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Song 0 — Hindi
607. सोरठाधन्य धन्य गुरु देव, कृपा सिंध पूरन धनी ।
चित से करू नित सेव, मेट जगत की वासना ॥
दोहेजाहि एति कहें सकल मुनि, नेति नेति कहे वेद ।
गुरु की दया अपार से, पूरन मिला सुभेद ॥1 ॥
ज्ञान समुदर अथाह अति, सूझे बार न पार ।
सुर नर मुनि सब बून्द जिमि, उढे लहर अपार ॥2 ॥
भेद भाव सब मिट गया, दरसा अचल अभेद । ।
नहीं जगत नहीं करम गति,नहीं विकार नहीं खेद ॥3 ॥
साध संग सतगुरु दया, समझ पड़ा निज रूप ।
जब रूप की गम नहीं, तब लग रहे भव कूप ॥4 ॥
आस गई मंसा गई, गया जगत का द्वन्द । ।
राधास्वामी गुरु की मेहर से, छूटा भव भ्रम फन्द ॥5 ॥
सोरठापरम तत्व गुरु आप है, आपहि ज्ञान विवेक ।
कहीं गुप्त कहीं प्रगट होय, परखावं पद एक ।
गुरु एक अनादि अनंत महा ।
पदकमल में आन के शरन गहा ॥
तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको ।
निज भक्ति का पंथ दिखा मुझको। ।
तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले ।
तेरे चरन सरोज का ध्यान लगे ।
अविनासी है तू सुखरासी है ।
तू घट घट का गुरु बासी है ।
तू विश्वम्भर जगदाधारी ।
सुर नर मुनि सबका हितकारी । ।
मेरे मन से दूर मद मान रहें ।
मुझे सदा तेरा ही ध्यान रहे ।
सबके प्रानों का प्यारा है तू ।
दे प्रेम जो प्रेम की खान है तू । ।
घट तिमिर मिटे कर उजियारी ।
तेरे चरन शरन की बलिहारी । ।
राधास्वामी देवन के देवा ।
करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥
354.
॥
चौपाई ॥
चित से करू नित सेव, मेट जगत की वासना ॥
दोहेजाहि एति कहें सकल मुनि, नेति नेति कहे वेद ।
गुरु की दया अपार से, पूरन मिला सुभेद ॥1 ॥
ज्ञान समुदर अथाह अति, सूझे बार न पार ।
सुर नर मुनि सब बून्द जिमि, उढे लहर अपार ॥2 ॥
भेद भाव सब मिट गया, दरसा अचल अभेद । ।
नहीं जगत नहीं करम गति,नहीं विकार नहीं खेद ॥3 ॥
साध संग सतगुरु दया, समझ पड़ा निज रूप ।
जब रूप की गम नहीं, तब लग रहे भव कूप ॥4 ॥
आस गई मंसा गई, गया जगत का द्वन्द । ।
राधास्वामी गुरु की मेहर से, छूटा भव भ्रम फन्द ॥5 ॥
सोरठापरम तत्व गुरु आप है, आपहि ज्ञान विवेक ।
कहीं गुप्त कहीं प्रगट होय, परखावं पद एक ।
गुरु एक अनादि अनंत महा ।
पदकमल में आन के शरन गहा ॥
तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको ।
निज भक्ति का पंथ दिखा मुझको। ।
तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले ।
तेरे चरन सरोज का ध्यान लगे ।
अविनासी है तू सुखरासी है ।
तू घट घट का गुरु बासी है ।
तू विश्वम्भर जगदाधारी ।
सुर नर मुनि सबका हितकारी । ।
मेरे मन से दूर मद मान रहें ।
मुझे सदा तेरा ही ध्यान रहे ।
सबके प्रानों का प्यारा है तू ।
दे प्रेम जो प्रेम की खान है तू । ।
घट तिमिर मिटे कर उजियारी ।
तेरे चरन शरन की बलिहारी । ।
राधास्वामी देवन के देवा ।
करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥
354.
॥
चौपाई ॥
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Song 1 — Hindi
608. मैं सेवक सतगुरु राधास्वामी ।
बार बार उन चरन नमामी ।
मैं पापी राधास्वामी पुनीता ।
मैं माया बस स्वामी अतीता ॥
चरन शरन की ओट गही जब ।
दुख दरिंद्र सब लोप हुये तब ॥
मैं तो किरन राधास्वामी भानु सम ।
राधास्वामी से अब पाऊँशम दम शम दम पाय जो करूं पयाना ।
सूझे सहज ही पद निरवाना ।
राधास्वामी सतगुरु कमल समान ।
मैं भँवरा अचेत अज्ञान ।
राधास्वामी सिंध बूद मेरा रूप ।
मैं सकार राधास्वामी अरूप ॥
दोहामैं तो कीट महान हूँ, राधास्वामी भृगी जान ।
राधास्वामी की दया, पाऊ भक्ति दान ॥
के चौगई है नहीं विवेक नहीं मन चतुराई ।
नहीं विद्या नहीं बल प्रभुताई । ।
धन सम्पत्ति तज गुरु को सुमिरू ।
गुरु की कृपा सिंध भव उतरू ।
सिद्धि शक्ति गुरु नाम रहाई ।
ले यह समझ करूं सेवकाई । ।
नाम न विस विसरू तन मन ।
एक रूा लखू घर परबत बन । ।
पल पल रटू नाम अविनासी ।
का, माया जन की फांसी । ।
गुरु मेरे समरथ पुरुष विधाता ।
गुरु के चरन में मन मेरा राता । ।
रात दिवस रहे गुरु का ध्याना ।
यही मांगू गरु से बरदाना । ।
दोहागरू गरू पल पल जपू, राधास्वामी के गुन गाय ।
अब कुछ मुझको भय नहीं, सतगुरु हुये सहाय ॥
राधास्वामी सतगुरु, दया दृष्टि से देख ।
छुटकारा प्रभु दीजिये, छूटे जगत बिसेख । ।
तुम दाता मैं दीन हूँ, आया गुरु दरबार ।
शरनागत की लाज को, रख लीजे दातार ।
अब आरत पूरन भई, मन पाया विश्राम ।
राधास्वामी चरन पर, कोटि कोटि परनाम ॥
बार बार उन चरन नमामी ।
मैं पापी राधास्वामी पुनीता ।
मैं माया बस स्वामी अतीता ॥
चरन शरन की ओट गही जब ।
दुख दरिंद्र सब लोप हुये तब ॥
मैं तो किरन राधास्वामी भानु सम ।
राधास्वामी से अब पाऊँशम दम शम दम पाय जो करूं पयाना ।
सूझे सहज ही पद निरवाना ।
राधास्वामी सतगुरु कमल समान ।
मैं भँवरा अचेत अज्ञान ।
राधास्वामी सिंध बूद मेरा रूप ।
मैं सकार राधास्वामी अरूप ॥
दोहामैं तो कीट महान हूँ, राधास्वामी भृगी जान ।
राधास्वामी की दया, पाऊ भक्ति दान ॥
के चौगई है नहीं विवेक नहीं मन चतुराई ।
नहीं विद्या नहीं बल प्रभुताई । ।
धन सम्पत्ति तज गुरु को सुमिरू ।
गुरु की कृपा सिंध भव उतरू ।
सिद्धि शक्ति गुरु नाम रहाई ।
ले यह समझ करूं सेवकाई । ।
नाम न विस विसरू तन मन ।
एक रूा लखू घर परबत बन । ।
पल पल रटू नाम अविनासी ।
का, माया जन की फांसी । ।
गुरु मेरे समरथ पुरुष विधाता ।
गुरु के चरन में मन मेरा राता । ।
रात दिवस रहे गुरु का ध्याना ।
यही मांगू गरु से बरदाना । ।
दोहागरू गरू पल पल जपू, राधास्वामी के गुन गाय ।
अब कुछ मुझको भय नहीं, सतगुरु हुये सहाय ॥
राधास्वामी सतगुरु, दया दृष्टि से देख ।
छुटकारा प्रभु दीजिये, छूटे जगत बिसेख । ।
तुम दाता मैं दीन हूँ, आया गुरु दरबार ।
शरनागत की लाज को, रख लीजे दातार ।
अब आरत पूरन भई, मन पाया विश्राम ।
राधास्वामी चरन पर, कोटि कोटि परनाम ॥
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Song 2 — Hindi
609. दोहाप्रीतम छबि नयनों बसी, भावे नहीं संसार ।
सार असार की सुध नहीं, मन चाहे दीदार ॥॥चौपाई ॥
रंग रंग में रंग रंगीला ।
सब रंगों में उसकी लीला ॥
गुप्त प्रगट में व्यापा सोई ।
प्रीतम बिन कोई और न होई ॥
जहां देखू तहां पिया का रूप ।
जहां सुनू पिया शब्द अनूप । ।
भोग बासना सब कुछ त्यागी ।
मैं हूँ प्रीतम छवि अनुरागी । ।
रोम रोम पिया करे निवास ।
घट में प्रगटा प्रेम बिलास ॥
दोहाजा हृदय प्रीतम बसे, प्रीत रीत अधिकाय ।
मन राता पिउ रंग में, माँगे मुक्ति बलाय ॥दोहे
सार असार की सुध नहीं, मन चाहे दीदार ॥॥चौपाई ॥
रंग रंग में रंग रंगीला ।
सब रंगों में उसकी लीला ॥
गुप्त प्रगट में व्यापा सोई ।
प्रीतम बिन कोई और न होई ॥
जहां देखू तहां पिया का रूप ।
जहां सुनू पिया शब्द अनूप । ।
भोग बासना सब कुछ त्यागी ।
मैं हूँ प्रीतम छवि अनुरागी । ।
रोम रोम पिया करे निवास ।
घट में प्रगटा प्रेम बिलास ॥
दोहाजा हृदय प्रीतम बसे, प्रीत रीत अधिकाय ।
मन राता पिउ रंग में, माँगे मुक्ति बलाय ॥दोहे
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Song 3 — Hindi
610. गुरु सम दाता कोई नहीं, गुरु है दीन दयाल ।
गुरु के चरन सरोज लग, ऋषि मुनि भये निहाल ॥1 ॥
मुक्ति पदारथ तब मिलें, जब गुरु होय सहाय । ।
बिन गुरु भक्ति फन्द जम, कभी न काटा जाय ॥2 ॥
गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि दंडौत ।
गुरु की दया अपार से, छूटे भव के खोट ॥3 ॥
तीन ताप के भंवर में, बड़े बारम्बार । ।
गुरु समरथ ने दया की, बूड़त लिया निकार ॥4 ॥
गुरु समान दाता नहीं, गुरु समान नहीं देव ।
गुरु की पल पल बंदना, निसदिन कीजे सेव ॥5 ॥
गुरु आज्ञा में चालिये, तन मन सीस झुकाय ।
काल कर्म से बचन का, और न कोई उपाय ॥6 ॥
गुरु से कुछ मांगू नहीं, मांगू उनसे यह । ।
राधास्वामी दया करो, कर चरनन की खेह ॥7 ॥
गुरु के चरन सरोज लग, ऋषि मुनि भये निहाल ॥1 ॥
मुक्ति पदारथ तब मिलें, जब गुरु होय सहाय । ।
बिन गुरु भक्ति फन्द जम, कभी न काटा जाय ॥2 ॥
गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि दंडौत ।
गुरु की दया अपार से, छूटे भव के खोट ॥3 ॥
तीन ताप के भंवर में, बड़े बारम्बार । ।
गुरु समरथ ने दया की, बूड़त लिया निकार ॥4 ॥
गुरु समान दाता नहीं, गुरु समान नहीं देव ।
गुरु की पल पल बंदना, निसदिन कीजे सेव ॥5 ॥
गुरु आज्ञा में चालिये, तन मन सीस झुकाय ।
काल कर्म से बचन का, और न कोई उपाय ॥6 ॥
गुरु से कुछ मांगू नहीं, मांगू उनसे यह । ।
राधास्वामी दया करो, कर चरनन की खेह ॥7 ॥
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Song 4 — Hindi
611. आज घड़ी मंगल सुखदायक ।
सतगुरु पूरे भये हैं सहायक ॥
घट में सूर हुआ उजियारा ।
दूर मिटा सब तिमिर विकारा ॥
सुख आनन्द की शोभा भारी ।
देखत देखत लागी तारी ॥
अनहद राग की धुन सुन पाई ।
हरे हर्ष सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले भवरा मंडलाया ।
बास सुवास पाय ललचाया ॥
अद्भुत लीला बरन न जाई ।
मन बानी रहे दोउ अलसाई ॥
लय चिंतन का मर्म पिछाना ।
पिया अमी रस हुआ मस्ताना ॥
झांकी निरखी अगम अनूप ।
रूपवान से हुआ अरूप ॥
रेखा रूप रंग सब त्यागा ।
सहजहि हंस बना है कागा । ।
मान सरोवर किया असनान ।
सुन्न गुरु का लागा ध्यान ॥
दुर्गम घाटी शिला अपार ।
गुरु बल पाय किये सब पार । ।
बीन बांसरी उत्तम बाजा ।
सुन सुन धुन सोया मन जागा ॥
राधास्वामी चरन पाय विसराम ।
मेटा देवासुर संग्राम ॥
दोहागुरु मूरत हृदय बसी, उपजा निर्मल ज्ञान ।
जाको ढूँढ़त मैं फिरा, सो अब प्रगटा आन ॥
सतगुरु पूरे भये हैं सहायक ॥
घट में सूर हुआ उजियारा ।
दूर मिटा सब तिमिर विकारा ॥
सुख आनन्द की शोभा भारी ।
देखत देखत लागी तारी ॥
अनहद राग की धुन सुन पाई ।
हरे हर्ष सूरत मुसकाई ॥
कवल खिले भवरा मंडलाया ।
बास सुवास पाय ललचाया ॥
अद्भुत लीला बरन न जाई ।
मन बानी रहे दोउ अलसाई ॥
लय चिंतन का मर्म पिछाना ।
पिया अमी रस हुआ मस्ताना ॥
झांकी निरखी अगम अनूप ।
रूपवान से हुआ अरूप ॥
रेखा रूप रंग सब त्यागा ।
सहजहि हंस बना है कागा । ।
मान सरोवर किया असनान ।
सुन्न गुरु का लागा ध्यान ॥
दुर्गम घाटी शिला अपार ।
गुरु बल पाय किये सब पार । ।
बीन बांसरी उत्तम बाजा ।
सुन सुन धुन सोया मन जागा ॥
राधास्वामी चरन पाय विसराम ।
मेटा देवासुर संग्राम ॥
दोहागुरु मूरत हृदय बसी, उपजा निर्मल ज्ञान ।
जाको ढूँढ़त मैं फिरा, सो अब प्रगटा आन ॥
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Song 5 — Hindi
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Song 6 — Hindi
612. मैं चकोर तुम चन्द्र स्वरूपा ।
रंक दुखी मैं तुम प्रभु भूपा ॥
मैं मछली तुम सुख के सागर ।
मैं औगुनी तुम सब गुन आगर । ।
मैं भँवरा तुम कमल समान ।
वास सुबास पाय हर्षान ।
मैं पतिंग तुम दीप स्वरूप ।
मैं घट तुम निर्मल जल कूप ।
मैं पतंग तुम डोर हो स्वामी ।
मैं अन्तर तुम अन्तर्यामी ॥
मैं लहरी तुम सिंध अपार ।
कहां तुम्हारा वारा पार ॥
बुन्द रूप मैं तुम सत गंग ।
कभी न छोडू गुरु का संग । ।
प्रेम रंग से रहूँ रंगानी ।
निसदिन चरन कमल लिपटानी ।
पपीहा की गति भई हमारी ।
स्वान्ति बद तुम चित में धारी ॥
दोहासेवा पूजा बंदना, नहीं कुछ जाने दास ।
सबकी आज्ञा त्याग दी, धर गुरु चरनन आस ॥
रंक दुखी मैं तुम प्रभु भूपा ॥
मैं मछली तुम सुख के सागर ।
मैं औगुनी तुम सब गुन आगर । ।
मैं भँवरा तुम कमल समान ।
वास सुबास पाय हर्षान ।
मैं पतिंग तुम दीप स्वरूप ।
मैं घट तुम निर्मल जल कूप ।
मैं पतंग तुम डोर हो स्वामी ।
मैं अन्तर तुम अन्तर्यामी ॥
मैं लहरी तुम सिंध अपार ।
कहां तुम्हारा वारा पार ॥
बुन्द रूप मैं तुम सत गंग ।
कभी न छोडू गुरु का संग । ।
प्रेम रंग से रहूँ रंगानी ।
निसदिन चरन कमल लिपटानी ।
पपीहा की गति भई हमारी ।
स्वान्ति बद तुम चित में धारी ॥
दोहासेवा पूजा बंदना, नहीं कुछ जाने दास ।
सबकी आज्ञा त्याग दी, धर गुरु चरनन आस ॥
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Song 7 — Hindi
613. आप ही आप आप तुम आये ।
आपहि आप निज भेद सुनाये । ।
आप आप को आप बताया ।
दुखित जीव पर कीन्ही दाया ॥
अलख लखाय लक्ष जब दीन्हा ।
तुम ही निरख लख तुम ही चीन्हा मुक्ति बंध का संशय त्यागा ।
अब गुरु चरन रहूँ नित जागा ॥
अभय पाय भय दुर्मति भागे ।
निर्भय होय गुरु चरनन लागे ।
नाम रतन निर्धन जब पाया ।
धनी भया घर निज धन आया ।
दोहाएक तुम्हारी चाह हैं, गुरु देवन के देव ।
_मुझसे बन आवे नहीं, भक्ति भाव पद सेव । ।
आपहि आप निज भेद सुनाये । ।
आप आप को आप बताया ।
दुखित जीव पर कीन्ही दाया ॥
अलख लखाय लक्ष जब दीन्हा ।
तुम ही निरख लख तुम ही चीन्हा मुक्ति बंध का संशय त्यागा ।
अब गुरु चरन रहूँ नित जागा ॥
अभय पाय भय दुर्मति भागे ।
निर्भय होय गुरु चरनन लागे ।
नाम रतन निर्धन जब पाया ।
धनी भया घर निज धन आया ।
दोहाएक तुम्हारी चाह हैं, गुरु देवन के देव ।
_मुझसे बन आवे नहीं, भक्ति भाव पद सेव । ।
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Song 8 — Hindi
614. राधास्वामी राधास्वामी रटत रहूँ नित ।
राधास्वामी राधास्वामी भजत रहूँ नित । ।
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी पल पल ध्याऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाऊ ।
___ राधास्वामी राधास्वामी सदा मनाऊँ ॥
राधास्वामी राधास्वामी और न दूजा ।
राधास्वामी राधास्वामी धारू पूजा ॥
राधास्वामी राधास्वामी देखू अन्तर। ।
राधास्वामी राधास्वामी निरखू बाहर ॥
दोहाभीतर बाहर एक रस, गुरु का दरसा रूप ।
राधास्वामी जब उर में बसे, पडू न भव जल कूप ॥
राधास्वामी राधास्वामी भजत रहूँ नित । ।
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी पल पल ध्याऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाऊ ।
___ राधास्वामी राधास्वामी सदा मनाऊँ ॥
राधास्वामी राधास्वामी और न दूजा ।
राधास्वामी राधास्वामी धारू पूजा ॥
राधास्वामी राधास्वामी देखू अन्तर। ।
राधास्वामी राधास्वामी निरखू बाहर ॥
दोहाभीतर बाहर एक रस, गुरु का दरसा रूप ।
राधास्वामी जब उर में बसे, पडू न भव जल कूप ॥
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Song 9 — Hindi
615. उगमा प्रेम न मन ठहराये ।
गुरु आप प्रीतम बन आये । ।
प्रेम पन्थ की डगर दिखाई ।
प्रेम नगर की राह बताई ॥
सुरत शब्द का भेद अनूप ।
बख्श दिखाया अपना रूप ॥
रूप दिखाय लिया अपनाई ।
छूट गया जग अगमापाई ॥
चरन ओट में दिया ठिकाना ।
शरन पाय मन अति विगसाना ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, जिभ्या रह गुरु नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
गुरु आप प्रीतम बन आये । ।
प्रेम पन्थ की डगर दिखाई ।
प्रेम नगर की राह बताई ॥
सुरत शब्द का भेद अनूप ।
बख्श दिखाया अपना रूप ॥
रूप दिखाय लिया अपनाई ।
छूट गया जग अगमापाई ॥
चरन ओट में दिया ठिकाना ।
शरन पाय मन अति विगसाना ।
दोहारात दिवस विसरू नहीं, जिभ्या रह गुरु नाम ।
राधास्वामी चरन में, कोटि कोटि परनाम ।
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Song 10 — Hindi
616. दोहानिराकार साकार तुम, अगुन सगन के महि ।
घट में घट घट रूप हो, अघट सघट फिर नांह । । ॥
चौपाई ॥
गुरु जग में कल्यान स्वरूप ।
अगम अगोचर अमल अरूप ॥
ब्रह्मा विष्णु शक्ति महि देवा ।
सुर नर मुनि करते मिल सेवा ॥
भानु समान प्रकाश प्रकासा ।
प्राण प्राण गत स्वांस में स्वांसा ॥
व्यापक यक रस सहज उदासी ।
समदर्शी अन्तर उर बासी ॥
कोई न जाने गरु का भेद ।
थक रहे ज्ञानी ध्यानी वेद ॥
आप चितावे आप लखावे ।
आप सैन दे मर्म बतावे ॥
कीट भृगी गति गुरु उपदेस ।
नीर मीन सम गुरु संदेस ।
दोहापारस से लोहा मिले, कंचन छिन में होय ।
सतगुरु से सेवक मिले, सन्त रूप कहो सोय ॥
चरन कमल की बंदना, निसदिन आठों याम ।
गुरु के पद में सब बसें, सत्त नाम सतधाम ॥
356
साखी
घट में घट घट रूप हो, अघट सघट फिर नांह । । ॥
चौपाई ॥
गुरु जग में कल्यान स्वरूप ।
अगम अगोचर अमल अरूप ॥
ब्रह्मा विष्णु शक्ति महि देवा ।
सुर नर मुनि करते मिल सेवा ॥
भानु समान प्रकाश प्रकासा ।
प्राण प्राण गत स्वांस में स्वांसा ॥
व्यापक यक रस सहज उदासी ।
समदर्शी अन्तर उर बासी ॥
कोई न जाने गरु का भेद ।
थक रहे ज्ञानी ध्यानी वेद ॥
आप चितावे आप लखावे ।
आप सैन दे मर्म बतावे ॥
कीट भृगी गति गुरु उपदेस ।
नीर मीन सम गुरु संदेस ।
दोहापारस से लोहा मिले, कंचन छिन में होय ।
सतगुरु से सेवक मिले, सन्त रूप कहो सोय ॥
चरन कमल की बंदना, निसदिन आठों याम ।
गुरु के पद में सब बसें, सत्त नाम सतधाम ॥
356
साखी
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Song 11 — Hindi
617. साधन तो गुरु नाम है, और काम बेकाम ।
साधन ही से पाइये, सत जीवन सत धाम ॥1 ॥
साधन सुगम सुहेल है, जो कोई जाने साध ।
साधु जो साधन करे, बिन साधन जग व्याध ॥2 ॥
साधन कीजे शब्द का, कान आंख मुख बन्द ।
शब्द योग के जतन से, कटे द्वन्द का फन्द ॥3 ॥
बाहर पट दे नन्दुआ, अन्तर के पट खोल ।
साधन कर नित शब्द का, मुख से कछु न बोल ॥4 ॥
यह तो उत्तम योग है, और योग हैं रोग ।
शब्द योग योगी बने, और योग सब सोग ॥5 ॥
योग यतन से पाइये, साहेब का दीदार ।
बिना यतन नहीं कुछ बने, परमारथ व्यौहार ॥6 ॥
नाम तेरे अन्तर बसे, ता संग धार पियार । ।
कान आंख मुह बन्द कर, सुन अनहद गुंजार ॥7 ॥
और यतन सब कठिन है, शब्द यतन है सहल ।
यह तो फल तत्काल है, और यतन निष्फल ॥8 ॥
साधन ही से पाइये, सत जीवन सत धाम ॥1 ॥
साधन सुगम सुहेल है, जो कोई जाने साध ।
साधु जो साधन करे, बिन साधन जग व्याध ॥2 ॥
साधन कीजे शब्द का, कान आंख मुख बन्द ।
शब्द योग के जतन से, कटे द्वन्द का फन्द ॥3 ॥
बाहर पट दे नन्दुआ, अन्तर के पट खोल ।
साधन कर नित शब्द का, मुख से कछु न बोल ॥4 ॥
यह तो उत्तम योग है, और योग हैं रोग ।
शब्द योग योगी बने, और योग सब सोग ॥5 ॥
योग यतन से पाइये, साहेब का दीदार ।
बिना यतन नहीं कुछ बने, परमारथ व्यौहार ॥6 ॥
नाम तेरे अन्तर बसे, ता संग धार पियार । ।
कान आंख मुह बन्द कर, सुन अनहद गुंजार ॥7 ॥
और यतन सब कठिन है, शब्द यतन है सहल ।
यह तो फल तत्काल है, और यतन निष्फल ॥8 ॥
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Song 12 — Hindi
618. जब लग पिया से मेल नहीं, कैसे जागे भाग ।
भाग जगे और मेल हो, तब पूरन होय सुहाय ॥1 ॥
पिया की प्यारी हो गई, कर कर प्रेम पियार ।
पिया मेरा मैं पिया की, झूठा जग व्यौहार ॥2 ॥
पिया को ढूंढन मैं चली, चित्त फर प्रेम की प्यास ।
प्रेम वू द जब मिल गया, पिया नित मेरे पास ॥3 ॥
पिया पिया मैं क्या करूं, पिया प्रेम का नीर ।
पिया से लग पिया की हुई, पिया पिया व्याप शरीर ॥4 ॥
पिया मेरा मैं पिया की, किससे पूछू जाय ।
मैं पिया से न्यारी नहीं, पिया जो प्रेम अघाय ॥5 ॥
पिया पिया करते पिया, भई पिया में धरनि अकास ।
पिया मुझमें मैं पिया में, चित क्यों होय उदास ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, पिया से भया संजोग ।
गुरु मिले अच्छी भई, सीख शब्द का जोग ।।7। ।
भाग जगे और मेल हो, तब पूरन होय सुहाय ॥1 ॥
पिया की प्यारी हो गई, कर कर प्रेम पियार ।
पिया मेरा मैं पिया की, झूठा जग व्यौहार ॥2 ॥
पिया को ढूंढन मैं चली, चित्त फर प्रेम की प्यास ।
प्रेम वू द जब मिल गया, पिया नित मेरे पास ॥3 ॥
पिया पिया मैं क्या करूं, पिया प्रेम का नीर ।
पिया से लग पिया की हुई, पिया पिया व्याप शरीर ॥4 ॥
पिया मेरा मैं पिया की, किससे पूछू जाय ।
मैं पिया से न्यारी नहीं, पिया जो प्रेम अघाय ॥5 ॥
पिया पिया करते पिया, भई पिया में धरनि अकास ।
पिया मुझमें मैं पिया में, चित क्यों होय उदास ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, पिया से भया संजोग ।
गुरु मिले अच्छी भई, सीख शब्द का जोग ।।7। ।
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Song 13 — Hindi
619. बात बनाना सुगम है, वाचक ज्ञान सहल ।
अपनी आंखों देखना, यही बात मुश्किल ॥1 ॥
पुस्तक लेखी क्या कहे, अपनी आंखों देख ।
अनुभव गम नर जब लहे, कटे करम की रेख ॥2 ॥
शब्द बिना अनुभव नहीं, अनुभव शब्द के साथ। ।
अनुभव का घर दूर है, अनुभव कीजे हाथ ॥3 ॥
साधन बिन साधु नहीं, साधन बिन नहीं साध ।
बिन साधे अनुभव कहाँ, लगे सार नहीं हाथ ॥4 ॥
अपनी आँखों देखिये, अपने हृदय विचार ।
निज घट में जो शब्द है, ताकी गहले धार ॥शा गुरु की वाणी जब सुने, मन में करे विचार ।
शब्द डोर को पकड़कर, पहुँचे शब्द के द्वार ॥6 ॥
अपनी आंखों देखना, यही बात मुश्किल ॥1 ॥
पुस्तक लेखी क्या कहे, अपनी आंखों देख ।
अनुभव गम नर जब लहे, कटे करम की रेख ॥2 ॥
शब्द बिना अनुभव नहीं, अनुभव शब्द के साथ। ।
अनुभव का घर दूर है, अनुभव कीजे हाथ ॥3 ॥
साधन बिन साधु नहीं, साधन बिन नहीं साध ।
बिन साधे अनुभव कहाँ, लगे सार नहीं हाथ ॥4 ॥
अपनी आँखों देखिये, अपने हृदय विचार ।
निज घट में जो शब्द है, ताकी गहले धार ॥शा गुरु की वाणी जब सुने, मन में करे विचार ।
शब्द डोर को पकड़कर, पहुँचे शब्द के द्वार ॥6 ॥
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Song 14 — Hindi
620. बिन गुरु ज्ञान विवेक न होई ।
गुरु बिन पन्थ न चाले कोई । ।
गुरु से लेना नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन । ।
मन परतीत गुरु की लाओ ।
गुरु मिले तब भक्ति कमाओ ।
गुरु बिन काम करो नहिं भाई ।
गुरु चरनन पर बल बल जाई । ।
राखे मन में गुरु प्रतीती ।
हो सुख सकल कामना जीती। ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ।
गुरु आराधो छिन छिन प्रानी ॥
गुरु समान नहीं कोई रक्षक ।
कुल कुटम्ब सब जानो तक्षक ॥
सत्त नाम सत पुरुष गुरु हैं ।
अलख अगम राधास्वामी गुरु हैं ।
गुरु की कीजे हरदम पूजा ।
गुरु समान कोई देव न दूजा ॥
गुरु चरनन पर बल बल जाऊ ।
आठ पहर गुरु का यश गाऊ ॥
गुरु को सुमिरू गुरु को ध्याऊ ।
माथे गुरुपद रज को लगाऊँ ।
गुरु ने गुप्त भेद दिया दान ।
गुरु ने सार बताया आन ।
गुरु ने अलख वस्तु लखवाया ।
गुरु ने अगम रूप दरसाया ।
जब लग नहीं गुरु भक्ति दृढ़ानी ।
तब लग निसदिन रहे अज्ञानी ।
रात अन्धेरी आंख न मुझे ।
केहि विधि प्रेमी गुरु पद बझे ।
गुरु मिले गुरु पद दरसाया ।
आंख खुली अंधकार हटाया ।
तेज पुंज का भया प्रकाश ।
ज्ञान सूर ने किया उजास ।
धन घमंड अज्ञान समान ।
जुड़ मिल अंधकार किया आन । ।
ज्ञान सूर गुरु बचन प्रकासा ।
देखत सकल अविद्या नासा । ।
सत्त सत्त का सत प्रगटाया ।
आतम परमातम दरसाया । ।
घट में प्रगटा सत का नूर ।
बाजे निसदिन अनहद तूर । ।
गुरु बिन पन्थ न चाले कोई । ।
गुरु से लेना नाम रसायन ।
घट से भागे शंका डायन । ।
मन परतीत गुरु की लाओ ।
गुरु मिले तब भक्ति कमाओ ।
गुरु बिन काम करो नहिं भाई ।
गुरु चरनन पर बल बल जाई । ।
राखे मन में गुरु प्रतीती ।
हो सुख सकल कामना जीती। ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ।
गुरु आराधो छिन छिन प्रानी ॥
गुरु समान नहीं कोई रक्षक ।
कुल कुटम्ब सब जानो तक्षक ॥
सत्त नाम सत पुरुष गुरु हैं ।
अलख अगम राधास्वामी गुरु हैं ।
गुरु की कीजे हरदम पूजा ।
गुरु समान कोई देव न दूजा ॥
गुरु चरनन पर बल बल जाऊ ।
आठ पहर गुरु का यश गाऊ ॥
गुरु को सुमिरू गुरु को ध्याऊ ।
माथे गुरुपद रज को लगाऊँ ।
गुरु ने गुप्त भेद दिया दान ।
गुरु ने सार बताया आन ।
गुरु ने अलख वस्तु लखवाया ।
गुरु ने अगम रूप दरसाया ।
जब लग नहीं गुरु भक्ति दृढ़ानी ।
तब लग निसदिन रहे अज्ञानी ।
रात अन्धेरी आंख न मुझे ।
केहि विधि प्रेमी गुरु पद बझे ।
गुरु मिले गुरु पद दरसाया ।
आंख खुली अंधकार हटाया ।
तेज पुंज का भया प्रकाश ।
ज्ञान सूर ने किया उजास ।
धन घमंड अज्ञान समान ।
जुड़ मिल अंधकार किया आन । ।
ज्ञान सूर गुरु बचन प्रकासा ।
देखत सकल अविद्या नासा । ।
सत्त सत्त का सत प्रगटाया ।
आतम परमातम दरसाया । ।
घट में प्रगटा सत का नूर ।
बाजे निसदिन अनहद तूर । ।
×
Song 15 — Hindi
621. राधास्वामी समरथ दीन दयाला ।
काटें दुख कष्ट जंजाला ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
भूल भरम मन तनकि न लाऊ राधास्वामी कृपा दृष्टि जब करें ।
दुख कलेश आपत सब हरें ।
राधास्वामी दया करें निस बासर ।
हाथ कृपा का धारे सिर पर । ।
मौज निहार चलो दिन रात ।
राधास्वामी चरन में चित्त बसात ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं त्यागे ।
प्रेम प्रीत रस निसदिन पागे । ।
दुख सुख हर्ष शोक में समता ।
धारूँ चरन कमल मन रमता । ।
काटें दुख कष्ट जंजाला ॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊँ ।
भूल भरम मन तनकि न लाऊ राधास्वामी कृपा दृष्टि जब करें ।
दुख कलेश आपत सब हरें ।
राधास्वामी दया करें निस बासर ।
हाथ कृपा का धारे सिर पर । ।
मौज निहार चलो दिन रात ।
राधास्वामी चरन में चित्त बसात ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं त्यागे ।
प्रेम प्रीत रस निसदिन पागे । ।
दुख सुख हर्ष शोक में समता ।
धारूँ चरन कमल मन रमता । ।
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Song 16 — Hindi
622 जीव चितावन आये राधास्वामी ।
बार बार तिन चरन नमामी ।
जीव शरन गह ले उपदेशा ।
सहजहि जावे सतगुरु देसा ॥
जहां नहीं काल करम नहीं माया ।
नहीं जहां गगन अकास न छाया बिन जल पड़े बूद जहां भारी ।
नहीं तीखा मीठा नहीं खारी ॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके ।
बिना चन्द्र रवि जोती चमके ॥
दोहावेद कतेब की गम नहीं, सो है गुरु दरबार ।
राधास्वामी की दया, मेटे द्वन्द असार ।
नहीं वहां कम न धर्म कहानी ।
नहीं वहां सुख दुख लाभ न हानी ॥
गूगा बोले मधुरी बानी ।
पिंगला चढ़े शैल निरवानी ॥
आवागवन का संशय मेटे ।
सुन्न समाध में निसदिन लेटे । ।
देखे अद्भुत बिमल बिलासा ।
निरखे अचरज अजब तमासा । ।
ऋतु बसंत चहुँ दिस रही छाई ।
कमल खिले बरसा झर लाई ॥
___ दोहाबिना पन्थ की गैल है, बिन बस्ती का देस ।
बिना नैन दृष्टा बने, यह सतगुरु उपदेस ॥
हैरत हैरत हैरत होई ।
हैरत रूप धरा पुनि सोई ॥
रंग रूप रेखा से न्यारा ।
बिन घोड़े बाहन असबारा ॥
जा पर कृपा गुरु की होई ।
सत परमारथ पावे सोई । ।
निराकार निरदेव निरूपम ।
अगम अलख अद्वत अनूपम । ।
सोई गुरु का रूप कहावे ।
विन गुरु दया समझ नहीं आवे । ।
दोहा यह मत अगम अगाध है, क्या कोई बरने आय ।
कोई गुरुमुख गति पावही, गुरु जब होंय सहाय ॥
जीव दुखित बिलये दिन राती ।
माया हृदया दया न आती । ।
काल करम का विकट पसारा ।
कौन जीव को देय सहारा ॥
बार बार भरमें चौरासी ।
काल गले विच डाली फांसी ॥
कोई विद्या पढ़ हुये दिवाने ।
कोई ज्ञान मत रहे लुभाने ।
कोई तीरथ कोई परत उपासा ।
कोई नेमी कोई रहे उदासा ॥
दोहासार न पाया भक्ति का, प्रेम प्रीत की रीत ।
काल निर्देई मारिया, यम किसका है मीत ॥
तब राधास्वामी दया उमगाई ।
धर गुरु रूप दिया शरनाई । ।
मन में राखा दृढ़ विश्वासो ।
गुरु मेरे पूर करें सब आसा । ।
मान न मागू नहीं धन दामा ।
मागू चरन शरन सतनामा ।
जीव काज तुम जग में आये ।
निराकार बन रूप दिखाये ॥
इष्ट दिया ऊँचा और भारी ।
तुम हो बन्धु मित्र हितकारी । ।
दोहागुरु पद में यही बन्दना, जीव हि लियो चिताय ।
राधास्वामी की दया, फसे न अब भव आय ॥
बार बार तिन चरन नमामी ।
जीव शरन गह ले उपदेशा ।
सहजहि जावे सतगुरु देसा ॥
जहां नहीं काल करम नहीं माया ।
नहीं जहां गगन अकास न छाया बिन जल पड़े बूद जहां भारी ।
नहीं तीखा मीठा नहीं खारी ॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके ।
बिना चन्द्र रवि जोती चमके ॥
दोहावेद कतेब की गम नहीं, सो है गुरु दरबार ।
राधास्वामी की दया, मेटे द्वन्द असार ।
नहीं वहां कम न धर्म कहानी ।
नहीं वहां सुख दुख लाभ न हानी ॥
गूगा बोले मधुरी बानी ।
पिंगला चढ़े शैल निरवानी ॥
आवागवन का संशय मेटे ।
सुन्न समाध में निसदिन लेटे । ।
देखे अद्भुत बिमल बिलासा ।
निरखे अचरज अजब तमासा । ।
ऋतु बसंत चहुँ दिस रही छाई ।
कमल खिले बरसा झर लाई ॥
___ दोहाबिना पन्थ की गैल है, बिन बस्ती का देस ।
बिना नैन दृष्टा बने, यह सतगुरु उपदेस ॥
हैरत हैरत हैरत होई ।
हैरत रूप धरा पुनि सोई ॥
रंग रूप रेखा से न्यारा ।
बिन घोड़े बाहन असबारा ॥
जा पर कृपा गुरु की होई ।
सत परमारथ पावे सोई । ।
निराकार निरदेव निरूपम ।
अगम अलख अद्वत अनूपम । ।
सोई गुरु का रूप कहावे ।
विन गुरु दया समझ नहीं आवे । ।
दोहा यह मत अगम अगाध है, क्या कोई बरने आय ।
कोई गुरुमुख गति पावही, गुरु जब होंय सहाय ॥
जीव दुखित बिलये दिन राती ।
माया हृदया दया न आती । ।
काल करम का विकट पसारा ।
कौन जीव को देय सहारा ॥
बार बार भरमें चौरासी ।
काल गले विच डाली फांसी ॥
कोई विद्या पढ़ हुये दिवाने ।
कोई ज्ञान मत रहे लुभाने ।
कोई तीरथ कोई परत उपासा ।
कोई नेमी कोई रहे उदासा ॥
दोहासार न पाया भक्ति का, प्रेम प्रीत की रीत ।
काल निर्देई मारिया, यम किसका है मीत ॥
तब राधास्वामी दया उमगाई ।
धर गुरु रूप दिया शरनाई । ।
मन में राखा दृढ़ विश्वासो ।
गुरु मेरे पूर करें सब आसा । ।
मान न मागू नहीं धन दामा ।
मागू चरन शरन सतनामा ।
जीव काज तुम जग में आये ।
निराकार बन रूप दिखाये ॥
इष्ट दिया ऊँचा और भारी ।
तुम हो बन्धु मित्र हितकारी । ।
दोहागुरु पद में यही बन्दना, जीव हि लियो चिताय ।
राधास्वामी की दया, फसे न अब भव आय ॥
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Song 17 — Hindi
623. मंगल गुरु का नाम है, गुरु मंगल की खान ।
मंगल गुरु के नाम में, नाम है मंगल दान ॥1 ॥
मंगल नाम धराय कर, तजा अमंगल भाव ।
निसदिन गुरु का नाम लो, यही है पक्का दाव ॥2 ॥
जा दिन गुरु दर्शन भया, कटा पाप का फंद। ।
दुन्द जाल को मेटकर, रहो सदा निद्वन्द ॥3 ॥
तुम क्यों पड़े हो भूल में, भूल है दुख अज्ञान । ।
गुरु का लेकर आसरा, तजो मोह मद मान ॥4 ॥
मंगलमय मंगल सदन, मंगल चारों ओर । ।
नाम जपो राधास्वामी का, लो सतपद में ठौर ॥ ॥
मंगल गुरु के नाम में, नाम है मंगल दान ॥1 ॥
मंगल नाम धराय कर, तजा अमंगल भाव ।
निसदिन गुरु का नाम लो, यही है पक्का दाव ॥2 ॥
जा दिन गुरु दर्शन भया, कटा पाप का फंद। ।
दुन्द जाल को मेटकर, रहो सदा निद्वन्द ॥3 ॥
तुम क्यों पड़े हो भूल में, भूल है दुख अज्ञान । ।
गुरु का लेकर आसरा, तजो मोह मद मान ॥4 ॥
मंगलमय मंगल सदन, मंगल चारों ओर । ।
नाम जपो राधास्वामी का, लो सतपद में ठौर ॥ ॥
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Song 18 — Hindi
624. बिन गुरु ज्ञान ध्यान नहीं आ ।
गुरु मिले तब भेद बतावे । ।
करम परम डारे बहु फन्दा ।
चिन विवेक नहीं मिले वितंडा ॥
याते गुर चरनन चित लाओ ।
तब निज पद का भेद खुलाओ । ।
गुरु के चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया सब पतित उद्धारी ॥
गुरु मिले छूटे त्रय तापा ।
गुरु ज्ञान से सूझे आपा ॥
गुरु मिले तब भेद बतावे । ।
करम परम डारे बहु फन्दा ।
चिन विवेक नहीं मिले वितंडा ॥
याते गुर चरनन चित लाओ ।
तब निज पद का भेद खुलाओ । ।
गुरु के चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया सब पतित उद्धारी ॥
गुरु मिले छूटे त्रय तापा ।
गुरु ज्ञान से सूझे आपा ॥
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Song 19 — Hindi
625. गुरु गुरु मैं निस दिन गाता ।
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रतिपाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ।
गुरु नाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा । ।
गुरु समुद्र शशि गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सत चित आनंद की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु महाना ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का बार न पार ।
__जित देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ॥
गुरु के चरन रहे मन राता ॥
गुरु मेरे समरथ दीन दयाला ।
गुरु परहित गुरु हैं प्रतिपाला ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा ।
गुरु नारद सारद गुरु शेषा ।
गुरु नाम गुरु नाम अधारा ।
गुरु वार गुरु भव के पारा । ।
गुरु समुद्र शशि गुरु सुखरासी ।
गुरु व्यापक गुरु घट घट बासी । ।
गुरु सत चित आनंद की खानी ।
गुरु हैं दाता गुरु हैं दानी ॥
गुरु प्रकाश गुरु भानु महाना ।
गुरु समुद्र गुरु बुन्द समाना ।
दोहागुरु महिमा अति अगम है, गुरु का बार न पार ।
__जित देखू गुरु दृष्टि में, गुरु हैं सबके सार ॥
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Song 20 — Hindi
626. आस करो गुरु चरन की, त्याग जगत की आस ।
जो कोई ऐसा दास है, कभी न होय निरास ॥1 ॥
गुरु समरथ की बंदगी, निस दिन आठों याम ।
जो कोई यह साधन करे, ताहि मिले निज नाम ॥2 ॥
चिंता कीजे गुरु की, चिंता और भुलाय ।
एक दिन ऐसा होयगा, बनत बनत बन जाय ॥3 ॥
जो कोई ऐसा दास है, कभी न होय निरास ॥1 ॥
गुरु समरथ की बंदगी, निस दिन आठों याम ।
जो कोई यह साधन करे, ताहि मिले निज नाम ॥2 ॥
चिंता कीजे गुरु की, चिंता और भुलाय ।
एक दिन ऐसा होयगा, बनत बनत बन जाय ॥3 ॥
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Song 21 — Hindi
627. जिन डरप्यो सुन्दर बरनारी ।
गुरु सब भांति करे उपकारी ॥
प्रेम प्रीत की रीत सुहाई ।
घिरहु छांड़ छल अरु कदराई ।
भक्तिभाव हित चित लगावहु ।
अछत शरीर मुक्ति फल पावहु ।
जा पर दया गुरू की होई ।
जग में भाग्यवान नर सोई ॥
कष्ट कलेश पास नहीं आवे ।
हंसा एक दिन निज घर जावे । ।
दोहाराधास्वामी चित्त धर, मन में राखो धीर ।
समरथ सतगुरु दीन हित, सहज मिटावें पीर ।
गुरु सब भांति करे उपकारी ॥
प्रेम प्रीत की रीत सुहाई ।
घिरहु छांड़ छल अरु कदराई ।
भक्तिभाव हित चित लगावहु ।
अछत शरीर मुक्ति फल पावहु ।
जा पर दया गुरू की होई ।
जग में भाग्यवान नर सोई ॥
कष्ट कलेश पास नहीं आवे ।
हंसा एक दिन निज घर जावे । ।
दोहाराधास्वामी चित्त धर, मन में राखो धीर ।
समरथ सतगुरु दीन हित, सहज मिटावें पीर ।
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Song 22 — Hindi
628. सतगुरु कहें भेद दरसाई ।
मारग घर का दीन बताई ॥
प्रथम शरन गहो सतगुरु की ।
द्वितीया शरन गहो सतसंग की ।
गुरु जो भेद बतावें तुमको ।
धारो वचन कमाओ उनको ।
तन मन इन्द्री सुरत समेटो ।
चढ़ आकाश शब्द गुरु मंटो ॥
सुनो नित्य तुम अनहद बानी ।
देखो अद्भुत जोत निशानी । ।
जोत फाड़कर सुन्न समाओ ।
सुखमन होय बंक में आओ ॥
बंक पार त्रिकुटी सुन गीत ।
काल कर्म दोऊ लेना जीत । ।
सुन्न शिखर चढ़ी सूरत धूम ।
मानसरोवर पहुँची झूम । ।
महासुन्न जहां अति अंधियार ।
गुप्त चार धुन बानी सार । ।
भंवरगुफा जाय लीना चीन्ह ।
आगे सत्त लोक चढ़ लीन ॥
अलख अगम को जाकर परसा ।
शब्द पकड़ लें सूरत सरसा ॥
राधास्वामी नगर निहारा ।
देखा जाय अगर उजियारा ॥
मारग घर का दीन बताई ॥
प्रथम शरन गहो सतगुरु की ।
द्वितीया शरन गहो सतसंग की ।
गुरु जो भेद बतावें तुमको ।
धारो वचन कमाओ उनको ।
तन मन इन्द्री सुरत समेटो ।
चढ़ आकाश शब्द गुरु मंटो ॥
सुनो नित्य तुम अनहद बानी ।
देखो अद्भुत जोत निशानी । ।
जोत फाड़कर सुन्न समाओ ।
सुखमन होय बंक में आओ ॥
बंक पार त्रिकुटी सुन गीत ।
काल कर्म दोऊ लेना जीत । ।
सुन्न शिखर चढ़ी सूरत धूम ।
मानसरोवर पहुँची झूम । ।
महासुन्न जहां अति अंधियार ।
गुप्त चार धुन बानी सार । ।
भंवरगुफा जाय लीना चीन्ह ।
आगे सत्त लोक चढ़ लीन ॥
अलख अगम को जाकर परसा ।
शब्द पकड़ लें सूरत सरसा ॥
राधास्वामी नगर निहारा ।
देखा जाय अगर उजियारा ॥
×
Song 23 — Hindi
629. गुरु पद परस करो अभ्यास ।
घट में देखो बिमल उजास ॥
सहसकमलदल सुरत चढ़ाओ ।
घंटा शंख धुन सुन घट आओ । ।
निरखो अन्दर गरु का नूर ।
बाजे अन्दर अनहद तूर ॥
सुन सुन तूर हुआ मन सूरा ।
त्रिकुटी जाय पाया गुरु पूरा ॥
सुरत ने पाया मूल कलाम ।
ओंकार पद का वह ठाम । ।
मेघनाद जहाँ बजत मृदंग ।
सुन सुन सुरत हो रही दंग ॥
कुछ दिन ऐसी लीला देखो ।
आगे का फिर करो परेखो ॥
सुन्न मंडल में गाड़ा थाना ।
अजब देश अद्भुत मैदाना ॥
मानसरोवर किया असनान ।
निर्मल हुई सुरत हंस समान ॥
क्षीर नीर का किया निवेरा ।
गढ़ कैलाश किया चढ़ डेरा ॥
गंग जमन सरस्वती की धार ।
देखी घट में बिमल बहार ॥
नहाय धोय सूरत मुसकानी ।
किंगरी सारंगी सुनली बानी ॥
ठमक ठमक आगे को चाली ।
सुरत जमाई हुई जलाली ।
भंवरगुफा का परवत देखा ।
सोहंग पुरुष का पाया लेखा । ।
सोहंग मोहंग बन्सी बाजी ।
सुन सुन सूरत मन में गाजी ।
मधुबन में बन्सी की धूम ।
देख रास लीला गई झूम । ।
झूम झूम हुई अति मस्तानी ।
देह गेह की सुद्धि भुलानी । ।
तब सतपद में आन विराजी ।
साज भक्ति का अनुपम साजी ॥
बीन सुनी सत धाम ठिकान |
सतपद देखा मगन मन मान ।
सत्यम् सत्यम् उठी बाजा ।
कहो आये तुम यहां केहि काजा । ।
बोली सुरत प्रेम हुलसाई ।
काल करम माया दुखदाई ॥
तीन ताप से अति घबरानी ।
गुर की दया पाई सहदानी ॥
लेकर भेद यहाँ चलि आई ।
दया पात्र होय शरन समाई । ।
सचखंड अलख अगम तर दरसा राधास्वामी चरन कमल तब परसा सुरत सहेली भई निरवानी ।
अब क्या कहूँ यह अकथ कहानी ।
॥
उपदेश ।
घट में देखो बिमल उजास ॥
सहसकमलदल सुरत चढ़ाओ ।
घंटा शंख धुन सुन घट आओ । ।
निरखो अन्दर गरु का नूर ।
बाजे अन्दर अनहद तूर ॥
सुन सुन तूर हुआ मन सूरा ।
त्रिकुटी जाय पाया गुरु पूरा ॥
सुरत ने पाया मूल कलाम ।
ओंकार पद का वह ठाम । ।
मेघनाद जहाँ बजत मृदंग ।
सुन सुन सुरत हो रही दंग ॥
कुछ दिन ऐसी लीला देखो ।
आगे का फिर करो परेखो ॥
सुन्न मंडल में गाड़ा थाना ।
अजब देश अद्भुत मैदाना ॥
मानसरोवर किया असनान ।
निर्मल हुई सुरत हंस समान ॥
क्षीर नीर का किया निवेरा ।
गढ़ कैलाश किया चढ़ डेरा ॥
गंग जमन सरस्वती की धार ।
देखी घट में बिमल बहार ॥
नहाय धोय सूरत मुसकानी ।
किंगरी सारंगी सुनली बानी ॥
ठमक ठमक आगे को चाली ।
सुरत जमाई हुई जलाली ।
भंवरगुफा का परवत देखा ।
सोहंग पुरुष का पाया लेखा । ।
सोहंग मोहंग बन्सी बाजी ।
सुन सुन सूरत मन में गाजी ।
मधुबन में बन्सी की धूम ।
देख रास लीला गई झूम । ।
झूम झूम हुई अति मस्तानी ।
देह गेह की सुद्धि भुलानी । ।
तब सतपद में आन विराजी ।
साज भक्ति का अनुपम साजी ॥
बीन सुनी सत धाम ठिकान |
सतपद देखा मगन मन मान ।
सत्यम् सत्यम् उठी बाजा ।
कहो आये तुम यहां केहि काजा । ।
बोली सुरत प्रेम हुलसाई ।
काल करम माया दुखदाई ॥
तीन ताप से अति घबरानी ।
गुर की दया पाई सहदानी ॥
लेकर भेद यहाँ चलि आई ।
दया पात्र होय शरन समाई । ।
सचखंड अलख अगम तर दरसा राधास्वामी चरन कमल तब परसा सुरत सहेली भई निरवानी ।
अब क्या कहूँ यह अकथ कहानी ।
॥
उपदेश ।
×
Song 24 — Hindi
630. पहिले करो सहसदल बासा ।
फिर त्रिकुटी का विमल बिलासा । ।
सुन्न महासुन्न तारी लागी ।
तब सोई सूरत कुछ जागी ।
भँवरगुफा चढ़ माया त्यागो ।
सच पुरुष के चरनन लागो । ।
भेद पाय ओम् पद आओ ।
तब तिस पद का मर्म कुछ पाओ ॥
जो कोई इतने ऊंचे चढ़े ।
रूप रंग रेखा से टरे ।
सहसकमल पहिला स्थान ।
जोति निरंजन रूप लखान । ।
अद्भुत लीला अचरज खेल | शिव शक्ती ने कीना मेल ।
प्रगटी जोत जोत में जोती ।
अद्भुत हीरे पन्ने मोती । ।
रंग रंग के फूल खिलाने ।
चहुँदिस भंवर मुण्ड मंडलाने ॥
श्याम कंज फुलवारी शोभा ।
देख देख मन अति कर छोभा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन धुन सूरत मुसकाई ।
ताहि छोड़ आगे को बढ़ी ।
त्रिकुटी छोड़ आगे को चढ़ी । ।
फिर त्रिकुटी का विमल बिलासा । ।
सुन्न महासुन्न तारी लागी ।
तब सोई सूरत कुछ जागी ।
भँवरगुफा चढ़ माया त्यागो ।
सच पुरुष के चरनन लागो । ।
भेद पाय ओम् पद आओ ।
तब तिस पद का मर्म कुछ पाओ ॥
जो कोई इतने ऊंचे चढ़े ।
रूप रंग रेखा से टरे ।
सहसकमल पहिला स्थान ।
जोति निरंजन रूप लखान । ।
अद्भुत लीला अचरज खेल | शिव शक्ती ने कीना मेल ।
प्रगटी जोत जोत में जोती ।
अद्भुत हीरे पन्ने मोती । ।
रंग रंग के फूल खिलाने ।
चहुँदिस भंवर मुण्ड मंडलाने ॥
श्याम कंज फुलवारी शोभा ।
देख देख मन अति कर छोभा ॥
घंटा शंख की धुन सुन पाई ।
सुन सुन धुन सूरत मुसकाई ।
ताहि छोड़ आगे को बढ़ी ।
त्रिकुटी छोड़ आगे को चढ़ी । ।
×
Song 25 — Hindi
631. मन मन्दिर में बैठो आय ।
निज मन दरपन रूप लखाय ।
सहसवृत्ति से सहसकमल में ।
कुछ दिन बसो तुम उसी महल में तज उसको त्रिकुटी में जाओ ।
त्रिपुटीवाद में चित्त लगाओ ।
इसके ऊपर सुन्न अस्थान ।
पुरुष प्रकृति जहां खेलें आन ॥
यह पद द्वत भाव सुन लीजे ।
माया ब्रह्म के गुन गुन लीजे ॥
दो वृत्ति को तज दो भाई ।
भंवरगुफा चढ़ सतपद जाई ।
सत में रूप अनूप तुम्हारा ।
वह है सुरत शब्द का सारा । ।
एक एक ताहि सन्त बखाना ।
तहां विचार का नहीं ठिकाना ।
अगम अलख के पार सुनाई ।
नहीं वह एक न दो है भाई । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जिन यह बचन सुनाया पुकारी। ।
निज मन दरपन रूप लखाय ।
सहसवृत्ति से सहसकमल में ।
कुछ दिन बसो तुम उसी महल में तज उसको त्रिकुटी में जाओ ।
त्रिपुटीवाद में चित्त लगाओ ।
इसके ऊपर सुन्न अस्थान ।
पुरुष प्रकृति जहां खेलें आन ॥
यह पद द्वत भाव सुन लीजे ।
माया ब्रह्म के गुन गुन लीजे ॥
दो वृत्ति को तज दो भाई ।
भंवरगुफा चढ़ सतपद जाई ।
सत में रूप अनूप तुम्हारा ।
वह है सुरत शब्द का सारा । ।
एक एक ताहि सन्त बखाना ।
तहां विचार का नहीं ठिकाना ।
अगम अलख के पार सुनाई ।
नहीं वह एक न दो है भाई । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जिन यह बचन सुनाया पुकारी। ।
×
Song 26 — Hindi
632. विद्या बुद्धि चतुरता, शास्त्र पुराण अनेक ।
इन सबको तुम परिहरो, जो नहीं समझे एक ॥1 ॥
वाद विवाद हिये दुख घना, तासों कुछ नहीं होय ।
तज इनको जो हरि भजे, भक्त कहावे सोय ॥2 ॥
ना सुख विद्या बुद्धि में, ना सुख वाद विवाद ।
सुखदायक गुरु भक्ति है, सुरत भई बिस्माध ॥3 ॥
इन सबको तुम परिहरो, जो नहीं समझे एक ॥1 ॥
वाद विवाद हिये दुख घना, तासों कुछ नहीं होय ।
तज इनको जो हरि भजे, भक्त कहावे सोय ॥2 ॥
ना सुख विद्या बुद्धि में, ना सुख वाद विवाद ।
सुखदायक गुरु भक्ति है, सुरत भई बिस्माध ॥3 ॥
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Song 27 — Hindi
633. निंदा कबहु न कीजिये, निंदा अघ की खान ।
निंदा से उपजे सभी, कलह कलेश महान ॥1 ॥
मन दर्पन के बीच में, पर निंदा की छार ।
निर्मलता पल में गई, भर गई धूल विकार ॥2 ॥
\अपने आपको देखिये, औरन सों क्या काम ।
अपने देखे गुन लहें, औरन औगुन ठाम ॥3 ॥
हस हस दोष न देखिये, मन घट अगम अनूप । ।
जो या में निंदा भरे, तन छिन होये कृप ॥4 ॥
साध बड़े परमारथी, गुन गह औगुन त्याग ।
जो कोई औगुन को गहे, सो मतिमंद अभाग ॥5 ॥
भैयरा बैठा फूल पर, लेइ सुगंध सुबास ।
मक्खी विष्ठा पर उड़ी, पाय कुगंध कुबास ॥6 ॥
जो तू गुरु का दास है, होजा गुरु का बच्छ ।
दूध सार सब खींच ले, छोड़ रक्त का पच्छ ॥7 ॥
शब्द सार टकसाल है, समझ शब्द का सार । ।
साधू माखन चाखिया, छाछ पिये संसार ॥8 ॥
अपनी निंदा कीजिये, पर निंदा से लाज ।
निज निंदा कारज बने, और से होय अकाज ॥6 ॥
ब्रह्मा ने यह जग रचा, अमृत जहर मिलाय ।
अमृत देव का खाज है, असुर जहर नित खाय ॥10 ॥
निंदक तो हिंसक भया, हिंसा करे उपाय । ।
जिभ्या की तलवार से, सदा कलेजे धाव ॥11 ॥
जो तू गुरु का सेवका, निंदा दोष भुलाव । ।
जो कोई पर निंदा करे, पड़े न पूरा दाच ॥12 ॥
गुन ग्राही कोई संतजन, औगुन ग्राही असाध ।
दोष पराया ना लखे, ताका मता अगाध ॥13 ॥
निज निंदा सुन हरखिये, कर निंदक सन्मान ।
बिन साबुन पानी बिना, शुद्ध करे मन आन ॥14 ॥
निंदक सांचा मीत है, जीवे आदि जुगाद ।
निंदा सुन हमने तना, मन का विषम विषाद ॥15 ॥
निज निंदा से जो डरे, सो नहीं सांचा भक्त ।
सुन सुन निंदा आपनी, तजे दोष का जग्त ॥16 ॥
गुरू टेक दृढ़ कीजिये, सुन निंदा के बैन ।
जो कोई निज निंदा सहे, मन उपजे सुख चैन ॥17 ॥
निंदक तो निंदा करे, हम निंदक को प्यार ।
सुनकर निंदा आपनी, त्यागा मूल विकार ॥18 ॥
गुरुमत गुरु का दास है, निंदक मनमत होय ।
निंदक के प्रसाद से, दुर्मति गई सब खोय ॥16 ॥
गुरु से नित यह माँग हूँ, औगुन त बनाय ।
गुन दृष्टि पर गुन लहूँ, राधास्वामी गुन नित गाय ॥20 ॥
निंदा से उपजे सभी, कलह कलेश महान ॥1 ॥
मन दर्पन के बीच में, पर निंदा की छार ।
निर्मलता पल में गई, भर गई धूल विकार ॥2 ॥
\अपने आपको देखिये, औरन सों क्या काम ।
अपने देखे गुन लहें, औरन औगुन ठाम ॥3 ॥
हस हस दोष न देखिये, मन घट अगम अनूप । ।
जो या में निंदा भरे, तन छिन होये कृप ॥4 ॥
साध बड़े परमारथी, गुन गह औगुन त्याग ।
जो कोई औगुन को गहे, सो मतिमंद अभाग ॥5 ॥
भैयरा बैठा फूल पर, लेइ सुगंध सुबास ।
मक्खी विष्ठा पर उड़ी, पाय कुगंध कुबास ॥6 ॥
जो तू गुरु का दास है, होजा गुरु का बच्छ ।
दूध सार सब खींच ले, छोड़ रक्त का पच्छ ॥7 ॥
शब्द सार टकसाल है, समझ शब्द का सार । ।
साधू माखन चाखिया, छाछ पिये संसार ॥8 ॥
अपनी निंदा कीजिये, पर निंदा से लाज ।
निज निंदा कारज बने, और से होय अकाज ॥6 ॥
ब्रह्मा ने यह जग रचा, अमृत जहर मिलाय ।
अमृत देव का खाज है, असुर जहर नित खाय ॥10 ॥
निंदक तो हिंसक भया, हिंसा करे उपाय । ।
जिभ्या की तलवार से, सदा कलेजे धाव ॥11 ॥
जो तू गुरु का सेवका, निंदा दोष भुलाव । ।
जो कोई पर निंदा करे, पड़े न पूरा दाच ॥12 ॥
गुन ग्राही कोई संतजन, औगुन ग्राही असाध ।
दोष पराया ना लखे, ताका मता अगाध ॥13 ॥
निज निंदा सुन हरखिये, कर निंदक सन्मान ।
बिन साबुन पानी बिना, शुद्ध करे मन आन ॥14 ॥
निंदक सांचा मीत है, जीवे आदि जुगाद ।
निंदा सुन हमने तना, मन का विषम विषाद ॥15 ॥
निज निंदा से जो डरे, सो नहीं सांचा भक्त ।
सुन सुन निंदा आपनी, तजे दोष का जग्त ॥16 ॥
गुरू टेक दृढ़ कीजिये, सुन निंदा के बैन ।
जो कोई निज निंदा सहे, मन उपजे सुख चैन ॥17 ॥
निंदक तो निंदा करे, हम निंदक को प्यार ।
सुनकर निंदा आपनी, त्यागा मूल विकार ॥18 ॥
गुरुमत गुरु का दास है, निंदक मनमत होय ।
निंदक के प्रसाद से, दुर्मति गई सब खोय ॥16 ॥
गुरु से नित यह माँग हूँ, औगुन त बनाय ।
गुन दृष्टि पर गुन लहूँ, राधास्वामी गुन नित गाय ॥20 ॥
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Song 28 — Hindi
634. गुरु की कीजे बन्दना, कोटि कोटि दिन रात ।
गुरु कृपा से साधुवा, पाये अद्भुत दात ॥1 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, निस दिन निस्सन्देह ।
गुरु कृपा से साधुवा, पावे उत्तम देह ॥2 ॥
गुरु को कीजे बन्दना, श्रद्धा भक्ति समेत ।
गुरु कृपा से साधुवा, जीते भव का खेत ॥3 ॥
गुरु की कीजे बन्दगी, रहिये आज्ञा माहिं। ।
गुरु कृपा से साधुवा, तीन लोक भय नाहिं ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये, कटे काल का फन्द ।
हिय अन्तर विच ऊगर्वी, कोटिन सूरज चन्द ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये; छूट जाय त्रय ताप । ।
सुख दुख एक समान हो, हदय शोक नहीं व्याप ॥6 ॥
गुरु मिले तब जानिये, सूझे अगम अपार ।
दृष्टि खुले पर पाइये, उत्तम भाव विचार ॥7 ॥
गुरु मिले तब जानिये, आवागवन नसाय ।
यम की फांसी कट गई, पदवी मिली महान ॥8 ॥
गुरु समान रक्षक नहीं, देखा नैन पसार ।
कुल कुटुम्ब सब स्वारथी, करें अधिक उपकार ॥6 ॥
गुरु समान दाता नहीं, दीनी दात अमोल ।
क्या कोई जाने दात वह, ताको मोल न तोल ॥10 ॥
गुरु समान नहिं मीत कोई, चार लोक जग माहिं। ।
निःकामी परस्वारथी, ऐसा कोई नाहिं ॥11 ॥
गुरु माता गुरु पिता हैं, गुरु भ्राता गुर मीत ।
गुरु सम प्रीतम जगत में, मोहि न आवे चीत ॥12 ॥
गुरु को सब कुछ जानिये, निसदिन कीजे सेव ।
गुरु साहेब गुरु साइयां, गुरु हैं सच्चे देव ॥13 ॥
गुरु कृपा से साधुवा, पाये अद्भुत दात ॥1 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, निस दिन निस्सन्देह ।
गुरु कृपा से साधुवा, पावे उत्तम देह ॥2 ॥
गुरु को कीजे बन्दना, श्रद्धा भक्ति समेत ।
गुरु कृपा से साधुवा, जीते भव का खेत ॥3 ॥
गुरु की कीजे बन्दगी, रहिये आज्ञा माहिं। ।
गुरु कृपा से साधुवा, तीन लोक भय नाहिं ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये, कटे काल का फन्द ।
हिय अन्तर विच ऊगर्वी, कोटिन सूरज चन्द ॥4 ॥
गुरु मिले तब जानिये; छूट जाय त्रय ताप । ।
सुख दुख एक समान हो, हदय शोक नहीं व्याप ॥6 ॥
गुरु मिले तब जानिये, सूझे अगम अपार ।
दृष्टि खुले पर पाइये, उत्तम भाव विचार ॥7 ॥
गुरु मिले तब जानिये, आवागवन नसाय ।
यम की फांसी कट गई, पदवी मिली महान ॥8 ॥
गुरु समान रक्षक नहीं, देखा नैन पसार ।
कुल कुटुम्ब सब स्वारथी, करें अधिक उपकार ॥6 ॥
गुरु समान दाता नहीं, दीनी दात अमोल ।
क्या कोई जाने दात वह, ताको मोल न तोल ॥10 ॥
गुरु समान नहिं मीत कोई, चार लोक जग माहिं। ।
निःकामी परस्वारथी, ऐसा कोई नाहिं ॥11 ॥
गुरु माता गुरु पिता हैं, गुरु भ्राता गुर मीत ।
गुरु सम प्रीतम जगत में, मोहि न आवे चीत ॥12 ॥
गुरु को सब कुछ जानिये, निसदिन कीजे सेव ।
गुरु साहेब गुरु साइयां, गुरु हैं सच्चे देव ॥13 ॥
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Song 29 — Hindi
635. पुरुष भेद नहीं पावे कोई ।
जब लग माया भरम न खोई ॥
छाया में सब रहे भुलान ।
रवि शशि का फिर मिले न ज्ञान ।
सूरज एक आकास प्रकाशा ।
ताका प्रतिबिम्ब आभास ॥
तत्वों का जब करे विचार ।
तब सूझे संसार असार ।
त्याग असार सार तब गहे ।
बिन परखे कोई कैसे कहे । ।
दोहासांख्य योग के मनन से, देखे माया रूप ।
उर अन्तर अपने लखे, तब निज सत्य स्वरूप ॥
जब लग माया भरम न खोई ॥
छाया में सब रहे भुलान ।
रवि शशि का फिर मिले न ज्ञान ।
सूरज एक आकास प्रकाशा ।
ताका प्रतिबिम्ब आभास ॥
तत्वों का जब करे विचार ।
तब सूझे संसार असार ।
त्याग असार सार तब गहे ।
बिन परखे कोई कैसे कहे । ।
दोहासांख्य योग के मनन से, देखे माया रूप ।
उर अन्तर अपने लखे, तब निज सत्य स्वरूप ॥
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Song 30 — Hindi
636. माया तो भई मोहनी, मोह लिया संसार ।
गरु की कृपा अपार से, कोई भया भव पार ॥1 ॥
माया के सेवक सभी, राजा रंक फकीर । ।
निसदिन मारे बान तक, बेधे सकल शरीर ॥2 ॥
माया तो फांसी भई, फांस लिये सब कोय ।
केवल गुरु की कृपा से, मुक्ति होय तो होय ॥3 ॥
गुरु को माथे राखिये, सुनिये बचन विचार ।
गुरु कृपा से साधुबा, छूटे सकल विकार ॥4 ॥
गरु की कृपा अपार से, कोई भया भव पार ॥1 ॥
माया के सेवक सभी, राजा रंक फकीर । ।
निसदिन मारे बान तक, बेधे सकल शरीर ॥2 ॥
माया तो फांसी भई, फांस लिये सब कोय ।
केवल गुरु की कृपा से, मुक्ति होय तो होय ॥3 ॥
गुरु को माथे राखिये, सुनिये बचन विचार ।
गुरु कृपा से साधुबा, छूटे सकल विकार ॥4 ॥
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Song 31 — Hindi
637. दोहाजीवन मुक्त के बात में, बात बात में बात ।
ज्यों कदली के पात में, पात पात में पात । । ॥ चौपाई ॥
सुन सतगुरु उपदेश साधु, सुन सतगुरु उपदेश पढ़ लिख के औरन समझावे ।
आप सांच का भेद न पावे ॥
भरम में भरमें और भरमावे ।
भूल भरम में सबही फसावे ।
उनका तज दे संग साधु, उनका तज दे संग ॥
सत्त असत्त की अकथ कहानी ।
भूले पंडित भूले ज्ञानी ॥
उनसे बचकर चल अभिमानी ।
इनकी बातें हैं मनमानी ॥
यह हैं निपट अनाड़ी, साधु यह हैं निपट अनाड़ी ॥
पढ़ा लिखा पर भेद न पाया ।
हाथ न उनके कुछ भी आया ।
झूठी काया झूठी माया ।
इनसे क्यों नर नेह लगाया ॥
समझबूझ कर काम साधु, समझबूझ कर काम ॥
मान बड़ाई में क्यों भूला ।
निसदिन फिरता फूला फूला ॥
काल जाल का कठिन है झूला ।
सहेगा अन्त में जम का मूला ।
मानुष जनम सुधार साधु, मानुष जनम सुधार ॥
चरन कमल प्रभु चित्त लगाओ ।
अपनी बिगड़ी आप बनाओ ।
भक्ति भाव का ढोल बजाओ ।
प्रेम प्रीत की महिमा गाओ ।
जासों हो निस्तार साधु, जासों हो निस्तार । ।
ज्यों कदली के पात में, पात पात में पात । । ॥ चौपाई ॥
सुन सतगुरु उपदेश साधु, सुन सतगुरु उपदेश पढ़ लिख के औरन समझावे ।
आप सांच का भेद न पावे ॥
भरम में भरमें और भरमावे ।
भूल भरम में सबही फसावे ।
उनका तज दे संग साधु, उनका तज दे संग ॥
सत्त असत्त की अकथ कहानी ।
भूले पंडित भूले ज्ञानी ॥
उनसे बचकर चल अभिमानी ।
इनकी बातें हैं मनमानी ॥
यह हैं निपट अनाड़ी, साधु यह हैं निपट अनाड़ी ॥
पढ़ा लिखा पर भेद न पाया ।
हाथ न उनके कुछ भी आया ।
झूठी काया झूठी माया ।
इनसे क्यों नर नेह लगाया ॥
समझबूझ कर काम साधु, समझबूझ कर काम ॥
मान बड़ाई में क्यों भूला ।
निसदिन फिरता फूला फूला ॥
काल जाल का कठिन है झूला ।
सहेगा अन्त में जम का मूला ।
मानुष जनम सुधार साधु, मानुष जनम सुधार ॥
चरन कमल प्रभु चित्त लगाओ ।
अपनी बिगड़ी आप बनाओ ।
भक्ति भाव का ढोल बजाओ ।
प्रेम प्रीत की महिमा गाओ ।
जासों हो निस्तार साधु, जासों हो निस्तार । ।
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Song 32 — Hindi
638. बुन्द सिन्ध का रूप है, सिन्ध बुन्द का रूप ।
बुन्द सिन्ध के रूप में, झलके अगम अनूप ॥1 ॥
पहिले बुन्द का मान है, पीछे सिन्ध का ज्ञान ।
बुन्द सिंध दोनों तजे, तब पावे निरवान ॥2 ॥
बुन्द चला सत सिंध को, समझ समझ पगधार ।
जब देखा निज रूप को, भया सार का सार ॥3 ॥
झगड़ा पड़ा अनेक का, लख आवे नहीं एक ।
धोके में नर तन गया, मिला न सार विवेक ॥4 ॥
॥चौपाई ॥
एके एक रहा भरपूर ।
सबके निकट नहीं कुछ दूर ॥
सिन्ध बुन्द में रहा छुपाई ।
परखे बुन्द तो सिन्ध लखाई ॥
घट समुद्र में लहर अपार ।
लहर मध्य व्यापा संसार ॥
सतगुरु मिले लगावे पार ।
बिन सतगुरु डूबे मंझधार ॥
बिरला गुरु का सेवक पूरा ।
जो रन चढ़े वह सच्चा सूरा ॥
दोहानाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे कोई साध ।
शब्द घाट जो ऊतरे, ताका मता अगाध ॥
बुन्द सिन्ध के रूप में, झलके अगम अनूप ॥1 ॥
पहिले बुन्द का मान है, पीछे सिन्ध का ज्ञान ।
बुन्द सिंध दोनों तजे, तब पावे निरवान ॥2 ॥
बुन्द चला सत सिंध को, समझ समझ पगधार ।
जब देखा निज रूप को, भया सार का सार ॥3 ॥
झगड़ा पड़ा अनेक का, लख आवे नहीं एक ।
धोके में नर तन गया, मिला न सार विवेक ॥4 ॥
॥चौपाई ॥
एके एक रहा भरपूर ।
सबके निकट नहीं कुछ दूर ॥
सिन्ध बुन्द में रहा छुपाई ।
परखे बुन्द तो सिन्ध लखाई ॥
घट समुद्र में लहर अपार ।
लहर मध्य व्यापा संसार ॥
सतगुरु मिले लगावे पार ।
बिन सतगुरु डूबे मंझधार ॥
बिरला गुरु का सेवक पूरा ।
जो रन चढ़े वह सच्चा सूरा ॥
दोहानाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे कोई साध ।
शब्द घाट जो ऊतरे, ताका मता अगाध ॥
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Song 33 — Hindi
639 सतसंगत से लाभ उठाया ।
गुरु से परमारथ धन पाया ।
परमारथ स्वारथ सब त्यागी ।
गुरु चरनन का रहूँ अनुरागी ।
गुरु की पूजा गुरु की सेवा ।
गुरु सम कोई न जाने देवा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बिगड़ी बात सँबारी ॥
गुरु से परमारथ धन पाया ।
परमारथ स्वारथ सब त्यागी ।
गुरु चरनन का रहूँ अनुरागी ।
गुरु की पूजा गुरु की सेवा ।
गुरु सम कोई न जाने देवा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बिगड़ी बात सँबारी ॥
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Song 34 — Hindi
640. गुरु ने युक्ति सहज बताई ।
मेंट दिया जग अगमापाई ॥
सुमिरन से भव का भय भागा ।
ध्यान बढ़ा चित्त अनुरागा । ।
शब्द से कटे मोह के जाल ।
सेवक फिर हुआ आज निहाल । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
या विधि टूटे बन्धन भारी ॥
मेंट दिया जग अगमापाई ॥
सुमिरन से भव का भय भागा ।
ध्यान बढ़ा चित्त अनुरागा । ।
शब्द से कटे मोह के जाल ।
सेवक फिर हुआ आज निहाल । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
या विधि टूटे बन्धन भारी ॥
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Song 35 — Hindi
641. करम धरम है गुरु की सेवा ।
सतसंग ज्ञान विचार का भेवा ॥
भक्ति भाव गुरु रूप का ध्यान ।
सुरत पाय पद अति हरखान ।
तुर्या अलख गुरु की लख है ।
जोति शब्द का अन्तर मुख है ।
जो कोई इन तीनों को पावे ।
जड़ चेतन का भर्म मिटावे ॥
ग्रन्थी खुले निज रूप निहारे ।
जोति शब्द का भेद विचारे ।
सवको त्यागो करो विचार ।
राधास्वामी धामी है सबका सार । ।
सतसंग ज्ञान विचार का भेवा ॥
भक्ति भाव गुरु रूप का ध्यान ।
सुरत पाय पद अति हरखान ।
तुर्या अलख गुरु की लख है ।
जोति शब्द का अन्तर मुख है ।
जो कोई इन तीनों को पावे ।
जड़ चेतन का भर्म मिटावे ॥
ग्रन्थी खुले निज रूप निहारे ।
जोति शब्द का भेद विचारे ।
सवको त्यागो करो विचार ।
राधास्वामी धामी है सबका सार । ।
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Song 36 — Hindi
642. करम धरम तज शरन में आओ ।
गुरु चरनन से आस लगाओ ।
मेटे द्वन्द का भरम पसारा ।
सूझे सार असार का सारा ॥
सुमिरन भजन ध्यान घट अंदर ।
तब प्रगटे हिय शब्द निरंतर ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया से हुआ भव पारी
गुरु चरनन से आस लगाओ ।
मेटे द्वन्द का भरम पसारा ।
सूझे सार असार का सारा ॥
सुमिरन भजन ध्यान घट अंदर ।
तब प्रगटे हिय शब्द निरंतर ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु की दया से हुआ भव पारी
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Song 37 — Hindi
643. प्रारब्ध पहले बन आया ।
ताने पीछे जनम रचाया ।
पेट में नर की किया संभार ।
दे अहार पाछे करतार ॥
मां की छाती दूध उत्पावे ।
पाले पोसे बड़ा करावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी मौज गुरु की लेउ निहारी ॥
ताने पीछे जनम रचाया ।
पेट में नर की किया संभार ।
दे अहार पाछे करतार ॥
मां की छाती दूध उत्पावे ।
पाले पोसे बड़ा करावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी मौज गुरु की लेउ निहारी ॥
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Song 38 — Hindi
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Song 39 — Hindi
644. क्रियमान कर्म सहज ही कटे ।
संचित कर्म भी चित से हटे ।
प्रारब्ध में प्रबलताई ।
बिना भोग नहीं काटा जाई ।
ताते मौज का लेउ सहारा ।
भोगो भोग में करो विचारा ॥
राधासामी चरन शरन बलिहारी ।
प्रारब्ध भोग को मेटत जारी । ।
संचित कर्म भी चित से हटे ।
प्रारब्ध में प्रबलताई ।
बिना भोग नहीं काटा जाई ।
ताते मौज का लेउ सहारा ।
भोगो भोग में करो विचारा ॥
राधासामी चरन शरन बलिहारी ।
प्रारब्ध भोग को मेटत जारी । ।
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Song 40 — Hindi
645. नेकी करे तो नेकी आवे ।
बदी करे बद का फल पावे ॥
जो औरन को खोदे कुआँ ।
आपहि डूबे गिरकर वहां ॥
जो औरन को जहर खिलावे ।
उसका पुत्र बन्धु मरजावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
करम भरम की बात है नियारी
बदी करे बद का फल पावे ॥
जो औरन को खोदे कुआँ ।
आपहि डूबे गिरकर वहां ॥
जो औरन को जहर खिलावे ।
उसका पुत्र बन्धु मरजावे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
करम भरम की बात है नियारी
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Song 41 — Hindi
646. मन बुद्धि चित में जब नहीं मेल ।
फिर साधन का बने न खेल ।
चंचल मन में शान्ति न आवे ।
भ्रान्ति भरम का दुख बहु पाये ॥
आसन टिके न ध्यान लगावे ।
परमारथ धन हाथ न आवे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति सारी ॥
फिर साधन का बने न खेल ।
चंचल मन में शान्ति न आवे ।
भ्रान्ति भरम का दुख बहु पाये ॥
आसन टिके न ध्यान लगावे ।
परमारथ धन हाथ न आवे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
गुरु ने बताई युक्ति सारी ॥
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Song 42 — Hindi
647. जैसा कृष्ण राधा को कहे ।
राधा के मुंह वैसा सुने ।
अनुचित बानी अनुचित मन ।
अनुचित कथन का अनुचित सुन। ।
जैसा सोचे तैसा रूप ।
सोच से कोई रंक नहीं भूप ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जैसा ध्यान वैसा व्यौहार । ।
राधा के मुंह वैसा सुने ।
अनुचित बानी अनुचित मन ।
अनुचित कथन का अनुचित सुन। ।
जैसा सोचे तैसा रूप ।
सोच से कोई रंक नहीं भूप ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
जैसा ध्यान वैसा व्यौहार । ।
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Song 43 — Hindi
648. द्वष भाव से द्वेष की आँच ।
राग जो उपजे तब हुये सांच ॥
कृष्ण असुर के काल कहावे ।
सुर देवता मित्र ठरावे ॥
जसोदा नन्द के नन्हें बालक ।
ब्राह्मण साधु के वह कुल पालक ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मित्र शत्रु मन अधम खिलारी ॥
राग जो उपजे तब हुये सांच ॥
कृष्ण असुर के काल कहावे ।
सुर देवता मित्र ठरावे ॥
जसोदा नन्द के नन्हें बालक ।
ब्राह्मण साधु के वह कुल पालक ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
मित्र शत्रु मन अधम खिलारी ॥
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Song 44 — Hindi
649. झुट मुट खेलू सांचा होय ।
सांचा खेले बिरला कोय ॥
जो कोई झूटे सतसंग आय ।
सांचा सतसंग का फल पाय ॥
झूट त्याग सत को दे चित ।
साहेब सांचा उसका मीत ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सतसंगत की महिमा भारी । ।
सांचा खेले बिरला कोय ॥
जो कोई झूटे सतसंग आय ।
सांचा सतसंग का फल पाय ॥
झूट त्याग सत को दे चित ।
साहेब सांचा उसका मीत ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सतसंगत की महिमा भारी । ।
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Song 45 — Hindi
650. जो कोई बोले बातें सांच ।
ताको कभी न आवे आंच ॥
जाके हृदय सांच का बासा ।
ताके मन प्रभु करें निवासा ॥
मौज निहार करे सेवकाई ।
साई उसके सदा सहाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सांच की आप करें रखवारी । ।
ताको कभी न आवे आंच ॥
जाके हृदय सांच का बासा ।
ताके मन प्रभु करें निवासा ॥
मौज निहार करे सेवकाई ।
साई उसके सदा सहाई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
सांच की आप करें रखवारी । ।
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Song 46 — Hindi
651. ब्रह्म न बनो कथो नहीं ज्ञान ।
सीखो गुरु से साधन ध्यान ॥
कथनी छोड़ करनी चितलाओ ।
करनी द्वारा रहनी पाओ ।
सुरत’ शब्द की लागे तारी ।
तब घट प्रगटे भेद अपारी ॥
( ज्ञान अज्ञान विचार )
सीखो गुरु से साधन ध्यान ॥
कथनी छोड़ करनी चितलाओ ।
करनी द्वारा रहनी पाओ ।
सुरत’ शब्द की लागे तारी ।
तब घट प्रगटे भेद अपारी ॥
( ज्ञान अज्ञान विचार )
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Song 47 — Hindi
652. दोहाचार अठारह षट पढ़े, पढ़ पढ़ जनम सिरान ।
बिना योग साधे कहां, उपजे उत्तम ज्ञान ॥
रज सत तम में रहे भुलाई ।
मन मूरख की थाह न पाई । ।
मन के उरझे उरझे पानी ।
मन नहीं सुरझा भरम भुलानी ॥
काम क्रोध मद घाटी दुर्गम ।
चढ़े न जब लग कैसा शम दम ॥
बिन शम दम नहीं पूरा ध्यान ।
बिना ध्यान कहो कैसा ज्ञान ॥
बाहर मुखी जगत में डोलें ।
बिन समझे बुझे बहु बोलें ।
दोहायोग करे जब तब लहे, घट अन्तर का भेद ।
तब छूटे संसार यह, मिटे भरम भव खेद ॥
बिना योग साधे कहां, उपजे उत्तम ज्ञान ॥
रज सत तम में रहे भुलाई ।
मन मूरख की थाह न पाई । ।
मन के उरझे उरझे पानी ।
मन नहीं सुरझा भरम भुलानी ॥
काम क्रोध मद घाटी दुर्गम ।
चढ़े न जब लग कैसा शम दम ॥
बिन शम दम नहीं पूरा ध्यान ।
बिना ध्यान कहो कैसा ज्ञान ॥
बाहर मुखी जगत में डोलें ।
बिन समझे बुझे बहु बोलें ।
दोहायोग करे जब तब लहे, घट अन्तर का भेद ।
तब छूटे संसार यह, मिटे भरम भव खेद ॥
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Song 48 — Hindi
653. दोहासिंह पड़ा भव कूप में, छाया अपनी देख ।
बूड़ मरा मंजधार विच, देखो करम की रेख ॥
छाया माया दोउ असार ।
छाया माया है संसार ॥
जब लग छाया माँहि रहावे ।
तब लग भव दुख अधिक सतावे। ।
अहं ब्रह्म हंकार निवास ।
अहंकार में जम का फाँस ॥
बात बनाई जग भरमाया ।
आप फंसा औरन फसबाया ॥
मान ध्यान और बुद्धि विलास ।
ताते होय न अविद्या नास ॥ भाई ॥
दोहा झाई में छाई पड़ी, झांई पड़ी न देख ।
झांई झांई लख परे, दरसे अगम अलेख ॥
बूड़ मरा मंजधार विच, देखो करम की रेख ॥
छाया माया दोउ असार ।
छाया माया है संसार ॥
जब लग छाया माँहि रहावे ।
तब लग भव दुख अधिक सतावे। ।
अहं ब्रह्म हंकार निवास ।
अहंकार में जम का फाँस ॥
बात बनाई जग भरमाया ।
आप फंसा औरन फसबाया ॥
मान ध्यान और बुद्धि विलास ।
ताते होय न अविद्या नास ॥ भाई ॥
दोहा झाई में छाई पड़ी, झांई पड़ी न देख ।
झांई झांई लख परे, दरसे अगम अलेख ॥
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Song 49 — Hindi
654. दोहा मिथ्या जग को सब कहें, मिथ्या कथन विचार ।
मिथ्या कहि मिथ्या फसे, मिथ्या माहि विचार । ।
मिथ्या का नर करे विचार ।
तज मिथ्या पद पावे सार ।
मिथ्या की अति असत कहानी ।
सतपद मिथ्या से अलगानी ॥
मिथ्या कारज मिथ्या कारन ।
मिथ्या है सब सूक्ष्म विचारन ।
मिथ्या अव्याकृत बिराट ।
मिथ्या हिरण्यगर्भ का ठाट ।
मिथ्या तेजस विश्व पराग ।
दोऊ तजे खुले तब भाग ।
दोहा शुद्ध भावना शुद्ध चित, शुद्ध विवेक विराग ।
__ घट पट से ऊँचे चढ़े, खेले सत से फाग ॥
मिथ्या कहि मिथ्या फसे, मिथ्या माहि विचार । ।
मिथ्या का नर करे विचार ।
तज मिथ्या पद पावे सार ।
मिथ्या की अति असत कहानी ।
सतपद मिथ्या से अलगानी ॥
मिथ्या कारज मिथ्या कारन ।
मिथ्या है सब सूक्ष्म विचारन ।
मिथ्या अव्याकृत बिराट ।
मिथ्या हिरण्यगर्भ का ठाट ।
मिथ्या तेजस विश्व पराग ।
दोऊ तजे खुले तब भाग ।
दोहा शुद्ध भावना शुद्ध चित, शुद्ध विवेक विराग ।
__ घट पट से ऊँचे चढ़े, खेले सत से फाग ॥
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Song 50 — Hindi
655. दोहा तीन अवस्था तीन गुन, तीन बरन तिउं काल ।
इनसे जब ऊँचे चले, तव चौथा पद चाल ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति माया ।
तुर्या चौथा पद निर्माया । ।
सृष्टि स्थिति परलय माहीं ।
क्षत्री शूद्र अरु वेश रहाई ॥
तुर्या पद में सत्य समाना ।
सोई ब्रह्म ब्राह्मण कोई जाना ॥
गृही ब्रह्माचारी बन बासी ।
तीनों त्याग हुये सन्यासी ॥
सन्यासी में सहज उदास ।
सन्यासी कोई गुरु का दास ॥
दोहा सगुन रूप त्रय गुन विषय, निर्गुन चौथा धाम ।
निर्गुन सगुन ते ऊपरे, तुर्यातीत की ठाम ॥
इनसे जब ऊँचे चले, तव चौथा पद चाल ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति माया ।
तुर्या चौथा पद निर्माया । ।
सृष्टि स्थिति परलय माहीं ।
क्षत्री शूद्र अरु वेश रहाई ॥
तुर्या पद में सत्य समाना ।
सोई ब्रह्म ब्राह्मण कोई जाना ॥
गृही ब्रह्माचारी बन बासी ।
तीनों त्याग हुये सन्यासी ॥
सन्यासी में सहज उदास ।
सन्यासी कोई गुरु का दास ॥
दोहा सगुन रूप त्रय गुन विषय, निर्गुन चौथा धाम ।
निर्गुन सगुन ते ऊपरे, तुर्यातीत की ठाम ॥
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Song 51 — Hindi
656 दोहा साधन से सब होत हैं, करम धरम के काम ।
बिन साधन नहीं पाइये, परमतत्व का धाम ।
जेहि विधि जीव फंसा संसार ।
तिसि विधि ताका करे निरवार ॥
कर निरवार ग्रन्थी हिये खोले ।
युक्ति मिलावे न मुख से बोले ।
जड़ चेतन की गांठी परी ।
शान्ति भाव सो मन से हरी । ।
मन अशान्त अज्ञान समाना ।
तिमिर भरम में अति अकुलाना ॥
अकुल विकुल में दुख कलेश ।
केहि विधि सुने गुरु संदेश ॥
दोहाश्रवन मनन निध्यासन, सतसंग में चित धार ।
गुरु की दया अपार से, उतरे भव जल पार । ।
बिन साधन नहीं पाइये, परमतत्व का धाम ।
जेहि विधि जीव फंसा संसार ।
तिसि विधि ताका करे निरवार ॥
कर निरवार ग्रन्थी हिये खोले ।
युक्ति मिलावे न मुख से बोले ।
जड़ चेतन की गांठी परी ।
शान्ति भाव सो मन से हरी । ।
मन अशान्त अज्ञान समाना ।
तिमिर भरम में अति अकुलाना ॥
अकुल विकुल में दुख कलेश ।
केहि विधि सुने गुरु संदेश ॥
दोहाश्रवन मनन निध्यासन, सतसंग में चित धार ।
गुरु की दया अपार से, उतरे भव जल पार । ।
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Song 52 — Hindi
657. दोहागोपी गोप हैं गुप्त वृती, मधु सूदन करतार ।
वृन्दावन बन तन आय के, लीला करे अपार । ।
आनन्द नन्द रूप पितु सोई ।
माया जमुमत माता होई ॥
निश्चर रूप अविद्या कंस ।
बूड़ा उग्रसेन का बंस ॥
ताहि मार दश द्वार सिधारा ।
राधा सुरत किया सिंगारा ॥
रुक्मिणी जाम्बवन्ती सतभामा ।
सुन्दर अद्भुत बिमल ललामा। ।
सुरत निरत सब अति कर साधी ।
द्वारका फिर जा लगी समाधी ॥
दोहाजो कोई जाने भेद यह, ताको कहिये साध ।
जो नर पड़े विवाद में, करें नित्य अपराध । ।
वृन्दावन बन तन आय के, लीला करे अपार । ।
आनन्द नन्द रूप पितु सोई ।
माया जमुमत माता होई ॥
निश्चर रूप अविद्या कंस ।
बूड़ा उग्रसेन का बंस ॥
ताहि मार दश द्वार सिधारा ।
राधा सुरत किया सिंगारा ॥
रुक्मिणी जाम्बवन्ती सतभामा ।
सुन्दर अद्भुत बिमल ललामा। ।
सुरत निरत सब अति कर साधी ।
द्वारका फिर जा लगी समाधी ॥
दोहाजो कोई जाने भेद यह, ताको कहिये साध ।
जो नर पड़े विवाद में, करें नित्य अपराध । ।
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Song 53 — Hindi
658. गुरु के चरन जाऊँ बलिहारी ।
जिन यह मौज दिखाई न्यारी ।
मन माया से पार लगाया ।
शब्द भेद दे सार बताया ।
सहसकमलदल घाटी तोड़ी ।
सुरत निरत गुरु चरनन जोड़ी ॥
घट में भान किया प्रकाश ।
तिमिर अविद्या का लगा नास ॥
त्रिकुटी चढ़ सुन खंड में आया ।
भवरगुफा बंसी बजवाया ।
दोहासोहंग धुन घट में सुनी, भंवरगुफा के पास । ।
राधा सुरत निर्मल भई, कृषण संग किया बिलास । ।
जिन यह मौज दिखाई न्यारी ।
मन माया से पार लगाया ।
शब्द भेद दे सार बताया ।
सहसकमलदल घाटी तोड़ी ।
सुरत निरत गुरु चरनन जोड़ी ॥
घट में भान किया प्रकाश ।
तिमिर अविद्या का लगा नास ॥
त्रिकुटी चढ़ सुन खंड में आया ।
भवरगुफा बंसी बजवाया ।
दोहासोहंग धुन घट में सुनी, भंवरगुफा के पास । ।
राधा सुरत निर्मल भई, कृषण संग किया बिलास । ।
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Song 54 — Hindi
659. भान उदय हुआ कमल विकास ।
मोहे मधुप सरोज सुबास ॥
बिगसत कवल मगन आनन्द ।
सुरत निरत के खुल गये बन्द ॥
बन्द खुले सुरत ऊपर चाली ।
लीला देख भई मतवाली ॥
निज स्वरूप का पाया भेद ।
छूट गये भव के भ्रम भेद । ।
हरखत मन गुरु चरन समानी ।
सत्त पुरुष की सुन ली बानी ॥
दोहाबानी सुन देही तजी, पाया पद निर्वान ।
राधास्वामी चरन में, मिल गया ठौर ठिकान ॥
मोहे मधुप सरोज सुबास ॥
बिगसत कवल मगन आनन्द ।
सुरत निरत के खुल गये बन्द ॥
बन्द खुले सुरत ऊपर चाली ।
लीला देख भई मतवाली ॥
निज स्वरूप का पाया भेद ।
छूट गये भव के भ्रम भेद । ।
हरखत मन गुरु चरन समानी ।
सत्त पुरुष की सुन ली बानी ॥
दोहाबानी सुन देही तजी, पाया पद निर्वान ।
राधास्वामी चरन में, मिल गया ठौर ठिकान ॥
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Song 55 — Hindi
660. इन्द्र प्रस्थ वह देश अनूप ।
राजा जहां युधिष्टर भूप ।
पाँच तत्व ले रचा शरीर ।
आये बसे वहाँ धीर गम्भीर ॥
अन्धा धृतराष्ट अज्ञान ।
से सौ पुत्र किया भति हान ॥
भीष्म द्रौण सब साज सँवारे ।
भारत रन में चढ़ पद गाड़े ॥
कृष्ण सहाय भये पान्डुन के ।
मारे खल दल क्षत्री बांके ।
दोहागये हिमालय जाय सब, पान्डव मंगल खान ।
राधास्वामी की दया, पाया यह सत ज्ञान ।
राजा जहां युधिष्टर भूप ।
पाँच तत्व ले रचा शरीर ।
आये बसे वहाँ धीर गम्भीर ॥
अन्धा धृतराष्ट अज्ञान ।
से सौ पुत्र किया भति हान ॥
भीष्म द्रौण सब साज सँवारे ।
भारत रन में चढ़ पद गाड़े ॥
कृष्ण सहाय भये पान्डुन के ।
मारे खल दल क्षत्री बांके ।
दोहागये हिमालय जाय सब, पान्डव मंगल खान ।
राधास्वामी की दया, पाया यह सत ज्ञान ।
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Song 56 — Hindi
661. पदम पंद्मनी नीर में, गगन मंडल में भान ।
दृश्य नेह स्वभाव का, देखे सज्जन आन ॥1 ॥
पद्म गगन की ओर दृष्टि, रवि धरती की ओर ।
दोनों मन मोहन बने, दोनों ही चित चोर ॥2 ॥
पदम पद्मिनी उच्च चित, नीच चित्त है सूर ।
ऊँच नीच दोऊ कल्पित, मद माया कर चूर ॥3 ॥
रवि दयाल का रूप है, दीन दुखी से प्यार ।
ऊँच की दृष्टि नीच पर, महिमा अगम अपार ॥4 ॥
सूरज की हानी नहीं, परम की ओर निहार ।
कृष्ण सुदामा की दशा, परखे परखन हार ॥5 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीन दुखी के काज ।
सतपद तज प्रगटे जगत, सन्त साध दल साज ॥6 ॥
दृश्य नेह स्वभाव का, देखे सज्जन आन ॥1 ॥
पद्म गगन की ओर दृष्टि, रवि धरती की ओर ।
दोनों मन मोहन बने, दोनों ही चित चोर ॥2 ॥
पदम पद्मिनी उच्च चित, नीच चित्त है सूर ।
ऊँच नीच दोऊ कल्पित, मद माया कर चूर ॥3 ॥
रवि दयाल का रूप है, दीन दुखी से प्यार ।
ऊँच की दृष्टि नीच पर, महिमा अगम अपार ॥4 ॥
सूरज की हानी नहीं, परम की ओर निहार ।
कृष्ण सुदामा की दशा, परखे परखन हार ॥5 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीन दुखी के काज ।
सतपद तज प्रगटे जगत, सन्त साध दल साज ॥6 ॥
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Song 57 — Hindi
662. पदम रहे जल जगत में, सूरज बसे आकास ।
दृष्टि गगन की ओर कर, पदम सूर के पास ॥1 ॥
पदम रंग है प्रेम का, प्रेम शक्ति के संग ।
प्रेम की शक्ति संग ले, धार पग का रंग ॥2 ॥
शक्ति भक्ति चित मुक्ति है, युक्ति मुक्ति व्यौहार ।
शक्ति भक्ति चित युक्ति धर, मुक्ति का पन्थ संवार ॥3 ॥
घट में प्रेम की शक्ति जब, चढ़ चल शब्द की धार ।
गगन मंडल सुन्न शिखर पर, सहज समाध सुधार ॥4 ॥
समता संजम साध ले, हो जा साध सुजान ।
सत संजोग के योग से, ले अब पद निरवान ॥5 ॥
जल में रह जल से अलग, पदम बतावे तोह ।
यही साध की रीत है, त्याग भरम मद मोह ॥6 ॥
मुरगावी जल में रहे, गोते खाये अनेक । ।
पर नहीं भीगे नीर से, यही पदम चित टेक ॥7 ॥
राधास्वामी की दया, पाया भेद अपार ।
पदम भानु की दशा लख, हो रहा जग से न्यार ॥8 ॥
दृष्टि गगन की ओर कर, पदम सूर के पास ॥1 ॥
पदम रंग है प्रेम का, प्रेम शक्ति के संग ।
प्रेम की शक्ति संग ले, धार पग का रंग ॥2 ॥
शक्ति भक्ति चित मुक्ति है, युक्ति मुक्ति व्यौहार ।
शक्ति भक्ति चित युक्ति धर, मुक्ति का पन्थ संवार ॥3 ॥
घट में प्रेम की शक्ति जब, चढ़ चल शब्द की धार ।
गगन मंडल सुन्न शिखर पर, सहज समाध सुधार ॥4 ॥
समता संजम साध ले, हो जा साध सुजान ।
सत संजोग के योग से, ले अब पद निरवान ॥5 ॥
जल में रह जल से अलग, पदम बतावे तोह ।
यही साध की रीत है, त्याग भरम मद मोह ॥6 ॥
मुरगावी जल में रहे, गोते खाये अनेक । ।
पर नहीं भीगे नीर से, यही पदम चित टेक ॥7 ॥
राधास्वामी की दया, पाया भेद अपार ।
पदम भानु की दशा लख, हो रहा जग से न्यार ॥8 ॥
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Song 58 — Hindi
663. हनुमन्त कुड अस्नान कर, देखे पदम अनेक ।
पूछा तुम तो कई हो, रवि है गगन में एक ॥1 ॥
पदम हस हस बोल कर, दृष्टि गगन की ओर । ।
समझ नेह की रीत कुछ, नहीं मुख से कर शोर ॥2 ॥
स्वामी सबका एक है, एक एक है एक ।
सेवक दास समान चित, जग में रहें अनेक ॥3 ॥
पाल प्रेम परतीत को, धर सतगुरु का ध्यान ।
सूरज एक अकास का, घट घट में दरसान ॥4 ॥
एक एक है एक है, एक एक के भाव ।
एक के प्रेम प्रतीत से, मिले प्रेम का दाव ॥5 ॥
घटे नहीं बाढ़े सदा, पाये मोह की धार ।
सीख प्रेम यह पदम से, सहित विवेक विचार ॥6 ॥
भक्ति के मारग आय कर, अघट प्रेम घट धार ।
सुरत शब्द की डोर गह, जाय गुरु दरबार ॥7 ॥
सूरज पदम समान दोऊ, एक रूप एक ढंग ।
गुरु चेला मिल एक हों, जो चित प्रेम का रंग ॥8 ॥
राधास्वामी भज सदा, निसदिन आठों धाम ।
जीवन सुख है जगत में, अन्त में सत्त पद ठाम ॥6 ॥
पूछा तुम तो कई हो, रवि है गगन में एक ॥1 ॥
पदम हस हस बोल कर, दृष्टि गगन की ओर । ।
समझ नेह की रीत कुछ, नहीं मुख से कर शोर ॥2 ॥
स्वामी सबका एक है, एक एक है एक ।
सेवक दास समान चित, जग में रहें अनेक ॥3 ॥
पाल प्रेम परतीत को, धर सतगुरु का ध्यान ।
सूरज एक अकास का, घट घट में दरसान ॥4 ॥
एक एक है एक है, एक एक के भाव ।
एक के प्रेम प्रतीत से, मिले प्रेम का दाव ॥5 ॥
घटे नहीं बाढ़े सदा, पाये मोह की धार ।
सीख प्रेम यह पदम से, सहित विवेक विचार ॥6 ॥
भक्ति के मारग आय कर, अघट प्रेम घट धार ।
सुरत शब्द की डोर गह, जाय गुरु दरबार ॥7 ॥
सूरज पदम समान दोऊ, एक रूप एक ढंग ।
गुरु चेला मिल एक हों, जो चित प्रेम का रंग ॥8 ॥
राधास्वामी भज सदा, निसदिन आठों धाम ।
जीवन सुख है जगत में, अन्त में सत्त पद ठाम ॥6 ॥
×
Song 59 — Hindi
664 । जल में पदम का वास है, सूरज बसे आकास ।
पदम का यह इच्छा भई, करे सूर की आस ॥1 ॥
धरती गगन का भेद लख, मन मेरा भया उदास ।
बोला पदम प्रतीत कर, मैं साज के पास ॥2 ॥
आस आस जग है बंधा, आस सहित विश्वास ।
जो जाके मन में बसे, सो है उसके पास ॥3 ॥
जैसी मति गति सोई लखे, कोई गुरु का दास ।
घट धरती सुरत सेवका, गगन मंडल गुरु वास ॥4 ॥
दृष्टि फेरकर ऊँच सिर, घट गुरु रूप निहार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, सतगुरु का दीदार ॥5 ॥
पदम भानु की प्रीत को, समझे साध सुजान ।
राधास्वामी की दया, पावे पद निरवान ॥6 ॥
इति
पदम का यह इच्छा भई, करे सूर की आस ॥1 ॥
धरती गगन का भेद लख, मन मेरा भया उदास ।
बोला पदम प्रतीत कर, मैं साज के पास ॥2 ॥
आस आस जग है बंधा, आस सहित विश्वास ।
जो जाके मन में बसे, सो है उसके पास ॥3 ॥
जैसी मति गति सोई लखे, कोई गुरु का दास ।
घट धरती सुरत सेवका, गगन मंडल गुरु वास ॥4 ॥
दृष्टि फेरकर ऊँच सिर, घट गुरु रूप निहार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, सतगुरु का दीदार ॥5 ॥
पदम भानु की प्रीत को, समझे साध सुजान ।
राधास्वामी की दया, पावे पद निरवान ॥6 ॥
इति







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