×
Song 100 — Hindi
109.आये थे रोते चले, हँसते हुये संसार से ।।
क्या हमारा बिगड़ा सृष्टि, करम के व्यौहार से ॥॥
रोये क्यों इसका पता, अब हमने पाया सोच कर ।।
बिछड़े थे गुरु के चरण, सतलोक के परिवार से ॥॥
क्यों हँसे इसका भी कारन, खोल कर कहते हैं अब ।
सस गुरुपद से लगाया, प्रेम से और प्यार से ॥॥
जिसके जो आता है जी में, वह कहे हमको सदा ।
फल को क्यों हानि पहुचे, मेघ की बौछार से ।।।।
राधास्वामी की दया से, रूप की आई समझे ।
मन नहीं दबता है मुक्ति, बन्ध के अब भार से ॥॥
क्या हमारा बिगड़ा सृष्टि, करम के व्यौहार से ॥॥
रोये क्यों इसका पता, अब हमने पाया सोच कर ।।
बिछड़े थे गुरु के चरण, सतलोक के परिवार से ॥॥
क्यों हँसे इसका भी कारन, खोल कर कहते हैं अब ।
सस गुरुपद से लगाया, प्रेम से और प्यार से ॥॥
जिसके जो आता है जी में, वह कहे हमको सदा ।
फल को क्यों हानि पहुचे, मेघ की बौछार से ।।।।
राधास्वामी की दया से, रूप की आई समझे ।
मन नहीं दबता है मुक्ति, बन्ध के अब भार से ॥॥
×
Song 101 — Hindi
110- हम न आये आपसे, और आप से जाते नहीं ।
लाया जो ले जायेगा, अब दुख से घबराते नहीं ॥॥
रहते हैं निरद्वन्द हँसते, खेलते दिन रात हम ।।
होगा क्यो कल आज चिन्ता, अपने चित लाते नहीं ॥॥
सुख हमारा रूप है, सुख में कहाँ दुख को पता ।।
मिट गया अपना भरम, औरों को भरमाते नहीं ॥॥
प्रेम के मारग में आये, द्वेष दृष्टि छिन गई ।
छोड़ कर अनुराग कोई, रागनी गाते नहीं ॥॥
राधास्वामी जपते हैं बस, राधास्वामी धाम में ।
राधास्वामी नाम पाया, यम का भय खाते नहीं ॥॥
लाया जो ले जायेगा, अब दुख से घबराते नहीं ॥॥
रहते हैं निरद्वन्द हँसते, खेलते दिन रात हम ।।
होगा क्यो कल आज चिन्ता, अपने चित लाते नहीं ॥॥
सुख हमारा रूप है, सुख में कहाँ दुख को पता ।।
मिट गया अपना भरम, औरों को भरमाते नहीं ॥॥
प्रेम के मारग में आये, द्वेष दृष्टि छिन गई ।
छोड़ कर अनुराग कोई, रागनी गाते नहीं ॥॥
राधास्वामी जपते हैं बस, राधास्वामी धाम में ।
राधास्वामी नाम पाया, यम का भय खाते नहीं ॥॥
×
Song 102 — Hindi
111- सहज में तुम सहज ही, रीती से गुरु का नाम लो ।
शब्द योग सहज है सहज में, सहज सहज से काम लो ॥॥
फल पकेगा जो सहज में, होगा मीठा और मधुर ।
जिसमें खींचातान हो, भुले न उसका नाम लो ॥॥
सुरत को अपनी लगा भ्र, मध्य में लो चित को सोध ।
मन न होने पावे चंचल, उसकी बिरती थाम लो ॥॥
करके साधन सुख लगे, मिलने यह पहला लाभ है।
पीछे जीवन मुक्ति का, सुख आप आठों याम लो ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
तन के रहते तनके अन्दर, राधास्वामी धाम लो ।।।।
शब्द योग सहज है सहज में, सहज सहज से काम लो ॥॥
फल पकेगा जो सहज में, होगा मीठा और मधुर ।
जिसमें खींचातान हो, भुले न उसका नाम लो ॥॥
सुरत को अपनी लगा भ्र, मध्य में लो चित को सोध ।
मन न होने पावे चंचल, उसकी बिरती थाम लो ॥॥
करके साधन सुख लगे, मिलने यह पहला लाभ है।
पीछे जीवन मुक्ति का, सुख आप आठों याम लो ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
तन के रहते तनके अन्दर, राधास्वामी धाम लो ।।।।
×
Song 103 — Hindi
112- भाग सोया जाग उठा हैं, गुरु की किरपा होगई ।
काल का भय अब नहीं, जब उसकी रक्षा होगई ॥॥
नाम पाया भक्ति का धन, पाया मन में हूँ सुखी ।
सुख मिला संकट कटा, अब छाया माया होगई ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन, करने जो बैठा शान्त हो ।
शब्द परगट होगया, जोती की बरषा होगई ॥॥
बर मिले भक्ति का बल का, दान दो शक्ति मिले ।
मेरे सिर पर आपके, चरनों की छाया होगई ।।।।
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
इस अधम पर आपकी, अब सच्ची दाया होगई ।।।।
काल का भय अब नहीं, जब उसकी रक्षा होगई ॥॥
नाम पाया भक्ति का धन, पाया मन में हूँ सुखी ।
सुख मिला संकट कटा, अब छाया माया होगई ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन, करने जो बैठा शान्त हो ।
शब्द परगट होगया, जोती की बरषा होगई ॥॥
बर मिले भक्ति का बल का, दान दो शक्ति मिले ।
मेरे सिर पर आपके, चरनों की छाया होगई ।।।।
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
इस अधम पर आपकी, अब सच्ची दाया होगई ।।।।
×
Song 104 — Hindi
113- नाम पाया गुरु से तूने, नाम से नामी हुआ ।
काम कर निष्काम होकर, जब तू निष्कामी हुआ ।।॥
नाम जिसको मिल गया, सो देवराज सुरेन्द्र है ।।
सुख है उसको नाम ले लेकर, जो विश्रामी हुआ ॥॥
जीते जी है हर्ष आनन्द, पीछे मुक्ति शान्ती ।
उसकी महिमा क्या कहे, कोई जो सतधामी हुआ ॥॥
राधास्वामी नाम जो लेता है, तज कर काम क्रोध ।
वह कहाँ बंधुआ हो जग का, सब का वह स्वामी हुआ ।।।।
काम कर निष्काम होकर, जब तू निष्कामी हुआ ।।॥
नाम जिसको मिल गया, सो देवराज सुरेन्द्र है ।।
सुख है उसको नाम ले लेकर, जो विश्रामी हुआ ॥॥
जीते जी है हर्ष आनन्द, पीछे मुक्ति शान्ती ।
उसकी महिमा क्या कहे, कोई जो सतधामी हुआ ॥॥
राधास्वामी नाम जो लेता है, तज कर काम क्रोध ।
वह कहाँ बंधुआ हो जग का, सब का वह स्वामी हुआ ।।।।
×
Song 105 — Hindi
114- जिसने बन्धन में फंसाया, है छुड़ायेगा वही ।
जाल माया मोह के, आकर कटायेगा वही ॥॥
गर्भ में माता के जो रक्षक, बना था हर घड़ी ।
जागता जीता पुरुष, अब भी बचायेगा वही ॥॥
सोच क्यों करता है, और इस सोच से क्या लाभ है।
तेरी करनी लाभ को, कारन बनायेगा वही ॥॥
ध्यान कर सुमिरन भजन कर, मन में उसकी आस कर ।
होके परगट भीतर और बाहर चितायेगा वही ॥॥
तन में तेरे मन में तेरे, तेरे सांसों सांस है।
रह के अपना रूप भी, तुझको दिखायेगा वही ॥॥
घट में है वह पट में है, संसार के खटपट में है।
तुझको क्यों चिंता है, खटपट को मिटायेगा वही ॥॥
राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।
नाम की धुन राग अनहद में, सुनायेगा वही ॥॥
जाल माया मोह के, आकर कटायेगा वही ॥॥
गर्भ में माता के जो रक्षक, बना था हर घड़ी ।
जागता जीता पुरुष, अब भी बचायेगा वही ॥॥
सोच क्यों करता है, और इस सोच से क्या लाभ है।
तेरी करनी लाभ को, कारन बनायेगा वही ॥॥
ध्यान कर सुमिरन भजन कर, मन में उसकी आस कर ।
होके परगट भीतर और बाहर चितायेगा वही ॥॥
तन में तेरे मन में तेरे, तेरे सांसों सांस है।
रह के अपना रूप भी, तुझको दिखायेगा वही ॥॥
घट में है वह पट में है, संसार के खटपट में है।
तुझको क्यों चिंता है, खटपट को मिटायेगा वही ॥॥
राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।
नाम की धुन राग अनहद में, सुनायेगा वही ॥॥
×
Song 106 — Hindi
115- । जब गुरु रक्षक हुआ मेरा, तो भय किस बात का ।।
ध्यान क्यों करने लगी, संसार के उत्पात का ॥॥
जागती हूँ मैं तो पाती हूँ, गुरु को साथ में ।
सोई पहरेदार वह, रहता है मेरा रात का ॥॥
चलते फिरते काम करते, नाम उसका लेती हूँ।
डर नहीं अब करती हूँ, माया की यम की घात का ॥॥
एक रस जीवन है, संशय से नहीं अब काम कुछ ।
दिन हो चाहे गरमी का, जाड़े का और बरसात का ॥॥
सोने से पहले सदा, भजती हूँ राधास्वामी नाम ।
जागने पर राग सुख से, गाती हूँ परभात का ॥॥
ध्यान क्यों करने लगी, संसार के उत्पात का ॥॥
जागती हूँ मैं तो पाती हूँ, गुरु को साथ में ।
सोई पहरेदार वह, रहता है मेरा रात का ॥॥
चलते फिरते काम करते, नाम उसका लेती हूँ।
डर नहीं अब करती हूँ, माया की यम की घात का ॥॥
एक रस जीवन है, संशय से नहीं अब काम कुछ ।
दिन हो चाहे गरमी का, जाड़े का और बरसात का ॥॥
सोने से पहले सदा, भजती हूँ राधास्वामी नाम ।
जागने पर राग सुख से, गाती हूँ परभात का ॥॥
×
Song 107 — Hindi
116- मन मगन मेरा है सुख का, चैन का भागी हुआ ।
गुरु की किरपा होगई, गुरु पद का अनुरागी हुआ ॥॥
भाग क्या अपना सराहूँ, बालपन में गुरु मिले ।।
गाके स्तुति और भजन, भक्ति के मैं रागी हुआ ॥॥
राधास्वामी मैं हूँ बालक, बाल विनती सुनके अब ।।
दीजिये अपनी शरण, तब समझे बड़भागी हुआ ॥॥
गुरु की किरपा होगई, गुरु पद का अनुरागी हुआ ॥॥
भाग क्या अपना सराहूँ, बालपन में गुरु मिले ।।
गाके स्तुति और भजन, भक्ति के मैं रागी हुआ ॥॥
राधास्वामी मैं हूँ बालक, बाल विनती सुनके अब ।।
दीजिये अपनी शरण, तब समझे बड़भागी हुआ ॥॥
×
Song 108 — Hindi
117- प्रेम औषधि ईर्षा, और द्वेष मन के रोग हैं।
रोग जब हों दुख बिपत, आपत कलेस और सोग हैं ॥॥
सब हैं उसके वह है सबका, उससे न्यारा कौन है ।।
भूल में कैसे पड़े, भरमे हुये सब लोग हैं ॥॥
फूट का फल दुख है, दुख में सत का जीवन कहां ।।
संग सत का फल चखो, इस ही में सुख के भोग हैं ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।
प्रेम में सुख शान्ती, आनन्द के संजोग हैं ॥॥
रोग जब हों दुख बिपत, आपत कलेस और सोग हैं ॥॥
सब हैं उसके वह है सबका, उससे न्यारा कौन है ।।
भूल में कैसे पड़े, भरमे हुये सब लोग हैं ॥॥
फूट का फल दुख है, दुख में सत का जीवन कहां ।।
संग सत का फल चखो, इस ही में सुख के भोग हैं ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।
प्रेम में सुख शान्ती, आनन्द के संजोग हैं ॥॥
×
Song 109 — Hindi
118- प्यार कर सब से भरम की, द्वेष दृष्टि त्याग कर ।।
रूप है यह जगत तेरा, इससे तू अनुराग कर ॥॥
तू यहां है तू वहां है, लोक में परलोक में ।
किस जगह जायेगा इस, रचना से कहदे भाग कर ॥॥
‘नेति क्यों कहता है, ‘एति भाव को चित दे सदा ।।
नेति है। वैराग, ‘एति भाव से अनुराग कर ॥॥
‘नेति ‘एति’ दोनों कल्पित, इनका तू स्थान है।
त्यागना हो त्याग दोनों, मोह नींद से जाग कर ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु, के बचन सुन प्रेम से ।।
पद कमल में सिर झुका, भक्ति अटल बर मांग कर ।।।।
रूप है यह जगत तेरा, इससे तू अनुराग कर ॥॥
तू यहां है तू वहां है, लोक में परलोक में ।
किस जगह जायेगा इस, रचना से कहदे भाग कर ॥॥
‘नेति क्यों कहता है, ‘एति भाव को चित दे सदा ।।
नेति है। वैराग, ‘एति भाव से अनुराग कर ॥॥
‘नेति ‘एति’ दोनों कल्पित, इनका तू स्थान है।
त्यागना हो त्याग दोनों, मोह नींद से जाग कर ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु, के बचन सुन प्रेम से ।।
पद कमल में सिर झुका, भक्ति अटल बर मांग कर ।।।।
×
Song 110 — Hindi
119- प्रेम छाया से किया, छाया का गुन जाना नहीं ।।
तूने अपना और उसका, रूप पहचाना नहीं ॥॥
ब्रह्म में माया है शक्ति, शक्ति दुखदाई कहाँ ।
भरम से बलवान ने, बल पाके बल माना नहीं ॥॥
माया छाया एक है, दौड़ो तो दौड़े और चले ।
रुकने से रुकती है, उस से भय कभी खाना नहीं ॥॥
जान लो पहचान लो, और अपनी शक्ति मान लो ।।
जान कर पहचान कर, भ्रान्ति में चित लाना नहीं ॥॥
राधास्वामी संग कर, कुछ दिन कि तुझको ज्ञान हो ।
ज्ञान पाकर भूल के चक्कर में फिर आना नहीं ॥॥
तूने अपना और उसका, रूप पहचाना नहीं ॥॥
ब्रह्म में माया है शक्ति, शक्ति दुखदाई कहाँ ।
भरम से बलवान ने, बल पाके बल माना नहीं ॥॥
माया छाया एक है, दौड़ो तो दौड़े और चले ।
रुकने से रुकती है, उस से भय कभी खाना नहीं ॥॥
जान लो पहचान लो, और अपनी शक्ति मान लो ।।
जान कर पहचान कर, भ्रान्ति में चित लाना नहीं ॥॥
राधास्वामी संग कर, कुछ दिन कि तुझको ज्ञान हो ।
ज्ञान पाकर भूल के चक्कर में फिर आना नहीं ॥॥
×
Song 111 — Hindi
120- ब्रह्म में माया है, यह उससे अलग होती नहीं ।
चांद और सूरज से न्यारी, दोनों की जोती नहीं ॥॥
जागता है ब्रह्म तब, माया है उसकी जानती ।
भिन्न होकर ब्रह्म से, माया कभी सोती नहीं ॥॥
बल सदा बलवान में, और शक्ति शक्तिमान में ।
शिव से शक्ति न्यारी होकर, हँसती और रोती नहीं ॥॥
सत में जो सत्ता है दह, सत्ता नहीं सत से पृथक ।
सत की सत्ता साथ है, और साथ से खौती नहीं ॥॥
राधास्वामी संग में, आई समझ अब रूप की ।
भिन्न सागर से कभी, मूंगा नहीं मोती नहीं ।।।।
चांद और सूरज से न्यारी, दोनों की जोती नहीं ॥॥
जागता है ब्रह्म तब, माया है उसकी जानती ।
भिन्न होकर ब्रह्म से, माया कभी सोती नहीं ॥॥
बल सदा बलवान में, और शक्ति शक्तिमान में ।
शिव से शक्ति न्यारी होकर, हँसती और रोती नहीं ॥॥
सत में जो सत्ता है दह, सत्ता नहीं सत से पृथक ।
सत की सत्ता साथ है, और साथ से खौती नहीं ॥॥
राधास्वामी संग में, आई समझ अब रूप की ।
भिन्न सागर से कभी, मूंगा नहीं मोती नहीं ।।।।
×
Song 112 — Hindi
121.जनम नर का पाके, सत जीवन का भागी बन के रह ।।
भोग ज्ञान आनन्द को, और तू न त्यागी बन के रह ॥॥
बैल गदहा कुत्ता बंदर, बनने की इच्छा को छोड़ ।
इच्छा माया फाँस है, इसमें विरागी बन के रह ॥॥
भक्त बन हो ज्ञानी ध्यानी, और विवेकी पारखी ।
कौन कहता है तुझे, जग में अभागी बनके रह ॥॥
करके सतसंगत गुरु की, रूप अपनी जान ले ।
सच्चिदानन्दम् अखंडम् , तू न साँगी बनके रह ॥॥
राधास्वामी की दया से, तू तो है सबसे बड़ा ।
शब्द का अभ्यास कर, और शब्द रागी बनके रह ।।।।
भोग ज्ञान आनन्द को, और तू न त्यागी बन के रह ॥॥
बैल गदहा कुत्ता बंदर, बनने की इच्छा को छोड़ ।
इच्छा माया फाँस है, इसमें विरागी बन के रह ॥॥
भक्त बन हो ज्ञानी ध्यानी, और विवेकी पारखी ।
कौन कहता है तुझे, जग में अभागी बनके रह ॥॥
करके सतसंगत गुरु की, रूप अपनी जान ले ।
सच्चिदानन्दम् अखंडम् , तू न साँगी बनके रह ॥॥
राधास्वामी की दया से, तू तो है सबसे बड़ा ।
शब्द का अभ्यास कर, और शब्द रागी बनके रह ।।।।
×
Song 113 — Hindi
122.राधास्वामी आये जग में, सन्त का अवतार धार ।।
शब्द मत सिखलाके, जीवों का किया सच्चा सुधार ॥॥
दुर्मती को त्याग दो, द्वेष ईर्षा अच्छी नहीं ।
मन में हो परतीत प्रीत, और प्रेम भक्ति से हो पियार ।।।।
साम दाम और भेद से, और दंड से निकला न काम ।
प्रेम के मारग में आओ, प्रेम का करके विचार ।।।।
प्रेम में शक्ति है रहती, द्वष में है निबलता ।।
प्रेम का बल लेके अब, होजाओ भवसागर से पार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, राधास्वामी योग साध ।।
योग का संयोग हो, इसका करो निस दिन प्रचार ॥॥
शब्द मत सिखलाके, जीवों का किया सच्चा सुधार ॥॥
दुर्मती को त्याग दो, द्वेष ईर्षा अच्छी नहीं ।
मन में हो परतीत प्रीत, और प्रेम भक्ति से हो पियार ।।।।
साम दाम और भेद से, और दंड से निकला न काम ।
प्रेम के मारग में आओ, प्रेम का करके विचार ।।।।
प्रेम में शक्ति है रहती, द्वष में है निबलता ।।
प्रेम का बल लेके अब, होजाओ भवसागर से पार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, राधास्वामी योग साध ।।
योग का संयोग हो, इसका करो निस दिन प्रचार ॥॥
×
Song 114 — Hindi
123. राग अनहद को सुनो, अन्तर में अपने आनकर ।
चित की विरती रोक लो, सुमिरन भजन और ध्यान कर ॥॥
आँख कान और मुखको मू दो, यह सुगम साधन करो ।।
चढ़ चलो घट के गगन में, पुतलियों को तान कर ॥॥
गुरु से गुरु गम लेके, सत्र संगत में सीखो यह जतन ।।
काम में लग जाओ, गुरु उपदेश को सत मानकर ॥॥
बाहरी बातों को छोड़ो, अन्तरी साधन करो ।।
शब्द का लो आसरा, तुम इसकी महिमा जानकर ।।॥
राधास्वामी ने कहा, गुरु करना गुरु को जानकर ।
पानी पीना पीछे, पहले पानी लेना अन कर ।।।।
चित की विरती रोक लो, सुमिरन भजन और ध्यान कर ॥॥
आँख कान और मुखको मू दो, यह सुगम साधन करो ।।
चढ़ चलो घट के गगन में, पुतलियों को तान कर ॥॥
गुरु से गुरु गम लेके, सत्र संगत में सीखो यह जतन ।।
काम में लग जाओ, गुरु उपदेश को सत मानकर ॥॥
बाहरी बातों को छोड़ो, अन्तरी साधन करो ।।
शब्द का लो आसरा, तुम इसकी महिमा जानकर ।।॥
राधास्वामी ने कहा, गुरु करना गुरु को जानकर ।
पानी पीना पीछे, पहले पानी लेना अन कर ।।।।
×
Song 115 — Hindi
124. सब रहो मिल जुलके, मिल जुलकर करो सब काम को ।।
देखना अनबन न होने, पावे तुममें नाम को ॥॥
दुख वहाँ रहता है, कुमति का जहाँ डेरा पड़ा ।।
सुमति से पाता है प्राणी, चेन और विश्राम को ॥॥
तज के आलस और निद्रा, त्याग दो परमाद को ।।
काम में लाओ सदा तुम, दिन के आठों यमि को ॥॥
एक छिन बेकाम रहना, भी कभी अच्छा नहीं ।
काम से पाते हैं नर, धर्म अर्थ मुक्ति काम को ॥॥
राधास्वामी योग साधो, राधास्वामी योग सीख ।।
जीते जी सुख अन्त में लो, सत को और सतधाम को ।।।।
देखना अनबन न होने, पावे तुममें नाम को ॥॥
दुख वहाँ रहता है, कुमति का जहाँ डेरा पड़ा ।।
सुमति से पाता है प्राणी, चेन और विश्राम को ॥॥
तज के आलस और निद्रा, त्याग दो परमाद को ।।
काम में लाओ सदा तुम, दिन के आठों यमि को ॥॥
एक छिन बेकाम रहना, भी कभी अच्छा नहीं ।
काम से पाते हैं नर, धर्म अर्थ मुक्ति काम को ॥॥
राधास्वामी योग साधो, राधास्वामी योग सीख ।।
जीते जी सुख अन्त में लो, सत को और सतधाम को ।।।।
×
Song 116 — Hindi
125. प्राण की है मुख्यता, और प्राण सबका सार है ।
प्राण में बल शक्ति है, दोनों का यह भंडार है ।।।।
प्राण को समझो समझकर, शब्द साधो प्राण संग ।।
साधना से सहज में, भव जल से बेड़ा पार है ॥॥
प्राण का भी शब्द ही है, सार शब्द को भी लो परख ।
यह परख आयेगी, सतसंग के बचन की धार से ॥॥
प्राण के समझे बिना, मत शब्द का अभ्यास कर ।
फिर न छूटेगा कभी तू , जग के कारागार से ॥॥
राधास्वामी गुरु की संगत, पहले कर फिर से दयो ।
इसके पीछे शब्द साधन, मुक्ति ले संसार से ।।।।
प्राण में बल शक्ति है, दोनों का यह भंडार है ।।।।
प्राण को समझो समझकर, शब्द साधो प्राण संग ।।
साधना से सहज में, भव जल से बेड़ा पार है ॥॥
प्राण का भी शब्द ही है, सार शब्द को भी लो परख ।
यह परख आयेगी, सतसंग के बचन की धार से ॥॥
प्राण के समझे बिना, मत शब्द का अभ्यास कर ।
फिर न छूटेगा कभी तू , जग के कारागार से ॥॥
राधास्वामी गुरु की संगत, पहले कर फिर से दयो ।
इसके पीछे शब्द साधन, मुक्ति ले संसार से ।।।।
×
Song 117 — Hindi
126. गुरु के मत में अके, गुरु गम पन्थ को पहचान ले ।।
गुरु की संगत करके, गुरु का मर्म ले गुर ज्ञान ले ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु है शिव की मूरती ।।
ब्रह्म है परब्रह्म गुरु है, गुरु से गुर को जान ले ॥॥
गुरु मिले सब कुछ मिला, अब किसकी मन में चाह हो ।
अर्थ धर्म और मोक्ष की, और कामना की खान ले ॥॥
ज्ञान भक्ति दोनों गुरु के, आसरे हैं यह समझ ।
गुरु दया से दोनों पाले, जीते जी निरवान ले ॥॥
राधास्वामी सन्त सतगुरु, रूप में परगट हुये ।
ले शरन अब पद कमल में, झुक के मेरी मान ले ॥॥
गुरु की संगत करके, गुरु का मर्म ले गुर ज्ञान ले ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु है शिव की मूरती ।।
ब्रह्म है परब्रह्म गुरु है, गुरु से गुर को जान ले ॥॥
गुरु मिले सब कुछ मिला, अब किसकी मन में चाह हो ।
अर्थ धर्म और मोक्ष की, और कामना की खान ले ॥॥
ज्ञान भक्ति दोनों गुरु के, आसरे हैं यह समझ ।
गुरु दया से दोनों पाले, जीते जी निरवान ले ॥॥
राधास्वामी सन्त सतगुरु, रूप में परगट हुये ।
ले शरन अब पद कमल में, झुक के मेरी मान ले ॥॥
×
Song 118 — Hindi
127. सब जगह रहता हूँ, और सब में मेरा स्थान है ।।
देख लेता है मुझे वह, जिसमें मेरा ज्ञान है ॥॥
आँख वाले देखते हैं, रूप मेरा सब जगह ।
वह समझ लेते हैं, जिनमें समझ है अनुमान है ॥॥
काम करता हूँ सभी, निष्काम मेरा काम सब ।
मुझ में ज्ञान अनुमान है, और मुझ ही में परमान है ॥॥
मुझ में सृटि स्थिति, और लय के सब प्रबन्ध हैं।
नाम जो लेते हैं मेरा, उनको पद निर्वाण है ॥॥
राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी धाम लो ।
लोक यश परलोक आनन्द, का जो तुमको ध्यान है ।।।।
देख लेता है मुझे वह, जिसमें मेरा ज्ञान है ॥॥
आँख वाले देखते हैं, रूप मेरा सब जगह ।
वह समझ लेते हैं, जिनमें समझ है अनुमान है ॥॥
काम करता हूँ सभी, निष्काम मेरा काम सब ।
मुझ में ज्ञान अनुमान है, और मुझ ही में परमान है ॥॥
मुझ में सृटि स्थिति, और लय के सब प्रबन्ध हैं।
नाम जो लेते हैं मेरा, उनको पद निर्वाण है ॥॥
राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी धाम लो ।
लोक यश परलोक आनन्द, का जो तुमको ध्यान है ।।।।
×
Song 119 — Hindi
128. सबके घट घट का है बासी, घट ही उसका धाम है ।
रूप भी सब हैं उसी के, उसके लाखों नाम हैं ॥॥
भक्त की भक्ति है, शक्तिवान की शक्ति है वह ।।
ज्ञान हे ज्ञानी का, और सन्तों का वह विश्राम है ॥॥
एक है और सहस्त्र है, और सहस्र से भी है अधिक ।।
सब का है सब में है, सब जग का वह रमता राम है ॥॥
फूल फल पत्त कली पौदा है, पौदों का है बीज ।
देह में वह बल में वह है, उसमें धन और दाम है ॥॥
राधास्वामी ने बताया, उसके होकर तुम रही।
वह है उसका जो सुमिरता, उसको आठों याम है ॥॥
रूप भी सब हैं उसी के, उसके लाखों नाम हैं ॥॥
भक्त की भक्ति है, शक्तिवान की शक्ति है वह ।।
ज्ञान हे ज्ञानी का, और सन्तों का वह विश्राम है ॥॥
एक है और सहस्त्र है, और सहस्र से भी है अधिक ।।
सब का है सब में है, सब जग का वह रमता राम है ॥॥
फूल फल पत्त कली पौदा है, पौदों का है बीज ।
देह में वह बल में वह है, उसमें धन और दाम है ॥॥
राधास्वामी ने बताया, उसके होकर तुम रही।
वह है उसका जो सुमिरता, उसको आठों याम है ॥॥
×
Song 120 — Hindi
129. बुद्धि जब तुमको मिली, मिलजुल के रहना सीख लो ।
द्वष तजकर प्रेम की, युक्ति का गहना सीख लो ॥॥
भाइयों से बैर त्यागो, मित्रता का भाव लो ।।
मुख से मीठे और मधुर, बचनों का कहना सीख लो ॥॥
लड़ते लड़ते होगये हो, अब निंबल सोचो भी कुछ ।
यह दशा अच्छी नहीं, सुमती को लहना सीख लो ॥॥
ऐसा हो व्योहार जिससे, सुख भिले और शान्ती ।।
कौन कहता है कि दुख, सागर में बहना सीख लो ।।।।
राधास्वामी जग में आये, प्रेम का परिचय दिया ।
मेल का साधन हो, मिलजुल कर निबहना सीख लो ॥॥
द्वष तजकर प्रेम की, युक्ति का गहना सीख लो ॥॥
भाइयों से बैर त्यागो, मित्रता का भाव लो ।।
मुख से मीठे और मधुर, बचनों का कहना सीख लो ॥॥
लड़ते लड़ते होगये हो, अब निंबल सोचो भी कुछ ।
यह दशा अच्छी नहीं, सुमती को लहना सीख लो ॥॥
ऐसा हो व्योहार जिससे, सुख भिले और शान्ती ।।
कौन कहता है कि दुख, सागर में बहना सीख लो ।।।।
राधास्वामी जग में आये, प्रेम का परिचय दिया ।
मेल का साधन हो, मिलजुल कर निबहना सीख लो ॥॥
×
Song 121 — Hindi
130. पाके नर जीवन न समझा, तत्व को और सार को ।।
क्यों बुरा कहते हो तुम, ईश्वर को और संसार को ॥॥
बुद्धि उसने दी तुम्हें, बुद्धि की शक्ति युक्ति दी ।।
क्यों बिगाड़ा पाके सब, परमार्थ और व्यौहार को ।।।।
देवताओं से भी उत्तम, उसने तुमको कर दिया।
भरम में फंसकर न समझा, तुमने वार और पार को ।।।।
करलो सतसंगत गुरु की, ज्ञान की दृष्टि खुले ।।
लाओ तट पर नाव अपनी, छोड़कर मॅझधार को ॥॥
राधास्वामी की दया से, जनम को करलो सुफल ।।
काटो बन्धन भरम के, और त्यागो कारागार को ।।।।
131.प्रेमी और प्रीतम नहीं दो, एक हैं वह एक हैं।
कौन कह सकता है दो, उनमें नहीं तू है न मैं ॥॥
तन को मनको धन को अरपा, अपने प्रीतम के लिये ।
आप मरकर सच्चे प्रेमी, प्रेम का जीवन जिये ॥॥
मैं जो कहता है, अहंकारी विकारी वह हुआ ।
तू जो कहता है, भरम के बस अनारी वह हुआ ॥॥
तोड़ दे मैं तू को बन्धन, मुक्त हो और शुद्ध हो ।
रूप को समझेगा तब तू, ज्ञान पाकर बुद्ध हो ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।।
प्रेम में जो लय हुये हैं, क्या सुनायें कह तुम्हें ॥॥
132. नेति नेति “एति एति में, पड़े अनजान सच ।।
उनकी युक्ति सब है मिथ्या, और मिथ्या ज्ञान सच ।।।।
बातों से यह सिद्ध करना चाहते हैं रूप को ।।
जब न हो अनुभव तो निष्फल, उनका है अनुमान सब ।।।।
मैं नहीं जाता वहाँ, बानी की गम उसमें नहीं ।
बुद्धि से सुलझायेंगे क्या, गुत्थी बुद्धिमान सब ।।।।
तत्व सब का एक है, इसमें नहीं संशय कोई ।।
बातों को फैला बतंगड़, भर्म है अज्ञान सब ।।।।
काग विष्टा जगको कहना, और गिरना मुंह के बल ।।
है दशा यह कैसी सोचे, जगके विद्यावान सब ।।।।
जाके सतसंग में गुरु के, हमने पाया भेद को ।।
भेदवादी हम नहीं, अब छुट गया अभिमान सब ।।।।
गधास्वामी नाम लो, साधन करो कुछ शब्द का ।
पाओगे गुरु की दया से, रूप का तब ज्ञान सब ।।।।
133. कौन तेरा है यहाँ, कोई नहीं तेरा यहाँ ।
साथ किसका कौन देता है, कोई देगा कहाँ ॥॥
चार दिन का है यह मेला, नाव नद संजोग हैं।
सब बिछुड़ जायेंगे, कोई है यहाँ कोई वहाँ ॥॥
झूठे नाते बाँध कर, तू हुआ मन में दुखी ।।
देख अपने रूप को, दो दिन का जग का समाँ ॥॥
रोक सब बाहर की वृत्ती, होके तू अन्तरमुखी ।
शब्द का अभ्यास कर, जैसी दशा में हो जहाँ ॥॥
राधास्वामी का सहारा लेके कर सुमिरन भजन ।।
थोड़े दिन पीछे यह अवसर, हाथ आयेगा कहाँ ।।।।
134.गुरु हुये संसार में परगट, गुरु से ज्ञान लो ।।
छोड़ दो पाखंड को, गुरु मत की महिमा जान लो ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु ही शिव के रूप हैं।
ब्रह्म गुरु परब्रह्म गुरु है, गुरु को सब कुछ मान लो ।।।।
ज्ञान है आधार गुरु के, भक्ति गुरु के आसरे ।
गुरु के सनमुख जाके तुम, सतगुरु से नाम का दान लो ॥॥
आया शुभ अवसर न इस, अवसर को छोड़ो हाथ से ।।
गुरु से मिलकर जीते जी, कैवल्य पद निर्वान लो ।।।।
राधास्वामी की दया से, गुरु की आई अब समझ ।।
जनम को करलो सुफल, निज रूप को पहचान लो ॥॥
क्यों बुरा कहते हो तुम, ईश्वर को और संसार को ॥॥
बुद्धि उसने दी तुम्हें, बुद्धि की शक्ति युक्ति दी ।।
क्यों बिगाड़ा पाके सब, परमार्थ और व्यौहार को ।।।।
देवताओं से भी उत्तम, उसने तुमको कर दिया।
भरम में फंसकर न समझा, तुमने वार और पार को ।।।।
करलो सतसंगत गुरु की, ज्ञान की दृष्टि खुले ।।
लाओ तट पर नाव अपनी, छोड़कर मॅझधार को ॥॥
राधास्वामी की दया से, जनम को करलो सुफल ।।
काटो बन्धन भरम के, और त्यागो कारागार को ।।।।
131.प्रेमी और प्रीतम नहीं दो, एक हैं वह एक हैं।
कौन कह सकता है दो, उनमें नहीं तू है न मैं ॥॥
तन को मनको धन को अरपा, अपने प्रीतम के लिये ।
आप मरकर सच्चे प्रेमी, प्रेम का जीवन जिये ॥॥
मैं जो कहता है, अहंकारी विकारी वह हुआ ।
तू जो कहता है, भरम के बस अनारी वह हुआ ॥॥
तोड़ दे मैं तू को बन्धन, मुक्त हो और शुद्ध हो ।
रूप को समझेगा तब तू, ज्ञान पाकर बुद्ध हो ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।।
प्रेम में जो लय हुये हैं, क्या सुनायें कह तुम्हें ॥॥
132. नेति नेति “एति एति में, पड़े अनजान सच ।।
उनकी युक्ति सब है मिथ्या, और मिथ्या ज्ञान सच ।।।।
बातों से यह सिद्ध करना चाहते हैं रूप को ।।
जब न हो अनुभव तो निष्फल, उनका है अनुमान सब ।।।।
मैं नहीं जाता वहाँ, बानी की गम उसमें नहीं ।
बुद्धि से सुलझायेंगे क्या, गुत्थी बुद्धिमान सब ।।।।
तत्व सब का एक है, इसमें नहीं संशय कोई ।।
बातों को फैला बतंगड़, भर्म है अज्ञान सब ।।।।
काग विष्टा जगको कहना, और गिरना मुंह के बल ।।
है दशा यह कैसी सोचे, जगके विद्यावान सब ।।।।
जाके सतसंग में गुरु के, हमने पाया भेद को ।।
भेदवादी हम नहीं, अब छुट गया अभिमान सब ।।।।
गधास्वामी नाम लो, साधन करो कुछ शब्द का ।
पाओगे गुरु की दया से, रूप का तब ज्ञान सब ।।।।
133. कौन तेरा है यहाँ, कोई नहीं तेरा यहाँ ।
साथ किसका कौन देता है, कोई देगा कहाँ ॥॥
चार दिन का है यह मेला, नाव नद संजोग हैं।
सब बिछुड़ जायेंगे, कोई है यहाँ कोई वहाँ ॥॥
झूठे नाते बाँध कर, तू हुआ मन में दुखी ।।
देख अपने रूप को, दो दिन का जग का समाँ ॥॥
रोक सब बाहर की वृत्ती, होके तू अन्तरमुखी ।
शब्द का अभ्यास कर, जैसी दशा में हो जहाँ ॥॥
राधास्वामी का सहारा लेके कर सुमिरन भजन ।।
थोड़े दिन पीछे यह अवसर, हाथ आयेगा कहाँ ।।।।
134.गुरु हुये संसार में परगट, गुरु से ज्ञान लो ।।
छोड़ दो पाखंड को, गुरु मत की महिमा जान लो ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु ही शिव के रूप हैं।
ब्रह्म गुरु परब्रह्म गुरु है, गुरु को सब कुछ मान लो ।।।।
ज्ञान है आधार गुरु के, भक्ति गुरु के आसरे ।
गुरु के सनमुख जाके तुम, सतगुरु से नाम का दान लो ॥॥
आया शुभ अवसर न इस, अवसर को छोड़ो हाथ से ।।
गुरु से मिलकर जीते जी, कैवल्य पद निर्वान लो ।।।।
राधास्वामी की दया से, गुरु की आई अब समझ ।।
जनम को करलो सुफल, निज रूप को पहचान लो ॥॥
×
Song 122 — Hindi
135. जाके गुरु के पास बैठो, और बचन उनके सुनो।
जो सुनो उसको विचारो, जो बिचारो वह गुनो ॥॥
सुन लो गुनके नित करो, बचनों को उनके तुम अहार ।।
तुष्ट होकर साधना से, करलो सब साक्षात्कार ॥॥
गुरु की संगत बिन नहीं, अधिकार होता ज्ञान का ।
जब तलक संगत न हो, मिटता नहीं मद मान का ॥॥
मान मद अभिमान मन मत, के सभी समझो विकार ।
मानी अभिमानी को कब, सूझे कभी सार और असार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, जो सहज है और सुगम ।
जीतेजी पाजाओ मुक्ति, और बनालो निज जनम ॥॥
जो सुनो उसको विचारो, जो बिचारो वह गुनो ॥॥
सुन लो गुनके नित करो, बचनों को उनके तुम अहार ।।
तुष्ट होकर साधना से, करलो सब साक्षात्कार ॥॥
गुरु की संगत बिन नहीं, अधिकार होता ज्ञान का ।
जब तलक संगत न हो, मिटता नहीं मद मान का ॥॥
मान मद अभिमान मन मत, के सभी समझो विकार ।
मानी अभिमानी को कब, सूझे कभी सार और असार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, जो सहज है और सुगम ।
जीतेजी पाजाओ मुक्ति, और बनालो निज जनम ॥॥
×
Song 123 — Hindi
136. ध्यान तक करता नहीं है, कोई मेरी बात का ।।
क्या कहूँ है भेद उनमें, मुझमें दिन का ति का ॥॥
काल ने चोटी पकड़ रखी है, सब की हाथ में ।
फिर भी यह करते हैं झगड़ा, पाँत का और जात का ॥॥
सबकी उत्पति स्थिती, और लय की लीला एक है।
जिसको देखा न्यून जीवन, कीड़ा था बरसात का ॥॥
आये है सो जायेंगे, रहने नहीं आया कोई ।।
ज्ञान होता ही नहीं है, इनको यम की घात का ॥॥
यह सहेंगे कष्ट आपत, सुनने वाला कौन है ।
बात को कब मानता है, देवता जो लात का ।।।।
राधास्वामी ने कहा, सब प्रेम के रस्ते चलें ।
ध्यान यह करते नहीं हैं, सतगुरु की बात का ।।।।
क्या कहूँ है भेद उनमें, मुझमें दिन का ति का ॥॥
काल ने चोटी पकड़ रखी है, सब की हाथ में ।
फिर भी यह करते हैं झगड़ा, पाँत का और जात का ॥॥
सबकी उत्पति स्थिती, और लय की लीला एक है।
जिसको देखा न्यून जीवन, कीड़ा था बरसात का ॥॥
आये है सो जायेंगे, रहने नहीं आया कोई ।।
ज्ञान होता ही नहीं है, इनको यम की घात का ॥॥
यह सहेंगे कष्ट आपत, सुनने वाला कौन है ।
बात को कब मानता है, देवता जो लात का ।।।।
राधास्वामी ने कहा, सब प्रेम के रस्ते चलें ।
ध्यान यह करते नहीं हैं, सतगुरु की बात का ।।।।
×
Song 124 — Hindi
137. प्रम का सौदा करो तुम, प्रेम के व्यौहार में ।
हानी और घाटा नहीं है, प्रेम के व्यौपार में ।।।।
प्रम में है स्वाद अद्भुत, प्रेम का प्याला पियो ।
होके मतवाला विचरना, सीखो इस संसार में ॥॥
प्रेम से मन जीतलो, सबसे निराला शस्त्र है ।।
जीत देखो अपनी पक्की, जय है इसके हार में ॥॥
मेरे दाता प्रेम दे, अपना न दे तू कुछ मुझे ।
इसमें सुख है, मीठा रस मिलता है इसकी मार में ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम की नौका चढ़ो ।
पार जाओ डूबते हो, क्यों पड़े मॅझधार में ॥॥
हानी और घाटा नहीं है, प्रेम के व्यौपार में ।।।।
प्रम में है स्वाद अद्भुत, प्रेम का प्याला पियो ।
होके मतवाला विचरना, सीखो इस संसार में ॥॥
प्रेम से मन जीतलो, सबसे निराला शस्त्र है ।।
जीत देखो अपनी पक्की, जय है इसके हार में ॥॥
मेरे दाता प्रेम दे, अपना न दे तू कुछ मुझे ।
इसमें सुख है, मीठा रस मिलता है इसकी मार में ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम की नौका चढ़ो ।
पार जाओ डूबते हो, क्यों पड़े मॅझधार में ॥॥
×
Song 125 — Hindi
138. सच्ची बन कर रात दिन, तुम सत गुरु का नाम लो ।
शील लो संतोष लो, संसार में धन दाम लो ॥॥
मन में जब विश्वास हो, दुर्लभ नहीं फिर कोई वस्तु ।।
धर्म लो तुम अर्थ लो, मोक्ष लो सत काम लो ॥॥
इसके सुमिरन से कटेंगे, फन्द माया जाल के ।
मन की सब खटपट मिटे, और उसकी विरती थामलो ॥॥
उठते बैठते चलते फिरते, जागते सोते हुये ।।
खाते पीते नाम लो, और नाम आठों याम लो ।।।।
जीते जी यश कीरती लो, भक्ति के मारग में आ ।।
तन छुटे पीछे सहज में, राधास्वामी धाम लो ॥॥
शील लो संतोष लो, संसार में धन दाम लो ॥॥
मन में जब विश्वास हो, दुर्लभ नहीं फिर कोई वस्तु ।।
धर्म लो तुम अर्थ लो, मोक्ष लो सत काम लो ॥॥
इसके सुमिरन से कटेंगे, फन्द माया जाल के ।
मन की सब खटपट मिटे, और उसकी विरती थामलो ॥॥
उठते बैठते चलते फिरते, जागते सोते हुये ।।
खाते पीते नाम लो, और नाम आठों याम लो ।।।।
जीते जी यश कीरती लो, भक्ति के मारग में आ ।।
तन छुटे पीछे सहज में, राधास्वामी धाम लो ॥॥
×
Song 126 — Hindi
139. काम जो करना हो, चित दे उसे करते रहो ।
छोड़ो दुविधा दुर्मति, दुचिताई से डरते रहो ।।।।
यह समझ लो तुम हुये, जैसा किया कर्म और विचार ।।
अपनी करनी पार उतरनी, है यही उपदेश सार ॥॥
सोचो मन में अपने, औरों से न पूछो बात को ।।
बचके चलना दूर करके, मन के सब उत्पात को ॥॥
एक चित होकर करो, सुमिरन भजन दिन रात तुम ।।
करनी से हो लगन सच्ची, कथनी को दो मात तुम ॥॥
सहज में साधन हो; कठिनाई की चिंता छोड़ कर ।।
काम में अपने लगो, बातों से मुह को मोड़ कर ॥॥
जो करो पूरा करो, करना हो जो वह करलो आज ।
भक्ति मुक्ति योग युक्ति, को सजा लो विमल साज ।।।।
राधास्वामी की दया से, जन्म अपना लो बना ।
गुरु की सतसंगत करो, सब पूरी होगी कामना ।।॥
छोड़ो दुविधा दुर्मति, दुचिताई से डरते रहो ।।।।
यह समझ लो तुम हुये, जैसा किया कर्म और विचार ।।
अपनी करनी पार उतरनी, है यही उपदेश सार ॥॥
सोचो मन में अपने, औरों से न पूछो बात को ।।
बचके चलना दूर करके, मन के सब उत्पात को ॥॥
एक चित होकर करो, सुमिरन भजन दिन रात तुम ।।
करनी से हो लगन सच्ची, कथनी को दो मात तुम ॥॥
सहज में साधन हो; कठिनाई की चिंता छोड़ कर ।।
काम में अपने लगो, बातों से मुह को मोड़ कर ॥॥
जो करो पूरा करो, करना हो जो वह करलो आज ।
भक्ति मुक्ति योग युक्ति, को सजा लो विमल साज ।।।।
राधास्वामी की दया से, जन्म अपना लो बना ।
गुरु की सतसंगत करो, सब पूरी होगी कामना ।।॥
×
Song 127 — Hindi
140.ध्यान में गुरु मूरती को, ध्यान देकर ध्यान दो ।
ध्यान की जड़ समझो सुमिरन, इसको तन और प्राण दो ॥॥
जब भजन हो मेट दो, संकल्प की बातों को सब ।।
शब्द का श्रवण करो, और पुतलियों को तान दो ॥॥
मन की दुविधा छोड़कर, दृष्टि जमाओ रूप पर ।।
मूरती को तीसरे तिल में, सदा स्थान दो ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन से, लव लगाओ रात दिन ।
जो सुनो अन्तर में उसकी, ओर चित के कान दो ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
साधना सतसंग करने वालों को सन्मान दो ॥॥
ध्यान की जड़ समझो सुमिरन, इसको तन और प्राण दो ॥॥
जब भजन हो मेट दो, संकल्प की बातों को सब ।।
शब्द का श्रवण करो, और पुतलियों को तान दो ॥॥
मन की दुविधा छोड़कर, दृष्टि जमाओ रूप पर ।।
मूरती को तीसरे तिल में, सदा स्थान दो ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन से, लव लगाओ रात दिन ।
जो सुनो अन्तर में उसकी, ओर चित के कान दो ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
साधना सतसंग करने वालों को सन्मान दो ॥॥
×
Song 128 — Hindi
141. भक्ति की चूनर पहन ली, और सुशीला बन गई।
रूखापन चित से गया जब, तब रसीला बन गई ॥॥
चित में है परतीत भक्ति, मन दया का पात्र है ।।
रंग गुरु को चढ़ गया, रंग ले रंगीला बन गई ॥॥
मीठी बानी बोलती है, प्रेम के रस से भरी ।।
दुर्वचन क्यों निकले मुह से, जब छबीला बन गई ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाले नित ।।
कौन कह सकता है अब, तुझको हठीला बन गई ॥॥
रूखापन चित से गया जब, तब रसीला बन गई ॥॥
चित में है परतीत भक्ति, मन दया का पात्र है ।।
रंग गुरु को चढ़ गया, रंग ले रंगीला बन गई ॥॥
मीठी बानी बोलती है, प्रेम के रस से भरी ।।
दुर्वचन क्यों निकले मुह से, जब छबीला बन गई ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाले नित ।।
कौन कह सकता है अब, तुझको हठीला बन गई ॥॥
×
Song 129 — Hindi
142 ज्ञान है गुरु ज्ञान गुरु के, नाम ही में ज्ञान है ।।
नाम का सुमिरन करो नित, नाम में कल्यान है ॥॥
नाम हो धुनात्मक, वर्णात्मक को छोड़ कर ।।
गायो अन्तर में उसे, अनहद से अनहद तान है ॥॥
नाम ले नामी का अनुभव, जाग उठेगा आप से ।।
नाम के अन्तरमुखी, सुमिरन में उसका ध्यान है ॥॥
नाम और नामी में क्या है, भेद उसको जान लो ।।
जानकर सुमिरन हो वह, क्या जाने जो अनजान है ॥॥
चाहे आलस क्रोध चाहे, भाव हो या वह नहीं ।
नाम में निस दिन है मंगल, नाम मंगल खान है ।॥॥
हो सहज सुमिरन, सहज रीती से विरती हो सहज ।।
शान्त चित जब नाम का, निंभ्रान्त होकर गान है ।।।।
राधास्वामी ने बताया, पास हो नामी के तुम ।
सुरत की बैठक जो घट में, नामी का स्थान है ॥॥
नाम का सुमिरन करो नित, नाम में कल्यान है ॥॥
नाम हो धुनात्मक, वर्णात्मक को छोड़ कर ।।
गायो अन्तर में उसे, अनहद से अनहद तान है ॥॥
नाम ले नामी का अनुभव, जाग उठेगा आप से ।।
नाम के अन्तरमुखी, सुमिरन में उसका ध्यान है ॥॥
नाम और नामी में क्या है, भेद उसको जान लो ।।
जानकर सुमिरन हो वह, क्या जाने जो अनजान है ॥॥
चाहे आलस क्रोध चाहे, भाव हो या वह नहीं ।
नाम में निस दिन है मंगल, नाम मंगल खान है ।॥॥
हो सहज सुमिरन, सहज रीती से विरती हो सहज ।।
शान्त चित जब नाम का, निंभ्रान्त होकर गान है ।।।।
राधास्वामी ने बताया, पास हो नामी के तुम ।
सुरत की बैठक जो घट में, नामी का स्थान है ॥॥
×
Song 130 — Hindi
143. ज्ञान की करनी करो, और तज दो बाचक ज्ञान को ।।
करनी से अनुभव बढ़ेगा, मैटकर मद मान को ।।।।
भूख हो उद्यम करो, खाना पकाकर खाओ तुम ।।
त्याग दो मिथ्या समझकर, बालों के पकवान को ।।।।
करनी को चित दे नहीं, कथनी से निस दिन काम है।
भोंक कर मर जायेगा, तुम कहदो ऐसे स्वान को ।।॥
वह है प्यारा मुझको जो, करता करनौ रात दिन ।
सम किया है करनी से, जिसने अपान व व्यान को ।।।।
ज्ञान का कथना सुगम है, करनी का जीवन कठिन ।।
हम तो करनी के हैं साथी, गह लिया गुरु ज्ञान को ।।।।
जब तलक देखा न अपनी, आँखों क्या कहने से लाभ ।
करनी करने से बढ़ालो, अनुभव और अनुमान को ॥॥
कहने को तो सब बहुत कुछ कहते रहते हैं सदा ।।
जब करेंगे करनी, पायेंगी, तभी परमान को ॥॥
राधास्वामी ने कहा, कथनी तजो करनी करो ।।
दो यही उपदेश अपने, जान को पहचान को ॥॥
करनी से अनुभव बढ़ेगा, मैटकर मद मान को ।।।।
भूख हो उद्यम करो, खाना पकाकर खाओ तुम ।।
त्याग दो मिथ्या समझकर, बालों के पकवान को ।।।।
करनी को चित दे नहीं, कथनी से निस दिन काम है।
भोंक कर मर जायेगा, तुम कहदो ऐसे स्वान को ।।॥
वह है प्यारा मुझको जो, करता करनौ रात दिन ।
सम किया है करनी से, जिसने अपान व व्यान को ।।।।
ज्ञान का कथना सुगम है, करनी का जीवन कठिन ।।
हम तो करनी के हैं साथी, गह लिया गुरु ज्ञान को ।।।।
जब तलक देखा न अपनी, आँखों क्या कहने से लाभ ।
करनी करने से बढ़ालो, अनुभव और अनुमान को ॥॥
कहने को तो सब बहुत कुछ कहते रहते हैं सदा ।।
जब करेंगे करनी, पायेंगी, तभी परमान को ॥॥
राधास्वामी ने कहा, कथनी तजो करनी करो ।।
दो यही उपदेश अपने, जान को पहचान को ॥॥
×
Song 131 — Hindi
144. सहज में सब काम करना, सहज विरती धार कर ।
सहज में परमार्थ हो, और सहज में व्यौहार कर ॥॥
सहज विरती मुख्य है, उत्तम है सुमिरन और भजन ।
है अधम तीरथ बरत, संगत से सत के प्यार कर ॥॥
गुरु पशु बनना नहीं, अच्छा गुरु का मन्त्र ले ।।
मन्त्र लेकर सहज में, भव जल से बेड़ा पार कर ॥॥
भक्ति कर भक्ति समझकर, भक्ति को चित दे सदा ।।
भक्त होजा भक्त जन के, मेल का सत्कार कर ॥॥
राधास्वामी मत है क्या, अनुभव से समझेगा उसे ।
अनुभवी हो काम मद और, लोभ मन से मार कर ॥॥
सहज में परमार्थ हो, और सहज में व्यौहार कर ॥॥
सहज विरती मुख्य है, उत्तम है सुमिरन और भजन ।
है अधम तीरथ बरत, संगत से सत के प्यार कर ॥॥
गुरु पशु बनना नहीं, अच्छा गुरु का मन्त्र ले ।।
मन्त्र लेकर सहज में, भव जल से बेड़ा पार कर ॥॥
भक्ति कर भक्ति समझकर, भक्ति को चित दे सदा ।।
भक्त होजा भक्त जन के, मेल का सत्कार कर ॥॥
राधास्वामी मत है क्या, अनुभव से समझेगा उसे ।
अनुभवी हो काम मद और, लोभ मन से मार कर ॥॥
×
Song 132 — Hindi
145. पुत्र पति सम्बन्धियों से, प्रेम का व्यौहार कर ।।
घर में रहकर हो भजन और, इस भजन से प्यार कर ॥॥
पाया शुभ अवसर न इसको, हाथ से खोना कभी ।।
मन से दुविधा मेटकर, निश्चय को अंगीकार कर ॥॥
उठते चलते बैठते, सुमिरन रहे सतनाम का ।
नाम में जीवन हो तेरा, नाम का परचार कर ॥॥
भाग को अपने बढ़ाले, सिंध बुद की गति परख ।
गुन्द हो सत सिंध ऐसे, प्रेम का विस्तार कर ॥॥
राधास्वामी की दया ले, बेन दया की मूरती ।।
शील पाकर हो सुशीला, चित की दुचिता टोर कर ॥॥
घर में रहकर हो भजन और, इस भजन से प्यार कर ॥॥
पाया शुभ अवसर न इसको, हाथ से खोना कभी ।।
मन से दुविधा मेटकर, निश्चय को अंगीकार कर ॥॥
उठते चलते बैठते, सुमिरन रहे सतनाम का ।
नाम में जीवन हो तेरा, नाम का परचार कर ॥॥
भाग को अपने बढ़ाले, सिंध बुद की गति परख ।
गुन्द हो सत सिंध ऐसे, प्रेम का विस्तार कर ॥॥
राधास्वामी की दया ले, बेन दया की मूरती ।।
शील पाकर हो सुशीला, चित की दुचिता टोर कर ॥॥
×
Song 133 — Hindi
146. प्रेम दुख संकट नहीं है, प्रेम के मारग में आ ।।
प्रेम का रस्ता सुगम है, प्रेम को ले आसरा ॥॥
प्रेम सुख आनन्द है, और प्रेम में है शान्ती ।
यह समझले अपने मनमें अपने, यह नहीं दुख आपदा ॥॥
सोना अग्नी में पड़ा, उसको सुहागा जब मिला ।
चमका दमका मैला सोना, तप से फिर कुन्दन बना ।।।।
सोच अपने मन में, प्रेम और प्रीति के व्यौहार को ।
प्रेम में परतीत में, भक्ति में दे मन को लगा ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वही मतवालो है।
राधास्वामी प्रेम मत है, समझा जो ज्ञानी हुआ ।।।।
प्रेम का रस्ता सुगम है, प्रेम को ले आसरा ॥॥
प्रेम सुख आनन्द है, और प्रेम में है शान्ती ।
यह समझले अपने मनमें अपने, यह नहीं दुख आपदा ॥॥
सोना अग्नी में पड़ा, उसको सुहागा जब मिला ।
चमका दमका मैला सोना, तप से फिर कुन्दन बना ।।।।
सोच अपने मन में, प्रेम और प्रीति के व्यौहार को ।
प्रेम में परतीत में, भक्ति में दे मन को लगा ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वही मतवालो है।
राधास्वामी प्रेम मत है, समझा जो ज्ञानी हुआ ।।।।
×
Song 134 — Hindi
147. प्रेम जिसके मन में आया, प्रेम से प्रेम बना ।।
संयम है प्रेम का वह, प्रेम का नियमी बना ॥॥
योग क्या है प्रेम है, वेदान्त क्या है प्रेम है।
शान्त क्या है प्रेम है, निंभ्रान्त क्या है प्र म है ॥॥
प्रेम हैं आनन्द यह, आनन्द का भंडार है ।
प्रेम ही को सत्य समझो, प्रेम सबका सार है ॥।।
प्रेम से अन्तःकरण हो, शुद्ध निर्मल बुद्धि हो ।
कब अशुद्धि रह सकेगी, प्रेम की जब शुद्धि हो ।।।।
नित्य है। यह प्र में, मुक्ति प्रेम के अधीन है ।
ज्ञान भक्ति शक्ति युक्ति, प्रेम के आधीन है ॥॥
प्रम की विद्या अविद्या, रोग की है औषधी ।।
क्या कहूँ संसार के यह, सोग की है औषधी ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वह मतवाला बना ।।
दुर्मति जाती रही, भोला बना बाला बना ॥॥
कैसी पूजापाठ संध्या, कैसे धर्म और कर्म अब ।
हट गये झगड़े मिला है, प्रेम का सत मर्म अब ॥॥
प्रेम है आनन्द दाता, प्रेम का प्याला रसाल ।
माँगता है उसके बदले, सीस तन मन को कलाल ॥॥
जीते जी मरजाना हो, इस रास्ते में आओ तुम ।
सहज में शम दम तितिक्षा, मुक्ति के फल खाओ तुम ॥॥
काग से कोयल बनो, बगले से अब होजाओ होस ।
थोड़ा ही जो हाथ आजाये, तुम्हारे प्रेम अंस ॥॥
प्रेम प्रेमी और प्रीतम को, मिला करता है एक ।।
प्रेम ही है ज्ञान धन, और प्रेम ही सच्चा विवेक ।।॥
प्रेम ही सुमिरन भजन है, प्रेम ही है ज्ञान ध्यान ।
करलो संगत प्रेमियों की, कुछ दिनों इसको पिछान ।।॥
प्रेम भव से पार ले जाने का, नौका बन गया।
चित की दुचिताई हटी, दुविधा मिटी तन मन गया ॥॥
राधास्वामी प्रेम के हैं, सिंध और हम बद हैं।
बृद जब उसमें मिला, तब फिर कहाँ तू और मैं ॥॥
संयम है प्रेम का वह, प्रेम का नियमी बना ॥॥
योग क्या है प्रेम है, वेदान्त क्या है प्रेम है।
शान्त क्या है प्रेम है, निंभ्रान्त क्या है प्र म है ॥॥
प्रेम हैं आनन्द यह, आनन्द का भंडार है ।
प्रेम ही को सत्य समझो, प्रेम सबका सार है ॥।।
प्रेम से अन्तःकरण हो, शुद्ध निर्मल बुद्धि हो ।
कब अशुद्धि रह सकेगी, प्रेम की जब शुद्धि हो ।।।।
नित्य है। यह प्र में, मुक्ति प्रेम के अधीन है ।
ज्ञान भक्ति शक्ति युक्ति, प्रेम के आधीन है ॥॥
प्रम की विद्या अविद्या, रोग की है औषधी ।।
क्या कहूँ संसार के यह, सोग की है औषधी ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वह मतवाला बना ।।
दुर्मति जाती रही, भोला बना बाला बना ॥॥
कैसी पूजापाठ संध्या, कैसे धर्म और कर्म अब ।
हट गये झगड़े मिला है, प्रेम का सत मर्म अब ॥॥
प्रेम है आनन्द दाता, प्रेम का प्याला रसाल ।
माँगता है उसके बदले, सीस तन मन को कलाल ॥॥
जीते जी मरजाना हो, इस रास्ते में आओ तुम ।
सहज में शम दम तितिक्षा, मुक्ति के फल खाओ तुम ॥॥
काग से कोयल बनो, बगले से अब होजाओ होस ।
थोड़ा ही जो हाथ आजाये, तुम्हारे प्रेम अंस ॥॥
प्रेम प्रेमी और प्रीतम को, मिला करता है एक ।।
प्रेम ही है ज्ञान धन, और प्रेम ही सच्चा विवेक ।।॥
प्रेम ही सुमिरन भजन है, प्रेम ही है ज्ञान ध्यान ।
करलो संगत प्रेमियों की, कुछ दिनों इसको पिछान ।।॥
प्रेम भव से पार ले जाने का, नौका बन गया।
चित की दुचिताई हटी, दुविधा मिटी तन मन गया ॥॥
राधास्वामी प्रेम के हैं, सिंध और हम बद हैं।
बृद जब उसमें मिला, तब फिर कहाँ तू और मैं ॥॥
×
Song 135 — Hindi
148. तारने वाले ने तारा, तर गये सब तर गये ।।
जिसको तरना था तरे, भवनिधि के वह तट पर गये ।।॥
लालची कामी तरे, क्रोधी तरे मोही तरे ।।
नीची योनी में जो थे, वह नाम ले ऊपर गये ॥॥
तारने वाले ने तारा, तार तरने का बँधा ।
अब हो क्या चिंता किसी को, उसके जो दर पर गये ।।।।
आये शरनागत जो उसके, कर लिया जीवन सुफल ।।
॥ ॥ अब नहीं तरने में संशय, काम अपना कर गये ॥॥
राधास्वामी ने दया की, लाये नौका शब्द की ।
जो चढ़े वह तर चले, चूके जो वह सब मर गये ॥॥
जिसको तरना था तरे, भवनिधि के वह तट पर गये ।।॥
लालची कामी तरे, क्रोधी तरे मोही तरे ।।
नीची योनी में जो थे, वह नाम ले ऊपर गये ॥॥
तारने वाले ने तारा, तार तरने का बँधा ।
अब हो क्या चिंता किसी को, उसके जो दर पर गये ।।।।
आये शरनागत जो उसके, कर लिया जीवन सुफल ।।
॥ ॥ अब नहीं तरने में संशय, काम अपना कर गये ॥॥
राधास्वामी ने दया की, लाये नौका शब्द की ।
जो चढ़े वह तर चले, चूके जो वह सब मर गये ॥॥
×
Song 136 — Hindi
149. चित की वृत्ती हो न चंचल, करले उसकी रोक थाम ।
उसके पीछे बैठकर, एकान्त में लो गुरु का नाम ॥॥
नाम के सुमिरन से, आजायेगी तुझमें धारना ।।
धारना से ध्यान होगा, ध्यान होगा आठों याम ॥॥
ध्यान से प्रगटेगी अन्तर, सतगुरु की मूरती ।।
मूरती का कर भजन, चिन्तन भजन का कर तू काम ॥॥
इस भजन चिन्तन के अन्तर, राम अनहद है छुपी ।।
सुन उसे लय होजा उसमें, गह ले सुन्न में लय का ठाम ।।।।
जब सहज आये समाधी, दौड़ चल सत लोक को ।।
लख अलख गम ले अगम की, पाले राधास्वामी धाम ॥॥
उसके पीछे बैठकर, एकान्त में लो गुरु का नाम ॥॥
नाम के सुमिरन से, आजायेगी तुझमें धारना ।।
धारना से ध्यान होगा, ध्यान होगा आठों याम ॥॥
ध्यान से प्रगटेगी अन्तर, सतगुरु की मूरती ।।
मूरती का कर भजन, चिन्तन भजन का कर तू काम ॥॥
इस भजन चिन्तन के अन्तर, राम अनहद है छुपी ।।
सुन उसे लय होजा उसमें, गह ले सुन्न में लय का ठाम ।।।।
जब सहज आये समाधी, दौड़ चल सत लोक को ।।
लख अलख गम ले अगम की, पाले राधास्वामी धाम ॥॥
×
Song 137 — Hindi
150. मौज के आधार रहना, मौज का लो आसरा ।
मौज की हो बात निस दिन, मौज में बरतो सदा ॥॥
मीत है स्वामी तेरा, कोई नहीं है और मीत ।
शत्रु कोई है कहाँ, वह आप जब रक्षक हुआ ॥॥
सुख में दुख में शान्ती हो, चित की दुविधा मेट कर ।।
शान्ती में सुख है, दुचिताई में दुख़ और आपदा ॥॥
मन बचन और कर्म से, चित के दुखाने से बचो ।
चित दुखाना ही है हिंसा, पाप यह सबसे बड़ा ॥॥
अपने जैसों से हो मिलना, छोटों पर करुणा रहे ।
बच के चलना शत्रु से, और हो बड़ों से नम्रता ॥॥
काम में मन को लगाओ, मिथ्या बातें छोड़कर ।
काम में जो रहते हैं, उनको नहीं वह व्यापता ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम के रस्ते चलो ।
नाव नद संजोग है, बिछड़ेगा जो आकर मिला ॥॥
मौज की हो बात निस दिन, मौज में बरतो सदा ॥॥
मीत है स्वामी तेरा, कोई नहीं है और मीत ।
शत्रु कोई है कहाँ, वह आप जब रक्षक हुआ ॥॥
सुख में दुख में शान्ती हो, चित की दुविधा मेट कर ।।
शान्ती में सुख है, दुचिताई में दुख़ और आपदा ॥॥
मन बचन और कर्म से, चित के दुखाने से बचो ।
चित दुखाना ही है हिंसा, पाप यह सबसे बड़ा ॥॥
अपने जैसों से हो मिलना, छोटों पर करुणा रहे ।
बच के चलना शत्रु से, और हो बड़ों से नम्रता ॥॥
काम में मन को लगाओ, मिथ्या बातें छोड़कर ।
काम में जो रहते हैं, उनको नहीं वह व्यापता ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम के रस्ते चलो ।
नाव नद संजोग है, बिछड़ेगा जो आकर मिला ॥॥
×
Song 138 — Hindi
151. सहज बेड़ा पार है अब, नाव थी मॅझधार में ।
डूबने का भय मिटा है, दुख नहीं संसार में ॥॥
एक रस जीवन मिला, निद्वन्द हूँ निर्धान्त हूँ।
अब नहीं है भेद, परमारथ में और व्यौहार में ॥॥
द्वत हूँ अद्वैत हूँ, दोनों का आधार हैं।
किसको पूजू किसको ध्याऊँ, पन्थ की भरमार में ॥॥
पढ़ के पोथी खोगये, अपना पता पाया नहीं ।
पंडितों को लाभ क्या था, धरम के व्यौपार में ।।।।
राधास्वामी ने दया की, गुर बताया ज्ञान को ।
सार पाकर सार का मैं, हो रहा हूँ सार का ॥॥
डूबने का भय मिटा है, दुख नहीं संसार में ॥॥
एक रस जीवन मिला, निद्वन्द हूँ निर्धान्त हूँ।
अब नहीं है भेद, परमारथ में और व्यौहार में ॥॥
द्वत हूँ अद्वैत हूँ, दोनों का आधार हैं।
किसको पूजू किसको ध्याऊँ, पन्थ की भरमार में ॥॥
पढ़ के पोथी खोगये, अपना पता पाया नहीं ।
पंडितों को लाभ क्या था, धरम के व्यौपार में ।।।।
राधास्वामी ने दया की, गुर बताया ज्ञान को ।
सार पाकर सार का मैं, हो रहा हूँ सार का ॥॥
×
Song 139 — Hindi
152. साध ले तन मन को अपने, मन से करले यह जतन ।।
सुरत को थिर कर मिलेगा, तुझको परमारथ को धन ।।।।
करनी में चित को लगादे, बातें कहना छोड़दे ।।
यह तो है करनी का साधन, तू लगादे इसमें मने ॥॥
थिर हो असन थिर हो बानी, थिर हो चित तेरा सदा ।।
आयेगी स्थिरता लगेगी, आप फिर सच्ची लगन ।।।।
प्रम और भक्ति के मारग में, है मुख्यता प्रम की ।
प्र में का श्रवण मनन हो, प्रेम ही का हो कथन ।।।।
राधास्वामी नाम ले, और नाम आठों याम ले ।
नाम का हो ध्यान सुमिरन, नाम ही का हो भजन ।।।
सुरत को थिर कर मिलेगा, तुझको परमारथ को धन ।।।।
करनी में चित को लगादे, बातें कहना छोड़दे ।।
यह तो है करनी का साधन, तू लगादे इसमें मने ॥॥
थिर हो असन थिर हो बानी, थिर हो चित तेरा सदा ।।
आयेगी स्थिरता लगेगी, आप फिर सच्ची लगन ।।।।
प्रम और भक्ति के मारग में, है मुख्यता प्रम की ।
प्र में का श्रवण मनन हो, प्रेम ही का हो कथन ।।।।
राधास्वामी नाम ले, और नाम आठों याम ले ।
नाम का हो ध्यान सुमिरन, नाम ही का हो भजन ।।।
×
Song 140 — Hindi
153. ध्यान में चित को लगा, बातें बनाना छोड़ दे ।
भरम और अज्ञान के, रस्ते में आना छोड़ दे ॥॥
सीस पर जब सतगुरु ने, हाथ तेरे रख दिया ।
मन में कर विश्वास, और धोके में जाना छोड़ दे ॥॥
काम वह आपहि करेगी, और करायेगा वही ।
आस कर सतगुरु की और, भव भय का खाना छोड़ दे ॥॥
चित हो चरनों में गुरु के, मन हो उसके ध्यान में ।
मोह और माया का मन में, ध्यान लाना छोड़ दे ॥॥
राधास्वामी नित जपा कर, जाप अजपा जाप हो ।
है यही करतब इसे कर, और बहाना छोड़ दे ॥॥
भरम और अज्ञान के, रस्ते में आना छोड़ दे ॥॥
सीस पर जब सतगुरु ने, हाथ तेरे रख दिया ।
मन में कर विश्वास, और धोके में जाना छोड़ दे ॥॥
काम वह आपहि करेगी, और करायेगा वही ।
आस कर सतगुरु की और, भव भय का खाना छोड़ दे ॥॥
चित हो चरनों में गुरु के, मन हो उसके ध्यान में ।
मोह और माया का मन में, ध्यान लाना छोड़ दे ॥॥
राधास्वामी नित जपा कर, जाप अजपा जाप हो ।
है यही करतब इसे कर, और बहाना छोड़ दे ॥॥
×
Song 141 — Hindi
154. त्याग दे आसा जगत की, आसा दुख का मूल है ।
आसा वाले के लिये जग, शम्भु का त्रिसूल है ॥॥
किसकी आसा कर रहा है, अस करती है निरास ।।
आसा ही अज्ञान है, और आसा तृष्णा भूल है ।।।।
पाके नर जीवन समझ ले, सार और निर्धान्त हो ।
फिर तुझे प्रतिकूल जग ही, सर्वदा अनुकूल है ॥॥
कृष्ण ने अर्जुन को यह, समझाया कर निष्काम कर्म ।।
मुस्कुराता हँसता खिलता, रह जो सच्चा फूल है ।।।।
राधास्वामी ने दया की, प्रेम का रस्ता दिया ।
प्रेम सब का सार है, और शेष मिट्टी धूल है ।।।।
आसा वाले के लिये जग, शम्भु का त्रिसूल है ॥॥
किसकी आसा कर रहा है, अस करती है निरास ।।
आसा ही अज्ञान है, और आसा तृष्णा भूल है ।।।।
पाके नर जीवन समझ ले, सार और निर्धान्त हो ।
फिर तुझे प्रतिकूल जग ही, सर्वदा अनुकूल है ॥॥
कृष्ण ने अर्जुन को यह, समझाया कर निष्काम कर्म ।।
मुस्कुराता हँसता खिलता, रह जो सच्चा फूल है ।।।।
राधास्वामी ने दया की, प्रेम का रस्ता दिया ।
प्रेम सब का सार है, और शेष मिट्टी धूल है ।।।।
×
Song 142 — Hindi
155. आस अब किसकी करू, जब दास तेरा होगया ।
मैं हुआ तेरा तो तू भी, स्वामी मेरा होगया ॥॥
तू है मेरे साथ पलछिन, क्यों हो अब चिन्ता कोई ।
मेरे घट में तेरे रहने का, जो डेरा होगया ।।।।
सीस पर तूने दया का, हाथ रख परिचय दिया।
मैंने समझा काल का, सब हेरा फेरा होगया ॥॥
जग नहीं स्थिर न, स्थिरताई जग की वस्तु में ।
यह तो चिड़िया रैन का, सचमुच बसेरा होगया ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
नाम भव के सिंध के, तरने का बेड़ा होगया ॥॥
मैं हुआ तेरा तो तू भी, स्वामी मेरा होगया ॥॥
तू है मेरे साथ पलछिन, क्यों हो अब चिन्ता कोई ।
मेरे घट में तेरे रहने का, जो डेरा होगया ।।।।
सीस पर तूने दया का, हाथ रख परिचय दिया।
मैंने समझा काल का, सब हेरा फेरा होगया ॥॥
जग नहीं स्थिर न, स्थिरताई जग की वस्तु में ।
यह तो चिड़िया रैन का, सचमुच बसेरा होगया ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
नाम भव के सिंध के, तरने का बेड़ा होगया ॥॥
×
Song 143 — Hindi
156 काम करता हूँ तेरा, स्वामी सदा निष्काम बन ।।
लाभ की और हानि की, चिंता नहीं कुछ मेरे मन ॥॥
मौज को लेकर सहारा, हूँ मैं जीवन काटता ।
चाहे रखे घर में चाहे, भेजदे तु सघन बन ॥॥
चित में क्यों हो भ्रान्ती, जब तू सहायक होगया ।
आस है तेरी दया की, और नहीं कोई जतन ॥॥
जीने की इच्छा नहीं, मरने से भय खाता नहीं ।
दोनों ही सम होगये हैं, मुझको अब जीवन मरन ।।।।
राधास्वामी नाम हो, होठों में सोते जागते ।।
राधास्वामी को हो निसदिन, ध्यान और सुमिरन भजन ।।।।
जग की लीला देख ली, स्वारथ के हैं साथी सभी ।
अपना कोई भी नहीं, इससे लगी तुझसे लगन ॥॥
स्तुति और निन्दा का डर, मन को सताता अब नहीं ।
मैं हूँ जैसा जानता है, तुझसे करू मैं क्या कथन ॥॥
मेरे दाता दीन हूँ, आधीन हूँ मैं सर्वदा ।।
यह दया कर तेरी बानी, का रहे श्रवन मनन ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम लू ।।
राधास्वामी छोड़कर, भावे नहीं कोई बचन ॥॥
लाभ की और हानि की, चिंता नहीं कुछ मेरे मन ॥॥
मौज को लेकर सहारा, हूँ मैं जीवन काटता ।
चाहे रखे घर में चाहे, भेजदे तु सघन बन ॥॥
चित में क्यों हो भ्रान्ती, जब तू सहायक होगया ।
आस है तेरी दया की, और नहीं कोई जतन ॥॥
जीने की इच्छा नहीं, मरने से भय खाता नहीं ।
दोनों ही सम होगये हैं, मुझको अब जीवन मरन ।।।।
राधास्वामी नाम हो, होठों में सोते जागते ।।
राधास्वामी को हो निसदिन, ध्यान और सुमिरन भजन ।।।।
जग की लीला देख ली, स्वारथ के हैं साथी सभी ।
अपना कोई भी नहीं, इससे लगी तुझसे लगन ॥॥
स्तुति और निन्दा का डर, मन को सताता अब नहीं ।
मैं हूँ जैसा जानता है, तुझसे करू मैं क्या कथन ॥॥
मेरे दाता दीन हूँ, आधीन हूँ मैं सर्वदा ।।
यह दया कर तेरी बानी, का रहे श्रवन मनन ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम लू ।।
राधास्वामी छोड़कर, भावे नहीं कोई बचन ॥॥
×
Song 144 — Hindi
157. नाम की औषधि मिली, संसार का क्यों रोग हो ।
नाम लेने वालों को क्यों, इस जगत में सोग हो ॥॥
नाम का साधन किया, जिसने उसे सब कुछ मिला ।।
लाभदायक अब उसे क्या, ज्ञान कर्म और योग है ॥॥
तीन तापों की है औषधि, राधास्वामी नाम एक ।
दुख सतावे किसको जब, गुरु नाम को संजोग है ॥॥
मेल है जब नाम से तब, सुख का मेला होगया ।।
नाम ही हो भगत को, जीवन यह उसका भोग है ॥॥
राधास्वामी नाम के, सुमिरन में सिद्धिं शक्ति है।
योगी पूरी कर कमाई, नाम ही का जोग है ॥॥
नाम लेने वालों को क्यों, इस जगत में सोग हो ॥॥
नाम का साधन किया, जिसने उसे सब कुछ मिला ।।
लाभदायक अब उसे क्या, ज्ञान कर्म और योग है ॥॥
तीन तापों की है औषधि, राधास्वामी नाम एक ।
दुख सतावे किसको जब, गुरु नाम को संजोग है ॥॥
मेल है जब नाम से तब, सुख का मेला होगया ।।
नाम ही हो भगत को, जीवन यह उसका भोग है ॥॥
राधास्वामी नाम के, सुमिरन में सिद्धिं शक्ति है।
योगी पूरी कर कमाई, नाम ही का जोग है ॥॥
×
Song 145 — Hindi
158. एक चिन्ता नाम की कर, जग की चिन्ता मेटकर ।।
चलते फिरते नाम ले तू , बैठकर या लेटकर ॥॥
गुरु के चरणों में झुका, मस्तक डहे सब मान मद ।
कर कमाई भक्ति की, और प्रेम गुरु के भंट कर ।।।।
चित से कब जाने लगा है, मान मद हंकार का ।
सीस अपना राधास्वामी, पद के आगे भेंट कर ।।।।
चलते फिरते नाम ले तू , बैठकर या लेटकर ॥॥
गुरु के चरणों में झुका, मस्तक डहे सब मान मद ।
कर कमाई भक्ति की, और प्रेम गुरु के भंट कर ।।।।
चित से कब जाने लगा है, मान मद हंकार का ।
सीस अपना राधास्वामी, पद के आगे भेंट कर ।।।।
×
Song 146 — Hindi
159. तेरी लीला कौन समझे, तु, तो अपरम्पार है।
एक दृष्टि से तेरे, दुखियों का बेड़ा पार है ।।।।
दुख में सुख रहता है तो, हमको नया कुछ भी नहीं ।
मौज को क्या जीव जाने, दुविधा का सिर भार है ।।।।
दुख में सुख रहता है छुपकर, कष्ट का परिणाम सुख ।
बन्ध में मुक्ति की छाया, मुक्ति बन्धाकार है ॥॥॥ ।।
राधास्वामी पूरे सतगुरु, ने बताया भेद को ।
मन में अब चिन्ता नहीं है, सुखदाई यह संसार है ॥॥
एक दृष्टि से तेरे, दुखियों का बेड़ा पार है ।।।।
दुख में सुख रहता है तो, हमको नया कुछ भी नहीं ।
मौज को क्या जीव जाने, दुविधा का सिर भार है ।।।।
दुख में सुख रहता है छुपकर, कष्ट का परिणाम सुख ।
बन्ध में मुक्ति की छाया, मुक्ति बन्धाकार है ॥॥॥ ।।
राधास्वामी पूरे सतगुरु, ने बताया भेद को ।
मन में अब चिन्ता नहीं है, सुखदाई यह संसार है ॥॥
×
Song 147 — Hindi
160. कोई दुख सुख का नहीं, दाता तेरी है भूल सब ।।
कर्म अपने करते हैं, अनुकूल और प्रतिकूल सब ॥॥
कर्म की प्रधानता की, क्या नहीं तुझको समझ ।
कर्म से आनन्द है, और कर्म ही है सूल सब ॥॥
यह जगत है वाटिका, करते हैं प्रानी आके काम ।
कर्म के अनुसार इनके, काँटे हैं और फूल सब ॥॥
जो ठगेगा वह ठगा जायेगा, निस्संदेह आप ।।
प्रेमीजन ही पाते हैं, और प्रेम के बहुमूल सब ॥॥
अपनी करनी आप भरनी, पड़ती है संसार में ।।
अपने घर की आप उठाया, करते ही हैं चूल सब ॥॥
किस भरम में तू पड़ा, औरों की बात छोड़ दे।
काम में लग अपने करले, कर्म निज अनुकूल सब ॥॥
राधास्वामी नाम भज, झगड़ों से बचकर रह सदा ।
जो नहीं समझा तो पढ़ना, लिखना होगा धूल सब ।।।।
कर्म अपने करते हैं, अनुकूल और प्रतिकूल सब ॥॥
कर्म की प्रधानता की, क्या नहीं तुझको समझ ।
कर्म से आनन्द है, और कर्म ही है सूल सब ॥॥
यह जगत है वाटिका, करते हैं प्रानी आके काम ।
कर्म के अनुसार इनके, काँटे हैं और फूल सब ॥॥
जो ठगेगा वह ठगा जायेगा, निस्संदेह आप ।।
प्रेमीजन ही पाते हैं, और प्रेम के बहुमूल सब ॥॥
अपनी करनी आप भरनी, पड़ती है संसार में ।।
अपने घर की आप उठाया, करते ही हैं चूल सब ॥॥
किस भरम में तू पड़ा, औरों की बात छोड़ दे।
काम में लग अपने करले, कर्म निज अनुकूल सब ॥॥
राधास्वामी नाम भज, झगड़ों से बचकर रह सदा ।
जो नहीं समझा तो पढ़ना, लिखना होगा धूल सब ।।।।
×
Song 148 — Hindi
161. राधास्वामी मेरी विनती, प्रेम से सुन लीजिये ।
चित हटाकर जगत से, चरणों की छाया दीजिये ॥॥
मन हो निश्चल ध्यान धरने, से वह उकताये नहीं ।
सुरत ठहरे और ठहरने, से वह घबराये नहीं ॥॥
रात दिन सुमिरन हो रसना, नाम का रस ले सदा ।।
मैं भजू हित चित से गुरु के, नाम ही को सर्वदा ॥॥
रूप का हो ध्यान सुमिरन, नाम का अन्तर में हो ।
शब्द का साधन भजन हो, तन की सुधबुध सारी खो ॥॥
तन मन में इन्द्रियों में बुद्धि, और तुम चित में बसो ।
अंग संग दिन रात मेरे, घट के भीतर तुम रहो ॥॥
हाथ में आओ करू, व्यौहार मैं उपकार के ।
पाँव ऐसे हों, चलू मैं पन्थ में करतार के ॥॥
आँख में बैठो जगत मैं, आपकी मूरत लखें ।।
कान में बैठो सदा मैं, शब्द अनहद का सुनू ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते रहो तुम साथ में ।
सहज में आजाये, परमारथ की निधि सिधि हाथ में ॥॥
मेरा आपा लय तुम्हारे, आपो में होजाये अब ।।
सुरत जागे गगन में, पृथवी में वह सो जाये अब ॥6॥
तू का मैं का मिथ्या झगड़ा, छूटे जीवन मुक्त हूँ ।
शुद्ध निर्मल आत्मा हो, सुख से आनन्द से जिऊँ ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर, हो सत करतार हो ।
ऐसी कृपा कीजिये, अब लोप यह संसार हो ॥॥
चित हटाकर जगत से, चरणों की छाया दीजिये ॥॥
मन हो निश्चल ध्यान धरने, से वह उकताये नहीं ।
सुरत ठहरे और ठहरने, से वह घबराये नहीं ॥॥
रात दिन सुमिरन हो रसना, नाम का रस ले सदा ।।
मैं भजू हित चित से गुरु के, नाम ही को सर्वदा ॥॥
रूप का हो ध्यान सुमिरन, नाम का अन्तर में हो ।
शब्द का साधन भजन हो, तन की सुधबुध सारी खो ॥॥
तन मन में इन्द्रियों में बुद्धि, और तुम चित में बसो ।
अंग संग दिन रात मेरे, घट के भीतर तुम रहो ॥॥
हाथ में आओ करू, व्यौहार मैं उपकार के ।
पाँव ऐसे हों, चलू मैं पन्थ में करतार के ॥॥
आँख में बैठो जगत मैं, आपकी मूरत लखें ।।
कान में बैठो सदा मैं, शब्द अनहद का सुनू ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते रहो तुम साथ में ।
सहज में आजाये, परमारथ की निधि सिधि हाथ में ॥॥
मेरा आपा लय तुम्हारे, आपो में होजाये अब ।।
सुरत जागे गगन में, पृथवी में वह सो जाये अब ॥6॥
तू का मैं का मिथ्या झगड़ा, छूटे जीवन मुक्त हूँ ।
शुद्ध निर्मल आत्मा हो, सुख से आनन्द से जिऊँ ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर, हो सत करतार हो ।
ऐसी कृपा कीजिये, अब लोप यह संसार हो ॥॥
×
Song 149 — Hindi
162.कौन कहता है तुम्हें, भाई कि संसारी बनो ।
मैं यह कहता हूँ कि तुम, भक्ति के अधिकारी बनो ॥॥
चित रहे गुरु के चरन में, मन रहे गुरु ध्यान में ।।
चाहे तुम परमारथी हो, चाहे व्यौपारी बनो ॥॥
हाट में संसार के, आये हो सौदा के लिये ।।
प्रेम का व्यौहार करके, सच्चे व्यौपारी बनो ॥॥
साथ अपने औरों के भी, हित को तुमको ध्यान हो ।
अपना हित करते रहो, औरों के भी हितकारी बनो ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
पाके नर तन रहके तन में, तुम निःहंकारी बनो ।।।।
मैं यह कहता हूँ कि तुम, भक्ति के अधिकारी बनो ॥॥
चित रहे गुरु के चरन में, मन रहे गुरु ध्यान में ।।
चाहे तुम परमारथी हो, चाहे व्यौपारी बनो ॥॥
हाट में संसार के, आये हो सौदा के लिये ।।
प्रेम का व्यौहार करके, सच्चे व्यौपारी बनो ॥॥
साथ अपने औरों के भी, हित को तुमको ध्यान हो ।
अपना हित करते रहो, औरों के भी हितकारी बनो ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
पाके नर तन रहके तन में, तुम निःहंकारी बनो ।।।।
×
Song 150 — Hindi
163. मौज की आई परख अब, चित में दुचिताई कहाँ ।
मौज के होते हुये, दुचिताई फिर आई कहाँ ।।।।
करने वाला काम करता है, हमारा नाम है।
करतो धरता आप वह, कुछ मुझसे बन आई कहाँ ॥॥
अगमा पाई जगत है, दो दिन के मेले का है ढंग ।।
बिछड़ेंगे सब एक दिन, माँबाप और भाई कहाँ ॥॥
और को है हाथ और, तलवार करती काट है ।
काट हर तलवार कब, अपनी कभी लाई कहाँ ॥॥
मित्र से क्या नेह और, क्या शत्रुओं से द्वेष हो ।
मित्रता और शत्रुता, किस पुरुष को भाई कहाँ ॥॥
सब ही उसके वह है सब को, सबको उससे काम है।
तूने निष्फल और मिथ्या, ममता को पाई कहाँ ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु ने, हटाया फंद को ।।
सब का दाता आप वह है, दाई और माई कहाँ ।।।।
मौज के होते हुये, दुचिताई फिर आई कहाँ ।।।।
करने वाला काम करता है, हमारा नाम है।
करतो धरता आप वह, कुछ मुझसे बन आई कहाँ ॥॥
अगमा पाई जगत है, दो दिन के मेले का है ढंग ।।
बिछड़ेंगे सब एक दिन, माँबाप और भाई कहाँ ॥॥
और को है हाथ और, तलवार करती काट है ।
काट हर तलवार कब, अपनी कभी लाई कहाँ ॥॥
मित्र से क्या नेह और, क्या शत्रुओं से द्वेष हो ।
मित्रता और शत्रुता, किस पुरुष को भाई कहाँ ॥॥
सब ही उसके वह है सब को, सबको उससे काम है।
तूने निष्फल और मिथ्या, ममता को पाई कहाँ ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु ने, हटाया फंद को ।।
सब का दाता आप वह है, दाई और माई कहाँ ।।।।
×
Song 151 — Hindi
164. तेरे घट में राधास्वामी, राधास्वामी नाम है।
घट के भीतर तू परखले, राधास्वामी धाम है ॥॥
एक कर व्यौहार परमारथ, जो दीक्षा भिल गई।
शब्द के साधन में लगजा, शब्द से बिसराम है ।।।।
लाभ और हानी की चिंता, को न आने चित में दे।
काम कर मन को लगाकर, काम ही से काम है ॥॥
जिसके मन में शान्ती हो, भ्रान्ती से वह बचे ।
भ्रान्ती व्याये नहीं अब; शान्ती आठों याम है ।।।।
जिसने गुरु को मुख्य समझा, कहते हैं गुरुमुरव उसे ।।
भय नहीं है भेद का, नहीं दंड को नहीं साम को ।।।।
दास को दुर्लभ नहीं है, कृतकार्यता गुरु दया से ।।
प्राप्त उसको धर्म अर्थ और, मोक्ष है और काम है ॥॥
राधास्वामी सब जगह हैं, सिंध में और बुन्द में ।
मोती और मू गे में भी, यह समझो तब बिसराम है ॥॥
घट के भीतर तू परखले, राधास्वामी धाम है ॥॥
एक कर व्यौहार परमारथ, जो दीक्षा भिल गई।
शब्द के साधन में लगजा, शब्द से बिसराम है ।।।।
लाभ और हानी की चिंता, को न आने चित में दे।
काम कर मन को लगाकर, काम ही से काम है ॥॥
जिसके मन में शान्ती हो, भ्रान्ती से वह बचे ।
भ्रान्ती व्याये नहीं अब; शान्ती आठों याम है ।।।।
जिसने गुरु को मुख्य समझा, कहते हैं गुरुमुरव उसे ।।
भय नहीं है भेद का, नहीं दंड को नहीं साम को ।।।।
दास को दुर्लभ नहीं है, कृतकार्यता गुरु दया से ।।
प्राप्त उसको धर्म अर्थ और, मोक्ष है और काम है ॥॥
राधास्वामी सब जगह हैं, सिंध में और बुन्द में ।
मोती और मू गे में भी, यह समझो तब बिसराम है ॥॥
×
Song 152 — Hindi
165. क्या कहूँ सुमिरन नियम, संजम है सुमिरन योग है।
धारना है ध्यान सुख, आनन्द मंगल भोग है ॥॥
ज्ञान का फाटक है सुमिरन, ज्ञान का वह धाम है।
भाग वाला है जिसे, सुमिरन से कुछ संजोग है ॥॥
सुख की चाहत हो करो, सुमिरन कि दुख संकट हटे ।।
औषधि इसकी करो, तुमको जो भवका रोग है ॥॥
इससे बढ़कर कुछ नहीं, वृत्ती में जो दृढ़ता रहे ।
लौ लगे गुरुचरन में, अन्तर जो मन में सोग है ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो सोते जागते ।।
उसकी महिमा से यहाँ, अनजान सारा लोग है ॥॥
धारना है ध्यान सुख, आनन्द मंगल भोग है ॥॥
ज्ञान का फाटक है सुमिरन, ज्ञान का वह धाम है।
भाग वाला है जिसे, सुमिरन से कुछ संजोग है ॥॥
सुख की चाहत हो करो, सुमिरन कि दुख संकट हटे ।।
औषधि इसकी करो, तुमको जो भवका रोग है ॥॥
इससे बढ़कर कुछ नहीं, वृत्ती में जो दृढ़ता रहे ।
लौ लगे गुरुचरन में, अन्तर जो मन में सोग है ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो सोते जागते ।।
उसकी महिमा से यहाँ, अनजान सारा लोग है ॥॥
×
Song 153 — Hindi
166. जिसकी तुझको खोज है, परगट वह तेरे मन में है।
भर्मा भूला भटका क्यों, दिन रात घर और बन में है ॥॥
इन्द्रियों में है वही, बुद्धि में चित अहंकार में।
मास में है प्रान में, नस नाड़ी में और तन में है ॥॥
खोल कर कहता नहीं, कोई कभी इस बात को ।
अपने आये को समझ, वह तेरे आपापन में है ॥॥
तू कहाँ और किसमें करता है, भजन किसके लिये ।।
सोच इसको मन में वह, अन्तर तेरे पल छिन में है ॥॥
राधास्वामी धाम घट में, घट में राधास्वामी नाम ।
सुरत में वह शब्द में वह, और वही साधन में है ॥॥
भर्मा भूला भटका क्यों, दिन रात घर और बन में है ॥॥
इन्द्रियों में है वही, बुद्धि में चित अहंकार में।
मास में है प्रान में, नस नाड़ी में और तन में है ॥॥
खोल कर कहता नहीं, कोई कभी इस बात को ।
अपने आये को समझ, वह तेरे आपापन में है ॥॥
तू कहाँ और किसमें करता है, भजन किसके लिये ।।
सोच इसको मन में वह, अन्तर तेरे पल छिन में है ॥॥
राधास्वामी धाम घट में, घट में राधास्वामी नाम ।
सुरत में वह शब्द में वह, और वही साधन में है ॥॥
×
Song 154 — Hindi
167. घट में दर्शन पाओगे, संदेह कुछ इसमें नहीं ।
मैं तो घट में हूँ तुम्हारे, ढूंढ़ लो मुझको वहीं ॥॥
शब्द सुनते हो मेरा, अन्तर में चित को साध कर ।।
सुरत मेरा रूप है, इसको समझ लेना यहीं ॥॥
सूक्ष्म हूँ स्थूल हूँ, कारन हूँ कारन से परे ।
देख दृश्टि को जमाकर, अपने अन्तर में कहीं ॥॥
चाह जब दरशन की होगी, देख लोगे आप, तुम ।।
जागते में सोते में, संध्या में मैं हूँ सब कहीं ॥॥
राधास्वामी धाम में, सेवक हूँ राधास्वामी को ।
मेल मेला राम में, इसकी परख आई नहीं ॥॥
मैं तो घट में हूँ तुम्हारे, ढूंढ़ लो मुझको वहीं ॥॥
शब्द सुनते हो मेरा, अन्तर में चित को साध कर ।।
सुरत मेरा रूप है, इसको समझ लेना यहीं ॥॥
सूक्ष्म हूँ स्थूल हूँ, कारन हूँ कारन से परे ।
देख दृश्टि को जमाकर, अपने अन्तर में कहीं ॥॥
चाह जब दरशन की होगी, देख लोगे आप, तुम ।।
जागते में सोते में, संध्या में मैं हूँ सब कहीं ॥॥
राधास्वामी धाम में, सेवक हूँ राधास्वामी को ।
मेल मेला राम में, इसकी परख आई नहीं ॥॥
×
Song 155 — Hindi
168. कुछ नहीं दुर्गम सुगम सब, कुछ जो गुरु के दास हो ।।
दास वह सच्चा है, जिसमें भक्ति हो विश्वास हो ॥॥
मैं हूँ तुझमें तू है मुझमें, मेरा तेरा है भरम ।।
छोड़ मैं तू को भरम, निज रूप की जब आस हो ॥॥
मुझको सुमिरो मुझको ध्याचो, हो भजन मेरा सदा ।
ध्यान सुमिरन और भजन की, रीत साँसों साँस हो ।।।।
हुँगा प्रगट जब बुलाओगे, कभी तुम चाह से।
मेरे रहने की जगह, भूमी नहीं आकाश हो ॥॥
राधास्वामी ने दया की, भेद अन्तर का दिया ।
देख लोगे मुझको जब, नित शब्द का अभ्यास हो ।।।।
दास वह सच्चा है, जिसमें भक्ति हो विश्वास हो ॥॥
मैं हूँ तुझमें तू है मुझमें, मेरा तेरा है भरम ।।
छोड़ मैं तू को भरम, निज रूप की जब आस हो ॥॥
मुझको सुमिरो मुझको ध्याचो, हो भजन मेरा सदा ।
ध्यान सुमिरन और भजन की, रीत साँसों साँस हो ।।।।
हुँगा प्रगट जब बुलाओगे, कभी तुम चाह से।
मेरे रहने की जगह, भूमी नहीं आकाश हो ॥॥
राधास्वामी ने दया की, भेद अन्तर का दिया ।
देख लोगे मुझको जब, नित शब्द का अभ्यास हो ।।।।
×
Song 156 — Hindi
169. जब तुम्हें चिन्ता सतावे, गुरु का तुमको ध्यान हो ।
मिट रहे अज्ञान पल छिन, में जो सच्चा ज्ञान हो ।।।।
दुख में संकट में बिपत में, सोच में चिन्ता में भी ।
नाम की सुमिरन सदा हो, नाम का अनुमान हो ॥॥
सोते उठते बैठते, और खाते पीते जागते ।।
गुरु को अपने पास समझो, परचे का परमान हो ॥॥
कौनसी आपत है जो, टाले नहीं टलती कभी ।।
नाम है हथियार जानो, तुम नहीं अनजान हो ॥॥
राधास्वामी की दया से, जब शरण तुझको मिली ।।
कुछ दिनों अभ्यास पीछे, जीते जी निरवान हो ॥॥
मिट रहे अज्ञान पल छिन, में जो सच्चा ज्ञान हो ।।।।
दुख में संकट में बिपत में, सोच में चिन्ता में भी ।
नाम की सुमिरन सदा हो, नाम का अनुमान हो ॥॥
सोते उठते बैठते, और खाते पीते जागते ।।
गुरु को अपने पास समझो, परचे का परमान हो ॥॥
कौनसी आपत है जो, टाले नहीं टलती कभी ।।
नाम है हथियार जानो, तुम नहीं अनजान हो ॥॥
राधास्वामी की दया से, जब शरण तुझको मिली ।।
कुछ दिनों अभ्यास पीछे, जीते जी निरवान हो ॥॥
×
Song 157 — Hindi
170. तू दया का रूप प्यारे, तू दया भंडार है।
कर दयादृष्टि दया मय, तुझ ही से अधिकार है ॥॥
सन्त सतगुरु तुझको कहते हैं, नहीं हैं जानता ।
मेरे अनुभव में, दया करुणा का तू भंडार है ॥॥
मेरे दाता सीस, पर, मेरे दया का हाथ रख ।।
तू है दानी दीनबन्धु, जगत का दातार है ॥॥
मेरे अन्तर में समाना, मेरे साँसों साँस में ।।
तू है व्यापक यह समझ दे, सच्चा जो अधिकार है ॥॥
आस रख कर गुरु कृपा की, नित करो अभ्यास तुम ।।
रात दिन छिन छिन तुम्हारा, वह सदा रखवार है ॥॥
छोड़ो ममता छल कपट, चतुराई गुरु से नेह जोड़ ।।
भक्ति उसकी कर वह सच्चा, प्रेम का भंडार है ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी को सुमिर ।।
राधास्वामी सर्व रक्षक, सर्वदा हितकार है ।।।।
कर दयादृष्टि दया मय, तुझ ही से अधिकार है ॥॥
सन्त सतगुरु तुझको कहते हैं, नहीं हैं जानता ।
मेरे अनुभव में, दया करुणा का तू भंडार है ॥॥
मेरे दाता सीस, पर, मेरे दया का हाथ रख ।।
तू है दानी दीनबन्धु, जगत का दातार है ॥॥
मेरे अन्तर में समाना, मेरे साँसों साँस में ।।
तू है व्यापक यह समझ दे, सच्चा जो अधिकार है ॥॥
आस रख कर गुरु कृपा की, नित करो अभ्यास तुम ।।
रात दिन छिन छिन तुम्हारा, वह सदा रखवार है ॥॥
छोड़ो ममता छल कपट, चतुराई गुरु से नेह जोड़ ।।
भक्ति उसकी कर वह सच्चा, प्रेम का भंडार है ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी को सुमिर ।।
राधास्वामी सर्व रक्षक, सर्वदा हितकार है ।।।।
×
Song 158 — Hindi
171. गुरु के चरनों में पड़ा जब, बन गया मेरा जनम ।।
बन गया अब बन गया, फिर क्या बिगाड़ेगा करम ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते में सुमिरन नाम का ।। ।।
यह धरम मेरा हुआ, क्या धारू अब दूजा धरम ॥॥
भूला भटका काल माया, ने किया मेरा अकाज ।
मिल गये सतगुरु छुटा, जन्मों का अब सारा भरम ॥॥
सैकड़ों पोथी पढ़ीं, निकला न कोई मेरा काम ।
गुरु की संगत पाई तब, सूझा ठिकाने का मरम ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
हो दया सुमिरन भजन, और ध्यान हो मेरा नियम ॥॥
बन गया अब बन गया, फिर क्या बिगाड़ेगा करम ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते में सुमिरन नाम का ।। ।।
यह धरम मेरा हुआ, क्या धारू अब दूजा धरम ॥॥
भूला भटका काल माया, ने किया मेरा अकाज ।
मिल गये सतगुरु छुटा, जन्मों का अब सारा भरम ॥॥
सैकड़ों पोथी पढ़ीं, निकला न कोई मेरा काम ।
गुरु की संगत पाई तब, सूझा ठिकाने का मरम ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
हो दया सुमिरन भजन, और ध्यान हो मेरा नियम ॥॥
×
Song 159 — Hindi
172. कहता हूँ सच घट में तेरे, राधास्वामी धाम है ।।
घट में सतगुरु सत की संगत, सत सभा सत नाम है ॥॥
होगया बाहर मुखी तब, भूला अपने आप को ।।
धेस के अन्तर खोज अन्तर, ही में सबका ठाम है ॥॥
मैं हूँ तेरे घट का बासी, और नहीं तुझ से पृथक ।।
मिलता हैं चिंता जिसे, मेरी ही आठों याम है ॥॥
राधास्वामी धाम को, दर्शन जो घट में हो तुझे ।।
जीते जी निर्वाण सुख, आनन्द और बिसराम है ॥॥
घट में सतगुरु सत की संगत, सत सभा सत नाम है ॥॥
होगया बाहर मुखी तब, भूला अपने आप को ।।
धेस के अन्तर खोज अन्तर, ही में सबका ठाम है ॥॥
मैं हूँ तेरे घट का बासी, और नहीं तुझ से पृथक ।।
मिलता हैं चिंता जिसे, मेरी ही आठों याम है ॥॥
राधास्वामी धाम को, दर्शन जो घट में हो तुझे ।।
जीते जी निर्वाण सुख, आनन्द और बिसराम है ॥॥
×
Song 160 — Hindi
173. छोड़ खटपट मन की अपने मन में अपना रूप देख ।।
मन ही के दरपन में जग की, सब प्रजा और भूप देख ॥॥
मन ही विष्णु लोक है, सत लोक है धुर धाम है।
मन में अमृत कुन्ड मन में, नरक का भी कूप देख ॥॥
सोचकर तब खोल मुह को, सिद्धि सारी मन में है ।
मन की साधारण गति है, मन में अगम अनूप देख ॥॥
मन में सब की खान है, मन गुन है मन निगुन सगुन ।
मन में रूप स्वरूप है, और मन में अपना रूप देख ॥॥
साध ले निजं मन को अब तू , शब्द के अभ्यास से ।।
सिर झुका चरनों में मन में, राधास्वामी भूप देख ॥॥
मन ही के दरपन में जग की, सब प्रजा और भूप देख ॥॥
मन ही विष्णु लोक है, सत लोक है धुर धाम है।
मन में अमृत कुन्ड मन में, नरक का भी कूप देख ॥॥
सोचकर तब खोल मुह को, सिद्धि सारी मन में है ।
मन की साधारण गति है, मन में अगम अनूप देख ॥॥
मन में सब की खान है, मन गुन है मन निगुन सगुन ।
मन में रूप स्वरूप है, और मन में अपना रूप देख ॥॥
साध ले निजं मन को अब तू , शब्द के अभ्यास से ।।
सिर झुका चरनों में मन में, राधास्वामी भूप देख ॥॥
×
Song 161 — Hindi
174. ज्ञान दीजे ज्ञान दाता, ज्ञान के भंडार से ।
सहज छुटकारा मिले, सबको कठिन संसार से ॥॥
कहने को तो बंध मुक्ति, कल्पना मन की सही ।।
बिन दया सतगुरु के वह, भिटते नहीं हैं जीते जी ॥॥
नाम का दे आसरा, चरनों में अपने लीजिये।
शब्द की महिमा बताकर, अपनी सेवक कीजिये ॥॥
सच्चिदानन्दम् अखंडम्, केवलम् निज रूप हो ।
निज दया से जाये, दुखदाई महा भव कूप खो ॥॥
आपका है आसरा, और आपको विश्वास है ।।
राधास्वामी तारिये, यह भी तुम्हारा दास है ।।।।
सहज छुटकारा मिले, सबको कठिन संसार से ॥॥
कहने को तो बंध मुक्ति, कल्पना मन की सही ।।
बिन दया सतगुरु के वह, भिटते नहीं हैं जीते जी ॥॥
नाम का दे आसरा, चरनों में अपने लीजिये।
शब्द की महिमा बताकर, अपनी सेवक कीजिये ॥॥
सच्चिदानन्दम् अखंडम्, केवलम् निज रूप हो ।
निज दया से जाये, दुखदाई महा भव कूप खो ॥॥
आपका है आसरा, और आपको विश्वास है ।।
राधास्वामी तारिये, यह भी तुम्हारा दास है ।।।।
×
Song 162 — Hindi
175. जब दया गुरु की हुई, चरनों की भक्ति मिल गई ।।
सब निबलता मिट गई, निश्चय की शक्ति मिल गई ॥॥
आगये सतसंग में, और संग सत का हो गया।
दुर्मति जाती रही, जब गुरु के मत का हो गया ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, पीते ही मतवाला बना ।।
मन की सुध बुध खोगई, भोला बना भाला बनीं ॥॥
पांच में मस्तक नवाया, चित से धारा गुरु का रंग ।
कीट जिसको पहिले सब, कहते थे अब ठहरा भिरंग ॥॥
आप में आपा लखा, आपे में पा ज्ञान था ।
। भरम में लटका हुआ, भूला था और अज्ञान था ।।।।
शब्द के सुनते ही अन्तर, में जो विरती सोगई ।।
छिन पल में वासना, माया की सारी खोगई ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राग को ।।
गारहा हूँ धन्य मैं, कहता हूँ अपने भाग को ॥॥
सब निबलता मिट गई, निश्चय की शक्ति मिल गई ॥॥
आगये सतसंग में, और संग सत का हो गया।
दुर्मति जाती रही, जब गुरु के मत का हो गया ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, पीते ही मतवाला बना ।।
मन की सुध बुध खोगई, भोला बना भाला बनीं ॥॥
पांच में मस्तक नवाया, चित से धारा गुरु का रंग ।
कीट जिसको पहिले सब, कहते थे अब ठहरा भिरंग ॥॥
आप में आपा लखा, आपे में पा ज्ञान था ।
। भरम में लटका हुआ, भूला था और अज्ञान था ।।।।
शब्द के सुनते ही अन्तर, में जो विरती सोगई ।।
छिन पल में वासना, माया की सारी खोगई ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राग को ।।
गारहा हूँ धन्य मैं, कहता हूँ अपने भाग को ॥॥
×
Song 163 — Hindi
176. है यही शिक्षा गुरु की, गुरु का गुन गाओ सदा ।।
गुरु चरन में करदो अरपन, देह धन मन सर्वदा ॥॥
गुरु तुम्हारे घट में है, घट ही में दर्शन की चाह ।
शब्द गुरु का संग हो, कोई नहीं गुरु दूसरा ॥॥
वह तुम्हारा तुम हो उसके, है वह घट में रात दिन ।
घट में दुदो घट में पाओ, घट का परदा दो उठा ॥॥
वह अघट व्यापा है घट में, घट ही में पाओगे तुम ।
बात मैं कहता हूँ सच, जिसको मिला घट में मिला ॥॥
राधास्वामी की दया से पूरा करलो काम अब ।।
नाम लो बिसराम लो, धन धाम लो तुम घट में अब ॥॥
गुरु चरन में करदो अरपन, देह धन मन सर्वदा ॥॥
गुरु तुम्हारे घट में है, घट ही में दर्शन की चाह ।
शब्द गुरु का संग हो, कोई नहीं गुरु दूसरा ॥॥
वह तुम्हारा तुम हो उसके, है वह घट में रात दिन ।
घट में दुदो घट में पाओ, घट का परदा दो उठा ॥॥
वह अघट व्यापा है घट में, घट ही में पाओगे तुम ।
बात मैं कहता हूँ सच, जिसको मिला घट में मिला ॥॥
राधास्वामी की दया से पूरा करलो काम अब ।।
नाम लो बिसराम लो, धन धाम लो तुम घट में अब ॥॥
×
Song 164 — Hindi
177. दुहृता फिरता है किसको, दुइ वह तु आप है।
तू नहीं समझा अभी तक, यह हृदय का ताप है ॥॥
चाह करना हो तो कर, अपनी यही अच्छी है चाह ।।
भूठे बेटे और बहू सब, झूठे माँ और बाप है ॥॥
त्याग चिंता मन से संबकी, अब समझले मर्म को ।
क्या कहूँ चिन्ता का निसदिन, तुझको रहता ताप है ॥॥
तूने अपने को फंसाया, मोह के जंजाल में ।
मोह माया कल्पना यह, मन की तोल और नाप है ॥॥
आप ही अपनी परख कर, आप को पहचान ले ।
तू अकेला एक है, संसार सब चुपचाप है ।।॥
करले संगत गुरु की कुछ दिन, आये आये की समझ)।
गढ़ के मूरत मूरती, पूजक बना क्यों आप है ॥॥
राधास्वामी की दया से, ज्ञान हो निज आप का ।।
आप निज को भूलना ही, है भरम और पाप है ॥॥
तू नहीं समझा अभी तक, यह हृदय का ताप है ॥॥
चाह करना हो तो कर, अपनी यही अच्छी है चाह ।।
भूठे बेटे और बहू सब, झूठे माँ और बाप है ॥॥
त्याग चिंता मन से संबकी, अब समझले मर्म को ।
क्या कहूँ चिन्ता का निसदिन, तुझको रहता ताप है ॥॥
तूने अपने को फंसाया, मोह के जंजाल में ।
मोह माया कल्पना यह, मन की तोल और नाप है ॥॥
आप ही अपनी परख कर, आप को पहचान ले ।
तू अकेला एक है, संसार सब चुपचाप है ।।॥
करले संगत गुरु की कुछ दिन, आये आये की समझ)।
गढ़ के मूरत मूरती, पूजक बना क्यों आप है ॥॥
राधास्वामी की दया से, ज्ञान हो निज आप का ।।
आप निज को भूलना ही, है भरम और पाप है ॥॥
×
Song 165 — Hindi
178. सहज में भव पार कर दो, नाव है मॅझधार में ।
है। तुम्हारे हाथ रक्षा, हूँ दुखी संसार में ॥॥
शब्द साखी क्या सुनू मैं, सुनते जी अब भर गया ।
मुझको जीता अब न समझो, जीते जी मैं मर गया ॥॥
तुमने मेरी बांह पकड़ी, अब तुम्हीं को लाज है।
राधास्वामी सतगुरु मेरे, मेरा अटका कांज है ॥॥
है। तुम्हारे हाथ रक्षा, हूँ दुखी संसार में ॥॥
शब्द साखी क्या सुनू मैं, सुनते जी अब भर गया ।
मुझको जीता अब न समझो, जीते जी मैं मर गया ॥॥
तुमने मेरी बांह पकड़ी, अब तुम्हीं को लाज है।
राधास्वामी सतगुरु मेरे, मेरा अटका कांज है ॥॥
×
Song 166 — Hindi
179. मन मगन जब होगया, और उसे क्या चाहिये ।
मन की दुचिताई मिटे, और दुविधा चाहिये ।।।।
है यह मन चंचल इसे, निश्चल करो अभ्यास से ।।
रात दिन उसको गुरु, पद से लगाना चाहिये ।।।।
जब गुनाचन यह मचावे, नाम का सुमिरन करो ।।
जो न समझो बात यह, सतगुरु से पूछा चाहिये ॥॥
एक संशय भी न रहने पाये, संशय कष्ट है।
करले संगत यह भरम, चित से मिटाना चाहिये ॥॥
राधास्वामी की दया से, इसका परिचय ले सदा ।।
पाके परिचय अपने अनुभव को बढ़ाना चाहिये ।।।।
मन की दुचिताई मिटे, और दुविधा चाहिये ।।।।
है यह मन चंचल इसे, निश्चल करो अभ्यास से ।।
रात दिन उसको गुरु, पद से लगाना चाहिये ।।।।
जब गुनाचन यह मचावे, नाम का सुमिरन करो ।।
जो न समझो बात यह, सतगुरु से पूछा चाहिये ॥॥
एक संशय भी न रहने पाये, संशय कष्ट है।
करले संगत यह भरम, चित से मिटाना चाहिये ॥॥
राधास्वामी की दया से, इसका परिचय ले सदा ।।
पाके परिचय अपने अनुभव को बढ़ाना चाहिये ।।।।
×
Song 167 — Hindi
180. राधास्वामी माँ हैं मेरे, राधास्वामी बाप हैं ।।
राधास्वामी मित्र गुरु, सम्बन्धी सब कुछ आप हैं ॥॥
राधास्वामी कर्म भक्ति, राधास्वामी ज्ञान हैं।
राधास्वामी ध्यान सुमिरन, और भजन अनुमान हैं ॥॥
राधास्वामी सिद्धि शक्ति, परम पद और मुक्ति है।
राधास्वामी साधना हैं, योग है और युक्ति हैं ॥॥
राधास्वामी करता थरता, राधास्वामी भूप हैं।
राधास्वामी सिंध सद्गति, ताल झील और कूप हैं ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, नाम का परिचय दिया ।
नाम हैं वह रूप हैं वह, और अनाम अरूप हैं ॥॥
राधास्वामी मित्र गुरु, सम्बन्धी सब कुछ आप हैं ॥॥
राधास्वामी कर्म भक्ति, राधास्वामी ज्ञान हैं।
राधास्वामी ध्यान सुमिरन, और भजन अनुमान हैं ॥॥
राधास्वामी सिद्धि शक्ति, परम पद और मुक्ति है।
राधास्वामी साधना हैं, योग है और युक्ति हैं ॥॥
राधास्वामी करता थरता, राधास्वामी भूप हैं।
राधास्वामी सिंध सद्गति, ताल झील और कूप हैं ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, नाम का परिचय दिया ।
नाम हैं वह रूप हैं वह, और अनाम अरूप हैं ॥॥
×
Song 168 — Hindi
181. किसकी हम चिंता करे, चिंता है कब किस काम की ।
आत्म अनुभव होगया, सूझी है अब विसराम की ॥॥
कृष्ण और अर्जुन कहां हैं, और युधिष्ठर क्या हुये ।।
यह कथा हमको सुनाओ, बसुदेव और बलराम की ॥॥
मोह किसका शोक किसका, रूप को पहचान ली ।।
आत्मा की साधना हो, तुम में आठों याम की ।।।।
यह जगत तो स्थिर नहीं, स्थिरताई पाओगे कहाँ ।
क्यों पड़ी है रात दिन, यह तुम को धूम और धाम की ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, ज्ञान का परिचय दिया ।
अब लगन है हमको निस दिन, राधास्वामी धाम की ॥॥
आत्म अनुभव होगया, सूझी है अब विसराम की ॥॥
कृष्ण और अर्जुन कहां हैं, और युधिष्ठर क्या हुये ।।
यह कथा हमको सुनाओ, बसुदेव और बलराम की ॥॥
मोह किसका शोक किसका, रूप को पहचान ली ।।
आत्मा की साधना हो, तुम में आठों याम की ।।।।
यह जगत तो स्थिर नहीं, स्थिरताई पाओगे कहाँ ।
क्यों पड़ी है रात दिन, यह तुम को धूम और धाम की ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, ज्ञान का परिचय दिया ।
अब लगन है हमको निस दिन, राधास्वामी धाम की ॥॥
×
Song 169 — Hindi
182. शब्द है आधार सब को, शब्द का तू ध्यान कर ।
शब्द के साधन में लगजा, उसकी महिमा जान कर ।।।।
ब्रह्म क्या है शब्द है, परब्रह्म क्या है शब्द है ।
गुरु की संगत कुछ दिनों हो, शब्द का अनुमान कर ।।।।
शब्द में है नाम और इस, शब्द ही में रूप है ।।
मुन गुरु का शब्द निस दिन, शब्द का सन्मान कर ॥॥
शब्द तू है शब्द मैं हूँ, शब्द सब का सार है।
ना जर की पहिचान कर ॥॥
शब्द ब्रह्मा शब्द विष्णु, शब्द शिव का रूप है।
शब्द को मथ कर परख ले, दूध जल को छानकर ॥॥
शब्द से रचना है सारी, शब्द ही से है प्रकाश ।।
राधास्वामी की दया ले, शब्द महिमा गान कर ॥॥
शब्द के साधन में लगजा, उसकी महिमा जान कर ।।।।
ब्रह्म क्या है शब्द है, परब्रह्म क्या है शब्द है ।
गुरु की संगत कुछ दिनों हो, शब्द का अनुमान कर ।।।।
शब्द में है नाम और इस, शब्द ही में रूप है ।।
मुन गुरु का शब्द निस दिन, शब्द का सन्मान कर ॥॥
शब्द तू है शब्द मैं हूँ, शब्द सब का सार है।
ना जर की पहिचान कर ॥॥
शब्द ब्रह्मा शब्द विष्णु, शब्द शिव का रूप है।
शब्द को मथ कर परख ले, दूध जल को छानकर ॥॥
शब्द से रचना है सारी, शब्द ही से है प्रकाश ।।
राधास्वामी की दया ले, शब्द महिमा गान कर ॥॥
×
Song 170 — Hindi
183. योग युक्ति भक्ति मुक्ति, सिद्धि शक्ति ज्ञान है ।
वह इसे समझे जिसे कुछ, ज्ञान का अनुमान है ॥॥
ज्ञान अनुभव ज्ञान साधन, ज्ञान के अधीन सब ।
ज्ञान ही अनुमान है, और ज्ञान ही परमान है ॥॥
पहिले साधन हो तो पीछे, ज्ञान की आसा करो ।
सच्चा साधन सतगुरु को, प्रेम और सतनाम है ॥॥
जाओ सतसंगत में गुरु के, जाके बैठो संग में ।
फिर बचन चित से सुनो, जो ज्ञान और विज्ञान है ॥॥
चित की विरती रोक लो, बचनों से करो यह योग तुम।।
शम की दम की उपरती की, जो तुम्हें पहचान है ।।।।
शब्द का लो आसरा, हो शब्द का श्रवण मनन ।
पीछे निध्यासन हो, निध्यासन ही उसकी जान है ॥॥
होगा निध्यासन से गुरु की, बानी का साक्षात्कार ।।
विरती अन्तर में जमे, यह शून्य का स्थान है ।।॥
शून्य में समता है और, समता समाधी है सही ।।
शून्य का है स्थल समाधी, समता की सच्ची खान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, पहुँचोगे सतपद में फिर ।।
यह है तुरिया और, तुरियातीत का स्थान है ॥॥
वह इसे समझे जिसे कुछ, ज्ञान का अनुमान है ॥॥
ज्ञान अनुभव ज्ञान साधन, ज्ञान के अधीन सब ।
ज्ञान ही अनुमान है, और ज्ञान ही परमान है ॥॥
पहिले साधन हो तो पीछे, ज्ञान की आसा करो ।
सच्चा साधन सतगुरु को, प्रेम और सतनाम है ॥॥
जाओ सतसंगत में गुरु के, जाके बैठो संग में ।
फिर बचन चित से सुनो, जो ज्ञान और विज्ञान है ॥॥
चित की विरती रोक लो, बचनों से करो यह योग तुम।।
शम की दम की उपरती की, जो तुम्हें पहचान है ।।।।
शब्द का लो आसरा, हो शब्द का श्रवण मनन ।
पीछे निध्यासन हो, निध्यासन ही उसकी जान है ॥॥
होगा निध्यासन से गुरु की, बानी का साक्षात्कार ।।
विरती अन्तर में जमे, यह शून्य का स्थान है ।।॥
शून्य में समता है और, समता समाधी है सही ।।
शून्य का है स्थल समाधी, समता की सच्ची खान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, पहुँचोगे सतपद में फिर ।।
यह है तुरिया और, तुरियातीत का स्थान है ॥॥
×
Song 171 — Hindi
184. न यहाँ हूँ न वहाँ हूँ, ने वहाँ हूँ न यहाँ ।
ढूंढ़ने जाता है वयों, पोयेगा तू मुझको कहाँ ॥॥॥ ।।
मन में भक्तों के छुपा बैठी हूँ, जो उनसे तू मिल ।
यह बतायेंगे बतायेंगे, मैं रहता हूँ जहाँ ॥॥
स्वर्ग में पायेगा तू किसको, वहाँ क्या है धरा ।
मैं कहीं अता न जाता हूँ, जहाँ का हूँ तहाँ ॥॥
ज्ञान में हूँ ध्यान में हैं, हूँ क्षमा और शील में ।
मैं जहाँ रहता हूँ ज्ञान, और शील रहते हैं वहाँ ॥॥
सत है क्या समझा नहीं, जाना असत को भी नहीं ।
राधास्वामी मत को समझो, खोगई बुद्धि कहाँ ।।।।
ढूंढ़ने जाता है वयों, पोयेगा तू मुझको कहाँ ॥॥॥ ।।
मन में भक्तों के छुपा बैठी हूँ, जो उनसे तू मिल ।
यह बतायेंगे बतायेंगे, मैं रहता हूँ जहाँ ॥॥
स्वर्ग में पायेगा तू किसको, वहाँ क्या है धरा ।
मैं कहीं अता न जाता हूँ, जहाँ का हूँ तहाँ ॥॥
ज्ञान में हूँ ध्यान में हैं, हूँ क्षमा और शील में ।
मैं जहाँ रहता हूँ ज्ञान, और शील रहते हैं वहाँ ॥॥
सत है क्या समझा नहीं, जाना असत को भी नहीं ।
राधास्वामी मत को समझो, खोगई बुद्धि कहाँ ।।।।
×
Song 172 — Hindi
185. सत हो सत का रूप, सतनामी हो राधास्वामी तुम ।
सत चरित सत शब्द, सतधामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
सत पुरुष सतलोक बासी, सत निवासी सत्य सत ।।
सत सहायक और, सत कामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
सत हो तो सत्ता मिले, चित हो तो चेतनता मिले ।।
मैं हूँ सेवक और, सत स्वामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
जीतेजी निर्वाण पद को, सत का जीवन है वही ।।
कहते हैं सतपद के, विश्रामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित जपू ।।
है मुझे विश्वास, सतगामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
सत चरित सत शब्द, सतधामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
सत पुरुष सतलोक बासी, सत निवासी सत्य सत ।।
सत सहायक और, सत कामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
सत हो तो सत्ता मिले, चित हो तो चेतनता मिले ।।
मैं हूँ सेवक और, सत स्वामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
जीतेजी निर्वाण पद को, सत का जीवन है वही ।।
कहते हैं सतपद के, विश्रामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित जपू ।।
है मुझे विश्वास, सतगामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
×
Song 173 — Hindi
186. जिसमें है भक्ति की शक्ति, वह नहीं अबला कभी ।
भक्ति से दुख दूर होंगे, होगी तुम निस दिन सुखी ॥॥
रात दिन सुमिरन भजन हो, मन में गुरु का ध्यान हो ।
तुम बचोगी कष्ट से, आपत से सुनलो जीतेजी ।।।।
जब कभी हो सामना, संकट का चरनों में झुको ।।
गुरु से रक्षा होगी सच्ची, बात यह मानो सही ॥॥
मन में गुरु हों तन में गुरु हों, गुरु हों साँसों साँस में ।
ऐसे साधन में लगो, और भूल जाओ सब अजी ॥॥
राधास्वामी की दया, तुम पर रहेगी रात दिन ।
सार सबका इसको जानो, यह है मक्खन सब दही ॥॥
भक्ति से दुख दूर होंगे, होगी तुम निस दिन सुखी ॥॥
रात दिन सुमिरन भजन हो, मन में गुरु का ध्यान हो ।
तुम बचोगी कष्ट से, आपत से सुनलो जीतेजी ।।।।
जब कभी हो सामना, संकट का चरनों में झुको ।।
गुरु से रक्षा होगी सच्ची, बात यह मानो सही ॥॥
मन में गुरु हों तन में गुरु हों, गुरु हों साँसों साँस में ।
ऐसे साधन में लगो, और भूल जाओ सब अजी ॥॥
राधास्वामी की दया, तुम पर रहेगी रात दिन ।
सार सबका इसको जानो, यह है मक्खन सब दही ॥॥
×
Song 174 — Hindi
187. पदम कहते हैं कमल को, मन कमल का रूप है।
मन ही गृही है विरागी, मन ही परजा भूप है ॥॥
मन में सारी योग युक्ति, मन की शक्ति साथ है।
मन को करता धरता समझो, मन ही पाँव और हाथ है ॥॥
रूप जिसने मन का समझा, वह नहीं होगा दुखी ।।
आगई मन की समझ, जिसमें रहेगा वह सुखी ॥॥
मन गुफा में बैठ कर तुम, मन से गुरु का नाम लो ।।
चैन लो सुख शान्ती, निरवान लो धुर धाम लो ॥॥
मन को बस में करलो, और सब जगत बस में आयेगा।
राधास्वामी की दया से, दास सुख धन पायेगा ।।।।
मन ही गृही है विरागी, मन ही परजा भूप है ॥॥
मन में सारी योग युक्ति, मन की शक्ति साथ है।
मन को करता धरता समझो, मन ही पाँव और हाथ है ॥॥
रूप जिसने मन का समझा, वह नहीं होगा दुखी ।।
आगई मन की समझ, जिसमें रहेगा वह सुखी ॥॥
मन गुफा में बैठ कर तुम, मन से गुरु का नाम लो ।।
चैन लो सुख शान्ती, निरवान लो धुर धाम लो ॥॥
मन को बस में करलो, और सब जगत बस में आयेगा।
राधास्वामी की दया से, दास सुख धन पायेगा ।।।।
×
Song 175 — Hindi
188. जो रमा रहता है सब में, सब का रमता राम है।
उसको सच्चे मन से चित से, बुद्धि से प्रनाम है ॥॥
प्रेम का भंडार करुणा, और दया का मूल है ।
शान्ती आनन्द दायक, सतचित उसका नाम है ॥॥
उसकी भक्ति कीजिये, उससे रहे लौ सर्वदा ।
जिसके घट में रम के वह, बैठा उसे विश्राम है ॥॥
सच्चिदानन्द अखंडम्, केवलम् आनन्द दा ।।
ब्रह्म सर्वाधार सवधार, सवधाम है ॥॥
रमने वाले के रमजा, हृदय को बैठक बना ।
फिर तो यह घट ही हमारा, राधास्वामी धाम है ॥॥
उसको सच्चे मन से चित से, बुद्धि से प्रनाम है ॥॥
प्रेम का भंडार करुणा, और दया का मूल है ।
शान्ती आनन्द दायक, सतचित उसका नाम है ॥॥
उसकी भक्ति कीजिये, उससे रहे लौ सर्वदा ।
जिसके घट में रम के वह, बैठा उसे विश्राम है ॥॥
सच्चिदानन्द अखंडम्, केवलम् आनन्द दा ।।
ब्रह्म सर्वाधार सवधार, सवधाम है ॥॥
रमने वाले के रमजा, हृदय को बैठक बना ।
फिर तो यह घट ही हमारा, राधास्वामी धाम है ॥॥
×
Song 176 — Hindi
189. राधास्वामी की शरन ले, जनम को अपने बना ।।
छोड़ दे अब मेरे भाई, दुर्गति आलसपना ॥॥
काम कर दिन रात डट कर, काम ही से काम रख ।
काम हो निष्काम तेरा, उसकी नित कर कल्पना ॥॥
काम ले तू अर्थ ले तू , धर्म ले तू मोक्ष ले ।।
काल माया कर्म का, कर वीरता से सामना ॥॥
सोचले अपनी दशा को, क्या था कैसा होगया ।।
है कठिन संसार मग में, पाँव का अब थामना ।।।।
राधास्वामी की दया से, संग सत का मिल गया ।
सुन वचन हित चित से प्यारे, सोचना और जाँचना ।।।।
छोड़ दे अब मेरे भाई, दुर्गति आलसपना ॥॥
काम कर दिन रात डट कर, काम ही से काम रख ।
काम हो निष्काम तेरा, उसकी नित कर कल्पना ॥॥
काम ले तू अर्थ ले तू , धर्म ले तू मोक्ष ले ।।
काल माया कर्म का, कर वीरता से सामना ॥॥
सोचले अपनी दशा को, क्या था कैसा होगया ।।
है कठिन संसार मग में, पाँव का अब थामना ।।।।
राधास्वामी की दया से, संग सत का मिल गया ।
सुन वचन हित चित से प्यारे, सोचना और जाँचना ।।।।
×
Song 177 — Hindi
190.गुरु की संगत से हटेंगे, कर्म माया काल सब ।
काट देगा तू सहज में, आप ही भव जाल सब ॥॥
मुख्य साधन संग सत का, और शेष हैं समझ गौण ।
इससे सूझेगी परम गति, सद्गति की चाल सब ॥॥
जिसने पाया पाया सत संग से, भक्ति ज्ञान गम ।
तू उतारेगा विवेक और, तरकन की खाल सब ॥॥
कुछ दिनों संगत हो कुछ दिन, नाम कुछ दिन मुक्त गति ।।
इसके पीछे पद है सत का, सत्व की रीती पाल सब ॥॥
अर्थ धर्म और काम मुक्ति, की है कु जी सत्र का संग ।।
राधास्वामी संग कर, दे काट अब जंजाल सब ॥॥
काट देगा तू सहज में, आप ही भव जाल सब ॥॥
मुख्य साधन संग सत का, और शेष हैं समझ गौण ।
इससे सूझेगी परम गति, सद्गति की चाल सब ॥॥
जिसने पाया पाया सत संग से, भक्ति ज्ञान गम ।
तू उतारेगा विवेक और, तरकन की खाल सब ॥॥
कुछ दिनों संगत हो कुछ दिन, नाम कुछ दिन मुक्त गति ।।
इसके पीछे पद है सत का, सत्व की रीती पाल सब ॥॥
अर्थ धर्म और काम मुक्ति, की है कु जी सत्र का संग ।।
राधास्वामी संग कर, दे काट अब जंजाल सब ॥॥
×
Song 178 — Hindi
191. जो हुये बाहर सुखी, क्या जाने अन्तर में है क्या ।।
जो रहे अन्तर मुखी, क्या समझे बाहर में है क्या ॥॥
माया ने डाला है अयो, कर लिया माया मुखी ।।
जब नहीं ईश्वर मुखी, क्यों माने ईश्वर में हैं क्या ॥॥
काल मुखता मन में आई, कमल मुख वह हो गये ।।
क्या बताये काल में, और उसके चक्कर में है क्या ॥॥
मन मुखी जब ठहरे, गुरु मुखता से फिर जाते रहे ।
कह नहीं सकते हैं, मन के नीचे ऊपर में है क्या ॥॥
राधास्वामी क दया, आये तो गुरु मुखता मिले।
फिर पता देगे अवर में, और इस घर में है क्या ।।।।
मन मुखी माया मुर्ख है, जीव मुख और काल मुख ।
भरम से क्या देखे अन्तर, और बाहर में है क्या ॥
राधास्वामी दीन हित, अज्ञान मेंटों ज्ञान दो ।
चर अचर को देखकर, समझे चराचर में है क्या ।।।।
जो रहे अन्तर मुखी, क्या समझे बाहर में है क्या ॥॥
माया ने डाला है अयो, कर लिया माया मुखी ।।
जब नहीं ईश्वर मुखी, क्यों माने ईश्वर में हैं क्या ॥॥
काल मुखता मन में आई, कमल मुख वह हो गये ।।
क्या बताये काल में, और उसके चक्कर में है क्या ॥॥
मन मुखी जब ठहरे, गुरु मुखता से फिर जाते रहे ।
कह नहीं सकते हैं, मन के नीचे ऊपर में है क्या ॥॥
राधास्वामी क दया, आये तो गुरु मुखता मिले।
फिर पता देगे अवर में, और इस घर में है क्या ।।।।
मन मुखी माया मुर्ख है, जीव मुख और काल मुख ।
भरम से क्या देखे अन्तर, और बाहर में है क्या ॥
राधास्वामी दीन हित, अज्ञान मेंटों ज्ञान दो ।
चर अचर को देखकर, समझे चराचर में है क्या ।।।।
×
Song 179 — Hindi
192. घट में हैं घट का है वासी, घट में रहता है सदा ।।
आप वह इस घट में रहकर, घट की कहता है सदा ।।।।
घट में जो है गुप्त परगट, उसको परगट करलो तुम ।।
चूका परगट करने से जो, दुख बिंपत सहता है वह ॥॥
घट में दूदो घट में पाओगे, नहीं सन्देह कुछ।
मन की खटपट में जो पड़ा, भवसिंधु में बहता है वह ॥॥
राधास्वामी ने दया की, शब्द का परिचय दिया ।।
प्रेम सेवक को मिला, आनन्द धुन गहता है वह ।।।।
आप वह इस घट में रहकर, घट की कहता है सदा ।।।।
घट में जो है गुप्त परगट, उसको परगट करलो तुम ।।
चूका परगट करने से जो, दुख बिंपत सहता है वह ॥॥
घट में दूदो घट में पाओगे, नहीं सन्देह कुछ।
मन की खटपट में जो पड़ा, भवसिंधु में बहता है वह ॥॥
राधास्वामी ने दया की, शब्द का परिचय दिया ।।
प्रेम सेवक को मिला, आनन्द धुन गहता है वह ।।।।
×
Song 180 — Hindi
193. सच्चिदानन्दम् अखण्डम्, कैवलम् शुद्धम् सदा ।।
नित्य मुक्तम् रूप अपना, तुम समझलो सर्वदा ॥।।
ज्ञान है सुख चित है सुख, सत्य सुख का रूप है।
क्या कहूँ में आत्मा, सुख शान्ती का कूप है ॥
आत्मा जब सुख हुआ, फिर दुख का भय क्यों मन में हो ।
दुख सतावे क्यों उसे, सुख ही के जो साधन में है ॥॥
सुरत सुख है शब्द सुख है, सुख में सुख का बास है।
शब्द की करलो कमाई, दूर यम का त्रास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, सुख का अब जीवन मिला ।
सुख मिला घट शब्द के, मिलने का जब साधन मिला ।।।।
नित्य मुक्तम् रूप अपना, तुम समझलो सर्वदा ॥।।
ज्ञान है सुख चित है सुख, सत्य सुख का रूप है।
क्या कहूँ में आत्मा, सुख शान्ती का कूप है ॥
आत्मा जब सुख हुआ, फिर दुख का भय क्यों मन में हो ।
दुख सतावे क्यों उसे, सुख ही के जो साधन में है ॥॥
सुरत सुख है शब्द सुख है, सुख में सुख का बास है।
शब्द की करलो कमाई, दूर यम का त्रास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, सुख का अब जीवन मिला ।
सुख मिला घट शब्द के, मिलने का जब साधन मिला ।।।।
×
Song 181 — Hindi
194. ज्ञान गुरु का रूप है, इस ज्ञान का कुछ ज्ञान है ।।
ज्ञान से बढ़कर नहीं कुछ, समझो जो है ज्ञान है ॥॥
शोल में है ज्ञान वह तन, और यह है आत्मा ।।
समझो बूझो तुम मनन श्रवण, से जो अनुमान है ॥॥
तन में जब है आत्मा, फिर किसकी चिंता है तुम्हें ।
सोच लो चिन्ता से दुचिताई से, कैसी हान है ॥॥
चित न हो चंचल न मन, विक्षिप्त होने न पाये कभी ।
फिर तो केवल ज्ञान है, हाँ ज्ञान है हाँ ज्ञान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, अब समझलो ज्ञान को ।।
ज्ञान ही से भक्ति मुक्ति, ध्यान और अवसान है ॥॥
ज्ञान से बढ़कर नहीं कुछ, समझो जो है ज्ञान है ॥॥
शोल में है ज्ञान वह तन, और यह है आत्मा ।।
समझो बूझो तुम मनन श्रवण, से जो अनुमान है ॥॥
तन में जब है आत्मा, फिर किसकी चिंता है तुम्हें ।
सोच लो चिन्ता से दुचिताई से, कैसी हान है ॥॥
चित न हो चंचल न मन, विक्षिप्त होने न पाये कभी ।
फिर तो केवल ज्ञान है, हाँ ज्ञान है हाँ ज्ञान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, अब समझलो ज्ञान को ।।
ज्ञान ही से भक्ति मुक्ति, ध्यान और अवसान है ॥॥
×
Song 182 — Hindi
195. छोड़ दो दुविधा को दुविधा, दुख का कारन मूल है।
जो फैसा दुविधा में उसको, दुविधा दुख का मूल है ॥॥
नाम लो और नाम ही में, शान्ती विश्राम लो ।।
नाम लेने वाले को यह, जग सदा अनुकूल है ॥॥
मन की चंचलता मिटेगी, नाम का सुमिरन किये ।।
नाम की महिमा बड़ी, यह नाम ही बहुमूल है ॥॥
क्या कहूँ कैसे कहूँ, तुम आप समझो मन में कुछ।
नाम का लो आसरा, फिर कुछ नहीं प्रतिकूल है ॥॥
राधास्वामी की दया से, आप ही उतरेगा सब ।।
मन के ऊपर , भर्म का, अज्ञान का जो झूल है ।।।।
जो फैसा दुविधा में उसको, दुविधा दुख का मूल है ॥॥
नाम लो और नाम ही में, शान्ती विश्राम लो ।।
नाम लेने वाले को यह, जग सदा अनुकूल है ॥॥
मन की चंचलता मिटेगी, नाम का सुमिरन किये ।।
नाम की महिमा बड़ी, यह नाम ही बहुमूल है ॥॥
क्या कहूँ कैसे कहूँ, तुम आप समझो मन में कुछ।
नाम का लो आसरा, फिर कुछ नहीं प्रतिकूल है ॥॥
राधास्वामी की दया से, आप ही उतरेगा सब ।।
मन के ऊपर , भर्म का, अज्ञान का जो झूल है ।।।।
×
Song 183 — Hindi
196. मन के मन में अपने मन को, जब लगाऔगे कभी ।।
आयेगी उसकी समझ, और ज्ञान पाओगे कभी ॥॥
मान का है मान वह, और सार को वह सार है।
उसको जो समझे तो, भव सागर से बेड़ा पार है ॥॥
ज्ञानी को अभिमान मिंध्या, हो रही है ज्ञान को ।।
वह विषय क्या है भला, इस ज्ञान का अनुमान का ॥॥
बानी मन की गम नहीं, बुद्धिं वहां जाती नहीं ।
भेद उस अनजान, अनजाने का वह पाती नहीं ।।।।
करलो सतसंग कुछ दिनों, गुरु का तो आये कुछ समझ।।
राधास्वामी की दया से, दास पाये कुछ समझ ।।।।
आयेगी उसकी समझ, और ज्ञान पाओगे कभी ॥॥
मान का है मान वह, और सार को वह सार है।
उसको जो समझे तो, भव सागर से बेड़ा पार है ॥॥
ज्ञानी को अभिमान मिंध्या, हो रही है ज्ञान को ।।
वह विषय क्या है भला, इस ज्ञान का अनुमान का ॥॥
बानी मन की गम नहीं, बुद्धिं वहां जाती नहीं ।
भेद उस अनजान, अनजाने का वह पाती नहीं ।।।।
करलो सतसंग कुछ दिनों, गुरु का तो आये कुछ समझ।।
राधास्वामी की दया से, दास पाये कुछ समझ ।।।।
×
Song 184 — Hindi
197. जब गुरु की शरन पाई, आस पूरी हो गई ।।
मिल गई गुरु पद से जब, माया से दुरी हो गई ।।।।
उठ गया परदा भरम का, मर्म सारा मिल गया।
अपने आपे की कहाँ, सुध हो हुजूरी हो गई ।।।।
क्याँ सतावे अब झमेला, काल का और कर्म का ।।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, गुरु पद की बुरी हो गई ॥॥
भय मिटी संकट कटा, भ्रान्ती गई शान्ती मिली।
अब नहीं ठग सकती, माया की भगोरी हो गई ।।।।
ज्ञान का परकाश, राधास्वामी ने अब कर दिया।
भाग जागा नूर पाकर, अब मैं नूरी हो गई ।।।।
मिल गई गुरु पद से जब, माया से दुरी हो गई ।।।।
उठ गया परदा भरम का, मर्म सारा मिल गया।
अपने आपे की कहाँ, सुध हो हुजूरी हो गई ।।।।
क्याँ सतावे अब झमेला, काल का और कर्म का ।।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, गुरु पद की बुरी हो गई ॥॥
भय मिटी संकट कटा, भ्रान्ती गई शान्ती मिली।
अब नहीं ठग सकती, माया की भगोरी हो गई ।।।।
ज्ञान का परकाश, राधास्वामी ने अब कर दिया।
भाग जागा नूर पाकर, अब मैं नूरी हो गई ।।।।
×
Song 185 — Hindi
198. चुन लिया है ज्ञान के, मोती को भवसागर में आ ।
झान ही को है सहारा, ज्ञान ही का आसरा ॥॥
ज्ञान जब पाया गुरु का, छोड़ कर अज्ञान को ।
सार आया हाथ में, अब कुछ नहीं है कल्पना ॥॥
किसको युक्ति सूझे जब तक, ज्ञान का परिचय नहीं ।
जब नहीं अनुभव तो निष्फल, है बनाना बात को ॥॥
मिथ्या वाचक ज्ञान उसका, मिथ्या सब अभिमान है।
मिथ्या ही मद मान और, अनुमान देता हूँ जता ॥॥
राधास्वामी कह गये, धोका है वाचक ज्ञान में ।।
करले करनी रहके रहनी, तेरा तब होगा भला ।।।।
झान ही को है सहारा, ज्ञान ही का आसरा ॥॥
ज्ञान जब पाया गुरु का, छोड़ कर अज्ञान को ।
सार आया हाथ में, अब कुछ नहीं है कल्पना ॥॥
किसको युक्ति सूझे जब तक, ज्ञान का परिचय नहीं ।
जब नहीं अनुभव तो निष्फल, है बनाना बात को ॥॥
मिथ्या वाचक ज्ञान उसका, मिथ्या सब अभिमान है।
मिथ्या ही मद मान और, अनुमान देता हूँ जता ॥॥
राधास्वामी कह गये, धोका है वाचक ज्ञान में ।।
करले करनी रहके रहनी, तेरा तब होगा भला ।।।।
×
Song 186 — Hindi
199. आगये जब पन्थ में, गुरु के तो पग हटता नहीं ।
छोड़ कर गुरु नाम कोई, नाम अब रटता नहीं ।।।।
पत्ता पत्ता कौन सींचे, सींचने में लाभ क्या ।।
मूल पकड़ा हाथ में, यह हाथ से छुटता नहीं ॥॥
गह लिया जब मूल को; हाथ आगये फल फूल सब ।।
चित की दुर्मत मिट गई, गुरु प्रेम अब घटता नहीं ।।।।
जब मिला परिचय तो, परिचय से ही अनुभव बढ़ गया।
मन में आई शान्ती, दुचिता से वह बटता नहीं ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी रट लगी।
मन का अब विश्वास, भय की धार से कटता नहीं ॥॥
छोड़ कर गुरु नाम कोई, नाम अब रटता नहीं ।।।।
पत्ता पत्ता कौन सींचे, सींचने में लाभ क्या ।।
मूल पकड़ा हाथ में, यह हाथ से छुटता नहीं ॥॥
गह लिया जब मूल को; हाथ आगये फल फूल सब ।।
चित की दुर्मत मिट गई, गुरु प्रेम अब घटता नहीं ।।।।
जब मिला परिचय तो, परिचय से ही अनुभव बढ़ गया।
मन में आई शान्ती, दुचिता से वह बटता नहीं ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी रट लगी।
मन का अब विश्वास, भय की धार से कटता नहीं ॥॥
×
Song 187 — Hindi
200. है सुफल नर जनम उसका, जो लगा है काम में ।
काम की जड़ है छुपी, गुरुदेवजी के नाम में ।।।।
चलते फिरते जागते सोते, समाधी हो लगी ।॥
भूलने के न गुरु का, नाम आठों याम मैं ॥॥
प्रेम भक्ति की कमाई, में लगे हैं भक्त जन ।
यह न समझो मन लगा है, जगत के धन धाम में ॥॥
टूट जाये लंक गढ़, रावण का भय जाता रहे ।
मानसिक फुरना यही है, अब तो रमतो राम में ॥॥
हम हुये सेवक हमारा, धर्म सेवा बन गया।
सेवा रह कर करते हैं, हम राधास्वामी धाम में ॥॥
काम की जड़ है छुपी, गुरुदेवजी के नाम में ।।।।
चलते फिरते जागते सोते, समाधी हो लगी ।॥
भूलने के न गुरु का, नाम आठों याम मैं ॥॥
प्रेम भक्ति की कमाई, में लगे हैं भक्त जन ।
यह न समझो मन लगा है, जगत के धन धाम में ॥॥
टूट जाये लंक गढ़, रावण का भय जाता रहे ।
मानसिक फुरना यही है, अब तो रमतो राम में ॥॥
हम हुये सेवक हमारा, धर्म सेवा बन गया।
सेवा रह कर करते हैं, हम राधास्वामी धाम में ॥॥
×
Song 188 — Hindi
201. ज्ञान का जब धन मिला है, ज्ञान के भंडार से।
भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥
सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।
यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥
चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।
फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥
सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।
शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥
कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।
सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥
सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।
भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥
मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।
राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥
भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥
सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।
यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥
चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।
फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥
सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।
शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥
कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।
सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥
सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।
भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥
मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।
राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥
×
Song 189 — Hindi
202. आई शरणागत तुम्हारे, आके कैसी खोगई ।।
जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥
इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।
जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥
सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।
लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥
आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।
बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।
हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।
जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥
इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।
जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥
सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।
लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥
आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।
बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।
हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।
×
Song 190 — Hindi
203. हंस हो और हंस के, राजा हो ऐसा जान लो ।
हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥
दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।
पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥
तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।
गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥
जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।
गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥
राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।
घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥
हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥
दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।
पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥
तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।
गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥
जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।
गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥
राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।
घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥
×
Song 191 — Hindi
204. नाम जब गुरु का लिया, हो जाओ गुरु का ध्यान कर ।
कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥
गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।
यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥
जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।
भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥
गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।
देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।
घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥
कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥
गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।
यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥
जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।
भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥
गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।
देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।
घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥
×
Song 192 — Hindi
205. जब सुशीला होगई, आनन्द मन को मिल गया ।।
जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥
शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।
वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥
शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।
शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।
जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥
जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥
शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।
वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥
शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।
शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।
जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥
×
Song 193 — Hindi
206. ज्ञान जब पाया तो, फिर अज्ञान की क्यों चाह हो ।
भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥
गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।
वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥
चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।
चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥
तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।
बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।
राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।
अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।
भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥
गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।
वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥
चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।
चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥
तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।
बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।
राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।
अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।







Hits Today : 520
Total Hits : 1712323