Shiva Shabdasagar Part I- 201 TO 400

201. ज्ञान का जब धन मिला है, ज्ञान के भंडार से।

भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥

सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।

यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥

चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।

फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥

सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।

शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥

कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।

सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥

सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।

भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥

मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।

राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥

202. आई शरणागत तुम्हारे, आके कैसी खोगई ।।

जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥

इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।

जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥

सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।

लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥

आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।

बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥

राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।

हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।

203. हंस हो और हंस के, राजा हो ऐसा जान लो ।

हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥

दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।

पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥

तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।

गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥

जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।

गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥

राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।

घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥

204. नाम जब गुरु का लिया, हो जाओ गुरु का ध्यान कर ।

कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥

गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।

यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥

जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।

भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥

गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।

देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥

राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।

घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥

205. जब सुशीला होगई, आनन्द मन को मिल गया ।।

जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥

शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।

वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥

शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।

शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥

राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।

जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥

206. ज्ञान जब पाया तो, फिर अज्ञान की क्यों चाह हो ।

भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥

गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।

वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥

चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।

चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥

तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।

बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।

राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।

अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।

207. ज्ञान का ले आसरा, और ज्ञान का आधार हो ।

फिर सहज भव सिंध से, बेड़ा तुम्हारा पार हो ।।।।

शब्द में है अर्थ, और अर्थ में है ज्ञान गम ।

चित की विरती रोक लो, और शब्द गुरुमत सार हो ॥॥

मुंह से निकले बचन मीठे, मन में हो करुणा सदा ।।

दीन दुखियों पर दया, घर वालों से नित प्यार हो ॥॥

भाग जब उदय होगया, फिर चिंता से क्या लाभ है ।।

उसको क्या खटका रहा, गुरु जिसका राखनहार हो ॥॥

राधास्वामी नाम की, घट में लगे सच्ची लगन ।।

यह लगन सच्ची लगे, फिर जग न कारागार हो ॥॥

208. जी में आता है सहज में, भव का सागर मैं तरू।।

मन बड़ा दुखदाई है यह, रुकता नहीं है क्या करू ॥॥

नाम में लगता नहीं, फिरता डाँवा डोल नित ।।

यह समझ उसको नहीं, किस ते हित किससे अहित ।।।।

ठानता है हठ हठीला, बनके यह मेरी सदा ।

भरम में पड़कर, गुनावन में है रहता सर्वदा ॥॥

कैसा सुमिरन ध्यान कैसा, अपना सुभिरन ध्यान है।

मन है चंचल और, चंचलता की उसमें खान है ॥॥

राधास्वामी अब दया कीजे, दया की दृष्टि से ।।

दो शरण यह यह मन न बहके, छूट इसकी सृष्टि से।। ।।

209. प्रेम जिसके मन में है, वह जगत का प्यारा बना ।।

जिसने देखा वह उसी की, आँख का तारा बना ॥॥

करके सुमिरन और भजन, और ध्यान तन मन साधकर ।।

नाम पाया भक्ति पाया, भक्त वह सारा बना ॥॥

घटे पर आसन मारकर, बैठा सुनी अनहद की तान ।।

उसका तन ही तानपूरा, और दोतरा बना ॥॥

चित में दुचिंताई नहीं, चिंता की कठिनाई नहीं ।

आप राधास्वामी सतगुरु, उसका रखवारा बना ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।

राधास्वामी को हो सेवक, उसका वह प्यारा बना ।।।।

210. शब्द गुरु का नाम है, और शब्द गुरु का रूप है।

शब्द ही चैतन्य है, और चैतन्य को वह कूप है ॥॥

शब्द का लो आसरा, और शब्द का स्थान लो ।।

शब्द परजी शब्द राजा, रात्र है और भुप है ॥॥

शब्द को सुमिरन भजन हो, शब्द ही का ध्यान हो ।

शब्द ही है एक और यह, शब्द ही बहुरूप है ॥॥

शब्द घट में गूजता है, रात दिन उसको सुनो।

मन की चंचलता मिटे, यह अगम अलख अनूप है ॥॥

राधास्वामी की दया से, घट के रस्ते में चलू ।।

ज्ञान का सूरज है चमका, उसकी चहुँ दिस धूप है ॥॥

211. बावली चिंता हैं कैस, गुरु तो तेरे पास है।

उसकी मन में कर तू आसा, और किसकी आस है ॥॥

भक्ति की चूनर पहिन ले, भक्ति का सिंगार कर ।।

ओढ़ चादर शील की, आनन्द सुख की रा है ॥॥

तुझमें भक्ति प्रेम है, और तुझमें है प्रतीत प्रीत ।

तुझमें श्रद्धा तुझमें दृढ़ला, तुझ ही में विश्वास है ॥॥

प्रेम में शक्ति है शक्ति, प्रेम की है मुरती ।।

प्रेम जिसके मन में आया, स्वामी का वह दास है ॥॥

नाम क्या तेरा है, तेरा रूप है कैसा सखी ।

क्यों भरम में है पड़ी, यह भरम यम की फाँस है ॥॥

अपने घट में देख, अपना आपा ले उसको परख ।।

तुझमें ज्योती ज्ञान गम की, ज्ञान का परकास है ॥॥

राधास्वामी की दया से, तू हुई सत संगिनी ।।

सत की संगत रात दिन कर, सते ही सांस और भास है ॥॥

212. आके चरणों में पड़ा हूँ, तेरे सबको त्यागकर ।

ली शरन पद कमल की, सम्बन्धियों से भागकर ॥॥

कष्ट पाया दुख उठाया, मोह से व्याकुल हुआ ।

छोड़ी आलस नींद की, निद्रा से भव के जागकर ॥॥

अब नहीं जाता कहीं, जाने लगा क्यों किस जगह ।।

बात आई अब समझ में, प्रेम और अनुराग कर ॥॥

एक का हो रहना अच्छा, बहुमता है दुर्गती ।।

एक मता है सद्गता, यह सोचा भाग और त्यागकर ॥॥

घूमा भरमा खालिये चक्कर, बगुले के समान ।।

अब तो चित निश्चल हुआ है, प्रेस का वर मांगकर ।।।।

कट गई अज्ञान की जड़, आया जच सतसंग में ।

राग उपजा सत का, सतसंग में गुरु के लागकर ॥॥

राधास्वामी मौज की आई समझ, सुनकर बचन ।

शब्द का श्रवण हुआ, भक्ति के रस में पागकर ॥॥

213. कहते हैं सब सन्त मत का, हे सहज साधन सही ।।

थोड़े दिन में करलो बुद्धि, ज्ञान का गुर है यही ॥॥

पर कोई ऐसा नहीं जो, तव का ज्ञाता मिले ।।

अश्न यू यूं उनका उत्तर, मुझको समझाता भिले ॥॥

कितने साधक हैं अनाड़ी, जानते कुछ भी नहीं ।

बहके फिरते हैं कहीं, और मारे फिरते हैं वहीं ॥॥

टेक बांधी झूठी कुछ, समझो न मत के सार की ।

ध्यान सुमिरन और भजन के, धरलिया सिर भार को ॥॥

कोई कहता है कि पहिले, धाम चढ़ना है कठिन ।

त्रिकुठीं कोई न पहुँचा, व्यर्थ भी सुमिरन भजन ॥॥

जो न हो त्रिकुटी का साधक, वह नहीं चैला हुआ ।

भौंदू सतसंगी को भौंदु, भक्त से मेला हुआ ॥॥

काल क्या है कोई बतलाता, नहीं क्या है दयाल ।।

गालियां देते हैं फिरते, यू ही कहते काल काल ॥॥

कैसे यह सृष्टि हुईं, हम क्यों करें सुमिरन भजन ।।

कोई समझाता ही नहीं, निष्फल हुआ सुमिरन मनन ।।।।

भाग उदय मेरा हुआ, सतगुरु की जब पाई शरन ।

सहज में आईं समझ, और सहज ही का था यतन ॥॥

धन्ये सतगुरु राधास्वामी, धन्य तुम दाता दयाल ।।

होगई मुझ पर दया, टूटा भरम का मोह जाल ॥॥

214. गुरु का सुमिरन ध्यान करके, गुरु की मैं दासी बनी ।

देह का अध्यास छूटा, अजर अविनाशी बनी ॥॥

गाती फिरती रहती हूँ मैं, राधास्वामी नाम को ।।

नाम से परताप पाया, मानसिक बिसराम को ॥।।

प्रेम जल के बूद की, मैं सहज ध्यासी हो गई ।।

रटते, पी पी आप ही, अपने पिया सी हो गई ॥।।

शब्द का साधन हुआ, जप तप से मुह को मोड़कर ।।

जग से मैं न्यारी बनी, सतगुरु से नाता जोड़कर ।।।।

राधास्वामी दीन हितकारी, मेरा उद्धार हो ।

ऐसी करनी कीजियेगा, सहज बेड़ा पार हो ॥॥

215. आत्मा मेरा सुखी है, देह सुख का ठाम है ।।

मन के साधन सुख का,सुख ही सतगुरु का नाम है ॥॥

दुख नहीं चिंता नहीं, आपत नहीं संकट नहीं ।।

सामने आंखों के मेरे, राधास्वामी धाम है ॥॥

राधास्वामी की दया से, जन्म का फल पागया ।

जीते जी सुख मिल गया, दिन रात सुख से काम है ॥॥

216. चित्त का आनन्द का, और रूप सत का होगया ।

मैं उसी दिन सुधरा, जिस दिन गुरु के मत का होगया ॥॥

काल के माया के बन्धन, सब सहज में कट गये ।।

जिन दुखों से मुझको घबराहट, थी आप ही कट गये ॥॥

ध्यान से सुमिरन भजन से, मुझको निस दिन काम है।

भूलकर जग भर्म को, होठों पे गुरु का नाम है ॥॥

घट में सूरज चाँद प्रगटे, सब अंधेरा खो गया ।

शब्द के सुनते ही, सुन्न की आत्म निद्रा सो गया ॥॥

भव मिटा संकट कटा, आनन्द मन में छा गया ।

धन्य राधास्वामी सतगुरु, मैं शरन में आ गया ॥॥

217. बंदनम् अद्वैत द्वत, अभाव भाव प्रकाशनम् ।

बंदनम् संसार त्रिविधि, विकार ताप विनाशनम् ॥॥

बंदनम् आदर्श इष्ट, अपार पार निवासनम् ।

बंदनम् गुरु पद्म पदरज, तिमिर दोष विभंजनम् ॥॥

नित्य मुक्त विशुद्ध निर्मल, सत्त चित आनन्दमय ।

शान्त बुद्ध अपार अद्भुत, सन्त सतगुरु पद गहे ॥॥

ज्ञान ध्यान न कर्म सेवा, भक्ति प्रेम न लह सके ।

गुरु दया बिन मुक्तिधाम का, रूप न कोई कह सके ।।।।

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाइये ।।

राधास्वामी चरन कमल की, ओर सीस झुकाइये ॥॥

218. मंगलम्

मंगलम् गुरु देव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।

मंगलम् त्रयलोक स्वामी, मंगलम् जन रंजनम् ॥॥

धन्य महिमा आपकी है, धन्य अद्भुत ज्ञान है।

आप ही के पद कमल में, सद्गति निर्वाण है ॥॥

राधास्वामी भक्ति दीजे, पार भव से कीजिये ।।

निज दया से अपना करके, तार मुझको लीजिये ॥॥

219.तीसरी धुन

गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ।

आन पड़ी मैं आन पड़ी, गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ॥

देश विदेश में भरमी भूली, देखे बन मैदाना ।

भर्मत फिरी चैन नहीं चित को, मिला न ठौर ठिकाना ॥

आन पड़ी मस्जिद देखे मन्दिर देखे, देखी कबर समाधी ।।

कुछ भी हाथ न आया मेरे, बढ़ गई मन की उपाधी ।

आन पड़ी पोथी पढ़कर शब्द जाल में, अटकी हो दीवानी ।।

भरम मिटा गुर की संगत मिल, हुई प्रेम मस्तानी ।।

आन पड़ी। कर्म किया और ज्ञान कथा बहु, मन गुत्थी न सुलझी ।

गुरु का शब्द सुन शान्ती आई, उलझी गुत्थी सुलझी ॥

आन पड़ी तीरथ गई तो पत्थर पानी, बरत में भूख पियासी ।

तपकर तपी कष्ट तन भोगा, चित मेरा हुआ उदासा ॥

आन पड़ी गुरु मिले सत्संग कराया, दया के बचन सुनाये ।।

चिंता डायन घट से भागी, सार तत्व दरसायो ।

आन पड़ी धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य तुम्हारी महिमा ।।

राधास्वामी सच्चे जीव हितैषी, किससे मैं दू उपमा ॥ आन पड़ी

220. गुरु चरन कमल की दासी बनी ।।

दासी बनी सुखरासी बनी, गुर चरन कमल की दासी बनी ॥

खोजी खोज खोज थक हारी, खोज का अन्त न देखा ।।

खोजे हाथ लगा नहीं कुछ भी, काल करम का लेखा ।। दासी बनी

माया छाया एक रूप दोऊ, जाने सब संसारी ।।

भगता के पाछे लगी डोले, सनमुख भागनहारी ।। दासी बनी

लोक परलोक धरम और अधरम, चेतन और जड़ काया ।।

दुविधा हँस दोनों खो बैठी, मिला राम न माया ।। दासी बनी

जो जो किया कर्म व्यौहार, संस्कार दृढ़ बैठे।

बन्धन मोह के मोटे रस्से, अन्तःकरन में पैठे ।। दासी बनी

स्वारथ वश मैं देखन आई, राधास्वामी समाजा ।।

गोरस बेचत हरी मिले मेरे, एक पन्थ दो काजा ॥ दासी बनी

सुरत शब्द मत भेद लखाया, सुखमन पन्थ लखाया ।।

भक्ति ज्ञान का मूल जताया, भरम विकार नसाया ।। दासी बनी

सत गुरु सत नाम सत संगत, अधिकारी कोई पावे ।।

राधास्वामी की कृपा से, फिर भव जाल न आवे ।। दासी बनी

221.गुरु दाता की शरन में आन गही ।

आन गही मैं आन गही, गुरु दाता की शरन मैं आन गही ।।

सुख सम्पत धन धाम बड़ाई, किसी का नहीं ठिकाना ।।

यह तो सब बादर की छाई, झूठा सब मद माना ॥

आन गही बालू की दीवार जगत है, बिनसत लगे न बारा ।

। चार दिना का सकल, पसारा, कुल कुटुम्ब परिवारा ।

आन गही ज्ञान ध्यान जप तप और संयम, मिथ्या वाद विवादा ।

इन से काज सरे नहीं कोई, उपजे हिये विषादा ।।

आन गही पल में सिंधु रेत बन जावे, पल में गिरे हिमाला ।

पल में नगर ग्राम सब छूटें, देवल और दीवाला ।।

आन गही गुरु की शरनागत जब आया, समझ पड़ी गुरु बानी ।।

राधास्वामी की दाया से, सहज हुआ निवनी ॥ आन गही

222. गुरु दया हुई गुरु प्यारी बनी ॥।

प्यारी बनी गुरु प्यारी बनी, मैं अपने गुरु की प्यारी बनी ॥

मैं बाली गुरु पितु और माता, गुरु का सहारा पाया ।

गुरु की गोद खेलू दिन राती, दुख सुख सब बिसराया ॥

प्यारी एक रस भक्ति हृदय में छाई, चंचल मन भया निश्चल ।।

भाग्य उदय हुआ चिंता भागी, नहीं चित में अब हलचल ॥

प्यारी एक आस विश्वास गुरु का, दुर्मति अब न सतावे ।।

यह गति कोई कोई साधू जाने, गुरु भक्ति जब पावे ॥

प्यारी ईश ने सिरजा फाँस हँसाया, मया मोह लपटाया ।

गुरु ने सिरजा फन्द कटाया, आवागमन नसाया ॥

प्यारी धन नहीं मांगू मान न मांगू, ज्ञान ध्यान नहीं मांगू ।।

मन रहे चरन कमल गुरु राता, भक्ति रस मैं मागू ॥

प्यारी दर्पन की सुन्दरी बन खेलू , किसी के हाथ न आऊँ।

काल जाल नहिं मोहि फैसावे, भक्ति भाव चित लाऊ ।।

प्यारी जाप मरा अजपा भी मर गया, चुप हुई अनहद बानी ।।

राधास्वामी ने खेल खिलाया, प्यारी हुई मस्तानी ।।

प्यारी

223. दुविधा ने गले फाँसी डारी ।।

फाँसी डारी फाँसी डारी, दुविधा ने गले फाँसी डारी ॥

पुरुष प्रकृति ने खेल रचाया, काल जाल फैलाया ।

दुविधि प्रकार की चाल चलाई, द्वन्द जगत निरमाया ।

फाँसी डारी चन्द्र सूर की लीला अद्भुत, रात दिवस की लीला ।।

ज्ञान अज्ञान अविद्या विद्या, कहीं नीला कहीं पीला ।

फाँसी डारी जीवन मृत्यु अशुभ शुभ कर्मा, नर्क स्वर्ग में बासा ।।

पितरी देव का पंथ दुहीला, देखे कोई तमासा ॥

फाँसी डारी माया ब्रह्म खिलाड़ी दोई, चौसर ठाठ सजाया ।

सुरत की गोट से खेलन बैठे, हार जीत बिलगाया ।।

फाँसी डारी कोई कच्ची कोई पक्की गोटी, चौसर घर में नाची ।

कच्ची माया चाल चले नित, पक्की लाल बन राची ॥

फाँसी डारी पक्की को भी चैन कहाँ है, पौ लग हो रही कच्ची ।

फिर वही खेल खिलाड़ी खेलें, सुरत खेल कहे सच्ची ।।

फाँसी डारी कुट पिट कर सुरत भई बिहाली, खेल से मुक्ति मांगे ।

नहिं कोई देवे सहारा अपना, दुख सुख भव भर्म लागे ।

फाँसी डारी सतगुरु दया रूप धर आये, सुरत को अंग लगाया।

शब्द भेद दे दिया सहारा, चौसर को उलटाया ।

फाँसी डारी काल चक्र का द्वन्द पसारा, अब नहीं किंचित व्यापे ।

राधास्वामी की किरपा से, लख लिया आपा आपे ।।फाँसी डारी

224. तू निज स्वरूप क्यों भूल गया ॥टेक॥

भूल गया क्यों भूल गया, तू निज स्वरूप क्यों भूल गया ।

दृष्टि पड़ी और पर तेरी, और का रूप प्रकासा ।।

दृष्टि सृष्टि का बढ़ा पसारा, मन में भरम विकासा

भूल गया दरपन मध्ये तेरी छाया, छाया देख मुलाना ।

बाहर मुखी भ्रान्ति चित बाढ़ी, अपना पराया ठाना ॥

भूल गया एक हुआ फिर दो बन आया, द्वैत अद्वौत की बानी ।

एक एकाई दहाई सैकड़ा, अगनित भर्म कहानी ॥

भूल गया असल नकल सच्चा और झूठा, लख लख अलख लखाया।

लख लख अलख लाख लख पाया, सोचा पढ़ा लिखाया ।।भुल गया

आप आपको आप पिंछानो, गुरु ने दिया संदेसा ।

कहा और का नेक न मानो, राधास्वामी का उपदेसा ॥भूल गया

225. गुरु दाता दया की नजर रहे ।।टेक॥

नजर रहे स्वामी नजर रहे, गुरु दाता दया की नजर रहे ॥

एक तुम्हारी आस है स्वामी, और सहारा नाहीं ।

ध्यान रहे नित सोते जागते, रूप का मन के माही ॥

नजर रहे स्वारथ वश हैं प्रानी जंग के, मात पिता सुत भाई ।।

पर स्त्रारथी है रूप तुम्हारा, सबकी तुम से भलाई ॥

नजर रहे दुख क्लेश से व्याकुल होकर, मैं चरनों में आया ।।

बालक समझ के अंग लगालो, दो पद कमल की छाया ॥

नजर रहे मन मलीन भरमावे छिन पल, चित विश्वास न आवे ।।

ऐसी दया करो राधास्वामी, यह बैरी न सतावे ॥

नजर रहे राधास्वामी नाम जपू नित, रहूँ मगन मन मानी ।।

अब तो दरस हुआ चरनों का, हित चित मन कर्म बानी नजर रहे

226. कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े ॥टेक॥

गगन चढ़े सुरत गगन चढ़े, कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े ॥

पिंड छोड़ जावे ब्रह्मांडा, पहुँचे गुरु दरबारा ।

धुन मृदंग की कान में ओवे, ओंकार झनकारी ।

गगन चढ़े सुन्न शिखर चढ़ आसन मारे, सहज समाध रचावे ।।

मानसरोवर करे अशनाना, हंस की पदवी पावे ।।

गगन चढ़े भंवर गुफा की खिड़की निरखे, सोहंग सोहंग भाखें ।

सत्त धाम में बीन बजावे, सत सत सत सत आखे ।।

गगन चढ़े। अलख को लख गम अगम की पावे, राधास्वामी पद में बासा ।

आस गुरु की चित में धारे, जग से रहे उदासा ॥

गगन चढ़े एक जनम में गुरु की सेवा, दूजे नाम का साधन ।

तीजे मुक्ति के धाम बसेरा, चौथे रूप अराधन ।।

गनन चढ़े राधास्वामी गुरु की दया भई है, शब्द योग को साधा ।।

एक जनम में काम बनाया, मेटा सकल उपाधा ॥ गगन चढ़े

227. भाई समझ बुझ व्यौहार करो ।।

व्यौहार करो व्यौहार करो, भाई समझ बूझ व्यौहार करो ॥

दिन तो खोया जग के धंदे, रात खाय कर सोये ।।

नर जीवन का सार न जाना, अन्त पीट सिर रोये ॥

व्यौहार सब कुछ करो विवेक सहित तुम, बिन विवेक व्यौहारी ।।

नर के काम सभी हैं निष्फल, समझे कोई गुरु प्यारा ॥

व्यौहार काम काज से निश्चत होकर, सत संगत में जाई ।।

प्रेम भक्ति का सौदा करलो, नित नित बड़े सवाई ॥

व्यौहार गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, कोईकोई बिरला जाने ।

बिन जाने परतत न आने, अनुभव गम गति माने ।व्यौहार

एक घड़ी की संगत प्यारे, कटें कोटि अपराधा ।।

राधास्वामी शब्द योग की विधि से, मन वानी को साधा ।व्यौहार

228. सत संग की महिमा जान गया ॥टेक।

जान गया पहचान गया, सतसंग की महिमा जान गयो ।

सिमिट सिमिट जल भरे तलाबा, त्यों सगुन चित आवे ।।

नित सतसंग के बचन से सज्जन, अपना जनम बनावें ।।

जान एक दिन का काम नहीं है, दिन दिन सतसंग कीजे ।

काल करम के जाल से बचकर, प्रेम भक्तिं मन दीजे ।।

जान शठ सुधरहिं सतसंगत पाई, पारस लोह समाना ।

सत की संगत करे जो प्रानी, बने सुसाध सुजाना ।

जान बिन सतसंग काज नहीं होगा, समझ लेहु मन अपने ।

जग व्यौहार पांच दस दिन के, रात समय के सपने ।।

जान कहता हूँ कह जात हूँ भाई, सतसंग करो बनाई ।

लोक परलोक में यश और कीर्ती, राधास्वामी की शरनाई ।।

जान

229. सजन तू क्यों नहीं सतसंग जाय ॥टेक।

पांच सेर चावल के भीतर, बीर बहूटी डाली ।।

संगत के परताप महातम, फटी सुन्दर लाली

सतसंग जाय जामुन आम बेर के पौधे, केवड़ा जल से सींचा ।।

फल को देख बास केवड़े की, किस विधि अन्तर खींचा ॥

सतसंग जाय तिल का तेल लगे अति प्यारा, गया जो फल से वासा ।।

प्यारी मीठी देख सुगंधी, कर सतसंग निवासा ।।

सतसंग जाय मिट्टी का तेल सेव कर सब कोई, अपनी नाक सिकोड़े।

गंधी कर संशोधन उसका, इतर फुलेल से जोड़े ।।

सतसंग जायराधास्वामी मौज परखले, कर गुरु का सतसंगा ।।

नद नाले गंगा से मिल कर, होगये निर्मल गंगां ।।सतसंग जाय

230.सजन तू कर सतसंग लव लाय ॥ ।

एक घड़ी सतसंग बैठकर, नाम गुरु का लेवे ।

सो प्रानी भवसागर तर कर, शोभा जग को देवे ॥

संग लव पानी देख शुद्धता वाढे, नारी देखे कामा ।।

वृस कुसंग कुटिलाई बादे, सतसंगत गुरु नामा ।।

संग लव एक घड़ी हो पाव घड़ी हो, पाव घड़ी की आधी ।।

जो सतगुरु की संगत बैठे, मेटे मन की उपाधी ॥

संग लव प्रेमीजन के संग में आवे, याद गुरु की बानी ।।

सो गुरु बानी जनम बनावे, अन्त मुक्ति निर्वानी ॥

संग लव संस्कार पलटे सब मन का, बुद्धि प्रेम चित आये ।।

राधास्वामी की दाया से, जम का फंद कटावे ।।

संग लव

231. घट तारा मेरे हुआ जग मग ।।।

बाहर आँख बन्द जब होगई, अन्तर आँख खुलानी ।।

लख परकाश घट लीला न्यारी, सुरत हुई मस्तानी। हुआ जगमग

बाहर छुये चरन सतगुरु के, अन्तर भैया उजारा ।।

कोटिन चन्द्र सूर प्रगटाने; देखे नौलख तारा। हुआ जगमग

मिटा अँधेरा भया सवेरा, मोह नींद से जागा ।

परदे उठे भरम के मन से, चित बाढ़ा अनुरागा।। हुआ जगमग

तिमिर अविद्या सहज ही भागी, ज्ञान जोत लहरानी।।

सिंध रूप में भाटा आया, कैसे करू बखानी।। हुआ जगमग

राधास्वामी सतगुरु दाता, घट का भेद बताया।।

भेद पायकर भेदी होगया, धन करुना धन दाया।। हुआ जगमग

232. नहीं सार तत्व समझाय सकी ॥

गूगे ने मीठा गुड़ खाया, खा खा कर रस पाया ।

किसी को वह कैसे समझावे, बानी शक्ति न पाया।।

समझाय सकी अंधों ने छुवा मिलकर हाथी, अपने ज्ञान विचारा ।

सब झूठे हैं सब सच्चे हैं, समझ का वार न पारा।।

समझाय सकी सिंह बचा गाडर के रेवड़, अजा रूप लख मोहा ।

सतगुरु सिंह ने आन चिताया, सिंह भाव सुन सोहा।।

समझाय सकी नमक की पुतली सिंध ओर गई, लगी थाह को लेने ।

पानी मिल पानी सो ठहरी, लेने के पड़े देने।।

समझाय सकी एक अनेक में भेदभाव है, भेद अभेद न जानू।।

राधास्वामी की संगत आ, मेन की मन में मानू।।

समझाय सकी

233. माई सोच समझ व्यौहार करू।।

टेक। पानी मध्ये पड़ा बतासा, गलते देर न लागे ।

इस जीवन का कौन भरोसा, बादर गगन से भागे।।

व्यौहार न्हाय धोय कर मैल उतारे, नित नये बस्तर धारे।।

तैसे सुरत उतारे तन को, कोई विवेकी विचारे।।

व्यौहार मल से देह बनी मानुष की, मल मलीन की खानी।।

नित उठ धोवो लाख जतन कर, शुद्धि में रहे गलानी।।

व्यौहार तन की आसा मन की आसा, सीस की आसा नाहीं।।

भाई सोचो कुछ निज मन में, आसा है परछाँई।।

व्यौहार सतसंगत कर बुद्धि बढ़ाओ, अपना जनम बनाओ।।

सुरत शब्द की करो कमाई, राधास्वामी के गुन गाओ।।

व्यौहार

234. मैं गूगी मुख से नहिं बोलू।।

टेक॥ पाँव नहीं मैं परवत लाँघु, चौदह भुवन में डोलू।।

बिना हाथ के करम करू सब, उलझी गुत्थी खोलू नहीं बोलू

कान नहीं और शब्द सुनू नित, विन जल नित गुड़ घोलू।।

उँगली बिना उतारू बखिये, धरन अकास टटोलें।।

नहीं बोलू बाँह न भुजा न कंधा पंजा, तीन त्रिलोकी तोलू।।

बिना आँख की सुरत सहेली, कहे सुन्न में सो लू।।

नहीं बोलू मानसरोवर मार के गोते, बिन साबुन मन धोलू।।

राधास्वामी से भक्ति बीज ले, हृदय खेत में बो लू।।

नहीं बोलू

235. गुरु दाता लगाकेंगे पार मुझे।।

पार मुझे जी पार मुझे, गुरु दाता लगा देंगे पार मुझे।।

मौज अधीन सदा मैं बरतू, चिंता चित्त न लाऊँ।

रात दिवस गुरु का रहे सुमिरन, और सकल बिसराऊँ।।

पार मुझे सोबत जागत भूलू नाहीं, वृत्ती धाम रहे अटकी।।

तन मन की सुध बुध न करू कुछ, अधर मंडल चढ़ लटकी।।

पार मुझे सहसकमलदल देख विराटा, त्रिकुटी गुरु दरबारा।।

सुन्न में शून्य समाधि अवस्था, देह बंध छुटकारा।।

पार मुझे जोत निरख सुनू अनहद बानी, बानी लय होजाऊं।।

लय चिंतन कर भरम मिटाऊँ, निर्बानी कहलाऊ।।

पार मुझे तीन स्थान यह मुख कर साधू, फिर अनुभव घट जागे।।

भंवर सत्य लख अलख अगमगति, राधास्वामी पद चित लागे।।

236. गुरु दाता के चरन चित जोड़ रहूँ।।

जोड़ रहूँ मन मोड़ रहूँ, गुरु दाता के चरन चित जोड़ रहूँ।।

सोवत जागत उट्ठत बैठत, रहे गुरु का ध्यान।।

एक भाव हिये अन्तर राखू, और सकल बिसराना।।

जोड़ रहूँ विद्या बुद्धि विवेक विचारा, गुरु गम के अनुसारी।।

येहि विधि तरू सहज भव सागर, तारू कुल परिवारा।।

जोड़ रहूँ। एक रूप नयनों में समाया, और नजर नहिं आवे।।

जहाँ जहाँ देखू गुरु की लीला, समझत मन हरषावे।।

जोड़ रहूँ सुनू तो गुरु का कथन निरंतर, बोलू तो गुरुबानी।।

बोल बोल सुन सुन कर चिंतन, रहूँ सदा निरबानी।।

जोड़ रहूँ मनुवा मेरा है बड़ भागी, निश्चल अचल अमानी।।

सब को त्याग चरन गुरु लागा, हो राधास्वामी अभिमानी।।

जोड़ रहूँ

237. गुरु चरन कमल में विनय करू।।टेक।

विनय करू मैं विनय करू, गुरुचरन कमल में विनय करू।।

विश्वामित्र विश्व हितकारी, विश्वम्भर विश्वासी।।

अपनी दया से पार लगादे, कटे बन्ध चौरासी।।

विनय करू करुणामय करुणा के सागर, करुणा के भंडारा।।

काम क्रोध से मुझे छुड़ाकर, ले चल भव के पारा।।

विनय करू दीन हितैषी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।

दीन समझ भक्ति दे मुझको, लहूँ चरन शरनाई।।

विनय करू गुन की खानी गुन में आगर, गुन नागर गुनकारी।।

अवगुन मेट के गुनी बनादे, करदे मुझे सुखारी।।

विनय करू राधास्वामी भक्ति पदारथ, का हूँ मैं अभिलाशी।।

प्रेम भाव हिये अन्तर आवे, भजें गुरु अविनाशी।।

विनय करू

238. कर घट में प्रीतम को दर्शन टेक।

प्रीति रीति की राह कठिन है, नहीं जाने संसारा।।

प्रेम प्रति जब मन में आवे, सूझे सार असारा।।

कर दर्शन। आवे प्रीति कहाँ चलि जावे, करे कहाँ यह बासा।।

घट उपजे घट से नहीं जावे, समझे गुरुमुख दासा।।

कर दर्शन सतसंगत बिन प्रति न आवे, परचय बिन परतीती।।

बिन परतीत भक्ति सब निष्फल, सीख संत मत रीती।।

कर दर्शन प्रेम प्रीति परतीत पदारथ, भक्ति और निवना।।

गुरु की दया बिना नहीं मिलते, यह सिद्धान्त पुराना।।

कर दर्शन प्रीति के मग में पग को धारा, घट में प्रीतम दरसा।।

राधास्वामी दया से काज बनाया, चरन कमल जब परसा कर दर्शन

239.पी प्रेम पियाला मस्त भई

। मस्त भई मतवाली भई, पी प्रेम पियाला मस्त भई।।

अँखियों में लाली के डोरे, लाल का रूप जो देखा।।

लाली देख लाल बन बैठी, चुका करम का लेखा।।

मस्त भई सुध बुध भूली तनकी अपने, रहा न सोच विचारा।।

ज्ञान अज्ञान दोऊ तज भागे, काल कला सब हारा मस्त भई पी बोला पी सुधा स्त्रान्तिरस, मुख से पीपी निकसा।।

। उड़ा पपीहा देख दशा मेरी, प्रेम कमल मन विगसा।।

मस्त भई मैं हूँ कौन पिया मेरा कैसा, अब कुछ समझ नाहीं।।

पी पी प्रेम पियाला पठी, पिया के हृदय माहीं।।

मस्त भई द्वत अद्वैत का झगड़ा छूटा, तारा चन्द न निरखू।।

राधास्वामी गुरु के चरन बलिहारी, आप पराया न परख।।

मस्त भई

240. घट आनन्द अघट घटा छाई।।

। घटा छाई जी घटा छाई, घट आनन्द अघट घटा छाई।।

बिन जल बरसे रिमझिम पानी, बिजली तेज प्रकाशा।।

बिन उपाव के सुख मंगल है, निर्मल हर्ष हुलासा।।

घटा छाई

जगमग जोत दिया बिन बाती, खुली आँख से सूझे।।

युक्ति यतन बिन अनुभव जागा, तत्व सर गम बुझे।।

घटा छाई बिगसे कमल पत्र घट भीतर, बरस गया जब पानी।।

बद पत्र बिन मोती झलके, झलक प्रकाश की खानी।।

घटा छाई फल खिले बहे त्रिविध बयार, निर्मल मन्द सुगंधी।।

रोम रोम सुख आनन्द व्यापा, खुली भैद की सन्धी।।

घटा छाई जब से घट में आन बिंराजा, मोह भरम सब भागा।।

राधास्वामी की किरपा से, सोया मनुआ जागा।।

घटा छाई

241. घट भीतर अजब तमाशा है॥टेक॥

तमाशा है जी तमाशा है, घट भीतर अजब तमाशा है।

घट के भीतर माल खजाना, हीरे लाल जवाहिर।।

मैंने अपनी आँखों देखा, खोल कहूँ क्या जाहिर तमाशा

घट के भीतर बाग बगीचे, फूल पत्र फल कलियाँ।

भाँति भाँति की बस्ती बसती, नजर ग्राम सुख गलियाँ

तमाशा पृथवी गगन पवन और अग्नी, जल से भरा भंडारा।।

बिजली ओजस तेज और क्रान्ती, सबको फैला पसारा तमाशा

इन्द्र कुबेर विष्णु शिव ब्रह्मा, घर में मेरे बिराजे।।

मंत्र जंत्र और तन्त्र सकल विधि, अनहद बाजे गाजे।।

तमाशा जब से देखी घट की लीला, तृप्त भयो मन मेरा।।

राधास्वामी की किरपा से, मिटा योनि का फेरा तमाशा

242. अब कुछ गुरुबानी समझ पड़ी।।

टेको। समझ पड़ी जी बूझ पड़ी, अब कुछ गुरुबानी समझ पड़ी।।

सहस कमलदल बैठक ठानी, निरख विराट पसारा।।

घंटा शंख की धुन सुन पाई, चमके घट रवि तारा।।

त्रिकुटी कमल ओम दरबारा, गुरु की संगत आई।

श्रुति स्मृति का भरम दूर भयो, धुन मृदंग सुन पाई।।

समझ सुन्न में सहज समाध रचाई, द्वौत की वजी सरंगी।।

चन्द्र प्रकाशा तिमिर विनासा, अब नहीं हूँ कुरंगी।।

समझ ऊँचे चढ़ी भंवर की घाटी, बजी सोहंगम बंसी।।

दुविधा मिटी काल छबिदरसी, चल गई सतपद दिनसी।।

समझ अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी स्थाना।।

अब न पडू भव दुख के फन्दे, भिल गया पद निरवाना।।

समझ

243. भव पार गई सोई पारवती।।

पारवती जी पारवती, भवसागर गई सोई पारवती।।

गिर केलास हिमालय डेरा, विश्वम्भर का संगा।।

मानसरोवर हंस मंडली, न्हाती प्रेम की गंगा।।

पारवती त्याग विराग प्रीति अनुरागा, उदासीनता मूरत।।

यह सब सुरत निरत के लक्षण, आनन्द सुख की मूरत

पारवती परवत के आकार है रिती, अटल पौढ़ दृढ़ गाड़ी।।

शब्द रती अनहद धुन माती, दया छमा मन बाढ़ी।।

पारवती सुरत शब्द में शब्द सुरत में, मिलजुल केल करन्ती।।

रह अचिन्त सतगुरु के सहारे, प्रीति प्रतीत धरन्ती।।

पारवती सतवन्ती सत वरत निवासी, सतभोगी सत भागी।।

सुरत सती भिल सत्य शब्द में, राधास्वामी चरनन लागी।।

पारवती

244. घट में अब अनहद धुन प्रगटी।।

रोम रोम आनन्द पसारा, सुरत का भोग बिलासा।।

इन्द्री थकी थके मन बानी, पायके हर्ष हुलासा।। धुन प्रगटी

मकर तार गति तार निकाला, सुरत तार गह डोरी।।

घर को तज अघर को धाई, भरती डग सोई चौड़ी।।धुन प्रगटी

मीन समान पकड़ जलधारा, मेघ आकाश सिंधाई।।

गगन मंडल के अमी कुन्ड में, गोते मार हंकारी।।

धुन चाल बिहंगम सुरत को भाई, चली उड़ी नभ धामा।।

हंस रूप हुई सुरत सहेली, त्याग मोह मद माना।।

धुन सहसकमलदल त्रिकुटी आई, सुन्न महासुन्न निरखा।।

भंवर सत्यपद अलख अगम लख, राधास्वामी को परखा।। धुन

245. मेरा चंचल मनुआ काल से डर।।

काल से डर प्यारे काल से डर, मेरा चंचल मनुआ काल से डर।।

आज कहे मैं काल भजू गा, काल की गति नहीं जाने।।

आज काल क्या करता है तू , काल लगा निकराने काल से

क्या जाने क्या पल में होगा, काल है कठिन कराला।।

काल भयानक फनधर भाई, काल नाम है काला काल से

जो करना है अब कर प्यारे, अवसर मिला सुहाना।।

आज का काम काल पर क्यों तू , छोड़ हुआ दीवाना काल से

खेल कूद में विषय भोग में, आयु सकल बिसराई।।

वृद्ध अवस्था देह शिथिल भई, अब कुछ करले कमाई।। काल से

आज काल में बिगड़ेगा तन, सांस दुधारा जारी।।

काल का त्याग बहाना झूठा, कर चलने की त्यारी।। काल से

संगी साथी नहीं हैं तेरे, मात पिता सुत भाई।।

अपने स्वारथ बंध बंधाने, साथ नहीं कोई जाई।।

काल से बादर की छांई जग लीला, बिनस जाय पल माहीं।।

राधास्वामी की कर आसा, और की आसा नाहीं।। काल से

246. साधु कौन आया और कौन गया टेका।

जन में मरन सब खेल है मन का, मन माया व्यौहार।।

उत्पत्ति स्थिति प्रलय की लीला, सब माया विस्तारा।।

कौन सिंध में लहर उठत दिन राती, काल चक्र का झूला।।

झूले ब्रह्मा विष्णु महेशा, कारन सूक्ष्म स्थूला।। कौन।।

कीचड़ में लतपत कभी होते, कभी नहाते धोते।।

कभी जाग परपंच रचाते, कभी नींद सुख सोते।।

कौन बाप के बीरज माँ के रज में, मैंने किया प्रवेश।।

निजे स्त्री के गर्भ में आकर, धार पुत्र का भेसा।। कौन

कभी पुत्री कभी पुत्र बना मैं, कभी गुरु कभी चेला।।

समझ जो हो तो समझ बूझ ले, रूप अम्म अलबेली।।

कौन शब्द स्पर्श रूप रस गंधा, संत्र ही मेरे रूपा।

गमन पवन अग्नी जल पृथवी, मैं परजा मैं भूपा।।कौन।।

मैं समुद्र मैं लहर बूद सब, झाग सृष्टि रच लीना।।

राधास्वामी की संगत पाई, निज स्वरूप तब चीन्हा।।कौन

247. सजन तू कल्पित फाँस फसा।।टेक।

होना न होना मरना जीना, सवः तेरे आधार।।

तेरे घट समुद्र में कल्पित, जगत प्रपंच पसारा।।

फॉस फैसा गोरख धन्धे पड़े हैं अन्धे, झॉई पकड़न निकसे।।

छाँईफाई झाँई न पाई, इत उत भटक के खिसके।।

फाँस हँसा ज्ञान अज्ञान ध्यान अध्याना, सब ही कल्पित साँई।।

योग यतन संयम यह क्या है, फाँई झाँई छाई फाँस हँसा गाये

बजाये गीत सुनाये, नाचे हाथ न आवे।।

रोये धोये आँसू बहाये, आदि अन्त कहां पावे।।

फाँस हँसा भेद अभेद द्वैत अद्वता, दोनों हैं एक सारा।।

मिथ्या कल्पित हुये अनहुये, कल्पित सब व्यौहारा।।फाँस हँसा।।

ज्ञानी अज्ञानी मनमानी, ध्यान ज्ञान अभिमानी।।

दोनों फँसे भरम के फन्दे, फन्दे फन्द फँसानी।।

फाँस हँसा बन में गये तो खाक उड़ाई, घर में रहे तो रोना।।

घर बन को एक न जाना, नित उठ मैल को धोना।।

फाँस हँसा साँच कहूँ तो कोई न माने, झूठ कहत सकुचाऊँ।

झूठ साँच सब का सब मिथ्या, केहि समझावन जाऊँ।फाँस हँसा

राधास्वामी सतगुरु यूरे, सुरत शब्द मत गाया।।

साधन अनुभव की प्रभुताई, भव निधि पार लगाया।। फाँस हँसा

248. सजन कोई सोच न बात कहे।।

टेक। योगाचार योग रस माते, क्षणिक ज्ञान क्षण भंगी।।

मध्यम वाले मध्य समाने, शून्यवाद सरवंगी।।

बात कहे सांख्य गिनावे गिनती सबकी, योग समाधी गावे।।

वेदान्त वेदान्ती की आशा, करम में करमी फेसावे।।

बात कहे जैसी मन की भई कल्पना, तैसा खेल खिलाया।।

खटपट में षट दर्शन भूले, अन्त मिला क्या छाया।।

बात कहे यूरा खेल किसी का नहीं, खेलें खेल खिलाड़ी।।

किसको बताऊँ पंडित मूरख, किसको ज्ञानी अनाड़ी।।

बात कहे गुरु की दया साध की संगत, सार तत्व लख पाया।

राधास्वामी चरन कमल गह, छूटी माया छाया।।

बात कहे

249. राधास्वामी दया का वार न पार।।

दया किया मोहि अंग लगाया, कृपा दृष्टि से देखा।।

महर की नजर पड़ी जब मुझ पर, चुका करम का लेखा।।

वार न पार माया काल के कठिन थे फन्दे, सहज में लिया छुड़ाई।।

प्रीति प्रतीति भक्ति श्रद्धा लख, बरखशी निज शरनाई।।वार न पार

सुरत शब्द मत राह सिखाई, अन्तरमुखी बनाया।

सतपद अलख अगम राधास्वामी, घट भीतर दिखलाया।।वार न पार

250. नाम सनेही नयनों में आजा।।

टेका। आंखों की कोठरी बनाई, पुतली पलंग विचित्र सजाई।।

पलकों की चिक विमल लगाई, आजा आंखों में तू समाजा।। नाम

नयन हमारे तेरे दिवाने, रूप अनूप देख ललचाने।।

छबि अद्भुत को देख लुभाने, सूना मंदिर आज बसाजा।।

नाम प्रेम पियाला पी मतवाली, ऑखे बनी सहज मतवाली।।

ध्यान तेरा कर हुई निहाली, प्रीति पाली को अंग लगाजा।।नाम

बिन दर्शन के कल नहीं आवे, हिया जिया रात दिवस अकुलावे।।

विरह लगन की आग तपावे, बचन बूंद रस छिड़क बुझाजा।।नाम

राधास्वामी सतगुरु प्यारा, तू है इन आंखों का तारा।।

चरन कमल का देके सहारा, बिगड़ी मेरी आके बनाजा।।नाम

251. जग चिड़िया रैन बसेरा है।।

दस दिन का जीना है जग में, दस दिन सैर तमाशा।।

जिसने आस फांस गले डाली, अन्त में चला उदासा।।बसेरा है।

महल मकान बनाकर भूले, फूले अपने मन में।।

काल जो अपनी बस्ती छोड़ी, आये उजड़े बन में।।

बसेरा है। मात पिता भाई सुत बंधु, मीत कुटुम्ब परिवारा।।

चलते समय संग नहीं कोई, कोई न हितू पियारा।।

बसेरा है। कोई जलावे कोई गाड़े, कोई नीर बहावे।।

कोई फेंके ऊसर परबत, हड्डी पवन सुखावे।।

बसेरा है। रावण गया वीर लंकापति, राम गये अवधीसा।।

योगी यती तपी बनवंडी, गये काल के देसी।।बसेरा है।

तू जायेगा मैं जाऊँगा, जायेगा संसारा।।

रहने वाला एक नहीं है, झूठ प्रपंच पसारा।।

बसेरा है। बन परबत और नगर ग्राम सब, जाने वाले जानो।

जल पृथवी आकास पवन और, अग्नि को ऐसा मानो।।

बसेरा है। सूरज चन्द्र गगन मंडल के, तारे अगमापाई।।

सबके सब यह काल के मुह में, काल बली दुखदाई।।

बसेरा है। अवसर मिला सुहानी तुझको, मानुष देही पाई।।

राधास्वामी भज निस बासर, ले गुरु की शरनाई।।बसेरा है।।

252. राधास्वामी चरन पर बलिहारी॥टेक॥

काल करम माया के बस हो, अंधकार में भूला।।

राधास्वामी दया से गुरुमत समझा, भक्ति हिंडोले झूला।।बलिहारी।।

सबको देखा किया परेखा पढ़ लिख कर भरमाना।।

राधास्वामी दया से सतसंगत कर, भरम भेद तत्त्त जाना।।बलिहारी।।

जनम जनम के पातके धोये, करके गुरु सतसंगी। राधास्वामी दया की लहर जो उमड़ी, घट फ्रगटी सत गंगा।।

बलिहारी एक अनेक का झगड़ा मेटा, मिट गया द्वन्द पसारा।।

राधास्वामी दया से आंख खुली तब, मिला सार का सारा।।

बलिहारी राधास्वामी राधास्वामी गाना, राधास्वामी ध्यान लगाना।।

राधास्वामी दया से काज बना है, होगया प्रेम दिवाना।।बलिहारी

253. राधास्वामी सतगुरु हितकारी।।

टेक। राधास्वामी ब्रह्मा राधास्वामी विष्णु, राधास्वामी शिव की मूरत।।

राधास्वामी पूरन ब्रह्म अखंडित, पारब्रह्म की सूरत।।

हितकारी राधास्वामी अगुन सगुन राधास्वामी, राधास्वामी इनसे न्यारे।।

राधास्वामी रक्षक राधास्वामी दानी,राधास्वामी सत रखवारे॥हितकारी

सत्त कबीर हैं राधास्वामी, नानक राधास्वामी जानो।।

राधास्वामी गुरु के एक रूप में, सब सन्तन को मानो

हितकारी राम कृष्ण और बुद्ध विवेकी, और सकल अवतारा।।

राधास्वामी रूप में सबको समझो, यही सार का सारा।।

हितकारी राधास्वामी सतगुरु प्रगटे कलि में, सुरत शब्द मत दीना।।

राधास्वामी चरन शरन में आकर, जनम सुफल कर लीना।।

हितकारी

254. सुरत घट में गगन की ओर चली।।

यह संसार बिपत की खानी, काल कर्म की फाँसी।।

इसके फन्दे आन फँसाई, अपनी कराई हाँसी।।

ओर चली माया को छिनभंगी लखकर, चित को अपने हटाई।।

पृथवी मंडल त्यागके सजनी, गगन की ओर सिधाई।।

ओर चली। भूल भरम की भरम भुलैय्यां, इस जग का व्यौहारा।।

जो कोई फैसा राह नहीं पाया, सिरपर करम का भारी।।

ओर चली सीधे मारग सब कोई चाले, उलटे को नहिं जाने।।

उलटे मग की समझ जो आवे, सत का सार पिछाने।।

ओर चली घट ही मेरे उलटा रस्ता, सतगुरु ने बतलाया।।

सुरत शब्द का साधन करके, राधास्वामी धाम में आया।।

ओर चली।

255. सुनो मेरी विनती गुरु दाता।।

तुम तो आये जव, उबारन, दया क्षमा के काजा।।

जो नहीं मेरा काम बनाओ, नाम को आवे लाजा।।

गुरु दाता मो सम दुष्ट नहीं कोई दूजा, दम्भी मानी गुमानी।।

दुखी जानकर चरन लगाओ, प्रेम भक्ति दे दानी।।

गुरु दाता दुख कलेश ने चहुँ दिस घेरा, मुझसा दुखी न कोई।

मुझे तार लो जब मैं जानू, पतित अधम गति सोई।।गुरु दाता

भलों को तुम नहीं तारन आये, तुम्हें बुरे हैं प्यारे।।

इनकी लाज तुम्हारे हाथ है, तुम इनके रखवारे।।

गुरु दाता राधास्वामी दीन दयाला, दीनन के हितकारी।।

बाँह गहो दुख मेंटों काटो, काल का बन्धन भारी।।गुरु दाता

256. गुरु गम की महिमा जान गई।।

टेक। जान गई पहचान गई, गुरु गम की महिमा जान गई।।

क्या था कौन था कैसा था वह, यह तो अकथ कहानी।

जब तक अपना मुंह नहीं खोले, कोई न समझे ज्ञानी।।

जान गई गुप्त न प्रगट न प्रगट गुप्त था, गुप्त प्रगट में व्यापा।।

एक नहीं न अनेक रूप में, अपने आपका आपा।।जान गई।

शब्द नहीं न अशब्द की मूरत, निराकार साकारा।।

अगुन सगुन व्यापक अध्यापक, दोनों दशा से न्यारा।।

जान गई मौज हुई धारा वह फूटी, सिंध लगा लहराने।।

प्रगट हुआ रचना लगी होने, सिंध बुद के बहाने।।

जान गई सत बन तपा ब्रह्म हो निकला, तीन अवस्था ठानी।।

हिरण्यगर्भ ओर अन्तरयामी, और विराट महानी।।

जान गई। तीन दशा यह काल रूप की, बूद एक सोई मानो।।

जब लग बूद की परख न आवे, सिंध भेद नहीं जानो जान

गई फैला ब्रह्म बढ़ा और सोचा, रचलिया सकल पसारा।।

यह ब्रह्मांड ब्रह्म का अंडा, बिरला समझे सारा।।

जान गई पहले एक अनेक बना फिर, एक अनेक प्रकार।।

एक अनेक की लीला अद्भुत, कहन सुनने से न्यारा।।

जान गई अंडे से ज्य पक्षी प्रगटे, पक्षी से ज्यों अण्डा।।

बीज से पेड़ फूल फल टहनी, अन्त में बीज प्रचंडा।।

जान गई ब्रह्म से जीव जन्तु प्रगटाये, सुरत सहारा लीना।।

जीव ब्रह्म से यहि विधि निकले, तीन रूप चित दीना।।

जान गई तेजस विश्व प्राज्ञ दशा हुई, जाग्रत स्वप्न सुषुप्ती।।

जो है ब्रह्म जीव है वैसा, बिरला समझे युक्ति।।

जान गई बूद सिंध से न्यारा होगया, दुख सुख जाल बंधाना।।

करम ज्ञान की उलझन में फैस, अपना भेद न जाना।।

जान गई यह गति देख सिंध दया उमड़ी, लहर रूप में आई।

सतगुरु सत दयाल सुखदाई, प्रेम भाव समुदाई।।

जान गई गुरु का भेष कृपालु दयाला, निराधार जगधारा।।

हम जैसा जग में बन आया, धरा सन्त अवतारा।।

जान गई सतसंगत में बचन सुना कर, लिया जीव अपनाई।।

भेद बताकर मरम जताकर, सत के पन्थ चलाई जान गई

शब्द जहाज बिठाया सबको, भवे के पार लगाया।

जीव निबल को बल पौरुष दे, सत पद ले पहुँचाया।।

जान गई सोई आदर्श इप्ट है सोई, धुरपद सत का बासी।।

अगुन सगुन साकार अकारा, चैतन धन सुखरासी।।

जान गई राधास्वामी परम सनेही, महिमा धन्य तुम्हारी।।

तुम्हरी दया जीव बहु तर गये, चरन शरन बलिहारी

जान गई राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना।।

राधास्वामी गुरु दयाला, गुन गागा हरषाना जान गई

257. उठ जाग सवेरा होगया।।

गई सियाही आई सफेदी, अब क्यों सोवे भाई।।

रात बीत गई सूरज निकला, त्याग नींद अलसाई

होगया उजले केस की पत कुछ रखले, चौथापन जब आया।।

चलने की कर अपने तयारी, जग बदर की छाया।।

होगया। हसा फूल हँस कर मुरझाया, बास सुबास को त्यागी।।

हँसी ठठोल का समय नहीं है, हो गुरु पद अनुरागी।।

होगया कोयल कूक सुनाकर चुप हुई, मौन अवस्थाधारी।।

बाद विवाद से मन को रोकले, शान्ती का अधिकारी होगया

सुमिरि सुमिर भज नाम गुरु का, नाम सन्त मन सारा।।

राधास्वामी की दाया से, जा भव जल पारा।।

होगया

258. गुरु पद सरोज में नमस्कार।।टेका।।

नमस्कार जी नमस्कार, गुरुपद सरोज में नमस्कार।।

भव भय भंजन कष्ट निकंदन, खंजन सकल मोह माया।।

शांती चैन सुख सहज में व्यापा, जो कोई छांह में आया

नमस्कार हरि इच्छा साया में फंस गये, भरमें अज्ञान के फन्दे।।

गुरु की कृपा से बंधन काटे, भक्ति प्रेम के धंदे नमस्कार जब

लग मन मत की सूझी, स्वारथ सूझ सुझाई।।

अब गुरु मत गुरुदेव का सेवक, परमारथ लव लाई

नमस्कार कठिन सुगम भया बूद सिंध बना, भव भय आप ही नासा।।

चिन्ता गई चाह उड़ भागी, मिटी त्रिलोकी असा।।

नमस्कार सहसकमल त्रिकुटी सुन्न महासुन्न, भंवर गुफा सत धाम।।।

। अलख अगम के पार दुर है, राधास्वामी पद निर्वाना।।

नमस्कार

259. भज भज ले राधास्वामी नाम सदा।।

टेका। नाम की महिमा सन्तु बखाने, नाम संग लव लायें।।

विषय वासना स्वाद त्यागकर, नाम राग धुन गावं।।

नाम सदा सदना तरगया मीरा तरगई, तरगई गणिका गायन।।

जनम का पापी तर अजामिल, सोधा नाम रसायन।।

नाम सदा नाम प्रताप की महिमा भारी, नाम विपत को टारे।।

गो खुर जग का सिंध लॅघावे, जनम के पाप किनारे।।नाम सदा

योग विराग त्याग जप ध्याना, संजम नियम अचारा।।

नाम बिना है सब ही निष्फल, करले आप विचारा।।

नाम सदा अट सिद्धि नौ निधि की खानी, भक्ति मुक्ति सुखदाई।।

राधास्वामी नाम जो हित से लेवे, लहे धन धाम बड़ाई।।नाम सदा

260. आई शाम भज गुरु का नाम।।

दिन तो बीता जग व्यौहारा, समय नींद का आया।।

सोने से पहले नाम को भजले, मोह मान तज माया।।

गुरु का नाम सोना मौत निशानी समझो, छोटी मौत अवस्था।।

मौत से पहले चेत नाम लो; सोधो अपनी व्यवस्था।।

गुरु का नाम सिमिट सिमिट जल भरे तलावा, तसे ही नाम सुमिरना।।

मन में शुभ गुन रस रस भरना, फिर आनन्द से भरना।।

गुरु का नाम जनम मरन छिन छिन है प्रानी, छिन छिन योनी बासा।।

जो कोई सुमिरे नाम गुरु का, पड़े न यम की फाँसा।।

गुरु का नाम नाम हैं मंगल सुख की खानी, नाम मुक्ति का दाता।।

जो कोई पीवे नाम सुधारस, रहे नाम मद माता।।

गुरु का नाम राधास्वामी गुरु ने विधि बताई, अन्तर बिरती जमाओ।।

सुरत शब्द की करो कमाई, नाम राग धुन गाओ।।

गुरु का नाम

261. नाम सुभिर मन चतुर सुजान।।

। नाम की है नाम ज्ञान है, नाम भक्ति और युक्ति।।

नाम जपे सो सहज ही पावे, जनम मरन से मुक्ति।।

चतुर तू तो पड़ा भरम के पाले, सुमिरन सार न जाने।।

नाम योग जग जतन सुगम है, सुभिर देख मन माने।।

चतुर नाम बिना निष्फल सब करनी, जप तप सोच बिचारा।।

नाम जहाज चढे जो कोई, पच जाय भव पारा।।

गुरु का बल ले नाम सुभिर नित, सतसंगत आधारा।।

आप ही छूट जाय मेरे भाई, दुखदाई संसारा।।

चतुर धर विश्वास रात दिन प्यारे, करले नाम कमाई।।

अपनी आंख से आप परखले, राधास्वामी नाम बड़ाई।। चतुर

262. गुरु नाम का ले आधार सखी॥टेक॥

सांस सांस पर नाम सुमिरना, नाम का तार न टूटे।

जो कोई इस विधि नाम को सुमिरे, सुख मृत्ति जग लूटे

आधार राजा रानी रंक भिखारी, बड़ा जो नाम को सुमिरे।।

उसे बड़ा तुम सबसे जानो, नाम न कबहूँ बिसरे।।

धार दुख नहीं व्याये बियत न आवे, नाम महा सुखदाई।।

नाम की महिमा सन्त बखाने, नाम से सबकी भलाई।।

आधार फेक के माला हाथ की सजनी, मन की सुमरनी लेना।।

। बिना जीभ और हॉट के सुमिरन, नाम को निज चित देना।।

आधार मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, घट की गुफा में पैठो।।

राधास्वामी नाम का छिन छिन सुमिरन,सुख आसन से बैठो।।

आधार

263. जग लीला परख चित चेत गया।

चेत गया चित चेत गया, जग लीला परख चित चेत गया।।

रेशम का कीड़ा अज्ञानी, मोह नींद में सोया।।

अपने बंधन मुआ आप फस, विरथा जीवन खोया।।

चेत गया मछली जीभ स्वाद रस भूखी, चारा देख के भूली।।

कटिया के कांटे उरझानी, मृत्यु हिंडोले झूली।।

चेत गया भवरा फल बास का लोभी, कमल पत्र लपटाना।।

सारी रात बन्ध में काटी, रोना और पछताना।।

चेत गया सुन्दर रूप देख क्यों मोहे, बुद्धि विवेक न खोना।।

दीपक जोत पतिंगा जलता, अन्त पीट सिर रोना।।

चेत गया हाथी ने हथनी जब देखी, सेंड से सेंड मिलाया।।

गिरा शिकारी के गड्ढे में, बेड़ी पांव बंधाया।।

चेत गया माखी गिरी शहद की थाली, पंख गये लपटाई।।

लालच बुरी बला है भाई, सिर धुन जान गंवाई।।

चेत गया हिरन बीन के शब्द का प्रेमी, बीन के राग लुभाया।।

मतवाला हो सन्मुख आया, अपना सीसे कटाया।।

चेत गया चित ने परखी विषय की लीला, मन में उदासी छाई।।

राधास्वामी की संगत कर, ली गुरु पद शरनाई।।

चेत गया

264. गुरु दाता के नाम से लव लागी।।

नाम रतन घट खान में पाया, खोदा ज्ञान कुदाली।।

जगमग जोत सात घट निकला, मन में हुई निहाली लव

लागी नाम न भूलें तन मन भूलू, भूलू जग व्यौहारा।।

अब परमारथ धन को पाया, सार सार का सारा।।

लव लागी मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, चंचल मन थिर कीना।

जब मैं थिरता ऐसी पाई, नाम रतन धन चीन्हा।।

लव लागी काट की माला कर से डारी, मन माला जब भाया।।

उई बैठे खड़े उताने, रहा नाम घट छाया।।

लव लागी आंख कान मुख बंद लगाया, सुन्न समाध रचाई।।

राधास्वामी नाम की धुन सुन पाई, अब मेरी बन आई लव लागी

265. अब सतधाम की बासी बनी।।

। अवट नाम जब घट में प्रगटा, मन की दुर्मति भागी।।

भूली सन की सुध बुध सारी, हुई नाम अनुरागी।।

बासी बनी मुख से नाम कान धुन व्यापी, आंख में नाम की जोती।।

चित ने सीप का रूप धारकर, गहलिया नाम का मोतः।।बासी बनी

पपिहा पी पी शोर मचावे, गगन घटा हिंग उड़कर।।

मैं निज घट में नाम को सुमिरू, सुन्नमंडल घट जुड़कर।।

बासी बनी नाम के पर जब भुजा में बांधे, उड़ी मेरु कैलासा।।

सहसकमल त्रिकुटी सुन्न चढ़गई, सतपद लहा हुलासा।।

बासी बनी पीछे छोड़ी भवर की घाटी, अलख अगम गति परखी।।

राधास्वामी चरनकमल जब बासा,भक्ति पाय अति हरखी।।बासी बनी

266. जिन नाम लिया तन काम किया।।

राना रानी दाता दानी, मान प्रतिष्ठा भागी।।

यह सब बड़े हैं इनसे बड़े हैं, नाम राग अनुरागी।।॥

नाम से नाम होत है सबका, नाम की महिमा भारी।।

मीरा सहजो दया को देखो, नाम से जगते उजारी।।॥

नाम सकल दुख आपत नासे, दुख में नाम जो लेवे।।

दुख दरिद्र कभी निकट न आवे, सुख से नाम चित देवे।।॥

जप तप योग पाठ और पूजा, नाम संग सब रहते।।

नियम धरम हैं नाम अधीना, साध सन्त यू कहते।।॥

मन से समझ नाम चित लाओ, नाम कभी न भुलाना।।

राधास्वामी मत में आकर, राधास्वामी जप जपवाना।।॥

267. दुविधा दुचिताई भाग गई।।

टेक। आँख कान जिभ्या को रोंधा, अन्तर किया निवासा।।

अन्तरमुखी सुरत हुई मेरी, प्रगटा हर्ष हुलासा।।॥

आँख कान जिभ्या को रोंधा, सम की अवस्था जागी।।

सम को धार समाधी पाई, गुरु गम की अनुरागी।।॥

आँख कान जिभ्या को रोंधा, प्रगटी अनहद बानी।।

बानी सोई सुख खानी ठहरी, आनन्द मंगल दानी।।॥

आँख कान जिभ्या को रोंधा, जीत सार लख पाया।।

जोत में जोत की लीला अद्भुत, लख लख हर्षाया।।।।

आँख कान जिभ्या को रोंधा, गुरु पद ध्यान लगाया।।

राधास्वामी की भई दाया, हटी जगत की माया।।॥

268. गुरु दाता की दया पर बलि जाऊँ।।

टेक। अंग लगाया दास बनाया, दिया चरन का सहारा।।

बानी सुनायो मन को चिताया, अधर्म पतित को तारा।।बलि

काल जाल माया के फन्दे, उलझा उलझ के हारा।।

प्रेम चरन का देकर मुझको, बन्ध काट दिया सारा।।

बलि चरन न भूलें भूलू तन मन, और सकल बिसराऊँ।

व्यापे नाम चोटी से एड़ी, नाम का जीवन पाऊँ।।

बलि दुविधा में फंस उमर गंवाई, समझ न अपनी आई।।

अपने रूप का ज्ञान मिली अब, सतगुरु की प्रभुताई।।

बलि राधास्वामी दीन दयाला, दीनानाथ कृपाला।।

चरन कमल की छांह में लेकर, कर दिया मुझे निहाला।।बलि

269. लीला बरनी बरन न जाय॥टेक॥

पिंगला चढ़ा सुमेर की चोटी, लम्बे डग नित भरते।।

बिना हाथ तोले आकासा, सब लख अचरज करते।।बरन न

गू गा बिन जिभ्या बिन बानी, पिंगल शास्त्र सुनावे।।

सुनने वाला अर्थ न समझे, दया लाग अर्थावे।।

बरन न लूला काम करे सब अपने, हाथ नहीं कोई रखता।।

। दोनों आंखों का जो अन्धा, धरन अकास को लखता।।

बरन न लगी समुद्र में आग निराली, मछली गांछ में बैठी।।

जल को त्याग गगन उड़ जाई, गगन मंडल में पैठी।।

चींटी के पेट से हाथी निकला, सिंह बाघ सब खाये।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिन यह दृश्य दिखाये।।बरन न

270. नाम सुमिरि भव तरना है, हाँ।।टेका।।

नर देही भव सागर तरनी, दया से हाथ में आई।।

जो कोई इसका सार न जाना, बिरथा जनम गंवाई।।

तरना नाव पड़ी मंझधार में तेरी, खेवट सतगुरु पूरा।।

नाम सुमिर जा मच जल पारा, जो माया रन स्वरा।।

तरना नाम मंत्र से बस में आवे, काल काला नागा।।

नाम पाये जो नाम न सुभिरे, विष से मरे अभागा।।

तरना एक नाव से सवही मिलते, नौ निधि सिद्धि शक्ति।

जीतेजी नर पावे मुक्ति, करे जो नाम की भक्ति।।

तरना राधास्वामी नाम सार है, सार सार का सारा।।

जो सुमिरे यह नाम निरंतर, सहज जाये भव पारा।।तरना

271. सन्त मत मारग झीना है, हाँ।।

त्याग स्थूल सूक्ष्म गति निरखे, फिर कारन की बारी।।

कारन तज महा कारन धावे, तब समझो अधिकारी।।

झीन है। धरम करम व्यौहार न छोड़े, दूदे सार न इनमें।।

सुरत शब्द में सार छुपा है, करे प्राप्त सो तिन में।।

झीना है। संजम नियम जप तप कर्मा, नहीं किंचित कठिनाई।।

सहज योग की सहज रीति है, सहज ही सहज भलाई।।

झीना है। सतगुरु सुत्त नाम सतसंगत, समझ सहज में धारे।।

फिर अन्तर में करे चढ़ाई, जड़ चेतन निरवारे।।झीना है।

राधास्वामी ने भेद बताया, सुरत शब्द मत गया सुरत

शब्द मत सब का टीका, सुरत में शब्द को पाया।।

झीना है

272. सहज योग विधि उलटी है, हाँ।।

टेका। जग के धरम करम व्यौहारा, सो मारग प्रवृति।।

सहज जोग साधन से प्यारे, सहज में नित्य निवृति।।

उलटी है। पृथवी छोड़ गगन को धावे, बेधे जाय ब्रह्म डा।।

लख विराट अव्याकृत अन्तर, हिरण्य गर्भ प्रचन्डा।।

उलटी है। माया सकल ब्रह्म के ऊपर, परब्रह्म दरबारा।।

इनके आगे चढ़े जो साधक, निरखे सत्य पसारा।।

उलटी है। उलटे नाम का सहज में सुमिरन, मुख में बन्द लगाना।।

आँख कान खुलने नहिं पावे, सुन अनहद धुन काना।।

उलटी है। तन थिर मन थिर सुरत निरत थिर, करे जो सूझे युक्ति।

युक्ति पाये सुरत शब्द साधे, सहज मिले पद मुक्ति।।

उलटी है। अलख अगम की गति लख पावे, अन्तर रूप प्रकाशा।।

राधास्वामी चरन कमल में, पावे अन्त निवासी।।

उलटी है। सहज योग की सहज कमाई, सहज सहज चितलाना।।

राधास्वामी की किरपा से, सहज में धुर निवणा।।उलटी है।

273. गुरुदाता की दया पर बलिहारी।।

टेक। मैं तो कामी क्रोधी लम्पट, रोम रोम बना हंकारी।।

हाथ दया का सिर पर फेरा, मेरी करली रखवारी।।

बलिहारी कपट न देखा छल नहीं देखा, नहीं निरखी गति संसारी।।

अपनी कृपा की ओर दृश्टि कर, कोटा मेरा संकट भारी।।

बलिहारी। मानुष देह का सार न जाना, जनम जुवा में गया हारी।।

गुरु ने बाँह गही मेरी आकर, होकर सच्चे हितकारी।।

बलिहारी भक्ति भाव व्यौहार न जाना, नहीं बरता आश्रमचारी।।

त्राह त्राह कर शरन पड़ा जब, दया दृटि मुझ पर डारी।।बलिहारी

274. अँखियाँ बिन दरशन तरस रहीं।।

सूखे हॉट आँख पथराई, हूल कलेजे पैठा।।

थर थर काँपे निबल अंग मेरा, मन बैरी बन बैठो।।

तरस दिन को चन रात नहीं निद्रा, व्याकुल चित घबराऊँ।।

जगत अंधेरा सूझे नहीं कुछ, कहां आऊँ कहाँ जाऊँ।।

तरस दाना पानी न मोहि सुहावे, किसी की बात न भावे।।

रोग सोग की समझ कठिन, पता वैद्य नहीं पावे।।

तरस बिरह की आग हिये में भड़की, सुलग रही दिन राती।।

धुवाँ न उठे न ज्वाला फटे, किसे दिखावन जाती।।

तरस मनकी उपजी मन में रहानी, मन कुरेद की खानी।।

। मन ही समझे मन की कहानी, और कोई क्या जानी।।

तरस घट में उठी चाह प्रीतम की, घट में दर्शन माँगू।।

घट की आँख से रूप निहारू, बट चरनन से लागू।।

तरस घट में आओ दरस दिखाओ, घट का मन्दिर सूना।।

घट को बसाओ जोति जलाओ, हो प्रकाश दिन दूना।।

तरस प्रीतम शब्द सुरत चित का अंग, प्रेम बंक की नाली !

सुरत शब्द का मेल मिले जब, सुख से रहूँ निहाली।।

तरस देकर दरस पीर मेरी मेटो, हरो त्रिगुन दुख साला।।

दया करो मैं दयापात्र हैं, राधास्वामी दयाला।।तरस

275.घट नाचे सुरतिया उमंग भरी टेका।।

सहज कमलदल ठुमकत आई, दीपक जोत जलाई।।

आरत ठानी थाली सजाई, घंटा शंख बजाई।।

उमंग भरी त्रिकुटी मंडल गुरु अस्थाना, ओंकार धुन गाना।।

थिरक थिरक नाचे मुरत प्यारी, गुरु गम लव हुकान।।उमंग भरी

थाप पखावज सुनकर मोहि, सुन्न की मिली अवस्था।।

सारंग सारंग बजी सारंगी, सहज समाध व्यवस्था।।

उमंग भरी मोर चाल चक्कर जब काटा, भंवर गुफा चढ़ दौड़ी।।

बंसी सुनी सोहंगम् की धुनि, निरखी खिड़की चौड़ी।।

उमंग भरी सुरत ने निरतरूप जब धारा, नाच हुई मस्तानी।।

वही है लीला सत की भाई, सत पद में टैरानी।।

उमंग भरी राग नाच सब कोई जाने, यह है नाच निराला।।

विरला समझे सन्त की बानी, पड़े न यम के पाला।।

उमंग भरी तुरिया तुरियातीत अलख लख, अगम अगोचर आई।।

राधास्वामी धाम में नाच रचाया, धुरपद पदवी पाई।।उमंग भरी

276. साधू जग है पद अद्वत।।

टेका। जो कुछ देखा एक को देखा, एक एक का लेखा।।

एक बिना कुछ दृष्टि न आया, बहु बिधि किया परेखा।।

पद अद्वत कहने को तो दो हैं आँखें, देखें दोउ मिल एका।।

। दो कानों से सुनें बात एक, सूझे सहज विवेका।।

पद अद्वत एक चन्द्र है एक है सूरज, एक एक सब तारे।।

मंगल बुध वीर शुक्र शनि, देखे न्यारे न्यारे।।

पद अद्वत एक डार के पात फूल सब, एक एक दरसाये।।

जीवजन्तु सुर असुर राक्षस, एक एक कर जाये।।

पद अद्वैत तुम हो एक एक हैं हम भी, एक एक एक पहचानू।।

राधास्वामी पद अद्वैत बखाने, समझ बूझ मन मानू।।

पद अद्वत

277. मैं आप आप में खौगया।।

टेक। आप कौन हैं आप कौन हैं, आप आप को जाना।।

आप भूल गया आप में भूला, अपना आपा ठाना।।खोगया

आपा ठान के एक हुआ जब, एक एकाई कहाया।।

एक एकाई दहाई सैकड़ा, लाख हजार बनाया।।

खोगया पदमनील और शंख महाशंख, अनगितनी गिन भूला।।

गिनती गिनी करोर भाँति से, गिनती गिन गिन फूला।।

खोगया भूला भूला भूल में अटका, भूल भुलैय्याँ भूला।।

भूला भूल कर भूल भूल से, भूल भुलैय्याँ झूला।।

खोगया धन दौलत के पड़ा फेर में लगा हिसाब बनाने।।

बेटे पोते और परपोते, उपजाये मन माने।।

खोगया ज्ञान ध्यान की रीति चलाई, खटपट के पट दरशन।।

रोया हँसा बिचारा सोचा, लख सुन्दरि बिच दरपन।।

खोगया जोग जुगत की ओर झुका फिर, सिद्धि शक्ति भरमाई।।

आपा आप में आपको भूला, आपकी सुध नहीं पाई।।

खोगया पूरब दौड़ा पच्छम दौड़ा, तीरथ बरत बहाना।।

आपा अपना हाथ न आया, ऐसा बना सियाना।।

खोगया राधास्वामी सतगुरु प्रगटे, घट की राह दिखाई।।

खोया आपा आप मिला अब, आप आप में पाई।।खोगया

278. नित जाग जाग कर सोगया।।

टेक। मैं हूँ कौन रूप मेरा कैसा, नाम रूप नहीं जानू।।

जोती प्रगटी घट में मेरे, जोत निरख सुख मानू।।

सोगया जोत निरख सुख पाकर कुछ दिन, थका तो आलस आई।।

नींद की इच्छा हुई तो मैंने, दिन को रात बनाई।।

सोगया सोया सोकर फिर उठ बैठा, सूरज के प्रकाशा।।

यह सूरज मेरे घट से निकला, जोत में किया विलासा।।सोगया

आलस निद्रा जोत से आई, आलस पाँव पसारा।।

फिर सोया सो सोकर जागा, लखे चन्द्र और तारा।।

सोगया तारे सूरज चांद वस्तु क्या, मेरे घट की जोती।।

आंख बिना कहो सूरज कैसा, जोत में जोत की सोती।।

सोगया सूरज चांद सितारे भाई, तेरी आंख की झांई।।

दो आंखों में सुर चन्द्र हैं, आंखों की परछाई।।

सोगया खुली आंख परछाई दरसे, बंद आंख क्या देखे।।

सोच समझ क्या पड़ा भरम में, भरम विकार के लेखे।।

सोगया जाग जाग उठ जाग जाग तू , जाग मेरा कर संगा।।

लिस नींद जाये छिन पल में, न्हाये जो मानस गंगा।।

सोगया सोकर खो बैठा निज आपा, मैं आया हूँ जगाने।।

राधास्वामी की दया से, जाग के लगजा ठिकाने।। सोगया

279.आजा शरन बचा लू गा॥टेक॥

तू है मेरा मैं हूँ तेरा, तन मन धन से प्यारा।।

तू आंखों का तारा मेरा, मैं तेरा रखवारा।।

बचा लू गा जुज कुल का है कुल जुज का है, धर मन में परतीती।।

जब जुज है तब कुल से प्यार कर, सीख शब्दमत रीती।।

बचा लूगा स्वारथ बस नहीं बना हूँ तेरा, नहीं स्वारथ मन मेरे।।

परमारथी परम उपकारी, क्या आया चित् तेरे।।

बचा लूगा तन के बन्धन मन के बन्धन, धन के बन्ध बंधाना।।

बन्ध बन्ध में बन्ध बन्ध में, बन्ध बन्ध उरझाना।।

बचा लू गा जब कोई नहीं तेरा सहाई, मैं ही रहा सहाई।।

अब भी सदा सहाई तेरा, तज दुर्मति दुचिताई।।

बचा लू गा उलटी समझ तेरे मन भाई, मन से मुझे भुलाया।।

भूला भंटका देख के अब मैं, तुझे बचाने आया।।

बचा लू गा राधास्वामी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।

परम सनेही परम हितैषी, ले उनकी शरनाई।।

बचा लू गा

280. तू सोया सो सो खोगया।।

बंजारों के संग में आया, धन दौलत ले हाथा।।

बनिज और व्यौहार की चिंता, भूल के छोड़ा साथा।।

खोगया साथ छोड़कर हुआ आलसी, पांव पसार के सोया।।

क्या तुझको यह समझ नहीं थी, जो सोया सो खोया।।

खोगया तेरे ताक में लगे चोर हैं, ठग डाकू बटमारे।।

जाग जाग उठ जाग भाग अब, सो नहिं पांव पसारे।।

खोगया कोई राजा बन लूटे तुझको, कोई नवाब दरबारी।।

मूरख चेत चेत के अवसर, पू जी बचाले सारी।।

खोगया किस सुख नींद में सोया प्रानी, यह सुख दुख का रूपा।।

दुख है मान बड़ाई प्रतिष्ठा, दुख प्रजा दुख भूपा।।खोगया

अपने आये में तू कहां है, यम के हाथ बिकाना।।

तन मन धन तेरा नहीं अपना, मन बच कर्म बेगाना।।

खोगया तेरा समय नहीं है तेरा, तेरा कथन न तेरा।

सोना खाना उठना बैठना, चिंतन मनन न तेरा।।

खोगया तेरी हँसी नहीं है तेरी, कोई बात न तेरी।।

कठपुतली बन नाचत डोले, कोई घात न तेरी खोगया

लूट लूट में लूट पड़ी है, लूट लूट सब लूटे।।

सोच समझ यह तन का भांडा, लुटकर छिन में फूटे।।

खोगया मानुष जनम दिया है जिसने, जिसने मनुष बनाया।।

वही दया और क्षमा साथ ले, तुझे बचावन आया।।

खोगया पल पल रक्षा हुई है तेरी, सोच समझ मन अपने।।

तू भरमा भरमा क्यों डोले, देख जगत के सपने।।

खोगया राधास्वामी दीन दयाला, करें सदा रखवारी।।

उनकी शरन में जल्दी आजा, जो सच्चा व्यौपारी।।खोगया

281. जगत में कैसी लूट पड़ी।।

माता कहे यूत है मेरा, भाई भाई बनावे।।

घर की तिरिया तन से लिपटी, पति कह रार मचावे।।

लूट पड़ी। बहन बीर कह हंस मुसकावे, मुस के धन ले जावे।।

पुत्रवधू कहे ससुर सियाना, भूठे भाव दिखावे।।

लूट पड़ी राजा कहे मेरी है परजा, करे कमाई उद्यम।।

मक्खन काढ़ मुझे दे उत्तम, पिये छाछ नित मध्यम।।

लूट पड़ी पण्डित दान दक्षिणा मांगे, साधु भिक्षाधारी।।

तीरथ मठ मूरति और मन्दिर, लूटें लूट की बारी।।

लूट पड़ी मरते समय आग यह बोली, इसे जला खा जाऊँ।।

मिट्टी कहे गाढ़ दे मुझमें, अपना अंश बनाऊ लूट पड़ी हवा

सुखावे पानी घुलावे, सिमटावे आकासा।।

चकित हुआ यह देख के लीला, लूट का अजब तमाशा।।

लूट पड़ी मैं हूँ कौन कौन है मेरा, इसकी समझ न आई।।

देख लूट का जग विस्तारा, लूट हुई दुखदाई।।

लूट पड़ी कभी कभी भूल भरम में फंसकर, आप लुट लुटवाऊँ।

लूट लूट के लुट गया सारा, लूट का मर्म न पाऊँ।।

लूट पड़ी राधास्वामी को संगत पाई, समझ लूट की आई।।

व्याकुल चित चरनों में आयो, ली सतगुरु शरनाई।।

लूट पड़ी

282. भाई शब्द योग तुम चित लाओ।।

शब्द का पहले रूप समझलो, सार सार का सारा।।

शब्द आकाश माया का गुण हैं, चेतन का भंडारा।।

तुम चित शब्द के मारे मरते प्राणी, शब्द जिलाचे जीवें।।

अजर अमर बन सुख को भोगें, शब्द अमृत जब पीवें।।तुम चित

शब्द राग सुन राग बढ़े नित, शब्द विराग से त्यागी।।

कैसे कहूँ खोल कर प्यारे, शब्द पवन जल आगीं।।

तुम चित गुरु गम लेकर घट में कमाई, सुन धुन अनहद बानी।।

चित विरती का निरोध सहज हो, सुरत बने असमानी।।

तुम चित बिन गुरु गम नहीं घट में चलना, मन मत कभी न होना।।

गुरुमत ले गुरु ज्ञान समझले, सुन्न समाध में सोना।।

तुम चिंत बिन गुरु ज्ञान का धन नहीं मिलता, बिन गुरु निरधनताई।।

शब्द अधीन गुरु उपदेशा, गुरु की है प्रभुताई।।

तुम चित मनमत में है चंचलताई, काल करम ब्यौहारा।।

गुरुमत में है निश्चलताई, गुरु गम ज्ञान पसारा।।तुम चित

शब्द सुरत में सुरत शब्द में, शब्द सुरत एक सारा।।

शब्द सुरत का मर्म है न्यारा, पावे गुरु मुख प्यारा।।

तुम चित पृथवी छोड़ गगन को धावे, गगन में शब्द विलासा।।

तीन सुन्न के पार ठिकाना, राधास्वामी पद में बासा।।तुम चित

283. भाई जोति में जोति मिलाना है।।

। सहस कमल दल जगमग जौती, जोति जोति की धारा।।

चाँद सूरज की शोभा न्यारी, लख लख लाख तारा।।

मिलाना है। नीला पीला लाल वर्ण की, हरी बैंगनी ज्योती।।

श्याम कंज फुलवारी निरखी, फटी ज्योत की सेती।।

मिलाना है। आगे चढ़ी सुरत मतवारी, त्रिकुटी अम् प्रकाशा।।

गुरु की ज्योति लाल रंग निरखी, उपजा उमंग हुलासा।।

मिलाना है सुन्न मंडल शशी स्वेत रंग का, मन शीतल हुआ तेरा।।

सहज समाध ज्योति लख जागे, सुख प्रगटे बहुतेरा मिलाना है।

भंवर गुफा झूमर झमकाहट, झमक दमक अति दमके।।

ज्योतिमें आँखकी ज्योति मिले जब,ज्योति ज्योति मिल चमके।मिलाना है।

सत में सच्च खन्ड की ज्योति, ज्योति सिंध लहराना।।

ज्योति सिंध में गोते मारा, अधर ध्वजा फहराना।।

मिलाना है। अलख अगम लख गम को पावे, सुरतवन्त अधिकारी।।

राधास्वामी धाम में चैन विलासा, हो रहे भव के पारी।।भिलाना है।

284. सुख पाय सहज सुख रासी बनी।।टेका।

नहीं सुख वाद विवाद में किंचत, नहीं सुख बचन बिलासा।।

कथा वारता सुख कहो कैसा, सुख का अन्तर बासी।।

रासी बनी। दौड़ दौड़ दौड़त मेरी हिरनी, समझ की निपट अधूरी।।

वह अज्ञानी मर्म न पावे, अन्तर है कस्तूरी।।

रासी बनी पोथी पढ़ पढ़ बात बनावे, भरमे और भरमावे।।

पड़ा पेट का फन्दा भारी, अन्तर ज्ञान न पावे।।

रासी बनी जोग जुगत कर जोगी हारा, रिद्ध सिद्ध के धंदे।।

रिद्धि सिद्धि नौ निधि शक्ति, मन माया के फन्दे।।

रासी बनी भोग विलास में सुख को दूई, बाहरमुखी अनारी।।

इतनी समझ उसे नहीं आई, माया प्रबल नारी।।

रासी बनी बाहर है सुख की परछाई, अन्तर सुख की ज्योती।।

अन्तर सिंध जो मारे गोते, चुनले सुख के मोती।।

रासी बनी राधास्वामी भेद बताया, अन्तर चाल चलाई।।

अन्तर पॅस अन्तरमुख बनकर, अन्तर सुख धन पाई।।रासी बनी

285. दुख मुझे छोड़ अब भाग गया।।

दो आँखों से द्वन्द को निरखा, द्वन्द में दुख बिस्तारा।।

द्वन्द जगत में दुख है व्यापा, जगत में दुख पसारा।।

भाग गया गृही दुखी दुखी बनवासी, जपी तपी दुख मूरत।।

ज्ञानी दुखी दुखी अज्ञानी, निरख लो उनकी सूरत।।

भाग गया दुख के मारे तीरथ भागे, छोड़ कुटुम्ब परिवार।।

साधन आराधन सब दुख हैं, कोई कोई करे बिचारा।।

भाग गया राजा दुखी दुखी है परजा, पढ़ लिख दुख भया दूना।।

जहाँ देखा तहाँ दुख ही दरसा, सुख से सब जग सूना।।

भाग गया अपने मनमें समझ बिचारो, कौन सुखी संसारा।।

किसी का कहना चित्त न लाओ, समझो बुधि अनुसार भाग गया

पूरनता नहीं किसी में भासे, सब ही देखे अधूरे।।

जो हैं ऐसे अधूरे जग में, वह सुख के कहाँ पूरे भाग

गया राधास्वामी मौज हुई और, घट में पाया बासी।।

मन को जीत जीत मन अपना, अब सुख चैन बिलासा।।

भाग गया

286. हम आये आये आये हैं।।

तुमको दुखी देख आँखों से, मन में दया समाई।।

दया रूप धर प्रगटे जग में, दया यहाँ ले आई।।

आये हैं। सूरज दया का गगन प्रकाशा, किरने दया की धारा।।

दया सिंध उमगा और बाढ़ा, दया भाव बिस्तारा।।

आये हैं। सुर नर मुनि की यह है रीती, लग स्वारथ करें प्रीती।

हम में नहीं है स्वारथ किंचित, लख लख करो प्रतीती आये हैं।

उदर निमित्त करें सब भेसा, योगी जती उदासी।।

माँगे भी ज्ञान की गम नहीं, तुम उनके विश्वासी।।

आये है। भूल भरम तज कर सत संगत, हिये की आँख खुलाओ।।

राधास्वामी रूप निरख कर, दया से काज बनाओ।।आये हैं

287. जग भानु उजाला होगया।।टेका।

भिटा अन्धेरा भयो सबेरा, अन्धकार तज भागा।।

ज्ञान ज्योति घट चीच प्रकाशा, घट घट घट घट लागा

होगया तिमिर अविद्या नहीं अब छाई, घट अकास भया निर्मल।।

चंचलताई चित से भागी, चंचल मन भया निश्चल होगया

निश्चल मन की साध के वृत्ती, निज स्वरूप जब देखा।

सुखी हुये मुस्काये हसे हम, मिटा करम का लेखा होगया

उलट दृष्टि तिलपट को खोला, आंख तीसरी पाई।।

इसी आँख की अग्नि ज्योति से, काम विकार जलाई।।होगया

काम गया निष्काम बने तब, चढ़े मेरु कैलासा।।

भीतर बाहर ऊपर नीचे, चहू दिस बिमल उजास

होगया डाकू चोर राह तजे भागे, भय बस पास न आवे।।

माया ठगनी काल उगारी, अब किसको भरमाचें।।

होगया राधास्वामी ने खेल खिलाया, खेल खेल की रीती।।

खेल खेल में ज्ञान सिखाया, उपजी मन परतीती होगया

288. नाम अमोल रतन है जग में।।

नाम भिला तो सब मिला, नाम है सबका सार।।

जो कोई सुमिरे नाम नित, व्याये नहीं संसार।।

जग में सुख देवे दुख को हरे, काटे कष्ट कलेश।।

जीवत शान्ती चित बसे, अन्त में सतगुरु देश।।

जग में जप तप संयम नियम यम, सच हैं नाम अधीन।।

नाम भक्ति के सिंध का, प्रेमी भक्त है मीन।।

जग में चंचल मन निश्चल बने, उपजे हर्ष हुलासे।।

मन में भजे जो नाम को, कभी न होय उदास।।जग में

नाम तेरे घट में बसे, बिन जिभ्या ले नाम।।

राधास्वामी की दया, पूरन हों सब काम।।जग में

289. बचन सतसंग के नहीं सुने।।

सतसंग किया लाभ क्या पाया, बना न प्रेम अनुरागी।।

समय निरर्थक अपना खोया, कैसा मंद अभागी नहीं

सुने आसन तन मन स्थिर नाहीं, ति में नहीं स्थिरताई।।

फिर सतसंग से मुझे बतादे, क्या हो तेरी भलाई नहीं

सुने हृदय को कठोर बन आया, गुरु की बात न मानी।।

पत्थर का कोर हु न भीगा, चहुँदिस सौ मन पानी नहीं सुने

औंधा घड़ा गहे नहीं पानी, बरसे मेह अखंडा।।

संगत का कुछ दोष नहीं है, मन चंचल परचंडा।।

नहीं सुने अमृत बरसे लाख गगन से, नीम होय नहीं मीठा।।

गुरु के बचन का रंग जमे नहीं, निरस चित्त जब सीठा

नहीं सुने कोई कोई संगत जाकर सवें, गुरु संगत नहीं जायें।।

भाग हीन अधिकार हीन नर, यम की राह में लागू नहीं सुने

शठ सुधरहिं सतसंग में गुरु के, पारस लोह समाना।।

पर दूर पड़ा तो सोना क्यों हो, लोहा लोह रहाना नहीं

सुने नद नाले का पानी बहकर, ऊसर रेत में आवे।।

गंगा की धारा नहीं पहुँचे, गंग रूप क्यों पावे।।

नहीं सुने राधास्वामी दीन दयाला, सतसंग जीव चिताये।।

जीव सुने नहीं गुरु की बानी, केहि बिधि अंग लगावें।।

नहीं सुने

290. अमृत नित बरसे सतसंग में।।

मूरख प्रानी को नहीं गम कुछ, यम के हाथ बिकाने।।

निश्चल चित गुरु बचन सुने नहीं, मन नहीं ठौर ठिकाने।।सतसंग में

एक घड़ी या आधी घड़ी हो, या आधी की आधी।।

संगत गुरु की करे चेतकर, मेटे सकल उपाधी।।

सतसंग में सतसंगत मानसर समाना, जुड़ मिल हँस जो आये।।

सतल तन मन होगया सारा, अमृत कुण्ड नहाये।।

सतसंग में हँसा बगला चले मानसर, अपने चित अनुमाना।।

हँसा तो चुने मोती मुक्ता, बगला मछली खाना।।

सतसंग में कोई छन्नी बनकर आवे, कोई छाज के हँगा।।

छन्नी सार वस्तु को त्यागे, छाज सार गहे अंगा।।

सतसंग में चित विवेक धरकर सतसंगत में, तज मन की दुचिताई।।

ततक्षण पल के सतसंगत में, निश्चय तेरी भलाई।।

सतसंग में अमृत बरसे गगन मंडल से, अमृत मय गुरु बानी।।

राधास्वामी की बानी सुन, वने सहज निरवानी।।सतसंग में

291. निज मन को सम कर लेना है।।

समता आई ममता भागी, सम का मिला सहारा।।

सम को पाइ सुरत हुई निश्चल, लखा शब्द भंडारा लेना है।

सम में ताल ताल में सम जब, राग सुहाना लागे।।

बिन सम राग अलाप है मिथ्या, सुनने वाला भागे।।

लेना है। सम की समझ बूझ नहीं जबलग, नहीं सुन्दर व्यौहारा।।

चित की समता बिन नहीं पावे, परमारथ का सारा लेना है।

सुखमन मध्य ढूंढ सम स्थल, सम्यक आसन मारी।।

जागी कुण्डलनी पर चढ़ने का, होजा तू अधिकारी।।

लेना है। नहीं दीयं बाये न भटकना, सम्यक हो वाचा मा।।

सम्यक करम में सम्यक बानी, सम संकल्प निशाना।।

लेना है। तिल को छोड़ तोड़ गढ़ त्रिकुटी, जा सुन के मैदाना।।

सम्यक सहज समाधि रचाले, महासुन्न स्थान।।लेना है।

सम्यक शब्द सुने जब घट में, शून्य पार चढ़ जावे।।

भंवरगुफा सोहंगम सम्यक, सौ सतपद पहुँचावे।।

लेना है। सुरत शब्द मत गुरु ने बताया, अनुभव सम्यक ज्ञाना।।

सम्यक साधन बिन नहीं पावे, अलख अगम निरवाना लेना है।

राधास्वामी सतगुरु आये, घट का भेद बताया।

सम कर सुरत निरत मन चित को, सुरत में रहा समाया।।लेना है।

292. सत भाव हिये में लाना है।।टेक।

तुम हो सत् सत जीवन समझो, तुम में सत सत जीना।।

सत में असत का भान कहां है, सत अमृत नित पीना।।

लाना है। निश्चय श्रद्धा प्रेम प्रति, परतीत आस्तिक लक्षण।।

जिनमें यह नहिं समझो नास्तिक, नास्ति आस्ति विलक्षण।।

लाना है। नास्ति नास्तिक असत हों कैसे, मिथ्या कल्पित बानी।।

हमने तो देखी नहीं अब तक, नास्तिकता की निशानी लाना है।

जो नहीं हो वह भासे कैसे, बन्ध्या पुत्र समाना।।

भरम भ्रांती में पड़े हो क्यों तुम, समझो गुरुमत ज्ञाना।।

लाना है। तुम जिसको माया कहते हो, वही ब्रह्म की खानी।।

ब्रह्म शक्ति वाला जब ठहरा, माया शक्ति कहानी लाना है।

शक्ति शक्तिवान की शोभा, नहीं है उससे न्यारी।।

यू ही बात बनाना छोड़ो, बोलो बचन बिचारी।।

लाना है। सत में जो सत्ता रहती है, वही है उसकी शक्ति।।

सत्ता बिन कोई सत नहीं होता, करो सत्त की भक्ति लाना है।

द्वन्द भाव को कल्पित जानो, एक एक चित लाओ।।

भरम भ्रांति कहो क्योंकर आवे, जब सतसंगत जाओ।।

लाना है। राधास्वामी की है। बानी, आप आपको जानो।।

अपना आपा और विचारो, किसी का कहा न मानो।।लाना है।

293. गुरु मुखता सब का सार है।।टेक।

गुरुमुखता कोई गुरु मुख जाने, और न जाने कोई।।

गुरुमुख नहीं काल माया मुख, जीव मुखी नहीं सोई।।

सार है। माया मुखता धरम करम सब, लोभ मोह के धन्दे।।

रोचक दशा भयानक गति मति; पड़े भरम के फन्दे सार है।

समय को देख मान मद बाढ़, अहंकार चित ठाने।।

काल निरंजन की परिछाई, अहं सोहंगम माने।।

सार है। जीवमुखी आधीन दीन है, रोवे और चिल्लावे।।

बिन समझे बुझे की नीति, स्तुति गाये सुनावे सार है।

यह सब यम के हाथ बिकाने, लगे न ठौर ठिकाने।।

गुरु मुख ज्ञान यथारथ बुझे, गुरु मत को पहचाने।।

सार है। कर सतसंग भेद सत मत लख, बहक न बारम्बारा।।

राधास्वामी की कृपा से, हो भव द्वन्द से न्यारा।।सार है।

294. राधास्वामी दया ले जा भव पार।।

माया तुझ से नहीं अलग है, माया तेरी बुद्धि।।

माया को कुछ रूप समझले, तब चित आवे शुद्धि।।

जा भवपार बुद्धि का प्रपंच है सारा, बुद्धि ही भव सागर।।

बुद्धिवान हो बुद्धिमान हो, चतुर सियाना नागर।।

जा भवपार दशा बदल गई समय को पाकर, समय काल है भाई।।

काल से कैसी व्याकुलताई, तज मिथ्या दुचिताई।।

जा भवपार माया काल के भरम मुलाना, भरमा भूला डरना।।

चालक ने निज छाया देखी, छाया लख घबराना।।

जा भवपार कर सतसंग विवेक सहित नित, शब्द सार निरवारी।।

शब्द समझ कर रूप परख ले, राधास्वामी की बलिहारी।।जा भवपार

295. मेरी सुरत सियानी चेत अब

सुरत सियानी भई अज्ञानी, चेतन रूप बिसारा।।

पड़ी काल माया के फन्दे, लखे न सार असारा।।

चेत अब सुरत सियानी हुई दिवानी, भरम रही संसारा।।

यह संसार और कुछ नहीं, सन संकल्प पसारा।।

चेत अब सुरत सियानी भव भरमानी, भरम का भेद न बूझे।।

भरम हिंडोले जो कोई भूले, केसे तत्व की सूझे।।

चेत अब सुरत सियानी मद लपटानी, मान गुमान फँसानी।।

मोर तोर की बंधी जेवरी, बन्धन बन्ध बंधानी।।

चेत अब सुरत सियानी उपजी गलानी, सत संगत में आई।।

राधास्वामी दया रूप निज जाना, झी सतगुरु शुरनाई।।चेत अब

296. सुख को किसमें कहां हूँ हूँ।।टेक।

जो कुछ है सब मेरे भीतर, सत्त चित्त आनन्दा।।

आंख खुले बिन सुझे कैसे, घट के सूरज चन्दा कहां हैं हैं।

मैं हूँ बुन्द सिंधु गति मेरी, लहर बुलबुले मुझमें।।

खोल कहूँ माने कोई नाहीं, धीर चुलबुले मुझमें कहां हूँढ़ें

मुझमें जीव प्रकृति ईश्वर, मुझमें ब्रह्म ब्रह्मांडा।।

मैं हूँ खंड खंड में व्यापा, रूप है मेरा अखंडा कहां हूँ हूँ

मुझमें सृष्टि की रचना फैली, मैं बालक पितु माता।।

जनम मरन मेरी है लीला, आता कहीं न जाता।।

कहां दें। गुरु की सेवा साध की संगत, करे तो जाने प्रानी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अपना रूप पिंछानी।।कहां हूँ हूँ

297. गुरु चरन कमल की दासी बनू।।

दासी बनू अविनासी बनू, हाँ दासी बनू प्रेम प्यासी बनू।।

गुरु हुये मेरे मैं हुई गुरु की, मैं हूँ गुरु की दासी।।

दासी हेकर हुई अविनासी, मीन प्रेम जल प्यासी।।

दासी बनू दासी हुई सीस चरनन धर, अरपो मन धन बानी।।

गुरु ने हाथ दया का फेरा, दी भक्ति सुख खानी।।

दासी बनू मेरा मुझमें कुछ नहीं अपना, गुरु का है सब मुझमें।।

भक्ति मुक्ति गुरु की है सारी, तेरा होगा तुझमें।।

दासी बने गुरु संगत मिल हुई गुरु की, मन चिन्ता नहीं व्यापे।।

जग को दुख नहीं मुझे सतावे, हैं गुरु आप ही आपे।।

दासी बनू अंग लगाकर गुरु ने मुझको, अपनी दासी बनाई।

राधास्वामी नाम दान दे, सुख की रासी बनाई दासी बनें

298. अपने गुरु की मैं दासी बनू गी।।

दासी बनू गी सुरक्रासी बनेगी, अपने गुरु की मैं दासी बनू गी।।

छबि गुरु की आँखों में समाई, दूजी छबि न समावे।।

भरी कोठरी जब सराय की, और ठौर नहीं पावे।।

दासी बनू गी प्रेम अमृत जब भरा पियाला, अब क्या उसमें धरना।।

भरगया मन जब प्रेम से गुरु के, अब न रहा कुछ भरना।।

दासी बनू गी मछली जल से मिली तो जल से, अपना नाता जोड़ा।

जल और मछली के नाते को, बतादो किसने तोड़ा।।

दासी बनेगी। भंवरा लोभी कमल बास का, बास सुबास लुभाया।।

दुर्गन्धी के निकट न जावे, प्रेम के बास बसाया।।

दासी बनेंगी भाग जगा गुरु दर्शन पाया, जनम सुफल हुआ अपना।।

राधास्वामी की दायी से, देख लिया जग सपना।।दासी बनू गी

299. दुविधा दुर्मति की है खानी।।

टेका। जबसे दुविधा चित में व्यापी, मन आई हैरानी।।

व्याकुल भये सार नहीं सूझे, फस गई द्वन्द गलानी है

खानी एकचित होय न समता आवे, भूल भरम भरमानी।।

दुख कलेश चिंता का बंधन, यम के फाँस हँसानी हैं खानी

राधास्वामी संग की अन्त में सूझी, पाई शब्द निशानी।।

शब्द समझ दुविधा गई मन से, होरही ठौर ठिकानी है खानी

300. सजनी प्रेम तराजू तुलजा।।

टेक। प्रेम तराजू चढ़ सम पावे, बन्द कली चित खुलजा।।

आनंद सुख तेरे भाग में आवे, हर्ष पवन लग फुलजा।।

हाँ तुलजह भवसागर के दुख सुख झूठे, भक्ति प्रति के पुलजी।।

पार जाये सतधाम विराजे, भिल जुन सत में रलजी हाँ तुलजा

नर तन पार्क कर सत संगत, जग से क्यों व्याकुलजा।।

राधास्वामी सतसंग मारले गोते, सत के सिंध में घुलजी हाँ तुलजा

301. मेला मेल मिले का मेला।।

जब लग मेल मिले नहीं मन का, तब लग मैला नाहीं।।

कपट नोन दुध जल डाला, खंड खंड बिलगाही।।

हाँ मेला सहस कोस गुरु चेला रहते, सुरत धार मिल संगी।।

पास में रहते दो कपटी जन, दुर वसे चिंतु भंगी।।

हाँ मेला जल मछली का मेल मिला है, यही मैल की रीती।।

बिछड़त प्रान तजे छिन पल में, देखलो प्रेम प्रतीती।।

हाँ मेला घट में सुरत है शब्द गगन में, मिलत समाधी लागे।।

बिना मेल कहो समता केसी, मेल से समता जागे।।हाँ मेला

गुरु के चरन से मेल मिला जब, उपजा हर्ष हुलासा।।

राधास्वामी दया से काज हुआ फू, पाया सतपद बासा।।हाँ मेला

302. मैं अपने मन से हार गई।।

मेरा मन नहीं बस में मेरे, नित उत्पात मचावे।।

क्रोध की आग चित्त में भड़के, तन मन सकल जरावे

हार गई मेरी जिभ्या बस नहीं मेरे, बोले अनुचित बानी।।

लाभ किसी का उससे क्या हो, मेरी करती हानी।।

हार गई मेरी आंख न बस में मेरे, अवगुन देखनहारी।।

गुन की ओर दृष्टि नहीं जावे, दोष दृष्टि की मारी।।

हार गई कान मेरे बस में नहीं मेरे, परनिंदा अनुरागी।।

सुनें और की दोष कहानी, प्रेम भजन को त्यागी।।

हार गई सतसंगत के बचन कौन सुने, आलस नींद सतावे।।

राधास्वामी ऐसी दशा से, तुम बिन कौन बचावे।।

हार गई

303. जगत की झूठी परतती।।

सुख आनन्द के समय साथ दें, दुखी देख कर भागे।।

स्वारथ बस ऋषि मुनि सुर नर सब, अपने हित को लागे।।परतीती

पुत्र पिता पति पत्नी भगनी, स्वारथ के अधीना।।

निज स्वारथ की आस नहीं जब, मनके सकल मलीना।।परतीती

रोग सोग में देख देह को, अपना चित्त हटायें।।

काल समय देहान्त हुये पर, धन सामिग्री बटावें।।परतीती

नारी कहे नर बहुत पियारा, बेलि वृक्ष लपटानी।।

प्रान तजे उसको तज भागी, भूत भूत चिल्लानी।।परतीती

कोई गाढ़े कोई जलावे, कोई जलधार बहावे।।

फिर नहीं नाम कोई ले उसका, अपने मन से भुलावे।।परतीती

ऐसे जग की प्रीति रीति पर, क्यों इतना अभिमाना।।

ममता त्याग त्याग दे ममता, कर सतगुरु का ध्याना परतीती

राधास्वामी जग में आये, अपना दिया सहारा।।

सुरत शब्द का पन्थ चलाया, किया भवसागर पारा।।परतीती

304.रंग पाय सुरंगी होगई॥टेक॥

जग का संग साथ जब त्यागा, धारा गुरु का संगा।।

गुरु का रंग जमा जब मन में, अब नहीं कभी कुठंगा

होगई गुरु का रंग संग कर आया, सतसंग की सुन बानी।।

काल करम के लाख झकोले, मेरी करें न हानी होगई

शब्द योग की विधि अनोखी, सीख किया अभ्यासा।।

मन तब तज पृथवी का मंडल, गगन मंडल किया बासा।।

होगई ब्रह्मरेन्द्र ओंकार अस्थाना, पहिले किया निवासा।।

ऊपर चढ़ी सुरत जब निरखी, गिर सुमेर कैलासा होगई

घट में सुरत शिष्य की बैठक, गगन में गुरु अस्थाना।।

सुरत शब्द संजोग महातम, दोनों एक ठिकाना होगई

सुरत में शब्द शब्द शब्द में सूरत, सुरत शब्द मिल एका।।

सहित विवेक दशा यह पाई, छूटा जगत अनेका।।

होगई द्वत अद्वैत का संशय भागा, चित की दुचिताई त्यागी।।

बनत बनत मेरी बनआई, हुई गुरुपद अनुरागी।।

होगई कीट भृगी के रूप बना है, ध्यान धारना प्रगटी।।

अब नहीं सहस कमलदल बासी, जब आई गढ़ त्रिकुटी।।

होगई राधास्वामी समरथ दाता, दया से अंग लगाया।।

रंग छुड़ाया भय दारुण का, अपना रंग दिलाया।।

होगई

305.तू एड़ी चोटी तक व्यापा।।

तू नयनों में आन बिराजा, और कौन अब आवे।।

रात की निद्रा फिर फिर लौटे, घर सूना नहीं पावे।।

तू व्यापा गू जे नाम तेरा कानों में, सोई अनहद बानी।।

क्या कहूँ कान हुये मेरे कैसे, बहरे या निरबानी।।

तू व्यापा मन के दरपन सुन्दर बसता, और की पड़े न झाँई।।

नहीं संकल्प विकल्प सतावे, जम कर बैठा साँई।।

तू व्यापा जिभ्या नाम तेरा है जपती, निस दिन आठों यामा।।

बात चीत किसकी करू किससे, गहा रसीला नामा।।

तू व्यापा हाथ पाऊँ नस नाड़ी में तू , आय किया बिसरामा।।

सिर में सोच समझ लख पाया, राधास्वामी धामा।।

तू व्यापा

306. अब अपना आपा जान गया।।

नहीं स्थल सूक्ष्म नहीं करन, नहीं मैं तन मन बुद्धि।।

पाप पुण्य नहीं मुझमें समाये, नहीं अशुद्धि न शुद्धि।।जान गया

जीवन ब्रह्म न माया शक्ति, व्यटि समिष्टि नाहीं।।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था, मन के आधार रहाई।।जान गया

जनम मरन मेरा नहीं होता, अमर रूप है मेरा।।

जब सतगुरु ने आन चिताया, छुट गया मेरा तेरा।।जान गया

छाया ज्योती मेरे सहारे, करते खेल निराले।।

मैं इनमें नहीं यह नहीं मेरे, पड़ा न इनके पाले।।जान गया

राधास्वामी सतगुरुदाता, संतसंग बचन सुनाया।

बचन सुना दुविधा तज भागी, अपना आपा पाया।।जान गया

307. गुरु स्वामी करो तुम मेरी सहाय।।

टेक। में बालक तुम मात पिता हो, आया शरन तुम्हारे।।

अब तो चिन्ता चित नहीं व्यापे, तुम हो सदा रखवारे।।

मेरो सहाय मैं अजान कुछ जानू नाहीं, बाल विनय सुन लीजे।।

माँगन की विधि मोहि न आवे, जो भावे सो दीजे।।

मेरी सहाय सत गुरु शरन रतन धन खानी, चरन शरन नित माँगू।।

और नहीं कोई चाह है मन में, पद सरोज में लागू।।

मेरी सहाय तुम्हरी गोद खेलू दिन राती, आनन्द चित बसाऊँ।

दुख कलेश नहीं मुझे सतावे, नाम सुमिर हरपाऊँ।।

मेरी सहाय राधास्वामी परम दयाला, दया से लो अपनाई।।

करम न व्यापे भरम न व्याये, सदा गहँ शरनाई।।

मेरी सहाय

308. तेरी काया नगरी कासी है।।

काया में शिव शम्भु शक्ति हैं, काया में अविनाशी है।

जोतिर लिंग शब्द धन धारा, सुरत उरधरु कासी है।।

कासी है। सुख आनन्द अवस्था वाहन, नंदी बृष कैलासी है।

चेतन धार बहे नित गंगा, सोई धार अकासी है।।

कोसी है। तीन लोक में कासी नगरी, न्यारी ज्ञान प्रकासी है।

जल धरि त्रिकुटी से बद जो गिरता, शब्द अमी सुख रासी है।कासीहै।

राधास्वामी नाम जो ले काया में, सच्चा कासी निवासी है।।

कासी से जो ऊपर जावे, पक्का साधु उदासी है।।

कासी है। राधास्वामी नाम पाये निज काया, सो सत धाम का बासी है।

राधास्वामी नाम जो गवे, उसकी कटी चौरासी है।।कासी है।

309. जब आँख खुले तब नजर पड़े।।

टेक। किसी की समझ में सार नहीं आवे, कोई किसी से क्यों झगड़े।

झगड़ा रगड़ा भव भ्रम भय है, मोह जाल में कौन अड़े नजर

पड़े पुस्तक पोथी पन्थ संप्रदा, पक्षपात के कठिन कड़े।।

मन को बाँध विचार शून्य नर, भव कीचड़ में आन गड़े नजर

पड़े पड़ा सो गड़ा गड़ा सो बिगड़ा, जो बिगड़े सोई अधिक सड़े।।

सड़े गले से हो दुर्गन्धी, द्वेष फैसे छोटे और बड़े।।

नजर पड़े कर सतसंग चाल चल सतकी, करम सीस पर दंड जड़े।

राधास्वामी बल संसार सिंध तर, शब्द नाव के बीच चढ़े।।नजर पड़े

310. गुरु ने अमृत नाम पिलाया॥टेक॥

मोह जाल की फाँसी काटी, चौरासी से आन छुड़ाया।।

अब नहीं काल कर्म का भय कुछ, अभयदान दे जीव चिताया।।

नाम खटका झटका भटका छूटा, सते मारग की राह चलाया।

भूल भरम दुबिधा संशय से, सहज रीति से सहज बचाया।।

नाम सहज योग विधि सहज कमाई, सहज सहज भव सिंध तराया।

सहज शब्द गति सहज समाधी, सहज सुन्न में सहज रचाया।।

नाम एक रस जीवन प्रेम भक्ति का, दया कृपा से सब ही दिलाया।

आओरे जीव करो सत संगत, समय अमोलक काहे गॅवाया।।

नाम राधास्वामी आये जीव चितावन, संत रूप धर जीव चिताया।

धन जो जीव शरण में आये, बिना कष्ट निज काम बनाया।।नाम

311. बाबा अपनी ओर निहार।।

टेक। और न को क्या देखें बाबा, निज जीवन को सुधार।।

काम न आवे कोई तेरे, कुल कुटुम्ब परिवार।।बाबा

बहुत गई थोड़ी रही आयु, मन नहीं सोच विचार।।

केहि बिधि मैं समझाऊँ तुझको, समझावत थका हार।।बाबा

कान सुने नहीं आँख न देखे, गहे न हाथ पसार।।

दाँत का काम आँत लगी करने, चिन रस का आहार।।बाबा

आदर मान बड़ाई मिट गई, नहीं समाज सतकार।।

औरन की तो बात कहूँ क्या, रूठे घर की नार।।बाबा

माया तज दे आस जगत की, भज सतगुरु करतार।।

राधास्वामी की दया से, चल भवं जल के पार।।बाबी

312. तेरी गति मति कौन लखे।।

टेक। वेद न जाने महिमा तेरी, ऋषि मुनि फिरे भरम की फेरी।।

शारद तेरे दर की चेरी, आन ही आन बके।।तेरी

अपरम्पार पार निहःपारा, तू है सार असार का सारा।।

अजर अमर अबिनासी प्यारा, घट घट व्याप रहे।।तेरी

नहीं एक और नहीं अनेका, सब विधि किया विचार विवेका।।

भूले ज्ञानी ध्यानी भेका, कोई न भरम लहे।।तेरी

तू प्रकाश है तू परछाँई, तू है परम तव तू झाँई।।

कैसे अस्तुति करू गोसाँई, सुध बुध भरम लहे।।तेरी

अनहित सहित सकल हितकारी, निराधार तू जगदाधारी।।

राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक चरन चहे।।तेरी

313. मुझे नाम मिला है धरनी धर।।

धरनी धर जी धरनी धर, मुझे नाम मिला है धरनीधर।।

बुन्द अवात गिरे गिर ऊपर, पड़े बरफ और पाला।।

सहे चोट मुख से नहिं बोले, परबत ऐसा हिमाला।।धरनीधर

माधु सहे कुटिल की वानी, चित चिंता नहीं लावे।।

स्तुति निंदा सम कर राखे, धीरज मन में बसावे।।धरनीधर

काम करू और मुख से न बोलू , काम में राखू प्रती।।

कथनी तज करनी लव लाऊ, मन घर प्रेम प्रतीती।।धरनीधर

साध स्वरमा सती तीन यह, त्यागे तन की आशा।।

मौज अधार जियें जग अन्दर, सहित उमंग हुलासा धरनीधर

धरनी धरे सकल का भारा, सिरपर चिंता त्यागी।।

तैसे सेवक रहे जगत में, राधास्वामी का अनुरागी।।धरनीधर

314. मुझे नाम का हीरा प्राप्त हुआ।।

प्राप्त हुआ जी हाथ लगा, मुझे नाम का हीरा प्राप्त हुआ।।

शब्द साखी कोई साधू परखे, और जौहरी हीरा।।

प्रेम प्रतीत कोई प्रेमी परखे, काछी ककड़ी खीरा।।

प्राप्त हुआ हीरा नाम रतन धन खानी, गुरु संगत मिल पाया।।

दुख दरिद्र नहीं मुझे सतावे, व्यापे काल न माया।।

प्राप्त हुआ वाद विवाद में उमर गंवाई, जीवन स्वाद न पाया।।

सतसंगत परताय महातम, घट में नाम धन पाया।।

प्राप्त हुआ बिन ग्राहक नहीं हीरा खोले, जौहरी चतुर सियाना।।

मूल बिना ग्राहक नहीं मिलता, जाने साध सुजाना।।

प्राप्त हुआ सुमिरन भज ध्यान घट डब्बा, नाम का हीरा राखें।।

सुरत शब्द अभ्यास कमाऊँ,राधास्वामी राधास्वामी भाख।।

प्राप्त हुआ

315. जिसे काल करम भरमाता है, उसे मायाजाल फँसाता है।।

जो आया है जायेगा एक दिन, यह जाने सब कोई।।

चिंता फिर क्यों तुझे सतावे, बुद्धि विवेक को खोई हँसाता है।

दिन से रात रात से दिन है, यह जग का व्यौहारा।।

एक दशा में कौन है रहता, ऐसा है संमारा।।

हँसाता है। दुविधा में फंस भूले प्रानी, नर जीवन को खोया।।

एकचित होय न सुख को पावे, अन्त पीट सिर रोया।।

फंसाता है। समझ बूझ कर गुरु की संगत, अब तो मूढ़ अज्ञानी।।

सांस सांस आयु है घटतो, तज दुविधा हैरानी।।

फंसाता है। सुमिरन भजन ध्यान को चित दे, वाद विवाद को त्यागी।।

राधास्वामी दया करेंगे, होजा प्रेम अनुरागी।।

फसाना है।

316. मन मगन भया बकवास गया।।

टेक। बकवास गया समवाद गया, शास्त्रार्थ गया पक्षपात गया।।

चैन कहां जहां नैन लड़े हैं, नेम कहां जहां प्रेम रहे।।

बुद्धि कहां जहां रूप पररव आई, झगड़ा जहां कहां क्षेम रहे मन

चिंता चित फिर धीर कहां, कहां औरत के मन चेत रहे।।

पक्ष के साथ में न्याय कहां, उपकार कहां जहां हेत रहे।।

मन तन मन कहां जहां भक्ति जमी, परमारथ में व्यवहार कहां।

जब परमतत्व की गम पाई, फिर तुमही कहो संसार कहां।।

मन और के होय आधीन जो नर, सुख सम्पत्ति निकट कहां आवे।।

चाहे ब्रह्मा वृहस्पति इन्द्र बने, मन भूल के शांति नहीं पावे।।

मन।।जब लोभ हो मन में तो लाज कहां, जब क्रोध तो धर्म का संग नहीं।।

राधास्वामी रंग जो धार लिया, फिर चढ़ता दुजा रंग नहीं।।मन।।

317. रह धरनी सुमिरो धरनीधर।।

धरनीधर है नाम गुरु का, बिरला कोई कोई माने।।

धरे जीव का भार सीस पर, सोई धरनीधर जाने।।

धरनीधर छोड़ कुसंगत कर सतसंगत, ज्ञान ध्यान चित लाना।।

दुविधा दुर्मति दूर हटाना, भव के फन्द न आना।।

धरनीधर घट का शुभ अधिकार जो जागे, संस्कार खुल खेले।।

तब तज धर को अधर सुधारे, चित से भरम को ठेले।।

धरनीधर भोग वासना छल चतुराई, कपट दम्भ नहीं व्यापे।।

माया काल भरम सब भागे, चिंता दुख न सतावे।।

धरनीधर अक्षत देह गुरु दर्शन पाया, घरपद धुरपद जाना।।

चढ़ा अधरपद गुरु के सहारे, राधास्वामी पद परसाना।।

धरनीधर

318. मेरे प्यारे भाई ले गुरु की शरनाई।।

भरम फाँस में मन उरझाना, नहिं सूझे कोई अपना बिराना।

भूला मोह मया मद माना, समझ न अब तक आई।।भाई ले

गुरु हैं तेरे तू है गुरु का, तू बालक गुरु पितु और माता।।

क्यों नहीं चरन कमल रहे राता, कैसे कहूँ समझाई।। भाई ले

छिन पल सुमिरन गुरु का नामा, चित पावे तेरा विश्रामा।।

त्याग मान अभिमान के कामा, चरन शरन हित लाई।। भाई ले

तेरा काम मौज से होगा, मौज अधीन भोग और जोगा।।

मौज को छोड़ सहे रोगा सोगा, मौज में तेरी भलाई।।

भाई ले तू रणवीर धीर रण सूरा, तेरा काम करे गुरु पूरा।।

हो रह चरन कमल का धूरा, राधास्वामी के गुन गाई।।भाई ले

319.सुरत प्यारी चित्त में धर अनुराग॥टेक॥

तू तो प्रेम की सच्ची मूरत, प्रेम का लिया सोहाग।।

तेरी महिमा क्या कोई जाने, तेरा बड़ा है भाग।।

सुरत बाहर जग से आंख बन्द कर, अन्तर जग में जाग।।

जागृत स्वप्न एक करले तू , सुन अनहद धुन राग।।

सुरत मूरख की बातों में मत जा, उनका मन्द है भाग।।

उनमें काल का विष तन व्यापा; काल है बिषधर नाग।।

सुरत सुख दुख करले सम मन अपने, चित में रहे बैराग।।

कमल नीर की रहनी सो है, ऐसी रहनी लाग।।

सुरत मन के घोड़े कर असवारी, मोड़ के उसकी बाग।।

राधास्वामी धाम सुरत नृत खेले, अद्भुत मंगल भाग।।

सुरत

320. माई तज दे जग की असा।।

नर जीवन है अगमापाई, जल के बीच बतासा।।

गलत देर नहीं लागे माई, सब परपंच तमासा।।

माई जो कोई बांधे आसा जग की, अन्त में रहे निरासा।।

किसकी आसा करे तू माई, असा वाला उदासा।।

माई पिंजरे तन में जीव का पंछी, बंधा प्रान के सांसा।।

सोस निकलते देर न लागे, निष्फल भोग बिलासा।।

माई छिन पल में सब जलेगा यह तन, ज्यों चिनगी से घासा।।

इस शरीर की कौन चलावे, जलें मेरु कैलासा।।

माई गुरु की दया साधु की संगत, आनन्द हर्ष हुलासा।।

राधास्वामी नाम को भज नित, माई सांसों सांसा।।माई

321. नहीं कोई बचा अवगुनी गुनी, ठगनी ने ठग लिये ऋषि मुनी।।

टेका। बनी मेनका बन में आई, बनबासी के भेषा।।

विश्वामित्र का भंग किया तप, पटक काम के देसा

नहीं शिव भगवान काम के बैरी, काम के हाथ फंसाने।।

मोहिनी रूप देख भये मोहित, बुद्धि न रही ठिकाने।।

नहीं। नारद भक्त शिरोमणि ज्ञानी, आदि ऋषि विज्ञानी।।

मोहे लक्ष्मी की सुन्दरता लख, बने मूढ़ अज्ञानी।।

नहीं। कहीं ज्ञान कहीं जप तप क्रिया, कहीं ठिठोल कहीं हांसी।।

माया हाथ में लेकर डोले, भूल भरम की फांसी नहीं दीनबन्धु

शिव दयाल गोसांई, गुरु अनाम अनाया।।

बचा शरन जो तेरे आया, राधास्वामी की दया नहीं

322. क्यों भूला तू प्यारे मग में, भरमा क्यों डाकू और ठग में।।

टेका। सतगुरु आये तोहि चितवन, दया से अंग लगाया।।

भवजल पार उतारन कारन, शब्द जहाज बनाया।।

हाँ मग मेंबड़े बने तो हुये कबीरा, नन्हे बने तो नानक।।

दोनों रूप बिसारा तूने, राधास्वामी आये अचानक।।हाँ मग में,

विद्या अविद्या फाँस हँसातू , द्वन्द जाल में उरझा।।

दुविधा दुचिताई के बन्धन, कैसे कहूँ तू सुरझा।।

मग में, मेरा कोई नहीं है अपना, सब स्वारथ के साथी।।

झूठे सुरव धन धाम बड़ाई, भूठे घोड़े हाथी।।

हाँ मग में कर सतसंग विवेक धार चित, सीखे शब्द मत रीती।।

सहज योग का सहज है साधन, धर मन में प्रतीती।।

हाँ मग में, सहज समांध अखंड सुन्न पद, घट में अघट का बासा।।

राधास्वामी की शरन में आज, कर सतलोक निवासा।।

हाँ मग में अजपा जाप सहज है साधन, साधन अनुभव जागे।।

बिन साधन अनुभव नहीं भाई, बिन अनुभव क्या माँगे।।

हाँ मग में कुछ दिन सतसंग कुछ दिन साधन, कुछ दिन मुक्ति बिलासा।।

बन्धन मुक्ति मानसिक लीला, कामी देख तमासा।।

मग में जाप मरे अजपा मर जाये, अनहद भी मर जाये।।

सुरत समानी शब्द में आकर, ताहि काल नहीं खाये हाँ

मग में नानक और कबीर की बानी, बिबिध अनेक सुनाई।।

चही अलाप अब नये ढंग में, राधास्वामी ने गाई।।हाँ मग़ में

323.माई सुख से जनम बिताओ॥टेक॥

सो सुख हैं गुरु चरन प्रेम में, नित गुरु के गुन गाओ।।

सुख नहीं जग प्रपंच में माई, सुख नहीं भोग विलासा।।

सुख है गुरु के प्रीति रीति में, नित आनन्द हुलासा।।

माई सुख नहीं मान बड़ाई दिखाये, सुख नहीं धन परिवारा।।

मुख है अन्तरवृत्ती जमाये, गुरु का ले के सहारा।।

माई मुख नहीं बाहर परबत बन में, सुख नहीं सैर तमासा।।

सुख है तेरे अन्तर माई, अन्तर कर जिज्ञासा।।माई

नित उठ गुरु की भजन बंदगी, नित गुरु संगत करना।।

घट में भजन हो घट में संगत, घट गुरु नाम सुमिरना।।

माई तेरे घट में गुरु बिराजे, गुरु सत चित आनन्दा।।

सो गुरु रूप है तेरा माई, ढूढ़ त्याग सब धन्दा

माई घट में पैठ बैठ कर पूजा, घट मन्दिर उजियारा।।

घट में पिंड ब्रह्मांड पसारा, घट में सुख विस्तारा।।

माई राधास्वामी सतगुरु दाता, घट में तेरे बिराजे।।

घट दर्शन घट सेवा संगत, घट सुन आनन्द बाजे॥माई

324. तू भूली भरमानी माई।।

जगत पिता तेरे घट में रहता, तू उसको क्यों भूली।।

जो उस पिता को चित से भुलावे, जग की सहे ठिठोली।।तू भूली

चिंता तज दे दुर्मति तज दे, तज दे तज दुचिताई।

मन में धार पिता की आसा, पिता से तेरी भलाई।।तू भूली

सच्चा स्वामी सदा सनेही, जनम जनम का संगी।

उसके रंग रंगी नहीं माई, होगई हाय कुरंगी।।तू भूली

पिता सहाई तेरा है माई, और की क्यों है आसा।।

जो कोई और की आस लावे; फंसे काल की फाँसा।।

तू भूली राधास्वामी समरथ दाता, छिन पल के रखवारे।।

चित देकर नित नाम का सुभिरन, रह रह उनके सहारे।।तू भूली

325. प्यारी प्रेम प्यार ले सीख।।

टेक प्यारी जब पति की हुई, सब जग करे पियार।।

आदर सुख सम्पति लहे, कहलावे बर नार।। प्यारी

अन्तर घट जब पीच बसे, मुख से क्यों ले नाम।।

पतनी को जब पीव भजे, तब पावे विश्राम।। प्यारी

एक पति का प्रेम चित, व्याप रहा घट माँह।।

पत्नी को अब दुख कहां, पति ने पकड़ी बांह।।प्यारी

नैन हमारे घर वने, पुतली पलंग समान।।

सेज बिछी पीव संग है, होगये सुक्ख महान।।प्यारी

एक पति तो पुरुष है, और पुरुष जग नांह।।

पत्नी पाले प्रेम पिउ, राधास्वामी करे निबाह।।प्यारी

326. पत्नी पतिव्रत धरम निबाह॥टेक॥

अपने पति की प्यारनी, जग की प्यारी होय।।

जो पति की प्यारी नहीं, दुख ग्रसित रहे सोय।।

पत्नी पत्नी तो पति की बनी, और का हिये में ध्यान।।

ताको इस संसार में, जीवन नरक निदान।।

पत्नी, पति बल अबला बली हो, पति सुख से सुख रूप।।

प्रेम पति को चित बसे, क्यों पड़े दुख के कूप।।

पत्नी एक तत्व के रूप दो, पति पत्नी के भाव।।

मिल जुल खेल जगत में, प्रेम प्रतीत प्रभाव।।

यत्ती, प्रीतम पति का अंग है, प्रेमी पत्नी भेस।।

अन्तर बाहर प्रेम रंग, प्यार प्रीति के देस।।

परनी पतिव्रता के एक है, कुलटा के दो चार।।

कुलटा नरकी जीव है, पतिव्रता वरनार।।

पत्नी सन्त पन्थ में आयकर, चल तू प्रीति की राह।।

प्रेम की दृढ़ता मन रहे, राधास्वामी हाथ निबाह।।पत्नी

327. पत्नी पति की ओर निहार।।

पति तेरे ब्रह्मा विष्णु हैं, पति सच्चे त्रिपुरार।।

रमा उमा का रूप तू , शारद सुन्दर नार।।

पत्नी अमला बिमला निर्मला, सो अबला क्यों होय।।

पति का बल ले चित्त में, सबला कहिये सोय।।

पत्नी शक्ति भक्ति संयुक्त बन, योन युक्ति मन ठान।।

बाहर भीतर पति दस, सहज सुमधि प्रमान में पत्नी

योग भोग पति संग है, जीवन मुक्त सदेह है।

पतिव्रता का रूप यह, पति से सच्चा नेह।।

पत्नी पति का सुमिरन पतिं भजन, पति का निसदिन ध्यान।।

यही सन्त मत पन्थ है, पुरुष का रूप ले जान

पत्नी पति मूरति गतिं चन्द्रमा, पत्नी चित्त चकोर।।

रात दिवस पति दरस है, दृटि पति की ओर।।

पत्नी परमारथ यौहार में, एक भाव मन रख।।

जनम सुफल कर आपना, राधास्वामी राधास्वामी आख।।

पत्नी

328. सजन प्रेम के सिंधु नहा टेका।

उठत तरंग विचित्र अद्भुति, नहीं कुछ जात कही है।

सुन्दर सुछवि स्वरूप सुहावन, शोभावन मा।।

सजन कोई बड़भाग गते मारे, प्रीति प्रतीति गहा हैं।।

गोते मार शांत चिंत होकर, भक्ति का मोती लहा

इसजनी भक्ति का मोती अमोल अारा, पावे सिंधु थहा है।

क्या पावे जो भाग का मन्दा, दुविधा धार बहा सुजन राधास्वामी दया से काम बनाया, जो सतसंग रहा।।

बिन सतसंग न बुद्धि मति शीतल,

त्रिधि अग्नि दहा सजन

329. सखी लख मानुष जनम का सार हटेका।।

भक्ति रीति के माग पग धर, चितु में प्रेम पियार है।

परमारथ का अर्थ साध ले, सुधरा रहे यौहार

पख पन्थ में आकर बन पन्थाई, पन्थ की डगर संभार।।

सतगुरु दयो भव निधि से तरजा, औरों को ले तार।।

सखी।।घट की खट पट मेट के सजनी, सुरत को कर सिंगार।।

सुरत को शब्द में सहज लगादे, राधास्वामी की बलिहार।।सखी

330. मन मगन भया तब क्या चहिये।।टेका।

आसा वासा चित्त न उपजे, शान्ती सहित मौन गहिये।।

राग बिराग ईष दुरमति, त्याग मुक्त रहिये।।

क्या चहिये देह गेह को नेह नहीं है, द्वन्द धार में क्यों बहिये।।

सार असार समझ बुझ तन, रूप को ठाठ बाट लहिये।।

क्या चहिये नहीं कोई शत्रु न मीत हमारा, बुरा भला किससे कहिये।।

योग ज्ञान जप तप और संयम, रूप अनि में सब दहिये।।

क्या चहिये ब्रह्मलोक सतलोक निवासा, किसको तजि किसको लहिये।।

काल चक्र के टूट गये हैं, पर पुरजे टुकड़े पहिये क्या चहिये

राधास्वामी सुफल नर देही, भव दुरव सुख अब क्या सहिये।।

जीतेजी निबन की सद्गति,जीवन मुक्ति की गति लहिये।।क्या चहिये

331.बिनती करुणा निधान कृपाल सतगुरु, प्रणतपाल महेश्वरम्।।

सतरूपे सतपद धार्म धुर, सत भाव सृत विश्वम्भरम्।।

दे भक्ति शक्ति मुक्ति युक्ति, तार लीजें दीन को।।

आया शरनागढ़ तुम्हारे, शरन दीजै हीन को।।

अति कठिन काल काल माया, जाल बन्धन में पड़े।।

हम जीव निबल समर्थहीन, सहते दुख संकट बड़े।।

नहिं बुद्धि समझे विवेक ज्ञान,न भक्ति ध्यान की सम्पदा।।

केवल तुम्हारी एक आस, भरोस रहती है सदा।।

नाम दीजे प्रम दीजे, दान् दीजे भक्ति का।।

धास्वामी अपना जन समझ कर, दया कीजे सर्वदा।।

332. मंगलम् मंगलम् अशब्द अरूप, शब्द रूप स्वामी।।

मंगलम् अलख अनाम, अगम नाम नामी।।

मंगलम् दीन बंधु, दीन नाथ दाता।।

मंगलम् अभेद भेद, आनन्द धन त्राता।।

महिमा अनन्त आदि, अन्त कौन गावे।।

भेद तेरा कौन जाने, कौन कह सुनाये।।

सन्त भेस प्रगट जगत, जीव को चिताया।।

काल कर्म फन्द काट, धुर ले पहुँचाया।।

प्रथम तत्व निज स्वरूप, पय कमल नमामी।।

गाऊँध्याऊँ रात दिवस, भजू राधास्वामी।।

333. चौथी धुन आस आस जीव बंधे, आस जम की फाँसी।।टेका।

आस ले निरास बने, चित्त से उदास बने।।

दुविधा सॉस सॉस बने, जग कराई हाँसी।।

आस आस जी कोई चाहे धन का दान, कोई माँगे मन का मान।।

कोई ज्ञान कोई ध्यान, अपनई रूप नासी आम आस जीव

बन्धन फेस मुक्ति माँगे, जोग जतन जुक्ति माँगे।।

भक्ति सिद्धि शक्ति माँगे, इरम तत्व आस आस

आस जी कोई भजे त्रिपुरार, कोई कृष्ण से पियार।।

गेई बुद्ध का बिहार, बसे पुरी काशी।।आस आस जब

लखे नाहिं अपना रूप, पड़े भव के द्वन्द कूप।।

सो नहीं प्रजा न भूप, माया विश्वासी।।आस आस जीव

खोल कहूँ माने नाहि, झगड़ा करे गह के बांह।।

नहीं ले गुरु पद की छांह, मीन जल में प्यासी।।आस आस जीव

राधास्वामी निज स्वरूप, अद्भुत अचरज अनूप।।

गोता मार तन के कूप, होजा सुखरासी।।आस आस जीव

334. मन के नाच सारे नाचे, ऋषि मुनि नर देवा।।

ऊँची नीची चाल चलें, द्वन्द जग की अग्नि जलें।।

दुविधा की गोद पलं, पावे नहीं मेवा।।मन के नाच।।

दुचिता पड़ बिपत सहें, भली बुरी बात कहें।।

सम चित कर नाहीं रहें, करें काल सेवा।।

मन के नाच॥ मन से बचे भक्त दास, सुख दुख की त्याग आस।।

राधास्वामी संग निवास, गुरु के नाम लेवा।।मन के नाच।

335. मनु मतवाला बना, रह रह कर नाचे।।टेक।

कबहूँ आनन्द हुलास, कबहूँ जग से निरास।।

कबहूँ होय उदास, दुविधा रंग राचे ।। मनवा मतवाला।

ऊचे चले विहंग चाल, नीचे डबे पताल।।

क्षण दुखिया क्षण निहाल, काम करे कांचे ।। मनवा मतवाला।।

राधास्वामी दीनबन्ध, काटो इस मन के फन्द।।

मिटे सकल कलह द्वन्द, दीन जीव बाचे।।मनवा मतवाला।।

336. मनुआ कुछ सोच समझ, दो दिन जग जीना॥टेक॥

अस से न प्यास बुझे, कैसे समझाऊँ तुझे।।

समझे तू नाहीं मुझे, रहे नित मलीना।।मनुआ कुछ

मुठी से बयार नावे, मिथ्या भव फसे आये।।

दुख से कलेजा कांये, सार तत्व से हीना।।मनुआ कुछ

सपना है माया खेल, सपना बिछोह मेल।।

सपना आनन्द केल, सत्त से विहीना।।मनुआ कुछ

फटा चित का जब आकास, कैसे न हो कोई उदास।।

सुई डोर नहीं पास, कठिन काम सीना।।मनुआ कुछ

पृथ्वी गगन दो हैं पाट, चलती चक्की का लाट।।

पिसे जीव करम डाट, समझ भेद झीना मनुआ कुछ

चहुँ दिस लगी है आग, भगते बने जल्द भाग।।

झूठा प्रपंच त्याग, हो न चित से दीना।।मनुआ कुछ

राधास्वामी सिंध ज्ञान, जीव बुन्द के समान।।

बुन्द सिंधु दशा जान, होजा जल मीना।।मनुआ कुछ

337. मनुआ तू कहा मान, चेत चेत बौरे।।

दाह जगत है उपाध, अन्तर वृती को बांध।।

सुरत शब्द जोग साध, अपने हेत बौरे।।मनुआ तू

करम धरम भूल भरम, कोई नहीं जाने मरम।।

कभी नरम कभी गरम, ध्यान देत बौरे।।मनुआ तू

अन्तर तेरे सुख हुलास, तू भटके झूठी आस।।

अपने घर को बिलास, क्यों न लेत बौरे।।मनुआ तू

सुरत शब्द परम योग, मंगल आनन्द भोग।।

भिटें सकल रोग सोग, भव का सेत बौरे।।मनुआ तू

बैरी है माया काल, फैसा इनके मोह जाल।।

चल चल सतगुरु की चाल, सीस रेत बौरे।।मनुआ तू

शस्त्र अस्त्र वस्त्र साज, रण भूमि दे पग आज।।

करले अपना आप काज, जीत खेत बौरे।।मनुआ तू

राधास्वामी परम सन्त, सृष्टि के आदि अन्त।।

देत तेहि सच्चा मन्त्र, संतमेत बौरे।।मनुआ तू

338. मनुआ चित हिये धार, सतगुरु की बानी॥टेक॥

काया माया छाया एक, तीनों भरम खानी।।

पकड़े नहीं आये हाथ, यतन योग हानी।।मनुआ चित

मिथ्या परपञ्च सारा, भ्रांति की निशानी।।

जो कोई भूल गया, अन्त पछतानी।।मनुआ चित

जागृत स्वप्न है समान, एक भाव जानी।।

सतसंग में बैठ बैठ, तज दे मन मानी।।मनुआ चित

पढ़ा लिखा सोचा समझा, आयु सब वितानी।।

अब तक नहीं समझा हाय, क्या कहूँ बखानी।।मनुआ चित

राधास्वामी नाम सुमिर, मन चित कर्म बानी।।

सत असत कर विवेक, रूप ले पिछानी।।मनुआ चित

339. गगन मंडल धूम मची, देखो सुरत मेला।।

टेक। घट की राह अधर चलो, चलने की बेला।।गगन मंडल

सुखमन का नाका तोड़, बंक नाल ठेला।। गगन मंडल

अंस बंस हंस पाँत, करत नित केला।।गगन मंडल

शब्द गुरु सुख समाज, संग सुरत चेला।।गगन मंडल

शंख ढोल झांझ बजत, सारंग धुन बेला।।गगन मंडल

राग रंग नाच देख, अद्भुत अति खेला।।गगन मंडल

अन्तर आनन्द लहो, वाह्य बिपत झेला।।गगन मंडल

जगत मोह आस फांस, काल को झमेला।।गगन मंडल

राधास्वामी दीनबन्धु, दया से देत हेला।।गगन मंडल

340. संगत कर गुरु की सखी, घट विवेक आवे।।

टेक। अमृत रस वचन भरे, मन आनन्द पावे।।संगत कर

ज्ञान ध्यान भक्ति सूझे, काल न सतावे।। संगत कर

योग युक्ति यतन मिले, भ्रान्ति भरम जावे।।संगत कर

चंचल मन अचल बने, बिकलतः नसावे।। संगत कर

राधास्वामी गुरु के गुन को, सांसों सांस गावे।। संगत कर

341. चल तू सुरत गगन ओर, त्याग जग की आसा।।

तिल को उलट ले दुरबीन, लख अजब तमाशा।।चल तू

अन्धकार मिटे सकल, प्रगटे परकाशा।। चल तू

अनहद धुन तूर बजे, आनन्द का बिलासा।। चल तू

पिंड और ब्रह्मांड त्याग, सतपद ले बासा।।चल तू

राधास्वामी धाम पाय, मेट जग की त्रासा।। चल तू

342. भक्तन के लाज काज, सतगुरु जग आये।।

साजा मंडल समाज, थापा भक्ति का राज।।

सुख सम्पत रहे गाज, आनन्द झर लाये।।

भक्तन के घट में बाढ़ी प्रतीति, उपजा मन प्रेम प्रीति।।

सीखी सुरत शब्द रीति, चरनन लव लाये।।

भक्तन के प्रगटा है सत का नूर, बाजा अनहद तूर।।

काल करम हुये दूर, ज्ञान गम्य पाये।।

भक्तन के काम क्रोध लोभ मोह, अहंकार दुर्मति द्रोह।।

माया ममता का मोह, चित्त न रहाये।।

भक्तन के राधास्वामी प्रेम रूप, अद्भुत अचरज अनूप।।

ज्ञान ध्यान ब्रह्म कूप, देखा हर्षाये।।भक्तन के

343. चेत चेत चेत अभी, चेत मेरे भाई।।टेका।

राह से कुराह भया, भूला भरमाना।।

कहां बसे कहां नसे, ठौर ना ठिकाना।।

चेत चैत संगी नाहिं साथी नाहिं, कोई ना सहाई।।

ताक में हैं चोर डाकू, कोई ना सहाई।।

चेत चेत सोया सो पू जी खोया, पू जी खोय रोया।।

फल पाया आप बुरा, जैसा बीज बोया।।

चेत चेत वह तो नहीं तेरा देस, देस है बिगाना।।

यहां सब बेगाने बसें, कोई ना येगाना।।

चेत चेत गुरु ने उपदेश दिया, और मुझे चिताया।।

संत पन्थ धार हिये, कटे मोह माया।।चेत चेत

लूट पड़ी लूट ले, बचाले धन अपना।।

सह न काल कर्म चोट, सोधले मन अपना।।

चेत चेत राधास्वामी संत रूप, तेरे हैं सहाई।।

उनकी ओर ध्यान लगा, ले चरन शरनाई।।चेत चेत

344. नाम सुमिर प्यारे भाई, नाम में भलाई।।

नाम काम क्रोध मारे, नाम कष्ट बिपत टारे।।

नाम पतित जीव तारे, नाम है सुखदाई।।नाम सुमिर

नाम ज्ञान नाम ध्यान, नाम भक्ति मुक्ति खान।।

नाम शक्ति है महान, सुमिर लव लाई।।नाम सुमिर

तीरथ बरत जप को छोड़, भर्म मोह नाता जोड़।।

चित को नाम से ले जोड़, सहज नाम गाई नाम सुमिर

भाव हो चाहे कुभाव, नाम ही से मन लगाव।।

यही सच्चा है उपात्र, काम ले बनाई।।नाम सुमिर

आँख कान होंठ बन्द, नाम सुभिर मेट द्वन्द।।

काट काल कर्म फन्द, सतसंगत जाई।।नाम सुमिर

नाम का समाज साज, नाम करे पूरा काज।।नाम सुमिर

सुमिर आज, क्या है कठिनाई नामसुमिर

राधास्वामी नाम ज्ञान, नाम शब्द और प्रमान।।

अंतर भज घट में आन, बिगड़ी ले बनाई नाम सुमिर

345. ठुमक चली गगन मंडल, सुरत झीनी झीनी।।

जब लग नहीं झीनी होय, शब्द जोत जाय स्वोय।।

सुन्न की समाधि सोय, तत्व कैसे चीन्ही।।ठुमक

माया मोह दिया त्याग, चित गये द्वेष रम्ग।।

जागा सोया सूक्ष्म भाग, नहीं अब मलीनी ठुमक

सहस कमल सहस जोति, सहस ज्योति लखी सोत।।

लख लख सुरत मगन होत, शब्द की अधीनी।।ठमक

घन्टा शंख नाद सुनी, अवगुन तज भई गुनी।।

अनहद धुन सहज धुनी, छांट ताहिं लीनी।।ठुमक

आगे चढ़ी ओंकार, त्रिकुटी त्रय गुन विचार।।

गुरु के संग किया ध्यार, सच्ची श्रुति लीनी।।युमक

सुन्न ब्रह्मरेन्द्र गई, सुन्दर छबि खान भई।।

सारंग धुन शब्द मई, समता चिंत भीनी ठुमक

तीनों पद त्याग दिया, चौथे पद नाम लिया।।

भवर में सत में वास किया, राधास्वामी चीन्ही।।ठमक

346.थिक थिक मेरी सुरतिं नाचे, नाच हैं रंगीला।।

गगन मंडल झूम चली, अचरज लख लीला।।थिक थिक

गुरु का रंग धार हिये, होगई रंगीला।।

सज धज से सजीली बनी, मिल गया सजीलो।।थिक थिक

शब्द सुनत जोति लखत, छबि सहित छबीला।।

घट सुख आनन्द पाय, निसदिन हर्षीला।।थिक थिक

बिजली सम दमक रही, रंग दमकीला।।

तारा बन उड़ी गगन, चकित चमकीला।।थिक थिक

राधास्वामी संग पाय, लाल नहीं पीला।।

शीलवन्त प्रेमवन्त, सूरत सुशीला।।थिक थिक

347. राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाइये॥टेक॥

माया से नाता तोड़, काल कर्म सीस फोड़।।

गुरु चरनन चित्त जोड़, और सब भुलाइये।।राधास्वामी

त्याग जग के द्वेष राग, आसा तृष्णा से भाग।।

गुरु चरनन नित जाग, भक्ति युक्ति पाइये।।राधास्वामी

झूठे सब धाम ठाम, झूठे धन और दाम।।

साँचा राधास्वामी नाम, उससे लव लगाइये।।राधास्वामी

348. नाम सुमिर नाम सुमिर, गुरु पर बलि जाना।।

झूठ जगत छोड़ भाग, सत पद से रहा लाग।।

जागा आज सोया भाग, हित चित हरषाना।।नाम

मैं तो सब बिधि मलीन, भक्ति भाव से विहीन।।

देखा सतगुरु ने दीन, नाम दिया दाना।।नाम

चला प्रेम प्रीत चाल, मन बानी बहे दोङ बेहाल।।

सतगुरु ने किया निहाल, उपजा सत ज्ञाना।।नाम

उमंग बढ़ी भक्ति धार, जाका नहीं वार पार।।

त्याग दिया जग असार, छूटी आना जाना।।नाम

नाम का महातम जान, अरपा तन मन प्रान।।

राधास्वामी लगा ध्यान, पाया निरवाना।। नाम

  1. चेतो मेरे बन्धु मीत, अवसर शुभ पायो।।
    टेक। इस जग से होत हान, तजो काम क्रोध मान।।
    लागे नित गुरु का ध्यान, मन को ठेरायौ।।
    चेतो। दिन में जग का व्यवहार, रात सोया तन को हार।।
    दोनों खोया गॅवार, चित न चेत आयो।।
    चेतो बाल पना खोया खेल, तरुणाई तिरिया से मेल।।
    बूढ़ेपन कष्ट झेल, सतगुरु विसरायो।।
    चेतो दो दिन की लोक लाज, दो दिन का जग का काज।।
    दो दिन का सुख समाज, नित ना रहायो।।
    चेतो कुल कुटुम्ब झूठे मीत, उनको क्यों देते चीत।।
    ले प्रसाद गुरु का सोत, बन्धन कटवायो।।
    चेतो राधास्वामी चरन शरन, नाम का हो श्रवण मनन।।
    सुमिरन और ध्यान भजन, कर अब लव लायो।।
    चतो
  2. नाम सुभिर नाम सुमिर, नाम सुमिर भाई॥टेक॥
    झूठा सब जगत काज, भूठे हैं लोक लाज।।
    झूठों का जुड़ा समाज, झूठा बंधु भाई।।
    नाम नाम ही हैं साँचा काम, साँचा है गुरु का नाम।।
    नाम ही जप आठों याम, नाम से भलाई।।
    नाम चहुँ दिस लागी है आग, भागत वने उठ भाग।।
    मोह नींद से तू जाग, ले सतगुरु शरनाई।।
    नाम राधास्वामी कमल चरन, हित चित से धार शरन।।
    मन में लगी सच्ची लगन, गुरु ही सुखदाई।।नाम
  3. मन में गुरु रूप बसा और सब भुलाया।।
    टेक। सतसंग बैठ बैठ, सार वस्तु पायो।।
    गुरु सम नहीं देव कोई, ऋषि मुनि मिल गया।।
    गुरु मिले काम बना, भव भय बिसराया।।
    मन में उलट नाम सुरत साध, सुमिरन दिलवाया। घट के पट को खोल दिया, दरशन करवाया।।
    मन में सहस कमल ज्योर्ति प्रगट, घंटा बज वाया।।
    ओम शब्द गुरु को मंत्र, त्रिकुटी जप पाया।।
    मन में राधास्वामी दीनबन्धु, अंग से लगाया।।
    अब तो भयो मन निर्चित, पाये चरन छाया।। मन में

352.बिनती गुरु मध्य आदि अनंत अद्भुत, अमल अगम अगोचरम्।।
विभ्र विरजपार अपार निगुन, सगुन सत्य विश्वेश्वरम्।।
जेहि मति लखे नहिं गति लखे, यह शुद्ध तत्व बिचार है।
जो चरन कमल की ओट आया, भव से बेड़ा पार है।।
गुरु विष्णु मूरत शिव की सूरत, गुरु को ब्रह्मा जान तू।।
गुरु ब्रह्म है परब्रह्म हैं, यह सोच समझ के मान तू।।
कर गुरु की संगत रात दिन, नर जनम अपना सुधार ले।।
दे फेक माया बोझ सिरसे, यम का सीस न भार ले।।
सीस दे तन मन को दे, गुरु भक्ति रतन अमोल ले।।
राधास्वामी भेद बताया तुम को, हिये तराजू तोल ले।।

353.स्तुति नाम दान प्रदान कीजे, गुरु दीन दयाल।।
यरन का नित ध्यान सुमिरन, चित न व्यापे काल।।
सर्व समरथ सर्व अंग संग, सर्व जगत अधार।।
शुद्ध मन से पद कमल को, करू निस दिन प्यार।।
सिंधु भव अति अगम दुस्तर, सूझे बार न पार।।
विकल मन रहे सोच छिन छिन, कैसे जाऊँ किनार।।
दया कीजे मेहर कीजे, लीजे चरन लगाय।।
भक्ति दीजे तार लीजे, कीजे मेरी सहाय।।
शब्द में रत रहूँ पल पल, सुरत पावे चैन।।
राधास्वामी दया सागर, भजू मैं दिन रैन।।
पांचवी धुन

354.धोबिया प्रगटा जग में सजनी, लीजो चूनर धुलाय।।
जनम जनम की मैली चुनरिया, देखत जिया घबराय।।
धोबिया काम क्रोध कीचड़ लपटानी, दुरगंध बास बसाय।।
धोबिया धोबिया आया चतुर सियाना, अवघट घाट सजाय।।
धोबिया कर्म की भट्टी तप की अग्नी, ज्ञान का साबुन लाये।।
धोबिया सतसंग शिला पे मल मल धोबे, चूनर मैल भराये।।
धोबिया फटे न बेगड़े सूत न बिखरे, सहज ही साफ कराय।।
धोबिया राधास्वामी धोबिया न्यारा, शब्द का रंग दिलाय।।
धोबिया

  1. घट में परगट अनहद धुन की, अव तो नई निराली तान।।
    बिना बोल के राग अनोखा, मीठा मधुर महान।।
    घट में तार टूटे सुर नहीं बिगड़े, ताल सुहेल सुहान।।
    घट में चंचल मन भया सहज में निश्चल, सुन, सूरत के कान।।
    घट में नर देही को सुफल कराया, छूट गया मद मान।।
    घट में जब से सुनी अनाहत की गत, आप भयो कल्यान।।
    घट में सुरत शब्द का सुगम है साधन, करे तो पावे जान।।
    घट में राधास्वामी भेद बतावे, शब्द सुरत का गान।।
    घट में

356.आई वर्षा की ऋतु सजनी, करले मचल मचल स्नान।।
टेका। गगन बूद की झड़ियां लगीं, रिमझिम रिमझिम आन।।
आई चमके बिजली गरजे अकासा, छाई घटा महान।।
आई बिन जल निर्मल बदरा बरसे, परखे साधु सुजान।।
आई नहीं मीठा नहीं खारा पानी, अमृत रस की खान।।
आई। सुरत शब्द की वर्षा न्यारी, घट परगट दरसान।।
आई न्हाय धोय तन मैल छुड़ाले, करले शान्त जिव प्रान।।
आई राधास्वामी गावे हित से, राग मल्हार की तान।।आई

  1. मेरा मनुआ भया रंगीला, गुरु का रंग हिये में धार।।
    त्याग रंग मोह मद को सब, परचित प्रेम पियार।।
    मेरा लाली लाली अखियां भई मतवाली,सूझा सार असार।।
    मेरा दुर्मति भागी चिंता त्यागी, लगा लगन का तार।।
    मेरा मस्ती आई रंग जमाई, छोड़ा नव को द्वार।।
    मेरा दसवे दर का पाट खुलाया, निरखी विमल बहार।।
    मेरा सुन्न में सहज समाधि रचाई, मन की ममता मार।।
    मेरा राधास्वामी खेल खिलाया, छूट गया संसार।।
    मेरा 358.आया सावन का महीना, झूलें सखियां मिल जुल आय।।
    टेका। गगन मंडल में पड़ा हिंडोला, अधर ध्वजा फर्राय।।
    आया सूर्य चांद के गढ़े खम्भ दो, शब्द की डोर बंधाय।।
    आया सुरत निरत की चतुर सहेली, प्रेम के पेंग बढ़ाय।।
    आया गावे गीत सुहानी धुन के, हिया जिया चित उमगाय।।
    आया तन मन की सब सुध बुध बिसरी, अंतर वृत्ति जमाय।।
    आया रिमझिम रिमझिम रिमझिम बदरा, बरस बरस बरसाय॥
    आया बिजली चमके जोत प्रकाशे, दादुर शोर मचाय।।
    आया भीज रही तन मन की चुनरिया, भक्ति बद रस पाय।।
    आया राधास्वामी झुलाचन आये, शब्द का योग बताय।। आया
  2. सजनी चलो बाग में पी के, आई सावन की बहार।।
    हरी भरी क्यारी लगे सुहावन, फुले फूल अपार।।
    सजनी कहीं जूही कहीं बेला चम्पा, कहीं केतकी अनार।।
    सजनी कमल खिले भंवरा मंडलाने, बिगसे हार सिंगार।।
    सजनी पिया के गले प्रेम से डालो, गूथगूथ के फल के हार।।
    सजनी बरसे मेह अखंडित धारा, चहुँ दिस बहे बयार।।
    सजनी काली काली घटा गगन में छाई, सूझे बार न पार।।
    सजनी रह रहकर नभ चमके बिजली, भीनी भीनी बरसे
    फुहार सजनी उमड़ उमड़कर सब बह निकले, सागर नद नदी नार।।
    सजनी बिरह तपन की आग बुझाओ, कर पी का दीदार।।
    सजनी भाग जगे अवसर शुभ पाया, यह नहिं बारम्बार।।
    सजनी घुमर घुमर राधास्वामी परिकरमा, गाओ राग मलार।। सजनी
  3. कांटा लगा विरह का हिय में, मेरा सिसक सिसक दम जाय।।
    टेक जल बिन मछली चैन न पावे, तड़पे और अकुलाय।।
    कांटा स्त्रांति बूद बिन पपीहा तरसे, पी पी रटन लगाय।।
    कांटा कमल की चाह में रसिया भंवरा, घुमर घुमर मंडलाय।।
    कांटा तैसी दशा है मेरी सजनी, मैं क्या करू उपाय।।
    कांटा पिया बिन हिया जिया मेरा तड़पे, छिनभर चैन न पाय।।
    कांटा बिरह अग्नि की ज्वाला भड़की, तन मन सब सुलगाय।।
    कांटा पिया मिले तो पीर मिटे यह, प्रेम की औषधि लाय।।
    कांटा जगत अंधेरा दृष्टि में मेरे, पिया बिन कोई न सुहाये।।
    कांटा राधास्वामी मेहर करें जब, तब बिगड़ी बन जाय।।
    कांटा

361.मैं हूँ गुरु का भोला बालक, निस दिन खेलू प्रेम को खेल।।
टेक। बायें हाथ परतीत की गोली, दायें प्रीति गुलेल।।
धांय धांय मद मोह को मारू, काल का नहीं दबेल।।
मैं हूँ माया की रनभूमि पैठि कर, रन से करू कुलेल।।
बांका राजपूत बन नाचू, बैरी दल को ठेल।।
मैं हूँ राधास्वामी सतगुरु पाया, सीस चरन में मेल।।
मेरा काज हुआ अब पूरा, जग दुख आपत झेल।।मैं हूँ

362.मैं तो चला गुरु के पन्थ, प्रेम परतीत से धरकर पांव।।
टेका। परवत कठिन विकट मैदाना, नहीं कहीं शरन न छांव।।
घाटी अटपट टेढ़ा मारग, केहि बिधि मारग जांच।।
मैं तो काम सिंह को बन में मारा, दियो न क्रोध को ठाँव।।
भक्ति युक्ति को शस्त्र निराला, महिमा केसे गांव।।
मैं तोप्रेम दात सतगुरु ने बख्शा, निज बल का निज दाँव।।
दुर्गम दास ने घाटी तोड़ी, ले ले राधास्वामी नाँव।।
मैं तो

  1. जिसके मने नहीं चिंता व्यापे, जग में वही हैं दास फकीर।।
    अभय रहे चित गुरु पद राखे, धीर वीर गम्भीर।।
    शांत भाव व्यवहार परमारथ, कभी न हो दिलगीर।।
    जिसके अपन पर न उर में साले, लखे पराई पीर।।
    पर की पीर न जिसे सतावे, सो अधरम बे पीर।।
    जिसके अपना रूप संभाले पल पल, काट मोह जंजीर।।
    यह फकीर है गुरु को प्यारा, महावीर चित धीर।।
    जिसके चाह गई चिंता सब भागी, आया भव निधि तीर।।
    हंस रूप धर त्याग नीर को, गह लिया ज्ञान का क्षीर है।
    जिसके राधास्वामी गुरु का सच्चा बालक, पहर विराग का चीर।।
    तन के रहते मुक्ति विही, सहे न द्वन्द शरीर।।जिसके

364.मैं हूँ भोला भाजा बालक, गुरु की गोद रहूँ दिन रात।।
चिंता जग की मुझे न व्या, हरष हुरष हरषात।।
बोझ उतारा काल का सिरसे, मन्द मन्द मुस्कात।।
मैं हूँ। बाहर भीतर लख गुरु मूरत, चित्त में रूप बसात।।
गुरु गम निरख परख कर हरख, दुख मन में नहीं आत।।
मैं हूँ। गुरु मेरे भाई सगे सगाई, गुरु मेरे पितु मात।।
गुरु सम्बन्धी मीत पियरे, गुरु का सिर पर हाथ।।
यक रस,जीवन समय बिताऊ, क्या जाड़ा बरसात।।
गुरु की शरन मिली अति कृपा, गुरु ही जात और पाँत।।
मैं हूँ राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, दिया प्रेम की दात।।
अब तो सुफल भई नर देही, काल करे नहिं घात।।
मैं हैं।

365.आयो देखन जग को मेला, धरे गुरु चरनन में परतीत।।
रमा उमा गायत्री सारद, नाचे गा गा गीत।।
काल चक्र का पड़ा हिंडोला, दृश्य महा रमनीत।।
आया पुरुष प्रकृति ने सभा रचाई, खेलें हार और जीत।।
करम हाथ से पाँसे डारे, अनूकूल, विपरीत।।
आया। सुरत गोट चौरासी घर में, दौड़ दौड़ भय भीत।।
कभी पक्की कभी कच्ची बन बन, पिटें खेल की रीत।।
आया गुरु के संग मिल नाता जोड़ा, खा खा भक्ति का सीत।।
मार धाड़ से बचकर निकला, होगया सहज अतीत।।
आया। सहज सहज में बन्धन काटे, सीख शब्द की रीत।।
। राधास्वामी दया से काज बनाया, दे चरनन में चीत।।आया

366.शम दम साधन करले प्यारी, अवसर अच्छा पाया आज॥टेक॥
चित को रोक रोक मन इन्द्री, सहज प्रेम दल साजे।।
भक्ति युक्ति आनन्द विलासा, अन्तर जुड़े समाज।।
शम दम सुरत शब्द का साधन सीधा, कर मन मुकुर को माँज।।
ऊँचे चढ़ निज रूप परखले, द्वन्द पसार से भाज।।
शम दम सहस कमलदल त्रिकुटी आजा, सुन में रारंग गाज।।
भंवर सोहंगम बजाले बंसी, सत पद को ले राज।।
शम दम राधास्वामी भेद बतावे, सन्तों के महाराज।।
चरन कमल की छाँह में आजा, करले अपना काज।।
शम दम

367.आया तन की अयोध्या नगरी, करले तू अब अपना काज।।
दशरथ दस इन्द्री का कुल है, इन्द्री विषय तज भाज।
बन में जप तप योग का संयम, प्रेम का जोड़ समाज।।
सत तम रज वानर रिंछ निश्चर, मंगल दल नित साज।।
लंका गढ़ माया विस्तारा, आग लगा दे आज।।
आया सीता सती सत्य की वृती, लेकर अवध का राज।।
राधास्वामी भेद बताउँ, सन्तों के सिरताज।।
आया

368.उत्तम पुरुष वही है जग में, चले जो प्रेम प्रीत की राह।।
आसा तृष्णा मोह माया तज, चित न उठावे चाह।।
काम क्रोध मद दूर निकाले, चिंता भव की दाह।।
उत्तम सुरत शब्द का साधन सीखे, मन में दूध न डाह।।
घट में अन्तर विरती जमावे, भक्ति का परन निबाह।।
उत्तम राधास्वामी राधास्वामी मुख से भाखे, अपना भाग सराह।
लगन लगे दुख आपत नासे, ले गुरु चरन पनाह।।

369.मनसा होगी तेरी पूरी, मन से करले गुरु का ध्यान।।
टेका। मूल नाम गुरु नाम हैं, मूल रूप गुरु रूप।।
मूल भजन गुरु शब्द् का, गुरु निवनि के भूप।।
गुरु की प्रीत हिये में धार, मिलेगा तब सच्चा गुरुज्ञान।।
मनसा तीरथ में है पत्थर पानी, व्रत में कठिन कलेश।।
बाद विवाद से मन हो चंचल, तत्व गुरु उपदेश।।
करे जो गुरु की संगत मानीं, वह फिर पड़े न भव की खान।।
मनसा गुरु विष्णु गुरु शिव की मूरत, गुरुको ब्रह्मा जान।।
गुरु ब्रह्म गुरु परब्रह्म है, अपनी बुद्धि पिछन।।
गुरु की भक्ति सब का सार है, और सब भरम अज्ञान।।
मनसा भटक भटक कर भटका जग में, भट का बारम्बार।।
जाके मन में अटक समाना, जाय न झव के पार।।
तू सोच समझ चित धार, बात यह सांची मन से मान।।मनसा
राधास्वामी सतगुरु पूरे, धरा सन्त अवतार।।
सुरत शब्द मत योग बताया, सार सार का सार।।
बिन गुरु भक्ति ज्ञान नहीं पावे, सब संतन ने किया बखान।।मनसा

370.सब आये आप ही आप हाथ में, पकड़ लिया जब मूल।।
पात पात को सींचते, पेड़ को दिया सुखाय।।
जो कोई सींचे मूल को, आप पेड़ हरियाय।।
ले मूल सीख यह मन्त्र, न यह उपदेश गुरु को भूल।।
पात पात का निरखना, अज्ञानी व्यवहार।।
ज्ञानी परखे मूल को, फल पावे तत सार।।
सोच यह मन में अपने जल्दी, मिटे द्वन्द का सूल।।
गुरु के नाम को सुमिरकर, नाम और विसराय।।
गुरु रूप का ध्यान कर, मोह भरम नस जाय।।
भजन कर शब्द योग चितलाय, सहे नहीं फिर यम का त्रिसूल।।
एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।।
एक से सब कुछ होत है, एक से प्रेम लगाय।।
ले पहर भक्ति का चीर, फेंककर सब माया के भूल।।
सब राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाय।।
राधास्वामी सुमिर मन, हिये गुरु रूप बसाय।।
लगा घट बाग में आम का पेड़, न बो तू कीकर और बबल।।

  1. बंसी धुन सुन राधा प्यारी, चल चल राधास्वामी स्थान।।
    भंवर गुफा में बजी बांसुरी, सोहंगम सुर तान।।
    मन से दूर निकार विकारा, मोह मया मद मान।।
    बंसी तेरा भाग जगा गुरु किरपा, भया जनम कल्यान।।
    नर देही अब सुफल भई है, मिटगंई विपत महान।।
    सुमिरन भजन से ध्यान रहे नित, धर सतगुरु का ध्यान।।
    ऊँचे चढ़ तज पृथ्वी मंडल, मिल गया शब्द विमान।।
    बंसी यह जग समझ रैन का सपना, छिन भर थिर न रहान।।
    सांस सांस जप नाम गुरु का, भक्ति भाव हिये आन।।
    बंसी राधास्वामी समरथ दाता, दिया नाम का दान।।
    नाम रतन धन प्रगटा घट में, धन दौलत की खान।।बंसी

372.चिंता चित से तज दे सारी, सतगुरु करेंगे तेरी सहाय।।
सुमिरन भजन ध्यान चित देना, जग में सुयश कीरती लेना।।
भक्ति महातम प्रभाव को चीन्हा, सुख आनन्द घट पाय चिंता
क्यों दुख पाता क्यों घबराता, सतगुरु तेरे हैं पितु माता।।
जो कोई चरन शरन में जाता, उसे वह लेंगे बचाय।।
चिंता राधास्वामी साँच हैं रखवारे, रह तू उनके चरन सहारे।।
सुन यह सांची बात को प्यारे, अपना मन समझाय।।
चिंता

373.मन मतंग बलवान है तेरा, जुगती जतन से उसको जीत।।
मन चंचल है मन है भोगी, मन ही बना है रोगी सोगी।।
अब इस मन को बनाले जोगी, धार ले सुरत शब्द की रीत।।
मन जो चंचल है वही है निश्चल, मेंटदे उसकी अब तू हलचल।।
संशोधन कर पंथ में चल चल, सीखले भक्ति प्रेम प्रतीत
मन मन की निंदा कभी न करना, सरपर कष्ट का भार न धरना।।
कमलपत्र सम भवनिधि तरना, गुरु के नाम का गाना गीत।।
मन सतसंगत जब आया प्रानी, अब नहीं उसकी होगी हानी।।
नित सुन चित से गुरु की बानी, खाकर जिये प्रसादी सीत।।
मन राधास्वामी गुरु ने बिधि बताई, इस विधि से कर अपनी भलाई।।
अब तो तेरी सहज बन आई, कर उनके चरण में प्रीत।।मन

374.सब हैं जाने वाले जग में, रहने वाला कोई नहीं।।
रामचन्द्र अवधेश भुवाला, दीनानाथ दीन प्रतिपाला।।
गये त्यागकर धर्म रटाला, रमने वाला कोई नहीं।।
सब रावण गया बुद्धि बल शीला, साहस उद्यम में फुरतीला।।
छैल छबीला रंग रंगीला, थमने वाला कोई नहीं।।
सब सोलह कला कुण औतारा, जिनकी गति को चार न पारा।।
गये सहित कुल और परिवारा, रुकने वाला कोई नहीं।।
सब परसराम क्रोधी अभिमानी, तेजस्वी बल बुद्धि की खानी।।
ऐसे गये न नाम निशानी, टिकने वाला कोई नहीं।।
सब मच्छ कच्छ बाराह पसारा, मिट गये जाने सब संसारा।।
गये छोड़ माया विस्तारा, बसने वाला कोई नहीं।।
सब बावन बलि सहस्राबाहू, नर भूषण नरेश नर नाहू।।
सहसह गये ताप त्रय दाहू, बचने वाला कोई नहीं।।
सब विश्वामित्र अगस्ते वशिठा, गौतम न्याय शास्त्र का सृष्टा।।
कपिल तत्व के दृष्टि का दृष्टा, गुनने वाला कोई नहीं।।
सब दुरयोधन दिल्ली का राजा, जिसने भारत दल को साजा।
चला त्यागकर सकल समाजा, सुनने वाला कोई नहीं।।
सब राधास्वामी संत शिरोमणि आये, दे चितावनी जीव चिताये।।
सुरत शब्द मत पन्थ चलाये, चलने वाला कोई नहीं।।सब

375.जब तू हुआ गुरु का सेवक, गुरु को हरदम तेरा ध्यान।।
जो कोई आया शरन गुरु के गुरु उसके रखवारे।।
उसको करना धरना क्या है, रहे गुरु के सहारे।।
सतगुरु दाता आप करेंगे उसका, सोच समझ कल्यान।।जब तू
प्रेम प्रीति परतीत सहज है, क्या जाने संसारी।।
यह तो जाने कोई गुरुमुख, गुरु को आज्ञाकारी।।
सतगुरु बख्शेगे निज किरपा से, उसे भक्ति युक्ति का दान।।जब तू
जो गुरु के हैं गुरु उनके हैं, गुरु को दास पियारा।।
गुरु सेवक के आंख के तारे, सेबक गुरु का दुलारा।।
कैसे होगा कभी जगत में, गुरु के सेवक को कुछ हाने।।
जब तू दास दुखी तो गुरु दुखी है, वह सुखिया गुरु सुखिया।।
दास की चिंता गुरु को रहती, वह सब में है मुखिया।।
सेवक बनेगा एक दिन भक्त शिरोमणि,ज्ञानी चतुर सुजान।।
जब तू यह कहता हूँ सच्ची बानी, गुरु को प्यारा दास।।
ऋद्धि सिद्धि नौनिधि गुरु दंगे, मुक्ति न छोड़े पास।।
राधास्वामी सिंधु रूप, और सेवक बुन्द समान।।जब तू

376.मारग चलो मुसाफिर सोच समझकर, बैठे होय अकाज।।
जो चलते हैं गिरते पड़ते, पहुँचेंगे निज धाम।।
जो बैठे हैं सुस्त अपाहिज, सो समझो बेकाम।।
उनसे कुल सृष्टि करती है, सदा शरम और लाज।।
मारग लड़का गिरा उठा फिर संभला, संभल भया बलवान।।
अब तो आई देह में शक्ति, सहज में हुआ जवान।।
तू भी आलस छोड़ किया कर, निसदिन अपने जन्म का काज।।
हाथ में हाथ धर क्यों बैठा, पन्थ में आजा भाई।।
पंथाई हो सत के मारग चल, ले गुरु की शरनाई॥
हो जावेगा निस्संदेह, राजा परजा का सिरताज।।
मारग करम सहज है करम कठिन है, समझ समझ की बात।।
जो समझे सो काम बनावे, अनसमझा पछतात।।
करम करो हित चित से अपना, करम साज दल साज।।
कथनी बदनी छोड़ के प्यारे, करनी से लव लाओ।।
करनी से रहनी पावेगा, यह है ठीक उपायो।।
संदेसा दिया जानकर तुझको, सतगुरु राधास्वामी महाराज।।मारग

  1. भूला झूलू गगन में चढ़ कर, आई बरखा की बहार।।
    भव के मध्य में पड़ा हिंडोला, ज्योत के पवन से ले झकझोला
    भक्ति पंग से खाये झकोला, झूली झूल अपार।।
    भूला रिमझिम रिमझिम बदरा बरसे, नन्हीं फुहार गिरे ऊपर से।।
    पिया के दरस को जिया मेरा तरसे, रहुँ नित मन को मार।।
    भूला बिजली चमके गरजे अकाशा, चित उपजावे नई नई आशा।।
    चरन कमल में अब मिले बासा, तन मन चित बुद्धिवार।।
    भूला नभ में दिया मैं पृथवी वासी, इस चिंता से सदा उदासी।।
    कब देखें प्रीतम सुखरासी, बिरह बिपत सच टार।।
    भूला उड़ चल मेरा शब्द हिंडोला, होजा होजा उड़न कठोला।।
    उड़ उड़ जैसे उड़े ममोला, चल पिया के दरबार।।
    भूला लाली लाली दशा दृटि में आवे, देख देख हिया जिया रस पावे।।
    दुर्मति दुर्गति ममता जावे, पाऊँ पद ओंकार।।भूला ।
    राधास्वामी राधास्वामी रास्वागाऊँ,रास्वारास्वा ध्याऊँ।
    राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी पाऊँ,सुन सुन राग मल्हार।भूला बन्दनम्।।

378.चरन शरन की बन्दना, नित कोई और न काम।।
गुरु बसो चित आये मेरे, बख्श दो निज नाम।।
तेरी शरनागत हुआ फिर, किसकी राखू आस।।
आसा तो तेरी दया की, जग से रहूँ उदास।।
रूप ध्याऊँ नाम गाऊँ, शब्द राता मन।।
आठों याम तेरा हीं सुमिरन, भाग मेरा धन।।
सीस पर निज कर कमल धर, लिया चरन लगाय।।
पतित पापी तर गया, गुरु शरन तेरी आय।।
मुक्ति की नहीं चाह मन में, भक्ति प्यारी लागे।।
राधास्वामी की दया से, भाग पूरन जाग।।

379.प्रार्थना नम सद्गुरुम्, सच्चिदानंद रूपम्।।
नमो अद्रुतम्, अद्वितीयम् अनूपम्।।
नहीं रूप कोई हैं, सब रूप तेरे है।
तेरे सब ही परजा हैं, और भूप तेरे।।
धरा सन्त अवतार, जग को चिताया है
दुख दन को अंग, अपने लगया।।
दिया संग सत का, मिला सतु का जीवन हैं।
तेरे नाम पर सीस, तन मन है अर्यन।।
झुके राधास्वामी, चरन हँसते हँसते।।
तुझे कहते हैं सब, नमस्ते नमस्ते।।

380.छटवी धुन

अपनी दो पहिचान, तुम मेरे सद्गुरु दाता।।
सत हो या आनन्द की मूरत, या हो तुन्छ के ज्ञान तुम मेरे
कोई कहे गुन सगुन हो निगुन, कोई रचना की जान तुम मेरे
निराकार साकार अकारा, इनके नाम निशान तुम मेरे
शब्द अशब्द सुरत भंडारा, या इनसे अलगान तुम मेरे।।
कौन हो क्या हो क्या कोई जाने, अपनी को बखान तुम मेरे।।
जगदाधारी जगत से न्यारे, निराधार निवन तुम मेरे।।
निगम अगम भूले चतुराई, ‘नेति ‘एति की खान तुम मेरे।।
साखी शब्द कहत सकुचाऊ, ज्ञान अनुमान प्रमान तुम मेरे।।
राधास्वामी अपना भेद बताओ, मेरी ओर दो कान तुम मेरे।।

381.राजों के महाराज, तुम मेरे सतगुरु स्वामी।।
टेक। हित अनहित सब के हितकारी, प्रगटे जन के काज
तुम मेरे परमारथ के कारन आये, साज के संत समाज तुम।।
मेरे दुखियों का मेटो दुख दारुन, रक्लो उनकी लाज तुम।।
मेरे ज्ञानी ध्यानी ऋषि मुनि देवा, सबके हो सिरताज तुम।।
मेरे राधास्वामी परमदयाला, चरन शरन दो आज तुम मेरे

382.सतसंग वचन सुनाइये, मेरे सतगुरु प्यारे।।
सतसंग विवेक न आये, सच्चा पंथ लखाइये।।
मेरे देखा देखी भेड़ चाल है, सार तत्व समझाइये।।
मेरे तीरथ आपके चरण में रहता, मोहि असनान कराइये।।
मेरे गुरु के रूप में साहब बसता, अपना दरस दिखाइये।।
मेरे मैं भुजंग तुम चंदन के तुल, अपने अंग लगाइये।।
मेरे कोदि ग्रन्थ पढ़ पढ़ क्यों मरना, निज उपदेश चेताइये।।
मेरे मैं कमुदिन तुम चन्द्र समाना, अमृत धार चुबाइये।।
मेरे तुम नौका मैं लोह कठिन हूँ, भवनिधि सहज तराइये।।
मेरे राधास्वामी अपनी दया से, भरम विकार नसाइये।।मेरे

383.अमृतधार बहाइये, सतगुरु जग तारन।।
टेक। हम सब काल कर्म के मारे, दया से अब तो जिलाइये।।
कर्म ने ज्ञान न भक्ति न सेवा, कोई उपाय बताइये।।
सत काठ की नाव में लोहा भारी, कैसे हो उसको तिराइये।।
सत चरण शरण की प्यास है भड़की, अमृत बूद पिलाइये।।
सत तृष्णा अग्नी दहे शरीरा, दर्शन देके बुझाइये।।
सत नाम दान दे अपना कीजे, अब कुछ देर न लाइये।।
सत मैं हूँ पतित तुम पतित उधारने, हाथ पकड़ के उठाये।।
सत त्राह त्राह शरणागत आया, निज पद छांह दिलाइये।।
सत राधास्वामी सतगुरु यूरे, सत की राह लगाइये।।सत

384.चरन ओट सहवास हो, सतगुरु करतारा।।
टेका। मैं निरास नहीं कोई सहाई, आपकी मेहर की आस हो।।
सतगुरु मन के अटपट उमर गंवाई, अब तो कुछ अवकास हो।।
सतगुरु घट से तिमिर अविद्या भागे, ज्ञान सूर परकास हो।।
सतगरु श्रद्धा प्रेम भक्ति चित बाई, दुरमति कुमति का नास हो।।
सतगुरु राधास्वामी मौज दिखाओ न्यारी, आनन्द हर्ष हुलास हो।।सतगुरु

385.आया गुरु दरबार मैं, मेरे सतगुरु साई।।
टेका। बल पौरष से हीन भया हूँ, बुद्ध का लाचार मैं।।
मेरे ज्ञान भक्ति नहीं कुछ बन आवे, कर्म का निपट गॅवार मैं।।
मेरे परमारथ स्वारथ दोऊ खोये, भर्म रहा संसार मैं।।
मेरे केसी करू उपाय न सूझे, दान धर्म व्यवहार मैं।।
मेरे कायर सम सबको तुज डारा, कुल कुटुम्ब परिवार मैं।।
मेरे घर नहीं चेन न बन में शान्ति, घुमा बस्ती उजार मैं।।
मेरे राधास्वामी धाम की ओर दृष्टि गई, आप पड़ा गुरु द्वार मैं।।मेरे

386.अपना दो निज ज्ञान, तुम गुरु अंतर्यामी।।
टेका। जड़ चेतन चेतन जड़ ग्रन्थी, या इनसे बिलगान तुम।।
गुरु हिरण्यगर्भ के अव्यकृत हो, अथवा विराट महान तुम।।
गुरु सबल ब्रह्म के शुद्ध ब्रह्म तुम, कै प्रकृती परधान तुम।।
गुरु द्वन्द जगत में प्रगट हुये हो, क्या सृष्टी की जान तुम।।
गुरु, गो गोचर नहीं मन के विषय नहीं,शब्द अनुमान प्रधान तुम।।
गुरु सत्र में व्यापक सब से न्यारे, क्या कूटस्थ निशान तुम।।
गुरु, राधास्वामी कुछ भेद बतादों, ज्ञान विज्ञान सुजान तुम।।गुरु

  1. बख्शो प्रेम की दात तुम, प्रभू प्राण अधारे।।
    नाम रूप तज शरण में आई, चरण ओट दो आज तुम।।
    प्रभू मैं अबला बल शक्ति से खाली, हो पूरे बलराज तुम।।
    प्रभू प्रीत प्रतीत पहिनाओ भूषण, अंग अंग दो साज तुम।।
    प्रभू घूघट तिल में देखें तुमको, हो सुरेन्द्र महाराज तुम।।
    प्रभू आँख की पुतली पे आसन मारो, हृदय में रहो बिराज तुम।।
    प्रभू नहीं किसी की अब हूँ तुम्हारी, कर दो मेरा काज तुम।।
    प्रभू राधास्वामी समरथ रख लो अब की, लाजवती की लाज तुम।।प्रभू

388.साध जनम का काज तू, प्यारी सुरत सहेली।।
आज का काम जो काल में छोड़ा, अपना करे अकाज तू।।
सुरत गया समय फिर हाथ न आवे, अवसर गहले आज तू।।
सुरत घट में घट घट ऊपर चढ़जा, ले त्रिकुटी का राज तू।।
सुरत छोड़ कुसंगत कर सतसंगत, जो सतगुरु के समाज तू।।
सुरत प्रम प्रीत परतीत सहज है, मन मनसा को भाँज तू।।सुरत
सत का नूर दृटि में आवे, हिये की आँख को आंज तू।।
सुरत राधास्वामी चरण ओट दृढ़ करले,भक्त साज दल साज तु।।सुरत

389.सब विधि है अनजान हम, प्रभू सतगुरु स्वामी॥टेक॥
समझ विवेक बुद्धि नहीं पाई, अपना रूप न जान हम।।
प्रभू तुम तो मात पिता सम्बन्धी, बाल अकार समान हम।।
प्रभू चंचल मूढ़ महा अज्ञानी, ग्रसित मोह मद मान हम
प्रभू अब तो आन पड़े शरणागत, बने विवेकी सुजान हम।।
प्रभू राधास्वामी प्रेम शक्ति दो, पायें भक्ति का दान हम।।

390.मानुष जनम सुधार तू, मेरी सुरत सुहागिन।।
पिया की शरण में जल्दी आजा, चित धर प्रेम पियार तू
मेरी माँग भरा भक्ति सेंदूर से, माँग परम सिंगार तू मेरी
क्षमा की चूनर दया की साड़ी, पहर के चल दरबार तू
मेरी पिया के महल का सुख आनन्द ले, डाल जगत
सिर छार तू मेरी राधास्वामी साँचे प्रीतम, चरन कमल हिये धार तू।।मेरी

391.भक्ति साज दल साजरी, मेरी सुरत पियारी।।
क्यों तू सोई माह नींद में, काल सीस पर गाजरी मेरी।।
सुरत जाग जाग उठ जाग अचेती, सोये होय अकाजी मेरी।।
सुरत डाकू चोर लगे तेरे पीछे, उनसे बचकर भाजरी मेरी।।
सुरत सतगुरु आये तोहि चितावन, चेत के करले काजरी मेरी।।
सुरत राधास्वामी गुरु की ले शरनाई, अवसर पायो आजरी मेरी।।सुरत

392.कर चित से सतसंग, अब मेरी सुरत सुभागी॥टेक॥
मोह भरम के बंधन तजदे, ज्यों केंचुली भुजंग अब मेरी
जग के रंग से भई कुरंगी, धार गुरु का रंग अब।।
मेरी गहरा ध्यान जमे घट भीतर कीट से होजा भृग अब।।
मेरी अन्तर जोत जगे तेरे जगमग, जल ज्यों दीप पतंग अब।।
मेरी सुन सुन शब्द अनाहद की धुन, होजा बन की कुरंग अब
मेरी मन समुद्र में उमड़े सजनी, प्रीत प्रतीत तरंग अब।।
मेरी मान मनी के भूल निशे को, पी पी प्रेम की भंग अब
मेरी माया काल के रन में पग दे, कर दोनों से जंग अब मेरी
राधास्वामी दया से काज बनेगा, हो न कभी दिल तंग अब मेरी

  1. सहजवृती चितधार री, कुछ सोच सुरतिया।।टेक।
    ज्यों तैराक रहे पानी पर, लम्बे हाथ पसार री कुछ सोच
    ज्यों बालक तिल तिल नित बाढ़, अपना हृदय उभाररी कुछ सोच
    सहज योग का सहज है साधन, सहज का आसनमाररी कुछ सोच
    सहज शब्द गूजे घट भीतर, अनहद धुन झनकार री कुछ सोच
    सहज सहज में सहज सहज में, राधास्वामी नाम पुकार री कुछ सोच

394.अन मत चित नहीं ठानरी, गुरु मत अनुरागी।।
टेका। नारी पुत्र के बंध बंधाना, हृदय सतगुरु ज्ञान री।।
गुरु मत कहाँ से आया क्यों तू आया, करले कुछ अनुमान री।।
गुरु मत सुमिरन भजन में कौन बसे घट, किस का अन्तर ध्यान री।।
गुरु मत बात बनाना छोड़ दे प्यारे, तज आपा अभिमान री।।
गुरु मत लगन लगी नहीं राधास्वामी से,समझ तू चतुर सुजानरी।।गुरु मत

395.मन की दुरगति टार री, मेरी सुरत अचेती।।
करता बन कर काम करे नित, लेती दुख सुख भार री मेरी।।
सुरत स्वारथ बस परलोक नसाया, नहीं परमारथ प्यार री मेरी।।
सुरत चोर राख मन धन लुटवावे, करे न गुरु रखवार री मेरी।।सुरत
भजन भाव में रहे अलसानी, टारे जान बेगार री मेरी।।सुरत।।
राधास्वामी गुरु का दरस ततकाला, घट के नैन उघार री मेरी।।सुरत

  1. सुरत अचेती चेतरी, मेरी सुरत अचेती॥टेक॥
    काम किया स्वारथ का अब कर, कुछ परमारथ हेत री
    मेरी सुरत बन कर वीर जीत ले प्यारी, काल करम का खेत री मेरी।।
    सुरत संशय भर्म पड़े तेरे पीछे, उनकी गरदन रेत री मेरी।।
    सुरते मौज अधीन काम कर जगमें, भार सीस क्यों लेत री मेरी।।
    सुरत राधास्वामी सुमिर सुभिर राधास्वामी, गुरु सिखावन देत री मेरी।

397.कहना मेरा मानरी, मेरी सुरत अचेती।।
निज स्वरूप जब से तू भूली, अपना किया अयमान री मेरी।।
सुरत सत्त धाम की राजकुमारी, क्यों पड़ी योनि की खान री मेरी।।
सुरत माया ने भर्माया तुझको, अटकी मया मद मान री मेरी।।
सुरत शुभ अवसर मानुष तन पाया, अब तो ले गुरु ज्ञान री मेरी।।
सुरत राधास्वामी सतगुरु दाता, देंगे भक्ति का दान री मेरी।।

398. सुरत अचेतरी जाग री, मेरी सुरत अचेती।।

टेक। जनम जनम सोबत तेरी बीता, मोह नींद तज भाग री मेरी।।

सुरत रात गई है मिटा, अन्धेरा, उठ गा जीवन राग री मेरी।।

सुरत हृदय थाल लेकर सज आरत, ज्योती प्रेम अनुराग री मेरी।।

सुरत राधास्वामी दया से जागे तेरा, सोया खोया भाग री मेरी।।सुरत

399.घट में दीवा बालरी, आज आई दिवाली।।
सुरत की सूत की पूरे बाती, प्रेम तेल हिये डालरी आज।।
आई शब्द अग्नी की जोत जलावे, वायु विषय से संभालरी आज।।आई
जगमग जोत प्रकाशे च दिस, तिमिर अविद्या टाल री आज।।
आई राधास्वामी घट की दिवाली मनाचे,और सकल जंजाल री आज।।आई

400.गुरु धुर धाम को भाग री, मेरी प्यारी सुरतिया॥टेक॥
जनम जनम भव निद्रा सोई, समझ चेत उठ जाग री मेरी।।
प्यारी गुरु बल मोह की तोड़दे रसरी, जैसे कांचा ताग री मेरी।।
शब्द शिला पर धो मेरी सजनी, कलि मल के सब दाग री मेरी।
सुमिरन मंत्र से जीतले अबकी, कोल करम के नाग री मेरी।।
राधास्वामी चरन धार सिर ऊपर,भक्ति प्रेम बर मांग री मेरी।।

401.नहीं तेरा है देश यह, मेरी प्यारी सजनी।।
सत पद तेरा निज अस्थाना, आन पड़ी परदेश यह मेरी प्यारी
कठिन कमे के काट दे बन्धन, धार सहज उपदेश यह मेरी।।
इन्द्री मन नहीं रूप हैं तेरे, सब माया के भेस यह मेरी।।
घट में शब्द धार जो प्रगटी, सोई सत्त संदेश यह मेरी।।
राधास्वामी सहजयोग बिधि गाई,नहीं कठिन लवलेश यह मेरी।।

402.भूल भरम सब त्याग री, मेरी प्यारी सहेली।।
इसका विष चढ़कर नहीं उतरे, जग है काला नाग री मेरी
प्यारी शब्द डोर गह घट में चढ़ चल, जागे भाग सुभाग री मेरी।।
त्रिकुटी में लव गुरु की मूरत, चरन कमल में लाग री मेरी।।
सुन्न में सहज समाध रचाले, दुचिता को दे आग री मेरी।।
राधास्वामी दया के सागर, देगे अचल सुहाग री मेरी।।

  1. प्रेम भाव उर धार री, मेरी प्यारी सरतिया।।
    टेक। अंतर में गुरु की संगत कर, दरस परस सत्कार री मेरी प्यारी
    तिलपट मध्ये अद्भुत मूरत, अचरज अगम अपार री मेरी प्यारी
    मन माथे दे तिलक केरिया, डाल गये बिच हार री मेरी।।
    तिल की जोत में साधले आरत, जगमग रूप निहार री मेरी।।
    घट में पूजा घट में सेवा, घट में भक्ति बहार री मेरी।।
    घंटा शंख बजे मन मन्दिर, अनहद धुन झनकार री मेरी।।
    सुमिरन भजन ध्यानकर मन में,राधास्वामी की बलिहार री मेरी।।

404.गुरु चरनन चित धार री, मेरी प्यारी सुरतिया।।
टेका। अपने स्वारथ वश लिपटाने, कुल कुटुम्ब परिवार री मेरी
प्यारी एक में सुख और अनेक में दुख है, टेक एक की धार री मेरी।।
कर्म की गठरी को हलकी करले, राख न सिरपर भार री मेरी।।
एक आस विश्वास गुरु का, भक्ति ज्ञान का सार री मेरी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,होजा द्वन्द के पार री मेरी।।

405.भोग वासना भूल री, अलबेली सहेली।।
दुख कलेश को मेट दे संशय, प्रेम हिंडोले झूल री।।अलबेली
क्यों मुरझाई सुख से खुलजा, जैसे हँसता फल री।।अलबेली
जो प्रतिकूल पन्थ नहीं पग दे, तिसके सब अनुकूल री।।अलबेली
लत फिरे भरम वश प्रानी, ममता नर का झूल री।।अलबेली
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हो पदकमल की धूल रीअलबेली

406.प्रेम का कर सरकार री, मेरी सुरत सुशीला।।
टेका। प्रेम है भूषण सन्दर बस्तर, प्रेम का कर सिंगार री मेरी।।
सुरत प्रेम ही मूल तत्व है प्यारी, प्रेम का कर त्र्यौहार री मेरी।।
सुरत प्रेम प्रेम कर प्रेम को चित दे, प्रेम का पन्थ संवार री मेरी।।
सरत प्रेम योग है प्रेम है भक्ति, प्रेम का आसन मार री मेरी।।
प्रेम ज्ञान का सच्चा साथी, प्रेम विवेक विचार री मेरी।।
सुरत प्रेम की हाट में प्रेम का सौदा, प्रेम बनजि व्यौपार री मेरी।।
सुरत राधास्वामी प्रेम रूप धर आये, परम सन्त औतार री मेरी।।सुरत

  1. चल गुरु के सतसंग री, मेरी सुरत सहेली।।
    सतसंगत अमृत जल बरसे, सतसंग निर्मल गंग री मेरी सखी
    सतसंग प्रेम सिंध है सजनी, उमड़े प्रीत तरंग री मेरी।। सखी
    बास सुबास मिले सत संगत, पाचे रंग सुरंग री मेरी।।सखी
    सतसंगत को ध्यान रहे नित, कीट सहज हो भृग री मेरी।।सखी
    राधास्वामी गुरु की कर सतसंगत, काल करम कर भंग री मेरी।।सखी
  2. गुरु पद का करले ध्यान री, मेरी सुरत सहेली
    आज गुरु की शरणागत में, सब विधि हो कल्यान री मेरी।।
    सुरत चिंता त्याग त्याग दे चिंता, यही है सच्चा ज्ञान री मेरी।।
    सुरत जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज को परख सुजान री मेरी।।
    सुरत अंतर में तेरे सतगुरु बसते, घट में रूप पिछान री मेरी।।
    सुरत गुरु के चरन शरन जो आया, नहीं उनकी हो हान री मेरी।।
    सुरत सुमिरन ध्यान भजन कर सजनी शब्दयोग की जान री मेरी।।
    सुरत राधास्वामी नाम जो कोई सुभिरे, जीते जी निवन री मेरी।।सुरत
  3. करले अपना काम अब, मेरी चतुर सरतिया।।
    आलस तज निद्रा को तजदे, तज मद मोह निकाम अब।।
    मेरी समिरन ध्यान भजन नित करना, सुमिर सुमिर गुरुनाम अब।।
    मेरी गुरु से पावे चार पदारथ, मोक्ष धर्म धन काम अब।।
    मेरी जो आया गुरु की शरणागत, सब विधि पूरन काम अब।।
    मेरी जीते यश कीर्ती इस जग में, पीछे राधास्वामी धाम अब।।मेरी
  4. थिर नहीं वह संसार री, सुन सखी सहेली।।टेका।
    जो आये हैं जायंगे सजनी, कुछ अब सोच विचार री सुन।।सखी
    बन्धन काट मोह माया के, यह उसके परिवार री सुन।।सखी
    संगी साथी कोई नहीं है, यह अपने चित धार री सुन।।सखी
    मिथ्या है सब जगत पसारा, मिथ्या में क्या सार री सुन।।सखी
    राधास्वामी नाम सुमिर घट भीतर,मानुष जनम सुधार री सुन।।सखी

411.अपनी ओर निहार री, अलबेली सुरतिया।।
औरन को क्या निरखे सजनी, तू है सबका सार री।।अलवेलीं
घट में तेरे प्रीतम बसता, हित चित से कर प्यार री।।अलबेली
तू है प्रेम की मूरत प्यारी, प्रेम की तू भंडार री।।अलबेली
सब कुछ तेरे घट में बसत है, घट के नैन उघार री।।अलबेली
बाहर की सब आसा तज दे, अंतर दृटि पसार री।।अलबेली
घट चेला गुरु गगन विराजे, सुरत से मन में विचार री।।अलबेली
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, चरन कमल सिर धार री।।अलबेली

412.गुरु संग नेह लगाओ री, मेरी प्यारी सुरतिया।।टेका।
सुमिरन भजन ध्यानकर चित में, मोक्ष पदारथ पाओ री मेरी।सुरत
गुरु का रूप बसा तेरे अंतर, उस पर वृत्ति जमाओ री मेरी।।सुरत
लख लख अलख दशा घट भीतर,अनहद धुन नित गा र मेरी।।
सुमिरन सबका सार है प्यारी, सुमिरन सहज उपाओ री मेरी।।सुरत
ध्यान गुरु का रूप है सजनी, रूप अनूप को ध्याओ री मेरी।।सुरत
नाम का तार गूज रहा अंतर, सुन मुख आनन्द पाओ री मेरी।।सुरत
दुख को त्याग हर्ष नित बाढ़, उसकी चाह बढ़ाओ री मेरी सूरत
भंवर में जीवन नाव पड़ी है, तट पर उसको लाओ री मेरी।।सुरत
राधास्वामी गुरु का दयाभाव ले, चरन शरन में जाओ री मेरी।।सुरत

413.अपना रूप सँभार री, तू रंगीली बहुरिया।।
शील क्षमा का भूपन सुन्दर, पहर के करले सिंगार री
तू रंगीली मीठे बचन मधुर रस बानी, मुख से सदा निकार री तू।।
दया भाव की ओढ़ चुनरिया, अपने आप संवार री तू।।
कर्म बचन मन से सब का हित, कर सजनी उपकार री तू।।
साँच चदरिया तन पर सोहे, काम क्रोध मद मार री तू।।
सब कोई हर्ष से करे बड़ाई, यह सुन्दर बरनार री तू।।
राधास्वामी पंथ ठुमक कर पगदे, सतगुरु नाम उचार री तू।।

  1. कर दो भव सागर पार, तुम मेरे सतगुरु दाता।।
    डूबत कोई न संग न साथी, काढ़ो आज किनारे तुम।।
    मेरे मैं अचेत अज्ञान की मूरत, ज्ञानी पुरुष अपार तुम।।
    मेरे मैं बिलपू भर दुख के कारन, देखो नैन निहार तुम।।
    मेरे असा बासा सब की त्यागी, हो साँचे रखवार तुम।।
    मेरे राधास्वामी दीन दयाला, सृष्टि के आधार तुम।। मेरे

415.बंसी की धुन सुन कान, सुरत मेरी गगन चढ़ी।।
सहस कमलदल घंटा बाजा, जब तिल को दिया तान सुरत।।
मेरी त्रिकुटी ओंकार धुन मृदंग, सुन हुआ चतुर सुजान सुरत।।
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, किंगरी शब्द प्रमान सुरत।।
भंवर गुफा सोहंगम वंसी, बंसीधर लिया जान सुरत।।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, पहुँची ठौर ठिकान सुरत।।

Updated: November 8, 2020 — 1:50 am

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