Hindi
[ 53-651 ] पहली कथा गंगा तट कोई साधु आया, बिच्छू पानी मझारा
[ 53-651 ] पहली कथा गंगा तट कोई साधु आया, बिच्छू पानी मझारा ।
तड़प जो देखी इसकी उसने, हाथ से उसे निकारा ।
बिच्छू ने उसे डंक से मारा, हाथ में उपजी पीरा ।
साधु ने कुछ बुरा न माना, सत मन चित गम्भीरा ।।
बिच्छू फिर पानी में आया, इसने उसे बचाया।
फिर बिच्छू ने डंक से मारा, साधु नहीं पछताया ॥
तीजे वार गिरा वह पानी, इसने पकड़ निकारा ।
बिच्छू का स्वभाव सब जाने, डंक से फिर भी मारा ।।
साधू पकड़ किनारे लाया, हाथ सूज गया भाई॥
यह लीला कोई देखी नारी, साधू ढिंग वह आई ॥
बोली क्या तू है अज्ञानी, जो बिच्छू नहिं जानी॥
उसे उठाकर क्यों बाहर किया, बिच्छू विष की खानी॥
हँसा साधु सुन सुन्दर माई, मैं नहीं निपट अनारी॥
मैं हूँ साध साध मत मेरा, पर हित पर उपकारी ॥
बिच्छू तजे स्वभाव न अपना, मैं अपना क्यों त्यागू॥
वह जब निज स्वभाव में करते,क्यों परहित नहीं लागू॥
माई ने जब सुनी तो बोली, धन्य साध की लीला॥
सुबचन सुमन सुकर्म है साधू, सुरत सुभाव सुशीला ॥
पर दुख हरन विभंजन त्रय तप, हितकारी सुख देवा॥
धन्य जगत में वह नर प्रानी, करें जो साध की सेवा।॥
मैं हूँ पारवती परवत की, शिव की निज अरधंगी॥
तू है शिव का पुत्र गुसाई, सुचित सुसाध सुअंगी ॥
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, धन्य गनेश की मूरत॥
जो कोई तेरा दरसन पावे, घरे दया की सूरत ॥
अन्तरध्यान भई वह देवी, साधू मन हरपाया॥
पर उपकार की महिमा भारी, सती का दर्शन पाया॥
दूसरी कथा
Hindi
[ ५४-६५२ ] दुजी कथा सुनाऊँ फकीरा, कान इधर ला भाई॥मैं फकीर का प्रेमी सेवक, त्याग हृदय दुचिताई ॥साधु कोई नौका चढ़ बैठा,
[ ५४-६५२ ] दुजी कथा सुनाऊँ फकीरा, कान इधर ला भाई॥
मैं फकीर का प्रेमी सेवक, त्याग हृदय दुचिताई ॥
साधु कोई नौका चढ़ बैठा,. संग मैं नर बहुतेरा॥
दुष्ट अभागी देख के साधू, उपजा क्रोध गम्भीरा ॥
हँसी उड़ाया धूम मचाया, मारा सिर पर लाठी॥
फूटा सिर साधू का भाई, साजा साज कुठाठी ॥
हुई अकाश बानी तब ऐसी, साध है मुझको प्यारे॥
मैं साधु का सहज सनेही, छिल पल का रखबारा ॥
उलट नात्र डुबाऊ सबको, यह अनथे नहीं भावे॥
क्यों कोई अपराधी बनकर, मेरा साध सतावे ॥
बानी सुनकर साधु दुखी भया, बोला चतुर सुजाना॥
तू दयालु है मेरा साँई, अगम अनाम अमाना ।॥
जीव निबल अज्ञानी मूरख, माया फन्द फंसाने॥
यह नहीं समझ सार तत्व को, भूल भरम भरमाने॥
दया दृष्टि कर इन्हें चितादो, भाव जतादे अपना॥
मेरे जैसा उन्हें बनादे, दया का देकर किनका ॥
साधु संग का फल नहीं हानी, लाभ साध संग स्वामी॥
मेट भरम अज्ञान जीव का, चरन सरोज नमामी॥
फिर अकाश बानी भई दूजी, एवमस्तु सुन प्यारे॥
ले तेरे छिन मात्र की संगत, यह जावें भव पारी ।॥
दुष्ट हृदय पछताना आया, साधु चरन लग रोया॥
साध ने अपने अंग लगाया, पल में दुर्मति खोया ॥
सुन फकीर होजा फकीर अब, रूप संभारे अपना॥
जग में प्रानी तेरे रूप में, मेटदे उनका तपना ॥
तेरा रूप है अद्भुत अचरज, तेरी उत्तम देही॥
जग कल्याण जगत में आया, परम दयाल सनेही ॥
तीसरी कथा
Hindi
[ ३१-६२६ ] तीजी कथा सुनाऊँ तुझको, सुन सुनकर चितलाना॥कथा नहीं यह और की प्यारे, तेरी कथा सुनाना ॥हरगोविंद को कैद में डाला, जहाँगीर ने भाई॥ले गवालियर किले में फाँसा, हुआ निपट दुखदाई ॥मियाँ मीर ने उसे चिताया, छोड़ फकीर को छिन में॥नहीं तो उलटे राज यह तेरा, एक रात एक दिन में ॥जहाँगीर ने हुकुम सुनाया, हरगोविंद को लाओ॥यह बोले मैं कैद न छोड़, कितना करो उपाओ॥मैं फकीर हूँ देह बंध में, जीवों के हित आया॥सात हजार छोड़ दे केही, उपजी मन में दाया ॥बादशाह ने सबको छोड़ा, जब यह बाहर आये॥आप छुटे औरन को छुड़ाया, दया का साज सजाये ॥यह इतिहासिक कथा पुरानी, चरित पुनीत सुहावन॥मन रंजन मन चेत बढ़ावन, मन भावन मन पावन॥देह के बंध फकीरा आवे, बंध निरबंधन सोई॥बंधकर बन्धुवे जीव छुड़ावें, समझे यह गति कोई ॥तू तो आया नर देही में, घर फकीर का भेसा॥दुखी जीव को अंग लगाकर, लेजा गुरु के देसा
[ ३१-६२६ ] तीजी कथा सुनाऊँ तुझको, सुन सुनकर चितलाना॥
कथा नहीं यह और की प्यारे, तेरी कथा सुनाना ॥
हरगोविंद को कैद में डाला, जहाँगीर ने भाई॥
ले गवालियर किले में फाँसा, हुआ निपट दुखदाई ॥
मियाँ मीर ने उसे चिताया, छोड़ फकीर को छिन में॥
नहीं तो उलटे राज यह तेरा, एक रात एक दिन में ॥
जहाँगीर ने हुकुम सुनाया, हरगोविंद को लाओ॥
यह बोले मैं कैद न छोड़, कितना करो उपाओ॥
मैं फकीर हूँ देह बंध में, जीवों के हित आया॥
सात हजार छोड़ दे केही, उपजी मन में दाया ॥
बादशाह ने सबको छोड़ा, जब यह बाहर आये॥
आप छुटे औरन को छुड़ाया, दया का साज सजाये ॥
यह इतिहासिक कथा पुरानी, चरित पुनीत सुहावन॥
मन रंजन मन चेत बढ़ावन, मन भावन मन पावन॥
देह के बंध फकीरा आवे, बंध निरबंधन सोई॥
बंधकर बन्धुवे जीव छुड़ावें, समझे यह गति कोई ॥
तू तो आया नर देही में, घर फकीर का भेसा॥
दुखी जीव को अंग लगाकर, लेजा गुरु के देसा ।॥
तीन ताप से जीव दुखी है, निबल अबल अज्ञानी॥
तेरा काम दया का भाई, नाम दान दे दानी ॥
नाम फकीर धरा जब तूने, काम फकीर का करले॥
गुरु की दया साथ ले अपने, भक्ति की झोली भरले ।॥
तू इराक से अब के आया, सत. संगत के कारन॥
ले प्रसाद यह सत संगत का, होजा भव निधि तारन॥
राधास्वामी दया के सागर, होंगे तेरे सहाई॥
फुक में उतरे साँच फकीरा, सब की करे भलाई ।॥
Hindi
[५६-६५४ ] चुप रहने का फल है मीठा, बोले बाद विवादा॥चुप का स्वाद रसीला अद्भुत, बोले मचे उपाधा ॥कान हैं दो और एक जीभ है, देखलो अपनी आँखों॥जब दो बार सुने कोई बानी, एक बार मुख भाखो ॥बोली बोले सहे दुख पानी, बिन बोले निरबानी॥तोता मैना बोल के चोली; पिंजरे बंध बंधानी ॥बिन बोले कोई मुक्ति न माँगे, नहीं प्रमान मत भेदा॥एक चुप लाख विपत्त को टारे, मिटे दुःख भव खेदा॥मुख की थैली जिभ्या राखू , बिन कारन क्यों बोलू॥बिना प्रयोजन कथन है निष्फल,क्यों मुख अपना खोलू॥जो बोले सो हारे भाई, जीत जो मुख नहीं बोले॥सोचे समझे मोल विचारे, बात हिये बिच तोले ॥जो सुमिरे सो चिंतन साधे, सुमिरन ध्यान का मूला॥सुमिरन विधि राधास्वामी नाम है,और बोल भव सूला ॥
[५६-६५४ ] चुप रहने का फल है मीठा, बोले बाद विवादा॥
चुप का स्वाद रसीला अद्भुत, बोले मचे उपाधा ॥
कान हैं दो और एक जीभ है, देखलो अपनी आँखों॥
जब दो बार सुने कोई बानी, एक बार मुख भाखो ॥
बोली बोले सहे दुख पानी, बिन बोले निरबानी॥
तोता मैना बोल के चोली; पिंजरे बंध बंधानी ॥
बिन बोले कोई मुक्ति न माँगे, नहीं प्रमान मत भेदा॥
एक चुप लाख विपत्त को टारे, मिटे दुःख भव खेदा॥
मुख की थैली जिभ्या राखू , बिन कारन क्यों बोलू॥
बिना प्रयोजन कथन है निष्फल,क्यों मुख अपना खोलू॥
जो बोले सो हारे भाई, जीत जो मुख नहीं बोले॥
सोचे समझे मोल विचारे, बात हिये बिच तोले ॥
जो सुमिरे सो चिंतन साधे, सुमिरन ध्यान का मूला॥
सुमिरन विधि राधास्वामी नाम है,और बोल भव सूला ॥
Hindi
[ ५७-६५५ ] सुन बानी उपजे मन हानी, हानी गिलानि महानी॥चित में डाह ईर्षा जागे, सहज बने अभिमानी ॥है अभिमान फंद का कारण, काल की यम की फाँसी॥जो कोई सुने जगत की बातें, अपनी ही करे हाँसी
[ ५७-६५५ ] सुन बानी उपजे मन हानी, हानी गिलानि महानी॥
चित में डाह ईर्षा जागे, सहज बने अभिमानी ॥
है अभिमान फंद का कारण, काल की यम की फाँसी॥
जो कोई सुने जगत की बातें, अपनी ही करे हाँसी ।॥
दोनों कान हैं नहरें न्यारी, बात है बहता पानी॥
मन का बरतन वृथा बचन से, भरता अपना प्रानी ।॥
पानी भरा बंधा घट आकर, प्रगटे भुंगा कीड़ा॥
इनसे दुख पावे नर मूरख, सहे त्रास दुख पीड़ा॥
सघन अंधेरा बानी का बन, जो आया भरमाया॥
वेद शास्त्र बानी की लीला, तत्व श्विक छुपाया ॥
यह गुरु का उपदेश फकीरा, बानी चित न बिसारे॥
बाहर. कान में बंध लगाकर, श्रुति उद्गीत विचारे॥
अनहद धुन है श्रुति उद्गीता, अन्तर साधी विरतो॥
राधास्वामी गुरु की कृपा, सहजे भई निवरती ।॥
Hindi
[५८-६५६ ] बाहर की जब आँखें खोली, दृष्टि सृष्टि पसारा॥बाहर मुखी हुआ जब प्रानी, अन्तर बिरती घिसारा ॥जो देखे सो भरम दृश्य है, मरम भरम उत्पावे॥भरम बसे जो हिय के अन्तर, भरम के खेल खेलावे ॥भरम है बीज अज्ञान अखुवा, डाल कर्म और धंदे॥फूल वासना काम क्रोध मद, फल सुख दुख के फंदे ॥भरम की सृष्टि दृष्टि से उपजी, आवागवन की खानी॥लख चौरासी योनी भरमे, भरम है अकथ कहानी ॥गुरु ने मर्म जताया अद्भुत, सत संगत करवाई॥सुरत शब्द की विधि बताया, अन्तर मुख की कमाई
[५८-६५६ ] बाहर की जब आँखें खोली, दृष्टि सृष्टि पसारा॥
बाहर मुखी हुआ जब प्रानी, अन्तर बिरती घिसारा ॥
जो देखे सो भरम दृश्य है, मरम भरम उत्पावे॥
भरम बसे जो हिय के अन्तर, भरम के खेल खेलावे ॥
भरम है बीज अज्ञान अखुवा, डाल कर्म और धंदे॥
फूल वासना काम क्रोध मद, फल सुख दुख के फंदे ॥
भरम की सृष्टि दृष्टि से उपजी, आवागवन की खानी॥
लख चौरासी योनी भरमे, भरम है अकथ कहानी ॥
गुरु ने मर्म जताया अद्भुत, सत संगत करवाई॥
सुरत शब्द की विधि बताया, अन्तर मुख की कमाई ।॥
उलटो आँख तीसरे तिल में, चित को ले ठराओ॥
बाहर के एट देकर अपने, हिय के नैन खुलाओ॥
सूक्ष्म लीला कारण लीला, ब्रह्म परब्रह्मांडा॥
देखो पहले निरख परख कर, फिर धाओ सच खंडा॥
विना नैन के मोती पोहो, बिना कान के बानी॥
बिन कर कर्म करो विधि नाना, बिन पग शिखर चढ़ानी ।॥
बिना देह की काया पाओ, बिन जिभ्या मुख बोलो॥
बिन सूरज के करो प्रकासा, बिना बुद्धि सब तोलो॥
यह गति अगम अपार अकथ है, कसे कोई बखाने॥
जो कोई घट में अपने आवे, लख लख तब मन माने॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, अचरज भेद बताव॥
उलट ब्रह्मांड को भेदे प्राणी, तुम निज सत पद पावें ।॥
[ ५६-६५७ ] तू अविनाशी अजर अमर है, तू सबका अधारा है॥
सब रहते हैं तेरे सहारे, तू ही सबका सहारा है॥
निराधार आधार जगत का, ममें न कोई लख पावे॥
जब तू अपना रूप दिखावे, समझ में तब कुछ कुछ आवे ॥
मन बानी की गम नहीं तुझ में, अगम अथाह अपारा है॥
अलख अगम अव्यक्त अनूपम, अगुण सगुण से न्यारा है ॥
तू है कौन कहाँ से आया, क्यों आया क्यों छाया है॥
क्यों आकर मुझे अंग लगाया, क्यों स्वरूप दिखलाया है॥
तू मैं हूँ या मैं ही तू है, क्या है केहि विधि मैं पाऊँ॥
तू अनाम है तू अरूप है, कैसे तेरा गुण गाऊ ॥
अचरज अचरज अचरज तू है, गुप्त प्रगट में व्यापा है॥
मायातीत अगोचर उनमन, छाँह न दिव्य प्रकाशा है॥
पात पात में तेरी लीला, फूल फूल का बास है तू॥
दूर बताता है कोई केसे, सबके सब विधि पास है तू ।॥
गुरु हुआ चेले के घट में, प्रगट होकर रहता है॥
बुरा भला लाखों कहे कोई; सबकी सुनता रहता है॥
नहीं गुरु नहीं चेला तू है, दोनों दशा से न्यारा है॥
हद बेहद से परे ठिकाना, तेरा सकल पसारा है ॥
आजा आजा मेरी सुन जा, मेरे हृदय में बस जा॥
प्रेम प्रीत की जाल बनाई, उसके फंदे में फंस जा॥
ऐ. अरूप तेरा मुखड़ा देखू, दर्शन की अभिलाष घनी॥
मैं निर्धन दीन शरणागत, तू है सबका आप धनी ॥
आरति कैसे करूं गुसाई, तेल दिया बाती है तू॥
फूल चढ़ाने से क्या होगा, कली फूल पाती है तू ॥
जहाँ जहाँ निरखू तेरी लीला, जो जो सुनूं तेरी बानी॥
जो जो कहूँ तेरी हो कहानी, रहूँ तेरा मैं अभिमानी ॥
मुझको शब्द तेरा हो सुमिरन, जो गाऊँ सो भजन तेरा॥
जो ध्याऊँ वही ध्यान तेरा हो, जो बोलू सो कथन तेरा ।॥
बलबल जाऊँ तेरी दया पर, जान प्राण तन मन अरपू॥
राधास्वामी चरन की महिमा गा गा,काल करम से नहीं डरपू॥
Hindi
[६०-६५८ ] राधास्वामी चरन कमल पर, बार बार बल जाऊँ॥तन मन की सब सुद्धि बिसारू, निसदिन गुरु गुन गाऊ॥गुरु मेरे जान प्रान से प्यारे, गुरु आँखों के तारे॥गुरु की दया साध की संगत, जाऊ भव जल पारे॥गुरु रक्षक गुरु दाता दानी, गुरु का लेऊ सहारा॥गुरु के चरन सीस पर धारे, काल करम थक हारा
[६०-६५८ ] राधास्वामी चरन कमल पर, बार बार बल जाऊँ॥
तन मन की सब सुद्धि बिसारू, निसदिन गुरु गुन गाऊ॥
गुरु मेरे जान प्रान से प्यारे, गुरु आँखों के तारे॥
गुरु की दया साध की संगत, जाऊ भव जल पारे॥
गुरु रक्षक गुरु दाता दानी, गुरु का लेऊ सहारा॥
गुरु के चरन सीस पर धारे, काल करम थक हारा ।॥
गुरु मूरति हिय आन विराजी, घट मैं करू गुरु सेवा॥
तन मन धन और सीस अरप कर, जानू और न देवा ॥
छिन प्रति छिन गुरु आरती ठान, गुरु से नेह लगाऊँ॥
सुरत शब्द की करू कमाई, अन्त परम पद पाऊँ॥
पिन गुरु भक्ति विवेक न होई, गुरु बिन ज्ञान न पाये॥
करम धरम सब धोका जानो, जब लग गुरु न चिताये ॥
गुरु का रंग हृदय जब धारा, मिटा तिमिर अज्ञाना॥
घट से ज्योती सोत बह निकसी, प्रगटा तब विज्ञाना॥
गुरु के चरन प्रीत भई गाड़ी, समझ पड़ी गुरु बानी॥
मन प्रतीत प्रेम रस पागा, मिल गई शब्द निशानी ॥
योग विराग हृदय प्रकाशा, सूझा सकल पसारा॥
अलख अगम की गम जब पाई, मिटा मोह संसारा ॥
पढ़ पढ़कर बहु दिवस बिताये, बुद्धि विलास में भूले॥
दृष्टि खुली जब गुरु कृपा से, प्रेम हिंडोले भूले ॥
कोटि जनम से धोखा खाया, मिला न ठौर ठिकाना॥
धन्य धन्य गुरु महिमा तेरी, सत्य नाम दिया दाना ॥
मान न माँगू सिद्धि न मागू, ऋद्धि में चित्त न लाऊ॥
जनम जनम पद कमल की सेवा, यही पदारथ पाऊँ ॥
सुमिरन नाम ध्यान गुरु मूरति, भजन शब्द मत सारा॥
तुरिया तुरियातीत न चाहूँ, रहूँ सकल से न्यारा ॥
गुरु मेरे मात पिता सम्बन्धी, गुरु से नाता जोड़े॥
भव की लाज लोक सब त्यागू, जग से मुंह को मोड़ ॥
जो मैं दास तुम्हारा दयानिध, हित चित मन कर्म वानी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बख्शो पद निरवानी ॥
Hindi
[६१-६५६ ] तू जगदीश जगत का करता, तेरा मन में ध्यान रहे॥तेरी लगन लगे निस बासर, तेरा निस दिन ध्यान रहे ॥तू अनाम तू मायातीता, गुणात त करुणा सागर॥सुख सम्पति परलोक बड़ाई, तुझमें यश और मान रहे॥चरन कमल की भक्ति मिले स्वामी,भक्तिभाव हिय में आवे॥तेरी प्रीति प्रेम पद का प्रभु, छिन छिन प्रतिछिन गान रहे
[६१-६५६ ] तू जगदीश जगत का करता, तेरा मन में ध्यान रहे॥
तेरी लगन लगे निस बासर, तेरा निस दिन ध्यान रहे ॥
तू अनाम तू मायातीता, गुणात त करुणा सागर॥
सुख सम्पति परलोक बड़ाई, तुझमें यश और मान रहे॥
चरन कमल की भक्ति मिले स्वामी,भक्तिभाव हिय में आवे॥
तेरी प्रीति प्रेम पद का प्रभु, छिन छिन प्रतिछिन गान रहे ।॥
दोऊ कर जोड़ करूं मैं विनती, क्षमा करो अपराध मेरा॥
तेरी सेवा तेरी पूजा, तेरा ही ज्ञान अनुमान रहे॥
रसना नाम जपे तेरा पल पल, दर्शन की अभिलाष बढ़ी॥
शब्द की ओर निरन्तर मेरे, सुरत निरत का कान रहे॥
जग की मान बड़ाई न माँगू, नहीं मागू धन परिवारा॥
भक्ति दीजे चरन कमल की, भक्ति से कल्यान रहे ।॥
छल चतुराई कपट कुटिलता, काल कर्म से सब हारे॥
शरणागत की सुध प्रभु लीजे, चरन शरन में आन रहे॥
Hindi
[६२-६६० ] चरन कमल में सीस मुकाऊँ, नित सतगुरु गुन गाऊँ॥तन मन सब अरपू हित चित से, निसदिन ध्यान लगाऊ॥जागू तो गुरु का रहे सुमिरन, सोऊँ तो लव लाऊँ॥गहरी नींद में लय चिंतन कर, आपा आप भुलाऊँ॥तुरिया तुरियातीत रहूँ जब, मन में रूप बसाऊँ॥सोबत जागत रूप न त्यागू, ऐसी ताड़ी लाऊं॥गुरु मेरे अगम अपार अमाया, दान दया का पाऊ॥भक्ति भाव नित बसे निरन्तर, और सकल बिसराऊँ॥गुरु की बानी अगम ठिकानी, समझ समझ हरपाऊँ॥जो कोई पूछे जिज्ञासू बन, प्रेम से ताहि सुनाऊँ॥गुरु की कृपा साध की संगत, बुद्धि विवेक बढ़ाऊँ॥निज स्वरूप का दर्शन पाकर, औरन को दरसाऊ
[६२-६६० ] चरन कमल में सीस मुकाऊँ, नित सतगुरु गुन गाऊँ॥
तन मन सब अरपू हित चित से, निसदिन ध्यान लगाऊ॥
जागू तो गुरु का रहे सुमिरन, सोऊँ तो लव लाऊँ॥
गहरी नींद में लय चिंतन कर, आपा आप भुलाऊँ॥
तुरिया तुरियातीत रहूँ जब, मन में रूप बसाऊँ॥
सोबत जागत रूप न त्यागू, ऐसी ताड़ी लाऊं॥
गुरु मेरे अगम अपार अमाया, दान दया का पाऊ॥
भक्ति भाव नित बसे निरन्तर, और सकल बिसराऊँ॥
गुरु की बानी अगम ठिकानी, समझ समझ हरपाऊँ॥
जो कोई पूछे जिज्ञासू बन, प्रेम से ताहि सुनाऊँ॥
गुरु की कृपा साध की संगत, बुद्धि विवेक बढ़ाऊँ॥
निज स्वरूप का दर्शन पाकर, औरन को दरसाऊ ।॥
भेद भाव का संशय मेटू, भरम विकार नसाऊ॥
साँई मेहर कुछ ऐसी होवे, सबको मरम बताऊँ ॥
जीव दुखारी तीन ताप से, सुख का भेद लखाऊँ॥
सुमिरन ध्यान भजन की किरिया, जानू जान बताऊँ॥
बिनती सुनो दयानिधि मेरी, आऊ कहूँ न जाऊ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम प्रोति उमगाऊँ॥
Hindi
[६३-६६१ ] आसा एक गुरु की चित में, और न मन अभिलाषा॥जिसकी ऐसी सच्ची श्रद्धा, हुये न कभी निरासा ॥काम न आवे छल चतुराई, यह सब भरम विकारा॥एक गुरु के नाम की चिन्ता, कर जग से हो न्यारा ॥जाके सिर पर हाथ गरु का, बाँका बाल न होई
[६३-६६१ ] आसा एक गुरु की चित में, और न मन अभिलाषा॥
जिसकी ऐसी सच्ची श्रद्धा, हुये न कभी निरासा ॥
काम न आवे छल चतुराई, यह सब भरम विकारा॥
एक गुरु के नाम की चिन्ता, कर जग से हो न्यारा ॥
जाके सिर पर हाथ गरु का, बाँका बाल न होई !
जो जग बैर करे बहुतेरा, हानि न तासे कोई ।॥
मौज में बरतूं मौज निहारूँ, मौज का धरूं सहारा॥
मौज की राह में पग को धारू, मौज से होय सुधारा ।॥
कष्ट कलेश विपत दुख आपति, पड़े सीस पर सहना॥
राधास्वामी मौज परखना, मौज की ओट में रहना ।॥
Hindi
[६४-६६२ ] धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य दीन हितकारी॥धन्य कृपाला सहज दयाला, भव भय मेटनहारी ॥लीला अगम अपार अमाया, अद्भुत क्या कोई जाने॥ऋषि मुनि जोगी पार न पावें, ज्ञानी नहीं पहचाने॥अगुन सगुन के मध्य बिराजे, नहीं ब्रह्म नहीं माया॥रूप अरूप के वरे परे तुम, नहीं प्रकाश नहीं छाया ॥सब में व्याप्त तुम्हारी सत्ता, सत्त असत्त के पारा॥मन बानी की गम नहीं तुममें, सब में सब से न्यारा ॥क्या कह करू तुम्हारी स्तुति, अजर अमर अविनासी॥निरालम्ब सब के आधारा, चेतन धन सुख रासी ॥गो गोचर जहाँ लग मन जाई, सो नहीं देश तुम्हारा॥माया काल के परे ठिकाना, क्या कोई बरने पारा ॥तत्व अतत्व असार सार नहीं, शब्द सुरत नहीं होई॥सन्त कहें तुम शब्द रूप हो, और अशब्द गति सोई ॥ऊँची दृष्टि करे जो प्रानी, सार भेद कुछ पावे॥भेद पाय शरणागत आवे, आवागवन मिटावे ॥दया करो करुणा चित लाओ, दो मोहि भक्ति विवेका॥राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहूँ शब्द मिल एका ॥
[६४-६६२ ] धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य दीन हितकारी॥
धन्य कृपाला सहज दयाला, भव भय मेटनहारी ॥
लीला अगम अपार अमाया, अद्भुत क्या कोई जाने॥
ऋषि मुनि जोगी पार न पावें, ज्ञानी नहीं पहचाने॥
अगुन सगुन के मध्य बिराजे, नहीं ब्रह्म नहीं माया॥
रूप अरूप के वरे परे तुम, नहीं प्रकाश नहीं छाया ॥
सब में व्याप्त तुम्हारी सत्ता, सत्त असत्त के पारा॥
मन बानी की गम नहीं तुममें, सब में सब से न्यारा ॥
क्या कह करू तुम्हारी स्तुति, अजर अमर अविनासी॥
निरालम्ब सब के आधारा, चेतन धन सुख रासी ॥
गो गोचर जहाँ लग मन जाई, सो नहीं देश तुम्हारा॥
माया काल के परे ठिकाना, क्या कोई बरने पारा ॥
तत्व अतत्व असार सार नहीं, शब्द सुरत नहीं होई॥
सन्त कहें तुम शब्द रूप हो, और अशब्द गति सोई ॥
ऊँची दृष्टि करे जो प्रानी, सार भेद कुछ पावे॥
भेद पाय शरणागत आवे, आवागवन मिटावे ॥
दया करो करुणा चित लाओ, दो मोहि भक्ति विवेका॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहूँ शब्द मिल एका ॥
Hindi
६५-६६३ ] भेद का ग्राहक मिले तो उसको, तत्व का भेद बताऊँ॥प्रेम भाव से हृदय लगाऊँ, घर की राह दिखाऊँ॥रूप न रंग अकार न देखा, ऐसा देश हमारा॥मन बानी की पहुँच नहीं है, कहन सुनन से न्यारा ॥पिंड खोज ब्रह्मांड लखे जो कोई, सूझे ब्रह्म पसारा॥पिंड ब्रह्मांड से न्यारा लखे, दरसे अगम अपारा
६५-६६३ ] भेद का ग्राहक मिले तो उसको, तत्व का भेद बताऊँ॥
प्रेम भाव से हृदय लगाऊँ, घर की राह दिखाऊँ॥
रूप न रंग अकार न देखा, ऐसा देश हमारा॥
मन बानी की पहुँच नहीं है, कहन सुनन से न्यारा ॥
पिंड खोज ब्रह्मांड लखे जो कोई, सूझे ब्रह्म पसारा॥
पिंड ब्रह्मांड से न्यारा लखे, दरसे अगम अपारा ।॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके, बरसे अमृत धारा॥
विन जिभ्या के शब्द प्रगट हो, बिन सूरज उजियारा॥
शब्द अशब्द अलख लख लीला, समझे बिरला ज्ञानी॥
सुरत शब्द का साधन करके, पावे पद निरवानी ॥
नीचे से ऊँचे चढ़ जावे, ब्रह्मरेन्द्र की चोटी॥
दुर्मति खोवे कुमति न आवे, तजे भावना खोटी॥
राधास्वामी परम दयाला, शब्द भेद मत गाया॥
अधिकारी जब मिले विवेकी, धुरपद ले पहुँचाया॥
Hindi
[६६-६६४ ] तन मन प्रान स्वामी के अरपन, स्वामी रंग रंग राता॥सब को भूलूँ उसे न भूलू , फिरूं जगत मद माता ॥आँखों में गुरु मूरति बसती, चित चिंता सतगुरु की॥मन में गुरु हैं तन में गुरु हैं, यह निष्ठा है धुर की ॥जिभ्या नाम गुरु का रहता, कानों में गुरु बानी॥सुरत शब्द का साधन करके, पाया पद निरवानी ॥सोये बेठे खड़े उताने, चलते और ठहराये॥सकल दसा में एक अवस्था, प्रेमी एक ठिकाने ॥राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, भेद पाय हरपाना॥मैं तो सब विधि गुरु का सेवक, सेवक भाव सियाना॥ [ ६७-६६५ ] सत गुरु का सच्चा जो सेवक, ज्ञानी चतुर सियाना॥तन मन से गुरु आज्ञा पाले, प्रेम भाव दीवाना ॥बुद्धि युक्ति से काम न राखे, छोड़े मान बढ़ाई॥जो कोई ऐसा परम सनेही, करे अटल सेवकाई
[६६-६६४ ] तन मन प्रान स्वामी के अरपन, स्वामी रंग रंग राता॥
सब को भूलूँ उसे न भूलू , फिरूं जगत मद माता ॥
आँखों में गुरु मूरति बसती, चित चिंता सतगुरु की॥
मन में गुरु हैं तन में गुरु हैं, यह निष्ठा है धुर की ॥
जिभ्या नाम गुरु का रहता, कानों में गुरु बानी॥
सुरत शब्द का साधन करके, पाया पद निरवानी ॥
सोये बेठे खड़े उताने, चलते और ठहराये॥
सकल दसा में एक अवस्था, प्रेमी एक ठिकाने ॥
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, भेद पाय हरपाना॥
मैं तो सब विधि गुरु का सेवक, सेवक भाव सियाना॥
[ ६७-६६५ ] सत गुरु का सच्चा जो सेवक, ज्ञानी चतुर सियाना॥
तन मन से गुरु आज्ञा पाले, प्रेम भाव दीवाना ॥
बुद्धि युक्ति से काम न राखे, छोड़े मान बढ़ाई॥
जो कोई ऐसा परम सनेही, करे अटल सेवकाई ।॥
करना धरना कुछ नहीं उसमें, गुरु मत में परवीना॥
कमल पत्र सम उसकी रहनी, गुरु के चरन अधीना ।॥
गुरु का हुकम सीस पर धारे, गुरु आज्ञा में चाले॥
त्यागे मोह वासना जीकी, प्रेम प्रीति पथ पाले ॥
मन में सुमिरे राधास्वामी नामा, तन से राधास्वामी कामा॥
मन बचन ध्यान से गुरु का, सतपद में विश्रामा॥
Hindi
[६८-६६६ ] उमर बिताई समय गवाया, मिला न ठौर ठिकाना॥प्रेम भक्ति की रीति न जानी, जग धन्धे भरमाना॥दो दिन का रहना है भाई, दो दिन का ब्यौहारा॥दो दिन का यह सकल पसारा, दो दिन कुल परिवारा
[६८-६६६ ] उमर बिताई समय गवाया, मिला न ठौर ठिकाना॥
प्रेम भक्ति की रीति न जानी, जग धन्धे भरमाना॥
दो दिन का रहना है भाई, दो दिन का ब्यौहारा॥
दो दिन का यह सकल पसारा, दो दिन कुल परिवारा।॥
जो आये हैं जायेंगे एक दिन, कैसा घर और डेरा॥
मूरख सोच समझ मन अपने, चिड़िया रैन बसेरा ॥
रात विषय में लम्पट रहता, दिन का खाना पीना॥
ऐसे प्राणी पशु हैं जग में, धिक धिक उनका जीना ॥
सतगुरु राधास्वामी पाये, सार भेद समझाया॥
अब नहीं पहुं, करम के धन्दे, भक्ति स्वाद रस पाया॥
Hindi
[६६-६६७ ] सेवक मेरा मैं सेवक का, आदि अन्त तिहु काला॥मैं सेवक से अपने राजी, सेवक करूं निहाला ॥दास दुखी तो मुझे भी दुख है, दुखी दास हुआ कैसा॥एक पलक में प्रगट होय कर, करदू अपने जैसा
[६६-६६७ ] सेवक मेरा मैं सेवक का, आदि अन्त तिहु काला॥
मैं सेवक से अपने राजी, सेवक करूं निहाला ॥
दास दुखी तो मुझे भी दुख है, दुखी दास हुआ कैसा॥
एक पलक में प्रगट होय कर, करदू अपने जैसा ।॥
माता का बालक है प्यारा, मछली को जल धारा॥
से ही सेवक मेरा दुलारा, और आँखों का तारा ॥
सेवक स्वामी एक मता के, प्रेम रंग रंग राते॥
छल चतुराई मुझे न भावे, प्रेम के दोऊ दिवाने॥
राधास्वामी समरथ दाता, मैं सेवक बिन दामा॥
उठत बैठत कभी न भूलू, जिभ्या रहे गुरुनामा॥
Hindi
[ ७०-६६८ ] आप तरें औरों को तारें, यह साधु की महिमा॥इनका पर उपकार है भारी, किससे कोई दे उपमा
[ ७०-६६८ ] आप तरें औरों को तारें, यह साधु की महिमा॥
इनका पर उपकार है भारी, किससे कोई दे उपमा ।॥
कोई बाहर कोई भीतर देखे, लीला अगम अनूपा॥
बाहर भीतर एक समाना, एक विचित्र स्वरूपा ॥
राधा सूरत शब्द कन्हाई, दोनों का भया मेला॥
बंसी बाजी जब मधुवन में, मेटा द्वन्द झमेला ॥
ब्रह्म सनातन रूप कृष्ण का, समझे कोई नर ज्ञानी॥
भवर गुफा चढ़ सुने बाँसुरी, परखे शब्द निशानी ॥
राह रुकाना गुरु से पूछो, आगे अगम अगोचर॥
राधासामी चरन शरन बलिहारी, सत पद पहुँचो धुर धर ।॥
Hindi
[७१-669] मन को सोच बुद्धि को दृढ़ कर, चित से ध्यान लगाओ॥ममता गुरु के चरन में राखो, बिगड़ी अपनी बनाओ॥आप तरो औरों को तारो, यह गुरु का उपदेशा॥चिंता जग की सकल विसारो, तन दो द्वन्द अंदेसा
[७१-669] मन को सोच बुद्धि को दृढ़ कर, चित से ध्यान लगाओ॥
ममता गुरु के चरन में राखो, बिगड़ी अपनी बनाओ॥
आप तरो औरों को तारो, यह गुरु का उपदेशा॥
चिंता जग की सकल विसारो, तन दो द्वन्द अंदेसा ।॥
जो कोई ऐसा सेवक साँचा, भजन भाव की शोभा॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देख भक्ति मन मोहा॥
Hindi
[ ७२-६७० ] गुरु के नाते सब का नाता, नाता और न मानू॥मेरा प्रीतम जिसे पियारा, प्यारा उसको जानू ॥गुरु हैं मात पिता सम्बन्धी, गुरु साथी संघातो॥गुरु के चरन का ध्यान लगाऊँ, मैं पल पल दिन राती॥राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊँ॥राधास्वामी नाम का सुमिरन, सुमिरू और सुमिराऊँ ॥का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
[ ७२-६७० ] गुरु के नाते सब का नाता, नाता और न मानू॥
मेरा प्रीतम जिसे पियारा, प्यारा उसको जानू ॥
गुरु हैं मात पिता सम्बन्धी, गुरु साथी संघातो॥
गुरु के चरन का ध्यान लगाऊँ, मैं पल पल दिन राती॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊँ॥
राधास्वामी नाम का सुमिरन, सुमिरू और सुमिराऊँ ॥
का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥
माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥
अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥
राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
Hindi
[७३-६७१ ] गुरु ने हाथ सीस पर फेरा, और मुझको अपनाया॥पहले जनम का रंग मिटाकर, भक्ति का रंग चढ़ाया ॥काल करम का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
[७३-६७१ ] गुरु ने हाथ सीस पर फेरा, और मुझको अपनाया॥
पहले जनम का रंग मिटाकर, भक्ति का रंग चढ़ाया ॥
काल करम का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥
माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥
अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥
राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
Hindi
[७४-६७२ ] साधू मुझको सब से प्यारे, साधू मेरे सनेही॥साधु चरन पर तन मन वारू, सुफल करू नर देही॥साधू कुल में जनम मिला है, साधू मेरे भाई॥गुरु की दया साधु की संगत, मेरी भई भलाई ॥साधु गुरु के रूप हैं मेरे, महिमा अधिक अपारी॥साधु सेवे आनन्द पाया, राधास्वामी की बलिहारी ॥
[७४-६७२ ] साधू मुझको सब से प्यारे, साधू मेरे सनेही॥
साधु चरन पर तन मन वारू, सुफल करू नर देही॥
साधू कुल में जनम मिला है, साधू मेरे भाई॥
गुरु की दया साधु की संगत, मेरी भई भलाई ॥
साधु गुरु के रूप हैं मेरे, महिमा अधिक अपारी॥
साधु सेवे आनन्द पाया, राधास्वामी की बलिहारी ॥
Hindi
[७५-६७३ ] जिसने अपना जगत रचाया, वह है चतुर सियाना॥तू बनता है करता धरता, क्यों मूरख दीवाना॥सेवक है तो सेवा कर, और तज दे भरम कहानी॥दुनियाँ को विश्वास नहीं है, दुनियाँ है दीवानी
[७५-६७३ ] जिसने अपना जगत रचाया, वह है चतुर सियाना॥
तू बनता है करता धरता, क्यों मूरख दीवाना॥
सेवक है तो सेवा कर, और तज दे भरम कहानी॥
दुनियाँ को विश्वास नहीं है, दुनियाँ है दीवानी ।॥
गर्भवास में जिसने पाला, माँ की गोद मैं डाला॥
वही तेरा रक्षक है प्राणी, उससे होगा संभाला ॥
सेवक करे रात दिन सेवा, स्वामीपन नहीं धारे॥
सेवक तो सेवा का भूखा, स्वामी ओर निहारे ।॥
मेरा मुझमें नहीं है कुछ भी, जो कुछ है सो तेरा॥
सेवा ले मुझसे कर मुझको, राधास्वामी का चेरा ॥
Hindi
[७६-६७४ ] मेरा साँई है बहुरंगी, अद्भुत नाच नचावे॥नाच खेल के सैन जतावे, भक्ति पन्थ दृढ़ावे ॥उसके घर में कमी नहीं है, पूरन है भण्डारी॥उसे समझकर काम करो तब, समझो सत मत सारा ॥बुन्द के पीछे सिंधु छुपा है, यह सब कोई जाने॥बुन्द के साथ है सिंधु की शक्ति, बिरला ही पहचाने॥विष्णु के पद में गंग की सोती, शिव की जटा में आई॥देखो जग में फैली फिरती, गंगा है लहराई ॥धर विश्वास त्याग जग आसा, गुरु चरन चित लाओ॥राधास्वामी को किरपा ले, दो दो और दिलाओ ॥
[७६-६७४ ] मेरा साँई है बहुरंगी, अद्भुत नाच नचावे॥
नाच खेल के सैन जतावे, भक्ति पन्थ दृढ़ावे ॥
उसके घर में कमी नहीं है, पूरन है भण्डारी॥
उसे समझकर काम करो तब, समझो सत मत सारा ॥
बुन्द के पीछे सिंधु छुपा है, यह सब कोई जाने॥
बुन्द के साथ है सिंधु की शक्ति, बिरला ही पहचाने॥
विष्णु के पद में गंग की सोती, शिव की जटा में आई॥
देखो जग में फैली फिरती, गंगा है लहराई ॥
धर विश्वास त्याग जग आसा, गुरु चरन चित लाओ॥
राधास्वामी को किरपा ले, दो दो और दिलाओ ॥
Hindi
[७७-६७५ ] मैं सेवक का सेवक मेरा, भेद भाव नहीं कोई॥प्रेम प्रीति की महिमा भारी, सेवक प्यारा होई
[७७-६७५ ] मैं सेवक का सेवक मेरा, भेद भाव नहीं कोई॥
प्रेम प्रीति की महिमा भारी, सेवक प्यारा होई ।॥
जात पाँत पारखण्ड पसारा, एक भक्ति का नाता॥
जो कोई मुझको मन से चाहे, मैं उसके रंग राता॥
नाता प्रेम का सब से उत्तम, यही सार है भाई॥
प्रेम भक्ति की लीला अद्भुत, भक्ति है सुखदाई ।॥
बड़े बने सो नीचे आये, नीचा ऊँचे आया॥
पाँव की धूल गगन में पहुँची, जल पताल पहुंचाया॥
ऊँचा है सो प्यासा जावे, नीचा जल को पीवे॥
राधास्वामी मेहर करें जब, प्यारा जुग जुग जीवे ॥
Hindi
[ ७८-६७६ ] तुम सेवक कसे हो भाई, सेवा चित नहीं लाते॥बिन सेवा उद्धार कहाँ है, क्यों नहिं भक्ति कमाते ॥अपनी सी तुम करनी करलो, सतगुरु जानें अपनी॥अपने धरम करम का पालो, धारो ऐसी रहनी ॥हर्प शोक व्यापे नहीं मन में, ममता मोह न आवे॥हित से सेवा भाव में लागो, तुम्हें न काल सतावे ॥करम करो करतापन त्यागो, यह सेवक की रहनी॥कथनी बदनी काम न आवे, काम की वस्तु है करनी ॥सेवक धर्म कठिन अति दुस्तर, चित बानी सब सोधो॥राधास्वामी नाम को सुमिरो, निज मन को परबोधो॥
[ ७८-६७६ ] तुम सेवक कसे हो भाई, सेवा चित नहीं लाते॥
बिन सेवा उद्धार कहाँ है, क्यों नहिं भक्ति कमाते ॥
अपनी सी तुम करनी करलो, सतगुरु जानें अपनी॥
अपने धरम करम का पालो, धारो ऐसी रहनी ॥
हर्प शोक व्यापे नहीं मन में, ममता मोह न आवे॥
हित से सेवा भाव में लागो, तुम्हें न काल सतावे ॥
करम करो करतापन त्यागो, यह सेवक की रहनी॥
कथनी बदनी काम न आवे, काम की वस्तु है करनी ॥
सेवक धर्म कठिन अति दुस्तर, चित बानी सब सोधो॥
राधास्वामी नाम को सुमिरो, निज मन को परबोधो॥
Hindi
[ ७६-६७७ ] जिनको चाह राम की साधू, राम उन्हें मिल जाते हैं॥राम दास के पास राम है, और नहीं कोई पाते हैं॥बाद विवाद में राम नहीं है, राम न पूछा पेखी में॥राम दास ने राम को पाया, सहज ही देखा देखी में॥गम नहीं तीरथ में रहते, राम बरत के साथ नहीं॥राम दास के हाथ राम है, औरों के वह हाथ नहीं॥बुन्द में सिंधु सिंधु में बूदें, बुन्द सिंधु दोऊ एक हुये॥बुन्द सिंधु का झगड़ा मन में, उनके लिये अनेक हुये ॥राधास्वामी सतगुरु आये, भेद दिया पूरा पूरा॥जो कोई भेद भाव को मेटे, सतगुरु का सेवक सूरा ॥
[ ७६-६७७ ] जिनको चाह राम की साधू, राम उन्हें मिल जाते हैं॥
राम दास के पास राम है, और नहीं कोई पाते हैं॥
बाद विवाद में राम नहीं है, राम न पूछा पेखी में॥
राम दास ने राम को पाया, सहज ही देखा देखी में॥
गम नहीं तीरथ में रहते, राम बरत के साथ नहीं॥
राम दास के हाथ राम है, औरों के वह हाथ नहीं॥
बुन्द में सिंधु सिंधु में बूदें, बुन्द सिंधु दोऊ एक हुये॥
बुन्द सिंधु का झगड़ा मन में, उनके लिये अनेक हुये ॥
राधास्वामी सतगुरु आये, भेद दिया पूरा पूरा॥
जो कोई भेद भाव को मेटे, सतगुरु का सेवक सूरा ॥
Hindi
[ ८०-६७८ ] माया ब्रह्म का भेद है न्यारा, भेद वाद है भरम कथा॥जो कोई उनका रूप पिछाने, भेद वाद है धरम कथा ॥बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं होती, ज्ञान गुरु के आधारा॥गुरु की संगत करे जो प्रानी, पावे सार भेद सारा ॥दृष्टि सृष्टि का सकल पसारा, जैसी दृष्टि वसी सृष्टि॥भक्ति की दृष्टि जब आई, ईश्वर मय होगई सृष्टि ॥गुन का ग्राहक कोई कोई होगा, अवगुण के ग्राहक हैं सब॥गुणी मिले तो गुण बतलावे, अगुन सगुन समझे नर तब ॥राधास्वामी परम दयाला, शब्द नाव लेकर आये॥हाथ पकड़ कर सबहि बिठाया, तट के निकट खींच लाये॥
[ ८०-६७८ ] माया ब्रह्म का भेद है न्यारा, भेद वाद है भरम कथा॥
जो कोई उनका रूप पिछाने, भेद वाद है धरम कथा ॥
बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं होती, ज्ञान गुरु के आधारा॥
गुरु की संगत करे जो प्रानी, पावे सार भेद सारा ॥
दृष्टि सृष्टि का सकल पसारा, जैसी दृष्टि वसी सृष्टि॥
भक्ति की दृष्टि जब आई, ईश्वर मय होगई सृष्टि ॥
गुन का ग्राहक कोई कोई होगा, अवगुण के ग्राहक हैं सब॥
गुणी मिले तो गुण बतलावे, अगुन सगुन समझे नर तब ॥
राधास्वामी परम दयाला, शब्द नाव लेकर आये॥
हाथ पकड़ कर सबहि बिठाया, तट के निकट खींच लाये॥
Hindi
[८१-679] सेवक की सेवा बस होकर, स्वामी सेवक आप हुआ॥उसका बोझ धरा सिर अपने, कारज सब चुपचाप हुआ॥प्रेम भक्ति में सच्चा होजा, त्याग बुद्धि छल चतुराई॥सहज ही मानुष जनम सुफल हो, छूटे जग अगमापाई ॥ज्ञान पन्थ है खड्ग की धारा, कट कट गिरा जो पग धारा॥भक्ति प्रेम में नहीं कठिनाई, सहज ही जा भव जल पारा॥भक्त को माया नहीं सताती, भक्त गुरु के हैं प्यारे॥ज्ञानी नेमी करमी धरमी, भक्तिभाव से हैं न्यारे ॥राधास्वामी नाम सुमिर नित, राधास्वामी गुन गाले॥शुभ अवसर पाया है साधु, भक्ति रतन धन को पाले॥
[८१-679] सेवक की सेवा बस होकर, स्वामी सेवक आप हुआ॥
उसका बोझ धरा सिर अपने, कारज सब चुपचाप हुआ॥
प्रेम भक्ति में सच्चा होजा, त्याग बुद्धि छल चतुराई॥
सहज ही मानुष जनम सुफल हो, छूटे जग अगमापाई ॥
ज्ञान पन्थ है खड्ग की धारा, कट कट गिरा जो पग धारा॥
भक्ति प्रेम में नहीं कठिनाई, सहज ही जा भव जल पारा॥
भक्त को माया नहीं सताती, भक्त गुरु के हैं प्यारे॥
ज्ञानी नेमी करमी धरमी, भक्तिभाव से हैं न्यारे ॥
राधास्वामी नाम सुमिर नित, राधास्वामी गुन गाले॥
शुभ अवसर पाया है साधु, भक्ति रतन धन को पाले॥
Hindi
[८२-६८० ] साधु की संगत गुरु की सेवा, राधास्वामी दीजे॥इसके सिवा और नहीं माँगू, चरन शरन में लीजे ॥साधु संग गंगाजल निर्मल, न्हाये पाप कटावे॥जो कोई साधु की संगत आवे, भक्ति पदारथ पावे ॥गंधी की दुकान साधु संग, पिन माँगे शुभ बासा॥जो चाहो तुम मुक्ति भक्ति को, रहो साध के साथा ॥पाप हरें दुख दारुण मेटें, सुख देवें दिन माँगे॥साहब का दीदार करावे, सहज ही भव निधि लाँघे ॥राधास्वामी साध संग दो, और नहीं अभिलासा॥चरन कमल की छांह रहूँ नित, बनू साध का दासा
[८२-६८० ] साधु की संगत गुरु की सेवा, राधास्वामी दीजे॥
इसके सिवा और नहीं माँगू, चरन शरन में लीजे ॥
साधु संग गंगाजल निर्मल, न्हाये पाप कटावे॥
जो कोई साधु की संगत आवे, भक्ति पदारथ पावे ॥
गंधी की दुकान साधु संग, पिन माँगे शुभ बासा॥
जो चाहो तुम मुक्ति भक्ति को, रहो साध के साथा ॥
पाप हरें दुख दारुण मेटें, सुख देवें दिन माँगे॥
साहब का दीदार करावे, सहज ही भव निधि लाँघे ॥
राधास्वामी साध संग दो, और नहीं अभिलासा॥
चरन कमल की छांह रहूँ नित, बनू साध का दासा ।॥
Hindi
[८३-६८१ ] साध मेरे हैं रूप अनूपम, अद्भुत अधिक सुहाने॥मैं हूँ उनका रूप दिवाना, वह मेरे दीवाने ॥भक्त और भगवंत में किंचित, भेद भाव नहीं होता॥भक्तों को तुम धार समझलो, भगवत गंग का सोता
[८३-६८१ ] साध मेरे हैं रूप अनूपम, अद्भुत अधिक सुहाने॥
मैं हूँ उनका रूप दिवाना, वह मेरे दीवाने ॥
भक्त और भगवंत में किंचित, भेद भाव नहीं होता॥
भक्तों को तुम धार समझलो, भगवत गंग का सोता।॥
स्वामी सूरज सेवक किरण, करते दिव्य प्रकासा॥
बुन्द सिंधु में रहे समाया, लहे आनन्द हुलासा ।॥
स्वामी गुप्त दास है प्रगट, यह सब कोई जाने॥
दास गुप्त बिन प्रगटे स्वामी, यह सब कोई जाने॥
प्रेमी प्रीतम प्रेम नगर में, पल पल करें विहारा॥
राधास्वामी भेद बतायें, सार सार का सारा ।॥
Hindi
[८४-६८२ ] प्रेम की लीला अद्भुत न्यारी, प्रेम की अकथ कहानी॥प्रेम दात का दान मिले गुरु, भक्ति करू मनमानी
[८४-६८२ ] प्रेम की लीला अद्भुत न्यारी, प्रेम की अकथ कहानी॥
प्रेम दात का दान मिले गुरु, भक्ति करू मनमानी ।॥
मान न दो सम्मान न दो, धन दौलत नहीं देना॥
भक्ति रतन धन का अधिकारी, नाम तुम्हारा लेना ॥
तन मन धन सब तुम पर वारू, साँस प्रान के संगा॥
मनमोहन छबि रहे दृष्टि में, चित हो कभी न भंगा॥
मुक्ति ज्ञान की चाह नहीं है, एक तुम्हारी आसा॥
सेवक करलो दास बनालो, पूरन प्रेम विलासा ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊँ॥
राधास्वामी चित्त बसाऊ, गुन गा गा हरपाऊँ ।॥
[८५-६८३ ] जो मेरा मैं भी हूँ उसका, मानें प्रेम का नाता॥
जिनमें मेरा प्रेम नहीं है, उनके ढिंग नहीं जाता ॥
छल चतुराई काम न आवे, निश्चल बुद्धि दिलासा॥
प्रेम भाव जब घट में आवे, अन्तर होय उजासा॥
मेरा रूप नहीं है कोई, मेरे रूप हैं सारे॥
जो जिस रूप से जिसको माने, रहे उसी के सहारे॥
दर्शन दूगा उसी रूप में, उसी से पार लगाऊ॥
काल करम का दुख नहीं व्यापे, सहज ही बन्ध कटाऊ॥
राधास्वामी मुझे चिताया, करूं साध की सेवा॥
साध रूप का दर्शन निस दिन, साध हैं सच्चे देवा ।॥
Hindi
[८६-६८४ ] साध हमारी आत्मा, साध को कोई न सताये॥जो कल्पाये साध को, जग में कल नहीं पाये ॥साध विकल तो सब विकल, साध सुखी सब सुख॥साध राम की आत्मा, साध को समझो मुख्य ॥निर्बल दीन की आह को, कैसे ईश सहे॥साँस खाल की देख लो, लोहा भस्म करे॥राधास्वामी सत पुरुष, सतगुरु सत करतार॥तुम ही दीनानाथ हो, तुम ही दीन दयार ॥
[८६-६८४ ] साध हमारी आत्मा, साध को कोई न सताये॥
जो कल्पाये साध को, जग में कल नहीं पाये ॥
साध विकल तो सब विकल, साध सुखी सब सुख॥
साध राम की आत्मा, साध को समझो मुख्य ॥
निर्बल दीन की आह को, कैसे ईश सहे॥
साँस खाल की देख लो, लोहा भस्म करे॥
राधास्वामी सत पुरुष, सतगुरु सत करतार॥
तुम ही दीनानाथ हो, तुम ही दीन दयार ॥
Hindi
[८७-६८५ ] जात न जानू पाँत न जानू, मानू भेद न कोई॥जो कोई मेरी भक्ति कमावे, मुझको प्यारा सोई
[८७-६८५ ] जात न जानू पाँत न जानू, मानू भेद न कोई॥
जो कोई मेरी भक्ति कमावे, मुझको प्यारा सोई ।॥
जात न पूछो मेरे भक्त की, उसकी जात निराली है
यह सब फूल बाग के मेरे, मैं उनका हूँ माली॥
फल मुझे प्यारे बहु लागें, सिर पर. फल चढ़ाओ॥
जात पाँत की दुर्मति मेटो, साधु के गुन गाओ॥
पूछो ज्ञान न पूछो जाती, जात भरम की खानी॥
लो तलवार म्यान नहीं देखो, साध को लो पहचानी ॥
यह सब ही पाखन्ड पसारा, भक्ति महातम जानो॥
राधास्वामी चरन कमल पर, आपा अपनी डारो ।।
Hindi
[८८-६८६ ] सुना पढ़ा समझा समझाया, ज्ञान हाथ नहीं आया॥जब सतगुरु ने आन चिताया, सहज ही वह धन पाया
[८८-६८६ ] सुना पढ़ा समझा समझाया, ज्ञान हाथ नहीं आया॥
जब सतगुरु ने आन चिताया, सहज ही वह धन पाया ।॥
कथनी कथे सो दूर है हमसे, करनी करे तो साथी॥
रहनी रहे सो गुरु हमारा, रहनी हमको भाती॥
गुरु की खोज करो सतसंगत, फिर करनी चित लाओ॥
करनी का फल उदय हुये जब, रहनी जाये समाओ॥
सत संगत में श्रवन मनन है, अनुभव में है रहनी॥
यह निध्यासन समझो प्यारे, त्यागो मुख की कहनी ।॥
कहनी तो है भर्म कहानी, भर्म की समझो खानी॥
राधास्वामी भेद बतावें, करनी है सुखदानी ॥
Hindi
[८६-६८७ ] बिन गुरु ज्ञान न उपजे साधु, लो गुरु की शरनाई॥बानी सुन सुन मन में धारो, मिटे भरम दुचिताई ॥गुरु हुये रूप धरा मानुष का, नर हुये जीव चिताया॥जो कोई उनके शरन में आया, ताको अंग लगाया
[८६-६८७ ] बिन गुरु ज्ञान न उपजे साधु, लो गुरु की शरनाई॥
बानी सुन सुन मन में धारो, मिटे भरम दुचिताई ॥
गुरु हुये रूप धरा मानुष का, नर हुये जीव चिताया॥
जो कोई उनके शरन में आया, ताको अंग लगाया ।॥
गुरु चरित्र को देखो समझो, सुनो गुरु की बानी॥
बानी सुन सुन मन में धारो, मेटो द्वन्द गिलानी ॥
कैसे कहूँ खोलकर यह मैं, नहीं बैन कोई बुझे॥
जब सत संगत आवे प्रानी, तत्व सार तब सूझे ॥
धन्य धन्य गुरु की लीला अद्भुत, धन्य धन्य उपदेसा॥
राधास्वामी मेहर से मेंटा, कष्ट कलेश अन्देसा ।॥
Hindi
[६०-६८८] महिमा अगम अपार अलौकिक, जो गावे सो जाने॥करे कीर्तन ध्यान लगावे, मुक्ति पदारथ पावे ॥सुरत शब्द है सबका टीका, योग सहज सुखदाई॥गुरु से सीख करे कोई साधन, चित आनन्द रस पाई
[६०-६८८] महिमा अगम अपार अलौकिक, जो गावे सो जाने॥
करे कीर्तन ध्यान लगावे, मुक्ति पदारथ पावे ॥
सुरत शब्द है सबका टीका, योग सहज सुखदाई॥
गुरु से सीख करे कोई साधन, चित आनन्द रस पाई ।॥
गो इन्द्री और कर्ण है गोले, शब्द प्रभाव खुलावे॥
ग्रन्थी काटे जड़ चेतन की, परम धाम को धावे ।॥
बन्शी वाला कृष्ण मुरारी, राधा सुरत सिंयानी॥
शब्द सुरत की करे कमाई, सहज सहज हो ज्ञानी ।॥
सात दिनों में सात स्थाना, गगन मंडल को फोड़े॥
सुन्न के बाहर गुफा कोट को, सुन मुरली धुन तोड़े॥
सात सुरों का भेद पिछाने, सरगम की गति जाने॥
सातों तारा मंडल बेधे, सात निरख मन माने ।॥
सात दिना की सात कमाई, जो कोई करे सियाना॥
राधास्वामी की कृपा से, पाचे पद निरवाना ॥
Hindi
[६१-689 ] धारो टेक गुरु की मन में, और टेक सब छोड़ो॥जग दारुण से मुंह को मोड़ो, गुरु से नाता जोड़ो॥गुरु का लिया सहारा जिसने, अपना काम बनाया॥अपने साथ और को तारा, यम का फन्द कटाया
[६१-689 ] धारो टेक गुरु की मन में, और टेक सब छोड़ो॥
जग दारुण से मुंह को मोड़ो, गुरु से नाता जोड़ो॥
गुरु का लिया सहारा जिसने, अपना काम बनाया॥
अपने साथ और को तारा, यम का फन्द कटाया ।॥
बने तो गुरु से बने तुम्हारी, किसी की ओर न आसा॥
राधास्वामी दया करे जब, क्यों दुख पावे दासा ।॥
Hindi
690 तन मन धन कुल सम्पत त्यागू, गरु के पद नहीं छोड़॥एक गुरु से नेह लगाकर, जग का नाता तोडू॥गुरु समरथ जब अंग लगावें, गहें बाँह निज करसे॥तब मेरे मन में ढारस आवे, चरन कमल रज परसे
690 तन मन धन कुल सम्पत त्यागू, गरु के पद नहीं छोड़॥
एक गुरु से नेह लगाकर, जग का नाता तोडू॥
गुरु समरथ जब अंग लगावें, गहें बाँह निज करसे॥
तब मेरे मन में ढारस आवे, चरन कमल रज परसे ।॥
जीते जी गुरु नाम जपू नित, प्रान तजे सोई भाखू॥
जनम मरन का संशय छूटे, चित गुरु मूरति राखू ॥
यही करनी है यही साधन है, यही योग जप ज्ञाना॥
यही नेम संयम शम दम है, यही तप यही सत ज्ञाना ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊ॥
राधास्वामी उर में धारूँ, जिभ्या नाम सुनाऊँ ॥
Hindi
[६३-691 ] सत्य नाम का दान दिया है, गुरु को क्या मैं भेंट धरूँ॥तन मन धन सब तुच्छ है दाता, अर्पन क्या फिर वस्तु करूँ॥आपा मेरा सब से प्यारा, आपे को चरनन में लो॥आपा गया गया फिर सब कुछ, हुआ तुम्हारा आपा खो ॥राधास्वामी लगन लगी है, जित देखू हो रूप तेरा॥मैं तेरा तू हो गया मेरा, मैं परजा तू भूप मेरा ॥
[६३-691 ] सत्य नाम का दान दिया है, गुरु को क्या मैं भेंट धरूँ॥
तन मन धन सब तुच्छ है दाता, अर्पन क्या फिर वस्तु करूँ॥
आपा मेरा सब से प्यारा, आपे को चरनन में लो॥
आपा गया गया फिर सब कुछ, हुआ तुम्हारा आपा खो ॥
राधास्वामी लगन लगी है, जित देखू हो रूप तेरा॥
मैं तेरा तू हो गया मेरा, मैं परजा तू भूप मेरा ॥
Hindi
[६४-692 ] लिखू कलम से तेरी लीला, जिभ्या नाम तेरा गाऊँ॥चित से तेरा चिंतन सतगुरु, मनमें ध्यान तेरा लाऊँ ॥अहंकार चित मन और बुद्धि, चारों भेट धरू स्वामी॥जो मैं तेरा सच्चा सेवक, ले इनको अन्तरयामी ॥राधास्वामी चरन कमल की, छाँह बसू मैं सहित उमंग॥त्यागू जग के रंग रूप सब, चढ़े सवाया गुरु का रंग॥
[६४-692 ] लिखू कलम से तेरी लीला, जिभ्या नाम तेरा गाऊँ॥
चित से तेरा चिंतन सतगुरु, मनमें ध्यान तेरा लाऊँ ॥
अहंकार चित मन और बुद्धि, चारों भेट धरू स्वामी॥
जो मैं तेरा सच्चा सेवक, ले इनको अन्तरयामी ॥
राधास्वामी चरन कमल की, छाँह बसू मैं सहित उमंग॥
त्यागू जग के रंग रूप सब, चढ़े सवाया गुरु का रंग॥
Hindi
[६५-693 ] ब्रह्मरेन्द्र के पार जो पहुँचे, सो सुमेर गिरि जावे॥हंस रूप की गति मति धारे, सत्य नाम धुन गावे ॥धाम सुमेर विचित्र महाना, हंसन का स्थाना॥जो प्रकाश सुनहरा देखे, अद्भुत अजब सुहाना ॥व्यापे काल न कर्म न माया; निज स्वरूप को समझे॥राधास्वामी की बलिहारी, द्वन्द जाल नहीं उरझे
[६५-693 ] ब्रह्मरेन्द्र के पार जो पहुँचे, सो सुमेर गिरि जावे॥
हंस रूप की गति मति धारे, सत्य नाम धुन गावे ॥
धाम सुमेर विचित्र महाना, हंसन का स्थाना॥
जो प्रकाश सुनहरा देखे, अद्भुत अजब सुहाना ॥
व्यापे काल न कर्म न माया; निज स्वरूप को समझे॥
राधास्वामी की बलिहारी, द्वन्द जाल नहीं उरझे ।॥
Hindi
[६६-694 ] सत में सत्ता चित में चेतन, आनन्द है मुख धामा॥सत चित आनन्द एक अवस्था, समझ जपो सतनामा॥देह गेह की सुध बुध भूलो, इष्ट धाम चित्त लाओ॥आनन्द उपजे भव दुख भागे, सुगति अलौकिक पाओ॥राधास्वामी गरु हम पाये, जनम सुफल कर लीना॥राधास्वामी धामा की आसा, मन ताहि को दीन्हा
[६६-694 ] सत में सत्ता चित में चेतन, आनन्द है मुख धामा॥
सत चित आनन्द एक अवस्था, समझ जपो सतनामा॥
देह गेह की सुध बुध भूलो, इष्ट धाम चित्त लाओ॥
आनन्द उपजे भव दुख भागे, सुगति अलौकिक पाओ॥
राधास्वामी गरु हम पाये, जनम सुफल कर लीना॥
राधास्वामी धामा की आसा, मन ताहि को दीन्हा ।॥
Hindi
[६७-695 नाम रतन धन मन में रखना, मुह से कुछ न कहना॥संसारी ज्यों जीवन रहना, दुख सुख सिर पर सहना॥भक्ति मन का भाव है प्यारे, मन भक्ति रंग राता॥गुप्त प्रगट में एक दशा है, रहे प्रेम मद माता॥मुख से नाम का लेना केसा, जग को क्या दिखलाना॥दिखलावे का काम है फूकट, अन्तर ताड़ी लाना॥लव लगी रहे लगन मन व्याने, हरष शोक से न्यारा॥जो कोई ऐसी रहनी धारे, वह सतगुरु का प्यारा ॥राधास्वामी नर शरीर में, सन्त रूप धर आये॥जीव दया ले भेद
[६७-695 नाम रतन धन मन में रखना, मुह से कुछ न कहना॥
संसारी ज्यों जीवन रहना, दुख सुख सिर पर सहना॥
भक्ति मन का भाव है प्यारे, मन भक्ति रंग राता॥
गुप्त प्रगट में एक दशा है, रहे प्रेम मद माता॥
मुख से नाम का लेना केसा, जग को क्या दिखलाना॥
दिखलावे का काम है फूकट, अन्तर ताड़ी लाना॥
लव लगी रहे लगन मन व्याने, हरष शोक से न्यारा॥
जो कोई ऐसी रहनी धारे, वह सतगुरु का प्यारा ॥
राधास्वामी नर शरीर में, सन्त रूप धर आये॥
जीव दया ले भेद. बताया, सुरत शब्द मत माये ॥
Hindi
[६८-696 जिनको मेरा सहारा साधु, मैं उनका रखवारा॥एक पलक मैं उन्हें न छोड़े, दूं दुख से छुटकारा
[६८-696 जिनको मेरा सहारा साधु, मैं उनका रखवारा॥
एक पलक मैं उन्हें न छोड़े, दूं दुख से छुटकारा ।॥
मेरे भक्त मुझे हैं पारे, ज्यों आँखों के तारे॥
आँख पलक सम उनको सेऊ, भव दुख मेट्र सारे ॥
दास दुखी मेरा हो कैसा, मैं उसका रखवारा॥
मैं तो उसके साथ हूँ हरदम, मेरा जिसे सहारा ॥
Hindi
[६६-697 चादर की छाई यह जग है, मिथ्या भोग विलासा॥जो कोई उसकी आस बंधाना, सहे काल का गासा ॥चालू की दीवार बनाई, पोचा दे चिकनाई॥बही बयार पलक में बिनसी, भूली छल चतुराई
[६६-697 चादर की छाई यह जग है, मिथ्या भोग विलासा॥
जो कोई उसकी आस बंधाना, सहे काल का गासा ॥
चालू की दीवार बनाई, पोचा दे चिकनाई॥
बही बयार पलक में बिनसी, भूली छल चतुराई ।॥
दो दिन का रनवास महज सब, जग दो दिन का डेरा॥
जो आये हैं एक दिन जा, चिड़िया रैन बसेरा ।॥
रावण मरा मरा दुर्योधन, कंस मरा उत्पाती॥
राज काज मद काम न आया, छूटे घोड़ा हाथी ।॥
कर सतसंग सुफल कर दही, शुभ असर यह प्रानी॥
गधास्वामी चरन ओट गह, मेट दे आना जानी ॥
Hindi
[ १००-698 एक रूप के सकल रूप हैं, सकल रूप एक रूपा॥जो कोई यह मर्म पिछाने, पड़े न भा जल कूपा
[ १००-698 एक रूप के सकल रूप हैं, सकल रूप एक रूपा॥
जो कोई यह मर्म पिछाने, पड़े न भा जल कूपा ।॥
मैं जानू गुरु मेरे मन बसते, गुरु घट घट के बासी॥
अजर अमर अव्यक्त अनूपम, अद्भुत कौतुक रासो ।॥
सब में रमा अकेला सबसे, सब लिधि सबका संगी॥
कर गुरु भक्ति त्याग दे दुधा, मेट जगत छिन भंगी ।॥
एक अनेक है लीला उसकी, नहीं वह एक अनका॥
जिसकी जमी हुई भावना, वेसी धारे टेका ॥
गधास्वामी परम दयाला, चरन शरन मोहि दीज॥
एक अनेक का धोका मिथ्या, सेवक अपना कीजे॥
Hindi
९-699 प्रेम के नाते सबको मानूं, प्रेम का नाता सच्चा॥जग व्यौहार झूठ है सारा, जग का नाता कच्चा ॥बिदुर शूद्र प्रहलाद राक्षस, कुबजा रूप कुरूपा॥गज हाथी हनुमान नील कपि, प्रेम से मोहा भूपा
९-699 प्रेम के नाते सबको मानूं, प्रेम का नाता सच्चा॥
जग व्यौहार झूठ है सारा, जग का नाता कच्चा ॥
बिदुर शूद्र प्रहलाद राक्षस, कुबजा रूप कुरूपा॥
गज हाथी हनुमान नील कपि, प्रेम से मोहा भूपा ।॥
बाल्मीक और व्याध शुपच थे, शबरी नार अनारी॥
यह सब तेरे भक्ति हित लागे, भक्ति की बलिहारी ॥
जात न पूछे पाँत न पूछे, कुल नहीं पूछे कोई॥
जो कोई हरी को भजे भक्ति से, हरि भज हरि का होई ॥
राधास्वामी प्रेम सिखावें, प्रेम की राह दिखलावें॥
प्रेम नगर में ले पहुँचाय, सुरत शब्द मत गावे ॥
Hindi
[१०२-700 ] धन दौलत की भेट न चाहूँ, मन की भेंट चढ़ाओ॥जो कोई अपने मन को देवे, उसे मोहि बतलाओ॥धन तन दिया तो दिया नहीं कुछ, इनसे काम न मेरा॥जो मन चरन कमल में अरपे, वह सच्चा है चेरा ॥धन नहीं दो तुम तन नहीं दो तुम, निज मन चरन में लाना॥वह सबसे है प्यारा मुझको, सबसे चतुर सियाना ॥उसके मन में रहता हूँ मैं, वह मेरा स्थाना॥स्वर्ग लोक बैकुन्ठ लोक में, मेरा नहीं ठिकाना ॥राधास्वामी सतगुरु पूरे, प्रेम का पन्थ चलाया॥और यतन को मिथ्या माना, प्रेम को सार बताया ॥
[१०२-700 ] धन दौलत की भेट न चाहूँ, मन की भेंट चढ़ाओ॥
जो कोई अपने मन को देवे, उसे मोहि बतलाओ॥
धन तन दिया तो दिया नहीं कुछ, इनसे काम न मेरा॥
जो मन चरन कमल में अरपे, वह सच्चा है चेरा ॥
धन नहीं दो तुम तन नहीं दो तुम, निज मन चरन में लाना॥
वह सबसे है प्यारा मुझको, सबसे चतुर सियाना ॥
उसके मन में रहता हूँ मैं, वह मेरा स्थाना॥
स्वर्ग लोक बैकुन्ठ लोक में, मेरा नहीं ठिकाना ॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, प्रेम का पन्थ चलाया॥
और यतन को मिथ्या माना, प्रेम को सार बताया ॥
Hindi
[ १०३-७०१ ] जात पाँत और कुल व्यौहारा, भक्ति संग नहीं तुलते॥जात पाँत हरि से करे बेमुख, हरी भक्ति से मिलते ॥बाल्मीक और सदन कसाई, सैना हरी के प्यारे॥ऊँचे कुल का मद है जिनको, वह उनसे है न्यारे॥गंगा तर गई तरे रैदासा, और सुग्रीव विभीषण॥नीचे कुल में जनमे फिर भी, बने भक्ति कुल भूषण ॥हनुमान नल नील जाम्बवन्त, बानर रीछ कहाये॥भक्ति के प्रताप महातम, राम ने अंग लगाये ॥गोह भील की प्रीति निरखकर, भ्राता बन्धु बनाया॥भरी सभा में रामचन्द्र ने, उसके गुन को गाया
[ १०३-७०१ ] जात पाँत और कुल व्यौहारा, भक्ति संग नहीं तुलते॥
जात पाँत हरि से करे बेमुख, हरी भक्ति से मिलते ॥
बाल्मीक और सदन कसाई, सैना हरी के प्यारे॥
ऊँचे कुल का मद है जिनको, वह उनसे है न्यारे॥
गंगा तर गई तरे रैदासा, और सुग्रीव विभीषण॥
नीचे कुल में जनमे फिर भी, बने भक्ति कुल भूषण ॥
हनुमान नल नील जाम्बवन्त, बानर रीछ कहाये॥
भक्ति के प्रताप महातम, राम ने अंग लगाये ॥
गोह भील की प्रीति निरखकर, भ्राता बन्धु बनाया॥
भरी सभा में रामचन्द्र ने, उसके गुन को गाया ।॥
दुर्योधन घर त्याग कृष्ण प्रभु, दासी पुत्र घर आये॥
भक्ति के प्रताप महातम, साग बिदुर घर खाये ॥
ऋषी मुनी से मुंह को फेरा, गये शबरी के पासा॥
झूठे बेर राम ने खाये, राम को प्यारे दासा ।॥
उत्तम और चंडाल के घर में; एक दीपक उजियारा॥
जात न पूछे कभी पतिंगा, ज्योत है उसको प्यारा ॥
राधास्वामी सतगुरु परे, भक्ति महातम थापा॥
भक्त रूप भगवान के ठैरे, त्याग आपनो आपा ॥
Hindi
[१०४-७०२ ] योगी जी अब संभलो समझो, कुछ तो साधो योग जतन॥निष्फल आयु अपनी बिताई, किये हैं जप तप बहुत कठिन
[१०४-७०२ ] योगी जी अब संभलो समझो, कुछ तो साधो योग जतन॥
निष्फल आयु अपनी बिताई, किये हैं जप तप बहुत कठिन ।॥
कठिन नहीं है घट की कमाई, पूरा गुरु नहीं हाथ आया॥
अब आओ मेरी संगत में, शब्द का समझादू साधन॥
नास्तिक भाव भुलाओ सारे, सच्चा नियम इसको जानो॥
आस्तिकता को हिये बसाओ, गुफा बनालो अपना मन ।॥
सतसंगत में आकर बैठो, दुचिताई दुविधा तजकर॥
चंचलता को निश्चल करके, बैठो लगाकर दृढ़ आसन॥
मेरे रूप पर आँख जमाओ, रोको थामो विरती को॥
यह नहीं कभी बहकने पावे, और सुने मेरे सच्चे बचन ॥
मन नहीं बहके चित नहीं भटके, एक भाव अन्तर आवे॥
इस विधि कुछ दिन करते रहना, मेरे बचनों का श्रवण ॥
कान तुम्हारे छाज बने, कूड़े को निकाल गहो इनको॥
सुनो तो बचन को गुनो भी, कुछ तुम समझ के उनको ।॥
काँट छाँटकर सार को गहना, वस्तु असार न चितलाना॥
सार में कुछ दिन विचरती जमाओ, यही यहाँ निध्यासन ।॥
दृढ़ता आये दुविधा जाये, साक्षात दिर सत का हो॥
इस प्रकार नित माँजो आकर, संगत में मन का दरपन॥
मन का दपन शुद्ध करो, जब बिमल अमल निर्मल हो वह॥
तब अधिकार तुम्हारा जगेगा, घट में पाओगे दर्शन ।॥
यह बाहर मुस्न की है कमाई, बहर मुखी अत्र नहीं रहना॥
अन्तर मुखी हने को तुम्हें, बताऊगा में तब साधन ।॥
तीन बन्द अब लगाओ प्यारे, होंट कान और नेन बधे॥
अन्तर विधि की कगे कमाई, शब्द अभ्यास की लगे लगन ।॥
तीन का अर्थ समझलो, बिन समझे नहीं काम करो॥
इन बन्दों से बनेगा अन्तर, सुमिरन ध्यान के साथ भजन ।॥
महसकमलदल बैठक ठानो, दृष्टि साध के शब्द सुनो॥
लख विराट की लीला घट में, ज्योति निरंजन का दर्शन ।॥
त्रिकुटी पद में ओंकार, सतगुरु का रूप वरूप लखो॥
अन्तरयामी से मेल मिले, तुम में तब आये साधनपन ।॥
सुन्न महासुन्न आसन मारो, सुन्न समाधि का रस पाओ॥
दृढ़ता आये ममता जाये, हिरण्यगर्भ को करो मथन ।॥
भँवर गुफा की खिड़की खोलो, पारब्रह्म गति को निरखो॥
कुछ दिन ऐसा यतन करो, सत पद का मिलेगा तुमको धन ।॥
अब सत धाम के बासी बनो, सुखरासी बनो अविनासी बनो॥
असत भावना दूर हटे फिर, कभी सतावे नहीं तन मन ॥
इसके आगे अलख अगम है, निरबानी कहना इसको॥
यही मुख्य निरवान की सद्गति, इसी का मन में रहे कथन ॥
जब इसमें दृढ़ता आ जाये, राधास्वामी धाम है यह॥
स्थानों का भेद तुम्हें दूँगा, मैं होकर के चित्त प्रसन्न॥
सुगम सहज है शब्द का साधन, बिन गुरु हाथ न आयेगा॥
साधु की संगत गुरु की दया ले, करे सदा उसका साधन ।॥
राधास्वामी सतगुरु आये, परम सन्त का भेस बना॥
जीवों को अपनाया दया से, शब्द अशब्द का किया मथन ॥
बिनती
Hindi
[ ७०३ ] धन्य सतगुरु रूप है, और धन्य उसका ज्ञान है॥धन्य भक्ति दया लीला, धन्य ध्यान अनुमान है॥भरम के पीछे पड़े थे, भरम के थे साथ साथ॥राह में सतगुरु मिले, दीपक दिया करुना से हाथ ॥देखो कैसा है अन्धेरा, संस्कार अज्ञान का॥ज्योति में लख लो, मिटे भय लाभ का और हानि का॥घट है कच्चा ठेस से, जग के बचाकर ले चलो॥काल का माया का यम का, द्वन्द भय पग से मलो
[ ७०३ ] धन्य सतगुरु रूप है, और धन्य उसका ज्ञान है॥
धन्य भक्ति दया लीला, धन्य ध्यान अनुमान है॥
भरम के पीछे पड़े थे, भरम के थे साथ साथ॥
राह में सतगुरु मिले, दीपक दिया करुना से हाथ ॥
देखो कैसा है अन्धेरा, संस्कार अज्ञान का॥
ज्योति में लख लो, मिटे भय लाभ का और हानि का॥
घट है कच्चा ठेस से, जग के बचाकर ले चलो॥
काल का माया का यम का, द्वन्द भय पग से मलो ।॥
राधास्वामी नाम लेकर, दो पलट काया अभी॥
ध्यान से सुमिग्न भजन से, मुक्ति पाओ जीते जी ॥







Hits Today : 528
Total Hits : 1712331