(201)धन धन धन जग त्राता,धन त्रिभुवन स्वामी।
धन धन धन पितु माता,धन अन्तर्यामी ।
प्रभुधन अन्तर्यामी।
भक्ति भाव स्वामी पाऊँ,चरन शरन ध्याऊँ।
चरनन चित्त लगाऊँ,सेवा में धाऊँ,प्रभु सेवा में धाऊँ।
आदि गुरु परमातम,तुम मंगलकारी।
जन सेवक सुखदायक,जीवन हितकारी,
प्रभु जीवन हितकारी।
प्रेम रूप करतारा,घट घट के बासी।
मन बुद्धि से पारा,अनुपम अविनासी,
प्रभु अनुपम अविनासी।।
प्रेम दान मोहे दीजे,सन्तन की सेवा।
सत संगत फल पाऊँ,देवन के देवा,
प्रभु देवन के देवा।।
त्रिविध ताप दुख मेटो,करलो मोहे अपना।
अवगुन चित्त न लाओ,दूर करो तपना,
प्रभु दूर करो तपना।
तज तीनों जल्दी प्रभु,पद:चौथा पाऊँ।
काल जाल से भागू,राधास्वामी गुन गाऊँ,
प्रभु राधास्वामी गुन गाऊँ ॥
लावनी
(1-202)कर निश्चय गुरु का चरन सीस पर धारा।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ॥
क्यों सोच से तू नित व्याकुल रहता है।
क्यों भरम में पड़कर दुख सुख को सहता है।
क्यों उलटी सुलटी बात बना कहता है ।।
क्यों नहीं चरन की ओट छांह गहता है।
जिस का सतगुरु रूप सदा रखवारा।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।1।।
गुरु हैं हितकारी तेरे समझ ले मन में ।
तु चाहे रहे कहीं घर परबत और वन में।
रह रात दिवस गुरु देव के प्रेम लगन में ।
नहीं चिंता का ले भार भरम के यतन में।
बेखटके जो करता है।यहाँ गुजारा ।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।।।
भृगी ने कीट को जोर से अपने पकड़ा।
और उसे बन्द छत में लाकर जकड़ा।
पहले वह भय बस भयो मोह का लकड़ा ।
फिर ध्यान से बन गया भृगी अच्छा तकड़ा।
जो लेता है गुरु देव का ऐसा सारा ।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥3॥
कर भजन ध्यान सुमिरन नित उठ कर भाई ।
इन ही बातों से होगी तेरी भलाई।
तज दे सर आलस नींद मोह कदाई।
बिगड़ी सब तेरी बनत बनत बन जई है।
जो दुविधा दुचिताई से गहे किनारा ।।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥4॥
राधास्वामी संत रूप धर जग में आये ।।
भूले भटकों को सत की राह चलाये।
जो अचेत थे दया से उन्हें चेताये ।।
सुरत शब्द मत योग का सच्चा यतन सिखाये।
शरणागत जो हुआ तरा और तारा ।
वह होगा आप एक दिन भी जल पारा ।।5।।
(2-203)जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।
उसका हुआ भव सागर से बेड़ा पारा।।
नहीं साँचे भक्त किसी से कभी हैं डरते।
नहीं भय से काले करम के हैं वह मरते।।
गुरु उनकी पल पल में है रक्षा करते।
वह सहज सहज में जग के निधि से तरते ।
गुरु की कृपा से हुआ उनका निस्तारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।1।।
नहीं धरम करम से लगा किसी का ठिकाना।
नहीं संयम नियम में परमारथ का निशाना।
सब वृथा जीन ज्ञान ध्यान अनुमाना।
केवल सतगुरु की दया में है निरवाना है।
गुरु भक्ति से होगा आप ही भला तुम्हारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।2।।
मीरी गणिका रैदास और सदन कसाई।
इन सबको गुरु की भक्ति हुई सुखदाई ।
तर गया गुरु की भक्ति से पीपा नाई।
गुरु रात दिवस अपने भक्तों के सहाई ॥
सब त्याग मोह भ्रमजाल किया भक्ति से गुजारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु के बल यह मन तुम्हरे बश में आवे।।
गुरु के बल नर भव द्वन्द को सहज नसावे।।
गुरु के बल पाप प्रभाव न अपना दिखावे।
गुरु के बल प्रानी यम का फंद कटावे ॥
गुरु नर स्वरूप में धरा सन्त अवतारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु की कर जीते जी क्षण क्षण तू सेवा।
गुरु सम इस जग में नहीं है कोई देवा ॥
गुरु की कृपा मिटे सब भूल भर्म का भेवा।
गुरु शब्द जहाज के बने आप ही खेवा ॥
राधास्वामी ने बख्शा यह गुर सार का सारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ॥5॥
(3-204)नामी हुए उसी दिन जिस दिन,चित से गुरु का नाम लिया।
जीते जी यश कीर्ति प्रतिष्ठा,और पीछे सेते धाम लिया।
अर्थ लिया और धर्म लिया और,मोक्ष लिया और काम लिया।
चार पदारथ हाथ में आये,तब जाकर विश्राम लिया।
मन चंचल की दुविधा मेटी,शान्ती आठों याम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।1।।
जीने की नहीं मन में इच्छा,मरने का डर नहीं करते हैं।
अजर अमर है रूप हमारा,प्रेमी जन कब मरते हैं।
भार बिपति आपति और दुख का,सिर पर कभी न धरते हैं।
कमल फूल ज्यों हम भव सागर,के जल में तरते रहते हैं।
मन का घोड़ा रान के नीचे,हाथ में उसका लगाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥2॥
खाकर दाना भक्ति का हम,प्रेम का पानी पीते है।
हृष्ट पुष्ट होकर संसार में,सुख आनन्द से जीते हैं।
हम नहीं हिंसक हंस हैं पूरे,बन के सिंह ने चीते हैं।
बिरह बान से फटे कलेजे,के चीरे को सोते हैं।
गुरु भक्ति का सौदा सच्चा,विना मोल बेदाम लिया।।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥3॥
ब्राह्मण को मिला ब्रह्म,क्षत्री क्षत्रपति कहलाता है।।
वैश्य को धन है शुद्र कला,कौशल की पदवी पाता है।
गाने बजाने वाला तान से,तान को अपना भिलाता है।
योगी सिद्धि शक्ति का भूका,योग के मारग जाता है।
हमको नाम की लगन लगी,ऊँचे चढ़ नाम का ग्राम लिया।।
सिर पर चार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥4॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आये,ओम् की बानी सहज सुनी।।
सुन्न में सहज समाध रचाई,महासुन्न के बने मुनी।।
भंवरगुफा चढ़ बन्शी बजाई,अवगुण मेंट के हुए गुनी।।
मत्तधाम धुर बीन की धुन सुन,सत धुनि बीन के धुनके धनी।।
अलख अगम पर बैठक ठानी,राधास्वामी धाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।5।।
(4-205)घर छोड़ा और देश देश में,घूम फिरे मारे मारे।
मन तपवन उपवन मधुबन सब,देख लिये न्यारे न्यारे।
परबत और पहाड़ की चोटी,चढ़ चढ़कर थक थक हारे।
गरे प्रेम में प्रीतम प्यारे,अन्त में पाया तुझे वारे ।
ॐघट का परदा खोल के गुरु ने,तेरे रूप को दरसाया।।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥1॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता,नहीं काशी का तू बासी।।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी,कहां बसा है अविनासी।
तू नहीं जपी तपी बन चंडी,नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी,कैसे कहे कोई आकासी।।
सत संगत के सुने बैन,समझाने वाले ने समझाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥2॥
खट पट में पोथियों के पड़कर,अटपट चाल चले दिन दिन।
सार मिला नहीं जी घबराया,तत्वों की गिनती गिन गिन।।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में,द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन।
जिसको देखा पक्षपात बस,करता रहता है भिन भिन।
गुरु मिले निज बचन सुनाया,अनुभव गम गति लखदाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥3॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि,शक्ति के मारग भरमाने।
मन को सोधा तन को साधा,साधन कर कर उक्ताने।
आसन मारा साँस को रोका,यतन किये बहु मन माने।
लगी समाध तुझे नहीं पाया,कैसे कोई तुझको जाने।
आप आप में आप समाया,अपना आपा बन आया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।4।।
साध की संगत गुरु की सेवा,सहज रीति जब बन आई।
सहज में सहज सहज में साधन,सहज भावना चितलाई।
सहज रूप है सहज नाम में,सहज काम नहीं कठिनाई।।
राधास्वामी की सत संगत में,सहज दृटि मैंने पाई।।
सहज दृष्टि में सहज रूप का,सहज ज्ञान सहजे छायो।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।5।।
घट का परदा खोल के गुरु ने, तेरे रूप को दरसाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥1 ॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता, नहीं काशी का तू बासी ।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी, कहां बसा है अविनासी ।
तू नहीं जपी तपी बन स्त्रंडी, नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी, कैसे कहे कोई आकासी ।
सत संगत के सुने बैन, समझाने वाले ने समझाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥2 ॥
खट पट में पोथियों के पड़कर, अटपट चाल चले दिन दिन ।
सार मिला नहीं जी घबराया, तत्वों की गिनती गिन गिन ।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में, द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन ।
जिसको देखा पक्षपात बस, करता रहता है भिन भिन ।
गुरु मिले निज बचन सुनाया, अनुभव गम गति लखवाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥3 ॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि, शक्ति के मारग भरमाने ।
मन को सोधा तन को साधा, साधन कर कर उक्ताने ।
आसन मारा साँस को रोका, यतन किये बहु मन माने ।
लगी समाध तुझे नहीं पाया, कैसे कोई तुझको जाने ।
आप आप में आप समाया, अपना आपा बन आया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥4 ॥
साध की संगत गुरु की सेवा, सहज रीति जब बन आई ।
सहज में सहज सहज में साधन, सहज भावना चितलाई ।
सहज रूप है सहज नाम में, सहज काम नहीं कठिनाई ।
राधास्वामी की सत संगत में, सहज दृष्टि मैंने पाई ।
सहज दृष्टि में सहज रूप का, सहज ज्ञान सहजे छाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥5 ॥
206. सोहं अस्मि जब हमने कहा, तब सोहंगम हंकार बना ।
तत्वमसी जो मुंह से निकला, वाच लक्ष जंजार बना ।
मनन किया मन बना चित्त से, चिंतन का सत्कार बना ।
बुद्धि निश्चयात्मक आई, जब ही विवेक विचार बना ।
पुरुष हुये तब बनी प्रकृति, कुल कुटुम्ब परिवार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥1 ॥
अपने आप में आप समाने, हिरण्य गर्भ की गति पाई ।
अन्तर्यामी बने जो अपने, अन्तर में ली अंगड़ाई ।
खोली आँख विराट कहाये, ठकुराई मन को भाई ।
सृष्टि स्थिति लय की ठानी, सत रज तम की प्रभुताई ।
तीन गुणों को एक किया और, अ, उ, म, ओम्कार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥2 ॥
यह ब्रह्मांड की सूक्ष्म है रचना, सूक्ष्म से आप स्थूल बना ।
कारण बीज से अँखुआ फूटा, फल पत्ता और फूल बना ।
द्वन्द भाव के घट आते ही, अनुकूल और प्रतिकूल बना ।
सुख वासना की छाया फूटी, रोग सोग दुख सूल बना ।
तीन त्रिलोकी हमने रचाई, सो निज सिर का भार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥3 ॥
जब सर्वज्ञ तो ब्रह्म बने, और त्रिलोकी में व्याप रहे ।
जब अल्पज्ञ तो जीव हैं, अन्तःकरण में पुण्य और पाप रहे ।
काल करम बस योनी भटके, कहीं माता कहीं बाप रहे ।
लोक परलोक के द्वन्द जगत को, निज माया से माप रहे ।
एक अवस्था निरमल सुन्दर, और दो से विभिचार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥4 ॥
आने आप में भूले भटके, अपने आप में भरमाने ।
अपने आपकी सुध नहीं पाई, पक्ष के उलझन उलझाने ।
राधास्वामी सतगुरु आये, आँख खुली तब पहचाने ।
कर सतसंग सार रस पाया, अपने आपको तब जाने ।
मेरा तेरा पना छूट गया, परमारथ का सार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥5 ॥
207. भव सागर में भाटा आया, लहर का हेरा फेरा है ।
बह बह गया जो धार की राह में, डाला अपना डेरा है ।
मन चंचल मूरख अज्ञानी, चेत ले अभी सवेरा है ।
मोह भरम अज्ञान अविद्या, ने क्यो तुझको घेरा है ।
कंकर चुन चुन कर महल बनाया, कहता है घर मेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥1 ॥
किस विरते पर तत्ता पानी, कुप्पे जैसा फूल गया ।
अपना रूप स्वरूप भुलाया, अपने आपको भूल गया ।
देख ले अगमा पाई जग से, कारण सूक्ष्म स्थूल गया ।
एक रहा नहीं नाम लेने को, अनुकूल प्रतिकूल गया ।
काल चक्र के घेरे में, प्रकाश है कहीं अँधेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥2 ॥
रामचन्द्र जी जैसे राजा, गये गई सीता रानी ।
विश्वामित्र वशिष्ठ गये, गौतम कनाड से विज्ञानी ।
जपी तपी नियमी और धरमी, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी ।
काल ने सबको ग्रास लिया, फिर तू क्यों हुआ है अभिमानी ।
तू कब आप किसी का होगा, कोई जब नही तेरा है ।
‘ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥3 ॥
देह का यह परिणाम देख ले, किसी को आग में दिया जला ।
किसी को कीड़ों मकोड़ों ने खाया, जब मिट्टी में गाड़ दिया ।
खुली जगह जंगल में कौव्वों, चील गिद्ध ने नोच लिया ।
पानी ने भी उसे न छोड़ा, छिन में लोन समान गला ।
चेत चेत ले चेत चेत ले, चेत चेत का बेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥4 ॥
राधास्वामी की संगत में, अपना जनम बना ले तू ।
त्याग भरम का रस्ता सच्चे, ज्ञान का रस्ता पाले तू ।
शब्द योग अभ्यास के साधन, से कुछ भक्ति कमाले तू ।
छोड़ काल माया का घर, सत धाम में सुरत बसा ले तू ।
भव सागर तरने का सन्तों, ने बांधा यह बेड़ा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥5 ॥
208. अजल से था यह अहद रहूँगा, साथ साथ दूंगा तेरा ।
भूलू गा नहीं कौल यह समझूगा, तू साथी है मेरा ।
आकर तेरी सँभाल करूंगा, दो अलम ने जब घेरा ।
तेरे दिल को बनाऊँगा, अपने रहने का मैं डेरा ।
जा दुनिया में फिक्र न कर, कुछ दिन के लिये दुनिया में जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥1 ॥
आशिक ने यह बात सुनी, माशूक की खुश होकर बोला ।
तेरे हुकम से मैं जाता हूँ, जाने की नहीं कुछ परवा ।
हिजर अज़ाब जान है बेशक, वस्ल है राहत और मजा ।
जब तू मेरा और मैं तेरा, फिक्र का फिर क्यों हो सौदा ।
वह बोला मैं सच कहता हूँ, कुछ नहीं कहता सच के सिवा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥2 ॥
अहर हुआ और कौल हुआ, आशिक ने छोड़ा अशवरी ।
उतर के कुर्सी से वह माँ के, हमल में हुआ करार गजीं ।
पलक सर जो रूह थी हुक्म से, आकर होगई खाक नशीं ।
रिज्क रसां माशूक साथ था, उसी मकां का होके मकी ।
तंग जगह में आशिक सुनता, रहता था बस यही सदा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥3 ॥
माँ के हमल से गिरा खाक पर, लगा लोटने खाक में वह ।
कभी पाक हालत थी उसकी, कभी हालत नापाक में वह ।
गिरा उठा उठकर फिर संभला, खौफ बीम और वाक में यह ।
कभी रोया कभी हँसा कभी, लोटा खस में खाशाक में वह ।
बात बात में बात में दिल में, बात ने उसके की थी जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥4 ॥
बालिग हुआ समझ कुछ पाई, पढ़ लिखकर हुशियार बना ।
औरों की बातों में बहका, बेदीन और दीदार बना ।
मज़हब भिन्लत के झगड़ों में, फंस फंस कर लाचार बना ।
कभी तकवा की उसको सूझी, कभी मयकश मयख्यार बना ।
अक्ल इल्म के धन्दों से वह, कौल करार को भूल गया ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥5 ॥
आखिर अपने को समझा तब, गालि और नाकार बना ।
बहम गुमां में फंसा गले का, वहम तब उसके हार बना ।
शादी की और फिक्र कसब में, बेहुरमत और ख्यार बना ।
गई जवानी आई पीरी, सुस्त हुआ बीमार बना ।
याद न आया कौल, दाम दुनिया में जब बे तरह फंसा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥6 ॥
जौफ नकाहत के हुये हमले, रफता रफता जईफ हुआ ।
तन में उसके आई लागरी, जार निज़ार नहीफ हुआ ।
जिसे लताफत का सौदा था, देखो कैसा कसीफ हुआ ।
हन्स सिफालत और रज़ालत, का महबूस शरीफ हुआ !
यह हुआ ख याल रहा नहीं, अहद का अपने बना भूठा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥7 ॥
यह हालत माशूक ने देखी, दिल में शर्म हया आई ।
मेरे आशिक ने कैसी, कर ली है अपनी रुस्वाई ।
जो मसजूद मलायक था कभी, दुनिया का हुआ शैदाई ।
अशरफअकबर अकमल अफजल, को यह हालत क्यों भाई ।
कुछ नहीं मेरे कौल को भूला, मैंने तो उसको यही कहा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥8 ॥
गैरत आई ओर हमिय्यत’ का, जज़बा जब उमगाया ।
वह असली माशूक यहां, हादी की सूरत में आया ।
राज नियाज़ के परदों में, छुप छुप कर यह नग्मा गाया ।
मेरा था क्यों मुझे भुलाया, मुझे छोड़ कर क्या पाया ।
अब आकर फिर तुझे, सुना देता हूँ वह कदीम नुक्ता ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥९ ॥
तेरे दिल के हुजरे का, हर वक्त मकी मैं रहता हूँ ।
अर्श फर्श पर नहीं न कुर्सा, और जमीं में रहता हूँ ।
हूतुलहूत के परदों में घुस, परदा नशीं में रहता हूँ ।
जहां है तू यह समझ ले अपने, दिल में वहीं मैं रहता हूँ ।
आंख कान जवां बन्द कर, देख अपने अन्दर में आ ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जदा ॥10 ॥
सदा मेरी खामोश नहीं है, अब भी गाफिल सोच जरा ।
आंख कान और जवां बंद कर, सुनले उलफत का नग्मा ।
सोते सरमदी सोते नसीरा”, सोतुल सोत 12 की शक्ल निदा ।
गूंज रही है तेरे अन्दर, गफलत का दे उठा परदा ।
वही कौल मेरा है प्यारे, अहः का मुझे समझ पक्का ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥11 ॥
आशिक ने यह सदा सुनी, होश आया नींद से जाग गया ।
बाहर की दुनिया से हटकर, वह बातिन में भाग गया ।
सुलतानुल अजकार कौल था, उसकी धुन में लाग गया ।
इस्म आजम पाया दुनिया का, और दीन और राग गया ।
नासूत और मलकूत के ऊपर, चढ़ जबरुत में आप सुना ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥12 ॥
लाहूती तबके में आया, की जुलमात की मंजिल ते ।
आब हयात’ पिया तब कर दिया, अरजियात दुनिया को के ।
गनी हुआ दिल सैर हुआ, इस्तगना फना नहीं कुछ शै ।
आशिक और माशूक मिले हैं, एक जान दो कालिब है ।
राधास्वामी आये अनहद, बानी का फैला चरचा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥13 ॥
अर्थ (1) दुर्गति (2) देवता (3) देवता (4)(प्रेमी) (5) लज्जा (6) गुरु (7)
कोठरी 8) आकाश (९) आठवाँ आकाश (10) (11) (12) अन्तरी शब्द ।
209. दिल में शान दिलबरी आई, जब तब वह दिलदार बना ।
दिल देने वाला मैं ठहरा, वह दिलवर हुशियार बना ।
मुझमें ददों गम व अलम थे, वह सच्चा गमवार बना ।
वह तबीव की शक्ल में आया, जिस दम मैं बीमार बना ।
वह मेरा है मैं उसका हूँ, मैं आशिक वह यार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥1 ॥
वह वाहिद वह जमा जरब, तफरीक हुआ तक्सीम हुआ ।
इल्म का ऐन लाम वह मेरे, और आखिर में मीम हुआ ।
मेरी तंग नजरों में वह खुद, दौलत जर और सीम हुआ ।
जब वह मेरा हुआ दूर तब, दिल से खौफ और बीम हुआ ।
बेखौकी से उसके इश्क का, जाम पिया सरशार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिवे दीदार बना ॥2 ॥
यह है कौन कौन हूँ मैं, जहां जात सिफात का धोका है ।
वह कालिब है नजर में सबके, जात पात का धोका है ।
किसी किसी की जबां पर आया, नफी’ असबात का धोका है ।
हम गुमां में पड़े सभी हैं, बात बात का धोका है ।
वहदत में कसरत जब आई, पांच सात दो चार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिये दीदार बना ॥3 ॥
मैं जुज वह कुल जरी मैं, वह आफताब की है सूरत ।
मुझे बर्गे गुल समझो तुम, और वह गुलाब की है सूरत ।
दरिया जात अनीम है उसकी, मेरी हुबाब की है सूरत ।
मैं मजद लफज की सूरत, यह किताब की है सूरत ।
करम की नजर से देखा, उसके गले का तब मैं हार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥4 ॥
आशिक है दिल का जेवर, माशूक उसी का सौदा है ।
इश्क के सिवा गरज नहीं उसको, वह माशूक पे शैदा है ।
इश्क की धुन में पक्का होकर, गली गली वह रुस्वा है ।
आसां नहीं इश्क समझ लो, जीते जी मर मिटना है ।
माशूक आया गले लगाया, आशिक जिस दम बार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥
(1) अमृत (2) बेपरवाही (3) लय ।
210. किसी को राज की इज्जत बख्शी, उसने किसी को पाट दिया ।
किसी को लाकर बिठाया तख्त पर, किसी को टूटी खाट दिया ।
बाढ़ जो माँगा बाढ़ दिया, और घाट जो माँगा घाट दिया ।
हाट वाल को हाट दिया, और बाट वाले को बाट दिया ।
जिसने दुनिया दबाना चाहा, धर कर उसको डाट दिया ।
मस्तों को वेफिकरी, बेखौफी मस्ती का ठाठ दिया ॥1 ॥
जर परस्त का खुदा है जर,जर परस्त को जर ओर सीम’ दिया ।
बुज दिल डरने वाले दिल को, खौफ दिया और बीम दिया ।
इल्म के जो शायक थे उनको, ऐन लाम और मीम’ दिया ।
ताज पसंद को ते और अलिफ के, साथ मिलाकर जीम दिया ।
रजवाड़े को राजपूत, और जटवाड़े को जाट दिया ।
मस्तों को बेफिकरी बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥2 ॥
मोहताजों को मोहताजी दी, गनी’ को इस्तगना’ बख्शी ।
दोजख बद आमालों को, नेकों को खुल्द में जा बख्शी ।
मछली को पानी में मसकिन, परदारों को हवा बख्शी ।
नूर पसंद तवे को नूर, तजल्ली और जिया’ बख्शी ।
ज्वाला मुखी पहाड़ को जगमग, ज्वाला मुखी का लाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥3 ॥
पस्त दिली और पस्त हिम्मती, बालों को उसने दी पस्ती ।
जंगल मिला है जंगली को, बस्ती वालों को मिली बस्ती ।
कतराये जो कीमत देने से, हाथ में ली अशिया सस्ती ।
बे परवाह सेर दिल आली, हिम्मत को दे दी मस्ती ।
जो खरीदने जैसा सौदा आया, उसको वैसा हाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥4 ॥
शरवत और शौकत वालों को, जाह जलाल मुबारक हो ।
मुल्क माल की गरज है जिनको, मुल्क और माल मुबारक हो ।
कोल काल’ आलिम को, और सूफी को हाल मुबारक हो ।
आशिक खस्ता दिल को इश्क का, दर्द मलाल मुबारक हो ।
जो कुछ जिन्होंने माँगा, उनमें उसी चीज को बांट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥5 ॥
जो जैसा था जैसी की ख्वाहिश, वैसी हालत पाई ।
इसमें नहीं कुसूर किसी का, दिल में गौर करो भाई ।
जैसा अपना जरफ बनाया, जरफ में जैसी गहराई ।
फिर भी नहीं कनाअत’ की, हरगिज तुममें आदत आई ।
धार छुरी छुरे को जब दी, तेग दुदम को काट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥6 ॥
शाकिर नहीं अपनी किस्मत पर, रंज न करो न फिक्र करो ।
सोहबत में मुरशद के जाकर, रंग ढंग उसका सीखो ।
बातें कहता रहता है वह, गोस होश’ से रोज सुनो ।
फिर अमली जिंदगी बनाकर, जल्द असलियत पर आजाओ ।
हवस रहेगी नहीं उलट जब, हिर्स हवस का टाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥7 ॥
अर्थ (1) चाँदी (2) इल्म (3) बे परव ह (4) बे परवारी (5) प्रकाश (6)
माल (7) पद () कहना सुनना । (1) नेति (2) ऐति ।
211. अदम’ से निकले तलाशे दिलवर, मैं मैदां जगल देखे ।
कभी नदी और नाले देखे, कहीं गहरे दलदल देखे ।
रेगिस्तान के टीले वीराने, सब घर से निकल देखे ।
चीते शेर के करतब देखे, गीदड़ के छल बल देखे ।
कफे अफसोस दद हसरत से, किसी वक्त मल मल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥1 ॥
जुदा हुऐ दिलदार से जब, यह हालत नहीं पसंद आई ।
हिज्र में सोजो गुदाज़ की सूझी, हुए उसी के शैदाई ।
हाजिर में वह हुजूर में था, गायब में है सौदाई ।
हाजिर गायब में यकसा है, इसकी समझ किसे आई ।
काबा’ में ढंढा जाकर, मंदिर और देवल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥3 ॥
अपने सिर में तलाश का सौदा, समाया होगये मुतलाशी ।
कभी मदीना मक्का पहुँचे, कभी पहुँचे मथुरा काशी ।
कभी नमाज की उठक बैठक, कभी था सिजड़ा फर्राशी ।
बैतुल्हम हम कभी गये, और कभी सुमेरु कभी कैलाशी ।
हास थी आज भी देखें उसको, हमने जिसको कल देखा ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखा ॥3 ॥
हाथ में ली तस्बीह सुमरनी, निर्दजवा था नाम उसका ।
लगा लबों से मिल के हमेशा, था तलाश का जाम उसका ।
दिल में तलब की तड़प उठी,जब याद किया तब काम उसका ।
शेख से पंडित से यूला कहिये, हमें बतादो नाम उसका ।
जाहिर बातिन बरजक के नजारे सब पल पल देखें ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखें ॥4 ॥
मिला नहीं लेकिन मायूसी से, हम नहीं हरगिज घबराये ।
कसरत के ते किये मनाजिल, तबकएवहदत में आये ।
कसरत वह त के मुकाम, और मसकिन सब खाली पाये ।
महरमेराज कहाँ था कोई, भेद जो उसका बतलाये !
पानी में ठिठरे और गले, आग तक में भी जल देखे
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगन देखे ॥5 ॥
वेद पढ़े कुरएन पड़े, पढ़ पढ़ का उनको रट डाला ।
आजिज हुए पड़ा है कैसे, कैसे मूजियों से पाला ।
तेग तअस्सुन की कहीं चमकी, पक्षपात का कहीं भाला ।
नूर सदाकत’ कहीं न पाया, समझा दाल में है काला ।
चिल्ला खींच समाध लगाई, गार गुफा में चल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥6 ॥
इस तलाश से काम न निकला, तब आखिर में पछताये ।
सोहबत में मुरशिद के पहुँचे, दिल में अपने घबराये ।
उसने दिल की किताब पढ़ाई, दिल के राज कुछ समझाये ।
दिल में दिलवर मिला तो, खुश होकर दिलदार के पास आये ।
फिर नहीं देखी तीखी नजर,अवरूप न किसी के न बल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥7 ॥
अर्थ (1) काबा के भीतरी भाग (2) निरंतर () मृत्यु से प्रलय तक (4 }
अद्वैत (5) द्वैत (6) भेद ज्ञातए । अर्थ(1) संतोष (2) चेतन के काम से (3) नेस्ती (4) हथेली (5) बियोग (6) तड़प ।
बिनती
(212 कुल संख्या 1116)
तुम्ही पिता और तुम्ही हो माता,
तुम्ही हो बहन और तुम्ही हो भ्राता ।
तुम्हीं हो धन धाम और सुख के दाता,
तुम्ही हो परम पुरुष सतगुरु विधाता ॥
नहीं ज्ञान विद्या नहीं भक्ति करमा,
नहीं योग युक्ति नहीं ध्यान घरमा ।
तुम्हीं मेरे हो जंत्र मंत्र और मरमा,
तुम्हारे ही संग से गये मन के भरमा ।
झुकाया कमल पद में निज सिर को जाना,
मिली अब शरन पागया हूँ ठिकाना ।
अर्थ – (1) सच्चाई ।
मिटा है सकल काम मद मोह माना,
छुटा है सहज जगत का आना जाना । ।
बचन को सुने रूप अपना पिछाना,
नहीं हो अलग मुझसे तुम मैंने जाना ।
तुम्हारे ही गुन का है दिन रात गाना,
तुम्हारा ही है चित्र मन में समाना । ।
तुम्हीं हो योग और तुम आप युक्ति,
तुम्ही में है सद्गति तुम्ही में हैं मुक्ति ।
मेरे तुम हो पुरुषार्थ बल और शक्ति,
सताते नहीं अब मुझे बन्ध मुक्ति । ।
नमो हां नमो राधास्वामी प्यारे,
हुये हो तुम अब मेरे आँखों के तारे ।
रहूँ मैं सहा आप ही के सहारे,
फिस जगत में सारे दुख सुख बिसारे ।
तेईसवी धुन
प्रार्थना
213. धन्य धन्य दयाल सतगुरु, दीन हितकारी महा ।
चरन कमल की ओट गहकर, भक्त परमानंद लहा । ।
आप प्रगटे इस जगत में, जीव के उपकार को ।
निज दया से नाम देकर, किया जीव सुधार को ।
कर्म धर्म और भरम और, अज्ञान दुख के मूल थे ।
यह हैं कांटे कष्ट के और, जीव समझे फूल थे ।
शब्दयोग की आप ही ने, आप दी शिक्षा हमें ।
सुगम रीति से मिलगई, भव तरन की दीक्षा हमें ।
राधास्वामी सतगुरु, करुना सदन दे नाम दान ।
सहज में हमको उबारो, बख्शो अपना सत्यज्ञान । ।
ॐ बसन्त
214. देखो सखी आई ऋतु बसंत ।
बसो गुरु के पास करो दुख का अन्त । ।
प्रेम कमल विगसे अनन्त ।
कोई टूढो चलकर साधु सन्त ।
बस बस के चसो बसन्त बास ।
दुर्गन्धि जगत की जाये नास । ।
नहीं मन में उपजे क्रोध काम !
रहे होठों पर राधास्वामी नाम ।
सतसंग दुकान का गंधी खोज ।
करो चरन बास गह पद सरोज । ।
नर जनम बसन्त है माघ मास ।
चहुँ ओर प्रेम की फूटी बास । ।
सीखो भक्ति भाव का रंग ढंग ।
करो माया काल को दंग तंग ॥
चौरासी फांस का बंध काट ।
लो साज भक्ति दल साज ठाठ ॥
सतसंग की महिमा अपार ।
बिन संग जाय न भरम विकार ॥
बसो सन्त पास सोई बसन्त ।
लो शब्द योग का सीख मन्त्र ॥
घट अन्तर जो अपने बसन्त ।
वह समझे क्या है ऋतु बसंत ।
बस बस कर प्रेम बास पास ।
बसो तब बसंत की पूरी आस ।
बिन संत चरन के निकट बास ।
नहीं परमारथ की बुझे प्यास ॥
चुनो फूल कमल के गुथ के हार ।
दो प्रेम साथ गले गुरु के डार । ।
मिल छिड़को बसंत बसंती रंग ।
तब भीजे तुम्हारा अंग अंग ॥
जो यह बसंत समझाया गाय ।
कोई प्रेमी बसंत का ममें पाय । ।
बसे बास पास जो खोज सन्त ।
बस उसी के लिये है ऋतु बसंत। ।
राधास्वामी ने भेद बताया सार ।
नहीं बूझे हिये का जो गवार ।
215. घट मांहि बसे राधास्वामी संत ।
मैंने समझा मूल बसंत का तन्त ॥
जब लग घट निकट न बसे कंत ।
तब न बसन्त का सूझे मन्त ।
बिन बसन्त सब जीव जन्त ।
चौरासी लक्ष रहे भरमन्त । ।
जब मन में बसे कोई आके सन्त ।
सब दुख कलेश का होय अन्त ।
गुरु पास में बसना है बसन्त ।
भक्ति बास में बसना है बसन्त ।
नहीं कोई बसन्त का अर्थ और ।
जो समझे पावे ठिकाना ठौर ॥
राधास्वामी मर्म लखाया आन ।
बसे सन्त शरन में कोई सुजान । ।
216. गुरु चरन जब लग बसन्त ।
तब लग समझो ऋतु बसन्त । ।
गुरु चरन बास बस बस बसंत ।
यही मेरे लिये सच्चा बसन्त । ।
जब लग नहीं बास निकट सन्त ।
तब लगकोई बुझेन ऋतु बसंत ॥
भक्ति कुसुम की फली बास ।
मैं आय बसा जब गुरु के पास । ।
सरसों फूली मस्ती की आय ।
मैं पड़ा गुरु के चरण धाय । ।
हुआ मोह भरम का आज अन्त ।
मिले ऋतु बसंत राधास्वामी कंत ॥
दिया सुरत शब्द का मूल मन्त ।
हुआ गुरु मन्दिर का मैं महन्त ॥
राधास्वामी धाम में पाय ठाम ।
लू छिन प्रति छिन राधास्वामी नाम चौरासी
का बन्धन कटाय ।
राधास्वामी कृपा निरवान पाय । ।
217. खेलो भक्ति फाग आया ऋतु बसंत ।
है राधास्वामी सतगुरु परमसंत। ।
चित उमगा प्रेम न हिये समाय ।
मैं चरण गुरु पड़, धाय धाय ॥
नहीं काम क्रोध न मोह व्याप ।
मिटी चिन्ता दुविधा आज आप ॥
गुरु चरन शरन है मूल मन्त्र ।
जो गहे वही सच्चा महन्त ॥
राधास्वामी धाम में बास पाय ।
मैं समय बिताऊँ नाम गाय ॥
218. सिंध प्रेम में गोते मार ।
गहो भक्ति मुक्ति मोती अपार ॥
यह मोती रतन अनमोल जान ।
जो पावे सोई भागवान ॥
चले कमल नीर गति चलन चाल |
गुरु चरन लाग रहे नित निहाल। ।
नहीं व्याये काल करम की गत ।
जो धारे राधास्वामी भक्ति का मत ॥
धन उसका भाग जो पाये सन्त ।
बस राधास्वामी धाम खेले बसन्त । ।
219. बेचन निकसी रस प्रेम का ले ।
राधास्वामी सन्त मग में मिले । ।
एक पन्थ दो काज भया ।
व्यापे न गुजरिया को मोह माया। ।
खा माखन सार छाछ को त्याग ।
मेरी प्यारी गुजरिया के जागे भाग ।
यह माखन गुरु की भक्ति जान |
और छाछ जगत का लाभ हान । ।
राधास्वामी ने भक्ति का गुरु बताय ।
लिया प्यारी गुजरिया को अंग
लगाय ॥
220.गुरु पद बास बसन्त जान |
गुरु भक्ति सुबास बसन्त ज्ञान । ।
भातु बसन्त में खेल फाग ।
गुरु चरन पकड़ तज द्वेष राग । ।
भव दुख का करदे भक्त अन्न ।
तब जाने क्या है ऋतु बसन्त । ।
राधास्वामी दया से जागा भाग ।
वह धन्य जो भक्ति प्रेम रस पाग । ।
221. सुरत चढ़ी अधर अब तज के खंड ।
लख छांड दिया ब्रह्मांड अंड ॥
घट भीतर शब्द की धुन प्रचंड ।
वह कैसे ठहरे पिंड बंड ॥
माया मद हो गये अंड बंड ।
ब्रह्मांड के कर दिये खंड खंड ॥
नहीं काम दाम धन धाम दंड ।
महा काल का सब टूटा घमंड ॥
राधास्वामी दया जब हुई प्रचंड ।
कर्म जाल की रचना का भया भंड ।
222. खेलो खेलो ऋतु आई बसन्त ।
बसो प्रेम बास मिल साध सन्त ॥
फूले बन में टेसू अनन्त ।
नहीं कुसुम फूल का आदि अन्त ॥
आनन्द मिला घट लखा कंत ।
सुरत सखी शब्द संग सुख करन्त । ।
ऋतु बसन्त है प्रेम पन्थ ।
नहीं जाने मन वाला महन्त ॥
राधास्वामी दया ले जीव जन्त ।
अब नहीं भव दुख निधि जल परंत । ।
दोहा प्रेम बास से जो बसे, सोई बसन्त कहाय ।
बसे जो निकट में सन्त के,वह बसन्त सुख पाय ॥
यह बसन्त के अर्थ दो, समझे साध सुजान |
यही अर्थ है मुख्य कर, दूजा गौण समान ।
223. गुरु बास सुबास से मन बसन्त, परमारथ का है सो बसन्त । ।
खुली आँख सहस दल कमल आय, त्रिकुटी चढ़ निरखा ओम जाय ॥
किया जिसने चित से संग सन्त, परमारथ का है सो बसन्त ।
गई सुन्न शिखर सुरत झूम झूम, मची सुन्न समाध की घट में धूम ॥
हुआ काम क्रोध का यहां अन्त, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सोहंग धुन बंसी बजाय, नसे माया काल के सब उपाय ।
हुई मतवाली सुरत अब महंत, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सद पद सत लोक में बजी बीन, लिया सुरत ने अपना रूप चीन्ह ।
हुआ शब्द सुरत का सच्चा कंत, परमारथ का है सो बसन्त ॥
लख अलख को अगम की गम को पाय, तुर्या से पहुँची ऊची जाय ।
राधास्वामी पद में नित बसन्त, परमारथ का है सो बसन्त ॥
224. सुन फकीर आई ऋतु बसन्त की ।
धार हिये अब रीति संत की ।
गुरु के पास बसे जो बसन्त ।
गुरु के बास बसे सो सन्त ॥
तू राधास्वामी के शरन में आया ।
चरन कमल में बासा पाया ।
ऋतु बसन्त की यह एक रीत ।
पाल चरन की प्रेम प्रीत ॥
कर सतसंग विचार के साथ ।
तेरे सीस रहे गुरु का हाथ ॥
दोहे धाम बसन्ता ग्राम है, बसे जो गांव बसन्त ।
सन्त निकट आकर बसे, पावे पदवी सन्त ।
इस बसन्त के तीन गुन, समझ समझ हरखाय ।
मन में सोच विचार कर, तू मत धोका खाय । ।
कहता हूँ कहजात हूँ, कही सुनी मत मान ।
कही सुनी प्रथम दशा, तीन गुनन की खान ॥
सत रज तम को निरख कर, गुन का कर व्यौहार ।
सगुन रूप तेरा बने, सन्त मते का सार । ।
तम है दृढ़ता मूढ़ता, शिव के देह का गुन ।
ज्ञान पाय दृढ़ मूढ़ हो, कथन को मेरे सुन ।
भरत की दृढ़ता परख कर, हो जा मूढ़ का भाव ।
तब आगे पग धार तू , सूझे सहज उपाय ॥
जान बूझ अनजान बन, ज्ञान पाय अज्ञान ।
चल पौरुष ले निबल हो, सो सच्चा बलवान ॥
फिर चल रज की राह पर, करम धरम व्यौहार ।
मूढ़ भाव करनी करे, धार हिये में प्यार ॥
करम करे करता नहीं, अभिमानी बिन मान ।
विन बानी बातें करे, बिन पग चले सुजान ।
बिना नैन दृष्टा बने, देखे बिमल बहार ।
परबत बन सब ते करे, बिन वाहन असवार ॥
सालोकी सामीपता, सारूपी चित धार ।
तीन गुनन का परख गुन, साँच बसन्त विचार । ।
सत संगत में आय कर, बस जा मेरे पास ।
यह बसन्त का मेद है, धार गुरु की आस ॥
225. सुन फकीर अब भेद अनूप ।
समझ बसन्त का दजा रूप ॥
तिल से तेल फूल संग बासा ।
सो बसन्त है अगम अभासा । ।
फूल के संग मिले जब तेल ।
बसा बास तब बने फुलेल ।
यह फुलेल सब के मन भावे ।
तिल का तेल न फूल कहावे । ।
राजा रानी के सिर चढ़े ।
सिर की पीड़ा तुरत ही हरे । ।
यह बसन्त है अगम अपारा ।
समझे कोई गुरु मुख प्यारा ॥
जीवन मुक्त दशा में बरते ।
देह गेह गहि उत्तम परखे । ।
अछत देह पावे निरवान !
यह धुर पद यह सत पद जान । ।
जनक राज की फिरे दुहाई ।
ज्ञान मार्ग ऋषि मुनि सिखाई ॥
जीवन मुक्त विदेह अवस्था ।
इस बसन्त की घारे कक्षा । ।
दोहे तीन गुनन के त्याग से, चौथे पद में आय ।
ताको सब कोई कहत है, सायुज गति सो पाय ॥
बस बसन्त के निकट में, धार ले रीति बसन्त ।
चौथे पद में बास कर, छोड़ तीन का तन्त ॥
ऐ फकीर आ पास में, गहले बास सुबास ।
बस बस मेरे रूप में, हो सन्तों का दास ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाना ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याना ।
राधास्वामी सन्त रूप धर आये ।
तीन छोड़ चौथा पद गाये ॥
राधास्वामी अगम अपार अमाना ।
राधास्वामी अलख अथाह महाना । ।
राधास्वामी धुरपद सतपद सांचा। ।
राधास्वामी लख फकीर तब नाचा ॥
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी तब हैं अब राधास्वामी ।
राधास्वामी किरन भान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह जान राधास्वामी ॥
राधास्वामी सिंधु बुन्द राधास्वामी ।
राधास्वामी एक द्वन्द राधास्वामी ॥
दोहे भेद बसन्त बताय कर, सार बताऊँ तन्त ।
इसका करदे अन्त अब, यह बसन्त बस अन्त । ।
जो समझे इस भेद को, साई दास फकीर ।
ज्ञान करम का भेद लख, होजा मत का धीर ॥
राधास्वामी की दया, हिये में धार फकीर ।
होजा सबका पीर तू , समझ पराई पीर ॥
226. सुन फकीर तोहि भेद सुनाऊँ ।
शब्दयोग खुलकर समझाऊँ ॥
सहस कमल दल रहे अनेक ।
इस पद में नहीं सूझे एक । ।
वह विराट का रूप कहावे ।
दो प्रकार का शब्द सुनावे । ।
ज्योति निरंजन माया ईश्वर ।
प्रगटे महा स्थूल रूप धर । ।
सहस आँख और सहस कान हैं ।
सहस कला के यह स्थान हैं ।
देख बिराट की अगम छबि, चित में हो प्रसन्न ।
तव त्रिकुटी की ओर चल, धर गुरु मूरत मन ॥
त्रिकुटी पद में है ओम्कारा ।
त्रिलोकी का सार पसारा ॥
अ उ म का शब्द रसाल ।
धुन प्रगटे सुन चित संभाल ॥
लाली उषा दृष्टि में आई ।
सुरत देख देख हर्षाई । ।
गुरु ने धारा लाल स्वरूप ।
श्रुति संयुक्त त्रिलोकी भूप ॥
सत रज तम की धारा तीन ।
प्रगटी यहां से सुन सुन चीन्ह । ।
वेद धाम प्रणव दशा, सहज उद्गीत का साज ।
राग सुनावे अद्भुती, तीन त्रिपुटि दल साज । ।
गुरु से भेद पाय चल आगे ।
सुरत प्रेम के रस में पागे ।
सुन्न शिखर चढ़ ध्यान लगावे ।
यहां द्वत पद रूप दिखावे । ।
ध्येय ध्याता और ज्ञानी ज्ञाता ।
सुन में द्वैत भाव रहे माता ॥
किंगरी और सारंगी की धुन ।
दोय धार हुई मुझसे सुन ।
पुरुष प्रकृति का अस्थाना } लीला रची विचार महाना । ।
यह सर्विकल्प समाधि का, धाम है मेरे फकीर ।
योगी योग के सिद्धि से, देह की भूले पीर । ।
महासुन्न तिस परे सुहाई ।
ब्रह्मरेन्द्र की चौकी माई ॥
घोर अँधेरा छाया जहां ।
गुरु बल ले सुरत चली वहां । ।
प्रगटा सूर विचित्र अपारा ।
उज्जल विमल अमल अति प्यारा ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
जाय लगाया गुरु का ध्यान ॥
लगी समाधि अखण्ड अनूप ।
नहीं वहां परजा नहीं वहाँ भूप ॥
निर्विकल्प पद तेहि निरख, यह अद्वत का धाम ।
साध ताहि तू सुरत से, ले ले गुरु का नाम ॥
कसरत असनियत और वहदत ।
वीनों का अति भेद है अद्भुत ॥
योगी ज्ञानी ऋषि मुनि भाई ।
इन तीनों में रहे लुभाई ॥
सत चित आनन्द में ठहराई ।
देह बुद्धि सुरत में भरमाई ॥
सत है देह योगी का योग ।
चित है मन ज्ञानी का सोग ॥
आनन्द ब्रह्म सुरत की लीला ।
माया काल ने उसको कीला । ।
तीनों तीनों में फंसे, सतगुरु मिला न कोय ।
यह सब भूले आप में, गये भरम में खोय ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीन ।
सृष्टि स्थिति प्रलय चीन्ह ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल को जान ।
जीव देश और ब्रह्म पिछान ।
स्थूल सूक्ष्म में रहे भुलाने ।
नहीं कोई पहुँचा ठौर ठिकाने ॥
तुर्यातीत का भेद न जाना ।
तुर्यातीत का मिला न ज्ञाना ।
कैसे खोल खोल समझाऊ ।
मिथ्याराद को केहि विधि गाऊ ।
देह सत और कर्म है, मन चित ही है ज्ञान ।
सुरत आनन्द का रूप है, यह विचार ले मान ॥
यहां तक सबकी गम है भाई ।
आगे की कोई खबर न पाई ॥
सुन सतगुरु का तू उपदेशा ।
आगे धाम में कर प्रवेशा ॥
भंवर गुफा की खिड़की खोल ।
सुन सोहंग की बंसी बोल ॥
माया काल का भेद पिछान ।
तब सतगुरु का पावे ज्ञान ।
मन है ज्ञान चित मेरे भाई ।
बिचली दशा न जा भरमाई ॥
सच्ची तुर्या यहाँ मिले, तुर्यातीत परख ।
दोनों की गम गुफा में, मन में आने निरख ।
चल आगे को मर्द फकीर ।
सतपद सतगुरु पद ले धीर ।
बीन की धुन जहां प्रगटी सत सत ।
सत्तपुरुष का दरस परस तत । ।
यहाँ नहीं देह न गेह न माया ।
यहाँ नहीं सूरज चांद न छाया ॥
एक सत्त का भाव फकीरा ।
अलख अगम चल गहर गंभीरा । ।
राधास्वामी अचल मुकाम ।
यहां मिले सांचा बिसराम ॥
भेद बताया मूल यह, सन्त मते का सार ।
सत संगत अभ्यास बिन, समझ बूझ से पार ॥
शब्द योग को साधकर, सुन संगत के बैन ।
तब समझेगा तत्व को, तत्व भेद है सैन ।
सैन बैन को जो लखे, सोई संत फकीर ।
राधास्वामी की दया, नहिं व्यापे भव पीर ॥
बिनती (212 कुल संख्या 1130) गुरु धरा शीश पर हाथ, मन क्यों फिकर करे ।
गुरु रक्षा हरदम संग, क्यों नहीं धीर धरे ।’
गुरु राखें राखनहार, इनसे काज सरे ।
मेरी करें पक्ष दिन रात, उनसे काल डरे ॥
मेरे मात पिता गुरु देव, महिमा कौन करे ।
राधास्वामी दीन दयाल, तुमसे काज सरे ॥
131
चौबीसवी धुन
प्रार्थना
228. भक्ति दान गुरु दे मुझे, तू अन्तर्यामी ।
शीस झुके पद कमल में, बहु बार नमामी ॥
दाता दान साइयाँ, सब का हितकारी ।
केहि विधि स्तुति मैं करूँ, तू अन्तर्यामी ।
गुरु देवन का देव तू , घट घट का बासी ।
अगम अपार अखंड नित, सुखमय सुख रासी ।
सत चित आनन्द रूप की, महिमा अति भारी ।
सहज अनादि अनंत विभु, को बरणे पारी ॥
अलख अगाध अथाह बहु, नहीं रंग न रूपा ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब अमर अनूपा । ।होली
229.होरी खेले सुरत सत संग ॥टेक ॥
सहस कमल दल धूर उड़ाई, त्रिकुटी गुलाल का रंग ।
सुन्न स्वेत का पहरा चाना, भंवर राग सोहंग । ।
होरी सत पद बीन मधुर धुन बाजी, उपजी मन में उमंग । ।
अलख अगम राधास्वामी गति परखी,काल भया दिल तंग । होरी
घंटा शंख सरगी बाजे, तबला और मृदंग ।
बंसी शोर जोर कर व्यापा, कोटि कृष्ण रहे दंग ॥
होरी नाचत सुरत अप्सरा प्यारी, धार भक्ति का ढंग ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई, सूझी सहज उचंग ॥ होरी0
राधास्वामी संग सुरत खेले होरी, अद्भुत अगम अमंग ।
तन मन की सुध बुध सब भूली, पी पी प्रेम की भंग ॥ होरी0
230. ठगनी आई ठगन संसार ॥टेक ।
रमा के रूप में विष्णु को लूटा, पारवती त्रिपुरार ।
गायत्री बन ब्रह्म ही घाला, माया चंचल नार ॥
ठगनी0 भक्ति भाव लख भक्त लुभाने, ज्ञानी ज्ञान हंकार ।
योगी ऋधि सिधि नौ निधि भूले, माया महा बरियार । ।
ठगनी0 ब्राह्मण बरन गोत्र कुल पाखंड, क्षत्री भुज बल भार ।
शूद्र मोह वैश्य धन दौलत, माया का भेस अपार ॥
ठगनी0 माया अगुन सगुन की मूरत, निराकर साकार ।
तीरथ बरत कर्म और धरमा, माया नरक विचार ॥
ठगनी0 एक बचा सतगुरु का सेवक, टेक गुरु की धार ।
राधास्वामी बल ले भया बलाना,माया को दिया पछार ॥
231.होरी खेलत सुरत नई ॥टेका ।
शब्द सुरत बनी शब्द की मूरत, शब्द के धाम गई ।
शब्द में शब्द शब्द लखपाया, सब कुछ शब्द मई ॥
जैसे जल में कमल निरालम, मुरगावी निशानिये ।
सुरत शब्द भवसागर तरिये, नानक नाम बखानिये ॥
होरी0 शब्द समानी सूरत प्यारी, शब्द सुने जो कई । ।
सुन धुन छाँट विवेक बिचारा, बहुर अशब्द भई ॥ होरी0
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय ।
सुरत समानी शब्द में, ताहि काल नहीं खाये ।
होरी0 राधास्वामी ऐसी खेलाई होरी, चरन शरन में लई ।
दुविधा द्वन्द विकार नसाया, रहा न प्रान रई ॥
होरी0 सत तक रूप रंग की रेखा, आगे चढ़कर कुछ नहीं देखा ।
जो कोई इतने ऊँचे चढ़े, रूप रंग रेखा से टरे ॥ होरी0
232. जगत से नाता तोड़, सुरत आज खेलत होरी ।।टेक ॥
माया के घर आग लगाई, काल करम सिर फोरी ।
काम क्रोध की खाक उड़ाई, मोह से मुख को मोरी ॥
सुरत आज तत्व विवेक हाथ पिचकारी, प्रेम का रंग भरोरी ।
बुक्का श्वेत शुद्ध भक्ति का, गुरु के चरन छिरकोरी ॥
प्रीत वस्त्र से अंग सजाया, श्रद्धा गुलाल मलो री ।
नाचत गावत धूम मचाक्त, शोर अकास गयो री ॥
ठुमक ठुमक थिरकत पग धारत, सत पुर ओर चलो री ।
सुरत सुहागिन निरत रूप धर, गुरु आगे मचलो री ॥
घुमर घुमर राधास्वामी परिक्रमा, उमंग से पद पकरोरी ।
गाय ध्याय कर भक्ति भाव का, फगुवा माँग लियोरी ।।
233. खेलू अनहद फाग अपार ॥टेक। ।
दुख नहीं व्यापे मोह न मोहे, उपजे न भरम विकार ।
राधास्वामी नाम का सुमिरन निसदिन,गुरुपद प्रेम पियार ॥खेलू0
राधास्वामी इष्ट का ध्यान रहे घट, देखे ज्योत अपार । ।
गुरु की मूरत हिये विराजे, त्याग के सोच विचार खेलू
घंटा शंख बजे मेरे अन्तर, प्रगटे धुन झनकार । ।
राधास्वामी शब्द गूंज रहा सिर में, पल छिन बारम्बार खेलू0
234. होली खेल ले दिन चार टेक ॥
फागुन मस्त महीना आया, पिया संग धर उर प्यार |
चरन लाग तन मन की सुध बुध, त्याग प्रेम चित धार होली0
दोऊ नयन की बना पिचकारी, भक्ति रंग बहार ।
हँस हँस गा गा भर भर छिन छिन, पिया के अंग पर डार होली0
सुरत की चतुर सियानी गुजरिया, तन मन सकल सिंगार ।
राधास्वामी अपने पिया को रिझाले, सुन्दर अबला नार होली
235. होली खेलू चरन गुरु लाग ।टेक ॥
जग की मोह नींद नहीं व्यापे, सत संगत में जाग ।
वचन विलास भजन और सुमिरन, गाऊँ अनहद राग होली0
मन पर करू पल पल असवारी, फेर निरोध की बाग ।
गुरु के पन्थ किया पयाना, चित घर सहज विराग होली0
सेवक रूप में पद की सेवा, फगुवा भक्ति का मांग ।
चिंता भरम की ओर न चालू , धर श्रद्धा अनुराग होली0
प्रेम भंग पी मस्त रहूँ नित, भरम विकार को त्याग ।
राधास्वामी धाम की रहे परिक्रमा, यह मेरा अद्भुत भाग होली
236. होली खेलू रंग भरी ॥टेका ।
आलस नींद प्रमाद को त्यागू, चित गुरु चरन वरी ।
सुमिरन भजन ध्यान घट भीतर, तन मन सुध
बिसरी होली जग चिंता की धूर उड़ाई, माया देख मरी ।
प्रेम गुलाल मला जब मुख पर, काल की गति बिगरी
होली अनहद धुन का हुआ दिवाना, मोह की विपत हरी ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई थेई, नाचत सुरत परी होली
मेरी होली है सबसे न्यारी, सच्ची सहज खरी ।
कोई कोई जाने साध सुजाना, धुन जेहि कान परी ॥होली0
राधास्वामी संग दह फाग रचाया, माया संग लरी ।
सुरत निरत ले कुल परिवारा, भव के सिंध तरी होली0
237. होली खेल ले आये फागुन के दिन चार ॥टेक ॥
यह नर जनम फाग की ऋतु है, सुगम सुहेल अपार ।
प्रेम गुलाल अबीर भक्ति का, बुक्का प्रीत पियार होली0
अनहद धुन का राग सुहाना, मस्ती विवेक बिचार ।
खेल खेल में दोनों सुधरे, परमारथ व्यौहार होली
गुरु का सतसंग राग अखाड़ा, बाजे घट झनकार ।
सुरत की चाल को नाच समझ ले, सुखमन तार
सितार होली सहस कमल घंटा मृदुबानी, त्रिकुटी ताल ओम्कार ।
सुन्न सारंगी भंवर में बसी, सत पद बीन का सार
होली यह होली कोई गुरु मुख खेले, त्यागे भरम विकार । ।
रच अचिन्त गुरु चरन कमल लग, राधास्वामी की बलिहार ॥
238. होली आई खेल ले फाग ॥टेक ॥
पुरुष प्रकृति का ब्याह रचा है, जागे सबके भाग ।
पुरुष लाल रंग बाना धारा, प्रकृति बसन्ति सुहाग होली0
सूरज चाँद नक्षत्र बराती, गाते मंगल राग ।
अनहद धुन का शोर मचा है, बाजे प्रेम अनुराग होली0
ममता मोह घोड़ा असवारी, मोड़ हिये की बाग ।
निश्चल दृढ़ भक्ति के हाथी, ऊंट त्याग वैराग होली
सुरत शिरोमनि नाचन लागी, मोह नींद से जाग ।
चित विरती का किया निरोधा, गुरु चरनन से लाग होली0
प्रीत समाज की सजी बराता, सुन्दर सहज सुभाग ।
राधास्वामी पद मंडप अस्थाना, ब्याह भक्ति का फाग होली0
239. होरी ब्रज में कैसी मचोरी ॥टेक। ।
यह ब्रज भूमी ब्रज का मंडल, अद्भुत साज सजोरी ।
नंद आनन्द यशोदा प्रकृति घर, मन कान्हा प्रगटोरी ॥होरी0
इन्द्री गोप गोपी संग मिल जुल, रास बिहार रचोरी ।
सुरत सार माखन रस चाहे, नित प्रति उठ करे चोरी ॥होरी0
जमुना करम धरम की धारा, बिटप विराट लखोरी। ।
चीर हरी गोपिन की सारी, कदम्ब के गाछ चढ़ोरी ॥होरी0
सखा गोप ले ग्वाल मंडली, करम खेल बिलसोरी ।
काली दह में गेंद गिरी जब, उछल के कूद परो री ॥
होरी0 विषधर नाग मलिन मनकी गति, फन पर अभय चढ़ोरी ।
बंसी बट बंसी धुन गाई, थिरक थिरक नाचो री॥होरी0
राधा सुरत के रूप पे मोहा, अंग संग अपने कियो री ।
मथुरा नगर कंस अज्ञाना, ताहि मार नासो री ॥
होरी कर अज्ञान का नास कृष्ण सोई, दसम द्वार पहुँचो री ।
का है ब्रह्म द्वार दरवाजा, द्वारका जाये धरो री ।
होरी0 सोहंग सोहंग मुरली बजावे, सोहंग धाम लियो री ।
ओम के ऊपर सोहंग की गति, भँवर गुफा मचलोरी ॥
होरी0 यह होरी ब्रज भवर की होरी, कोई कोई साधू कहो री। ।
राधास्वामी संग सार हम पाया, सत पद खेल गयो री॥होरी0
240. खेली चित प्रसन्न, आज अन्तर घट होली ।।टेका ।
महस कमल में फंसी उमंग से, सुरत निरत की टोली ।
गुरु पद ओम्कार जा पहुँची, त्रिकुटो महल में डोली खेली ।
लाल गुलाल प्रेम रंग भरकर, हिये पिचकारी खोली ।
तक तक मारा गुरु के चरनन, बुक्के की उल्टी झोली खेली0
फाग राग मंगल मृदुबानी, ओम् शब्द धुन बोली ।
गाय रिझाय मनाय गुरु को, दृष्टि दृष्टि से तोली ॥
हृदय पात्र में भंग भाव की, साहस जल में घोली ।
पीते ही तन की सुध बिसरी, सूझी सहज ठिठोली ॥
गिरत पड़त भूमत पग धारत, चरन शरन में रोली ।
राधास्वामी अंग लिया लपटाई, समझ सुरत को भोली ॥
241. खेल री अपने घट होरी ॥टेक ॥
चित की दुचिता जला दे मन से, दुविधा से नाता तोरी ।
शम दम साध के कर सतसंगत, नेह गुरु से जोरी खेल री0
प्रपंच से मुख मोरी ॥
बचन विलास सेवा और पूजा, सतसंग चित धरो री ।
बाहर मुखी बिरती को त्यागो, अन्तर मुखी गहोरी ॥
दर्शन गुरु घट में करो री ॥
काम क्रोध को आग लगाई, जरबर भस्म भयो री ।
भक्ति भाव अबीर गुलाला, गुरु पद में छिरकोरी ॥
मान की मटकी फोरी ॥
शंख मृदंग बजा कर अन्तर, फाग राग गायो री ।
अनहद धुन व्यापी घट भीतर, अमृत भंग पियो री ॥
बुद्धि मति हो गई भोरी ।
यह होरी कोई साधु खेले, गुरु गम ज्ञान लियो री ।
गधास्वामी पद बिसराम मिले तब, यम भयत्रास गयोरी । ।
करे माया न ठगोरी । ।
242. सुरत प्यारी होरी खेले आज नई टेक ॥
अपने गुरु की बनी है पियारी, प्रेम प्रतीत मई ।
भजन ध्यान सुमिरन को चित दे, मन में मगन भई ।
सुरत0 प्यार अबीर गुलाल हाथ ले, प्रीत पिचकारी गही ।
गुरु के चरन छिड़क निस बासर, सुख आनन्द लही ।
सुरत0 गुरु समान कोई दृष्टि न आवे, गुरु गम ज्ञान लही ।
नाचे उमंग से लज्जा तज कर, थिक थिक थेई थेई । ।
सुरत0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, भक्ति दान दई ।
सुरत प्यारी हुई गुरु पियारी, गुरु की गोद रही । ।
सुरत0
243. खेल न जाने होरी, सुरत जो मति की भोरी ॥टेक। ।
विरती न रोके मन नहीं सोधे, चित गुरु चरनन जोरी ।
सुने न फाग राग अन्तर घट, अनहद होरी मचोरी ॥
सुरत जो0 मन के हाथ नहीं पिचकारी, रंग उमंग न भरो री ।
ऊँचे चढ़ कर इष्ट रूप का, दरस परस न करो री ॥
शम दम की कुछ कर ले कमाई, आलस नींद तजोरी। ।
तब दरशन राधास्वामी का पावे, अद्भुत ज्योत लखोरी ॥
244. आंखों ने होली सिखाई, हां तेरी आंखों ने होली सिखाई ॥टेक। ।
जब से रूप का दर्शन पाया, सुध बुध सब बिसराई ।
मतवाला बन झूम रहा हूँ, भूली अपनी पराई ।
नहि चित में दुचिताई ॥
हां तेरी आंख में अमृत विष है तेरे, आंख में मद मदताई ।
देखत जियत मरत मदमातत, दशा विचित्र बनाई ।
लखे कोई ज्ञानी आई ॥
हां तेरी0
आँख में तीन रंग के डोरे, लाल स्वेत कजराई ।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था, दृष्टि में तेरे समाई ।
कहे कोई कैसे बनाई ॥
हां तेरी0 आंख में सृष्टि प्रलय और उत्पति, रचना रचत रचाई ।
ब्रह्मा विष्णु महेश तीन मिल, अपनी रीति चलाई ।
मरम कोई जान न पाई ॥
हां तेरी0 बुक्का गुलाल अबीर आँख में, झोली विचित्र सजाई ।
दृष्टि हाथ पिचकारी से छिड़का, गुरु चरनन चितलाई ।
भेद राधास्वामी बताई ।
हां तेरी
245. होली होली होनी जो थी गुरु कृपा होली ॥टेक। ।
सत रज तम की खाक उड़ाई, अबीर प्रेम की घोली ।
गुरु के चरन मार पिचकारी, निज ममता सब धोली
होली जिभ्या कान आंख को मीचा, अन्तर के पट खोली। ।
भूल राग जग के अन्तर में, अनहद की धुन बोली होली
प्रीत रीत के रंग रंगी है, तन की मन की चोली ।
सब विधि भक्ति रंग से भरली, हिया की अपनी झोली होली
फगुवा खेलत फाग मनावत, आई सुरत की टोली ।
शब्द सुहाने गावन लागी, अन्तर मुख को खोली होली
गधास्त्रामी रंग रंगाया, दे सिर माथे रोली ।
अब तो रंग गई गुरु के रंग से, मेरी सूरत भोली होली
246. सुरत आज खेलत फाग नई ॥टेक ॥
आये बसन्त कंत मुख देखा, आनन्द धूम मची ।
काल करम का चुका है लेखा, अब गुरु रंग रची ।
माया मौन भई ॥ सुरत
अचल सुहाग दिया गुरु पूरे, प्रेम के बास बसी ।
मोती हीरे निछावर कीन्हे, मुखड़ा देख हसी। ।
मंगल प्रेम मई ॥
सुरत0 राधास्वामी फाग रचाया, अद्भुत अगम महा ।
बाजी गत प्रगटी धुन अद्भुत, हर्ष हुलास लहा ।
चिन्ता सकल गई ॥
सुरत0
247. सखी मेरी न्यारी है सबसे होली ॥टेक ॥
सबकी होली पुरानी लीक है, मेरी तो है बर होली ।
बिरह की आग कलेजे भड़के, जल रहे पंजर झोली ॥सखी0
ज्वाला न फटे धुवां न निकसे, समझे कौन मेरी बोली ।
आंखों की पिचकारी बनी है, रक्त रंग हिया घोली ॥सखी0
बिरह की होली की धूम मची है, ब्रज की ठिठोली। ।
तन मन की नहीं सुध कुछ मुझको, खाली प्रेम की गोली ॥सखी0
भंग धतूरे की मस्ती नहीं है, यह है मस्ती अतोली ।
और तो डफ मृदंग बजावे, तन मेर ढोल अडोली ।सखी0
नस नाड़ी का तार बना है, इन्द्री है फाग की टोली ।
मति गति अनहद राग अनोखे, गाती है सूरत भोली सखी0
हिया जिया उमंग प्रेम से भरा है, भरम की गुंडी खोली ।
राधास्वामी चरन धूर का टीका, यह मस्तक की रोली ।।सखी0
सच्ची होली मेरी सजनी, और है आंख मिचौली ।
राधास्वामी संग खेल रही निसदिन, होली होली होली ॥सखी0
248.| खेले होली सुरतिया उमंग भरी ।।टेक। ।
इंगला पिंगला त्याग के दोनों, सुखमन मध्य सिधाई ।
केसर तिलक थाल भ्र मध्य में, त्रिकुटी गढ़ चढ़ धाई ॥ खेले0
घंटा शंख पखावज बाजे, ओम की धुन सुन पाई ।
गुरु चेले का साथ हुआ है, सुन्न सरोवर आई ॥
खेले0 सारंग सारंग धूम मची जब, भवर की खिड़की निरखी ।
चन्द्र सूर घट तारे चमके, अपनी गति मति परखी।
नाची नाच सुहाना घट में, गा गा अनहद बानी ।
सतपद गूंज रही धुन बानी, हुई सहज निरवानी । ।
अलख अगम के पार ठिकाना, थिरकत ठुमकत नाची ।
राधास्वामी धाम में पाया बासा,भक्ति अंग संग रांची ॥
249. सुन्दर फाग रचाया, सुरत मेरी खेले होली ॥टेका ।
होली जलाई खाक उड़ाई, माया की करी ठिठोली ।
काल कर्म को माटी मिलाई, चढ़ी शब्द की डोली ॥सुरत0
रज का गुलाल मला मुख ऊपर, मस्तक प्रेम की रोली ।
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ धाई, शब्द अनाहद बोली ॥
सतसंगत सत सगुन के संग में, सत सत्ता की बानी। ।
गुरु के बचन का श्रवन मनन नित, निध्यासन निरवानी ॥
सुमिरन भजन ध्यान रस पागी, एकरस जीवन व्यापा ।
सुरत शिरोमनि लख निज आपा, परख लिया निज आपा ॥
तीन त्याग चोथे पद आई, गुरु के बचन प्रमाना ।
शब्द अनुमान प्रमान लखे सब, प्रगटा हिये सत ज्ञाना ॥
तीन त्रिलोकी का नाता तोड़ा, अ उ म गति बूझी। ।
सोचा समझा विचारा मन में, अलख अगम की सूझी ॥
तीन त्रिलोकी में नाम कहां है, चौथे नाम का वासा ।
कोई कोई जाने साधु विवेकी, त्याग त्रिलोकी आसा ॥
जो कोई तीन की आसा धारे, चौथे पद नहीं आवे ।
गुमिरन भजन ध्यान गहि राखे, तब चौथे पद पावे ॥
सतसंगी बने साध की गति ले, हंस भाव चित लावे ।
शब्द नीर को मन कर छाने, परम हंस गति पावे ॥
सुरत0 इन चारों के ऊपर भाई, संत की पदवी भाई ।
नाम रहे सतगुरु आधीना, राधास्वामी भेद बताई ॥
कोई कोई परखे राधास्वामी बना, बैना रटन लगावे । ।
तब सत मत का सार पिछाने, जीते मुक्ति मनावे ॥
250. होली होली होली होली, सुरत खेले भक्ति की होली ॥टेक। ।
काल कर्म माया ने सब विधि, जग में दिया झकोली ।
तब सूरत को सुरता आई, त्यागी आंख मिचोली ॥
सुरत0 शारद शेष गनेश महेशा, ब्रह्मा विष्णु की टोली ।
यह नहीं जाने मरम संतों का, मरम नहीं है ठिठोली ॥
पुस्तक योथी में भेद कहां है, भेद है संत की झोली ।
घट झोली रहे ज्ञान अबीरा, प्रेम गुलाल की गोली ॥
भौं के मध्य पाये पिचकारी, गुरु चरनन झकझोली ।
गावे आनन्द राग सुहाना, निरख सन्त मत बोली ॥
पीकर प्याला नाम अमीरस, हो रहे बारी भोली ।
नशा न उतरे प्रेम भंग का, घट प्याले में घोली ॥
चित की वृत्ति निरोध किया तब, होगई अटल अडोली । ।
तब आई गुरु की शरनागत, चरन छांह में डोली ॥
सहजे सहजे फेरो मन को, जैसे पान तम्बोली ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, जो होनी थी होली ॥
251. खेले सुरत आज सतज्ञान की होली ।।टेक। ।
शब्द का वन मनन अर्थ का, आशय का निदिध्यासन ।
भजन ध्यान सुमिरन की यह विधि,हो रही अमल अतोली ॥ खेले0
सतसंगत में गुरु के आई, नाम वाक्य चित धारा ।
घट में विवेक विचार संभारा, अनहद धुन तब बोली । ।
खेले0 ज्ञान भक्ति में भेद नहीं कुछ, कोई कोई बिरला जाने ।
सुरत सखी पहनी जब चित से, गुरुमुखता की चोली ॥दम
इन्द्रिन का शम निज मन का, समाधान संशय का। ।
भक्ति मुक्ति इच्छा उपजे चित, यह सिद्धांत अमोली ॥
चौसाधन बिन ज्ञान है निष्फल, नहीं अधिकारी कोई। ।
महावाक्य की विधि तब सूझे, ज्ञान का परदा खोली ॥
गुरुमुख शब्द वाच है सांचा, लक्ष गुरु का रूपा ।
पिये भंग चिन्तन का नित ही, प्रेम के जल में घोली ॥
अधिष्ठान में वृत्ति जमावे, रहे मगन मन अपने ।
शब्द ओम्कार सुरत घट निर्मल, सत पद जाय टटोली ॥
सुन्न शिखर पर ध्यान जमावे, भँवर में बंसी बजावे ।
सतपद में करे सदा निवासा, अमल विमल सुरत भोली ॥
यहि विधि होली खेले सजनी, नाम संग गुरु साथा ।
राधास्वामी दया रूप तब दरसे, लगे समाधि अडोली ॥
252. होली आई खेले फाग, सुरतिया सुहाग भरी ॥टेक। ।
दोऊ आँखों की बनी पिचकारी, प्रेम रंग भरपूर ।
तक तक गुरु मूरति पर छिड़का, भक्ति दृष्टि से धूर ॥
सुरतिया हिये की झोली गुलाल प्रीति का, बुक्का भाव सुहाना ।
गोला कुमकुम फेंक के मारा, रूप बनाया निशाना ॥
अनहद राग फाग धुन लागी, सहज भक्ति की होली ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत सुहागिन भोली ॥
253. होली आई खेले फाग, सुरतिया सुहाग भरी ॥टेक। ।
सोलह शृंगार के भूषन पहने साड़ी प्रीत की धारी ।
प्रेम अबीर गुलाल भक्ति ले, ठुमक चली मतवारी ॥
होली तिल पर सहस कमल का बिंदा, माथे टीका त्रिकुटी ।
सुन्न की टिकली सोहे मध्य में, भंवर की झूमर प्रगटी ॥
भक्ति सेंदूर से माँग भराई, सत मोतिन लड़ माला ।
राधास्वामी चरन परिक्रमा फिरती,सुरति नारि बर वाला ॥
बिनती
(254 कुल संख्या 1156) आंख में रूप अनूप बिराजे, जिभ्या पर तेरा नाम रहे ।
मन में तेरा भजन ध्यान हो, इसी से मुझको काम रहे ॥
जो कुछ देखू तेरी हो लीला, जो कुछ कहूँ हो नाम तेरा ।
जो कुछ करूं हो सेवा तेरी, सुमिरन आठों याम तेरा ॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, दया दृष्टि मुझ पर कीजे ।
जग के मोह जाल कटवाकर, चरन शरन में लीजे ॥
145
पच्चीसवी धुन
प्रार्थना
( 254) करम भोग अति कर सहे, पाया विपति कलेश ।
दाता अब तो दया कर, पहुँचू सत के देश ।
काल करम व्याये नहीं, मिटे मोह संसार ।
सहजे ही भव सिंध से, कर बेड़े को पार ॥
ज्ञान ज्ञान का ज्ञान तू, ध्यान ध्यान का ध्यान ।
तेरी कृपा महान से, छूटे सब अज्ञान ॥
तुझ में बल और शक्ति है, तू है शक्तिवान ।
अपने बल और शक्ति से, मेरा लगादे ठिकान । ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब कर मेरी सहाय ।
सुरत बहिरमुख ना रहे, अन्वरमुख बन जाय ।
सोहर
255. घरसत धार अखण्ड, द बिन पानी हो ।
ललना, उठत फुहार, सुरत मुसकानी हो ॥1 ॥
बिन वाती बिन दीप, ज्योत प्रकासे हो ।
ललना, ज्योत ज्योत विचित्र, प्रकाश विकासे हो ॥2 ॥
लीला अगम अथाह, अगाध की खानी हो ।
ललना, देखि सुरत हैरान, चकित मन बानी हो ॥3 ॥
हरखि हरखि हरखान, न जाय बखानी हो ।
ललना, जाने कैसे असन्त, सन्त कोई जानी हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, बिलास विलासी हो ।
ललना, हुलसी हुलसी हुलास, हटी भव त्रासी हो ॥5 ॥
2256. ब्रह्मा चौ मुख हीन, वेद मत सृष्टि हो ।
ललना, हंस समान उड़ान, नयन बिन दृष्टि हो ॥1 ॥
विना शंख का विष्णु, नाद धुनि गाजे हो ।
ललना, गदा पदम नहीं चक्र, बजावे बाजे हो ॥2 ॥
बिन त्रिशूल का शम्भु, जगत संहारा हो ।
ललना, बिना सीस का शेष, धरे महि भारा हो ॥3 ॥
मुख बिन बानी बोल, पांव बिन चाले हो ।
ललना, बिनकर करे सुकर्म, कृपाल दयाला हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, देखि हरखानी हो ।
ललना, लखि लखि अलख विलास,हिया मगनानी हो ॥शा
257. है कोई साध सुजान, शब्द अर्थ जाने हो ।
ललना, भाग्यवती मनमान, मन ही मन माने हो ॥1 ॥
बुंद सिंध के रूप, सिंध गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती लख दशा, मगन मन मोहे हो ॥2 ॥
किरन में भानु प्रकासे, किरन भई भानु हो ।
ललना, भाग्यवती के भाव, दोऊ एक ठानू हो ॥3 ॥
जीव में ब्रह्म समान, ब्रह्म जीव खानी हो ।
ललना, भाग्यवती सब जान, भई असमानी हो ॥4 ॥
पृथवी अकास विराज, पिंड ब्रह्मांडा हो ।
ललना, भाग्यवती चढ़ी गगन, किया खंड खंडा हो ॥5 ॥
258. गोद में मचल दयाल, खेल नित खेले हो ।
ललना, भाग्यवती है निहाल, मेल सत मेले हो ॥1 ॥
गोद में बाल गोपाल घर में ढिंडोरा हो ।
ललना, भाग्यवती लखि हाल, चकित मन मेरा हो ॥2 ॥
बालक खेले गोद, खोज कहां कीजे हो ।
ललना, भाग्यवती कर दृष्टि, प्रेम रस भीजे हो ॥3 ॥
गर्भ में बालक आय, गर्भ के बाहर हो ।
ललना, भाग्यवती घट देखे, यहां वहां जाहिर हो ॥4 ॥
अन्तर बाहर एक, एक में एकी हो ।
ललना, भाग्यवती रही झूम, ‘दयाल’ की टेकी हो ॥5 ॥
259. सहस कमल दल मांह, चन्द्र रवि तारा हो ।
ललना, भाग्यवती चढ़ि देख, निरंजन द्वारा हो ॥1 ॥
त्रिकुटी महल गुरु धाम, ओम धुन बानी हो ।
ललना, भाग्यवती सुन कान, वेद परमानी हो ॥2 ॥
मुन्न शिखर अस्थान, अर्धशशी ज्योती हो ।
ललना, भाग्यवती लखि रूप, समाहित होती हो ॥3 ॥
भंवर गुफा के बीच, बांसरी बाजी हो ।
ललना; भाग्यवती सुन कान, सोहमस्मि राजी हो ॥4 ॥
सत्त लोक धुनबीन, अनोखी निराली हो ।
ललना, भाग्यवती सुरतनारि, भई मतवाली हो ॥5 ॥
260. चुवत अमी रस चूद, छमा छम बरसे हो ।
ललना, भूमी पताल अघाय, पपीहा तरसे हो ॥1 ॥
प्रगटे दयाल कृपाल, दया की खानी हो ।
ललना, दीन अधीन निहाल, दुखी अभिमानी हो ॥2 ॥
उदय प्रभात का सूर, कमल मुस्काने हो ।
ललना, उल्लू गेदुरा डरे, वृक्ष में लुकाने हो ॥3 ॥
भाग्यवती लखि दशा, विचार परायन हो ।
ललना; भाग्य सराहत धाय, परी गुरु पायन हो ॥4 ॥
बरस बरस चहुँ ओर, दया का पानी हो ।
ललना, रिमझिम चहुँदिस होय, सुरत मगनानी हो ॥5 ॥
देह की चुनर भीज, ताप त्रय हारी हो ।
ललना, चरन दयाल के पाय, सन्त मत धारी हो ॥6 ॥
गुरु दयाल खिलाय, बाल गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती का भाग, अलख लखि मोहे हो ॥7 ॥
261बरसत धार अखण्ड, सुधा रस पानी हो ।
ललना, धार में उठत फुहार, शब्द संग बानी हो ॥1 ॥
चमकत ज्योत अपार, ज्योत की खानी हो ।
ललना, रवि शशि गयले लजाय, दृश्य असमानी हो ॥2 ॥
बिन बाती जले दिया, दिया परमानी हो ।
ललना, सूझे पिंड ब्रह्मांड, अकथ सो अगम कहानी हो ॥3 ॥
भीज रही सुरत नार, अंग नहीं पानी हो। ।
ललना, सुरत निरत के रूप, सहज मुसकानी हो ॥4 ॥
घट में अघट का पन्थ, चले गुरु ज्ञानी हो ।
ललना, बूझे बिरला भेद, साधु कोई सन्त सुहानी हो ॥5 ॥
शब्द सुरत की बात, शब्द अलगानी हो ।
ललना, अटक भटक मिट जाय, अभर लटकानी हो ॥6 ॥
कमल नीर की रहनी, जल पंछी जानी हो ।
ललना, जो कोई बुझे भेद, बने निरबानी हो ॥7 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश, न गति यह जानी हो ।
ललना, क्योंकर कहे सुनाय, कोई नर ज्ञानी हो ॥8 ॥
भाग्यवती नित मुने, यह राग पुरानी हो ।
ललना, सुन सुन रीझे सन्त जन, मुनि ज्ञानी हो ॥6 ॥
262. प्रगट भईले राधास्वामी, ध्यान गर्भ फूटल हो ।
ललना, दरस परस सत्कार, जगत जस लूटल हो ॥1 ॥
चहुँ दिस मंगल राग, नाद धुनि गाजल हो ।
ललना, त्रिकुटी महल अपार, अनाहद वाजल हो ॥2 ॥
सुरत सखी रही भूम, मगन मन नाचल हो ।
ललना, पी पी अमृत रस सार, निरत रहि मातल हो ॥3 ॥
पंडित वेद उचारि के, चौक पुरायल हो ।
ललना, बन्दनवार सजाय, द्वार बंधायल हो ॥4 ॥
छबि पर बल बल जाय, उमंग बढ़ावल हो ।
ललना, भाग्यवती बन याचक, भक्ति बर मांगल हो ॥5 ॥
263. कहां कहां गइलिंउं, कहां कहां नित भरमइलिउँ हो ।
ललना, देवी पितर मनव लिउँ, जती सती पुजलिउँ हो ॥1 ॥
बाम्हन विप्र जेवइलिउ, बरत बहु करलिउ हो ।
ललना, घूमेउँ देस विदेस, मन में पछतइलिउँ हो ॥2 ॥
निकसत एक न काम, चित्त में लजइलिउ हो ।
ललना, जंतर मंतर करइलिउँ, वयस वितइलिउँ हो ॥3 ॥
इहवां उहवाँ फिइरलिउँ, धूरि उड़इलिउँ हो ।
ललना, अन्त मिलेन गुरुदेव, जन्म फल पवइलिउँ हो ॥4 ॥
घट कई खुलल कपाट, घटहि गुरु पइठलिउँ हो ।
ललना, घट में ठाकुर द्वार, घटहि गुरु पवलिउँ हो ॥5 ॥
प्रगटल ज्योत अनंत, आरती कइलिउ हो ।
ललना, बाजल अनन्द वधाव, हरखि हरखइलिउँ हो ॥6 ॥
धनि धनि सतगुरु देव, चरन में अइलिउँ हो ।
ललना, भाग्यवती सुखी भइलिउ, तब भाग सरहलिउ हो॥7 ॥
264. सुमिर सुमिर राधास्वामी, नाम अमोला हो ।
ललना, आय गई नभ पार, सुन्न के हिंडोला हो ॥1 ॥
धूम मची अति घोर, रंग मृदु बानी हो ।
ललना, प्रगटा चन्द्र ललाट, स्वेत की निशानो हो ॥2 ॥
चन्द्र मौली सुरत बनी, समाधि रचाई हो ।
ललना, काल भया तब मौन, मौन साया माई हो ॥3 ॥
बिस्माधी अस्थान, सूझ नहिं सूझे हो ।
ललना, लखे सुसन्त सुजान, साध कोई बूझे हो ॥4 ॥
भाग्यवती को देख, दयाल बतावे हो ।
ललना, यह नहीं ठहरन धाम, महासुन्न धावे हो ॥5 ॥
बिनती
(265 कुल संख्या 1167) तड़प रही दिन रेन, चित्त को शान्ति न आवे ।
व्याकुल मन घबराय, कहीं सुख चैन न पावे ॥
मोह जाल में फंस रही, मुझे भरमावे माया ।
परख न आवे हाय, धूप क्या क्या है छाया ।
नहीं जब सूझा उपाय, पड़ी आकर गुरु द्वारे । ।
अब कुछ करो सहाय, तुम्हीं सच्चे रखवारे ।
हरो हिये की पीर, बचन से मिले दिलासा ।
छोड़ी सबकी आस, तुम्हारी अब रही आसा ।
आस बँधाओ धरि धरि, गुरु राधास्वामी ।
चरन कमल में बार बार, मैं करूँ परनामी ॥
151
छब्बीसवी धुन
प्रार्थना
266. आनन्द मंगल साज, साज की बजी बधाई ।
सतगुरु आये जगत में, मुझे लिया अपनाई । ।
जनम जनम भटकत फिरा, नहीं मिला ठिकाना ।
आय मिले गुरुदेव, नाम का दे दियो दाना ।
नाम पाय पाई सरन, पद कमल में बासा ।
आस लगी गुरु चरन की, मन क्यों हो उदासा ॥
सुरत शब्द अभ्यास का, करू नित अब साधन ।
निर्धनता का भय नहीं,मिला प्रेम का जब धन ।
राधास्वामी की दया, मेरी बन आई ।
दुखदाई संसार, बन गया अब सुखदाई ॥
कुण्डलियाँ ॐ
267. परमारथ का सार, साध कोई बिरला जाने ।
विरला जाने साध, करे सतगुरु की सेवा ।
सेवा के प्रताप मिटे, सब भरम के भेवा ॥1 ॥
भेव भेद को त्याग, न राखे मन में शंका । ।
धर विवेक चित माँहि, चढ़े त्रिकुटी गढ़ लंका ॥2 ॥
लंका चढ़ दससीस, रजोगुण रावण मारा ।
कुम्भकर्ण तम त्याग, विभीषण सत को धारा ॥3 ॥
मेघनाद को जीत, शब्द के चढ़े विमाने ।
परमारथ का सार, साध कोई विरला जाने ॥4 ॥
268. सुख परमारथ सार, सार लख पावे कोई ॥
लख पावे कोई एक, पुरुष जो होय सियाना ।
तज अज्ञान विकार, विचार से गुरु का ज्ञाना ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान के संग, परम पद आसा लावे ।
आशा मन में लाय, सुन्न पद जाय समावे ॥2 ॥
सुन्न समाध लगाव, दशम दर पाट खुलाई। ।
मन के सकल विकल्प, त्याग करे शब्द कमाई ॥3 ॥
शब्द में वृत्ति जोड़, रूप है उसका सोई ।
सुख परमारथ सार, सार लख पावे सोई ॥4 ॥
269. सुख का चिंतन यू करो, जैसे लोभी दाम । ।
जैसे लोभी दाम, चित्त वाही में राखे ।
गढ़ा खजाना नाक में, नित धन धन भाखे ॥1 ॥
धन धन भाखे लालची, चिंता रहे धन की ।
धन दौलत की चाह है, यह गति है मन की ॥2 ॥
गति है मन की यही, रात दिन धन का ध्याना ।
धन की लालच में फंसा, हरदम अज्ञाना ॥3 ॥
अज्ञाना को लालसा, धन से रखना काम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे लोभी दाम ॥4 ॥
270. सुख का चिंतन यू करो, जैसे कामी काम ॥
जैसे कामी काम, कामिनी को चित धारे ।
सोये जागे बैठे उठे, नहिं ताहि बिसारे ॥1 ॥
ताहि विसारे नाहिं, जागते सुमिरन उसका ।
सोते देखे स्वप्न, रहे मन में वही खटका ॥2 ॥
खटका खटकत रहे, खटक नहिं हिय से जावे ।
त्यागे जग व्यौहार, और कुछ मन नहिं लावे ॥3 ॥
मन नहिं लावे आपने, कामिन उसकी राम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे कामी काम ॥4 ॥
271. सुख का चिंतन यू करो, जैसे मन संकल्प ॥
जैसे मन संकल्प, रूप औरन का धारे ।
हो जाये वही रूप, व अपना रूप बिसारे ॥1 ॥
अपना त्यागे रूप, और का रूप बनावे ।
भृगी कीट समान, कीट भृगी हो जावे ॥2 ॥
भृगी कीट बना, त्याग पृथ्वी को उड़ता ।
अपना नाता तोड़, उसी की ओर वह मुड़ता ॥3 ॥
मुड़ता सब संकल्प ले, तजा विकार विकल्प ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे मन संकल्प ॥4 ॥
272. सुख का चिंतन 5 करो, जैसे पानी मीन ।
जैसे पानी मीन, तज नीर न जाये ।
कबहूँ होय विछोह, जीव और प्रान गवावे ॥1 ॥
प्रान गवाये आपना, पानी सों यू प्रीति ।
यही सार है भक्ति का, यही प्रेम की रीति ॥2 ॥
यही प्रेम की रीत है, महा कठिन व्यौहार ।
ऐसे ही सुख परमात्म का, मन में रहे पियार ॥3 ॥
रहे पियार विचार तज, दीन अधीन प्रवीन ।
सुख का चिंतन 5 करो, जैसे पानी मीन ॥4 ॥
273. सुख की चिंता यूँ करो, ज्यों विरती व्यौहार ॥
ज्यों विरती व्यौहार, धार जो मन से निकसी ।
जाय मिले जिस वस्तु से, वा से नहीं बिछड़ी ॥1 ॥
वा से बिछड़ी नाहिं, उसी का रूप कहावे । ।
उसी की होकर रहे, उसी से नेह लगावे ॥2 ॥
नेह लगावे ब्रह्म से, विरती ब्रह्माकार ।
ब्रह्मानन्द का भान हो, सत संकल्प विचार ॥3 ॥
सत संकल्प विचार से, गुन गह तजे विकार ।
सुख का साधन यूँ करो, ज्यों वृती व्यौहार ॥4 ॥
274. सुख का चिंतन यू करो, जैसे वृत्ति विवेक ॥
जैसे वृत्ति विवेक, सार गहे तजे असारा ।
बूद लहर को छोड़, लहे सत सिंध अपारा ॥1 ॥
सिंध अपार महान, वह सबका है आधार ।
निराधार रह आप में, सबका उस पर भार ॥2 ॥
सबका उस पर भार है, भार को भार न जान ।
भार अभार का द्वन्द लख, रह निरद्वन्द महान ॥3 ॥
रह निरद्वन्द समान जब, व्यारे नहीं अनेक ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे वृत्ति विवेक ॥4 ॥
275. सुख की जड़ निज रूप में, बिरला जाने कोय ॥
बिरला जाने कोय, जिसे गुरु संग मिला है ।
उसका मन निज रूप के, बीच में जाय पिला है ॥1 ॥
जाय पिला है मन तब, निज रूप लखे वह ।
लख लख कर निज रूप, सांच सत बात भखे वह ॥2 ॥
बात भखे वह जान, समझ औरन समझावे ।
आप तरे भव सिंध, और दूजे को तरावे ॥3 ॥
दना दिया तराय कर, सो परमारथी होय ।
सुख की जड़ निज रूप में, बिरला जाने कोय ॥4 ॥
276. निज सुख आतम राम में, सन्तन किया विचार ।
सन्तन किया विचार, खोज कर पता लगाया ।
सतचित आनन्द भानु, रूप प्रगट होय आया ॥1 ॥
रूप प्रगट होय आया, रूप का किया विवेका ।
तज अनेक मत बाद, चित में धारा ऐका ॥2 ॥
धारा एका सोच समझ कर, ज्ञान बनाया ।
यही एक है सार, और सब झूठी माया ॥3 ॥
झूठी माया जान कर, जगत पे डारी छार ।
निज सुख आतम राम में, सन्तन किया बिचार ॥4 ॥
277 इस जग में तुम य रहो, ज्यों मुरगाची नीर । ।
ज्यों मुरगावी नीर, नीर में गोते खावे ।
जल के बाहर आय, न अपनो पंख भिगोये ॥1 ॥
पंख न भीगे कभी, रहे सूखे का सूखा ।
जल थल एक समान, नहीं वह तृप्त न भूका ॥2 ॥
तृप्त न भूका नीरका, यू उमर बिताये ।
हँस गति वह पाय, जो मानसरोवर नहावे ॥3 ॥
मान सरोवर नहाय कर, हँस न पावे पीर ।
इस जग में तुम यू रहो, ज्यों मुरगावी नीर ॥4 ॥
278. सबसे मिल जुल चालिये, रूप न अपनो त्याग ॥
रूप न अपनो त्याग, रूप में स्थिर रहना ।
भव की धार प्रवाह वेग में, कबहुँ न बहना ॥1 ॥
कबहुँ न बहना धार, शान्त होय निश्चल रहिये ।
चंचलता को त्याग, निश्चल की आदत लहिये ॥2 ॥
आदत लहिये साध, साध साधन का नेमी ।
जो कोई साधे भक्ति, ताहि को कहिये प्रेमी ॥3 ॥
प्रेमी जन का संग कर, सुख निदरा में जाग ।
सबसे मिल जुल चालिये, रूप न अपनो त्याग ॥4 ॥
279.गुरु विवेकी जब मिले, तब सूझे निरवान ॥
तब सूझे निरवान, नहीं कुछ समझ में आवे ।
सैन बेन के बीच, सन्त कोई सार लखावे ॥1 ॥
सार लखावे सन्त, सन्त की संगत करना ।
हित अनहित को त्याग, सन्त के गह ले चरना ॥2 ॥
गह ले चरना सन्त, सन्त तेरे हितकारी ।
राधास्वामी चरन शरन की, जा बलिहारी ॥3 ॥
जा बलिहारी गुरु के, गुरु से ले निज ज्ञान ।
गुरु विवेकी जब मिलें, तब सूझे निरवान ॥4 ॥
280. बिन साधन नहीं होय कुछ, यह जाने सब कोय ॥
यह जाने सब कोय, आग रहे लकड़ी भीतर ।
बिना मथे नहीं प्रगट होय, वह किंचित बाहर ॥1 ॥
किंचित बाहर प्रकट न होय, मेंहदी की लाली । ।
जो कोई पीसे ताहि करे, सो हाथ गुलाली ॥2 ॥
हाथ गुलाली होय, पीस मेंहदी जब लावे ।
तसे ही ब्रह्म का दरस, पुरुष साधन सों पावे ॥3 ॥
साधन सों सब पाइये, ऋद्धि सिद्धि बुद्धि सोय । ।
बिन साधन नहीं होय कुछ, यह जाने सब कोय ॥4 ॥
281 बिन साधन के साधुवा, कोई साध न होय ॥
कोई साध न होय, जो साधन चित नहीं लावे ।
जानो ताहि असाध, सदा सो विपत कमावे ॥1 ॥
बिपत कमावे दुखी रहे, पड़ा काल के फंदा ।
ऐसा प्रानी मूढ़ रहे, बनत खुदा का बंदा ॥2 ॥
खुदा का बंदा बना, बंदगी जान है उसकी । ।
बंदा बन्धुआ होय, बन्ध गति शान है उसकी ॥3 ॥
शान है उसकी बंदगी, स्वतन्त्रता खोय ।
बिन साध न के साधुवा, कोई साध न होय ॥4 ॥
282. साधन मन का खेल है, और कहो मत ताहि । ।
और कहो मत ताहि, यह मन है बड़ा खिलाड़ी ।
कबहुँ होय सचेत तो, कबहुँ निपट अनाड़ी ॥1 ॥
निपट अनाड़ी बना, कुबुद्धि की चढ़ी कमानी ।
त्याग दिया जब कुबुद्धि तो, होगया ज्ञानी ध्यानी ॥2 ॥
ज्ञानी ध्यानी बना जोड़कर, वृत्ती अपनी ।
वृत्ती वियोग कलेश, मेल ही सुख की रहनी ॥3 ॥
सुख की रहनी वृत्ती में, वृती साधन माह ।
साधन मन का खेल है, और कहो मत ताहि ॥4 ॥
283. मन का अमन बिमन करे, सोहै सन्त सुजान । ।
सोहै सन्त सुजान, ज्ञान का रूप है सोई ।
आवागवन को मेट, लीन निज रूप में होई ॥1 ॥
लीन रूप में रहे, योनी का भर्म मिटावे ।
करम धरम पाखंड के, फिर फन्द न आवे ॥2 ॥
फन्द न आवे सन्त, काल यम से वह नहीं डरते ।
न वह जन्मे कभी, जनम जनम कर फिर नहीं मरते ॥3 ॥
फिर नहीं मरते सन्त कभी, मन के परे ठिकान ।
मन को अमन विमन करे, सोहै सन्त सुजान ॥4 ॥
284. सहज समाध विचित्र गति, वरन बखान न जाय । ।
बरन बखान न जाय, थके जिम्या मन बानी ।
अनुभव से लख पाय, कोई कोई बिरला ज्ञानी ॥1 ॥
बिरला ज्ञानी लखे, अलख गति अगम निशानी ।
जड़ चैतन नहीं होय, न बन्ध न मुक्ति कहानी ॥2 ॥
मुक्ति कहानी कहो, सूक्ष्म स्थूल न कारन ।
निरविकल्प सविकल्प, न सुन्न न मोहन मारन ॥3 ॥
मोहन मारन कल्पना, कल्पित कल्प रहाय ।
सहज साधना विचित्र गति, बरन बखान न जाय ॥4 ॥
285. ज्ञानी मूढ़ की एक गति समझ लेउ मनमांह ॥
समझ लेव मन माँह, समझ कर भ्रान्ती हटाओ ।
मेटो जग जंजाल, काम को तुरत बनाओ ॥1 ॥
तुरत बनाओ काम, फिर अवसर नहीं ऐसा ।
सन्त शरन में जाय, संग करो जैसा तैसा ॥2 ॥
जैसा तैसा करो संग, संगत फल लहना ।
अपने मन ही विचार, शान्त मति चुप होय रहना ॥3 ॥
चुप होय रहना हृदय में, सतगुरु चरन की छांह ।
ज्ञानी मूढ़ की एक गति, समझ लेउ मन माह ॥4 ॥
286. अपनी ओर निहारिये, औरन से क्या काम ॥
औरन से क्या काम, काम अब अपना कीजे ।
समय अमोलक मिला, चित कहीं और न दीजे ॥1 ॥
चित न दीजे और ठौर, नर जनम सुफल हो ।
अपना करो उपकार, हृदय तब शुद्ध बिमल हो ॥2 ॥
शुद्ध बिमल हो हृदय, सोध ले अपनी काया ।
काया मध्ये रहे, ब्रह्म जग, संस्त्रित माया ॥3 ॥
संश्रित माया कल्पना, कल्पित क्रोध और काम ।
अपनी ओर निहारिये, औरन से क्या काम ॥4 ॥
287. भक्ति पन्थ में आय कर, तज दे भर्म विकार ॥
तज कर भरम विकार, ध्यान भगवत का करना ।
छूत छात बिसराय, नाम पर उसके मरना ॥1 ॥
प्रेम भाव से राम ने, खाये झूठे बेर ।
शबरी प्यारी भक्तिनी, लाई राम को घेर ॥2 ॥
साग बिदुर घर खालिया, तज दुर्योधन खीर ।
कृष्ण को प्यारे भक्त हैं, धीर भीर गम्भीर ॥3 ॥
धर्मराज के यज्ञ में, घंटा बोला नाहिं ।
ऋषि मुनि खाली भक्ति से, भक्ति श्वपच के मांहि ॥4 ॥
छूत छात और वरन का, भक्ति में कहाँ विचार ।
भक्ति पन्थ में आय कर, तज दे भरम विकार ॥1 ॥
288. सूरज चमका गगन में, मिटा जगत अंधियार । ।
मिटा जगत अंधियार, कमल बिगसे बन अन्दर ।
भागा तिमिर विकार, रहा नहीं उसका कुछ डर ॥1 ॥
डर कोई कैसे करे, चोर डाकू सब भागे ।
पन्थी धरमी संयमी, पुरुषारथ लागे ॥2 ॥
दीपक जैसे दिप्त हो, निज घट दीवा बार ।
सूरज चमका गगन में, मिटा जगत अंधियार ॥3 ॥ बिनती
(289 कुल संख्या 1161) आनन्द की वर्षा हुई, धुनि नाम जो पाया ।
दुख कलेश का भय मिटा, गुरु ने की दाया ॥1 ॥
भक्ति युक्ति का दान दे, मुझको किया अपना ।
मेट दिया निज कृपा से, भव दुख का सपना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु देव, दया सागर धनी ।
दिया छुड़ा संसार गति, मझ्या मनी ॥3 ॥
जन्म जन्म शरना गत, पद कमल को आसा ।
अब न सतावे काल करम, जग द्वन्द वासा ॥4 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीनन के सहाई ।
रहूँ मगन दिन रात, पाई चरनन शरनाई ॥1 ॥
161 सत्ताईसवी धुन
प्रार्थना
290. दीन बन्धु दयाल स्वामी, तुम दया के सिन्ध ।
निज दया से बन्ध काटो, छूटे द्वन्द का बन्ध ।
काल करम का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटन की, उरझ उरझ फसाय ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे दरश, कटें जग के पाप ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पावें परम पद को, चित चरन से मेल ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
सब जपें हित चित से निस दिन; पावें अमृत धाम । ।
ॐ फुटकल शब्द
291. दयानिधि दीन दुख भंजन, कृपामय नाथ जन रंजन ॥टेक ॥
चरन की ओट में लीजे, मुझे भक्ति का धन दीजे । ।
दुखी हूँ तीन तापों से, मलिन मन जग के पापों से । ।
दया पड़ी अज्ञान की फाँसी, छुड़ालो आके अविनाशी ।
तुम्हारा नाम लेता हूँ, चरन में चित को देता हूँ ।
दया0 तुम्हारा एक सहारा है, नहीं कोई हमारा है ।
खुली दृष्टि तो यह जाना, तुम्हीं को मीत पहचाना ।
292 गहो तुम बांह अब मेरी, न लाओ नाथ कुछ देरी। ।
रहे लौ नाम की निस दिन, भजू मैं आपको छिन छिन ॥4 ॥
चरन को छोड़ कहाँ जाऊँ, सदा मन बुद्धि से ध्याऊँ ।
सुफल कर दो जनम मेरा, मिटे संसार का फेरा ॥5 ॥
यही बिनती हमारी है, तुम्हीं से आस भारी है ।
दया राधास्वामी अब कीजे, चरन की छाँह में लीजे ॥6 ॥
292. है कोई ज्ञानी ध्यानी, सत तत्व भेद पहिचानी ॥टेक ॥
सिंध में सीप सीप मुख मोती, मोती आब रहानी ।
चारों क्या है समझ न आवे, बुद्धि भई दीवानी ॥1 ॥
केला और प्याज को देखा, पात पात अलगाया ।
निरख परख कर सोच विचारा, तत्व सार नहीं पाया ॥2 ॥
बरफ में जल जल भाप रहावे, तीन तीन के रूपा ।
इनके अन्तर क्या कोई देखे, पड़े भरम के कूपा ॥3 ॥
बीज में अंकुर पात फूल सब, फूल में फल का बासा ।
फल में बीज अनेक भाँति के, हेर फेर का पांसा ॥4 ॥
माटी कमल कमल में डंडी, डंडी फूल बिराजा ।
फूल में बास है किसकी फूटी, कौन है सब का राजा ॥5 ॥
सत में चित चित में है आनन्द, सतचित आनन्द एका ।
तीन के अन्तर चौथा क्या है, कोई करे विवेका ॥6 ॥
तत्व भेद द्रोपदी की साड़ी, तह पर तह की खानी ।
दुश्शासन को नजर न आवे, देखे अजुन ज्ञानी ॥7 ॥
गुप्त में प्रकट प्रकट में गुप्ती, गुप्त प्रकट की रचना ।
गुप्त प्रकट का अन्त कहा है, कैसे कहे कोई बचना ॥2 ॥
तुझे प्रगट किया गुरु ने गुप्त हो, सीख भक्ति की रीती ।
आप गुप्त कर प्रगट गुरु को, तब प्रगटेगी प्रीती ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु की संगत में जा, सीख शब्द मत युक्ति ।
तब कुछ पावे भेद तत्व का, मिले भरम से मुक्ति ॥10 ॥
तीन छोड़ चौथा पद दरसे, सत्त नाम गति जाने ।
बिन जाने कोई कैसे बखाने, जाने तब मन माने ॥11 ॥
तेजस विश्व पराज्ञ तीन हैं, लख तीनों का भेदा ।
अन्तरयामी विराट हिरण्यगर्भ, ब्रह्म सुनावे वेदा ॥12 ॥
चौथा पद इनसे है न्यारा, राधास्वामी बतायें ।
तुर्या तुर्यातीत नहीं वह, बिरले कोई कोई जानें ॥13 ॥
293. है कोई चतुर सियाना ज्ञानी, लखे गुरु की बानी ॥टेक। ।
रेत में गिरी शकर की पुड़िया, शकर रेत बिलगावे ।
चिउटी बन कर निज युक्ति से, रेत से शकर हटावे ॥1 ॥
बानी बन में भरमे पंडित, अर्थ अनर्थ बतावें ।
अर्थ समझ नहीं आने उनके, भूल भरम भरमावें ॥2 ॥
नीर से क्षीर मिलाकर देखो, एक अंग बन जाये ।
हंस विवेकी त्याग नीर को, क्षीर क्षीर पी जाने ॥3 ॥
जड़ चेतन की पड़ी है गांठी, छूटत अति कठिनाई ।
बिन गुरु ज्ञान के सुरझे केहि विधि, उरझ उरम उरझाई ॥4 ॥
बेद उपनिषद नहीं हैं भूठे, झूठा जो न बिचारे । ।
बिन विचार के सार न पाने, अटके भरम के मारे ॥5 ॥
श्रुति वह है जो सुनी गई है, और श्रुति नहीं कोई ।
ऋषियों ने चढ़ सुना अधर में, अपने घट बिच सोई ॥6 ॥
श्रुति धुन मात्र है अनहद बानी, वेद वरन के रूपा ।
धुन को सुने वरन को त्यागे, तब घट दरसे भूपा ॥7 ॥
ओम् ओम् सब कोई कहते, आम् का समझ न आई ।
है उद्गीत ओम धुन बानी, नहीं वह बरन में भाई ॥8 ॥
धुन को सुने ओम् गति दरसे, असुर मार रण जीते । ।
जनम मरन का खटका छूटे, अमी धार रस पीते ॥6 ॥
लाख द पढ़े लाख उपनिषद, ओम् सार नहीं पाये ।
देवियान पन्थ जब पग धारे, तब धुन कान में आये ॥10 ॥
पित्रयान है करम का रस्ता, जो आया भरमाया ।
ऊँचे नीचे चढ़ा विकट मग, करनी फल बिलगाया ॥11 ॥
देवियान है मरम का रस्ता, सूरज ज्ञान प्रकासा ।
गुरु की दया चला जो प्रानी, सहे न यम के त्रासा ॥12 ॥
पग पग पर ज्योती की धारा, जगमग ज्योति सुहानी ।
चांद सूर तारागन मंडल, सो प्रकाश की खानी ॥13 ॥
गुप्त भेद क्या मुख से भाखू, सैन बैन का रस्ता ।
गांठी का कोई दाम न छीने, सौदा बहुत है सस्ता ॥14 ॥
गुरु से मिल उपासना कीजे, भेद भाव सुन लीजे ।
उप है निकट तो आसन बैठक, कुछ दिन संगत कीजे ॥1 ॥
संग में कीट भृग गति धारे, रूप गुरु चित आने ।
तब सत नाम के पाय भेद को, सत्त धाम चलि जागे ॥16 ॥
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ आओ, सहस कमल दल बासा ।
फिर त्रिकुटी ओंमकार की धुन सुन,देखो अजब तमासा ॥17 ॥
वहां उद्गीत की धुन को सुनना, सुन सुन चित ठराना ।
लाली उषा निरख पड़े जब, निरख परख मन माना ॥18 ॥
आगे तिसके सुन्न मंडल है, सुन्न समाध रचाओ ।
चन्द्रलोक में बासा पाकर, अधर धाम चढ़ जाओ ॥16 ॥
महासुन्न में मानसरोवर, हंसन संग दिलासा ।
नहाओ अमी अहार को खाओ, हिये आनन्द हुलासा ॥20 ॥
लगी समाध अखंड अपारा, रारंग सारंग बानी ।
यह बानी है मंगल खानी, सुगम सुसाध सुहानी ॥21 ॥
जब उत्थान समाध का देखो, चलो भँवर के देसा ।
सोहंग सोहंग बजे बाँसुरी, दुख नहीं वहां लवलेसा ॥22 ॥
सोहंग सूर विमल प्रकाशा, नूर तूर का मंडल ।
कुछ दिन ठहर के लीला देखो, फिर साजो सत का दल ॥23 ॥
सत धाम सुख बीना बाजे, सत्त पुरुष का लोका ।
कोटि सूर चन्दा की ज्योति, अद्भुत महा अशोका ॥24 ॥
अलख अगम अव्यक्त अनामी, अमर अजर अविनासी ।
आनन्द घन चेतन घन निर्मल, सतघन सुकृति सुबासी ॥25 ॥
राधास्वामी चरन पखारो, गुरु चेला व्यौहारा ।
फिर नहीं गुरु नहीं कोई चेला, ध्यान न सोच विचारा ॥26 ॥
जो कोई इस मारग में आवे, सहज ज्ञान निधि पावे। ।
राधास्वामी की बलिहारी, भव सागर तर जावे ॥27 ॥
294. तेरी लगन में हुई दिवानी, मेरे सतगुरु सत अस्थानी ॥टेक ॥
बिछुड़ी और बिछुड़ के रोई, तन मन की बुध सुध खोई ।
मेरी दशा न जाने कोई, दिन रात फिरूं घबरानी ॥तेरी0
अँखियों में से बहे जल धारा, हिया चीरे विरह का आरा ।
क्यों देता नहीं मुझे सहारा, आयु मेरी विपत बितानी ॥
तेरी0 मैं पृथवी तू नभ का बासी, मैं दुखी हूँ तू सुखरासी ।
तू स्त्रांती मैं पपीहा प्यासी, हो कैसे मेल मिलानी ॥
तेरी0 घट घट का तू अन्तरयामी, सुइयाल सुसाध सुस्वामी । ।
रज चरन सरोज नमामी, दे मेट द्वन्द की गलानी ॥ तेरी0
दरसत चित आनन्द धन खानी, कूटस्थ आधार महानी ।
तेरी महिमा कौन बखानी, कर अपनी मुझे अभिमानी ॥
तेरी0 राधास्वामी दीन दयाला, करुणा मय सहज कृपाला ।
भक्ति दे करदेय निहाला, यही विनती नित्त सुनानी ॥ तेरी0
295.. आजा गले लग जा, मुझे मोहनी रूप दिखाजा ॥टेका ।
तुझ बिन मुझको चैन न आने, पीर बिरह की बहुत सताये ।
रह रह कर हिया जिया मुरझाने, जलती आग बुझाजा आजा0
दिन में सोच तेरा है पल पल, रात को तन में रहती हलचल ।
आजा प्रेम डगर में चलचल, सुख का भेद बताजा ॥तड़
तरसू प्यारे कारन, बिलपू दम दम छिन छिन ।
व्याप रही चित चिंता डायन, उसका फन्द कटाजा ॥
मन मन्दिर मेरा पड़ा है सूना, विपत कलेश रहे दिन राती ।
तू क्यों हुआ बेहरदी ऊना, घट के घर को बसाजा ॥
ज्योत में ज्योत जले दिन राती, अन्धकार की मिटे उत्पाती ।
तेरी छवि अति मुझको भाती, सूरज चन्द्र लजाजा ॥
अँखियन बहे नीर की धारा, जग में मेरा कोई न सहारा ।
तू ही सांचा है रखवारा, काल से अब तू बचाजा ॥
योग विराग कछू नहिं सूझे, ज्ञान ध्यान गम नेक न बुझे। ।
माया करम से नित ही जूझे, भव दुस्ख आप हटाजा ॥
सतगुरु रूप का दर्शन प्यारा, गुरु मूरती है सार का सारा ।
मैं हूँ प्रेम प्यास का मारा, अमृत बूद पिलाजा ॥
तू है दाता तू हितकारी, तू समरथ तू जगदाधारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी मेरी बनाजा ।।
296. ऐसी अभिमानी अज्ञानी है, यह दुनिया ॥टेक। ।
सत को त्याग असत को धावे, झूठे भरम फंसानी दुनिया ।
गुरु की संगत को नहीं दे चित, अटकी पत्थर पानी यह दुनिया ।
दोहारामकृष्ण जब लग जिये, निंदित रहा संसार । ।
पीछे देवल साज कर, अब पूजा सत्कार, दुनिया ॥
ऐसी0 जीते पिता का करें अनादर, मुये श्राद्ध रचानी दुनिया ।
सतगुरु देव प्रत्यक्ष न पूजे, गढ़ मूरत पुजवानी यह दुनिया ।
दोहामुये बैल की आख बड़ी, यह जग का व्यौहार ।
मिली वस्तु का ध्यान नहीं, अनमिल सोच विचार दुनिया ॥
सत संगत में कभी न बैठे, तीरथ बरत दिवानी दुनिया ।
सोच विचार विवेक ज्ञान नहीं, भेड़ की चाल चलानी यह दुनिया ।
दोहातीरथ राज समाज गुरु का, सुख मंगल की खान ।
सो तो नहाते ना बने, बन परबत हैरान दुनिया ॥
साँची बात कह नहीं कोई, भूठे को पतियानी दुनिया ।
मानुप जनम का सार न जाने, भव की धार बहानी, यह दुनिया ।
दोहानर शरीर उत्तम महा, सुर को दुर्लभ जान ।
अपनी गति मति ना लखे, देवी देव भुलान ।
दुनिया ॥इस दुनिया की लीला अद्भुत, अकथ अपार कहानी, दुनिया ।
गधास्वामी दया ज्ञान गम पाया, छूटी द्वन्द गलानी, यह दुनिया ।
दोहा धन्य भाग सतगुरु मिले, जनम को दिया सुधार ।
सत संगत के बचन सुन, हो गया भवके पार, दुनिया ॥
297. उठ जाग सबेरारी, सुरत मेरी भागवती ।
मिटा भरम अंधेरा री, धारले हिये सुमती ॥टेक। ।
क्या तू सोई मोह नींद में, उठ के भजन में लाग ।
सोये होय अकाज पियारी, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0 चेत चेत है चेत का अवसर, काल है फन धर नाग ।
कब डस ले क्या कोई जाने, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत प्रेम प्रीत परतीत उमंग से, धर गुरु पद अनुराग ।
जो सोया सो खोया प्राणी, जाग जाग उठ जाग ।
सुरत0 सीतल मंद सुगंध पवन बहे, गा गुरु मंगल राग ।
यह सोने का समय नहीं है, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत राधास्वामी तोहि चितावन, बख्शा अचल सुहाग ।
तज परमाद की निन्द्रा, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0
298. पिला दे भक्ति का ऐसा प्याला, ममत्व मैं अपने मन का खोदूं ।
न बुधि रहे और न सुधि रहे कुछ,अहंपना सारा मनका खोदूं ॥टेका
पि0 जपू तर्पू और भजू न सुमिरूँ, न योग युक्ति के पन्थ दौडूं ।
न नाम की माला हाथ में हो, हिये की माला का मनका खोदू । ।
पि0 वह राग क्या जिसमें राग आये, वह त्याग क्या त्याग में फसाये ।
न बन्ध और मुक्ति का हो खटका, विवेक घर और बन का खोदू ॥
न दुख की दुविधा न सुख की चिंता,न चित की दुचिता का भय हो
किंचिता न ज्ञान और ध्यान की हो इच्छा, विचार साधन यतन का खोदू ॥
न द्वन्द निरद्वन्द का हो झगड़ा, न त अद्वत का हो बखेड़ा ।
झुका के सिर राधास्वामी पद में, विचार तक दास पन का खोदू ॥
299.साकारम निराकार ॥टेक प्रथम सहस्रार, दुजे समझ ओंकार ।
तीजे शून्य महा शून्य, चौथे सोहंग सार ।
पंचम सतपद विचार, अलख अगम धुर अधार ।
सोच समझ बार बार, चित मध्य धार धार ॥
साकारम0 सगुन अगुन गुन प्रचंड, खंड खंड ब्रह्म अंड ।
व्यापे सब करके पिंड, निश्फल सहे यम का दंड ।
भूल गये मति के मंद, फंस काम क्रोध फंद ।
भागें नित जगत द्वन्द, हिया जिया को हार हार ॥
सतसंग में जाय जाय’ गुरु स्वरूप ध्याय ध्याय ।
धुरपद चित में बसाय, घट मंदिर में समाय ।
अनहद धुन गाय गाय, दर्शन ज्योति का पाय ।
मुक्ति युक्ति कर उपाय, सूझे अपरम अपार ॥
गुरु स्वरूप धार रंग, भवका भाव कर दे भंग ।
चित हो ज्यों कीट भृग, रुके घट निध के तरंग ।
शब्द सुनत हो कुरंग, कमल नीर सीख ढंग ।
हो असंग रहके संग, जग चिन्ता जार जार ॥
राधास्वामी परम रूप, चेतन रचना के भूप ।
रूपवान और अरूप, ब्रह्म परब्रह्म कूप ।
नहीं छांह नहीं धूप, अचरज अद्भुत अनूप ।
नीर क्षीर सोत कूप, व्याप रहे वार पार ॥
300 अस्त्रियां खुली रहें दिन रात ॥टेक ॥
खुले नयन से रूप का दर्शन, खुले कान सुन बात ।
खुली जीभ से नाम का सुमिरन, खुले हाथ परसात
अखियाँ तह में तह है तह में तह है, तह में तह के साथ ।
आँख खुले तह दरस में आवे, केले का लख पात ॥
तह अस्थूल सूक्ष्म भी तह है, कारन तह की जात। ।
बिना आंख क्या कोई देखे, आंख खोल कर बात ॥
बाहर तो सब कोई देखे, अन्तर दृष्टि न जात ।
अन्तर बाहर नैन खुलें जब, तब सत रूप लखात ॥अखियाँ 0
राधास्वामी गुरु की दया भई है, धरा सीस पर हाथ ।
अन्तर बाहर आँख खुलानी, भया तत्व का साथ ॥
301. दया मय दीन दुख भंजन, कृपा निधि भक्त मन रंजन ।
कमल पद की शरन दीजे, पतित की लाज रख लीजै ॥
दया0 जगत में कष्ट बहु पाया, चरन में आपके आया ।
विकल मन चित्त घबराया, तुम्हारा ध्यान तब आया ॥ दया0
चरन की ओट में लीजे, अटल भक्ति का बर दीजे ।
भिकारी आपके द्वारे, पड़ा त्रयताप के मारे ।
दया0 पिला दो प्रेम का प्याला, रहे दिन रात मतवाला ।
करम के जाल से भागे, अमी रस नाम में पागे ॥
दया0 यही मन की है अभिलाषा, करो पूरी प्रभू आसा ।
विनय राधास्वामी हितकारी, सुनो भव से करो पारी ॥
302. गुरु पूरे ने दिखाया अपना धाम ॥टेक ॥
सहज योग की विधि बतलाई, बख्शा सांचा नाम ।
सुमिरन भजन ध्यान निस बासर, व्याये क्रोध न काम ॥
गुरु0 प्रथम बंद जब तीन लगाये, मन को दिया लगाम ।
जब मन गगना चढ़ा सुरत ले, बंद का फिर नहीं काम । ।
गुरु0 क्यों कोई कान आंख को मदे, क्यों चित राखे थाम । ।
सुरत शब्द का साधन अद्भुत, अन्तर मूल कलाम ।
गुरु0 चढ़ी सुरत छोड़ा नौ द्वारा, गनन में किया बिसराम ।
पिंड ब्रह्मांड से ऊंची पहुँची, जहां न दक्ष न वाम ।गुरु0
सहस कमल दल त्रिकुटी मंडल, सुन्न महासुन्न ठाम ।
भंवर गुफा सतलोक अलख लख, अगम परे गुरु धाम ॥
गुरु0 राधास्वामी पद में ठौर ठिकाना, वहां सुबह नहीं शाम । ।
जो कोई घट चढ़ यहां तक पहुँचे, बिसमध आठों याम ॥
गुरु0 मूल योग यह सबका टीका, निर्मल सुगम सुहाम ।
राधास्वामी दया से काल दंड का, भेद साम नहीं दाम ॥
गुरु0
303. नाम रस पीले मेरे भाई ।।टेका ।
ध्रव प्रहलाद नाम रस माते, माती मीरा बाई ।
शिव सनकादिक नाम दिवाने, गनिका सदन कसाई ॥
नाम0 ब्रह्मा नाम जपे निस बासर, शिव रहे तारी लाई । ।
विष्णु गनेश नाम आधारा, शेष सहस मुख गाई ॥
नामक नानक जपे नाम गुरु निस दिन, सन्त कबीर बताई ।
शबरी भीलनी नाम के पुन से, राम से नेह लगाई ॥
नाम0 तुलसी जपे प्रभु नाम निरन्तर, जपत सदा लौ लाई ।
सूरदास नाम के बल से, हिये की आंख खलाई ॥
नाम0 नाम बिना जीवन है बिरथा, बहु पाछे पछताई। ।
गुरु की कृपा मिला शुभ अवसर, नाम रतन धन पाई ॥
नाम0 गुरु की सेवा साध की संगत, दिन दिन चढ़े सवाई ।
राधास्वामी नाम गुरु से मिलिया, परगट तोहि जताई । ।
नाम
304. सतगुरु एक तुम्हारी आस, दाता एक तुम्हारी आस ॥टेक। ।
भूल भरम पड़ समझी अलग हूँ, तुम तो मेरे पास ।
रोम रोम व्यापक मेरे तन में, तुम सांसों के सांस ।सतगुरु0
तुम नहीं गगन पताल न पृथवी, तुम न मेरु कैलास ।
हृदय गुफा में मेरे विराजे, अन्तर घट में बास । ।
सहसकमलदल सहस रूप हो, अ दल मध्य निवास ।
त्रिकुटी त्रिपुटी रूप त्रिगुन विधि, अ उ म परकास ॥
सतगुरु0 सुन्न में दुविधि प्रकृति पुरुष तुम, स्वामी सेवक दास ।
महासुन्न अद्वैत तत्व एक, स्वांस कहूँ के भास ॥
भंवर में काली काल बन व्यापे, काल में काल बिलास ।
आगे सत पद सत्त तत्व प्रभु, सत में सत्त उजास ॥
अलख अगम राधास्वामी अनामी, सतचित आनन्द रास ।
सर्व कला संग मुझ में समाने, कैसे होऊँ उदास ॥
305. फकीरा रूप तेरा अति पारा ॥टेक ॥
तू सत चित आनन्द की मूरत, तू तीनों से न्यारा ।
तेरी गति मति बुधि न जाने, अटक रही मझधारा ॥फकीरा0
करम किया सत की चढ़ा घाटी, चिर में विवेक विचारा। ।
सत्त चित्त आनन्द विलासा, चहुँ दिस हर्ष पसारा फकीरा0
तीन त्याग चौथे को धारे, सी सबका अधारा ।
द्वन्द जगत त्रिपुटी की त्रिकुटी, छड़ चला घरबारा ॥फकीरा0
नहीं तू दोय न तीन चार है, नह तू सहस हजारा। ।
एक एक है एक एक है, जाम जानन हारा ॥फकीरा0
एक अनेक कहां है तुझ में, यह जी भूल विकारा ।
राधास्वामी दया रूप लख अपना, ई व्यापक संसारा फकीरा0
306. दुविधा है संसारा, कोई समझे गुरु का प्यारा ॥टेक। ।
सत में एक अनेक नहीं है, वह है अमर अपारा ।
निराधार कूटस्थ अवस्था, अष्ठिान आधारा ॥दुविधा0
जैसे सिंध में लहर उठत है, लारी लहर पसारा ।
तसे सत की दशा फकीरा, कहन सुनन से न्यारा ॥
लहर उठी हुई मौज अनोखी, प्रगटे बुद फुहारा ।
बुंद सिंध से भये बिलगाने, मन बुधि चित हंकारा ॥दुविधा
अहंकार में दृढ़ता आई, धरा रूप विस्तारा ।
दृढ़ता के बस मन न चिन्ता, चिन्तन बुद्धि विकारा ॥
बुद्धि ने प्रपंच रचाया, बुद सिंध भये न्यारा ।
कारन सूक्ष्म स्थूल बनाया, रचा प्रपंच अपारा ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ गई, कठिन भया छुटकारा ।
मध्य दशा में आन बिराजा, उपजा सोच विचारा ॥
कभी नीचे कभी ऊचे फुदके, कभी मध्य की धारा ।
एक धार से सहस धार बन, धारा मूल विकारा॥
क्लिपे तड़पे चैन न आवे, जनम जुआ गले डारा ।
जनम मरन भोगें चौरासी, लखे न सार असारा ॥
दुर्मति आई कुमति बसाई, स्वारथ बस भटकाया ।
लोक परलोक में डोलत प्रानी, कभी जीता कभी हारा । ।
कोटि जनम से धोखा खाया, काल कर्म का मारा ।
अपनी चिन्ता और की चिन्ता, भोग संयोग अधिकारा ॥
भरमे भरम भूल की लीला, नहीं पाये छुटकारा ।
तीन ताप का बन्धन गाढ़ा, आय फैसा नो द्वारा ॥
यह दुविधा है यह दुचिताई, दुख सुख सिर पर भारा ।
करम हिंडोले भूले प्रानी, नहीं पावे निस्तारा ॥
बल में निवल निबल बल संयुत, करे उपाय निकारा। ।
दहे शरीर जरे उर निस दिन, रोय रोय विकरारा ॥
सतगुरु दया देख तब उमड़ी, धरा सन्त अवतारा। ।
जीव चितावन आये राधास्वामी, शब्द जहाज संवारा ॥
सुरत शब्द की युक्ति बताई, मुख से शब्द उचारा ।
मैं तोहि लेऊँ छुड़ाय काल से, बन्धन का, सारा ॥दुविधा0
एक अनेक की तज दे दुबिधा, ले अब मेरा सहारा ।
तब फकीर ने दृष्टि उठाई, लखा रूप चमकारा ॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आया, सुन्न महासुन्न पग धारा ।
सहज समाधि रचाया अद्भुत, गुफा का निरख फुहारा ॥
जब सत पद को ओर दृष्टि गई चमका रवि शशी तारा ।
एक अनेक की दरमति नासी, नसा मूल हंकारा ॥
जीवन मुक्त की पदवी पाई, व्यापे न जग धन दारा ।
राधास्वामी खेल खेल में, किया सकल निरवारा ॥
307. फकीरा जा भव सागर पारा ।।टेका ।
जग है दुविधा जग दुरिताई, जग दुई व्यवहारा ।
सुख दुख राग द्वेष विष अमृत, यह सब द्वन्द पसारा फकीरा0
सहज में जग का रूप लखाऊँ, सहित विवेक विचारा ।
यह समझाय तोहि अपनाऊँ, मेटू द्वन्द विकारा ॥
यह अनेक है द्वत भा है, द त में द्वत की धारा ।
द्वत में खींच तान है प्यारे, ले अद्वत सहारा ॥
सत संगत जब किया गुरु का, मिला ज्ञान मत सारा ।
लखा जगत का रूप अनोखा, लख लख किया प्रतिहारा ।
गुरु से प्रेम बढ़ाया तूने, गुरु चेला व्यौहारा ।
गुरु चेला मिल एक हुये जब, एक का मिला सहारा ॥
मिला एक यह नियम है भाई, चित से द्वन्द बिसारा !
मिला है यम, यम और नहीं कुछ, नियम में चित को धारा ॥
सत का ग्रहण नियम है सांचा, यम असत्य छुटकारा ।
समझ जो आई फुरा विवेका, सुख से आसन मारा।
आसन मार विचार की दृढ़ता, प्राणायाम तत सारा ।
इस विचार में रेचक पूरक, कुम्भक का व्यौहारा ॥फकीरा0
चित की वृत्ती निरोध को पाकर, प्रत्याहार संभारा ।
कर अभ्यास मगन मन माना, सत को चित से धारा ॥
यही धारना धारन करना, ध्यान का भया उभारा ।
ध्यान बना जब हुआ फकीरा, तब समाधि बिस्तारा ।
समता जागी ममता भागी, चमका ज्ञान का तारा ।
निरविकल्प सरिकल्प समाधी, शम्भु ने मन को मारा ॥
यह अष्टांग योग है गुरु का, सांचा सहज अकारा ।
सुरत शब्द योग के साधन, मिटा भरम अंधियारा ॥
छुटी समाधि भया उत्थाना, फिर प्रपंच परिवारा ।
साधन साध सन्त मत समझा, सहज समाधि संवारा । ।
सहज समाध सहज चित वृत्ती, सहज योग चित धारा ।
सहज में सहज सहज चित डोले, जीवन मुक्त उद्धारा ॥
सहस कमल दल ज्योति का दर्शन, त्रिकुटी धुन ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न हंसन लीला, सोहंग भँवर फुहारा ॥
ऊंचे चढ़ सत पद में बासा, रूप रंग तज डारा ।
अलख अगम की सुन्दरताई, राधास्वामी नाम निहारा ॥
जीते जी व्यौहार परमारथ, नहीं मीठा नहीं खारा ।
नहीं कड़वा नहीं तीखा लागे, कोमल नहीं करारा ॥
यह विदेह गति जीवन मुक्ति, यह सिद्धांत अपारा ।
मैंने यह सब तुझे सुझाया, मेटा सकल विकारा ।
सहज में तेरा काम बना है, सहज सहज छुटकारा । ।
सहज में सहज रूप पद दरसा, काल कमे भय टारा ।
राधास्वामी दीन दयाला, सन्त रूप अवतारा ।
‘सालिग्राम’ गुरु की दाया, भया सहज निस्तारा ॥
जब लग प्रालब्ध है भाई, भोग काट दे सारा ।
भोगे प्रालब्ध तब कुछ नाहीं, आगे अगम अपारा फकीरा0
कट गई काल कर्म की फांसी, जनम जुआ नहीं हारा ।
राधास्वामी की बलिहारी, रहे फकीर सुखारा ॥फकीरा0
308. विदेसी समझ ले अपने मन में ॥टेका ।
सबको देखा किया परेखा, समझ पड़ा नहीं जग का लेखा ।
भोगा बिपत कलेश विशेखा, मन में रही पछताय विदेसी0
कल्पित जग का भोग बिलासा, कल्पित सब प्रपंच तमासा ।
कल्पित आसा कल्पित बासा, मुख से निकसत हाय ॥
भाई बन्धु कबीले सारे, निज स्वारथ बस लाग प्यारे ।
बिगड़े समय हुये सब न्यारे, एक न आवे जाय ॥
तेरा प्रीतम तेरे घट में, तू है पड़ी जग की खटपट में ।
क्यों नहीं देखे तू तिलपट में, रहा हृदय में छाय ॥
क्यों फिरती है मारी मारी; क्यों जग भरम में हुई दुखारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट गुरु चरन समाय ॥
309. गुरु स्वामी दया करो आज नई ॥टेका ।
वन्धन छूटे मोह भरम का, मन से चिंता भागे ।
दुख आपति और संकट जावे, भक्ति भजन चित लागे ।
आज0 मात पिता की सेवा धारू, साध चरन में प्रीती ।
सत संगत के बचन सुनू, जब, उपजे घट परतीती ॥
आज0 सुमति बसे मन कुमति बिनासे, प्रेम प्यार उर आवे ।
ज्ञान ध्यान से नह लगाऊ, दुख दारुन न सतावे । ।
आज0 मन कर्म वचन रहूँ नित सेवक, सहा तुम्हारा ध्याना ।
सुमिरन भजन में समय बिताऊँ, यही मूल है ज्ञाना ।
आज0
राधास्वामी सदा मनाऊँ, राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी नाम जप और, राधास्वामी ध्याऊ ।
आज
310. नाम गुरु नित गाओ मेरे साधु, नाम गुरु नित गाओ ॥टेक। ।
नाम ही ज्ञान ध्यान पुनि नाम ही, नाम ही गाय सुनाओ ।
नाम ही पाठ नाम ही पूजा, नाम से नेह लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही योग और नाम ही मुद्रा, नाम ही ताड़ी लाओ ।
नाम नाम में अन्तर नहीं कुछ, भेद अलौकिक पाओ ॥
मेरे साधु0 नाम की महिमा क्या कोई जाने, नाम जपो जपवाओ ।
नौका नाम नाम है खेवट, नान से तरो तराओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही सेतबन्ध रामेश्वर, नाम से लंक जिताओ ।
लौ लगी रहे नाम संग निसदिन, नाम पदारथ पाओ ॥
मेरे साधु0 जप तप तीरथ सब कुछ त्यागो, नाम की ज्योत जगाओ ।
नाम से रूप गुरु हिये दरसे, नाम से अलख लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम द्वत का भरम बिनासे, पद अत में जाओ ।
प्रेम प्रीत रहे नाम के अन्तर, नाम भजो भजवाओ ॥
मेरे साधु0 नाम सार घट के भीतर, नाम की धूनी रमाओ ।
नाम अमीरस प्रेम पियाला, अमृत नाम चखाओ । ।
मेरे साधु0 नाम की बंसी नाम की मुरली, नाम का शंख बजाओ ।
मोर तोर की कठिन जेवरी, नाम से बंध कटाओ ॥
मेरे साधु0 दाह जगत से चित्त हटाओ, घट में शोर मचाओ ।
राधास्वामी नाम जात है गुरु की, नाम हिये में बसाओ ॥
मेरे साधु0
311. ब्रह्म क्या है ब्रह्म की, सबको समझ आती नहीं ।
गुरु की जब संगत मिली, फिर माया भरमाती नहीं ॥1 ॥
‘वृह’ बढ़ना ‘म’ मनन और, सोचना है जान लो । ।
सोचना बढ़ना है लक्षण, ब्रम का तुम मान लो ॥2 ॥
जगत है सब ब्रह्ममय, और ब्रह्म सबका खेल है ।
बुन्द गति है सिंध की गति, दोनों ही का मेल है ॥3 ॥
ऐसी दृष्टि जब मिले, तब ब्रह्म की आवे समझ ।
ब्रह्म जब आवे समझ में, भरम की जावे समझ ॥4 ॥
सच्ची बातें राधास्वामी, ने बताई आन कर ।
भूल में अब तुम न पड़ना, मेरे प्यारे जानकर ॥5 ॥
बिनती
(312 कुल संख्या 1214) बन्दना करता हूँ अपनी, और की क्या बन्दना ।
कोई जब हो दूसरा, उसका करूँ तब सामना ॥1 ॥
द्वरत है अद्वैत द्वताद्वत, और कुछ भी नहीं ।
जिस जगह देखो हूँ व्यापा, आप मैं हूँ सब कहीं ॥2 ॥
शुद्ध चित हूँ बुद्ध हूँ, निन्द हूँ नित मुक्त हूँ ।
सबसे न्यारा सब में पूरा, पृथक और संयुक्त हूँ ॥3 ॥
सत्त चित आनन्द हूँ, तीनों में मेरा भास है। ।
मेरे ही आधार पर, जल थल पवन आकास है ॥4 ॥
ब्रह्म हूँ सर्वज्ञ मैं, और जीव हूँ अल्पज्ञ मैं ।
यज्ञ का मन्तव्य हूँ, और आहुती हूँ यज्ञ में ॥5 ॥
जब मिले अनुभव तो मेरे, रूप की पहचान हो ।
ज्ञान हो अनुमान हो, सत मत हो और विज्ञान हो ॥6 ॥
राधास्वामी के बचन, सतसंग में जाकर सुनो ।
अपने आपा को पिछानोगे, जो सुनकर तुम गुनो ॥7 ॥
फुटकल शब्द है
धुन 20 1
313. बाँसुरी बाजी मधु बन में ॥टेका ।
बंसी की धुन सुन जिया हिया मोहे, सुध बुध नहीं रही तन में ।
गोप प्रेम मद माते डोले, गोपी अचेत है मन में ॥
बांसुरी0 बंसी रस कोई नहीं जाने, वह नहीं श्रवन मनन में ।
ज्ञानी ज्ञान ध्यान में भूले, जोगी जोग जतन में ॥
सोहंग सोहंग बंसी बोले, जाग्रत और स्वपन में ।
सुषुप्ति में व्यापी धुन अद्भुत, व्यापी चौथे पन में ॥
मन बानी से ऊंची बंसी, वह नहीं कहन सुनन में। ।
गूजत पिंड ब्रह्मांड के अन्तर, गूजत बस्ती बन में ॥
अनहद नाद शब्द सुन सूरत, लड़न चली है रन में ।
माया कर्म का माथा काटा, धसी धुर पद छिन छिन में ॥
धुन 16 314. बाँसुरी बाजी बाजी बाजी ॥टेक। ।
ऋषि मुनि का ध्यान छूट गयो, शब्द अनाहत गाजी ॥1 ॥
प्रीतम प्रेमी संग मिल बैठे, हो गये दोनों राजी ॥2 ॥
यह बंसी धुन भंवर गुफा की, ढोल पखावज लाजी ॥3 ॥
भक्ति भाव की धूम मची है, साज अनूपम साजी ॥4 ॥
धुन 16 315. जनम अन्मोल नसाय रहो री ।।टेक ॥
उत्तम करनी उत्तम रहनी, उत्तम कथनी भुलाय रहो री ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं कीन्हा, भूल भरम अटकाय रहो री ॥2 ॥
चित मलीन हीन हिय व्याकुल, रात दिवस पछताय रहो री ॥3 ॥
जड़ चेतन की गांठ न खोली, उरझ उरझ उरझाय रहो री ॥4 ॥
कर्म फांस जम काल कठिन अति, छिन छिन अधिक फंसाय रहोरी ॥5 ॥
साज साज कुसंग कुबुद्धि, मन तीनों से लगाय रहो री ॥6 ॥
काल कराल बयाल इन्द्रिन को, गल में हार पहनाय रहो री ॥7 ॥
साधु संग तज तज सतसंगत, माया में लपटाय रहो री ॥8 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम्हरे द्वारे आय रहो री ॥6 ॥
धुन 20 316. गुरु चरन की आसा निस दिन, गुरु चरन की आसा ।।टेक। ।
स्वाँति बून्द गति चित्त बसावे, रहत पपीहा प्यासा ।
पल पल पल पल पी पी रटते, काल करम की त्रासा ॥
गुरु0 पूरी आस लगी गुरु पद से, जग से सदा निरासा ।
जा को चरन प्राप्त गुरू का, सो क्यों होय उदासा ॥
गुरु खुल खेले संसार खेल में, काट मोह का फाँसा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सकल अविद्या नासा ॥
गुरु
धुन 17 317. प्रान दाता दान दाता, नाम दीजे दान ।
भक्ति दीजे पतित पावन, नष्ट हो मदमान ॥1 ॥
कष्ट दारुन दूर कीजे, मेट कर अज्ञान ।
चरन शरन की ओट पकड़ी, बख्शिये निज ज्ञान ।।2। ।
आया शरनागत तुम्हारी, राख लीजे लाज ।
राधास्वामी की दया से, मेरा हो न अकाज ॥3 ॥
धुन 16 318.मन का रूप निहारो साधु, मन का रूप निहारो ॥टेक ॥
मन ही राजा मन ही परजा, मन का सकल पसारो ॥
साधु0 मन ही कुटिल मन ही है निर्मल, मन है अति ही करारो॥
मन रथ गज है मन सब कुछ है, मन ही बनो असबारो॥
मन परलोक लोक यह मन है, मन ही जगत बिस्तारो ॥
साधु0 ज्ञान विराग भक्ति सब मन है, मन की इष्ट करतारो ॥
समझ बूझ अनुभव सब मन है, मन ही आचार विचारो ॥
मन तिरिया मन मातु बंधु कुल, मन सुत गृह परिवारो॥
मन सुध बुध मन काम क्रोध, मन में भरो विकारो॥
मन को सोध चलो गगना पर, सुनो राधास्वामी पुकारो॥
धुन 16 319. धन्य धन्य सतगुरु दयाला, कृपा सागर दुख भंजन ।
संकट मोचन भव भय खंजन, काम निकंदन जन रंजन ॥1 ॥
कोटि काम छवि अंग बिराजे, शोभा धारी हितकारी ।
सुर मुनि ऋषि सब ध्यान लगावें, इन्द्र वरुण आज्ञाकारी ॥2 ॥
शेष सहस मुख बरणे महिमा, नारद शारद गुन गायें ।
अस्तुति ठान पूजा धार, भक्ति अनूपम बर पाव ॥3 ॥
अपरम्पार पार पुरुषोत्तम, व्यापक वरज महान महा ।
वेद बरखाने लीला तेरी, समझ समझ पद पदकमल गहा ॥4 ॥
तू है सिंध अगाध गंभीरा, लहर विष्णु अज त्रिपुरारी ।
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, धन धन तू जगदा धारी ॥5 ॥
सबका प्यारा सबका प्रीतम, घट घट का तू नित बासी ।
आनन्द मंगल रूप है तेरा, आनन्द मय आनन्द रासी ॥6 ॥
सहस कमल में ज्योति निरंजन, त्रिकुटी पद का ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न पारब्रह्म तू , भवर गुफा सोहंग सारा ॥7 ॥
सत्तलोक का सत्त पुरुष तू , अलख अगम का करतारा ।
राधास्वामी धाम में राधास्वामी, सुरत शब्द का भंडारा ॥8 ॥
तेरी सेवा तेरी पूजा, तेरा सुमिरन ध्यान रहे ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तेरा ज्ञान हर आन रहे ॥6 ॥
धुन 17 320. अपरम्पार पार गुरु देवा, बार पार से पार रहा ।
पार वार नहीं पाये कोई, पार रहा और वार रहा ॥1 ॥
धन्य धन्य है तेरी महिमा, क्या कोई जाने ऋषि मुनि ।
करता धरता आदि निरंजन, नागर आगर परम गुनि ॥2 ॥
चतुर सियाना पंडित ज्ञानी, मन बुद्धि के पार है तू । ।
सब में रहता सबसे न्यारा, प्रेत प्रीत भंडार है तू ॥3 ॥
तू महेश है तू ब्रह्मा है, तू है विष्णु जगत पति । ।
लीला तेरी विचित्र रूप की, तू नेती नहीं नहीं एती ॥4 ॥
धुन 17 321. आदि अन्त के मरम को, सतसंग में पाया ।
खुली आँख तव तत्व पद, दृष्टि में आया ॥1 ॥
अपने आप में खो गये, भूला निज आपा ।
मापा आरे को नहीं, किया सबका मापा ॥2 ॥
गुरु मिले निज दया से, आपा दरसाया ।
अपने आरे में थे छुपे, सब ब्रह्म और माया ॥3 ॥
अपने आपका ज्ञान नहीं, औरों को जाना ।
सब विधि जान अनजान था, विन गुरु के ज्ञाना ॥4 ॥
आपे में गुरु ज्ञान था, गुरु आप लखाया ।
भरम मिटा दुर्मति गई, आधे को पाया ॥5 ॥
आप आप में आप था, आपे के भीतर ।
आप मिला निज घट मिला, कुछ रहा न बाहर ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, आपे को बुझा ।
आपे को जब लख लिया, सब कुछ तब सूझा ॥7 ॥
शिव शब्द सांगर
धुन 16 322. प्रेमी सुनो प्रेम की बात ॥टेक। ।
सेवा करो प्रेम से गुरु की, और दर्शन पर बल बल जात ॥प्रेमी0
बचन पियारे गुरु के ऐसे, जस माता सुत तोतरी बात |प्रेमी
जस कामी को कामिन प्यारी अस गुरुमुख को गुरु का गात ॥प्रेमी
खाते पीते चलते फिरते, सोबत जागत बिसर न जात ॥प्रेमी
खटकत रहे भाल ज्यों हियरे, दर्दी के ज्यों दर्द समात ॥प्रेमी
ऐसी लगन गुरु संग जाकी, वह गुरुमुख परमारथ पात ॥प्रेमी
जब लग गुरु प्यारे नहीं ऐसे, तब लग हिरसी जानो जात ॥प्रेमी
मन मुख फिरे किसी का नाहीं, कहो क्योंकर परमारथ पात ॥प्रेमी
राधास्वामी कहत सुनाई, अब सतगुरु का पकड़ो हाथ ॥प्रेमी
धुन 16 323. सजनी गुरु का मिला संदेशा ॥टेक। ।
धीरज धरो शान्ति चित राखो, यह है निज उपदेशा ।
माया काल की बस्ती तज कर, जाओ गुरु के देशा सजनी0
नहीं वहां शोक न चिंता व्यापे, नहीं वहां कलह कलेशा। ।
नित आनन्द विलास चैन सुख, धरो हंस का भेसा ॥सजनी
नहिं वहां ब्रह्मा नहीं वहां विष्णु, नहीं वहां इन्द्र गनेसा ।
नहीं वहां वरुण न वायु न अग्नि, नहीं जल थल नहीं सेसा सजनी
नहीं वहां पिंड नहीं ब्रह्मडा; गांव न बस्ती देसा ।
एक रस जीवन पद निरवाना, दुख सुख नहीं लवलेसा ॥सजनी
जो चल जाये राधास्वामी धामा, दुख सुख नहीं लवसेसा ।
भाग्यवती चल काल लोक तज, त्याग जगत का अंदेसा ।।सजनी
धुन 17 324. नारी देख काम अंग उपजे, साधु देखे भक्ति ।
जल के देखे निर्मलताई, यह विचित्र है युक्ति ॥1 ॥
लोभी लोभ हृदय जब आवे, लालच अधिक सतावे ।
पीक पान की रतन दिखावे, गोपी चन्द भरमावे ॥2 ॥
लालच बस जब निरखी सीपी, रूपा समझ उठाया ।
भूला भटका चतुर सयाना, पीछे बहु पछताया ॥3 ॥
तृष्णा जल की हिये में व्यापी, मृग लख रेत में पानी ।
मृग तृष्णा जल भरम भुलाना, अन्त में प्रान गवानी ॥4 ॥
भय बस भूत ठूठ में भासा, नसी बुद्धि चतुराई । ।
वंद विचारे औषध लाये, भई न कोई भलाई ॥5 ॥
यह जग है माया की छाया, माया आप है झाई ।
जो कोई माया चित बसाये, पड़े भरन में साई ॥6 ॥
प्रातः काल की प्रार्थना के
धुन 20 325. तुम्हारा एक सहारा नाथ ॥टेक। ।
मैं अजान चिन्ता बस व्याकुल, मन में भरा हंकारा ।
तीन ताप की अग्नि जलाये, कौन करे निस्तारा ॥ तुम्हारा
लोभ माह ने मुझे फंसाया, बझे वार न पारा ।
गुरु उपदेश न चित्त समावे, हार हार बहु हारा ॥
तुम्हारा धीरज दे मेरी बांह पकड़ कर, भव से करो किनारा !
राधास्वामी सतगुरु दाता, मैं हूँ दास तुम्हारा ॥
तुम्हारा मध्यान काल की प्रार्थना
धुन 20 326. आस लगी तुम्हरे दरस की, दरस दिखा दो नाथ ॥टेका
मात पिता भाई सम्बन्धी, इनके झूठे प्रेम में बधी ।
मैं तो सब विधि भई हूँ अन्धी, सांची डगर दिखाओ नाथ । ।
आस0 आओ आओ चित में समाओ, सांवरी मूरति हिये बस जाओ ।
बिगड़ी मेरी बना भी जाओ, प्रीत की रीत सिखादो नाथ ।।आस0
तुम हो सांचे सखा संघाती, तुम्हें रिझाऊँ दिन और राती ।
राधास्वामीमेटो सब उत्पाती, घट का मरम लखा दो नाथ ॥आस
सोने से पूर्व की प्रार्थना ॥
धुन 20 327. मेरा संकट काटो नाथ ॥टेक ॥
दीन दुखित और मलीन चित; कोई संग न साथ ।
कैसे दुखी जीवन को बिताऊँ, धरो सिर पर हाथ ॥
मेरा0 तुम हो मेरे सांचे रक्षक, मैं अजान अनाथ ।
भूल चूक को क्षमा करो प्रभु, चरन झुकाऊ माथ ॥
मेरा0 साँची भक्ति दो दयामय, और प्रेम की दात ।
राधास्वामी की कृपा से, छूटे सब उत्पातः । । मेरा0
धुन 16 328. दीन हीन शरण में आया, भेट भाव स्वामी लीजे ।
कृपा दृष्टि से अपने दाता, शरणागत धन दीजे ॥1 ॥
मैं तो निबल कुटिल खल कामी, क्रोधी महा मलीना ।
तुमने अवगुन देख के मेरे, दया पात्र मोहि कीना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु परम सनेही, परम दयाल कृपाला ।
तिमिर मिटा अज्ञान भरम का, हृदय भया उजाला ॥3 ॥
धुन 17 329. धन्य धन्य गुरु लीला तेरी, धन्य तेरी है बानी ।
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, अगम अथाह निशानी ॥1 ॥
आप प्रगट हो मुझे बनाया, निज उपदेश सुनाया ।
जोग जुक्त की रीति सिखाई, भक्ति का पन्थ चलाया ॥2 ॥
ममें लखाया मेद बताया, पड़त जीव तराया ।
शन्द जहाज बिठाकर तूने, भव के पार लगाया ॥3 ॥
तेरी महिमा अगम अलौकिक, क्या कोई वरन सुनावे ।
आप कहे तब समझ में आवे, द्वन्द फाँस कट जावे ॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु पाया, चरन शरन गह पकड़ा ।
बन्ध मुक्ति का संशय मेटा, तोड़ा काल का सकड़ा ॥5 ॥
धुन 17 330. योग को है वियोग का डर, भोग रोग और सोग ।
द्वन्द रचना में पड़े हैं, कैसे समझे लोग ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान की गम नहीं, नहीं बानी मन में सार ।
भक्ति मुक्ति के फल को क्या हूँ, वह है मनन विचार ॥2 ॥
सुन्न सिखर पर मार आसन, चित्त ध्यान लगाय ।
जप किया बहु तप किया बहु, जड़ समाध रचाय ॥3 ॥
हाथ आया कुछ नहीं, नहीं खुले हिय के नेन ।
आपके चरनों में आया, तब मिला सुख चैन ॥4 ॥
पाय कर सुख चैन कुछ दिन, साध शब्द का योग । ।
सार समझा भेट लीजे, आज सन्त संजोग ॥5 ॥
धुन 16 331. माया छाया एक रूप हैं, पकड़े हाथ न आवे ।
रूप जान ले इनका भाई, फिर नहीं यह भरमावे ॥1 ॥
जो भागे माया के भय से, वह कायर अज्ञानी ।
माया मिथ्या कल्पित झूठी, नाटक खेल की खानी ॥2 ॥
नाटकशाला सत्र जाते हैं, देखन खेल तमाशा ।
किसी के चित्त उदासी आई, किसी को हर्ष हुलासा ॥3 ॥
साधु साक्षी रूप से देखें, अपना रूप न त्यागे ।
नहीं वह भिड़े न लड़ भिड़ कल्प, नहीं माया से भाग ॥4 ॥
स्म बना माया की गठड़ी, अर्थ का लाड़ पियारा ।
सखी माल दौलत को भोगे, रहे सदा छुटकारा ॥5 ॥
माया नहीं हैं दुख का कारन, दुख भज्ञान है भाई ।
समझले अपना रूप अनूपा, फिर यह हो सुखदाई ॥6 ॥
काम है माया धर्म है माया, अर्थ है माया रूपा । ।
जो नहीं इनका रूप पिछाने, गिरे भरम के कूपा ॥7 ॥
कूप गिरे सो गोते खावे, कभी नीचे कभी ऊपर । ।
चेत न आवे समझ न पावे, भार कष्ट का सिर पर ॥8 ॥
सन्त समागम जो कोई आवे, सार मेद कुछ बुझे ।
राधास्वामी गुरु की दाया, निज स्वरूप की सूझे ॥6 ॥
धुन 16 332. काम से उपजी मन में आसा, आसा चित में धारी ।
आसा बासा दृढ़ता आहे, दृढ़ता मूल विकारी ॥1 ॥
इस दृढ़ता में बन्धन की जड़, सूत कात मन लाया ।
ताना बाना तान चलाया, बन्धन बीच फसाया ॥2 ॥
बन्धन के बस दुचिता बाढ़ी, दुविधा दुर्मति खानी ।
साँप छछू दर की गति जैसी, वैसा ही अज्ञानी ॥3 ॥
आस न तोड़े पास न छोड़े, रहे ताहि के पासा ।
जहाँ आसा तहाँ बासा पावे, अचरज अजब तमासा ॥4 ॥
यह बन्धन है काल की रसरी, विरला कोई लख पावे ।
राधास्वामी दया करें जब, मन की दुविधा जावे ॥5 ॥
धुन 21 333. मुक्ति साधु रूप में, साधु मुक्ति रूप ॥टेक ॥
कमल नीर सम जग में रहनी, देखें वास सुबास ।
जहां जायें जंगल में मंगल, दुख नहीं साधू पास ॥
सच्चे अगम अनूप ॥1 ॥
देह गेह की चिंता नाही, करें और का हित ।
यह बर दीजे सतगुरु स्वामी, साध सेव करू नित । ।
पड़, न भर्म के कूप ॥2 ॥
राधास्वामी दया के सागर, दया मेहर की खान ।
सन्त रूप धर मुख से अपना, महिमा साध बखान । ।
अचरज अमर अरूप ॥3 ॥
धुन 17 334. | बीज से अंकुर अंकुर कोंपल, पात फूल सक आये ।
फूल से फल फल मीठा लागा, खाय ताहि तृप्ताये ॥1 ॥
काम से धर्म धर्म से सबको, अर्थ प्रापत होई ।
रचना का सिद्धान्त अद्भुत, बिरला समझे कोई ॥2 ॥
राधास्वामी मौज दिखाया, सार तत्व समझाया ।
जो नहीं सार वस्तु को समझे, मानुष जनम गँवाया ॥3 ॥
धुन 20 335. साधु मिला ओम् अस्थान ॥टेक ।
सहस कमल दल वृत्ति जमाई, विश्वमित्र धर ध्यान ।
भ्र मध्य मिथिला पर ठहरे, तोड़ी शिव की कमान ॥1 ॥
सीता सती से विवाह रचाया, राम हुये बलवान ।
आये अवध शरीर को सोधा, दशरथ का किया हान ॥2 ॥
बन में जप तप संजम नेमा, कर बाढ़ा अभिमान ।
सूर्पनखा की नाक कटाई, खर दूषन घुमसान ॥3 ॥
रज रावन ने सीता हरली, पाया दुख महान ।
चल विहंग मारग के रस्ते, कपि मारग दरसान ॥4 ॥
कपि की चाल कठिन अति भारी, पहुँचे बीर हनुमान ।
लंका जाय अशोक बाटिका, देखी सीता आन ॥5 ॥
तब पिपीलिका मारग सोधा, सप्त सिंध गति जान ।
बानर रीछ राक्षस सैना, लंका किया चढ़ान ॥6 ॥
रज तम सत गुन इनको समझो, वृत्ति सुशील सुहान ।
रज रावण तम कुम्भकर्ण को, मारा तक तक बान ॥7 ॥
मेघनाद त्रिकुटी गढ़ जीता, सत विभीषन सन्मान ।
सीता सत वृत्ति ले लौटे, चढ़ पुष्पक बीमान ॥8 ॥
देह अवध का काज सुधारा, पाया अद्भुत ज्ञान । ।
ताके पीछे गुप्त घाट में, घट सरजू में आन ॥6 ॥
कथा सुनी पर मेद न पाया, खुली न हिय की खान ।
राधास्वामी की दाया से, सुरत शब्द मिल छान ॥10
धुन 17 336. शिव बैठे कैलास शिला पर, नन्दी वाहन संग ।
जगमग चन्द्र ललाट पै सोहे, सिर से बहती गंग ॥1 ॥
पारवती संसार की माता, बायें अंग विराजी । ।
दायें गनपत स्वामिकार्तिक, शिव के नित्य समाजी ॥2 ॥
नीलकंठ विख्यात जगत में, गले मुन्ड की माला ।
कर में डम डम बाजे डमरू, साथ भूत बैताला ॥3 ॥
ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, मेरु सुमेरु बिलासा ।
मानसरोवर हंस विराज, धार शिव की आसा ॥4 ॥
ज्ञान ध्यान बैराग की मूरत, समझे कोई कोई ज्ञानी ।
गुरु मिलें तब भेद बतायें, राधास्वामी की सहदानी ॥5 ॥
धुन 2 337. सत है सुख चित है सुख, सुख आनन्द ही का रूप है ।
यह हमारी देह क्या है, ब्रह्म मुख का कूप है ॥1 ॥
सोत निर्मल जल का जैसे, कूप के है बीच में । ।
वैसे ही सुख का भी झरना, रूप के है बीच में ॥2 ॥
बाहरी वृत्ती हटाकर, जर हुये अन्तरमुखी ।
भने दुख का मिट गया, हम होगये सच्चे सुखी ॥3 ॥
अंतरी बिरती के साधन से, गये सब रोग सोग ।
योग सुख का होगया, इससे न होगा अब वियोग ॥4 ॥
राधास्वामी ने बताया, मुख का साधन बानकर ।
अपने अन्तर देख लो तुम, पुतलियों को तानकर ॥1 ॥
घट में अनहद धुन सुनो, बाहर लगाकर तीन बंद। ।
सुन्न में जाते ही मिट जायेगा, सब भवदुख का द्वन्द ॥6 ॥
शब्द सुख है सुरत सुख है, घट में सुख भंडार है ।
शब्द के साधन से, भव सागर से बेड़ा पार है॥7 ॥
धुन 27 338. आके बंधादे धीर प्यारे, आके बंधादे धीर ।।टेका ।
जग जी भूल भुलैय्यां फंसी हूँ; माया के दलदल में फंसी हूँ ।
भरम की रस्सी से मैं कसी हूँ, उर में साले पीर प्यारे ॥1 ॥
दुख की गले में फांसी पड़ी है, पीछे की उलझी गांठ कड़ी है ।
क्या कहूँ आपत विपत बड़ी है, नैनों बहता नीर प्यारे ॥2 ॥
टूटी नाव भंवर में अटकी, दशा देख बुद्धि मेरी खटकी ।
कब तक रहूँ दुविधा में लटकी, करदे भव जल तीर प्यारे॥3 ॥
नहीं मुझे समझ बूझ है प्यारे, रहती हूँ नित तेरे सहारे ।
सबके भरोसे त्याग दिये सारे, तेरी आस शरीर प्यारे ॥4 ॥
राधास्वामी दीन दयाला, तू दुखियों का है प्रतिपाला ।
चरन लगादे करदे निहाला, भीर धीर गम्भीर प्यारे ॥5 ॥
धुन 3 339. गुरु दाता ने मेद बतला दिया ॥टेक। ।
भेद बताया गुर जतलाया, अन्तर दृष्टि खुलाई ।
कर्म ज्ञान का सार सुझाया, घट की राह दिखाई ॥
बतला
चात बनाना छोड़ो भाई, बात का सार पिछानो ।
जान पिछान मान मन अपने, करनी गति चित ठानो ॥
बतला पक पक पक कर कुत्ता मर गया, शीश महल की छाया ।
भोंका भोंक के होगया निरचल, यू ही प्रान गंवाया ॥
आप पियासा पानी न पीवे, ध दान औरों को ।
देने चला पियासा मर गया, जान प्रान तन मन खो॥
चक पक करना सहज रीत है, इसमें क्या कठिनाई ।
बोल बोल कर बुद्धि मति खोई, अन्त में मिली राई ॥
बात सुनी तो करनी कर फिर, कथनी बदनी छोड़ी ।
करनी तो पूरी उतरेगी, जब बक से मुंह मोड़ी ॥
पुस्तक पढ़ी पोथी नित बांची, पड़ा ग्रन्थ के बन्धन । ।
जड़ चेतन की ग्रन्थि गढ़ी हुई, सुलझी एक न उलझन ॥
करनी वाले निकट हैं मुझ से, बकवासी रहें दूरी । ।
करनी करो तो अंग लगा लूँ, कसै कामना पूरी ॥
इस संसार में जब आये हो, सार ग्रहण कर लीजे। ।
तज असार मन मनसा त्यागी, चित गुरु चरनन दीजे ॥
औरों के विचार का झूठा, कब तक खाओगे भाई ।
क्यों नहीं करनी को चित देते, करनी में हैं भलाई ॥
कुत्ते का स्वभाव नहीं अच्छा, टुकड़े कारन भरमा ।
हाथी रहे एक अस्थल में, जाने कर्म का मरमा ।
झूठी पत्चल क्यों नित चाटो, सीखो सिंह की रीती ।
अपना झूठा औरों देदे, जो मति नहीं विपरीती ॥
राधास्वामी जग में आये, सुरत शब्द मत गाया ।
निज अनुभव का पन्थ दिखाया, जो आया सो पाया । ।
धुन 2 340. देख चिन्ता नाम की कर, और सब चिन्ता बिसार ।
तुझ को गुरु से प्यार है तो, गुरु को होगा तुझसे प्यार ॥1 ॥
ध्यान धरं सुमिरन भजन में, गुरु की मूरत का सदा ।
शान्त हो निर्धात हो, निरद्वन्द होकर कर संभार ॥2 ॥
जिस को जिस से हेत है, वह है उसी के अंग संग ।
इसको समझेगा कभी, मन में जो आवेगा विचार ॥3 ॥
करता धरता तू नहीं है, करता धरता और है ।
मौज में रह मौज ही से, आप ही होगा सुधार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया से, मिल गई गुरु की शरन ।
होके शरनागत जुये में, मन में आने को न हार ॥5 ॥
धुन 16 341. सोचा समझा समझ विचारा, सार हाथ नहीं आया ।
पक्षपात के उलझन उलझे, अपना भेद न पाया ॥1 ॥
पंडित शेख किताब में अटके, भोगे दुख सुख नाना ।
पशुओं के सरदार बने वह, ज्यों अन्धों में काना ॥2 ॥
नहीं खुदा के मेद को समझा, नहीं ईश्वर पहिचाना ।
अपने रूप की गम नहीं पाई, कैसे कहूँ सियाना ॥3 ॥
राधास्वामी सन्त रूप घर, बख्श दिया निज झाना ।
जीते जी है जीवन मुक्ति, जीते जी निरवाना ॥4 ॥
धुन 20 342. जो आया गुरु चरन छांह में, मोक्ष भक्ति पल पावेगा टेका ।
हुई चरन में दृढ़ प्रतीती, मन में बसी भक्ति की रीती ।
सत सुगम सहज साधन से, नया नित अनुराग बढावेगा ।
जो दिन दिन गुरु रंग रंगाना, संसार के पन्थ नहीं जाना ।
पी प्रेम का मद मस्ताना, पपिहा बन भक्ति गगन मंडल
में पी पी रटन लगावेगा ।।
राधास्वामी दीन दयाला, कर देंगे वह आप निहाला ।
सुरत शब्द का जोग सुखाला, बिन जुक्ति जतन करतूत सतपद ओर
धुन 20 343. सिधावेगा ।प्रेम की सड़कें देखीं यार ॥टेक
पहली सड़क सुनहरे रंग की, खिली बसन्त बहार ।
जग मग जोत दिया बिन बाती, जोती जोत मंझार ॥
प्रेम दजी सड़क लाल रंग बाना, बीर बहूटि के रंग ।
चली सुरत अखियां भई लाली, सुनी थाप मृदंग ॥
तीजी सड़क नील परवत पर, चन्द्र जोत उजियारा ।
अमी कुड बने दायें बायें, बरनत बने न पारा ॥
चौथी स्वेत बरन छबि अद्भुत, देख सुरत हरषानी ।
यहां आये मन शान्ती आई, सो नहीं जाय बखानी ॥
चारों सड़क लांघ पद सूझा, प्रेम का महल दिखाना ।
सतगुरु का दर्शन तब पाया, मिल गया ठौर ठिकाना ॥
घट के भीतर चार सड़क यह, प्रेमी पन्थी जाने ।
बिन देखे परतीत न आये, कैसे कोई माने ॥
राधास्वामी दया साध की संगत, हम धरपद चल आये। ।
प्रेम की धार हृदय से फूटी, प्रेम में आय समाये ॥
धुन 21 344. घट का परदा खोल रे, घट जगत पसारा ।।टेक ॥
घट में कासी घट में फांसी, घट में जम का द्वारा ।
घट में ज्ञान ध्यान सन्यासी, घट ही में निस्तारा ।
घट में घट को तोल रे, घट अगम अपारा ॥
घट का0 घट में ब्रह्मा वेद विचारे, घट में विष्णु करतारा ।
घट में शिव संसार संहारे, घट शक्ति की धारा ।
घट में शब्द अनमोल रे, घट का लेउ सहारा । । घट का0
घट का घाट पाट पहिचानो, पिंड देस दस द्वारा ।
घट में खेल खिलाड़ी जानो, घट है जीत और हारा ।
घट के बीच तू डोल रे, घट सब से न्यारा ॥
घट का0 घट में अटपट घट में सटपट, घट में मोह अहंकारा ।
घट में घटपट घट में चटपट, घट में ब्रह्म उचारा ।
घट की बानी बोल रे, घट अधिक पियारा ॥
घट का0 घट की निरख परख रखवारी, घट का करे विचारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट का खुला किवारा ।
बाजत अनहद ढोल रे, घट का चमका तारा । ।
घट का0
धुन 17 345. गुरु की बानी महा अनुभवी, कोई समझे गुरु ज्ञानी ।
समझ समझ बूझे मन अपने, बचन सार निज जानी ॥1 ॥
पक्षपात तज मर्म लखाऊँ, सच्ची बात सुनाऊँ ।
जो कोई आवे प्रेम भाव ले, ताही भेद बताऊ ॥2 ॥
गुरु ने जेसे मुझे चिताया, मैं भी सर्वाह चिताऊ ।
नाम रतन धन खान खुली है, नित्त प्रति दिलवाऊँ ॥3 ॥
बिन गाहक बिन पारख पाये, केहि विधि रतन दिखाऊँ ।
पारख गाहक जो कोई पाऊँ, प्रेम से अंग लगाऊँ ॥4 ॥
गुरु का सोंपू माल खजाना, निरख परख अधिकारी ।
अपने साथ औरन को तारू, राधास्वामी की बलिहारी ॥5 ॥
धुन 18 346. सर्व समरथ साइयाँ, तुम जगत के आधार ।
जीव भव जल में पड़े हैं, तुम लगाओ पार ॥1 ॥
भँवर में नैया फंसी है, बुद्धि से लाचार ।
रात गहरी बहु अधेरी, सूझे बार न पार ॥2 ॥
आओ आओ आओ दाता, कर दो बेड़ा पार ।
तुम सहाई जीव निर्बल, करो आज संभार ॥3 ॥
शब्द डोरी हाथ देकर, खींच लो करतार । ।
धाम में दो अपने बासा, तुमहि हो रखवार ॥4 ॥
राधास्वामी दया सागर, दया के भंडार । ।
दीन हीन शरन में आये, करो सब की सुधार ॥5 ॥
धुन 17 347. चल सुरत गुरु देस को, जहां अनहद बाजे ।
जगमग जोत प्रकाश लख, शत सूरज लाजे ॥1 ॥
अमृत द्वन्द फुहार रस, बरसा बिन पानी ।
महिमा अकथ अपार अति, क्या बरने बानी ॥2 ॥
प्रेम झरे बिगसे कँवल, भँवरा मंडलाने ।
मलियागर की बास सों, मन चित हरषाने ॥3 ॥
धर्मी करमी संजमी, क्या जाने महिमा ।
तीन लोक के अंड की, नहीं ताम् उपमा ॥4 ॥
जब लग देखे न नैन से, क्या कोई बखाने । ।
राधास्वामी दीन उपदेस जब, तब ही मन माने ॥1 ॥
धुन 27 348. आ जा आ जा मेरे पास, या मुझे बुलाले पास ॥टेका ।
मैं हूँ तेरे जीव का जीवन, मैं हूँ तेरी सांस ।
मैं तो घट में तेरे बसता, तू क्यों भया उदासा । ।
आजा0 मुझ को देख देख घट अपने, धर चरनन विश्वास ।
एक पनक बिसरू नहीं तुझको, तेरा करूँ सुपास ॥
आजा मेरी आस धार ले चित में, जग से होय निरास । ।
मेरी आस से काम किया कर, कभी न सहना त्रास ॥
मैं हूँ ज्ञान ध्यान भी मैं हूँ, मैं दासों का दास ।
दास दुखी तो मुझे भी दुख हो, करद दुख का नास ॥
आजा0 द्वादस चक्र छोड़ चढ़ ऊचे, कर सत पद में बास ।
वही रूप मेरा है साधु, स्वयम् ज्ञान प्रकास ॥
आजा0 मेरा धाम नहीं काशी में, ना गिरवर कैलास ।
तेरे घट में रहूँ बिराजत, कर ले वहां तलास ॥
आजा0 राधास्वामी चरन शरन में, सुख आनन्द हुलास ।
भवरा पद सरोज का होजा, पाय सुरंग सुबास ॥ आजा0
धुन 16 349. घट मंन्दिर पट खोल कर, कर दर्शन चितलाय ।
अपना आपा त्याग कर, गुरु आपा नित ध्याय ॥1 ॥
आरत कर गा अस्तुति, घंटा शंख बजाय ।
बीन पखावज बांसुरी, अनहद नाद गुजाय ॥2 ॥
दीवा वाला प्रेम का, जोती जगमग होय ।
लख प्रकाश बिच हिये में, मन मंदिर में सोय ॥3 ॥
तेरा तुझ में क्या रहा, तेरा सब कुछ मोर ।
मेरा ले अपना बना, फिर कर मोर न तोर ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, रह अलमस्त फकीर ।
कभी न व्याये जगत गति, उर नाहीं साले पीर ॥5 ॥
धुन 20 350. मौज आधीन दास रहे निसदिन, एक दिन काम करें गुरु पूरा ।।टेक ।
सेवक भाव कठिन है भाई, नहीं रन में ठहरे नर कूरा ।
मौज निहार करे सेवकाई, सीस उतार लड़े कोई सूरा ॥1 ॥
सुमिरन भजन ध्यान सेवा से, काम क्रोध मद सब हो चूरा ।
घट की खटपट चटपट पलटे,प्रगट हिये रवि शशि का नूरा ॥2 ॥
167 दुविधा दुचिताई न सतावे, बाजे सुहाना अनहद तूरा ।
राधास्वामी मौज निरख कर चाले, लोभ के सिर पर मारे हूरा ॥3 ॥
धुन 16 351. घट में जब अनहद राग सुना, बाहर का गाना छोड़ दिया ।
जब गुरु चरनन से मेल मिला, भव फन्द में आना छोड़ दिया ॥1 ॥
अन्दर में जोत जगी जगमग, हुये दूर लोभ मद मोह के ठग ।
नहीं रोके कोई मेरा अब मग, माया का ठिकाना छोड़ दिया ॥2 ॥
संसार है यह अगमापाई, नहीं अपने मीत पुत्र भाई ।
गुरु की जब पाई शरनाई, मन इनसे लगाना छोड़ दिया ॥3 ॥
लो नींद गई मन जाग गया, भय द्वन्द से आप ही भाग गया ।
वराग गया अनुराग गया, यह ताना बाना छोड़ दिया ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दया भारी, अधिकारी भया अन अधिकारी ।
सुरत सत पद की हुई दरबारी, सब करना कराना छोड़ दिया ॥5 ॥
धुन 16 352. शब्द का भेद बता दो, सतगुरु शब्द का भेद बता दो ॥टेक ॥
कैसे मन चढ़े गगन के ऊपर, वह उपाय समझा दो ॥
सत0 प्रगटे जोत में अद्भुत जोती, हिये की आँख खुला दो ॥
सत0 जोत देख सुध बुध तन बिसरू, ऐसी लगन लगा दो ॥
सत घट में शब्द की हो भनकारा, अनहद नाद सुना दो ।
सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चौथा पद दरसा दो ॥
सत
धुन 20 353. | घट का शब्द सुने कोई ज्ञानी ॥टेक ॥
शब्द की महिमा अगम अपारा, क्या कोई बरने बरनन हारा ।
शब्दहि मुक्ति जुक्ति भंडारा, शब्द सुरत की खानी ॥
घट का0 शब्द का योग महा सुखदाई, शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
सुरत शब्द की करो कमाई, सूझे अगम निशानी ॥
शब्द भेद ले घट में आओ, शब्द धाम पर सुरत लगाओ ।
मन चंचल को तहां ठहराओ, मिटे भरम की खानी ॥
घट का0 बिना शब्द झूठा सब धन्दा, बिना शब्द नर डोले अंधा ।
गले पड़ा है काल का फन्दा, छूटन विधि नहीं जानी ॥
शब्द शब्द का सकल पसारा, शब्द है सार सार का सारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु की सहदानी ॥
धुन 20 354. अब मैं नाथ शरन में आया ॥टेक। ।
मैं अजान अज्ञान की मूरत, मोह मान लपटाया ।
बुद्धि विवेक समझ नहीं मुझ में, मन भरमा भरमाया ॥
अब0 बाल जान अन्जान परख कर, दीजे पद की छाया ।
दुखी अधीन दीन चित व्याकुल, जान न आप पराया ॥
भूल चूक अपराध मेट कर, कीजे करुना दाया ।
वाह वाह प्रभु रक्षा कीजे, करम ने बहुत सताया ॥
अब नहीं सहन की शक्ति स्वामी, चित है अधिक घबराया ।
मुझे तो इतनी समझ न आई, क्या अपराध कमाया ।
शरन में आया है शरनागत, मटका धोखा खाया ।
राधास्वासी परम दयाला, अब नहीं व्यापे माया ॥
धुन 20 355. नन्दु माया की निन्दा नहीं करना ॥टेक। ।
माया अगुन सगुन की खानी, निराकार साकारा ।
माया चेतन जड़ की सूरत, माया ब्रह्म पसारा नहीं करना0
माया रोक थाम है प्यारे, माया सिद्धि शक्ति । ।
माया जोग जुगत व्यौहारा, माया प्रेम और भक्ति ॥
माया बुद्धि विवेक जगत में, माया सत सत ज्ञाना ।
माया जप तप संयम क्रिया, माया सुमिरन ध्याना ।
माया अन्त आदि है सबकी, माया मध्य की बासी ।
त्रिगुनात्मक माया को जीते, तब हो पुरुष अविनासी ॥
नहीं करना माया पारवती सावित्री, माया लक्ष्मी मूरत । ।
माया काली कराल बिकराली, माया सारद सूरत ॥
माया बिन कोई रहे न जग में, माया पाले पोसे ।
कैसा मूरख है वह प्राणी, नित उठ माया जो कोसे ॥
माया बनी सहाई सबकी, करतब करम सिखाये। ।
धरम मरम की राह दिखाकर, सत्तलोक पहुँचावे ॥
करनी करो तो रहनी आवे, रहनी अनुभव जागे’ नन्द
गुरु सेवा में रह कर, और वस्तु नहीं मांगे ॥
राधास्वामी मन में आकर, कोई यथार्थ गति बुझे ।
करनी की जब करे कमाई, सार तत्व तब सूझे । ।
धुन 20 356. गुरु ने चिताया जग में आकर ॥टेक ॥
नर शरीर सतगुरु ने धारा, जीव निबल को दिया सहारा ।
भव सागर के पार उतारा, अपना सच्चा रूप दिखाकर ॥
गुरु0 शब्द योग की विधि बताई, सुखमन मध्य राह दरसाई। ।
सोई सुरत को लिया जगाई, दया से अपने अंग लगाकर ॥
सतसंग द्वारा बचन सुनाया, सहज रीति से जीव चिताया ।
अपना आपा उसे दिखाकर, अनहद बानी घट में सुनाकर ॥
सहम कमल त्रिकुटी लखपाई, सुन्न महासुन्न गति परखाई ।
भँवर में माया काल लखाई, अन्त में सतपद धाम में लाकर ॥
अगम अलख के पार अनामी, सन्त कहें जिसे राधास्वामी ।
उसके चरन सरोज नमामी, प्रीत रीति प्रतीत दिलाकर ॥
धुन 20 357. तू हूँ किसको प्यारे, मैं तो निसदिन तेरे संग ॥टेक। ।
नहीं मैं जोग जुगत में रहता, मैं तेरे अंग संग ।
घट में अपने ढूँढ ले मुझको, चित न हो फिर भंग ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन और सेवा, कर तू सहित उमंग ।
आरत ठान धाम त्रिकुटी में, धारे मेरा रंग ॥2 ॥
तेरे भीतर जमुना सरस्वति, बहती निर्मल गंग ।
कर अस्नान ध्यान और पूजा, सबसे होय असंग ॥3 ॥
त्याग भरम दुविधा चतुराई, मन के सभी उचंग ।
निश्चय धार गुरु को चित में, काल को करदे दंग ॥4 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी; कर माया से जंग ।
जो कोई गुरु का ध्यान लगावे, जग में होय न तंग ॥5 ॥
धुन 20 358. सुरत सुन्दर नार जगत में, कोई कोई बिरला जाने ।।टेक। ।
कर सिंगार पुरुष तर रीझे, रीझ रीझ हरखावे ।
नार का रूप सुहाना लागे, हर्ष के अंग लगावे ॥
सुरत भौं के बीच सुनहिला बिंदा, ऊपर टिकली सोहे ।
टिकली लाल लाल रहे जगमग, शोभा देख मन मोहे ॥
टिकली पर है दुपहले टीके, टीके को न भुलावे ।
माथे पर झूमर की सोभा, जगमग जोत दिखावे ॥
मांग काढ के लट बिलगावे, मोतिन माँग भरावे ।
बीच में हीरे पन्ने का गहना, रूप विचित्र बनावे ॥
सिर पर है सोने का झूपना, निश्चल अधर कहावे ।
यह सिंगार है सुरत नारका, कोई समझे समझाये ।
सुरत सहेली रंग रंगीली, अलबेली मतवाली ।
अटखेली खेले नित पिउ से, लाड़ प्यार की पाली ॥
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, मेद सार का सारा ।
गावे सुरत जब शब्द सुहाने, पिया का परखे प्यारा ॥
धुन 21 359. चल गिरवर कैलास, जो तू सच्चा पन्थाई ॥टेक ॥
हर की पौढ़ी हरद्वार चढ़, सहसकमलदल घाटी ।
रुद्र नेत्र को खोल अन्तर में, समझले जग को माटी ।
आज तेरी बन आई ॥
चल जगमग ज्योत प्रकाशे घट में, ज्योतिर्लिंग अकारा ।
जोत जोत में जोत का दर्शन, जोत में जोत पसारा ।
जोत में जोत समाई ।
चल डमरू शब्द की गूज परख सुन, भ्रमध्य आसन डारी ।
व्याये जोर शोर तहाँ छन पल, प्रेम प्रतीत संभाली ।
घंटा शंख बजाई ।
चल0 सुरत के अरघ में जोतर्लिंग का, दरस परस ततकाला ।
सुमिरन भजन ध्यान का लेले, हाथ त्रिशूल का भाला ।
रूप में मन को लगाई ॥
चल नन्द वाहन कर असवारी, परध वृत्ति चित लाना ।
परब को साध पार्वती मति संग, तब समझे गुरु ज्ञाना । ।
रहे समता लव लाई ॥
चल परवत के आकार अटल बन, संग भूत बैताला ।
राग सुहाना अद्भुत सुन सुन, मधुर मनोहर ताना ॥
अनहद धुन सुखदाई ।
चल पीले भंग प्रेम भक्ति की, चित चंचलता भागे ।
काम क्रोध नहीं तुझे सतावे, शब्दयोग मन लागे ।
नहीं रहे मन दुचिताई ॥
चल प्रथम अस्थान त्याग अब प्यारे, त्रिपुर ओर सिधारो ।
अ उ म मृदंग ओम् सुन, सत रज तम को मारो ।
गुरु के सन्मुख जाई ।
दूजा त्रिकुटी पद का मंडल, बीज मन्त्र उच्चारन ।
गुरु चेले की जुग जब सूझे, बने अनोखा चारन ॥
यह युक्ति अनूप सुहाई ॥
चल तीजी मंजिल सुन्न देश की, ब्रह्म सिखर कैलासा ।
मानसरोवर कर असनाना, हो रह गुरु का दासा । ।
सहज समाध लगाई ।
चल सुन्न में सूझे पद निरवाना, हंस गति को पाना ।
शिव का रूप बने फिर तेरा, यही परम कल्याना ॥
समझ मन अपने भाई ॥ चल0 ।
आगे भंवर गुफा की खिड़की, बंसी धुन जहां गाजी ।
काया माया काल जीत ले, अपना आपा साजी । ।
न हो फिर जग दुखदाई । ।
चल सतपद अलख अगम चढ़जा तू , धर राधास्वामी की आसा ।
संतन का यह बल अस्थाना, पावे गुरुमुख दासा । ।
करे जो सहज कमाई ॥ चल
धुन 5 360. मेरा रूप लखे नहीं कोई, जग में मैं हूँ सुन्दर नार ॥टेक ॥
पति के प्रेम में सदा दिवानी, पतिव्रत धर्म रीति हिये ठानी ।
पति की मूरत लख हर्षानी, चित धर प्रेम पियार ॥
मेरा0 आंख के भीतर पति विराजे, सूरज चन्द्र देख छबि लाजे ।
घंटा शंख सहस दल बाजे, पति का रूप निहार । ।
मेरा0 शील सिंदूर से माँग भराई, धर्म वस्त्र से देह सजाई ।
पति को निरख निरख मुस्काई, आपा सकल बिसार ॥
मेरा0 नाम रूप की है अधिकाई, पति सेवा में रहे भलाई ।
पति से मिल गई सुन्दरताई, पति सांचे भरतार । ।
पति की सेवा हिये बसाऊँ, पति को सुमिरू पतिहि मनाऊँ ।
पति से निस दिन नेह लगाऊँ, राधास्वामी भये दयार ।मेरा0
धुन 16 361. भाग जगा गुरु पूरा पाया, अब माया भरमावे क्यों ।
काल कर्म का बन्धन कट गया, मोह जाल फैलावै क्यों ॥1 ॥
धन्य धन्य गुरु तेरी लीला, गुन गाकर हरषाता हूँ ।
तेरी चरन कमल में आकर, जीव निबल कहीं जावे क्यों ।।2। ।
तू है मेरा मैं हूँ तेरा, मेरा तेरा है व्यवहार ।
परमारथ का भेद मिला जब, जग प्रपंच बहकावे क्यों ॥3 ॥
तू है सिंध बुन्द मैं तेरा, बुन्द सिंध से अलग है कब ।
सिंध बुन्द है बुन्द सिंध है, इसको कोई बिलगावे क्यों॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु परमदयाला, सिर पर हाथ रहे तेरा। ।
तेरा हाथ चरन पर तेरे, सेवक हाथ हटावे क्यों ॥5 ॥
धुन 2 362. ढूँढ़ लो तुम घट में अपने, घट ही उसका धाम है ।
द्द कर हो नाम का जप, घट में उसका नाम है ॥1 ॥
वह अवश्य घट में मिलेगा, घट में रहता है सदा ।
घट ही में है शान्ती, और घट ही में विश्राम है ॥2 ॥
वह न तीरथ बरत में है, और न वह मंदिर में है ।
पाता है उसको जो जपता, घट में आठों याम है ॥3 ॥
तुम न बहको तुम न भटको, और न आओ धोके में ।
है अघट घट में तुम्हारे, और उसी से काम है ॥4 ॥
ढूँढ़ो ढूढो ढूंढो ढूँढ़ो, नाम जब है ढूँढ़ राव ।
ढूँढ़ने में मुक्ति है, और धर्म है सत काम है ॥5 ॥
204.
धुन 17 363. चल चल सुरत उस देस को, जहां अनहद बाजे ।
सत्त पुरुष की आन, नित छिन प्रति छिन राजे ॥1 ॥
बानी अद्भुत अचरजी, धुन कान में आवे ।
सुन सुन सुन तारी लगे, नहीं मन भरमावे ॥2 ॥
रम्भा सुन्दर अप्सरा, थिक थिक थिक नाचें ।
वह सब सुरत स्वरूप हैं, सत लोक में राचे ॥3 ॥
जमघट हंसों की बनी, हंसन की पांती ।
वहां न वरण न आश्रम, नहीं कुल नहीं जाती ॥4 ॥
दुख कलेश का नाम नहीं, आनन्द दिन राती। ।
रैन दिवस की गम कहां, पपीहा नहीं स्वांती ॥5 ॥
आनन्द मंगल होत नित, एक चित मन रमा ।
चकित भई यह लख दशा, लक्ष्मी और उमा ॥6 ॥
जनम मरन का दुख मिटे, अमरापुर जाये । ।
जो कोई पहुँचे सत्त पद, अजरा बन जाये ॥7 ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल से, ऊंचा है सत पद । ।
बानी सुन नहीं कह सकें, वह गद या निज पद ॥ ॥
गद से पद का भास है, भाषा में भाखा । ।
बानी निर्मल विमल सुन, निज हृदय राखा ॥6 ॥
दिश दस मंगल होय, मंगला रागनी ।
कुन्डलनी पहुँचे नहीं, नहीं नागनी ॥10 ॥
शक्ति युक्त संयुक्त वह, मुक्ति अस्थाना । ।
जब सुरत पहुँची वहां निश्चय कर जाना ॥11 ॥
बिन जाने कोई क्या कहे, कैसे मन माने ।
बिन माने निश्चय नहीं, निश्चय नहीं आने ॥12 ॥
निज नैनों से देख कर, संशय न रहाई ।
वह इनका विश्राम है, जो धुन लव लाई ॥13 ॥
सतपद धुरपद एक है, सुन सूरत बाता ।
सतपद पहुंचे सन्त जन, त्यागा उत्पाता ॥14 ॥
नहीं काल नहीं कर्म वहां, नहीं माया लवलेस ।
मैं कहूँ तोय समझाय कर, घर सतपद भेस ॥1 ॥
कर साधन इस शब्द का, बन साधन सम्पन्न तू ।
कुछ दिन पीछे आय, हो साधन सम्पन्न तू ॥16 ॥
अनुभव बिन कोई क्या कहे, क्या समझे बानी ।
सतगुरु मिलें तो भेद दें, और भेद निशानी ॥17 ॥
जब लग गुरु से गम नहीं, गुरु गम न विचारा ।
बिन विचार कैसे मिले, निज सार का सारा ॥18 ॥
गुरु बिन मत चल पन्थ में, बिन गुरु दुहीला। ।
गुरु संग जो कोई चले, तब पन्थ सुहीला ॥16 ॥
पुस्तक पोथी क्या पढ़े, क्या उनमें पावे ।
पोथी पढ़ भ्रम में फसे, औरन भरमावे ॥20 ॥
वाचक ज्ञानी बहु मिले, करनी के द्रोही ।
वाचक ज्ञान के बीच में, बने क्रोधी मोही ॥21 ॥
तू इस मारग मत चले, अन्धों का रस्ता ।
अन्धा चले टटोल कर, दुख सहता सहता ॥22 ॥
कथनी तज करनी करे, करनी चित लावे ।
करनी से रहनी मिले, रहनी पद पावे ॥23 ॥
करनी वाला पुत्र है, सतगुरु का साथी। ।
कथनी वाला दूर है, सम्बन्धी नाती ॥23 ॥
रहनी है गुरु नाम में, गुरु इष्ट का साखी ।
आप इष्ट का रूप वह, सच्ची मैं भाखी ॥24 ॥
राधास्वामी की दया, पाया निरवाना ।
सूरत सुन मेरी बात को, कर सत का पयाना ॥26 ॥
धुन 20 364.. गुरु तेरे चरन की बलिहारी ॥टेक। ।
भरम मिटाया मोह नसाया, माया की कटी जड़ सारी ।
सार सुझाया तत्व लखाया, नहीं रहा मैं संसारी ।
गुरु0 भय न सतावे भव न डरावे, निस दिन तेरी रखबारी ।
मोह मया चिंता नहीं व्यापे, मेरी अवस्था भई न्यारी ॥
गुरु0 जाग्रत स्वप्न एक सम लेखा, हटी हिये की अधियारी ।
निज स्वरूप का दर्शन पाया, चहुँ दिस रहे मंगलकारी ॥ गुरु0
अघट प्रेम घट अंतर आया, प्रेम की फूली फुलवारी ।
चम्पा श्रद्धा भक्ति चमेली, निरखू हृदय की क्यारी । ।
गुरु0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, होगया मैं आज्ञाकारी। ।
शब्द योग की करू कमाई, ज्ञान भान घट उजियारी ॥ गुरु0
धुन 17 365. कुरुक्षेत्र यह तन नगरी है, अर्जुन तीर चलावे ।
अन्ध तीर दुर्योधन मारे, भरम अज्ञान मिटावे ॥1 ॥
अर्जुन दास गुरु का बांका, धीर भीर गम्भीरा ।
साधे तीर ज्ञान का पल पल, सोधे विकल शरीरा ॥2 ॥
कृष्ण सारथी गुरु मूरत है, रथ यह देही भाई। ।
अहंकार मन बुद्धि चित्त सब, घोड़ों की समुदाई ॥3 ॥
लड़े भिड़े शत्रू दल मारे, रन भूमी यश पाये ।
पांडवों को जय विजय दिलावे, अंध का वंश मिटावे ॥4 ॥
सहज सहज में काम बनाव, घर राधास्वामी की आस ।
ऐसा सेवक प्यारा मुझको, सो है अर्जुन दास ॥5 ॥
धुन 2 366. ध्यान मन मोहन का करके, मैं भी मोहन होगया ।
दुख गया चिन्ता मिटी, आनन्द तन मन होगया ॥1 ॥
कीट भृगी की दशा है, रंग गुरु का धार कर ।
जब खिला घट में कमल, घट मेरा मधुबन होगया ॥2 ॥
ढूँढ़ता फिरता किसे है, किस लिये तू रात दिन ।
अपने हृदय में जब उसका, आप दर्शन होगया ॥3 ॥
अपने आप को भुलाकर, गुरु का आपा धारकर ।
आप में आपा लखा, मन आप दरपन होगया ॥4 ॥
राधास्वामी की दया का, पात्र तुम समझो मुझे ।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, यह सहज साधन होगया ॥2 ॥
धुन 16 367. प्यारी रंगी प्रेम के रंग में, अब प्यारी घबराये क्यों ।
प्रेम प्यार का रस है मीठा, जग की प्यास सतावे क्यों ॥1 ॥
गुरु ने धरा हाथ सिर ऊपर, रक्षा पल पल होती है ।
मन चंचल क्यों धूम मचावे, भूल भरम भरमावे क्यों ॥2 ॥
चिंता किसकी प्यारी तुझको, अब निचित रह सब विधि तू ।
तेरी चिंता गुरु को रहती, चिंता बस तू आवें क्यों ॥3 ॥
तेरे मन में मेरे तन में, रोम रोम गुरु व्याप रहे ।
उनका बल ले घट में प्यारी, अबला कोई बताये क्यों ॥4 ॥
राधास्वामी अचल मुकामी, अंग संग तेरे रहते हैं ।
घट में दर्शन कर हित चित से, इधर उधर तू जावे क्यों ॥5 ॥
धुन 15 368. क्यों तू भरम रही संसार, तेरा स्वामी तेरे घर में ॥टेक। ।
मन्दिर पूजा तीरथ नहाया, तिलक लगाया भाई ।
माला फेरी ध्यान जमाया, घट का मर्म न पाई ॥ तेरा0
पुरी द्वारिका काशी मथुरा, भरम फिरा चौदेसा ।
अटपट खटपट उमर गंवाई, ज्ञान नहीं लवलेसा ॥
तेरा0 गीता पढ़ी भागवत बाँची, रामायण पढ़ भूली ।
सार पदारथ हाथ न आया, आगे यम की मूली ॥
स्वांग बनाया भेस बनाया, यह पाखंड पसारा ।
भेस से न्यारा साहेब तेरा, लख निज घट मत सारा ॥
अपने घट में बैठक ठानो, घट में करो गुरु पूजा। ।
राधास्वामी भेद बतायें, स्वामी और न दूजा ॥
धुन 6 366. सुन चित से उपदेस, सुरत मेरी भाग्यवती ।।टेक ॥
मन इन्द्री के देस पड़ी है, यह नहीं तेरा देस ॥
सुरत0 देस तेरा राधास्वामी धामा, यह तो है परदेस ॥
प्रेम प्रीत की पहर ले चूनर, धार हंसनी भेस ॥
करम बचन को साथ ले अपने, मन को न दे तू ठेस ॥
राधास्वामी धाम की बांध ले आसा, जहां न दुख लवलेस ॥
धुन 22 370. मैंने अपना रूप बिसारा, तब आप ही अन्जान बना ।
भर्म विकार की हुई उत्पत्ति, काम क्रोध मद मान बना ।
भूला भटका और भर्माया, क्या था और क्या आन बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलाबान बना ॥1 ॥
कर्म किया हट साधन किया, तपसी जपी भक्ति साधी ।
ईश्वर की भक्ति को चित दिया, वह भी ठहरी उपाधी ।
चैन न पाया शान्ति न आई, पूरी मिली नहीं आधी ।
जोग जुगत कर थका, जतन ने बुद्धि को बाधी ।
मन चंचल में दुविधा आई, चित चिन्ता की खान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥2 ॥
206 गुरु मिले सतसंग कराया, सत संगत के सुने बचन ।
चित को रोका मन को रोका, रोक थाम से किया श्रवन ।
श्रवन किया तो फिर इस श्रवन का, सहज में होगया आप मनन ।
श्रवन मनन के पीछे कर लिया, उस बानी का निध्यासन ।
तत्वमसि कहा तब गुरु ने, तब स्वरूप का ज्ञान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥3 ॥
मैं हूँ ब्रह्म ब्रह्म नहीं मुझसे, कभी अलग और नहीं न्यारा ।
मेरा रूप अगम और अलख है, मैं इनसे भी हूँ पारा ।
अपना प्यार प्रेम जब भाया, अपने आपका मैं प्यारा ।
मैं हूँ परे पार हूँ सबसे, और कोई होगा वारा ।
सोहं अहं ब्रह्मास्मि कह निकला, ब्रह्म का पहिचान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥4 ॥
मैं नहीं कान आँख और देही, मैं नहीं मन चित हंकारा ।
मैं नहीं कर्म भक्ति और बुद्धि, रूप मेरा सबसे न्यारा ।
मैं नहिं उनका यह रहते हैं, क्यों मेरे आधारा ।
अयं आत्मा ब्रह्म अखंडं, अद्वतीय अमृत सारा ।
अपनी समझ आप अब आई, शान्ति का अवसान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥5 ॥
चौथे पद की समझ तब आई, तुर्या पद सहजहि पाई ।
समझ बूझ नहिं किंचित मुझको, नहीं सहनी पड़ी कठिनाई ।
तुर्या छोड़ा तुर्यातीत हुआ, तब मेरी बन आई ।
अपने में अब आप समाना, कैसी दुर्मति दुचिताई ।
गुरु दाता गुरु ज्ञानी ध्यानी, गुरु से नाम का दान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, केसा लीलावान बना ॥6 ॥
मैं क्या हूँ कोई कैसे जाने, कहन सुनन में नहीं आता ।
नहीं मरता नहीं जीता हूँ मैं, नहीं आता कहीं नहीं जाता ।
आप भरम कर आपको भूला, कैसे कोई भरमाता ।
यह भी लीला एक थी मेरी, नहीं तू क्यों धोका खाता ।
राधास्वामी सतगुरु पूरे, मिले तो ज्ञान और ध्यान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥7 ॥
धुन 8 371. दया कीजै मुझको चरनों में लीजे, बैठा संग में ज्ञान गम आप दीजे ।
समझ आये संसार का तत्व सारा, मिटे भर्म माया करम का विकारा ।
बिमल चित मन शुद्ध बुद्धि हो निर्मल, अहंकार में सच्ची शक्ति
का हो बल ।
खुले अनुभव और ब्रह्म का भेद पाऊँ, वह क्या है वह कैसा है
सब को जताऊ ॥
दया दृष्टि हो दास पर राधास्वामी, कमल पद में निस दिन
नमामी नमामी ।
धुन 17 372. धन्य धन्य गुरु देव दया सागर धनी ।
बख्शा सुरत शब्द भेद किया
दिल का गनी ॥
चरन कमल की धूर आंख में जब लगाई ।
खान खुली निज हृदय में
सुख सम्पत पाई ॥
सहस कवल दल में किया ज्योती का दर्शन ।
घंटा शंख की नाद का
हुआ सहज ही श्रवन ॥
बंकनाल के पार चढ़ त्रिकुटी पद परसा ।
सुनी ओउम् धुनी घट में ही
ओंकार जो दरसा ॥
सुन्न महासुन्न दसम दर मानस अस्नाना ।
हंसगती जब पाईया चुना
मोती ज्ञाना । ।
चार शब्द जहां गुप्त हैं बानी अति निर्मल ।
अधिकारी कोई सुन हिये
सुरत का बल ॥ आला
भंवर गुफा के मध्य में मुरली धुन बाजी ।
सुन सुन सूरत हरपती
हुई मन में राजी ॥
सोहंग से परचा भया सोहंग गति पाई ।
अब भव में नहीं मैं फंसू
गुरु की शरनाई ॥
सतपद में सत धाम है सत बीन का राजा ।
सत्त सत्त का शब्द याम
आठों तहां गाजा ॥
अलख अगम के पार पार संतन का धामा ।
राधास्वामी धाम में मिला
अब विश्रामा ॥
धन्य धन्य तू धन्य है यह धन्य कमाई ।
सहजहि कट गया जाल
छुटा जग अगमा पाई ।
बाहर भीतर एक रस निज रूप पसारा ।
प्रगटे दीन दयाल दिया
मोहि आप सहारा ॥
राधास्वामी नाम कह कह तारी लागी ।
सुरत शब्द के योग से
सुरत भई विस्माधी ॥
धुन 4 373. तू अमीर तू वजीर, तू फकीर सांचा ।
तू गुरु की अब पकड़ी ओट, त्याग जगत भाव खोट ।
सही घनी जम की चोट, अब न लगे आँचा । ।
तू0 सार गह तज असार, झूटा जग का पसार ।
सतगुरु को कर ले यार, सांच मीत जांचा ॥
तू0 राधास्वामी राधास्वामी, सतगुरु हैं तेरे हामी ।
राधास्वामी पद नमामी, गह के चरन बांचा ॥ तू0
धुन 16 374. मैं पैय्यां परूँ अब मेरा आप सुधार करो टेक। ।
भव जल में नहीं नाव न बेड़ा, बहियां पकर मुझे पार करो ॥
मैं गोते खाते बहु दिन बीते, अब तो गुरु निस्तार करो ॥
लहर लहर बिच भँवर भैर है, अपनी दया उद्धार करो ॥
मैं0 हाथ पांव नहीं शक्ति है बाकी, समरथ तुम ही संभार करो ॥
मैं0 राधास्वामी चरन शरनं बलिहारी, प्रेम अगनी उदगार करो ॥ मैं0
धुन 16 375. लीला तेरी न्यारी प्रभु जी, लीला तेरी न्यारी ॥टेका ।
ब्रह्मा विष्णु भेद नहीं पावे, नहीं जाने त्रिपुरारी ॥
प्रभु जी0 माया बस सब रहे भुलाने, भटक भटक भटकानी ॥
करम जाल और काल चक्र में, निसदिन जिया दुखारी ॥
सबहि नचावत नाच अनोखा, राजा रंक भिकारी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चकित भये नरनारी ॥
धुन 16 376. आजा रंगीले यार, छवि तेरी घुझको भागई ॥टेक। ।
सूना पड़ा था यह मन मंदिर, अब तेरी मूरत आगई ।आजा0
सुरत को घंटा शंख मिला जब, अनहद नाद बजा गई ॥
तिल को उलट सहस कमल में, जोत में जोत समा गई ।
त्रिकुटी में ओंकार की लीला, अद्भुत रूप दिखा गई ॥
दृष्टि खुली हिया जिया हर्षाना, सुन्न समाध रचा गई ॥
भँवर गुफा में बंसी बाजी, कोटिन कृष्ण लजा गई ॥
सतपद अलख अगम राधास्वामी, चरन शरन गुरु पा गई ।
धुन 17 377. गुरु दरस दिखा गुरु दरस दिखा, तेरा अद्भुत रूप है प्यारा ।
मन तिमिर मिटा मन तिमिर मिटा, घट चमके रवि शशी तारा ॥1 ॥
तेरी बांकी अदा तेरी बांकी अदा, मेरे हिया जिया को अति भाई ।
तेरा ध्यान करूँ तेरा ध्यान करूं, हित चित से मैं दिन राती ॥2 ॥
घट भीतर आ घट भीतर आ, घट का घर पड़ा है सूना ।
तेरी लगन लगी तेरी लगन लगी, बिरह ज्वाला तपे दिन दूना ॥3 ॥
धुन 16 378. प्रेम की भट्टी प्रेमी बैठे, पीते प्रेम पियाला हो ।टेका ।
अमृत रस से भरा पियाला, अद्भुत अधिक रसाला हो । ।
जो नहीं पिया स्वाद क्या जाने, कैसे बने मतवाला हो ।
इस प्याले का कठिन है पीना, मांगे सीस कलाला हो ।
लोभी तन मन सीस न अरपे, उरझा जम की ज्वाला हो ।
साधु संग में गुरु गम पाये, दुर्मति घट से निकाला हो ।
पी पी तृप्त भये दिन राती, छूटा जग जंजाला हो ।
लाली लाली अखिया गुरु छवि देखी, अन्तर भया उजाला हो ।
मतवाले से कोई न हटके, हानी करे नहीं काला हो ।
कुंजी घर की सुरत शब्द की, खुल गया मनका ताला हो ।
आपहि द्वन्द मिटा सब भव का, सुख से भया निराला हो ।
नहीं कोई गुरु बिन है अपना, बहु विधि देखा भाला हो ।
एकचित होय स्वामी चरनन लागा, दुचिता का भय टाला हो ।
नाम सुधा रस गुरु ने बख्शा, तन भया प्रेम पियाला हो ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगया सहज निहाला हो ।
धुन 21 379. आजा रंगीले यार तेरी छवि चित में समा गई ॥टेक। ।
दुर्मति त्यागू चरनों लागू, जग के मोह मया से भागू ।
बाँकी अदा मन भागई ॥
अरे आजा रंगीले0 सबको छोड़ा, नाता तोड़ा, तुझसे नेह का रिश्ता जोड़ा ।
तेरे शरन में आ गई ॥
अरे आजा0 ।
नहीं संसारी न मैं विभिचारी, तुझ से होगई मेरी यारी ।
भक्ति भाव फल पा गई ॥
अरे आजा0
गुरु है दाता गुरु पितु माता, गुरु हैं सम्बन्धी हित भ्राता ।
गुरु के रंग रंगा गई ॥
अरे आजा0 जगदाधारी जग हितकारी, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
माया ओर मैं ना गई ॥
अरे आजा0
धुन 18 380. दीन बन्धु दयाल स्वामी, तुम दया के सिंध ।
निज दया से बंध काटो, छूटे द्वन्द का बंध ॥1 ॥
काल कर्म का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटने की, उरझ उरझ फंसाय ॥2 ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे चरन में, कट जग के पाप ॥3 ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पायें परम पद को, चित चरन से मेल ॥4 ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
दान दीजे बासना से, चित्त हो उपराम ॥5 ॥
धुन 66 381. सतगुरु प्यारे ने सुनाया, पिया का संदेशा हो ।टेक। ।
सुन सुन सुरत भई मस्तानी, मेटा भव का अंदेसा हो ॥1 ॥
छिन भंगी माया विस्तारा, व्यापा भरम कलेसा हो ॥2 ॥
काल मते की दुर्मति छोड़ी, ममता नहीं लवलेसा हो ॥3 ॥
तिल की ओट पहाड़ लखा जब, त्रिकुटी किया प्रवेशा हो ॥4 ॥
सुन्न में पहुँची सुन्न गति निरखी, महासुन्न का देसा हो ॥5 ॥
भँवर गुफा की खिड़का अद्भुत, पहुँचे कोई दस्वेसा हो ॥6 ॥
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी धाम उजेसा हो ॥7 ॥
215
धुन 16 382. हम होगये गुरु के गुरु के, नाता नहीं जग से कुल से ।।टेक। ।
गुरु देवन के देवा, सब करो’ गुरु की सेवा ॥1 ॥
गुरु मानुष तन धर आये, गुरु गुप्त भेद दरसाये ॥2 ॥
गुरु सम नहीं कोई रक्षक, सम्बन्धी जानो तक्षक ॥3 ॥
गुरु रूप लखे नैनों से, गुरु शब्द सुने श्रवन से ॥4 ॥
गुरु ने सत रूप दिखाया, गुरु अलख अगम दरसाया ॥5 ॥
गुरु रूप धरा राधास्वामी, गुरु के पद कमल नमामी ॥6 ॥
धुन 17 383. धन्य घड़ी धन्य दिवस, धन्य समय आया ।
धन्य धन्य धन्य धन्य, धन्य तेरी माया ॥1 ॥
भूले थे जग आस, ज्ञान रतन पाया ।
तुझसे नहीं कोई निराश, धन्य तेरी दाया ॥2 ॥
भक्तन लाज काज, जोड़ा मंगल समाज ।
आनन्द सुख बिभो आज, चारों ओर छाया ॥3 ॥
धुन 16 384. गुरु जम का फन्द कटा दिया, भव दारुन द्वन्द हटा दिया ॥टेक। ।
माया जाल का उलझन भारी, घटते घटते घटा दिया ॥1 ॥
अमृत नाम स्वाद रस मीठा, हितचित आन चटा दिया ॥2 ॥
नाम रतन के जो अधिकारी, तिन में आप बटा दिया ॥3 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिभ्या नाम रटा दिया ॥4 ॥
धुन 16 385. चल गुरु मारग चल गुरु मारग, जगत वासना प्यारी रे ॥टेक। ।
कान पड़े जब शब्द रसीला, सोया मनुआ जागी रे ॥1 ॥
मया मोह दुर्मति चतुराई, सबही अचानक भागी रे ॥2 ॥
पग पग बरसे अमृत धारा, जड़ी अखंडित लागी रे ॥3 ॥
भक्ति भाव सुख आनन्द मंगल, सूरत भई सुहागी रे ।
चलत चलत धुरपद नियरानी, मन हुआ सहज विरागी रे ॥
कर्म धर्म का बन्धन टूटा, जम घर देदी आगी रे ।
चमकत विजली बोलत दादुर, चातक भये अति रागी रे ॥
गुरु दया से निज पद पाया, अब क्या काहु से मांगी रे ।
मेरु सुमेरु शिखर जब दरसा, मन भया सत अनुरागी रे । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, परम प्रीति रस पागी रे ॥
धुन 16 386. तेरे भक्ति भाव नहीं मन में प्रानी,
भूला माया के पन में ॥टेका काम क्रोध और छल चतुराई, रहा इसी के जतन में ॥
गुरु का ध्यान न गुरु की पूजा, नहीं तू गुरु की लगन में ॥
मानुष जनम मिला रहो निस दिन, सुमिरन ध्यान भजन में ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भजले गुरु छिन छिन में ।
धुन 16 387. छोड़ो मन कुटिलाई साधो, छोड़ो मन कुटिलाई ॥टेक ।
अनहोनी कभी होनी नाही, होनी काटि न जाई ।
वृथा उपाय करे कर मूरख, गह सतगुरु शरनाई ॥
सिंध अपार अगम जल भरिया, रह रह कर लहराई । ।
ता में जीव जन्तु बहुतेरा, थाह न कोई पाई ॥
बाढ़े घटे घटे और बादे, रोक सके को आई ॥
देव द्वत नर सुर मुनि बड़े, बूड़ी सब दुनियाई ॥
ऊँचे गगन मंडल शशि डोले, प्रतिबिम्ब होय आई । ।
जब लग चंद उदय हुये तारे, सिंघ बाढ़ किम जाई । ।
मिट गये चंद गुप्त भये बादर, धरती आकास समाई ॥
आवागवन के फंद कटाने, राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
धुन 17 388. साधो यह जग अगमापाई, तासों कौन भलाई ॥टेक ॥
छिन में उपजे छिन में बिनसे, ज्यों बादर की छांई ।
धन दौलत का रूप पिछानो, सपना है रैनाई ॥
बालू भीत उठाई दिन दिन, तासों नेह लगाई ।
पल छिन भीतर विनस जात है, यह तो महा दुखदाई ॥
पढ़ा लिखा भरमा भरमाया, भाई बुद्धि चतुराई ।
अध घटी काया भई निबेल, सूझ परी तब भाई ॥
आसा तृष्णा काल का फांसा, उरझ उरझ उरझाई ।
केसे छूटन होय तुम्हारा, जो नहीं गुरु सुरझाई । ।
त्राह त्राह कर सतसंग आओ, ले उनकी शरनाई ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी बात बनाई ।
धुन 16 389. चरन गुरु हिरदे धार रही ॥टेक। ।
भव की धार कठिन अति भारी, सो अब उलट वही ।
गुरु बिन कौन संभारे मन को, सुरत उमंग अब शब्द गही ।
कोटिन जन्म भरमते बीते, काहू मेरी आन न बांह गही ।
अपके सतगुरु मिले दया कर, शब्द भेद उन सार दई ।
नी को छोड़ द्वार दस लागी, अक्षर मय नौनीत लई ।
नौका पार चली अब गुरु बल, अगम पदारथ लान सही । ।
क्या क्या कहूँ कहूँ गति नाही, सुरत शब्द मिल एक हुई ।
रहनी गहनी की बात नियारी, सन्त बिना कोई नाहिं कही ।
सुन्न शिखर चढ़ महा सुन्न लख, भवर गुफा पर ठाठ ठई । ।
सत्त नाम सत धाम निरख धुर, अलख अगम गति पाय गई ।
सुरत निरत संग चली अगाड़ी, राधास्वामी राधास्वामी चरन मई । ।
अब आरत सिंगार सुधारी, प्रेम उमंग भी बहुत चही ॥
काल कला सब दर बिडारी, दयाल सरन अब आन लई ॥
पचरंग बाना पहन विराजे, शोभा धारी आज नई ।
जीव काज निज भवन छोड़कर, जमा दूध फिर होत दही । ।
मथ मथ माखन काढ़ निकारा, बिरले गुरुसुख चाख चखी ।
राधास्वामी दीन दयाला, चढ़ो अधर निज धाम यही ॥
धुन 20 390. खोज री पिया को निज घट में ॥टेका
जो तुम पिया से मिलना चाहो, तो भटको मत मग में ।
तीरथ बरत कर्म आचारा, यह अटकावे मग में ॥
खोज री जब लग सतगुरु मिले न पूरे, पड़े रहोगे अघ में ।
नाम सुधारस कभी न पाआ, भरमो योनी खग में ॥
पंडित काजी भेष शेख सब, अटक रहे डग डग में ॥
इनके संग पिया नहीं मिलना, पिया मिले कोई साध समग में ॥
यह तो भूले विषय वास में, भर्म बसे इनकी रग रग में ।
बिना संत कोई भेद न पावे, वे तोहि कहें अलग में ॥
जब लग संत मिले नहीं तुमको, खाय ठगोरी तू इन ठग में ।
राधास्वामी शरन गहो तो, रखो जोति जगमग में ॥
धुन 16 391. राधास्वामी करो मेरा बेड़ा पार ।।टेक। ।
मुझ समान दुखिया नहीं कोई, देख लिया तिहुँ लोक मॅझार ।
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा, कर्म का पड़ा बहुत सिर भार ॥
रा0 रहा किसी का नहीं सहारा, मेरी लाज के तुम रखवार ॥
अपने बैरी पराये शत्रु, मेरी दृष्टि नरक संसार ॥+
चरन कमल में आन पड़ी हूँ, राधास्वामी करो सँभार ॥
धुन 17 392. मेरे घट में अनहद बाजे बाजे बाजे ।
धुन मधुर रसीले गाजे गाजे गाजे ॥1 ॥
सत सार शब्द अब पाया पाया पाया ।
सुरत साज अनूपम साजे साजे साजे ॥2 ॥
मन अद्भुत रंग दिखाया दिखाया दिखाया ।
मद मोह लोभ सब भाजे भाजे भाजे ॥3 ॥
प्रकाश विचित्र प्रकाशा प्रकाशा प्रकाशा ।
हिये सतगुरु मेरे विराजे विराजे विराजे ॥4 ॥
राधास्वामी खेल खिलाया खिलाया खिलाया ।
निरवानी हुआ मैं आजे आजे आजे ॥5 ॥
धुन 17 393. धुन अनहद में चित लाया लाया लाया ।
चढ़ अधर घाट गुरु पाया पाया पाया ॥1 ॥
सुरत झूम चली मद माती माती माती ।
घट राग सुहावन गाया गाया गाया ॥2 ॥
उत्तम पद निश्चल दरसा दरसा दरसा ।
माया का देखा छाया छाया छाया ॥3 ॥
माया करम सब त्यागा त्यागा त्यागा ।
धुरपद में आया आया आया ॥4 ॥
राधास्वामी मौज दिखाई दिखाई दिखाई ।
गुरु चरन ओर तष धाया धाया धाया ॥
धुन 16 394. नर भजन बिना पछतायेगा, नर अन्तकाल पछतायेगा ।।टेक। ।
सांसों सांस जात है अवसर, फिर यह हाथ न आयेगा ।
आवेगी जब लहर मौत की, फिर न संभाला जायेगा । ।
मुट्ठी बाँधे आया है नर, मुट्ठी बांधे जायेगा ॥
नर0 जग का भूठा सकल पसारा, इससे क्या तू पायेगा ।
करना है सो करले पानी, नहीं तो मुंह की खायेगा ।
ज्ञान ध्यान भक्ति गुरु सेवा, फिर क्या करे करायेगा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,भव के भरम मिटायेगा ।
धुन 17 395. मुझको बतादे अपना ठिकाना, तेरा है धाम कहां साधु ।
नाम बतादे पता बतादे, अपना जतादे निशां साधु ॥
तेरी कुटी है किस तीरथ में, किस जां तेरा मकां साधु ।
मैं भी करूँ हित चित से दर्शन, रहता है तू जहाँ साधु । ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी तेरी जवां साधु ॥1 ॥
पढ़ा लिखा कुछ समझ न आया, भूल भरमें में मन अटका ।
जम के हाथ बिके सब प्रानी, माया काल का पड़ा झटका ॥
दुख कलेश से दुखी हैं सारे, जनम मरन का है खटका ।
दया से नेह से हमें सुनादे, भेद गुप्त मानुष घट का ॥
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥2 ॥
भवसागर का अगम पंथ है, नाव पड़ी मझधारा है ।
पग पग पड़े भंवर का धोका, यहां से दूर किनारा है । ।
काली घटा गगन में छाई, मूझे वार न पारा है ।
सुन सुन कहते हैं क्या प्रानी, चहुँ दिस हाहाकारा है ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥3 ॥
तीन ताप के अग्नि कुन्ड में, सब निस बासर जलते है ।
छोड़ धरम का सीधा रस्ता, टेढ़े रस्ते चलते हैं । ।
स्वर्ग नर्क में जीव जन्तु सब, नित नया चोला बदलते हैं ।
दे उपदेश दीन दुखियों को, हाथ शोक से मलते हैं ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥4 ॥
कोई अद्वत द्वैत में भूले, कोई बने योगी ज्ञानी ।
किसी ने न्यारा पंथ चलाया, किसी की चाल है मनमानी ।
भक्ति भाव से नहीं परिचय कुछ, प्रेम की महिमा नहीं जानी ।
दरस दिखा दे डगर बता दे, आके सुना अपनी बानी ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥5 ॥
धुन 1 396. गुरु नाम से बेड़ा पार हुआ, सुखदाई सकल संसार हुआ ।
अब जग नहीं कारागार हुआ, सुख चैन का नित व्यवहार हुआ ॥1 ॥
चिंता न रही दुविधा न रही, मन की सब दुर्मति दूर हुई ।
मैं क्या थी क्या से क्या हूँ बनी, कैसे कहूँ क्या निस्तार हुआ ॥2 ॥
घर में सुख है मन में सुख है, सुख ही सुख व्याप रहा चहुँ दिस ।
गुरु भक्ति में आनन्द हुआ, सब विधि मेरा उद्धार हुआ ॥3 ॥
सुख का जब तार बंधा जगमग, घट में प्रगटा भक्ति का मग ।
भक्ति सुखदाई हुई मुझको, सुख भक्ति का व्यौहार हुआ ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दयाभारी, अब मैं नहीं किंचित संसारी ।
जल पक्षी का जीवन प्राप्त हुआ, गुरु भक्ति का विस्तार हुआ ॥5 ॥
धुन 3 397.. राधास्वामी की मौज रहूँ चित धार ॥टेक। ।
जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज विरुद्ध न करना ।
मौज में सदा भलाई सबकी, क्यों चिन्ता कर मरना ॥रा0
स्वा0 बलि को इन्द्रासन की इच्छा, यज्ञ विधान रचाया ।
मौज से वामन रूप प्रगट भया, तुरत पताल पठाया ॥
दशरथ राम तिलक को चाहे, करे उपाय घनेरी । ।
मौज उसे बनबासी बनावे, कथा ऐसी बहुतेरी ॥
दुर्योधन धन धाम का भूका, पांडव धोका दीन्हा ।
मौज हुई महाभारत ठन गई, कुल कलंक सिर लीना ॥
यह सब हैं इतिहास पुराने, सोच समझ मन आया ।
राधास्वामी दया से मौज पिछानी, मौज से चित्त लगायारा0स्वा0 धुन 2
398. जिन को गुरु से प्रेम है, वह मौज के आधार हैं ।
उनके बेड़े भव के सागर से, सहज में पार हैं ॥1 ॥
थिर वचन मन थिर सुरत थिर, तन को अपने थिर करो ।
नाम फिर सतगुरु का, स्थिरताई से घट में तुम जपो ॥2 ॥
बंद मुंह हो कान और, आँखों को अपने करलो बंद ।
नाम लो इस रीत से, घट में प्रगटे सूर चन्द ॥3 ॥
किसकी इच्छा है तुम्हें, इच्छा ही यम की फांस है ।
जब नहीं इच्छा रही, दुख और भरम का नास है ॥4 ॥
राधास्वामी गाइये, और राधास्वामी ध्याइये ।
राधास्वामी नाम ले ले, राधास्वामी पाइये ॥5 ॥ धुन 20
399. मनुआ सोच समझ पग धरना ॥टेक। ।
चंचल मनुआ कहा न माने, क्या उपाय अब करना ।
गुरु के नाम का सुमिरन निसदिन, या विधि भवजल तरना ॥1 ॥
रोग सोग में आयु बीती, ठंडी सांस का भरना। ।
गुरु के नाम से संकट भागे, क्यों नहीं नाम सुमिरना ॥2 ॥
सतगुरु तेरे सदा सहाई, यम के भय से डरना । ।
राधास्वामी अंग संग जब, क्यों फिर दुख से मरना ॥3 ॥ धुन 11
400. है पिंड घट तुम्हारा, ब्रह्मांड घट बना है ।
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥







Hits Today : 847
Total Hits : 1712650