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[ ७०४ ] राधास्वामी गुरु दयाल, बलि बलि जाऊँ चरन पर॥मुझको किया निहाल, दीन दुखी अति जानकर ॥चरन कमल की ओट, आन गही जब गुरु की॥मेटो कम सब खोट, धन्य धन्य गुरु दीन हित ॥तुम तो चन्द्र स्वरूप हो, मैं हूँ चित चकोर सम॥प्रभु तुम ब्रह्म के कूप हो, मैं तो हूँ घट के सदृश॥सूर उगा बिगसे कमल, तिमिर विकार की गम नहीं॥नहीं अज्ञान का भय कोई, तेरी दया अपार से॥राधास्वामी परम कृपाल, नर शरीर गुरु धार कर॥साँचे दीन दयाल, शब्द योग की रीति दी॥सत्रहवीं धुन
[ ७०४ ] राधास्वामी गुरु दयाल, बलि बलि जाऊँ चरन पर॥
मुझको किया निहाल, दीन दुखी अति जानकर ॥
चरन कमल की ओट, आन गही जब गुरु की॥
मेटो कम सब खोट, धन्य धन्य गुरु दीन हित ॥
तुम तो चन्द्र स्वरूप हो, मैं हूँ चित चकोर सम॥
प्रभु तुम ब्रह्म के कूप हो, मैं तो हूँ घट के सदृश॥
सूर उगा बिगसे कमल, तिमिर विकार की गम नहीं॥
नहीं अज्ञान का भय कोई, तेरी दया अपार से॥
राधास्वामी परम कृपाल, नर शरीर गुरु धार कर॥
साँचे दीन दयाल, शब्द योग की रीति दी॥
सत्रहवीं धुन
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[१-७०५ ] गुरु गम अगम अलौकिक अद्भुत, शोभा कही न जाय॥महिमा अकह अपार सिंधुवत, अधिक अधिक अधिकाय
[१-७०५ ] गुरु गम अगम अलौकिक अद्भुत, शोभा कही न जाय॥
महिमा अकह अपार सिंधुवत, अधिक अधिक अधिकाय ।॥
घट घट बासी प्रभु अविनाशी, चेतन सहज उदासी॥
रूप अरूप स्वरूप अनूपम, आनन्दधन सुखरासी ॥
नारद शारद शेष वरुण रवि, शशि को बरने पारा॥
परमतत्व शुभ सदन अयन छवि, रचना के आधारा॥
ज्ञान ध्यान का पन्थ चलाया, योग युक्ति बतलाई॥
भव भय जाल से जीव निकारा, यम की फाँस कटाई ॥
कलि मल दहन विभंजन त्रय दुख, दीन अधीन सहाई॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धन जिन यह गति पाई ॥
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[२-७०६ ] स्वामी प्रीतम दाता दानी, गुरु तुम भूप हो मेरे॥तन मन धन सब तुम पर वारू , रूप स्वरूप हो मेरे॥मुक्ति धान धुरलोक निवासी, अन्तर घट के बासी॥मतपद चेतन धन निरवानी, सुख आनन्द सुखरासी
[२-७०६ ] स्वामी प्रीतम दाता दानी, गुरु तुम भूप हो मेरे॥
तन मन धन सब तुम पर वारू , रूप स्वरूप हो मेरे॥
मुक्ति धान धुरलोक निवासी, अन्तर घट के बासी॥
मतपद चेतन धन निरवानी, सुख आनन्द सुखरासी ।॥
करुणा सागर सब विधि आगर, नागर शोभा धारी॥
निराधार जग के आधारा, जीवन के हितकारी ॥
आप आर में आर समाने, आप में आधा दरसा॥
ज्ञान ध्यान अनुभव गति जानी,चरन कमल जब परसा ।॥
सिंधु गम्भीर धीर जल भरिया, लहर उठे अति भारी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सबके सबसे न्यारी ॥
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[३-७०७ ] दाता दानी देता, दिव्य दृष्टि के रूप॥सतमत सतगुरु सतकला, सत संकल्प स्वरूप ॥तुम आये इस जगत में, दया धरम के कान॥दया कीजिये दयामय, दया धरम के लाज
[३-७०७ ] दाता दानी देता, दिव्य दृष्टि के रूप॥
सतमत सतगुरु सतकला, सत संकल्प स्वरूप ॥
तुम आये इस जगत में, दया धरम के कान॥
दया कीजिये दयामय, दया धरम के लाज ।॥
मैं तो सब विधि हीन हूँ, अगुन का भण्डार॥
शरण पड़ा प्रभु आयकर, मेरी करो संभार ।॥
मेरी और न देखिये, मैं तो कुटिल कुचाल॥
अपनी ओर निहारिये, दीनबन्धु सुदयाल ।॥
कामी क्रोधी लालची, हिया जिया सकल मलीन॥
यह सब मेरे चिन्ह हैं, तुम दाता परवीन॥
मैं माया बस भूल में, भरम रहा संसार॥
तुम समरथ मेरे साँइयाँ, मेटो मूल विकार ।॥
साध संग नित दीजिये, साधु सेव का दान॥
साधु प्रेम में रंग रहूँ, और न कोई ध्यान ॥
मो सम तेरे बहुत हैं, मेरे तुम हो एक॥
एक तुम्हारे रूप की, सदा रहे मन टेक ॥
अंध टेक नहीं चाहिये, ज्ञान टेक अभिलाख॥
राधास्वामी दया करो, मिले ज्ञान की आँख ।॥
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[४-७०८ ] चरन कमल चित जोड़कर, स्वामी सनमुख आया॥निज सेवक मोहि जानि, कीजे करुणा दाया
[४-७०८ ] चरन कमल चित जोड़कर, स्वामी सनमुख आया॥
निज सेवक मोहि जानि, कीजे करुणा दाया ।॥
जनम जनम रहा भून में, माया लपटानी॥
काल करम के फाँस में, निस दिन उरझानी ॥
भक्ति भाव के सार को, किंचित नहीं जाना॥
भटक भटक भटकत फिरा, भरम माहिं भुलाना ॥
आसा मनसा बन्ध रहा, छूटा संसारा॥
काम क्रोध और मोह ने, गले फाँसी डारा ॥
अवगुन हारा गुन नहीं, पुरुषारथ हीना॥
मन प्रतीति नहीं प्रेम रस, सब विधि आधीना ॥
जगत पिता दाया करो, मैं दास तुम्हारा॥
प्रेम दान मोहि दीजिये, भक्ति रस सारा ॥
भव जल गहर गम्भीर अति, उठे लहर अपारा॥
तुम बिन समरथ सतगुरु, केसे जाऊँ पारा ॥
बाँह गहे की लाज, काज करो अन्तरयामी॥
तुम हो दीन दयाल पिता, प्रभु रक्षक स्वामी ॥
नाम रतन धन बख्शिये, शरनागति दीजे॥
और नहीं कुछ चाहिये, चरनन में लीजे ।॥
राधास्वामी सतगुरु, पूरन करतारा॥
दया दृष्टि से मेटिये, अज्ञान पसारा ॥
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[ ५-709 ] भाग जगा गुरु पूरा पाया, बना आप बड़भागी॥प्रेम हाट में सौदा कीन्हा, नहीं बना बैरागी॥जोगी जंगम चतुर सियाना, ज्ञानी ध्यानी उदासी॥इनके मारग चलू न कवहीं, भजू गुरु अविनासी
[ ५-709 ] भाग जगा गुरु पूरा पाया, बना आप बड़भागी॥
प्रेम हाट में सौदा कीन्हा, नहीं बना बैरागी॥
जोगी जंगम चतुर सियाना, ज्ञानी ध्यानी उदासी॥
इनके मारग चलू न कवहीं, भजू गुरु अविनासी ।॥
गुरु पूरे को समरथ जानू, समरथ का पद परसू॥
चरन कमल की पूजा सेवा, आसा लाग न तरसू ।॥
भाग सुहाग राग और ज्ञाना, गुरु के मारग पाया॥
प्रेम भक्ति का पंथ अनूपम, राधास्वामी आप लखाया॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी पल पल गाऊँ॥
राधास्वामी प्रीति बसी मन अंतर, कहूँ न आऊँ जाऊँ ।॥
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710 शब्द राता मन भया, शब्द ही जाय समाना॥निरखा शब्द स्वरूप, निरख हिय अति हरषाना
710 शब्द राता मन भया, शब्द ही जाय समाना॥
निरखा शब्द स्वरूप, निरख हिय अति हरषाना ।॥
शब्द जीव सत शब्द, शब्द ब्रह्मांड रचाना॥
प्रणव ओ३म् सत शब्द में, यह सन्त बखाना ॥
शब्द भेद नहीं मिला, जगत में रहे अमाना॥
करम धरम पच पच मरे, चौरासी खाना ॥
शब्द भेद ले गुरु से, तब लगे ठिकाना॥
बिन गुरु शब्द न पावई, नर भरम भुलाना ॥
शब्द सुरत भण्डार है, सुरत शब्द कमाना॥
राधास्वामी चरन में, निज शब्द रहाना ।॥
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[७-७११ ] गुरु की दया भेद सब जाना, घट में भान प्रकासा॥तिमिर मिटा अज्ञान विनासा, सहज में भया उदासा
[७-७११ ] गुरु की दया भेद सब जाना, घट में भान प्रकासा॥
तिमिर मिटा अज्ञान विनासा, सहज में भया उदासा ।॥
ब्रह्म राम से गुरु पद ऊँचा, कोई कोई भेदी जाने॥
लख लख अलख अगम लख पावे, तब कुछ सार पिछाने ।॥
बिन गुरु मर्म न पावे कोई, पंडित ऋषि मुनि ज्ञानी॥
यह तो भेद लहे घट अन्दर, जब समझे गुरु बानी ।॥
गुरु ने कच्छ मच्छ समझाया, रूप वराह बताया॥
नरसिंह वामन पद दरसाया, राम कृष्ण लखवाया ।॥
बुद्धमता का सार सुझाया, कलिकी की गति भाखी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,खुलगई हिय की आँखी ॥
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[८-७१२ ] मन मन्दिर में ढूंढ़िये, मूरत अगम अपार॥
[८-७१२ ] मन मन्दिर में ढूंढ़िये, मूरत अगम अपार॥
. मन्दिर सब बेकाज हैं, मन मन्दिर है सार ॥
छवि मूरत की अद्भुति, निरख निरख हरषाय॥
ऐसे दरस परस से, एक नि पूरा दाव ।॥
घट में गुरु मूरति बसी, को ढंढ़े केहि धाम॥
और सफल भ्रम जाल है, घट में गुरु का नाम ।॥
गुरु तो तेरे पास हैं, मन में देख विचार॥
आओ जाओ का कहूँ, घट में कर गुरु प्यार ॥
जो तू प्यारी गुरू की, अन्तर प्रेम जगाव॥
वही टेक को दृढ़ करो, बनत बनत बन जाव॥
नयनों अन्दर झाँप ले, नयनों कर दीदार॥
नयनों में तेरे गुरु बसें, अन्तर में कर प्यार ॥
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[६-७१३ ] निंद्रा घोर सकल जग व्यापे, जागे कोई गुरु का प्यारा॥जाग जाग के मर्म पिछाने, त्यागे मिथ्या संसारा ॥भूल भरम में निस दिन भूले, करम धरम निज हंकारा॥यम का जाल बिछा चहुँ अरा, कसे पाये छुटकारा ॥मिथ्या मात पिता नर प्रानी, मिथ्या कुटुम्ब है परिवारा॥साथ न तेरे कोई जावे, मान बड़ाई सुत दारा ॥भज भज नाम गुरु हित चित से, त्याग त्याग यह संसारा॥शब्द की सहज नाव चढ़ बोरे, चल चल चल भव के पारा ॥गुरु समरथ गुरु दीनदयाला, गुरु ज्ञानी गुरु दातारा॥गुरु का सतसंग गुरु की सेवा, गुरु सुमिर बारम्बारा
[६-७१३ ] निंद्रा घोर सकल जग व्यापे, जागे कोई गुरु का प्यारा॥
जाग जाग के मर्म पिछाने, त्यागे मिथ्या संसारा ॥
भूल भरम में निस दिन भूले, करम धरम निज हंकारा॥
यम का जाल बिछा चहुँ अरा, कसे पाये छुटकारा ॥
मिथ्या मात पिता नर प्रानी, मिथ्या कुटुम्ब है परिवारा॥
साथ न तेरे कोई जावे, मान बड़ाई सुत दारा ॥
भज भज नाम गुरु हित चित से, त्याग त्याग यह संसारा॥
शब्द की सहज नाव चढ़ बोरे, चल चल चल भव के पारा ॥
गुरु समरथ गुरु दीनदयाला, गुरु ज्ञानी गुरु दातारा॥
गुरु का सतसंग गुरु की सेवा, गुरु सुमिर बारम्बारा ।॥
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[१०-७१४ ] उठ जागो तुम सोये कैसे, यह जग माया की कल्पना है॥नहीं गुरु चरन गहा उसको नित, भूल भरम में खपना है॥काल करम ने जाल बिछाया, मूढ़ जीव को उसमें फंसाया॥दुख सुख में वह रहे भरमाया, नहीं समझे यह सपना है
[१०-७१४ ] उठ जागो तुम सोये कैसे, यह जग माया की कल्पना है॥
नहीं गुरु चरन गहा उसको नित, भूल भरम में खपना है॥
काल करम ने जाल बिछाया, मूढ़ जीव को उसमें फंसाया॥
दुख सुख में वह रहे भरमाया, नहीं समझे यह सपना है ।॥
तीन ताप रहा चहुँदिस छाया, राह न सूझे नर घबराया॥
व्यापे काम क्रोध मद माया, मोह अग्नि में तपना है॥
जड़ चेतन की ग्रन्थी भारी, उरम उरम मरे बहु संसारी॥
केहि विधि छूटन होय तुम्हारी, गाँठ के बीच तड़पना है ।॥
राधासामी मेहर करें जब जन पर, दृष्टि पड़े तब जग विषधर॥
विना दया नहीं उबरे कोई नर, काल नाग को हड़पना है॥
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[११-७१५ ] हम तो साँस पवन के ठरे, शब्द गम्भीर सुनाते हैं॥सुख की चाह नहीं मन अंतर, सुख आनन्द नहीं पाते हैं॥नर जीवन है पक्न झकोला, दो दिन जग का रहना॥रोना तड़पना शोर मचाना, निस बासर दुख सहना॥कहाँ से आये किधर जायेंगे, किंचित मरम न पाया॥दो दिन का यह धन जोवन है, क्या है कहाँ से आया॥हम तुम सब हैं अगमा पाई, ज्यों सपना रैनाई॥पानी मध्ये आग विराजे, सुख में विपत समाई ॥बालू की दीवार उठाई, रुचि रुचि ताहि बनाई॥बही बयार बिनस गई पल में, तामें कौन भलाई
[११-७१५ ] हम तो साँस पवन के ठरे, शब्द गम्भीर सुनाते हैं॥
सुख की चाह नहीं मन अंतर, सुख आनन्द नहीं पाते हैं॥
नर जीवन है पक्न झकोला, दो दिन जग का रहना॥
रोना तड़पना शोर मचाना, निस बासर दुख सहना॥
कहाँ से आये किधर जायेंगे, किंचित मरम न पाया॥
दो दिन का यह धन जोवन है, क्या है कहाँ से आया॥
हम तुम सब हैं अगमा पाई, ज्यों सपना रैनाई॥
पानी मध्ये आग विराजे, सुख में विपत समाई ॥
बालू की दीवार उठाई, रुचि रुचि ताहि बनाई॥
बही बयार बिनस गई पल में, तामें कौन भलाई ।॥
मोह माया है भरम की गाँठी, उरझ उरझ उरझानी॥
सार असार की सुधि नहीं पाई, भूले भरम में प्रानी ॥
इन्द्रजाल माया की रचना, नया नया रूप बनावे॥
रूप दिखाये जीव भरमावे, यम के फाँस फँसावे॥
भूठी काया भूठी माया, झूठा मेरा तेरा॥
झूठा महल मकान है झूठा, चिड़िया रैन बसेरा ।॥
भूठे सुख को सुख सब कहते, सहते विपत घनेरी॥
मरते खपते बारम्बारा, मिटी न हेरा फेरी ॥
बादर की छाया नर देही, रोक रुके ना भाई॥
यह धारा ठहराय न टहरे, कीतों करो उपाई ॥
सुन सुन शब्द चेत मन आने, होजा सहज उदासी॥
त्याग त्याग मद मोह मया को, अगमलोक का वासी ।॥
त्रिविधि ताप दुख व्यापा जग में, तू है बचावन हारा॥
भव सागर से पार लगादे, देकर अपना सहारा ॥
रक्षक साँचे सतगुरु स्वामी, आदि अनादि जुगादी॥
झुक झुक उनके चरन में निसदिन,खा नित सीत प्रसादी॥
आस छोड़ विश्वास जगत का, यह है चार दिना का॥
चारों दिन में धोखादाई, सर्व काल में मिथ्या ॥
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[१२-७१६ ] राम ने तजी अयोध्या नगरी, लंक किया प्रवेशा॥रावन कुमति को आग लगाया, तब लौटे निज देशा॥मेघनाद को मार गिराया, राज विभीषण दीना॥लोक परलोक बनाये दोनों, सुयश सुकीरति लीना ॥नाम प्रभाव समझ मन अपने, कर जग में उपकारा॥यह अवसर फिर मिले न पानी, जा भव सागर पारा ॥गुरु का प्यारा गुरु शरणागत, गुरु का सेवक दासा॥गुरु सों प्रीति रहे निस बासर, गुरुपद विमल विलासा ॥गुरु प्रसाद तन अवध में रहकर, रावण दुर्मति मारो॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जनम जआ मत हारो॥
[१२-७१६ ] राम ने तजी अयोध्या नगरी, लंक किया प्रवेशा॥
रावन कुमति को आग लगाया, तब लौटे निज देशा॥
मेघनाद को मार गिराया, राज विभीषण दीना॥
लोक परलोक बनाये दोनों, सुयश सुकीरति लीना ॥
नाम प्रभाव समझ मन अपने, कर जग में उपकारा॥
यह अवसर फिर मिले न पानी, जा भव सागर पारा ॥
गुरु का प्यारा गुरु शरणागत, गुरु का सेवक दासा॥
गुरु सों प्रीति रहे निस बासर, गुरुपद विमल विलासा ॥
गुरु प्रसाद तन अवध में रहकर, रावण दुर्मति मारो॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जनम जआ मत हारो॥
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[१३-७१७ ] नाम भजन कर नाम भजन कर, नाम भजन कुछ पावेगा॥नाम सुफल कर जनम सुफल कर, नहीं अन्त पछतावेगा॥झूठी माया झूठी काया, ता संग नेह लगाया क्यों॥सुन मन मूरख सुन मन मूरख, हाथ तेरे क्या आवेगा॥भम भुलाना भर्म भुलाना, भर्म फाँस गले डाला है॥प्रभु सुमिरन कर प्रभु सुमिरन कर, एक दिन यहाँ से जावेगा॥संग न साथी संग न साथी, कोई नहीं अपना है जग में॥गुरु सेवा कर गुरु सेवा कर, गुरु भव पार लगावेगा ॥प्रीति हिये धर प्रोति हिये धर, प्रेम प्रीति रस में लगजा॥छोड़ कुसंगत छोड़ बुसंगत, सतसंग काज बनावेगा॥ज्ञान गंग बिच ज्ञान गंग बिच, कर स्नान ध्यान प्रानी॥अब अवसर है अब अवसर है, फिर अवसर नहीं पायेगा॥चेत सवेरे चेत सवरे, चलना बाट अकेला है॥भोग विषय तज भोग विषय तज, भोग सोग उपजावेगा॥काम क्रोध मद काम क्रोध मद, काम क्रोध मद क्यों भूला॥नर अभिमानी नर अभिमानी, काल जाल फैलावेगा॥
[१३-७१७ ] नाम भजन कर नाम भजन कर, नाम भजन कुछ पावेगा॥
नाम सुफल कर जनम सुफल कर, नहीं अन्त पछतावेगा॥
झूठी माया झूठी काया, ता संग नेह लगाया क्यों॥
सुन मन मूरख सुन मन मूरख, हाथ तेरे क्या आवेगा॥
भम भुलाना भर्म भुलाना, भर्म फाँस गले डाला है॥
प्रभु सुमिरन कर प्रभु सुमिरन कर, एक दिन यहाँ से जावेगा॥
संग न साथी संग न साथी, कोई नहीं अपना है जग में॥
गुरु सेवा कर गुरु सेवा कर, गुरु भव पार लगावेगा ॥
प्रीति हिये धर प्रोति हिये धर, प्रेम प्रीति रस में लगजा॥
छोड़ कुसंगत छोड़ बुसंगत, सतसंग काज बनावेगा॥
ज्ञान गंग बिच ज्ञान गंग बिच, कर स्नान ध्यान प्रानी॥
अब अवसर है अब अवसर है, फिर अवसर नहीं पायेगा॥
चेत सवेरे चेत सवरे, चलना बाट अकेला है॥
भोग विषय तज भोग विषय तज, भोग सोग उपजावेगा॥
काम क्रोध मद काम क्रोध मद, काम क्रोध मद क्यों भूला॥
नर अभिमानी नर अभिमानी, काल जाल फैलावेगा॥
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[ १४-७१८ ] चिन्ता राधास्वामी नाम की, राधास्वामी आस॥राधास्वामी चहुँदिसि बस, और न चितरे दास
[ १४-७१८ ] चिन्ता राधास्वामी नाम की, राधास्वामी आस॥
राधास्वामी चहुँदिसि बस, और न चितरे दास ।॥
राधास्वामी नाम की, रटन रहे दिन रात॥
मैं पपीहा का रूप हूँ, राधास्वामी बादल स्वाँति ॥
राधास्वामी कमल समान हैं, भँवर भाव मेरा चित॥
रैन दिवस अब रहत है, कमल बास से हित ।॥
राधास्वामी सिंधु अथाह हैं, मैं हूँ बूद स्वरूप॥
जीव अधीन मलीन मैं, राधास्वामी जग के भूप ॥
सागर बाढ़ा प्रेम का, मैं तो प्रेम जल मीन॥
राधास्वामी पद को परसकर, अब क्यों रहूँ मलीन ॥
राधास्वामी पूरण चन्द्रमा, मेरा चित्त चकोर॥
पल पल निरखू आम छथि, दृष्टि उन्हीं की ओर ॥
सोवत राधास्वामी का सपन, जाग्रत राधास्वामी ज्ञान॥
राधास्वामी के पद कमल में, अरपू तन मन प्रान ।॥
मेरे राधासामी एक है, उनके दास अनेक॥
चित में राधास्वामी धाम है, उपजा परम विवेक॥
मुख में राधासामी नाम है, मन में राधास्वामी ध्यान !
मस्तक राधासामी धाम है, रसना राधास्वामी गान ।॥
१५-७१६] धन धन गुरुदेव जी, जिन भेद बताया॥
आनी दया अपार से, भव पार कराया ॥
शरणागत की लाज कान, स्वामी जग में आये॥
जड़ चेतन की ग्रन्थी, सब निज युक्ति छुड़ाये ॥
माया काल कराल, कोई बचने नहीं पाये॥
करम धरम के जाल, जीव निस बासर आवे ॥
भोगे कष्ट आर, ताप त्रय दहे शरीरा॥
दारुण विपत कलेश, भया मन विकल अधीरा ।॥
द्वत भव जल माँहि, नहीं कहूँ ठौर ठिकाना॥
गुरु ने पकड़ी बाँह, दिया भक्ति धन दाना ।॥
चरन कमल का आसरा, हित चित्त बसाऊँ॥
निरखू रूप अनूप, ध्यान गुरु मूरति लाऊं ॥
गुरु की निस दिन बन्दगी, गुरु चरनन पूजा॥
गुरु सम लोक परलोक में, मानू नहिं दूजा ॥
गुरु मेरे जान व प्रान, गुरु मेरे रखवारे॥
रात दिवस मैं जिऊ, गुरु के चरन सहारे ।॥
भक्ति दान गुरु दीजिये, देवन के देवा॥
राधास्वामी दयाल, करूं मैं तुम्हरी सेवा ॥
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[१६-७२० ] दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय॥ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु कृपा से होय ॥भव सागर अति गहर है, सूझे वार न पार॥गुरु खेवटिया जब मिले, खेह लगावे पार
[१६-७२० ] दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय॥
ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु कृपा से होय ॥
भव सागर अति गहर है, सूझे वार न पार॥
गुरु खेवटिया जब मिले, खेह लगावे पार ।॥
माया भरम और काल भय, जीवत कबहूँ न जाय॥
यह बन्धन तो तब कटें, सतगुरु होय सहाय ॥
जनम जनम कठिनाइयाँ, भव के विपत कलेश॥
गुरु ने पकड़ी बाँह जब, रहा न भव दुख लेस ॥
क्या सुख ले स्तुति करू, गुरु समरथ दातार |
तुम्हरी कृपा अपार से, पाई बुद्धि मति सार ॥
ढूँढ ढूँढ़ थक थक रहे, मिला न ज्ञान विवेक॥
चरन कमल की छाँह में, सूझा एक अनेक ।॥
प्रेम दान प्रभु दीजिये, पद सरोज की धूर॥
सत का नूर हृदय बसे, बाजे अनहद तूर ।॥
भर्म भर्म सब भ्रम फिरें, पढ़ पढ़ ग्रन्थ अनेक॥
परमारथ निधि तब मिले, पकड़े गुरु की टेक ।॥
गुरु चरनन पर वारिये, देह गेह और सीस॥
गुरु से निस दिन माँगिये, प्रेम प्रीति बख्शीस ॥
गुरु पर नित बलि जाइये, तजिये मान गुमान॥
गुरु से छिन छिन माँगिये, भक्ति भाव का दान ।॥
गुरु पद अरपो रात दिन, तन मन धन और प्रान॥
यही सार का सार है, और ज्ञान का ज्ञान॥
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[१७-७२१ ] जो कोई हित से मुझे बुलावे, मैं ढिंग उसके जाऊँ॥जो कोई मुझसे प्रेम लगावे, मैं सब विधि अपनाऊँ॥नहीं पताल स्वर्ग में रहता, नहीं पृथवी में बासा॥प्रेम प्रीति की रीति में न्यारी, रहूँ प्रेमी के पासा ॥प्रेम भाव का मैं अभिलाषी, प्रेम की डगर दिखाऊँ॥प्रेम का भूखा प्रेम का प्यासा, अमृत प्रेम चखाऊँ॥धीरज धरो आस मन राखो, चिन्ता तुम्हारी मुझको॥दुख का पर्वत दूर हटे तब, कहो गिरवरधारी मुझको॥करम वासना राग द्वेष से, न्यारा रहूँ निरन्तर॥भक्तों के हित साज सँवारूँ, भक्त भार लूँ सिर पर ॥
[१७-७२१ ] जो कोई हित से मुझे बुलावे, मैं ढिंग उसके जाऊँ॥
जो कोई मुझसे प्रेम लगावे, मैं सब विधि अपनाऊँ॥
नहीं पताल स्वर्ग में रहता, नहीं पृथवी में बासा॥
प्रेम प्रीति की रीति में न्यारी, रहूँ प्रेमी के पासा ॥
प्रेम भाव का मैं अभिलाषी, प्रेम की डगर दिखाऊँ॥
प्रेम का भूखा प्रेम का प्यासा, अमृत प्रेम चखाऊँ॥
धीरज धरो आस मन राखो, चिन्ता तुम्हारी मुझको॥
दुख का पर्वत दूर हटे तब, कहो गिरवरधारी मुझको॥
करम वासना राग द्वेष से, न्यारा रहूँ निरन्तर॥
भक्तों के हित साज सँवारूँ, भक्त भार लूँ सिर पर ॥
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[१८-७२२ ] एक आस विश्वास गुरु का, मन में प्रेम प्रतीति॥बहुत आस विश्वास बहु, चंचलता की रीति ॥गुरुमुख के तो एक हैं, मन मत के हैं दोय॥जो कोई मन मत भया, चैन न पावे सोय ॥गुरुमुख में पतिव्रतपना, मन मत है व्यभिचार॥पतिव्रता को सुख घना, व्यभिचारी मुख छार ॥एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय॥सबकी आस निरास है, एक आस हर्षाय ॥पात पात का सींचना, अज्ञानी व्यौहार॥ज्ञानी सींचे मूल को, पावे उत्तम सार ॥पात पात के सींचते, वृक्ष को दिया सुखाय॥माली सींचे मूल को, फूला फला अघाय ॥तज दे दुचिताई पना, एक चित गुरु की सेव॥गुरु सम सुनले साधुवा, और न कोई देव ॥नारी बनी है पीव की, कैसा पीव से प्यार॥घर के सम्बन्धी सकल, करें आप सत्कार॥नारी आई पीव घर, पीव से किया न नेह॥सास ससुर घिरणा करें, बिगड़ गया सब नेह
[१८-७२२ ] एक आस विश्वास गुरु का, मन में प्रेम प्रतीति॥
बहुत आस विश्वास बहु, चंचलता की रीति ॥
गुरुमुख के तो एक हैं, मन मत के हैं दोय॥
जो कोई मन मत भया, चैन न पावे सोय ॥
गुरुमुख में पतिव्रतपना, मन मत है व्यभिचार॥
पतिव्रता को सुख घना, व्यभिचारी मुख छार ॥
एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय॥
सबकी आस निरास है, एक आस हर्षाय ॥
पात पात का सींचना, अज्ञानी व्यौहार॥
ज्ञानी सींचे मूल को, पावे उत्तम सार ॥
पात पात के सींचते, वृक्ष को दिया सुखाय॥
माली सींचे मूल को, फूला फला अघाय ॥
तज दे दुचिताई पना, एक चित गुरु की सेव॥
गुरु सम सुनले साधुवा, और न कोई देव ॥
नारी बनी है पीव की, कैसा पीव से प्यार॥
घर के सम्बन्धी सकल, करें आप सत्कार॥
नारी आई पीव घर, पीव से किया न नेह॥
सास ससुर घिरणा करें, बिगड़ गया सब नेह ।॥
एक गुरू की बन्दना, करे भक्त का काम॥
जो सबकी आसा करे, चंचल आठों याम ॥
साँई यही है प्रार्थना, एक तुम्हारी आस॥
सबहिं छाँहि तुमको भजू, रहूँ तुम्हारा दास ।॥
दो मालिक का सेवका, क्यों पावे सुख चैन॥
वह गरीब भटका फिरे, इधर उधर दिन रैन॥
Hindi
[ १६-७२३ ] प्यारी प्यारी तू है प्यारी, प्यारी क्यों दुख पावे॥गुरु की दया से बन्धन काटे, अन्त परम पद पावे ॥आना जाना कैसा प्यारी, गुरु तो पास है तेरे॥मन की दुविधा त्याग निरन्तर, तू तो निकट है मेरे ॥जब जागे तब ध्यान हो गुरु का, सपना सोई देखे॥गहरी नींद सुषप्ति में प्यारी, आनन्द मिले विशेखे॥शब्द योग की करे कमाई, प्यारी गुरु की है प्यारी॥प्यारी प्यार से नाता जोड़े, राधास्वामी की बलिहारी॥
[ १६-७२३ ] प्यारी प्यारी तू है प्यारी, प्यारी क्यों दुख पावे॥
गुरु की दया से बन्धन काटे, अन्त परम पद पावे ॥
आना जाना कैसा प्यारी, गुरु तो पास है तेरे॥
मन की दुविधा त्याग निरन्तर, तू तो निकट है मेरे ॥
जब जागे तब ध्यान हो गुरु का, सपना सोई देखे॥
गहरी नींद सुषप्ति में प्यारी, आनन्द मिले विशेखे॥
शब्द योग की करे कमाई, प्यारी गुरु की है प्यारी॥
प्यारी प्यार से नाता जोड़े, राधास्वामी की बलिहारी॥
Hindi
[ २०-७२४ ] तू तो होगई बावली, समझ न आवे वैन॥मैं तुझसे कैसे कहूँ, जब तू लखे न सैन॥मैं तेरे हृदय बसू, तू ढूँढ़े नभ माँह॥कंगन तो ऊपर खसा, देख आपनी बाँह
[ २०-७२४ ] तू तो होगई बावली, समझ न आवे वैन॥
मैं तुझसे कैसे कहूँ, जब तू लखे न सैन॥
मैं तेरे हृदय बसू, तू ढूँढ़े नभ माँह॥
कंगन तो ऊपर खसा, देख आपनी बाँह ।॥
हूँढ़ ढूँढ तू मन में निसदिन, राम पियारी प्यारी॥
तेरा हृदय कैलाश शिव का, जहाँ बसें त्रिपुरारी ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाओ॥
राधास्वामी निसदिन गाकर, अपना जनम बनाओ॥
Hindi
[२१-७२५ ] दया भई जो गुरु मिले, पकड़ी अपनी बाँह॥बूड़त पार उतारिया, भव सागर के माँह ॥दया भई जो गरु मिले, अपने मन में देख॥औरों से क्यों पूछिये, निज मन अन्तर देख ॥सदा पियारी राम की, रामपियारी नाम॥एक दिना गुरु देवेगे, अपना सतपद धाम ॥देख देख तू निज मन में, मन में रहते श्याम॥राधास्वामी नाम ले, त्यागदे इनको धाम ॥
[२१-७२५ ] दया भई जो गुरु मिले, पकड़ी अपनी बाँह॥
बूड़त पार उतारिया, भव सागर के माँह ॥
दया भई जो गरु मिले, अपने मन में देख॥
औरों से क्यों पूछिये, निज मन अन्तर देख ॥
सदा पियारी राम की, रामपियारी नाम॥
एक दिना गुरु देवेगे, अपना सतपद धाम ॥
देख देख तू निज मन में, मन में रहते श्याम॥
राधास्वामी नाम ले, त्यागदे इनको धाम ॥
Hindi
[२२-७२६ ] जग का खेल है मन की लीला, मन की समझ न आई॥मन के विषय विकार में भूले, मन ही भया दुखदाई
[२२-७२६ ] जग का खेल है मन की लीला, मन की समझ न आई॥
मन के विषय विकार में भूले, मन ही भया दुखदाई ।॥
मन से ऊचे चढ़े जो प्रानी, बूझे सतगुरु ज्ञाना॥
बूझ बूझ गरु ज्ञान की महिमा, सूझे पद निरवाना ॥
हद पर बैठ कहा सतगुरु ने, चढ़ बेहद की घाटी॥
चेला हद बेहद जब लाँघा, उड़ी भरम की टाटी ॥
हद में दुख बेहद में सुख है, अनहद पद निरवाना॥
हद बेहद अनहद जब लाँधे, मेटे आना जाना ॥
गुरु की दया साधु की संगत, उत्तम गति मति पावे॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भर्म भव जाल न आवे ।॥
Hindi
[२३-७२७ ] आज का काम आज दिन करना, कल की आस न करना॥पल पल साँस का आना जाना, पल हो जनम और मरना॥पल में उपजे पल में बिनसे, पल माया व्यौहारा॥पल का स्वारथ पल परमारथ, काल का पल संहारा
[२३-७२७ ] आज का काम आज दिन करना, कल की आस न करना॥
पल पल साँस का आना जाना, पल हो जनम और मरना॥
पल में उपजे पल में बिनसे, पल माया व्यौहारा॥
पल का स्वारथ पल परमारथ, काल का पल संहारा ।॥
आज कहे मैं काल करूंगा, भक्ति भाव सतसंगा॥
आज काल के बीच ही प्रानी, काल का भया कुसंगा॥
क्या जाने क्या पल में होगा, काल का छोड़ बहाना ॥
जो कोई आज करे गुरु संगत, वही है पुरुष सियाना॥
कथा सुनो एक अद्भुत न्यारी, बढ़े बुद्धि चतुराई॥
नहीं भरोसा आज काल का, यह जग अगमा पाई ॥
राम ने रावण को जब मारा, कहा लखन से भ्राता॥
जा रावण से नीति बचन सुन, वह पंडित विख्याता॥
लक्ष्मण आये उसके सिरहाने, बोले अमृत बानी॥
रावण तू है परम सुजाना, योगी ज्ञानी ध्यानी ।॥
दे शिक्षा कुछ नीति सिखाजा, शिष्य भाव ले आया॥
राम ने तेरे पास है भेजा, कर कुछ मुझ पर दाया॥
रावण हसा देर से आये, मैं क्या भेद लखाऊ॥
काल शिकारी सिर पर गाजा, नीति राग क्या गाऊँ॥
एक बात तुम सुनलो मुझ से, मन में सदा विचारो॥
आज का काम काल नहीं छोड़ो, आज ही काम सुधारो ।॥
आज का अवसर मिला है तुमको, काल की क्या है आसा॥
जो काल का बन्धन काटे, काल से रहे उदासा ।॥
काल भरम है काल है धोका, काल महा दुखदाई॥
करना हो सो आज करो तुम, काल की आस भुलाई ॥
मैं तो काल के धोके आया, अपना काम बिगाड़ा॥
आज काल में अबसर बीता, सिर पर काल का आरा ॥
इच्छा थी सागर को मथकर, मीठा उसे बनाता॥
स्वर्ग लगाकर सीढ़ी ऊची, जीव तहाँ पहुँचाता ॥
आज काल का किया बहाना, काल यह दिन दिखलावे॥
जो कोई आज को कल पर टाले, क्या परमारथ पावे ।॥
तुम यह नीति सुनलो मुझसे, उसे न मन से भुलाना॥
जो करना हो आज करो तुम, पाओ उत्तम ज्ञाना॥
रावण मर गया देकर नीती, लखन राम ढिंग आये॥
जो कोई यह शिक्षा चितलाये, अमर लोक को जाये॥
Hindi
[२४-७२८ ] चरन गुरु चित धार, जगत तज भागिये॥मिथ्या सब व्यौहार, पाप पुन त्यागिये॥राग द्वष सब छोड़, प्रेम हिये धारना॥लख अन्तर उत्तम रूप, सहज मन मारना ॥मानुष जनम सुधार, सार गह लीजिये॥भोग विषय विष समझ, प्रेम रस पीजिये॥भक्ति भाव सतसंग, संवारे काज को॥मोह भरम मत भूल, त्याग जग लाज को॥आया था किस कारने, क्या तूने किया॥आप ही अमर स्वरूप है, क्यों भरमा फिरा ॥भूले नर मुनि देव, न पाया सार को॥भवसागर नहीं तरे, न पहुँचे पार को
[२४-७२८ ] चरन गुरु चित धार, जगत तज भागिये॥
मिथ्या सब व्यौहार, पाप पुन त्यागिये॥
राग द्वष सब छोड़, प्रेम हिये धारना॥
लख अन्तर उत्तम रूप, सहज मन मारना ॥
मानुष जनम सुधार, सार गह लीजिये॥
भोग विषय विष समझ, प्रेम रस पीजिये॥
भक्ति भाव सतसंग, संवारे काज को॥
मोह भरम मत भूल, त्याग जग लाज को॥
आया था किस कारने, क्या तूने किया॥
आप ही अमर स्वरूप है, क्यों भरमा फिरा ॥
भूले नर मुनि देव, न पाया सार को॥
भवसागर नहीं तरे, न पहुँचे पार को ।॥
करे गुरु से प्यार, यही उपदेश है॥
करम काल के परे, गुरु का देश है॥
Hindi
[२५-729 ] क्यों फिरत भुलाना जगत में, कुछ सोच फकीरा॥तेरा संगी कोई नहीं, क्या शाह फकीरा ॥मेरा मेरा क्या करे, तेरा नहीं कोई॥अपना रूप संभार ले, तेरा है सोई॥भटके क्यों भरम जाल में, अब सोच सवेरा॥ले सतगुरु के चरन में, दिन रात बसेरा ॥छोड़ जगत की आस, आस सब जीव फसाने॥आसा तृष्णा में पड़े, यह सकल दीवाने॥लोकलाज मरयाद धान, धन धाम बड़ाई॥यह सब बन्धन काल के, सुन ले मेरे भाई ॥तेरा संगी सतगुरु, तेरे घट में बसता॥आय पड़ा जग हाट में, कर सौदा सस्ता॥लेना हो सो जल्द ले, अवसर नहीं ऐसा॥सोच अंदेशा छोड़ दे, तू भूला कैसा
[२५-729 ] क्यों फिरत भुलाना जगत में, कुछ सोच फकीरा॥
तेरा संगी कोई नहीं, क्या शाह फकीरा ॥
मेरा मेरा क्या करे, तेरा नहीं कोई॥
अपना रूप संभार ले, तेरा है सोई॥
भटके क्यों भरम जाल में, अब सोच सवेरा॥
ले सतगुरु के चरन में, दिन रात बसेरा ॥
छोड़ जगत की आस, आस सब जीव फसाने॥
आसा तृष्णा में पड़े, यह सकल दीवाने॥
लोकलाज मरयाद धान, धन धाम बड़ाई॥
यह सब बन्धन काल के, सुन ले मेरे भाई ॥
तेरा संगी सतगुरु, तेरे घट में बसता॥
आय पड़ा जग हाट में, कर सौदा सस्ता॥
लेना हो सो जल्द ले, अवसर नहीं ऐसा॥
सोच अंदेशा छोड़ दे, तू भूला कैसा ।॥
एक सतगुरु के नाम की, कर टेक पियारे॥
सतगुरु साँचे मीत हैं, पल छिन रखवारे॥
नाम फकीर धराय कर, दुर्मति को तज दे॥
राधास्वामी नाम तू, निस बासर भज ले ॥
Hindi
[२६-७३० ] क्यों फिरत भुलाना भरम में, निस दिन नादाना॥गुरु के चरन सरोज में, तेरा कल्याना
[२६-७३० ] क्यों फिरत भुलाना भरम में, निस दिन नादाना॥
गुरु के चरन सरोज में, तेरा कल्याना ।॥
कभी तीरथ की परक्रमा, गंगा अस्नाना॥
जप तप संयम बहु किये, नहीं लगा ठिकाना ॥
पोथी पुस्तक बाँच कर, बाढ़ा अभिमाना॥
विद्या बुद्धि विलास में, मन अति हरषाना ।॥
सार मिला नहीं शब्द का, नहीं उपजा ज्ञाना॥
जड़ चेतन की ग्रंथि को, कहो कैसे खुलाना ।॥
प्रगटे सतगुरु आय, दिया शब्द निशाना॥
राधास्वामी की दया, पाया निरवाना ॥
Hindi
[ २७-७३१ ] गूगा बोले मधुरी बानी, शब्द अशब्द विस्तारा॥लंगड़ा चढ़े शिखर परवत पर, घाटी शैल अपारा ॥बिन नैना का अंधा देखे, भाँति भाँति की रचना॥मन नहीं बुद्धि नहीं कान नहीं, सुने अगम के बचना
[ २७-७३१ ] गूगा बोले मधुरी बानी, शब्द अशब्द विस्तारा॥
लंगड़ा चढ़े शिखर परवत पर, घाटी शैल अपारा ॥
बिन नैना का अंधा देखे, भाँति भाँति की रचना॥
मन नहीं बुद्धि नहीं कान नहीं, सुने अगम के बचना ।॥
बिना सूर के विमल प्रकासा, बिन बादल की बरसा॥
बिना रूप का सतगुरु व्यापा, चरन कमल निज परसा॥
कहीं बीन कहीं ढोल बाँसुरी, बाजे अद्भुत बाजे॥
ओम् ओम् सोहंग सत सत, शब्द अनाहद गाजे ॥
पन्थ अपन्थ का मिटा झमेला, कौन बने पन्थाई॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिली सतगुरु शरनाई।॥
Hindi
[२८-७३२ ] सिंध रूप से बूद जो निकला, रूप देख डरपाना
[२८-७३२ ] सिंध रूप से बूद जो निकला, रूप देख डरपाना !
एक बुन्द में सिंध पसारा, जब जाना हरषाना॥
सिंध में बुन्द अनेकन दरसे, यह तो सब कोई जाने॥
बुन्द में सिंघ आप है व्यापा, बिरला कोई पहचाने ।॥
बुन्द में लहर बुन्द में सिंधु, सिंध बुन्द दोऊ एका॥
द्वैत भरम कहो केसे छूटे, जब नहीं चित्त विवेका ।॥
हम तो बुन्द सिंध के रूपा, बुन्द में सिंध समाना ।॥
लख लख दशा न्यारी अपनी, समझा गुरु मत ज्ञाना ।॥
आप आपको आप पहचानो, राधास्वामी की है बानी॥
कहा और का नेक न मानो, पाओ पद निरवानी ॥
Hindi
[ २६-७३३ ] बीत गई मेरी उमर, मिला नहीं ठौर ठिकाना॥सूझे आदि न अन्त, रहा भरम में भरमाना ॥झूठा जग व्यौहार है, सब भूठी माया॥झूठा कुल परिवार है, झूठी यह काया
[ २६-७३३ ] बीत गई मेरी उमर, मिला नहीं ठौर ठिकाना॥
सूझे आदि न अन्त, रहा भरम में भरमाना ॥
झूठा जग व्यौहार है, सब भूठी माया॥
झूठा कुल परिवार है, झूठी यह काया ।॥
झूठ साँच की परख, हाय मोको नहीं आई॥
कैसे करूँ उपाय; बात मेरी बन जाई॥
कभी जप तप कभी बरत है, कभी तीरथ पानी॥
निकसा काम न एक भी, मन उपजी गलानी ॥
करम धरम सब त्याग कर, तुम सम्मुख आया॥
राधास्वामी दया निधि, आप कीजिये दाया ॥
Hindi
734 मन मन्दिर बैठ कर, जब लागे गुरु का ध्यान॥तिमिर मिटे अज्ञान का, सूझे पद निरवान
734 मन मन्दिर बैठ कर, जब लागे गुरु का ध्यान॥
तिमिर मिटे अज्ञान का, सूझे पद निरवान ।॥
करना धरना कुछ नहीं, करम धरम सब भने॥
घट के पट को खोल कर, तब पावे कुछ मर्म॥
अटपट लीला जगत की, खट पट रहे दिन रेन॥
ताके पट पट जो रमा, कैसे पावे चैन ।॥
बढ़ बढ़ कर सब घट गये, पढ़ पढ़ मुये गवार॥
घट घट कर सब मिट गये, बिना विवेक विचार ।॥
आपा चीन्हा आप में, आप आप में सार॥
अब संशय में ना पडू, राधास्वामी के बलिहार ।॥
Hindi
[३१-७३५ ]| जो अद्ध त प्रकाश विभु, सगुन अगुन आधार॥सत चित आनन्द रूप वह, मन बानी के पार
[३१-७३५ ]| जो अद्ध त प्रकाश विभु, सगुन अगुन आधार॥
सत चित आनन्द रूप वह, मन बानी के पार ।॥
ताको निस दिन बंदना, कोटि कोटि परनाम॥
अलख अगम गति अमल अति, मोक्ष मुक्ति का धाम ॥
सिंध गम्भीर अथाह बहु, पार सो पावे कोय॥
लखि आवे जब साध संग, गुरु की कृपा होय॥
रूप स्वरूप अरूप नित, गम पावे कोई सन्त॥
अज्ञानी जाने नहीं, अति उतंत गुरु पन्थ॥
भीतर बाहर एक रस, सब विधि रहा समाय॥
खुली दृष्टि से देखिये, जब गुरु होंय सहाय ।॥
दशरथ राम वशिष्ठ अरु, विश्वमित्र तन धार॥
गुरु चेला सुत तीन पद, चौथे माहिं विचार॥
एक अनेक अनादि अज, अलख अगाध अभेद॥
गुरु मुख से कुछ पाइये, थाके ऋषि मुनि वेद ॥
Hindi
[ ३२-७३६ ] दीन दयाल दीन हितकारी, दीन बन्धु सुख दाता॥करुनामय करुना के सागर, करुना रूप विधाता ॥जीव काज निज भवन छोड़कर, प्रगटे जन के लाजा॥बाँह पकड़ भव पार निकाला, कीन्हा अचरज काजा ॥महा गम्भीर सिंध भव दुस्तर, सूझे बार न पारा॥पवन बहत दारुण दुखदाई, नजर न पड़े किनारा ॥भंवर चक्र में डोलत नौका, सुध बुध तन की भूली॥दुख द्वन्द हिंडोल की सूरत, छिन प्रति छिन बहुभूली ॥देख दुखी प्रगटे राधास्वामी, शब्द जहाज बनाया॥खेवटिया गुरु पूरे पाया, बड़त सब ही बचाया ॥
[ ३२-७३६ ] दीन दयाल दीन हितकारी, दीन बन्धु सुख दाता॥
करुनामय करुना के सागर, करुना रूप विधाता ॥
जीव काज निज भवन छोड़कर, प्रगटे जन के लाजा॥
बाँह पकड़ भव पार निकाला, कीन्हा अचरज काजा ॥
महा गम्भीर सिंध भव दुस्तर, सूझे बार न पारा॥
पवन बहत दारुण दुखदाई, नजर न पड़े किनारा ॥
भंवर चक्र में डोलत नौका, सुध बुध तन की भूली॥
दुख द्वन्द हिंडोल की सूरत, छिन प्रति छिन बहुभूली ॥
देख दुखी प्रगटे राधास्वामी, शब्द जहाज बनाया॥
खेवटिया गुरु पूरे पाया, बड़त सब ही बचाया ॥
Hindi
[३३-७३७ ] गुरु कीजे दया अपार, आस धर सन्मुख आया॥अपना दास विचार, चरण की दीजे छाया ॥यह संसार असार, सार कुछ इसमें नाहीं॥मिथ्या है व्यौहार, जेसे बादर की छाँई ॥स्वारथ के सब सगे, बिना स्वारथ नहीं डोले॥स्वारथ के बस रहें, स्वारथी स्वारथ बोले॥सुन नर देवी देवता, ऋषि मुनि सियाने॥निज स्वारथ के कारने, सब भये दिवाने॥प्रीति रीति व्यौहार, जगत प्रपंच अपारा॥सब कुछ इनका रहे, सो स्वारथ के आधारा
[३३-७३७ ] गुरु कीजे दया अपार, आस धर सन्मुख आया॥
अपना दास विचार, चरण की दीजे छाया ॥
यह संसार असार, सार कुछ इसमें नाहीं॥
मिथ्या है व्यौहार, जेसे बादर की छाँई ॥
स्वारथ के सब सगे, बिना स्वारथ नहीं डोले॥
स्वारथ के बस रहें, स्वारथी स्वारथ बोले॥
सुन नर देवी देवता, ऋषि मुनि सियाने॥
निज स्वारथ के कारने, सब भये दिवाने॥
प्रीति रीति व्यौहार, जगत प्रपंच अपारा॥
सब कुछ इनका रहे, सो स्वारथ के आधारा ।॥
देश दशा उपराम चित, व्याकुल रहूँ निसदिन॥
परमारथ की चाह बसी, मेरे हिय में छिन छिन॥
तुम साँचे परमारथी, जीवन हित लागी॥
सहज दयालु कृपालु, सहज त्यागी बैरागी ॥
धर कर सन्त स्वरूप, दिया परमारथ दाना॥
निबल जीव को आय, लगाया ठौर ठिकाना ॥
राधास्वामी सतगुरु, परमारथ वादी॥
बख्शो प्रेम की छाँह, मेट प्रपंच उपाधी ॥
Hindi
[३४-७३८ ] चलो गुरू दरबार, आज दर्शन के कारन॥दरस परस सुख सार, हुये प्रगट जग तारन॥प्रेम प्रीति उमगाय, मुके पद कमल में माथा॥सतसंत गंगा न्हाय, रहो सतगुरु के साथा
[३४-७३८ ] चलो गुरू दरबार, आज दर्शन के कारन॥
दरस परस सुख सार, हुये प्रगट जग तारन॥
प्रेम प्रीति उमगाय, मुके पद कमल में माथा॥
सतसंत गंगा न्हाय, रहो सतगुरु के साथा ।॥
बचन सुनो चितलाय, तजो मन की दुचिताई॥
सतगुरु होंय सहाय, भरम संकट मिट जाई ।॥
मानुष जनम सुधार, काज अपना कर लीजे॥
भक्ति भाव हिय धार, दुविधि दुर्मति तज दीजे ॥
सुरत शब्द अभ्यास, साध लो गुरु का नामा॥
जीते जी विश्वास, जाओ राधास्वामी धामा ॥
बिन गुरु निष्फल करम सब, बिन गुरु निष्फल धर्म॥
बिन गुरु ध्यान न भक्ति कुछ, यह सत भेद का मम ॥
Hindi
[३५-739 ] पड़ा चरन में आय, शरन में अपने लीजे॥नहीं कोई संग सहाय, मुझे शरणागत कीजे ॥माया मद से बचाय, दान भक्ति का दीजे॥दीन को अंग लगाय, प्रभु अब अपना कीजे
[३५-739 ] पड़ा चरन में आय, शरन में अपने लीजे॥
नहीं कोई संग सहाय, मुझे शरणागत कीजे ॥
माया मद से बचाय, दान भक्ति का दीजे॥
दीन को अंग लगाय, प्रभु अब अपना कीजे ।॥
जनम को दिया गँवाय, अवधि मेरी निसदिन छीजे॥
राधास्वामी आय, आज मेरी रक्षा कीजे ॥
[३६-७४० ] सखियो गाओ मंगल राग, भाग से गुरु दर्शन पाया॥
सुफल हुआ नर जनम, न मोहे काल न अब मोहे माया ॥
जनम जनम से भूल भरम लग, चौरासी योनि भटकी॥
अब गुरु हुये सहाय फोड़दी, सहज सहज माया मटकी॥
घट आनन्द दिन रात चैन से, सुख से समय बिताते हैं॥
घट सतगुरू से प्यार, कहीं नहीं हम अब आते जाते हैं॥
घट में अपने प्रीतम प्यारा, सदा विराजा रहता है॥
दुखी न परजा होय कभी जब, साथ में राजा रहता है॥
राधास्वामी दया के सागर, आगर नागर हितकारी॥
सहज स्वभाव कृपाल, करेंगे अपनी रक्षा रखवारी ॥
“प्रश्नोत्तरी उपदेश
Hindi
[ ३७-७४१ ] प्रश्न: क्या देखा क्या सुना है घट में, मुझे सुना अपनी बानी॥सोचूँ तेरा कथन है कैसा, गुरू मत है या मन मानी ॥ उत्तर: ज्योति में लखी निरंजन की छवि, ज्योति निरंजन ब्रह्म अपार॥ब्रह्म में परब्रह्म को निरखा, परब्रह्म सोहंगम सार॥सोहंग हंस के परे ठिकाना, सतगुरु सत्त पुरुष दरवार॥यह सब मैंने देखा प्यारे, देख देख कर किया विचार ॥घट में सुना शब्द जो अद्भुत, पहला शब्द महा टनकार॥इस टनकार के ऊपर बानी, आई कानों में ओंकार
[ ३७-७४१ ] प्रश्न: क्या देखा क्या सुना है घट में, मुझे सुना अपनी बानी॥
सोचूँ तेरा कथन है कैसा, गुरू मत है या मन मानी ॥
उत्तर: ज्योति में लखी निरंजन की छवि, ज्योति निरंजन ब्रह्म अपार॥
ब्रह्म में परब्रह्म को निरखा, परब्रह्म सोहंगम सार॥
सोहंग हंस के परे ठिकाना, सतगुरु सत्त पुरुष दरवार॥
यह सब मैंने देखा प्यारे, देख देख कर किया विचार ॥
घट में सुना शब्द जो अद्भुत, पहला शब्द महा टनकार॥
इस टनकार के ऊपर बानी, आई कानों में ओंकार ।॥
ओंकार पर रारंकारम्, रारंकार में सोहंकार॥
सोहंकार बाँसुरी की गति, बीन की धुन थी सत्याकार ।॥
यह सब देखा किया परेखा, यह सब कान से सुन पाया॥
__ अब आगे का भेद बतादे, सतगुरु ने जो है गाया ॥
उपदेश : कर सतसंग अगम की गम कर, लख लख अलख को लखले तू॥
अलख अगम के पार राधास्वामी, परख परख के परखले तू ॥
आप आपको आप परखकर, आप आपको ले पहचान॥
साधन अनुभव की मर्यादा, कहा और का नेक न मान॥
बिन साधन अनुभव नहीं जागे,बिन सतसंग विवेक न ज्ञान॥
बिन सतगुरु कोई राह न पावे, राधास्वामी कहा बखान ॥
Hindi
[३८-७४२ ] नहीं मैं जानता था कौन हूँ, और क्यों यहाँ आया॥पड़ा क्यों काल की फाँसी में, क्यों माया ने भरमाया॥इधर भटका उधर भरमा, कोई यह भेद बतलाये॥बहुत पूछा किसी ने मेरी यह, गुत्थी न सुलझाया ॥पढ़ी पोथी गया तीरथ, किया जप तप रहा बन में॥न सन्यासी उदासी, और न बनवासी ने समझाया॥न निकला काम तब मन में, उदासी आगई मेरे
[३८-७४२ ] नहीं मैं जानता था कौन हूँ, और क्यों यहाँ आया॥
पड़ा क्यों काल की फाँसी में, क्यों माया ने भरमाया॥
इधर भटका उधर भरमा, कोई यह भेद बतलाये॥
बहुत पूछा किसी ने मेरी यह, गुत्थी न सुलझाया ॥
पढ़ी पोथी गया तीरथ, किया जप तप रहा बन में॥
न सन्यासी उदासी, और न बनवासी ने समझाया॥
न निकला काम तब मन में, उदासी आगई मेरे ।
चरन राधास्वामी के पकड़े, गुरू ने जब यह बतलाया ॥
नहीं माया अलग तुझसे, यह माया तेरी बुद्धि है॥
समय है काल माया बस, समय से आप घबराया ॥
सुरत को साध घट में धस, किया कर शब्द का साधन ॥
तो यह समझेगा तू चेतन है, चेतन चेतना भाया ॥
सुलझ तब यह गई गुत्थी, समझ निज रूप की आई॥
मुखी हो राधास्वामी संगत में, सतगुरु के गुन गाया ॥
Hindi
'प्रश्नोत्तर' [ ३६-७४३ ] प्रश्न: इस संसार का रूप क्या, पूछे दास फकीर ॥इसका उत्तर दीजिये, सुगम सुसूक्ष्म गम्भीर ॥ उत्तर: जहाँ पर निंदा सो संसार ॥जगत है निंदा का व्यौहार ॥निदा करे कोई संसारी ॥निंदा तजे सो गुरुमत धारी ॥गुन को गह औगुनको त्यागे ॥गुन ग्राही हो गुन रस पागे ॥परनिंदा से अपनी हानी ॥सुख नहीं मिले रहे अज्ञानी
‘प्रश्नोत्तर’ [ ३६-७४३ ]
प्रश्न: इस संसार का रूप क्या, पूछे दास फकीर ॥
इसका उत्तर दीजिये, सुगम सुसूक्ष्म गम्भीर ॥
उत्तर: जहाँ पर निंदा सो संसार ॥
जगत है निंदा का व्यौहार ॥
निदा करे कोई संसारी ॥
निंदा तजे सो गुरुमत धारी ॥
गुन को गह औगुनको त्यागे ॥
गुन ग्राही हो गुन रस पागे ॥
परनिंदा से अपनी हानी ॥
सुख नहीं मिले रहे अज्ञानी ।॥
निंदा करे जो और की, सो नहीं गुरु का दास ॥
चित नहीं उसके गुरू बसें, सहे अन्त में त्रास ॥
प्रश्न : है उपासना भेद क्या ? सो कहिये समझाय ॥
___ मन की सब दुविधा मिटे, चित का भरम नसाय ।॥
उत्तर : ४ उप हैं निकट बैठना आसन ॥
मूल मनन श्रवण निध्यासन ॥
गुरू के पास करे जो बासा ॥
सो उपासना धारे दासा ।॥
[३६१ चित थिर करे हृदय सोधे ॥
बिरती न भरमे सहज निरोधे ॥
दृष्टि रहे गुरू रूप के संग ॥
लखे रूप धारे गुरू रंग॥
यह उपासना सार बताऊँ ॥
सैन बैन में भेद लखाऊँ ॥
यह सिद्धान्त है अद्भुती, बरनत बरन न जाय ॥
गुरू समीप का बैठना, उप आसन कहलाय ॥
प्रश्न ५: सतसंगत के मर्म को, सहज ही देउ बताय ॥
गुरू गम गति कुछ लख पड़े, चार पदारथ पाय ।॥
उत्तर ६: सतगुरु हैं गुरु सत के रूप ॥
सत्त लोक के साँचे भूप ।॥
उनका संग है सत सतसंग ॥
सतसंगत से चढ़े सुरंग ॥
संग प्रभाव रंग गुरु धारे ॥
चित को सोधे मन को मारे ॥
ज्योति संग ज्यों जले पतिंगा ॥
तेहि विधि करे गुरु का संगा।॥
अन्धकार अज्ञान बिनासे ॥
सत का नूर हिय बिच भासे ॥
सतसंग सत का संग है, सतगुरु सत सरदार ॥
सत रूपी सत भावना, सत शोभा भंडार ॥
प्रश्न ७: सुमिरन कैसे कीजिये, सुमिरन का क्या भाव ॥
केसे सुमिरन के किये, पड़े हमारा दाव ॥
उत्तर ८: सत्त नाम है सुमिरन सार ॥
सुमिरन सहज योग न्यौहार ।॥
जेहि विधि कामी सुमिरे नार ॥
तेसा हो आदर्श का प्यार ॥
जैसे लोभी संयम दाम ॥
तैसे ही व्यापे सत नाम ॥
घट पर घट सिर धर पनिहारी ॥
डोले हिले चले पग धारी ॥
सुरत रहे घट माँह पिरोई ॥
सुमिरन की गति ऐसी होई ।॥
चन्द्र ललाट तो कंठ विष, सिरसे बहती गंग ॥
भस्म विभूती तन मलें, लपटे कीट भुजंग ॥
जटा जूट सिर से.हते, सुरत निरत विस्माध ॥
अमन अमल अवगत दशा, लखे रूप कोई साध ॥
उमा रमण करुणा अयन, कुन्द इंदु सम देह ॥
मोह भरम व्यापे नहीं, अचित अगेह अदेह ॥
नन्दी वाहन साथ ले, लिये भूत बैताल ॥
डमरु और त्रिशूल कर, गले मुड की माल ॥
लख शिव की मूरत उमा, बोली दीन दयाल ॥
तुम क्यों ऐसा रूप धर, करो जगत प्रतिपाल ॥
शिव बोले सुन तू प्रिया, मैं कल्याण स्वरूप ॥
मेरा रूप विचित्र है, नहीं परजा नहीं भूप ॥
मानी अभिमानी महा, नहीं मान अभिमान ॥
माँगू मान न आप मैं, दे औरन सन्मान ॥
औरन के तो आँख दो, मेरे आँखें तीन ॥
धनी बली को सब चहें, मुझ को प्यारे दीन ॥
अमृत प्यारा सबन को, विष प्यारा है मोहि ॥
औरन के उपकार हित, तजू काम मद मोह ॥
औगुन देख के गुन लहूँ, अवगुन से नहीं प्यार ॥
मेरी दशा विचित्र है, अगुन सगुन व्यौहार ॥
पारवती अर्धाङ्गिनी, परबत के आकार ॥
यह निज शक्ति चित्त की, उपजे न विषय विकार ॥
नन्दी सुख को समझले, मेरा वाहन सोय ॥
सुखी रहूँ नहीं दुखी हूँ, मन की दुर्मति खोय ॥
एक कर में त्रिशूल ले, शूल का करू संघार ॥
अधि दैविक अधिभूत दुख, अध्यातम दू मार ॥
दूजे कर डमरू गहूँ, अन्तर शब्द की धुन ॥
शब्द रूप है निज मेरा, बिसमध शब्द को सुन ।॥
पर उपकार को चित्त दे, विष का किया अहार ॥
नील कंठ का नाम धर, इसी नाम से प्यार ॥
सृष्टि प्रलय उत्पति दशा, व्यापे नाहीं मोह ॥
मुन्डमाल भूषन बने, रह कैलाश की खोह ॥
जग मग चन्द्र ललाट में, तिसको ओजस जान ॥
मैं निःकाम रहता सदा, क्रान्ति शान्ति स्थान ।॥
गंग सीस धारा सुगम, सिर से निकसी धार ॥
सोई मेरा रूप है, निरमल शुद्ध विचार ॥
संग में मेरे भूत हैं, भूत में धरनि अकास ॥
जलवायु पावक सदा, मुझ में करें निवास ॥
और रमे बैताल नित, सो सुन प्यारी आज ॥
बैताली है राग धुन, गान से मुझको काज ॥
अनहद बानी अद्भुती, अगम निगम की खान ॥
श्रुति उद्गीत प्रणव कहो, साई ज्ञान मन मान ॥
आँख तीसरी सुन प्रिया, तीजे तिल भ्रमध्य ॥
जो पावे इस भेद को, रहे न जग में बद्ध ॥
मैं कैलाश बसू सदा, ‘कैल’ जान ‘आनन्द’ ॥
‘अस’ है ‘रहना’ सुन उमा, मेंट भरम का द्वन्द ॥
सत चित आनन्द रूप में, सत है मेरी देह ॥
चित परवत सम पारवती, रूप आनन्द सनेह ॥
मेरा अपना कुछ नहीं, जो कुछ है सब मोर ॥
कमल नीर को परख ले, मुझ में मोर न तोर ।॥
मोर तोर की जेवरी, बन्धे जीव समुदाय ॥
मोर तोर मुझ में नहीं, कैसे कोई फसाय ।॥
मोर तोर की जेवरी, बट बाँधे सब जीव ॥
यह बन्धन तो तब कटें, लखे जो मूरत शिव ।॥
मोर तोर की जेवरी, सोई जग व्यौहार ॥
यही तो यम का काल है, यही है मूल विकार ॥
मोर तोर की जेवरी, काल करम की फाँस ॥
काट दे दुख के फन्द को, भज गुरु साँसों साँस ॥
मोर तोर की जेवरी, दो लड़ त्रय लड़ जान ॥
त्रिगुनात्मिक जगत में, तीन ताप की खान ॥
मोर तोर की जेबरी, शिव संगत में काट ॥
ले जो भक्ति विवेक को, चमके चन्द्र ललाट ॥
पारवती चित साध कर, शब्द योग अभ्यास ॥
नन्दी आनन्द चढ़ चले, बिचरे कोई दास ॥
सिर से गंग की धार नित, बहे तरंग अपार ॥
ज्ञान ध्यान की गम लहे, उपजे विवेक विचार ॥
प्रेम भक्ति मन में बसे, डसे न काल भुजंग ॥
दुख नहीं व्यापे देह को, पिये जो आनन्द भंग ॥
सत्त देह मन चित्त है, आनन्द सुरत सुजान ॥
भेद सच्चिदानन्द का, अद्भुत अगम महान ।॥
यही ज्ञान का सार है, और ज्ञान अज्ञान ॥
शब्द सार मेरा परख, शब्द का कर नित ध्यान ॥
शब्द गुरु का रूप है, और गुरू नहिं कोय ॥
जो नहिं गुरु गम को लखे, जावे भव जल खोय ॥
‘शालिग्राम’ की दया से, पाया भेद अपार ॥
‘शालिग्राम’ के संग से, मेटा द्वन्द पसार ॥
गुरु मूरत हृदय बसी, शिव प्रगटा अवधूत ॥
जग की फाँसी कट गई, जैसे काँचा सूत ॥
धन्य धन्य गुरु धन्य तुम, धन्य दया व्यौहार ॥
राधास्वामी धन्य तुम, दीनन के हितकार ।॥
Hindi
[ ४१-७४५ ] राधास्वामी नाम हित चित, प्रेम भाव से गाइये॥जीते जी यश कीरती, निरवान सद्गति पाइये॥घट में गाना नाम का हो, घट में हो सुमिरन मनन ॥घट के अन्दर उसका श्रवन, घट में हो उसका भजन ॥घट में अघट है घट में, घट के घाट का है पता ॥बैठ अपने घट में निसदिन, घट ही में मन को लगा॥घट में सुन धुन नाम की तू , श्रुति मत को साधकर ॥नाम की है रागनी उलटी, इधर से मुड़ उधर ॥सुरत के कानों से सुन, नित नाद अनहद राग की ॥शब्द की डोरी पकड़, यह राग है अनुराग की ॥है यही उद्गीत सच्चा, उसका प्रणव नाम है॥प्राण गाता है इसे, और प्राण ही से काम है॥कान आँख और मुख को, माने के समय में करले बंद ॥राधास्वामी नाम गायाकर, छुटेगा खेद द्वन्द
[ ४१-७४५ ] राधास्वामी नाम हित चित, प्रेम भाव से गाइये॥
जीते जी यश कीरती, निरवान सद्गति पाइये॥
घट में गाना नाम का हो, घट में हो सुमिरन मनन ॥
घट के अन्दर उसका श्रवन, घट में हो उसका भजन ॥
घट में अघट है घट में, घट के घाट का है पता ॥
बैठ अपने घट में निसदिन, घट ही में मन को लगा॥
घट में सुन धुन नाम की तू , श्रुति मत को साधकर ॥
नाम की है रागनी उलटी, इधर से मुड़ उधर ॥
सुरत के कानों से सुन, नित नाद अनहद राग की ॥
शब्द की डोरी पकड़, यह राग है अनुराग की ॥
है यही उद्गीत सच्चा, उसका प्रणव नाम है॥
प्राण गाता है इसे, और प्राण ही से काम है॥
कान आँख और मुख को, माने के समय में करले बंद ॥
राधास्वामी नाम गायाकर, छुटेगा खेद द्वन्द ।॥
है यही निज नाम, और इस नाम में चित को लगा॥
घट के परदे तब खुलंगे, घट के अनुभव को जगा ॥
राधास्वामी नाम का, साधन हो सोते जागते ॥
त्याग आलस नींद बन आवे, जो तुझसे त्यागते ॥
Hindi
[४२-७४६ ] आओ सतसंग में, नर जन्म बनाने आओ॥गुरु का उपदेश सुनो, चित को चिताने आओ॥काम करना हो करो, बातें बनाना छोड़ो॥अपने को औरों को, बन्धन से छुड़ाने आओ
[४२-७४६ ] आओ सतसंग में, नर जन्म बनाने आओ॥
गुरु का उपदेश सुनो, चित को चिताने आओ॥
काम करना हो करो, बातें बनाना छोड़ो॥
अपने को औरों को, बन्धन से छुड़ाने आओ ।॥
शम से और दम से करो, चित की वृत्ति का निरोध ॥
योग की शक्ति से बल, अपना बढ़ाने आओ ॥
सुरत शब्द का अभ्यास, सुगम है प्यारे ॥
सीख लो युक्ति, कमाई को कमाने आओ ॥
राधास्वामी ने दया की, दिया सत मत का मरम ॥
चूको आलस न करो, ज्ञान को पाने आओ॥
Hindi
[४३-७४७ ] काम करो चित से करो, दुचिताई से हान ॥दुचिताई अच्छी नहीं, भूल भरम की खान
[४३-७४७ ] काम करो चित से करो, दुचिताई से हान ॥
दुचिताई अच्छी नहीं, भूल भरम की खान ।॥
दुविधा से क्या बनेगा, दुविधा है बेकाम ॥
दुविधा ने दोऊ गये, माया पिली न राम ॥
दुविधा त्यागी साध चित को, मन का साजा साज॥
गोरस बेचत हरि मिले, एक पन्थ दो काज ।॥
एक रंग में रंग रहो, कभी न बनो कुरंग ॥
सूरदास की कामरी, चढ़े न दूजा रंग ॥
राधास्वामी गुरु किया, दुविधा मेटी आय ॥
क्यों नहीं पूरा काम हो, सतगुरु हुये सहाय ॥
Hindi
[४४-७४८ ] तुम आप करो विश्वास करो, गुरु बेड़ा पार करेंगे जी ॥दृढ़ निश्चय रहे मन में सदा, सच्चा उद्धार करेंगे जी ॥जो शरन में उनके आया है, भक्ति के दान को पाया है॥गुरु सुमिरन चित्त बसाया है, वह उसका सुधार करेंगे जी
[४४-७४८ ] तुम आप करो विश्वास करो, गुरु बेड़ा पार करेंगे जी ॥
दृढ़ निश्चय रहे मन में सदा, सच्चा उद्धार करेंगे जी ॥
जो शरन में उनके आया है, भक्ति के दान को पाया है॥
गुरु सुमिरन चित्त बसाया है, वह उसका सुधार करेंगे जी ।॥
मन में सच्ची प्रतीति रहे, गुरु चरन कमल में प्रीति रहे ॥
और प्रेम प्रभाव की रीति रहे, सच्चा उपकार करेंगे जी ।॥
बिन गुरु नहीं कर्म न ज्ञान मिले, गुरु बिन नहीं ज्ञान अनुमान मिले ॥
नहीं शब्द न साखी प्रमान मिले, वही विचार करेंगे जी ॥
राधास्वामी भजो राधास्वामी जपो,राधास्वामी सुमिरि
राधास्वामी कहो राधास्वामी सुनो राधास्वामी कहो, राधास्वामी संभाल करंगे जी ॥
Hindi
[४५-749 ] आतम विरती सहज की, सहज भाव चित दे॥सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥सहजा विरती आत्मा, मध्य धारना ध्यान ॥अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥जाकी जैसी प्रकृति, तैसा तिसका काम ॥छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥जो बन आये सहज में, सोई सहज का रूप ॥जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप
[४५-749 ] आतम विरती सहज की, सहज भाव चित दे॥
सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥
सहजा विरती आत्मा, मध्य धारना ध्यान ॥
अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥
जाकी जैसी प्रकृति, तैसा तिसका काम ॥
छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥
जो बन आये सहज में, सोई सहज का रूप ॥
जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप ।॥
सहज सहज जो सहज विधि, सो फल मीठा होय ॥
और युक्ति से जो पके, सुन्दर मधुर न सोय ॥
साधन सुमिरन सहज का, सहज ही सहज विधान॥
सहज बुद्धि सहज आचरण, अन्त सहज निरवान ।॥
निरविकल्प सविकल्प नहीं, उत्तम सहज समाधि ॥
सहज समाधि सहज मिले, छूटे सहज उपाधि ॥
सहज में नहीं कठिनता, सीख सहज मत रीति ॥
साधन सहज की प्रबलता, उपजे सहज प्रतीति ।॥
प्रेम प्रतीति सहज विधि, कठिन न प्रेम का पंथ ॥
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, भरम न छूटे ग्रन्थ ।॥
ग्रन्थ पढ़ा तो क्या भया, मिला न प्रेम का पन्थ ॥
प्रेम युक्ति सहजे खुले, जड़ चेतन का ग्रन्थ ।॥
सुरत शब्द अभ्यास से, वृत्ति सहज हो प्राप्त ॥
निज अनुभव साक्षात्कार, सहज शब्द मन आस ॥
सहज इन्द्री का ज्ञान है, सहज ज्ञान अनुमान ॥
सहज सहज निज ज्ञान है, यही है मुख्य प्रमान ॥
तुझमें ज्ञान प्रमान है, तुझमें ज्ञान अनुमान ॥
तुझमें शब्द की खान है, आप्त बचन सुन कान ॥
कठिन ग्रन्थ की जेवरी, बंध रहे चतुर सुजान ॥
निज अनुभव सूझा नहीं, पाया वाचक ज्ञान ।॥
वाचक ज्ञान को त्यागदे, महा कठिन व्यौहार ॥
प्रेम प्रतीति प्रभाव से, पावे उत्तम सार ।॥
सहज रीति सतसंग कर, सहज श्रवन और मनन ॥
सहज शब्द अभ्यास है, सुमिरन सहज भजन ॥
मिसरी जब जल से मिली, होगई जल का अंग ॥
जैसे ही गुरु के संग को, समझ सत्य का संग ।॥
नोन गला पानी भया, भरे कौन अब गौन ॥
सतसंगत परताप से, मन बानी चित मौन ॥
Hindi
[४६-७५० ] हम बासी उस देस के, जहाँ न बुद्धि विचार ॥द्वन्द भेद का भय नहीं, परम तत्व का सार ॥हम बासी उस देस के, जहाँ आनन्द की खान ॥सुख दुख कुछ व्यारे नहीं, एक रस भाव समान
[४६-७५० ] हम बासी उस देस के, जहाँ न बुद्धि विचार ॥
द्वन्द भेद का भय नहीं, परम तत्व का सार ॥
हम बासी उस देस के, जहाँ आनन्द की खान ॥
सुख दुख कुछ व्यारे नहीं, एक रस भाव समान ।॥
कमल नीर की गति परख, समझे कोई साध ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, मेटे सकल उपाध ॥
नहीं वह एक न दो कभी, त्रिगुनात्मक वह नाँहि ॥
गुनातीत गति अगम छवि, देखा निज घट मांहिं ॥
राधास्वामी की दया, पाया अगम अपार ॥
कहते सुनते ना बने, नहीं विवेक विचार ।॥
Hindi
[४७-७५१ ] सुमिरन करो तो जीभ बन्द हो, शब्द सुनो तब कान ॥मन को बस करने की विधि, गुरु स्वरूप का ध्यान ॥आँख से निरखो गुरु स्वरूप को, अन्तर घट में आन ॥धीरे धीरे काम बनाओ, गुरु महिमा को जान
[४७-७५१ ] सुमिरन करो तो जीभ बन्द हो, शब्द सुनो तब कान ॥
मन को बस करने की विधि, गुरु स्वरूप का ध्यान ॥
आँख से निरखो गुरु स्वरूप को, अन्तर घट में आन ॥
धीरे धीरे काम बनाओ, गुरु महिमा को जान ।॥
तीन बन्द जब लग नहीं लागे, केसे मिले ठिकान ॥
इन्द्री मन का शम दम साधन, समझ के करो विधान ।॥
निरख परख अपनी हो निस दिन,अपने रूप की हो पहचान॥
समय न खोना भरम न फसाना, ममता में है सबकी खान ।॥
सुरत शब्द की रहे कमाई, साधु संत को मन से मान ॥
राधास्वामी की कृपा से, मिलेगा एक दिन सच्चा ज्ञान ॥
Hindi
[४८-७५२ ] चित चरनों में जोड़िये, साक्षी भाव समान ॥तत्र सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ॥सहज भजन और ध्यान हो, सहज ही सुमिरन नाम ॥सहज भाव को समझलो, कठिनाई को त्याग ॥कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ॥कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ॥सहज वृत्ति है नम्रता, खींचतान अभिमान
[४८-७५२ ] चित चरनों में जोड़िये, साक्षी भाव समान ॥
तत्र सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥
सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ॥
सहज भजन और ध्यान हो, सहज ही सुमिरन नाम ॥
सहज भाव को समझलो, कठिनाई को त्याग ॥
कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥
सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ॥
कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥
सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ॥
सहज वृत्ति है नम्रता, खींचतान अभिमान ।॥
सहज मौज की रीति है, सहज चले जो कोय ॥
सहज भाव अन्तर बसे, घट में दरशन होय ।॥
सुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ॥
सहज सहज सुमिरन करो, एक दिन गुरु मिल जाय ।॥
करम स्थूल है साधुआ, ज्ञान सूक्ष्म यौहार ॥
आनन्द कारन मात्र है, यह सिद्धान्त विचार ॥
नीचे सब करमी रहे, ज्ञानी अधर समाय ॥
आनन्द जिनको मिल गया, सो भव दुःख नसाय ॥
त्रिगुन जगत की यह दशा, तीन तीन का भेद ॥
सत चित आनन्द परखले, मेट भरम का खेद ।॥
करम बने अज्ञान से, ज्ञान से बने विचार ॥
आनन्द बने सो सुरत से, गुरु मत सार सुधार ।॥
ज्ञान बीच की कड़ी है, यह नहीं इष्ट फकीर ॥
समझ समझ मन आपने, चित करो धीर गंभीर ॥
त्रिकुटी की गम करम में, सो अनेक का रूप ॥
अंधकार अज्ञान सोई, डाले भव के कूप ॥
ज्ञान द्वत का पक्ष है, और नहीं कोई द्वत ॥
मन ही में दुविधा बसे, नहीं वह पद अद्व त ॥
सुरत निरत में एकता, एक भाव आनन्द ॥
सुरत शब्द के योग से, कटे मोह का फन्द ।॥
वेद मार्गी त्रिपुटिः पद, वेदान्ती सोई द्वत ॥
भक्त उपासक प्रेम रत, लहें सुगम अद्वत ।॥
तीनो तीनों में फंसे, अपने भरम की खान ॥
त्रिगुन जगत के जाल में, भोगें योनि निदान ॥
योगी भोगी चतुर नर, आवागमन न काट ॥
कभी जनमे और कभी मरे, साजा द्वन्द का ठाट ॥
नहीं यह अगुन न सगुन है, निराकार साकार ॥
इनके मारग ना चले, हो फकीर हुशियार ।॥
नहीं समाधि में निचलता, ताका होय उत्थान ॥
सृष्टि स्थिति प्रलय में, आवागमन फंसान ॥
युक्ति अनूपम गुरु की, समझ समझ चित धार ॥
सतसंगत कर साध की, सहज में जा भव पार ॥
सन्त मता ऊँचा बहुत, समझ तो उपजे चैन ॥
संस्कार ले गुरु से, सुन सुन उनके सैन ॥
यह करनी का भेद है, तज कथनी की बान ॥
करनी कर रहनी रहे, सोई साध सुजान ।॥
तीन अवस्था त्यागकर, चौथे पद चित लाव ॥
वही सन्तमत सार है, वही मुक्ति का दाव ।॥
सहस कमल दल बास कर, गह त्रिकुटी ओंकार ॥
सुन्न समाधि रचाय ले, गुफा से होजा पार ॥
सतपद आसन मारकर, अलख अगम को दौड़॥
तब राधास्वामी धाम में, छूटे मन की चौड़।॥
शब्द योग को सीखकर, कर कुछ दिन सतसंग ॥
त्याग जगत के रंग को, धार गुरु का रंग ॥
Hindi
[ ५२-७५६ ] गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, गुरु की भक्ति नित करना ॥यह भव सागर की नौका है, बिना इसके नहीं तरना ॥जगत की वासना झूठी, न उससे नेह कर प्यारे ॥भरम में जो पड़े प्रानी, सहेंगे जनम और मरना ॥समझले माया छाया है, किसी के हाथ कब आई॥धुआँ का नापना मिथ्या, विपति का बोझ सिर धरना
[ ५२-७५६ ] गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, गुरु की भक्ति नित करना ॥
यह भव सागर की नौका है, बिना इसके नहीं तरना ॥
जगत की वासना झूठी, न उससे नेह कर प्यारे ॥
भरम में जो पड़े प्रानी, सहेंगे जनम और मरना ॥
समझले माया छाया है, किसी के हाथ कब आई॥
धुआँ का नापना मिथ्या, विपति का बोझ सिर धरना ।॥
समय अनमोल जो खोते, गुरु का संग नहीं करते ॥
पशु सम तुम उन्हें जानो, पशु हैं वह कभी नर ना ॥
रहे गुरु की लगन मन में, यतन सुमिरन भजन का हो ॥
दयासागर हैं राधास्वामी, चरन की दृढ़ करो शरना ॥
[ ५३-७५७ ॥मैं पतित ठहरा तभी, तू भी पतित पावन बना ॥
डूबा दुख सागर में मैं, तब तू तरन तारन बना ॥
जो न होता जग में रावण, कैसे आते रामचन्द्र ॥
कंस ने प्रगट किया, मथुरा में कृष्ण आनन्दकन्द ॥
जो सुखी हैं उनको तेरे, नाम की चाहत नहीं ॥
जो भले हैं उनको तेरे, काम की हाजत नहीं ॥
पाप जब मैंने किया तब, तू हुआ परगट यहाँ॥
मैं न करता पाप तुझको, जानता कोई कहाँ ॥
पापियों के तारने वाले, हमारा ध्यान कर ॥
करते हैं सब हमसे घृणा, हमको पापी जानकर ॥
अच्छे लोगों भागते हो, क्यों हमारे नाम से॥
कैसे कतराकर चले हो, तुम हमारे काम से ॥
ज्ञान का अज्ञानियों को, ही सदा अधिकार है॥
पापियों के ही लिये जग, सन्त का अवतार है॥
सुख के सिर पत्थर पड़, सुख ने भुलाया नाम को॥
दुख की बलिहारी है, दुख ने ही जपाया नाम को ॥
मेरे दाता दीन और, दुखियों की तुझको लाज है॥
दीन बन्धु दीन हित, करना ही तेरा काज है॥
अपनी निंदा क्या करें, निंदा के हम कब पात्र हैं॥
सच्चे अधिकारी दया के, जग के पापी मात्र है॥
पाप ही दरशन दिलाते, हैं तेरा संसार को ॥
पाप करके वह सुझा देते हैं, भक्ति सार को ।॥
द्वन्द में हमको फसाया, और पापी कर दिया॥
मन का बरतन वासनाओं, से हमारा भर दिया ॥
सारे पापी तर गये, आई है अब बारी मेरी ॥
देखता हूँ राह व्याकुलता, से आने की तेरी ॥
तर गये गनिका अजामिल, मुक्त शबरी भीलनी ॥
तर गये सैना सदन तक, और सुपच चर डाल भी ॥
मेरी बारी पर बता अब, देर क्यों करने लगा॥
इस अधम को तारदे यह, दुख से अब मरने लगा॥
ऐ पतित पावन पतित की, और दृष्टि हो तेरी ॥
ऐ तरन तारन नहीं, होती है चिन्ता क्यों मेरी ॥
राधास्वामी अब दया से, मेरा बेड़ा पार कर ॥
दुख सहा करता हूँ निसदिन, आके तू उद्धार कर ।॥
बिनती
[ ७५८ ] धन्य धन्य गुरु देव, ज्ञान सच्चा दिया॥
मिथ्या जग का द्वन्द सो, उसको मिटा दिया ॥
सत चित आनन्द रूप, अजर अमर विज्ञानमय ॥
उनकी कृपा महान, सूर ज्ञान का भया उदय ।॥
छूटा सब प्रपंच, दुख दारुन गया॥
भव के जाल से बच गये, हुई ऐसी दया ॥
भाग मेरा है धन्य धन्य, गुरु दीन हित ॥
धन्य ज्ञान और ध्यान है, धन्य धन्य हो अचल चित ।॥
शब्द जहाज चढ़ाय कर, कर लिया भव के पार |
राधास्वामी मेहर से, छूट गया संसार ॥
Hindi
[ 759 ] राधास्वामी धनी जग में आये, धर सतगुरु अवतार ॥जीव निवल की बाँह पकड़कर, किया भवसागर पार
[ 759 ] राधास्वामी धनी जग में आये, धर सतगुरु अवतार ॥
जीव निवल की बाँह पकड़कर, किया भवसागर पार ।॥
दया सिंधु में लहर जो उमड़ी, लाई शब्द जहाज ॥
निवल जीव सब चढ़कर बैठे, सुख सम्पति रहे गाज ॥
हँसी खेल में पार लगाया, सुरत शब्द के लार ॥
धरम करम का बन्धन काटा, मेट दिया जम जार ।॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊ,प्रेम प्रीति उमगाय ॥
धन धन धन मेरे सतगुरु स्वामी, सबको लिया बचाय ॥
अठारहवीं धुन
[ १-७६० ] गुरु परम दीन दयाल प्रगटे, जीव तारन हार ॥
शब्द नाव चढ़ाय सुन्दर, लाये भव जल पार ।॥
कृपा मूरति दया सूरति, ज्ञान गम भण्डार ॥
भक्त रंजन जग विभंजन, सकल के आधार ।॥
जीव दीन अधीन स्वामी, दुखित अति दिन रैन ॥
शब्द सार चिताय जन को, सुरत दीजे चैन ।॥
मिटे कलि मल वासना, और छूटे मूल विकार ॥
चरन कमल लगाय सबको, कीजे बेड़ा पार ।॥
अपना कीजे प्रेम दीजे, दया दृष्टि संभार ॥
सहज में प्रभु आप कीजे, लीजे सकल सुधार ।॥
जीव निवल अचेत सब विधि, सहत विपत कलेश ॥
छोड़े यह परदेश भव का, जायें तुम्हरे देश ॥
शब्द नाम सुनाय घट में, शब्द डोर लखाय ॥
शब्द का रहे आसरा प्रभु, शब्द डगर चढ़ाय ॥
शब्द धाम दिखाइये, और शब्द चित्त बसाय ॥
शब्द रूप दिखाय सबको, शब्द दीजे मिलाय ॥
जहाँ मन की गम नहीं है, वह तुम्हारा देश ॥
भक्त जन को निज दया से, इसका दो उपदेश ॥
काल करम से विवश हैं जीव, माया मोह फसाय ॥
राधास्वामी दया सागर, कीजे इनकी सहाय ।॥
Hindi
[२-७६१ ] भक्ति दाता भक्ति दीजे, भक्त पालन हार ॥मुक्त कीजे भक्ति अपनी, बख्शिये करतार ॥तुम हो ज्ञानी तुम हो ज्ञाता, ज्ञान गम भंडार ॥मेट दो अज्ञान तम को, ज्ञान के आधार ॥दीन तारन दीन बन्धु, हैं दीन दयाल ॥दीन शरणागत पड़ा है, कीजे उसकी संभाल
[२-७६१ ] भक्ति दाता भक्ति दीजे, भक्त पालन हार ॥
मुक्त कीजे भक्ति अपनी, बख्शिये करतार ॥
तुम हो ज्ञानी तुम हो ज्ञाता, ज्ञान गम भंडार ॥
मेट दो अज्ञान तम को, ज्ञान के आधार ॥
दीन तारन दीन बन्धु, हैं दीन दयाल ॥
दीन शरणागत पड़ा है, कीजे उसकी संभाल ।॥
मैं पतित सब विधि हूँ स्वामी, तुम हो पतित उद्धार ॥
मेरी ओर न देखियेगा, अपनी ओर निहार ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, नाम दीजे दांन ॥
मान की इच्छा नहीं मोहे, आया तज अभिमान ॥
मैं हूँ बालक तुम पिता हो, मैं निपट अनजान ॥
चाल विनती सुनिये चित से, कीजे मेरा ध्यान ॥
भक्ति सेवा नहीं बने कुछ, मैं हूँ बाल स्वरूप ॥
गधास्वामी मैं हूँ घट सम, तुम हो ब्रह्म के कूप ।॥
में हूँ कमल दल भाव सम, तुम कीजिये परकास ॥
चित रहे चरनों में निसदिन, दीजे ऐसी उजास ॥
फेर कर दृष्टि को मेरी, कीजे मेरी ओर ॥
चन्द्र मुख तुम राधास्वामी, मैं हूँ चित्त चकोर ।॥
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[३-७६२ ] अज्ञान बस नहीं तुमहि जाना, कैसे कोई जाने तुम्हें ॥जहाँ बानी मन की गम नहीं, कोई कैसे पहिचाने तुम्हें ॥रूपवान अरूप हो तुम, आप जगत स्वरूप हो ॥तुम आप भव निधि कूप हो, तुम चर अचर के भूप हो ॥अज्ञान भरम के जाल में, फसकर तुम्हें जाना नहीं॥इस कठिन मोह की छाया में, प्रभु तुमको पहिचाना नहीं॥पद कमल सीस बिराजिया, त्रय ताप सकल बिनासिया ॥अघपाप पूरे नासिया, प्रभु कीन्हा सहज उदासिया ॥मेरे अब तो अबगुन मेटिये, चरनों में मुझको लीजिये ॥राधास्वामी निज जन जानकर, पद पद्म भक्ति दीजिये॥
[३-७६२ ] अज्ञान बस नहीं तुमहि जाना, कैसे कोई जाने तुम्हें ॥
जहाँ बानी मन की गम नहीं, कोई कैसे पहिचाने तुम्हें ॥
रूपवान अरूप हो तुम, आप जगत स्वरूप हो ॥
तुम आप भव निधि कूप हो, तुम चर अचर के भूप हो ॥
अज्ञान भरम के जाल में, फसकर तुम्हें जाना नहीं॥
इस कठिन मोह की छाया में, प्रभु तुमको पहिचाना नहीं॥
पद कमल सीस बिराजिया, त्रय ताप सकल बिनासिया ॥
अघपाप पूरे नासिया, प्रभु कीन्हा सहज उदासिया ॥
मेरे अब तो अबगुन मेटिये, चरनों में मुझको लीजिये ॥
राधास्वामी निज जन जानकर, पद पद्म भक्ति दीजिये॥







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