि परेखो । ।
गुप्त चार बानी जहां रहती ।
बिन बानी सुरत दुख सुख सहती ॥
प्रथम घोर अंधियारी छाई ।
गुरु दया से ताहि नसाई ॥
चमका चन्द्र प्रकाश प्रकाशा ।
सुरत ने पाया विमल विलासा ॥
शिव शक्ति मिल एक समान ।
पुरुष प्रकृति न अंतर जान ॥
देख देख लीला अलबेली ।
आगे बढ़ी सुरत हरखेली ।
भवरगुफा की पांजी आई ।
माया काल रहे मुरझाई ॥
सोहंग सोहंग बन्सी बाजी ।
धुन बांसुरी अनूपम बाजी ।
जब कपाट घट का खुल जाय ।
तबही भवरगुफा सुरत आय ॥
जब सब मेटो मन की आसा ।
तब सतपद में पाओ बासा ॥
मन बानी के पार है सत ।
सतपद सन्तों का है तत ॥
सत सत बीन की धुन सुन पाई ।
अलख अगम के पार सिधाई ।
तिसके आगे धाम अनामी ।
सत्पुरुष सतगुरु राधास्वामी ।
रूप रंग रेखा से पारा ।
नाम अनाम दोनों से न्यारा ॥
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Song 57 — Hindi
561. सुरत चली पहिले अस्थाना ।
सहसकमलदल ठौर ठिकाना । ।
जोत जोत में जोत अनूपा ।
रूप रूप में रूप स्वरूपा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन सुन सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले सूरज प्रकास ।
प्रेम भरे दिन रात बिलास ।
सुख पाया जाका वार न पार ।
सारद शेष न बरनन हार । ।
दोहाजोत निरंजन का दरस, सो पहिला अस्थान ।
शब्द जोत की गम लखी, सूझा अधिक महान । ।
सहसकमलदल ठौर ठिकाना । ।
जोत जोत में जोत अनूपा ।
रूप रूप में रूप स्वरूपा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन सुन सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले सूरज प्रकास ।
प्रेम भरे दिन रात बिलास ।
सुख पाया जाका वार न पार ।
सारद शेष न बरनन हार । ।
दोहाजोत निरंजन का दरस, सो पहिला अस्थान ।
शब्द जोत की गम लखी, सूझा अधिक महान । ।
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Song 58 — Hindi
562. सुरत चली अब दूजा धामा ।
ऋषि मुनि सुर जन का निज ठामा । ।
ऊपा लाल लाल रंग देखा ।
देख देख अति किया परेखा ॥
लाय सूर चमका तहां भारी ।
खुली आँख से ताहि निहारी ॥
बानी वेद चार सुन पाई ।
ब्रह्मा निर्मल कथा सुनाई ॥
328. आई ओम ओम झनकारा ।
ओंकार हद दरसा सारा ॥
धुन मृदंग जहां निसदिन बाजी ।
मेघ नाद लंका गढ़ साजी ॥
सुवरन कली अनूपम लंका ।
मन से भागे सब ही शंका ॥
सीता राम की भई चढ़ाई ।
रावण रज का राज नसाई ॥
ज्ञान विवेक हृदय जब आया ।
गुरु प्रसन्न चित भेद बताया ॥
नूर कलाम त्रिलोकी सार ।
त्रिलोकी का मूल ओंकार ॥
दोहाजो कोई अन्तर में चढ़, देखे विमल बहार ।
जनम मरन के फांस से, मिले सहज छुटकार ॥
ऋषि मुनि सुर जन का निज ठामा । ।
ऊपा लाल लाल रंग देखा ।
देख देख अति किया परेखा ॥
लाय सूर चमका तहां भारी ।
खुली आँख से ताहि निहारी ॥
बानी वेद चार सुन पाई ।
ब्रह्मा निर्मल कथा सुनाई ॥
328. आई ओम ओम झनकारा ।
ओंकार हद दरसा सारा ॥
धुन मृदंग जहां निसदिन बाजी ।
मेघ नाद लंका गढ़ साजी ॥
सुवरन कली अनूपम लंका ।
मन से भागे सब ही शंका ॥
सीता राम की भई चढ़ाई ।
रावण रज का राज नसाई ॥
ज्ञान विवेक हृदय जब आया ।
गुरु प्रसन्न चित भेद बताया ॥
नूर कलाम त्रिलोकी सार ।
त्रिलोकी का मूल ओंकार ॥
दोहाजो कोई अन्तर में चढ़, देखे विमल बहार ।
जनम मरन के फांस से, मिले सहज छुटकार ॥
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Song 59 — Hindi
563. चौथा सुन्न महासुन्न ध्यान ।
मानसरोवर किया असनान ।
कर असनान ध्यान गुरु जागा ।
सहजहि मन बिसमाधी लागा ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर निहारा ।
चढ़ चढ़ भई त्रिलोकी पारा ॥
चौथे भवरगुफा की खिड़की ।
बंसी मधुर मनोहर कड़की ॥
हंस चुनें गज मुक्ता नित ।
क्षमा दया करुना रहे चित ।
दोहामन की दुचिताई गई, पाया पद अद्वत ।
सुन्न पार जब चढ़ गये, रहा न भय भव द्वत ॥
मानसरोवर किया असनान ।
कर असनान ध्यान गुरु जागा ।
सहजहि मन बिसमाधी लागा ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर निहारा ।
चढ़ चढ़ भई त्रिलोकी पारा ॥
चौथे भवरगुफा की खिड़की ।
बंसी मधुर मनोहर कड़की ॥
हंस चुनें गज मुक्ता नित ।
क्षमा दया करुना रहे चित ।
दोहामन की दुचिताई गई, पाया पद अद्वत ।
सुन्न पार जब चढ़ गये, रहा न भय भव द्वत ॥
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Song 60 — Hindi
564. अब पंचम की किया तयारी ।
भँवर पार सत पद गति धारी ॥
सत्यम सत्यम बाना निर्मल ।
सुरत निरत हुये सुन सुन निश्चल । ।
सत में सत का सत्त प्रकाश ।
अद्भुत लीला अजब विलास ॥
बीन सुनी जहाँ मधुर सुहावन ।
मन ललचावन प्रेम बढ़ावन । ।
अलख अगम चढ़ आगे बढ़ी ।
फिर राधास्वामी चरन पड़ी ।
गुरु बल पाय किया भव पार ।
अब नहीं व्यापे भव संसार । ।
धन्य धन्य गुरु राधास्वामी ।
धन्य धन्य तुम चरन नमामी ॥
दोहाकोटि जनम का पंथ था, भटका बारम्बार ।
राधास्वामी की दया, अब हुये भवजल पार । ।
भँवर पार सत पद गति धारी ॥
सत्यम सत्यम बाना निर्मल ।
सुरत निरत हुये सुन सुन निश्चल । ।
सत में सत का सत्त प्रकाश ।
अद्भुत लीला अजब विलास ॥
बीन सुनी जहाँ मधुर सुहावन ।
मन ललचावन प्रेम बढ़ावन । ।
अलख अगम चढ़ आगे बढ़ी ।
फिर राधास्वामी चरन पड़ी ।
गुरु बल पाय किया भव पार ।
अब नहीं व्यापे भव संसार । ।
धन्य धन्य गुरु राधास्वामी ।
धन्य धन्य तुम चरन नमामी ॥
दोहाकोटि जनम का पंथ था, भटका बारम्बार ।
राधास्वामी की दया, अब हुये भवजल पार । ।
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Song 61 — Hindi
565. कथनी छोड़ करनी करो, करनी से रहो लाग ।
कथनी मिलावे छार में, करनी बढ़ावे भाग ॥1 ॥
अहं ब्रह्म न उचारिये, निस दिन कीजे कर्म ।
कथनी से हो भ्रान्ती, करनी मेटे भर्म ॥2 ॥
अहं ब्रह्म कहकर मुये, समझे नाहिं गवार ।
करम से निध्यासन बने, बोले बढ़े बिकार ॥3 ॥
श्रवन मनन कर लीजिये, तब निध्यासन होय ।
बिना कम क्या फल मिले, ज्ञानी बने न कोय ॥4 ॥
पोथी पत्रा में नहीं, ब्रह्म ब्रह्म का सार ।
पोथी पत्रा जो फंसे, व्याप रहा संसार ॥5 ॥
पोथी पत्रा ग्रन्थ में, माया लपटी देख ।
बिन सतसंग न ऊपजे, हृदय ज्ञान विवेक ॥6 ॥
मूल गवाया आपना, पढ़ पुस्तक की सीख ।
भूल भरम में फंस रहे, मांगे घर घर भीख ॥7 ॥
पहिले कर्म उपासना, पीछे सतगुरु ध्यान ।
ता पीछे सुन बन्धु जन, पावे सतपद ज्ञान ॥8 ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, छोड़ ग्रन्थ की आस ।
ग्रन्थ से ग्रन्थि पड़त है, ग्रन्थी भये निरास ॥6 ॥
कोटि ग्रन्थ पढ़ क्यों मरे, तत्व न आवे हाथ । ।
तत्व भेद तब पाइये, जब लीजे सतगुरु साथ ॥10 ॥
पहिले गुरु भक्ति करो, पीछे दूजा काम ।
ताके पीछे पाइये, सत्त नाम सत धाम ॥11 ॥
चौसाधन पहिले करो, पीछे गुरुमुख नाम ।
महावाक्य का फल लहो, मन पावे विश्राम ॥12 ॥
बिन गुरु पढ़ो न ग्रन्थ को, बिन गुरु लो नहीं नाम ।
बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु बने न काम ॥13 ॥
जब लग मन की गढ़त नहीं, तब लग सब बेकाम । ।
“दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम॥14 ॥
गुरु सतसंग में आयकर, साजा भक्ति साज ।
“गोरस बेचत हरि मिले, एक पन्थ दो काज ॥15 ॥
अहं ब्रह्म उचारते, खाया मूल को सोय ।
“ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय॥16 ॥
ग्रन्थ की ग्रन्थी पड़गई, सूझा वाद विवाद ।
अहं ब्रह्म के वाक्य से, मिला न ब्रह्म का स्वाद ॥17 ॥
अहं ब्रह्म दिन रात कह, चिंता वाढ़ी मन ।
घर में अनबन जब मची, भाग गये तब मन ॥18 ॥
घर बन एक समान कर, साज प्रेम का साज ।
भक्ति पदारथ पायकर, मिला ज्ञान का राज ॥16 ॥
कथनी मिलावे छार में, करनी बढ़ावे भाग ॥1 ॥
अहं ब्रह्म न उचारिये, निस दिन कीजे कर्म ।
कथनी से हो भ्रान्ती, करनी मेटे भर्म ॥2 ॥
अहं ब्रह्म कहकर मुये, समझे नाहिं गवार ।
करम से निध्यासन बने, बोले बढ़े बिकार ॥3 ॥
श्रवन मनन कर लीजिये, तब निध्यासन होय ।
बिना कम क्या फल मिले, ज्ञानी बने न कोय ॥4 ॥
पोथी पत्रा में नहीं, ब्रह्म ब्रह्म का सार ।
पोथी पत्रा जो फंसे, व्याप रहा संसार ॥5 ॥
पोथी पत्रा ग्रन्थ में, माया लपटी देख ।
बिन सतसंग न ऊपजे, हृदय ज्ञान विवेक ॥6 ॥
मूल गवाया आपना, पढ़ पुस्तक की सीख ।
भूल भरम में फंस रहे, मांगे घर घर भीख ॥7 ॥
पहिले कर्म उपासना, पीछे सतगुरु ध्यान ।
ता पीछे सुन बन्धु जन, पावे सतपद ज्ञान ॥8 ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, छोड़ ग्रन्थ की आस ।
ग्रन्थ से ग्रन्थि पड़त है, ग्रन्थी भये निरास ॥6 ॥
कोटि ग्रन्थ पढ़ क्यों मरे, तत्व न आवे हाथ । ।
तत्व भेद तब पाइये, जब लीजे सतगुरु साथ ॥10 ॥
पहिले गुरु भक्ति करो, पीछे दूजा काम ।
ताके पीछे पाइये, सत्त नाम सत धाम ॥11 ॥
चौसाधन पहिले करो, पीछे गुरुमुख नाम ।
महावाक्य का फल लहो, मन पावे विश्राम ॥12 ॥
बिन गुरु पढ़ो न ग्रन्थ को, बिन गुरु लो नहीं नाम ।
बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु बने न काम ॥13 ॥
जब लग मन की गढ़त नहीं, तब लग सब बेकाम । ।
“दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम॥14 ॥
गुरु सतसंग में आयकर, साजा भक्ति साज ।
“गोरस बेचत हरि मिले, एक पन्थ दो काज ॥15 ॥
अहं ब्रह्म उचारते, खाया मूल को सोय ।
“ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय॥16 ॥
ग्रन्थ की ग्रन्थी पड़गई, सूझा वाद विवाद ।
अहं ब्रह्म के वाक्य से, मिला न ब्रह्म का स्वाद ॥17 ॥
अहं ब्रह्म दिन रात कह, चिंता वाढ़ी मन ।
घर में अनबन जब मची, भाग गये तब मन ॥18 ॥
घर बन एक समान कर, साज प्रेम का साज ।
भक्ति पदारथ पायकर, मिला ज्ञान का राज ॥16 ॥
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Song 62 — Hindi
566. भजन बिना कहो कौन संदेसा ।
भजन बिना नहीं मिटे कलेसा ॥
भजन प्रभाव जान सब कोई ।
बिन गुरु भजन ज्ञान नहिं होई । ।
गुरु भज भव से छूटे पानी ।
गुरु भज मिटे मोह मद मानी ।
घट में भज गुरु नाम निरंतर ।
भजन विहीन जान पशु सम नर । ।
नहीं विद्या नहीं बुद्धि विचारा ।
भजन से होय सकल निस्तारा ॥
दोहालौ लागी तब जानिये, नाम बिसर मत जाय ।
जीवत सुख आनन्द ले, अन्य परम पद पाय ॥
भजन बिना नहीं मिटे कलेसा ॥
भजन प्रभाव जान सब कोई ।
बिन गुरु भजन ज्ञान नहिं होई । ।
गुरु भज भव से छूटे पानी ।
गुरु भज मिटे मोह मद मानी ।
घट में भज गुरु नाम निरंतर ।
भजन विहीन जान पशु सम नर । ।
नहीं विद्या नहीं बुद्धि विचारा ।
भजन से होय सकल निस्तारा ॥
दोहालौ लागी तब जानिये, नाम बिसर मत जाय ।
जीवत सुख आनन्द ले, अन्य परम पद पाय ॥
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Song 63 — Hindi
567. लौ लागी रहे आठों याम ।
मन निज मन में व्यापे काम ॥
नाम जपत भव सिंधु सुखाई ।
नाम जपत माया टर जाई ।
नाम से क्रोध मोह मद भागे ।
नाम से प्रीत रीत में पागे ।
नाम निशान अस्थान बतावे ।
नाम परम पद ले पहुँचावे ॥
सहज सहज ले नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन ॥
दोहानाम जपो घट अन्तरे, अन्तर नाम निशान ।
सुरत शब्द के योग से, पाया नाम ठिकान ॥
मन निज मन में व्यापे काम ॥
नाम जपत भव सिंधु सुखाई ।
नाम जपत माया टर जाई ।
नाम से क्रोध मोह मद भागे ।
नाम से प्रीत रीत में पागे ।
नाम निशान अस्थान बतावे ।
नाम परम पद ले पहुँचावे ॥
सहज सहज ले नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन ॥
दोहानाम जपो घट अन्तरे, अन्तर नाम निशान ।
सुरत शब्द के योग से, पाया नाम ठिकान ॥
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Song 64 — Hindi
568. घट में शब्द सुनो घट आओ ।
बाहर के पट सकल गिराओ ॥
खोलो घट का पट दिन राती ।
चमके जोत दिया बिन बाती ॥
बरसे जोत अखंडित धारा ।
अन्तर चमके सूर सितारा ॥
सुरत शब्द धुन सुरत शब्द धुन ।
सुनत सुनत भई सूरत उनमन ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
भजन प्रभाव जीव बहु तारी सोरठाराधास्वामी नाम, नित हित चित से गाय ।
भव दुख आपति नास, सहज परम पद पाय ॥
दोहाराधास्वामी दया करी, शब्द जहाज चढ़ाय ।
भवसागर के भंवर से, दीना पार लगाय ॥
बाहर के पट सकल गिराओ ॥
खोलो घट का पट दिन राती ।
चमके जोत दिया बिन बाती ॥
बरसे जोत अखंडित धारा ।
अन्तर चमके सूर सितारा ॥
सुरत शब्द धुन सुरत शब्द धुन ।
सुनत सुनत भई सूरत उनमन ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
भजन प्रभाव जीव बहु तारी सोरठाराधास्वामी नाम, नित हित चित से गाय ।
भव दुख आपति नास, सहज परम पद पाय ॥
दोहाराधास्वामी दया करी, शब्द जहाज चढ़ाय ।
भवसागर के भंवर से, दीना पार लगाय ॥
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Song 65 — Hindi
569. सूरज लाल लाल अस्थाना ।
गुरु ने बताया गुरु का ठिकाना ॥
ठुमक चली सूरत मतवारी ।
देखे अचरज बाग कियारी ॥
फूल खिले भँवरे मंडलाये ।
शोभा अद्भुत बरनि न जाये ॥
ओंकार का पाया धाम ।
ओम् धुनी जहां आठों याम ॥
बाजत मृदंग शब्द सुहाई ।
बिजली चमके आभा छाई । ।
मेष नाद सुन अचरज लीला ।
सुन सुन सूरत भई सुशीला । ।
त्रिलोकी का नाका पाया ।
देख देख मन अति हरखाया ॥
नाद शब्द और मूल कलाम ।
वेद ज्ञान का त्रिकुटी धाम । ।
गुरु ने बताया गुरु का ठिकाना ॥
ठुमक चली सूरत मतवारी ।
देखे अचरज बाग कियारी ॥
फूल खिले भँवरे मंडलाये ।
शोभा अद्भुत बरनि न जाये ॥
ओंकार का पाया धाम ।
ओम् धुनी जहां आठों याम ॥
बाजत मृदंग शब्द सुहाई ।
बिजली चमके आभा छाई । ।
मेष नाद सुन अचरज लीला ।
सुन सुन सूरत भई सुशीला । ।
त्रिलोकी का नाका पाया ।
देख देख मन अति हरखाया ॥
नाद शब्द और मूल कलाम ।
वेद ज्ञान का त्रिकुटी धाम । ।
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Song 66 — Hindi
570. शब्दहि सारा शब्द निज सारा ।
शब्दहि माया ब्रह्म विचारा ॥
शब्द सांख्य और शब्द वेदान्त ।
शब्द न्याय और शब्द सिद्धांत ॥
जो कोई करे शब्द अभ्यासा ।
लूटे जग की आसा त्रासा ॥
शब्द मेद सतगुरु से लीना ।
सुन सुन शब्द शब्द चित दीना ॥
शब्द की महिमा वेद बखाने ।
शब्दी होय शब्द सोई जाने ।
शब्द मंडल में रचा विलासा ।
शब्द सुने कोई गुरु का दासा ॥
सुन सुन अंतर शब्द सुहेला ।
सुरत शब्द का होगया मेला ॥
मेला भया सुरत मगनानी ।
गई परम पद चित हरखानी ॥
जहां न रंग रूप नहीं रेखा ।
जहां विचार न गिनती लेखा ॥
धुरपद पहुँच सार निज पाया ।
राधास्वामी चरन जाय लिपटाया ।
दोहागुरु चरनन बल जाइये, दीना शब्द बताय ।
बन्ध काट निज दास के, लीना अंग लगाय ॥
शब्दहि माया ब्रह्म विचारा ॥
शब्द सांख्य और शब्द वेदान्त ।
शब्द न्याय और शब्द सिद्धांत ॥
जो कोई करे शब्द अभ्यासा ।
लूटे जग की आसा त्रासा ॥
शब्द मेद सतगुरु से लीना ।
सुन सुन शब्द शब्द चित दीना ॥
शब्द की महिमा वेद बखाने ।
शब्दी होय शब्द सोई जाने ।
शब्द मंडल में रचा विलासा ।
शब्द सुने कोई गुरु का दासा ॥
सुन सुन अंतर शब्द सुहेला ।
सुरत शब्द का होगया मेला ॥
मेला भया सुरत मगनानी ।
गई परम पद चित हरखानी ॥
जहां न रंग रूप नहीं रेखा ।
जहां विचार न गिनती लेखा ॥
धुरपद पहुँच सार निज पाया ।
राधास्वामी चरन जाय लिपटाया ।
दोहागुरु चरनन बल जाइये, दीना शब्द बताय ।
बन्ध काट निज दास के, लीना अंग लगाय ॥
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Song 67 — Hindi
571. उलटो तिल देखो असमाना ।
सुरत निरत का ठौर ठिकाना ॥
फर्श को छोड़ अर्श पर आओ ।
गगन मंडल पर कुर्सी बिछाओ ।
कुर्सी बैठ करो तुम राज ।
सुरत निरत का साजो साज । ।
तिल को फेर फेरदो तिल को ।
उलट पलट ठहराओ दिल को ॥
बंक नाल का नाका देखो ।
सहसकवलदल जाय परेखो ॥
घंटा शंख सुनो धुन दोई ।
तिल की जोत जोत लखो सोई ॥
सुरत निरत का ठौर ठिकाना ॥
फर्श को छोड़ अर्श पर आओ ।
गगन मंडल पर कुर्सी बिछाओ ।
कुर्सी बैठ करो तुम राज ।
सुरत निरत का साजो साज । ।
तिल को फेर फेरदो तिल को ।
उलट पलट ठहराओ दिल को ॥
बंक नाल का नाका देखो ।
सहसकवलदल जाय परेखो ॥
घंटा शंख सुनो धुन दोई ।
तिल की जोत जोत लखो सोई ॥
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Song 68 — Hindi
572. फिर त्रिकुटी चढ़ आसन मार ।
देखो बिमल रूप ओंकार ।
झांझ मृदंग सुनो झनकार ।
मेघनाद ओम दरबार ।
बन परबत बाटिका सुहाई ।
महल अनूप भूप छवि जाई ।
गंग जमन बिच सरस्वती धारा ।
न्हाये धोये सुरत करे सिंगारा ॥
वेद मंत्र का निज अस्थान ।
ब्रह्मा कथे ज्ञान और ध्यान ॥
देखा नूर और सुने कलाम ।
मूल कलाम का यह निज धाम ॥
तीन रूप लीला विस्तारी ।
तीनों की गति लगी अति प्यारी ॥
हिरण्यगर्भ विराट पसारा ।
अव्याकृत लखि त्रिकुटी द्वारा ॥
वेद तत्व को लीना चीन्ह ।
फिर आगे चित सूरत दीन ।
देखो बिमल रूप ओंकार ।
झांझ मृदंग सुनो झनकार ।
मेघनाद ओम दरबार ।
बन परबत बाटिका सुहाई ।
महल अनूप भूप छवि जाई ।
गंग जमन बिच सरस्वती धारा ।
न्हाये धोये सुरत करे सिंगारा ॥
वेद मंत्र का निज अस्थान ।
ब्रह्मा कथे ज्ञान और ध्यान ॥
देखा नूर और सुने कलाम ।
मूल कलाम का यह निज धाम ॥
तीन रूप लीला विस्तारी ।
तीनों की गति लगी अति प्यारी ॥
हिरण्यगर्भ विराट पसारा ।
अव्याकृत लखि त्रिकुटी द्वारा ॥
वेद तत्व को लीना चीन्ह ।
फिर आगे चित सूरत दीन ।
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Song 69 — Hindi
573. आया नजर सुन्न मैदान ।
लामकान लाहूत स्थान ।
मेरु सुमेरु गिर कैलास ।
शिव सकनकादिक करे बिलास ।
मान सरोवर हंस निवास ।
अमी रहा जुल्मात के पास ॥
आव हयात अमी की धारा ।
अजरज अद्भुत खेल नियारा ॥
अन्धकार की घाटी दरसी ।
भेद खुला जब गुरुपद परसी । ।
महासुन्न तिस ऊपर रहे ।
परब्रह्म पद सब कोई कहे । ।
किंगरी सारंगी धुन नाद ।
छाई मस्ती लगी समाध । ।
भंवरगुफा की खिड़की खोली ।
सुनी सुरत मैं सोहंगम बोली ॥
मुरली बजी मचाई धूम ।
ऊँची चढ़ गई सूरत झूम ॥
महाकाल का गढ़ अब टूटा ।
माया मोह साथ जब छूटा ॥
लामकान लाहूत स्थान ।
मेरु सुमेरु गिर कैलास ।
शिव सकनकादिक करे बिलास ।
मान सरोवर हंस निवास ।
अमी रहा जुल्मात के पास ॥
आव हयात अमी की धारा ।
अजरज अद्भुत खेल नियारा ॥
अन्धकार की घाटी दरसी ।
भेद खुला जब गुरुपद परसी । ।
महासुन्न तिस ऊपर रहे ।
परब्रह्म पद सब कोई कहे । ।
किंगरी सारंगी धुन नाद ।
छाई मस्ती लगी समाध । ।
भंवरगुफा की खिड़की खोली ।
सुनी सुरत मैं सोहंगम बोली ॥
मुरली बजी मचाई धूम ।
ऊँची चढ़ गई सूरत झूम ॥
महाकाल का गढ़ अब टूटा ।
माया मोह साथ जब छूटा ॥
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Song 70 — Hindi
574. सत्त लोक चढ़ सूरत आई ।
सतपद लखा सत्त ठहराई ।
सत्त सत का सत आनन्द ।
यहां न माया काल का द्वन्द । ।
हुई सुरत अब सब से न्यारी ।
भरम अविद्या छूटी सारी ॥
मिला ज्ञान मेटा अज्ञान ।
निज स्वरूप का हो गया भान ।
अगम अलख और लखा अनामी ।
परे ताहि पद राधास्वामी ॥
गुरु ने पूरा भेद बताया ।
उलट फेर तिल सबही दिखाया ।
फेरे तिल और ऊपर चढ़े ।
रेखा रूप रंग से टरे ।
क्या कोई उसका करे बखान ।
गुरु ने बख्शा पद निरवान ॥
सतपद लखा सत्त ठहराई ।
सत्त सत का सत आनन्द ।
यहां न माया काल का द्वन्द । ।
हुई सुरत अब सब से न्यारी ।
भरम अविद्या छूटी सारी ॥
मिला ज्ञान मेटा अज्ञान ।
निज स्वरूप का हो गया भान ।
अगम अलख और लखा अनामी ।
परे ताहि पद राधास्वामी ॥
गुरु ने पूरा भेद बताया ।
उलट फेर तिल सबही दिखाया ।
फेरे तिल और ऊपर चढ़े ।
रेखा रूप रंग से टरे ।
क्या कोई उसका करे बखान ।
गुरु ने बख्शा पद निरवान ॥
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Song 71 — Hindi
575. घंटा शंख सुनो धर कान ।
सहसकवल चढ़ लाओ ध्यान । ।
त्रिकुटी चढ़ मृदंग बजाओ ।
ओम् शब्द में चित को लाओ ॥
सुनो गगन में अद्भुत बाजा ।
अनहद राग जहां नित गाजा ॥
सुन्न सरोवर मैल छुड़ाओ ।
त्रिवेनी में जाय नहाओ ॥
किंगरी सारंगी वहां सुनो ।
सुन सुनकर मन अपने गुनो ।
महासुन्न का नाका तोड़ो ।
भान रूप में चित को जोड़ो ॥
भवरगुफा की खिड़की खोलो ।
मुरली बंसी की धुन बोलो ॥
सत्तलोक में बीन बजाओ ।
सत सत हक हक धूम मचाओ ।
आगे अलख अगम अनामी ।
ताके आगे पद राधास्वामी ।
चरनकवल गुरु सीस झुकाओ ।
सुरत शब्द के मारग आओ ।
देखो घट में बिमल बिलासा ।
अचरज अद्भुत अजब तमाशा ॥
सहसकवल चढ़ लाओ ध्यान । ।
त्रिकुटी चढ़ मृदंग बजाओ ।
ओम् शब्द में चित को लाओ ॥
सुनो गगन में अद्भुत बाजा ।
अनहद राग जहां नित गाजा ॥
सुन्न सरोवर मैल छुड़ाओ ।
त्रिवेनी में जाय नहाओ ॥
किंगरी सारंगी वहां सुनो ।
सुन सुनकर मन अपने गुनो ।
महासुन्न का नाका तोड़ो ।
भान रूप में चित को जोड़ो ॥
भवरगुफा की खिड़की खोलो ।
मुरली बंसी की धुन बोलो ॥
सत्तलोक में बीन बजाओ ।
सत सत हक हक धूम मचाओ ।
आगे अलख अगम अनामी ।
ताके आगे पद राधास्वामी ।
चरनकवल गुरु सीस झुकाओ ।
सुरत शब्द के मारग आओ ।
देखो घट में बिमल बिलासा ।
अचरज अद्भुत अजब तमाशा ॥
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Song 72 — Hindi
576. सबसे ऊचा सत्याकार ।
सुरत शब्द का जो भंडार । ।
इससे नीचे सोहंकार ।
माया काल का जो दरबार ।
उससे उतर कर शून्याकार ।
जिससे प्रगटा यह संसार ।
शून्याकार से रारंकार ।
सहज समाध का जहाँ विचार । ।
चौथा तुम जानो ओंकार ।
अ उ म त्रिलोको सार । ।
सत रज तम की त्रिपुटी भाई ।
साधु साध साधन गति पाई ॥
पचयां कहो सहस्राकार ।
योग युक्ति का पहिला द्वार । ।
कमलप्तहादल और सहबार ।
सतसंगी कोई समझे सार ।
एक ओंकार सागुरु प्रसाद ।
सहपकमल चढ़ कीजे याद । ।
राधास्वामी भेद बतावें ।
अने हंस को आय वितावें ॥
सुरत शब्द का जो भंडार । ।
इससे नीचे सोहंकार ।
माया काल का जो दरबार ।
उससे उतर कर शून्याकार ।
जिससे प्रगटा यह संसार ।
शून्याकार से रारंकार ।
सहज समाध का जहाँ विचार । ।
चौथा तुम जानो ओंकार ।
अ उ म त्रिलोको सार । ।
सत रज तम की त्रिपुटी भाई ।
साधु साध साधन गति पाई ॥
पचयां कहो सहस्राकार ।
योग युक्ति का पहिला द्वार । ।
कमलप्तहादल और सहबार ।
सतसंगी कोई समझे सार ।
एक ओंकार सागुरु प्रसाद ।
सहपकमल चढ़ कीजे याद । ।
राधास्वामी भेद बतावें ।
अने हंस को आय वितावें ॥
रमेनी
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Song 73 — Hindi
577. जब जागे तब जग व्यौहार ।
इन्द्री ज्ञान का सकल पसार ।
जब सोये अन्तर में आये ।
सूक्ष्म जगत को लख हरषाये ।
गहरी नींद में सुव का भान ।
परख के समझो पाओ ज्ञान ॥
शब्द सुना और शब्द को देखा ।
किसा शब्द का बहु विधि लेखा ।
शब्द भेद है शब्द का ज्ञान ।
शब्द प्रतान शब्द अनुमान ॥
शब्द शब्द का किया बखान ।
सन के बिरला साध सुजान । ।
दोहाराधास्वामी ने कहा, आपको आप पिछान ।
अपने आप में आप लख, और का कहा न मान । ।
इन्द्री ज्ञान का सकल पसार ।
जब सोये अन्तर में आये ।
सूक्ष्म जगत को लख हरषाये ।
गहरी नींद में सुव का भान ।
परख के समझो पाओ ज्ञान ॥
शब्द सुना और शब्द को देखा ।
किसा शब्द का बहु विधि लेखा ।
शब्द भेद है शब्द का ज्ञान ।
शब्द प्रतान शब्द अनुमान ॥
शब्द शब्द का किया बखान ।
सन के बिरला साध सुजान । ।
दोहाराधास्वामी ने कहा, आपको आप पिछान ।
अपने आप में आप लख, और का कहा न मान । ।
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Song 74 — Hindi
रमेनी 578. शब्द योग सबका है टीका ।
सहज सुगम सीधा और सच्चा ॥
घर में रहकर साधन कीजे ।
साधन से सुख आनन्द लीजे ।
शब्द योग से दुख नहीं कोय ।
सहजे पके सो मीठा होय ॥
शब्द योग दुख दूर करावे ।
शब्द योग सुख चित उपजावे ॥
शब्द योग की महिमा भारी ।
उसका सब कोई है अधिकारी । ।
साखीसुख तो है कही और ही, तू ढूँढ़े कहीं और ।
भूल भरम में पड़ गया, नहीं ठिकाना ठौर ।
॥
साखी ॥
सहज सुगम सीधा और सच्चा ॥
घर में रहकर साधन कीजे ।
साधन से सुख आनन्द लीजे ।
शब्द योग से दुख नहीं कोय ।
सहजे पके सो मीठा होय ॥
शब्द योग दुख दूर करावे ।
शब्द योग सुख चित उपजावे ॥
शब्द योग की महिमा भारी ।
उसका सब कोई है अधिकारी । ।
साखीसुख तो है कही और ही, तू ढूँढ़े कहीं और ।
भूल भरम में पड़ गया, नहीं ठिकाना ठौर ।
॥
साखी ॥
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Song 75 — Hindi
576. पात पात को सींचते, वृक्ष को दिया सुखाय ।
पात फूल फल ना मिला, अन्त रहे पछताय ॥1 ॥
ना सुख देह में प्रान में, ना सुख मन में होय ।
ना सुख ज्ञान विलास में, बिरला जाने कोय ॥2 ॥
सुख तो है आनन्द में, आनन्द के अस्थान । ।
ऋषि मुनि भूले देवता, ज्ञान का कर अभिमान ॥3 ॥
आनन्द आनन्द में लखो, आनन्द अपना रूप ।
साधन आनन्द का करो, छोड़ भरम का कूप ॥4 ॥
जो है जहाँ हूँढ़ों वहां, ढूँढ़ के पाओ सार । ।
राधास्वामी ने कहा, और सकल जंजार ॥5 ॥
पात फूल फल ना मिला, अन्त रहे पछताय ॥1 ॥
ना सुख देह में प्रान में, ना सुख मन में होय ।
ना सुख ज्ञान विलास में, बिरला जाने कोय ॥2 ॥
सुख तो है आनन्द में, आनन्द के अस्थान । ।
ऋषि मुनि भूले देवता, ज्ञान का कर अभिमान ॥3 ॥
आनन्द आनन्द में लखो, आनन्द अपना रूप ।
साधन आनन्द का करो, छोड़ भरम का कूप ॥4 ॥
जो है जहाँ हूँढ़ों वहां, ढूँढ़ के पाओ सार । ।
राधास्वामी ने कहा, और सकल जंजार ॥5 ॥
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Song 76 — Hindi
580. शब्द योग है सबका सार ।
अधिकारी कोई करे विचार ॥
शब्द योग है सुगम सुहीला ।
और योग सब कठिन दुहीला ॥
शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
बिगड़ी बात सहज बन जाई ॥
शन्द योग का साधन करना ।
और योग को चित नहीं देना ॥
शब्द योग साध अनजान ।
जीते जी पावे निरवान ॥
सावीशब्द योग संजम बना, करे कोई चितलाय ।
दुचिताई दुविधा मिटे, भरम भ्रान्ती जाय ।
सहज सहज का भेद है, सहज सहज की रीत ।
सहज सहज में चित लगा, उपजे प्रेम प्रतीत ॥
राधास्वामी की दया, शब्द योग कर ले ।
सहज जनम को सुफलकर, और योग तज दे ।
अधिकारी कोई करे विचार ॥
शब्द योग है सुगम सुहीला ।
और योग सब कठिन दुहीला ॥
शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
बिगड़ी बात सहज बन जाई ॥
शन्द योग का साधन करना ।
और योग को चित नहीं देना ॥
शब्द योग साध अनजान ।
जीते जी पावे निरवान ॥
सावीशब्द योग संजम बना, करे कोई चितलाय ।
दुचिताई दुविधा मिटे, भरम भ्रान्ती जाय ।
सहज सहज का भेद है, सहज सहज की रीत ।
सहज सहज में चित लगा, उपजे प्रेम प्रतीत ॥
राधास्वामी की दया, शब्द योग कर ले ।
सहज जनम को सुफलकर, और योग तज दे ।
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Song 77 — Hindi
581. शब्द नाम ऊंचे से आया ।
ताहि उलट कोई ध्यानी गाया । ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी चढ़ो ।
चोटी चढ़कर धुन को सुनो ।
सुन सुन धुन सुरत हुई मस्तानी ।
ब्रह्म शिखर चढ़ आसन तानी ।
उलटी गंगा उलटी जमुना ।
सरस्वती उलट हुआ मन मगना ।
मान सरोवर कर अस्नान ।
हंस रूप लिया सूरत ठान ।
जो सन्तों के मारग आवे ।
उलट नाम ले संगति पावे ॥
सीधा मारग सब कोई जाय ।
उलटे का कोई भेद न पाय । ।
उलटे मारग घर का पन्थ ।
सो नहीं पाये पढ़कर ग्रन्थ ।
सीधे मारग है प्रवृति ।
उलट साध कोई करे निवृति ॥
साखीराधास्वामी की दया, पाया सतमत ज्ञान ।
उलटे मारग पर चले, मुझे पद निरवान । ।
सीधे तो सब कोई चले, उलट चले नहीं कोय ।
क्यों पहुँचे घर आपने, चित मन बुद्धि खोय ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, अन्तर धस सुरत साध ।
दर्शन पाये रूप का, लख लख अगम अगाध । ।
ताहि उलट कोई ध्यानी गाया । ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी चढ़ो ।
चोटी चढ़कर धुन को सुनो ।
सुन सुन धुन सुरत हुई मस्तानी ।
ब्रह्म शिखर चढ़ आसन तानी ।
उलटी गंगा उलटी जमुना ।
सरस्वती उलट हुआ मन मगना ।
मान सरोवर कर अस्नान ।
हंस रूप लिया सूरत ठान ।
जो सन्तों के मारग आवे ।
उलट नाम ले संगति पावे ॥
सीधा मारग सब कोई जाय ।
उलटे का कोई भेद न पाय । ।
उलटे मारग घर का पन्थ ।
सो नहीं पाये पढ़कर ग्रन्थ ।
सीधे मारग है प्रवृति ।
उलट साध कोई करे निवृति ॥
साखीराधास्वामी की दया, पाया सतमत ज्ञान ।
उलटे मारग पर चले, मुझे पद निरवान । ।
सीधे तो सब कोई चले, उलट चले नहीं कोय ।
क्यों पहुँचे घर आपने, चित मन बुद्धि खोय ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, अन्तर धस सुरत साध ।
दर्शन पाये रूप का, लख लख अगम अगाध । ।
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Song 78 — Hindi
582. नाम प्रताप सकल जग माना ।
नाम महातम फिर नहीं जाना ॥
बरण नाम सब गये भुलाई ।
धुन का किसी ने भेद न पाई ॥
नाम रहे त्रिलोकी पारा ।
यह ढूँढ़े त्रिलोक पसारा । ।
चौथे पद में नाम निशान ।
शब्द योग से कोई कोई जान ॥
जो कोई चौथे पद में जाये ।
तब वह नाम की महिमा पाये ॥
साखीमकर तार गति चढ़ चले, पहुँचे सत के धाम ।
सतपद में सूझे उसे, धुनात्मक सतनाम । ।
।
दोहा
नाम महातम फिर नहीं जाना ॥
बरण नाम सब गये भुलाई ।
धुन का किसी ने भेद न पाई ॥
नाम रहे त्रिलोकी पारा ।
यह ढूँढ़े त्रिलोक पसारा । ।
चौथे पद में नाम निशान ।
शब्द योग से कोई कोई जान ॥
जो कोई चौथे पद में जाये ।
तब वह नाम की महिमा पाये ॥
साखीमकर तार गति चढ़ चले, पहुँचे सत के धाम ।
सतपद में सूझे उसे, धुनात्मक सतनाम । ।
।
दोहा
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Song 79 — Hindi
583. बहता था भव धार, ठौर ठिकाना नांह ।
राधास्वामी पार लगा दिया, पकड़ दास की बांह ॥1 ॥
राधास्वामी राधास्वामी गाय,राधास्वामी राधास्वामी ध्याय ।
राधास्वामी नाम से लौ लगी, पड़ेगा पूरा दाव ॥2 ॥
मेरा अब कोई नहीं, एक गुरु की आस ।
सुख दुख जग के मिट गये, द्वन्द की हटी त्रास ॥3 ॥
शब्द योग की साधना, लागी सहज समाधः ।
सहज वृत्ति जब घट रमी, हट गये भव के व्याध ॥4 ॥
भंवरा लोभी कमल का, चन्द्र का लोभी चकोर ।
मैं लोभी गुरु दरस का, चित्त न आवे और ॥ ॥
निसदिन गुरु की चाह है, पल पल गुरु का ध्यान ।
छिन छिन गुरु का भजन है, गुरु मेरे जान और प्रान ॥6 ॥
सिद्धि शक्ति ले क्या करू, ऋधि निधि से नहीं काम ।
यह माया के फंद हैं, मुझे मिले गुरु नाम ॥7 ॥
।
राधास्वामी पार लगा दिया, पकड़ दास की बांह ॥1 ॥
राधास्वामी राधास्वामी गाय,राधास्वामी राधास्वामी ध्याय ।
राधास्वामी नाम से लौ लगी, पड़ेगा पूरा दाव ॥2 ॥
मेरा अब कोई नहीं, एक गुरु की आस ।
सुख दुख जग के मिट गये, द्वन्द की हटी त्रास ॥3 ॥
शब्द योग की साधना, लागी सहज समाधः ।
सहज वृत्ति जब घट रमी, हट गये भव के व्याध ॥4 ॥
भंवरा लोभी कमल का, चन्द्र का लोभी चकोर ।
मैं लोभी गुरु दरस का, चित्त न आवे और ॥ ॥
निसदिन गुरु की चाह है, पल पल गुरु का ध्यान ।
छिन छिन गुरु का भजन है, गुरु मेरे जान और प्रान ॥6 ॥
सिद्धि शक्ति ले क्या करू, ऋधि निधि से नहीं काम ।
यह माया के फंद हैं, मुझे मिले गुरु नाम ॥7 ॥
।
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Song 80 — Hindi
584. जब लग बालक गिरे नहीं, तब लग उठे न जान ।
जब लग अज्ञानी नहीं, कैसे पावे ज्ञान ॥1 ॥
नन्द पाप कमाय कर, आ सतगुरु के पास ।
पुन्य मिले सतसंत से, क्यों तू होय उदास ॥2 ॥
नन्दू पाप कमाय कर, ली सतगुरु की ओट ।
सकल पाप जल भुन गये, भाग गया सब खोट ॥3 ॥
पाप किया तो क्या भया, पाप पुन्य का बीज ।
बिना पाप कहो पुन्य क्या, हाथ न दुख का मीज ॥4 ॥
नन्दू गुरु बिन नहीं लखी, पाप पुन्य की बात ।
राधास्वामी की दया, समझ पड़ी जम घात ॥1 ॥
नन्दू माया जग ठगे, ठगनी अति बलिबान ।
इस ठगनी के मरम को, समझे साध सुजान ॥6 ॥
माया ने तुमको ठगा, ठगो उसे तुम आय ।
आँख मिचौली खेलकर, लो अब काम बनाय ॥7 ॥
माया बुद्धि विवेक है, माया है गुनवान ।
माया शक्ति सिद्धि है, माया है बलवान ॥8 ॥
माया से मिल बुद्धि ले, माया ही से विवेक ।
पहिले खेल अनेक से, पीछे एक ही टेक ॥6 ॥
एक नाम गुरु देव का, सतगुरु दिया बताय ।
नन्दु सोच विचार कर, राधास्वामी पद लपटाय ॥10 ॥
जब लग अज्ञानी नहीं, कैसे पावे ज्ञान ॥1 ॥
नन्द पाप कमाय कर, आ सतगुरु के पास ।
पुन्य मिले सतसंत से, क्यों तू होय उदास ॥2 ॥
नन्दू पाप कमाय कर, ली सतगुरु की ओट ।
सकल पाप जल भुन गये, भाग गया सब खोट ॥3 ॥
पाप किया तो क्या भया, पाप पुन्य का बीज ।
बिना पाप कहो पुन्य क्या, हाथ न दुख का मीज ॥4 ॥
नन्दू गुरु बिन नहीं लखी, पाप पुन्य की बात ।
राधास्वामी की दया, समझ पड़ी जम घात ॥1 ॥
नन्दू माया जग ठगे, ठगनी अति बलिबान ।
इस ठगनी के मरम को, समझे साध सुजान ॥6 ॥
माया ने तुमको ठगा, ठगो उसे तुम आय ।
आँख मिचौली खेलकर, लो अब काम बनाय ॥7 ॥
माया बुद्धि विवेक है, माया है गुनवान ।
माया शक्ति सिद्धि है, माया है बलवान ॥8 ॥
माया से मिल बुद्धि ले, माया ही से विवेक ।
पहिले खेल अनेक से, पीछे एक ही टेक ॥6 ॥
एक नाम गुरु देव का, सतगुरु दिया बताय ।
नन्दु सोच विचार कर, राधास्वामी पद लपटाय ॥10 ॥
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Song 81 — Hindi
585. नन्द करनी सबल है, बिन करनी क्या होय ।
पहिले करनी चित्त दे, पीछे सुख से सोय ॥1 ॥
करनी बिन बहुतक करे, ज्ञान ध्यान की बात ।
वह कुत्ता है जगत में, सहे काल की घात ॥2 ॥
करनी करे सो मीत हमारा, हम नहीं कथनी के साथी ।
करनी करे सो सब कुछ पावे, घोड़े बैल और हाथी ॥3 ॥
बक बक करते थक गया, जिभ्या होंट सुखाय ।
करनी से सब कुछ मिले, करनी सुगम उपाय ॥4 ॥
वेद पढ़ा तो क्या हुआ, करम का नहीं व्यवहार । ।
वह गधा है जगत में, लादे पुस्तक भार ॥5 ॥
चंदन लादा बैल पर, मिला न बास सुबास ।
पढ़ लिखकर कथनी करे, सो हुआ अन्त उदास ॥6 ॥
नन्दू वाचक ज्ञान तज, गुरु गम ले पहिचान ।
राधास्वामी की दया, ले जल्दी निरवान ॥7 ॥
पहिले करनी चित्त दे, पीछे सुख से सोय ॥1 ॥
करनी बिन बहुतक करे, ज्ञान ध्यान की बात ।
वह कुत्ता है जगत में, सहे काल की घात ॥2 ॥
करनी करे सो मीत हमारा, हम नहीं कथनी के साथी ।
करनी करे सो सब कुछ पावे, घोड़े बैल और हाथी ॥3 ॥
बक बक करते थक गया, जिभ्या होंट सुखाय ।
करनी से सब कुछ मिले, करनी सुगम उपाय ॥4 ॥
वेद पढ़ा तो क्या हुआ, करम का नहीं व्यवहार । ।
वह गधा है जगत में, लादे पुस्तक भार ॥5 ॥
चंदन लादा बैल पर, मिला न बास सुबास ।
पढ़ लिखकर कथनी करे, सो हुआ अन्त उदास ॥6 ॥
नन्दू वाचक ज्ञान तज, गुरु गम ले पहिचान ।
राधास्वामी की दया, ले जल्दी निरवान ॥7 ॥
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Song 82 — Hindi
586. तड़प तड़प में उमंग है, जीवपना है जोग ।
यह रहस्य बूझे कोई, जिसे प्रेम का भोग ॥1 ॥
नन्दू प्रेम में रस महा, रसिया होय सुजान ।
रस की जिसको समझ नहीं, प्रेम प्रीत क्या जान ॥2 ॥
प्रेम भाव मन में रमा, प्रीतम तन मन व्याप ।
जब प्रेमी प्रीतम मिले, एक रूप है आप ॥3 ॥
नन्दू प्रेम का स्वाद ले, फीके हैं सब स्वाद ।
प्रेम प्यार विन जीवना, जनम गवाया बाद ॥4 ॥
पढ़ा गुना लिख पढ़ मुवा, अपना आप न जान ।
नन्दू पंडित मूरखो, दोनों एक समान ॥5 ॥
अपने को जाना नहीं, औरों को लिया जान । ।
नन्दू ऐसे जान को, नहीं कहते है ज्ञान ॥6 ॥
विद्या बुद्धि का सार यह, आपको ले पहिचान ।
नन्द जिसको समझ यह, सो ज्ञानी परमान ॥7 ॥
यह रहस्य बूझे कोई, जिसे प्रेम का भोग ॥1 ॥
नन्दू प्रेम में रस महा, रसिया होय सुजान ।
रस की जिसको समझ नहीं, प्रेम प्रीत क्या जान ॥2 ॥
प्रेम भाव मन में रमा, प्रीतम तन मन व्याप ।
जब प्रेमी प्रीतम मिले, एक रूप है आप ॥3 ॥
नन्दू प्रेम का स्वाद ले, फीके हैं सब स्वाद ।
प्रेम प्यार विन जीवना, जनम गवाया बाद ॥4 ॥
पढ़ा गुना लिख पढ़ मुवा, अपना आप न जान ।
नन्दू पंडित मूरखो, दोनों एक समान ॥5 ॥
अपने को जाना नहीं, औरों को लिया जान । ।
नन्दू ऐसे जान को, नहीं कहते है ज्ञान ॥6 ॥
विद्या बुद्धि का सार यह, आपको ले पहिचान ।
नन्द जिसको समझ यह, सो ज्ञानी परमान ॥7 ॥
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Song 83 — Hindi
587. समय अमोल न खोइये, नित करिये सतसंग ।
सिर पर फन काढ़े खड़ा, काला काल भुजंग ॥1 ॥
एक घड़ी आधी घड़ी, और आधी में आध ।
सतसंगत परताप से, छूटे सकल उपाध ॥2 ॥
लोक परलोक सुधार ले, भज भज गुरु का नाम ।
फिर यह अवसर यह घड़ी, नहीं यह धाम न ठाम ॥3 ॥
जाना है रहना नहीं, जाना निस्संदेह ।
त्याग सकल की बासना, बांध गुरु सों नेह ॥4 ॥
नन्द भोग विलास का, चाख लिया रस आय ।
अब मन राता प्रेम रस, माता भक्ति लगाय ॥5 ॥
सिर पर फन काढ़े खड़ा, काला काल भुजंग ॥1 ॥
एक घड़ी आधी घड़ी, और आधी में आध ।
सतसंगत परताप से, छूटे सकल उपाध ॥2 ॥
लोक परलोक सुधार ले, भज भज गुरु का नाम ।
फिर यह अवसर यह घड़ी, नहीं यह धाम न ठाम ॥3 ॥
जाना है रहना नहीं, जाना निस्संदेह ।
त्याग सकल की बासना, बांध गुरु सों नेह ॥4 ॥
नन्द भोग विलास का, चाख लिया रस आय ।
अब मन राता प्रेम रस, माता भक्ति लगाय ॥5 ॥
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Song 84 — Hindi
588. सतसंगत सुख उपजे, सतसंगत दुख जाय ।
सतसंगत से साधुवा, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥1 ॥
सतसंगत के गुन बहुत, महिमा बनि न जाय ।
लोहा पारस से मिले, सो सोना हो जाय ॥2 ॥
सतसंगत में पुण्य है, सतसंगत में धर्म । ।
सतसंगत में साधुवा, मिले सत्त का ममें ॥3 ॥
पोथी पढ़ पढ़ जग मुवा, खुले न हिये के नैन ।
सतसंगत प्रताप से, मिल रहा सच्चा चेन ॥4 ॥
वाल्मीक नारद भये, ज्ञान ध्यान की खान ।
सतसंगत में कीजिये, नाम अमृत रस पान ॥5 ॥
सतसंगत से साधुवा, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥1 ॥
सतसंगत के गुन बहुत, महिमा बनि न जाय ।
लोहा पारस से मिले, सो सोना हो जाय ॥2 ॥
सतसंगत में पुण्य है, सतसंगत में धर्म । ।
सतसंगत में साधुवा, मिले सत्त का ममें ॥3 ॥
पोथी पढ़ पढ़ जग मुवा, खुले न हिये के नैन ।
सतसंगत प्रताप से, मिल रहा सच्चा चेन ॥4 ॥
वाल्मीक नारद भये, ज्ञान ध्यान की खान ।
सतसंगत में कीजिये, नाम अमृत रस पान ॥5 ॥
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Song 85 — Hindi
589. संगत तजिये दुष्ट की, उपजे काम विकार ।
कीजे संगत साध की, तत छिन हो निरवार ॥1 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, मिटे हिये का मैल ।
सतसंगत में पाइये, प्रेम प्रीत की गैल ॥2 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, कलह कष्ट को मेट ।
संगत कीजे साध की, धर भक्ति की भेंट ॥3 ॥
पढ़ना लिखना सब भुला, जो आवे हरि नाम ।
सतसंगत उत्तम महा, व्यापे क्रोध न काम ॥4 ॥
धर्म अर्थ और मोक्ष गति, सतसंगत में पाय ।
सहजे ही सब ऊपजें, जप तप कौन कराय ॥5 ॥
कीजे संगत साध की, तत छिन हो निरवार ॥1 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, मिटे हिये का मैल ।
सतसंगत में पाइये, प्रेम प्रीत की गैल ॥2 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, कलह कष्ट को मेट ।
संगत कीजे साध की, धर भक्ति की भेंट ॥3 ॥
पढ़ना लिखना सब भुला, जो आवे हरि नाम ।
सतसंगत उत्तम महा, व्यापे क्रोध न काम ॥4 ॥
धर्म अर्थ और मोक्ष गति, सतसंगत में पाय ।
सहजे ही सब ऊपजें, जप तप कौन कराय ॥5 ॥
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Song 86 — Hindi
590. एक इष्ट मन में बसे, प्रगटे प्रेम प्रचार ।
कोटि इष्ट की बन्दना, है निषिद्ध व्यभिचार ॥1 ॥
व्यभिचारी हो खोगये, मन में प्रेम न प्रीत ।
तिनको कैसे प्राप्त हो, गुरु भक्ति की सीत ॥2 ॥
कभी विष्णु कभी शम्भु है, कभी गनेश दिनेश ।
यह व्यभिचारी सदा के, भोगें कष्ट कलेश ॥3 ॥
एक गुरु की भक्ति है, एक गुरु का नाम ।
पूजा सेवा बन्दना, मानसिक आठों याम ॥4 ॥
सहज रीति की भक्ति की, महिमा अगम अपार । ।
जप तप कठिनाई महा, कभी न बेड़ा पार ॥5 ॥
एक घाट पर बैठकर, कर गंगाजल अस्नान ।
नीर मथन से क्या बने, मन में समझ सुजान ॥6 ॥
एक पुरुष का सेवका, सेवा करे निशंक ।
दस पुरुषों का सेवका, रहे सदा चित भंग ॥7 ॥
पतिविरता का एक हैं, व्यभिचारिनि के दोय ।
पतिविरिता व्यभिचारिणी, कहो क्यों मेला होय ॥8 ॥
कोटि इष्ट की बन्दना, है निषिद्ध व्यभिचार ॥1 ॥
व्यभिचारी हो खोगये, मन में प्रेम न प्रीत ।
तिनको कैसे प्राप्त हो, गुरु भक्ति की सीत ॥2 ॥
कभी विष्णु कभी शम्भु है, कभी गनेश दिनेश ।
यह व्यभिचारी सदा के, भोगें कष्ट कलेश ॥3 ॥
एक गुरु की भक्ति है, एक गुरु का नाम ।
पूजा सेवा बन्दना, मानसिक आठों याम ॥4 ॥
सहज रीति की भक्ति की, महिमा अगम अपार । ।
जप तप कठिनाई महा, कभी न बेड़ा पार ॥5 ॥
एक घाट पर बैठकर, कर गंगाजल अस्नान ।
नीर मथन से क्या बने, मन में समझ सुजान ॥6 ॥
एक पुरुष का सेवका, सेवा करे निशंक ।
दस पुरुषों का सेवका, रहे सदा चित भंग ॥7 ॥
पतिविरता का एक हैं, व्यभिचारिनि के दोय ।
पतिविरिता व्यभिचारिणी, कहो क्यों मेला होय ॥8 ॥
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Song 87 — Hindi
591. सतसंगी कहें सत का संग ।
सत के संग न हो चित भंग ॥
साधु वह जो साधन करे ।
मन को साध असाधन हरे ॥
हंस जो क्षीर नीर अलगावें ।
ज्ञान लहें अज्ञान हटावें ॥
सन्त जो सहे मान अपमान ।
निज स्वरूप का राखे ज्ञान ।
आप तरे औरन को तारे ।
सुधरे और को साथ सुधारे ॥
सन्त पन्थ की महिमा भारी ।
कोई समझे उत्तम अधिकारी ।
परम सन्त सतगुरु दयाल ।
भव जल से लीन जीव निकाला शब्द नाव सहज जीव चढ़ावे ।
सहज ही भव के पार लगावे ॥
ऐसी रहनी जिसकी देखो ।
उसे सन्त सतगुरु तुम समझो ।
राधास्वामी दीन सहाई ।
साध संत की गति यों गाई । ।
माने कोई कोई चतुर विवेकी ।
जो नहीं जड़ता हट का टेकी ॥
सत के संग न हो चित भंग ॥
साधु वह जो साधन करे ।
मन को साध असाधन हरे ॥
हंस जो क्षीर नीर अलगावें ।
ज्ञान लहें अज्ञान हटावें ॥
सन्त जो सहे मान अपमान ।
निज स्वरूप का राखे ज्ञान ।
आप तरे औरन को तारे ।
सुधरे और को साथ सुधारे ॥
सन्त पन्थ की महिमा भारी ।
कोई समझे उत्तम अधिकारी ।
परम सन्त सतगुरु दयाल ।
भव जल से लीन जीव निकाला शब्द नाव सहज जीव चढ़ावे ।
सहज ही भव के पार लगावे ॥
ऐसी रहनी जिसकी देखो ।
उसे सन्त सतगुरु तुम समझो ।
राधास्वामी दीन सहाई ।
साध संत की गति यों गाई । ।
माने कोई कोई चतुर विवेकी ।
जो नहीं जड़ता हट का टेकी ॥
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Song 88 — Hindi
592 सहसकमल में लावे ध्यान ।
देखे रूप विराट महान ॥
पांच रंग की खिली कियारी ।
पंच अग्नि फुलवारी न्यारी ॥
दीपवान घट भीतर निरखे ।
ब्रह्म विराट की सूरत निरखे । ।
जाग्रत ब्रह्म है रूप विराट ।
ब्रह्म जाग्रत का वह ठाट । ।
कुछ दिन निरख विराट की लीला ।
आगे चले सुरत शुभ शीला । ।
ओंकार का दर्शन पावे ।
अव्याकृत का नाम धरावे ॥
ब्रह्म स्वप्न की यह गति पाई ।
ब्रह्म स्वप्न में रहा समाई ॥
इसके आगे शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ तेहि कहूँ पुकार ॥
ब्रह्म सुषुप्ति का अस्थान ।
योगी घाट में चढ़े निदान ।
॥
दोहे ॥
देखे रूप विराट महान ॥
पांच रंग की खिली कियारी ।
पंच अग्नि फुलवारी न्यारी ॥
दीपवान घट भीतर निरखे ।
ब्रह्म विराट की सूरत निरखे । ।
जाग्रत ब्रह्म है रूप विराट ।
ब्रह्म जाग्रत का वह ठाट । ।
कुछ दिन निरख विराट की लीला ।
आगे चले सुरत शुभ शीला । ।
ओंकार का दर्शन पावे ।
अव्याकृत का नाम धरावे ॥
ब्रह्म स्वप्न की यह गति पाई ।
ब्रह्म स्वप्न में रहा समाई ॥
इसके आगे शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ तेहि कहूँ पुकार ॥
ब्रह्म सुषुप्ति का अस्थान ।
योगी घाट में चढ़े निदान ।
॥
दोहे ॥
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Song 89 — Hindi
593. गुन का ग्राही सन्त है, औगुन गहे असंत ।
गुन से लौ लागी रहे, देखेगा निज कन्त ॥1 ॥
क्षीर नीर आगे धरे, हंसा करे विचार ।
आत्मक्षीर से काम है, नीर तजा सो विकार ॥2 ॥
गुन का साथी साध है, औगुन लहे असाध ।
जो कोई गुन को गहे, ताका मता अगाध ॥3 ॥
चन्दन वास न त्यागई, काटे लाख कुठियार ।
बास सुवासित होरहा, मुख कुठार बरियार ॥4 ॥
जो तुझको दुख देत है, ता को दे तू सुख ।
यही साध का लक्ष है, सुन सुन हो गुरुमुख ॥5 ॥
गुन से लौ लागी रहे, देखेगा निज कन्त ॥1 ॥
क्षीर नीर आगे धरे, हंसा करे विचार ।
आत्मक्षीर से काम है, नीर तजा सो विकार ॥2 ॥
गुन का साथी साध है, औगुन लहे असाध ।
जो कोई गुन को गहे, ताका मता अगाध ॥3 ॥
चन्दन वास न त्यागई, काटे लाख कुठियार ।
बास सुवासित होरहा, मुख कुठार बरियार ॥4 ॥
जो तुझको दुख देत है, ता को दे तू सुख ।
यही साध का लक्ष है, सुन सुन हो गुरुमुख ॥5 ॥
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Song 90 — Hindi
594. तू क्या सोचे रात दिन, क्यों नहीं सोचे मोहि ।
मुझ असोच की सोच से, सोच न व्याये तोहि ॥1 ॥
तारूं तारूँ तार टू, तारू निस्सन्देह । ।
तेरे देह की क्या कहूँ, तारू कुल और गेह ॥2 ॥
खेल खेल में भजन कर, सहज जोग चितलाय । ।
जो होना है होन दे, गुरु गम चित्त बसाय ॥3 ॥
आसा मैं पूरन करू, दास न होय निरास ।
जो निरास है सेवका, सो नहीं मेरा दास ॥4 ॥
अपनी आसा त्याग दे, कर नित मेरी आस ।
एक रूप में लख पड़ें, दोनों स्वामी दास ॥5 ॥
क्या करता है सोच तू , करता है हंकार । ।
अहं भाव जो ना तजे, केसे लहे विचार ॥6 ॥
सहज सहज में सहज में, सूझे पद निरवान ।
सतसंगत कर आन कर, मिले शब्द का ज्ञान ॥7 ॥
मेरा हो मुझ सरस रह, तज आपा अभिमान ।
फिर इस द्वन्द पसार में, काल करे नहीं हान ॥8 ॥
जाग्रत स्वप्न समान कर, गुरु के चरनन लाग ।
जाग्रत में तू स्वप्न कर, और सुपने में जाग ॥6 ॥
मुझ जैसा तू हो रहे, स्वाग मोह भ्रम मूल ।
रहनी ऐसी धार ले, जैसे कमल का फूल ॥10 ॥
मुझ असोच की सोच से, सोच न व्याये तोहि ॥1 ॥
तारूं तारूँ तार टू, तारू निस्सन्देह । ।
तेरे देह की क्या कहूँ, तारू कुल और गेह ॥2 ॥
खेल खेल में भजन कर, सहज जोग चितलाय । ।
जो होना है होन दे, गुरु गम चित्त बसाय ॥3 ॥
आसा मैं पूरन करू, दास न होय निरास ।
जो निरास है सेवका, सो नहीं मेरा दास ॥4 ॥
अपनी आसा त्याग दे, कर नित मेरी आस ।
एक रूप में लख पड़ें, दोनों स्वामी दास ॥5 ॥
क्या करता है सोच तू , करता है हंकार । ।
अहं भाव जो ना तजे, केसे लहे विचार ॥6 ॥
सहज सहज में सहज में, सूझे पद निरवान ।
सतसंगत कर आन कर, मिले शब्द का ज्ञान ॥7 ॥
मेरा हो मुझ सरस रह, तज आपा अभिमान ।
फिर इस द्वन्द पसार में, काल करे नहीं हान ॥8 ॥
जाग्रत स्वप्न समान कर, गुरु के चरनन लाग ।
जाग्रत में तू स्वप्न कर, और सुपने में जाग ॥6 ॥
मुझ जैसा तू हो रहे, स्वाग मोह भ्रम मूल ।
रहनी ऐसी धार ले, जैसे कमल का फूल ॥10 ॥
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Song 91 — Hindi
595. घर में रहे तो भक्ति कर, बन में रहे तो त्याग ।
भक्ति ग्रहण का रूप है, त्याग रूप वैराग ॥1 ॥
ग्रहण मार्ग है प्रेम का, प्रेम प्रीत परतीत ।
प्यार बसे जिस हृदय में, गहे भक्ति की रीत ॥2 ॥
त्याग मागे वैराग का, उदासीन निश भाव ।
त्याग बसे जिस हृदय में, लहे ज्ञान का दाव ॥3 ॥
धारे तो दोऊ चले, भक्ति और वैराग ।
वैरागी त्यागी बने, भक्त करे अनुराग ॥4 ॥
मन मलीन को शुद्ध कर, समझ गुरु के बैन ।
कुछ दिन ऐसे जतन से, उपजेंगे सुख चैन ॥5 ॥
मन साधे बिन कुछ नहीं, बने न पूरा काम ।
समझ न आवे सन्तमत, नहीं प्रगटे सतनाम ॥6 ॥
पोथी पुस्तक ग्रन्थ पढ़, बाड़े मन हंकार ।
जा गुरु के सतसंग में, अनुभव ज्ञान विचार ॥7 ॥
भक्ति ग्रहण का रूप है, त्याग रूप वैराग ॥1 ॥
ग्रहण मार्ग है प्रेम का, प्रेम प्रीत परतीत ।
प्यार बसे जिस हृदय में, गहे भक्ति की रीत ॥2 ॥
त्याग मागे वैराग का, उदासीन निश भाव ।
त्याग बसे जिस हृदय में, लहे ज्ञान का दाव ॥3 ॥
धारे तो दोऊ चले, भक्ति और वैराग ।
वैरागी त्यागी बने, भक्त करे अनुराग ॥4 ॥
मन मलीन को शुद्ध कर, समझ गुरु के बैन ।
कुछ दिन ऐसे जतन से, उपजेंगे सुख चैन ॥5 ॥
मन साधे बिन कुछ नहीं, बने न पूरा काम ।
समझ न आवे सन्तमत, नहीं प्रगटे सतनाम ॥6 ॥
पोथी पुस्तक ग्रन्थ पढ़, बाड़े मन हंकार ।
जा गुरु के सतसंग में, अनुभव ज्ञान विचार ॥7 ॥
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Song 92 — Hindi
596. निर्गुन गुन वाले सभी, सगुन न निगुन कोय ।
सतसंगत करो साध की, तब विवेक चित होत ॥1 ॥
गुन से खाली कोई नहीं, पशु पक्षी नर रूप ।
निगुन तो कोई नहीं, रंक भिखारी भूप ॥2 ॥
ऐसा जग में कौन है, जो नहीं निर्गुन मीत ।
सब गुन नहीं सबमें रहें, समझ के कर परतीत ॥3 ॥
सगुन अगुन के बीच में, चले सन्त का पन्थ ।
यह सुखमन का मार्ग है, समझ बूझ पढ़ ग्रन्थ ॥4 ॥
लाख कहा समझे नहीं, समझ न आवे बैन ।
कैसे हम उपदेश दें, लखे नहीं जब सैन ॥5 ॥
सैन बैन के बीच में, सत मत सत पथ देख ।
सतसंगत प्रताप से, सूझे अगम अलेख ॥6 ॥
युक्ति प्रमाण विचार से, कर गुरु का सतसंग ।
गुरु का रंग जब हिये बसे, कभी न होय कुरंग ॥7 ॥
सतसंगत करो साध की, तब विवेक चित होत ॥1 ॥
गुन से खाली कोई नहीं, पशु पक्षी नर रूप ।
निगुन तो कोई नहीं, रंक भिखारी भूप ॥2 ॥
ऐसा जग में कौन है, जो नहीं निर्गुन मीत ।
सब गुन नहीं सबमें रहें, समझ के कर परतीत ॥3 ॥
सगुन अगुन के बीच में, चले सन्त का पन्थ ।
यह सुखमन का मार्ग है, समझ बूझ पढ़ ग्रन्थ ॥4 ॥
लाख कहा समझे नहीं, समझ न आवे बैन ।
कैसे हम उपदेश दें, लखे नहीं जब सैन ॥5 ॥
सैन बैन के बीच में, सत मत सत पथ देख ।
सतसंगत प्रताप से, सूझे अगम अलेख ॥6 ॥
युक्ति प्रमाण विचार से, कर गुरु का सतसंग ।
गुरु का रंग जब हिये बसे, कभी न होय कुरंग ॥7 ॥
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Song 93 — Hindi
597. एक तहां से सब हुआ, सब में एक समाय ।
लीला लहर समुद्र की, समझ प्रतीत बढ़ाय ॥1 ॥
एक हुआ दूजा बना, दो मिल भये अनेक ।
नन्द एक अनेक है, और अनेक है एक ॥2 ॥
एक न होय तो दो कहां, दो लख परखे एक ।
नन्द् गुरु गम ज्ञान से, मेटे एक अनेक ॥3 ॥
एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहा न जाय ।
नन्द चुप हो बैठ रह, द्वत अद्वैत मिटाय ॥4 ॥
आया गुरु दरबार में, चित धर अपने एक ।
सतसंगत प्रताप से, गई एक की टेक ॥1 ॥
ब्रह्म नहीं माया नहीं, सत नहीं असत न कोय । ।
नन्द चुप रह मौन वन, समझे ज्ञानी सोय ॥6 ॥
एक कहा बेहद लखा, बेहद में था हृद ।
नन्द हद बेहद तजा, रहा न नेक न बद ॥7 ॥
लीला लहर समुद्र की, समझ प्रतीत बढ़ाय ॥1 ॥
एक हुआ दूजा बना, दो मिल भये अनेक ।
नन्द एक अनेक है, और अनेक है एक ॥2 ॥
एक न होय तो दो कहां, दो लख परखे एक ।
नन्द् गुरु गम ज्ञान से, मेटे एक अनेक ॥3 ॥
एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहा न जाय ।
नन्द चुप हो बैठ रह, द्वत अद्वैत मिटाय ॥4 ॥
आया गुरु दरबार में, चित धर अपने एक ।
सतसंगत प्रताप से, गई एक की टेक ॥1 ॥
ब्रह्म नहीं माया नहीं, सत नहीं असत न कोय । ।
नन्द चुप रह मौन वन, समझे ज्ञानी सोय ॥6 ॥
एक कहा बेहद लखा, बेहद में था हृद ।
नन्द हद बेहद तजा, रहा न नेक न बद ॥7 ॥
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Song 94 — Hindi
598. अपनी अपनी समझ में, सब जग रहा फसाय ।
जब गुरु ज्ञानी कोई मिले, मूल तत्व समझाय ॥1 ॥
जब गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु नहीं विवेक ।
बिन गुरु कोई न लख सके, एक तत्व के अनेक ॥2 ॥
संगत कीजे संत की, अलख लखावे सन्त । ।
सूझ पड़े सतसंग में, सबका आदि और अन्त ॥3 ॥
पक्ष अपक्ष के भेद में, सूझे नहीं अभेद ।
मुल्ला पंडित लड़ मुये, पढ़ कुरान और वेद ॥4 ॥
पक्ष छोड़ कर सार ले, सार तत्व पहिचान ।
मुल्ला पंडित हों दोऊ, पल में एक समान ॥5 ॥
हिलमिल खेलू शब्द में, मन का पक्ष हटाय ।
समझे का मत एक है, नन्दू कहे बताय ॥6 ॥
पर उपदेश में खोगये, उपदेशक हुशियार ।
निज उपदेश बिना नहीं, गया कोई भव पार ॥7 ॥
पर उपदेशक बहुत हैं, निज उपदेशक नाहिं ।
निज उपदेशक जो मिले, नन्द पकड़े वाह ॥8 ॥
नन्दू आप चिताइये, और चिताओ नाहिं । ।
आप चिताये गुरु मिलें, और के भवजल माहिं ॥4 ॥
जब गुरु ज्ञानी कोई मिले, मूल तत्व समझाय ॥1 ॥
जब गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु नहीं विवेक ।
बिन गुरु कोई न लख सके, एक तत्व के अनेक ॥2 ॥
संगत कीजे संत की, अलख लखावे सन्त । ।
सूझ पड़े सतसंग में, सबका आदि और अन्त ॥3 ॥
पक्ष अपक्ष के भेद में, सूझे नहीं अभेद ।
मुल्ला पंडित लड़ मुये, पढ़ कुरान और वेद ॥4 ॥
पक्ष छोड़ कर सार ले, सार तत्व पहिचान ।
मुल्ला पंडित हों दोऊ, पल में एक समान ॥5 ॥
हिलमिल खेलू शब्द में, मन का पक्ष हटाय ।
समझे का मत एक है, नन्दू कहे बताय ॥6 ॥
पर उपदेश में खोगये, उपदेशक हुशियार ।
निज उपदेश बिना नहीं, गया कोई भव पार ॥7 ॥
पर उपदेशक बहुत हैं, निज उपदेशक नाहिं ।
निज उपदेशक जो मिले, नन्द पकड़े वाह ॥8 ॥
नन्दू आप चिताइये, और चिताओ नाहिं । ।
आप चिताये गुरु मिलें, और के भवजल माहिं ॥4 ॥
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Song 95 — Hindi
599. पूरन दया गुरु जब करें ।
तीन ताप भव संकट हरें ।
मन में उपजे विमल विलासा ।
अन्तर देखे सुरत तमासा । ।
जगमग जोत की महिमा भारी ।
कोई निरखे विरला अधिकारी ॥
शब्द सुहावन मंडल लावे ।
सुन सुन सुरत अति हरषावे ॥
आनन्द छाय रहा चहुँ ओर ।
अनहद तूर मचाया शोर । ।
भूम झूम सूरत मस्तानी ।
सतगुरु चरन कमल लिपटानी ॥
ध्येय ध्याता दोउ एक समान ।
आनन्द हर्ष महान महान ॥
घट की अद्भुत लीला देख ।
सुरत सखी हुई सुखी विशेख ॥
सुख प्रगटा जाका वार न पार ।
सुरत चरन होगई बलिहार ॥
सुरत शब्द का साधा जोग ।
अब नहीं सहे कलेश वियोग ।
ऊचे चढ़ आपा को त्यागे ।
गुरु आपा के रस में पागे ।
यह भक्ति यह प्रेम कहावे ।
भक्ति मिले अज्ञान नसावे । ।
ज्ञान पाय लख गुरु की मूरत ।
निरत रूप को धारे सूरत ॥
सुरत निरत में रूप आकार ।
आगे चल हुई इनसे न्यार ॥
विस्माधी हैरत अस्थाना ।
सन्त धाम धुर पद निरवाना । ।
दोहाराधास्वामी की दया, गुरु पद की ले छांव ।
चांद सूर के सीस पर, धरा सुरत ने पाँव । ।
तीन ताप भव संकट हरें ।
मन में उपजे विमल विलासा ।
अन्तर देखे सुरत तमासा । ।
जगमग जोत की महिमा भारी ।
कोई निरखे विरला अधिकारी ॥
शब्द सुहावन मंडल लावे ।
सुन सुन सुरत अति हरषावे ॥
आनन्द छाय रहा चहुँ ओर ।
अनहद तूर मचाया शोर । ।
भूम झूम सूरत मस्तानी ।
सतगुरु चरन कमल लिपटानी ॥
ध्येय ध्याता दोउ एक समान ।
आनन्द हर्ष महान महान ॥
घट की अद्भुत लीला देख ।
सुरत सखी हुई सुखी विशेख ॥
सुख प्रगटा जाका वार न पार ।
सुरत चरन होगई बलिहार ॥
सुरत शब्द का साधा जोग ।
अब नहीं सहे कलेश वियोग ।
ऊचे चढ़ आपा को त्यागे ।
गुरु आपा के रस में पागे ।
यह भक्ति यह प्रेम कहावे ।
भक्ति मिले अज्ञान नसावे । ।
ज्ञान पाय लख गुरु की मूरत ।
निरत रूप को धारे सूरत ॥
सुरत निरत में रूप आकार ।
आगे चल हुई इनसे न्यार ॥
विस्माधी हैरत अस्थाना ।
सन्त धाम धुर पद निरवाना । ।
दोहाराधास्वामी की दया, गुरु पद की ले छांव ।
चांद सूर के सीस पर, धरा सुरत ने पाँव । ।
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Song 96 — Hindi
600. सुरत सखी सुन मेरी बात ।
माया काल को अब दे मात ॥
कर सतसंग गुरु का आय ।
ता से मन का भरम नसाय ॥
बिन सतसंग विवेक न आवे ।
बिन सतसंग काल भरमावे ॥
माया ठगिनी करे ठगौरी ।
माया तज चल पौरी पौरी ॥
शब्द की कर तू नित्य कमाई ।
धुन में मन और सुरत जमाई ॥
सहसकमलदल घंटा बजाओ ।
त्रिकुटी ओम् नाद गुन गाओ ।
अजपा जाप है अनहद बानी ।
सुन सूरत होगी मस्तानी । ।
गुरुगम लख चढ़ सुन्न शिखर पर ।
घर को छोड़ अचर में चित धर। ।
सहज समाध का कुछ सुख पावे ।
सुरत जमे तब समझ में आवे । ।
सुन्न के आगे है महासुन्न ।
महासुन्न की अब धुन सुन ।
घोर अंधेरा तजकर सजनी ।
धार हंस गति होकर हंसनी । ।
भंवरगुफा की चौड़ी खिड़की ।
धंसजा जहां बसी धुन कड़की । ।
बंसी की धुन गुप्त है बानी ।
जो गोपी बनी वह पहचानी । ।
गोपी गोप का है यह भेद ।
सुन धुन गति अब धार अभेद । ।
है अभेद गति सत्त धाम में ।
वहां तू लगजा सत्त नाम में ।
नहीं वहां एक न दो हैं तीन ।
सत धुन की बजती है चीन ।
सत्य सत्य जहाँ सत्य संदेश ।
सतगुरु संत को कर आदेश ।
बिगड़े दूध को क्या मथे, ता में मूल विकार ।
मन बानी को सोध कर, मथ ले माखन सार ॥2 ॥
• पानी मथना भूल है, मथ ले उत्तम क्षीर । ।
माखन निकसे दूध से, त्याग जगत का नीर ॥3 ॥
बड़ी बड़ाई बच्छ की, गहे दीर निरवार ।
रक्त मास को नहीं लहे, साध का यही विचार ॥4 ॥
ग्रन्थ चीर का कुंड है, मन भांडा का रूप ।
चित्त मथानी हाथ ले, माखन मिले अनूप ॥5 ॥
क्षीर नीर का मेल है, जग का द्वन्द पसार ।
उत्तम क्षीर से काम है, हंस करे निरवान ॥6 ॥
मान सरोवर के निकट, रहे हंस की पांत ।
जो कोई आवे भाव से, बख्शे क्षीर की दात ॥7 ॥
परमहंस के दरस से, उपजे निर्मल ज्ञान ।
काग हंस पहिचान कर, तज आगरा मद मान ॥7 ॥
परमहंस गुरु रूप है, काग रूप संपार । ।
काग रूप को जो तजे, सोई साध विचार ||
माया काल को अब दे मात ॥
कर सतसंग गुरु का आय ।
ता से मन का भरम नसाय ॥
बिन सतसंग विवेक न आवे ।
बिन सतसंग काल भरमावे ॥
माया ठगिनी करे ठगौरी ।
माया तज चल पौरी पौरी ॥
शब्द की कर तू नित्य कमाई ।
धुन में मन और सुरत जमाई ॥
सहसकमलदल घंटा बजाओ ।
त्रिकुटी ओम् नाद गुन गाओ ।
अजपा जाप है अनहद बानी ।
सुन सूरत होगी मस्तानी । ।
गुरुगम लख चढ़ सुन्न शिखर पर ।
घर को छोड़ अचर में चित धर। ।
सहज समाध का कुछ सुख पावे ।
सुरत जमे तब समझ में आवे । ।
सुन्न के आगे है महासुन्न ।
महासुन्न की अब धुन सुन ।
घोर अंधेरा तजकर सजनी ।
धार हंस गति होकर हंसनी । ।
भंवरगुफा की चौड़ी खिड़की ।
धंसजा जहां बसी धुन कड़की । ।
बंसी की धुन गुप्त है बानी ।
जो गोपी बनी वह पहचानी । ।
गोपी गोप का है यह भेद ।
सुन धुन गति अब धार अभेद । ।
है अभेद गति सत्त धाम में ।
वहां तू लगजा सत्त नाम में ।
नहीं वहां एक न दो हैं तीन ।
सत धुन की बजती है चीन ।
सत्य सत्य जहाँ सत्य संदेश ।
सतगुरु संत को कर आदेश ।
बिगड़े दूध को क्या मथे, ता में मूल विकार ।
मन बानी को सोध कर, मथ ले माखन सार ॥2 ॥
• पानी मथना भूल है, मथ ले उत्तम क्षीर । ।
माखन निकसे दूध से, त्याग जगत का नीर ॥3 ॥
बड़ी बड़ाई बच्छ की, गहे दीर निरवार ।
रक्त मास को नहीं लहे, साध का यही विचार ॥4 ॥
ग्रन्थ चीर का कुंड है, मन भांडा का रूप ।
चित्त मथानी हाथ ले, माखन मिले अनूप ॥5 ॥
क्षीर नीर का मेल है, जग का द्वन्द पसार ।
उत्तम क्षीर से काम है, हंस करे निरवान ॥6 ॥
मान सरोवर के निकट, रहे हंस की पांत ।
जो कोई आवे भाव से, बख्शे क्षीर की दात ॥7 ॥
परमहंस के दरस से, उपजे निर्मल ज्ञान ।
काग हंस पहिचान कर, तज आगरा मद मान ॥7 ॥
परमहंस गुरु रूप है, काग रूप संपार । ।
काग रूप को जो तजे, सोई साध विचार ||
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Song 97 — Hindi
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Song 98 — Hindi
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Song 99 — Hindi
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Song 100 — Hindi
604 } गुरु के मत में आर कर, गुरु मत ले पहिचान ।
वह अवसर और यह समय, बहुर न देखे आन ॥1 ॥
गरु मत गरु भेही लके, तासों मन पतियाय । ।
पढ़ा लिखा जाना बहुत, यह नहीं ठीक उपाय ॥2 ॥
नाम तो तेरे घट बसे, नाम से लौ रहे लाग ।
घट का परदा खोल दे, पावे पूरक भाग ॥3 ॥
आज कहे मैं काल कर गा, गुरु पूति का ध्यान ।
काल काल के करत ही, पहुँचा काल निदान ॥4 ॥
एक घड़ी में जग नसे, छोड़ काल का भमे ।
जो करना हो आज कर, समझ गुरु का मम ॥5 ॥
काल काल तू मत करे, काल का नहीं ठिकान ।
जो चाहे सो आज कर, लेकर गुरु का ज्ञान ॥6 ॥
वह अवसर और यह समय, बहुर न देखे आन ॥1 ॥
गरु मत गरु भेही लके, तासों मन पतियाय । ।
पढ़ा लिखा जाना बहुत, यह नहीं ठीक उपाय ॥2 ॥
नाम तो तेरे घट बसे, नाम से लौ रहे लाग ।
घट का परदा खोल दे, पावे पूरक भाग ॥3 ॥
आज कहे मैं काल कर गा, गुरु पूति का ध्यान ।
काल काल के करत ही, पहुँचा काल निदान ॥4 ॥
एक घड़ी में जग नसे, छोड़ काल का भमे ।
जो करना हो आज कर, समझ गुरु का मम ॥5 ॥
काल काल तू मत करे, काल का नहीं ठिकान ।
जो चाहे सो आज कर, लेकर गुरु का ज्ञान ॥6 ॥
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Song 101 — Hindi
605. गुरु भक्ति दृढ़ कर भाई ।
तेरी बनत बनत बन जाई ।
गुरु बिराजे मन में ।
गुरु भाव बसे तेरे तन में ॥
गुरु शब्द रहे श्रवन में ।
गुरु छबि रहे नित चितवन में ।
गुरु नाम की टेक संभारो ।
गुरु मूरति हृदय धारो ॥
गुरु का जस निसदिन गाओ ।
गुरु से लौ अपनी लगाओ ।
दोहासांस सांस पर गुरु कहो, प्रगटे ज्ञान विवेक ।
द्वत भाव मेटो सकल, सिप गुरु मिल रहे एक ॥
वाहर भीतर एक समान ।
गुरु तन मन गुरु जान और प्रान ॥
गुरु के रंग रंगे तन चोला ।
सो गुरु मुख जग में अनमोला ।
गुरु मय जगत रूप जब भासे ।
तब अज्ञान अविद्या नासे ॥
तिमिर मिटे घट होय प्रकासा ।
गुरु मुख गुरु का निज कर दासा ॥
माया मोह का बन्धन छूटे ।
सो गुरु मुख परमारथ लूटे । ।
दोहाहर्ष शोक व्यापे नहीं, सन दृष्टि चित होय ।
जाकी ऐसी रहन है, सच्चा सेवक सोय ॥
कर्म करे करता नहीं होय ।
धर्म धरे धरता नहीं होय ॥
बन्ध में मुक्त मुक्ति में बंधा ।
जो ऐला नहीं सो नर अंधा ॥
काज बने नहीं होय अकाज ।
साजे ‘प्रेम भक्ति का साज ॥
मन से सुरत रहे अलगान ।
यही विवेक यही निर्मल ज्ञान । ।
गुरु का रहे निरंतर ध्यान ।
गुरु बल पाय शिष्य बलवान ॥
दोहागुरु बल कर्म नसाइये, गुरु बल काटिये फंद ।
गुरु के बल से साधुवा, छूट जाय जग द्वन्द ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी चरन कोटि परनामी ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी घट घट अन्तर्यामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी पद में मिले बिसरामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी दया उबरे खल कामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी भजे नर आठों जामी । ।
दोहाराधास्वामी गुरु का रूप है, राधास्वामी निज धाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
सहसकवल धुन राधास्वामी ।
त्रिकुटी ओं गुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी सुन्न मंडल धुन रारंग ।
राधास्वामी महासुन सुन रारंग भंवरगफा मुरली राधास्वामी ।
सतपद चढ़ घुर ली राधास्वामी ॥
राधास्वामी अलख अपार अरूप ।
राधास्वामी अगम अथाह अनूप। ।
राधास्वामी धाम है राधास्वामी ।
राधास्वामी नाम है राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी लक्ष पद, राधास्वामी वाच ।
राधास्वामी इष्ट है, राधास्वामी सांच ॥
तेरी बनत बनत बन जाई ।
गुरु बिराजे मन में ।
गुरु भाव बसे तेरे तन में ॥
गुरु शब्द रहे श्रवन में ।
गुरु छबि रहे नित चितवन में ।
गुरु नाम की टेक संभारो ।
गुरु मूरति हृदय धारो ॥
गुरु का जस निसदिन गाओ ।
गुरु से लौ अपनी लगाओ ।
दोहासांस सांस पर गुरु कहो, प्रगटे ज्ञान विवेक ।
द्वत भाव मेटो सकल, सिप गुरु मिल रहे एक ॥
वाहर भीतर एक समान ।
गुरु तन मन गुरु जान और प्रान ॥
गुरु के रंग रंगे तन चोला ।
सो गुरु मुख जग में अनमोला ।
गुरु मय जगत रूप जब भासे ।
तब अज्ञान अविद्या नासे ॥
तिमिर मिटे घट होय प्रकासा ।
गुरु मुख गुरु का निज कर दासा ॥
माया मोह का बन्धन छूटे ।
सो गुरु मुख परमारथ लूटे । ।
दोहाहर्ष शोक व्यापे नहीं, सन दृष्टि चित होय ।
जाकी ऐसी रहन है, सच्चा सेवक सोय ॥
कर्म करे करता नहीं होय ।
धर्म धरे धरता नहीं होय ॥
बन्ध में मुक्त मुक्ति में बंधा ।
जो ऐला नहीं सो नर अंधा ॥
काज बने नहीं होय अकाज ।
साजे ‘प्रेम भक्ति का साज ॥
मन से सुरत रहे अलगान ।
यही विवेक यही निर्मल ज्ञान । ।
गुरु का रहे निरंतर ध्यान ।
गुरु बल पाय शिष्य बलवान ॥
दोहागुरु बल कर्म नसाइये, गुरु बल काटिये फंद ।
गुरु के बल से साधुवा, छूट जाय जग द्वन्द ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी चरन कोटि परनामी ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी घट घट अन्तर्यामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी पद में मिले बिसरामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी दया उबरे खल कामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी भजे नर आठों जामी । ।
दोहाराधास्वामी गुरु का रूप है, राधास्वामी निज धाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
सहसकवल धुन राधास्वामी ।
त्रिकुटी ओं गुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी सुन्न मंडल धुन रारंग ।
राधास्वामी महासुन सुन रारंग भंवरगफा मुरली राधास्वामी ।
सतपद चढ़ घुर ली राधास्वामी ॥
राधास्वामी अलख अपार अरूप ।
राधास्वामी अगम अथाह अनूप। ।
राधास्वामी धाम है राधास्वामी ।
राधास्वामी नाम है राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी लक्ष पद, राधास्वामी वाच ।
राधास्वामी इष्ट है, राधास्वामी सांच ॥
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Song 102 — Hindi
606. सुरत रहे राधास्वामी चरनन में, देह बसे संसारा ।
करम करे करता नहीं सेवक, अंतर सबसे नियारा ॥1 ॥
अहंकार की दुर्मति खो, छोड़े मूल विकारा ।
ऐसा सेवक जो कोई सांचा, सो सतगुरु का प्यारा ॥2 ॥
सेवक करे सहज सेवकाई, जगत अविद्या नासे। ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर प्रकासे ॥3 ॥
करम करे करता नहीं सेवक, अंतर सबसे नियारा ॥1 ॥
अहंकार की दुर्मति खो, छोड़े मूल विकारा ।
ऐसा सेवक जो कोई सांचा, सो सतगुरु का प्यारा ॥2 ॥
सेवक करे सहज सेवकाई, जगत अविद्या नासे। ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर प्रकासे ॥3 ॥







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