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Song 201 — Hindi
ज्ञान का जब धन मिला है, ज्ञान के भंडार से।
भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥
सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।
यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥
चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।
फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥
सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।
शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥
कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।
सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥
सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।
भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥
मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।
राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥
भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥
सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।
यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥
चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।
फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥
सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।
शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥
कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।
सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥
सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।
भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥
मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।
राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥
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Song 202 — Hindi
आई शरणागत तुम्हारे, आके कैसी खोगई ।।
जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥
इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।
जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥
सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।
लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥
आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।
बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।
हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।
जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥
इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।
जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥
सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।
लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥
आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।
बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।
हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।
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Song 203 — Hindi
हंस हो और हंस के, राजा हो ऐसा जान लो ।
हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥
दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।
पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥
तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।
गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥
जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।
गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥
राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।
घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥
हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥
दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।
पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥
तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।
गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥
जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।
गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥
राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।
घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥
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Song 204 — Hindi
नाम जब गुरु का लिया, हो जाओ गुरु का ध्यान कर ।
कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥
गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।
यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥
जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।
भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥
गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।
देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।
घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥
कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥
गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।
यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥
जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।
भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥
गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।
देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।
घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥
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Song 205 — Hindi
जब सुशीला होगई, आनन्द मन को मिल गया ।।
जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥
शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।
वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥
शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।
शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।
जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥
जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥
शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।
वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥
शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।
शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।
जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥
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Song 206 — Hindi
ज्ञान जब पाया तो, फिर अज्ञान की क्यों चाह हो ।
भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥
गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।
वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥
चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।
चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥
तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।
बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।
राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।
अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।
भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥
गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।
वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥
चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।
चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥
तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।
बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।
राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।
अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।
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Song 207 — Hindi
ज्ञान का ले आसरा, और ज्ञान का आधार हो ।
फिर सहज भव सिंध से, बेड़ा तुम्हारा पार हो ।।।।
शब्द में है अर्थ, और अर्थ में है ज्ञान गम ।
चित की विरती रोक लो, और शब्द गुरुमत सार हो ॥॥
मुंह से निकले बचन मीठे, मन में हो करुणा सदा ।।
दीन दुखियों पर दया, घर वालों से नित प्यार हो ॥॥
भाग जब उदय होगया, फिर चिंता से क्या लाभ है ।।
उसको क्या खटका रहा, गुरु जिसका राखनहार हो ॥॥
राधास्वामी नाम की, घट में लगे सच्ची लगन ।।
यह लगन सच्ची लगे, फिर जग न कारागार हो ॥॥
फिर सहज भव सिंध से, बेड़ा तुम्हारा पार हो ।।।।
शब्द में है अर्थ, और अर्थ में है ज्ञान गम ।
चित की विरती रोक लो, और शब्द गुरुमत सार हो ॥॥
मुंह से निकले बचन मीठे, मन में हो करुणा सदा ।।
दीन दुखियों पर दया, घर वालों से नित प्यार हो ॥॥
भाग जब उदय होगया, फिर चिंता से क्या लाभ है ।।
उसको क्या खटका रहा, गुरु जिसका राखनहार हो ॥॥
राधास्वामी नाम की, घट में लगे सच्ची लगन ।।
यह लगन सच्ची लगे, फिर जग न कारागार हो ॥॥
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Song 208 — Hindi
जी में आता है सहज में, भव का सागर मैं तरू।।
मन बड़ा दुखदाई है यह, रुकता नहीं है क्या करू ॥॥
नाम में लगता नहीं, फिरता डाँवा डोल नित ।।
यह समझ उसको नहीं, किस ते हित किससे अहित ।।।।
ठानता है हठ हठीला, बनके यह मेरी सदा ।
भरम में पड़कर, गुनावन में है रहता सर्वदा ॥॥
कैसा सुमिरन ध्यान कैसा, अपना सुभिरन ध्यान है।
मन है चंचल और, चंचलता की उसमें खान है ॥॥
राधास्वामी अब दया कीजे, दया की दृष्टि से ।।
दो शरण यह यह मन न बहके, छूट इसकी सृष्टि से।। ।।
मन बड़ा दुखदाई है यह, रुकता नहीं है क्या करू ॥॥
नाम में लगता नहीं, फिरता डाँवा डोल नित ।।
यह समझ उसको नहीं, किस ते हित किससे अहित ।।।।
ठानता है हठ हठीला, बनके यह मेरी सदा ।
भरम में पड़कर, गुनावन में है रहता सर्वदा ॥॥
कैसा सुमिरन ध्यान कैसा, अपना सुभिरन ध्यान है।
मन है चंचल और, चंचलता की उसमें खान है ॥॥
राधास्वामी अब दया कीजे, दया की दृष्टि से ।।
दो शरण यह यह मन न बहके, छूट इसकी सृष्टि से।। ।।
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Song 209 — Hindi
प्रेम जिसके मन में है, वह जगत का प्यारा बना ।।
जिसने देखा वह उसी की, आँख का तारा बना ॥॥
करके सुमिरन और भजन, और ध्यान तन मन साधकर ।।
नाम पाया भक्ति पाया, भक्त वह सारा बना ॥॥
घटे पर आसन मारकर, बैठा सुनी अनहद की तान ।।
उसका तन ही तानपूरा, और दोतरा बना ॥॥
चित में दुचिंताई नहीं, चिंता की कठिनाई नहीं ।
आप राधास्वामी सतगुरु, उसका रखवारा बना ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
राधास्वामी को हो सेवक, उसका वह प्यारा बना ।।।।
जिसने देखा वह उसी की, आँख का तारा बना ॥॥
करके सुमिरन और भजन, और ध्यान तन मन साधकर ।।
नाम पाया भक्ति पाया, भक्त वह सारा बना ॥॥
घटे पर आसन मारकर, बैठा सुनी अनहद की तान ।।
उसका तन ही तानपूरा, और दोतरा बना ॥॥
चित में दुचिंताई नहीं, चिंता की कठिनाई नहीं ।
आप राधास्वामी सतगुरु, उसका रखवारा बना ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
राधास्वामी को हो सेवक, उसका वह प्यारा बना ।।।।
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Song 210 — Hindi
शब्द गुरु का नाम है, और शब्द गुरु का रूप है।
शब्द ही चैतन्य है, और चैतन्य को वह कूप है ॥॥
शब्द का लो आसरा, और शब्द का स्थान लो ।।
शब्द परजी शब्द राजा, रात्र है और भुप है ॥॥
शब्द को सुमिरन भजन हो, शब्द ही का ध्यान हो ।
शब्द ही है एक और यह, शब्द ही बहुरूप है ॥॥
शब्द घट में गूजता है, रात दिन उसको सुनो।
मन की चंचलता मिटे, यह अगम अलख अनूप है ॥॥
राधास्वामी की दया से, घट के रस्ते में चलू ।।
ज्ञान का सूरज है चमका, उसकी चहुँ दिस धूप है ॥॥
शब्द ही चैतन्य है, और चैतन्य को वह कूप है ॥॥
शब्द का लो आसरा, और शब्द का स्थान लो ।।
शब्द परजी शब्द राजा, रात्र है और भुप है ॥॥
शब्द को सुमिरन भजन हो, शब्द ही का ध्यान हो ।
शब्द ही है एक और यह, शब्द ही बहुरूप है ॥॥
शब्द घट में गूजता है, रात दिन उसको सुनो।
मन की चंचलता मिटे, यह अगम अलख अनूप है ॥॥
राधास्वामी की दया से, घट के रस्ते में चलू ।।
ज्ञान का सूरज है चमका, उसकी चहुँ दिस धूप है ॥॥
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Song 211 — Hindi
बावली चिंता हैं कैस, गुरु तो तेरे पास है।
उसकी मन में कर तू आसा, और किसकी आस है ॥॥
भक्ति की चूनर पहिन ले, भक्ति का सिंगार कर ।।
ओढ़ चादर शील की, आनन्द सुख की रा है ॥॥
तुझमें भक्ति प्रेम है, और तुझमें है प्रतीत प्रीत ।
तुझमें श्रद्धा तुझमें दृढ़ला, तुझ ही में विश्वास है ॥॥
प्रेम में शक्ति है शक्ति, प्रेम की है मुरती ।।
प्रेम जिसके मन में आया, स्वामी का वह दास है ॥॥
नाम क्या तेरा है, तेरा रूप है कैसा सखी ।
क्यों भरम में है पड़ी, यह भरम यम की फाँस है ॥॥
अपने घट में देख, अपना आपा ले उसको परख ।।
तुझमें ज्योती ज्ञान गम की, ज्ञान का परकास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, तू हुई सत संगिनी ।।
सत की संगत रात दिन कर, सते ही सांस और भास है ॥॥
उसकी मन में कर तू आसा, और किसकी आस है ॥॥
भक्ति की चूनर पहिन ले, भक्ति का सिंगार कर ।।
ओढ़ चादर शील की, आनन्द सुख की रा है ॥॥
तुझमें भक्ति प्रेम है, और तुझमें है प्रतीत प्रीत ।
तुझमें श्रद्धा तुझमें दृढ़ला, तुझ ही में विश्वास है ॥॥
प्रेम में शक्ति है शक्ति, प्रेम की है मुरती ।।
प्रेम जिसके मन में आया, स्वामी का वह दास है ॥॥
नाम क्या तेरा है, तेरा रूप है कैसा सखी ।
क्यों भरम में है पड़ी, यह भरम यम की फाँस है ॥॥
अपने घट में देख, अपना आपा ले उसको परख ।।
तुझमें ज्योती ज्ञान गम की, ज्ञान का परकास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, तू हुई सत संगिनी ।।
सत की संगत रात दिन कर, सते ही सांस और भास है ॥॥
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Song 212 — Hindi
आके चरणों में पड़ा हूँ, तेरे सबको त्यागकर ।
ली शरन पद कमल की, सम्बन्धियों से भागकर ॥॥
कष्ट पाया दुख उठाया, मोह से व्याकुल हुआ ।
छोड़ी आलस नींद की, निद्रा से भव के जागकर ॥॥
अब नहीं जाता कहीं, जाने लगा क्यों किस जगह ।।
बात आई अब समझ में, प्रेम और अनुराग कर ॥॥
एक का हो रहना अच्छा, बहुमता है दुर्गती ।।
एक मता है सद्गता, यह सोचा भाग और त्यागकर ॥॥
घूमा भरमा खालिये चक्कर, बगुले के समान ।।
अब तो चित निश्चल हुआ है, प्रेस का वर मांगकर ।।।।
कट गई अज्ञान की जड़, आया जच सतसंग में ।
राग उपजा सत का, सतसंग में गुरु के लागकर ॥॥
राधास्वामी मौज की आई समझ, सुनकर बचन ।
शब्द का श्रवण हुआ, भक्ति के रस में पागकर ॥॥
ली शरन पद कमल की, सम्बन्धियों से भागकर ॥॥
कष्ट पाया दुख उठाया, मोह से व्याकुल हुआ ।
छोड़ी आलस नींद की, निद्रा से भव के जागकर ॥॥
अब नहीं जाता कहीं, जाने लगा क्यों किस जगह ।।
बात आई अब समझ में, प्रेम और अनुराग कर ॥॥
एक का हो रहना अच्छा, बहुमता है दुर्गती ।।
एक मता है सद्गता, यह सोचा भाग और त्यागकर ॥॥
घूमा भरमा खालिये चक्कर, बगुले के समान ।।
अब तो चित निश्चल हुआ है, प्रेस का वर मांगकर ।।।।
कट गई अज्ञान की जड़, आया जच सतसंग में ।
राग उपजा सत का, सतसंग में गुरु के लागकर ॥॥
राधास्वामी मौज की आई समझ, सुनकर बचन ।
शब्द का श्रवण हुआ, भक्ति के रस में पागकर ॥॥
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Song 213 — Hindi
कहते हैं सब सन्त मत का, हे सहज साधन सही ।।
थोड़े दिन में करलो बुद्धि, ज्ञान का गुर है यही ॥॥
पर कोई ऐसा नहीं जो, तव का ज्ञाता मिले ।।
अश्न यू यूं उनका उत्तर, मुझको समझाता भिले ॥॥
कितने साधक हैं अनाड़ी, जानते कुछ भी नहीं ।
बहके फिरते हैं कहीं, और मारे फिरते हैं वहीं ॥॥
टेक बांधी झूठी कुछ, समझो न मत के सार की ।
ध्यान सुमिरन और भजन के, धरलिया सिर भार को ॥॥
कोई कहता है कि पहिले, धाम चढ़ना है कठिन ।
त्रिकुठीं कोई न पहुँचा, व्यर्थ भी सुमिरन भजन ॥॥
जो न हो त्रिकुटी का साधक, वह नहीं चैला हुआ ।
भौंदू सतसंगी को भौंदु, भक्त से मेला हुआ ॥॥
काल क्या है कोई बतलाता, नहीं क्या है दयाल ।।
गालियां देते हैं फिरते, यू ही कहते काल काल ॥॥
कैसे यह सृष्टि हुईं, हम क्यों करें सुमिरन भजन ।।
कोई समझाता ही नहीं, निष्फल हुआ सुमिरन मनन ।।।।
भाग उदय मेरा हुआ, सतगुरु की जब पाई शरन ।
सहज में आईं समझ, और सहज ही का था यतन ॥॥
धन्ये सतगुरु राधास्वामी, धन्य तुम दाता दयाल ।।
होगई मुझ पर दया, टूटा भरम का मोह जाल ॥॥
थोड़े दिन में करलो बुद्धि, ज्ञान का गुर है यही ॥॥
पर कोई ऐसा नहीं जो, तव का ज्ञाता मिले ।।
अश्न यू यूं उनका उत्तर, मुझको समझाता भिले ॥॥
कितने साधक हैं अनाड़ी, जानते कुछ भी नहीं ।
बहके फिरते हैं कहीं, और मारे फिरते हैं वहीं ॥॥
टेक बांधी झूठी कुछ, समझो न मत के सार की ।
ध्यान सुमिरन और भजन के, धरलिया सिर भार को ॥॥
कोई कहता है कि पहिले, धाम चढ़ना है कठिन ।
त्रिकुठीं कोई न पहुँचा, व्यर्थ भी सुमिरन भजन ॥॥
जो न हो त्रिकुटी का साधक, वह नहीं चैला हुआ ।
भौंदू सतसंगी को भौंदु, भक्त से मेला हुआ ॥॥
काल क्या है कोई बतलाता, नहीं क्या है दयाल ।।
गालियां देते हैं फिरते, यू ही कहते काल काल ॥॥
कैसे यह सृष्टि हुईं, हम क्यों करें सुमिरन भजन ।।
कोई समझाता ही नहीं, निष्फल हुआ सुमिरन मनन ।।।।
भाग उदय मेरा हुआ, सतगुरु की जब पाई शरन ।
सहज में आईं समझ, और सहज ही का था यतन ॥॥
धन्ये सतगुरु राधास्वामी, धन्य तुम दाता दयाल ।।
होगई मुझ पर दया, टूटा भरम का मोह जाल ॥॥
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Song 214 — Hindi
गुरु का सुमिरन ध्यान करके, गुरु की मैं दासी बनी ।
देह का अध्यास छूटा, अजर अविनाशी बनी ॥॥
गाती फिरती रहती हूँ मैं, राधास्वामी नाम को ।।
नाम से परताप पाया, मानसिक बिसराम को ॥।।
प्रेम जल के बूद की, मैं सहज ध्यासी हो गई ।।
रटते, पी पी आप ही, अपने पिया सी हो गई ॥।।
शब्द का साधन हुआ, जप तप से मुह को मोड़कर ।।
जग से मैं न्यारी बनी, सतगुरु से नाता जोड़कर ।।।।
राधास्वामी दीन हितकारी, मेरा उद्धार हो ।
ऐसी करनी कीजियेगा, सहज बेड़ा पार हो ॥॥
देह का अध्यास छूटा, अजर अविनाशी बनी ॥॥
गाती फिरती रहती हूँ मैं, राधास्वामी नाम को ।।
नाम से परताप पाया, मानसिक बिसराम को ॥।।
प्रेम जल के बूद की, मैं सहज ध्यासी हो गई ।।
रटते, पी पी आप ही, अपने पिया सी हो गई ॥।।
शब्द का साधन हुआ, जप तप से मुह को मोड़कर ।।
जग से मैं न्यारी बनी, सतगुरु से नाता जोड़कर ।।।।
राधास्वामी दीन हितकारी, मेरा उद्धार हो ।
ऐसी करनी कीजियेगा, सहज बेड़ा पार हो ॥॥
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Song 215 — Hindi
आत्मा मेरा सुखी है, देह सुख का ठाम है ।।
मन के साधन सुख का,सुख ही सतगुरु का नाम है ॥॥
दुख नहीं चिंता नहीं, आपत नहीं संकट नहीं ।।
सामने आंखों के मेरे, राधास्वामी धाम है ॥॥
राधास्वामी की दया से, जन्म का फल पागया ।
जीते जी सुख मिल गया, दिन रात सुख से काम है ॥॥
मन के साधन सुख का,सुख ही सतगुरु का नाम है ॥॥
दुख नहीं चिंता नहीं, आपत नहीं संकट नहीं ।।
सामने आंखों के मेरे, राधास्वामी धाम है ॥॥
राधास्वामी की दया से, जन्म का फल पागया ।
जीते जी सुख मिल गया, दिन रात सुख से काम है ॥॥
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Song 216 — Hindi
चित्त का आनन्द का, और रूप सत का होगया ।
मैं उसी दिन सुधरा, जिस दिन गुरु के मत का होगया ॥॥
काल के माया के बन्धन, सब सहज में कट गये ।।
जिन दुखों से मुझको घबराहट, थी आप ही कट गये ॥॥
ध्यान से सुमिरन भजन से, मुझको निस दिन काम है।
भूलकर जग भर्म को, होठों पे गुरु का नाम है ॥॥
घट में सूरज चाँद प्रगटे, सब अंधेरा खो गया ।
शब्द के सुनते ही, सुन्न की आत्म निद्रा सो गया ॥॥
भव मिटा संकट कटा, आनन्द मन में छा गया ।
धन्य राधास्वामी सतगुरु, मैं शरन में आ गया ॥॥
मैं उसी दिन सुधरा, जिस दिन गुरु के मत का होगया ॥॥
काल के माया के बन्धन, सब सहज में कट गये ।।
जिन दुखों से मुझको घबराहट, थी आप ही कट गये ॥॥
ध्यान से सुमिरन भजन से, मुझको निस दिन काम है।
भूलकर जग भर्म को, होठों पे गुरु का नाम है ॥॥
घट में सूरज चाँद प्रगटे, सब अंधेरा खो गया ।
शब्द के सुनते ही, सुन्न की आत्म निद्रा सो गया ॥॥
भव मिटा संकट कटा, आनन्द मन में छा गया ।
धन्य राधास्वामी सतगुरु, मैं शरन में आ गया ॥॥
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Song 217 — Hindi
बंदनम् अद्वैत द्वत, अभाव भाव प्रकाशनम् ।
बंदनम् संसार त्रिविधि, विकार ताप विनाशनम् ॥॥
बंदनम् आदर्श इष्ट, अपार पार निवासनम् ।
बंदनम् गुरु पद्म पदरज, तिमिर दोष विभंजनम् ॥॥
नित्य मुक्त विशुद्ध निर्मल, सत्त चित आनन्दमय ।
शान्त बुद्ध अपार अद्भुत, सन्त सतगुरु पद गहे ॥॥
ज्ञान ध्यान न कर्म सेवा, भक्ति प्रेम न लह सके ।
गुरु दया बिन मुक्तिधाम का, रूप न कोई कह सके ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाइये ।।
राधास्वामी चरन कमल की, ओर सीस झुकाइये ॥॥
बंदनम् संसार त्रिविधि, विकार ताप विनाशनम् ॥॥
बंदनम् आदर्श इष्ट, अपार पार निवासनम् ।
बंदनम् गुरु पद्म पदरज, तिमिर दोष विभंजनम् ॥॥
नित्य मुक्त विशुद्ध निर्मल, सत्त चित आनन्दमय ।
शान्त बुद्ध अपार अद्भुत, सन्त सतगुरु पद गहे ॥॥
ज्ञान ध्यान न कर्म सेवा, भक्ति प्रेम न लह सके ।
गुरु दया बिन मुक्तिधाम का, रूप न कोई कह सके ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाइये ।।
राधास्वामी चरन कमल की, ओर सीस झुकाइये ॥॥
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Song 218 — Hindi
मंगलम्
मंगलम् गुरु देव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।
मंगलम् त्रयलोक स्वामी, मंगलम् जन रंजनम् ॥॥
धन्य महिमा आपकी है, धन्य अद्भुत ज्ञान है।
आप ही के पद कमल में, सद्गति निर्वाण है ॥॥
राधास्वामी भक्ति दीजे, पार भव से कीजिये ।।
निज दया से अपना करके, तार मुझको लीजिये ॥॥
मंगलम् गुरु देव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।
मंगलम् त्रयलोक स्वामी, मंगलम् जन रंजनम् ॥॥
धन्य महिमा आपकी है, धन्य अद्भुत ज्ञान है।
आप ही के पद कमल में, सद्गति निर्वाण है ॥॥
राधास्वामी भक्ति दीजे, पार भव से कीजिये ।।
निज दया से अपना करके, तार मुझको लीजिये ॥॥
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Song 219 — Hindi
तीसरी धुन
गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ।
आन पड़ी मैं आन पड़ी, गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ॥
देश विदेश में भरमी भूली, देखे बन मैदाना ।
भर्मत फिरी चैन नहीं चित को, मिला न ठौर ठिकाना ॥
आन पड़ी मस्जिद देखे मन्दिर देखे, देखी कबर समाधी ।।
कुछ भी हाथ न आया मेरे, बढ़ गई मन की उपाधी ।
आन पड़ी पोथी पढ़कर शब्द जाल में, अटकी हो दीवानी ।।
भरम मिटा गुर की संगत मिल, हुई प्रेम मस्तानी ।।
आन पड़ी। कर्म किया और ज्ञान कथा बहु, मन गुत्थी न सुलझी ।
गुरु का शब्द सुन शान्ती आई, उलझी गुत्थी सुलझी ॥
आन पड़ी तीरथ गई तो पत्थर पानी, बरत में भूख पियासी ।
तपकर तपी कष्ट तन भोगा, चित मेरा हुआ उदासा ॥
आन पड़ी गुरु मिले सत्संग कराया, दया के बचन सुनाये ।।
चिंता डायन घट से भागी, सार तत्व दरसायो ।
आन पड़ी धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य तुम्हारी महिमा ।।
राधास्वामी सच्चे जीव हितैषी, किससे मैं दू उपमा ॥ आन पड़ी
गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ।
आन पड़ी मैं आन पड़ी, गुरु दाता के चरण में आन पड़ी ॥
देश विदेश में भरमी भूली, देखे बन मैदाना ।
भर्मत फिरी चैन नहीं चित को, मिला न ठौर ठिकाना ॥
आन पड़ी मस्जिद देखे मन्दिर देखे, देखी कबर समाधी ।।
कुछ भी हाथ न आया मेरे, बढ़ गई मन की उपाधी ।
आन पड़ी पोथी पढ़कर शब्द जाल में, अटकी हो दीवानी ।।
भरम मिटा गुर की संगत मिल, हुई प्रेम मस्तानी ।।
आन पड़ी। कर्म किया और ज्ञान कथा बहु, मन गुत्थी न सुलझी ।
गुरु का शब्द सुन शान्ती आई, उलझी गुत्थी सुलझी ॥
आन पड़ी तीरथ गई तो पत्थर पानी, बरत में भूख पियासी ।
तपकर तपी कष्ट तन भोगा, चित मेरा हुआ उदासा ॥
आन पड़ी गुरु मिले सत्संग कराया, दया के बचन सुनाये ।।
चिंता डायन घट से भागी, सार तत्व दरसायो ।
आन पड़ी धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य तुम्हारी महिमा ।।
राधास्वामी सच्चे जीव हितैषी, किससे मैं दू उपमा ॥ आन पड़ी
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Song 220 — Hindi
गुरु चरन कमल की दासी बनी ।।
दासी बनी सुखरासी बनी, गुर चरन कमल की दासी बनी ॥
खोजी खोज खोज थक हारी, खोज का अन्त न देखा ।।
खोजे हाथ लगा नहीं कुछ भी, काल करम का लेखा ।। दासी बनी
माया छाया एक रूप दोऊ, जाने सब संसारी ।।
भगता के पाछे लगी डोले, सनमुख भागनहारी ।। दासी बनी
लोक परलोक धरम और अधरम, चेतन और जड़ काया ।।
दुविधा हँस दोनों खो बैठी, मिला राम न माया ।। दासी बनी
जो जो किया कर्म व्यौहार, संस्कार दृढ़ बैठे।
बन्धन मोह के मोटे रस्से, अन्तःकरन में पैठे ।। दासी बनी
स्वारथ वश मैं देखन आई, राधास्वामी समाजा ।।
गोरस बेचत हरी मिले मेरे, एक पन्थ दो काजा ॥ दासी बनी
सुरत शब्द मत भेद लखाया, सुखमन पन्थ लखाया ।।
भक्ति ज्ञान का मूल जताया, भरम विकार नसाया ।। दासी बनी
सत गुरु सत नाम सत संगत, अधिकारी कोई पावे ।।
राधास्वामी की कृपा से, फिर भव जाल न आवे ।। दासी बनी
दासी बनी सुखरासी बनी, गुर चरन कमल की दासी बनी ॥
खोजी खोज खोज थक हारी, खोज का अन्त न देखा ।।
खोजे हाथ लगा नहीं कुछ भी, काल करम का लेखा ।। दासी बनी
माया छाया एक रूप दोऊ, जाने सब संसारी ।।
भगता के पाछे लगी डोले, सनमुख भागनहारी ।। दासी बनी
लोक परलोक धरम और अधरम, चेतन और जड़ काया ।।
दुविधा हँस दोनों खो बैठी, मिला राम न माया ।। दासी बनी
जो जो किया कर्म व्यौहार, संस्कार दृढ़ बैठे।
बन्धन मोह के मोटे रस्से, अन्तःकरन में पैठे ।। दासी बनी
स्वारथ वश मैं देखन आई, राधास्वामी समाजा ।।
गोरस बेचत हरी मिले मेरे, एक पन्थ दो काजा ॥ दासी बनी
सुरत शब्द मत भेद लखाया, सुखमन पन्थ लखाया ।।
भक्ति ज्ञान का मूल जताया, भरम विकार नसाया ।। दासी बनी
सत गुरु सत नाम सत संगत, अधिकारी कोई पावे ।।
राधास्वामी की कृपा से, फिर भव जाल न आवे ।। दासी बनी
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Song 221 — Hindi
गुरु दाता की शरन में आन गही ।
आन गही मैं आन गही, गुरु दाता की शरन मैं आन गही ।।
सुख सम्पत धन धाम बड़ाई, किसी का नहीं ठिकाना ।।
यह तो सब बादर की छाई, झूठा सब मद माना ॥
आन गही बालू की दीवार जगत है, बिनसत लगे न बारा ।
। चार दिना का सकल, पसारा, कुल कुटुम्ब परिवारा ।
आन गही ज्ञान ध्यान जप तप और संयम, मिथ्या वाद विवादा ।
इन से काज सरे नहीं कोई, उपजे हिये विषादा ।।
आन गही पल में सिंधु रेत बन जावे, पल में गिरे हिमाला ।
पल में नगर ग्राम सब छूटें, देवल और दीवाला ।।
आन गही गुरु की शरनागत जब आया, समझ पड़ी गुरु बानी ।।
राधास्वामी की दाया से, सहज हुआ निवनी ॥ आन गही
आन गही मैं आन गही, गुरु दाता की शरन मैं आन गही ।।
सुख सम्पत धन धाम बड़ाई, किसी का नहीं ठिकाना ।।
यह तो सब बादर की छाई, झूठा सब मद माना ॥
आन गही बालू की दीवार जगत है, बिनसत लगे न बारा ।
। चार दिना का सकल, पसारा, कुल कुटुम्ब परिवारा ।
आन गही ज्ञान ध्यान जप तप और संयम, मिथ्या वाद विवादा ।
इन से काज सरे नहीं कोई, उपजे हिये विषादा ।।
आन गही पल में सिंधु रेत बन जावे, पल में गिरे हिमाला ।
पल में नगर ग्राम सब छूटें, देवल और दीवाला ।।
आन गही गुरु की शरनागत जब आया, समझ पड़ी गुरु बानी ।।
राधास्वामी की दाया से, सहज हुआ निवनी ॥ आन गही
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Song 222 — Hindi
गुरु दया हुई गुरु प्यारी बनी ॥।
प्यारी बनी गुरु प्यारी बनी, मैं अपने गुरु की प्यारी बनी ॥
मैं बाली गुरु पितु और माता, गुरु का सहारा पाया ।
गुरु की गोद खेलू दिन राती, दुख सुख सब बिसराया ॥
प्यारी एक रस भक्ति हृदय में छाई, चंचल मन भया निश्चल ।।
भाग्य उदय हुआ चिंता भागी, नहीं चित में अब हलचल ॥
प्यारी एक आस विश्वास गुरु का, दुर्मति अब न सतावे ।।
यह गति कोई कोई साधू जाने, गुरु भक्ति जब पावे ॥
प्यारी ईश ने सिरजा फाँस हँसाया, मया मोह लपटाया ।
गुरु ने सिरजा फन्द कटाया, आवागमन नसाया ॥
प्यारी धन नहीं मांगू मान न मांगू, ज्ञान ध्यान नहीं मांगू ।।
मन रहे चरन कमल गुरु राता, भक्ति रस मैं मागू ॥
प्यारी दर्पन की सुन्दरी बन खेलू , किसी के हाथ न आऊँ।
काल जाल नहिं मोहि फैसावे, भक्ति भाव चित लाऊ ।।
प्यारी जाप मरा अजपा भी मर गया, चुप हुई अनहद बानी ।।
राधास्वामी ने खेल खिलाया, प्यारी हुई मस्तानी ।।
प्यारी
प्यारी बनी गुरु प्यारी बनी, मैं अपने गुरु की प्यारी बनी ॥
मैं बाली गुरु पितु और माता, गुरु का सहारा पाया ।
गुरु की गोद खेलू दिन राती, दुख सुख सब बिसराया ॥
प्यारी एक रस भक्ति हृदय में छाई, चंचल मन भया निश्चल ।।
भाग्य उदय हुआ चिंता भागी, नहीं चित में अब हलचल ॥
प्यारी एक आस विश्वास गुरु का, दुर्मति अब न सतावे ।।
यह गति कोई कोई साधू जाने, गुरु भक्ति जब पावे ॥
प्यारी ईश ने सिरजा फाँस हँसाया, मया मोह लपटाया ।
गुरु ने सिरजा फन्द कटाया, आवागमन नसाया ॥
प्यारी धन नहीं मांगू मान न मांगू, ज्ञान ध्यान नहीं मांगू ।।
मन रहे चरन कमल गुरु राता, भक्ति रस मैं मागू ॥
प्यारी दर्पन की सुन्दरी बन खेलू , किसी के हाथ न आऊँ।
काल जाल नहिं मोहि फैसावे, भक्ति भाव चित लाऊ ।।
प्यारी जाप मरा अजपा भी मर गया, चुप हुई अनहद बानी ।।
राधास्वामी ने खेल खिलाया, प्यारी हुई मस्तानी ।।
प्यारी
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Song 223 — Hindi
दुविधा ने गले फाँसी डारी ।।
फाँसी डारी फाँसी डारी, दुविधा ने गले फाँसी डारी ॥
पुरुष प्रकृति ने खेल रचाया, काल जाल फैलाया ।
दुविधि प्रकार की चाल चलाई, द्वन्द जगत निरमाया ।
फाँसी डारी चन्द्र सूर की लीला अद्भुत, रात दिवस की लीला ।।
ज्ञान अज्ञान अविद्या विद्या, कहीं नीला कहीं पीला ।
फाँसी डारी जीवन मृत्यु अशुभ शुभ कर्मा, नर्क स्वर्ग में बासा ।।
पितरी देव का पंथ दुहीला, देखे कोई तमासा ॥
फाँसी डारी माया ब्रह्म खिलाड़ी दोई, चौसर ठाठ सजाया ।
सुरत की गोट से खेलन बैठे, हार जीत बिलगाया ।।
फाँसी डारी कोई कच्ची कोई पक्की गोटी, चौसर घर में नाची ।
कच्ची माया चाल चले नित, पक्की लाल बन राची ॥
फाँसी डारी पक्की को भी चैन कहाँ है, पौ लग हो रही कच्ची ।
फिर वही खेल खिलाड़ी खेलें, सुरत खेल कहे सच्ची ।।
फाँसी डारी कुट पिट कर सुरत भई बिहाली, खेल से मुक्ति मांगे ।
नहिं कोई देवे सहारा अपना, दुख सुख भव भर्म लागे ।
फाँसी डारी सतगुरु दया रूप धर आये, सुरत को अंग लगाया।
शब्द भेद दे दिया सहारा, चौसर को उलटाया ।
फाँसी डारी काल चक्र का द्वन्द पसारा, अब नहीं किंचित व्यापे ।
राधास्वामी की किरपा से, लख लिया आपा आपे ।।फाँसी डारी
फाँसी डारी फाँसी डारी, दुविधा ने गले फाँसी डारी ॥
पुरुष प्रकृति ने खेल रचाया, काल जाल फैलाया ।
दुविधि प्रकार की चाल चलाई, द्वन्द जगत निरमाया ।
फाँसी डारी चन्द्र सूर की लीला अद्भुत, रात दिवस की लीला ।।
ज्ञान अज्ञान अविद्या विद्या, कहीं नीला कहीं पीला ।
फाँसी डारी जीवन मृत्यु अशुभ शुभ कर्मा, नर्क स्वर्ग में बासा ।।
पितरी देव का पंथ दुहीला, देखे कोई तमासा ॥
फाँसी डारी माया ब्रह्म खिलाड़ी दोई, चौसर ठाठ सजाया ।
सुरत की गोट से खेलन बैठे, हार जीत बिलगाया ।।
फाँसी डारी कोई कच्ची कोई पक्की गोटी, चौसर घर में नाची ।
कच्ची माया चाल चले नित, पक्की लाल बन राची ॥
फाँसी डारी पक्की को भी चैन कहाँ है, पौ लग हो रही कच्ची ।
फिर वही खेल खिलाड़ी खेलें, सुरत खेल कहे सच्ची ।।
फाँसी डारी कुट पिट कर सुरत भई बिहाली, खेल से मुक्ति मांगे ।
नहिं कोई देवे सहारा अपना, दुख सुख भव भर्म लागे ।
फाँसी डारी सतगुरु दया रूप धर आये, सुरत को अंग लगाया।
शब्द भेद दे दिया सहारा, चौसर को उलटाया ।
फाँसी डारी काल चक्र का द्वन्द पसारा, अब नहीं किंचित व्यापे ।
राधास्वामी की किरपा से, लख लिया आपा आपे ।।फाँसी डारी
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Song 224 — Hindi
तू निज स्वरूप क्यों भूल गया ॥टेक॥
भूल गया क्यों भूल गया, तू निज स्वरूप क्यों भूल गया ।
दृष्टि पड़ी और पर तेरी, और का रूप प्रकासा ।।
दृष्टि सृष्टि का बढ़ा पसारा, मन में भरम विकासा
भूल गया दरपन मध्ये तेरी छाया, छाया देख मुलाना ।
बाहर मुखी भ्रान्ति चित बाढ़ी, अपना पराया ठाना ॥
भूल गया एक हुआ फिर दो बन आया, द्वैत अद्वौत की बानी ।
एक एकाई दहाई सैकड़ा, अगनित भर्म कहानी ॥
भूल गया असल नकल सच्चा और झूठा, लख लख अलख लखाया।
लख लख अलख लाख लख पाया, सोचा पढ़ा लिखाया ।।भुल गया
आप आपको आप पिंछानो, गुरु ने दिया संदेसा ।
कहा और का नेक न मानो, राधास्वामी का उपदेसा ॥भूल गया
भूल गया क्यों भूल गया, तू निज स्वरूप क्यों भूल गया ।
दृष्टि पड़ी और पर तेरी, और का रूप प्रकासा ।।
दृष्टि सृष्टि का बढ़ा पसारा, मन में भरम विकासा
भूल गया दरपन मध्ये तेरी छाया, छाया देख मुलाना ।
बाहर मुखी भ्रान्ति चित बाढ़ी, अपना पराया ठाना ॥
भूल गया एक हुआ फिर दो बन आया, द्वैत अद्वौत की बानी ।
एक एकाई दहाई सैकड़ा, अगनित भर्म कहानी ॥
भूल गया असल नकल सच्चा और झूठा, लख लख अलख लखाया।
लख लख अलख लाख लख पाया, सोचा पढ़ा लिखाया ।।भुल गया
आप आपको आप पिंछानो, गुरु ने दिया संदेसा ।
कहा और का नेक न मानो, राधास्वामी का उपदेसा ॥भूल गया
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Song 225 — Hindi
गुरु दाता दया की नजर रहे ।।टेक॥
नजर रहे स्वामी नजर रहे, गुरु दाता दया की नजर रहे ॥
एक तुम्हारी आस है स्वामी, और सहारा नाहीं ।
ध्यान रहे नित सोते जागते, रूप का मन के माही ॥
नजर रहे स्वारथ वश हैं प्रानी जंग के, मात पिता सुत भाई ।।
पर स्त्रारथी है रूप तुम्हारा, सबकी तुम से भलाई ॥
नजर रहे दुख क्लेश से व्याकुल होकर, मैं चरनों में आया ।।
बालक समझ के अंग लगालो, दो पद कमल की छाया ॥
नजर रहे मन मलीन भरमावे छिन पल, चित विश्वास न आवे ।।
ऐसी दया करो राधास्वामी, यह बैरी न सतावे ॥
नजर रहे राधास्वामी नाम जपू नित, रहूँ मगन मन मानी ।।
अब तो दरस हुआ चरनों का, हित चित मन कर्म बानी नजर रहे
नजर रहे स्वामी नजर रहे, गुरु दाता दया की नजर रहे ॥
एक तुम्हारी आस है स्वामी, और सहारा नाहीं ।
ध्यान रहे नित सोते जागते, रूप का मन के माही ॥
नजर रहे स्वारथ वश हैं प्रानी जंग के, मात पिता सुत भाई ।।
पर स्त्रारथी है रूप तुम्हारा, सबकी तुम से भलाई ॥
नजर रहे दुख क्लेश से व्याकुल होकर, मैं चरनों में आया ।।
बालक समझ के अंग लगालो, दो पद कमल की छाया ॥
नजर रहे मन मलीन भरमावे छिन पल, चित विश्वास न आवे ।।
ऐसी दया करो राधास्वामी, यह बैरी न सतावे ॥
नजर रहे राधास्वामी नाम जपू नित, रहूँ मगन मन मानी ।।
अब तो दरस हुआ चरनों का, हित चित मन कर्म बानी नजर रहे
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Song 226 — Hindi
कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े ॥टेक॥
गगन चढ़े सुरत गगन चढ़े, कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े ॥
पिंड छोड़ जावे ब्रह्मांडा, पहुँचे गुरु दरबारा ।
धुन मृदंग की कान में ओवे, ओंकार झनकारी ।
गगन चढ़े सुन्न शिखर चढ़ आसन मारे, सहज समाध रचावे ।।
मानसरोवर करे अशनाना, हंस की पदवी पावे ।।
गगन चढ़े भंवर गुफा की खिड़की निरखे, सोहंग सोहंग भाखें ।
सत्त धाम में बीन बजावे, सत सत सत सत आखे ।।
गगन चढ़े। अलख को लख गम अगम की पावे, राधास्वामी पद में बासा ।
आस गुरु की चित में धारे, जग से रहे उदासा ॥
गगन चढ़े एक जनम में गुरु की सेवा, दूजे नाम का साधन ।
तीजे मुक्ति के धाम बसेरा, चौथे रूप अराधन ।।
गनन चढ़े राधास्वामी गुरु की दया भई है, शब्द योग को साधा ।।
एक जनम में काम बनाया, मेटा सकल उपाधा ॥ गगन चढ़े
गगन चढ़े सुरत गगन चढ़े, कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े ॥
पिंड छोड़ जावे ब्रह्मांडा, पहुँचे गुरु दरबारा ।
धुन मृदंग की कान में ओवे, ओंकार झनकारी ।
गगन चढ़े सुन्न शिखर चढ़ आसन मारे, सहज समाध रचावे ।।
मानसरोवर करे अशनाना, हंस की पदवी पावे ।।
गगन चढ़े भंवर गुफा की खिड़की निरखे, सोहंग सोहंग भाखें ।
सत्त धाम में बीन बजावे, सत सत सत सत आखे ।।
गगन चढ़े। अलख को लख गम अगम की पावे, राधास्वामी पद में बासा ।
आस गुरु की चित में धारे, जग से रहे उदासा ॥
गगन चढ़े एक जनम में गुरु की सेवा, दूजे नाम का साधन ।
तीजे मुक्ति के धाम बसेरा, चौथे रूप अराधन ।।
गनन चढ़े राधास्वामी गुरु की दया भई है, शब्द योग को साधा ।।
एक जनम में काम बनाया, मेटा सकल उपाधा ॥ गगन चढ़े
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Song 227 — Hindi
भाई समझ बुझ व्यौहार करो ।।
व्यौहार करो व्यौहार करो, भाई समझ बूझ व्यौहार करो ॥
दिन तो खोया जग के धंदे, रात खाय कर सोये ।।
नर जीवन का सार न जाना, अन्त पीट सिर रोये ॥
व्यौहार सब कुछ करो विवेक सहित तुम, बिन विवेक व्यौहारी ।।
नर के काम सभी हैं निष्फल, समझे कोई गुरु प्यारा ॥
व्यौहार काम काज से निश्चत होकर, सत संगत में जाई ।।
प्रेम भक्ति का सौदा करलो, नित नित बड़े सवाई ॥
व्यौहार गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, कोईकोई बिरला जाने ।
बिन जाने परतत न आने, अनुभव गम गति माने ।व्यौहार
एक घड़ी की संगत प्यारे, कटें कोटि अपराधा ।।
राधास्वामी शब्द योग की विधि से, मन वानी को साधा ।व्यौहार
व्यौहार करो व्यौहार करो, भाई समझ बूझ व्यौहार करो ॥
दिन तो खोया जग के धंदे, रात खाय कर सोये ।।
नर जीवन का सार न जाना, अन्त पीट सिर रोये ॥
व्यौहार सब कुछ करो विवेक सहित तुम, बिन विवेक व्यौहारी ।।
नर के काम सभी हैं निष्फल, समझे कोई गुरु प्यारा ॥
व्यौहार काम काज से निश्चत होकर, सत संगत में जाई ।।
प्रेम भक्ति का सौदा करलो, नित नित बड़े सवाई ॥
व्यौहार गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, कोईकोई बिरला जाने ।
बिन जाने परतत न आने, अनुभव गम गति माने ।व्यौहार
एक घड़ी की संगत प्यारे, कटें कोटि अपराधा ।।
राधास्वामी शब्द योग की विधि से, मन वानी को साधा ।व्यौहार
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Song 228 — Hindi
सत संग की महिमा जान गया ॥टेक।
जान गया पहचान गया, सतसंग की महिमा जान गयो ।
सिमिट सिमिट जल भरे तलाबा, त्यों सगुन चित आवे ।।
नित सतसंग के बचन से सज्जन, अपना जनम बनावें ।।
जान एक दिन का काम नहीं है, दिन दिन सतसंग कीजे ।
काल करम के जाल से बचकर, प्रेम भक्तिं मन दीजे ।।
जान शठ सुधरहिं सतसंगत पाई, पारस लोह समाना ।
सत की संगत करे जो प्रानी, बने सुसाध सुजाना ।
जान बिन सतसंग काज नहीं होगा, समझ लेहु मन अपने ।
जग व्यौहार पांच दस दिन के, रात समय के सपने ।।
जान कहता हूँ कह जात हूँ भाई, सतसंग करो बनाई ।
लोक परलोक में यश और कीर्ती, राधास्वामी की शरनाई ।।
जान
जान गया पहचान गया, सतसंग की महिमा जान गयो ।
सिमिट सिमिट जल भरे तलाबा, त्यों सगुन चित आवे ।।
नित सतसंग के बचन से सज्जन, अपना जनम बनावें ।।
जान एक दिन का काम नहीं है, दिन दिन सतसंग कीजे ।
काल करम के जाल से बचकर, प्रेम भक्तिं मन दीजे ।।
जान शठ सुधरहिं सतसंगत पाई, पारस लोह समाना ।
सत की संगत करे जो प्रानी, बने सुसाध सुजाना ।
जान बिन सतसंग काज नहीं होगा, समझ लेहु मन अपने ।
जग व्यौहार पांच दस दिन के, रात समय के सपने ।।
जान कहता हूँ कह जात हूँ भाई, सतसंग करो बनाई ।
लोक परलोक में यश और कीर्ती, राधास्वामी की शरनाई ।।
जान
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Song 229 — Hindi
सजन तू क्यों नहीं सतसंग जाय ॥टेक।
पांच सेर चावल के भीतर, बीर बहूटी डाली ।।
संगत के परताप महातम, फटी सुन्दर लाली
सतसंग जाय जामुन आम बेर के पौधे, केवड़ा जल से सींचा ।।
फल को देख बास केवड़े की, किस विधि अन्तर खींचा ॥
सतसंग जाय तिल का तेल लगे अति प्यारा, गया जो फल से वासा ।।
प्यारी मीठी देख सुगंधी, कर सतसंग निवासा ।।
सतसंग जाय मिट्टी का तेल सेव कर सब कोई, अपनी नाक सिकोड़े।
गंधी कर संशोधन उसका, इतर फुलेल से जोड़े ।।
सतसंग जायराधास्वामी मौज परखले, कर गुरु का सतसंगा ।।
नद नाले गंगा से मिल कर, होगये निर्मल गंगां ।।सतसंग जाय
पांच सेर चावल के भीतर, बीर बहूटी डाली ।।
संगत के परताप महातम, फटी सुन्दर लाली
सतसंग जाय जामुन आम बेर के पौधे, केवड़ा जल से सींचा ।।
फल को देख बास केवड़े की, किस विधि अन्तर खींचा ॥
सतसंग जाय तिल का तेल लगे अति प्यारा, गया जो फल से वासा ।।
प्यारी मीठी देख सुगंधी, कर सतसंग निवासा ।।
सतसंग जाय मिट्टी का तेल सेव कर सब कोई, अपनी नाक सिकोड़े।
गंधी कर संशोधन उसका, इतर फुलेल से जोड़े ।।
सतसंग जायराधास्वामी मौज परखले, कर गुरु का सतसंगा ।।
नद नाले गंगा से मिल कर, होगये निर्मल गंगां ।।सतसंग जाय
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Song 230 — Hindi
सजन तू कर सतसंग लव लाय ॥ ।
एक घड़ी सतसंग बैठकर, नाम गुरु का लेवे ।
सो प्रानी भवसागर तर कर, शोभा जग को देवे ॥
संग लव पानी देख शुद्धता वाढे, नारी देखे कामा ।।
वृस कुसंग कुटिलाई बादे, सतसंगत गुरु नामा ।।
संग लव एक घड़ी हो पाव घड़ी हो, पाव घड़ी की आधी ।।
जो सतगुरु की संगत बैठे, मेटे मन की उपाधी ॥
संग लव प्रेमीजन के संग में आवे, याद गुरु की बानी ।।
सो गुरु बानी जनम बनावे, अन्त मुक्ति निर्वानी ॥
संग लव संस्कार पलटे सब मन का, बुद्धि प्रेम चित आये ।।
राधास्वामी की दाया से, जम का फंद कटावे ।।
संग लव
एक घड़ी सतसंग बैठकर, नाम गुरु का लेवे ।
सो प्रानी भवसागर तर कर, शोभा जग को देवे ॥
संग लव पानी देख शुद्धता वाढे, नारी देखे कामा ।।
वृस कुसंग कुटिलाई बादे, सतसंगत गुरु नामा ।।
संग लव एक घड़ी हो पाव घड़ी हो, पाव घड़ी की आधी ।।
जो सतगुरु की संगत बैठे, मेटे मन की उपाधी ॥
संग लव प्रेमीजन के संग में आवे, याद गुरु की बानी ।।
सो गुरु बानी जनम बनावे, अन्त मुक्ति निर्वानी ॥
संग लव संस्कार पलटे सब मन का, बुद्धि प्रेम चित आये ।।
राधास्वामी की दाया से, जम का फंद कटावे ।।
संग लव
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Song 231 — Hindi
घट तारा मेरे हुआ जग मग ।।।
बाहर आँख बन्द जब होगई, अन्तर आँख खुलानी ।।
लख परकाश घट लीला न्यारी, सुरत हुई मस्तानी। हुआ जगमग
बाहर छुये चरन सतगुरु के, अन्तर भैया उजारा ।।
कोटिन चन्द्र सूर प्रगटाने; देखे नौलख तारा। हुआ जगमग
मिटा अँधेरा भया सवेरा, मोह नींद से जागा ।
परदे उठे भरम के मन से, चित बाढ़ा अनुरागा।। हुआ जगमग
तिमिर अविद्या सहज ही भागी, ज्ञान जोत लहरानी।।
सिंध रूप में भाटा आया, कैसे करू बखानी।। हुआ जगमग
राधास्वामी सतगुरु दाता, घट का भेद बताया।।
भेद पायकर भेदी होगया, धन करुना धन दाया।। हुआ जगमग
बाहर आँख बन्द जब होगई, अन्तर आँख खुलानी ।।
लख परकाश घट लीला न्यारी, सुरत हुई मस्तानी। हुआ जगमग
बाहर छुये चरन सतगुरु के, अन्तर भैया उजारा ।।
कोटिन चन्द्र सूर प्रगटाने; देखे नौलख तारा। हुआ जगमग
मिटा अँधेरा भया सवेरा, मोह नींद से जागा ।
परदे उठे भरम के मन से, चित बाढ़ा अनुरागा।। हुआ जगमग
तिमिर अविद्या सहज ही भागी, ज्ञान जोत लहरानी।।
सिंध रूप में भाटा आया, कैसे करू बखानी।। हुआ जगमग
राधास्वामी सतगुरु दाता, घट का भेद बताया।।
भेद पायकर भेदी होगया, धन करुना धन दाया।। हुआ जगमग
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Song 232 — Hindi
नहीं सार तत्व समझाय सकी ॥
गूगे ने मीठा गुड़ खाया, खा खा कर रस पाया ।
किसी को वह कैसे समझावे, बानी शक्ति न पाया।।
समझाय सकी अंधों ने छुवा मिलकर हाथी, अपने ज्ञान विचारा ।
सब झूठे हैं सब सच्चे हैं, समझ का वार न पारा।।
समझाय सकी सिंह बचा गाडर के रेवड़, अजा रूप लख मोहा ।
सतगुरु सिंह ने आन चिताया, सिंह भाव सुन सोहा।।
समझाय सकी नमक की पुतली सिंध ओर गई, लगी थाह को लेने ।
पानी मिल पानी सो ठहरी, लेने के पड़े देने।।
समझाय सकी एक अनेक में भेदभाव है, भेद अभेद न जानू।।
राधास्वामी की संगत आ, मेन की मन में मानू।।
समझाय सकी
गूगे ने मीठा गुड़ खाया, खा खा कर रस पाया ।
किसी को वह कैसे समझावे, बानी शक्ति न पाया।।
समझाय सकी अंधों ने छुवा मिलकर हाथी, अपने ज्ञान विचारा ।
सब झूठे हैं सब सच्चे हैं, समझ का वार न पारा।।
समझाय सकी सिंह बचा गाडर के रेवड़, अजा रूप लख मोहा ।
सतगुरु सिंह ने आन चिताया, सिंह भाव सुन सोहा।।
समझाय सकी नमक की पुतली सिंध ओर गई, लगी थाह को लेने ।
पानी मिल पानी सो ठहरी, लेने के पड़े देने।।
समझाय सकी एक अनेक में भेदभाव है, भेद अभेद न जानू।।
राधास्वामी की संगत आ, मेन की मन में मानू।।
समझाय सकी
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Song 233 — Hindi
माई सोच समझ व्यौहार करू।।
टेक। पानी मध्ये पड़ा बतासा, गलते देर न लागे ।
इस जीवन का कौन भरोसा, बादर गगन से भागे।।
व्यौहार न्हाय धोय कर मैल उतारे, नित नये बस्तर धारे।।
तैसे सुरत उतारे तन को, कोई विवेकी विचारे।।
व्यौहार मल से देह बनी मानुष की, मल मलीन की खानी।।
नित उठ धोवो लाख जतन कर, शुद्धि में रहे गलानी।।
व्यौहार तन की आसा मन की आसा, सीस की आसा नाहीं।।
भाई सोचो कुछ निज मन में, आसा है परछाँई।।
व्यौहार सतसंगत कर बुद्धि बढ़ाओ, अपना जनम बनाओ।।
सुरत शब्द की करो कमाई, राधास्वामी के गुन गाओ।।
व्यौहार
टेक। पानी मध्ये पड़ा बतासा, गलते देर न लागे ।
इस जीवन का कौन भरोसा, बादर गगन से भागे।।
व्यौहार न्हाय धोय कर मैल उतारे, नित नये बस्तर धारे।।
तैसे सुरत उतारे तन को, कोई विवेकी विचारे।।
व्यौहार मल से देह बनी मानुष की, मल मलीन की खानी।।
नित उठ धोवो लाख जतन कर, शुद्धि में रहे गलानी।।
व्यौहार तन की आसा मन की आसा, सीस की आसा नाहीं।।
भाई सोचो कुछ निज मन में, आसा है परछाँई।।
व्यौहार सतसंगत कर बुद्धि बढ़ाओ, अपना जनम बनाओ।।
सुरत शब्द की करो कमाई, राधास्वामी के गुन गाओ।।
व्यौहार
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Song 234 — Hindi
मैं गूगी मुख से नहिं बोलू।।
टेक॥ पाँव नहीं मैं परवत लाँघु, चौदह भुवन में डोलू।।
बिना हाथ के करम करू सब, उलझी गुत्थी खोलू नहीं बोलू
कान नहीं और शब्द सुनू नित, विन जल नित गुड़ घोलू।।
उँगली बिना उतारू बखिये, धरन अकास टटोलें।।
नहीं बोलू बाँह न भुजा न कंधा पंजा, तीन त्रिलोकी तोलू।।
बिना आँख की सुरत सहेली, कहे सुन्न में सो लू।।
नहीं बोलू मानसरोवर मार के गोते, बिन साबुन मन धोलू।।
राधास्वामी से भक्ति बीज ले, हृदय खेत में बो लू।।
नहीं बोलू
टेक॥ पाँव नहीं मैं परवत लाँघु, चौदह भुवन में डोलू।।
बिना हाथ के करम करू सब, उलझी गुत्थी खोलू नहीं बोलू
कान नहीं और शब्द सुनू नित, विन जल नित गुड़ घोलू।।
उँगली बिना उतारू बखिये, धरन अकास टटोलें।।
नहीं बोलू बाँह न भुजा न कंधा पंजा, तीन त्रिलोकी तोलू।।
बिना आँख की सुरत सहेली, कहे सुन्न में सो लू।।
नहीं बोलू मानसरोवर मार के गोते, बिन साबुन मन धोलू।।
राधास्वामी से भक्ति बीज ले, हृदय खेत में बो लू।।
नहीं बोलू
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Song 235 — Hindi
गुरु दाता लगाकेंगे पार मुझे।।
पार मुझे जी पार मुझे, गुरु दाता लगा देंगे पार मुझे।।
मौज अधीन सदा मैं बरतू, चिंता चित्त न लाऊँ।
रात दिवस गुरु का रहे सुमिरन, और सकल बिसराऊँ।।
पार मुझे सोबत जागत भूलू नाहीं, वृत्ती धाम रहे अटकी।।
तन मन की सुध बुध न करू कुछ, अधर मंडल चढ़ लटकी।।
पार मुझे सहसकमलदल देख विराटा, त्रिकुटी गुरु दरबारा।।
सुन्न में शून्य समाधि अवस्था, देह बंध छुटकारा।।
पार मुझे जोत निरख सुनू अनहद बानी, बानी लय होजाऊं।।
लय चिंतन कर भरम मिटाऊँ, निर्बानी कहलाऊ।।
पार मुझे तीन स्थान यह मुख कर साधू, फिर अनुभव घट जागे।।
भंवर सत्य लख अलख अगमगति, राधास्वामी पद चित लागे।।
पार मुझे जी पार मुझे, गुरु दाता लगा देंगे पार मुझे।।
मौज अधीन सदा मैं बरतू, चिंता चित्त न लाऊँ।
रात दिवस गुरु का रहे सुमिरन, और सकल बिसराऊँ।।
पार मुझे सोबत जागत भूलू नाहीं, वृत्ती धाम रहे अटकी।।
तन मन की सुध बुध न करू कुछ, अधर मंडल चढ़ लटकी।।
पार मुझे सहसकमलदल देख विराटा, त्रिकुटी गुरु दरबारा।।
सुन्न में शून्य समाधि अवस्था, देह बंध छुटकारा।।
पार मुझे जोत निरख सुनू अनहद बानी, बानी लय होजाऊं।।
लय चिंतन कर भरम मिटाऊँ, निर्बानी कहलाऊ।।
पार मुझे तीन स्थान यह मुख कर साधू, फिर अनुभव घट जागे।।
भंवर सत्य लख अलख अगमगति, राधास्वामी पद चित लागे।।
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Song 236 — Hindi
गुरु दाता के चरन चित जोड़ रहूँ।।
जोड़ रहूँ मन मोड़ रहूँ, गुरु दाता के चरन चित जोड़ रहूँ।।
सोवत जागत उट्ठत बैठत, रहे गुरु का ध्यान।।
एक भाव हिये अन्तर राखू, और सकल बिसराना।।
जोड़ रहूँ विद्या बुद्धि विवेक विचारा, गुरु गम के अनुसारी।।
येहि विधि तरू सहज भव सागर, तारू कुल परिवारा।।
जोड़ रहूँ। एक रूप नयनों में समाया, और नजर नहिं आवे।।
जहाँ जहाँ देखू गुरु की लीला, समझत मन हरषावे।।
जोड़ रहूँ सुनू तो गुरु का कथन निरंतर, बोलू तो गुरुबानी।।
बोल बोल सुन सुन कर चिंतन, रहूँ सदा निरबानी।।
जोड़ रहूँ मनुवा मेरा है बड़ भागी, निश्चल अचल अमानी।।
सब को त्याग चरन गुरु लागा, हो राधास्वामी अभिमानी।।
जोड़ रहूँ
जोड़ रहूँ मन मोड़ रहूँ, गुरु दाता के चरन चित जोड़ रहूँ।।
सोवत जागत उट्ठत बैठत, रहे गुरु का ध्यान।।
एक भाव हिये अन्तर राखू, और सकल बिसराना।।
जोड़ रहूँ विद्या बुद्धि विवेक विचारा, गुरु गम के अनुसारी।।
येहि विधि तरू सहज भव सागर, तारू कुल परिवारा।।
जोड़ रहूँ। एक रूप नयनों में समाया, और नजर नहिं आवे।।
जहाँ जहाँ देखू गुरु की लीला, समझत मन हरषावे।।
जोड़ रहूँ सुनू तो गुरु का कथन निरंतर, बोलू तो गुरुबानी।।
बोल बोल सुन सुन कर चिंतन, रहूँ सदा निरबानी।।
जोड़ रहूँ मनुवा मेरा है बड़ भागी, निश्चल अचल अमानी।।
सब को त्याग चरन गुरु लागा, हो राधास्वामी अभिमानी।।
जोड़ रहूँ
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Song 237 — Hindi
गुरु चरन कमल में विनय करू।।टेक।
विनय करू मैं विनय करू, गुरुचरन कमल में विनय करू।।
विश्वामित्र विश्व हितकारी, विश्वम्भर विश्वासी।।
अपनी दया से पार लगादे, कटे बन्ध चौरासी।।
विनय करू करुणामय करुणा के सागर, करुणा के भंडारा।।
काम क्रोध से मुझे छुड़ाकर, ले चल भव के पारा।।
विनय करू दीन हितैषी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।
दीन समझ भक्ति दे मुझको, लहूँ चरन शरनाई।।
विनय करू गुन की खानी गुन में आगर, गुन नागर गुनकारी।।
अवगुन मेट के गुनी बनादे, करदे मुझे सुखारी।।
विनय करू राधास्वामी भक्ति पदारथ, का हूँ मैं अभिलाशी।।
प्रेम भाव हिये अन्तर आवे, भजें गुरु अविनाशी।।
विनय करू
विनय करू मैं विनय करू, गुरुचरन कमल में विनय करू।।
विश्वामित्र विश्व हितकारी, विश्वम्भर विश्वासी।।
अपनी दया से पार लगादे, कटे बन्ध चौरासी।।
विनय करू करुणामय करुणा के सागर, करुणा के भंडारा।।
काम क्रोध से मुझे छुड़ाकर, ले चल भव के पारा।।
विनय करू दीन हितैषी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।
दीन समझ भक्ति दे मुझको, लहूँ चरन शरनाई।।
विनय करू गुन की खानी गुन में आगर, गुन नागर गुनकारी।।
अवगुन मेट के गुनी बनादे, करदे मुझे सुखारी।।
विनय करू राधास्वामी भक्ति पदारथ, का हूँ मैं अभिलाशी।।
प्रेम भाव हिये अन्तर आवे, भजें गुरु अविनाशी।।
विनय करू
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Song 238 — Hindi
कर घट में प्रीतम को दर्शन टेक।
प्रीति रीति की राह कठिन है, नहीं जाने संसारा।।
प्रेम प्रति जब मन में आवे, सूझे सार असारा।।
कर दर्शन। आवे प्रीति कहाँ चलि जावे, करे कहाँ यह बासा।।
घट उपजे घट से नहीं जावे, समझे गुरुमुख दासा।।
कर दर्शन सतसंगत बिन प्रति न आवे, परचय बिन परतीती।।
बिन परतीत भक्ति सब निष्फल, सीख संत मत रीती।।
कर दर्शन प्रेम प्रीति परतीत पदारथ, भक्ति और निवना।।
गुरु की दया बिना नहीं मिलते, यह सिद्धान्त पुराना।।
कर दर्शन प्रीति के मग में पग को धारा, घट में प्रीतम दरसा।।
राधास्वामी दया से काज बनाया, चरन कमल जब परसा कर दर्शन
प्रीति रीति की राह कठिन है, नहीं जाने संसारा।।
प्रेम प्रति जब मन में आवे, सूझे सार असारा।।
कर दर्शन। आवे प्रीति कहाँ चलि जावे, करे कहाँ यह बासा।।
घट उपजे घट से नहीं जावे, समझे गुरुमुख दासा।।
कर दर्शन सतसंगत बिन प्रति न आवे, परचय बिन परतीती।।
बिन परतीत भक्ति सब निष्फल, सीख संत मत रीती।।
कर दर्शन प्रेम प्रीति परतीत पदारथ, भक्ति और निवना।।
गुरु की दया बिना नहीं मिलते, यह सिद्धान्त पुराना।।
कर दर्शन प्रीति के मग में पग को धारा, घट में प्रीतम दरसा।।
राधास्वामी दया से काज बनाया, चरन कमल जब परसा कर दर्शन
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Song 239 — Hindi
पी प्रेम पियाला मस्त भई
। मस्त भई मतवाली भई, पी प्रेम पियाला मस्त भई।।
अँखियों में लाली के डोरे, लाल का रूप जो देखा।।
लाली देख लाल बन बैठी, चुका करम का लेखा।।
मस्त भई सुध बुध भूली तनकी अपने, रहा न सोच विचारा।।
ज्ञान अज्ञान दोऊ तज भागे, काल कला सब हारा मस्त भई पी बोला पी सुधा स्त्रान्तिरस, मुख से पीपी निकसा।।
। उड़ा पपीहा देख दशा मेरी, प्रेम कमल मन विगसा।।
मस्त भई मैं हूँ कौन पिया मेरा कैसा, अब कुछ समझ नाहीं।।
पी पी प्रेम पियाला पठी, पिया के हृदय माहीं।।
मस्त भई द्वत अद्वैत का झगड़ा छूटा, तारा चन्द न निरखू।।
राधास्वामी गुरु के चरन बलिहारी, आप पराया न परख।।
मस्त भई
। मस्त भई मतवाली भई, पी प्रेम पियाला मस्त भई।।
अँखियों में लाली के डोरे, लाल का रूप जो देखा।।
लाली देख लाल बन बैठी, चुका करम का लेखा।।
मस्त भई सुध बुध भूली तनकी अपने, रहा न सोच विचारा।।
ज्ञान अज्ञान दोऊ तज भागे, काल कला सब हारा मस्त भई पी बोला पी सुधा स्त्रान्तिरस, मुख से पीपी निकसा।।
। उड़ा पपीहा देख दशा मेरी, प्रेम कमल मन विगसा।।
मस्त भई मैं हूँ कौन पिया मेरा कैसा, अब कुछ समझ नाहीं।।
पी पी प्रेम पियाला पठी, पिया के हृदय माहीं।।
मस्त भई द्वत अद्वैत का झगड़ा छूटा, तारा चन्द न निरखू।।
राधास्वामी गुरु के चरन बलिहारी, आप पराया न परख।।
मस्त भई
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Song 240 — Hindi
घट आनन्द अघट घटा छाई।।
। घटा छाई जी घटा छाई, घट आनन्द अघट घटा छाई।।
बिन जल बरसे रिमझिम पानी, बिजली तेज प्रकाशा।।
बिन उपाव के सुख मंगल है, निर्मल हर्ष हुलासा।।
घटा छाई
जगमग जोत दिया बिन बाती, खुली आँख से सूझे।।
युक्ति यतन बिन अनुभव जागा, तत्व सर गम बुझे।।
घटा छाई बिगसे कमल पत्र घट भीतर, बरस गया जब पानी।।
बद पत्र बिन मोती झलके, झलक प्रकाश की खानी।।
घटा छाई फल खिले बहे त्रिविध बयार, निर्मल मन्द सुगंधी।।
रोम रोम सुख आनन्द व्यापा, खुली भैद की सन्धी।।
घटा छाई जब से घट में आन बिंराजा, मोह भरम सब भागा।।
राधास्वामी की किरपा से, सोया मनुआ जागा।।
घटा छाई
। घटा छाई जी घटा छाई, घट आनन्द अघट घटा छाई।।
बिन जल बरसे रिमझिम पानी, बिजली तेज प्रकाशा।।
बिन उपाव के सुख मंगल है, निर्मल हर्ष हुलासा।।
घटा छाई
जगमग जोत दिया बिन बाती, खुली आँख से सूझे।।
युक्ति यतन बिन अनुभव जागा, तत्व सर गम बुझे।।
घटा छाई बिगसे कमल पत्र घट भीतर, बरस गया जब पानी।।
बद पत्र बिन मोती झलके, झलक प्रकाश की खानी।।
घटा छाई फल खिले बहे त्रिविध बयार, निर्मल मन्द सुगंधी।।
रोम रोम सुख आनन्द व्यापा, खुली भैद की सन्धी।।
घटा छाई जब से घट में आन बिंराजा, मोह भरम सब भागा।।
राधास्वामी की किरपा से, सोया मनुआ जागा।।
घटा छाई
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Song 241 — Hindi
घट भीतर अजब तमाशा है॥टेक॥
तमाशा है जी तमाशा है, घट भीतर अजब तमाशा है।
घट के भीतर माल खजाना, हीरे लाल जवाहिर।।
मैंने अपनी आँखों देखा, खोल कहूँ क्या जाहिर तमाशा
घट के भीतर बाग बगीचे, फूल पत्र फल कलियाँ।
भाँति भाँति की बस्ती बसती, नजर ग्राम सुख गलियाँ
तमाशा पृथवी गगन पवन और अग्नी, जल से भरा भंडारा।।
बिजली ओजस तेज और क्रान्ती, सबको फैला पसारा तमाशा
इन्द्र कुबेर विष्णु शिव ब्रह्मा, घर में मेरे बिराजे।।
मंत्र जंत्र और तन्त्र सकल विधि, अनहद बाजे गाजे।।
तमाशा जब से देखी घट की लीला, तृप्त भयो मन मेरा।।
राधास्वामी की किरपा से, मिटा योनि का फेरा तमाशा
तमाशा है जी तमाशा है, घट भीतर अजब तमाशा है।
घट के भीतर माल खजाना, हीरे लाल जवाहिर।।
मैंने अपनी आँखों देखा, खोल कहूँ क्या जाहिर तमाशा
घट के भीतर बाग बगीचे, फूल पत्र फल कलियाँ।
भाँति भाँति की बस्ती बसती, नजर ग्राम सुख गलियाँ
तमाशा पृथवी गगन पवन और अग्नी, जल से भरा भंडारा।।
बिजली ओजस तेज और क्रान्ती, सबको फैला पसारा तमाशा
इन्द्र कुबेर विष्णु शिव ब्रह्मा, घर में मेरे बिराजे।।
मंत्र जंत्र और तन्त्र सकल विधि, अनहद बाजे गाजे।।
तमाशा जब से देखी घट की लीला, तृप्त भयो मन मेरा।।
राधास्वामी की किरपा से, मिटा योनि का फेरा तमाशा
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Song 242 — Hindi
अब कुछ गुरुबानी समझ पड़ी।।
टेको। समझ पड़ी जी बूझ पड़ी, अब कुछ गुरुबानी समझ पड़ी।।
सहस कमलदल बैठक ठानी, निरख विराट पसारा।।
घंटा शंख की धुन सुन पाई, चमके घट रवि तारा।।
त्रिकुटी कमल ओम दरबारा, गुरु की संगत आई।
श्रुति स्मृति का भरम दूर भयो, धुन मृदंग सुन पाई।।
समझ सुन्न में सहज समाध रचाई, द्वौत की वजी सरंगी।।
चन्द्र प्रकाशा तिमिर विनासा, अब नहीं हूँ कुरंगी।।
समझ ऊँचे चढ़ी भंवर की घाटी, बजी सोहंगम बंसी।।
दुविधा मिटी काल छबिदरसी, चल गई सतपद दिनसी।।
समझ अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी स्थाना।।
अब न पडू भव दुख के फन्दे, भिल गया पद निरवाना।।
समझ
टेको। समझ पड़ी जी बूझ पड़ी, अब कुछ गुरुबानी समझ पड़ी।।
सहस कमलदल बैठक ठानी, निरख विराट पसारा।।
घंटा शंख की धुन सुन पाई, चमके घट रवि तारा।।
त्रिकुटी कमल ओम दरबारा, गुरु की संगत आई।
श्रुति स्मृति का भरम दूर भयो, धुन मृदंग सुन पाई।।
समझ सुन्न में सहज समाध रचाई, द्वौत की वजी सरंगी।।
चन्द्र प्रकाशा तिमिर विनासा, अब नहीं हूँ कुरंगी।।
समझ ऊँचे चढ़ी भंवर की घाटी, बजी सोहंगम बंसी।।
दुविधा मिटी काल छबिदरसी, चल गई सतपद दिनसी।।
समझ अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी स्थाना।।
अब न पडू भव दुख के फन्दे, भिल गया पद निरवाना।।
समझ
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Song 243 — Hindi
भव पार गई सोई पारवती।।
पारवती जी पारवती, भवसागर गई सोई पारवती।।
गिर केलास हिमालय डेरा, विश्वम्भर का संगा।।
मानसरोवर हंस मंडली, न्हाती प्रेम की गंगा।।
पारवती त्याग विराग प्रीति अनुरागा, उदासीनता मूरत।।
यह सब सुरत निरत के लक्षण, आनन्द सुख की मूरत
पारवती परवत के आकार है रिती, अटल पौढ़ दृढ़ गाड़ी।।
शब्द रती अनहद धुन माती, दया छमा मन बाढ़ी।।
पारवती सुरत शब्द में शब्द सुरत में, मिलजुल केल करन्ती।।
रह अचिन्त सतगुरु के सहारे, प्रीति प्रतीत धरन्ती।।
पारवती सतवन्ती सत वरत निवासी, सतभोगी सत भागी।।
सुरत सती भिल सत्य शब्द में, राधास्वामी चरनन लागी।।
पारवती
पारवती जी पारवती, भवसागर गई सोई पारवती।।
गिर केलास हिमालय डेरा, विश्वम्भर का संगा।।
मानसरोवर हंस मंडली, न्हाती प्रेम की गंगा।।
पारवती त्याग विराग प्रीति अनुरागा, उदासीनता मूरत।।
यह सब सुरत निरत के लक्षण, आनन्द सुख की मूरत
पारवती परवत के आकार है रिती, अटल पौढ़ दृढ़ गाड़ी।।
शब्द रती अनहद धुन माती, दया छमा मन बाढ़ी।।
पारवती सुरत शब्द में शब्द सुरत में, मिलजुल केल करन्ती।।
रह अचिन्त सतगुरु के सहारे, प्रीति प्रतीत धरन्ती।।
पारवती सतवन्ती सत वरत निवासी, सतभोगी सत भागी।।
सुरत सती भिल सत्य शब्द में, राधास्वामी चरनन लागी।।
पारवती
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Song 244 — Hindi
घट में अब अनहद धुन प्रगटी।।
रोम रोम आनन्द पसारा, सुरत का भोग बिलासा।।
इन्द्री थकी थके मन बानी, पायके हर्ष हुलासा।। धुन प्रगटी
मकर तार गति तार निकाला, सुरत तार गह डोरी।।
घर को तज अघर को धाई, भरती डग सोई चौड़ी।।धुन प्रगटी
मीन समान पकड़ जलधारा, मेघ आकाश सिंधाई।।
गगन मंडल के अमी कुन्ड में, गोते मार हंकारी।।
धुन चाल बिहंगम सुरत को भाई, चली उड़ी नभ धामा।।
हंस रूप हुई सुरत सहेली, त्याग मोह मद माना।।
धुन सहसकमलदल त्रिकुटी आई, सुन्न महासुन्न निरखा।।
भंवर सत्यपद अलख अगम लख, राधास्वामी को परखा।। धुन
रोम रोम आनन्द पसारा, सुरत का भोग बिलासा।।
इन्द्री थकी थके मन बानी, पायके हर्ष हुलासा।। धुन प्रगटी
मकर तार गति तार निकाला, सुरत तार गह डोरी।।
घर को तज अघर को धाई, भरती डग सोई चौड़ी।।धुन प्रगटी
मीन समान पकड़ जलधारा, मेघ आकाश सिंधाई।।
गगन मंडल के अमी कुन्ड में, गोते मार हंकारी।।
धुन चाल बिहंगम सुरत को भाई, चली उड़ी नभ धामा।।
हंस रूप हुई सुरत सहेली, त्याग मोह मद माना।।
धुन सहसकमलदल त्रिकुटी आई, सुन्न महासुन्न निरखा।।
भंवर सत्यपद अलख अगम लख, राधास्वामी को परखा।। धुन
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Song 245 — Hindi
मेरा चंचल मनुआ काल से डर।।
काल से डर प्यारे काल से डर, मेरा चंचल मनुआ काल से डर।।
आज कहे मैं काल भजू गा, काल की गति नहीं जाने।।
आज काल क्या करता है तू , काल लगा निकराने काल से
क्या जाने क्या पल में होगा, काल है कठिन कराला।।
काल भयानक फनधर भाई, काल नाम है काला काल से
जो करना है अब कर प्यारे, अवसर मिला सुहाना।।
आज का काम काल पर क्यों तू , छोड़ हुआ दीवाना काल से
खेल कूद में विषय भोग में, आयु सकल बिसराई।।
वृद्ध अवस्था देह शिथिल भई, अब कुछ करले कमाई।। काल से
आज काल में बिगड़ेगा तन, सांस दुधारा जारी।।
काल का त्याग बहाना झूठा, कर चलने की त्यारी।। काल से
संगी साथी नहीं हैं तेरे, मात पिता सुत भाई।।
अपने स्वारथ बंध बंधाने, साथ नहीं कोई जाई।।
काल से बादर की छांई जग लीला, बिनस जाय पल माहीं।।
राधास्वामी की कर आसा, और की आसा नाहीं।। काल से
काल से डर प्यारे काल से डर, मेरा चंचल मनुआ काल से डर।।
आज कहे मैं काल भजू गा, काल की गति नहीं जाने।।
आज काल क्या करता है तू , काल लगा निकराने काल से
क्या जाने क्या पल में होगा, काल है कठिन कराला।।
काल भयानक फनधर भाई, काल नाम है काला काल से
जो करना है अब कर प्यारे, अवसर मिला सुहाना।।
आज का काम काल पर क्यों तू , छोड़ हुआ दीवाना काल से
खेल कूद में विषय भोग में, आयु सकल बिसराई।।
वृद्ध अवस्था देह शिथिल भई, अब कुछ करले कमाई।। काल से
आज काल में बिगड़ेगा तन, सांस दुधारा जारी।।
काल का त्याग बहाना झूठा, कर चलने की त्यारी।। काल से
संगी साथी नहीं हैं तेरे, मात पिता सुत भाई।।
अपने स्वारथ बंध बंधाने, साथ नहीं कोई जाई।।
काल से बादर की छांई जग लीला, बिनस जाय पल माहीं।।
राधास्वामी की कर आसा, और की आसा नाहीं।। काल से
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Song 246 — Hindi
साधु कौन आया और कौन गया टेका।
जन में मरन सब खेल है मन का, मन माया व्यौहार।।
उत्पत्ति स्थिति प्रलय की लीला, सब माया विस्तारा।।
कौन सिंध में लहर उठत दिन राती, काल चक्र का झूला।।
झूले ब्रह्मा विष्णु महेशा, कारन सूक्ष्म स्थूला।। कौन।।
कीचड़ में लतपत कभी होते, कभी नहाते धोते।।
कभी जाग परपंच रचाते, कभी नींद सुख सोते।।
कौन बाप के बीरज माँ के रज में, मैंने किया प्रवेश।।
निजे स्त्री के गर्भ में आकर, धार पुत्र का भेसा।। कौन
कभी पुत्री कभी पुत्र बना मैं, कभी गुरु कभी चेला।।
समझ जो हो तो समझ बूझ ले, रूप अम्म अलबेली।।
कौन शब्द स्पर्श रूप रस गंधा, संत्र ही मेरे रूपा।
गमन पवन अग्नी जल पृथवी, मैं परजा मैं भूपा।।कौन।।
मैं समुद्र मैं लहर बूद सब, झाग सृष्टि रच लीना।।
राधास्वामी की संगत पाई, निज स्वरूप तब चीन्हा।।कौन
जन में मरन सब खेल है मन का, मन माया व्यौहार।।
उत्पत्ति स्थिति प्रलय की लीला, सब माया विस्तारा।।
कौन सिंध में लहर उठत दिन राती, काल चक्र का झूला।।
झूले ब्रह्मा विष्णु महेशा, कारन सूक्ष्म स्थूला।। कौन।।
कीचड़ में लतपत कभी होते, कभी नहाते धोते।।
कभी जाग परपंच रचाते, कभी नींद सुख सोते।।
कौन बाप के बीरज माँ के रज में, मैंने किया प्रवेश।।
निजे स्त्री के गर्भ में आकर, धार पुत्र का भेसा।। कौन
कभी पुत्री कभी पुत्र बना मैं, कभी गुरु कभी चेला।।
समझ जो हो तो समझ बूझ ले, रूप अम्म अलबेली।।
कौन शब्द स्पर्श रूप रस गंधा, संत्र ही मेरे रूपा।
गमन पवन अग्नी जल पृथवी, मैं परजा मैं भूपा।।कौन।।
मैं समुद्र मैं लहर बूद सब, झाग सृष्टि रच लीना।।
राधास्वामी की संगत पाई, निज स्वरूप तब चीन्हा।।कौन
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Song 247 — Hindi
सजन तू कल्पित फाँस फसा।।टेक।
होना न होना मरना जीना, सवः तेरे आधार।।
तेरे घट समुद्र में कल्पित, जगत प्रपंच पसारा।।
फॉस फैसा गोरख धन्धे पड़े हैं अन्धे, झॉई पकड़न निकसे।।
छाँईफाई झाँई न पाई, इत उत भटक के खिसके।।
फाँस हँसा ज्ञान अज्ञान ध्यान अध्याना, सब ही कल्पित साँई।।
योग यतन संयम यह क्या है, फाँई झाँई छाई फाँस हँसा गाये
बजाये गीत सुनाये, नाचे हाथ न आवे।।
रोये धोये आँसू बहाये, आदि अन्त कहां पावे।।
फाँस हँसा भेद अभेद द्वैत अद्वता, दोनों हैं एक सारा।।
मिथ्या कल्पित हुये अनहुये, कल्पित सब व्यौहारा।।फाँस हँसा।।
ज्ञानी अज्ञानी मनमानी, ध्यान ज्ञान अभिमानी।।
दोनों फँसे भरम के फन्दे, फन्दे फन्द फँसानी।।
फाँस हँसा बन में गये तो खाक उड़ाई, घर में रहे तो रोना।।
घर बन को एक न जाना, नित उठ मैल को धोना।।
फाँस हँसा साँच कहूँ तो कोई न माने, झूठ कहत सकुचाऊँ।
झूठ साँच सब का सब मिथ्या, केहि समझावन जाऊँ।फाँस हँसा
राधास्वामी सतगुरु यूरे, सुरत शब्द मत गाया।।
साधन अनुभव की प्रभुताई, भव निधि पार लगाया।। फाँस हँसा
होना न होना मरना जीना, सवः तेरे आधार।।
तेरे घट समुद्र में कल्पित, जगत प्रपंच पसारा।।
फॉस फैसा गोरख धन्धे पड़े हैं अन्धे, झॉई पकड़न निकसे।।
छाँईफाई झाँई न पाई, इत उत भटक के खिसके।।
फाँस हँसा ज्ञान अज्ञान ध्यान अध्याना, सब ही कल्पित साँई।।
योग यतन संयम यह क्या है, फाँई झाँई छाई फाँस हँसा गाये
बजाये गीत सुनाये, नाचे हाथ न आवे।।
रोये धोये आँसू बहाये, आदि अन्त कहां पावे।।
फाँस हँसा भेद अभेद द्वैत अद्वता, दोनों हैं एक सारा।।
मिथ्या कल्पित हुये अनहुये, कल्पित सब व्यौहारा।।फाँस हँसा।।
ज्ञानी अज्ञानी मनमानी, ध्यान ज्ञान अभिमानी।।
दोनों फँसे भरम के फन्दे, फन्दे फन्द फँसानी।।
फाँस हँसा बन में गये तो खाक उड़ाई, घर में रहे तो रोना।।
घर बन को एक न जाना, नित उठ मैल को धोना।।
फाँस हँसा साँच कहूँ तो कोई न माने, झूठ कहत सकुचाऊँ।
झूठ साँच सब का सब मिथ्या, केहि समझावन जाऊँ।फाँस हँसा
राधास्वामी सतगुरु यूरे, सुरत शब्द मत गाया।।
साधन अनुभव की प्रभुताई, भव निधि पार लगाया।। फाँस हँसा
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Song 248 — Hindi
सजन कोई सोच न बात कहे।।
टेक। योगाचार योग रस माते, क्षणिक ज्ञान क्षण भंगी।।
मध्यम वाले मध्य समाने, शून्यवाद सरवंगी।।
बात कहे सांख्य गिनावे गिनती सबकी, योग समाधी गावे।।
वेदान्त वेदान्ती की आशा, करम में करमी फेसावे।।
बात कहे जैसी मन की भई कल्पना, तैसा खेल खिलाया।।
खटपट में षट दर्शन भूले, अन्त मिला क्या छाया।।
बात कहे यूरा खेल किसी का नहीं, खेलें खेल खिलाड़ी।।
किसको बताऊँ पंडित मूरख, किसको ज्ञानी अनाड़ी।।
बात कहे गुरु की दया साध की संगत, सार तत्व लख पाया।
राधास्वामी चरन कमल गह, छूटी माया छाया।।
बात कहे
टेक। योगाचार योग रस माते, क्षणिक ज्ञान क्षण भंगी।।
मध्यम वाले मध्य समाने, शून्यवाद सरवंगी।।
बात कहे सांख्य गिनावे गिनती सबकी, योग समाधी गावे।।
वेदान्त वेदान्ती की आशा, करम में करमी फेसावे।।
बात कहे जैसी मन की भई कल्पना, तैसा खेल खिलाया।।
खटपट में षट दर्शन भूले, अन्त मिला क्या छाया।।
बात कहे यूरा खेल किसी का नहीं, खेलें खेल खिलाड़ी।।
किसको बताऊँ पंडित मूरख, किसको ज्ञानी अनाड़ी।।
बात कहे गुरु की दया साध की संगत, सार तत्व लख पाया।
राधास्वामी चरन कमल गह, छूटी माया छाया।।
बात कहे
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Song 249 — Hindi
राधास्वामी दया का वार न पार।।
दया किया मोहि अंग लगाया, कृपा दृष्टि से देखा।।
महर की नजर पड़ी जब मुझ पर, चुका करम का लेखा।।
वार न पार माया काल के कठिन थे फन्दे, सहज में लिया छुड़ाई।।
प्रीति प्रतीति भक्ति श्रद्धा लख, बरखशी निज शरनाई।।वार न पार
सुरत शब्द मत राह सिखाई, अन्तरमुखी बनाया।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, घट भीतर दिखलाया।।वार न पार
दया किया मोहि अंग लगाया, कृपा दृष्टि से देखा।।
महर की नजर पड़ी जब मुझ पर, चुका करम का लेखा।।
वार न पार माया काल के कठिन थे फन्दे, सहज में लिया छुड़ाई।।
प्रीति प्रतीति भक्ति श्रद्धा लख, बरखशी निज शरनाई।।वार न पार
सुरत शब्द मत राह सिखाई, अन्तरमुखी बनाया।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, घट भीतर दिखलाया।।वार न पार
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Song 250 — Hindi
नाम सनेही नयनों में आजा।।
टेका। आंखों की कोठरी बनाई, पुतली पलंग विचित्र सजाई।।
पलकों की चिक विमल लगाई, आजा आंखों में तू समाजा।। नाम
नयन हमारे तेरे दिवाने, रूप अनूप देख ललचाने।।
छबि अद्भुत को देख लुभाने, सूना मंदिर आज बसाजा।।
नाम प्रेम पियाला पी मतवाली, ऑखे बनी सहज मतवाली।।
ध्यान तेरा कर हुई निहाली, प्रीति पाली को अंग लगाजा।।नाम
बिन दर्शन के कल नहीं आवे, हिया जिया रात दिवस अकुलावे।।
विरह लगन की आग तपावे, बचन बूंद रस छिड़क बुझाजा।।नाम
राधास्वामी सतगुरु प्यारा, तू है इन आंखों का तारा।।
चरन कमल का देके सहारा, बिगड़ी मेरी आके बनाजा।।नाम
टेका। आंखों की कोठरी बनाई, पुतली पलंग विचित्र सजाई।।
पलकों की चिक विमल लगाई, आजा आंखों में तू समाजा।। नाम
नयन हमारे तेरे दिवाने, रूप अनूप देख ललचाने।।
छबि अद्भुत को देख लुभाने, सूना मंदिर आज बसाजा।।
नाम प्रेम पियाला पी मतवाली, ऑखे बनी सहज मतवाली।।
ध्यान तेरा कर हुई निहाली, प्रीति पाली को अंग लगाजा।।नाम
बिन दर्शन के कल नहीं आवे, हिया जिया रात दिवस अकुलावे।।
विरह लगन की आग तपावे, बचन बूंद रस छिड़क बुझाजा।।नाम
राधास्वामी सतगुरु प्यारा, तू है इन आंखों का तारा।।
चरन कमल का देके सहारा, बिगड़ी मेरी आके बनाजा।।नाम
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Song 251 — Hindi
जग चिड़िया रैन बसेरा है।।
दस दिन का जीना है जग में, दस दिन सैर तमाशा।।
जिसने आस फांस गले डाली, अन्त में चला उदासा।।बसेरा है।
महल मकान बनाकर भूले, फूले अपने मन में।।
काल जो अपनी बस्ती छोड़ी, आये उजड़े बन में।।
बसेरा है। मात पिता भाई सुत बंधु, मीत कुटुम्ब परिवारा।।
चलते समय संग नहीं कोई, कोई न हितू पियारा।।
बसेरा है। कोई जलावे कोई गाड़े, कोई नीर बहावे।।
कोई फेंके ऊसर परबत, हड्डी पवन सुखावे।।
बसेरा है। रावण गया वीर लंकापति, राम गये अवधीसा।।
योगी यती तपी बनवंडी, गये काल के देसी।।बसेरा है।
तू जायेगा मैं जाऊँगा, जायेगा संसारा।।
रहने वाला एक नहीं है, झूठ प्रपंच पसारा।।
बसेरा है। बन परबत और नगर ग्राम सब, जाने वाले जानो।
जल पृथवी आकास पवन और, अग्नि को ऐसा मानो।।
बसेरा है। सूरज चन्द्र गगन मंडल के, तारे अगमापाई।।
सबके सब यह काल के मुह में, काल बली दुखदाई।।
बसेरा है। अवसर मिला सुहानी तुझको, मानुष देही पाई।।
राधास्वामी भज निस बासर, ले गुरु की शरनाई।।बसेरा है।।
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दस दिन का जीना है जग में, दस दिन सैर तमाशा।।
जिसने आस फांस गले डाली, अन्त में चला उदासा।।बसेरा है।
महल मकान बनाकर भूले, फूले अपने मन में।।
काल जो अपनी बस्ती छोड़ी, आये उजड़े बन में।।
बसेरा है। मात पिता भाई सुत बंधु, मीत कुटुम्ब परिवारा।।
चलते समय संग नहीं कोई, कोई न हितू पियारा।।
बसेरा है। कोई जलावे कोई गाड़े, कोई नीर बहावे।।
कोई फेंके ऊसर परबत, हड्डी पवन सुखावे।।
बसेरा है। रावण गया वीर लंकापति, राम गये अवधीसा।।
योगी यती तपी बनवंडी, गये काल के देसी।।बसेरा है।
तू जायेगा मैं जाऊँगा, जायेगा संसारा।।
रहने वाला एक नहीं है, झूठ प्रपंच पसारा।।
बसेरा है। बन परबत और नगर ग्राम सब, जाने वाले जानो।
जल पृथवी आकास पवन और, अग्नि को ऐसा मानो।।
बसेरा है। सूरज चन्द्र गगन मंडल के, तारे अगमापाई।।
सबके सब यह काल के मुह में, काल बली दुखदाई।।
बसेरा है। अवसर मिला सुहानी तुझको, मानुष देही पाई।।
राधास्वामी भज निस बासर, ले गुरु की शरनाई।।बसेरा है।।
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Song 252 — Hindi
राधास्वामी चरन पर बलिहारी॥टेक॥
काल करम माया के बस हो, अंधकार में भूला।।
राधास्वामी दया से गुरुमत समझा, भक्ति हिंडोले झूला।।बलिहारी।।
सबको देखा किया परेखा पढ़ लिख कर भरमाना।।
राधास्वामी दया से सतसंगत कर, भरम भेद तत्त्त जाना।।बलिहारी।।
जनम जनम के पातके धोये, करके गुरु सतसंगी। राधास्वामी दया की लहर जो उमड़ी, घट फ्रगटी सत गंगा।।
बलिहारी एक अनेक का झगड़ा मेटा, मिट गया द्वन्द पसारा।।
राधास्वामी दया से आंख खुली तब, मिला सार का सारा।।
बलिहारी राधास्वामी राधास्वामी गाना, राधास्वामी ध्यान लगाना।।
राधास्वामी दया से काज बना है, होगया प्रेम दिवाना।।बलिहारी
काल करम माया के बस हो, अंधकार में भूला।।
राधास्वामी दया से गुरुमत समझा, भक्ति हिंडोले झूला।।बलिहारी।।
सबको देखा किया परेखा पढ़ लिख कर भरमाना।।
राधास्वामी दया से सतसंगत कर, भरम भेद तत्त्त जाना।।बलिहारी।।
जनम जनम के पातके धोये, करके गुरु सतसंगी। राधास्वामी दया की लहर जो उमड़ी, घट फ्रगटी सत गंगा।।
बलिहारी एक अनेक का झगड़ा मेटा, मिट गया द्वन्द पसारा।।
राधास्वामी दया से आंख खुली तब, मिला सार का सारा।।
बलिहारी राधास्वामी राधास्वामी गाना, राधास्वामी ध्यान लगाना।।
राधास्वामी दया से काज बना है, होगया प्रेम दिवाना।।बलिहारी
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Song 253 — Hindi
राधास्वामी सतगुरु हितकारी।।
टेक। राधास्वामी ब्रह्मा राधास्वामी विष्णु, राधास्वामी शिव की मूरत।।
राधास्वामी पूरन ब्रह्म अखंडित, पारब्रह्म की सूरत।।
हितकारी राधास्वामी अगुन सगुन राधास्वामी, राधास्वामी इनसे न्यारे।।
राधास्वामी रक्षक राधास्वामी दानी,राधास्वामी सत रखवारे॥हितकारी
सत्त कबीर हैं राधास्वामी, नानक राधास्वामी जानो।।
राधास्वामी गुरु के एक रूप में, सब सन्तन को मानो
हितकारी राम कृष्ण और बुद्ध विवेकी, और सकल अवतारा।।
राधास्वामी रूप में सबको समझो, यही सार का सारा।।
हितकारी राधास्वामी सतगुरु प्रगटे कलि में, सुरत शब्द मत दीना।।
राधास्वामी चरन शरन में आकर, जनम सुफल कर लीना।।
हितकारी
टेक। राधास्वामी ब्रह्मा राधास्वामी विष्णु, राधास्वामी शिव की मूरत।।
राधास्वामी पूरन ब्रह्म अखंडित, पारब्रह्म की सूरत।।
हितकारी राधास्वामी अगुन सगुन राधास्वामी, राधास्वामी इनसे न्यारे।।
राधास्वामी रक्षक राधास्वामी दानी,राधास्वामी सत रखवारे॥हितकारी
सत्त कबीर हैं राधास्वामी, नानक राधास्वामी जानो।।
राधास्वामी गुरु के एक रूप में, सब सन्तन को मानो
हितकारी राम कृष्ण और बुद्ध विवेकी, और सकल अवतारा।।
राधास्वामी रूप में सबको समझो, यही सार का सारा।।
हितकारी राधास्वामी सतगुरु प्रगटे कलि में, सुरत शब्द मत दीना।।
राधास्वामी चरन शरन में आकर, जनम सुफल कर लीना।।
हितकारी
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Song 254 — Hindi
सुरत घट में गगन की ओर चली।।
यह संसार बिपत की खानी, काल कर्म की फाँसी।।
इसके फन्दे आन फँसाई, अपनी कराई हाँसी।।
ओर चली माया को छिनभंगी लखकर, चित को अपने हटाई।।
पृथवी मंडल त्यागके सजनी, गगन की ओर सिधाई।।
ओर चली। भूल भरम की भरम भुलैय्यां, इस जग का व्यौहारा।।
जो कोई फैसा राह नहीं पाया, सिरपर करम का भारी।।
ओर चली सीधे मारग सब कोई चाले, उलटे को नहिं जाने।।
उलटे मग की समझ जो आवे, सत का सार पिछाने।।
ओर चली घट ही मेरे उलटा रस्ता, सतगुरु ने बतलाया।।
सुरत शब्द का साधन करके, राधास्वामी धाम में आया।।
ओर चली।
यह संसार बिपत की खानी, काल कर्म की फाँसी।।
इसके फन्दे आन फँसाई, अपनी कराई हाँसी।।
ओर चली माया को छिनभंगी लखकर, चित को अपने हटाई।।
पृथवी मंडल त्यागके सजनी, गगन की ओर सिधाई।।
ओर चली। भूल भरम की भरम भुलैय्यां, इस जग का व्यौहारा।।
जो कोई फैसा राह नहीं पाया, सिरपर करम का भारी।।
ओर चली सीधे मारग सब कोई चाले, उलटे को नहिं जाने।।
उलटे मग की समझ जो आवे, सत का सार पिछाने।।
ओर चली घट ही मेरे उलटा रस्ता, सतगुरु ने बतलाया।।
सुरत शब्द का साधन करके, राधास्वामी धाम में आया।।
ओर चली।
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Song 255 — Hindi
सुनो मेरी विनती गुरु दाता।।
तुम तो आये जव, उबारन, दया क्षमा के काजा।।
जो नहीं मेरा काम बनाओ, नाम को आवे लाजा।।
गुरु दाता मो सम दुष्ट नहीं कोई दूजा, दम्भी मानी गुमानी।।
दुखी जानकर चरन लगाओ, प्रेम भक्ति दे दानी।।
गुरु दाता दुख कलेश ने चहुँ दिस घेरा, मुझसा दुखी न कोई।
मुझे तार लो जब मैं जानू, पतित अधम गति सोई।।गुरु दाता
भलों को तुम नहीं तारन आये, तुम्हें बुरे हैं प्यारे।।
इनकी लाज तुम्हारे हाथ है, तुम इनके रखवारे।।
गुरु दाता राधास्वामी दीन दयाला, दीनन के हितकारी।।
बाँह गहो दुख मेंटों काटो, काल का बन्धन भारी।।गुरु दाता
तुम तो आये जव, उबारन, दया क्षमा के काजा।।
जो नहीं मेरा काम बनाओ, नाम को आवे लाजा।।
गुरु दाता मो सम दुष्ट नहीं कोई दूजा, दम्भी मानी गुमानी।।
दुखी जानकर चरन लगाओ, प्रेम भक्ति दे दानी।।
गुरु दाता दुख कलेश ने चहुँ दिस घेरा, मुझसा दुखी न कोई।
मुझे तार लो जब मैं जानू, पतित अधम गति सोई।।गुरु दाता
भलों को तुम नहीं तारन आये, तुम्हें बुरे हैं प्यारे।।
इनकी लाज तुम्हारे हाथ है, तुम इनके रखवारे।।
गुरु दाता राधास्वामी दीन दयाला, दीनन के हितकारी।।
बाँह गहो दुख मेंटों काटो, काल का बन्धन भारी।।गुरु दाता
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Song 256 — Hindi
गुरु गम की महिमा जान गई।।
टेक। जान गई पहचान गई, गुरु गम की महिमा जान गई।।
क्या था कौन था कैसा था वह, यह तो अकथ कहानी।
जब तक अपना मुंह नहीं खोले, कोई न समझे ज्ञानी।।
जान गई गुप्त न प्रगट न प्रगट गुप्त था, गुप्त प्रगट में व्यापा।।
एक नहीं न अनेक रूप में, अपने आपका आपा।।जान गई।
शब्द नहीं न अशब्द की मूरत, निराकार साकारा।।
अगुन सगुन व्यापक अध्यापक, दोनों दशा से न्यारा।।
जान गई मौज हुई धारा वह फूटी, सिंध लगा लहराने।।
प्रगट हुआ रचना लगी होने, सिंध बुद के बहाने।।
जान गई सत बन तपा ब्रह्म हो निकला, तीन अवस्था ठानी।।
हिरण्यगर्भ ओर अन्तरयामी, और विराट महानी।।
जान गई। तीन दशा यह काल रूप की, बूद एक सोई मानो।।
जब लग बूद की परख न आवे, सिंध भेद नहीं जानो जान
गई फैला ब्रह्म बढ़ा और सोचा, रचलिया सकल पसारा।।
यह ब्रह्मांड ब्रह्म का अंडा, बिरला समझे सारा।।
जान गई पहले एक अनेक बना फिर, एक अनेक प्रकार।।
एक अनेक की लीला अद्भुत, कहन सुनने से न्यारा।।
जान गई अंडे से ज्य पक्षी प्रगटे, पक्षी से ज्यों अण्डा।।
बीज से पेड़ फूल फल टहनी, अन्त में बीज प्रचंडा।।
जान गई ब्रह्म से जीव जन्तु प्रगटाये, सुरत सहारा लीना।।
जीव ब्रह्म से यहि विधि निकले, तीन रूप चित दीना।।
जान गई तेजस विश्व प्राज्ञ दशा हुई, जाग्रत स्वप्न सुषुप्ती।।
जो है ब्रह्म जीव है वैसा, बिरला समझे युक्ति।।
जान गई बूद सिंध से न्यारा होगया, दुख सुख जाल बंधाना।।
करम ज्ञान की उलझन में फैस, अपना भेद न जाना।।
जान गई यह गति देख सिंध दया उमड़ी, लहर रूप में आई।
सतगुरु सत दयाल सुखदाई, प्रेम भाव समुदाई।।
जान गई गुरु का भेष कृपालु दयाला, निराधार जगधारा।।
हम जैसा जग में बन आया, धरा सन्त अवतारा।।
जान गई सतसंगत में बचन सुना कर, लिया जीव अपनाई।।
भेद बताकर मरम जताकर, सत के पन्थ चलाई जान गई
शब्द जहाज बिठाया सबको, भवे के पार लगाया।
जीव निबल को बल पौरुष दे, सत पद ले पहुँचाया।।
जान गई सोई आदर्श इप्ट है सोई, धुरपद सत का बासी।।
अगुन सगुन साकार अकारा, चैतन धन सुखरासी।।
जान गई राधास्वामी परम सनेही, महिमा धन्य तुम्हारी।।
तुम्हरी दया जीव बहु तर गये, चरन शरन बलिहारी
जान गई राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना।।
राधास्वामी गुरु दयाला, गुन गागा हरषाना जान गई
टेक। जान गई पहचान गई, गुरु गम की महिमा जान गई।।
क्या था कौन था कैसा था वह, यह तो अकथ कहानी।
जब तक अपना मुंह नहीं खोले, कोई न समझे ज्ञानी।।
जान गई गुप्त न प्रगट न प्रगट गुप्त था, गुप्त प्रगट में व्यापा।।
एक नहीं न अनेक रूप में, अपने आपका आपा।।जान गई।
शब्द नहीं न अशब्द की मूरत, निराकार साकारा।।
अगुन सगुन व्यापक अध्यापक, दोनों दशा से न्यारा।।
जान गई मौज हुई धारा वह फूटी, सिंध लगा लहराने।।
प्रगट हुआ रचना लगी होने, सिंध बुद के बहाने।।
जान गई सत बन तपा ब्रह्म हो निकला, तीन अवस्था ठानी।।
हिरण्यगर्भ ओर अन्तरयामी, और विराट महानी।।
जान गई। तीन दशा यह काल रूप की, बूद एक सोई मानो।।
जब लग बूद की परख न आवे, सिंध भेद नहीं जानो जान
गई फैला ब्रह्म बढ़ा और सोचा, रचलिया सकल पसारा।।
यह ब्रह्मांड ब्रह्म का अंडा, बिरला समझे सारा।।
जान गई पहले एक अनेक बना फिर, एक अनेक प्रकार।।
एक अनेक की लीला अद्भुत, कहन सुनने से न्यारा।।
जान गई अंडे से ज्य पक्षी प्रगटे, पक्षी से ज्यों अण्डा।।
बीज से पेड़ फूल फल टहनी, अन्त में बीज प्रचंडा।।
जान गई ब्रह्म से जीव जन्तु प्रगटाये, सुरत सहारा लीना।।
जीव ब्रह्म से यहि विधि निकले, तीन रूप चित दीना।।
जान गई तेजस विश्व प्राज्ञ दशा हुई, जाग्रत स्वप्न सुषुप्ती।।
जो है ब्रह्म जीव है वैसा, बिरला समझे युक्ति।।
जान गई बूद सिंध से न्यारा होगया, दुख सुख जाल बंधाना।।
करम ज्ञान की उलझन में फैस, अपना भेद न जाना।।
जान गई यह गति देख सिंध दया उमड़ी, लहर रूप में आई।
सतगुरु सत दयाल सुखदाई, प्रेम भाव समुदाई।।
जान गई गुरु का भेष कृपालु दयाला, निराधार जगधारा।।
हम जैसा जग में बन आया, धरा सन्त अवतारा।।
जान गई सतसंगत में बचन सुना कर, लिया जीव अपनाई।।
भेद बताकर मरम जताकर, सत के पन्थ चलाई जान गई
शब्द जहाज बिठाया सबको, भवे के पार लगाया।
जीव निबल को बल पौरुष दे, सत पद ले पहुँचाया।।
जान गई सोई आदर्श इप्ट है सोई, धुरपद सत का बासी।।
अगुन सगुन साकार अकारा, चैतन धन सुखरासी।।
जान गई राधास्वामी परम सनेही, महिमा धन्य तुम्हारी।।
तुम्हरी दया जीव बहु तर गये, चरन शरन बलिहारी
जान गई राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना।।
राधास्वामी गुरु दयाला, गुन गागा हरषाना जान गई
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Song 257 — Hindi
उठ जाग सवेरा होगया।।
गई सियाही आई सफेदी, अब क्यों सोवे भाई।।
रात बीत गई सूरज निकला, त्याग नींद अलसाई
होगया उजले केस की पत कुछ रखले, चौथापन जब आया।।
चलने की कर अपने तयारी, जग बदर की छाया।।
होगया। हसा फूल हँस कर मुरझाया, बास सुबास को त्यागी।।
हँसी ठठोल का समय नहीं है, हो गुरु पद अनुरागी।।
होगया कोयल कूक सुनाकर चुप हुई, मौन अवस्थाधारी।।
बाद विवाद से मन को रोकले, शान्ती का अधिकारी होगया
सुमिरि सुमिर भज नाम गुरु का, नाम सन्त मन सारा।।
राधास्वामी की दाया से, जा भव जल पारा।।
होगया
गई सियाही आई सफेदी, अब क्यों सोवे भाई।।
रात बीत गई सूरज निकला, त्याग नींद अलसाई
होगया उजले केस की पत कुछ रखले, चौथापन जब आया।।
चलने की कर अपने तयारी, जग बदर की छाया।।
होगया। हसा फूल हँस कर मुरझाया, बास सुबास को त्यागी।।
हँसी ठठोल का समय नहीं है, हो गुरु पद अनुरागी।।
होगया कोयल कूक सुनाकर चुप हुई, मौन अवस्थाधारी।।
बाद विवाद से मन को रोकले, शान्ती का अधिकारी होगया
सुमिरि सुमिर भज नाम गुरु का, नाम सन्त मन सारा।।
राधास्वामी की दाया से, जा भव जल पारा।।
होगया
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Song 258 — Hindi
गुरु पद सरोज में नमस्कार।।टेका।।
नमस्कार जी नमस्कार, गुरुपद सरोज में नमस्कार।।
भव भय भंजन कष्ट निकंदन, खंजन सकल मोह माया।।
शांती चैन सुख सहज में व्यापा, जो कोई छांह में आया
नमस्कार हरि इच्छा साया में फंस गये, भरमें अज्ञान के फन्दे।।
गुरु की कृपा से बंधन काटे, भक्ति प्रेम के धंदे नमस्कार जब
लग मन मत की सूझी, स्वारथ सूझ सुझाई।।
अब गुरु मत गुरुदेव का सेवक, परमारथ लव लाई
नमस्कार कठिन सुगम भया बूद सिंध बना, भव भय आप ही नासा।।
चिन्ता गई चाह उड़ भागी, मिटी त्रिलोकी असा।।
नमस्कार सहसकमल त्रिकुटी सुन्न महासुन्न, भंवर गुफा सत धाम।।।
। अलख अगम के पार दुर है, राधास्वामी पद निर्वाना।।
नमस्कार
नमस्कार जी नमस्कार, गुरुपद सरोज में नमस्कार।।
भव भय भंजन कष्ट निकंदन, खंजन सकल मोह माया।।
शांती चैन सुख सहज में व्यापा, जो कोई छांह में आया
नमस्कार हरि इच्छा साया में फंस गये, भरमें अज्ञान के फन्दे।।
गुरु की कृपा से बंधन काटे, भक्ति प्रेम के धंदे नमस्कार जब
लग मन मत की सूझी, स्वारथ सूझ सुझाई।।
अब गुरु मत गुरुदेव का सेवक, परमारथ लव लाई
नमस्कार कठिन सुगम भया बूद सिंध बना, भव भय आप ही नासा।।
चिन्ता गई चाह उड़ भागी, मिटी त्रिलोकी असा।।
नमस्कार सहसकमल त्रिकुटी सुन्न महासुन्न, भंवर गुफा सत धाम।।।
। अलख अगम के पार दुर है, राधास्वामी पद निर्वाना।।
नमस्कार
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Song 259 — Hindi
भज भज ले राधास्वामी नाम सदा।।
टेका। नाम की महिमा सन्तु बखाने, नाम संग लव लायें।।
विषय वासना स्वाद त्यागकर, नाम राग धुन गावं।।
नाम सदा सदना तरगया मीरा तरगई, तरगई गणिका गायन।।
जनम का पापी तर अजामिल, सोधा नाम रसायन।।
नाम सदा नाम प्रताप की महिमा भारी, नाम विपत को टारे।।
गो खुर जग का सिंध लॅघावे, जनम के पाप किनारे।।नाम सदा
योग विराग त्याग जप ध्याना, संजम नियम अचारा।।
नाम बिना है सब ही निष्फल, करले आप विचारा।।
नाम सदा अट सिद्धि नौ निधि की खानी, भक्ति मुक्ति सुखदाई।।
राधास्वामी नाम जो हित से लेवे, लहे धन धाम बड़ाई।।नाम सदा
टेका। नाम की महिमा सन्तु बखाने, नाम संग लव लायें।।
विषय वासना स्वाद त्यागकर, नाम राग धुन गावं।।
नाम सदा सदना तरगया मीरा तरगई, तरगई गणिका गायन।।
जनम का पापी तर अजामिल, सोधा नाम रसायन।।
नाम सदा नाम प्रताप की महिमा भारी, नाम विपत को टारे।।
गो खुर जग का सिंध लॅघावे, जनम के पाप किनारे।।नाम सदा
योग विराग त्याग जप ध्याना, संजम नियम अचारा।।
नाम बिना है सब ही निष्फल, करले आप विचारा।।
नाम सदा अट सिद्धि नौ निधि की खानी, भक्ति मुक्ति सुखदाई।।
राधास्वामी नाम जो हित से लेवे, लहे धन धाम बड़ाई।।नाम सदा
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Song 260 — Hindi
आई शाम भज गुरु का नाम।।
दिन तो बीता जग व्यौहारा, समय नींद का आया।।
सोने से पहले नाम को भजले, मोह मान तज माया।।
गुरु का नाम सोना मौत निशानी समझो, छोटी मौत अवस्था।।
मौत से पहले चेत नाम लो; सोधो अपनी व्यवस्था।।
गुरु का नाम सिमिट सिमिट जल भरे तलावा, तसे ही नाम सुमिरना।।
मन में शुभ गुन रस रस भरना, फिर आनन्द से भरना।।
गुरु का नाम जनम मरन छिन छिन है प्रानी, छिन छिन योनी बासा।।
जो कोई सुमिरे नाम गुरु का, पड़े न यम की फाँसा।।
गुरु का नाम नाम हैं मंगल सुख की खानी, नाम मुक्ति का दाता।।
जो कोई पीवे नाम सुधारस, रहे नाम मद माता।।
गुरु का नाम राधास्वामी गुरु ने विधि बताई, अन्तर बिरती जमाओ।।
सुरत शब्द की करो कमाई, नाम राग धुन गाओ।।
गुरु का नाम
दिन तो बीता जग व्यौहारा, समय नींद का आया।।
सोने से पहले नाम को भजले, मोह मान तज माया।।
गुरु का नाम सोना मौत निशानी समझो, छोटी मौत अवस्था।।
मौत से पहले चेत नाम लो; सोधो अपनी व्यवस्था।।
गुरु का नाम सिमिट सिमिट जल भरे तलावा, तसे ही नाम सुमिरना।।
मन में शुभ गुन रस रस भरना, फिर आनन्द से भरना।।
गुरु का नाम जनम मरन छिन छिन है प्रानी, छिन छिन योनी बासा।।
जो कोई सुमिरे नाम गुरु का, पड़े न यम की फाँसा।।
गुरु का नाम नाम हैं मंगल सुख की खानी, नाम मुक्ति का दाता।।
जो कोई पीवे नाम सुधारस, रहे नाम मद माता।।
गुरु का नाम राधास्वामी गुरु ने विधि बताई, अन्तर बिरती जमाओ।।
सुरत शब्द की करो कमाई, नाम राग धुन गाओ।।
गुरु का नाम
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Song 261 — Hindi
नाम सुभिर मन चतुर सुजान।।
। नाम की है नाम ज्ञान है, नाम भक्ति और युक्ति।।
नाम जपे सो सहज ही पावे, जनम मरन से मुक्ति।।
चतुर तू तो पड़ा भरम के पाले, सुमिरन सार न जाने।।
नाम योग जग जतन सुगम है, सुभिर देख मन माने।।
चतुर नाम बिना निष्फल सब करनी, जप तप सोच बिचारा।।
नाम जहाज चढे जो कोई, पच जाय भव पारा।।
गुरु का बल ले नाम सुभिर नित, सतसंगत आधारा।।
आप ही छूट जाय मेरे भाई, दुखदाई संसारा।।
चतुर धर विश्वास रात दिन प्यारे, करले नाम कमाई।।
अपनी आंख से आप परखले, राधास्वामी नाम बड़ाई।। चतुर
। नाम की है नाम ज्ञान है, नाम भक्ति और युक्ति।।
नाम जपे सो सहज ही पावे, जनम मरन से मुक्ति।।
चतुर तू तो पड़ा भरम के पाले, सुमिरन सार न जाने।।
नाम योग जग जतन सुगम है, सुभिर देख मन माने।।
चतुर नाम बिना निष्फल सब करनी, जप तप सोच बिचारा।।
नाम जहाज चढे जो कोई, पच जाय भव पारा।।
गुरु का बल ले नाम सुभिर नित, सतसंगत आधारा।।
आप ही छूट जाय मेरे भाई, दुखदाई संसारा।।
चतुर धर विश्वास रात दिन प्यारे, करले नाम कमाई।।
अपनी आंख से आप परखले, राधास्वामी नाम बड़ाई।। चतुर
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Song 262 — Hindi
गुरु नाम का ले आधार सखी॥टेक॥
सांस सांस पर नाम सुमिरना, नाम का तार न टूटे।
जो कोई इस विधि नाम को सुमिरे, सुख मृत्ति जग लूटे
आधार राजा रानी रंक भिखारी, बड़ा जो नाम को सुमिरे।।
उसे बड़ा तुम सबसे जानो, नाम न कबहूँ बिसरे।।
धार दुख नहीं व्याये बियत न आवे, नाम महा सुखदाई।।
नाम की महिमा सन्त बखाने, नाम से सबकी भलाई।।
आधार फेक के माला हाथ की सजनी, मन की सुमरनी लेना।।
। बिना जीभ और हॉट के सुमिरन, नाम को निज चित देना।।
आधार मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, घट की गुफा में पैठो।।
राधास्वामी नाम का छिन छिन सुमिरन,सुख आसन से बैठो।।
आधार
सांस सांस पर नाम सुमिरना, नाम का तार न टूटे।
जो कोई इस विधि नाम को सुमिरे, सुख मृत्ति जग लूटे
आधार राजा रानी रंक भिखारी, बड़ा जो नाम को सुमिरे।।
उसे बड़ा तुम सबसे जानो, नाम न कबहूँ बिसरे।।
धार दुख नहीं व्याये बियत न आवे, नाम महा सुखदाई।।
नाम की महिमा सन्त बखाने, नाम से सबकी भलाई।।
आधार फेक के माला हाथ की सजनी, मन की सुमरनी लेना।।
। बिना जीभ और हॉट के सुमिरन, नाम को निज चित देना।।
आधार मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, घट की गुफा में पैठो।।
राधास्वामी नाम का छिन छिन सुमिरन,सुख आसन से बैठो।।
आधार
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Song 263 — Hindi
जग लीला परख चित चेत गया।
चेत गया चित चेत गया, जग लीला परख चित चेत गया।।
रेशम का कीड़ा अज्ञानी, मोह नींद में सोया।।
अपने बंधन मुआ आप फस, विरथा जीवन खोया।।
चेत गया मछली जीभ स्वाद रस भूखी, चारा देख के भूली।।
कटिया के कांटे उरझानी, मृत्यु हिंडोले झूली।।
चेत गया भवरा फल बास का लोभी, कमल पत्र लपटाना।।
सारी रात बन्ध में काटी, रोना और पछताना।।
चेत गया सुन्दर रूप देख क्यों मोहे, बुद्धि विवेक न खोना।।
दीपक जोत पतिंगा जलता, अन्त पीट सिर रोना।।
चेत गया हाथी ने हथनी जब देखी, सेंड से सेंड मिलाया।।
गिरा शिकारी के गड्ढे में, बेड़ी पांव बंधाया।।
चेत गया माखी गिरी शहद की थाली, पंख गये लपटाई।।
लालच बुरी बला है भाई, सिर धुन जान गंवाई।।
चेत गया हिरन बीन के शब्द का प्रेमी, बीन के राग लुभाया।।
मतवाला हो सन्मुख आया, अपना सीसे कटाया।।
चेत गया चित ने परखी विषय की लीला, मन में उदासी छाई।।
राधास्वामी की संगत कर, ली गुरु पद शरनाई।।
चेत गया
चेत गया चित चेत गया, जग लीला परख चित चेत गया।।
रेशम का कीड़ा अज्ञानी, मोह नींद में सोया।।
अपने बंधन मुआ आप फस, विरथा जीवन खोया।।
चेत गया मछली जीभ स्वाद रस भूखी, चारा देख के भूली।।
कटिया के कांटे उरझानी, मृत्यु हिंडोले झूली।।
चेत गया भवरा फल बास का लोभी, कमल पत्र लपटाना।।
सारी रात बन्ध में काटी, रोना और पछताना।।
चेत गया सुन्दर रूप देख क्यों मोहे, बुद्धि विवेक न खोना।।
दीपक जोत पतिंगा जलता, अन्त पीट सिर रोना।।
चेत गया हाथी ने हथनी जब देखी, सेंड से सेंड मिलाया।।
गिरा शिकारी के गड्ढे में, बेड़ी पांव बंधाया।।
चेत गया माखी गिरी शहद की थाली, पंख गये लपटाई।।
लालच बुरी बला है भाई, सिर धुन जान गंवाई।।
चेत गया हिरन बीन के शब्द का प्रेमी, बीन के राग लुभाया।।
मतवाला हो सन्मुख आया, अपना सीसे कटाया।।
चेत गया चित ने परखी विषय की लीला, मन में उदासी छाई।।
राधास्वामी की संगत कर, ली गुरु पद शरनाई।।
चेत गया
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Song 264 — Hindi
गुरु दाता के नाम से लव लागी।।
नाम रतन घट खान में पाया, खोदा ज्ञान कुदाली।।
जगमग जोत सात घट निकला, मन में हुई निहाली लव
लागी नाम न भूलें तन मन भूलू, भूलू जग व्यौहारा।।
अब परमारथ धन को पाया, सार सार का सारा।।
लव लागी मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, चंचल मन थिर कीना।
जब मैं थिरता ऐसी पाई, नाम रतन धन चीन्हा।।
लव लागी काट की माला कर से डारी, मन माला जब भाया।।
उई बैठे खड़े उताने, रहा नाम घट छाया।।
लव लागी आंख कान मुख बंद लगाया, सुन्न समाध रचाई।।
राधास्वामी नाम की धुन सुन पाई, अब मेरी बन आई लव लागी
नाम रतन घट खान में पाया, खोदा ज्ञान कुदाली।।
जगमग जोत सात घट निकला, मन में हुई निहाली लव
लागी नाम न भूलें तन मन भूलू, भूलू जग व्यौहारा।।
अब परमारथ धन को पाया, सार सार का सारा।।
लव लागी मन थिर तन थिर सुरत निरत थिर, चंचल मन थिर कीना।
जब मैं थिरता ऐसी पाई, नाम रतन धन चीन्हा।।
लव लागी काट की माला कर से डारी, मन माला जब भाया।।
उई बैठे खड़े उताने, रहा नाम घट छाया।।
लव लागी आंख कान मुख बंद लगाया, सुन्न समाध रचाई।।
राधास्वामी नाम की धुन सुन पाई, अब मेरी बन आई लव लागी
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Song 265 — Hindi
अब सतधाम की बासी बनी।।
। अवट नाम जब घट में प्रगटा, मन की दुर्मति भागी।।
भूली सन की सुध बुध सारी, हुई नाम अनुरागी।।
बासी बनी मुख से नाम कान धुन व्यापी, आंख में नाम की जोती।।
चित ने सीप का रूप धारकर, गहलिया नाम का मोतः।।बासी बनी
पपिहा पी पी शोर मचावे, गगन घटा हिंग उड़कर।।
मैं निज घट में नाम को सुमिरू, सुन्नमंडल घट जुड़कर।।
बासी बनी नाम के पर जब भुजा में बांधे, उड़ी मेरु कैलासा।।
सहसकमल त्रिकुटी सुन्न चढ़गई, सतपद लहा हुलासा।।
बासी बनी पीछे छोड़ी भवर की घाटी, अलख अगम गति परखी।।
राधास्वामी चरनकमल जब बासा,भक्ति पाय अति हरखी।।बासी बनी
। अवट नाम जब घट में प्रगटा, मन की दुर्मति भागी।।
भूली सन की सुध बुध सारी, हुई नाम अनुरागी।।
बासी बनी मुख से नाम कान धुन व्यापी, आंख में नाम की जोती।।
चित ने सीप का रूप धारकर, गहलिया नाम का मोतः।।बासी बनी
पपिहा पी पी शोर मचावे, गगन घटा हिंग उड़कर।।
मैं निज घट में नाम को सुमिरू, सुन्नमंडल घट जुड़कर।।
बासी बनी नाम के पर जब भुजा में बांधे, उड़ी मेरु कैलासा।।
सहसकमल त्रिकुटी सुन्न चढ़गई, सतपद लहा हुलासा।।
बासी बनी पीछे छोड़ी भवर की घाटी, अलख अगम गति परखी।।
राधास्वामी चरनकमल जब बासा,भक्ति पाय अति हरखी।।बासी बनी
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Song 266 — Hindi
जिन नाम लिया तन काम किया।।
राना रानी दाता दानी, मान प्रतिष्ठा भागी।।
यह सब बड़े हैं इनसे बड़े हैं, नाम राग अनुरागी।।॥
नाम से नाम होत है सबका, नाम की महिमा भारी।।
मीरा सहजो दया को देखो, नाम से जगते उजारी।।॥
नाम सकल दुख आपत नासे, दुख में नाम जो लेवे।।
दुख दरिद्र कभी निकट न आवे, सुख से नाम चित देवे।।॥
जप तप योग पाठ और पूजा, नाम संग सब रहते।।
नियम धरम हैं नाम अधीना, साध सन्त यू कहते।।॥
मन से समझ नाम चित लाओ, नाम कभी न भुलाना।।
राधास्वामी मत में आकर, राधास्वामी जप जपवाना।।॥
राना रानी दाता दानी, मान प्रतिष्ठा भागी।।
यह सब बड़े हैं इनसे बड़े हैं, नाम राग अनुरागी।।॥
नाम से नाम होत है सबका, नाम की महिमा भारी।।
मीरा सहजो दया को देखो, नाम से जगते उजारी।।॥
नाम सकल दुख आपत नासे, दुख में नाम जो लेवे।।
दुख दरिद्र कभी निकट न आवे, सुख से नाम चित देवे।।॥
जप तप योग पाठ और पूजा, नाम संग सब रहते।।
नियम धरम हैं नाम अधीना, साध सन्त यू कहते।।॥
मन से समझ नाम चित लाओ, नाम कभी न भुलाना।।
राधास्वामी मत में आकर, राधास्वामी जप जपवाना।।॥
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Song 267 — Hindi
दुविधा दुचिताई भाग गई।।
टेक। आँख कान जिभ्या को रोंधा, अन्तर किया निवासा।।
अन्तरमुखी सुरत हुई मेरी, प्रगटा हर्ष हुलासा।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, सम की अवस्था जागी।।
सम को धार समाधी पाई, गुरु गम की अनुरागी।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, प्रगटी अनहद बानी।।
बानी सोई सुख खानी ठहरी, आनन्द मंगल दानी।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, जीत सार लख पाया।।
जोत में जोत की लीला अद्भुत, लख लख हर्षाया।।।।
आँख कान जिभ्या को रोंधा, गुरु पद ध्यान लगाया।।
राधास्वामी की भई दाया, हटी जगत की माया।।॥
टेक। आँख कान जिभ्या को रोंधा, अन्तर किया निवासा।।
अन्तरमुखी सुरत हुई मेरी, प्रगटा हर्ष हुलासा।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, सम की अवस्था जागी।।
सम को धार समाधी पाई, गुरु गम की अनुरागी।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, प्रगटी अनहद बानी।।
बानी सोई सुख खानी ठहरी, आनन्द मंगल दानी।।॥
आँख कान जिभ्या को रोंधा, जीत सार लख पाया।।
जोत में जोत की लीला अद्भुत, लख लख हर्षाया।।।।
आँख कान जिभ्या को रोंधा, गुरु पद ध्यान लगाया।।
राधास्वामी की भई दाया, हटी जगत की माया।।॥
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Song 268 — Hindi
गुरु दाता की दया पर बलि जाऊँ।।
टेक। अंग लगाया दास बनाया, दिया चरन का सहारा।।
बानी सुनायो मन को चिताया, अधर्म पतित को तारा।।बलि
काल जाल माया के फन्दे, उलझा उलझ के हारा।।
प्रेम चरन का देकर मुझको, बन्ध काट दिया सारा।।
बलि चरन न भूलें भूलू तन मन, और सकल बिसराऊँ।
व्यापे नाम चोटी से एड़ी, नाम का जीवन पाऊँ।।
बलि दुविधा में फंस उमर गंवाई, समझ न अपनी आई।।
अपने रूप का ज्ञान मिली अब, सतगुरु की प्रभुताई।।
बलि राधास्वामी दीन दयाला, दीनानाथ कृपाला।।
चरन कमल की छांह में लेकर, कर दिया मुझे निहाला।।बलि
टेक। अंग लगाया दास बनाया, दिया चरन का सहारा।।
बानी सुनायो मन को चिताया, अधर्म पतित को तारा।।बलि
काल जाल माया के फन्दे, उलझा उलझ के हारा।।
प्रेम चरन का देकर मुझको, बन्ध काट दिया सारा।।
बलि चरन न भूलें भूलू तन मन, और सकल बिसराऊँ।
व्यापे नाम चोटी से एड़ी, नाम का जीवन पाऊँ।।
बलि दुविधा में फंस उमर गंवाई, समझ न अपनी आई।।
अपने रूप का ज्ञान मिली अब, सतगुरु की प्रभुताई।।
बलि राधास्वामी दीन दयाला, दीनानाथ कृपाला।।
चरन कमल की छांह में लेकर, कर दिया मुझे निहाला।।बलि
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Song 269 — Hindi
लीला बरनी बरन न जाय॥टेक॥
पिंगला चढ़ा सुमेर की चोटी, लम्बे डग नित भरते।।
बिना हाथ तोले आकासा, सब लख अचरज करते।।बरन न
गू गा बिन जिभ्या बिन बानी, पिंगल शास्त्र सुनावे।।
सुनने वाला अर्थ न समझे, दया लाग अर्थावे।।
बरन न लूला काम करे सब अपने, हाथ नहीं कोई रखता।।
। दोनों आंखों का जो अन्धा, धरन अकास को लखता।।
बरन न लगी समुद्र में आग निराली, मछली गांछ में बैठी।।
जल को त्याग गगन उड़ जाई, गगन मंडल में पैठी।।
चींटी के पेट से हाथी निकला, सिंह बाघ सब खाये।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिन यह दृश्य दिखाये।।बरन न
पिंगला चढ़ा सुमेर की चोटी, लम्बे डग नित भरते।।
बिना हाथ तोले आकासा, सब लख अचरज करते।।बरन न
गू गा बिन जिभ्या बिन बानी, पिंगल शास्त्र सुनावे।।
सुनने वाला अर्थ न समझे, दया लाग अर्थावे।।
बरन न लूला काम करे सब अपने, हाथ नहीं कोई रखता।।
। दोनों आंखों का जो अन्धा, धरन अकास को लखता।।
बरन न लगी समुद्र में आग निराली, मछली गांछ में बैठी।।
जल को त्याग गगन उड़ जाई, गगन मंडल में पैठी।।
चींटी के पेट से हाथी निकला, सिंह बाघ सब खाये।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिन यह दृश्य दिखाये।।बरन न
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Song 270 — Hindi
नाम सुमिरि भव तरना है, हाँ।।टेका।।
नर देही भव सागर तरनी, दया से हाथ में आई।।
जो कोई इसका सार न जाना, बिरथा जनम गंवाई।।
तरना नाव पड़ी मंझधार में तेरी, खेवट सतगुरु पूरा।।
नाम सुमिर जा मच जल पारा, जो माया रन स्वरा।।
तरना नाम मंत्र से बस में आवे, काल काला नागा।।
नाम पाये जो नाम न सुभिरे, विष से मरे अभागा।।
तरना एक नाव से सवही मिलते, नौ निधि सिद्धि शक्ति।
जीतेजी नर पावे मुक्ति, करे जो नाम की भक्ति।।
तरना राधास्वामी नाम सार है, सार सार का सारा।।
जो सुमिरे यह नाम निरंतर, सहज जाये भव पारा।।तरना
नर देही भव सागर तरनी, दया से हाथ में आई।।
जो कोई इसका सार न जाना, बिरथा जनम गंवाई।।
तरना नाव पड़ी मंझधार में तेरी, खेवट सतगुरु पूरा।।
नाम सुमिर जा मच जल पारा, जो माया रन स्वरा।।
तरना नाम मंत्र से बस में आवे, काल काला नागा।।
नाम पाये जो नाम न सुभिरे, विष से मरे अभागा।।
तरना एक नाव से सवही मिलते, नौ निधि सिद्धि शक्ति।
जीतेजी नर पावे मुक्ति, करे जो नाम की भक्ति।।
तरना राधास्वामी नाम सार है, सार सार का सारा।।
जो सुमिरे यह नाम निरंतर, सहज जाये भव पारा।।तरना
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Song 271 — Hindi
सन्त मत मारग झीना है, हाँ।।
त्याग स्थूल सूक्ष्म गति निरखे, फिर कारन की बारी।।
कारन तज महा कारन धावे, तब समझो अधिकारी।।
झीन है। धरम करम व्यौहार न छोड़े, दूदे सार न इनमें।।
सुरत शब्द में सार छुपा है, करे प्राप्त सो तिन में।।
झीना है। संजम नियम जप तप कर्मा, नहीं किंचित कठिनाई।।
सहज योग की सहज रीति है, सहज ही सहज भलाई।।
झीना है। सतगुरु सुत्त नाम सतसंगत, समझ सहज में धारे।।
फिर अन्तर में करे चढ़ाई, जड़ चेतन निरवारे।।झीना है।
राधास्वामी ने भेद बताया, सुरत शब्द मत गया सुरत
शब्द मत सब का टीका, सुरत में शब्द को पाया।।
झीना है
त्याग स्थूल सूक्ष्म गति निरखे, फिर कारन की बारी।।
कारन तज महा कारन धावे, तब समझो अधिकारी।।
झीन है। धरम करम व्यौहार न छोड़े, दूदे सार न इनमें।।
सुरत शब्द में सार छुपा है, करे प्राप्त सो तिन में।।
झीना है। संजम नियम जप तप कर्मा, नहीं किंचित कठिनाई।।
सहज योग की सहज रीति है, सहज ही सहज भलाई।।
झीना है। सतगुरु सुत्त नाम सतसंगत, समझ सहज में धारे।।
फिर अन्तर में करे चढ़ाई, जड़ चेतन निरवारे।।झीना है।
राधास्वामी ने भेद बताया, सुरत शब्द मत गया सुरत
शब्द मत सब का टीका, सुरत में शब्द को पाया।।
झीना है
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Song 272 — Hindi
सहज योग विधि उलटी है, हाँ।।
टेका। जग के धरम करम व्यौहारा, सो मारग प्रवृति।।
सहज जोग साधन से प्यारे, सहज में नित्य निवृति।।
उलटी है। पृथवी छोड़ गगन को धावे, बेधे जाय ब्रह्म डा।।
लख विराट अव्याकृत अन्तर, हिरण्य गर्भ प्रचन्डा।।
उलटी है। माया सकल ब्रह्म के ऊपर, परब्रह्म दरबारा।।
इनके आगे चढ़े जो साधक, निरखे सत्य पसारा।।
उलटी है। उलटे नाम का सहज में सुमिरन, मुख में बन्द लगाना।।
आँख कान खुलने नहिं पावे, सुन अनहद धुन काना।।
उलटी है। तन थिर मन थिर सुरत निरत थिर, करे जो सूझे युक्ति।
युक्ति पाये सुरत शब्द साधे, सहज मिले पद मुक्ति।।
उलटी है। अलख अगम की गति लख पावे, अन्तर रूप प्रकाशा।।
राधास्वामी चरन कमल में, पावे अन्त निवासी।।
उलटी है। सहज योग की सहज कमाई, सहज सहज चितलाना।।
राधास्वामी की किरपा से, सहज में धुर निवणा।।उलटी है।
टेका। जग के धरम करम व्यौहारा, सो मारग प्रवृति।।
सहज जोग साधन से प्यारे, सहज में नित्य निवृति।।
उलटी है। पृथवी छोड़ गगन को धावे, बेधे जाय ब्रह्म डा।।
लख विराट अव्याकृत अन्तर, हिरण्य गर्भ प्रचन्डा।।
उलटी है। माया सकल ब्रह्म के ऊपर, परब्रह्म दरबारा।।
इनके आगे चढ़े जो साधक, निरखे सत्य पसारा।।
उलटी है। उलटे नाम का सहज में सुमिरन, मुख में बन्द लगाना।।
आँख कान खुलने नहिं पावे, सुन अनहद धुन काना।।
उलटी है। तन थिर मन थिर सुरत निरत थिर, करे जो सूझे युक्ति।
युक्ति पाये सुरत शब्द साधे, सहज मिले पद मुक्ति।।
उलटी है। अलख अगम की गति लख पावे, अन्तर रूप प्रकाशा।।
राधास्वामी चरन कमल में, पावे अन्त निवासी।।
उलटी है। सहज योग की सहज कमाई, सहज सहज चितलाना।।
राधास्वामी की किरपा से, सहज में धुर निवणा।।उलटी है।
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Song 273 — Hindi
गुरुदाता की दया पर बलिहारी।।
टेक। मैं तो कामी क्रोधी लम्पट, रोम रोम बना हंकारी।।
हाथ दया का सिर पर फेरा, मेरी करली रखवारी।।
बलिहारी कपट न देखा छल नहीं देखा, नहीं निरखी गति संसारी।।
अपनी कृपा की ओर दृश्टि कर, कोटा मेरा संकट भारी।।
बलिहारी। मानुष देह का सार न जाना, जनम जुवा में गया हारी।।
गुरु ने बाँह गही मेरी आकर, होकर सच्चे हितकारी।।
बलिहारी भक्ति भाव व्यौहार न जाना, नहीं बरता आश्रमचारी।।
त्राह त्राह कर शरन पड़ा जब, दया दृटि मुझ पर डारी।।बलिहारी
टेक। मैं तो कामी क्रोधी लम्पट, रोम रोम बना हंकारी।।
हाथ दया का सिर पर फेरा, मेरी करली रखवारी।।
बलिहारी कपट न देखा छल नहीं देखा, नहीं निरखी गति संसारी।।
अपनी कृपा की ओर दृश्टि कर, कोटा मेरा संकट भारी।।
बलिहारी। मानुष देह का सार न जाना, जनम जुवा में गया हारी।।
गुरु ने बाँह गही मेरी आकर, होकर सच्चे हितकारी।।
बलिहारी भक्ति भाव व्यौहार न जाना, नहीं बरता आश्रमचारी।।
त्राह त्राह कर शरन पड़ा जब, दया दृटि मुझ पर डारी।।बलिहारी
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Song 274 — Hindi
अँखियाँ बिन दरशन तरस रहीं।।
सूखे हॉट आँख पथराई, हूल कलेजे पैठा।।
थर थर काँपे निबल अंग मेरा, मन बैरी बन बैठो।।
तरस दिन को चन रात नहीं निद्रा, व्याकुल चित घबराऊँ।।
जगत अंधेरा सूझे नहीं कुछ, कहां आऊँ कहाँ जाऊँ।।
तरस दाना पानी न मोहि सुहावे, किसी की बात न भावे।।
रोग सोग की समझ कठिन, पता वैद्य नहीं पावे।।
तरस बिरह की आग हिये में भड़की, सुलग रही दिन राती।।
धुवाँ न उठे न ज्वाला फटे, किसे दिखावन जाती।।
तरस मनकी उपजी मन में रहानी, मन कुरेद की खानी।।
। मन ही समझे मन की कहानी, और कोई क्या जानी।।
तरस घट में उठी चाह प्रीतम की, घट में दर्शन माँगू।।
घट की आँख से रूप निहारू, बट चरनन से लागू।।
तरस घट में आओ दरस दिखाओ, घट का मन्दिर सूना।।
घट को बसाओ जोति जलाओ, हो प्रकाश दिन दूना।।
तरस प्रीतम शब्द सुरत चित का अंग, प्रेम बंक की नाली !
सुरत शब्द का मेल मिले जब, सुख से रहूँ निहाली।।
तरस देकर दरस पीर मेरी मेटो, हरो त्रिगुन दुख साला।।
दया करो मैं दयापात्र हैं, राधास्वामी दयाला।।तरस
सूखे हॉट आँख पथराई, हूल कलेजे पैठा।।
थर थर काँपे निबल अंग मेरा, मन बैरी बन बैठो।।
तरस दिन को चन रात नहीं निद्रा, व्याकुल चित घबराऊँ।।
जगत अंधेरा सूझे नहीं कुछ, कहां आऊँ कहाँ जाऊँ।।
तरस दाना पानी न मोहि सुहावे, किसी की बात न भावे।।
रोग सोग की समझ कठिन, पता वैद्य नहीं पावे।।
तरस बिरह की आग हिये में भड़की, सुलग रही दिन राती।।
धुवाँ न उठे न ज्वाला फटे, किसे दिखावन जाती।।
तरस मनकी उपजी मन में रहानी, मन कुरेद की खानी।।
। मन ही समझे मन की कहानी, और कोई क्या जानी।।
तरस घट में उठी चाह प्रीतम की, घट में दर्शन माँगू।।
घट की आँख से रूप निहारू, बट चरनन से लागू।।
तरस घट में आओ दरस दिखाओ, घट का मन्दिर सूना।।
घट को बसाओ जोति जलाओ, हो प्रकाश दिन दूना।।
तरस प्रीतम शब्द सुरत चित का अंग, प्रेम बंक की नाली !
सुरत शब्द का मेल मिले जब, सुख से रहूँ निहाली।।
तरस देकर दरस पीर मेरी मेटो, हरो त्रिगुन दुख साला।।
दया करो मैं दयापात्र हैं, राधास्वामी दयाला।।तरस
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Song 275 — Hindi
घट नाचे सुरतिया उमंग भरी टेका।।
सहज कमलदल ठुमकत आई, दीपक जोत जलाई।।
आरत ठानी थाली सजाई, घंटा शंख बजाई।।
उमंग भरी त्रिकुटी मंडल गुरु अस्थाना, ओंकार धुन गाना।।
थिरक थिरक नाचे मुरत प्यारी, गुरु गम लव हुकान।।उमंग भरी
थाप पखावज सुनकर मोहि, सुन्न की मिली अवस्था।।
सारंग सारंग बजी सारंगी, सहज समाध व्यवस्था।।
उमंग भरी मोर चाल चक्कर जब काटा, भंवर गुफा चढ़ दौड़ी।।
बंसी सुनी सोहंगम् की धुनि, निरखी खिड़की चौड़ी।।
उमंग भरी सुरत ने निरतरूप जब धारा, नाच हुई मस्तानी।।
वही है लीला सत की भाई, सत पद में टैरानी।।
उमंग भरी राग नाच सब कोई जाने, यह है नाच निराला।।
विरला समझे सन्त की बानी, पड़े न यम के पाला।।
उमंग भरी तुरिया तुरियातीत अलख लख, अगम अगोचर आई।।
राधास्वामी धाम में नाच रचाया, धुरपद पदवी पाई।।उमंग भरी
सहज कमलदल ठुमकत आई, दीपक जोत जलाई।।
आरत ठानी थाली सजाई, घंटा शंख बजाई।।
उमंग भरी त्रिकुटी मंडल गुरु अस्थाना, ओंकार धुन गाना।।
थिरक थिरक नाचे मुरत प्यारी, गुरु गम लव हुकान।।उमंग भरी
थाप पखावज सुनकर मोहि, सुन्न की मिली अवस्था।।
सारंग सारंग बजी सारंगी, सहज समाध व्यवस्था।।
उमंग भरी मोर चाल चक्कर जब काटा, भंवर गुफा चढ़ दौड़ी।।
बंसी सुनी सोहंगम् की धुनि, निरखी खिड़की चौड़ी।।
उमंग भरी सुरत ने निरतरूप जब धारा, नाच हुई मस्तानी।।
वही है लीला सत की भाई, सत पद में टैरानी।।
उमंग भरी राग नाच सब कोई जाने, यह है नाच निराला।।
विरला समझे सन्त की बानी, पड़े न यम के पाला।।
उमंग भरी तुरिया तुरियातीत अलख लख, अगम अगोचर आई।।
राधास्वामी धाम में नाच रचाया, धुरपद पदवी पाई।।उमंग भरी
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Song 276 — Hindi
साधू जग है पद अद्वत।।
टेका। जो कुछ देखा एक को देखा, एक एक का लेखा।।
एक बिना कुछ दृष्टि न आया, बहु बिधि किया परेखा।।
पद अद्वत कहने को तो दो हैं आँखें, देखें दोउ मिल एका।।
। दो कानों से सुनें बात एक, सूझे सहज विवेका।।
पद अद्वत एक चन्द्र है एक है सूरज, एक एक सब तारे।।
मंगल बुध वीर शुक्र शनि, देखे न्यारे न्यारे।।
पद अद्वत एक डार के पात फूल सब, एक एक दरसाये।।
जीवजन्तु सुर असुर राक्षस, एक एक कर जाये।।
पद अद्वैत तुम हो एक एक हैं हम भी, एक एक एक पहचानू।।
राधास्वामी पद अद्वैत बखाने, समझ बूझ मन मानू।।
पद अद्वत
टेका। जो कुछ देखा एक को देखा, एक एक का लेखा।।
एक बिना कुछ दृष्टि न आया, बहु बिधि किया परेखा।।
पद अद्वत कहने को तो दो हैं आँखें, देखें दोउ मिल एका।।
। दो कानों से सुनें बात एक, सूझे सहज विवेका।।
पद अद्वत एक चन्द्र है एक है सूरज, एक एक सब तारे।।
मंगल बुध वीर शुक्र शनि, देखे न्यारे न्यारे।।
पद अद्वत एक डार के पात फूल सब, एक एक दरसाये।।
जीवजन्तु सुर असुर राक्षस, एक एक कर जाये।।
पद अद्वैत तुम हो एक एक हैं हम भी, एक एक एक पहचानू।।
राधास्वामी पद अद्वैत बखाने, समझ बूझ मन मानू।।
पद अद्वत
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Song 277 — Hindi
मैं आप आप में खौगया।।
टेक। आप कौन हैं आप कौन हैं, आप आप को जाना।।
आप भूल गया आप में भूला, अपना आपा ठाना।।खोगया
आपा ठान के एक हुआ जब, एक एकाई कहाया।।
एक एकाई दहाई सैकड़ा, लाख हजार बनाया।।
खोगया पदमनील और शंख महाशंख, अनगितनी गिन भूला।।
गिनती गिनी करोर भाँति से, गिनती गिन गिन फूला।।
खोगया भूला भूला भूल में अटका, भूल भुलैय्याँ भूला।।
भूला भूल कर भूल भूल से, भूल भुलैय्याँ झूला।।
खोगया धन दौलत के पड़ा फेर में लगा हिसाब बनाने।।
बेटे पोते और परपोते, उपजाये मन माने।।
खोगया ज्ञान ध्यान की रीति चलाई, खटपट के पट दरशन।।
रोया हँसा बिचारा सोचा, लख सुन्दरि बिच दरपन।।
खोगया जोग जुगत की ओर झुका फिर, सिद्धि शक्ति भरमाई।।
आपा आप में आपको भूला, आपकी सुध नहीं पाई।।
खोगया पूरब दौड़ा पच्छम दौड़ा, तीरथ बरत बहाना।।
आपा अपना हाथ न आया, ऐसा बना सियाना।।
खोगया राधास्वामी सतगुरु प्रगटे, घट की राह दिखाई।।
खोया आपा आप मिला अब, आप आप में पाई।।खोगया
टेक। आप कौन हैं आप कौन हैं, आप आप को जाना।।
आप भूल गया आप में भूला, अपना आपा ठाना।।खोगया
आपा ठान के एक हुआ जब, एक एकाई कहाया।।
एक एकाई दहाई सैकड़ा, लाख हजार बनाया।।
खोगया पदमनील और शंख महाशंख, अनगितनी गिन भूला।।
गिनती गिनी करोर भाँति से, गिनती गिन गिन फूला।।
खोगया भूला भूला भूल में अटका, भूल भुलैय्याँ भूला।।
भूला भूल कर भूल भूल से, भूल भुलैय्याँ झूला।।
खोगया धन दौलत के पड़ा फेर में लगा हिसाब बनाने।।
बेटे पोते और परपोते, उपजाये मन माने।।
खोगया ज्ञान ध्यान की रीति चलाई, खटपट के पट दरशन।।
रोया हँसा बिचारा सोचा, लख सुन्दरि बिच दरपन।।
खोगया जोग जुगत की ओर झुका फिर, सिद्धि शक्ति भरमाई।।
आपा आप में आपको भूला, आपकी सुध नहीं पाई।।
खोगया पूरब दौड़ा पच्छम दौड़ा, तीरथ बरत बहाना।।
आपा अपना हाथ न आया, ऐसा बना सियाना।।
खोगया राधास्वामी सतगुरु प्रगटे, घट की राह दिखाई।।
खोया आपा आप मिला अब, आप आप में पाई।।खोगया
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Song 278 — Hindi
नित जाग जाग कर सोगया।।
टेक। मैं हूँ कौन रूप मेरा कैसा, नाम रूप नहीं जानू।।
जोती प्रगटी घट में मेरे, जोत निरख सुख मानू।।
सोगया जोत निरख सुख पाकर कुछ दिन, थका तो आलस आई।।
नींद की इच्छा हुई तो मैंने, दिन को रात बनाई।।
सोगया सोया सोकर फिर उठ बैठा, सूरज के प्रकाशा।।
यह सूरज मेरे घट से निकला, जोत में किया विलासा।।सोगया
आलस निद्रा जोत से आई, आलस पाँव पसारा।।
फिर सोया सो सोकर जागा, लखे चन्द्र और तारा।।
सोगया तारे सूरज चांद वस्तु क्या, मेरे घट की जोती।।
आंख बिना कहो सूरज कैसा, जोत में जोत की सोती।।
सोगया सूरज चांद सितारे भाई, तेरी आंख की झांई।।
दो आंखों में सुर चन्द्र हैं, आंखों की परछाई।।
सोगया खुली आंख परछाई दरसे, बंद आंख क्या देखे।।
सोच समझ क्या पड़ा भरम में, भरम विकार के लेखे।।
सोगया जाग जाग उठ जाग जाग तू , जाग मेरा कर संगा।।
लिस नींद जाये छिन पल में, न्हाये जो मानस गंगा।।
सोगया सोकर खो बैठा निज आपा, मैं आया हूँ जगाने।।
राधास्वामी की दया से, जाग के लगजा ठिकाने।। सोगया
टेक। मैं हूँ कौन रूप मेरा कैसा, नाम रूप नहीं जानू।।
जोती प्रगटी घट में मेरे, जोत निरख सुख मानू।।
सोगया जोत निरख सुख पाकर कुछ दिन, थका तो आलस आई।।
नींद की इच्छा हुई तो मैंने, दिन को रात बनाई।।
सोगया सोया सोकर फिर उठ बैठा, सूरज के प्रकाशा।।
यह सूरज मेरे घट से निकला, जोत में किया विलासा।।सोगया
आलस निद्रा जोत से आई, आलस पाँव पसारा।।
फिर सोया सो सोकर जागा, लखे चन्द्र और तारा।।
सोगया तारे सूरज चांद वस्तु क्या, मेरे घट की जोती।।
आंख बिना कहो सूरज कैसा, जोत में जोत की सोती।।
सोगया सूरज चांद सितारे भाई, तेरी आंख की झांई।।
दो आंखों में सुर चन्द्र हैं, आंखों की परछाई।।
सोगया खुली आंख परछाई दरसे, बंद आंख क्या देखे।।
सोच समझ क्या पड़ा भरम में, भरम विकार के लेखे।।
सोगया जाग जाग उठ जाग जाग तू , जाग मेरा कर संगा।।
लिस नींद जाये छिन पल में, न्हाये जो मानस गंगा।।
सोगया सोकर खो बैठा निज आपा, मैं आया हूँ जगाने।।
राधास्वामी की दया से, जाग के लगजा ठिकाने।। सोगया
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Song 279 — Hindi
आजा शरन बचा लू गा॥टेक॥
तू है मेरा मैं हूँ तेरा, तन मन धन से प्यारा।।
तू आंखों का तारा मेरा, मैं तेरा रखवारा।।
बचा लू गा जुज कुल का है कुल जुज का है, धर मन में परतीती।।
जब जुज है तब कुल से प्यार कर, सीख शब्दमत रीती।।
बचा लूगा स्वारथ बस नहीं बना हूँ तेरा, नहीं स्वारथ मन मेरे।।
परमारथी परम उपकारी, क्या आया चित् तेरे।।
बचा लूगा तन के बन्धन मन के बन्धन, धन के बन्ध बंधाना।।
बन्ध बन्ध में बन्ध बन्ध में, बन्ध बन्ध उरझाना।।
बचा लू गा जब कोई नहीं तेरा सहाई, मैं ही रहा सहाई।।
अब भी सदा सहाई तेरा, तज दुर्मति दुचिताई।।
बचा लू गा उलटी समझ तेरे मन भाई, मन से मुझे भुलाया।।
भूला भंटका देख के अब मैं, तुझे बचाने आया।।
बचा लू गा राधास्वामी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।
परम सनेही परम हितैषी, ले उनकी शरनाई।।
बचा लू गा
तू है मेरा मैं हूँ तेरा, तन मन धन से प्यारा।।
तू आंखों का तारा मेरा, मैं तेरा रखवारा।।
बचा लू गा जुज कुल का है कुल जुज का है, धर मन में परतीती।।
जब जुज है तब कुल से प्यार कर, सीख शब्दमत रीती।।
बचा लूगा स्वारथ बस नहीं बना हूँ तेरा, नहीं स्वारथ मन मेरे।।
परमारथी परम उपकारी, क्या आया चित् तेरे।।
बचा लूगा तन के बन्धन मन के बन्धन, धन के बन्ध बंधाना।।
बन्ध बन्ध में बन्ध बन्ध में, बन्ध बन्ध उरझाना।।
बचा लू गा जब कोई नहीं तेरा सहाई, मैं ही रहा सहाई।।
अब भी सदा सहाई तेरा, तज दुर्मति दुचिताई।।
बचा लू गा उलटी समझ तेरे मन भाई, मन से मुझे भुलाया।।
भूला भंटका देख के अब मैं, तुझे बचाने आया।।
बचा लू गा राधास्वामी दीन दयाला, दीन अधीन सहाई।।
परम सनेही परम हितैषी, ले उनकी शरनाई।।
बचा लू गा
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Song 280 — Hindi
तू सोया सो सो खोगया।।
बंजारों के संग में आया, धन दौलत ले हाथा।।
बनिज और व्यौहार की चिंता, भूल के छोड़ा साथा।।
खोगया साथ छोड़कर हुआ आलसी, पांव पसार के सोया।।
क्या तुझको यह समझ नहीं थी, जो सोया सो खोया।।
खोगया तेरे ताक में लगे चोर हैं, ठग डाकू बटमारे।।
जाग जाग उठ जाग भाग अब, सो नहिं पांव पसारे।।
खोगया कोई राजा बन लूटे तुझको, कोई नवाब दरबारी।।
मूरख चेत चेत के अवसर, पू जी बचाले सारी।।
खोगया किस सुख नींद में सोया प्रानी, यह सुख दुख का रूपा।।
दुख है मान बड़ाई प्रतिष्ठा, दुख प्रजा दुख भूपा।।खोगया
अपने आये में तू कहां है, यम के हाथ बिकाना।।
तन मन धन तेरा नहीं अपना, मन बच कर्म बेगाना।।
खोगया तेरा समय नहीं है तेरा, तेरा कथन न तेरा।
सोना खाना उठना बैठना, चिंतन मनन न तेरा।।
खोगया तेरी हँसी नहीं है तेरी, कोई बात न तेरी।।
कठपुतली बन नाचत डोले, कोई घात न तेरी खोगया
लूट लूट में लूट पड़ी है, लूट लूट सब लूटे।।
सोच समझ यह तन का भांडा, लुटकर छिन में फूटे।।
खोगया मानुष जनम दिया है जिसने, जिसने मनुष बनाया।।
वही दया और क्षमा साथ ले, तुझे बचावन आया।।
खोगया पल पल रक्षा हुई है तेरी, सोच समझ मन अपने।।
तू भरमा भरमा क्यों डोले, देख जगत के सपने।।
खोगया राधास्वामी दीन दयाला, करें सदा रखवारी।।
उनकी शरन में जल्दी आजा, जो सच्चा व्यौपारी।।खोगया
बंजारों के संग में आया, धन दौलत ले हाथा।।
बनिज और व्यौहार की चिंता, भूल के छोड़ा साथा।।
खोगया साथ छोड़कर हुआ आलसी, पांव पसार के सोया।।
क्या तुझको यह समझ नहीं थी, जो सोया सो खोया।।
खोगया तेरे ताक में लगे चोर हैं, ठग डाकू बटमारे।।
जाग जाग उठ जाग भाग अब, सो नहिं पांव पसारे।।
खोगया कोई राजा बन लूटे तुझको, कोई नवाब दरबारी।।
मूरख चेत चेत के अवसर, पू जी बचाले सारी।।
खोगया किस सुख नींद में सोया प्रानी, यह सुख दुख का रूपा।।
दुख है मान बड़ाई प्रतिष्ठा, दुख प्रजा दुख भूपा।।खोगया
अपने आये में तू कहां है, यम के हाथ बिकाना।।
तन मन धन तेरा नहीं अपना, मन बच कर्म बेगाना।।
खोगया तेरा समय नहीं है तेरा, तेरा कथन न तेरा।
सोना खाना उठना बैठना, चिंतन मनन न तेरा।।
खोगया तेरी हँसी नहीं है तेरी, कोई बात न तेरी।।
कठपुतली बन नाचत डोले, कोई घात न तेरी खोगया
लूट लूट में लूट पड़ी है, लूट लूट सब लूटे।।
सोच समझ यह तन का भांडा, लुटकर छिन में फूटे।।
खोगया मानुष जनम दिया है जिसने, जिसने मनुष बनाया।।
वही दया और क्षमा साथ ले, तुझे बचावन आया।।
खोगया पल पल रक्षा हुई है तेरी, सोच समझ मन अपने।।
तू भरमा भरमा क्यों डोले, देख जगत के सपने।।
खोगया राधास्वामी दीन दयाला, करें सदा रखवारी।।
उनकी शरन में जल्दी आजा, जो सच्चा व्यौपारी।।खोगया
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Song 281 — Hindi
जगत में कैसी लूट पड़ी।।
माता कहे यूत है मेरा, भाई भाई बनावे।।
घर की तिरिया तन से लिपटी, पति कह रार मचावे।।
लूट पड़ी। बहन बीर कह हंस मुसकावे, मुस के धन ले जावे।।
पुत्रवधू कहे ससुर सियाना, भूठे भाव दिखावे।।
लूट पड़ी राजा कहे मेरी है परजा, करे कमाई उद्यम।।
मक्खन काढ़ मुझे दे उत्तम, पिये छाछ नित मध्यम।।
लूट पड़ी पण्डित दान दक्षिणा मांगे, साधु भिक्षाधारी।।
तीरथ मठ मूरति और मन्दिर, लूटें लूट की बारी।।
लूट पड़ी मरते समय आग यह बोली, इसे जला खा जाऊँ।।
मिट्टी कहे गाढ़ दे मुझमें, अपना अंश बनाऊ लूट पड़ी हवा
सुखावे पानी घुलावे, सिमटावे आकासा।।
चकित हुआ यह देख के लीला, लूट का अजब तमाशा।।
लूट पड़ी मैं हूँ कौन कौन है मेरा, इसकी समझ न आई।।
देख लूट का जग विस्तारा, लूट हुई दुखदाई।।
लूट पड़ी कभी कभी भूल भरम में फंसकर, आप लुट लुटवाऊँ।
लूट लूट के लुट गया सारा, लूट का मर्म न पाऊँ।।
लूट पड़ी राधास्वामी को संगत पाई, समझ लूट की आई।।
व्याकुल चित चरनों में आयो, ली सतगुरु शरनाई।।
लूट पड़ी
माता कहे यूत है मेरा, भाई भाई बनावे।।
घर की तिरिया तन से लिपटी, पति कह रार मचावे।।
लूट पड़ी। बहन बीर कह हंस मुसकावे, मुस के धन ले जावे।।
पुत्रवधू कहे ससुर सियाना, भूठे भाव दिखावे।।
लूट पड़ी राजा कहे मेरी है परजा, करे कमाई उद्यम।।
मक्खन काढ़ मुझे दे उत्तम, पिये छाछ नित मध्यम।।
लूट पड़ी पण्डित दान दक्षिणा मांगे, साधु भिक्षाधारी।।
तीरथ मठ मूरति और मन्दिर, लूटें लूट की बारी।।
लूट पड़ी मरते समय आग यह बोली, इसे जला खा जाऊँ।।
मिट्टी कहे गाढ़ दे मुझमें, अपना अंश बनाऊ लूट पड़ी हवा
सुखावे पानी घुलावे, सिमटावे आकासा।।
चकित हुआ यह देख के लीला, लूट का अजब तमाशा।।
लूट पड़ी मैं हूँ कौन कौन है मेरा, इसकी समझ न आई।।
देख लूट का जग विस्तारा, लूट हुई दुखदाई।।
लूट पड़ी कभी कभी भूल भरम में फंसकर, आप लुट लुटवाऊँ।
लूट लूट के लुट गया सारा, लूट का मर्म न पाऊँ।।
लूट पड़ी राधास्वामी को संगत पाई, समझ लूट की आई।।
व्याकुल चित चरनों में आयो, ली सतगुरु शरनाई।।
लूट पड़ी
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Song 282 — Hindi
भाई शब्द योग तुम चित लाओ।।
शब्द का पहले रूप समझलो, सार सार का सारा।।
शब्द आकाश माया का गुण हैं, चेतन का भंडारा।।
तुम चित शब्द के मारे मरते प्राणी, शब्द जिलाचे जीवें।।
अजर अमर बन सुख को भोगें, शब्द अमृत जब पीवें।।तुम चित
शब्द राग सुन राग बढ़े नित, शब्द विराग से त्यागी।।
कैसे कहूँ खोल कर प्यारे, शब्द पवन जल आगीं।।
तुम चित गुरु गम लेकर घट में कमाई, सुन धुन अनहद बानी।।
चित विरती का निरोध सहज हो, सुरत बने असमानी।।
तुम चित बिन गुरु गम नहीं घट में चलना, मन मत कभी न होना।।
गुरुमत ले गुरु ज्ञान समझले, सुन्न समाध में सोना।।
तुम चिंत बिन गुरु ज्ञान का धन नहीं मिलता, बिन गुरु निरधनताई।।
शब्द अधीन गुरु उपदेशा, गुरु की है प्रभुताई।।
तुम चित मनमत में है चंचलताई, काल करम ब्यौहारा।।
गुरुमत में है निश्चलताई, गुरु गम ज्ञान पसारा।।तुम चित
शब्द सुरत में सुरत शब्द में, शब्द सुरत एक सारा।।
शब्द सुरत का मर्म है न्यारा, पावे गुरु मुख प्यारा।।
तुम चित पृथवी छोड़ गगन को धावे, गगन में शब्द विलासा।।
तीन सुन्न के पार ठिकाना, राधास्वामी पद में बासा।।तुम चित
शब्द का पहले रूप समझलो, सार सार का सारा।।
शब्द आकाश माया का गुण हैं, चेतन का भंडारा।।
तुम चित शब्द के मारे मरते प्राणी, शब्द जिलाचे जीवें।।
अजर अमर बन सुख को भोगें, शब्द अमृत जब पीवें।।तुम चित
शब्द राग सुन राग बढ़े नित, शब्द विराग से त्यागी।।
कैसे कहूँ खोल कर प्यारे, शब्द पवन जल आगीं।।
तुम चित गुरु गम लेकर घट में कमाई, सुन धुन अनहद बानी।।
चित विरती का निरोध सहज हो, सुरत बने असमानी।।
तुम चित बिन गुरु गम नहीं घट में चलना, मन मत कभी न होना।।
गुरुमत ले गुरु ज्ञान समझले, सुन्न समाध में सोना।।
तुम चिंत बिन गुरु ज्ञान का धन नहीं मिलता, बिन गुरु निरधनताई।।
शब्द अधीन गुरु उपदेशा, गुरु की है प्रभुताई।।
तुम चित मनमत में है चंचलताई, काल करम ब्यौहारा।।
गुरुमत में है निश्चलताई, गुरु गम ज्ञान पसारा।।तुम चित
शब्द सुरत में सुरत शब्द में, शब्द सुरत एक सारा।।
शब्द सुरत का मर्म है न्यारा, पावे गुरु मुख प्यारा।।
तुम चित पृथवी छोड़ गगन को धावे, गगन में शब्द विलासा।।
तीन सुन्न के पार ठिकाना, राधास्वामी पद में बासा।।तुम चित
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Song 283 — Hindi
भाई जोति में जोति मिलाना है।।
। सहस कमल दल जगमग जौती, जोति जोति की धारा।।
चाँद सूरज की शोभा न्यारी, लख लख लाख तारा।।
मिलाना है। नीला पीला लाल वर्ण की, हरी बैंगनी ज्योती।।
श्याम कंज फुलवारी निरखी, फटी ज्योत की सेती।।
मिलाना है। आगे चढ़ी सुरत मतवारी, त्रिकुटी अम् प्रकाशा।।
गुरु की ज्योति लाल रंग निरखी, उपजा उमंग हुलासा।।
मिलाना है सुन्न मंडल शशी स्वेत रंग का, मन शीतल हुआ तेरा।।
सहज समाध ज्योति लख जागे, सुख प्रगटे बहुतेरा मिलाना है।
भंवर गुफा झूमर झमकाहट, झमक दमक अति दमके।।
ज्योतिमें आँखकी ज्योति मिले जब,ज्योति ज्योति मिल चमके।मिलाना है।
सत में सच्च खन्ड की ज्योति, ज्योति सिंध लहराना।।
ज्योति सिंध में गोते मारा, अधर ध्वजा फहराना।।
मिलाना है। अलख अगम लख गम को पावे, सुरतवन्त अधिकारी।।
राधास्वामी धाम में चैन विलासा, हो रहे भव के पारी।।भिलाना है।
। सहस कमल दल जगमग जौती, जोति जोति की धारा।।
चाँद सूरज की शोभा न्यारी, लख लख लाख तारा।।
मिलाना है। नीला पीला लाल वर्ण की, हरी बैंगनी ज्योती।।
श्याम कंज फुलवारी निरखी, फटी ज्योत की सेती।।
मिलाना है। आगे चढ़ी सुरत मतवारी, त्रिकुटी अम् प्रकाशा।।
गुरु की ज्योति लाल रंग निरखी, उपजा उमंग हुलासा।।
मिलाना है सुन्न मंडल शशी स्वेत रंग का, मन शीतल हुआ तेरा।।
सहज समाध ज्योति लख जागे, सुख प्रगटे बहुतेरा मिलाना है।
भंवर गुफा झूमर झमकाहट, झमक दमक अति दमके।।
ज्योतिमें आँखकी ज्योति मिले जब,ज्योति ज्योति मिल चमके।मिलाना है।
सत में सच्च खन्ड की ज्योति, ज्योति सिंध लहराना।।
ज्योति सिंध में गोते मारा, अधर ध्वजा फहराना।।
मिलाना है। अलख अगम लख गम को पावे, सुरतवन्त अधिकारी।।
राधास्वामी धाम में चैन विलासा, हो रहे भव के पारी।।भिलाना है।
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Song 284 — Hindi
सुख पाय सहज सुख रासी बनी।।टेका।
नहीं सुख वाद विवाद में किंचत, नहीं सुख बचन बिलासा।।
कथा वारता सुख कहो कैसा, सुख का अन्तर बासी।।
रासी बनी। दौड़ दौड़ दौड़त मेरी हिरनी, समझ की निपट अधूरी।।
वह अज्ञानी मर्म न पावे, अन्तर है कस्तूरी।।
रासी बनी पोथी पढ़ पढ़ बात बनावे, भरमे और भरमावे।।
पड़ा पेट का फन्दा भारी, अन्तर ज्ञान न पावे।।
रासी बनी जोग जुगत कर जोगी हारा, रिद्ध सिद्ध के धंदे।।
रिद्धि सिद्धि नौ निधि शक्ति, मन माया के फन्दे।।
रासी बनी भोग विलास में सुख को दूई, बाहरमुखी अनारी।।
इतनी समझ उसे नहीं आई, माया प्रबल नारी।।
रासी बनी बाहर है सुख की परछाई, अन्तर सुख की ज्योती।।
अन्तर सिंध जो मारे गोते, चुनले सुख के मोती।।
रासी बनी राधास्वामी भेद बताया, अन्तर चाल चलाई।।
अन्तर पॅस अन्तरमुख बनकर, अन्तर सुख धन पाई।।रासी बनी
नहीं सुख वाद विवाद में किंचत, नहीं सुख बचन बिलासा।।
कथा वारता सुख कहो कैसा, सुख का अन्तर बासी।।
रासी बनी। दौड़ दौड़ दौड़त मेरी हिरनी, समझ की निपट अधूरी।।
वह अज्ञानी मर्म न पावे, अन्तर है कस्तूरी।।
रासी बनी पोथी पढ़ पढ़ बात बनावे, भरमे और भरमावे।।
पड़ा पेट का फन्दा भारी, अन्तर ज्ञान न पावे।।
रासी बनी जोग जुगत कर जोगी हारा, रिद्ध सिद्ध के धंदे।।
रिद्धि सिद्धि नौ निधि शक्ति, मन माया के फन्दे।।
रासी बनी भोग विलास में सुख को दूई, बाहरमुखी अनारी।।
इतनी समझ उसे नहीं आई, माया प्रबल नारी।।
रासी बनी बाहर है सुख की परछाई, अन्तर सुख की ज्योती।।
अन्तर सिंध जो मारे गोते, चुनले सुख के मोती।।
रासी बनी राधास्वामी भेद बताया, अन्तर चाल चलाई।।
अन्तर पॅस अन्तरमुख बनकर, अन्तर सुख धन पाई।।रासी बनी
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Song 285 — Hindi
दुख मुझे छोड़ अब भाग गया।।
दो आँखों से द्वन्द को निरखा, द्वन्द में दुख बिस्तारा।।
द्वन्द जगत में दुख है व्यापा, जगत में दुख पसारा।।
भाग गया गृही दुखी दुखी बनवासी, जपी तपी दुख मूरत।।
ज्ञानी दुखी दुखी अज्ञानी, निरख लो उनकी सूरत।।
भाग गया दुख के मारे तीरथ भागे, छोड़ कुटुम्ब परिवार।।
साधन आराधन सब दुख हैं, कोई कोई करे बिचारा।।
भाग गया राजा दुखी दुखी है परजा, पढ़ लिख दुख भया दूना।।
जहाँ देखा तहाँ दुख ही दरसा, सुख से सब जग सूना।।
भाग गया अपने मनमें समझ बिचारो, कौन सुखी संसारा।।
किसी का कहना चित्त न लाओ, समझो बुधि अनुसार भाग गया
पूरनता नहीं किसी में भासे, सब ही देखे अधूरे।।
जो हैं ऐसे अधूरे जग में, वह सुख के कहाँ पूरे भाग
गया राधास्वामी मौज हुई और, घट में पाया बासी।।
मन को जीत जीत मन अपना, अब सुख चैन बिलासा।।
भाग गया
दो आँखों से द्वन्द को निरखा, द्वन्द में दुख बिस्तारा।।
द्वन्द जगत में दुख है व्यापा, जगत में दुख पसारा।।
भाग गया गृही दुखी दुखी बनवासी, जपी तपी दुख मूरत।।
ज्ञानी दुखी दुखी अज्ञानी, निरख लो उनकी सूरत।।
भाग गया दुख के मारे तीरथ भागे, छोड़ कुटुम्ब परिवार।।
साधन आराधन सब दुख हैं, कोई कोई करे बिचारा।।
भाग गया राजा दुखी दुखी है परजा, पढ़ लिख दुख भया दूना।।
जहाँ देखा तहाँ दुख ही दरसा, सुख से सब जग सूना।।
भाग गया अपने मनमें समझ बिचारो, कौन सुखी संसारा।।
किसी का कहना चित्त न लाओ, समझो बुधि अनुसार भाग गया
पूरनता नहीं किसी में भासे, सब ही देखे अधूरे।।
जो हैं ऐसे अधूरे जग में, वह सुख के कहाँ पूरे भाग
गया राधास्वामी मौज हुई और, घट में पाया बासी।।
मन को जीत जीत मन अपना, अब सुख चैन बिलासा।।
भाग गया
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Song 286 — Hindi
हम आये आये आये हैं।।
तुमको दुखी देख आँखों से, मन में दया समाई।।
दया रूप धर प्रगटे जग में, दया यहाँ ले आई।।
आये हैं। सूरज दया का गगन प्रकाशा, किरने दया की धारा।।
दया सिंध उमगा और बाढ़ा, दया भाव बिस्तारा।।
आये हैं। सुर नर मुनि की यह है रीती, लग स्वारथ करें प्रीती।
हम में नहीं है स्वारथ किंचित, लख लख करो प्रतीती आये हैं।
उदर निमित्त करें सब भेसा, योगी जती उदासी।।
माँगे भी ज्ञान की गम नहीं, तुम उनके विश्वासी।।
आये है। भूल भरम तज कर सत संगत, हिये की आँख खुलाओ।।
राधास्वामी रूप निरख कर, दया से काज बनाओ।।आये हैं
तुमको दुखी देख आँखों से, मन में दया समाई।।
दया रूप धर प्रगटे जग में, दया यहाँ ले आई।।
आये हैं। सूरज दया का गगन प्रकाशा, किरने दया की धारा।।
दया सिंध उमगा और बाढ़ा, दया भाव बिस्तारा।।
आये हैं। सुर नर मुनि की यह है रीती, लग स्वारथ करें प्रीती।
हम में नहीं है स्वारथ किंचित, लख लख करो प्रतीती आये हैं।
उदर निमित्त करें सब भेसा, योगी जती उदासी।।
माँगे भी ज्ञान की गम नहीं, तुम उनके विश्वासी।।
आये है। भूल भरम तज कर सत संगत, हिये की आँख खुलाओ।।
राधास्वामी रूप निरख कर, दया से काज बनाओ।।आये हैं
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Song 287 — Hindi
जग भानु उजाला होगया।।टेका।
भिटा अन्धेरा भयो सबेरा, अन्धकार तज भागा।।
ज्ञान ज्योति घट चीच प्रकाशा, घट घट घट घट लागा
होगया तिमिर अविद्या नहीं अब छाई, घट अकास भया निर्मल।।
चंचलताई चित से भागी, चंचल मन भया निश्चल होगया
निश्चल मन की साध के वृत्ती, निज स्वरूप जब देखा।
सुखी हुये मुस्काये हसे हम, मिटा करम का लेखा होगया
उलट दृष्टि तिलपट को खोला, आंख तीसरी पाई।।
इसी आँख की अग्नि ज्योति से, काम विकार जलाई।।होगया
काम गया निष्काम बने तब, चढ़े मेरु कैलासा।।
भीतर बाहर ऊपर नीचे, चहू दिस बिमल उजास
होगया डाकू चोर राह तजे भागे, भय बस पास न आवे।।
माया ठगनी काल उगारी, अब किसको भरमाचें।।
होगया राधास्वामी ने खेल खिलाया, खेल खेल की रीती।।
खेल खेल में ज्ञान सिखाया, उपजी मन परतीती होगया
भिटा अन्धेरा भयो सबेरा, अन्धकार तज भागा।।
ज्ञान ज्योति घट चीच प्रकाशा, घट घट घट घट लागा
होगया तिमिर अविद्या नहीं अब छाई, घट अकास भया निर्मल।।
चंचलताई चित से भागी, चंचल मन भया निश्चल होगया
निश्चल मन की साध के वृत्ती, निज स्वरूप जब देखा।
सुखी हुये मुस्काये हसे हम, मिटा करम का लेखा होगया
उलट दृष्टि तिलपट को खोला, आंख तीसरी पाई।।
इसी आँख की अग्नि ज्योति से, काम विकार जलाई।।होगया
काम गया निष्काम बने तब, चढ़े मेरु कैलासा।।
भीतर बाहर ऊपर नीचे, चहू दिस बिमल उजास
होगया डाकू चोर राह तजे भागे, भय बस पास न आवे।।
माया ठगनी काल उगारी, अब किसको भरमाचें।।
होगया राधास्वामी ने खेल खिलाया, खेल खेल की रीती।।
खेल खेल में ज्ञान सिखाया, उपजी मन परतीती होगया
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Song 288 — Hindi
नाम अमोल रतन है जग में।।
नाम भिला तो सब मिला, नाम है सबका सार।।
जो कोई सुमिरे नाम नित, व्याये नहीं संसार।।
जग में सुख देवे दुख को हरे, काटे कष्ट कलेश।।
जीवत शान्ती चित बसे, अन्त में सतगुरु देश।।
जग में जप तप संयम नियम यम, सच हैं नाम अधीन।।
नाम भक्ति के सिंध का, प्रेमी भक्त है मीन।।
जग में चंचल मन निश्चल बने, उपजे हर्ष हुलासे।।
मन में भजे जो नाम को, कभी न होय उदास।।जग में
नाम तेरे घट में बसे, बिन जिभ्या ले नाम।।
राधास्वामी की दया, पूरन हों सब काम।।जग में
नाम भिला तो सब मिला, नाम है सबका सार।।
जो कोई सुमिरे नाम नित, व्याये नहीं संसार।।
जग में सुख देवे दुख को हरे, काटे कष्ट कलेश।।
जीवत शान्ती चित बसे, अन्त में सतगुरु देश।।
जग में जप तप संयम नियम यम, सच हैं नाम अधीन।।
नाम भक्ति के सिंध का, प्रेमी भक्त है मीन।।
जग में चंचल मन निश्चल बने, उपजे हर्ष हुलासे।।
मन में भजे जो नाम को, कभी न होय उदास।।जग में
नाम तेरे घट में बसे, बिन जिभ्या ले नाम।।
राधास्वामी की दया, पूरन हों सब काम।।जग में
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Song 289 — Hindi
बचन सतसंग के नहीं सुने।।
सतसंग किया लाभ क्या पाया, बना न प्रेम अनुरागी।।
समय निरर्थक अपना खोया, कैसा मंद अभागी नहीं
सुने आसन तन मन स्थिर नाहीं, ति में नहीं स्थिरताई।।
फिर सतसंग से मुझे बतादे, क्या हो तेरी भलाई नहीं
सुने हृदय को कठोर बन आया, गुरु की बात न मानी।।
पत्थर का कोर हु न भीगा, चहुँदिस सौ मन पानी नहीं सुने
औंधा घड़ा गहे नहीं पानी, बरसे मेह अखंडा।।
संगत का कुछ दोष नहीं है, मन चंचल परचंडा।।
नहीं सुने अमृत बरसे लाख गगन से, नीम होय नहीं मीठा।।
गुरु के बचन का रंग जमे नहीं, निरस चित्त जब सीठा
नहीं सुने कोई कोई संगत जाकर सवें, गुरु संगत नहीं जायें।।
भाग हीन अधिकार हीन नर, यम की राह में लागू नहीं सुने
शठ सुधरहिं सतसंग में गुरु के, पारस लोह समाना।।
पर दूर पड़ा तो सोना क्यों हो, लोहा लोह रहाना नहीं
सुने नद नाले का पानी बहकर, ऊसर रेत में आवे।।
गंगा की धारा नहीं पहुँचे, गंग रूप क्यों पावे।।
नहीं सुने राधास्वामी दीन दयाला, सतसंग जीव चिताये।।
जीव सुने नहीं गुरु की बानी, केहि बिधि अंग लगावें।।
नहीं सुने
सतसंग किया लाभ क्या पाया, बना न प्रेम अनुरागी।।
समय निरर्थक अपना खोया, कैसा मंद अभागी नहीं
सुने आसन तन मन स्थिर नाहीं, ति में नहीं स्थिरताई।।
फिर सतसंग से मुझे बतादे, क्या हो तेरी भलाई नहीं
सुने हृदय को कठोर बन आया, गुरु की बात न मानी।।
पत्थर का कोर हु न भीगा, चहुँदिस सौ मन पानी नहीं सुने
औंधा घड़ा गहे नहीं पानी, बरसे मेह अखंडा।।
संगत का कुछ दोष नहीं है, मन चंचल परचंडा।।
नहीं सुने अमृत बरसे लाख गगन से, नीम होय नहीं मीठा।।
गुरु के बचन का रंग जमे नहीं, निरस चित्त जब सीठा
नहीं सुने कोई कोई संगत जाकर सवें, गुरु संगत नहीं जायें।।
भाग हीन अधिकार हीन नर, यम की राह में लागू नहीं सुने
शठ सुधरहिं सतसंग में गुरु के, पारस लोह समाना।।
पर दूर पड़ा तो सोना क्यों हो, लोहा लोह रहाना नहीं
सुने नद नाले का पानी बहकर, ऊसर रेत में आवे।।
गंगा की धारा नहीं पहुँचे, गंग रूप क्यों पावे।।
नहीं सुने राधास्वामी दीन दयाला, सतसंग जीव चिताये।।
जीव सुने नहीं गुरु की बानी, केहि बिधि अंग लगावें।।
नहीं सुने
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Song 290 — Hindi
अमृत नित बरसे सतसंग में।।
मूरख प्रानी को नहीं गम कुछ, यम के हाथ बिकाने।।
निश्चल चित गुरु बचन सुने नहीं, मन नहीं ठौर ठिकाने।।सतसंग में
एक घड़ी या आधी घड़ी हो, या आधी की आधी।।
संगत गुरु की करे चेतकर, मेटे सकल उपाधी।।
सतसंग में सतसंगत मानसर समाना, जुड़ मिल हँस जो आये।।
सतल तन मन होगया सारा, अमृत कुण्ड नहाये।।
सतसंग में हँसा बगला चले मानसर, अपने चित अनुमाना।।
हँसा तो चुने मोती मुक्ता, बगला मछली खाना।।
सतसंग में कोई छन्नी बनकर आवे, कोई छाज के हँगा।।
छन्नी सार वस्तु को त्यागे, छाज सार गहे अंगा।।
सतसंग में चित विवेक धरकर सतसंगत में, तज मन की दुचिताई।।
ततक्षण पल के सतसंगत में, निश्चय तेरी भलाई।।
सतसंग में अमृत बरसे गगन मंडल से, अमृत मय गुरु बानी।।
राधास्वामी की बानी सुन, वने सहज निरवानी।।सतसंग में
मूरख प्रानी को नहीं गम कुछ, यम के हाथ बिकाने।।
निश्चल चित गुरु बचन सुने नहीं, मन नहीं ठौर ठिकाने।।सतसंग में
एक घड़ी या आधी घड़ी हो, या आधी की आधी।।
संगत गुरु की करे चेतकर, मेटे सकल उपाधी।।
सतसंग में सतसंगत मानसर समाना, जुड़ मिल हँस जो आये।।
सतल तन मन होगया सारा, अमृत कुण्ड नहाये।।
सतसंग में हँसा बगला चले मानसर, अपने चित अनुमाना।।
हँसा तो चुने मोती मुक्ता, बगला मछली खाना।।
सतसंग में कोई छन्नी बनकर आवे, कोई छाज के हँगा।।
छन्नी सार वस्तु को त्यागे, छाज सार गहे अंगा।।
सतसंग में चित विवेक धरकर सतसंगत में, तज मन की दुचिताई।।
ततक्षण पल के सतसंगत में, निश्चय तेरी भलाई।।
सतसंग में अमृत बरसे गगन मंडल से, अमृत मय गुरु बानी।।
राधास्वामी की बानी सुन, वने सहज निरवानी।।सतसंग में
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Song 291 — Hindi
निज मन को सम कर लेना है।।
समता आई ममता भागी, सम का मिला सहारा।।
सम को पाइ सुरत हुई निश्चल, लखा शब्द भंडारा लेना है।
सम में ताल ताल में सम जब, राग सुहाना लागे।।
बिन सम राग अलाप है मिथ्या, सुनने वाला भागे।।
लेना है। सम की समझ बूझ नहीं जबलग, नहीं सुन्दर व्यौहारा।।
चित की समता बिन नहीं पावे, परमारथ का सारा लेना है।
सुखमन मध्य ढूंढ सम स्थल, सम्यक आसन मारी।।
जागी कुण्डलनी पर चढ़ने का, होजा तू अधिकारी।।
लेना है। नहीं दीयं बाये न भटकना, सम्यक हो वाचा मा।।
सम्यक करम में सम्यक बानी, सम संकल्प निशाना।।
लेना है। तिल को छोड़ तोड़ गढ़ त्रिकुटी, जा सुन के मैदाना।।
सम्यक सहज समाधि रचाले, महासुन्न स्थान।।लेना है।
सम्यक शब्द सुने जब घट में, शून्य पार चढ़ जावे।।
भंवरगुफा सोहंगम सम्यक, सौ सतपद पहुँचावे।।
लेना है। सुरत शब्द मत गुरु ने बताया, अनुभव सम्यक ज्ञाना।।
सम्यक साधन बिन नहीं पावे, अलख अगम निरवाना लेना है।
राधास्वामी सतगुरु आये, घट का भेद बताया।
सम कर सुरत निरत मन चित को, सुरत में रहा समाया।।लेना है।
समता आई ममता भागी, सम का मिला सहारा।।
सम को पाइ सुरत हुई निश्चल, लखा शब्द भंडारा लेना है।
सम में ताल ताल में सम जब, राग सुहाना लागे।।
बिन सम राग अलाप है मिथ्या, सुनने वाला भागे।।
लेना है। सम की समझ बूझ नहीं जबलग, नहीं सुन्दर व्यौहारा।।
चित की समता बिन नहीं पावे, परमारथ का सारा लेना है।
सुखमन मध्य ढूंढ सम स्थल, सम्यक आसन मारी।।
जागी कुण्डलनी पर चढ़ने का, होजा तू अधिकारी।।
लेना है। नहीं दीयं बाये न भटकना, सम्यक हो वाचा मा।।
सम्यक करम में सम्यक बानी, सम संकल्प निशाना।।
लेना है। तिल को छोड़ तोड़ गढ़ त्रिकुटी, जा सुन के मैदाना।।
सम्यक सहज समाधि रचाले, महासुन्न स्थान।।लेना है।
सम्यक शब्द सुने जब घट में, शून्य पार चढ़ जावे।।
भंवरगुफा सोहंगम सम्यक, सौ सतपद पहुँचावे।।
लेना है। सुरत शब्द मत गुरु ने बताया, अनुभव सम्यक ज्ञाना।।
सम्यक साधन बिन नहीं पावे, अलख अगम निरवाना लेना है।
राधास्वामी सतगुरु आये, घट का भेद बताया।
सम कर सुरत निरत मन चित को, सुरत में रहा समाया।।लेना है।
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Song 292 — Hindi
सत भाव हिये में लाना है।।टेक।
तुम हो सत् सत जीवन समझो, तुम में सत सत जीना।।
सत में असत का भान कहां है, सत अमृत नित पीना।।
लाना है। निश्चय श्रद्धा प्रेम प्रति, परतीत आस्तिक लक्षण।।
जिनमें यह नहिं समझो नास्तिक, नास्ति आस्ति विलक्षण।।
लाना है। नास्ति नास्तिक असत हों कैसे, मिथ्या कल्पित बानी।।
हमने तो देखी नहीं अब तक, नास्तिकता की निशानी लाना है।
जो नहीं हो वह भासे कैसे, बन्ध्या पुत्र समाना।।
भरम भ्रांती में पड़े हो क्यों तुम, समझो गुरुमत ज्ञाना।।
लाना है। तुम जिसको माया कहते हो, वही ब्रह्म की खानी।।
ब्रह्म शक्ति वाला जब ठहरा, माया शक्ति कहानी लाना है।
शक्ति शक्तिवान की शोभा, नहीं है उससे न्यारी।।
यू ही बात बनाना छोड़ो, बोलो बचन बिचारी।।
लाना है। सत में जो सत्ता रहती है, वही है उसकी शक्ति।।
सत्ता बिन कोई सत नहीं होता, करो सत्त की भक्ति लाना है।
द्वन्द भाव को कल्पित जानो, एक एक चित लाओ।।
भरम भ्रांति कहो क्योंकर आवे, जब सतसंगत जाओ।।
लाना है। राधास्वामी की है। बानी, आप आपको जानो।।
अपना आपा और विचारो, किसी का कहा न मानो।।लाना है।
तुम हो सत् सत जीवन समझो, तुम में सत सत जीना।।
सत में असत का भान कहां है, सत अमृत नित पीना।।
लाना है। निश्चय श्रद्धा प्रेम प्रति, परतीत आस्तिक लक्षण।।
जिनमें यह नहिं समझो नास्तिक, नास्ति आस्ति विलक्षण।।
लाना है। नास्ति नास्तिक असत हों कैसे, मिथ्या कल्पित बानी।।
हमने तो देखी नहीं अब तक, नास्तिकता की निशानी लाना है।
जो नहीं हो वह भासे कैसे, बन्ध्या पुत्र समाना।।
भरम भ्रांती में पड़े हो क्यों तुम, समझो गुरुमत ज्ञाना।।
लाना है। तुम जिसको माया कहते हो, वही ब्रह्म की खानी।।
ब्रह्म शक्ति वाला जब ठहरा, माया शक्ति कहानी लाना है।
शक्ति शक्तिवान की शोभा, नहीं है उससे न्यारी।।
यू ही बात बनाना छोड़ो, बोलो बचन बिचारी।।
लाना है। सत में जो सत्ता रहती है, वही है उसकी शक्ति।।
सत्ता बिन कोई सत नहीं होता, करो सत्त की भक्ति लाना है।
द्वन्द भाव को कल्पित जानो, एक एक चित लाओ।।
भरम भ्रांति कहो क्योंकर आवे, जब सतसंगत जाओ।।
लाना है। राधास्वामी की है। बानी, आप आपको जानो।।
अपना आपा और विचारो, किसी का कहा न मानो।।लाना है।
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Song 293 — Hindi
गुरु मुखता सब का सार है।।टेक।
गुरुमुखता कोई गुरु मुख जाने, और न जाने कोई।।
गुरुमुख नहीं काल माया मुख, जीव मुखी नहीं सोई।।
सार है। माया मुखता धरम करम सब, लोभ मोह के धन्दे।।
रोचक दशा भयानक गति मति; पड़े भरम के फन्दे सार है।
समय को देख मान मद बाढ़, अहंकार चित ठाने।।
काल निरंजन की परिछाई, अहं सोहंगम माने।।
सार है। जीवमुखी आधीन दीन है, रोवे और चिल्लावे।।
बिन समझे बुझे की नीति, स्तुति गाये सुनावे सार है।
यह सब यम के हाथ बिकाने, लगे न ठौर ठिकाने।।
गुरु मुख ज्ञान यथारथ बुझे, गुरु मत को पहचाने।।
सार है। कर सतसंग भेद सत मत लख, बहक न बारम्बारा।।
राधास्वामी की कृपा से, हो भव द्वन्द से न्यारा।।सार है।
गुरुमुखता कोई गुरु मुख जाने, और न जाने कोई।।
गुरुमुख नहीं काल माया मुख, जीव मुखी नहीं सोई।।
सार है। माया मुखता धरम करम सब, लोभ मोह के धन्दे।।
रोचक दशा भयानक गति मति; पड़े भरम के फन्दे सार है।
समय को देख मान मद बाढ़, अहंकार चित ठाने।।
काल निरंजन की परिछाई, अहं सोहंगम माने।।
सार है। जीवमुखी आधीन दीन है, रोवे और चिल्लावे।।
बिन समझे बुझे की नीति, स्तुति गाये सुनावे सार है।
यह सब यम के हाथ बिकाने, लगे न ठौर ठिकाने।।
गुरु मुख ज्ञान यथारथ बुझे, गुरु मत को पहचाने।।
सार है। कर सतसंग भेद सत मत लख, बहक न बारम्बारा।।
राधास्वामी की कृपा से, हो भव द्वन्द से न्यारा।।सार है।
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Song 294 — Hindi
राधास्वामी दया ले जा भव पार।।
माया तुझ से नहीं अलग है, माया तेरी बुद्धि।।
माया को कुछ रूप समझले, तब चित आवे शुद्धि।।
जा भवपार बुद्धि का प्रपंच है सारा, बुद्धि ही भव सागर।।
बुद्धिवान हो बुद्धिमान हो, चतुर सियाना नागर।।
जा भवपार दशा बदल गई समय को पाकर, समय काल है भाई।।
काल से कैसी व्याकुलताई, तज मिथ्या दुचिताई।।
जा भवपार माया काल के भरम मुलाना, भरमा भूला डरना।।
चालक ने निज छाया देखी, छाया लख घबराना।।
जा भवपार कर सतसंग विवेक सहित नित, शब्द सार निरवारी।।
शब्द समझ कर रूप परख ले, राधास्वामी की बलिहारी।।जा भवपार
माया तुझ से नहीं अलग है, माया तेरी बुद्धि।।
माया को कुछ रूप समझले, तब चित आवे शुद्धि।।
जा भवपार बुद्धि का प्रपंच है सारा, बुद्धि ही भव सागर।।
बुद्धिवान हो बुद्धिमान हो, चतुर सियाना नागर।।
जा भवपार दशा बदल गई समय को पाकर, समय काल है भाई।।
काल से कैसी व्याकुलताई, तज मिथ्या दुचिताई।।
जा भवपार माया काल के भरम मुलाना, भरमा भूला डरना।।
चालक ने निज छाया देखी, छाया लख घबराना।।
जा भवपार कर सतसंग विवेक सहित नित, शब्द सार निरवारी।।
शब्द समझ कर रूप परख ले, राधास्वामी की बलिहारी।।जा भवपार
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Song 295 — Hindi
मेरी सुरत सियानी चेत अब
सुरत सियानी भई अज्ञानी, चेतन रूप बिसारा।।
पड़ी काल माया के फन्दे, लखे न सार असारा।।
चेत अब सुरत सियानी हुई दिवानी, भरम रही संसारा।।
यह संसार और कुछ नहीं, सन संकल्प पसारा।।
चेत अब सुरत सियानी भव भरमानी, भरम का भेद न बूझे।।
भरम हिंडोले जो कोई भूले, केसे तत्व की सूझे।।
चेत अब सुरत सियानी मद लपटानी, मान गुमान फँसानी।।
मोर तोर की बंधी जेवरी, बन्धन बन्ध बंधानी।।
चेत अब सुरत सियानी उपजी गलानी, सत संगत में आई।।
राधास्वामी दया रूप निज जाना, झी सतगुरु शुरनाई।।चेत अब
सुरत सियानी भई अज्ञानी, चेतन रूप बिसारा।।
पड़ी काल माया के फन्दे, लखे न सार असारा।।
चेत अब सुरत सियानी हुई दिवानी, भरम रही संसारा।।
यह संसार और कुछ नहीं, सन संकल्प पसारा।।
चेत अब सुरत सियानी भव भरमानी, भरम का भेद न बूझे।।
भरम हिंडोले जो कोई भूले, केसे तत्व की सूझे।।
चेत अब सुरत सियानी मद लपटानी, मान गुमान फँसानी।।
मोर तोर की बंधी जेवरी, बन्धन बन्ध बंधानी।।
चेत अब सुरत सियानी उपजी गलानी, सत संगत में आई।।
राधास्वामी दया रूप निज जाना, झी सतगुरु शुरनाई।।चेत अब
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Song 296 — Hindi
सुख को किसमें कहां हूँ हूँ।।टेक।
जो कुछ है सब मेरे भीतर, सत्त चित्त आनन्दा।।
आंख खुले बिन सुझे कैसे, घट के सूरज चन्दा कहां हैं हैं।
मैं हूँ बुन्द सिंधु गति मेरी, लहर बुलबुले मुझमें।।
खोल कहूँ माने कोई नाहीं, धीर चुलबुले मुझमें कहां हूँढ़ें
मुझमें जीव प्रकृति ईश्वर, मुझमें ब्रह्म ब्रह्मांडा।।
मैं हूँ खंड खंड में व्यापा, रूप है मेरा अखंडा कहां हूँ हूँ
मुझमें सृष्टि की रचना फैली, मैं बालक पितु माता।।
जनम मरन मेरी है लीला, आता कहीं न जाता।।
कहां दें। गुरु की सेवा साध की संगत, करे तो जाने प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अपना रूप पिंछानी।।कहां हूँ हूँ
जो कुछ है सब मेरे भीतर, सत्त चित्त आनन्दा।।
आंख खुले बिन सुझे कैसे, घट के सूरज चन्दा कहां हैं हैं।
मैं हूँ बुन्द सिंधु गति मेरी, लहर बुलबुले मुझमें।।
खोल कहूँ माने कोई नाहीं, धीर चुलबुले मुझमें कहां हूँढ़ें
मुझमें जीव प्रकृति ईश्वर, मुझमें ब्रह्म ब्रह्मांडा।।
मैं हूँ खंड खंड में व्यापा, रूप है मेरा अखंडा कहां हूँ हूँ
मुझमें सृष्टि की रचना फैली, मैं बालक पितु माता।।
जनम मरन मेरी है लीला, आता कहीं न जाता।।
कहां दें। गुरु की सेवा साध की संगत, करे तो जाने प्रानी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अपना रूप पिंछानी।।कहां हूँ हूँ
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Song 297 — Hindi
गुरु चरन कमल की दासी बनू।।
दासी बनू अविनासी बनू, हाँ दासी बनू प्रेम प्यासी बनू।।
गुरु हुये मेरे मैं हुई गुरु की, मैं हूँ गुरु की दासी।।
दासी हेकर हुई अविनासी, मीन प्रेम जल प्यासी।।
दासी बनू दासी हुई सीस चरनन धर, अरपो मन धन बानी।।
गुरु ने हाथ दया का फेरा, दी भक्ति सुख खानी।।
दासी बनू मेरा मुझमें कुछ नहीं अपना, गुरु का है सब मुझमें।।
भक्ति मुक्ति गुरु की है सारी, तेरा होगा तुझमें।।
दासी बने गुरु संगत मिल हुई गुरु की, मन चिन्ता नहीं व्यापे।।
जग को दुख नहीं मुझे सतावे, हैं गुरु आप ही आपे।।
दासी बनू अंग लगाकर गुरु ने मुझको, अपनी दासी बनाई।
राधास्वामी नाम दान दे, सुख की रासी बनाई दासी बनें
दासी बनू अविनासी बनू, हाँ दासी बनू प्रेम प्यासी बनू।।
गुरु हुये मेरे मैं हुई गुरु की, मैं हूँ गुरु की दासी।।
दासी हेकर हुई अविनासी, मीन प्रेम जल प्यासी।।
दासी बनू दासी हुई सीस चरनन धर, अरपो मन धन बानी।।
गुरु ने हाथ दया का फेरा, दी भक्ति सुख खानी।।
दासी बनू मेरा मुझमें कुछ नहीं अपना, गुरु का है सब मुझमें।।
भक्ति मुक्ति गुरु की है सारी, तेरा होगा तुझमें।।
दासी बने गुरु संगत मिल हुई गुरु की, मन चिन्ता नहीं व्यापे।।
जग को दुख नहीं मुझे सतावे, हैं गुरु आप ही आपे।।
दासी बनू अंग लगाकर गुरु ने मुझको, अपनी दासी बनाई।
राधास्वामी नाम दान दे, सुख की रासी बनाई दासी बनें
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Song 298 — Hindi
अपने गुरु की मैं दासी बनू गी।।
दासी बनू गी सुरक्रासी बनेगी, अपने गुरु की मैं दासी बनू गी।।
छबि गुरु की आँखों में समाई, दूजी छबि न समावे।।
भरी कोठरी जब सराय की, और ठौर नहीं पावे।।
दासी बनू गी प्रेम अमृत जब भरा पियाला, अब क्या उसमें धरना।।
भरगया मन जब प्रेम से गुरु के, अब न रहा कुछ भरना।।
दासी बनू गी मछली जल से मिली तो जल से, अपना नाता जोड़ा।
जल और मछली के नाते को, बतादो किसने तोड़ा।।
दासी बनेगी। भंवरा लोभी कमल बास का, बास सुबास लुभाया।।
दुर्गन्धी के निकट न जावे, प्रेम के बास बसाया।।
दासी बनेंगी भाग जगा गुरु दर्शन पाया, जनम सुफल हुआ अपना।।
राधास्वामी की दायी से, देख लिया जग सपना।।दासी बनू गी
दासी बनू गी सुरक्रासी बनेगी, अपने गुरु की मैं दासी बनू गी।।
छबि गुरु की आँखों में समाई, दूजी छबि न समावे।।
भरी कोठरी जब सराय की, और ठौर नहीं पावे।।
दासी बनू गी प्रेम अमृत जब भरा पियाला, अब क्या उसमें धरना।।
भरगया मन जब प्रेम से गुरु के, अब न रहा कुछ भरना।।
दासी बनू गी मछली जल से मिली तो जल से, अपना नाता जोड़ा।
जल और मछली के नाते को, बतादो किसने तोड़ा।।
दासी बनेगी। भंवरा लोभी कमल बास का, बास सुबास लुभाया।।
दुर्गन्धी के निकट न जावे, प्रेम के बास बसाया।।
दासी बनेंगी भाग जगा गुरु दर्शन पाया, जनम सुफल हुआ अपना।।
राधास्वामी की दायी से, देख लिया जग सपना।।दासी बनू गी
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Song 299 — Hindi
दुविधा दुर्मति की है खानी।।
टेका। जबसे दुविधा चित में व्यापी, मन आई हैरानी।।
व्याकुल भये सार नहीं सूझे, फस गई द्वन्द गलानी है
खानी एकचित होय न समता आवे, भूल भरम भरमानी।।
दुख कलेश चिंता का बंधन, यम के फाँस हँसानी हैं खानी
राधास्वामी संग की अन्त में सूझी, पाई शब्द निशानी।।
शब्द समझ दुविधा गई मन से, होरही ठौर ठिकानी है खानी
टेका। जबसे दुविधा चित में व्यापी, मन आई हैरानी।।
व्याकुल भये सार नहीं सूझे, फस गई द्वन्द गलानी है
खानी एकचित होय न समता आवे, भूल भरम भरमानी।।
दुख कलेश चिंता का बंधन, यम के फाँस हँसानी हैं खानी
राधास्वामी संग की अन्त में सूझी, पाई शब्द निशानी।।
शब्द समझ दुविधा गई मन से, होरही ठौर ठिकानी है खानी
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Song 300 — Hindi
सजनी प्रेम तराजू तुलजा।।
टेक। प्रेम तराजू चढ़ सम पावे, बन्द कली चित खुलजा।।
आनंद सुख तेरे भाग में आवे, हर्ष पवन लग फुलजा।।
हाँ तुलजह भवसागर के दुख सुख झूठे, भक्ति प्रति के पुलजी।।
पार जाये सतधाम विराजे, भिल जुन सत में रलजी हाँ तुलजा
नर तन पार्क कर सत संगत, जग से क्यों व्याकुलजा।।
राधास्वामी सतसंग मारले गोते, सत के सिंध में घुलजी हाँ तुलजा
टेक। प्रेम तराजू चढ़ सम पावे, बन्द कली चित खुलजा।।
आनंद सुख तेरे भाग में आवे, हर्ष पवन लग फुलजा।।
हाँ तुलजह भवसागर के दुख सुख झूठे, भक्ति प्रति के पुलजी।।
पार जाये सतधाम विराजे, भिल जुन सत में रलजी हाँ तुलजा
नर तन पार्क कर सत संगत, जग से क्यों व्याकुलजा।।
राधास्वामी सतसंग मारले गोते, सत के सिंध में घुलजी हाँ तुलजा







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