400. है पिंड घट तुम्हारा, ब्रह्मांड घट बना है ।
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥
धुन 17
401. क्यों सोवे जग में नींद भरी, उठ जागो जलदी भोर भई ।
पन्थी सब उठकर राह लई, तू मंजिल अपनी बिसर गई ॥1 ॥
सतगुरु का खोज करो प्यारी, संग उनके घाट चलो न्यारी ।
भवसागर है गहिरा भारी, गुरु बिन को जाय सके पारी ॥2 ॥
भक्ति की रीति सुनो प्यारी, गुरु चरनन प्रीति करो सारी ।
तज संशय, भरम करम जारी, तब सुरत अधर घर पग धारी ॥3 ॥
चढ़ गगन शिखर तन वन वारी, धुन बीन सुनो सतपद न्यारी ।
फिर अलख अगम जा परसा री, राधास्वामी चरन पर बलिहारी ॥4 ॥
402. उदय हुआ मेरा भाग री, राधास्वामी गुरु पाया टेक। ।
जब से गुरु के चरन में आई, सोया मनुआ जाग री, व्यापे नहीं माया ॥
उदय जनम जनम के संकट मेटे, पाया अचल सोहाग री, सत गुरु की दाया । ।
आंख खुली निज रूप संभाला, द्वन्द जगत से भाग री,मोहे नहीं काया ॥
उदय0 ज्ञान ध्यान का सार मिला अब, भक्ति अटल बर मांग री,
सुख चहुँ दिस छाया ॥कहना मान पियारी मेरा, राधास्वामी पद से लाग री,
तज अपना पराया ॥
403. सुरत चली पग धार री, राधास्वामी धुर धामा टेका ।
पहली मंजिल सहस कमल दल, पीत ज्योत की धार री, घंटा धुन काना ॥
सुरत0 दूसरी मंजिन त्रिकुटी आई, काल सूर बिस्तार री,
धुन ओम का गाना ॥तीसरी मंजिल सुन्न महासुन्न, सैत चन्द्र उजियार री,
सारंग गत जाना॥चौथी मंजिल भँवर गुफा की, सेत सूर पर कार री,
मुरली बजवाना॥पांचवीं मंजिल सत्त धाम की, ज्योती की भरमार री,
राधास्वामी बखाना ॥
404. तार सुमिरन का बंधा जब, समझो तब तरजाओगे ।
जीते जी सुमिरन भजन और, ध्यान का फल पाओगे ॥1 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, नाम की जब लौ लगी ।
वह तरेगा तारेगा लाखों को, अपने जीते जी ॥2 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, तार को रखो संभाल ।
अन्त में है मुक्ति पद, हो जाओगे इससे निहाल ॥3 ॥
225 तार सुमिरन का न टूटा, नाम की तारी लगी ।
शब्द धुन की गूंज मन को, मीठी और प्यारी लगी ॥4 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, सुमिरो साँसों सांस तुम ।
राधास्वामी की दया से, कर लो पूरी आस तुम ॥ ॥
405. लगी लगन उस पीव से, अब नहीं टूटे तार ॥
अब नहीं टूटे तार, प्रीत प्रीतम से लागी ।
जग की आस भरोस, हिये से अपने त्यागी ।
त्याग के तप से तपी, तपी मैं दिन और राती ।
हृदय विरह की आग तपे, ज्यों दीपक बाती ।
प्रीत रीति अति कठिन है, कोई सके नहीं टार ।
लागी लगन उस पीव से, अब नहीं टूटे तार ॥
406. प्रेम में वर्ण विषेक नहीं, नहीं अचार व्यवहार । ।
नहीं अचार व्यवहार, कठिन है प्रेम का नाता ।
प्रेम पन्थ की डगर, कोई कोई बिरला जाता ।
बिरला जाता कोई, वरण और कुल को तज के ।
प्रभु को ले अपनाय, नाम उस प्रभु का भज के ॥
खाये बेर प्रसन्न हो, शबरी से कर प्यार ।
प्रेम में वरण विवेक नहीं, नहीं अचार व्यौहार ।
407. लौ लागी जब जानिये, तार टूट नहीं जाय । ।
तार टूट नहीं जाय, एक रस समय बितावे ।
दुख सुख के व्यौहार भाव को, मन नहीं लावे । ।
अटल अचल दृढ़ प्रेम, मगन घट अन्तर रहना ।
सुने न और की बात, न अपने मन की कहना । ।
जीते सुमिरे पीव को, मर कर पीव समाय ।
लौ लागी तब जानिये, तार टूट नहीं जाय ॥
408. लगी लगन छूटे नहीं, कितनो करो उपाय । ।
कितनो करो उपाय, रोग यह बड़ा है भारी ।
सहे कलेजे घाव, लगी जब बिरह कटारी ॥
घायल की गति लख, कौन जो घाव न खावे ।
अन्तर में है चोट, कोई कैसे दरसावे । ।
प्रेम का मारा न जिये, सिसक सिसक दम जाय ।
लगी लगन छूटे नहीं, कितनो करो उपाय ॥
409. परमारथ धन क्यों मिले, लिया टके का मन्त्र ।
लिया टके का मंत्र, गुरु किया भिक्ष भिकारी ।
मांगे सबसे भीख, भीख का बन व्यवहारी ॥
और की रोटी खाय, खोय पुरषारथ अपना ।
जागृत में भी देखे तत्व का, वह नहीं सपना ।
झूठा पाखंड यन्त्र है, भूठा ही है तन्त्र ।
परमारथ धन क्यों मिले, लिया टके का मन्त्र ।
410. ब्रह्म बढ़े चिन्तन करे, यही ब्रह्म का अर्थ ॥
यही ब्रह्म का अर्थ, और कोई अर्थ न दूजा ।
सोये बढ़े सो ब्रह्म, वही करे ब्रह्म की पूजा ।
बढ़ो बढ़ो बढ़ चलो, सोच कर नित ही बढ़ना ।
जीवन का रस मिले, वृद्धि में जीवन गढ़ना । ।
वृद्धि भाव चिन्तन नहीं, उसका जीना व्यर्थ ।
ब्रह्म बड़े चिन्तन करे, यही ब्रह्म का अर्थ ॥
411. लेना हो सो जल्द ले, अवसर जासी चाल ।
अवसर के चूके नरा, मारे काल कराल ॥1 ॥
मारे काल कराल, फंसावे यम की फांसी ।
बिगड़े अपना काम, होय जग भीतर हांसी ॥2 ॥
दया राखिये चित्त में, कीजे दुखी निहाल ।
लेना हो सो जल्द ले, अवसर जासी चाल ॥3 ॥
412. दया धरम यह लीजिये, यही वस्तु है सार ।
दया धर्म का मूल है, साधो करो विचार ॥1 ॥
साधो करो विचार, मनुष देही जो पाई ।
वृथा जन्म गया बीत, जो मन में दया न आई ॥2 ॥
जब लग स्वाँसा पिंड में, करले पर उपकार ।
दया धरम गह लीजिये, यही वस्तु है सार ॥3 ॥
कुण्डलियाँ है
413. मैंना तोता बोल कर, पड़े फन्द के जाल ।
जो नर बोले चोल अति, कैसे होय निहाल ॥1 ॥
कैसे होय निहाल, शक्ति तन मन की खोवे । ।
बने दुखी और दीन, वह जन्मों को रोवे ॥2 ॥
रोवे जनम जनम को, सुखी न हो बाचाल ।
मैंना तोता बोल कर, पड़े फन्द के जाल ॥3 ॥
414. करम किया भक्ति किया ज्ञान कथा भाई ।
हिये ना विवेक आया सार ना सुझाई । ।
गनपत है कर्म रूप विष्णु भक्ति देवा ।
शिव हैं विज्ञानवान सुर नर करें सेवा ॥
तीनों के तीन काम तीन भाव प्यारे ।
तीन ही गुन तीन रूप तीन आधारे ॥
गनपति से स्टष्टि कर्म विष्णु पालन पोषन । ।
शिव जी से ज्ञान मर्म हृदय आये तो बन ॥
रज है गनेश सत विष्णु की बड़ाई ।
तम शिव है महादेव दीनन सुखदाई ॥
415. चूहा गनेश चढ़े गरुड़ विष्णु वाहन ।
नन्दी बेल पीठ शम्भु मारें निज आसन ॥
पांच हाथ के गनेश पांच भुजा धारी ।
मस्तक संदूर सोहे मूष की सवारी ॥
विष्णु स्वरूप देखा चार भुजा वाला ।
मस्तक पर तिलक केसर उर मुक्ता माला ॥
शिव का दर्शन विचित्र दोय भुजा सोहे ।
भस्म देह चन्द्र मूल मुन्डमाल मोहे । ।
गनपत का लाल रंग विष्णु रंग नीला ।
इन्द कुन्द शम्भु अद्भुत छबि लीला ॥
416. तीनों तीन प्रश्न मैंने पूछे मन से ।
यह क्या है कोई आखे भिन्न भिन्न तिनके ।
उत्तर यह मिला मुझे मन की प्रभुताई ।
तीन के हैं तीन मन सोच समझ भाई । ।
मूढ़ मूस गुरुड़ चंचल बैल है अज्ञानी ।
इनकी दशा कोई लखे गुरु के संग प्रानी ॥
कर्म करे मूढ़ भक्ति चंचल सुविवेका ।
ज्ञान अज्ञानी लहे धरे चित्त एका ॥
तीन के उपाय तीन तीन का हो साधन ।
तीन देव तीन विधि तीन आराधन ॥
417. मूढ़ मूष के शरीर गनपत बन चढ़ना ।
कर्म धर्म साध कर्म पन्थ में न अड़ना ॥
चंचल गरुड़ चेत जाय विष्णु भार पाकर ।
अज्ञानी भी बैल चढ़े शम्भु रूप आकर ॥
कर्म लहे भक्ति लहे ज्ञान लहे निर्मल ।
सिद्धि ऋद्धि शक्ति लहे मन को करे प्रबल ॥
तीन गुन जीते या विधि आगे पद धारे ।
चौथा पद समझ आवे संगत के सहारे । ।
तब गिरे गुरु के चरन त्रिगुन दोष खोकर ।
जागे तब सोया हदय मोह नींद सोकर । ।
418. एक जन्म कर्म करे दूजे जन्म भक्ति ।
तीजे जन्म ज्ञान लहे सूझे निज युक्ति ॥
चौथे गुरु चरन कमल बास लौ लावे ।
नर शरीर सुफल करे भरम में न आवे ॥
मन चित बुद्धि त्याग दृढ़ किया हंकारा। ।
शूद्र चैश्य क्षत्री छोड़ ब्राह्मण तन धारा ॥
ब्रह्मचर्य गृही और तपसी बनबासी ।
चौथा तब सार लहें कोई सन्यासी । ।
सार पाय पार जाय सुरत शब्द मत से। ।
शब्द सार निरख परख तब सतपद पावे ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
424. फूटी आंख विवेक की, लखे न सन्त असन्त ।
जाके संग दस बीस है, ताका नाम महन्त ॥
ताका नाम महन्त, करे अनुचित व्यवहारा ।
त्याग सन्त मत राह, जनम के जुये में हारा । ।
सिख साखा तो बहुत हैं, सतगुरु संग न भाव ।
ऐसे जन के निकट में, भूल कोई मत आव ॥
फूटी भांख विवेक की, लखे न सन्त असन्त ।
जाके संग दस बीस हैं, ताका नाम महन्त ।
425. सिंहों के लँहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत ।
लालों की नहीं बोरियां, साफ न चलें जमात ॥
साध न चलें जमात, रहें वह सब से न्यारे ।
दया भाव हिये धार, सदा सतगुरु के प्यारे ।
प्रेम प्रीत परतीत में, अघट अमोघ अगाध ।
दम्भ चाल करनी करे, ताहि कहो मत साध ॥
सिहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत ।
लानों की नहीं बोरियां, सन्त न चलें जमात । ।
426. गिरही में तो प्रेम गति, दासा तन का भाव ।
नन्दू सहज है साधना, जो कोई जाने दाब । ।
दास बना तो दे सभी, इष्ट नाम तब ले ।
सेवक है तो सेव कर, चित, गुरु चरनन दे । ।
क्या गिरही का धर्म है, समझ के कर व्यवहार ।
बिन समझे पग दे नहीं, मन में रहे विचार ।
427. भावी अटल अपार है, कोई समझे ज्ञानी ॥
समझे ज्ञानी ज्ञान से, नहिं बुद्धि लड़ावे ।
तके कुतके निशर के, क्यों साख बढ़ावे ॥1 ॥
भावी बस श्रीराम, हिरन को मार गिराया ।
रावन से अनबन हुई, बहु युद्ध मचाया ॥2 ॥
धर्मराज की बुद्धि को, भावी ने बिगाड़ा ।
बन बन डोलत फिरे, बजा भारत का नगाड़ा ॥3 ॥
भावी बस श्री कृष्ण ने, अपना कुल मारा ।
भावी बस नर का छुटे, सब बुद्धि विचारा ॥4 ॥
दुर्योधन की आंख में, पड़ी भर्म की धूरी। ।
आसा तृष्णा राज की, कर सका न पूरी ॥5 ॥
होनहार होकर रहे, यह निज कर जानी। ।
भावी अटल पर है, कोई समझे ज्ञानी ॥6 ॥
428. जग की आसा त्यागकर, कर सतगुरु की आस ।
शक्ति शक्तिवान है, क्यों वह होय निरास ॥1 ॥
शक्ति शक्तिवान है, शक्ति सबका सार ।
शक्ति गुरु की भक्ति में, शक्ति करे विचार ॥2 ॥
शक्ति में नहीं निचलता, सबला कहिये सोय ।
शक्ति में शक्ति रहे, नहीं वह अबला होय ॥3 ॥
पदम रूप जल में रहे, नहीं व्याये संसार ।
क्षीर नीर का मथन कर, पिये अमीरस धार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, भक्ति पदारथ पाय ।
शक्ति में शक्ति रहे, शक्ति पाय हर्षाय ॥
429. गुरु से मेरी प्रीत लगी भारी ।
भक्ति मिली अब नहीं संसारी ॥
नित शीत प्रसाद को खाती हूँ ।
पी चरनामृत तृप्ताती हूँ ।
सुमिरन और भजन से लगन लगी ।
फिरती हूँ जग से भगी भगी ॥
माया से मुझको नहीं हानी ।
गुरु व्याप रहे तन मन बानी ॥
राधास्वामी मेरे प्रीतम प्यारे ।
दिन रात साथ के रखवारे ।
(430 कुल संख्या 1332) न अपना नाम रखना तुम, न दुनियां में निशां रखना ।
नहीं की जब गई आदत, जबां पर तब न हां रखना ॥
मुकर होना अबस है, और मुनकर होना है गलती ।
न सिर में ऐसे सौदा का, कभी बारे गिरां रखना । ।
न साहिबे दिल न बेदिल, बनने की तुममें हविस आये ।
न दिल देना न दिल लेना, न बहरे दिलस्ताँ रखना । ।
अगर है तर्क तर्क करदो, तर्क का भी तर्क बेगुमां ।
मकां जब छुट गया फिर, क्यों खयाले लामकां रखना ॥
खामोशी मानये दारद, कि दर गुफ्तन नमी आयद ।
न सच और झूठ कहने, के लिये मुह में जुबां रखना । ।
सहज योग सहज सुमिरन
431. अगम अपार अगाध अनामी ।
अलख अनादि आदि राधास्वामी ॥
सत्त रूप सतपद सत धामी ।
अक्षर निःअक्षर राधास्वामी ।
अमर अजर अव्यक्त अकामी ।
अगथ अनेह व्यक्त राधास्वामी ॥
सुलभ सुगम सुविचार मुकामी ।
आतम परमातम राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी ॥
दोहाएड़ी से चोटी तलक, सब राधास्वामी रूप ।
निराकार साकार दोऊ, रूपावन्त अरूप ॥
राधास्वामी कारन राधास्वामी कारज ।
राधास्वामी गुरु राधास्वामी अचारज ॥
राधास्वामी फल हैं फूल राधास्वामी ।
राधास्वामी बीज मूल राधास्वामी ॥
राधास्वामी तन राधास्वामी मन ।
राधास्वामी वित्त राधास्वामी धन ॥
राधास्वामी भक्ति ज्ञान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह प्राण राधास्वामी ।
राधास्वामी कठिन सुगम राधास्वामी ।
राधास्वामी अगम निगम राधास्वामी ॥
दोहापावक गगन समीर जल, पृथ्वी राधास्वामी रूप ।
निराधार आधार गति, अकह अनाम अरूप ॥
सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
क्रिया भक्ति ज्ञान राधास्वामी ॥
तीरथ बरत धरम राधास्वामी ।
गुप्त अगुप्त मरम राधास्वामी ॥
शब्द स्पर्श रूप राधास्वामी ।
रसमय गन्ध कूप राधास्वामी ॥
अगुन सगुन सब गुन की खान ।
राधास्वामी मेरे पुरुष महान ॥
अक्षर निःअक्षर के पार ।
निराकार नहिं नहीं साकार ॥
दोहा एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहत लजाऊँ ।
एक अनेक के परे लख, राधास्वामी ठांऊँ ।
राधास्वामी पिता मात राधास्वामी ।
राधास्वामी बन्धु तात राधास्वामी राधास्वामी ऋषी मुनी राधास्वामी ।
राधास्वामी वेद गुनी राधास्वामी राधास्वामी शब्द धार राधास्वामी ।
राधास्वामी मन विचार राधास्वामी राधास्वामी मुक्त बद्ध राधास्वामी ।
राधास्वामी नित्य शुद्ध राधास्वामी राधास्वामी पार वार राधास्वामी ।
राधास्वामी तत्व सार राधास्वामी
दोहाराधास्वामी सहस गति, राधास्वामी द्वत ।
राधास्वामी एक हैं, सत धुर पद अद्वत ।
रेचक पूरक हैं राधास्वामी ।
प्राण योग कुम्भक राधास्वामी ॥
सहस कमल दल त्रिकुटी धाम ।
सुन्न महासुन्न राधास्वामी ठाम । ।
सोहंग रूप जान राधास्वामी ।
सत्य स्वरूप मान राधास्वामी ।
लख गम अलख अगम बिस्तार ।
राधास्वामी पद में रा0स्वा0 सार ।
रात दिवस गाओ राधास्वामी ।
छिन प्रतिछिन ध्याओ रा0स्वामी । ।
दोहासुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सांस सांस सुमिरन करो, राधास्वामी के गुन गाय ॥
सहज ध्यान
432. राधास्वामी संत रूप धर आये ।
राधास्वामी तत्व सार समझाये ॥
सुन्दर शान्त विशुद्ध शरीरा ।
रा0 स्वा0 प्रगटे धीर गम्भीरा ॥
सोभा धाम अकाम अमाया ।
रा0 स्वा0 अचरज भेष बनाया ।
निराकार साकार स्वरूप ।
पद अनाम में नामी भूप ॥
अवगति गति तज गतिगत भाई ।
राधास्वामी संत समाज सजाई ।
दोहारूप रङ्ग रेखा नहीं, रूप रङ्ग से न्यार ।
रूप रङ्ग रेखा गहा, जीवों के उद्धार ॥
दया भाव ले जग में आये ।
राधास्वामी राधास्वामी पंथ चलाये ॥
सुरत शब्द की राह चलाई ।
शब्दयोग राधास्वामी बतलाई ।
सेत सिंहासन विमल विराजे ।
राधास्वामी साज अनूपम साजे ।
मृदुल मनोहर गात सुहाना ।
राधास्वामी धरा सन्त का बाना । ।
साध हंस संतन गति गाई ।
राधास्वामी सहज किया कठिनाई । ।
दोहासांस योग हठ योग का, सब विधि किया निषेध ।
शब्दयोग उत्तम कहा, दिया ध्यान का योग । ।
सहसकमलदल पुरुष विराट ।
राधास्वामी जोत निरंजन ठाट ।
पंच भूत पचरंग फुलवारी ।
श्याम कुंज राधास्वामी सवारी ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
राधास्वामी छबि अद्वत सुहीला ॥
लाल रंग का चमका भान ।
राधास्वामी किया प्रणव अस्थान । ।
वेद ज्ञान का मूल मुकाम ।
अव्याकृत राधास्वामी नाम । ।
दोहात्रिकुटी पद ओंकार बन, ब्रह्म सिखर पद ठाम ।
तेज पुंज सुप्रकाश मय, राधास्वामी ॐके नाम ।
सुन्न महासुन्न शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ कारन अविकार ॥
मानसरोवर मानस पार ।
ब्रह्म शिखर कैलास बिहार ॥
हंस भाव सीतला सोम छबि ।
अन्ध घोर के परे स्वेत रवि ॥
अमृत मय अमृत की खान ।
सत सत्ता का नाम निशान ।
गुप्त धार की निर्मल सोती ।
बीजा अन्धकार और जीती । ।
दोहाजब लग हंस स्वभाव लग, ले नहीं राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी शून्य सरूप में, नहीं प्रगटे विश्राम ॥
उलट हंस सोहंग गति भाई ।
सोहंग ‘मैं हूँ’ शब्द सुनाई । ।
जगमग बिजली जोत अपार ।
सोहंगम झूमर आकार । ।
रूप रंग रेखा की खानी ।
सोहंग पुरुष राधास्वामी जानी ॥
भाप में ज्यों मूरज छबि प्रगटे ।
आदि माया सोहंग त्यों दरसे ॥
भँवरगुफा भँवराकृत काल ।
राधास्वामी सोहंगम गति पाल ।
दोहाबरे सत्य पद के लखा, सोहंगम स्थान ।
राधास्वामी का यह रूप, लख पावे कोई सुजान । ।
है है है है सहज विचार ।
सो “हैपनाहै सत्याकार ॥
सत्य भाव सत रूप सलोक ।
नहीं वहां चिंता नहीं वहां शोक ॥
जोत प्रकाश का सोत महान ।
राधास्वामी सत्य पुरुष परधान ॥
सुरत शब्द दुरवीन जो पावे ।
तब सतपुरुष के दरशन पावे । ।
सत सत सत सत है जोई ।
राधास्वामी सत्य पुरुष कहो सोई । ।
दोहायहाँ लग रूप व रंग हैं, रेखा और आकार ।
___ राधास्वामी सतगुरु रूप धर, सत्य सत्य दरबार ॥
अलख लखे और लखा न जाये, राधास्वामी अलख दशा कहलाये ।
अगम की गम गम अगम की नाहीं ।
राधास्वामी अगम अमन दरसाही नाम अनाम नाम नहिं जाका ।
राधास्वामी गाड़ा नाम पताका ॥
क्या है सो कोई नहिं भाखे ।
अलख अनाम अगम कह आखे ॥
अचरज अचरज अचरज होई ।
अद्भुत अद्भुत समझो सोई ॥
दोहाइसके ऊपर परे गति, राधास्वामी का धाम ।
सन्तन राधास्वामी नाम कहा,सो सन्तन का ठाम। ।
ही सत नहीं असत के रीत ।
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ॥
नहीं रूप नहीं सो अरूप ।
नहीं वह परजा नहीं वह भूप । ।
नहीं जोत नहीं जोत्याकार ।
नहीं तिमिर न तिमिर विस्तार ।
आदि आदि और अनन्त अनन्ता ।
साध न परखे परखे सन्ता ।
रूप अरूप नाम नहीं नामी ।
वरन सुनाया राधास्वामी ।
दोहामन बानी की गम नहीं, अगम निगम गम नहिं ।
राधास्वामी इष्ट धुर, पद राधास्वामी माहि ॥
236
8 सहजरूपता 8
433. सहज सहज है सृष्टी कर्म ।
सहज ही सहज सहज का मर्म ।
सहज ब्रह्म है सहज है माया ।
सहज रूप है सहज है छाया ॥
सहज स्थूल सूक्ष्म और कारण ।
सहज बोल है सहज उचारण ।
सहज ज्ञान है सहज अनुमान ।
इन्द्रिय पंच सहज परमान ॥
सहज शक्ति है सहज है शिव ।
सहज प्रेम प्रेमी और पीव । ।
दोहाजो समझे सुख सहज को, उपजे सहज विचार ।
सहज नाव व्यौहार चढ़, जावे भव जल पार ॥
सहज पके सो मीठा होय ।
खींच तान है कड़वा सोय ॥
सहज बूझ का सहज विचार ।
कठिनाई में रहे बिकार । ।
सहज की खेती सहज का बान ।
सहज की सेवा मंगल खान ॥
सहज शब्द है सहजहि साखी ।
लखें जो मिले सहज की आँखी । ।
सहज सन्त मत सुगम सुहेला ।
कठिन जगत मत दुगम दुहेला ॥
दोहाकमल नीर रहनी रहे, कभी न व्यापे मोह ।
सहज दशा करनी करे, उपजे काम न कोह । ।
सहज तजे और गहे कठिनाई ।
रहे सो भरम फन्द उरझाई । ।
भरम भूल है भरम अज्ञान ।
भरम छुटे तब सहज का ज्ञान ॥
भरम में दुविधा और दुचिताई ।
सार तजे संसार फँसाई ॥
व्याये अहंकार और ममता ।
चित से हटे सुशील सुसमता । ।
अहंकार है मोर और तोर ।
मोर तोर में काल का जोर ॥
दोहामोर तोर की जेवरी, बट बाँधा संसार ।
दास कबीरा क्यों बधे, सहज नाम आधार । ।
मोर तोर की रसरी भारी ।
बद्ध जीव भये कठिन दुखारी । ।
मोर तोर का मिथ्या भाव ।
पड़े जीव माया के दाव ॥
मैं तू मोर तोर है माया ।
माया बस रहा भरम भुलाया ।
कल्पित बिरथा कहे सब कोई ।
तदपि न झूठ कठिन अति सोई । ।
मोर तोर के बन्धन नाना ।
को सुरझावे कठिन महाना । ।
दोहा उरम उरक उरझे सकल, सुरझा नाहीं कोय !
__ ऋषि मुनि सुर नर प्रीतजन, गये भरम में खोय ॥
नर्क स्वर्ग अपवर्ग त्रिलोकी ।
जनम मरन सहे जीव विशोकी । ।
लख चौरासी योनि फंसाने ।
छूटन की विधि कोई न जाने ।
तीन तार की अग्नि प्रचण्ड ।
तरे भोग माया के दंड । ।
पुरुष दयाल दया उमगाई ।
सन्त रूप धर जग में आई ॥
दुखी जीव को दिया दिलासा ।
सहज चाल जाओ सत देसा ॥
दोहा सत्त सत्त वह धाम है, माया नहीं कलेस ।
साध शब्द की सुगम विधि, धार शब्द का भेष ॥
नहीं यह कर्म न धर्म कहानी ।
नहीं यह जप तप संयम खानी । ।
नहीं यह तुरिया न तुरियातीत ।
नहीं तीरथ नहीं बरत की नीत । ।
नहीं पाखंड न वाद विवाद ।
वाचक ज्ञान की नहीं मरियाद । ।
शब्द भेद घट शब्द चढ़ाई ।
अन्तर शब्द का साधन भाई । ।
शब्द का सुमिरन शब्द का ध्यान ।
शब्द का भजन सन्त परमान
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, परख साक्षी मत सार ।
साखी शब्द जहाज चढ़, जा भवसागर पार ॥
साधन शब्द विना नहीं साखी ।
खुले न शब्द बिना हिय आंखी । ।
जो कोई समझे शब्द हमारा ।
समझ जाय भव निधि के पारा ॥
जो कोई गावे हमारी सारखी ।
काल न सके त्रिलोकी राखी । ।
कबीर का बझा जो कोई बुझे ।
तीन लोक सब पल में सूझे । ।
कबीर का गाया जो कोई गावे ।
तीन त्याग चौथा पद पारे ।
241 दोहा शब्द साक्षी रूप है, साक्षी रहे असंग ।
__ संग दोष ब्यापे नहीं, सुन सतगुरु परसंग ॥
राधास्वामी संत कबीर ।
तुलसी जग जीवन मति धीर ॥
नानक पलटू दास बखाना ।
गुरु की दया हमहुँ कछु जाना ।
वेद पढ़े और पढ़ा पुरान ।
सांख्य वेदान्त का परखा ज्ञान । ।
प्राण योग कर आसन मारा ।
तो भी हाथ लगा नहीं सारा ॥
भेद गुप्त बानी में है कुछ ।
समझे ताहि न जीव अधम तुछ ॥
दोहा राधास्वामी प्रगट किया, शब्द योग की रीत ।
सोई संत की बानी में, श्रुति संयुत उद्गीत ॥
पंचम नाम के पंच विधान ।
पंच अग्नि परचंड महान । ।
पंच यज्ञ परमारथ बाद ।
नहीं वह आशय बाद विवाद । ।
करनी करे सो भेद को पावे ।
कथनी कथे सो अवध गवावे ॥
करनी करे सो सेवक पूरा ।
करनी कर कायर हो सूरा ॥
कथनी बदनी जब कोई त्यागे ।
तब करनी के शब्द में लागे ।
दोहा यह करनी का भेद है, नाही बुद्धि विचार ।
कथनी तज करनी करे, तब पावे कुछ सार ॥
सहज शब्द निर्णय
434. शब्द गुप्त तब रहा अनामी ।
शब्द प्रगट तब प्रगटा नामी ॥
गुप्त प्रगट दोउ शब्द स्वरूप ।
रंक प्रजा कहीं राजा भूप । ।
कहीं सामान्य और कहीं विशेष ।
कहीं विस्तार कहीं है शेष ॥
सब में शब्द है ओत परोत ।
कहीं धार गति कहीं है सोत । ।
माला मनका और सुमेर ।
गांठ गांठ में हेरा फेर ।
दोहा जहां छोब गति गम लहे, तहां शब्द की धार ।
जहां छोब की गम नहीं, अधिष्ठान आधार । ।
निराकार साकार की खानी ।
कारन सूक्ष्म स्थूल निशानी ॥
श्रुति जब अन्तःकरण में आवे ।
गगन मंडल उद्गीत कहावे ॥
जिभ्यातट सोई बने सुबानी ।
ब्रह्मा शारद शेस बखानी ॥
अनहद निराकार धुन सोहे ।
मुख जिभ्या बानी है मोहे ॥
बानी में सब गये भुलाई ।
अनहद धुन उनमुनि नहीं पाई । ।
दोहा बानी वरनात्मक है, सगुन गुनन की खान ।
अनहद धुनात्मक धुन, निर्गुन अगुन महान ॥
शब्द शब्द का रचा पसारा ।
शब्द शब्द त्रिगुण बिस्तारा । ।
अधि दैविक अधि भौतिक जानो ।
सोई अध्यात्मक रूप पिछानो ।
शब्द भेद है शब्द अभेद ।
शब्द मुक्ति शब्दहि भव भेद । ।
एक शब्द भव फन्द कटावे ।
एक शब्द गले फाँसी लावे ॥
एक शब्द आनन्द विलास ।
एक शब्द दारुण दुख त्रास । ।
दोहा एक शब्द के सुनत ही, लगे कलेजे घाव ।
एक शब्द औषधि करे, अपने सहज स्वभाव । ।
भोग शब्द उपजावे भोग ।
जोग शब्द प्रगटावे जोग । ।
एक शब्द हिये आवे ज्ञान ।
एक शब्द सुन बन्द निदान ॥
शब्द विवेक से बुझे एक ।
भव के शब्द से लखे अनेक ॥
एक अनेक शब्द परमाना ।
सोई अद्वत और द्रुत कहाना ।
माया ब्रह्म पुरुष प्रकृति ।
शब्द ही जीव शिव और शक्ति ॥
दोहा गुरु मुख शब्द में रहत है, अद्भुत अनन्त विचार ।
गुरु का शब्द जो लख पड़े, सूझे अगम अपार ॥
शब्दहि मारे बन को जाये ।
शब्द से लोक परलोक नसाये ॥
शब्द सबारे लोक परलोक ।
शब्दहि टारे भव का शोक ॥
शब्द वेद और शब्द पुरान ।
शब्दहि श्रुति स्मृति की जान ।
शब्दहि प्रश्न शब्द ही उत्तर ।
शब्दहि मौन और शब्द ही सूत्तर ॥
शब्दहि उन्मन शब्द समाधी ।
शब्दहि बन्धन शब्द उपाधी । ।
दोहाशब्द शब्द में भेद है, शब्द शब्द में भाव ।
___ गुरु का शब्द से पाइये, भक्ति मुक्ति का दाव ॥
शब्द त्रिलोकी रचा पसारा ।
शब्द मांहि त्रिगुन निस्तारा ॥
गगन पवन अगनी जल पृथ्वी ।
शब्द आदि जानो इन सबकी ।
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध ।
शब्द मुक्ति और शब्द है बन्ध ।
शब्द पुरुष है शब्द प्रकृति ।
शब्द शम्भु और शब्द है शक्ति ।
जीव ब्रह्म ईश्वर और माया ।
शब्द तत्व और शब्द है काया ॥
दोहाबिना शब्द रचना नहीं, शब्द है सबका सार ।
कोई कोई सन्त जन, शब्द का करे विचार ॥
शब्द से सुरत सुरत से शब्द ।
शब्द अलब्ध शब्द है लब्ध ॥
त्वचा आँख जिभ्या और कान ।
शब्द है शब्द रूप पहिचान । ।
पश्यन्ती मध्यमा बैखरी ।
अपरा परा शब्द है बैखरी ॥
निराधार और सर्वाधार ।
अधिष्ठान गति शब्द विचार ॥
तुरिया तुरियातीत शब्द ।
साध सन्त अतीत शब्द सब ॥
सोरठारवि शशि मंगल बुद्ध, और बृहस्पति शुक्र शनि ।
__ शब्दहि शुद्ध अशुद्ध, निरख परख पहिचान ले ॥
शब्द विराट शब्द है माया ।
जोत निरंजन शब्द की काया ॥
शब्द है मूल मंत्र ओंकार ।
अन्तरयामी शब्द मंझार । ।
सुन्न महासुन्न शब्द पसार ।
शब्द भंवर सोहं झनकार । ।
शब्द पुरुष है शब्द अकार ।
शब्द करे सत धाम पुकार । ।
अलख है शब्द अगम है शब्द ।
अगम है शब्द निगम है शब्द । ।
दोहाराधास्वामी शब्द है, मुख से लेते नाम ।
गुप्त तो शब्द अशब्द है, अमला अचल अनाम । ।
244.
सहज सुरत निर्णय
435. शब्द सोत से निकली धार ।
पिंड में आय फंसी नौ द्वार ।
अन्तःकरण चार से मिली ।
इन्द्री ज्ञान कर्म संग पिली । ।
सोई धार सुरत सार कहावे ।
कल्प विकल्प के साथ रहावे । ।
जब लग देह गेह संयोग ।
आवागमन के भोगे योग । ।
जब ठहरी तब सुख संयोग ।
हटी तो दुख से भया वियोग । ।
दोहादुख सुख द्वन्द अवस्था, ऊपर नीचे जाय ।
नव द्वारे जब लग रहे, भरम के फंद फंसाय । ।
देव भूत आतम का फंद ।
तीन ताप में व्यापा द्वन्द ॥
एक चित होय न आनन्द पावे ।
द्विचिताई के बन्ध रहावे ॥
दुविधा द्विचिताई संसार ।
गह असार वह लहे न सार ॥
असत भाव में लख चौरासी ।
भरमत भिरी सुरत अविनासी ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ी ।
सुरत गांठि संग पड़कर अड़ी ॥
दोहागांठी कल्पित सर्वदा, मिथ्या वृथा के भाव ।
___ कहत कठिन समझत कठिन, खुलत न सहस उपाय । ।
नव को छोड़ दसम दर लागे ।
हिये के मोह लोभ सब त्यागे ।
सुन्दर सुन्दर रूप निहारे ।
ज्ञान पाय गांठी निरवारे ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
शब्द गुरु का लावे ध्यान ॥
ध्यान में लागे सहज समाध ।
तब मन के सब हटें उपाध । ।
वृत्ति साध मेटे सब व्याध ।
सुरत निरत तब हो विस्माध ॥
दोहाबिसमिध हुये उत्थान पर, करे विचार अपार ।
तजे बासना जगत की, सहज होय निस्तार ॥
तीन छोड़ चौथे पद धावे ।
चौथे सुरत को निरत करावे ॥
सुरत धारना निरत है ध्यान ।
धारे अधिष्ठान अस्थान । ।
245 सत पद है कूटस्थ का थाना ।
अचरज अद्भुत अकह अमाना ।
अलख अगम और राधास्वामी ।
निगम अगम के पार मुकामी । ।
साखी शब्द शब्द और साखी ।
जिनकी गति है पहले भाखी ।
दोहा शब्द कमाय साखी लहे, साक्षी रूप प्रमान ।
धुर पद जीवन मुक्त मति, आवागवन नसान । ।
सुरत टिके अन्तर कर बासा ।
सतचित आनन्द लहे बिलासा । ।
सत में बल चित में है ज्ञान ।
आनन्द है आनन्द के ध्यान । ।
तीन त्रिवेणी कर अस्नान ।
मेटे सत रज तम का मान । ।
मान सरोवर मारे गोता ।
निर्मल होय अमी के सोता ॥
तब चौथा पद पड़े लखाई ।
बिन चौथे पद नहीं भलाई ॥
दोहा तीन छोड़ चौथा दिया, पाया पद निर्माण ।
राधास्वामी दीन हित, सतगुरु संत महान । ।
सहज चेतावनी
436. रचना सहज सहज प्रकृति ।
सहज वृत्ति में सहज सुकृति । ।
सहज सरल चित कबहुँ न त्यागे ।
बाल दशा व्यौहार में लागे ।
सनक सनन्दन सनत कुमारा ।
सहज वृत्ति को चित में धारा ॥
तजे न चित से रूप आनन्द ।
भूल न व्यापे जग का द्वन्द ।
अहंकार से खींचा तान ।
ता से उपजे मन अज्ञान । ।
दोहा यह अज्ञान है भरम गति, जग का मूल विकार ।
__भूल भरम में जो फैसा, खोया तत्व का सार ॥
काम क्रोध मद लोभ प्रचंड ।
अनसमझी से बढ़ा घमंड ॥
यह घमंड जाके चित आया ।
ताके हृदय व्यापी माया ॥
माया सौ सौ नाच नचावे ।
छल बल जीव को अधिक सतावे। ।
कहीं दारा कहीं धन परिवारा ।
कहीं दल बादल सजकर मारा ॥
कहीं युक्ति बिन दाँव चलाई ।
कहीं सक्ति होय आँख दिखाई ॥
दोहा अमी हलाहल मद भरे, दृष्टि पियाले माहि ।
जेहि देखा सो जिया मरा, गिरत पड़त सुध नाहिं ॥
ऐसी नहीं कोई दृष्टि में आया ।
जाके हृदय न व्यापी माया ॥
जड़ताई दुर्योधन मारा ।
विश्वामित्र का तप संहारा ॥
शिव मोहनी के रूप लुभाने ।
ब्रह्मा कामातुर जग जाने ।
शृंगी ऋषि पर दाव चलाई ।
माया दशरथ घर ले आई ॥
नारद आदि ऋषि विज्ञानी ।
माया के रहे बन्ध बधानी ॥
दोहा है नाहीं डोलत फिरे, कोई न देखे नैन ।
नैन बिना वह पापनी, मारे दृष्टि के नैन ।
शत रूपा शत भाव गोसाई ।
कहीं परकाश कहीं परछाई ।
कभी आस दे कभी निरास ।
कभी त्रास दे करे उदास ।
रोय गाय प्रान हर लेवे ।
हसी खेल में विष मुख देवे ॥
दुविधा दुरमति और द्विचिताई ।
कपट ईर्षा बुद्धि चतुराई ।
सहस बांह सहसा बलवान ।
सहस बान से बेधे प्रान ॥
दोहा ऋषि मुनि सुर नर सकल विधि, माया के आधीन ।
जप तप संयम छोड़ कर, पुरषारथ से हीन ॥
सुख सम्पत्ति धन धाम बड़ाई ।
माया कल्पित फाँसी लाई ॥
पांच लड़ी की रस्सी बटी ।
बांधे सबको माया नटी ।
एक लड़ काम दूजा हंकार ।
तीजा लोभ है मूल विकार । ।
चौथा मोह पांचवां क्रोध ।
जिनसे जग में बढ़ा विरोध ।
पांच विकार का सकल पसारा ।
उपज प्रपंच अकथ बिस्तारा ॥
दोहा करम करें सब शुभ अशुभ, भोर्ग फल दिन रात ।
जनम जनम बिलपत फिरें, नसे न जग उत्पात ॥
247 सहज चेतावनी (नं0 2)
437. चोटी जीव की काल के हाथ ।
सौ सौ बात की एक यह बात । ।
काल चलावे चोखा बान ।
बन परबत ऊसर मैदान ॥
काल बली सिर ऊपर ठाढ़ा ।
लखे शिकारी जैसे पाढ़ा ॥
बिना हते नहीं छोड़े प्रान ।
कोई किसका करे अभिमान ।
मद अभिमान काम नहीं आये ।
काल हाथ से कोई न बचावे ॥
दोहा—कबीर काहे गरभिया, काल गहे कर केस ।
ना जाने कित मारसी, क्या घर क्या परदेस ।
देह से होय प्रान जब न्यारा ।
घर से तत छिन देहिं निकारा ॥
कोई अर्थी सज मरघट लावे ।
अग्नि प्रचंड में ताहि जलावे ॥
कोई गाड़े माटी ले आई ।
माटी में तेहि देह मिलाई ॥
कोई फेके पर्वत मैदाना ।
पशु पक्षी तेहि खाई निदाना ॥
कोई नद नाला करे प्रवाह ।
खायें कच्छ मच्छ सब आह ॥
दोहायह परिणाम है देह का, सोच समझ मन धीर ।
आसा तज दे देह की, फिर नहिं व्यापे पीर ।
सड़े गले जर बर होय राख ।
क्या है इस देही का साख ।
राजा मरे मरे पटरानी ।
मूरख मरे मरे नर ज्ञानी ।
मृत्यु हाथ से कोई न बांचा ।
समझ देह को तू घट कांचा । ।
अन्त काल कोई नहिं साथी ।
क्या होवे दल बाँधे हाथी ।
जिनके घर हैं लाख करोड़ ।
मारे काल सीस को फोड़ ॥
दोहादेह जले ज्यों लाकड़ी, केस जले ज्यों घास । ।
सब जग जलता देखकर, भये कबीर उदास ॥
गर्व गुमान छोड़ दे बन्दे ।
कर कुछ भक्ति युक्ति के धन्दे ॥
अन्त समय नहीं कोई सहाई ।
साथ चले नहीं सुत पितु माई ॥
झूठी है तिरिया अरधंगी ।
वह कब हुई चिता की संगी ॥
प्रेत भूत कह घर से काढ़े ।
रूप कुरूप देख भय बाढ़े ॥
स्वारथ बस सब जीवहि घेरी ।
निकसत प्रान पीठ ले फेरी ॥
दोहाजीते जी व्यवहार है, जीते के सब मीत ।
झूठा नाता जगत का, झूठी प्रीत प्रतीत ॥
कंकर चुन चुन महल बनाया ।
दो दिन पीछे रहन न पाया ॥
आस त्रास लग अवधि गवाई ।
अन्त समय कछु साथ न जाई ।
धन दौलत और माल खजाना ।
सब तज हंस अकेले जाना । ।
धूम धाम जीते बहु किया ।
चलती बेर हाथ क्या लिया ।
खाली आया खाली गया ।
आसा बांध निरासा भया ।
दोहाऊचे महल चुनावते, करते होड़म होड़ ।
खाली हाथों बह गये, जिनके लाख करोड़ ॥
सहज चेतावनी नं 3
438. जब सुख मिला तो रहा अचेत ।
दुख जब सहा हुआ कुछ चेत । ।
चेत चेत यह बचन सुनाया ।
रहा हाय ! माया लपटाया । ।
आज नहीं तो काल भजू गा ।
गह गुरु चरन विचार तजू गा ॥
आज गया फिर आया काल ।
काल करत ही अवसर चाल ।
काल काल कह काल बुलाया ।
अन्त काल जिया में पछताया ।
दोहाएक पलक की सुध नहीं, करे काल का साज ।
काल अचानक मारि है, ज्यों तीतर को बाज ॥
समय खोय नर अन्त में रोया ।
ज्ञान त्याग अज्ञान में सोया ।
काल शिकारी सिर पर गाजे ।
साज द्वन्द का नित ही साजे । ।
गुरु सतसंग मिले जब प्रानी ।
सार की समझ बूझ तब आनी । ।
इष्ट धार चित करे कमाई ।
सहज हि काल फन्द छुट जाई ॥
निरख परख कर करतब पाले ।
संशय रहित काल घर घाले ॥
दोहागहे दयाल के चरन को, काल की चिंता त्याग ।
___आज सवारे काम को, लहे सुभाव सुभाग ॥
आज की कर चिन्ता कुछ प्रानी ।
काल रूप को ले पहचानी ।
काल काल है महा कराल ।
कठिन भयानक अति विकराल ।
काल सहस मुख सीस और पाँव ।
खेले काल सहस नित दांव ॥
शरन दयाल जो चित नहीं आवे ।
काल के भय से मुक्ति न पावे । ।
इसी काल की माया नार ।
ठौर ठौर में वह बटमार ॥
दोहाएक शत्रु भयभीत कर, चित उपजावे भर्म ।
यहां शत्रु दो संग है, समझ गुरु का मर्म ॥
आज का अवसर मिला है तुझको ।
मूल भरम में इसे न तू खो ॥
करले आज आज का काम ।
भज ले अविनाशी गुरु नाम ।
सांस सांस जो सुमिरे नाम ।
अन्त काल पावे विश्राम ॥
तज सुख निद्रा नींद का साज ।
जाग सबार आपनो काज । ।
नेह लगाले नाम रतन से ।
नाम रतन तू पाय जतन से ॥
दोहासांस सांस पर नाम ले, वृथा जनम मत खोय ।
को जाने इस सांस का, आबन होय न होय ॥
जो कोई काल की चिन्ता लावे ।
काल सहसमुख तिस को खावे । ।
दुविधा तज तज दे दुचिताई ।
ले तुरन्त सतगुरु शरनाई । ।
सतगुरु संग बांध जुग चाल ।
चोट न खाय न व्याये काल ॥
गोट बांध जुग चौसर चले ।
असह योग का सो दल दले ॥
लाल होय निज घर नो आवे ।
सहजहि अपना जनम बनावे । ।
दोहा बिन सतगुरु बिन गुरु नहीं, चित में आवे एक ।
पौ लख चौरासी लहे, सूझे भरम अनेक । ।
250.
सहज सत्त
439. असत न होय सत्त कहूँ कैसे ।
देखा अनदेखा दोऊ तैसे ॥
अपनी आँखी मैं नित देखू ।
बिन देखे का भेद न लेखू ॥
आँख खुली वह दृष्टि में आया ।
दृष्टि खुली वह गया गँवाया ।
ऐसी बात कहे को आय ।
कोई क्यों उसको पतियाय । ।
मैं जानूं रह रह अनजान ।
अनजानी कहूँ कैसे जान । ।
दोहा होने को तो है सही, अनहोना नहीं सोय ।
है नाहीं के बीच में, कैसे समझे सोय ॥
बिन कर करम करे व्यवहारा ।
मिन पग चले सो कोस हजारा ॥
विना नैन का दृष्टा भाई ।
नाक विना सूघे सब आई । ।
बिन जिभ्या बानी बहु गावे ।
बिन जिभ्या स्वाद रस खावे ॥
बिना कान श्रोता सज्ञानी ।
बिना मान के मान अभिमानी ।
बिना देह के देहाधारी ।
बिन अकार के सोई साकारी । ।
दोहा बिना रूप का रूप है, बिन अकार साकार ।
निराधार आधार जग, सब विधि किया विचार ॥
मुक्त न बद्ध न शुद्ध अशुद्ध ।
ज्ञानी बड़ वक्ता बड़ बुद्ध ॥
निरबुद्धि नहीं बुद्धिमान ।
किस विधि तिसका करू बखान ।
बिना चेत चेतन की खानी ।
अमन समन नहीं मन अनुमानी ॥
करता धरता सबका भाई ।
करता धरता सो न रहाई । ।
बिना सीस धारे महि धारा ।
नहीं असार वह सबका सारा ॥
दोहा अवगति की गति कठिन है, निरालम्ब निरदेव ।
व्यापक सुर अरु असुर में, अद्भुत अचरज देव ॥
फूल मध्य ज्यों बास समाना ।
मेंहदी की लाली परमाना ।
चकमक मध्ये आग विराजा ।
राज विचित्र करे महाराजा । ।
251 प्राण का प्राण जान का जान ।
देह अदेह विदेह बखान ॥
अर्थ धर्म काम का दाता ।
अधिकारी को मुक्ति दिलाता ॥
काम अकाम अनर्थ अर्थ जो ।
मुक्त अमुक्त है धर्म मर्म जो । ।
दोहा सब कुछ है और कुछ नहीं, कहा सुना नहीं जाय ।
कथन सुनन बिन जीव से, चुप भी रहा न जाय ॥
देस अदेस विदेस महाना ।
रूप अरूप स्वरूप बखाना ॥
अगुन सगुन गुनवान है सोई ।
मायातीत शक्तिधर होई ॥
जड़ नहीं चेतन कैसे कहूँ ।
जड़ चेतन लख मौनी गहूँ ।
जड़ चेतन में व्यापा सोई ।
बिन अधार ठहरे नहीं कोई ॥
सत तप मह जन ऋषि बखाने ।
सोह भुवः भूः मुनि जन जाने ।
दोहा जोत निरंजन सहसदल, त्रिकुटी पद ओंकार ।
सुन्न महासुन्न हंसगति, भवर का सोहंग सार ।
कहीं विराट कहीं अव्याकृत ।
कहीं हिरण्यगर्भ करे चरित्र । ।
कर चरित्र सब के मन भाया ।
सबसे मिल जुल रह विलगाया ।
अलग बिलग ताकी गति नाहीं ।
प्रतिविम्बित रहे बुद्धि माहीं ॥
मति नहीं लखे सुमति लख पावे ।
बिनती निगम गम एति बतावे ॥
एति नेति दोनों से न्यारा ।
पार अपार वार के वारा ॥
दोहा सत्त पुरुष सतलोक का, अगम अलख निरवान ।
राधास्वामी धाम में, राधास्वामी जान ॥
सहज भेद नं 1
440 1 जो कोई घर की ओर सिधावे ।
सहज भेद युक्ति चित लावे । ।
जल थल पावक गगन समीरा ।
पंच तत्व से बना शरीरा । ।
पंच तत्व के पंच अस्थान ।
कोई कोई जाने चतुर सुजान ॥
गुदा चक्र में पृथवी बासा ।
इन्द्री में जल करे निवासा ॥
नाभी अग्नि हृदय में पवन ।
कंठ अकास बसे रह मौन ॥
दोहा पाँच चक्र यह तत्व के, बसते पिंड मझार ।
____इन्हें त्याग आगे चले, छटे चक्र के द्वार ॥
छटा चक्र शिव नेत्र कहावे ।
कोई कोई तीजा तिल कह गावे ॥
छटे चक्र में जीव निवासा ।
जीव ब्रह्म संग करे बिलासा ॥
रुद्र नेत्र जीव का धाम ।
तिस पर सहसकमलदल ठाम ।
दोनों मिल एक साथ रहाई ।
इनकी गति कोई बिरला पाई ॥
छटे सातवें चक्र हैं पास ।
जीव ब्रह्म मिल करें निवास ॥
दोहा शब्दयोग साधन करे, रुद्र नेत्र में आय ।
सहजहि सहसकमल में, ब्रह्म की संगत पाय ॥
आगे का सुन लीजो भेद ।
मिटे भरम संशय का खेद ॥
जीव चक्र में चित को जोड़ो ।
पुतली उलट गगन को फोड़ो ॥
श्याम कंज का तिमिर बिनासे ।
तब विराट का रूप प्रकासे । ।
यह साधन अति सुगम सुहेल ।
जीव विराट का समझो मेल ॥
जगमग ज्योति दृष्टि में आवे ।
देख देख मन अति हरखावे ॥
दोहा यह पहला अस्थान है, बिरला भेदी जान ।
विन सतगुरु की दया के, नहीं कोई पावे ज्ञान । ।
जाग्रत स्वप्न सुषप्ति तीन ।
तीन अवस्था जीव के चन्हि । ।
तीन अवस्था के सुन नाम ।
तेजस विश्व प्राज्ञ से काम ॥
जाग्रत विश्व स्वप्न है तेजस ।
सुषुप्ति प्राज्ञ नाम है सह रस ॥
ब्रह्म की तीन अवस्था जान ।
सृष्टि स्थिति प्रलय पिछान ॥
तीन अवस्था नाम हैं तीन ।
जो नहीं जाने मति का हीन ॥
दोहा सृष्टि विराट का नाम है, स्थिति अव्याकृत ।
हिरण्यगर्भ प्रलय दशा, यह अचरजी चरित्र ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
नाम रूप से है बिलगान ।
ब्रह्म महा सर्वज्ञ कहावे ।
जीव नाम अल्पज्ञ का पावे ॥
सिंध मध्य ज्यों बुन्द समाना ।
तैसे हि ब्रह्म जीव अस्थाना ॥
बिलगाये नहीं बिलगें सोई ।
एक साथ दोउ मिल एक होई । ।
जीव रहे माया आधीन ।
मायाधीश ब्रह्म परवीन । ।
दोहाजीव ब्रह्म का भेद यह, सार तत्व का सार ।
बिन विवेक समझे नहीं, फुरे न हृदय विचार ॥
पिंड देश में जीव रहाई ।
देश ब्रह्मड ब्रह्म ठकुराई ।
ब्रह्म जगत त्रिलोकी नामा ।
एक अनेक बीज के धामा ।
जगत अनेक विराट महाना ।
अव्याकृत त्रिकुटी परमाना ॥
हिरण्यगर्भ द्वत अद्वत ।
भेद अगम कोई ज्ञानी देत ।
बीज रूप तुम इसको जानो ।
गुप्त बात सुन मन से मानो ॥
दोहाइष्ट नहीं पद ब्रह्म का, सन्तन किया विचार ।
तीन छोड़ चौथा गहे, तब पाव कुछ सार ॥
सहसबाहु सहसासिर राजा ।
सहसानन बन कौतुक साजा ॥
माल सूत ज्यों मनके रहें ।
त्यों विराट सबको संग गहें ।
यह विराट का रूप है भाई ।
संत मिले तब भेद बताई ॥
अव्याकृत है ओम् का इष्ट ।
समझ न पाव मनुष कनिष्ट ॥
बिन पग चले हाथ बिन कामा ।
नैन बिना देखे सब ठामा ।
दोहा हिरण्यगर्भ अद्वैत पद, है वह एक और दोय ।
__ जैसे बीज के मध्य में, सब रहे आपा खोय ॥
भेदी सुनो भेद की बानी ।
जा से छूटे द्वन्द गलानी ॥
सहसकमलदल जोत निरंजन ।
सो विराट का रूप समझ मन ।
त्रिकुटी में अव्याकृत रहाई ।
प्रणव ॐ की पदवी गहई ॥
हिरण्यगर्भ रहे शून्य मझार ।
बीज रूप सोई अपरम्पार ॥
तीन चक्र यह मस्तक मध्य ।
विन बूझे क्या जाने बद्ध ।
दोहासुन्न के फिर दो भेद हैं, सुन्न महासुन्न जान ।
___यह मस्तिक में गुप्त हैं, कर साधन पहिचान ।
सुन्न देश में है सविकल्प ।
महासुन्न नहीं कल्प विकल्प ॥
उत्पति बीज यहां से आव ।
स्थिति सृष्टि का रूप दिखावे ॥
ज्यों सुषप्ति का होय उत्थाना ।
सुन्न से त्यों सृष्टि उत्पाना ।
एक सवल है एक है शुद्ध ।
लख पात्र’ कोई ज्ञानी बुद्ध ।
सृष्टि स्थिति लय व्यौहारा ।
तीनों हि समझो बीज पसारा ॥
दोहाकाल चक्र कौतुक महा, जाका आदि न अन्त ।
भूले सुर नर ताहि लख, पाया मूल न तन्त ।
सुन्न के परे काल बरियार ।
भँवरगुफा रहा बैठक मार । ।
ज्यों कुम्हार निज चक्र चलाने ।
गढ़ बासन फिर ताहि नसावे । ।
जैसे सिंध में लहर बूंद जल ।
तैसेहि काल में चल और निश्चल ॥
कभी द्वन्द और कभी निरद्वन्द ।
काल चक्र का फेला फन्द ॥
काल में जीव ब्रह्म लपटाने ।
द्वैत अद्व त में रहे लुभाने । ।
दोहासिन्ध मध्य ज्यों लहर है, बुद बुद नीर तरंग ।
काल चक्र में सब रहे, पाय सुसंग कुसंग ॥
काल चक्र के परे अधार ।
सतपद धुरपद अगम अपार ॥
अधिष्ठान कूटस्थ समाना ।
अहिरन लोह के रूप पिछाना ॥
नहीं वहां एक न दोय न तीना ।
नहीं वहां सिंध तरंग नवीना ॥
नहीं कैत अद्धत का भाव ।
नहीं अज्ञान न ज्ञान का दाव । ।
‘है पद’ सतपद शब्द के योग ।
नहिं वेदान्त न साँख्य न योग । ।
दोहामति न लखे जेहि मति लखे, कुमति सुमति मति नाहिं ।
अनुभव सिद्ध अलख अगम, राधास्वामी माहिं ॥
सहज भेद नं 2
441. सहज सहज की चाले चाल ।
तब समझे गति माया काल ।
शब्द योग की करे कमाई ।
कुछ दिन गुरु संगत लौ लाई ॥
गुरु बिन पावे भक्ति न ज्ञान ।
गुरु बिन हिये न मोह न मान । ।
गुरु बिन सार तत्व क्यों बूझे ।
गुरु मिलें तो सब कुछ सूझे ॥
गुरुमत हो मनमत को त्याग ।
गुरु बिन पंथ के पंथ न लाग ॥
दोहा कबीर निगुरा ना मिले, पापी मिलें हजार ।
एक निगुरे के सीस पर, लख पापी का भार ॥
गुरु वही जो शब्द सनेही ।
गुरु बिन दूसरे और न सेई । ।
लक्ष का लक्ष वाच का वाच ।
गुरु का रूप लख भक्ति में राच । ।
गुरु संगत है सत का संग ।
सत के संग धार सत रंग ॥
गुरु की भक्ति रहे निष्काम ।
धर्म अर्थ मुक्ति सत काम ॥
गुरु से पाव बिना प्रयास ।
ताते कर गुरु दया की आस ॥
दोहागुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान ।
गुरु विन नाम हराम है, जाय पूछो वेद पुरान ।
जब कुछ दिन सतसंग अभ्यास ।
तब गुरुमुख गुरु का निज दास ॥
गुरु हर बैठ सहारा देव ।
चेला बेहद चढ़ सुख लेवे ॥
हद बेहद के परे ठिकाना ।
सत्त लोक सतगुरु अस्थाना ॥
वहां गुरु का पात्र भेद ।
नहीं वहां कथा कतेब न वेद ॥
यहां कथा वहां कथा नहीं है ।
कैसे कोई समझे कथे झूठी है ।
दोहा नहीं कथनी का देश वह, अनुभव गति मन सार ।
सो तो निश्चय पाइये, सतगुरु के उपकार ॥
अकथ अलौकिक अगम कहानी ।
जान अजान सुजान अजानी ॥
नहीं वह सत्त असत्त कहावे ।
बिना कहे क्यों समझ में आये ॥
समझ बूझ की पहुँच से पार ।
समझ बूझ तिस के आधार ॥
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ।
नहीं ऊष्ण और नहीं वह तत ॥
अन्धे हाथी हाथ टटोले ।
कहते निज मन भिन्न भिन्न बोले । ।
दोहासबमें है सबसे पृथक, है नहिं नहिं है सोय ।
गुरु की दया अपार बिन, लख पाव नहीं कोय ॥
अकथ कहन में कैसे आवे ।
बिना कहे कोई क्या बतलाये ॥
सैन बैन की युक्ति न्यारी ।
हद बेहद चढ़ कोई विचारी ॥
नहीं वह बुन्द न सिंध समान ।
नहीं मिलाप गम नहीं अलगान ।
रूप अरूप सरूप बिहीना ।
राव रंक नहीं दीन प्रवीना ॥
जीव न ईश न ब्रह्म न माया ।
नाम अनाम स नाम कहाया । ।
दोहाजीव मुक्त न विदेह है, कसे कहूँ सुझाय ।
राधास्वामी सैन लख, अनुभव में कुछ आय । ।
8 सहज कीर्तन ,
442. कथा कीर्तन का व्यवहार ।
सहज करे भवसागर पार ॥
कथा चित्त उत्साह बढ़ाने ।
सत मारग की राह दिखाने ।
जिसका निस दिन कथा का नेम ।
ता संग अवश्य कीजिये प्रेम ॥
नहीं कीर्तन जिसको प्यारा ।
सो तो भरम रहा संसारा ॥
करम बोझ लादे सिर ऊपर ।
जग में जीव ज्यों खर कूकर ॥
दोहाकथा कीर्तन जगत में, उत्तम साधन जान ।
धीरे धीरे सहज में, उपजाव सत ज्ञान ॥
जो नित कथा करे चितलाई ।
बिगड़ी बनत बनत बन जाई । ।
कथा प्रेम प्रतीत की खानी ।
श्रद्धा की जड़ सन्त बखानी ॥
कथा कीर्तन कथा प्रसंग ।
करे जो चढ़े परमारथ रंग ॥
काम कथा से उपजे काम ।
नाम कथा पावे गुरु नाम ॥
एक चौरासी धार बहावे ।
दूजा काई किनारे लावे । ।
दोहाकथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे सनेह ।
जीवन मुक्त गति सोलहे, नहीं यामें संदेह ॥
रस रस सोत से पानी आवे ।
कथा प्रसंग हृदय गुन पावे ॥
कथा दृढ़ावे नाम की आस ।
बिना कथा नर फिरे उदास ।
नहीं प्राप्त जाको सतसंग ।
सो नित धारे कथा प्रसंग ॥
मलिन वासना मन से जावे ।
शुभ इच्छा सहजहि उपजावे ॥
शुभ विचार शुभ इच्छा साथ ।
ज्ञान रतन धन आव हाथ ॥
दोहाकथा ज्ञान की भूमिका, पहिली सीढ़ी जान ।
तिसके पीछे ज्ञान है, साध बचन परमान ॥
कथा कीर्तन कर गुरु संग ।
बिन गुरु निष्फल कथा प्रसंग ॥
कथा कीर्तन जोग अष्टांग ।
और सकल बहु रूप का सांग ॥
गुरु समीप बैठे सोई आसन ।
त्याग ग्रहन यम नियम का साधन ।
गहे बचन सो प्राणायाम ।
सांस सांस ले गुरु का नाम ।
बार बार जो करे विचार ।
सोई जानो प्रत्याहार ॥
धारन करे सोई धारना ।
ध्यान धारना में मन मारना ।
गूढ ध्यान है गूढ़ समाधी ।
कथा कीर्तन मिटे उपाधी । ।
दोहाकथा कीर्तन नित किये, मन बाढ़े गुरु प्रीत ।
प्रीत प्रेम की वृद्धि से, उपजे दृढ़ परतीत ॥
कथा कीर्तन जो नहीं करे ।
बहु दुख व्यापे दुख में मरे ।
नित प्रति कथा कीर्तन करना ।
प्रीत प्रेम चित बासन भरना । ।
कथा कीर्तन सबका सार ।
सहज जनम का होय सुधार ।
पढ़े सुने जो नित गुरु बानी ।
बने विवेकी साधु ज्ञानी ।
कथा कीर्तन नहीं कठिनाई ।
सहज सहज में होय भलाई । ।
दोहाराधास्वामी की या, कर गुरु का सतसंग ।
कथा कीर्तन संग गुरु, फिर नहीं चित हो भंग ।
सहज गुरु विचार
443. राधास्वामी पद में कोटि प्रणाम ।
राधास्वामी राधास्वामी धारा नाम ।
गुरु स्वरूप धर जग प्रगटाने ।
निजपद अपना आप बखाने ।
राधास्वामी द्वन्द का फंद कटाया ।
चार खान के पार लगाया ।
आप आप में आप दिखाया ।
आप आप को आप लखाया । ।
‘मैं छुड़ाय ‘तू’ में ठहराया ।
‘मैं’ ‘तू’ का फिर भेद मिटाया ।
दोहा भली भई जो गुरु मिले, मन का भरम नसान ।
मन का भरम है फन्द जम, चार योनि की खान ।
गुरु समुद्र सिख बुन्द समान ।
गुरु में लाभ बिना गुरु हान । ।
हानि लाभ का संशय मेटा ।
मोर तोर का सिर किया हेटा ॥
राधास्वामी धर कुम्हार का भेस ।
घड़ सिख कुम्भ दिया उपदेश ।
घड़ धड़ मन के खोट निकारे ।
वचन चोट दे ताहि संवारे ॥
माटी ले जब कुम्भ सजाया ।
वस्तु विचित्र अपार बनाया । ।
दोहा धर्म दया श्रद्धा क्षमा, प्रेम प्रतीत पियार ।
राधासामी की दया, चित्त पात्र लिया धार ॥
गुरु का निरख आँख और माथा ।
सत का नूर रहे जिस साथा । ।
अस चिन्ह देख करे पहिचान ।
जाके मन सतगुरु का ज्ञान ॥
अन्धा काना ऐंचा तान ।
आँख दोष यह ले पहिचान ॥
सिमटा माथा कुबुद्धि निशानी ।
ऐसे गुरु के संग में हानी ॥
द्रोह ईर्षा द्वेष की खान ।
समझ बूझ गुरु संगत ठान ॥
दोहा पानी पीजिये छानकर, गुरु को कीजे जान ।
यह लक्षण गुरु रूप का, सन्तन किया बखान ।
शब्द भेद के मरम को जाने ।
सन्त मता का सार बखाने ।
परिचय देवे सैन बुझाये ।
बचन प्रभाव युक्त समझावे ॥
माँग ताँग नहीं व्यवहार ।
ऐसे गुरु से सहज सुधार ॥
ममता नहिं नहिं मन हंकार ।
केवल परमारथ आधार ॥
अन्तर मुखी सिखाने साधन ।
परिचय दे कराने निध्यासन ॥
दोहा ऐसे गुरु के संग से, लाभ होय ततकाल ।
माया का संकट कटे, अन्तर जीव निहाल ॥
गुरु के पद जब हो परतीती ।
तब तो सीख शब्द मति रीती ॥
सुमिरन भजन ध्यान लौ लाई ।
कर अन्तर घट सहज चढ़ाई ॥
घट चढ़ गुरु की गति मति देख ।
निरख परख लख अगम अलेख ॥
सहज जोग थोड़े दिन साध ।
मेट द्वन्द के कठिन उपाध ॥
सहज जोग सहज है युक्ति ।
साधन कर ले जीवन मुक्ति ।
दोहा राधास्वामी की दया, कमल नीर व्यवहार ।
जग में रह जग करम कर, नहीं व्यापे संसार ।
सहज शब्दार्थ
444. जैसे सहज संत का पन्थ ।
तैसे उनके सहज है ग्रन्थ । ।
सहज बात और सहजहि बानी ।
सहज ज्ञान और सहज अनुमानी ॥
साधारण वार्ता विलाप ।
साधारण गत और अलाप ॥
खींच तान नहीं तोड़ मरोड़ ।
नहीं कहीं जोड़ नहीं कहीं तोड़ ॥
जैसा शब्द वैसा ही अर्थ ।
अर्थ का कभी न करें अनर्थ ॥
दोहा शब्द अर्थ के बीच में, नहीं युक्ति नहीं दाव ।
जो बोल सो सरल है, सरल स्वभाव उपाय । ।
सतसंग कहिये सत्त का संग ।
सत जीवन और संग प्रसंग । ।
सत जीवन कहिये गुरु देव ।
तिन का संग करो निर भेव ॥
सत का अर्थ जो दजा हो ।
भरम फांस में फंस कर मरे ॥
बिन सत संग विवेक न आवे ।
बचन बिना कोई क्या समझाने ।
जीवन गुरु के संग में जाय ।
सुन गुन बचन के जनम बनाय ॥
दोहा यह सतसंग का अर्थ है, नहीं सो कथा विलाप ।
सत जीवन के मेल को, कहिये सहज मिलाप । ।
उप है निकट और आसन बैठना ।
नहीं वह कर्म धर्म में ऐंठना ॥
यह उपासना का सिद्धांत ।
निकट बैठ मन को कर शान्त । ।
प्रश्न पूछ कर उत्तर लीजे ।
उत्तर सुन चित उसको दीजे । ।
और उपासना का अर्थ बताय ।
सरल जीव को भरम फंसाय ॥
भर्म फंसाय जनम को नाशे ।
समझ पड़े नहीं भर्म न आशे ॥
___ दोहा नहीं उपासना और कोई, कहिये तहिं सतसंग ।
गुरु समीप आसन करे, धारे गुरु का रंग ॥
उप है निकट देस अस्थाना ।
यह उपदेश का अर्थ बखाना ॥
सहज योग की करे कमाई ।
गुरु गम लहे देश बदलाई ॥
तीन देश में पिंड मझार ।
काया काल दयाल विचार ॥
काया पिंड देश है भाई ।
काल देश ब्रह्मांड कहाई ॥
देश दयाल काल के परे ।
चेतन शुद्ध का निर्णय करे ॥
दोहा यह उपदेश का अर्थ है, सुन लीजे सब कोय ।
देश न बदले सुरत के, परमारथ नहीं होय ॥
बृः बढ़ना और मनन मन ।
सोचे बढ़े “ब्रह्मतेहि भिन ॥
सोचे बढ़े सो ब्रह्म कहाने ।
यही अर्थ सन्तन को भाव । ।
ब्रह्म अधिष्ठित अचल न होई ।
नाम अर्थ भेद कहो सोई ॥
ब्रह्मांडी मन सोई ब्रह्म ।
जो समझे मन रहे न भर्म ॥
अ उ म ओंकार सो जाना ।
सतरज तम का रूप पिछान ॥
दोहा ब्रह्म भेद निर्णय किया, चित में आने मान ।
माने कसे जीव यह, जब लग अर्थ न जान ॥
परब्रह्म है परे का ब्रह्म ।
शुद्ध सतोगुन का लख मर्म ।
महाकाल की गति मति सोई ।
ब्रह्म में गति मति दोनों होई । ।
गति है चाल मति है बुद्धि ।
सोच समझ कर मनकी शुद्धि ।
ब्रह्म न परब्रह्म है इष्ट ।
इनको जान के हो न कनिष्ट ॥
ऊँचा इष्ट सन्त मत का ये ।
कर सतसंग तो समझे आशे ।
दोहा सतपद धुरपद इष्ट है, शब्द योग कर जान ।
___ऊंचे चढ़ सत धाम ले, सार तत्व पहिचान ॥
जीव जो जीवन की करे आशा ।
ईश ब्रह्म निज भाव प्रकाशा ।
जीव पिंड धारी अल्पज्ञ ।
दृष्टि ब्रह्मांड से वह सर्वज्ञ ॥
जीव ब्रह्म का इतना भेद ।
नहीं तो दोनों रहें अभेद ॥
यहां जाग्रत और स्वप्न सुषुप्ति ।
वहां प्रलय सृष्टि और स्थिति ॥
तेजस विश्व प्राज्ञ है जीव ।
तीनहि नाम ब्रह्म लख पीव ॥
सोरठा अन्तरर्यामी विराट, हिरण्यगर्भ यह ब्रह्म है ।
लख कर इनका ठाठ, जीव ब्रह्म का भेद भिन्न ॥
‘मा’ है माप और ‘या’ है यंत्र ।
यह माया का अर्थ स्वतन्त्र ॥
यंत्र से जो सब वस्तु को मापे ।
माया भेद संत यह थापे ।
माया और नहीं वह बुद्धि ।
यह व्यष्टि रहे वहां समष्टि ।
नहीं वह हुई नहीं अनहुई ।
व्यक्त अव्यक्त के रूप है सोई ॥
ब्रह्म के साथ शक्ति बन रहे ।
जीव के संग बुद्धि सब कहे ॥
दोहा माया का यह अर्थ है, सन्तमता के भाव ।
कर सतसंग विवेक से, तब मन आवे दाव ॥
गुरु महिमा
445. गुरु पूजो गुरु पुजवाओ ।
गुरु बिन कोई देव न ध्याओ ॥
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
गुरु शेष धनेश गणेशा ॥
262. गुरु ब्रह्म सच्चिदानन्दम ।
गुरु व्यापक अमित अखंडम ॥
गुरु परब्रह्म अविनाशी ।
गुरु सबके घट घट बासी ।
गुरु परम तत्व परमाना ।
गुरु ज्ञानी ज्ञाता ज्ञाना ।
गुरु का दरस आंख से कीजे ।
गुरु के चरणों में चित दीजे ॥
गुरु सुमिरो दिन और राती ।
गुरु मेट सब भव उत्पाती ।
गुरु रूप से प्रेम बढ़ाना गुरु आगे नित सीस झुकाना ॥
गुरु पर तन मन धन अर्पण ।
गुरु पद सब करो समर्पन ।
गुरु भक्ति सबका सारा ।
गुरु अस्तुति कर करो बिचारा ॥
गुरु ही गुरु निसदिन भजना ।
गुरुमुखता गुरु से लेना ॥
गुरु की महिमा है भारी ।
गुरु जगजीवन हितकारी ॥
गरु प्रेम अमी मतवाले ।
नहीं पड़ें काल के पाले ॥
गरु संगत में नित जाओ ।
गुरु से परमारथ पाओ ॥
गुरु बिन नहीं करम न धरमा ।
गरु बिन नहीं भक्ति का मरमा ।
दोहाजो रांचे गुरु रूप पर, दुख न सहे संसार ।
राधास्वामी नाम ले, उतरे भव जल पार ॥
446 सुरत है पात्र शब्द है धार ।
सुरत शब्द के है आधार ।
ज्यों बासन में जल ठहराय ।
शब्द सुरत में रहा समाय ॥
अंधी सुरत शब्द बिन जान ।
शब्द सुरत की जान और प्रान ॥
शब्द प्रेम सुरत शब्द की प्रेमी ।
शब्द नेम सुरत शब्द की नेमी ।
शिव शक्ति का ज्यों व्यवहार ।
सुरत शब्द संग करे बिहार । ।
विष्णु लक्ष्मी दोउ मिल एक ।
सुरत शब्द त्यों नहीं अनेक । ।
ब्रह्मा शब्द सुरत गायत्री ।
ऋषि सत शब्द सुरत सावित्री । ।
शब्द नाद घट करे पुकार ।
सुरत सुने चित वृत्ती धार ॥
सुरत स्मृति आस विश्वासा ।
शब्द है निश्चय त्रिमल प्रकाशा ॥
जग जग जो नहीं चहे त्रास ।
कर घट सुरत शब्द अभ्यास ॥
सुरत शब्द का आतम जोग ।
सुरत दुखी लख शब्द वियोग । ।
सुरत शब्द की जग में रचना ।
सुरत शब्द बिन बीन न बजना ॥
प्रगटे शब्द जो लिंगाकार ।
अर्घ बन सुरत सहित विचार । ।
संतन सुरत शब्द मत गाया ।
जो माना तेहि पार लगाया ।
सुरत शब्द की अकथ कहानी ।
सुरत शब्द मिल ही निर्बानी ॥
दोहासुरत साध कर शब्द सुन, अन्तर बाहर दोय ।
राधास्वामी की दया, नहीं भरमावे कोय ॥
447. शब्द अपार शब्द है पार ।
शब्द का नहीं है वारापार ॥
शब्द की महिमा कही न जाय ।
शब्दहि मारे शब्द जिलाय ॥
शब्द की जग में सारी रचना ।
शब्द राग धुन शब्दहि वचना ।
शब्द से सब होते व्यवहार ।
शब्द है परमारथ का सार ।
शब्द ब्रह्म और माया शब्द ।
शब्द जोति और छाया शब्द ।
शिव है शब्द शब्द है शक्ति ।
शब्द ज्ञान और शब्द है भक्ति ।
धरम करम सब शब्दहि शब्द ।
मरम भरम सब शब्दहि शब्द ॥
शब्द है गन और शब्द अगन है ।
शब्द त्रिकुटी शब्दहि सुन्न है ।
शब्द औषधी शब्द है रोग ।
शब्द बियोग शब्द है योग ।
शब्द समझ और बूझ है शब्द ।
बुद्धि शब्द और सूझ है शब्द ॥
शब्दर्हि बन्धन शब्दहि मुक्ति ।
शब्द उपाय शब्द है नीति ॥
शब्द करे सबका निरवार ।
शब्द फसावे भव मझार ॥
शब्द की समझ बूझ तब आवे ।
शब्द गुरु जब चरन लगावे ॥
बिना शब्द निष्फल सब काम ।
शब्द से मिले परम पद धाम ॥
शब्द सिंध और शब्द है मीन ।
शब्द सबल और शब्द दीन ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया ।
शब्द योग की रीत सिखाया ।
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, ले सतगरु का नाम ।
जीते जी इस जनम में, चढ़ राधास्वामी धाम ॥
448. ले सतगुरु से नाम की भीख ।
सुरत शब्द का साधन सीख ॥
तिल को फोड़ सहसदल आयो ।
फिर त्रिकुटी ओंकार को पाओ ॥
त्रिकुटी ऊपर सुन्न अस्थान ।
नहीं मंडली शोभा मान ।
मानसरोवर कर स्नान ।
होकर शुद्ध ले गुरु का ज्ञान ।
गंग जमन सरस्वती की धारा ।
अन्तर लख हो देह से न्यारा ॥
महासुन्न पर आसन मार ।
सहज समाध का कर व्यवहार ॥
कुछ दिन सुन्न समाध अवस्था ।
भवरगुफा की देख व्यवस्था ।
सोहंग धुन सोहंग गति जान ।
फिर आगे का साधो ज्ञान ॥
आगे अलख अगम मैदाना ।
अद्भुत ग्राम अद्भुत थाना ।
लख लख अलख अगम की गम ले ।
फिर राधास्वामी को चित दे ।
यही सुन्न का है निज ठाम ।
सुरत शब्द में ले विश्राम । ।
दोहा राधास्वामी योग कर, शब्द सुरत व्यवहार ।
शब्द सुरत मिल एक जब, तब माया रहे हार । ।
दोहे ॐ
449. आज्ञाकारी दास मैं, नहीं ममता अभिमान ।
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, त्याग मोह मद मान ॥1 ॥
वह स्वामी मैं दास हूँ, जहां भेजे तहां जाउँ ।
हर्ष शोक में सम सदा, ले सतगुरु का नाउँ ॥2 ॥
जो चाहे सो करे वह, करता धरता वह ।
मुझको दुख व्यापे नहीं, दुख का हरता वह ॥3 ॥
काला पानी क्यों गहे, क्यों नहीं सागर क्षीर ।
परख मौज कर बन्दगी, सेवक धीर गम्भीर ॥4 ॥
जहां चाहे गुरु हैं वहां, करे तहां सतसंग ।
प्रेम भाव जो मन बसे, कबहुँ न हो चित भंग ॥5 ॥
धीरज धरकर जतन कर, व्याकुल चित्त न होय ।
कुछ दिन के अभ्यास से, बदले मन ढंग सोय ॥6 ॥
जग में आया क्या भया, नहीं होनी है तोर ।
कर प्रार्थना हृदय में, फिर आवेगा ठौर ॥7 ॥
दया की आस भरोस कर, आस भाव चित धार ।
आस भाव है दास का, दास मौज आधार ॥8 ॥
राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाव ।
राधास्वामी सुमिर नित, पाव अपार स्वभाव ॥6 ॥
450. सुख का जीवन पाय कर, मन का भया मलीन ।
हसी आवे मोहि देखकर, जल में प्यासी मीन ॥1 ॥
मानुष तन जब मिल गया; सो सुर दुर्लभ जान ।
साधन सहज उपाय ते, लह सुख भक्ति सुज्ञान ॥2 ॥
सत के संग में बैठकर, सुन सतसंग के बैन ।
योग युक्ति गुरु भक्ति का, तब पायेगा नैन ॥3 ॥
बिन सतसंग विवेक नहिं, बिन विवेक नहिं ज्ञान ।
बिन गुरु सतसंगत नहीं, गुरु सत रूप पिछान ॥4 ॥
सतसंगत अभ्यास दोऊ, नर का जनम बनाय ।
राधास्वामी नाम ले, सोई सहज उपाय ॥5 ॥
451. सत श्रद्धा विश्वास से, सो आस्तिक का रूप ।
बिन श्रद्धा विश्वास के, नास्तिक गिरा भवकूप ॥1 ॥
अपनी अपनी क्या करे, अपना आपा ठान ।
सेवक मौज अधीन है, मौजवान गुनवान ॥2 ॥
गुरु चरनन में सीस दे, जो न उभारे सीस ।
पहुँचेगा गुरु धाम में, सेवक बिस्वा बीस ॥3 ॥
सीस दिया नहीं आपना, सो नहीं मौज अधार ।
अपना आपा ठानकर, क्यों न सहे सिर मार ॥4 ॥
गुरु समरथ ने बांह गही, करेंगे पूरा काज ।
क्यों निचिंत होता नहीं, बांह गहे की लाज ॥5 ॥
संस्कार गुरु भक्ति का, गुरु दयाल ने दीन ।
काम करेंगे आपना, मन क्यों किया मलीन ॥6 ॥
निश्चय कर विश्वास कर, नित सतसंग विलास ।
राधास्वामी दीन हित, पूरी करेंगे आस ॥7 ॥
जो करना है कर सदा, दुविधा दुर्मति खोय ।
मन न दुखावे किसी का तू , संत का मारग सोय ॥8 ॥
समझ बूझ कर बन्दगी, मिथ्या बचन न बोल ।
गुरु के शब्द अमोल को, हिये तराजू तोल ॥6 ॥
धिरता समता चित्त धर, भक्ति साज दल साज । ।
सेवक का होता नहीं, जग में कभी अकाज ॥10 ॥
दुविधा दुर्मति त्याग दे, ले राधास्वामी नाम ।
गुरु समरथ की दया से, एक दिन पूरा काम ॥11 ॥
अरदास ( साखी)
452. गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि परनाम ।
गुरु के पद में मुक्ति पद, सतपद धुरपद ठाम ॥1 ॥
गरु बानी सत मान सर, मैं तो हंस स्वरूप ।
अमृत पान सदा करू , त्याग भरम भव कूप ॥2 ॥
गुरु बानी सुख दायनी, निर्वानी निज सार। ।
बोलू तो गरु बचन नित, महिमा अगम अपार ॥3 ॥
गुरु संगत जग दुख मिटा, सूझा अलख अरूप ।
गुरु में गुरुपद तत्व सब, गुरु सत मत के भूप ॥4 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, निगम अगम सद्ग्रन्थ ।
गुरु पद नख में सब बसें, वेद शास्त्र शुचि पंथ ॥5 ॥
453. ईश ब्रह्म अवगत कला, उन्मनि लगी समाध ।
जब मस्तक गुरु पद झुका, पाया अगम अगाध ॥1 ॥
सगुन अगुन गुन सम्पदा, माया ब्रह्म विचार । ।
गुरु संगत मिल सब लखें, तज अविवेक विचार ॥2 ॥
सहसकमलदल जोति मय, त्रिकुटी ओउम् अस्थान ।
सुन्न भवर सत धाम गति, गुरु के वचन निशान ॥3 ॥
शब्द अशब्द अनाम अज, अद्भुत विमल प्रकाश ।
एक गुरु के बचन में, आस सुआस सुपास ॥4 ॥
विज्ञानी ज्ञानी यती, योग युक्ति के दाव ।
बिन गुरु ममें न पावहीं, कोटिन करे उपाव ॥5 ॥
454. जप तप संयम बहु किये, घूमे देश विदेश ।
भटक भटक भटकत मरे, बिन गरु के उपदेश ॥1 ॥
विद्या बुद्धि चातुरी, भूठा वाद विवाद ।
गुरु पद मिल सबका तजा, लागी सुन्न समाध ॥2 ॥
भरम मिटा संशय गया, खुली ममे की खान ।
जड़ चेतन ग्रन्थी खिसी, जब पाया गुरु ज्ञान ॥3 ॥
पढ़ लिख दुविधा में फंसे, मन तो भया अशान्त ।
जब आये गुरु चरण में, बुद्धि भई निरभ्रान्त ॥4 ॥
तीरथ में पाषान जल, बन परबत दुख धाम ।
बिन गुरु कृपा न गम लखे, मिले न सत सतनाम ॥5 ॥
455. साध समान न कोई सगा, सन्त समान न मीत ।
गुरु सम हितकारी नहीं, लहे न प्रेम प्रतीत ॥1 ॥
विद्या पढ़ पंडित मुये, अटके माया जाल ।
ज्ञान कथन ज्ञानी थके, शब्द जाल जंजाल ॥2 ॥
वेद पढ़ा तो खेद अति, शास्त्र शासना पाय ।
ऐसा कोई ना मिला, सहजे लिया छुड़ाय ॥3 ॥
ऐसे तो सतगुरु मिले, दीनबन्धु सुदयाल । ।
बांह पकड़ खींचा अधर, आपहि लिया सभाल ॥4 ॥
हाथी अटका कीच में, केहि विधि निकसे आय। ।
जितना बल पौरुष करे, उतना ही धस जाय ॥5 ॥
456. निज बल त्याग भरोस गुरु, आस कुआस निरास ।
प्रगटे पल में सतगुरु, छुटा फंद से दास ॥1 ॥
ऋद्धि सिद्धि नौ निद्धि यह, माया ही के भर्म ।
सिद्ध साधक भूले सकल, लखा न निज पद मर्म ॥2 ॥
उरझ उरझ उरझे महा, अब सुरझावे कौन ।
मुरझावन हारा गुरु, कर जो संगत गौन ॥3 ॥
ना विद्या ना बांह बल, ना मन में हंकार ।
ना भक्ति ना प्रीत रुचि, सतगुरु करो उदार ॥4 ॥
गुरु से कोई नहीं बड़ा, यह जाना अब जान । ।
गुरु चरनन पर वारिया, देह गेह मन प्रान ॥5 ॥
457. गुरु से भेद जो मिल गया, सीस उतारा आप ।
चरन शरन बल बल गये, मिटा देह का पाप ॥1 ॥
मानुष जनम अमोल था, नहीं तोल नहीं मोल ।
सुफल भया जब गुरु मिले, सुनी जो अबुत बोल ॥2 ॥
एक आस गुरु चरन की, एक भरोसा मन ।
एक दास की बीनती, एक ही प्रेम जतन ॥3 ॥
प्रेम गुरु से कीजिये, गुरु जो करे सहाय ।
जो गुरु शरणागत भया, फिर नहीं भटका खाय ॥4 ॥
आप मिले आपहि कहा, आपहि लिया बुझाय । ।
आप आप मिल आप है, आप आप समझाय ॥5 ॥
458. गुरु समुद्र हैं अगम गति, लहर देव मुनि बृन्द ।
ईश ब्रह्म हैं धार सम, जीव जन्तु सब बुन्द ॥1 ॥
प्रगट प्रगट प्रगटा प्रगट, आप जीव के काज ।
अब तो मैं गुरु का भया, त्याग जगत की लाज ॥2 ॥
गुरु तड़ाग मैं कमल जिमि, शोभा पाया आय ।
जग में फैली बास भली, गुरु चरनन बल जाय ॥3 ॥
गुरु तो चन्द्र स्वरूप हैं, मैं चकोर बलवान ।
पल पल गुरु मूर्ती लखू, कहीं और नहीं ध्यान ॥4 ॥
गुरु गम सिंध अगाध में, करूं सदा अस्नान ।
त्यागू जग का मैल सब, पाऊ गति मति ज्ञान ॥5 ॥
459. मैं बालक गुरु मात पितु, खेलू प्रेम की गोद ।
संशय भरम में ना पड़े , पाऊँ बोध सुबोध ॥1 ॥
नाथ तुम्हारा आसरा, तुमने किया सनाथ । ।
साथ न छोड़, चरन का, रहूँ तुम्हारे साथ ॥2 ॥
काम सकाम अकाम की, रहे न मन में आस ।
तुम तो सांचे सतगुरु, मैं सांचा सत दाम ॥3 ॥
सेवा हित चित से करूँ, फल की चाह न कोय ।
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, होना होय सो होय ॥4 ॥
किसकी कीजे बन्दना, किसकी कीजे सेव ।
केहि बल जीतू जगत को, पूज कौन सत देव ॥5 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, गुरु की कीजे सेव ।
गुरु बल जीतो जगत को, पूज पूज गुरु देव ॥6 ॥
460. लहर जो उठी समुद्र में, बुन्द पड़ा अति दूर ।
बिलपे तड़पे रात दिन, यह वियोग दुख मूर ॥1 ॥
देख दशा तब बुन्द की, छोभा सिंध अपार ।
लहरी आई दया की, बुन्दहि लिया संभार ॥2 ॥
बुन्द सिंध की एक गति, लख पावे कोई साध ।
जब लख पावे मर्म यह, छूटे सकल उपाध ॥3 ॥
पंडित तो पोथी पढ़े, मन में बड़ा हंकार ।
पाँडे तीरथ में खपे, दान दक्षिणा लार ॥4 ॥
भेख सती का भेष घर, घर घर माँगी भीख ।
सतगुरु की संगत बिना, लही न पूरी सीख ॥5 ॥
ज्ञानी ग्रन्थन में बंधे, नहीं कुछ जाना भेद ।
बक बक निस दिन खोगये, हटा न संशय खेद ॥6 ॥
माया ब्रह्म समान दोऊ, दोउ द्वन्द अज्ञान ।
द्वन्द बास जब मन बसे, केहि विधि सूझे ज्ञान ॥7 ॥
461. मैं तो गुरु चरनन लगा, जैसे दीप पतंग ।
जरी कामना कल्पना, रहा न बाकी अंग ॥1 ॥
मैं तो कीट समान हूँ, गुरु मुंगी के रूप ।
ध्यान लगा पद कमल का, प्रगटा अमर अरूप ॥2 ॥
मैं हूँ बन की मृगनी, गुरु बीन के बोल ।
तन मन की सुधि बिसर कर, सहजे भई अडोल ॥3 ॥
मैं मछली गुरु सिंध गति, खेलू जल के माहिं ।
मीन सिंध गति क्यों तजे, सतगुरु पकड़ी बाँह ॥4 ॥
मैं तो किरन के भाव हूँ, सतगुरु भानु महान ।
किरनी मिली जो भानु में,क्या कोई सके अलगान ॥5 ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये, चरन पखारू नित ।
चरनामृत की लालसा, और न कोई चित ॥6 ॥
निरबेरी निहकामना, निहकामी निज दास ।
राधास्वामी दया कीजिये, सबसे रहूँ उदास ॥7 ॥
प्रार्थना
462 विद्या बुद्धि विवेक की, चरन कमल में खान ।
दया मेहर गुरु कीजिये, दीजे शुभ मति ज्ञान ॥1 ॥
प्रेम भक्ति सद्गति सुगति, सब तुम्हरे आधीन ।
दया दृष्टि गुरु कीजिये, चरन पड़ा जन दीन ॥2 ॥
खटक खटक सालत रहे, दुख दारुण उर मूल ।
अपनी दया से काटिये, भव कलेश का मूल ॥3 ॥
चन्दन के ढिंग आय के, सुधरे नीम पलास । ।
मैं आया तुम शरन में, कीजे अपना दास ॥4 ॥
चरन ओट में राखिये, शरनागत पहिचान । ।
राधास्वामी सतगुरु, दीजे भक्ति दान ॥5 ॥
272. ॐ अभ्यास की विधि चौपाई
463. गुरु की दया सुसंगत पाई ।
प्रेम उमंग रहा मन में छाई । ।
यह प्रपंच है दुख की खानी ।
काल कर्म के जाल फंसानी ॥
तलपत बिलपत अवध सिरानी ।
छूटन की कोई विधि नहीं जानी। ।
उर में तीर विपत का साले ।
वैद न मिला जो ताहि निकाले ।
कसक कसक भई पीर घनेरी ।
तड़प रहा ज्यों भग्नि #मेरी । ।
तीरथ बरत धरम अटकाना ।
पूजा पाठ नेम अभिमाना ।
जप तप संयम बहु बिधि किया ।
शान्ति न पाई भरमत रहा । ।
भेद भाव से जब घबराया ।
गुरु सतसंग महिमा सुन पाया ।
दोहाश्रद्धा भाव की भेंट ले, आया गुरु दरबार ।
दर्शन करतहि मिट गया, भव भ्रम मूल विकार ।
464. गुरु ने हाथ सीस पर फेरा ।
दिया ज्ञान निज करके चेरा ॥
जीव ईश का मर्म जनाया ।
माया काल का भेद बताया ॥
सतसंग की महिमा अति भारी ।
शेष महेश न बरने पारी ॥
सहज योग सतसंग प्रतापा ।
करे तो समझ परे निज आपा ॥
आपा समझ ईश पद सूझे ।
ब्रह्म सरल शुद्ध की गति बुझे ।
ज्ञान ध्यान की विधि मन भाई ।
गुरु संगत में सब सुधि पाई ॥
समझ परी श्रीगुरु मुख बानी ।
लखा अलख सतपद निर्वानी ॥
हिये उठा आनन्द महाना ।
गुरु की दया सन्त गति जाना ।
दोहा बाच लक्ष निर्णय किया, अजा प्रेम प्रतीत ।
अनुभव मिला विचार पद, मूझ पड़ी धर्म नीत। ।
465. तब गुरु ने यों दिया संदेसा ।
करो जतन जाओ सत देसा ॥
काल देश और माया देश ।
नित उपजावे कष्ट कलेश ॥
भूल भरम के यह अस्थान ।
यहां जीव रहे बंध फसान ॥
जाग्रत स्वप्न का ज्यों व्यवहार ।
तैसाहि समझो जगत असार । ।
निश्चल अचल न होय मन चंचल ।
डांवाडोल रहे अति बेकल ॥
ज्ञान कथा मन काज कमाओ ।
धर विवेक उर ध्यान लगाओ ॥
बाचक ज्ञान का नहीं ठिकाना ।
यह नहीं मुख्य न सांचा ज्ञाना । ।
बिना योग नहीं ज्ञान अखंड ।
बिन साधन नहीं सुमति प्रचंड ॥
दोहाब्रह्माकार न वृत्ति जब, निष्फल वाचक ज्ञान ।
गुरु मत ले कुछ युक्ति कर, मेट देउ अज्ञान ॥
466. गुरत शब्द का योग सुहावन ।
सुगम सुसाधन सुरुचि सुभावन । ।
शब्द में सुरत आपनी जोड़ो ।
सहजे भव के बन्धन तोड़ो ॥
चित को साध बैठ एकान्त ।
साधन कर मन को करो शान्त ॥
जब यह चित निर्मल हो जावे ।
तब कुछ रस साधन में पावे ॥
ज्यों ज्यों अधिक स्वादरस प्रगटे ।
त्यों त्यों मनकी गांठी खुले ॥
जड़ चेतन की ग्रंथी भारी ।
उरम उरक जीव भये दुखारी ॥
साधन से जब गांठी खोले ।
तब नहीं मन चंचल होय डोले ।
मन चंचल का ज्ञान न निर्मल ।
चंचल नहीं है आतम निश्चल । ।
दोहागुरु का यह उपदेश सुन, पूछे शिष्य सुजान ।
प्रभु साधन की विधि कहो, दीन दुखी मोहि जान । ।
467. सतगुरु ने तब बचन सुनाया ।
शब्द योग साधन ठहराया ॥
उलटो पुतली रोको मन को ।
विधि से नित प्रति करो जतन को ।
गुरु का नाम सुमिर हिय अंदर ।
योग कमाई करो निरन्तर । ।
पहिले सहसकमल चढ़ जाओ ।
महिमा जोति का दीप जलाओ ॥
जब आँखों पर बांधे बन्द ।
जोती निरख प्रगटे आनन्द ।
तत्व भास की लीला निरखो ।
बिमल बिलास हिये बिच परखो ।
ज्यों जोती बीच जले पतिंगा ।
जरत न मोड़े अपनो अंगा ।
त्यों तुम ध्यान जोति में लाओ ।
जोति देखकर चित ठहराओ ॥
दोहाध्यान सुगम है जोति का, जोती अद्भुत रूप ।
इस जोती के मध्य में, व्यापक पुरुष अनूप ॥
468. फिर तुम सुनो शब्द झनकारा ।
घंटा शंख की ध्वनी अपारा ॥
जब प्रगटे धुन घट में भाई ।
तब समझो घट पन्थ खुलाई ॥
धुन में नाम नाम में धुन है ।
गुन में गुनी गुनी में गुन है ।
घंटा शंख बजे घट अन्तर ।
उपजे प्रेम प्रतीत निरंतर ॥
चित नहीं डोले रहे अडोल ।
आप न बोले सुन धुन बोल ॥
भाव कुभाव चित जब रुके ।
धुन आप ही प्रगटे मन नसे ॥
धुन से खिंचे सुरत धुन माहीं ।
अन्त न मन और चित कहूँ जाहीं ।
तार न टूटे ध्यान न छूटे ।
सहजहि मन आतम सुख लूटे ।
दोहादेवल सहसकमलदल, प्रथम आरती कीन ।
दीना वाला जोति का, घंटा शब्द प्रवीन ॥
469. पहिली मंजिल हो गई पूरी ।
सुरत निबल अब हो गई सूरी ॥
गुरु बल पाय चली आगे को ।
तोड़ दिया भव के तागे को ।
दूसरी मंजिल त्रिकुटी धाम ।
ओंकार का यही मुकाम ॥
एक ओं सतगुरु प्रसाद ।
पाय सुरत लागी स्मिाध ॥
मूल मंत्र का यह अस्थान ।
ॐ प्रणव श्रुति पथ का ज्ञान । ।
सूरज मंडल लाली उषा ।
निरख हटाया मन का दोषा ।
गुरु पद गुरु संग गुरु का मंडल ।
गुरु की बानी निर्मल निश्चल ॥
ओंकार की लाली जोत ।
है त्रिलोकी का यह सोत । ।
दोहाव्यापक ओम् का शब्द है, ज्यों मृदंग की धुन ।
सुरत हुई अति बिमल गति, ओम् ओम् धुन सुन ।
470. मेघनाद लंका की बानी ।
रावणगढ़ की अटल निशानी ॥
जो कोई इस पद बासा पावे ।
सहजहि इन्द्री जीत हो जावे ॥
गगन चढ़े सुरत सुघड़ सहेली ।
अलबेली अल्लहड़ी नवेली । ।
यकटक होय लखे गुरु मूरत ।
अगम अगोचर अद्भुत मूरत ।
मस्ती छाई ध्यान जमाया ।
ओंकार पद लख हरषाया ।
काम क्रोध के मस्तक फोड़े ।
लोभ मोह के नाते तोड़े ।
गम रूप मन सीता पाई ।
अबध राज की ली ठकुराई ॥
तन में रहे काज सब करे ।
तन के मोह मया सब हरे ॥
दोहाजैसे जल के बीच में, कमल रहा बिगसाय ।
तैसी देह के बीच में, सुरत रही अलगाय ॥
471. जब लग ओंकार नहीं दरसे ।
तब लग कबहुँ न कारज सरसे । ।
ओम् विशेष पुरुप गुरु रूप ।
ओम् त्रिलोकी का निज भूप । ।
ओम् बीज है ओम् है सार ।
त्रिलोकी का यह आधार ।
ओम् तीन साधन का मूल ।
ओम् जाप जग मेटे मूल ॥
ओम् आधार ओम् करतार ।
ओम् मूल बाकी सब डार ।
ओम् तत्व है ओम् है मुख ।
ओम् से उपजे हिये का सुख । ।
ओम् वेद है ओम् पुरान ।
ओम् श्रुति स्मृति की जान ।
निगुन सगुन में निर्गुन ओम् ।
व्याप रहा जग में धुन ओम् ॥
दोहा उत्पति सृष्टि प्रलय जग, प्रलय के आधार ।
ब्रह्म खंड त्रिलोक में, ओम् है सबका सार ॥
276. शिव शन्द सागर
472. त्रिकुटी लख सुरत बढ़ी अगाड़ी ।
सुन्न समाध की आशा बाढ़ी ॥
कभी चिउंटी बन कभी विहंगम ।
मकर तार गति मीन दीन सम ।
कपि की चाल कूद मतवारी ।
सुन्न नगर की करी तैयारी ॥
स्वेत चन्द्र की जोत अपारा ।
आई दसवें द्वार पसारा ॥
नौ को छोड़ दसम दर लागी ।
नौ की नींद से सुन्न में जागी ।
नौ के पार का नौका पाया ।
जल थल वन उपवन मन भाया ।
ऊँचा परवत गहरी खाड़ी ।
लख लख चली सुरत मति गाढ़ी ।
सारंग सारंग धुनी विचित्र ।
सुन्न में देखी सुन्न चरित्र ॥
दोहागति सो सूक्ष्म निर्मल अमल, सुरत निरत रही झूम ।
सारंग सारंग शब्द की, पड़ी सुन्न में धूम ॥
473. सुरत देख अति चित हरखानी ।
ज्ञान दशा लख भई विज्ञानी ॥
आनन्द दरसा अमित अपारा ।
शेष गनेश न बरने पारा ॥
आगे महासुन्न मैदाना ।
घोर तिमिर प्रकाश छुपाना ।
कभी आगे कभी पीछे चाली ।
नाम सुमिरि मिली शक्ति निराली। ।
गुरु बल अंधकार सब नासा ।
पुरुषारथ की पाई आशा ॥
मान सरोवर किया अस्नान ।
हंसन गति लख लागा ध्यान ।
सुरत हुई सहजहि विस्माध ।
ताड़ी लागी अगम अगाध ॥
चित भया अचित विमन मन भया ।
चार शब्द सुने गुरु की दया ॥
दोहाघोर अखंड समाध लगी, तन मन की सुध नाहिं ।
महासुन्न कैलास गति, ब्रह्म शिखर के माहिं ॥
474. आनन्द हर्ष अपार महाना ।
अचल अमल निर्मल गति भाना ॥
गुरु की दया सुरत जब जागी ।
प्रेम प्रीत भक्ति रस पागी ॥
निरविकल्प सविकल्प अस्थाना ।
देखा उपजा मन गुरु ज्ञाना ।
हंस मंडली अद्भुत लीला ।
अमी अहार सप्रेम सुशीला ॥
सम दर्शी समचित सविवेका ।
पद दरसा नहीं एक अनेका ।
कहत न आवे मुख से चैन ।
गुरु लख दीन्ही अपनी सैन ।
बोले यह नहीं ठहरन धाम ।
चलो बढ़ो ले सतगुरु नाम ॥
सुरत नवीन चली जब आगे ।
पहुँची भवरगुफा के नाके ।
दोहाभँवर के बीच में गुफा है, सोत विचित्र अनूप ।
चक्कर खाता रात दिन, रूप कहूँ कि अरूप ॥
475. सूर स्वेत पर दृष्टि जमाई ।
महा प्रकाश तेज अधिकाई । ।
कोटि कृष्ण छबि रही लजाई ।
मुरली धुन तहां पड़ी सुनाई ॥
सोहंग सोहंग बानी प्रगटी ।
अटल अटूट नहीं अबढ़न अघटी ।
ओम भया सोहंग आकार ।
“हूँया “हूअव्यक्त अपार । ।
सूक्ष्म प्रमाणु दृष्टि सब आये ।
लख लख सुरत निरत हरखाये । ।
माया काल के रूप दिखाने ।
बिन यहां पहुँचे कोई क्यों जाने ।
महाकाल का यह अस्थान ।
तर जप धाम अलौकिक भवन । ।
यही चक्र रचना की आदि ।
लखे सन्त बिरला बिस्माधि ॥
दोहाजो कोई इतने पद चढ़े, काल करे नहीं हान ।
सृष्टि प्रलय उत्पति विषय, का तब पावे ज्ञान ।
476. सतगुरु कृपा हंस कोई आया ।
पूछा कौन कहां से आया ।
बोली सुरत संत की दासी ।
सन्त मिले तब भई उदासी ॥
सत्य धाम की आसा धार ।
पहुँची यहां लग संग विचार ॥
हंस सुरत को लेकर साथ ।
चला जहां सत पद पद नाथ ॥
सत्य पुरुष का दर्शन दीन्हा ।
लख प्रकाश रूप सत चीन्हा । ।
कोटिन चन्द्र सूर उजियारी ।
बीन सुनी सत सत धुन भारी ॥
यह है सत सब और असत ।
यह हक नाहक और सब मत ॥
माया काल से ऊचा धाम ।
सन्तन का सतपद सत नाम ।
दोहायही ज्ञान का मूल है, यही रूप की खान ।
सतपद धुरपद आदि पद, अन्तिम पद निरवान । ।
477. ली दुरबीन सुरत ले बढ़ी ।
आगे अलख अगम पद चढ़ी । ।
कौन लखे लख अलख निशानी ।
कौन कथे यह अकथ कहानी । ।
गम के पार अगम का देस ।
क्या कोई दे तिस का संदेश । ।
मन बानी दोउ रहे अलसाने ।
ज्ञानी योगी भेद न जाने । ।
अलख अगम के पार अनामी ।
अगति अगाध पुरुष राधास्वामी । ।
रूप न रंग न रेख न काया ।
अजर अमर अव्यक्त अमाया ॥
निज प्रकाश शोभा अति भारी ।
राधास्वामी धाम अपारी ॥
यह सत सिंध सत्य निज धाम ।
अनल अचल अधिकार अकाम ।
दोहापाई सतगुरु की दया, आदि अनादि अगाध ।
निज स्वरूप निज रूप, तिन धन चतन्य अबाध ॥
478. धन्य धन्य गुरु धन्य दयाला धन्य उदार सुसहज कृपाला ॥
तुम्हारी दया कटी जम फांसी ।
तुम्हरी कृपा अविद्या नासी । ।
जड़ चेतन का बन्ध कटाना ।
सकल उपाधी भरम हटाना । ।
अब नहीं व्यापे काल न माया ।
अब मैं रहूँ न जग उरझाया ।
जीवन मुक्ति दशा चित लाऊँ ।
जल में कमल समान रहाऊँ ।
कर्म अकर्म ज्ञान अज्ञाना ।
द्वन्द अवस्था से बिलगाना ॥
चेतन धन आनन्द धन बासी ।
धन आनन्द न पास सुपासी ॥
जीवन में विदेह गति पाई ।
जनक राज की बजी बधाई ॥
दोहागुरु मिले सीतल भया, दूर भया उत्पात ।
राधास्वामी की दया, काल करे नहीं घात ॥
276
साखी
479. शब्द अगम साखी निगम, महिमा अमित महान ।
साखी शब्द को जानिये, निगमागम की खान ॥1 ॥
श्रुति स्मृति का सार है, मर्म न जाने कोय ।
जो कोई पढ़े विचार से, सहजे पंडित होय ॥2 ॥
श्रुति धुनात्मक नाम घट, श्रुति गुरु का बैन ।
मूल शब्द सिद्धान्त है, सुन चित प्रगटे चैन ॥3 ॥
साखी साक्षी स्वरूप है, स्मृति सुमिरन सार । ।
सुरत सखी साखी बनी, शब्द का किया निरवार ॥4 ॥
राधास्वामी नाम है, सुरत शब्द भंडार ।
भाग्यवती गुरु नाम से, उपजे विमल विचार ॥5 ॥
480. कथा कीर्तन जगत में, अति उत्तम व्यवहार ।
भाग्यवती इस जगत से, गह परमारथ सार ॥1 ॥
कथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे विचार ।
भाग्यवती व्यापे नहीं, उसको अशुभ विकार ॥2 ॥
कथा कीर्तन सुगम है, तू इसको चित दे ।
भाग्यवती संसार में, धर्म मुक्ति फल ले ॥3 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, त्याग मोह मद काम । ।
भाग्यवती भव दुख मिटे, मन पाये विश्राम ॥4 ॥
नाय पड़ी मंझधार में, केहि विधि उतरे पार ।
भाग्यवती गुरु नाम ले, कथा कीर्तन सार ॥5 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, सतगुरु के आधार । ।
भाग्यवती सहजे मिले, सत दयाल करतार ॥6 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भक्ति साज दल साज ।
भाग्यवती मन में जुड़े, मंगल मोद समाज ॥7 ॥
कथा कीतेन सार है, साधन सुगम सुभाव । ।
भाग्यवती जग तरन का, नही कोई और उपात्र ॥8 ॥
कथा कीर्तन के किये, उपजे हृदय विवेक ।
भाग्यवती इस विधि लहे, इष्ट देव की टेक ॥6 ॥
कथा कीर्तन ध्यान है, सुमिरन भजन सुसंग ।
भाग्यवती सहजे बने, कीट से भृग सुरंग ॥10 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भाग्यवती निष्काम ।
ऐड़ी से चोटी तलक, व्यापे गुरु का नाम ॥11 ॥
कथा कीर्तन में रहे, ज्ञान भक्ति का मूल ।
भाग्यवती सब भूल जा, किचिंत इसे न भूल ॥12 ॥
कथा कीर्तन में बसे, जप तप परम विराग ।
भाग्यवती कर ग्रहन यह, और सबन को त्याग ॥13 ॥
कथा कीर्तन में बसें, डार पात फल फूल ।
भाग्यवती अब क्या गहे, गह लिया भक्ति का मूल ॥14 ॥
कथा कीर्तन का मिला, दान तो हुई निहाल ।
ध्यान गर्म से भाग्यवती, प्रगटे गोद दयाल ॥1 ॥
आंख कान मुख नासिका, मस्तक तन भये गोद ।
खेले गोद दयाल नित, भाग्यवती लह मोद ॥16 ॥
लाल दयाल हुए मेरे, मैं हो गई निहाल ।
भाग्यवती लख लाल को, व्यापा चहुँ दिस लाल ॥17 ॥
लाली अपने लाल की, जहां देखू तहां लाल । ।
भाग्यवती खोजे किसे, यहां वहां लाल दयाल ॥18 ॥
लाल लाल सब लाल है, प्रगटा लाल गुलाल ।
भाग्यवती सहजे तरी, सतगुरु हुये दयाल ॥16 ॥
कथा कीर्तन में मिला, राधास्वामी नाम ।
भाग्यवती हुई मगन मन, सब विधि पूरन काम ॥20 ॥
राधास्वामी गायकर, जनम सुफल कर ले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने घर ले ॥21 ॥
॥
चौगई ॥
481. गधास्वामी मेरे धीर गम्भीर ।
राधास्वामी जोधा राधास्वामी वीर । ।
गधास्वामी गुन आगर गुन नागर ।
राधास्वामी दया प्रेम के सागर । ।
गधास्वामी सुरत शब्द भंडारा ।
राधास्वामी मन बानी के पारा ।
गधास्वामी अधिष्ठान आधार ।
राधास्वामी अचल अटल भव पार । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याऊँ ॥
दोहापतित पावन भय नसावन, दया करुना रूप ।
राधास्वामी सन्त सतगुरु, पद अगाध अनूप । ।
गधास्वामी नाम जो चित से धारे ।
सहज जाय भव सागर पारे ।
गधास्वामी नाम हिये से गावे ।
करम भरम के फन्द कटावे । ।
राधास्वामी नाम नाम निज नामा ।
जो गावे सो पूरन कामा । ।
गधास्वामी महिमा बरनि न जाय ।
शेष महेश रहे सकुचाय ॥
राधास्वामी सुमिर सुमिर राधास्वामी ।
राधास्वामी चरनन सदा नमामी
दोहाबसे हृदय में हमारे, राधास्वामी जान हो ।
राधास्वामी ठहरे मन के, ज्ञान सत अनुमान हो ।
गधास्वामी सन्त भेष जब धारा ।
राधास्वामी रूप लगा अति प्यारा ॥
गधास्वामी भाव बसा जब मन में ।
राधास्वामी छवि छाई नेनन में ॥
राधास्वामी शब्द पड़ा श्रवन में ।
जाग सुरत लगी शब्द जतन में ।
कुण्डलिनी शक्ती सुरत वारी ।
बसी सहसदल मूलाधारी । ।
राधास्वामी शब्द रूप जब परखी ।
खिसकी अधर धाम गति निरखी ॥
दोहात्रिकुटी महल में आन पहुँची, ओम् के दरबार ।
धुन मृदंग कानों सुनी, मिला पद ओंकार ॥
राधास्वामी अलख अगम राधास्वामी ।
राधास्वामी ताल सुसम राधास्वामी ॥
राधास्वामी नाम अनाम अनामी ।
राधास्वामी इष्ट धाम निज धामी ॥
राधास्वामी शब्द सुरत के पार ।
राधास्वामी शब्द शब्द से न्यार । ।
राधास्वामी धुन राधास्वामी राग ।
राधास्वामी प्रेम भक्ति बेराग ॥
राधास्वामी चमन फल राधास्वामी ।
राधास्वामी पौद मूल राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी नाम में जी, रत रहे दिन रैन ।
राधास्वामी की दया से, पावे आनन्द चैन ।
सतपद सत्य रूप राधास्वामी ।
सोहंग भवर भूप राधास्वामी ॥
निःअक्षर पद शून्याकार ।
अक्षर धाम रूप ओंकार । ।
क्षर में सहस सहस के भाव ।
राधास्वामी नाम से लहे उपाय ॥
आदि अनादि जुगादि अनाम ।
राधास्वामी अर्थ धर्म सतकाम । ।
राधास्वामी मुक्ति युक्ति निरवान ।
राधास्वामी भक्ति भजन विज्ञान ।
दोहाराधास्वामी नाम धन नित, सुरत निरत से गाइये ।
राधास्वामी पद कमल में, अपना सीस झुकाइये ॥
482. राधास्वामी साँस भास राधास्वामी ।
राधास्वामी भाव आस राधास्वामी राधास्वामी प्रान व्यान राधास्वामी ।
सम समता समान राधास्वामी ।
तीजे तिल उदान राधास्वामी ।
मूला चक्र अपान राधास्वामी ॥
राधास्वामी श्रोत्र नैन राधा मी ।
राधास्वामी वचन बैन राधास्वामी राधा अंतर राधास्वामी बाहर ।
राधास्वामी घट राधारामी जाहिर ।
दोहा दृष्टि सृष्टि दृश्य को लखि, राधास्वामी गाइये ।
राधास्वामी की दया से, राधारामी पाइये ॥
गधास्वामी ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
राधास्वामी देवी देव गनेशा ॥
गधास्वामी ब्रह्म ब्रह्म के भेस ।
राधास्वामी परब्रह्म के देस ।
गधास्वामी ईश्वर और परमेश्वर ।
राधास्वामी अक्षर और निःअक्षर । ।
गधास्वामी सम कोई और न जानू ।
राधास्वामी सबमें व्यापक मानू ।
मापको करूँ प्रनाम सप्रीती ।
गुरुपद इष्ट यही शुभ नीती ॥
दोहा राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी ध्यान हो ।
राधास्वामी धुन का अन्तर, ऊँचे घाट में गान हो ।
गधास्वामी पंथ राधास्वामी पंथी ।
राधास्वामी ग्रन्थ राधास्वामी ग्रन्थी गधास्वामी लोक वेद राधास्वामी ।
राधास्वामी मर्म भेद राधास्वामी गधास्वामी नाम से नाता जोड़ा ।
जगत के मत से नाता जोड़ा ।
गधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी।राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी उनु बैठे खड़े उताने ।
राधास्वामी भजत रहूँ मन माने ।
दोहासांस सांस में सुमिर गुरु को, गुरु के ध्यान में मगन हो ।
लाग सच्ची मन से हो, इस रीति सच्ची लगन हो ॥
गधास्वामी जोति राधासामी झाई ।
राधास्वामी दीप दीप परछाई गधास्वामी जाग्रत राधास्वामी सुपने ।
सुषुप्ति में राधास्वामी अपने गधास्वामी तुरिया तुरियातीत ।
राधास्वामी पद दोनों से अतीत गधास्वामी लोक लोक से न्यारे ।
राधास्वामी उदासीन सत प्यारे जल थल पावक गगन समीरा ।
राधास्वामी के सब देह शरीरा दोहा सब में व्यापक सबसे न्यारा, राधास्वामी का है रूप ।
रूप रंग नहीं कोई अद्भुत, विचित्र अगम अनूप ।
गधास्वामी सुन राधास्वामी गुन ।
राधारामी राग ताल सम धुन गहमकमलदल राधास्वामी गाना ।
घंटा शंख के शब्द अनुमाना ।
त्रिकुटी राधासामी ओम् अलाए ।
ज्यों मृदंग थप थापा थाप । ।
सुन्न में राधास्वामी रारंकार ।
भँवर बांसुरी सोहंकार ॥
सतपद बीन मधुर धुन गाजी ।
सत्त सत्त राग निज साजी । ।
दोहाऐसा हो अभ्यास निस दिन, सुरत शब्द की रीति से ।
राधास्वामी अलख अगम को, पाइये परतीत से ॥
483. राधास्वामी अगम अनाम अनूपा ।
राधास्वामी अलख अपार अरूपा ॥
राधास्वामी दीनबन्धु जग दाता ।
राधास्वामी सबके पितु और माता। ।
राधास्वामी गुप्त प्रकट राधास्वामी ।
राधास्वामी अघट सुघट राधास्वामी
राधास्वामी यहां वहाँ राधास्वामी ।
राधास्वामी जहां तहां राधास्वामी
पृथ्वी आकास गगन राधास्वामी ।
ऊसर परबत बन राधास्वामी ॥
दोहादृश्य तेरा रात दिन, आँखों में अब आकर रहे ।
शब्द तेरा कान में हो, नाम मुख रसना लहे ॥
राधास्वामी वार पार राधास्वामी ।
राधास्वामी तट मझार राधास्वामी राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी तीन चार और एक न मानू ।
सब में व्यापक राधास्वामी मानू ॥
राधास्वामी घट में किया निवासा |
राधास्वामी चहुँदिस किया प्रकाशा
राधास्वामी चरन कमल में बास ।
राधास्वामी रात दिवस मेरे पास ॥
दोहा ऐसा सुमिरन नाम का हो, टूटने पाये न तार ।
राधास्वामी जीत राधा, स्वामी मन के मेरे हार ।
राधास्वामी चन्द्र जोत राधास्वामी राधास्वामी
सिंध सोत राधास्वामी राधास्वामी कला सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी वृक्ष मूल राधास्वामी। ।
राधास्वामी जान प्रान राधास्त्रामी राधास्वामी ज्ञान मान
राधास्वामी सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
राधास्वामी शब्द तान राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामीराधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
दोहामुझको अपने पद का ऐसा, प्रेम गहरा दीजिये ।
अपना जन मुझको बनाकर, तब शरन में लीजिये ।
राधास्वामी आये जीव उबारन ।
राधास्वामी सहज बने जग तारन ।
सन्त भेस धर यहाँ चल आये ।
राधास्वामी जीव को अंग लगाये । ।
राधास्वामी जीव जन्तु घट वासी ।
राधास्वामी अमल विमल सुखरासी राधास्वामी निराधार आधारा ।
राधास्वामी वार पार से न्यारा ॥
राधास्वामी राधास्वामी बारम्बारा ।
कहत सुनत रहूँ सहित विचारा ॥
दोहादया कीजे महर कीजे, भक्ति दीजे दीन को ।
सिंध की सद्गति में दीजे, बासा अपने मीन को ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी जान जान से प्यारे ।
राधास्वामी मेरे आँखों के तारे ।
मेरे हृदय करें निवास ।
राधास्वामी मैं निज दास ।
सांस साँस भजू राधास्वामी ।
आस भास सुमिरू राधास्वामी ॥
राधास्वामी मंगल मंगलकारी ।
राधास्वामी पाय न रहूँ दुखारी । ।
दोहा तारिये और तार लीजे, नाम रतन का दान दे ।
राधास्वामी अपना कीजे, चरन शरन की ओट दे ॥
484. उत्तम वृत्ती सहज की, सहज भाव चित दे ।
सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥1 ॥
सहजा वृती उत्तमा, मध्य धारना ध्यान ।
अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥2 ॥
जाकी जैसी प्रकृति, तसे तिस का काम । ।
छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥3 ॥
जो बन आवे सहज में, सोई सहज का रूप ।
जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप ॥4 ॥
सहज सहज जो सहज विधि, सो फल मीठा होय ।
और युक्ति से जो पके, सुन्दर मधुर न सोय ॥5 ॥
साधन सुमिरन सहज का, सहजाहि सहज विधान । ।
सहज वृद्धि सहज आचरन, अन्त सहज निर्वान ॥6 ॥
निर्विकल्प सविकल्प नहीं, उत्तम सहज समाध ।
सहज समाध सहजहि मिले, छूटे सहज उपाध ॥
जा सहज में नहीं कठिनता, सीख सहज मत रीत । ।
साधन सहज की प्रबलता, उपजे प्रेम प्रतीत ॥8 ॥
प्रेम प्रतीत सहज विधि, कठिन न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, भरम न छूटे ग्रन्थ ॥6 ॥
ग्रन्थ पढ़ा तो क्या भया, मिला न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम युक्ति सहजे खुले, जड़ चेतन की ग्रन्थ ॥10 ॥
सुरत शब्द अभ्यास से, वृत्ति सहज हो प्राप्त ।
निज अनुभव साक्षात्कार, सहज शब्द मत आप्त ॥11 ॥
सहज इन्द्री का ज्ञान है, सहज ज्ञान अनुमान ।
सहज शब्द निज ज्ञान है, यही है मुख्य प्रमान ॥12 ॥
तुझमें मान प्रमान है, तुझमें ज्ञान अनुमान है ।
तुझमें शब्द की खान है, आप्त बचन सुन कान ॥13 ॥
कठिन ग्रन्थ की जेवरी, बंधि रहे चतुर सुजान । ।
निज अनुभव सूझा नहीं, पाया वाचक ज्ञान ॥14 ॥
वाचक ज्ञान को त्याग दे, महा कठिन व्यवहार । ।
प्रेम प्रतीत प्रभाव से, पावे उत्तम सार ॥15 ॥
सहज रीति सत्संग कर, सहज श्रवन और मनन ।
सहज शब्द अभ्यास है, सुमिरन सहज भजन ॥16 ॥
मिश्री जब जल से मिली, होगई जल का अंग। ।
वैसे ही गुरु के संग को, समझ सत्य का अंग ॥17 ॥
नोन गला पानी भया, भरे कौन अब गोन ।
सतसंगत परताप से, मन बानी चित मौन ॥18 ॥
485. चित चरनों से जोड़िये, साक्षी भाव समान ।
तब सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥1 ॥
सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ।
सहज भजन और ध्यान हो, सहजहि सुमिरन नाम ।।2। ।
सहज भाव को समझ लो, कठिनाई को त्याग । ।
कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥3 ॥
सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ।
कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥4 ॥
सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ।
सहज वृत्ति है नम्रता, खींच तान अभिमान ॥5 ॥
सहज मौज की रीति है, सहज चले जो कोय ।
सहज भाव अन्तर बसे, घट मे दर्शन होय ॥6 ॥
सुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सहज सहज सुमिरन करो, एक दिन गुरु मिल जाय॥7 ॥
सहज समाना सहज में, सहजे चित्त में चेत ।
माधन सहज सुलभ सदा, सहजहि से हो हेत ॥8 ॥
राधास्वामी की दया, सहज योग चित लाय ।
भव तरने का सेत यह, और न कोई उपाय ॥6 ॥
486. करनी से चित लाइये, तजिये बचन असार ।
कथनी है निश्फल सदा, अपने हृदय विचार ॥1 ॥
संशय भरम को त्याग कर, करनी को चित दे ।
करनी से रहनी मिले, गुरु भक्ति फल ले ॥2 ॥
रत्ती भक्ति नाम की, फल लावे तत्काल ।
बात चीत में जो फसा, ताहि सतावे काल ॥3 ॥
बातों में है क्या धरा, बात बात की बात ।
बात से नहीं परदा खुले, लख केले का पात ॥4 ॥
सहज कमाई नाम की, नाम से लौ रहे लाग ।
राधास्वामी की दया, पावे भाग सुभाग ॥5 ॥
487. सबसे उत्तम शील धन, जाने कोई सुशील ।
और सकल निरधन यहाँ, शील बिना सब भील ॥1 ॥
नम्र भाव चित में बसे, प्रेम हिये में व्याप ।
नर सुशील के तन बदन, साहब बसता आप ॥2 ॥
साहब शील महान है, शीलबन्त है दास ।
शील का धन जब मिलगया, दास न रहे उदास ॥3 ॥
बड़ा पदारथ शील है, शील क्षमा का रूप ।
जिसमें शील क्षमा नहीं, बड़े भव जल कूप ॥4 ॥
शील ज्ञान दोऊ एक है, मन में रहे विचार ।
राधास्वामी की दया, भव से बेड़ा पार ॥5 ॥
488. पर उपकारी आत्मा, सहे न कोई दुख ।
यही तो परमानन्द है, यही सुक्ख है सुख ॥1 ॥
देह मिली तो देह कुछ, देह देह कुछ देह ।
नहीं भरोसा देह का, देह होगई खेह ।।2। ।
खाली आये जगत में, खाली हाथों जाय ।
पर उपकारी आत्मा, दान का द्रव्य कमाय ॥3 ॥
लेना हो सत नाम ले, देना अन्न का दान । ।
राधास्वामी की दया, निश्चल हो कल्यान ॥4 ॥
489. जाके मन विश्वास है, सदा रहे गुरु साथ ।
काल कर्म व्यापे नहीं, हाथ में गुरु का हाथ ॥1 ॥
सीस में गुरु मूरत बसे, धरे सीस पर हाथ ।
भय चिंता क्यों हो मुझे, सदा जो गुरु का साथ ॥2 ॥
घट अन्तर बैठक किया, रहना गुरु के संग ।
कैसे फिर संसार से, मेरा चित हो भंग ॥3 ॥
गगन गुरु घट शिष्य है, दो देही एक प्रान ।
सुरत शब्द मेला भया, समझे साधु सुजान ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मिला शब्द का भेद ।
चिंता दुविधा मिट गई, रहा न मन में भेद ॥ ॥
490 सेवक सेवा में रहे, सेवा में दे चित ।
जो सेवा में आलसी, क्या हो उसका हित ॥1 ॥
आज्ञाकारी सेवका, आज्ञा सीस धरे ।
अपना आपा मेटकर, गुरु की भक्ति करे ॥2 ॥
अपना तो कुछ भी नहीं, गुरु दाता का सब ।
ऐसी समझ जब मन बसे, सेवक कहिये तब ॥3 ॥
करता चन करनी करे, हठ को मन में ठान ।
ऐसे सेवक का कहो, केहि विधि हो कल्यान ॥4 ॥
गुरु मस्तक व्यापे सदा, गुरु को सिर पर धार ।
ऐसा सेवक जगत में, सहे न दुख का भार ॥5 ॥
मनमत त्याग गुरुमत बने, गुरुमत है सिद्धान्त । ।
राधास्वामी की दया, सेवक रहे निर्धान्त ॥6 ॥
491 दृष्टि सृष्टि का भेद है, और नहीं कुछ भेद ।
दृष्टि सृष्टि का मर्म लख, मिटे जगत का खेद ॥1 ॥
दृष्टी में सृष्टी रहे, सृष्टि दृष्टि आधार ।
मोर तोर जब दृष्टि में, तब दृष्टी संसार ॥2 ॥
ज्ञान दृष्टि लवलीन जब, ज्ञान सृष्टि तब होय ।
जो अज्ञान है दृष्टि में, सृष्टि अज्ञान की सोय ॥3 ॥
दिल का परदा खोलकर, देख गुरु का रूप ।
गुरु सृष्टि गुरु दृष्टि में, फिर नहीं भव का कूप ॥4 ॥
गुरुमत सृष्टी ज्ञान की, मनमत सृष्टि अज्ञान ।
राधास्वामी की दया, अपना रूप पिछान ॥शा
492. सतसंग करना सुगम है, सतसंग किया न सोय ।
पारस से परदा रहे, कंचन केहि विधि होय ॥1 ॥
नाम लिया तो क्या हुआ, बकबक में गये खोय ।
रसना में रस नाम नहिं, सो सुमिरन नहीं होय ॥2 ॥
मनमत है गुरुमत नहीं, चंचल मन को कीन ।
ध्यान ज्ञान बेकाम सब, चित नहीं गुरु में लीन ॥3 ॥
कथनी का सुमिरन किया, कथनी का किया ध्यान ।
अनुभव जागे क्यों तेरा, कथनी का रहा ज्ञान ॥4 ॥
सुरत निरत थिर कीजिये, फिर लीजे गुरु नाम ।
छिन पल के अभ्यास में, सब विधि पूरन काम ॥5 ॥
समझ समझ पग धारिये, पंथ है सुगम सुहेल ।
पंथ में पंथाई चले, जो हो गुरु से मेल ॥6 ॥
गुरु अलग चेला अलग, अलग चाल चले मन ।
मैं तोहि पूछू साधुवा, यह कैसा है जतन ||7||
राधास्वामी नाम भज, धुन आत्मक सो होय ।
वर्णात्मक का काम नहीं, गये वर्ण सब खोय ॥8 ॥
493. मनमत मन का दास है, गुरुमत गुरु का दास ।
मनमत सदा उदास है, गुरुमत मन विश्वास ॥1 ॥
गुरुमत मौज अधीन नित, परखे मौज की बात ।
मनमत मन के बन्ध बधे, बिलये दिन और रात ॥2 ॥
दुख सुख सिर ऊपर सहे, भजे गुरु का नाम ।
गुरुमत आनन्द रूप है, दिन के आठों याम ॥3 ॥
गुरुमत शील क्षमा दिया, धारे अपने मन ।
मनमत को है दुख धना, चैन न पावे तन ॥4 ॥
गुरुमत पतिव्रत रूप है, हृदय पिया का ध्यान ।
मनमत है व्यभिचारिणी, भोगे नरक निदान ॥5 ॥
पतिव्रता पति को भजे, एक पति की आस ।
व्यभिचारिन को दुख महा, नहीं आस विश्वास ॥6 ॥
पिउ पिउ पिउ पिउ नित भजे, सदा सुशीला नार ।
ताके शील चरित्र के, गुरु सदा रखवार ॥7 ॥
पतिव्रता मैली भली, भाव आस चित एक ।
मन मैली व्यभिचारिनी, बँधी जो बन्ध अनेक ॥8 ॥
एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास । ।
ऐसी नारि सुन्दर महा, कबहुँ न होय उदास ॥6 ॥
मोती चमके क्रीट संग, गगन में चमके भान ।
पतिव्रता पति संग में, भलके झलक महान ॥10 ॥
पति पत्नी व्यवहार लख, मेरा चित आनन्द ।
यही भोग और जोग है, क्या समझे मतिमन्द ॥11 ॥
ज्ञानी भूला ज्ञान में, जोगी भूला जोग ।
पति पत्नी के मेल का, नहीं समझे संजोग ॥12 ॥
भया सुशीला नारि का, ज्ञान के संग विवाह ।
शील ज्ञान मिल एक हैं, गुरु के हाथ निबाह ॥13 ॥
ज्ञान सुशीला संग नित, प्रेम प्रीति व्यवहार ।
नर का जनम सुफल भया, कोई समझे वर नार ॥14 ॥
राधास्वामी की दया, मिला भक्ति का दान ।
भक्ति के अंग संग रहे, शील दया और ज्ञान ॥15 ॥
494. देह धरा तो देह तू , कर्म धर्म सत ज्ञान ।
कर्म धर्म सत ज्ञान से, और का हो कल्यान ॥1 ॥
देह धरा तो देह तू , अन्न द्रव्य का दान ।
अन्न द्रव्य के दान से, तेरा हो कल्यान ॥2 ॥
देह धरा तो देह तू , मुख से मीठे बैन ।
मुख के मीठे बैन से, सबको हो सुख चैन ॥3 ॥
देह धरा तो देह तू , औरों का सन्मान ।
औरन के सम्मान से, तुझे मिलेगा मान ॥4 ॥
देह धरा तो देह तू , सतगुरु का सत नाम ।
सतगुरु के सत नाम से, पावेगा विश्राम ॥5 ॥
देह धरा तो देह तू , प्रेम प्रीत परतीत ।
प्रेम प्रीत परतीत से, होगा तेरा हीत ॥6 ॥
देह धरा तो देह तू , विद्या बुद्धि विचार ।
विद्या बुद्धि विचार से, हो तेरा उपकार ॥7 ॥
देह धरा तो सेव कर, सेवक का यह धर्म ।
सेवा कर गुरु देव की, समझ भक्ति का मर्म ॥8 ॥
देह धरा अच्छा भया, देह देह अब देह ।
धन दे मन दे देह दे, अशरन को दे गेह ॥6 ॥
देह धरा अच्छा भया, जी औरों के हेत ।
औरों का उपकार है, भव तरने का सेत ॥10 ॥
देह धरा तो देह अब, जब लग तेरी देह । ।
देह देह दे देह दे, देह गेह अरु नेह ॥11 ॥
देह धरा तो देह तू , तन मन निज मन देह । ।
देह खेह हो जायगी, फिर कौन कहेगा देह ॥12 ॥
जीना मरना एक है, दोनों एक समान ।
नर की देही जब मिली, कर सबका कल्यान ॥13 ॥
नदी वहे नहीं आपको, फल नहीं खावे पेड़ ।
जो नर ऐसा नहीं है, उसे काल का एड ॥14 ॥
सन्तन का मत है यही, देह देह कुछ देह ।
जो नहीं देगा देह को, देह अन्त में खेह ॥15 ॥
लेना हो सतनाम ले, देना हों अन्न दान ।
लेने देने को समझ, यह सिद्धान्त महान ॥16 ॥
जो देगा लेगा वही, समझ गुरु की बात ।
जो देने वाला नहीं, सहेगा जम की घात ॥17 ॥
अपने लिये न जी कभी, यह गुरु का उपदेश । ।
जीतू औरों के लिये, यह है सन्त सन्देश ॥18 ॥
मरा जो औरों के लिये, वह जीवित है नर ।
जिया जो अपने देह को, वह है कूकर खर ॥16 ॥
सेवक सेवा करे नित, सेवा गुरु की रीत ।
सेवा के परताप से, लेगा काल को जीत ॥20 ॥
काल कर्म को जीतकर, चल सतगुरु के धाम । ।
धुरपद सतपद पहुँच कर, ले सच्चा विश्राम ॥21 ॥
मात्र लेना हो सो जल्द ले, कही सुनी मत मान ।
लेना दान का रूप है, गुरु बानी परमान ॥22 ॥
495. घट में नूर प्रकाशिया, बरस गया चहुँ ओर ।
जगमग जगमग हो रहा, बढ़ा नूर का जोर ॥1 ॥
नूर नूर सब कोई कहे, नूर न जाने कोय ।
गुरु गम परख का ज्ञान जो, नूर कहावे “सोय ॥2 ॥
आदि अन्त यह नूर है, छाय रहा भरपूर ।
जो न लखे इस नूर को, तिस आंखन में धूर ॥3 ॥
घट में प्रेम प्रगट भया, आंसू निकले नैन ।
धोगये छिन में नैन दोउ, अब लख नूर का सैन ॥4 ॥
राधास्वामी रूप में, दरस नूर का पाय ।
तिमिर मिटा अज्ञान का, सतगुरु भये सहाय ॥5 ॥
496. दुख आया जब देह में, मीठा लागा नाम ।
यह सुख गति अनमोल है, हिय पाया विश्राम ॥1 ॥
दुख साबुन है देह का, मल दे छांट बहाय ।
मल तज निर्मलता मिले, जो गुरु होय सहाय ॥2 ॥
दुख आया और सुख गया, पाया दंड शरीर ।
कर्जा मेटा काल का, चित से बना गंभीर ॥3 ॥
सुख से भूला नाम को, दूजा ने दिलाई याद ।
बुरा कहूँ क्यों दुख को, दुख में सुख का स्वादः ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मेटो मन की पीर ।
नाम जपू लवलीन हो, हिय रहे धीर गंभीर ॥5 ॥
497. रंग रंगी जब घट की चुनरिया ।
नाचे रंगीली सुरत बहुरिया ॥
गुरु ने रंग दिया गाढ़ा रंग ।
क्यों करे काल करम चित भंग ॥
नहीं हो सुरत कुरंगी मेरी ।
लाख हो माया की हेरा फेरी ॥
दुख न सतावे न चिंता व्याये ।
अन्तर में रहूँ आपहि आपे ।
कोटि काल झकझोले माया ।
चित न भंग हो गुरु की दाया ॥
अंतमती सत गति मेरे भाई ।
राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाय ।
सुरत बहुरिया गुरु गुन गाय ॥
498. जाके मन विश्वास है, सो है मन का धीर ।
शान्त चित्त निर्धान्त भया, आनन्द हर्ष शरीर ॥1 ॥
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।
होनी अनहोनी दोउ, टार सके नहिं कोय ॥2 ॥
दाता मौज की परख नहीं, मौज अगाध की बात ।
के जाने सेवक कोई, के जाने कोई साध ॥3 ॥
मौज भरोसे साध जन, मौज का घर विश्वास ।
मौज अधीन बसे सदा, धार गुरु की आस ॥4 ॥
राधास्वामी मौज में, रहूँ मगन मन माँह । ।
क्यों मन अब चंचल बने, गुरु ने पकड़ी बाँह ॥1 ॥
499. एक भरोसा गुरु का, मन व्यापा दिन रात ।
सोते फिरते जागते, गुरु का सिर पर हाथ ॥1 ॥
शब्द गुरु चेला सुरत, रूप अनूप महान । ।
एक घट में एक गगन में, सुरत शब्द पहिचान ॥2 ॥
शब्द सुरत मिल एक जब, गुरु चेला तब एक ।
मुरत शब्द अभ्यास से, उपजे हिये विवेक ॥3 ॥
सुरत शब्द भंडार है, शब्द सुरत भंडार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, प्रगटा हिये विचार ॥4 ॥
बिना शब्द के सुरत नहीं, सुरत बिना नहीं शब्द ।
गुरु मुख प्यारा कोई लखे, क्या है शब्द अशब्द ॥5 ॥
500. राधास्वामी सत्त है, और सकल सब झूट ।
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खूट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम गह, मन मन्सा को त्याग । ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
सुमिरन राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद हैं, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोट कोट परनाम ॥5 ॥
चौपाई ॥
501नाम रूप दोउ अकथ कहानी ।
बरनत बने न जाय बखानी ॥
जो चाहे सत आनन्द ज्ञाना ।
गुरु समीप सो जाय सुजाना । ।
: तसंग करे बचन को सुने ।
सुन सुन बचन चित्त से गुने ।
गुन कर बचन सो करे अहारा ।
परमारथ से बाढ़े प्यारा ।
पुष्ट होय मन को सोधे ।
निर्मल मन निर्मलता बोधे ।
दोहामन की निर्मलता मिले, भागे मन से पाप ।
गुरु का रूप लखे तब, गुरु फिर प्रगटें आप । ।
श्रद्धा बड़े प्रीत हिय बाढ़े ।
चित की दुचिताई को काड़े ॥
गुरु से नाम की विधि तब पूछे ।
करे कमाई तब कुछ सूझे ॥
प्रथम सहस दल करे निबासा ।
देखे घट में बिमल बिलासा ॥
जोति विराट का दर्शन पावे ।
जोति निरंजन लख हरखावे ॥
घंटा शंख सुने धुन दोई ।
चित से दुर्मति अवगुन खोई ॥
दोहानाम रूप जब लख परे, उपजे अति आनन्द ।
हरख हरख आलस तजे, सुमति होय मति मन्द ॥
कुछ दिन सहसकमल में बासा ।
फिर आगे पग धरे हुलासा ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
सुगम सुभाव सुकृत सुशीला ॥
लाली उषा लाली जोती ।
लाल रंग के पन्ना मोती ।
श्रुति स्मृति का ज्ञान बिचारे ।
सुन सुन श्रुति अपना मन हारे ॥
ओम् मृदंग की धुन अति निर्मल ।
वेद मंत्र का धारे चित बल ॥
दाहायह गुरु का अस्थान है, यह रचना की खान ।
ओम् मंत्र का बीज है, मूल तत्व का ज्ञान । ।
घट में गुरु घट ही में चेला ।
घट में खेले खेल सुहेला ॥
घट का सतसंग यहां तब पावे ।
गुरु मिले तब भेद बतावे ॥
गुप्त भेद यह मर्म कहानी ।
समझे कोई गुरु मुख गुरु ज्ञानी ।
शब्द गुरु चेला सुरत होई ।
शब्द सुरत मिलि भव दुख खोई । ।
शब्द सुरत गुरु चेला जान ।
जो गुरु कहे सुरत सोई मान ।
502. जब लग कोई न समझे बात ।
सुने कहे चाहे उत्पात ॥
अन्ध बहर को क्यों समझाये ।
बिन विवेक कुछ हाथ न आवे । ।
गुरु पशु सार भेद नहीं पाये ।
विद्या पशु बातों अटकावे ॥
ज्ञान पशु समझे नहीं ज्ञान ।
मान पशु तप अटका अभिमान । ।
योग पशु सिद्धि में जकड़ा ।
तय पशु ता धूनी का लकड़ा । ।
भक्ति पशु सूझे न विवेक ।
यह नहीं लखे अनेक न एक । ।
सार भेद किसको समझाऊँ ।
झगड़ा मेट मौन बन जाऊँ ॥
राधास्वामी गुरु ने तत्व लखाया ।
उनकी दया हमहुँ कुछ पाया ।
503. नाम भेद है सबका सार ।
नाम दुख से दे छुटकार । ।
नाम बसे त्रिलोकी पार ।
तू टू हे जिभ्या रस द्वार ।
नाम ओम् है नाम है सोहंग ।
नामहि सारंग नामहि रारंग ॥
नाम सत्त है सत्त की धुन ।
नाम की धुन ऊचे चढ़ सुन ।
पंच नाम का लेकर भेद ।
जप निज नाम मिटे जग खेद ॥
बिन गुरु नाम हाथ नहीं आवे ।
गुरु मिले तब नाम बतावे ॥
नाम श्रवन कर नाम मनन ।
नाम धार तब निध्यासन ।
साक्षात जब नाम करेगा ।
तब नहिं जग के शोक मरेगा ।
राधास्वामी सन्त स्वरूप ।
नाम दान मेटा भव कूप ।
504. अपने आपका धारो प्रेम ।
तब समझोगे प्रेम के नम । ।
अपनी समझ आप जब आवे ।
तब परमारथ गुरु लखावे ॥
अपना भला आप तुम करो ।
औरन के पीछे न मरो । ।
अपनी आंख खुले जब भाई ।
तब ही गगन प्रकाश दिखाई ॥
अपनी मौत स्वर्ग का दर्शन ।
बाकी सब मिथ्या है भाषन ॥
आप जिये तब ही जग जिया ।
आप मरे पीछे क्या रहा ।
आप आपको आप सँबारो ।
अपनी बिगड़ी आप सुधारो ॥
तब गुरु पूरे होंय सहाई ।
बनत बनत तेरी बन आई ।
जो नहीं समझेगा यह बानी ।
सो तो मूढ़ गूढ़ अज्ञानी ॥
राधास्वामी दीन दयाल ।
सार सुझाकर किया निहाल ॥
दोहाविना ओम् शनी सुने, ज्ञान न पाओ मीत ।
ऋषि मुनि या को कहें, घट का निज उद्गीत । ।
ओम् पाय सुरत हरखाई ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी धाई ।
लखा अविद्या का तहां रूप ।
प्रगटा काल जगत का भूप ॥
गुरु के नाम तिमिर सब नासा ।
चन्द्र जोत का भयो उजासा ॥
सुन्न महामुन्न लखा पसारा ।
मान सरोवर आसन मारा ॥
ज्ञान ध्यान असनान कराई ।
सुरत हंस गति पा हरखाई । ।
दोहाहंस ब्रह्म छवि अद्भुति, शोभा अमल अपार ।
लख लख अलख महान गति, सूझा अमल अपार ॥
आपा बिसरा जगत मुलाना ।
मिटा काम मद भया अमाना ॥
यकटक रूप दृष्टि जब आया ।
तेज पुज प्रकाश सुहाया ।
वानी चार गुप्त धुन जागी ।
सुरत प्रेम भक्ति रस पागी ।
सरंग सारंग सरंग सारंग ।
मंत्र एकाक्षर शिव मन धारंग ॥
मुनत सुनत मन भया बिस्माध ।
सुन्न महा उन्न लगी समाध । ।
दोहादेह गेह की सुध गई, हंस की आई चाल ।
दशा सुहानी पाय कर, सूरत भई निहाल ।। ।
कुछ दिन सुन्न समाध रचानी ।
मिला ज्ञान तब हुई बिज्ञानी ।
आगे को फिर किया पयाना ।
भैपर गुफा की ओर ठिकाना ॥
छाया माया माया छाया ।
अपना निज आकार दिखाया ।
झांई में निरखी परछाई ।
सोई परे का ब्रह्म गोसाई ॥
परछाई की जोति अनूपम ।
लख लख चन्द्र सूर से उत्तम । ।
दोहामुरली बाजी गुफा में, सोहंग से हंग धुन ।
विस्माधि बिसमत सुरत, अभय भई तेहि संग । ।
खिड़की निरख चली आगे को ।
पांव न धरे भूल पाछे को । ।
प्रगटा तब सत का मेहाना ।
बीन मधुर धुन आई काना ।
सत्त पुरुप का दर्शन पाया ।
कोटिन सूरज चन्द्र लजाया । ।
जगमग जगमग जगमग होई ।
दरस परस पावे नर कोई ॥
बड़भागी जो यह पद भाये ।
आगमन सकल विधि नाये । ।
दोहासतपद निरख परख कर, गई अलख के द्वार ।
अगम अनाम के पार चढ़, राधास्वामी दरबार ॥
505. रूप अरूप सरूप नहीं तू ।
नहीं परजा और भूष नहीं तू ॥
ब्रह्म न माया ब्रह्म पसारा ।
त्रिलोकी की हद से पारा ।
परब्रह्म पद से भी परे ।
सत्त असत्त दोनों के बरे ॥
नूर कलाम न धूप न छाई ।
कैसे तुझको लखू गोसाई ॥
ॐ रमेनी ॐ
506. बन्धन देह गेह भी बन्धन ।
बन्धन द्वष नेह भी बन्धन । ।
सुयश कर्म बन्धन ही बन्धन ।
कुजश मर्म बन्धन ही बन्धन ॥
सुत पितु मात त्रिया सम्बन्धी ।
समझो इन सबको बन्धन भी ॥
काम बन्ध बन्धन है धर्म ।
अर्थ बन्ध बन्धन है मर्म ॥
विद्या ज्ञान दान सब बन्धन ।
जान पिछान मान सब बन्धन । ।
बन्धन दुख कलेश की खानी ।
बन्धन तोड़े कोई कोई प्रानी ॥
बन्ध न कटे मुक्ति क्यों पावे ।
बिन मुक्ति सुख चैन न आवे ॥
( साखी )
507. साध मिले जग के टले, आपत विपत कलेस ।
धन साधु का भाव है, धन साधु का भेस ॥1 ॥
दुख तो अपने सिर सह, सेवक को सुख दे ।
ऐसी दया के बदल में, साधु कुछ नहीं लें ॥2 ॥
धन साधु का रूप है, धन साधु का ढंग । ।
साई हमको दे सदा, साधु जन का संग ॥3 ॥
साथ कपास समान हैं, सहें कोटि तन पीर ।
औरन के अवगुन ढके, ऐसे धीर गम्भीर ॥4 ॥
आप जले दुख अग्नि में, जलते को दें नीर ।
साधु की महिमा बड़ी, साधु सम नहीं बीर ॥5 ॥
पर स्वारथ के काम में, साधु करें न देर ।
साध को अपने द्वार से, खाली हाथ न फेर ॥6 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, सारद शेष गनेश ।
महिमा जाने साध की, बरनत बने न लेस ॥7 ॥
साधु का दर्शन किया, अन्तर व्याये राम ।
नन्दु साधु पांव की, जूती मेरा चाम ॥8 ॥
साधू का दर्शन लहूँ, साध का निसदिन संग ।
आँसू प्रेम के नीर से, चरन पखारूँ अंग ॥6 ॥
साथ बड़े परमारथी, तर बर सरवर रूप ।
दया मेहर उपकार धन, महिमा अगम अनूप ॥10 ॥
ऋद्धि सिद्धि दे नहीं, दर्शन साध का दे ।
साध दरस की लालसा, और सकल ले ले ॥11 ॥
निर बन्धन होय बन्ध रहे, दुखी जीव के काज। ।
साधु महिमा गावते, नन्दू आवे लाज ॥12 ॥
क्या मुख ले अस्तुति करू, साधु अगम अपार । ।
नन्दू साधु दरसते, जा भव सागर पार ॥13 ॥
नहीं सीतल है चन्द्रमा, नहीं रवि में प्रकाश ।
नन्दू साध स्वरूप का, सीतल महा उजास ॥14 ॥
नन्दू सेवक साध का, स्वामी मेरे साध ।
सेवक स्वामी संग मिला, कटा कंदि अपराध ॥15 ॥
साध गुरु के रूप हैं, सत स्वरूप सत धाम ।
नन्दु साध के दरस से, मुख आवे सतनाम ॥16 ॥
साहेब साहेब क्या करू, साहेब मेरे साध ।
साहेब को हूँ हूँ कहां, साध से मिटे उपाध ॥17 ॥
अलख पुरुष की आरसी, साधु जिनका रूप ।
नन्द लख ले अलख को, अलख में साध अनूप ॥18 ॥
रमेनी
508. नहीं ब्रह्मा नहीं विष्णु महेश ।
नहीं नारद सारद नहीं शेष ॥
नहीं गोलोक नहीं साकेत ।
नहीं किसी से राग न हेत । ।
तीरथ बरत कर्म नहीं धर्म ।
संजय नेम न यम नहीं मर्म । ।
कुशल क्षेम ऐको कछु नाहीं ।
यह सब काल बली की छाई ॥
माया कर्म काल नहीं सोई ।
बिरला यह गति जाने कोई ॥
साखीराधास्वामी ने कही, खोल मर्म विस्तार ।
__कोई सतसंगी सुने, सार का करे विचार ॥
509 राधास्वामी अगुन सगुन राधास्वामी ।
राधास्वामी शब्द है धुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अन्त राधास्वामी ।
राधास्वामी साध सन्त राधास्वामी ॥
साध आदि के सहित रहाया ।
सन्त अन्त के मध्य समाया ॥
राधास्वामी किरन सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी निकट दूर राधास्वामी । ।
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी अब हैं तब राधास्वामी ।
साखीराधास्वामी की दया, पाया भेद अभेद ।
राधास्वामी गुरु मिले, मिटा भर्म भव खेद । ।
510. जब नहीं नाम अनाम सनामी ।
तब मे सत्तपुरुष राधास्वामी ॥
वेद न ब्रह्मा काल न माया ।
शब्द न सुरत न धूप न छाया ।
रूप रंग रेखा नहीं होई ।
राधास्वामी नाम न कोई ॥
आप आप में आप बिराजा ।
सृष्टि प्रलय का दल नहीं साजा ॥
पुहुप मध्य ज्यों बास सुवासा ।
उनमनि रूप अगोचर भासा ॥
मौज हुई धारा बह निकली ।
अगम अलख सतपद आ ठहरी ॥
प्रगटा काल कला बन आई ।
भँवर गुफा माया रही छाई ॥
माया बंसी तपा पुनि काल ।
तप कर सोहंग सोहंग चाल ॥
बंसी बजी फंक ज्यों बानी ।
पवन धूम अग्नि खम पानी ॥
नहीं तत्व पर तत्व का बीजा ।
भाप रूप ज्यों रहे पसीजा ॥
धार फुटी नीचे चल आई ।
जड़ अचेत की भांति रहाई ॥
सोई सुन्न महासुन्न कहावे ।
रारंग सारंग बानी गावे ॥
धारा फुटी त्रिकुटी में आई ।
सूक्ष्म तत्व गुन तीन रचाई ॥
संपुट मार आप में आपा ।
अ उ म त्रिलोकी नापा ॥
सो पुन दशा ब्रह्मांडी मन ।
ओंकार का प्रगटा तन । ।
फिर सोई सहस कवलदल उतरा ।
काली कला जोत छबि सुथरा । ।
साखीयह विराट का देह है, महानन शत सीस ।
प्रगटे पाँचों तत्व यहाँ, और प्रगटी पचीस ॥
511. कंठ करे आकास निवास ।
हृदय पवन धारे निज भास ॥
नाभी अग्नि इन्द्री जल ठहरा ।
गुदा पृथ्वी का मंडल पहरा । ।
दुरगा कंठ हृदय शिव धामा ।
नाभी विषणु पाया विश्रामा ।
इन्द्री ब्रह्मा रचे शरीरा ।
गुदा गनेश बसे मति धीरा ॥
पंच देव सो विराट रहावें ।
पंच तत्व तन माँह समावे ॥
यह रचना का भेद सुनाया ।
जैला ब्रह्म जीव तस गाया ॥
ब्रह्म तीन गुन तीन ही नाम ।
जीवह करे ब्रह्म के काम ॥
वह विराट अव्याकृत भाई ।
यही हिरण्यगर्भ कहलाई ॥
जाग्रत धरे विराट को भेस | स्वप्न में अव्याकृत का देस । ।
सुषप्ति हिरण्यगर्भ सोई भया ।
नहीं तामे कछु मोह और मया । ।
जीव के तीन नाम अब जानो ।
ब्रह्म जीव का भेद पिछानो ।
जाग्रत विश्व स्वप्न में तेजस ।
सुख पति सोई प्राग्य नाम तस । ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
यह वेदान्त का निश्चय ज्ञान । ।
यहां लग गम वेदान्त की भाई ।
आगे की कुछ खबर न पाई ॥
शौच लक्षना भाग और त्याग ।
वह नित गावे ज्ञान का राग । ।
दोहानेति नेति पुन कह सदा, चेतन रहा समाय ।
जीव ब्रह्म का भेद तज, चेतन भाग वताय ।
512. राधास्वामी भेद बताया ।
बिरला जीव की समझ में आया ।
पढ़ पढ़ ग्रन्थ ग्रन्थि भई गाढ़ी ।
मति दुर्मति सुमति अति बाढ़ी ॥
अहं ब्रह्म तत्वमसि भाखा ।
अहं प्रज्ञानं धर साखा ॥
अयं आत्मा ब्रह्म कहाना ।
चार बाक महावाक्य प्रमाना । ।
संतन की बातें नहीं जानी ।
बिन जाने सब भये अभिमानी । ।
जड़ चेतन में गये भुलाई ।
वह उपेक्षा बानी भाई । ।
नहीं वह जड़ नहीं चेतन नामा ।
जड़ चेतन है द्वत सकामा । ।
नहीं यह पद अहत द्वत यह ।
हत भाव ले दुख सुख को सह । ।
कोई ब्रह्म जाय करे निवास ।
कोई सुमेर गिरवर कैलास । ।
कोई समाने तत्व मंझार ।
कोई तत्व का लखा न सार ।
नन्द करो सन्त का संग ।
तब कुछ लखो सार का ढंग । ।
बिन सतसंग विवेक न जागे ।
बिन विवेक अनुभव नहीं पागे । ।
बिन अनुभव पद की गम नाहीं ।
यह सब भरम जोनि भरमाहीं ।
शालिगराम ने अनुभव भावा ।
अनुभव गति सर्वोपरि रावा । ।
दया दृष्टि से मोहि बताई ।
सो सब आज तोहि समझाई ॥
मुक्ति पदारथ सतसंग है ।
संगत करे सो तिसको है ।
दोहाआदि अन्त उत्पति कथा, आज सुनाया तोहि ।
जो सुनकर चिन्तन करे, मिटे भरम और मोह ॥
513. पृथ्वी मंडल सुरत से त्यागो ।
मन को उलट गगन को भागो ।
बाहर के पट बंद कराओ ।
अन्तर से तिलपट खुलवाओ ॥
सहसकमलदल देखो जोत ।
घंटा शंख सुनो धुन सोत ॥
अनहद बानी सुन सुन रीझो ।
अमी धार के रस में भीजो ॥
चित को साधो ध्यान जमाओ ।
सुमिरन भजन साथ लौ लाओ ॥
दोहा तीन बन्द लगाय कर, आंख कान मुख मू द ।
शब्द के सिंध नहाय सुरत, सुरत शब्द की चू द । ।
514. फिर त्रिकुटी में गुरु का दरस ।
चरन कमल मानसिक हो परस ॥
ओंकार मृदंग का साज ।
धुन जहां ओम् शब्द रही गाज । ।
वेद ज्ञान का यह अस्थान ।
बीज मंत्र का मिले निशान ॥
पाय निशान सुरत मन जागे ।
भक्ति प्रेम के रस में पागे ।
स्वामी सेवक यक मत होय ।
मनकी दुविधा जावे खोय ॥
दोहातीन बंद मध्य में लगे, प्रगटा गुरु का नाम ।
शब्द अनुमान प्रमान को, अन्तर देखा आन ॥
515. चित चकोर की दशा बताई ।
सुन्न महासुन्न तारी लाई । ।
हंस हंस की गति लख पाई ।
तिमिर त्याग प्रकाश को धाई । ।
उज्जल चन्द्र प्रकासा अन्तर ।
देह गेह सुध भूली दुस्तर । ।
सुन्न समाध की अकथ कहानी ।
समझत बने न जावे बखानी । ।
गरंग सारंग शब्द मुहाना ।
गढ़ सुमेर में गाड़ा थाना ।
दोहातीन बंद प्रताप से, बन्धन गया हराय ।
चिंता दुविधा मिट गई, मुक्ति पदारथ पाय ॥
516. सुन्न समाध का भया उथान ।
चली सुरत सोहंग अस्थान ।
बन्सी सोहंग भवर में बाजी ।
सूर प्रकाश देख भई राजी ॥
यहां से सहज समाध की बारी ।
जीवन मुक्त की दशा सवारी ॥
हँस चुने मोती मुक्ता मन ।
अपना भाग सराहे धन धन ॥
मस्ती छाई उमगा प्रेम ।
जग व्यवहार का तोड़ा नेम । ।
दोहातीन बन्द के तीन गुन, सुमिरन ध्यान भजन ।
भंवर गुफा प्रगटे सभी, हरख उठा तन मन ॥
517. फिर आगे की करी तैयारी ।
चली झूम सुरत मतकारी ॥
सत्त लोक का पाया नाका ।
कोटिन चन्द्र सूर छबि ताका ॥
सत्त सत्त बीना धुन सुनी ।
सुन सुन धुन अन्तर में गुनी । ।
पांच नाम के पांच अस्थान ।
पाचों लख लख लख हरखान । ।
जीवन मुक्ति दशा भई गाढ़ी ।
मुक्ति अवस्था की गति बाढ़ी । ।
दोहातीन बन्द लगाय कर, आगे को पद दीन ।
अलख अगम के पार चल, राधास्वाती पद लौ लीन ॥
518. यहां न बन्धन का भय कोई ।
मुक्ति आस लय चिंतन होई ॥
नहीं यहां काम न धर्म कहानी ।
नहीं यहाँ अर्थ न मुक्ति निशानी ॥
यह निज धाम सन्त का ऊँचा ।
बिरला सन्त यहां कोई पहुँचा ।
रूप रंग रेखा से न्यारा ।
त्रिलोकी के रहे सो पारा ॥
सोई अपना रूप कहावे ।
अधिकारी लख ताहिं सुनावे ॥
दोहा तीन बंद सब छुट गये, पाया पद निर्बान ।
राधास्वामी की दया, मिल गया ठौर ठिकान ॥
516. दोहाजो कोई चाहे नित्य सुख, करे गुरु का संग ।
गुरु संगत से पाइये, गुरु विवेक गुरु रंग ॥
गुरु बिन भक्ति न ज्ञान कुछ, गुरु कीजे कोई सन्त ।
परमारथ की आने समझ, जब गुरु निकट बसन्त ॥ ॥
चौपाई ॥
परमारथ का उभरे रंग ।
कर गुरु पूरे का सतसंग ॥
गुरु को खोज संग चित लाय ।
सो परमारथ युक्ति कमाय ॥
बिन गुरु भक्ति न ज्ञान न कर्म ।
बिन गुरु मिले न तत्व का मर्म ।
गुरु मत हो मन मता को त्यागे ।
ममता अहंकार सों भागे ।
गुरु संगत पावे सत ज्ञान ।
काठ की नौका तिरे पखान । ।
दोहागुरु की श्रद्धा मन बसी, उपजा दृढ़ अनुराग ।
यही राग का त्याग है, यही विवेक बिराग ॥
520 जो नहीं गुरु चरन से प्यार ।
मिथ्या है सब सोच विचार । ।
प्रेम प्रीत उपजे दृढघट में ।
सो सिष पड़े न जग खट पट में ।
वृत्ती यकटक लगे अखंड ।
सूझे अंड पिंड ब्रह्मड ॥
दरस परस सेवा सत्कार ।
करे सदा निज मति अनुसार । ।
भाव सुभाव प्रभाव भलाई ।
उमड़े प्रेम चित्त रहे छाई । ।
दोहाजब घट आवे यह दशा, जाग उठे अधिकार ।
बचन सुने सतसंग में, सेवक सहित विचार । ।
521 } सोचे समझे अपने मन ।
छांट धरे हिये गुरु बचन ॥
शब्द का करे सदा अहार ।
त्यागे मिथ्या भर्म विकार । ।
जो नहीं बात समझ में आवे ।
प्रश्न करे दुर्मति नसावे ॥
ॐ दुविधा भ्रान्ति मिटे जब सारी ।
शब्द योग साधे अधिकारी ॥
सीखें रीत करे फिर जतन ।
उलटे तिल लौटावे मन । ।
दोहासुमिरन ध्यान भजन विधि, जान मान सुविवेक ।
आसन मार एकान्त में, धारे गुरु की टेक ॥
522. तीसरा तिल चित वृत्ती निरोध ।
इसी योग से हो प्रबोध ॥
जब यह दशा लखे शिष अंतर ।
सहसकमलदल साधे मंतर ॥
यह कसरत विराट का थाना ।
नाका ब्रह्म अंड का जाना ॥
श्याम कंज में सूरत धरे ।
जोत लखे धुन श्रवन करे ॥
घंटा शंख मधुर धुन बानी ।
प्रगटे जोत प्रकाश निशानी ॥
दोहासुन अनहद और जोति लख, सुरत निरत हरषाय ।
बाढ़े प्रेम मगन मन, हिया जिया अति उमगाय ॥
523. कुछ दिन सहसकमलदल बासा ।
फिर दूजी मंजिल की आसा ॥
बंकनाल चढ़ त्रिकुटी धावे ।
ओंकार का दर्शन पावे ॥
ओंकार सतगुरु प्रसाद ।
धारे चित विरती को साध ॥
यह गुरु का अस्थान सुहेला ।
अन्तर सतसंग बचन का मेला ॥
सूरज लाल लाल रंग बाना ।
ओम् मृदंग धुन आवे काना ॥
दोहाएकटक नेन जमावई, एकचित सुन धुन बेन ।
देह दशा स्थिर करे, तब आगे की सेन ॥
524. त्रिकुटी साधन साध कमाये ।
साधु सोई जो यह पद पावे ॥
यह उपासना अन्तर भाई ।
यहां से गुरुमति चाल चलाई ॥
सुन्न मंडल की ओर सिधाये ।
द्वत सहज आसन मन भाये । ।
शीतल चन्द्र अमीरस पागा ।
जो लख पावे परम सुभागा ।
किंगरी सारंगी धुन की धूम ।
सुन सूरत रही भीतर झूम ॥
दोहासुरत निरत का रूप धर, नाच रहे सुन्न धाम ।
निरख परख अपनी दशा, पावे स्थिर विश्राम ॥
525. अंधकार जहां घोर व्यापा ।
सुरत निरत नहीं चीन्हे आपा ॥
सुन्न समाध की लाई तारी ।
महासुन्न सोई अकथ अपारी ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर सुहाना ।
नाम प्रताप सुरत लख जाना ॥
जगमग सूर्य स्वेत रंग चमका ।
प्रगटी सारंगी धुन हरखा ॥
मानसरोवर कर अस्नान ।
हंस सुगति मति सुबुधि सुजान ॥
दोहा कलिमल अवगुन धोयकर, निर्मल विमल अनूप ।
क्षीर नीर को छानकर, धरा हंसन का रूप ॥
526. कुछ दिन सुन्न समाध रचाई ।
पद अद्वत पाय हरपाई ॥
देह गेह की सुधि बिसरानी ।
कहत लजाय सुसमझ सुवानी ॥
नहीं वहां सांझ न भोर प्रभाव ।
नहीं वहां दाब कुदाव सुदाव ।
नहीं वहां निरख न परख विवेक ।
व्यापा एक एक ही एक ॥
मस्ती आय जमाई रंग , झूम रही अब सुरत अभंग ॥
दोहा सुन्न महासुन्न आनंद लहा, कुछ दिन कर अभ्यास ।
जीत लिया पद सुन्न जब, प्रगटा बिमल बिलास ॥
527. दृढ़ता आई उमगा मन ।
चौथी मंजिल किया जतन ॥
भंवरगुफा का नाका तोड़ा ।
सोहंग पद से नाता जोड़ा ।
बंसी बजी मधुर मृदु बानी ।
सुन सुन सुरत निरत मुसकानी ।
सोहंग सोहंग धुन सुन पाई ।
स्वत सूर सोहंग चित लाई । ।
जगमग जोत न जाय बखानी ।
लख लख सूर रोम एक जानी ॥
दोहा महाकाल का धाम यह ऊंच सिखर ब्रह्मन्ड ।
खिड़की लखे जो गुफा की, पाये हर्ष अखंड ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
528. आगे चली सुरत मतवारी ।
सत्त धाम की ओर सिधारी ॥
पद अनूप अव्यक्त अपारा ।
अप्रगति गति को बरने पारा । ।
हंस बंस और अंस सहाने ।
देखे सरत स्वरूप सुबाने ।
अधिष्ठान आधार महाना ।
पुहुप बास सम ताहि पिछाना । ।
पुहुप आधार बास ठहरानी ।
माया आदि जान तेहि ज्ञानी । ।
दोहा सत्त धाम कूटस्थ धुर, रचना का आधार ।
यही सार का सार है, द्वत अत के पार ॥
॥
साखी ॥
529. मैं मैं करते दिन गया, मैं से लगी लगन ।
मैं तजने का नंदुवा, कर कुछ जोग जतन ॥1 ॥
अकड़ा अकड़ा क्या फिरे, अकड़ को दे दे आग ।
मैं छूटे तेरी अभी, गुरु चरनन से लाग ॥2 ॥
द्वष ईर्षा डाह की, मन में भड़की आग ।
नर जीवन पाये अभी, पीठ फेर कर भाग ॥3 ॥
पढ़ा लिखा सोचा बहुत, पाया नहीं गुरु ज्ञान । ।
औरन के समझावते, खोया आप निदान ॥4 ॥
गुरु परिचय ले नन्दुवा, बिन परिचय क्यों बात ।
परिचय से अनुभव मिले, अनुभव आतम जात ॥5 ॥
कर्म करे कर्ता नहीं, सोई दास सुजान ।
कर्ता बनकर कर्म विधि, नन्दु कर्म न जान ॥6 ॥
करता हूँ कर्ता नहीं, कर्म करूं दिन रात ।
कैसे बने उपाध फिर, इस जग की उत्पात ॥7 ॥
नन्दू सुख गुरु चरन में, सुख सतगुरु के ध्यान ।
सुख है सुमिरन भजन में, कोई कोई बिरला जान ॥8 ॥
जग के दुख से भागकर, आया गुरु दरवार ।
अब दुख का मेरे यहाँ, नहीं कार व्यौहार ॥6 ॥
नन्दू करनी सबल है, निरबल वाचक ज्ञान ।
कथनी तज करनी करो, अनुभव गति परमान ॥10 ॥
नन्दू कथनी हम तजी, करनी से लव लाय । ।
गुरु की दया अपार से, अनुभव गम गति पाय ॥11 ॥
पोथी अटके पाठी समझो, ग्रन्थ में अटका ग्रन्थी ।
पुस्तक वाला पुस्तक झाड़े, विरथा नीर मथन्ती॥12 ॥
कोटिन ग्रन्थन बांच के, खुले न हिय के नैन ।
नन्दू करनी मन लगा, सुन गुरु का एक वैन ॥13 ॥
सौ बातों की एक बात, नन्दु सोच विचार ।
सतगुरु सत्तनाम सत्त, करनी सतसंग में सार ॥14 ॥
अच्छे अपनी जगह पर, मन बुधि चित अहंकार ।
नन्द यह नहीं रूप हैं, करनी सहित विचार ॥15 ॥
आप आप को जान ले, आप आप को मान ।
आप आप पहिचान ले, करनी संग जो ज्ञान ॥16 ॥
अपना बैरी आप तू , जो कथनी का भर्म ।
अपना मीत है आप तू , लख करनी का मर्म ॥17 ॥
जो करनी गुरु प्रेम दे, सो करनी है मुख्य ।
ऐसी करनी जो करे, लोक परलोक में सुख ॥18 ॥
नन्दू गुरु प्रताप से, समझ में आई बात । ।
जब करनी में चित लगा, छूट गया उत्पात ॥16 ॥
सत करनी चित ज्ञान है, उप आसन आनन्द ।
मन देहि सुरत माँज ले, कटे मोह का फन्द ॥20 ॥
पहिले करनी करम गति, पीछे अनुभव ज्ञान ।
ता पाछे आनन्द है, नन्दू सुन धर ध्यान ॥21 ॥
बिना कर्म नहीं ज्ञान कुछ, बिना ज्ञान नहीं सुख ।
नन्दू सांची बात यह, समझे कोई गुरुमुख ॥22 ॥
530. नर शरीर को पायकर, कर नर का व्यवहार ।
समता चित में धार ले, सत पथ में पग धार ॥1 ॥
जो तू फूल गुलाब का, हंसमुखता धर चित ।
रंग बास दे जगत को, यह उपकार के हित ॥2 ॥
जो तू वृक्ष समान है, सहकर धूप और मेह ।
पंछी को छाया सघन, फूल पात फल देह ॥3 ॥
जो तू गंग तरंग है, धो औरों का मेल ।
शीतलता का दाव दे, चलें जो तेरी गेल ॥4 ॥
जो तू हंस स्वरूप है, क्षीर नीर बिलगाय ।
त्याग नीर गह क्षीर को, हंस का यही स्वभाव ॥5 ॥
जो तू कमल का फूल है, रह जल जल उतराय ।
धन सम्पत कुल पायकर, मत मन में इतराय ॥6 ॥
जो तू गुरु का भक्त है, भक्ति में चित राख ।
ध्यान और का त्यागकर, गह गुरुभक्ति की साख ॥7 ॥
सन्त पन्थ में आयकर, पाल प्रेम की रीत ।
नदी नाव संजोग लख, सबके संग कर प्रीत ॥8 ॥
जो तू सीप तो स्वाति का, ज्ञान बून्द गह ले ।
मोती झलके हृदय में, शोभा सागर दे ॥6 ॥
मलियागिरि चंदन बना, बास बास से बास ।
काटे आय कुल्हाड़ जो, मुख कर बास सुवास ॥10 ॥
राधास्वामी आदि गुरु, आय चिताया तोह ।
उनकी समझ चेतावनी, त्याग मान मद मोह ॥11 ॥
531. गुरु सम दाता कोई नहीं, देखा जगत मझार ।
दीन हीन अधीन के, गुरु सच्चे रखवार ॥1 ॥
गुरु मिले सब मिट गये, मोह भरम जंजाल ।
अब चिंता भय कुछ नहीं, जब गुरु हुये दयाल ॥2 ॥
भक्ति दान गुरु ने दिया, भक्तिदान धन खान । ।
भक्ति से सब कुछ मिला, सत चित आनंद मान ॥3 ॥
दुर्लभ भक्ति का रतन है, गुरु बिन प्राप्त न होय । ।
विन गुरु ध्यान न ज्ञान कुछ, बिन गुरु मुक्ति न होय ॥4 ॥
मनमत से ममता बढ़े, घट आवे हंकार ।
गुरुमत से ममता घटे, नासे मूल विकार ॥5 ॥
गुरु मिले शीतल भया, शान्ती आई धाय ।
भ्रान्ती दुविधा मिट गई, जब गुरु हुये सहाय ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु मिले, सतसंग बचन सुनाय ।
अब कोई चिंता नहीं, मुक्ति का मिले उपाय ॥7 ॥
आस करो गुरु देव की, ले गुरु देव का नाम ।
गुरु आसा पूरन करें, चित को दें विश्राम ॥8 ॥
चलो पंथ में रात दिन, गुरु आज्ञा सिर धार ।
गुरु समरथ की कृपा से, एक दिन बेड़ा पार ॥6 ॥
मांगो तुमको मिलेगा, पूछ के उत्तर लो ।
ठोको और पट खुलेगा, राधास्वामी भजो ॥10 ॥
532. मैं साधु के संग हूँ, साधु मेरे हैं रूप ।
मुझमें साधु में भेद नहीं, कोई न प्रजा भूप ॥1 ॥
साधहि मेरे रूप हैं, मैं साधु का दास ।
साध सेव की लालसा, मेरे मन की आस ॥2 ॥
जो कोई सेवे साध को, मेरा सेवक सोय ।
साध सेव जो ना बने, सोहि आवत है रोय ॥3 ॥
साधु मेरे आत्मा, मैं साधु के साथ ।
तन मन धन से सेव करू , चरन लगाकर माथ ॥4 ॥
साधु रूप भगवंत का, दर्शन आवे ध्यान ।
भगवत की प्रसन्नता, साधु का सन्मान ॥5 ॥
मैं नहीं भूखा द्रव्य का, नाम रतन धन पाय ।
जो कोई अरपे कुछ मुझे, साधु के हेत चढ़ाय ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, मन में भय विवेक ।
मनसा वाचा कर्मणा, साधु साहिब एक ॥7 ॥
533. चित चकोर चन्दा लखे, मैं लखू सतगुरु देव ।
प्रेम प्रीत परतीत से, करूँ चरन की सेव ॥1 ॥
मैं न बिसारू नाम को, नाम न भूले मोह ।
नाम बसा जब हिये में, भूला काम और कोह ॥2 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को राखो साध ।
गुरु कृपा से सहज में, मन के मिटे उपाध ॥3 ॥
आंख कान मुख मूंदकर, करो शब्द अभ्यास ।
राधास्वामी की दया, चित्त न होय उदास ॥4 ॥
प्रीत प्रतीत की चाल चल, राखो गुरु का ध्यान ।
राधास्वामी की दया, सब प्रकार कल्यान ॥5 ॥
हाथ लगा रहे काम में, मन में गुरु का ध्यान ।
इस विधि जग में जतन कर, त्याग मोह मद मान ॥6 ॥
सुमिरन भजन और ध्यान में, चित को लो ठहराय ।
राधास्वामी की दया, भव का दुख मिट जाय ॥7 ॥
सांसों सांसों जात है, समय तुम्हारा खोय ।
सांस सांस गुरु नाम बो, जन्म सुफल सब होय ॥8 ॥
भजन करो आलस तजो, चित में रहे गुरू नाम ।
एक दिन गुरु की दया से, पूरन जग का काम ॥6 ॥
नाम भजो सुमिरन करो, गुरु पद का चित ध्यान ।
शब्द योग साधन किये, काल करे नहीं हान ॥10 ॥
ॐ चौपाई ॐ
534. पहिले भू लोक चित लाओ ।
भूः लोक में फिर चढ़ आओ ॥
देखो अचरज बिमल तमाशा ।
जड़ चेतन का ज्ञान प्रकासा ॥
धरे प्रकृती अचरज रूप ।
कोई भिकारी रंक कोई भूप ॥
चेतन अंश ने खेल खिलाया ।
जड़ को जैसा चाहा बनाया ॥
भुः लोक है मानुष पिंडा ।
प्रकृती का खेल अखंडा । ।
देह तजो देखो चित रूप ।
रूप देख तुम हो जाओ भूप ॥
भुवः लोक है चेतन धाम ।
व्येष्टि चित रखा उसका नाम । ।
535. फिर चलने की करो तैयारी ।
देखो ईश्वर आनंदकारी । ।
चढ़ चढ़ आओ स्वः लोक तुम ।
ओम् जपो तपो मोह शोक तुम । ।
पुरुष प्रकृति विराट स्वरूपम् ।
अद्भुत लीला अमित अनूपम ॥
आनंद मिल आनंद हो जाओ ।
छिन छिन ईश्वर के गुन गाओ ।
लाख हाथ और लाखों कान ।
कैसे कोई करे बखान । ।
वह सत है वह चित आनन्द ।
उसी की कृपा से छूटे द्वन्द । ।
पुरुष प्रकृती की वह जान ।
इस पद में लखो उसका ज्ञान ।
शिव शन्द सागर जोति निरंजन सन्त बताया ।
ईश्वर का यह रूप लखाया ॥
तुम चेतन व्येष्टि रूप ।
चेतन ईश समष्टि स्वरूप ॥
जड़ चेतन मिल बना है जीव ।
माया चेतन ईश्वर पीव ॥
जीव ईश का भेद बताया ।
गुप्त न राखा खुलकर गाया ।
536. सुरत चढ़ी ब्रह्मांड मंझार ।
महत तत्व का खोला द्वार ।
अंडा रूप ताहि मन माना ।
हिरण्यगर्भ का रूप पिछाना ॥
यह ब्रह्मांड महत की छाया ।
ओम् महः ताहि वेद बताया ॥
सुन्दर रूप बरनि नहीं जाई ।
महा ऋषि मुनि सुर नर गाई ॥
चित एकाग्र से उसको देखा ।
तब साधु किया हमने लेखा ॥
537. पंचम दर पंचम अस्थाना ।
ओम् जनः जन लोक ठिकाना ॥
अव्याकृत नाम सुन लीजे ।
तब उसके गुन को चित दीजे ॥
सुरत चली जन लोक में आई ।
बड़ी बनी जन पदवी पाई ॥
जो कोई इस मंडल तक आवे ।
श्रेष्ठ बने जन जनक कहावे ॥
सब में उत्तम सब में ऊँचा ।
धन्य भाग जो यहां तक पहुँचा ।
उत्तम मिल उत्तम पद पाया ।
उत्तम मिल उत्तम बन आया ।
यहां तक रूप रंग अरु रेखा ।
अब आगे का करो परेखा ॥
538. छटवां तपः लोक है भाई ।
तप बल की जहां प्रभुत्ताई । ।
ओम् तपः धरा उसका नाम ।
हंस गति का वह निज ठाम ॥
हंस बने तब किया निबेड़ा ।
नीर क्षीर का मिटा बखेड़ा ॥
छोड़ा नीर क्षीर लिया मन में ।
हर्ष शोक नहीं व्यापे सुपने । ।
तप करतब बल अधिक बढ़ाया ।
संस्कार सब तप से मिटाया ।
भस्म किया शुभ अशुभ कर्म सब ।
मिटे यहां अज्ञान भर्म सब ॥
परमहंस हुई सूरत प्यारी ।
सत्त धाम की भई अधिकारी ॥
539. चल सजनी अब सतगुरु धाम ।
सन्त कह जाहि सतपद ठाम ॥
सत्त लोक की खाड़ी आई ।
सतपद में जाय सुरत समाई ॥
रूप रंग रेखा तज डार ।
भवसागर के हो जा पार ॥
जो कोई सतपद आय समाये ।
रूप रंग रेखा मिट जाये ॥
सन्तन का यह सतपद धाम ।
सत्त कबीर कहें सतनाम । ।
नानक पीर ने यह समझाया ।
तुलसी साहेब निजकर गाया ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
विद्या गुप्त बताई सारी ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी पर मैं बल बल जाऊ ॥
राधास्वामी चरन शरन अब पाई ।
राधास्वामी गूढ़ तत्व समझाई । ।
राधास्वामी दृष्टि खोल जब दीन्हा ।
तब ही गूढ़ तत्व हम चीन्हा । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी दीन बन्धु सुख दाता ।
राधास्वामी गुरु समरथ पितु माता ॥
॥
सोरठा ॥
540. सत चित आनन्द रूप, बुद्धि से जानिये ।
तीनों का ले भेद, परम सुख मानिये ॥1 ॥
बुद्धि ज्ञान प्रकासिया, तब जन होय जाई ।
लहे बुद्धि निधि ज्ञान, मिले तब मान बड़ाई ॥2 ॥
कल्पित मान बड़ाई सब, मिथ्या तज डारो ।
तप से ताहि जराय, सत का लियो सहारो ॥3 ॥
सतपद ठौर ठिकान, वही सतधाम है ।
सन्तन किया बखान, सत्त सतनाम है ॥4 ॥
सुरत शब्द के जोग में, मन चित ठहराना ।
इंगला पिंडला छोड़ कर, सुखमन घर आना ||
मुखमन के घर राग, राग में अनहद पानी ।
अनहद बानी सुहावनी, सुरत शब्द निशानी ॥6 ॥
सुरत निरत यक अंग कर, मन ले ठहराई। ।
मन ही सोध ले साधुवा, तब सतपद जाई ॥7 ॥
दोहाशब्द मेद गुरु से मिले, बिन गुरु काज न होय ।
गुरु बिन ज्ञान मिले नहीं, यह भाखे सब कोय ॥
राधास्वामी दया करी, दीन्हा मेद बताय ।
मूरख जन चेते नहीं, कौन कहे समझाय ॥
541. दोहा
राधास्वामी सतगुरु, दिया शब्द का मेद ।
जो मानें इस शब्द को, मिटे भरम का खेद ॥
ॐ चौपाई दया मेहर गुरु उमड़त आई ।
परमारथ का पन्थ दिखाई । ।
पन्थ डगर घट भीतर दरसा ।
हुए प्रसन्न गुरु पद को परसा ॥
गुरु है समरथ अन्तर्यामी ।
गुरु के चरन सरोज नमामी ।
गुरु है परम पुरुष घट वासी ।
अमल बिमल निमेल सुखरासी ॥
गुरु मूरत निज हृदय धरना ।
गुरु का ध्यान निरंतर करना । ।
गुरु सुमिरन गुरु ही हैं ध्याना ।
गुरु है अगम सुगम गम ज्ञाना ॥
गुरु की खोज करो तुम भाई ।
गुरु की दया जाय कठिनाई ॥
गुरु का भजन गुरु की सेवा ।
गुरु समान कोई और न देवा ॥
दोहागुरु की अस्तुति बंदना, गुरु का सुमिरन ध्यान ।
गुरु के भजन से साधुवा, उपजे निर्मल ज्ञान ।
542. शब्द जोग की करो कमाई ।
चित से मेटो सब दुचिताई । ।
शब्द से भई जगत की सृष्टि ।
शब्द समष्टि शब्द है व्यष्टि ।
शब्द जीव है शब्द है ब्रह्म ।
शब्द से जावे भवका भमे ॥
शब्द आकाश का है भंडार ।
शब्द की महिमा का नहीं पार ॥
शब्द अनीह अनाहत शब्द ।
शब्द जिज्ञासा आरत शब्द ॥
शब्द ज्ञान की सूझ सुझावे ।
शब्द अर्थ और जतन बतावे । ।
शब्द शब्द का द्वार दिखावे ।
शब्द शब्द का भरम हटावे ॥
शब्दहि बानी शब्दहि सार ।
सार शब्द से हुये निस्तार ॥
दोहाशब्द शब्द में अंतरा, शब्द शब्द में भेद ।
___ सार शब्द लौ लाइये, जामे दुख न खेद ॥
543. शब्द अनाम नाम है शब्द ।
शब्द अकाम काम है शब्द ॥
शब्द अर्थ है शब्द अनर्थ ।
शब्द समर्थ शब्द असमर्थ ॥
शब्द गुरु और शब्दहि चेला ।
सब्द अनेक और शब्द अकेला ॥
साधन शब्द शब्द सिद्धान्त ।
शब्द भ्रान्त शब्द निरभ्रान्त ॥
शब्द कटावे जम की फाँसी ।
शब्द विनोद शब्द है हांसी ॥
शब्द कमावे सोई सियाना ।
शब्द न बूझे सो अज्ञाना ।
जग का शब्द जोनि ले आवे ।
गुरु के शब्द परम पद पावे ॥
शब्द का भेद गुरु से पाओ ।
बिन गुरु शब्द न कभी कमाओ ।
शब्दजोग अति सुगम है, निगम अगम गम सार ।
साधन शब्द का जो करे, देखे बिमल बहार ॥
544. राधास्वामी दया मिला मोहि ज्ञाना ।
जो कोई माँगेंहूँ मैं दाना ॥
गुरु ने बख्शा माल खजाना ।
ले अधिकारी चतुर सुजाना । ।
कुछ दिन आये करे सतसंगा ।
मन का मोह भरम होय भंगा ॥
320. भारत जिज्ञासु नर ज्ञानी ।
अरथाप्ति वा अज्ञानी ॥
चंचल मूड़ के क्रोधी कामी ।
मानी छली निपट अभिमानी । ।
पापी पाप ग्रस्त वा रोगी ।
भोगी सोगी अथवा जोगी ।
जाको मैं अधिकारी पाऊँ ।
गुरु का भेद प्रगट कह गाऊँ ॥
गूढ तत्व सब ताहि सुनाऊँ ।
भेद न राखू प्रेम जताऊँ ।
दोहाईश वाद का कथन नहीं, नहीं निरीश्वर वाद ।
दोऊ में मम परम प्रिय, करें न वाद विवाद ॥
545. शब्द बताऊँ सहसकमल का ।
नाद सुनाऊँ त्रिकुटी मंडल का ॥
सुन्न महासुन्न बानी चारी ।
भंवर गुफा मुरली झनकार ॥
सतपद बीन की धुनी लखाऊँ ।
अलख अगम के पार पहुँचाऊँ ।
धाम अनामी राधास्वामी ।
धुरपद पद सरोज निज धामी ॥
इतने पद सन्तों ने कहे ।
बिन गुरु मरम न कोई लहे ॥
पहिले तजो धाम नासूत ।
फिर आओ चढ़कर मलकूत ॥
ताके पार रहे जबरूत ।
इसके परे धाम लाहूत ॥
हूत पार है हूतुलहूत ।
समझे कोई ज्ञानी अवधूत ॥
दोहायह साधन योग का, नहीं विचार का काम ।
तज विचार करनी करे, तब प्रगटे सतनाम ॥
546. राधास्वामी राधास्वामी नित गुन गाऊँ ।
राधास्वामी धुन सुन सुन हरपाऊँ ।
राधास्वामी सम कोई और न दुजा ।
राधास्वामी धासै चित में पूजा । ।
राधास्वामी मेरे गुरु दातार ।
राधास्वामी संग में जाऊँ पार ॥
321 राधास्वामी परम पुरुष निरवान ।
राधास्वामी पर तन मन कुरवान ।
राधास्वामी प्रीत प्रेम उरझाया ।
राधास्वामी भक्ति में मन ठहराया ।
राधास्वामी नाम अमी रस पीना ।
राधास्वामी सत संगत चित दीना ॥
राधास्वामी की गति क्या कोई जाने ।
__राधास्वामी पद बिरला पहचाने ।
राधास्वामी नाम अनाम अमाया ।
राधास्वामी अमर अजर दिखलाया ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, व्यापा राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ॥
547. गुरु गुरु मैं निस दिन गाता ।
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रति पाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ॥
गुरु अनाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा ॥
गुरु समदर्शी गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सतचित आनन्द की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु अपारा ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का वार न पार ।
जिन देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ।
548. गुरु खालिक मखलूक गुरु हैं ।
गुरु आशक माशूक गुरु है । ।
गुरु में प्रेम गुरु में भक्ति ।
गुरु समान कोई और न शक्ति ।
गुरु धुरपद गुरु हैं निरवाना ।
गुरु समान कोई और न जाना ।
गुरु की शरनागत जब आया ।
भव का सकल विकार न साया ।
गुरु की बानी अगम ठिकानी ।
गुरु प्रताप कोई विरला जानी ॥
गुरु के शरन आये जब पानी ।
गुरु की महिमा तब कुछ जानी ॥
मैं भवरा गुरु कमल प्रकाशी ।
गुरु नित गुरु मूरत अविनासी ॥
गुरु जान गुरु हैं मेरे प्रान ।
गुरु सांस गुरु शब्द की खान ॥
दोहाएक गुरु की आस कर, त्याग जगत की आस ।
राधास्वामी चरन में, धार सदा विश्वास ॥
( साखी )
546. पढ़ा लिखा कुछ गुना नहीं, तोते जैसी रट ।
पेट की खटपट में रहे, यह विद्या सट पट ॥1 ॥
परमारथ करने चले, तिरिया पकड़े कान ।
पहिले घर को देख ले, पाछे कर तू ध्यान ॥2 ॥
भेस बनाये क्या भया, घर घर मांगी भीख । ।
धिक इस जीवन पर सदा, समझ न भाई सीख ॥3 ॥
चित नहीं ठहरे ध्यान में, भटक भटक भटकाय ।
खाली पेट बेरी कठिन, खुशी न हाय सुहाय ॥4 ॥
गले में कफनी डाल ली, बन स्वांगी दरवेश । ।
लानत ऐसी जिन्दगी, लानत ऐसे भेस ॥ ॥
ज्ञानी ध्यानी संजमी, रोटी के आधीन ।
मुक्ति न पावें सौ जनम, समझबूझ के हीन ॥6 ॥
पहिले लोक सुधार ले, तब पाछे परलोक ।
जो नहीं ऐसा करेगा, बहुत सहेगा शोक ॥7 ॥
कहता हूँ कह जात हूँ, कहता हूँ सौ बार ।
खाली पेट न हर भजे, मिथ्या ज्ञान बिचार ॥8 ॥
550. दोहाघट में काशी द्वारका, घट में गिर कैलास ।
घट में ब्रह्मा विष्णु हैं, घट है शिव का बास ॥
घट में सहसकमल दल जोती ।
घट में त्रिकुटी सिंध गति मोती ॥
घट में ओंकार विस्तारा ।
घट में निरखो ब्रह्म पसारा ॥
घट में सुन्न समाध रचाओ ।
घट में उनमुनी दशा समाओ ॥
घट में सोहंग घट में सत ।
घट में सूझे सन्त का मत ॥
अलख अगम घट की ठकुराई ।
राधास्वामी भेद बताई ॥
दोहाजो घट की लीला लखे, सूझे अगम अपार ।
बिन घट खोज न पाइये, सतगुरु का दीदार ॥
551. दुखी जीव सुख के सहकारी ।
बद्ध मुक्ति के है अधिकारी ।
बिन दुख सुख की चाह न आवे ।
बिना बन्ध मुक्ति नहीं पावे । ।
एक को टेक से छुटे अनेक ।
भक्ति भाव से बड़े विवेक ।
भक्ति ज्ञान और शुद्ध विचार ।
साधन से पावे उदगार ॥
सुमिरन भजन ध्यान चित लाओ ।
तब अधिकार ज्ञान का पाओ ।
शब्द योग बिन पन नहीं निश्चल ।
बिन मन निश्चल ज्ञान न निर्मल ज्ञान बिमल जब घट नहीं आवे ।
यह मन शांती कदापि न पावे ॥
ज्ञान रूप गुरु राधास्वामी ।
अस आदर्श के चरन नमामी ॥
गुरु ही इण्ट आदर्श परमपद ।
गुरु की मेहर से छूटे आपद ॥
तीन ताप भव दुख सब कटे ।
मन बुद्धि चित गुरु में बसें ॥
आनन्द पाय जो चित ठहराय ।
सहस ही सहस समाध जगाय ॥
सहज समाध परम पद जानो ।
सन्त मते का सार पिछानो ॥
बाद विवाद काम नहीं आये ।
साध वही जो भक्ति कमावे ॥
राधास्वामी दया काम बन जावे ।
सेवक फिर भव फन्द न आवे ॥
324.
॥साखी ॥
552. राधास्वामी सत्त है, और सकल सब झूठ ।
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खू ट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम कह, मन मनसा को त्याग ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव । ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद है, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोटि कोटि परनाम ॥5 ॥
॥
चौपाई ॥
553. मन पर निसदिन हो असवार ।
यह मन डाकू यह बटमार ॥
युक्ति शक्ति से जीतो वाको ।
सोच समझ बस लाओ ताको ।
मन के मते कभी नहीं चलना ।
नहीं तो अंत हाथ का मलना । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मन के घाट से होगये पारी । ।
554. कुछ दिन सतसंग की आस ।
कुछ दिन ध्यान भजन अभ्यास ॥
भजन ध्यान सुमिरन लौलीन ।
कुछ दिन गुरु चरनन में दीन ।
गुरु चरन में आपा मेटो ।
तब इस भव का टाट समेटो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति नियारी ॥
325
555 पहिले करम करो बिधि नाना ।
मूढ़ अवस्था मिटे सुजाना ॥
तब उपासना से रज जीत ।
चंचल वृत्ति न आवे चीत ॥
सत अज्ञान का भरम मिटाओ ।
तब कहीं ज्ञान की सम्पत पाओ ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
चौथे पद की करी तय्यारी ॥
556. मोर तोर की रसरी भारी ।
तासे बन्धे जीव संसारी ॥
बकरा ‘मैं’ कह गला कटावे ।
मैंना ‘मैं ना’ कह सुख पावे ॥
मैं मैं बुरी आग है भाई ।
‘मैं’ से जगत भया दुखदाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
‘मैं तज सेवक बना सुखारी ॥
557. धन दे धन का पावे दान ।
विद्या दे हो विद्यावान || ज्ञान रतन जो कोई दे ।
जग में यश और कीर्ती ले ॥
भक्ति देकर भक्त कहावे ।
तारे सबहि आप तर जावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
दान की परखी महिमा भारी ॥
558. ऊँचे पानी कभी न टिके ।
नीचा होय सो भर भर पीये ॥
सिर पर चढ़े सो गिर गिर जाय ।
पांव पड़े भक्ति फल पाय ॥
दीन दयाल नाम सतगुरु का ।
दीन दुखी हो दास चरनन का ॥
राधास्वामी शरन चरन बलिहारी ।
दीन भक्त की महिमा भारी ॥
559. प्रेम प्रीति की प्रीति अनूप ।
प्रेम से रंक दुखी होय भूप ॥
मरे जीव को प्रेम जिलावे ।
प्रेम अलौकिक वस्तु कहावे ॥
चामन प्रेम फन्द से बन्धे ।
नित बलि द्वारे निस दिन खड़े । ।
दुर्योधन का तज पकवान ।
खाया साग विदुर घर आन ॥
शवरी के बेर ससाद रस खाये ।
राम कृष्ण दोनों हाये । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
महिमा प्रेम की अकथ अपारी। ।
560. उलट सुरत को तिल में लाओ ।
रुद्र नेत्र में ताहि जमाओ ॥
मन को रोको मन परबोधो ।
मनहि सुधारो मन को सोधो ॥
वाह्य जगत की आस भुलाओ ।
आसा गुरु चरनन में लाओ ।
आसा मनसा दोनों मोड़ी ।
चरन कमल गुरु में चित जोड़ी ।
राधास्वामी नाम जीव निज घट में ।
आसन धारो तिल के पट में । ।
देखो घट में विमल तमामा ।
सहसकमल का जहां उजासा । ।
सूरज चांद की जगमग जोती ।
झलके तारे पन्ने मोती । ।
पांच रंग फुलवारी परखो ।
श्याम कंज तज जोत को निरखो ।
जगमग दीप जरे जहां भारी ।
जोत निरंजन शोभा धारी ॥
सुनो गगन का पहिला बाजा ।
अनहा शब्द तूर जहां बाजा । ।
भेद युक्ति का गुरु से लेना ।
बिन गुरु पग नहीं पंथ में देना ॥
कुछ दिन सहसकमल प्रकासा ।
फिर त्रिकुटी में करो निवासा ॥
ओंकार से लगन लगाओ ।
धुन मृदंग की गूजत पाओ ।
यह श्रति का मूल मुकाम ।
यहाँ से उपजे नूर कलाम । ।
गुरुपद का यह पहिला स्थान ।
गुरु बिन मिले न वेद का ज्ञान ।
ओंकार गुरु का है रूप ।
त्रिलोकी का अद्भुत भूप । ।
लाल भान का भया उजाला ।
अन्तर जागा शब्द रसाला ॥
जब गुरु मिलें तो भेद बतावें ।
निज स्वरूप ओंकार दिखा ।
गुरु पद पाय सुन्न को धाओ ।
महासुन चढ़ चढ़ ध्यान लगाओ । ।
परमहंस की गति है सोई ।
गंग जमन विच सरस्वति होई । ।
मानसरोवर कर अस्नाना ।
हंस गति का पाओ ज्ञान । ।
क्षीर नीर का करो निबेरा ।
गढ़ सुमेर में लागे डेरा ॥
दसवें द्वार का नाका देखा ।
कर प्रवेश फिर ताहि परेखो । ।
गुप्त चार बानी जहां रहती ।
बिन बानी सुरत दुख सुख सहती ॥
प्रथम घोर अंधियारी छाई ।
गुरु दया से ताहि नसाई ॥
चमका चन्द्र प्रकाश प्रकाशा ।
सुरत ने पाया विमल विलासा ॥
शिव शक्ति मिल एक समान ।
पुरुष प्रकृति न अंतर जान ॥
देख देख लीला अलबेली ।
आगे बढ़ी सुरत हरखेली ।
भवरगुफा की पांजी आई ।
माया काल रहे मुरझाई ॥
सोहंग सोहंग बन्सी बाजी ।
धुन बांसुरी अनूपम बाजी ।
जब कपाट घट का खुल जाय ।
तबही भवरगुफा सुरत आय ॥
जब सब मेटो मन की आसा ।
तब सतपद में पाओ बासा ॥
मन बानी के पार है सत ।
सतपद सन्तों का है तत ॥
सत सत बीन की धुन सुन पाई ।
अलख अगम के पार सिधाई ।
तिसके आगे धाम अनामी ।
सत्पुरुष सतगुरु राधास्वामी ।
रूप रंग रेखा से पारा ।
नाम अनाम दोनों से न्यारा ॥
561. सुरत चली पहिले अस्थाना ।
सहसकमलदल ठौर ठिकाना । ।
जोत जोत में जोत अनूपा ।
रूप रूप में रूप स्वरूपा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन सुन सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले सूरज प्रकास ।
प्रेम भरे दिन रात बिलास ।
सुख पाया जाका वार न पार ।
सारद शेष न बरनन हार । ।
दोहाजोत निरंजन का दरस, सो पहिला अस्थान ।
शब्द जोत की गम लखी, सूझा अधिक महान । ।
562. सुरत चली अब दूजा धामा ।
ऋषि मुनि सुर जन का निज ठामा । ।
ऊपा लाल लाल रंग देखा ।
देख देख अति किया परेखा ॥
लाय सूर चमका तहां भारी ।
खुली आँख से ताहि निहारी ॥
बानी वेद चार सुन पाई ।
ब्रह्मा निर्मल कथा सुनाई ॥
328. आई ओम ओम झनकारा ।
ओंकार हद दरसा सारा ॥
धुन मृदंग जहां निसदिन बाजी ।
मेघ नाद लंका गढ़ साजी ॥
सुवरन कली अनूपम लंका ।
मन से भागे सब ही शंका ॥
सीता राम की भई चढ़ाई ।
रावण रज का राज नसाई ॥
ज्ञान विवेक हृदय जब आया ।
गुरु प्रसन्न चित भेद बताया ॥
नूर कलाम त्रिलोकी सार ।
त्रिलोकी का मूल ओंकार ॥
दोहाजो कोई अन्तर में चढ़, देखे विमल बहार ।
जनम मरन के फांस से, मिले सहज छुटकार ॥
563. चौथा सुन्न महासुन्न ध्यान ।
मानसरोवर किया असनान ।
कर असनान ध्यान गुरु जागा ।
सहजहि मन बिसमाधी लागा ॥
ब्रह्मरेन्द्र का सिखर निहारा ।
चढ़ चढ़ भई त्रिलोकी पारा ॥
चौथे भवरगुफा की खिड़की ।
बंसी मधुर मनोहर कड़की ॥
हंस चुनें गज मुक्ता नित ।
क्षमा दया करुना रहे चित ।
दोहामन की दुचिताई गई, पाया पद अद्वत ।
सुन्न पार जब चढ़ गये, रहा न भय भव द्वत ॥
564. अब पंचम की किया तयारी ।
भँवर पार सत पद गति धारी ॥
सत्यम सत्यम बाना निर्मल ।
सुरत निरत हुये सुन सुन निश्चल । ।
सत में सत का सत्त प्रकाश ।
अद्भुत लीला अजब विलास ॥
बीन सुनी जहाँ मधुर सुहावन ।
मन ललचावन प्रेम बढ़ावन । ।
अलख अगम चढ़ आगे बढ़ी ।
फिर राधास्वामी चरन पड़ी ।
गुरु बल पाय किया भव पार ।
अब नहीं व्यापे भव संसार । ।
धन्य धन्य गुरु राधास्वामी ।
धन्य धन्य तुम चरन नमामी ॥
दोहाकोटि जनम का पंथ था, भटका बारम्बार ।
राधास्वामी की दया, अब हुये भवजल पार । ।
565. कथनी छोड़ करनी करो, करनी से रहो लाग ।
कथनी मिलावे छार में, करनी बढ़ावे भाग ॥1 ॥
अहं ब्रह्म न उचारिये, निस दिन कीजे कर्म ।
कथनी से हो भ्रान्ती, करनी मेटे भर्म ॥2 ॥
अहं ब्रह्म कहकर मुये, समझे नाहिं गवार ।
करम से निध्यासन बने, बोले बढ़े बिकार ॥3 ॥
श्रवन मनन कर लीजिये, तब निध्यासन होय ।
बिना कम क्या फल मिले, ज्ञानी बने न कोय ॥4 ॥
पोथी पत्रा में नहीं, ब्रह्म ब्रह्म का सार ।
पोथी पत्रा जो फंसे, व्याप रहा संसार ॥5 ॥
पोथी पत्रा ग्रन्थ में, माया लपटी देख ।
बिन सतसंग न ऊपजे, हृदय ज्ञान विवेक ॥6 ॥
मूल गवाया आपना, पढ़ पुस्तक की सीख ।
भूल भरम में फंस रहे, मांगे घर घर भीख ॥7 ॥
पहिले कर्म उपासना, पीछे सतगुरु ध्यान ।
ता पीछे सुन बन्धु जन, पावे सतपद ज्ञान ॥8 ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, छोड़ ग्रन्थ की आस ।
ग्रन्थ से ग्रन्थि पड़त है, ग्रन्थी भये निरास ॥6 ॥
कोटि ग्रन्थ पढ़ क्यों मरे, तत्व न आवे हाथ । ।
तत्व भेद तब पाइये, जब लीजे सतगुरु साथ ॥10 ॥
पहिले गुरु भक्ति करो, पीछे दूजा काम ।
ताके पीछे पाइये, सत्त नाम सत धाम ॥11 ॥
चौसाधन पहिले करो, पीछे गुरुमुख नाम ।
महावाक्य का फल लहो, मन पावे विश्राम ॥12 ॥
बिन गुरु पढ़ो न ग्रन्थ को, बिन गुरु लो नहीं नाम ।
बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु बने न काम ॥13 ॥
जब लग मन की गढ़त नहीं, तब लग सब बेकाम । ।
“दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम॥14 ॥
गुरु सतसंग में आयकर, साजा भक्ति साज ।
“गोरस बेचत हरि मिले, एक पन्थ दो काज ॥15 ॥
अहं ब्रह्म उचारते, खाया मूल को सोय ।
“ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय॥16 ॥
ग्रन्थ की ग्रन्थी पड़गई, सूझा वाद विवाद ।
अहं ब्रह्म के वाक्य से, मिला न ब्रह्म का स्वाद ॥17 ॥
अहं ब्रह्म दिन रात कह, चिंता वाढ़ी मन ।
घर में अनबन जब मची, भाग गये तब मन ॥18 ॥
घर बन एक समान कर, साज प्रेम का साज ।
भक्ति पदारथ पायकर, मिला ज्ञान का राज ॥16 ॥
566. भजन बिना कहो कौन संदेसा ।
भजन बिना नहीं मिटे कलेसा ॥
भजन प्रभाव जान सब कोई ।
बिन गुरु भजन ज्ञान नहिं होई । ।
गुरु भज भव से छूटे पानी ।
गुरु भज मिटे मोह मद मानी ।
घट में भज गुरु नाम निरंतर ।
भजन विहीन जान पशु सम नर । ।
नहीं विद्या नहीं बुद्धि विचारा ।
भजन से होय सकल निस्तारा ॥
दोहालौ लागी तब जानिये, नाम बिसर मत जाय ।
जीवत सुख आनन्द ले, अन्य परम पद पाय ॥
567. लौ लागी रहे आठों याम ।
मन निज मन में व्यापे काम ॥
नाम जपत भव सिंधु सुखाई ।
नाम जपत माया टर जाई ।
नाम से क्रोध मोह मद भागे ।
नाम से प्रीत रीत में पागे ।
नाम निशान अस्थान बतावे ।
नाम परम पद ले पहुँचावे ॥
सहज सहज ले नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन ॥
दोहानाम जपो घट अन्तरे, अन्तर नाम निशान ।
सुरत शब्द के योग से, पाया नाम ठिकान ॥
568. घट में शब्द सुनो घट आओ ।
बाहर के पट सकल गिराओ ॥
खोलो घट का पट दिन राती ।
चमके जोत दिया बिन बाती ॥
बरसे जोत अखंडित धारा ।
अन्तर चमके सूर सितारा ॥
सुरत शब्द धुन सुरत शब्द धुन ।
सुनत सुनत भई सूरत उनमन ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
भजन प्रभाव जीव बहु तारी सोरठाराधास्वामी नाम, नित हित चित से गाय ।
भव दुख आपति नास, सहज परम पद पाय ॥
दोहाराधास्वामी दया करी, शब्द जहाज चढ़ाय ।
भवसागर के भंवर से, दीना पार लगाय ॥
569. सूरज लाल लाल अस्थाना ।
गुरु ने बताया गुरु का ठिकाना ॥
ठुमक चली सूरत मतवारी ।
देखे अचरज बाग कियारी ॥
फूल खिले भँवरे मंडलाये ।
शोभा अद्भुत बरनि न जाये ॥
ओंकार का पाया धाम ।
ओम् धुनी जहां आठों याम ॥
बाजत मृदंग शब्द सुहाई ।
बिजली चमके आभा छाई । ।
मेष नाद सुन अचरज लीला ।
सुन सुन सूरत भई सुशीला । ।
त्रिलोकी का नाका पाया ।
देख देख मन अति हरखाया ॥
नाद शब्द और मूल कलाम ।
वेद ज्ञान का त्रिकुटी धाम । ।
570. शब्दहि सारा शब्द निज सारा ।
शब्दहि माया ब्रह्म विचारा ॥
शब्द सांख्य और शब्द वेदान्त ।
शब्द न्याय और शब्द सिद्धांत ॥
जो कोई करे शब्द अभ्यासा ।
लूटे जग की आसा त्रासा ॥
शब्द मेद सतगुरु से लीना ।
सुन सुन शब्द शब्द चित दीना ॥
शब्द की महिमा वेद बखाने ।
शब्दी होय शब्द सोई जाने ।
शब्द मंडल में रचा विलासा ।
शब्द सुने कोई गुरु का दासा ॥
सुन सुन अंतर शब्द सुहेला ।
सुरत शब्द का होगया मेला ॥
मेला भया सुरत मगनानी ।
गई परम पद चित हरखानी ॥
जहां न रंग रूप नहीं रेखा ।
जहां विचार न गिनती लेखा ॥
धुरपद पहुँच सार निज पाया ।
राधास्वामी चरन जाय लिपटाया ।
दोहागुरु चरनन बल जाइये, दीना शब्द बताय ।
बन्ध काट निज दास के, लीना अंग लगाय ॥
571. उलटो तिल देखो असमाना ।
सुरत निरत का ठौर ठिकाना ॥
फर्श को छोड़ अर्श पर आओ ।
गगन मंडल पर कुर्सी बिछाओ ।
कुर्सी बैठ करो तुम राज ।
सुरत निरत का साजो साज । ।
तिल को फेर फेरदो तिल को ।
उलट पलट ठहराओ दिल को ॥
बंक नाल का नाका देखो ।
सहसकवलदल जाय परेखो ॥
घंटा शंख सुनो धुन दोई ।
तिल की जोत जोत लखो सोई ॥
572. फिर त्रिकुटी चढ़ आसन मार ।
देखो बिमल रूप ओंकार ।
झांझ मृदंग सुनो झनकार ।
मेघनाद ओम दरबार ।
बन परबत बाटिका सुहाई ।
महल अनूप भूप छवि जाई ।
गंग जमन बिच सरस्वती धारा ।
न्हाये धोये सुरत करे सिंगारा ॥
वेद मंत्र का निज अस्थान ।
ब्रह्मा कथे ज्ञान और ध्यान ॥
देखा नूर और सुने कलाम ।
मूल कलाम का यह निज धाम ॥
तीन रूप लीला विस्तारी ।
तीनों की गति लगी अति प्यारी ॥
हिरण्यगर्भ विराट पसारा ।
अव्याकृत लखि त्रिकुटी द्वारा ॥
वेद तत्व को लीना चीन्ह ।
फिर आगे चित सूरत दीन ।
573. आया नजर सुन्न मैदान ।
लामकान लाहूत स्थान ।
मेरु सुमेरु गिर कैलास ।
शिव सकनकादिक करे बिलास ।
मान सरोवर हंस निवास ।
अमी रहा जुल्मात के पास ॥
आव हयात अमी की धारा ।
अजरज अद्भुत खेल नियारा ॥
अन्धकार की घाटी दरसी ।
भेद खुला जब गुरुपद परसी । ।
महासुन्न तिस ऊपर रहे ।
परब्रह्म पद सब कोई कहे । ।
किंगरी सारंगी धुन नाद ।
छाई मस्ती लगी समाध । ।
भंवरगुफा की खिड़की खोली ।
सुनी सुरत मैं सोहंगम बोली ॥
मुरली बजी मचाई धूम ।
ऊँची चढ़ गई सूरत झूम ॥
महाकाल का गढ़ अब टूटा ।
माया मोह साथ जब छूटा ॥
574. सत्त लोक चढ़ सूरत आई ।
सतपद लखा सत्त ठहराई ।
सत्त सत का सत आनन्द ।
यहां न माया काल का द्वन्द । ।
हुई सुरत अब सब से न्यारी ।
भरम अविद्या छूटी सारी ॥
मिला ज्ञान मेटा अज्ञान ।
निज स्वरूप का हो गया भान ।
अगम अलख और लखा अनामी ।
परे ताहि पद राधास्वामी ॥
गुरु ने पूरा भेद बताया ।
उलट फेर तिल सबही दिखाया ।
फेरे तिल और ऊपर चढ़े ।
रेखा रूप रंग से टरे ।
क्या कोई उसका करे बखान ।
गुरु ने बख्शा पद निरवान ॥
575. घंटा शंख सुनो धर कान ।
सहसकवल चढ़ लाओ ध्यान । ।
त्रिकुटी चढ़ मृदंग बजाओ ।
ओम् शब्द में चित को लाओ ॥
सुनो गगन में अद्भुत बाजा ।
अनहद राग जहां नित गाजा ॥
सुन्न सरोवर मैल छुड़ाओ ।
त्रिवेनी में जाय नहाओ ॥
किंगरी सारंगी वहां सुनो ।
सुन सुनकर मन अपने गुनो ।
महासुन्न का नाका तोड़ो ।
भान रूप में चित को जोड़ो ॥
भवरगुफा की खिड़की खोलो ।
मुरली बंसी की धुन बोलो ॥
सत्तलोक में बीन बजाओ ।
सत सत हक हक धूम मचाओ ।
आगे अलख अगम अनामी ।
ताके आगे पद राधास्वामी ।
चरनकवल गुरु सीस झुकाओ ।
सुरत शब्द के मारग आओ ।
देखो घट में बिमल बिलासा ।
अचरज अद्भुत अजब तमाशा ॥
576. सबसे ऊचा सत्याकार ।
सुरत शब्द का जो भंडार । ।
इससे नीचे सोहंकार ।
माया काल का जो दरबार ।
उससे उतर कर शून्याकार ।
जिससे प्रगटा यह संसार ।
शून्याकार से रारंकार ।
सहज समाध का जहाँ विचार । ।
चौथा तुम जानो ओंकार ।
अ उ म त्रिलोको सार । ।
सत रज तम की त्रिपुटी भाई ।
साधु साध साधन गति पाई ॥
पचयां कहो सहस्राकार ।
योग युक्ति का पहिला द्वार । ।
कमलप्तहादल और सहबार ।
सतसंगी कोई समझे सार ।
एक ओंकार सागुरु प्रसाद ।
सहपकमल चढ़ कीजे याद । ।
राधास्वामी भेद बतावें ।
अने हंस को आय वितावें ॥
रमेनी
577. जब जागे तब जग व्यौहार ।
इन्द्री ज्ञान का सकल पसार ।
जब सोये अन्तर में आये ।
सूक्ष्म जगत को लख हरषाये ।
गहरी नींद में सुव का भान ।
परख के समझो पाओ ज्ञान ॥
शब्द सुना और शब्द को देखा ।
किसा शब्द का बहु विधि लेखा ।
शब्द भेद है शब्द का ज्ञान ।
शब्द प्रतान शब्द अनुमान ॥
शब्द शब्द का किया बखान ।
सन के बिरला साध सुजान । ।
दोहाराधास्वामी ने कहा, आपको आप पिछान ।
अपने आप में आप लख, और का कहा न मान । ।
रमेनी 578. शब्द योग सबका है टीका ।
सहज सुगम सीधा और सच्चा ॥
घर में रहकर साधन कीजे ।
साधन से सुख आनन्द लीजे ।
शब्द योग से दुख नहीं कोय ।
सहजे पके सो मीठा होय ॥
शब्द योग दुख दूर करावे ।
शब्द योग सुख चित उपजावे ॥
शब्द योग की महिमा भारी ।
उसका सब कोई है अधिकारी । ।
साखीसुख तो है कही और ही, तू ढूँढ़े कहीं और ।
भूल भरम में पड़ गया, नहीं ठिकाना ठौर ।
॥
साखी ॥
576. पात पात को सींचते, वृक्ष को दिया सुखाय ।
पात फूल फल ना मिला, अन्त रहे पछताय ॥1 ॥
ना सुख देह में प्रान में, ना सुख मन में होय ।
ना सुख ज्ञान विलास में, बिरला जाने कोय ॥2 ॥
सुख तो है आनन्द में, आनन्द के अस्थान । ।
ऋषि मुनि भूले देवता, ज्ञान का कर अभिमान ॥3 ॥
आनन्द आनन्द में लखो, आनन्द अपना रूप ।
साधन आनन्द का करो, छोड़ भरम का कूप ॥4 ॥
जो है जहाँ हूँढ़ों वहां, ढूँढ़ के पाओ सार । ।
राधास्वामी ने कहा, और सकल जंजार ॥5 ॥
580. शब्द योग है सबका सार ।
अधिकारी कोई करे विचार ॥
शब्द योग है सुगम सुहीला ।
और योग सब कठिन दुहीला ॥
शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
बिगड़ी बात सहज बन जाई ॥
शन्द योग का साधन करना ।
और योग को चित नहीं देना ॥
शब्द योग साध अनजान ।
जीते जी पावे निरवान ॥
सावीशब्द योग संजम बना, करे कोई चितलाय ।
दुचिताई दुविधा मिटे, भरम भ्रान्ती जाय ।
सहज सहज का भेद है, सहज सहज की रीत ।
सहज सहज में चित लगा, उपजे प्रेम प्रतीत ॥
राधास्वामी की दया, शब्द योग कर ले ।
सहज जनम को सुफलकर, और योग तज दे ।
581. शब्द नाम ऊंचे से आया ।
ताहि उलट कोई ध्यानी गाया । ।
ब्रह्म रेन्द्र की चोटी चढ़ो ।
चोटी चढ़कर धुन को सुनो ।
सुन सुन धुन सुरत हुई मस्तानी ।
ब्रह्म शिखर चढ़ आसन तानी ।
उलटी गंगा उलटी जमुना ।
सरस्वती उलट हुआ मन मगना ।
मान सरोवर कर अस्नान ।
हंस रूप लिया सूरत ठान ।
जो सन्तों के मारग आवे ।
उलट नाम ले संगति पावे ॥
सीधा मारग सब कोई जाय ।
उलटे का कोई भेद न पाय । ।
उलटे मारग घर का पन्थ ।
सो नहीं पाये पढ़कर ग्रन्थ ।
सीधे मारग है प्रवृति ।
उलट साध कोई करे निवृति ॥
साखीराधास्वामी की दया, पाया सतमत ज्ञान ।
उलटे मारग पर चले, मुझे पद निरवान । ।
सीधे तो सब कोई चले, उलट चले नहीं कोय ।
क्यों पहुँचे घर आपने, चित मन बुद्धि खोय ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, अन्तर धस सुरत साध ।
दर्शन पाये रूप का, लख लख अगम अगाध । ।
582. नाम प्रताप सकल जग माना ।
नाम महातम फिर नहीं जाना ॥
बरण नाम सब गये भुलाई ।
धुन का किसी ने भेद न पाई ॥
नाम रहे त्रिलोकी पारा ।
यह ढूँढ़े त्रिलोक पसारा । ।
चौथे पद में नाम निशान ।
शब्द योग से कोई कोई जान ॥
जो कोई चौथे पद में जाये ।
तब वह नाम की महिमा पाये ॥
साखीमकर तार गति चढ़ चले, पहुँचे सत के धाम ।
सतपद में सूझे उसे, धुनात्मक सतनाम । ।
।
दोहा
583. बहता था भव धार, ठौर ठिकाना नांह ।
राधास्वामी पार लगा दिया, पकड़ दास की बांह ॥1 ॥
राधास्वामी राधास्वामी गाय,राधास्वामी राधास्वामी ध्याय ।
राधास्वामी नाम से लौ लगी, पड़ेगा पूरा दाव ॥2 ॥
मेरा अब कोई नहीं, एक गुरु की आस ।
सुख दुख जग के मिट गये, द्वन्द की हटी त्रास ॥3 ॥
शब्द योग की साधना, लागी सहज समाधः ।
सहज वृत्ति जब घट रमी, हट गये भव के व्याध ॥4 ॥
भंवरा लोभी कमल का, चन्द्र का लोभी चकोर ।
मैं लोभी गुरु दरस का, चित्त न आवे और ॥ ॥
निसदिन गुरु की चाह है, पल पल गुरु का ध्यान ।
छिन छिन गुरु का भजन है, गुरु मेरे जान और प्रान ॥6 ॥
सिद्धि शक्ति ले क्या करू, ऋधि निधि से नहीं काम ।
यह माया के फंद हैं, मुझे मिले गुरु नाम ॥7 ॥
।
584. जब लग बालक गिरे नहीं, तब लग उठे न जान ।
जब लग अज्ञानी नहीं, कैसे पावे ज्ञान ॥1 ॥
नन्द पाप कमाय कर, आ सतगुरु के पास ।
पुन्य मिले सतसंत से, क्यों तू होय उदास ॥2 ॥
नन्दू पाप कमाय कर, ली सतगुरु की ओट ।
सकल पाप जल भुन गये, भाग गया सब खोट ॥3 ॥
पाप किया तो क्या भया, पाप पुन्य का बीज ।
बिना पाप कहो पुन्य क्या, हाथ न दुख का मीज ॥4 ॥
नन्दू गुरु बिन नहीं लखी, पाप पुन्य की बात ।
राधास्वामी की दया, समझ पड़ी जम घात ॥1 ॥
नन्दू माया जग ठगे, ठगनी अति बलिबान ।
इस ठगनी के मरम को, समझे साध सुजान ॥6 ॥
माया ने तुमको ठगा, ठगो उसे तुम आय ।
आँख मिचौली खेलकर, लो अब काम बनाय ॥7 ॥
माया बुद्धि विवेक है, माया है गुनवान ।
माया शक्ति सिद्धि है, माया है बलवान ॥8 ॥
माया से मिल बुद्धि ले, माया ही से विवेक ।
पहिले खेल अनेक से, पीछे एक ही टेक ॥6 ॥
एक नाम गुरु देव का, सतगुरु दिया बताय ।
नन्दु सोच विचार कर, राधास्वामी पद लपटाय ॥10 ॥
585. नन्द करनी सबल है, बिन करनी क्या होय ।
पहिले करनी चित्त दे, पीछे सुख से सोय ॥1 ॥
करनी बिन बहुतक करे, ज्ञान ध्यान की बात ।
वह कुत्ता है जगत में, सहे काल की घात ॥2 ॥
करनी करे सो मीत हमारा, हम नहीं कथनी के साथी ।
करनी करे सो सब कुछ पावे, घोड़े बैल और हाथी ॥3 ॥
बक बक करते थक गया, जिभ्या होंट सुखाय ।
करनी से सब कुछ मिले, करनी सुगम उपाय ॥4 ॥
वेद पढ़ा तो क्या हुआ, करम का नहीं व्यवहार । ।
वह गधा है जगत में, लादे पुस्तक भार ॥5 ॥
चंदन लादा बैल पर, मिला न बास सुबास ।
पढ़ लिखकर कथनी करे, सो हुआ अन्त उदास ॥6 ॥
नन्दू वाचक ज्ञान तज, गुरु गम ले पहिचान ।
राधास्वामी की दया, ले जल्दी निरवान ॥7 ॥
586. तड़प तड़प में उमंग है, जीवपना है जोग ।
यह रहस्य बूझे कोई, जिसे प्रेम का भोग ॥1 ॥
नन्दू प्रेम में रस महा, रसिया होय सुजान ।
रस की जिसको समझ नहीं, प्रेम प्रीत क्या जान ॥2 ॥
प्रेम भाव मन में रमा, प्रीतम तन मन व्याप ।
जब प्रेमी प्रीतम मिले, एक रूप है आप ॥3 ॥
नन्दू प्रेम का स्वाद ले, फीके हैं सब स्वाद ।
प्रेम प्यार विन जीवना, जनम गवाया बाद ॥4 ॥
पढ़ा गुना लिख पढ़ मुवा, अपना आप न जान ।
नन्दू पंडित मूरखो, दोनों एक समान ॥5 ॥
अपने को जाना नहीं, औरों को लिया जान । ।
नन्दू ऐसे जान को, नहीं कहते है ज्ञान ॥6 ॥
विद्या बुद्धि का सार यह, आपको ले पहिचान ।
नन्द जिसको समझ यह, सो ज्ञानी परमान ॥7 ॥
587. समय अमोल न खोइये, नित करिये सतसंग ।
सिर पर फन काढ़े खड़ा, काला काल भुजंग ॥1 ॥
एक घड़ी आधी घड़ी, और आधी में आध ।
सतसंगत परताप से, छूटे सकल उपाध ॥2 ॥
लोक परलोक सुधार ले, भज भज गुरु का नाम ।
फिर यह अवसर यह घड़ी, नहीं यह धाम न ठाम ॥3 ॥
जाना है रहना नहीं, जाना निस्संदेह ।
त्याग सकल की बासना, बांध गुरु सों नेह ॥4 ॥
नन्द भोग विलास का, चाख लिया रस आय ।
अब मन राता प्रेम रस, माता भक्ति लगाय ॥5 ॥
588. सतसंगत सुख उपजे, सतसंगत दुख जाय ।
सतसंगत से साधुवा, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥1 ॥
सतसंगत के गुन बहुत, महिमा बनि न जाय ।
लोहा पारस से मिले, सो सोना हो जाय ॥2 ॥
सतसंगत में पुण्य है, सतसंगत में धर्म । ।
सतसंगत में साधुवा, मिले सत्त का ममें ॥3 ॥
पोथी पढ़ पढ़ जग मुवा, खुले न हिये के नैन ।
सतसंगत प्रताप से, मिल रहा सच्चा चेन ॥4 ॥
वाल्मीक नारद भये, ज्ञान ध्यान की खान ।
सतसंगत में कीजिये, नाम अमृत रस पान ॥5 ॥
589. संगत तजिये दुष्ट की, उपजे काम विकार ।
कीजे संगत साध की, तत छिन हो निरवार ॥1 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, मिटे हिये का मैल ।
सतसंगत में पाइये, प्रेम प्रीत की गैल ॥2 ॥
संगत तजिये दुष्ट की, कलह कष्ट को मेट ।
संगत कीजे साध की, धर भक्ति की भेंट ॥3 ॥
पढ़ना लिखना सब भुला, जो आवे हरि नाम ।
सतसंगत उत्तम महा, व्यापे क्रोध न काम ॥4 ॥
धर्म अर्थ और मोक्ष गति, सतसंगत में पाय ।
सहजे ही सब ऊपजें, जप तप कौन कराय ॥5 ॥
590. एक इष्ट मन में बसे, प्रगटे प्रेम प्रचार ।
कोटि इष्ट की बन्दना, है निषिद्ध व्यभिचार ॥1 ॥
व्यभिचारी हो खोगये, मन में प्रेम न प्रीत ।
तिनको कैसे प्राप्त हो, गुरु भक्ति की सीत ॥2 ॥
कभी विष्णु कभी शम्भु है, कभी गनेश दिनेश ।
यह व्यभिचारी सदा के, भोगें कष्ट कलेश ॥3 ॥
एक गुरु की भक्ति है, एक गुरु का नाम ।
पूजा सेवा बन्दना, मानसिक आठों याम ॥4 ॥
सहज रीति की भक्ति की, महिमा अगम अपार । ।
जप तप कठिनाई महा, कभी न बेड़ा पार ॥5 ॥
एक घाट पर बैठकर, कर गंगाजल अस्नान ।
नीर मथन से क्या बने, मन में समझ सुजान ॥6 ॥
एक पुरुष का सेवका, सेवा करे निशंक ।
दस पुरुषों का सेवका, रहे सदा चित भंग ॥7 ॥
पतिविरता का एक हैं, व्यभिचारिनि के दोय ।
पतिविरिता व्यभिचारिणी, कहो क्यों मेला होय ॥8 ॥
591. सतसंगी कहें सत का संग ।
सत के संग न हो चित भंग ॥
साधु वह जो साधन करे ।
मन को साध असाधन हरे ॥
हंस जो क्षीर नीर अलगावें ।
ज्ञान लहें अज्ञान हटावें ॥
सन्त जो सहे मान अपमान ।
निज स्वरूप का राखे ज्ञान ।
आप तरे औरन को तारे ।
सुधरे और को साथ सुधारे ॥
सन्त पन्थ की महिमा भारी ।
कोई समझे उत्तम अधिकारी ।
परम सन्त सतगुरु दयाल ।
भव जल से लीन जीव निकाला शब्द नाव सहज जीव चढ़ावे ।
सहज ही भव के पार लगावे ॥
ऐसी रहनी जिसकी देखो ।
उसे सन्त सतगुरु तुम समझो ।
राधास्वामी दीन सहाई ।
साध संत की गति यों गाई । ।
माने कोई कोई चतुर विवेकी ।
जो नहीं जड़ता हट का टेकी ॥
592 सहसकमल में लावे ध्यान ।
देखे रूप विराट महान ॥
पांच रंग की खिली कियारी ।
पंच अग्नि फुलवारी न्यारी ॥
दीपवान घट भीतर निरखे ।
ब्रह्म विराट की सूरत निरखे । ।
जाग्रत ब्रह्म है रूप विराट ।
ब्रह्म जाग्रत का वह ठाट । ।
कुछ दिन निरख विराट की लीला ।
आगे चले सुरत शुभ शीला । ।
ओंकार का दर्शन पावे ।
अव्याकृत का नाम धरावे ॥
ब्रह्म स्वप्न की यह गति पाई ।
ब्रह्म स्वप्न में रहा समाई ॥
इसके आगे शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ तेहि कहूँ पुकार ॥
ब्रह्म सुषुप्ति का अस्थान ।
योगी घाट में चढ़े निदान ।
॥
दोहे ॥
593. गुन का ग्राही सन्त है, औगुन गहे असंत ।
गुन से लौ लागी रहे, देखेगा निज कन्त ॥1 ॥
क्षीर नीर आगे धरे, हंसा करे विचार ।
आत्मक्षीर से काम है, नीर तजा सो विकार ॥2 ॥
गुन का साथी साध है, औगुन लहे असाध ।
जो कोई गुन को गहे, ताका मता अगाध ॥3 ॥
चन्दन वास न त्यागई, काटे लाख कुठियार ।
बास सुवासित होरहा, मुख कुठार बरियार ॥4 ॥
जो तुझको दुख देत है, ता को दे तू सुख ।
यही साध का लक्ष है, सुन सुन हो गुरुमुख ॥5 ॥
594. तू क्या सोचे रात दिन, क्यों नहीं सोचे मोहि ।
मुझ असोच की सोच से, सोच न व्याये तोहि ॥1 ॥
तारूं तारूँ तार टू, तारू निस्सन्देह । ।
तेरे देह की क्या कहूँ, तारू कुल और गेह ॥2 ॥
खेल खेल में भजन कर, सहज जोग चितलाय । ।
जो होना है होन दे, गुरु गम चित्त बसाय ॥3 ॥
आसा मैं पूरन करू, दास न होय निरास ।
जो निरास है सेवका, सो नहीं मेरा दास ॥4 ॥
अपनी आसा त्याग दे, कर नित मेरी आस ।
एक रूप में लख पड़ें, दोनों स्वामी दास ॥5 ॥
क्या करता है सोच तू , करता है हंकार । ।
अहं भाव जो ना तजे, केसे लहे विचार ॥6 ॥
सहज सहज में सहज में, सूझे पद निरवान ।
सतसंगत कर आन कर, मिले शब्द का ज्ञान ॥7 ॥
मेरा हो मुझ सरस रह, तज आपा अभिमान ।
फिर इस द्वन्द पसार में, काल करे नहीं हान ॥8 ॥
जाग्रत स्वप्न समान कर, गुरु के चरनन लाग ।
जाग्रत में तू स्वप्न कर, और सुपने में जाग ॥6 ॥
मुझ जैसा तू हो रहे, स्वाग मोह भ्रम मूल ।
रहनी ऐसी धार ले, जैसे कमल का फूल ॥10 ॥
595. घर में रहे तो भक्ति कर, बन में रहे तो त्याग ।
भक्ति ग्रहण का रूप है, त्याग रूप वैराग ॥1 ॥
ग्रहण मार्ग है प्रेम का, प्रेम प्रीत परतीत ।
प्यार बसे जिस हृदय में, गहे भक्ति की रीत ॥2 ॥
त्याग मागे वैराग का, उदासीन निश भाव ।
त्याग बसे जिस हृदय में, लहे ज्ञान का दाव ॥3 ॥
धारे तो दोऊ चले, भक्ति और वैराग ।
वैरागी त्यागी बने, भक्त करे अनुराग ॥4 ॥
मन मलीन को शुद्ध कर, समझ गुरु के बैन ।
कुछ दिन ऐसे जतन से, उपजेंगे सुख चैन ॥5 ॥
मन साधे बिन कुछ नहीं, बने न पूरा काम ।
समझ न आवे सन्तमत, नहीं प्रगटे सतनाम ॥6 ॥
पोथी पुस्तक ग्रन्थ पढ़, बाड़े मन हंकार ।
जा गुरु के सतसंग में, अनुभव ज्ञान विचार ॥7 ॥
596. निर्गुन गुन वाले सभी, सगुन न निगुन कोय ।
सतसंगत करो साध की, तब विवेक चित होत ॥1 ॥
गुन से खाली कोई नहीं, पशु पक्षी नर रूप ।
निगुन तो कोई नहीं, रंक भिखारी भूप ॥2 ॥
ऐसा जग में कौन है, जो नहीं निर्गुन मीत ।
सब गुन नहीं सबमें रहें, समझ के कर परतीत ॥3 ॥
सगुन अगुन के बीच में, चले सन्त का पन्थ ।
यह सुखमन का मार्ग है, समझ बूझ पढ़ ग्रन्थ ॥4 ॥
लाख कहा समझे नहीं, समझ न आवे बैन ।
कैसे हम उपदेश दें, लखे नहीं जब सैन ॥5 ॥
सैन बैन के बीच में, सत मत सत पथ देख ।
सतसंगत प्रताप से, सूझे अगम अलेख ॥6 ॥
युक्ति प्रमाण विचार से, कर गुरु का सतसंग ।
गुरु का रंग जब हिये बसे, कभी न होय कुरंग ॥7 ॥
597. एक तहां से सब हुआ, सब में एक समाय ।
लीला लहर समुद्र की, समझ प्रतीत बढ़ाय ॥1 ॥
एक हुआ दूजा बना, दो मिल भये अनेक ।
नन्द एक अनेक है, और अनेक है एक ॥2 ॥
एक न होय तो दो कहां, दो लख परखे एक ।
नन्द् गुरु गम ज्ञान से, मेटे एक अनेक ॥3 ॥
एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहा न जाय ।
नन्द चुप हो बैठ रह, द्वत अद्वैत मिटाय ॥4 ॥
आया गुरु दरबार में, चित धर अपने एक ।
सतसंगत प्रताप से, गई एक की टेक ॥1 ॥
ब्रह्म नहीं माया नहीं, सत नहीं असत न कोय । ।
नन्द चुप रह मौन वन, समझे ज्ञानी सोय ॥6 ॥
एक कहा बेहद लखा, बेहद में था हृद ।
नन्द हद बेहद तजा, रहा न नेक न बद ॥7 ॥
598. अपनी अपनी समझ में, सब जग रहा फसाय ।
जब गुरु ज्ञानी कोई मिले, मूल तत्व समझाय ॥1 ॥
जब गुरु ज्ञान की गम नहीं, बिन गुरु नहीं विवेक ।
बिन गुरु कोई न लख सके, एक तत्व के अनेक ॥2 ॥
संगत कीजे संत की, अलख लखावे सन्त । ।
सूझ पड़े सतसंग में, सबका आदि और अन्त ॥3 ॥
पक्ष अपक्ष के भेद में, सूझे नहीं अभेद ।
मुल्ला पंडित लड़ मुये, पढ़ कुरान और वेद ॥4 ॥
पक्ष छोड़ कर सार ले, सार तत्व पहिचान ।
मुल्ला पंडित हों दोऊ, पल में एक समान ॥5 ॥
हिलमिल खेलू शब्द में, मन का पक्ष हटाय ।
समझे का मत एक है, नन्दू कहे बताय ॥6 ॥
पर उपदेश में खोगये, उपदेशक हुशियार ।
निज उपदेश बिना नहीं, गया कोई भव पार ॥7 ॥
पर उपदेशक बहुत हैं, निज उपदेशक नाहिं ।
निज उपदेशक जो मिले, नन्द पकड़े वाह ॥8 ॥
नन्दू आप चिताइये, और चिताओ नाहिं । ।
आप चिताये गुरु मिलें, और के भवजल माहिं ॥4 ॥
599. पूरन दया गुरु जब करें ।
तीन ताप भव संकट हरें ।
मन में उपजे विमल विलासा ।
अन्तर देखे सुरत तमासा । ।
जगमग जोत की महिमा भारी ।
कोई निरखे विरला अधिकारी ॥
शब्द सुहावन मंडल लावे ।
सुन सुन सुरत अति हरषावे ॥
आनन्द छाय रहा चहुँ ओर ।
अनहद तूर मचाया शोर । ।
भूम झूम सूरत मस्तानी ।
सतगुरु चरन कमल लिपटानी ॥
ध्येय ध्याता दोउ एक समान ।
आनन्द हर्ष महान महान ॥
घट की अद्भुत लीला देख ।
सुरत सखी हुई सुखी विशेख ॥
सुख प्रगटा जाका वार न पार ।
सुरत चरन होगई बलिहार ॥
सुरत शब्द का साधा जोग ।
अब नहीं सहे कलेश वियोग ।
ऊचे चढ़ आपा को त्यागे ।
गुरु आपा के रस में पागे ।
यह भक्ति यह प्रेम कहावे ।
भक्ति मिले अज्ञान नसावे । ।
ज्ञान पाय लख गुरु की मूरत ।
निरत रूप को धारे सूरत ॥
सुरत निरत में रूप आकार ।
आगे चल हुई इनसे न्यार ॥
विस्माधी हैरत अस्थाना ।
सन्त धाम धुर पद निरवाना । ।
दोहाराधास्वामी की दया, गुरु पद की ले छांव ।
चांद सूर के सीस पर, धरा सुरत ने पाँव । ।
600. सुरत सखी सुन मेरी बात ।
माया काल को अब दे मात ॥
कर सतसंग गुरु का आय ।
ता से मन का भरम नसाय ॥
बिन सतसंग विवेक न आवे ।
बिन सतसंग काल भरमावे ॥
माया ठगिनी करे ठगौरी ।
माया तज चल पौरी पौरी ॥
शब्द की कर तू नित्य कमाई ।
धुन में मन और सुरत जमाई ॥
सहसकमलदल घंटा बजाओ ।
त्रिकुटी ओम् नाद गुन गाओ ।
अजपा जाप है अनहद बानी ।
सुन सूरत होगी मस्तानी । ।
गुरुगम लख चढ़ सुन्न शिखर पर ।
घर को छोड़ अचर में चित धर। ।
सहज समाध का कुछ सुख पावे ।
सुरत जमे तब समझ में आवे । ।
सुन्न के आगे है महासुन्न ।
महासुन्न की अब धुन सुन ।
घोर अंधेरा तजकर सजनी ।
धार हंस गति होकर हंसनी । ।
भंवरगुफा की चौड़ी खिड़की ।
धंसजा जहां बसी धुन कड़की । ।
बंसी की धुन गुप्त है बानी ।
जो गोपी बनी वह पहचानी । ।
गोपी गोप का है यह भेद ।
सुन धुन गति अब धार अभेद । ।
है अभेद गति सत्त धाम में ।
वहां तू लगजा सत्त नाम में ।
नहीं वहां एक न दो हैं तीन ।
सत धुन की बजती है चीन ।
सत्य सत्य जहाँ सत्य संदेश ।
सतगुरु संत को कर आदेश ।
बिगड़े दूध को क्या मथे, ता में मूल विकार ।
मन बानी को सोध कर, मथ ले माखन सार ॥2 ॥
• पानी मथना भूल है, मथ ले उत्तम क्षीर । ।
माखन निकसे दूध से, त्याग जगत का नीर ॥3 ॥
बड़ी बड़ाई बच्छ की, गहे दीर निरवार ।
रक्त मास को नहीं लहे, साध का यही विचार ॥4 ॥
ग्रन्थ चीर का कुंड है, मन भांडा का रूप ।
चित्त मथानी हाथ ले, माखन मिले अनूप ॥5 ॥
क्षीर नीर का मेल है, जग का द्वन्द पसार ।
उत्तम क्षीर से काम है, हंस करे निरवान ॥6 ॥
मान सरोवर के निकट, रहे हंस की पांत ।
जो कोई आवे भाव से, बख्शे क्षीर की दात ॥7 ॥
परमहंस के दरस से, उपजे निर्मल ज्ञान ।
काग हंस पहिचान कर, तज आगरा मद मान ॥7 ॥
परमहंस गुरु रूप है, काग रूप संपार । ।
काग रूप को जो तजे, सोई साध विचार ||
604 } गुरु के मत में आर कर, गुरु मत ले पहिचान ।
वह अवसर और यह समय, बहुर न देखे आन ॥1 ॥
गरु मत गरु भेही लके, तासों मन पतियाय । ।
पढ़ा लिखा जाना बहुत, यह नहीं ठीक उपाय ॥2 ॥
नाम तो तेरे घट बसे, नाम से लौ रहे लाग ।
घट का परदा खोल दे, पावे पूरक भाग ॥3 ॥
आज कहे मैं काल कर गा, गुरु पूति का ध्यान ।
काल काल के करत ही, पहुँचा काल निदान ॥4 ॥
एक घड़ी में जग नसे, छोड़ काल का भमे ।
जो करना हो आज कर, समझ गुरु का मम ॥5 ॥
काल काल तू मत करे, काल का नहीं ठिकान ।
जो चाहे सो आज कर, लेकर गुरु का ज्ञान ॥6 ॥
605. गुरु भक्ति दृढ़ कर भाई ।
तेरी बनत बनत बन जाई ।
गुरु बिराजे मन में ।
गुरु भाव बसे तेरे तन में ॥
गुरु शब्द रहे श्रवन में ।
गुरु छबि रहे नित चितवन में ।
गुरु नाम की टेक संभारो ।
गुरु मूरति हृदय धारो ॥
गुरु का जस निसदिन गाओ ।
गुरु से लौ अपनी लगाओ ।
दोहासांस सांस पर गुरु कहो, प्रगटे ज्ञान विवेक ।
द्वत भाव मेटो सकल, सिप गुरु मिल रहे एक ॥
वाहर भीतर एक समान ।
गुरु तन मन गुरु जान और प्रान ॥
गुरु के रंग रंगे तन चोला ।
सो गुरु मुख जग में अनमोला ।
गुरु मय जगत रूप जब भासे ।
तब अज्ञान अविद्या नासे ॥
तिमिर मिटे घट होय प्रकासा ।
गुरु मुख गुरु का निज कर दासा ॥
माया मोह का बन्धन छूटे ।
सो गुरु मुख परमारथ लूटे । ।
दोहाहर्ष शोक व्यापे नहीं, सन दृष्टि चित होय ।
जाकी ऐसी रहन है, सच्चा सेवक सोय ॥
कर्म करे करता नहीं होय ।
धर्म धरे धरता नहीं होय ॥
बन्ध में मुक्त मुक्ति में बंधा ।
जो ऐला नहीं सो नर अंधा ॥
काज बने नहीं होय अकाज ।
साजे ‘प्रेम भक्ति का साज ॥
मन से सुरत रहे अलगान ।
यही विवेक यही निर्मल ज्ञान । ।
गुरु का रहे निरंतर ध्यान ।
गुरु बल पाय शिष्य बलवान ॥
दोहागुरु बल कर्म नसाइये, गुरु बल काटिये फंद ।
गुरु के बल से साधुवा, छूट जाय जग द्वन्द ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी चरन कोटि परनामी ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी घट घट अन्तर्यामी ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी पद में मिले बिसरामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी दया उबरे खल कामी । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।
___ राधास्वामी भजे नर आठों जामी । ।
दोहाराधास्वामी गुरु का रूप है, राधास्वामी निज धाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
सहसकवल धुन राधास्वामी ।
त्रिकुटी ओं गुन राधास्वामी ॥
राधास्वामी सुन्न मंडल धुन रारंग ।
राधास्वामी महासुन सुन रारंग भंवरगफा मुरली राधास्वामी ।
सतपद चढ़ घुर ली राधास्वामी ॥
राधास्वामी अलख अपार अरूप ।
राधास्वामी अगम अथाह अनूप। ।
राधास्वामी धाम है राधास्वामी ।
राधास्वामी नाम है राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी लक्ष पद, राधास्वामी वाच ।
राधास्वामी इष्ट है, राधास्वामी सांच ॥
606. सुरत रहे राधास्वामी चरनन में, देह बसे संसारा ।
करम करे करता नहीं सेवक, अंतर सबसे नियारा ॥1 ॥
अहंकार की दुर्मति खो, छोड़े मूल विकारा ।
ऐसा सेवक जो कोई सांचा, सो सतगुरु का प्यारा ॥2 ॥
सेवक करे सहज सेवकाई, जगत अविद्या नासे। ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर प्रकासे ॥3 ॥
607. सोरठाधन्य धन्य गुरु देव, कृपा सिंध पूरन धनी ।
चित से करू नित सेव, मेट जगत की वासना ॥
दोहेजाहि एति कहें सकल मुनि, नेति नेति कहे वेद ।
गुरु की दया अपार से, पूरन मिला सुभेद ॥1 ॥
ज्ञान समुदर अथाह अति, सूझे बार न पार ।
सुर नर मुनि सब बून्द जिमि, उढे लहर अपार ॥2 ॥
भेद भाव सब मिट गया, दरसा अचल अभेद । ।
नहीं जगत नहीं करम गति,नहीं विकार नहीं खेद ॥3 ॥
साध संग सतगुरु दया, समझ पड़ा निज रूप ।
जब रूप की गम नहीं, तब लग रहे भव कूप ॥4 ॥
आस गई मंसा गई, गया जगत का द्वन्द । ।
राधास्वामी गुरु की मेहर से, छूटा भव भ्रम फन्द ॥5 ॥
सोरठापरम तत्व गुरु आप है, आपहि ज्ञान विवेक ।
कहीं गुप्त कहीं प्रगट होय, परखावं पद एक ।
गुरु एक अनादि अनंत महा ।
पदकमल में आन के शरन गहा ॥
तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको ।
निज भक्ति का पंथ दिखा मुझको। ।
तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले ।
तेरे चरन सरोज का ध्यान लगे ।
अविनासी है तू सुखरासी है ।
तू घट घट का गुरु बासी है ।
तू विश्वम्भर जगदाधारी ।
सुर नर मुनि सबका हितकारी । ।
मेरे मन से दूर मद मान रहें ।
मुझे सदा तेरा ही ध्यान रहे ।
सबके प्रानों का प्यारा है तू ।
दे प्रेम जो प्रेम की खान है तू । ।
घट तिमिर मिटे कर उजियारी ।
तेरे चरन शरन की बलिहारी । ।
राधास्वामी देवन के देवा ।
करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥
354.
॥
चौपाई ॥
608. मैं सेवक सतगुरु राधास्वामी ।
बार बार उन चरन नमामी ।
मैं पापी राधास्वामी पुनीता ।
मैं माया बस स्वामी अतीता ॥
चरन शरन की ओट गही जब ।
दुख दरिंद्र सब लोप हुये तब ॥
मैं तो किरन राधास्वामी भानु सम ।
राधास्वामी से अब पाऊँशम दम शम दम पाय जो करूं पयाना ।
सूझे सहज ही पद निरवाना ।
राधास्वामी सतगुरु कमल समान ।
मैं भँवरा अचेत अज्ञान ।
राधास्वामी सिंध बूद मेरा रूप ।
मैं सकार राधास्वामी अरूप ॥
दोहामैं तो कीट महान हूँ, राधास्वामी भृगी जान ।
राधास्वामी की दया, पाऊ भक्ति दान ॥
के चौगई है नहीं विवेक नहीं मन चतुराई ।
नहीं विद्या नहीं बल प्रभुताई । ।
धन सम्पत्ति तज गुरु को सुमिरू ।
गुरु की कृपा सिंध भव उतरू ।
सिद्धि शक्ति गुरु नाम रहाई ।
ले यह समझ करूं सेवकाई । ।
नाम न विस विसरू तन मन ।
एक रूा लखू घर परबत बन । ।
पल पल रटू नाम अविनासी ।
का, माया जन की फांसी । ।
गुरु मेरे समरथ पुरुष विधाता ।
गुरु के चरन में मन मेरा राता । ।
रात दिवस रहे गुरु का ध्याना ।
यही मांगू गरु से बरदाना । ।
दोहागरू गरू पल पल जपू, राधास्वामी के गुन गाय ।
अब कुछ मुझको भय नहीं, सतगुरु हुये सहाय ॥
राधास्वामी सतगुरु, दया दृष्टि से देख ।
छुटकारा प्रभु दीजिये, छूटे जगत बिसेख । ।
तुम दाता मैं दीन हूँ, आया गुरु दरबार ।
शरनागत की लाज को, रख लीजे दातार ।
अब आरत पूरन भई, मन पाया विश्राम ।
राधास्वामी चरन पर, कोटि कोटि परनाम ॥
609. दोहाप्रीतम छबि नयनों बसी, भावे नहीं संसार ।
सार असार की सुध नहीं, मन चाहे दीदार ॥॥चौपाई ॥
रंग रंग में रंग रंगीला ।
सब रंगों में उसकी लीला ॥
गुप्त प्रगट में व्यापा सोई ।
प्रीतम बिन कोई और न होई ॥
जहां देखू तहां पिया का रूप ।
जहां सुनू पिया शब्द अनूप । ।
भोग बासना सब कुछ त्यागी ।
मैं हूँ प्रीतम छवि अनुरागी । ।
रोम रोम पिया करे निवास ।
घट में प्रगटा प्रेम बिलास ॥
दोहाजा हृदय प्रीतम बसे, प्रीत रीत अधिकाय ।
मन राता पिउ रंग में, माँगे मुक्ति बलाय ॥दोहे
610. गुरु सम दाता कोई नहीं, गुरु है दीन दयाल ।
गुरु के चरन सरोज लग, ऋषि मुनि भये निहाल ॥1 ॥
मुक्ति पदारथ तब मिलें, जब गुरु होय सहाय । ।
बिन गुरु भक्ति फन्द जम, कभी न काटा जाय ॥2 ॥
गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि दंडौत ।
गुरु की दया अपार से, छूटे भव के खोट ॥3 ॥
तीन ताप के भंवर में, बड़े बारम्बार । ।
गुरु समरथ ने दया की, बूड़त लिया निकार ॥4 ॥
गुरु समान दाता नहीं, गुरु समान नहीं देव ।
गुरु की पल पल बंदना, निसदिन कीजे सेव ॥5 ॥
गुरु आज्ञा में चालिये, तन मन सीस झुकाय ।
काल कर्म से बचन का, और न कोई उपाय ॥6 ॥
गुरु से कुछ मांगू नहीं, मांगू उनसे यह । ।
राधास्वामी दया करो, कर चरनन की खेह ॥7 ॥
611. आज घड़ी मंगल सुखदायक ।
सतगुरु पूरे भये हैं सहायक ॥
घट में सूर हुआ उजियारा ।
दूर मिटा सब तिमिर विकारा ॥
सुख आनन्द की शोभा भारी ।
देखत देखत लागी तारी ॥
अनहद राग की धुन सुन पाई ।
हरे हर्ष सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले भवरा मंडलाया ।
बास सुवास पाय ललचाया ॥
अद्भुत लीला बरन न जाई ।
मन बानी रहे दोउ अलसाई ॥
लय चिंतन का मर्म पिछाना ।
पिया अमी रस हुआ मस्ताना ॥
झांकी निरखी अगम अनूप ।
रूपवान से हुआ अरूप ॥
रेखा रूप रंग सब त्यागा ।
सहजहि हंस बना है कागा । ।
मान सरोवर किया असनान ।
सुन्न गुरु का लागा ध्यान ॥
दुर्गम घाटी शिला अपार ।
गुरु बल पाय किये सब पार । ।
बीन बांसरी उत्तम बाजा ।
सुन सुन धुन सोया मन जागा ॥
राधास्वामी चरन पाय विसराम ।
मेटा देवासुर संग्राम ॥
दोहागुरु मूरत हृदय बसी, उपजा निर्मल ज्ञान ।
जाको ढूँढ़त मैं फिरा, सो अब प्रगटा आन ॥
612. मैं चकोर तुम चन्द्र स्वरूपा ।
रंक दुखी मैं तुम प्रभु भूपा ॥
मैं मछली तुम सुख के सागर ।
मैं औगुनी तुम सब गुन आगर । ।
मैं भँवरा तुम कमल समान ।
वास सुबास पाय हर्षान ।
मैं पतिंग तुम दीप स्वरूप ।
मैं घट तुम निर्मल जल कूप ।
मैं पतंग तुम डोर हो स्वामी ।
मैं अन्तर तुम अन्तर्यामी ॥
मैं लहरी तुम सिंध अपार ।
कहां तुम्हारा वारा पार ॥
बुन्द रूप मैं तुम सत गंग ।
कभी न छोडू गुरु का संग । ।
प्रेम रंग से रहूँ रंगानी ।
निसदिन चरन कमल लिपटानी ।
पपीहा की गति भई हमारी ।
स्वान्ति बद तुम चित में धारी ॥
दोहासेवा पूजा बंदना, नहीं कुछ जाने दास ।
सबकी आज्ञा त्याग दी, धर गुरु चरनन आस ॥
613. आप ही आप आप तुम आये ।
आपहि आप निज भेद सुनाये । ।
आप आप को आप बताया ।
दुखित जीव पर कीन्ही दाया ॥
अलख लखाय लक्ष जब दीन्हा ।
तुम ही निरख लख तुम ही चीन्हा मुक्ति बंध का संशय त्यागा ।
अब गुरु चरन रहूँ नित जागा ॥
अभय पाय भय दुर्मति भागे ।
निर्भय होय गुरु चरनन लागे ।
नाम रतन निर्धन जब पाया ।
धनी भया घर निज धन आया ।
दोहाएक तुम्हारी चाह हैं, गुरु देवन के देव ।
_मुझसे बन आवे नहीं, भक्ति भाव पद सेव । ।
614. राधास्वामी राधास्वामी रटत रहूँ नित ।
राधास्वामी राधास्वामी भजत रहूँ नित । ।
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी पल पल ध्याऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाऊ ।
___ राधास्वामी राधास्वामी सदा मनाऊँ ॥
राधास्वामी राधास्वामी और न दूजा ।
राधास्वामी राधास्वामी धारू पूजा ॥
राधास्वामी राधास्वामी देखू अन्तर। ।
राधास्वामी राधास्वामी निरखू बाहर ॥
दोहाभीतर बाहर एक रस, गुरु का दरसा रूप ।
राधास्वामी जब उर में बसे, पडू न भव जल कूप ॥
615. उगमा प्रेम न मन ठहराये ।
गुरु आप प्रीतम बन आये । ।
प्रेम पन्थ की डगर दिखाई ।
प्रेम नगर की राह बताई ॥
सुरत शब्द का भेद अनूप ।
बख्श दिखाया अपना रूप ॥
रूप दिखाय लिया अपनाई ।
छूट गया जग अगमापाई ॥
चरन ओट में दिया ठिकाना ।
शरन पाय मन अति विगसाना ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, जिभ्या रह गुरु नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
616. दोहानिराकार साकार तुम, अगुन सगन के महि ।
घट में घट घट रूप हो, अघट सघट फिर नांह । । ॥
चौपाई ॥
गुरु जग में कल्यान स्वरूप ।
अगम अगोचर अमल अरूप ॥
ब्रह्मा विष्णु शक्ति महि देवा ।
सुर नर मुनि करते मिल सेवा ॥
भानु समान प्रकाश प्रकासा ।
प्राण प्राण गत स्वांस में स्वांसा ॥
व्यापक यक रस सहज उदासी ।
समदर्शी अन्तर उर बासी ॥
कोई न जाने गरु का भेद ।
थक रहे ज्ञानी ध्यानी वेद ॥
आप चितावे आप लखावे ।
आप सैन दे मर्म बतावे ॥
कीट भृगी गति गुरु उपदेस ।
नीर मीन सम गुरु संदेस ।
दोहापारस से लोहा मिले, कंचन छिन में होय ।
सतगुरु से सेवक मिले, सन्त रूप कहो सोय ॥
चरन कमल की बंदना, निसदिन आठों याम ।
गुरु के पद में सब बसें, सत्त नाम सतधाम ॥
356
साखी
617. साधन तो गुरु नाम है, और काम बेकाम ।
साधन ही से पाइये, सत जीवन सत धाम ॥1 ॥
साधन सुगम सुहेल है, जो कोई जाने साध ।
साधु जो साधन करे, बिन साधन जग व्याध ॥2 ॥
साधन कीजे शब्द का, कान आंख मुख बन्द ।
शब्द योग के जतन से, कटे द्वन्द का फन्द ॥3 ॥
बाहर पट दे नन्दुआ, अन्तर के पट खोल ।
साधन कर नित शब्द का, मुख से कछु न बोल ॥4 ॥
यह तो उत्तम योग है, और योग हैं रोग ।
शब्द योग योगी बने, और योग सब सोग ॥5 ॥
योग यतन से पाइये, साहेब का दीदार ।
बिना यतन नहीं कुछ बने, परमारथ व्यौहार ॥6 ॥
नाम तेरे अन्तर बसे, ता संग धार पियार । ।
कान आंख मुह बन्द कर, सुन अनहद गुंजार ॥7 ॥
और यतन सब कठिन है, शब्द यतन है सहल ।
यह तो फल तत्काल है, और यतन निष्फल ॥8 ॥
618. जब लग पिया से मेल नहीं, कैसे जागे भाग ।
भाग जगे और मेल हो, तब पूरन होय सुहाय ॥1 ॥
पिया की प्यारी हो गई, कर कर प्रेम पियार ।
पिया मेरा मैं पिया की, झूठा जग व्यौहार ॥2 ॥
पिया को ढूंढन मैं चली, चित्त फर प्रेम की प्यास ।
प्रेम वू द जब मिल गया, पिया नित मेरे पास ॥3 ॥
पिया पिया मैं क्या करूं, पिया प्रेम का नीर ।
पिया से लग पिया की हुई, पिया पिया व्याप शरीर ॥4 ॥
पिया मेरा मैं पिया की, किससे पूछू जाय ।
मैं पिया से न्यारी नहीं, पिया जो प्रेम अघाय ॥5 ॥
पिया पिया करते पिया, भई पिया में धरनि अकास ।
पिया मुझमें मैं पिया में, चित क्यों होय उदास ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, पिया से भया संजोग ।
गुरु मिले अच्छी भई, सीख शब्द का जोग ।।7। ।
619. बात बनाना सुगम है, वाचक ज्ञान सहल ।
अपनी आंखों देखना, यही बात मुश्किल ॥1 ॥
पुस्तक लेखी क्या कहे, अपनी आंखों देख ।
अनुभव गम नर जब लहे, कटे करम की रेख ॥2 ॥
शब्द बिना अनुभव नहीं, अनुभव शब्द के साथ। ।
अनुभव का घर दूर है, अनुभव कीजे हाथ ॥3 ॥
साधन बिन साधु नहीं, साधन बिन नहीं साध ।
बिन साधे अनुभव कहाँ, लगे सार नहीं हाथ ॥4 ॥
अपनी आँखों देखिये, अपने हृदय विचार ।
निज घट में जो शब्द है, ताकी गहले धार ॥शा गुरु की वाणी जब सुने, मन में करे विचार ।
शब्द डोर को पकड़कर, पहुँचे शब्द के द्वार ॥6 ॥
620. बिन गुरु ज्ञान विवेक न होई ।
गुरु बिन पन्थ न चाले कोई । ।
गुरु से लेना नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन । ।
मन परतीत गुरु की लाओ ।
गुरु मिले तब भक्ति कमाओ ।
गुरु बिन काम करो नहिं भाई ।
गुरु चरनन पर बल बल जाई । ।
राखे मन में गुरु प्रतीती ।
हो सुख सकल कामना जीती। ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ।
गुरु आराधो छिन छिन प्रानी ॥
गुरु समान नहीं कोई रक्षक ।
कुल कुटम्ब सब जानो तक्षक ॥
सत्त नाम सत पुरुष गुरु हैं ।
अलख अगम राधास्वामी गुरु हैं ।
गुरु की कीजे हरदम पूजा ।
गुरु समान कोई देव न दूजा ॥
गुरु चरनन पर बल बल जाऊ ।
आठ पहर गुरु का यश गाऊ ॥
गुरु को सुमिरू गुरु को ध्याऊ ।
माथे गुरुपद रज को लगाऊँ ।
गुरु ने गुप्त भेद दिया दान ।
गुरु ने सार बताया आन ।
गुरु ने अलख वस्तु लखवाया ।
गुरु ने अगम रूप दरसाया ।
जब लग नहीं गुरु भक्ति दृढ़ानी ।
तब लग निसदिन रहे अज्ञानी ।
रात अन्धेरी आंख न मुझे ।
केहि विधि प्रेमी गुरु पद बझे ।
गुरु मिले गुरु पद दरसाया ।
आंख खुली अंधकार हटाया ।
तेज पुंज का भया प्रकाश ।
ज्ञान सूर ने किया उजास ।
धन घमंड अज्ञान समान ।
जुड़ मिल अंधकार किया आन । ।
ज्ञान सूर गुरु बचन प्रकासा ।
देखत सकल अविद्या नासा । ।
सत्त सत्त का सत प्रगटाया ।
आतम परमातम दरसाया । ।
घट में प्रगटा सत का नूर ।
बाजे निसदिन अनहद तूर । ।
621. राधास्वामी समरथ दीन दयाला ।
काटें दुख कष्ट जंजाला ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
भूल भरम मन तनकि न लाऊ राधास्वामी कृपा दृष्टि जब करें ।
दुख कलेश आपत सब हरें ।
राधास्वामी दया करें निस बासर ।
हाथ कृपा का धारे सिर पर । ।
मौज निहार चलो दिन रात ।
राधास्वामी चरन में चित्त बसात ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं त्यागे ।
प्रेम प्रीत रस निसदिन पागे । ।
दुख सुख हर्ष शोक में समता ।
धारूँ चरन कमल मन रमता । ।
622 जीव चितावन आये राधास्वामी ।
बार बार तिन चरन नमामी ।
जीव शरन गह ले उपदेशा ।
सहजहि जावे सतगुरु देसा ॥
जहां नहीं काल करम नहीं माया ।
नहीं जहां गगन अकास न छाया बिन जल पड़े बूद जहां भारी ।
नहीं तीखा मीठा नहीं खारी ॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके ।
बिना चन्द्र रवि जोती चमके ॥
दोहावेद कतेब की गम नहीं, सो है गुरु दरबार ।
राधास्वामी की दया, मेटे द्वन्द असार ।
नहीं वहां कम न धर्म कहानी ।
नहीं वहां सुख दुख लाभ न हानी ॥
गूगा बोले मधुरी बानी ।
पिंगला चढ़े शैल निरवानी ॥
आवागवन का संशय मेटे ।
सुन्न समाध में निसदिन लेटे । ।
देखे अद्भुत बिमल बिलासा ।
निरखे अचरज अजब तमासा । ।
ऋतु बसंत चहुँ दिस रही छाई ।
कमल खिले बरसा झर लाई ॥
___ दोहाबिना पन्थ की गैल है, बिन बस्ती का देस ।
बिना नैन दृष्टा बने, यह सतगुरु उपदेस ॥
हैरत हैरत हैरत होई ।
हैरत रूप धरा पुनि सोई ॥
रंग रूप रेखा से न्यारा ।
बिन घोड़े बाहन असबारा ॥
जा पर कृपा गुरु की होई ।
सत परमारथ पावे सोई । ।
निराकार निरदेव निरूपम ।
अगम अलख अद्वत अनूपम । ।
सोई गुरु का रूप कहावे ।
विन गुरु दया समझ नहीं आवे । ।
दोहा यह मत अगम अगाध है, क्या कोई बरने आय ।
कोई गुरुमुख गति पावही, गुरु जब होंय सहाय ॥
जीव दुखित बिलये दिन राती ।
माया हृदया दया न आती । ।
काल करम का विकट पसारा ।
कौन जीव को देय सहारा ॥
बार बार भरमें चौरासी ।
काल गले विच डाली फांसी ॥
कोई विद्या पढ़ हुये दिवाने ।
कोई ज्ञान मत रहे लुभाने ।
कोई तीरथ कोई परत उपासा ।
कोई नेमी कोई रहे उदासा ॥
दोहासार न पाया भक्ति का, प्रेम प्रीत की रीत ।
काल निर्देई मारिया, यम किसका है मीत ॥
तब राधास्वामी दया उमगाई ।
धर गुरु रूप दिया शरनाई । ।
मन में राखा दृढ़ विश्वासो ।
गुरु मेरे पूर करें सब आसा । ।
मान न मागू नहीं धन दामा ।
मागू चरन शरन सतनामा ।
जीव काज तुम जग में आये ।
निराकार बन रूप दिखाये ॥
इष्ट दिया ऊँचा और भारी ।
तुम हो बन्धु मित्र हितकारी । ।
दोहागुरु पद में यही बन्दना, जीव हि लियो चिताय ।
राधास्वामी की दया, फसे न अब भव आय ॥
623. मंगल गुरु का नाम है, गुरु मंगल की खान ।
मंगल गुरु के नाम में, नाम है मंगल दान ॥1 ॥
मंगल नाम धराय कर, तजा अमंगल भाव ।
निसदिन गुरु का नाम लो, यही है पक्का दाव ॥2 ॥
जा दिन गुरु दर्शन भया, कटा पाप का फंद। ।
दुन्द जाल को मेटकर, रहो सदा निद्वन्द ॥3 ॥
तुम क्यों पड़े हो भूल में, भूल है दुख अज्ञान । ।
गुरु का लेकर आसरा, तजो मोह मद मान ॥4 ॥
मंगलमय मंगल सदन, मंगल चारों ओर । ।
नाम जपो राधास्वामी का, लो सतपद में ठौर ॥ ॥
624. बिन गुरु ज्ञान ध्यान नहीं आ ।
गुरु मिले तब भेद बतावे । ।
करम परम डारे बहु फन्दा ।
चिन विवेक नहीं मिले वितंडा ॥
याते गुर चरनन चित लाओ ।
तब निज पद का भेद खुलाओ । ।
गुरु के चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया सब पतित उद्धारी ॥
गुरु मिले छूटे त्रय तापा ।
गुरु ज्ञान से सूझे आपा ॥
625. गुरु गुरु मैं निस दिन गाता ।
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रतिपाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ।
गुरु नाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा । ।
गुरु समुद्र शशि गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सत चित आनंद की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु महाना ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का बार न पार ।
__जित देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ॥
626. आस करो गुरु चरन की, त्याग जगत की आस ।
जो कोई ऐसा दास है, कभी न होय निरास ॥1 ॥
गुरु समरथ की बंदगी, निस दिन आठों याम ।
जो कोई यह साधन करे, ताहि मिले निज नाम ॥2 ॥
चिंता कीजे गुरु की, चिंता और भुलाय ।
एक दिन ऐसा होयगा, बनत बनत बन जाय ॥3 ॥
627. जिन डरप्यो सुन्दर बरनारी ।
गुरु सब भांति करे उपकारी ॥
प्रेम प्रीत की रीत सुहाई ।
घिरहु छांड़ छल अरु कदराई ।
भक्तिभाव हित चित लगावहु ।
अछत शरीर मुक्ति फल पावहु ।
जा पर दया गुरू की होई ।
जग में भाग्यवान नर सोई ॥
कष्ट कलेश पास नहीं आवे ।
हंसा एक दिन निज घर जावे । ।
दोहाराधास्वामी चित्त धर, मन में राखो धीर ।
समरथ सतगुरु दीन हित, सहज मिटावें पीर ।
628. सतगुरु कहें भेद दरसाई ।
मारग घर का दीन बताई ॥
प्रथम शरन गहो सतगुरु की ।
द्वितीया शरन गहो सतसंग की ।
गुरु जो भेद बतावें तुमको ।
धारो वचन कमाओ उनको ।
तन मन इन्द्री सुरत समेटो ।
चढ़ आकाश शब्द गुरु मंटो ॥
सुनो नित्य तुम अनहद बानी ।
देखो अद्भुत जोत निशानी । ।
जोत फाड़कर सुन्न समाओ ।
सुखमन होय बंक में आओ ॥
बंक पार त्रिकुटी सुन गीत ।
काल कर्म दोऊ लेना जीत । ।
सुन्न शिखर चढ़ी सूरत धूम ।
मानसरोवर पहुँची झूम । ।
महासुन्न जहां अति अंधियार ।
गुप्त चार धुन बानी सार । ।
भंवरगुफा जाय लीना चीन्ह ।
आगे सत्त लोक चढ़ लीन ॥
अलख अगम को जाकर परसा ।
शब्द पकड़ लें सूरत सरसा ॥
राधास्वामी नगर निहारा ।
देखा जाय अगर उजियारा ॥
629. गुरु पद परस करो अभ्यास ।
घट में देखो बिमल उजास ॥
सहसकमलदल सुरत चढ़ाओ ।
घंटा शंख धुन सुन घट आओ । ।
निरखो अन्दर गरु का नूर ।
बाजे अन्दर अनहद तूर ॥
सुन सुन तूर हुआ मन सूरा ।
त्रिकुटी जाय पाया गुरु पूरा ॥
सुरत ने पाया मूल कलाम ।
ओंकार पद का वह ठाम । ।
मेघनाद जहाँ बजत मृदंग ।
सुन सुन सुरत हो रही दंग ॥
कुछ दिन ऐसी लीला देखो ।
आगे का फिर करो परेखो ॥
सुन्न मंडल में गाड़ा थाना ।
अजब देश अद्भुत मैदाना ॥
मानसरोवर किया असनान ।
निर्मल हुई सुरत हंस समान ॥
क्षीर नीर का किया निवेरा ।
गढ़ कैलाश किया चढ़ डेरा ॥
गंग जमन सरस्वती की धार ।
देखी घट में बिमल बहार ॥
नहाय धोय सूरत मुसकानी ।
किंगरी सारंगी सुनली बानी ॥
ठमक ठमक आगे को चाली ।
सुरत जमाई हुई जलाली ।
भंवरगुफा का परवत देखा ।
सोहंग पुरुष का पाया लेखा । ।
सोहंग मोहंग बन्सी बाजी ।
सुन सुन सूरत मन में गाजी ।
मधुबन में बन्सी की धूम ।
देख रास लीला गई झूम । ।
झूम झूम हुई अति मस्तानी ।
देह गेह की सुद्धि भुलानी । ।
तब सतपद में आन विराजी ।
साज भक्ति का अनुपम साजी ॥
बीन सुनी सत धाम ठिकान |
सतपद देखा मगन मन मान ।
सत्यम् सत्यम् उठी बाजा ।
कहो आये तुम यहां केहि काजा । ।
बोली सुरत प्रेम हुलसाई ।
काल करम माया दुखदाई ॥
तीन ताप से अति घबरानी ।
गुर की दया पाई सहदानी ॥
लेकर भेद यहाँ चलि आई ।
दया पात्र होय शरन समाई । ।
सचखंड अलख अगम तर दरसा राधास्वामी चरन कमल तब परसा सुरत सहेली भई निरवानी ।
अब क्या कहूँ यह अकथ कहानी ।
॥
उपदेश ।
630. पहिले करो सहसदल बासा ।
फिर त्रिकुटी का विमल बिलासा । ।
सुन्न महासुन्न तारी लागी ।
तब सोई सूरत कुछ जागी ।
भँवरगुफा चढ़ माया त्यागो ।
सच पुरुष के चरनन लागो । ।
भेद पाय ओम् पद आओ ।
तब तिस पद का मर्म कुछ पाओ ॥
जो कोई इतने ऊंचे चढ़े ।
रूप रंग रेखा से टरे ।
सहसकमल पहिला स्थान ।
जोति निरंजन रूप लखान । ।
अद्भुत लीला अचरज खेल | शिव शक्ती ने कीना मेल ।
प्रगटी जोत जोत में जोती ।
अद्भुत हीरे पन्ने मोती । ।
रंग रंग के फूल खिलाने ।
चहुँदिस भंवर मुण्ड मंडलाने ॥
श्याम कंज फुलवारी शोभा ।
देख देख मन अति कर छोभा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन धुन सूरत मुसकाई ।
ताहि छोड़ आगे को बढ़ी ।
त्रिकुटी छोड़ आगे को चढ़ी । ।
631. मन मन्दिर में बैठो आय ।
निज मन दरपन रूप लखाय ।
सहसवृत्ति से सहसकमल में ।
कुछ दिन बसो तुम उसी महल में तज उसको त्रिकुटी में जाओ ।
त्रिपुटीवाद में चित्त लगाओ ।
इसके ऊपर सुन्न अस्थान ।
पुरुष प्रकृति जहां खेलें आन ॥
यह पद द्वत भाव सुन लीजे ।
माया ब्रह्म के गुन गुन लीजे ॥
दो वृत्ति को तज दो भाई ।
भंवरगुफा चढ़ सतपद जाई ।
सत में रूप अनूप तुम्हारा ।
वह है सुरत शब्द का सारा । ।
एक एक ताहि सन्त बखाना ।
तहां विचार का नहीं ठिकाना ।
अगम अलख के पार सुनाई ।
नहीं वह एक न दो है भाई । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जिन यह बचन सुनाया पुकारी। ।
632. विद्या बुद्धि चतुरता, शास्त्र पुराण अनेक ।
इन सबको तुम परिहरो, जो नहीं समझे एक ॥1 ॥
वाद विवाद हिये दुख घना, तासों कुछ नहीं होय ।
तज इनको जो हरि भजे, भक्त कहावे सोय ॥2 ॥
ना सुख विद्या बुद्धि में, ना सुख वाद विवाद ।
सुखदायक गुरु भक्ति है, सुरत भई बिस्माध ॥3 ॥
633. निंदा कबहु न कीजिये, निंदा अघ की खान ।
निंदा से उपजे सभी, कलह कलेश महान ॥1 ॥
मन दर्पन के बीच में, पर निंदा की छार ।
निर्मलता पल में गई, भर गई धूल विकार ॥2 ॥
\अपने आपको देखिये, औरन सों क्या काम ।
अपने देखे गुन लहें, औरन औगुन ठाम ॥3 ॥
हस हस दोष न देखिये, मन घट अगम अनूप । ।
जो या में निंदा भरे, तन छिन होये कृप ॥4 ॥
साध बड़े परमारथी, गुन गह औगुन त्याग ।
जो कोई औगुन को गहे, सो मतिमंद अभाग ॥5 ॥
भैयरा बैठा फूल पर, लेइ सुगंध सुबास ।
मक्खी विष्ठा पर उड़ी, पाय कुगंध कुबास ॥6 ॥
जो तू गुरु का दास है, होजा गुरु का बच्छ ।
दूध सार सब खींच ले, छोड़ रक्त का पच्छ ॥7 ॥
शब्द सार टकसाल है, समझ शब्द का सार । ।
साधू माखन चाखिया, छाछ पिये संसार ॥8 ॥
अपनी निंदा कीजिये, पर निंदा से लाज ।
निज निंदा कारज बने, और से होय अकाज ॥6 ॥
ब्रह्मा ने यह जग रचा, अमृत जहर मिलाय ।
अमृत देव का खाज है, असुर जहर नित खाय ॥10 ॥
निंदक तो हिंसक भया, हिंसा करे उपाय । ।
जिभ्या की तलवार से, सदा कलेजे धाव ॥11 ॥
जो तू गुरु का सेवका, निंदा दोष भुलाव । ।
जो कोई पर निंदा करे, पड़े न पूरा दाच ॥12 ॥
गुन ग्राही कोई संतजन, औगुन ग्राही असाध ।
दोष पराया ना लखे, ताका मता अगाध ॥13 ॥
निज निंदा सुन हरखिये, कर निंदक सन्मान ।
बिन साबुन पानी बिना, शुद्ध करे मन आन ॥14 ॥
निंदक सांचा मीत है, जीवे आदि जुगाद ।
निंदा सुन हमने तना, मन का विषम विषाद ॥15 ॥
निज निंदा से जो डरे, सो नहीं सांचा भक्त ।
सुन सुन निंदा आपनी, तजे दोष का जग्त ॥16 ॥
गुरू टेक दृढ़ कीजिये, सुन निंदा के बैन ।
जो कोई निज निंदा सहे, मन उपजे सुख चैन ॥17 ॥
निंदक तो निंदा करे, हम निंदक को प्यार ।
सुनकर निंदा आपनी, त्यागा मूल विकार ॥18 ॥
गुरुमत गुरु का दास है, निंदक मनमत होय ।
निंदक के प्रसाद से, दुर्मति गई सब खोय ॥16 ॥
गुरु से नित यह माँग हूँ, औगुन त बनाय ।
गुन दृष्टि पर गुन लहूँ, राधास्वामी गुन नित गाय ॥20 ॥
634. गुरु की कीजे बन्दना, कोटि कोटि दिन रात ।
गुरु कृपा से साधुवा, पाये अद्भुत दात ॥1 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, निस दिन निस्सन्देह ।
गुरु कृपा से साधुवा, पावे उत्तम देह ॥2 ॥
गुरु को कीजे बन्दना, श्रद्धा भक्ति समेत ।
गुरु कृपा से साधुवा, जीते भव का खेत ॥3 ॥
गुरु की कीजे बन्दगी, रहिये आज्ञा माहिं। ।
गुरु कृपा से साधुवा, तीन लोक भय नाहिं ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये, कटे काल का फन्द ।
हिय अन्तर विच ऊगर्वी, कोटिन सूरज चन्द ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये; छूट जाय त्रय ताप । ।
सुख दुख एक समान हो, हदय शोक नहीं व्याप ॥6 ॥
गुरु मिले तब जानिये, सूझे अगम अपार ।
दृष्टि खुले पर पाइये, उत्तम भाव विचार ॥7 ॥
गुरु मिले तब जानिये, आवागवन नसाय ।
यम की फांसी कट गई, पदवी मिली महान ॥8 ॥
गुरु समान रक्षक नहीं, देखा नैन पसार ।
कुल कुटुम्ब सब स्वारथी, करें अधिक उपकार ॥6 ॥
गुरु समान दाता नहीं, दीनी दात अमोल ।
क्या कोई जाने दात वह, ताको मोल न तोल ॥10 ॥
गुरु समान नहिं मीत कोई, चार लोक जग माहिं। ।
निःकामी परस्वारथी, ऐसा कोई नाहिं ॥11 ॥
गुरु माता गुरु पिता हैं, गुरु भ्राता गुर मीत ।
गुरु सम प्रीतम जगत में, मोहि न आवे चीत ॥12 ॥
गुरु को सब कुछ जानिये, निसदिन कीजे सेव ।
गुरु साहेब गुरु साइयां, गुरु हैं सच्चे देव ॥13 ॥
635. पुरुष भेद नहीं पावे कोई ।
जब लग माया भरम न खोई ॥
छाया में सब रहे भुलान ।
रवि शशि का फिर मिले न ज्ञान ।
सूरज एक आकास प्रकाशा ।
ताका प्रतिबिम्ब आभास ॥
तत्वों का जब करे विचार ।
तब सूझे संसार असार ।
त्याग असार सार तब गहे ।
बिन परखे कोई कैसे कहे । ।
दोहासांख्य योग के मनन से, देखे माया रूप ।
उर अन्तर अपने लखे, तब निज सत्य स्वरूप ॥
636. माया तो भई मोहनी, मोह लिया संसार ।
गरु की कृपा अपार से, कोई भया भव पार ॥1 ॥
माया के सेवक सभी, राजा रंक फकीर । ।
निसदिन मारे बान तक, बेधे सकल शरीर ॥2 ॥
माया तो फांसी भई, फांस लिये सब कोय ।
केवल गुरु की कृपा से, मुक्ति होय तो होय ॥3 ॥
गुरु को माथे राखिये, सुनिये बचन विचार ।
गुरु कृपा से साधुबा, छूटे सकल विकार ॥4 ॥
637. दोहाजीवन मुक्त के बात में, बात बात में बात ।
ज्यों कदली के पात में, पात पात में पात । । ॥ चौपाई ॥
सुन सतगुरु उपदेश साधु, सुन सतगुरु उपदेश पढ़ लिख के औरन समझावे ।
आप सांच का भेद न पावे ॥
भरम में भरमें और भरमावे ।
भूल भरम में सबही फसावे ।
उनका तज दे संग साधु, उनका तज दे संग ॥
सत्त असत्त की अकथ कहानी ।
भूले पंडित भूले ज्ञानी ॥
उनसे बचकर चल अभिमानी ।
इनकी बातें हैं मनमानी ॥
यह हैं निपट अनाड़ी, साधु यह हैं निपट अनाड़ी ॥
पढ़ा लिखा पर भेद न पाया ।
हाथ न उनके कुछ भी आया ।
झूठी काया झूठी माया ।
इनसे क्यों नर नेह लगाया ॥
समझबूझ कर काम साधु, समझबूझ कर काम ॥
मान बड़ाई में क्यों भूला ।
निसदिन फिरता फूला फूला ॥
काल जाल का कठिन है झूला ।
सहेगा अन्त में जम का मूला ।
मानुष जनम सुधार साधु, मानुष जनम सुधार ॥
चरन कमल प्रभु चित्त लगाओ ।
अपनी बिगड़ी आप बनाओ ।
भक्ति भाव का ढोल बजाओ ।
प्रेम प्रीत की महिमा गाओ ।
जासों हो निस्तार साधु, जासों हो निस्तार । ।
638. बुन्द सिन्ध का रूप है, सिन्ध बुन्द का रूप ।
बुन्द सिन्ध के रूप में, झलके अगम अनूप ॥1 ॥
पहिले बुन्द का मान है, पीछे सिन्ध का ज्ञान ।
बुन्द सिंध दोनों तजे, तब पावे निरवान ॥2 ॥
बुन्द चला सत सिंध को, समझ समझ पगधार ।
जब देखा निज रूप को, भया सार का सार ॥3 ॥
झगड़ा पड़ा अनेक का, लख आवे नहीं एक ।
धोके में नर तन गया, मिला न सार विवेक ॥4 ॥
॥चौपाई ॥
एके एक रहा भरपूर ।
सबके निकट नहीं कुछ दूर ॥
सिन्ध बुन्द में रहा छुपाई ।
परखे बुन्द तो सिन्ध लखाई ॥
घट समुद्र में लहर अपार ।
लहर मध्य व्यापा संसार ॥
सतगुरु मिले लगावे पार ।
बिन सतगुरु डूबे मंझधार ॥
बिरला गुरु का सेवक पूरा ।
जो रन चढ़े वह सच्चा सूरा ॥
दोहानाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे कोई साध ।
शब्द घाट जो ऊतरे, ताका मता अगाध ॥
639 सतसंगत से लाभ उठाया ।
गुरु से परमारथ धन पाया ।
परमारथ स्वारथ सब त्यागी ।
गुरु चरनन का रहूँ अनुरागी ।
गुरु की पूजा गुरु की सेवा ।
गुरु सम कोई न जाने देवा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बिगड़ी बात सँबारी ॥
640. गुरु ने युक्ति सहज बताई ।
मेंट दिया जग अगमापाई ॥
सुमिरन से भव का भय भागा ।
ध्यान बढ़ा चित्त अनुरागा । ।
शब्द से कटे मोह के जाल ।
सेवक फिर हुआ आज निहाल । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
या विधि टूटे बन्धन भारी ॥
641. करम धरम है गुरु की सेवा ।
सतसंग ज्ञान विचार का भेवा ॥
भक्ति भाव गुरु रूप का ध्यान ।
सुरत पाय पद अति हरखान ।
तुर्या अलख गुरु की लख है ।
जोति शब्द का अन्तर मुख है ।
जो कोई इन तीनों को पावे ।
जड़ चेतन का भर्म मिटावे ॥
ग्रन्थी खुले निज रूप निहारे ।
जोति शब्द का भेद विचारे ।
सवको त्यागो करो विचार ।
राधास्वामी धामी है सबका सार । ।
642. करम धरम तज शरन में आओ ।
गुरु चरनन से आस लगाओ ।
मेटे द्वन्द का भरम पसारा ।
सूझे सार असार का सारा ॥
सुमिरन भजन ध्यान घट अंदर ।
तब प्रगटे हिय शब्द निरंतर ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया से हुआ भव पारी
643. प्रारब्ध पहले बन आया ।
ताने पीछे जनम रचाया ।
पेट में नर की किया संभार ।
दे अहार पाछे करतार ॥
मां की छाती दूध उत्पावे ।
पाले पोसे बड़ा करावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी मौज गुरु की लेउ निहारी ॥
644. क्रियमान कर्म सहज ही कटे ।
संचित कर्म भी चित से हटे ।
प्रारब्ध में प्रबलताई ।
बिना भोग नहीं काटा जाई ।
ताते मौज का लेउ सहारा ।
भोगो भोग में करो विचारा ॥
राधासामी चरन शरन बलिहारी ।
प्रारब्ध भोग को मेटत जारी । ।
645. नेकी करे तो नेकी आवे ।
बदी करे बद का फल पावे ॥
जो औरन को खोदे कुआँ ।
आपहि डूबे गिरकर वहां ॥
जो औरन को जहर खिलावे ।
उसका पुत्र बन्धु मरजावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
करम भरम की बात है नियारी
646. मन बुद्धि चित में जब नहीं मेल ।
फिर साधन का बने न खेल ।
चंचल मन में शान्ति न आवे ।
भ्रान्ति भरम का दुख बहु पाये ॥
आसन टिके न ध्यान लगावे ।
परमारथ धन हाथ न आवे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति सारी ॥
647. जैसा कृष्ण राधा को कहे ।
राधा के मुंह वैसा सुने ।
अनुचित बानी अनुचित मन ।
अनुचित कथन का अनुचित सुन। ।
जैसा सोचे तैसा रूप ।
सोच से कोई रंक नहीं भूप ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जैसा ध्यान वैसा व्यौहार । ।
648. द्वष भाव से द्वेष की आँच ।
राग जो उपजे तब हुये सांच ॥
कृष्ण असुर के काल कहावे ।
सुर देवता मित्र ठरावे ॥
जसोदा नन्द के नन्हें बालक ।
ब्राह्मण साधु के वह कुल पालक ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मित्र शत्रु मन अधम खिलारी ॥
649. झुट मुट खेलू सांचा होय ।
सांचा खेले बिरला कोय ॥
जो कोई झूटे सतसंग आय ।
सांचा सतसंग का फल पाय ॥
झूट त्याग सत को दे चित ।
साहेब सांचा उसका मीत ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सतसंगत की महिमा भारी । ।
650. जो कोई बोले बातें सांच ।
ताको कभी न आवे आंच ॥
जाके हृदय सांच का बासा ।
ताके मन प्रभु करें निवासा ॥
मौज निहार करे सेवकाई ।
साई उसके सदा सहाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सांच की आप करें रखवारी । ।
651. ब्रह्म न बनो कथो नहीं ज्ञान ।
सीखो गुरु से साधन ध्यान ॥
कथनी छोड़ करनी चितलाओ ।
करनी द्वारा रहनी पाओ ।
सुरत’ शब्द की लागे तारी ।
तब घट प्रगटे भेद अपारी ॥
( ज्ञान अज्ञान विचार )
652. दोहाचार अठारह षट पढ़े, पढ़ पढ़ जनम सिरान ।
बिना योग साधे कहां, उपजे उत्तम ज्ञान ॥
रज सत तम में रहे भुलाई ।
मन मूरख की थाह न पाई । ।
मन के उरझे उरझे पानी ।
मन नहीं सुरझा भरम भुलानी ॥
काम क्रोध मद घाटी दुर्गम ।
चढ़े न जब लग कैसा शम दम ॥
बिन शम दम नहीं पूरा ध्यान ।
बिना ध्यान कहो कैसा ज्ञान ॥
बाहर मुखी जगत में डोलें ।
बिन समझे बुझे बहु बोलें ।
दोहायोग करे जब तब लहे, घट अन्तर का भेद ।
तब छूटे संसार यह, मिटे भरम भव खेद ॥
653. दोहासिंह पड़ा भव कूप में, छाया अपनी देख ।
बूड़ मरा मंजधार विच, देखो करम की रेख ॥
छाया माया दोउ असार ।
छाया माया है संसार ॥
जब लग छाया माँहि रहावे ।
तब लग भव दुख अधिक सतावे। ।
अहं ब्रह्म हंकार निवास ।
अहंकार में जम का फाँस ॥
बात बनाई जग भरमाया ।
आप फंसा औरन फसबाया ॥
मान ध्यान और बुद्धि विलास ।
ताते होय न अविद्या नास ॥ भाई ॥
दोहा झाई में छाई पड़ी, झांई पड़ी न देख ।
झांई झांई लख परे, दरसे अगम अलेख ॥
654. दोहा मिथ्या जग को सब कहें, मिथ्या कथन विचार ।
मिथ्या कहि मिथ्या फसे, मिथ्या माहि विचार । ।
मिथ्या का नर करे विचार ।
तज मिथ्या पद पावे सार ।
मिथ्या की अति असत कहानी ।
सतपद मिथ्या से अलगानी ॥
मिथ्या कारज मिथ्या कारन ।
मिथ्या है सब सूक्ष्म विचारन ।
मिथ्या अव्याकृत बिराट ।
मिथ्या हिरण्यगर्भ का ठाट ।
मिथ्या तेजस विश्व पराग ।
दोऊ तजे खुले तब भाग ।
दोहा शुद्ध भावना शुद्ध चित, शुद्ध विवेक विराग ।
__ घट पट से ऊँचे चढ़े, खेले सत से फाग ॥
655. दोहा तीन अवस्था तीन गुन, तीन बरन तिउं काल ।
इनसे जब ऊँचे चले, तव चौथा पद चाल ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति माया ।
तुर्या चौथा पद निर्माया । ।
सृष्टि स्थिति परलय माहीं ।
क्षत्री शूद्र अरु वेश रहाई ॥
तुर्या पद में सत्य समाना ।
सोई ब्रह्म ब्राह्मण कोई जाना ॥
गृही ब्रह्माचारी बन बासी ।
तीनों त्याग हुये सन्यासी ॥
सन्यासी में सहज उदास ।
सन्यासी कोई गुरु का दास ॥
दोहा सगुन रूप त्रय गुन विषय, निर्गुन चौथा धाम ।
निर्गुन सगुन ते ऊपरे, तुर्यातीत की ठाम ॥
656 दोहा साधन से सब होत हैं, करम धरम के काम ।
बिन साधन नहीं पाइये, परमतत्व का धाम ।
जेहि विधि जीव फंसा संसार ।
तिसि विधि ताका करे निरवार ॥
कर निरवार ग्रन्थी हिये खोले ।
युक्ति मिलावे न मुख से बोले ।
जड़ चेतन की गांठी परी ।
शान्ति भाव सो मन से हरी । ।
मन अशान्त अज्ञान समाना ।
तिमिर भरम में अति अकुलाना ॥
अकुल विकुल में दुख कलेश ।
केहि विधि सुने गुरु संदेश ॥
दोहाश्रवन मनन निध्यासन, सतसंग में चित धार ।
गुरु की दया अपार से, उतरे भव जल पार । ।
657. दोहागोपी गोप हैं गुप्त वृती, मधु सूदन करतार ।
वृन्दावन बन तन आय के, लीला करे अपार । ।
आनन्द नन्द रूप पितु सोई ।
माया जमुमत माता होई ॥
निश्चर रूप अविद्या कंस ।
बूड़ा उग्रसेन का बंस ॥
ताहि मार दश द्वार सिधारा ।
राधा सुरत किया सिंगारा ॥
रुक्मिणी जाम्बवन्ती सतभामा ।
सुन्दर अद्भुत बिमल ललामा। ।
सुरत निरत सब अति कर साधी ।
द्वारका फिर जा लगी समाधी ॥
दोहाजो कोई जाने भेद यह, ताको कहिये साध ।
जो नर पड़े विवाद में, करें नित्य अपराध । ।
658. गुरु के चरन जाऊँ बलिहारी ।
जिन यह मौज दिखाई न्यारी ।
मन माया से पार लगाया ।
शब्द भेद दे सार बताया ।
सहसकमलदल घाटी तोड़ी ।
सुरत निरत गुरु चरनन जोड़ी ॥
घट में भान किया प्रकाश ।
तिमिर अविद्या का लगा नास ॥
त्रिकुटी चढ़ सुन खंड में आया ।
भवरगुफा बंसी बजवाया ।
दोहासोहंग धुन घट में सुनी, भंवरगुफा के पास । ।
राधा सुरत निर्मल भई, कृषण संग किया बिलास । ।
659. भान उदय हुआ कमल विकास ।
मोहे मधुप सरोज सुबास ॥
बिगसत कवल मगन आनन्द ।
सुरत निरत के खुल गये बन्द ॥
बन्द खुले सुरत ऊपर चाली ।
लीला देख भई मतवाली ॥
निज स्वरूप का पाया भेद ।
छूट गये भव के भ्रम भेद । ।
हरखत मन गुरु चरन समानी ।
सत्त पुरुष की सुन ली बानी ॥
दोहाबानी सुन देही तजी, पाया पद निर्वान ।
राधास्वामी चरन में, मिल गया ठौर ठिकान ॥
660. इन्द्र प्रस्थ वह देश अनूप ।
राजा जहां युधिष्टर भूप ।
पाँच तत्व ले रचा शरीर ।
आये बसे वहाँ धीर गम्भीर ॥
अन्धा धृतराष्ट अज्ञान ।
से सौ पुत्र किया भति हान ॥
भीष्म द्रौण सब साज सँवारे ।
भारत रन में चढ़ पद गाड़े ॥
कृष्ण सहाय भये पान्डुन के ।
मारे खल दल क्षत्री बांके ।
दोहागये हिमालय जाय सब, पान्डव मंगल खान ।
राधास्वामी की दया, पाया यह सत ज्ञान ।
661. पदम पंद्मनी नीर में, गगन मंडल में भान ।
दृश्य नेह स्वभाव का, देखे सज्जन आन ॥1 ॥
पद्म गगन की ओर दृष्टि, रवि धरती की ओर ।
दोनों मन मोहन बने, दोनों ही चित चोर ॥2 ॥
पदम पद्मिनी उच्च चित, नीच चित्त है सूर ।
ऊँच नीच दोऊ कल्पित, मद माया कर चूर ॥3 ॥
रवि दयाल का रूप है, दीन दुखी से प्यार ।
ऊँच की दृष्टि नीच पर, महिमा अगम अपार ॥4 ॥
सूरज की हानी नहीं, परम की ओर निहार ।
कृष्ण सुदामा की दशा, परखे परखन हार ॥5 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीन दुखी के काज ।
सतपद तज प्रगटे जगत, सन्त साध दल साज ॥6 ॥
662. पदम रहे जल जगत में, सूरज बसे आकास ।
दृष्टि गगन की ओर कर, पदम सूर के पास ॥1 ॥
पदम रंग है प्रेम का, प्रेम शक्ति के संग ।
प्रेम की शक्ति संग ले, धार पग का रंग ॥2 ॥
शक्ति भक्ति चित मुक्ति है, युक्ति मुक्ति व्यौहार ।
शक्ति भक्ति चित युक्ति धर, मुक्ति का पन्थ संवार ॥3 ॥
घट में प्रेम की शक्ति जब, चढ़ चल शब्द की धार ।
गगन मंडल सुन्न शिखर पर, सहज समाध सुधार ॥4 ॥
समता संजम साध ले, हो जा साध सुजान ।
सत संजोग के योग से, ले अब पद निरवान ॥5 ॥
जल में रह जल से अलग, पदम बतावे तोह ।
यही साध की रीत है, त्याग भरम मद मोह ॥6 ॥
मुरगावी जल में रहे, गोते खाये अनेक । ।
पर नहीं भीगे नीर से, यही पदम चित टेक ॥7 ॥
राधास्वामी की दया, पाया भेद अपार ।
पदम भानु की दशा लख, हो रहा जग से न्यार ॥8 ॥
663. हनुमन्त कुड अस्नान कर, देखे पदम अनेक ।
पूछा तुम तो कई हो, रवि है गगन में एक ॥1 ॥
पदम हस हस बोल कर, दृष्टि गगन की ओर । ।
समझ नेह की रीत कुछ, नहीं मुख से कर शोर ॥2 ॥
स्वामी सबका एक है, एक एक है एक ।
सेवक दास समान चित, जग में रहें अनेक ॥3 ॥
पाल प्रेम परतीत को, धर सतगुरु का ध्यान ।
सूरज एक अकास का, घट घट में दरसान ॥4 ॥
एक एक है एक है, एक एक के भाव ।
एक के प्रेम प्रतीत से, मिले प्रेम का दाव ॥5 ॥
घटे नहीं बाढ़े सदा, पाये मोह की धार ।
सीख प्रेम यह पदम से, सहित विवेक विचार ॥6 ॥
भक्ति के मारग आय कर, अघट प्रेम घट धार ।
सुरत शब्द की डोर गह, जाय गुरु दरबार ॥7 ॥
सूरज पदम समान दोऊ, एक रूप एक ढंग ।
गुरु चेला मिल एक हों, जो चित प्रेम का रंग ॥8 ॥
राधास्वामी भज सदा, निसदिन आठों धाम ।
जीवन सुख है जगत में, अन्त में सत्त पद ठाम ॥6 ॥
664 । जल में पदम का वास है, सूरज बसे आकास ।
पदम का यह इच्छा भई, करे सूर की आस ॥1 ॥
धरती गगन का भेद लख, मन मेरा भया उदास ।
बोला पदम प्रतीत कर, मैं साज के पास ॥2 ॥
आस आस जग है बंधा, आस सहित विश्वास ।
जो जाके मन में बसे, सो है उसके पास ॥3 ॥
जैसी मति गति सोई लखे, कोई गुरु का दास ।
घट धरती सुरत सेवका, गगन मंडल गुरु वास ॥4 ॥
दृष्टि फेरकर ऊँच सिर, घट गुरु रूप निहार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, सतगुरु का दीदार ॥5 ॥
पदम भानु की प्रीत को, समझे साध सुजान ।
राधास्वामी की दया, पावे पद निरवान ॥6 ॥
इति







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