[ 39-503 ] जब गुरु की बंधी मन में आसा, अज्ञान भरम घट का नासा ॥टेक॥ अखंड मंडलाकारम्, व्याप्तम् एन चराचरम् । अद्भुतम् एकम् केवलम्, गुरु चरणम् नित्यं बन्दनम् । नहीं जाऊँ सुमेरु और कैलासा ॥ जब गुरु0 सत्यम् चित्तम् आनन्दम्, अकथ अनीह अगोचरम् । अधिष्ठानम् आधारम्, कूटस्थ नमाम्यहम् । घट लख पड़े ज्ञान का परकासा ॥ जब गुरु0 माया रहितम् मंगलम्, अमलम् निर्मलम् सदा । नमो नमो पद पंकजम्, सेरितम् पद सर्वदा । गुरु चरन में मिला मुझे बासा ॥ जब गुरु0 विराटम् च हिरण्यगर्भम्, सबलम् शुद्धम् दुर्लभम् । ओंकारम् च सोहंगम्, सत्यम् सत्यम् वराननम् । राधास्वामी ने काटा यम फाँसा ॥जब गुरु0
[37-504 ] सुरत चढ़ गई आज अटरिया जी, खोली भ्र मध्य कुठरिया जी ॥टेक।। सहसकमलदल ज्योति लख, ज्योति निरंजन बास । पचरंगी फुलवारी खिली, फैली बास सुवास । धुन घंटा शंख उचरिया जी ॥ सुरत0 त्रिकुटी गढ़ लंका चढ़ी, मेघनाद सुन कान । लाली ऊषा मध्य में, लाल सूर का भान । धुन ओ3म् मृदंग पकड़िया जी ॥ सुरत0 सुन्न सिखर कैलाश में, चन्द्र का दरसन पाय । आगे बढ़ी उमंग से, सारंगी धुन गाय । तिस परे थी घोर अंधिरिया जी ॥ सुरत गुरु बल अंधियारी मिटी, किया मानसर स्नान । चार गुप्त धुन मधुर बहु, पड़ी सुरत के कान । नहीं जाये वह लीला बिसरिया जी ॥ सुरत भँवर गुफा आई महल, सोहंगम् दरबार । महाकाल का निरखकर, सहज किया दीदार । यहाँ बाजी सुरीली बाँसुरिया जी ॥ सुरत0 घूमी फिरी विचार कर, पाया अद्भुत भेद । सोहं सोहं कह बढ़ चली, मेट करम का भेद । चौड़ी थी भवर झझरिया जी ॥ सुरत0 पहुँची सत मैदान में, चौड़ा उसका घाट । सत सत सत बानी प्रगट, सत सत सत का ठाठ । यहाँ बीन मधुर सुन तरिया जी ॥ सुरत0 अलख अगम का दरस कर, गुप्त भेद लिया चीन्ह । सुरत सखी हरषी बहुत, अब नहीं दीन अधीन । राधास्वामी चरन में परिया जी ॥ सुरत0 धन्य धन्य तुम धन्य हो, सतगुरु सर्वाधार । तुम्हरी महिमा दया का, कहीं नहीं वारापार । मिली ओढ़ के शब्द चुनरिया जी ॥सुरत
[38-505 ] पट अपट प्रेम की घटा छाई, भक्ति गुरु रिमझिम झरी लाई ॥टेक॥ तीन ताप का दुख मिटा, प्रीति लता रही छाय । ज्ञान कर्म जप तप क्रिया, के भोगे समुदाय । सुरत शब्द की वर्षा जब आई ॥ घट0 शीतल तन में आत्मा, प्रेम की ठंडक पाय । द्वेष ईर्षा अग्नि को, छिन में दिया बुझाय । मस्ती से फिरे सुरत मगनाई ॥ घट0 इन्द्री देह के भर गये, नद नाले और कूप । धार जो फूटी प्रेम की, होगई सिंधु स्वरूप । तब जीव को ब्रह्म दशा भाई ॥ वट सिंधु बुन्द दोऊ एक हैं, एक हैं एक समान । सिंधु में बुन्द अनेक हैं, बुन्द में सिंधु रहान । नहीं बुन्द सिंधु रहे बिलगाई । घट बुन्द समाना सिंधु में, यह जाने सब कोय । सिंधु बुन्द में है छिपा, नजर न आवे सोय । जब गुरु मिले ऐसी समझ पाई । घट0 बुन्द का भाव कहाँ प्रगट, बुन्द ही सिंधु रहाय । सिंधु में बुन्द की खान है, बुन्द में सिंधु समाय । बिरले जन को प्रतीत आई ।। घट सिंधु बुन्द तू क्या करे, अनसमझे की बात । बुन्द अधार यह सिंधु है, देख के कर साक्षात । है बुन्द से सिंधु की प्रभुताई ॥ घट जीव ब्रह्म में है बसा, जब घट आवे प्रेम । ब्रह्म जीव में कहाँ रहे, क्या है उसका नेम । जा गुरु की ले अब शरनाई ॥ घट0 बुन्द में बुन्द और सिंधु है, सिंधु बुन्द है सिंधु । सोच समझ मन में भला, कहाँ दोनों की संधि । घट बैठ परख यह सच्चाई ॥ घट0 राधास्वामी गुरु मिले, भेद दिया भरपूर । सुरत शब्द शब्द सुरत है, भरम भया तब चूर । हरखत मन गुरु महिमा गाई ॥घट0 बिनती
[ 506 ] गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि दंडोत । गुरु की दया अपार से, छूटे भव के खोट । तीन ताप के भवर में, बढ़े बारम्बार । गुरु समरथ ने दया की, बू ढ़त लिया निकार ॥ गुरु समान दाता नहीं, गुरु समान नहीं देव । गुरु की पल पल बंदना, निस दिन कीजे सेव ॥ गुरु आज्ञा में जायकर, तन मन सीस झुकाय । काल करम से बचन का, और न कोई उपाय ॥ गुरु से कुछ माँगू नहीं, उनसे माँगू यह । राधास्वामी दया करो, कर चरनन की खंह ॥
[ 507 ] दीन हित करुना निधान, कपाल सुख सागर महा । जान अपना दास दीजे, भक्ति प्रेम की सम्पदा ॥ आया शरणागत तुम्हारे, त्याग सब का आसरा । एक तुम्हारी आस है प्रभु, कीजिये मुझ पर दया । बुन्द केहि विधि सिंधु तजकर, पाये सुख अरु शांती । ज्ञान घन के रूप तुम हो, मेट दो सब भ्रांती ।। है तुम्हारी सब में सत्ता, सत्त मुझको कीजिये । काल माया से छुड़ाकर, मुक्ति का पद दीजिये ।। राधास्वामी सत्तगुरु, करतार गुन निगुन हो तुम । नाम सच्चा दान दीजे, सत्यनाम की धुन हो तुम ॥ग्यारहवीं धुन
[ 1-508 ] अपनी शरण में लेलो, मेरे कृपाल दाता। चरनों की भक्ति देदो, मेरे दयाल दाता ॥1॥ दुख कष्ट के झमेले, दिन रात मैंने भेले । पापड़ इन्ही के बेले, मेरे दयाल दाता ॥2॥ बोझा है भारी सिर पर, फिरता हूँ मारा दर दर । है एक जैसे बन घर, मेरे दयाल दाता ॥3॥ भक्ति न ज्ञान पाया, भरमा भरम में आया। अज्ञान घट में छाया, मेरे दयाल दाता ॥4॥ संकट में मैं फंसा हूँ, दुख कष्ट में बसा हूँ। दलदल में मैं धंसा हूँ, मेरे दयाल दाता ॥5॥ दुखिया की लाज रखलो, चरनों की छाँह देदो । दृष्टि मेहर की करदो, मेरे दयाल दाता ॥9॥ राधास्वामी दीन हितकर, अपनी शरण में रखकर । निज धाम दो दया कर, मेरे दयाल दाता ॥7॥
[ 2-509 ] तुम बिन नहीं है कोई, मेरे दयाल दाता । रखना कृपा की दृष्टि, मुझ पर कृपाल दाता ॥1॥ जब से जगत में आया, दुख में बिताये दिन को। शरनाई ली चरन की, अब कर निहाल दाता ॥2॥ माया का जाल भारी, चहुँ ओर में तना है। हाथों को अपने फैला, निस दिन संभाल दाता ॥3॥ अपराध क्या किये थे, ऐसा जो जन्म पाया। गहरी है भव की खाई, उससे निकाल दाता ॥4॥ रख लाज मेरी अब तू , तेरा ही आसरा है। मुझको न अब सताये, बेपीर काल दाता ॥1॥ संकट में मैं घिरा हूँ, बुद्धि नहीं ठिकाने । आकर बचाले मुझको, तू बाल बाल दाता ॥9॥ दे पद कमल की छाया, तुझसे लगी रहे लव ।। राधास्वामी तुम अकेले, हो प्रतिपाल दाता ॥7॥
[3-510 ] देखा है रूप बाहर, अंतर में अब दिखादो । बानी सुनी जो मुख से, अंतर में अब सुनादो ॥1॥ बाहर दिया सहारा, अंतर की अब है बारी । दोनों की करदो समता, ऐसी विधि मिलाहो ॥2॥ व्यापक हो सब जगह हो, सब वस्तु में मिले हो । आपे में मेरे प्रगटो, परदा अभी उठादो ॥3॥ तुम हो तुम्हारे सत का, सत्ता ही यह जगत है। फिर भेद क्यों है स्वामी, मेरा भरम मिटादो ॥4॥ अज्ञान शान में क्यों, क्यों ज्योति में अंधेरा। यह पूछता हूँ तुम से, अब यह मरम जतादो ॥॥ तुम हो तो कौन मैं हूँ, मैं तू का क्यों है झगड़ा। जी चाहता है खुलकर, अंधेरा यह मिटादो ॥9॥ गुरु राधास्वामी प्यारे, आँखों के मेरे तारे । सेवक हूँ मैं तुम्हारा, चित से मुझे चितादो ॥7॥
[4-511 ] तुम कौन और क्या हो, अपना पता बतादो । क्या रूप नाम क्या है, कैसे हो यह जतादो ॥1॥ कहता है कोई निर्गुण, कोई सगुण बताता । मैं पूछता हूँ तुम से, तुम भेद यह सुनादो ॥2॥ सुनता हूँ नाम को नित, पर नाम रूप क्या है। जब नाम है तो फिर अब, निज रूप को दिखादो ॥3॥ मन से मनन हो चिंतन, आँखों से पाऊँ दर्शन । बानी का मुख से श्रवण, ऐसी विधि मिलादो ॥4॥ जब हो तो आओ आगे, आँखों को खोल देखू । ऐसे न मानूंगा मैं, तुम आके अब मनादो ॥5॥ हट से यही प्रतिज्ञा, संकल्प दृढ़ है पूरा।। बिनती यही है निसदिन, बिगड़ी को अब बनादो ॥9॥ गुरुदेव राधास्वामी, तुम से लगन लगी है। तुमको न भूलू दाता, ऐसा मुझे चितादो ॥7॥
[ 5-512 ] लेता हूँ नाम तेरा, दाता दयाल है तू । कर अब संभाल मेरी, मेरा संभाल है तू ॥1॥ तेरी दया हुई जब, फिर काल का भरम क्यों।। यह मैंने समझा मन से, सच्चा कृपाल है तू ॥2॥ संशय नहीं कि बहका, था जग की भ्रांती से। व्यापक हृदय में स्वामी, अब बाल बाल है तू ॥3॥ दिन रात ध्यान सुमिरन, दिन रात का भजन है। मेरा श्रवण मनन तू , और मेरी चाल है तू ॥ शा गुरु पूरे राधास्वामी, तुझसे लगन लगी है। करदे निहाल मुझको, समझा निहाल है तू ॥5॥
[9-513 ] तेरी दया हो मुझपर, मेरे कपाल दाता। रख कर शरण में अपने, करदे निहाल दाता ॥1॥ तेरी दया की दृष्टि, से पार जाऊँगा मैं । भव सिंधु में पड़ा हूँ, उससे निकाल दाता ॥2॥ लंपट हूँ मोह मद में, बुद्धि नहीं ठिकाने । फैला के हाथ अपना, मुझको संभाल दाता ॥3॥ बेपीर काल निस दिन, यू ही सता रहा है। उससे बचालो मुझको, लू बाल बाल दाता ॥4॥ गुरु पूरे राधास्वामी, तेरा ही आसरा हैं। चहुँ ओर में तना है, माया का जाल दाता ॥5॥
[7-514 ] आया तेरी शरण में, कर मेरी लाज प्यारे । तेरी दया से यूरा, हो मेरा काज प्यारे ॥1॥ भक्ति का आसरा हो, भक्ति दे अपनी मुझको । हित चित से मैं सजाऊँ, भक्ति का साज प्यारे ॥2॥ तुम में है सारी शक्ति, तुम में है योग युक्ति । दुख से दिला दे मुक्ति, तेरा है राज प्यारे ॥3॥ जब आगया शरन में, दुख दूर करदे मेरा।। कल का भरोसा क्या है, कर काम आज प्यारे ॥4॥ गुरु दाता राधास्वामी, तेरा ही आसरा है। आया शरण में तेरे, सब जग से भाज प्यारे ॥3॥
[8-515 ] सतगुरु फकत जगत में, दुख से छुड़ाने वाले। भव सिंधु में जगत के, सब हैं डुबाने वाले ॥1॥ माता पिता तुम्हारे, तिरिया व सुत सखा रे। स्वारथ से अपने सारे, नाता लगाने वाले ॥2॥ जितने सगे घनेरे, कहते हो जिनको मेरे । आखिर में कोई तेरे, नहीं काम आने वाले ॥3॥ यम की पड़ेंगी मारें, मुश्क जकड़ के ताने । कोई न उस ठिकाने, होंगे बचाने वाले ॥4॥ पाया मनुष्य तन को, करले पवित्र मन को । भूलो न देख धन को, दौलत कमाने वाले ॥5॥ राधास्वामी नाम सुमिरन, कर तुझको होगा दर्शन । कट जाय भव का बंधन, सतपद को जाने वाले ॥9॥
[9-516 ] ऐ शीलवन्त स्वामी, करदो मुझे सुशीला । व्यौहार में कुशल हो, मैं देखू उसकी लीला ॥1॥ है ज्ञान संग मेरे, रहता है तन में व्यापा। मैं तुमसे पूछती हूँ, क्या मेरा है यह आपा ॥2॥ उत्तम है ज्ञान इसमें, संदेह कुछ नहीं अब । अनुभव बढ़े जो मन का, संशय रहित हूँ मैं तब ॥3॥ सत चित है रूप मेरा, सत देह ज्ञान मन है। आनन्द आत्मा है, आनन्द की लगन है ॥4॥ आनन्द मेल से हो, सुलझा दो आके उलझन । गुत्थी यह मेरी सुलझे, सुन चैन पाऊँ ततछिन ॥ शा अज्ञान से भरम से, संशय से मैं दुखी हूँ। ऐसी दया हो स्वामी, दुख दूर हो सुखी हूँ॥6॥ गुरु पूरे राधास्वामी, आई शरण तुम्हारे । रख लीजो लाज मेरी, मिनतो यही है प्यारे ॥7॥
[10-517 ] उसकी हो जुस्तजू क्या, जो अपने रूबरू है। यह जस्तजू नहीं है, तोहीने जस्तजू है॥1॥ अंधे बने हैं आदि, आँखें नहीं हैं खुलतीं । क्या हूँढ़ते हैं उसको, जो अपने बद् है ॥2॥ दायें है अपने बायें, इसजा है और उसजा। आँखें खुली तो देखा, वह अपने चारसू है ॥3॥ क्या खीलो खाल में है, क्या फरजी हाल में है। जो है जबां पे बैठा, क्या उसकी गुफ्तगू है ॥4॥ दिलदार और दिलवर, दिलकश है दिलरुबा है। खुरशीद रू अगर है, वह मेरा माहरू है ॥5॥ वह दिल में खुद है कायम, दिल घर है जिसका दायम । दिल को संभल के देखा, वह दिल में मूबमू है ॥9॥ राधास्वामी की मेहर से, कर शग्ल जिक्र सुल्तां । पहुँचेगा अपने मसकिन, जहां तेरी जुस्तजू है ॥7॥ बिनती
[ 518 ] सर्व समरथ साइयाँ, भव द्वन्द मेटनहार । अगुन सगुन अमोह अविचल, सकल जगदाधार । अजर अमर अपार अद्भुत, अगम अलख अमान । तुम्हरे चरन सरोज में, प्रभु ज्ञान गम की खान ॥ जीव निबल अनाथ आरत, सहत बिपत कलेश । अपनी मेहर से बन्ध काटो, ले चलो निज देश ।। तरन तारन नाम धारा, आये जीव के काज । चरन शरन में सब पड़े हैं, राखो उनकी लाज । हाथ फेरो सीस पर, और पकड़ो उनकी बांह । राधास्वामी सतगुरु, यह पड़े भव जल माह ।। प्रार्थना
[1-520 ] गुरु दाता चरण की धूर मिले ॥टेक॥ करूँ धरूँ आँखों का अन्जन, दिव्य दृष्टि भरपूर मिले ॥ गुरु0 सूझे अण्ड खण्ड ब्रह्माण्डा, निकट पदारथ दूर मिले ॥ खुले नयन सरूप निहारू, माया भरम सब दूर मिले ॥ सहज सहज में सहज सहज में, प्रेम भक्ति की मूर मिले ॥ राधास्वामी चरन की आस रहे नित, सतपद का सतनूर मिले।
[2-521 ] गुरु दाता करो मेरी आप संभार ॥टेक।। मैं तो करम धरम का बंधुआ, चहुँ दिस व्याप रहा संसार ॥ गुरु0 मेरा दाव चले नहीं कोई, माया काल महा बरयार ॥ आसा तृष्णा बन्ध बन्धाना, मोह मया गले फाँसी डार ॥ अब तो आपकी शरण पड़ा हूँ, दया से कीजे मेरा सुधार ॥ राधास्वामी दीन दयाला, जान प्रान के तुम आधार ॥
[3-522 ] गुरु प्यारे दरस दो मोहि अपना ॥टेक॥ दरशन बिन मोहि चैन न आवे, रात दिवस का है तपना ।।टेक।। बाहर भीतर दरशन दीजे, रहे नाम का नित जपना ॥ गुरु0 अनुभव ज्ञान की खोलदो दृष्टि, भरम का दूर करो टपना ॥ इन्द्रजाल संसार की लीला, जाग मिटे मेरा यह सपना ॥ राधास्वामी दया दृष्टि हो, काल के भय से न हो कपना ॥
[4-523 ] गुरु दाता मौज करो आज नई ॥टेक।। अमृत बचन धार बरसादो, भूमण्डल हो सुधामई ॥ गुरु0 सहज तरें सब भव सागर से, मुझ सम पापी कई कई ॥ पतित उधारन पतित उद्धारो, नहीं नाम की लाज गई ॥ भाग जगा तब दर्शन पाया, गरु मिले अब भली भई ॥ राधास्वामी द्वन्द अवस्था मेटो, दृष्टि रहे नहीं प्रान रई ॥
[ 5-524 ] गरु स्वामी दया की दृष्टि करो ।।टेक॥ मेरे मन के पात्र में दाता, भक्ति प्रीति की वस्तु भरो ॥ गुरु0 माया काल की रणभूमी में, शस्त्र अस्त्र ले अधिक लरो॥ गुरु जब मिले जिलोवन हारे, मैं न मरूँ चाहे कोई मरो॥ अपना भाग सराहूँ कैसे, भव सागर से सहज तरो॥ राधास्वामी चरन ओट नहीं त्यागू, अब तो शरण में आन परो॥
[9-525 ] गरु दाता की छवि पर बलिहारी ।।टेक।। व्यापक अव्यापक हद बेहद, कहनसुनन से वह न्यारी ॥ गुरु0 चरन पताल मध्य गगना पर, दिव्य सीस सोभा भारी ॥ गेम रोम कोटिन रवि चन्दा, देव दनुज आज्ञाकारी ॥ रूप अरूप स्वरूप अमाया, कौन कहे महिमा भारी ॥ अखिल ब्रह्मांड रोम एक रहता, निराधार जगदाधारी ।। गुरु का चित्र लखे नहीं कोई, निराकार नहीं साकारी ॥ सगुन अगुन अव्यक्त व्यक्त नहीं, शारद शेष कहत हारी ।। बुद्धि न बूझे मन नहिं सूझे, बानी अटकी मझधारी ॥ राधास्वामी रूप में दरस मिला जब, सेवक जान प्राण वारी ॥
[7-526 ] गुरु प्यारे दया करो दृष्टि संभार ॥टेक॥ मैं भूली भरमी मारग में, हिया जिया व्याप रहा संसार ॥ गुरु0 दुविधा छल चतुराई के बस, डूब रही भव सिंधु मँझार ॥ कोई जग में मीत न मेरा, मतलब के सब कुल परिवार ॥ मैं अनजान समझ नहीं मुझमें, अपनी मेहर से करो सुधार ॥ राधास्वामी जीव हितेषी, तुम हो रचना के आधार ॥
[8-527 ] गुरु प्यारे से प्रेम लगा मेरा ।।टेक॥ सबको त्याग चरन में लागी, छूट गया मेरा तेरा । गुरु0 अन्तर धस गई सुरत सुहागिन, शब्द रतन घट में हेरा ॥ सुन सुन धुन भई चरन दिवानी, सुन्न नगर में किया डेरा ॥ काल न व्यारे कर्म न मोहे, मिटा चौरासी का फेरा ॥ राधास्वामी दया से काज बना है, अब न पड़भव के घेरा ॥बिनती
[ 529 ] दीन बन्धु कृपाल स्वामी, जगत के आधार । प्रेम भक्ति दान दीजे, कीजे बेड़ा पार ॥ मुक्ति की नहीं मन में इच्छा, भक्ति दीजे दान । प्रेमियों का साथ दीजे, साध संगत मान । तारलीजे अधम पापी, को दया से आज । राधास्वामी सतगुरु, अब मेरी तुमको लाज ।। तेरहवीं धुन
[2-531 ] तेरा रूप अनूप अपार, दूजा क्या देखे ॥टेक।। कर सतसंग विवेक सहित नित, होजा भवजल पार ॥ दजा0 तुझमें शब्द अनाहद गूंजे, तझ में नूर का सार ॥ देवी देव रहें तेरे काया, तुम में ब्रह्म पसार ॥ ज्ञान ध्यान का मरम है तझ में, तुझमें तत्व विचार ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तज दे भरम विकार ॥
[ 3-532 ] गुरु दाता सहज में तारगे, गुरु दाता ॥टेका। सोच विचार त्याग मन बौरे, भव निधि पार उतारेंगे ॥ गुरु दाता0 सिर पर हाथ गुरु ने फेरा, आप ही आप संभारेंगे॥ तेरा बल कुछ पेश न जावे, काल करम को मारेंगे ॥ ममता मोह का बन्धन काटें, बिगरी तेरी सुधारेंगे ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कलि कलेश सब टारेंगे।
[4-533 ] यह दुनिया गोरख धन्दा है, यह दुनिया ॥टेक।। जड़ में चेतन चेतन में जड़, काल फाँस का फन्दा है यह दुनियाँ कहीं अन्धे मिल दृष्टि पसार, कहा सुझा का अन्धा है ।यह दुनियाँ माया ब्रह्म ईश प्रकृती, द्वन्दपने का रन्दा है।यह दुनियाँ तत्व विवेक बिना यह प्रानी, करम भरम से गन्दा है । यह दुनियाँ तिमिर हिंडोले ऋषि मुनि भूलें, भूलें सूर और चन्दा है ।यह दुनियाँ कल्प विकल्प ज्ञान अज्ञाना, इनमें भरमा बन्दा है |यह दुनियाँ राधास्वामी मेहर न हो जब जन पर,तब लग मति का मन्दा है।
[5-534 ] दो दिन का भोग बिलासा है, दो दिन का ॥टेक। दृष्टि सृष्टि का सकल पसारा, अद्भुत अजब तमाशा है दो दिन का स्वर्ग नर्क और लोक परलोका, पानी बीच बतासा है। मिथ्या ब्रह्म धाम की आसा, मिथ्या गिर कैलासा है। ब्रह्मा विष्णु नहीं है कल्पित, कल्पित आसा त्रासा है। अनसूया अत्रय की रचना, दत्त चन्द्र दुरबासा है। शत रूपा माया मनु है मन, जग जुवे का पाँसा है। राधास्वामी गुरु जब होय दयाला,पल छिन में यह नासा है।
[ 9-535 ] करले निज उपकार, मानुष तन पाया ॥टेका। नर शरीर दुर्लभ देवन को, मन में सोच विचार ॥ मानुष अब की चूक होय पछतावा, अवसर नहीं बारम्बार ॥ मानुष भक्ति भाव गह ले गुरु शरनी, तज दे विषय विकार ॥ मानुष रात दिवस रहे लम्पट जग में, भज ले सत करतार ।। मानुष राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जा भवनिधि के पार ॥मानुष
[7-536 ] कर आपन घट उजियार रे, आपन घट ॥टेक।। घट में माया ब्रह्म हैं दोऊ, ब्रह्म अग्नि उदगार रे ।। आपन घट0 घट में गुरु घट ही में चेला, घट में शब्द है सार रे ।। आपन0 घट में परमारथ स्वारथ सब, घट में कुल परिवार रे ।। आपन0 घट में करम भक्ति सत ज्ञाता, घट है सहज विचार रे ॥ आपन0 घट में हाट दुकान हवेली, घट में कर व्यौपार रे ॥ आपन0 घट में उन्मुनि सुन्न समाधी, घट का हो व्यौहार रे ।। आपन0 राधास्वामी चरन शरन बरिहारी, घट सतनाम पुकार रे ॥ आपन0
[9-538 ] जब लागी सहज समाध, फिर क्या करम बने ॥टेक॥ तीरथ बरत नियम और धरमा, सब मन के हैं उपाध ॥ फिर क्या आँख खुली तब निकट वही देखा, सुरत भई बिस्माध ॥ फिर क्या द्वत अद्व त का झगड़ा छूटा सब, रहा न एक न आध ॥ फिर क्या राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तत समझे कोई साध ॥फिर क्या
[10-539 ] नर भूला भूला क्यों भटके, ले चेत सवेरा है भाई ॥टेक॥ आना जाना भरम है मनका, इसके झटके क्यों भटके ॥ ले चेत बन्धन मुक्ति अज्ञान की बातें, मूरख सब इनमें अटके ।। ले चेत जा के हृदय अटक समाना, उन भटकन में वह लटके ॥ ले चेत ज्ञानी ध्यानी मरम न जाने, उनके पास न तू फटके ॥ ले चेत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुन भरम साध सत पद सटके ।।
11-540 । भरम में कैसे फंसी महाराजा ।।टेक॥ मैं सतवंती सत्तधाम की, या में आन धंसी महाराजा ॥ भरम सुरत सहेली अगम की बासी, मृत्यु लोक बसी महाराजा ॥ भरम जनम मरन के फंद कठिन हैं, इनमें हाय नसी महाराजा ॥ भरम आनन्द रस की निस दिन पागी, मोह स्वाद रसी महाराजा ॥ भरम राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,सुन गुरु बचन हँसी महाराजा ॥
[12-541 ] चलत दाई हमको सिंगारें अभागे ॥टेक।। जीते बाप को लात न मारे, मरते अरथी संवारें ॥ अभागे इस जगत की है न्यारी लीला, कोई कोई मरम विचारें । अभागे गुरु की सेवा चित न धारी, पाछे समाध पखारें । अभागे मत गुरु खोज करो सत संगत, वह भव खेप उतारें ॥ अभागे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु दया से सुधारें ॥अभागे
[13-542 ] नर जनम गया बरबाद, मूरख ना चेते ॥टेक।। मन इन्द्री के भोग भुलाना, इनमें कौन सवाद ॥ मूरख करम धरम पाखंड पसारा, भूठा वाद विवाद ॥ मूरख औरन को नित दोष लगावे, अपना अन्त न आदि ॥ मूरख बन्धे सकल माया की रसरी, लोक लाज मरजाद ॥ मूरख राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सत्तनाम कर याद ॥मूरख
[14-543 ] सतगुरु दीन अजब उपदेशवा ॥टेक॥ जब से सुनी गुरु की बानी, मिट गया मन का सकल अंदेसवा ॥ सत काल करम माया नहीं व्यारे, नासा जग का बिपत कलेसवा ॥ सत सत्त धाम से सतगुरु आये, धुरका दया से दीन संदेसवा ।। सत शब्द योग का साधन सीखा, सुरत चली घट गुरु के देसवा ।। सत देवी देव की गम नहीं वामे, वहाँ न ब्रह्मा विश्णु महेसवा । सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कागा भया हंस के भेसवा ॥सत
[ 15-544 ] जग जाल फैसा मेरा मन पानी ॥टेक॥ समझ न आवे जूझ न पाये, दया त्याग भया सन्तापी ॥ जग अन्त समय कुछ काम न आये, यम की जब सीस पड़े थापी जग बिन कारज उत्पात मचावे, दंड सहे आपहि आपी ॥ जग भक्ति के पन्थ पग नहीं देवे, काम क्रोध की डगर नापी जग राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब तो छोड़ा आपा तापी ॥जग
17-546 । सत सोत से अमृत धार बहे ॥टेक। जो कोई सत की ओर सिधाये, तीन ताप दुख नाहीं सहे ॥ सत आस बुझे भव प्यास न लागे, माया की अग्नि नाहीं रहे ॥ सत उत से मोड़े इतसे जोड़े, सत्त पुरुष की दया लहे ॥ सत चाह मिटे चिंता हटे मन से, घट में सुख आनन्द रहे ॥ सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, साध देख कर ऐसा कहे ॥सत
[ 18-547 ] मैं तेरी न मानूंगी बात बेदरदी, जा जा जा रे ॥टेका। जब से पड़ी मन माया के पाले, बिलपी दुख पा पा पारे ।। मैं तेरी काल नगर में कलेस है भारी, सही विपत आ आ आ रे ॥ मैं तेरी काल काग सम रार मचावे, नहीं भावे तेरा का का का रे ॥ मैं तेरी गुरु गुन गाय रहूँ हरषानी, सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सा, रे। मैं तेरी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु का ध्यान हिये ला ला ला रे॥
[19-548 ] मैं होगई गुरु सत संगी हो, मैं होगई ॥टेक।। ध्यान धरत आपा सब बिसरा, जैसे दीप पतंगी, हाँ दीप पतंगी हो ॥ मैं होगई भजन में देह गेह सुध भूली, ज्यों गति कीट भृगी, हाँ ज्यों गति कीट भृगी हो ॥ मैं होगई सुमिरन रंग गुरु का धारा, अब नहिं रहुँ कुरंगी, हाँ नहिं रहूँ कुरंगी हो ॥ मैं होगई सुमिरन भजन ध्यान निस वासर, सुरत निरत भई चंगी, हाँ भई चंगी हो ॥मैं होगई राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम की सहज उमंगी हाँ सहज उमंगी हो ॥मैं होगई
[ 20-549 ] चल घट की ओर सुरत प्यारी, जहाँ नित अमृत जल बरसे ॥टेक॥ घट की लीला अगम अलौकिक, घट से काज सभी सरसे ॥ जहाँ0 घट में नूर सुरूर शब्द सत्र, घट का बासी नहीं तरसे ॥ जहाँ घट में राधास्वामी चरन निवासा, घट में चरन कमल परसे ॥जहाँ0
[22-551 ] सरने की बात निराली है, सपने की ॥टेक॥ साना तोज तेव्हार का उत्सव, सपना होली दिवाली है ।सपने की सपना तोप बन्दूक है सपना, सपना खड़ग भुजाली है ॥सपने की यह संसार रैन का गड़वा, कभी भरा कभी खाली है ।सपने की साना माया साना काया, साना लोटा थाली है ।सपने की राधास्वामी गुरु मिल भेद बतावें, जग सपना जंजाली है ।सपने की
[23-552 ] तेरे घट में बिमल बहार, तू बाहर ना जारे ॥टेक।। तेरे घट में खेत कियारी, घट में गुल गुलजार ॥तू बाहर निरख परख लख घट की लीला, अन्तर सोच विचार ॥तू बाहर बाहर मुख बन उमर गवाई, अन्तर मुख चित धार ।। तू बाहर भीतर बाहर फिर साल करले, हो जीवन उद्धार ॥तू बाहर अन्तर में तेरे सूरज चन्दा, झलके ज्योत अपार ॥तू बाहर शब्दनाद गूंजे घट भीतर, अनहद धुन झनकार ॥तू बाहर राधास्वामी योग की महिमा, कोई न बरने पार ॥तू बाहर बिनती
[ 553 ] सहज में भव पार कर दो, नाव है मँझधार में । है तुम्हारे हाथ रक्षा, हूँ दुखी संसार में ॥ शब्द साखी क्या सुनू मैं, सुनते जी अब भर गया। मुझको जीता तुम न समझो, जीते जी मैं मर गया। तुमने मेरी बाँह पकड़ी, अब तुम्ही को लाज है। राधास्वामी सतगुरु मेरे, मेरा अटका काज है ।। प्रार्थना
[ 554 ] तुम आये इस जगत में, दीन जीव के काज । अब तो तारे हो बने, तुम्हें हमारी लाज || हम तो आप हो पतित हैं, तुम हो पतित उधार । आये पड़े भव सिंध में, कीजे भव जलपार ।। शब्द जहाज चढ़ाय कर, सुरत निरत की डोर । बेड़ा कीजे पार प्रभु, निरख आपनी ओर ॥ दुरव भंजन मन रंजना, साज भक्ति का साज । दीन दुखी को तारिये, सन्तों के सरताज । तुम तो समरथ साईयाँ, सब जग के आधार । साध संग नित दीजिये, राधास्वामी परम दयार ॥ चौदहवीं धुन
[ 1-555 ] मन भजले गुरु करतार को नित, मन भजले ॥टेक॥ गुरु है आनन्दघन सुखरासी, अजर अमर घट घट के बासी । तेज पुञ्ज और सहज प्रकाशी, मायातीत अगम अविनासी । उनके चरन लगाले चित ॥मन भजले0 सत चित आनन्द अद्भुत मूरत, मुक्त बुद्ध शुद्ध प्रेम की मूरत । पाया मानुष जनम महूरत, हिये का त्याग विकार करत । गुरु से होगा तेरा हित ।। मन भजले राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु दयाल हैं जग हितकारी । वही राम और कृष्ण मुरारी, वही ब्रह्म परब्रह्म सुरारी । भजन ही भक्त का उद्यम बित ॥मन भजले
[2-556 ] तेरा जनम अकारथ जाय, मन कुछ चिंता कर ॥टेक॥ खेल कूद में समय गंवाया, गुरु पद कमल न नेह लगाया। सुमिरन ध्यान भजन बिसराया, बोरे हाथ तेरे क्या आया। काम बने अब क्या पछिताय ।। मन कुछ0 करम धरम सब भाम की खानी, तीरथ बरत अज्ञान कहानी । भेद न पायें ज्ञानी ध्यानी, सब मिल पिसे माया की घानी । भटके माया के जाल फसाय ॥मन कुछ0 भूल भुलैय्याँ जग व्योहारा, मिथ्या है प्रपंच पसारा । योनी जये में जनम को हारा, राधास्वामी नाम न सुमिर विचारा। गुरु संग कोई बड़भागी पाय ॥मन कुछ0
[ 3-557 ] तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना । नीचे नीच नीच की संगत, नीच भात में नीच की रंगत । त्याग कुसंगत कर सतसंगत, भव के दुख सुख क्यों सहना ।।टेका सीधा मारग जगत का, उलटा सन्त का पन्थ । जो कोई उलटे मग चले, सो पानिज कन्थ । तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ॥ नीचे माया नीचे काया, नीचे झाँई नीचे छाया। इसके भरम में जो कोई आया, सो तो रहा यम बंध बंधाया। भव के भरम में क्यों बहना ॥तुम उलट ऊँचे गंग तरंग है, ऊँचे जमुन का नीर । ऊँचे सरस्ती धार है, सिंधु अथाह गम्भीर । तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।। नीचे कष्ट कलेश है भारी, नीचे जाया करे दुखारी । करम भरम में पड़े संसारी, सार न पात्र माया धारी । तीन तार में क्यों दहना ।। तुम उलट0 । ऊँचे सूर्य प्रकाश है, ऊँचे चन्द्र की जोत । ऊँचे ज्ञान भण्डार है, ऊँचे सत का सोत । तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ॥ नीचे नीच क्रोध की घाटी, नीचे ताणा मोह कुठाटी । नीचे लोभ की जलती भाटी, नीचे भरम की पड़ी है टाटी । नीचे नीच का है लहना ॥तुम उलट ऊँचे पुरुष विराट है, ऊँचे है ओंकार । ऊँचे शून्य का देश है, ऊँचे सौहंग सार । तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।। नीचे इन्द्री भोग विलासा, नीचे आसा नीचे बासा । नीचे जो कोई करे निवासा; सो तो रहे दिन रात निरासा । नीची राह को क्यों चहना ॥तुम उलट0 ऊँचे सत पद धाम है, ऊंचे अगम अलेख । ऊचे राधास्वामी नाम है, ऊचे चढ़कर देख । तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना । नीचे काल करम है व्यापा, नीचे भरम पाखंड का पापा । नीचे माया मारे छापा, भ्रान्ती से नहीं सूझे आपा । नीच कथा को क्यों कहना ॥तुम उलट0
[4-558 गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने । दीवाना क्यों घबराना है, क्यों भूला तू नादाना है। गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।टेक।। गुरु ही विषणु महेश हैं, गुरु ही वरुण गनेश । गुरु ही शेष सुरेश हैं, गुरु ही धनी धनेश । गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ॥ दीवाना0 गुरु ब्रह्मा गुरु जगपति, गुरु को समरथ जान । गुरु ब्रह्म परब्रह्म है, गुरु पद में कल्यान । गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने । दीवाना0 गुरु आये इस जगत में, धार सन्त अवतार । शब्द जहाज चढ़ाय कर, कर जीव भव पार । गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।। दीवाना0 गुरु ही साँचे मीत है, हितकारी निजदेव । और सबन को त्याग दे, कर गुरु चरनन सेव । गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने । दीवाना0 राधासामी सतगुरु, सत्य पुरुष सत रूप । सतनामी सतधाम धुर, सतस्वामी सत भूप । गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने । दीवाना
[5-559 ] भक्ति के मारग जो आवे, भक्ति के टेक। जग जंजाल का नाता तोड़े, चित गुरु चरन कमल में जोड़े। काल करम का माथा फोड़े, मन को सहज ही इत ते मोड़े। आवागमन नसावे, हाँ आवागमन नसावे ॥ भक्ति के साधु की संगत गुरु की सेवा, करे भरम के त्यागे भेवा। दुख से बचे रहे सुख लेरा, निज घट देखे देवी देवा । आत्म आनन्द पावे, हाँ आत्म आनन्द पावे ॥ भक्ति के0 ध्यान न लावे कथनी बदनी, निस दिन करे परमारथ करनी। कमल नीर की धारे रहनी, पृथवी तज नभ मंडल चढ़नी । शब्द में सुरत लगावे, हाँ शब्द में सुरत लगावे ॥ भक्ति के0 उलट दृष्टि ताके ब्रह्मांडा, अन्तर लखे प्रकाश प्रचंडा। लगी समाधि अगाध अखंडा, मारे भ्रान्ती के सिर दंडा। सोया मनुआ जगावे, हाँ सोया मनुवा जगावे ॥ भक्ति के0 प्रेम डगर की अकय कहानी, बरमत अन साये मन बानी । दूर हुये चित की हैरानी, राधास्वामी चरन शरन सहदानी। नर जनम सुफल करावे, हाँ नर जनम सुफल बनावें ॥भक्ति के0
[9-560 ] कोई माने न गुरु की बात, धोखे धार बहा ॥टेक॥ सौदा करने हार में आया, गाँठ की पू जी धूर मिलाया । माया मिली न रात हो पाया, दुविधा साथ रहा ॥ धोखे0 निस दिन भूठा वाद विवादा, लंपट मन इन्द्री के स्वादा। मन नहीं मारा चित नहीं साधा, दारुण कन्ट सहा ॥ धोखे, नहीं विचार नहीं हिो विवेका, झूठो पन में धारी टेका। सूझा एक न सूझ अनेका, राधास्वामी पद न गहा ॥धोखे0
[ 7-561 ] मेरा तेरा कहाँ हो मेल, तू भव धार बहा ॥टेका। मैं तो देखू आँखों अपनी, तेरे हाथ ग्रन्थन की छपनी । मुझे नाम तुझे माया जपनी, भेद अपार महा ॥ तू भव0 तेरा इष्ट है जग की माया, मैं माँगू सतगुरु की दाया। मैंने सुख से लगन लगाया, तूने कलेश सहा ॥ तू भव0 तू पढ़ता है विद्या थोथी, मैं पढ़ता हूँ मन की पोथी। तेरे पीछ माया खोह थी, मैं गुरु चरन लहा ।। तू भव0
[8-562 ] शब्द कमाई कमावे, सोई मेरा साथी ॥टेक॥ चढ़ असमान गगन को धावे, विषय वासना चित से मिटावे । पृथवी छोड़ अधर धन पावे, सेवे गुरु की थाती ॥सोई मेरा0 नौ को त्याग दसम दर लागे, जग दारुण से पल पल भागे। इधर से सोवे उधर से जागे, बाँधे न घोड़े हाथी ॥सोई मेरा0 आवे न जाय न पन्थ दिवाना, ज्ञान ध्यान तत्र सहज सियाना । राधास्वामी चरन शरन मस्ताना, साधे न पोथी पाथी॥सोई मेरा0
[9-563 ] सन्तों का मारग झीना है, सन्तों का ॥टेक॥ यह तो नित्य निवृति का रस्ता, मॅहगा नहीं बहुत है सस्ता । चल इस मग में हँसता हसता, तू क्यों लाचार अधीना है ।संतों0 सन्त शब्द का सार बतावें, हाथ पकड़ भव सिंधु तरावें।। कलि कलेश से सहज बचायें, ले शरण जो तू परवीना है संतों0 सन्त दया के रूप हैं भाई, औरों में है कुटिल खुटाई।। न्याग जगत यह अगमापाई, चार दिना का जीना ॥ संतों नूर कलाम शब्द प्रकाशा, पन्थ मैं होता सहज उजासा।
तिमिर अविद्या सभी विनासा अमी नाम रस पीना है ॥संतों0 सहसकमलदल घंटा बाजे, त्रिकुटी ओंकार धुन गाजे । भँवर गुफा में मुरली साजे, सत्त धाम सुख बीना है ॥ संतों0 गगन मंडल की ओर सिधारो, घट में लखो सवा लख तारो । सूर चाँद का होत उजारो, वहाँ एक न दोय न तीना है ॥ संतों0 कोई बड़भागी पन्थ में आवे, शब्द युक्ति से काज बनावे । सत्त लोक में बासा पावे, राधास्वामी पद में लीना है। संतों
[10-564 ] पी पी रे अभागे आय, गगन से बून्दा झरे ।।टेक॥ क्यों प्यासा मरे क्यों आह भरे, क्यों छाती जरे क्यों शोर करे । पी पी करते दिन गया, पिया न निर्मल नीर । पिया का प्रेम जल ना मिला, तन मन व्यापी पीर पी पी रे0 रात दिवस प्यासा रहा, तड़प तड़प अकुलाय । प्रेम बून्द से भेंट नहीं, व्याकुल तन घबराय ॥ पपीहा प्यासा स्वांति का, गहे न दूजा नीर । माँगे पिया का प्रेम रस, मन नहीं धारे धीर ॥ पिया पियाला प्रेम का, मन की बुझी पियास ।। हिया जिया की तृष्णा गई, अब नहीं रहूँ उदास ॥ गुरु चरनामृत को चहूँ, चहूँ न गंगा का सोत । सुख दायनी मन भावनी, तासों तृप्ति होत ॥ पपीहा के कुल जनम ले, तनँ न कुल अभिमान । के पाऊ गुरु दरस चल, के मैं त्यागू प्रान ॥ राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाय । राधास्वामी सुमिर मन, गुन गा गा हरषाय ॥
[ 11-565 ] पी पी सुधारस नाम, तेरा नर जनम बने ॥टेक॥ क्यों जन्मे मरे क्यों जग से डरे, क्यों त्रास करे क्यों गिरे परे ॥ राता माता नाम का, ले अमृत रस चाख । माया काल का संग तज, निश्चय गुरु की राख ॥ तेरा नर0 नाम जपत भव सिंधु तरे, पापी पतित अनेक । ज्ञान भक्ति सब नाम में, धार नाम की टेक ॥ तेरा नर0 कामी क्रोधी लालची, पापी तरे अनन्त । नाम ही के प्रताप से, पाई पदवी सन्त ॥ तेरा नर0 नाम नाम में भेद है, नाम नाम में भाव । सोई नाम को सुमिरिये, जो गुरु बतावें दाव ॥ तेरा नर0 धुनात्मक सोई नाम ले, वर्णात्मक तज डार । राधास्वामी की दया, भव से जावे पार ॥
[ 12-566 ] नहीं कोई तेरा यगाना है, नहीं कोई ॥टेक।। आवत साथ नहीं कोई आवे, जाते समय कोई संग न जावे । तू क्यों इनसे नेह लगावे, क्या सचमुच दीवाना है ।। नहीं चार दिना का यह जग मेला, करता है क्यों ठेलम ठेला । आया अकेला जाय अकेला, यह तो देश विराना है ॥ नहीं हाथी घोड़े माल खजाना, खेत मुल्क जंगल मैदाना। इनका नहीं है ठौर ठिकाना, इनमें क्यों भरमाना है। नहीं राम गये रघुकुल के पालक, रावण गया निशाचर घातक ।। रहे वशिष्ट न ऋषि उद्दालक, भूठा सब मद माना है ॥ नहीं सतगुरु सन्त की महिमा भारी, वह तेरे साँचे हितकारी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, शरन में है जो सियाना है ॥नहीं
[567 ] चरन शरन गुरु दीजिये, शरनागत आया। सेवक सब विधि जानकर, गुरु कीजे दाया । अपराधी कामी कुटिल, दम्भी और मानी। खोट भरा छल कपट का, क्रोधी अज्ञानी ।। तारनहारा तारले, तू तारन आया। मो सम पापी कौन है, दे चरन की छाया । हार हार कर हारकर, हारा मन अपने । और कहीं नहीं आसरा, कोई सूझे न सपने ॥ निज बालक प्रभु जानकर, लीजे चरन लगाय । चरन कमल मन छोड़कर, और कहूँ नहिं जाय ।। प्रार्थना
[ 568 ] नाम दान दे अपना कीजे, गुरु निज सेवक जानी। चरन शरन की ओट बख्शकर, दीजे शब्द सहदानी ॥ मान न मागू धन नहीं मागू, नहिं सुख चैन विलासा। गुरु का अमृत नाम पायकर, करू गुरु की आसा ॥ गुरु मेरे पूरन परम सनेही, गुरु दाता गुरु ज्ञानी । गुरु के बल छूटे जम फंदा, मिले धाम निरवानी ।। राधास्वामी पल पल गाऊँ, राधास्वामी लव लाऊँ। राधास्वामी मेरे गुरु दयाला, गुरुपद नेह लगाऊँ। पन्द्रहवीं धुन
[1-569 ] गुरु महिमा अगम अपार, गुरु गति कौन कहे ॥टेक॥ बिन गुरु धर्म न कर्म कुछ, विन गुरु भक्ति न ज्ञान । जनम जनम यम फाँस है, बिन गुरु नहीं निरवान । चरन धूर सिरधार, शुद्धमति सोई लहे री ॥ गुरु0 देवी देवा ऋषी मुनी, सुर नर साध सुजान । हंस बंस अातार सब, गुरु महिमा को जान । गुरु हैं सत करतार, बिन गुरु कौन रहे री ॥ गुरु0 राम कृष्ण के गुरु हैं, गुरु मत गुरु वसिष्ठ । सत्त कबीर ने गुरु किया, गुरु है सबके इष्ट ।। बिन गुरु भव जल धार, निगरे सकल बहे री । गुरु0 दुख कलेश आपत विपत, चहूँ दिस जग में व्याप । जीव छुड़ावन सतगुरु, प्रगटे आप ही आप । सबका किया उद्धार, जो कोई शरण चहे री ॥ गुरु0 राधास्वामी आदि गुरु, परम दयाल प्रवीन । अभय करें पद भक्ति दे, तारें जीव अधीन । नहिं उसका वारा पार, जो गुरु भक्ति लहे री ॥गुरु0 | 2-570 ] मैंने सौदा किया न कोय, पूजी छीन गई ॥टेक।। बनजारों को देख कर, आया जगत की हाट । ठग डाकू मग में मिले, होगया बारह बाट । मैं तो गया नींद में सोय, तासों लूट भई री ॥ मैंने सौदा घर का भया न बाट का, बाहर रही न साख । व्यौपारी कोई ना मिला, सके जो पति मेरी राख । सब विधि आपा खोय, चहुँ दिस भर्म मई री ॥मैंने सौदा राधासामी दीन हित, मिले महाजन आय । भक्ति पारस बख्श कर, कीनी मेरी सहाय ॥ मैं पड़ा चरन में रोय, गुरु ने शरन दई री ॥मैंने सौदा
[3-571 ] गुरु कीजे आप सहाय, चरन में आन पड़ा ॥टेका। कामी क्रोधी लालची, दम्भ कपट की खान । मान बड़ाई कुटिलता, यह सब मेरे निशान ॥ आप मेरे पितु मात, मैं भव खोह गड़ा री ।। गुरु0 बिलपत तलपत रात दिन, कोई साथ न संग । निरख परख अपनी दशा, चित मलीन भया भंग ॥ रहूँ छिन छिन अति पछताय, भरम बस विकल खड़ारी ॥ गुरु0 काल करम के जाल में, उरझ उरझ उरझाय । सुलझावे मेरी कौन गति, मुख से निकसे हाय ॥ नहीं सूझे कोई उपाय, आप कीचड़ में सड़ा री ॥ गुरु0 कायर सम भयभीत हूँ, माया रन में हार । भागत बने न भागते, हाथ नहीं हथियार ॥ भरम पड़ा हूँ आय, सिर पर बोझ कड़ा री ॥ गुरु0 राधास्वामी दीन हित, अपना बल दे दान । संकट काटो दुख हरो, मेटो विपत महान ।। दया से काल हटाय, चरन में आन पड़ा री ।। गुरु0
[4-572 ] गुरु कीजे मेरी सहाय, शब्द में चित मेरा लागे ।टेक।। मेरी सोई सुरत अचेत, शब्द सुन घट में जागे । तुम दाता दीन दयाला, सुनिये मेरी बिनती ॥ मैं भूला चूका हाय, न इनकी कीजे गिनती ॥गुरु व्याये क्यों मद मह, हुरे नब सतगुरु रक्षक । यम काल का भय मिट जाय, यह दोनों विषधर तक्क्षक ।। गुरु0 राधास्वामी करुणा सिंध, आस करो मेरी पूरी । लो चरन शरन में आप, न हो अब चरन से दूरी ॥गुरु0
[5-573 ] कर सतसंग अस्नान, तीरथ राज यही ॥टेक॥ गंग भक्ति जमुना कर्म धारा, सरस्वती ज्ञान मई । न्हाये धोये सुरत भई निर्मल, चिन्ता चित न रही ।। तीरथ ईडा पिंगला नील रंग छवि, सुखमन स्वेत कही। केसर तिलक भाल दे न्यारा, प्रेम का रूप लही ॥ तीरथ सहस कमलदल मार ले आसन, ओम का मंत्र गही । सुन्न समाध अखंड रचाले, ध्यान का सार यही ॥ तीरथ भँवर गुफा चढ़ जीत काल को, माया मोह दही । सत पद अलख अगम राधास्वामी, धुर पद धाम वही ॥ तीरथ ऐसा तीरथ मिले भाग से, यम की फाड़ भई । राधास्वामी मौज निरख घट अन्तर, छाछ त्यागले मही। तीरथ
[9-574 ] सब भोगे बारम्बार, अवश फल कर्म किये का।। यह सोच समझ चित धार, मरम जग जगत जिये का।टेक।। सुर नर देवी देव महाऋषी, और ब्रह्म अवतारा । एक जो कहिये राम महाप्रभू, पुरषोत्तम मर्यादा ।। गप्त घाट सरजू जल बू हे, रामायण सम्बादा ॥ यह सोच दूजे कहिये कृष्ण विवेकी, सोलह कला के पूरे । यदुकुल नाश भील की गाँसी, भये मान मद चूरे ॥ यह सोच तीजे युधिष्ठिर धर्मराज की, अकथ अपार कहानी । भाई भारजा संग गले सो, हिम सब कोई जानी ॥यह सोच चौथे वशिष्ठ महा मुनि ज्ञानी, देखा कुल का नाता । विश्वामित्र के हाथ पलट गया, ज्ञान योग का पासा | यह सोच पंचम दशरथ अवध नरेशा, श्रवण ऋषि को मारा । पुत्र वियोग प्राण को त्याग, मिला न राम सहारा || यह सोच छटे इन्द्र की करनी समझो, शाप वृहस्पति दीना। भगमय देव राज की काया, करम का फल यह लीना यह सोच चन्द्र कलंकित काम वेग से, जाने सब संसारा। करम अटल है महाबली है, कोई कोई करे विचारा ॥ यह सोच रावण वाली भरत जड़ ज्ञानी, ऋषि के सुत दुर्वासा। करम किया तैसा फल पाया, अन्त में भये उदासा । यह सोच सुन प्रसंग चित अपना साधो, सोधो मन कर्म बानी । शब्दयोग कर जनम बनाओ, राधास्वामी की सहदानी।यह सोच
[7-575 ] मन में बसे गुरु रूप, दरशन क्यों न बने ॥टेक॥ निकट दूर सब कल्पना, चित चंचल की रीति । चंचल मन कर थिर सदा, सीखले प्रेम प्रतीति ॥ दर्शन आपा तज नहीं गुरु भजे, रहे चिन्ता लवलीन । दर्शन रस तो वह लिये, गुरु चरनन आधीन ॥ दर्शन जो होना है हो रहे, मौज मौज की बात । दास रहे गुरु मौज पर, फिर नहीं कोई उत्पात ॥ दर्शन चिन्ता किसकी कीजिये, स्थिर नहीं संसार । चिन्ता तो एक नाम की, नहीं और में सार । दर्शन होनी अनहोनी नहीं, अनहोनी नहीं होय । ऐसा समझ विवेक से, रह गुरु चरनन सोय ॥ दर्शन करता धरता क्यों मिले, करतापन अभिमान । आगा मन का मेटकर, धर सतगुरु का ध्यान ॥दर्शन दुचिताई दुविधा कठिन, दुरमति अटका मन । सेवक मौज अधीन है, नाहीं और जतन ॥ दर्शन दृढ़ प्रतीत भरोस से, जो रहे मौज आधार । हाजिर गायब हो सदा, सतगुरु के दरबार । दर्शन राधास्वामी मौज लख, मौन वृत्ती ले धार । पल पल सुमिरन नाम का, सुमिरन करे संभार ॥दर्शन
[8-576 ] प्रेम की महिमा कहे कौन, यह है अकथ कहानी ।टेक।। प्रीतम प्रेमी एक रूप दोउ, अन्तर भेद न जानो। शवरी राम की कथा बाँच लो, दोनों एक पिछानो ॥ यह है झूठे बेर स्वाद ले खाये, ऋषि मुनि घर नहीं आये। मोहे देख भीलनी की गति, शबरी के प्रेम रिझाये ॥ यह है धृतराट की सभा को त्यागा, बिदुर के घर चल आये। कृण प्रेम रस भाव के भूके, साग अलोना खाये ॥यह है धर्मराज की सभा में लाखों, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।। आये स्वपच बिना नहीं बाजा, घंटा सब कोई जानी ॥ यह है राधास्वामी दीन दयाला, प्रेम की रीति चलाई । जो कोई चरन शरन में आये, प्रेम पदारथ पाई ॥यह है
[9-577 ] बदला मन का रंग, प्रेम जब चित में बसा ॥टेक॥ पहले मन था हिंसक पूरा, जीव घात नित करता । अब तो प्रेम के रंग रंगाना, प्रेम प्रीत लख मितरा ॥ चित में पहले मन परबत कठोर था, लगी प्रेम की टाँकी । कंचन रतन की खान खुली घट, प्रीतम की बना झाँकी॥चित में पहले मन था काग समाना, अनुचित बानी बोले । अब कोयल सम मधुर बोल है, प्रेम आम चढ़ डोले ॥चित में दया क्षमा करुणा बसे, प्रेम प्रीत परतीत । यह घर मेरा रात दिन, यह भक्ति की रीत ॥ मन में जुड़े यह अद्भुत समाज ॥ मेरी0 कथनी बदनी त्याग कर, रहनी से चित लाय ! गुरु गम को ही गम लहूँ, अपना जनम बनाय ॥ यही करो मेरा तुम जल्द काज ॥ मेरी0 व्यापे कलह कलेश नहीं, रहे एक रस ध्यान । सम जीवन सम भावना, सम दृष्टि सम ज्ञान । राधास्वामी हो तुम राजों के राज ॥मेरी0
[10-578 ] प्रगटा प्रेम प्रभाव, लगन प्रीतम संग लागी ॥टेक॥ जोती जले प्रेम की घट में, मन मेरा भया पतिंगा। जरत न मोड़े अंग वह अपना, न्हाये जोत की गंगा ॥ लगन धारा वही प्रेम की मन में, मैं मछली बन आया। बिछड़त पल में प्रान को त्यागू, ऐसी लगन लगाया ॥लगन भृगी गति लख ध्यान जमाया, कीट प्रेम अनुरागी। भृगी बना ले पंख उड़ा सोई, सुरुचि सुभाव सुभागी ॥ लगन चन्द्र की छबि शोभा लख रहा, कोमल चित्त चकोर । आग में चन्द्र का टूढ़े दर्शन, मारे टूठ कठोर ॥ लगन राधास्वामी प्रीतम पूरे, आकर अंग लगाया। प्रेम दान दे मोहि अपनाया, अपना आप बनाया ॥लगन
[11-579 ] कौन गिने तिथि वार, प्रेम जब मन में रमा टेक।। प्रेम प्यार जब चित में समाना, तन मन की सुध भूली। प्रेमी सुरत पिंड के अन्तर, रहती फूली फूली ॥ प्रेम जब प्रेम बाज जब मन की शाखा, पर फैलाय के बैठा । काम क्रोध पक्षी उड़ भागे, घोंसला एक न पैठा ॥ प्रेम जब मन में प्रेम का रंग जमा जब, जग का रंग भया फीका । प्रीतम बिन कोई और न सूझे, प्रेम का सच्चा नाता ॥ प्रेम जब एक भाव घट अन्तर आया, दुचिता दुर्मति भागी। दुविधा का घर राख भया है, प्रेम ने देदी आगी ॥प्रेम जब राधास्वामी सतगुरु आये, प्रेम का पन्थ चलाया। प्यारे प्रीतम की लख सूरत; घट में दर्शन पाया ॥प्रेम जब
[12-580 ] गुरु मुख बिन जाने नहीं कोई, गुरु का भेद अपारा टेक।। कहन सुनन की बात नहीं है, पोथी ग्रन्थ से न्यारा । नहीं यह ज्ञान न योग की किरिया, नाहीं विवेक विचारा।। गुरु का घट में चढ़ कर सुने शब्द धुन, सहस कमल मझारा । फिर त्रिकुटी के महल में बासा, परसे पद ओंकारा ॥ गुरु का सुन्न शिखर पर आसन मारे, त्यागे भर्म विकारा । महासुन्न में लगी समाधी, सूझे अपर अपारा ॥ गुरु का भँवर गुफा सोहंगम दरसे, जगमग जोत उजारा । सत्त धाम में सतगुरु दर्शन, पावे गुरु मुख प्यारा । गुरु का अलख अगम की गति गम निरखे, लख अखंड पसारा । भक्ति युक्ति के प्रेम से पहुँचे, राधासामी के दरबारा ।। गुरु का
[ 13-581 ] गुरु मिले मुलावनहार हिंडोला गगन पड़ा ।।टेक।। इंगला पिंगला खम्ब है दोई, सुखमन पाट पड़ा। मकर तार गत शब्द का कोमल, बाँधा दृढ़ सकड़ा । हिंडोला प्रेम भक्ति के कल में ताला, निश्चय भाव जड़ा। चित की कुंजी ऐंठ जो दीनी, भूला भूल पड़ा । हिंडोला सहज समाध की पंग चली जब, सुरत निरत जकड़ा। सुध बुध तन मन की सब भूली, यम का जाल सड़ा ॥ हिंडोला तीन ताप की बिपता नासी, काल अचेत खड़ा । माया ठगनी तोड़न लागी, मोह भरम छकड़ा । हिंडोला सुरत शब्द का झूला न्यारा, साधन का तकड़ा। राधास्वामी दया भेद सब पाया, उलटा भव पलड़ा ॥हिंडोला
[ 14-582 ] तू भरम रहा संसार, तेरी बुद्धि गई ॥टेक।। किसी का तू नहीं कोई न तेरा, क्यों करता है मेरा तेरा। सोच सोच ले सोच सोरा, दुर्गति बहुत भई ॥तेरी बुद्धि भरम हिंडोले भूला प्रानी, भरम से भरम भरम की खानी। भरम से अपनी करता हानी, चहुँ दिस भर्म मई ॥ नौ को छोड़ द्वार दस सजा, सुन्न मंडल के धाम में बसजा। भक्ति प्रेम के रस में रसजा, चोली पहर नई ॥ तीन गया चौथा पन आया, अब भी चेत न तुझको भाया। मोह जाल में रहा फंसाया, बन्धन कई कई॥ राधास्वामी वैद बन आये, सतसंग औषधलय ठेराये। क्यों नहीं औषधि अपनी कराये, तुझको रोग छई ॥
[15-583 ] मेरी सुध बुध करना आप, बिकल मन तड़प रहा ।।टेक।। काल करम से बहु दुख पाये, असह कलेश सहा । अब तो दया का मिले सहारा, चरन की ओट गहा ॥ विकल मन भव की धार कठिन अति गहरी, जीव अचेत बहा । गोते खा खा निबल शरीरा, पाया कष्ट महा ॥ विकल मन अपना बल कुछ काम न आवे, नहीं सुख चैन लहा। कौन उपाय करूँ नहीं जानें, क्या कहूँ बहुत कहा ॥ विकल मन कृपा करो मेरे प्रीतम प्यारे, प्रेम की गंग बहा ।। तन मन में मेरे शान्ती आवे, त्रय दुख अग्नी रहा । विकल मन राधास्वामी आस करो मेरी पूरी, निर्धन भक्ति चहा । भक्ति रतन सम कुछ नहीं देखा, जग का सिंध थहा ।। विकल मन
[19-584 ] कर प्रेमी जन का संग, तेरा नर जनम बने ॥टेक।। लोन की खान में वस्तु पड़े जब, लोन सहज हो जावे । प्रेमी जिसका संग करे जो, प्रेम प्रीति गति पावे ॥ तेरा नर0 पत्थर लोहा जल में बूड़े, काठ का बेड़ा तेरे । लदे लोह पत्थर जब बेड़ा, नीर के ऊपर है रे ।। तेरा नर0 संगत कर उत्तम सज्जन की, सज्जनता चित आवे । पड़े असज्जन की जो संगत, विरथा जनम गवावे ॥ तेरा नर0 तोता मैंना भक्त के घर में, राम नाम नित गाते । वही अभक्त असाध की संगत, अनुचित बैन सुनाते ॥ तेरा नर0 यह विचार कर संग गुरु का, गुरु गम ले पहचानी। राधास्वामी की शरनाई, होजा ज्ञानी ध्यानी ॥तेरा नर0
[17-585 ] गुरु कीजे मेरी सहाय, विपति से तड़प रही ॥टेक॥ रोग सोग से रही घबरानी, चित में छाई है हैरानी। छूटन की कोई विधि न जानी, काल करम भरमाय ॥ विपत से0 ना जाने क्या कर्म कमाये, जीवन कष्ट कलेश बिताये। छिनभर सुख चैन नहीं पाये, हिया जिया नित अकुलाय ॥ विपत से0 राधास्वामी दीन दयाला, काटो आपति का जंजाला।। अपना बल दे करो निहाला, गुन गाऊँ लव लाय ॥विपत से0
[18-586 ] दुख सहा जगत में आय, न सत पद जान के भूलू गी ॥टेक।। यह संसार है दुख की खानी, मन में उपजी मेरे गलानी । कैसे अपनी सुनाऊँ कहानी, तज दुख के डगर को सजनी । सुख के हिंडोले भूलू गी ।। न सत0 स्वारथ बस सबने है फंसाया, दुख में कोई काम न आया । अब ज्ञान अन्त में पाया, कर गुरु का संग दिन रात । उमंग आनन्द में फुलूगी ॥ न सत राधास्वामी भक्ति के दाता, तुम हो सच्चे पितु अरु माता । सम्बन्धी मीत विधाता, ले नाम तुम्हारा ज्ञान अंकुस से। मन मतंग को हूलू गी॥न सत0
19-587 1 तूने सतगुरु किया न संग, काल से कौन बचावेगा ।टेक।। परमारथ स्वारथ खोया; नहीं अशुभ वासना धोया। दुष्कर्म बीज घट बोया, फल पाकर अन्त में रोया। लिया बोझ सीस पर बड़ा, भार यह कैसे उठावेगा ॥ काल से0 खटपट में उमर गवाई, तीरथ बरत रहा भरमाई । पाखंडवाद चित लाई, नहीं सूझी अपनी पराई । आये दिन मल मल हाथ, कष्ट से बहु पछतावेगा । काल से0 जग माया अगमापाई, नहीं कोई सगा सहाई । मतलब के बन्धु भाई, झूठे बन्ध रहा बन्धाई । जब आया काल का समय, साथ तेरे कोई न जावेगा ।काल से0 धन दौलत माल खजाना, घर बार मुल्क मैदाना। व्यौहार का ताना बाना, तूने भेद न इनका जाना । पड़ भरम फाँस के फंद गला,यम खड़ग से हाय कटावेगा।काल से राधास्वामी जग में आये, भक्ति मत पन्थ चलाये । गत सुरत शब्द धुन गाये, दुखियों को अंग लगाये । ले चरन कमल की छाँह, जल्द नर देही सुफल करायेगा ।काल से0
[ 20-588] तेरा भेद न जाने हाय, जगत धोखे में रहा ।।टेक।। बिन बानी का शब्द है, बिना अक्षर का ग्रन्थ । बिन मन बुद्धि विवेक है, बिना डगर का पन्थ । कोई कैसे आवे जाय, भरम की धार बहा ॥ तेरा भेद0 सत्त तत्व के सिखर पर, दूत अद्वत न कोय । मन चिउटा फिसला गिरा, बुद्धि माखी रही सोय। चित पक्षी न उड़ाय, बहु दुख कष्ट सहा ॥ तेरा भेद0 बिन बादल पानी बरस, बिना बून्द का मेह । भीजे तन मन सहज में, नगर ग्राम और गेह । चहूँ ओर बरसाय, घटा छाई है महा ॥ तेरा भेद0 मन अलसाना अमन बन, बुद्धि बनी अबुद्ध । चित अचेत चेते नहीं, कैसे पावे सुद्ध । नहीं सूझे जतन उपाय, किसने मर्म लहा ॥ तेरा भेद0 ‘नेति नेति’ कोई कहे, ‘एति एति’ कहे कोय ।। ‘नेति एति’ कोई नहीं, चतुराई गई खोय । जब सतगुरु भये सहाय, राधास्वामी चरन गहा ॥तेरा भेद
[21-589 ] क्या है पद निर्वाण, नहीं कुछ समझ में आवे ॥टेक।। कोई करे इस लोक की आसा, कोई परलोक बतावे । कोई कथे ज्ञान ध्यान की महिमा, भेद न कोई पावे ॥ नहिं कुछ मंत्र पढ़े संध्या जप तप करे, देवी देव मनावे । मन्दिर मूरत की परिकर्मा, बैठ के ध्यान लगावे ।। नहिं कुछ मत का मतवाला बन देखे, पक्षपात उरझावे । झगड़ा ठान के करे लड़ाई, भरमे और भरमावे ॥ नहिं कुछ आसन मारे योग यतन किये, गहरी समाध में जावे । जड़ चेतन की गांठ खुली कभी, जड़वत रूप बनावे ।। नहिं कुछ खोज खोज के खोज थके जब, गुरु की संगत जावे । राधास्वामी दया रूप लख आवे, सोई निर्वाह कहावे ॥नहिं कुछ
[ 22-590 ] तेरे मन में झाड़ झंकार, तू बन में ना जा रे । बन में क्या है सोचले भाई, बन अनबन तेरे मन में रहाई । क्रोध सिंह गीदड़ किदराई, लोभ लोमड़ी रीछ बुराई । यह बन साफ करा रे ॥ तू बन में हाथी अहंकार मतवाले, चीते द्रोह काल विकराले । इनके दाव को कौन संभाले, साधु संग मिल देखे भाले । संगत गुरु गम पारे॥ तू बन में बन जाना है मन के बन जा, दुर्मति अनबन त्याग के बन जा। गुरुमत शस्त्र साज तन तनजा, माया काल करम के रन जा। विजय की धूम मचा रे ॥ तू बन में0 माया बन में काल शिकारी, निस दिन सो करे मारा मारी । जीव वस्तु नित रहें दुखारी, इनकी दशा को कौन सुधारी । दुख की चोट न खा रे ॥ तू बन में राधास्वामी सतगुरु की शरनाई, बन बनकर मेरी बन आई। बिगड़ी बात गुरु ने बनाई, बन की करनी मोहि बताई। बनवारी संग चित ला रे ॥तू बन में
[ 23-591 ] गुरु रूप न समझे कोय, भरम में पड़े अज्ञानी ॥टेक।। गुरु को मानुष जानकर, भक्ति का करें व्यौहार । सो पानी अति मूढ़ हैं, कैसे जायें भव पार । देह के बने अभिमानी ॥ भरम में? गुरु को मानुष जानकर, शीत प्रसादी ले। सो तो पशु समान हैं, संशय में अटके । गुरु तत्व न जानी ॥भरम में गुरु को मानुष जानकर, मानुष करो विचार । सो नर मूढ़ गवार हैं, भूल रहे संसार । मोह के फाँस फसानी ॥ भरम में गुरु को मानुप जानकर, भेड़ की चलते चाल । वह बन्धन को क्यों तजें, व्यापे माया काल । पड़े योनि की खानी ॥भरम में गुरु नाम आदर्श का, गुरु है मन का इष्ट । इप्ट आदर्श को ना लखे, समझो उसे कनिष्ट । बात बूझे मन मानी ॥भरम में0 गुरु भाव घट में रहे, अघट सुघट की खान । जिसे समझ ऐसी नहीं, वह है मूढ़ समान । नहीं गुरु रूप पिछानी ॥भरम में चेला तो चित में रहे, गुरु चित के आकास । अपने में दोनों लखे, वही गुरु का दास । रहे गुरुपद घट ठानी ॥भरम में0 सुरत शिष्य गुरु शब्द है, शब्द गुरु का रूप । शब्द गुरु की परख बिन, डूबे भरम के कूप ।, नर जनम गंवानी ॥भरम में गुरु ज्ञान का तत्व है, गुरु ज्ञान का सार । गुरु मत गुरु गम लखे, फिर नहीं भव भय भार । कमल जैसी गति आनी ॥ भरम में गधास्वामी सतगुरु सन्त ने, कही बात समझाय । जो नहीं माने बचन को, उरझ उरझ उरझाय । कौन समझे यह बानी ।। भरम में
[ 24-592 ] गुरु दरस दिखादो जल्दी, विकल मन सोच रहा ।।टेक।। चैत में चित्र तुम्हारा देखा, चेत हिये में आया । मास बैसाख में साख मिली, गुरु बानी ध्यान लगाया। जेठ में श्रेष्ठ के लक्षण जाने, उमंग न चित्त समाया। जब अषाढ़ की धुन झर लाई, जिज्ञासू बन आया। नयनों नीर बहा ॥ विकल मन0 सावन मास सुनी गुरु महिमा, श्रवण भक्ति जागी । भादों भद्र का रूप संभारा, सहज बना अनुरागी । कुआर में उपजी हिये में श्रद्धा, मोह माया सब त्यागी। कातिक चन्द्र विवेक की जोती, लखत भया बड़भागी। उपजा हर्ष महा ॥ विकल मन0 अगहन घर की आसा छोड़ी, जग से भया उदासी । पूस में शशि जिभि ज्ञान प्रकासा, आनन्द मंगल रासी । माघ मघा में जोत की लीला, सूझी घट अविनासी । फागुन फाग की इच्छा उपजी, राधास्वामी दरस की प्यासी । कष्ट कलेश सहा ॥विकल मन0
[ 25-593 ] क्यों तू टू हे देश विदेश, तेरा प्रीतम तेरे घट में ॥ कासी वासी मथुरा भटके, मथुरा वासी कासी । भरमत फिरे भरम के बस हो, मिला नहीं अविनासी ॥ तेरा0 बन में जा कोई आसन मारे, अंग भभूत रमाई । सॉग बनाया कफनी पहनी, घट का मरम न पाई ॥ तेरा0 तीरथ में क्या जाकर पाया, क्या सौदा कर लाया। मूरत पूजी पानी नहाया, साँच बता क्या पाया ॥ तेरा0 बरत किया संयम बहु धारे, मन थिर भया न तेरा । समझ बूझ अब चेतके पग धर, खोया समय बहुतेरा ॥तेरा0 जप तप साधन योग युक्ति सब, मन माया के भरमा । जड़ चेतन की गाँठ खुली नहीं, कटा न एको करमा ॥ तेरा0 पोथी ग्रन्थ शास्त्र पढ़ देखा, लगा सार नहीं हाथा। जिसको तू नित ढूँढत डोले, वह तो तेरे साथा ॥तेरा0 घट अन्तर गुरु दशन करले, सुरत शब्द चित लाई। तेरा प्रीतम रूप है तेरा, राधास्वामी भेद बताई ॥तेरा0
[29-594 ] नहीं मन में सोच विचार, भटके संसारी मग में ॥टेक।। आसन मारा ध्यान लगाया, मिटी न मन की आसा। कोल्हू से तेली का बैल बंधा है, घर में कोस पचासा ॥ हाँ मगमें0 वायु विषय प्रचंड भये जब, घट सागर थिर नाहीं । कैसे पड़े रूप की अपने, महा सूक्ष्म परछाँई । अपने भूले सबको भूले, रूप का भेद न पाया। कस्तूरी तो नाभि में अपने, मृग यू ही भरमाया ॥ मन के सागर लहर उठत है, छाई धरन अकासा ।। जहाँ जहाँ जावे खाये थपेड़े, लग कर तृष्णा आसा ॥ घट के भीतर सात समुन्दर, चौदह भुवन पसारा । घट को परख मर्म कोई पावे, सतगुरु का निज प्यारा ॥ रूप सिंधु की लहरी समझो, ब्रह्मा विष्णु महेशा।। देवी देव बुदबुदे छोटे, बुन्द सिन्धु के देशा॥ राधास्वामी जग में आये, धार सन्त औतारा। सुरत शब्द विधि रूप लखाया, पहुँचाया भव पारा ।
[27-595 ] पी पी ले अमी रस धार, गगन से झरी लगी ॥टेक॥ बुन्द का चूका घड़ा भर पावे, सपने में वह स्वाद न आवे । कोई किसे कैसे समझावे, एक बूंद पी तरी लगी ॥पी पीले0 नीचा हुआ सो भर भर पिया, अमृत का जीवन नित जिया। नर शरीर के फल को लिया, ऊँचे को रोये मरेगी ॥ पी पीले0 प्यास बिना क्या होये प्रानी, प्यासे ही के लिये है पानी । बिन अधिकार न कोई जानी, अमृत विष की झरी लगी ॥ अमृत पिये अमर पद पावे, भव योनी में कभी न आवे ।। जनम मरन के दोष नसावे, घट की गगरी भरन लगी ॥ बद अमी की गुरु की बानी, जीवन रस का है यह पानी। राधास्वामी संगत कर मनमानी, डाली प्रेम की हरी लगी ॥
[28-596 ] झूला झूले सुहागिन नार, पिया का धर हृदय में ध्यान ॥टेक।। प्रेम की घटा गगन घट छाई, भक्ति झरी चहुँ दिस झर लाई । आनन्द शान्ती मन में आई, पिया का बड़ा अभिमान ॥ पिया का0 बिजली चमके दादुर बोले, पी पी करत पपीहा डोले । धरन अकास की नाड़ी टटोले, यही है सतगुरु ज्ञान ॥ सुरत शब्द का गढ़ा हिंडोला, प्रेम की पेंग से ले झकझोला। सुखमन मध्य में इत उत डोला, आनन्द रस की खान ॥ शब्द ज्ञान अनुमान प्रमाना, गावे सुरत राग सुहाना । सुख पाया और हर्ष महाना, कोई करे कैसे बखान ॥ मधुर रसीली ओम की बानी, राग अनुराग विराग निशानी। मंगल दायक और सुखदानी, छिड़ी मल्हार की तान ॥ अमी धार की बरखा न्यारी, हित चित जिया को लागे प्यारी। पर कोई मिले जीव हितकारी, करले मोद से पान ॥ राधास्वामी काम की आसा मन में,भर सावन रहे इसी यतन में।। सुमिरन ध्यान और शब्द भजन में, सहजे बने सुजान ॥॥
[ 597 ] गुरु ने अस कृपा करी, दिया ठौर ठिकाना। काल की फाँसी कट गई, मिला शब्द प्रमाना । गुरु मेरे समरथ साइयाँ, सच्चे दातारा । गुरु चरनन बल जाइये, गुरु परम उदारा ।। गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हैं, गुरु हैं त्रिपुरारी । सतगुरु ब्रह्म स्वरूप हैं, गुरु की बलिहारी ॥ गुरु मेरे जान व प्रान हैं, गुरु ही मन बानी । राधास्वामी की दया, गुरु पद पहचानी ।।
[ 598 ] धन रूप भूप अनूप निगुन, सगुन गुनकारी प्रभु । धन अजर अमर अनन्त शोभा, सिंधु हितकारी प्रभु ॥ नहीं भेद तेरा कोई जाने, ज्ञान धन धरनी धरम् । तू मंत्र यंत्र है तंत्र गोप है, सन्त जन मन रंजनम् ।। जो प्रगट गुप्त अशोच निर्मल, असम सम शीतल सदा । सोई नाथ करुना पुंज कीजे, दास सेवक पर दया । धन बार पार अपार मध्य, अनंत आदि विश्वेश्वरम् । तेरी वन्दना करें भक्त निसदिन, काम खलदल गंजनम् ।। जेहि नेति नेति पुकार, अगम निगम न भेद को पावहीं । जप योग त्याग विराग संयुता, योगी ऋषि मुनि ध्यावहीं ॥ धन सन्त रूप कृपा विशेष, जो जीव निबल को तार ही। भज राधास्वामी नाम सतगुरु, और सकल बिसार ही ॥ सोलहवीं धुन
[1-599 ] तू दयाल है दया की मूरत, तेरी दया का दान मिले । भक्ति मिले शुभ शक्ति मिले, सत संगत में गुरु ज्ञान मिले। जग की सहज होय कठिनाई, सुख साधन का है अबसर । नाम मिले सत धाम मिले, साधु सेवा सन्मान मिले ॥ टेढ़े जतन को करदे सीधा, युक्ति निराली बतलादे । थोड़े ही में समझादे तू , सत मत की पहचान मिले ॥ ज्ञान के तीन रूप हैं स्वामी, अनुभव है उनकी चोटी । शब्द मिले अनुमान मिले, अनुमान के साथ प्रमान मिले ।। राधास्वामी सतगुरु दाता, हम सब हैं तेरे सेवक । सहज योग की सहज समाध का, सुमिरन भजन और ध्यान मिले।
[2-600 ] दाता ज्ञाता पितु और माता, छिन छिन तेरा ध्यान रहे । जग त्राता भ्राता सतराता, तेरे नाम का गान रहे ।। सुमिरन तेरा ध्यान हो तेरा, तेरा भजन हर आन रहे । तेरी बानी अगम निशानी, उसी ओर मेरा कान रहे ।। तुझको ध्याऊ तुझको गाऊँ, तेरा ही अरमान रहे । सुमिरन भजन ध्यान सेवा में, मेरी जान और प्रान रहे । सुरत निरत तेरे रंग राती, तेरे रूप का ज्ञान रहे । जहाँ जहाँ देखू तेरी लीला, तेरा ही अभिमान रहे ।। जो जो सुनू सो तेरा बचन हो, मन से दूर मदमान रहे। राधा स्वामी चरन शरन बलिहारी, भव से सुरत अलगान रहे । ॥ ॥
[3-601 ] जगत में आये बहुत दुख पाया, प्रेम का नगर दिखादो जी। भरमत भरमत चहुँ दिस डोलू, सच्ची डगर बता दो जी । मोह नींद में निस दिन सोये, बाँह पकड़ के जगा दो जी । मैं तो अचेत चेत नहीं किंचित, चित से अपनी चेता दो जी ॥ ज्ञान भक्ति का सार न जानू, मेरा अज्ञान मिटा दो जी। चित चकोर निरखे गति चंदा, ऐसी लगन लगा दो जी । सुध बुध मन की सब ही भूलू , प्रेम का प्याला पिला दो जी। मतवारों की चाल चलू नित, प्रीत की चाल चला दो जी ॥ आँख न मृदू कान न रूधू, सहज समाधि लगा दो जी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर उगादो जी ।।
[602 ] धन धन भव भंजन जन मन रंजन, काम निकंदन गुरु राई । धन सुरमुनि नायक जगत सहायक, सुखदायक धन प्रभुताई ॥ धन करुणा सागर सब गुण आगर, गुनातीत गदि हरी । धन घटघट बासी प्रभु अविनाशी, सुखरासी दुख नास करी॥ धन ज्ञानी ज्ञाता विश्वविधाता, सर्व जनन के पितु माता। धन करता धरता नेह की सरिता, मुक्ति भक्ति के निजं दाता । धन परम सियाने वेद बखाने, ऋषि मुनि नहीं जाने चतुराई । धन दीन दयाला सहज कृपाला, बार पार नहीं कोई पाई ।। चरन शरन दे अपना कीजे, भक्ति भाव राधास्वामी दीजे । मैं अति नीच निकाम अनारी, पद सरोज में ले लीजे ॥
[9-604 ] प्राणों का है प्राण पिता तू , जीवन का है आधारा । निर्भर यह ब्रह्मांड है तुझ पर, तू है सब का रखवारा ॥ तू है जोत नेन की सब के, तू है घट घट का वासी। अन्तरयामी प्रीतम प्यारा, अजर अमर विभु अविनासी ।। जल में तेरी शीतलता है, तेज में है प्रकाश तेरा । वायु में है तेरी शक्ति, और आकाश में भास तेरा ।। तू है एक अनेक रूप में, अगम अगोचर निर्माया । यह ब्रह्मांड तेरी है काया, फिर भी तू है निरकाया ॥ बिन पग चलत सुनत बिन काना, मिन जिभ्या बाचाल है तू। माया मोह से रहित निरन्तर, सब जग का प्रतिपाल है तू ॥ तू है देस निमित भी तू है, और कहूँ क्या काल है तू । जड़ चेतन है कारन कारज, करुणा मय कृपाल है तू ॥ फूल फूल में बास है तेरी, मेंहदी में है तू लाली । चकमक में ज्यों आग छुपी है,एक तिल नहीं तुझसे खाली। दया सिंधु है दीनबन्धु है, भक्त जनन का हितकारी । सृष्टि प्रलय लीला है तेरी, तू है हलका तू भारी ।। तू व्यापक तू अविच्छिन्न है, तू सब में सब हैं तेरे । सब में रमा अलग है सब से, सब से दूर सब से नेरे ॥ ॥ ॥
[605 रोम रोम में गुप्त हुआ है, अणु अणु में प्रगट है तू । हृदय गुफा में बास है तेरा, जीव जन्तु का घट है तू ॥ महिमा अनिमा लधिमा गरिमा, हैं अनेक यह तेरे रूप । तू सेवक है तू स्वामी है, तू है परजा तू है भूप ॥ क्या माँगू तुझसे मैं स्वामी, तू मेरा मैं हूँ तेरा । खोजूं क्यों मैं देस देस में, हिये में है तेरा डेरा ॥
[ 7-605 ] सबका आदि अन्त तू दाता, धन्य धन्य तेरी माया । व्यापक सत चित आनन्द स्वामी,कर निज दासों पर दाया। तेरी थाह न पावे कोई, अगम अपार से पार है तू। लीला तेरी सब से अद्भुत, एक तीन दो चार है तू ॥ जड़ चेतन में तेरी छाया, क्या कोई भेद तेरा जाने । योगी ऋषि मुनि ध्यान लगावें सबमें विभो तुझको मानें। हम सब तेरे बाल बाल हैं, तू पितु मात सखा स्वामी । सबमें रमा सकल से न्यारा, घट घट का अन्तरयामी ।
[8-606 ] मन मोहन चित चोर छबीला, अलबेला प्यारा है तू । मेरे मन में आन विराजा, इन आँखों का तारा है तू ॥ तुझपर छिनछिन बलि बलि जाऊँ,निसदिन तेरा गुन गाऊँ। तुझको सुमिरूँ तुझको ध्याऊँ, सच्चा करतारा है तू ॥ योग कठिन वैराग कठिन है, ज्ञान का दान मिले मुझको । प्रेम बसा जब मन में आकर, प्रान का अपने आधारा है तू ॥