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[46 816 ] साधु सहज साधन कीजे ॥टेक॥ कठिनाई का काम नहीं है, नाम न वा का लीजे ॥ साधु0 सहज ही सहज चढ़ी घट ऊपर, अमी नाम जल पीजे ॥ ब्रह्म सोचना और बढ़ना है, मुझ से अर्थ सुनीजे ॥ सोच सोच बढ़ते चलो पल पल, पग आगे को दीजे ॥ सतगुरु शब्द का सार परख कर, गुरु की बात पतीजे ॥ जो कुछ होगा सहज में होगा, कठिन काम नहिं कीजे ॥ साधु0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु नाम जपीजे ॥
[46 816 ] साधु सहज साधन कीजे ॥टेक॥
कठिनाई का काम नहीं है, नाम न वा का लीजे ॥
साधु0 सहज ही सहज चढ़ी घट ऊपर, अमी नाम जल पीजे ॥
ब्रह्म सोचना और बढ़ना है, मुझ से अर्थ सुनीजे ॥
सोच सोच बढ़ते चलो पल पल, पग आगे को दीजे ॥
सतगुरु शब्द का सार परख कर, गुरु की बात पतीजे ॥
जो कुछ होगा सहज में होगा, कठिन काम नहिं कीजे ॥
साधु0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु नाम जपीजे ॥
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[ 47 817 ] सुरत मेरी जागरी, तज नींद विकार टेक॥ कब लग सोवे मोह निशा में, मानुष जनम न बारम्बार
[ 47 817 ] सुरत मेरी जागरी, तज नींद विकार टेक॥
कब लग सोवे मोह निशा में, मानुष जनम न बारम्बार ।॥
सुरत तरुवर से ज्यों पात झड़त है, फिर नहीं लागे डार ॥
सुरत तैसे ही यह अवसर प्रानी, फिर नहीं मिले गवार ।॥
सुरत चेत चेत सुध कर कुछ घरकी, रहन यहाँ दिन चार ॥
सुरत राधास्वामी दया काज कर अपना, कर मन सोच विचार ॥ सुरत
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[48 818 ] राधास्वामी हैं रखवारे तेरे, राधास्वामी है रखवारे ॥टेका॥ छिन छिन प्रति छिन चित चरनन पर, रह सतगुरु के सहारे ॥ तेरे दया मौज की निरख परख कर, भज गुरु साँझ सकारे
[48 818 ] राधास्वामी हैं रखवारे तेरे, राधास्वामी है रखवारे ॥टेका॥
छिन छिन प्रति छिन चित चरनन पर, रह सतगुरु के सहारे ॥
तेरे दया मौज की निरख परख कर, भज गुरु साँझ सकारे ।॥
तेरे भव सागर एक अगम पन्थ है, नाव पड़ी मझधारे ॥
तेरे खेवटिया गुरू पूरा पाया, पहुँची आन किनारे ॥
तेरे वह दयाल आपहि तोहि पोसें, क्यों तू होत दुखारे ॥
तेरे सुमिरन भजन ध्यान कर बन्दे, गुरू के चरन अधारे ॥
तेरे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चरन कमल में आ रे ॥ तेरे
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[46 819 ] छाई अँधियारी भारी हो, कुछ नजर न आवे ॥टेक॥ काल करम के फाँस फसाना, यम की लगी कटारी हो
[46 819 ] छाई अँधियारी भारी हो, कुछ नजर न आवे ॥टेक॥
काल करम के फाँस फसाना, यम की लगी कटारी हो ।कुछ0
राह न सूझे गैल न बूझे, इत उत बाट निहारी हो ॥
कुछ भूल भरम मे धोका खाया, कैसी दशा हमारी हो ।।
कुछ माया ममता से हित जोड़ा, तिरिया लागी प्यारी हो ॥
कुछ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सब से होगई न्यारी हो ।कुछ
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50 820 ] मिला ओम् स्थान, साधु मिला ओम् स्थान
50 820 ] मिला ओम् स्थान, साधु मिला ओम् स्थान ।।टेक॥
सूरज लाल लाल रंग बाना, लाल रंग दरसान ॥
साधु0 बाजत घोर मृदंग पखावज, ओम् ओम् धुन गान ॥
ब्रह्मा बैठ वेद समझावे, चौमुख भेद लखान ॥
त्रिकुटी चढ़ लंका गढ़ तोड़ा, घर सीता का ध्यान ।॥
, मेघनाद जहाँ गरज सुनावे, सामवेद मचान ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने बख्शा ज्ञान ॥
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51 821 ] भजले गुरु अविनासी प्यारे, भजले गुरु अविनासी ॥टेक
51 821 ] भजले गुरु अविनासी प्यारे, भजले गुरु अविनासी ॥टेक।॥
गुरु का सुमिरन भजन ध्यान कर, गुरु आनन्द सुखरासी ॥
प्यारे गुरु माया से आन छुड़ावें, गुरु काटें यम फाँसी ॥
प्यारे गुरु की दया अविद्या भागे, घट में सूर प्रकासी ॥
प्यारे मिटा अंधेरा भया सवेरा, चहुँ दिस छाई उजासी ॥
प्यारे गुरू महिमा हित चित में बसाले, होजा गुरु की दासी ॥
प्यारे गुरू पर बलि बलि जा निसि बासर, मोह कपट छल जासी ॥
प्यारे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मन भया सहज उदासी ॥ प्यारे
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[ 52 822 ] __ रटन लागी मेरे हिया जिया से, पार लगादो साँवरिया ॥टेक॥ भवसागर एक अगम पन्थ है, बूड़त मेरी नावरिया ॥ रटन0 नाव पुरानी बहत बयारा, बीच में पड़ गई भाँवरिया ॥ रटन बरसत मेह अखंडित धारा, भारी बोझ भई काँवरिया ॥ रटन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेतगई सुरत गाँवरिया ॥ रटन
[ 52 822 ] __ रटन लागी मेरे हिया जिया से, पार लगादो साँवरिया ॥टेक॥
भवसागर एक अगम पन्थ है, बूड़त मेरी नावरिया ॥
रटन0 नाव पुरानी बहत बयारा, बीच में पड़ गई भाँवरिया ॥
रटन बरसत मेह अखंडित धारा, भारी बोझ भई काँवरिया ॥
रटन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेतगई सुरत गाँवरिया ॥ रटन
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[53 823 ] जनम जुआ मत हार, भाई जनम जुआ मत हार ॥टेक॥ जब तू आया गुरू शरणागत, फिर क्यों सोच विचार ॥ भाई तेरा काम करें किरपा से, मेटें भरम विकार ॥ भाई संस्कार अधिकार बढ़े जब, मिला परमारथ सार ॥ भाई प्रीति प्रतीति के मग में पग दे, तज संशय मोह विकार | भाई सुमिरन भजन ध्यान कर चित दे, साधारण व्यौहार ॥ भाई सुगम सहज है शब्द का साधन, सतगुरु के आधार ॥ भाई राधास्वामी परम दयाला, नित तेरे रखवार ॥ भाई
[53 823 ] जनम जुआ मत हार, भाई जनम जुआ मत हार ॥टेक॥
जब तू आया गुरू शरणागत, फिर क्यों सोच विचार ॥ भाई
तेरा काम करें किरपा से, मेटें भरम विकार ॥
भाई संस्कार अधिकार बढ़े जब, मिला परमारथ सार ॥
भाई प्रीति प्रतीति के मग में पग दे, तज संशय मोह विकार |
भाई सुमिरन भजन ध्यान कर चित दे, साधारण व्यौहार ॥
भाई सुगम सहज है शब्द का साधन, सतगुरु के आधार ॥
भाई राधास्वामी परम दयाला, नित तेरे रखवार ॥ भाई
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[54 824 ] अमर फल बिरला गुरुमुख खाये
[54 824 ] अमर फल बिरला गुरुमुख खाये ।टेक॥
अमरापुर में डेरा डाले, अमृत पी पी कर तुप्ताये ॥
अमरफल जिये न मरे न जग में आये, आवागमन के फन्द कटाये ॥
करम करे और बने न कर्ता, अहंभाव चित में नहीं लाये ।॥
बन्ध निबन्ध न मुक्त अमुक्ति, इसकी महिमा बरन न जाये ॥
हद बेहद दोनों से न्यारा, अगम अलख में बासा पाये ॥
बसे खिसे नहीं सगुन न निर्गुन, कोई कैसे कह समझाये ॥
रूप रंग रेखा नहीं उसमें, नाम अनाम का भेद मिटाये ॥
ऐसा गुरूमुख गुरु का प्यारा, बिन बानी नित गुरूगुन गाये॥
राधास्वामी दयापात्र सोई साँचा,साँच भूठ का भरम नसाये ॥
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[55 825 ] काहे करे उत्पात, मनुआ काहे करे उत्पात ॥टेका॥ चरन में गुरू के चित्त लगादे, सिर पर उनका हाथ ॥ मनुआ0 तेरा बल कुछ काम न आवे, गुरू समरथ है साथ ॥ मनुआ तज चिंता दुविधा दुचिताई, बचा काल की घात ॥ मनुआ सुमिरन भजन ध्यान हो नित ही, यह कर तू दिनरात ॥ मनुआ चरन शरन में लगजा भाई, वहीं गहें तेरा हाथ ॥ मनुआ राधास्वामी सच्चे सहाई, वहीं हैं जग के नाथ ॥ मनुआ
[55 825 ] काहे करे उत्पात, मनुआ काहे करे उत्पात ॥टेका॥
चरन में गुरू के चित्त लगादे, सिर पर उनका हाथ ॥
मनुआ0 तेरा बल कुछ काम न आवे, गुरू समरथ है साथ ॥
मनुआ तज चिंता दुविधा दुचिताई, बचा काल की घात ॥
मनुआ सुमिरन भजन ध्यान हो नित ही, यह कर तू दिनरात ॥
मनुआ चरन शरन में लगजा भाई, वहीं गहें तेरा हाथ ॥
मनुआ राधास्वामी सच्चे सहाई, वहीं हैं जग के नाथ ॥ मनुआ
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[ 56 826 ] कहाँ तुझे पाऊँ रे मनमोहना मैं कहाँ तुझे पाऊँ
[ 56 826 ] कहाँ तुझे पाऊँ रे मनमोहना मैं कहाँ तुझे पाऊँ ।टेका॥
घर घर बन बन देखा भाला, अब कहाँ मैं जाऊँ ॥
रे मनमोहना मेरी विपत की अकथ कहानी, किसको बीती सुनाऊँ॥
हार गई और थककर बैठी, अब कहीं जाऊँ न आऊँ॥
आना हो तो आपही आजा, सौ सौ बार मनाऊँ॥
, मेरे घट में लगन लगी है, घट ही में खींच बुलाऊँ ॥
घट के भीतर दरस दिखादे, दुख क्लेश विसराऊँ॥
घट का मन्दिर पड़ा है सूना, तू मिल जाय बसाऊँ॥
आरत साजू प्रेम भक्ति की, घन्टा शंख बजाऊँ॥
आनन्द मंगल चहुँदिश ब्यापे, आनन्द धुन नित गाऊँ॥
तिल पट मध्ये सेज पिछाऊँ, पलकों की चिकलाऊँ ॥
नहीं मैं देखू और किसी को, नयनों में तुझे छुपाऊँ॥
मैं तेरी और तू है मेरा, तुझ ही से नेह लगाऊँ॥
, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हिया जिया अब उमगाऊ
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[57 827 ] | गुरुदाता ने सार समझा दिया ॥टेक॥ सहस कमलदल सहस रूप का, भेद भाव दिखला दिया ॥ गुरू0 त्रिकुटी त्रिकुटी ओंकार का, सच्चा अर्थ बता दिया ॥ सुन्न द्वत अद्वत महासुन्न, दोनों पद दरसा दिया
[57 827 ] | गुरुदाता ने सार समझा दिया ॥टेक॥
सहस कमलदल सहस रूप का, भेद भाव दिखला दिया ॥
गुरू0 त्रिकुटी त्रिकुटी ओंकार का, सच्चा अर्थ बता दिया ॥
सुन्न द्वत अद्वत महासुन्न, दोनों पद दरसा दिया ।
सोहंग भंवर काल माया गति, अपनी दया समझा दिया ॥
सत पद निज पद धुर पद सच्चा, अपनी कृपा पहुँचा दिया॥
अलख अनाम अगम राधास्वामी, सबका सब लखवा दिया ॥
तत्व में वाच लक्ष को जाना, जाना जान जना दिया ॥
भूल भरम भ्रान्ती नहीं मन में, मुझको शान्त बना दिया ॥
राधास्वामी नाम व्याप रहा मन में, निकट जो आया सुना दिया
[ 433
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[58 828 ] मेरे मन में आजा सँवलिया, मेरे मन में आजा ॥टेक
[58 828 ] मेरे मन में आजा सँवलिया, मेरे मन में आजा ॥टेक।॥
मन में आजा मन में समाजा, मन में रूप दिखाजा |सँवलिया
मन में ज्योत जगे दिन राती, जगमग ज्योति जगाजा ॥
सवालिया मन में स्तुति तेरी गाऊ, प्रेम की धूम मचाजा संवलिया मन में
घन्टा मृदंग बाजे, अनहद नाद सुनाजा सिबलिया मन मन्दिर में
डालके चौकी, सोया मनुआ जगाजा ॥
सवलिया मन में भोग लगाऊँ तेरा, सीत प्रसाद खिलाजा ॥
सवालिया मन का घाट है भारी भारी, दसवाँ द्वार खुलाजा ॥
सवलिया राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चरणामृत पिलाजा |सँवलिया
Hindi
[56 829 ] तेरी गुदड़ी में लाल टका, क्यों नहीं नजर करे ॥टेका॥ बगल में लड़का शहर ढिंढोरा, मूरख भरम मरे ॥ क्यों नहीं हिरन के नाम रहे कस्तूरी, बन बन भटक फिरे ॥ मानुष तन में साहेब बसता, नर पाखान लखे ॥ बिन सतगुरु सब धोका खाया, कैसे कोई समझे ॥ राधास्वामी गुरु जब जीव चेतावें, तब भव सिंध तरे ॥ [60 830 ] निस दिन सत्त नाम धुन माते ॥टेका॥ जब से हृदय पड़ी गुरु मूरत, मन फूले न समाते ॥ जब सेवा भजन बन्दगी करते, कहीं आते नहीं जाते ॥ जब घट में राग रागनी सुनते, अनहद तूर बजाते
[56 829 ] तेरी गुदड़ी में लाल टका, क्यों नहीं नजर करे ॥टेका॥
बगल में लड़का शहर ढिंढोरा, मूरख भरम मरे ॥
क्यों नहीं हिरन के नाम रहे कस्तूरी, बन बन भटक फिरे ॥
मानुष तन में साहेब बसता, नर पाखान लखे ॥
बिन सतगुरु सब धोका खाया, कैसे कोई समझे ॥
राधास्वामी गुरु जब जीव चेतावें, तब भव सिंध तरे ॥
[60 830 ] निस दिन सत्त नाम धुन माते ॥टेका॥
जब से हृदय पड़ी गुरु मूरत, मन फूले न समाते ॥
जब सेवा भजन बन्दगी करते, कहीं आते नहीं जाते ॥
जब घट में राग रागनी सुनते, अनहद तूर बजाते ।॥
जब प्रेम पियाला पिया मस्त हो, छिन छिन गुरु गुन गाते ॥
जब नहीं अभिमान काम मद मोहा, सबको दूर भगाते ॥
जब राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पर बलि बलि जाते ॥
Hindi
[61 831 ] मुझे अद्भुत रूप दिखादो जी ॥टेक
[61 831 ] मुझे अद्भुत रूप दिखादो जी ॥टेक।॥
प्रेम दिवानी भई मस्तानी, चरन कमल से लगा दीजो जी ॥
मुझे0 तन मन धन सब तुम पर वारूं, जनम को सुफल करा दीजो जी॥
बिरह अगन मेरा तन मन जारे, तपन की आग बुझा दीजो जी ॥
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा, हिया की पीर मिटा दीजो जी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अमी का प्याला पिला दीजो जी ॥
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[62 832 ] रमैय्या तेरे रूप लुभानी रे ॥टेक॥ शोभा देख अनूप अगोचर, मन्द मन्द मुस्कानी रे ॥ रमैय्या तिरछी चितवन नैना रसीले, देख देख हर्षानी रे॥ बाँका सजीला रंगीला रमैय्या, लोभी मन कर्म बानी रे ॥ हिया जिया में मेरे बसा मोहना, ताहि के रंग रंगानी रे ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु चरनन लपटानी रे॥
[62 832 ] रमैय्या तेरे रूप लुभानी रे ॥टेक॥
शोभा देख अनूप अगोचर, मन्द मन्द मुस्कानी रे ॥
रमैय्या तिरछी चितवन नैना रसीले, देख देख हर्षानी रे॥
बाँका सजीला रंगीला रमैय्या, लोभी मन कर्म बानी रे ॥
हिया जिया में मेरे बसा मोहना, ताहि के रंग रंगानी रे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु चरनन लपटानी रे॥
Hindi
[63 833 ] रसना प्रेम स्वाद अति मीठा ॥टेक॥ विषय भोग रस कड़वा लागे, त्याग जगत दे पीठा ॥ रसना0 भव भय से तोहि प्रेम छुड़ावे, करे निरन्तर ढीठा ॥ रसना राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रीति रीति में दीठा ॥ रसना
[63 833 ] रसना प्रेम स्वाद अति मीठा ॥टेक॥
विषय भोग रस कड़वा लागे, त्याग जगत दे पीठा ॥
रसना0 भव भय से तोहि प्रेम छुड़ावे, करे निरन्तर ढीठा ॥
रसना राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रीति रीति में दीठा ॥ रसना
Hindi
[64 834 ] तुझ बिन कोई नहीं अपना ॥टेक॥ तुझको सुमिरू तुझको ध्याऊँ, तेरे नाम का है जपना ॥ तुझ0 तेरी दया से सतगुरु प्यारे, तीन ताप का मिटे ताना ॥ तुझ तू है सच्चा अन्तरयामी, तेरे सिवा सब है सपना ॥ तुझ मेरे अन्तर दर्शन देदे, मन का खुले आज ढकना ॥ तुझ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भव के भय से न हो कपना ॥
[64 834 ] तुझ बिन कोई नहीं अपना ॥टेक॥
तुझको सुमिरू तुझको ध्याऊँ, तेरे नाम का है जपना ॥
तुझ0 तेरी दया से सतगुरु प्यारे, तीन ताप का मिटे ताना ॥
तुझ तू है सच्चा अन्तरयामी, तेरे सिवा सब है सपना ॥
तुझ मेरे अन्तर दर्शन देदे, मन का खुले आज ढकना ॥
तुझ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भव के भय से न हो कपना ॥
Hindi
[65 835 ] घट अद्भुत बाजे बाज रहे
[65 835 ] घट अद्भुत बाजे बाज रहे ।टेक।॥
पाजत बीन सितार बाँसुरी, घन्टा शंख धुन गाज रहे ॥
घट0 किंगरी ढोल मृदंग पखावज, अनहद शब्द समाज रहे ।॥
घट सुन सुन धुन सुरत हुई मस्तानी, प्रेम प्रीति का साज रहे ॥
घट शब्द सुनत मन अति हर्षाना, काम क्रोध मद भाज रहे ॥
घट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सूर चन्द्र दोऊ लाज रहे ॥
घट
Hindi
[66 836 ] मैं तो प्रेम दिवानी होगई ॥टेक॥ रूप अनूप देख छवि अद्भुत, लो मस्तानी होगई ॥ मैं तो0 दुख दारुण की चिंता मेटी; चित हर्षानी होगई ॥ मैं तो माया काल के बन्धन काटे, अगम निशानी होगई
[66 836 ] मैं तो प्रेम दिवानी होगई ॥टेक॥
रूप अनूप देख छवि अद्भुत, लो मस्तानी होगई ॥
मैं तो0 दुख दारुण की चिंता मेटी; चित हर्षानी होगई ॥
मैं तो माया काल के बन्धन काटे, अगम निशानी होगई ।॥
मैं तो राग द्वष से काम न रंचक, दर गिलानी होगई ।॥
मैं तो राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सहज निर्वानी होगई॥मैं तो
Hindi
[67 837 ] गुरु तेरी शरन में आगया ॥टेक॥ दीन अधीन कुटिल खल कामी, परमारथ धन पागया ॥ गुरु0 दीनानाथ दीन हितकारी, मन में मेरे समा गया ॥ देखा रूप अरूप अगोचर, हित चित से सो भागया ॥ बन्धन छूटे मोह मया से, काल भी धोखा खागया ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरुगम बानी सुनागया ॥
[67 837 ] गुरु तेरी शरन में आगया ॥टेक॥
दीन अधीन कुटिल खल कामी, परमारथ धन पागया ॥
गुरु0 दीनानाथ दीन हितकारी, मन में मेरे समा गया ॥
देखा रूप अरूप अगोचर, हित चित से सो भागया ॥
बन्धन छूटे मोह मया से, काल भी धोखा खागया ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरुगम बानी सुनागया ॥
Hindi
[68 838 ] अन्तर सतगुरु की प्रीति बसी ॥टेक॥ अन्तर देखा रूप अनूपा, गुरू छवि देख हसी ॥ अन्तर अन्तर सुनी अनाहद बानी, बाहर से अन्तः खिसी
[68 838 ] अन्तर सतगुरु की प्रीति बसी ॥टेक॥
अन्तर देखा रूप अनूपा, गुरू छवि देख हसी ॥
अन्तर अन्तर सुनी अनाहद बानी, बाहर से अन्तः खिसी ।॥
अन्तर अन्तर सहस कमल पद परसा, त्रिकुटी जाय धसी ॥ अन्तर
अन्तर का अन्तर जब निरखा, सुख आनन्द लसी ॥
अन्तर राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहूँ न जगत फंसी ॥ अन्तर
Hindi
[6९ 839 ॥हमारे मन सतगुरु प्रीति बसी
[6९ 839 ॥हमारे मन सतगुरु प्रीति बसी ।।टेक।॥
प्रीति की राह चली तब सूरत, माया देख खिसी ॥
हमारे देख देख लीला घट अपने, मन में बहुत हँसी ॥
हमारे बाहर के पट बन्द भये जब, अन्तर माहिं धसी ॥
हमारे सुरत नवेली भई अलबेली, भूषण प्रेम लसी ॥
हमारे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब तो बने तपसी ॥ हमारे
Hindi
[70 840 ] बख्शा गुरु ने प्रेम पियाला ॥टेक
[70 840 ] बख्शा गुरु ने प्रेम पियाला ॥टेक।॥
ताहि पिया हित चित से जब ही, हुआ निपट मतवाला ॥
बख्शा मस्ती छाई रंग जमा है, अब क्या करहि है काला॥
इस मस्ती को क्या कोई जाने, निकला करम दिवाला ॥
तिमिर विनासक भव भय नासक, घट भीतर भान उजाला ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, फेलं गुरु की माला ॥
Hindi
[71 841 ] घट में भानु खिला ॥टेक॥ रैन अंधेरी दूर भई जब, ज्ञान का सार मिला ॥ घट जोति जो फैली हट गई झाँई, सूझा फटक शिला ॥ घट अपनी सृष्टि दृष्टि गत निरखी, भव का नींव हिला ॥ घट आवागवन का संशय छूटा, माया का बिनसा फिला ॥ घट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रन की भूमि पिला ॥ घट
[71 841 ] घट में भानु खिला ॥टेक॥
रैन अंधेरी दूर भई जब, ज्ञान का सार मिला ॥
घट जोति जो फैली हट गई झाँई, सूझा फटक शिला ॥
घट अपनी सृष्टि दृष्टि गत निरखी, भव का नींव हिला ॥
घट आवागवन का संशय छूटा, माया का बिनसा फिला ॥
घट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रन की भूमि पिला ॥ घट
Hindi
[72 842 ] दिल की सब दुर्मति दूर भई ॥टेक॥ भव का भय जब त्यागा छिन में, कायर से अब सूर भई दिल क्या माँगू कुछ चित न रहाई, सकल कामना पूर भई ॥ दिल0 मान की दपेनी पटक दिया है, ठेस लगी तब चूर भई ॥ दिल माया की सामग्री सारी, मेरी दृष्टि में धूर भई ॥ दिल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु चरनन धूर भई ॥ दिल
[72 842 ] दिल की सब दुर्मति दूर भई ॥टेक॥
भव का भय जब त्यागा छिन में, कायर से अब सूर भई दिल
क्या माँगू कुछ चित न रहाई, सकल कामना पूर भई ॥
दिल0 मान की दपेनी पटक दिया है, ठेस लगी तब चूर भई ॥
दिल माया की सामग्री सारी, मेरी दृष्टि में धूर भई ॥
दिल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु चरनन धूर भई ॥ दिल
Hindi
[73 843 ] गुरु की अभिमानी हो गई ॥टेक॥ चाह मिटी चिन्ता दुख भागा, घट मगनानी हो गई ॥ गुरु0 तीरथ बरत नेम नहिं संयम, सतगुरु की दिवानी हो गई ॥ बन्धन काटा द्वन्द जगत का, सुरत सियानी हो गई ॥ त्याग मान मोह मद सबका, अब तो निरबानी हो गई ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी मन बानी हो गई ॥
[73 843 ] गुरु की अभिमानी हो गई ॥टेक॥
चाह मिटी चिन्ता दुख भागा, घट मगनानी हो गई ॥
गुरु0 तीरथ बरत नेम नहिं संयम, सतगुरु की दिवानी हो गई ॥
बन्धन काटा द्वन्द जगत का, सुरत सियानी हो गई ॥
त्याग मान मोह मद सबका, अब तो निरबानी हो गई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी मन बानी हो गई ॥
Hindi
[74 844 ] मेरे उर सतगुरु रूप बसा ॥टेक॥ देखा रूप अनूप तुम्हारा, हिया जिय हर्ष हँसा ॥ मेरे0 चिंता चित की दूर भई सब, मन आनन्द लसा
[74 844 ] मेरे उर सतगुरु रूप बसा ॥टेक॥
देखा रूप अनूप तुम्हारा, हिया जिय हर्ष हँसा ॥
मेरे0 चिंता चित की दूर भई सब, मन आनन्द लसा ।॥
मेरे अन्तर प्रगटी ज्योति निरंतर, तिमिर विकार नसा ।॥
मेरे बाहर के पट दे दे पल पल, घट ही माँहि धंसा ॥
मेरे राधास्वामी मोह के बन्धन काटे, अब कहाँ रहा फंसा ॥ मेरे
Hindi
[75 845 ] माया से न्यारी हो गई
[75 845 ] माया से न्यारी हो गई ।।टेक॥
काम क्रोध की चिन्ता बिसरी, गुरु मतवारी हो गई ॥
माया0 जगत का प्रेम भाव सब भूला, सतगुरु की प्यारी हो गई॥
माया आना जाना मिटा योनि का, धुर पद की त्यारी हो गई ॥
माया अब कैसे बन्धन में आऊ, यम की रखवारी हो गई॥
माया राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत शब्द संवारी हो गई ॥
Hindi
[ 76 846 ] कहत न आवे बैन ॥टेक कल नहीं पड़े विकल रहे तन मन, रात दिवस नहीं चैन ॥ कहत दर्शन की इच्छा घट छाई, नहीं कुछ लेन न देन ॥ कहत आँखों में भाई पड़ आई, रहत नाम दिन रैन ॥ कहत राधास्वामी खुलकर भेद बताओ, समझ न आवे सेन ॥ कहत
[ 76 846 ] कहत न आवे बैन ॥टेक
कल नहीं पड़े विकल रहे तन मन, रात दिवस नहीं चैन ॥
कहत दर्शन की इच्छा घट छाई, नहीं कुछ लेन न देन ॥
कहत आँखों में भाई पड़ आई, रहत नाम दिन रैन ॥
कहत राधास्वामी खुलकर भेद बताओ, समझ न आवे सेन ॥ कहत
Hindi
[77 847 ] मन लागत लागत लागा ॥टेक॥ सोया मनुआ जनम जनम का, जागत जागत जागा ॥ मन0 पहले तो यह भव में बहु भरमा, भरम देख अब भागा ॥ मन विषयों को तजकर अभिमानी, भक्ति भाव में पागा
[77 847 ] मन लागत लागत लागा ॥टेक॥
सोया मनुआ जनम जनम का, जागत जागत जागा ॥
मन0 पहले तो यह भव में बहु भरमा, भरम देख अब भागा ॥
मन विषयों को तजकर अभिमानी, भक्ति भाव में पागा ।॥
मन संसारी से हुआ है सारी, हंसा बन गया कागा ॥
मन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, उपजा दृढ़ अनुरागा ॥ मन
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78 848] सोच करे क्यों मन में ॥टेक॥ समरथ सतगुरु दीन दयाला, रक्षक घर और बन में ॥ सोच0 निरखो छिन छिन गरु की मूरत, अपने मन दरपन में ॥ सोच तिलके भीतर गरु विराजे, देखो अपने तन में ॥ सोच नैनों में तेरी साँवली सूरत, लागे चित दरशन में || सोच सोवत जागत ताड़ी लागी, रहो तुम इसी यतन में ॥ सोच पल पल सोधो नाम रसायन, सुमिरन ध्यान भजन में ॥ सोच बचन बिलास पाठ और पूजा, सब हो श्रवण मनन में ॥ सोच सूरा नाम फकीर ने धारा, लड़े काल के रन में ॥ सोच काम क्रोध मद मस्तक फोड़े, उदासीन रहे तन में ॥ सोच किसकी सोच करे नर बौरे, गुरु प्रगट निज जन में ॥ सोच राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु मिले याही पन में ॥ सोच
78 848] सोच करे क्यों मन में ॥टेक॥
समरथ सतगुरु दीन दयाला, रक्षक घर और बन में ॥
सोच0 निरखो छिन छिन गरु की मूरत, अपने मन दरपन में ॥
सोच तिलके भीतर गरु विराजे, देखो अपने तन में ॥
सोच नैनों में तेरी साँवली सूरत, लागे चित दरशन में ||
सोच सोवत जागत ताड़ी लागी, रहो तुम इसी यतन में ॥
सोच पल पल सोधो नाम रसायन, सुमिरन ध्यान भजन में ॥
सोच बचन बिलास पाठ और पूजा, सब हो श्रवण मनन में ॥
सोच सूरा नाम फकीर ने धारा, लड़े काल के रन में ॥
सोच काम क्रोध मद मस्तक फोड़े, उदासीन रहे तन में ॥
सोच किसकी सोच करे नर बौरे, गुरु प्रगट निज जन में ॥
सोच राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु मिले याही पन में ॥ सोच
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[7९ 849 ] सजनी चल सतगुरु के देस टेक
[7९ 849 ] सजनी चल सतगुरु के देस टेक।॥
यह तो सब ही काल पसारा, आये परे परदेस ॥
सजनी0 माया मोह की दुर्गम घाटी, भूल भरम का देस ।॥
सजनी वह तो देस अनूप अगम है, जहाँ न काल कलेश ॥
सजनी दुख सुख चिंता कभी न व्यापे, यह गुरु का उपदेस ॥
सजनी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुन लिया सार संदेस ॥
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[80 850 ] मौज से होगा सारा काम ॥टेका॥ तू क्या सोचे क्या मन ठाने, सोच समझ बेकाम ॥ मौज प्रीति दृढ़ा प्रतीत बढ़ाये, भज गुरु आठों याम ॥ मौज सुख दुख भूल भरम की लीला, भरमे नहीं मिसराम ॥ मौज जग की चाह महा उत्पाती, भज ले गुरु का नाम ॥ मौज राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने बख्शा अचल मुकाम ॥मौज
[80 850 ] मौज से होगा सारा काम ॥टेका॥
तू क्या सोचे क्या मन ठाने, सोच समझ बेकाम ॥
मौज प्रीति दृढ़ा प्रतीत बढ़ाये, भज गुरु आठों याम ॥
मौज सुख दुख भूल भरम की लीला, भरमे नहीं मिसराम ॥
मौज जग की चाह महा उत्पाती, भज ले गुरु का नाम ॥
मौज राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने बख्शा अचल मुकाम ॥मौज
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[81 851 ] अन्त समय क्यों रोया है
[81 851 ] अन्त समय क्यों रोया है ।।टेक।॥
मानुष देह की जानी महिमा, सुख निन्द्रा में सोया है ॥
अन्त उठ उठ उठकर गुरु की संगत, जो सोया है सो खोया है ॥
अन्त प्रीतम बसते हिय बिच तेरे, दूध माँहि ज्यों खोया है ॥
अन्त अपनी करनी पार उतरनी, फल पाया जो बोया है ॥
अन्त राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अमी चूद मन धोया है ।॥अन्त
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[82 852 ] सतगुरु राजों के महाराजा ॥टेक॥ तुम्हरे महल में नौवत झड़ती, बाजे अनहद बाजा ॥ सतगुरु धन दौलत का कौन ठिकाना, दल बादल रहे साजा ॥ सुरत निरत जहाँ पानी भरते, शब्द हुकम करे काजा ॥ ईश्वर ब्रह्मा तुम्हारे सेवक, कोटि काम छबि लाजा ॥ सतगुरु0 शेष महेश गनेश शारद, जुड़ा जनन का समाजा ॥ , वेद भेद जाने नहीं ब्रह्मा, तुम हो सबमें विराजा ॥ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रगटे जन के काजा ॥
[82 852 ] सतगुरु राजों के महाराजा ॥टेक॥
तुम्हरे महल में नौवत झड़ती, बाजे अनहद बाजा ॥
सतगुरु धन दौलत का कौन ठिकाना, दल बादल रहे साजा ॥
सुरत निरत जहाँ पानी भरते, शब्द हुकम करे काजा ॥
ईश्वर ब्रह्मा तुम्हारे सेवक, कोटि काम छबि लाजा ॥ सतगुरु0
शेष महेश गनेश शारद, जुड़ा जनन का समाजा ॥
, वेद भेद जाने नहीं ब्रह्मा, तुम हो सबमें विराजा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रगटे जन के काजा ॥
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[83 853 ] सुरत प्यारी दुख से क्यों घबराये
[83 853 ] सुरत प्यारी दुख से क्यों घबराये ।।टेका॥
तेरे अन्तर कूप अमीरस, क्यों नहीं पी तृप्ताये ॥
सुरत नाम निशान प्रगट घट भीतर, निस दिन रटन लगाये ॥
सुरत सुमिरन भजन ध्यान नित करना, नामे मत अलसाये ॥
सुरत जब दुख संकट आय पड़े सिर, गरु चरनन लिपटाये ॥
सुरत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भवदुख सब मिटजाये |सुरत
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[84 854 ] साधु मन की गति अति न्यारी ॥टेक
[84 854 ] साधु मन की गति अति न्यारी ॥टेक।॥
ज्ञान ध्यान में कबहुँ सियाना, कबहुँ अझ अनारी ॥
साधु0 कबहुँ गगन मंडल बिच धावे, कबहुँ सिंधु मझारी साधु
पल में त्यागी जोग विरागी, पल ही में संसारी साधु
चंचल निश्चल कामी अकामी, राजा रंक भिखारी साधु
मन की सूझ समझ जब आई, राधास्वामी की बलिहारीसाधु
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[85 855 ] मन तु काहे दिवाना हुआ ॥टेक
[85 855 ] मन तु काहे दिवाना हुआ ॥टेक।॥
मरकट मूठी भरम बन्धाया, ज्यों चरखी का सुआ ॥
मन0 अपनी प्रतिमा देख डराना, गज लड़ लड़ कर मुआ॥
मन नीचे दृष्टि करे क्यों मूरख, नीचे भरम का कुआ॥
मन गिरत पड़त कुछ देर न लागे, नहीं तहाँ माल पुआ ॥
मन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, फेंक गले का जुआ ॥ मन
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[86 856 ] सुरत प्यारी चल सतगुरु के देस ॥टेक॥ अगम में ठौर ठिकाना तेरा, आन पड़ी परदेस ॥ सुरत0 काग दृष्टि तज विष्टा त्यागे, ले अब हंसा भेस ॥ सुरत सुख का धाम प्रेम जहाँ व्यापा, वहाँ कहाँ काम कलेस ॥ सुरत निरवानी धुरपद घर तेरा, माया नहीं लव लेस ॥ सुरत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,सुन लिया गुरु उपदेश
[86 856 ] सुरत प्यारी चल सतगुरु के देस ॥टेक॥
अगम में ठौर ठिकाना तेरा, आन पड़ी परदेस ॥
सुरत0 काग दृष्टि तज विष्टा त्यागे, ले अब हंसा भेस ॥
सुरत सुख का धाम प्रेम जहाँ व्यापा, वहाँ कहाँ काम कलेस ॥
सुरत निरवानी धुरपद घर तेरा, माया नहीं लव लेस ॥
सुरत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,सुन लिया गुरु उपदेश ।।सुरत
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[87 857 ] काहे बौराना हाय फकीरवा
[87 857 ] काहे बौराना हाय फकीरवा ।।टेक॥
तेरे घट में माल खजाना, भया दिवाना हाय फकीरवा ॥
काहे जाकी चाह में खोजत डोले, मन में समाना हाय फकीरवा ॥
काहे तीरथ बरत सभी तेरे भीतर, नहीं कहीं जाना हाय फकीरवा ।॥
काहे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, नित गुन गाना हाय फकीरवा ।॥
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[88 858] वह फकीर है साँचा ॥टेक॥ प्रेम प्रीति गले कफनी डाले, उमंग उमॅग कर नाचा ॥ वह0 विषय भोग की चाह न मन में, गुरु चरनन में राचा
[88 858] वह फकीर है साँचा ॥टेक॥
प्रेम प्रीति गले कफनी डाले, उमंग उमॅग कर नाचा ॥
वह0 विषय भोग की चाह न मन में, गुरु चरनन में राचा ।॥
वह लोभ मोह तृष्णा के कारण, जगत न कबहुँ जाँचा ॥
वह दर दर भक्ति को माँगत डोले, सो मारग में काँचा ॥
वह राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काट फंद यम बाँचा॥वह
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[86 859 ] रे मन आज सुमिर गुरु नाम ॥टेका॥ क्या जाने क्या होयेगा पल में, सदा नहीं विश्राम ॥ रे मन0 माया मोह में भूला निसदिन, व्यापा मोह और काम
[86 859 ] रे मन आज सुमिर गुरु नाम ॥टेका॥
क्या जाने क्या होयेगा पल में, सदा नहीं विश्राम ॥
रे मन0 माया मोह में भूला निसदिन, व्यापा मोह और काम ।॥
रे मन सावधान होय सुन गुरु बानी, तजदे मोह और काम ॥रे मन
काल करम की गति है न्यारी, भक्ति करे निष्काम ॥
रे मन राधास्वामी मूरत बसी हिये में, गुरु भजो आठों याम ॥रे मन
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[60 860 ] __सैय्या बेदरदी दरस दिखा ॥टेक॥ स्वाँती बंद ज्यों रटत पपीहा, सहे निरन्तर कष्ट महा ॥ सेथ्याँ चित चकोर को चन्द्र पियारा, अब तो तेरा चरन गहा
[60 860 ] __सैय्या बेदरदी दरस दिखा ॥टेक॥
स्वाँती बंद ज्यों रटत पपीहा, सहे निरन्तर कष्ट महा ॥
सेथ्याँ चित चकोर को चन्द्र पियारा, अब तो तेरा चरन गहा ।॥
सैंय्याँ मैं कमला तू सूर प्रकाशी, तेरी शरन में आन पड़ा ॥
सैंय्याँ तू समुद्र मैं तेरी लहरिया, सिंधु बुन्द तज कहाँ रहा ॥
सैंय्याँ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सबकी त्यागी मोहुमया ॥
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[ 61 861 ] तड़प रहा जिया मोर
[ 61 861 ] तड़प रहा जिया मोर ।।टेक॥
काल और करम से जीतू केहि विधि, नहीं चले कुछ जोर ॥
तड़प0 पूँजी खोई सकल गँवाया, जित देखू तित चोर ॥
तड़प चित में काम क्रोध की रेखा, जैसे बन का मोर ॥
तड़प रात विरह की बहुत कठिन है, सोवत होगया भोर ॥
तड़प केहि विधि दर्शन पाऊँ तुम्हारा, करता नित उठ शोर ॥
तड़प तड़प तड़प तड़पू बिरहा दुख, दुख व्यापा चहुँ ओर ।॥
तड़प राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिले मोहि बन्दी छोर ॥ तड़प
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[62 862 ] बाँसुरी बाजी मधुवन में ॥टेक॥ या बंसी का राग तान सुन, सुध बुध भूली मन में ॥ बाँसुरी0 आपा बिसरो आप बिसारियो, ध्यान नहीं कुछ तन में ॥ बाँसुरी ज्ञानी ज्ञान रंग मतवारो, योगी भागे बन में ॥ बाँसुरी भूले भटके राह न पाई, उलझे लाख जतन में ॥ बॉसुरी गोपी गोप गोप में भूले, भक्ति रही नहीं मन में ॥ बाँसुरी शिव सनकादिक मर्म न जाना, सार है नाम रतन में ॥ बाँसुरी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुनली अनहद धुन में ॥ बाँसुरी
[62 862 ] बाँसुरी बाजी मधुवन में ॥टेक॥
या बंसी का राग तान सुन, सुध बुध भूली मन में ॥
बाँसुरी0 आपा बिसरो आप बिसारियो, ध्यान नहीं कुछ तन में ॥
बाँसुरी ज्ञानी ज्ञान रंग मतवारो, योगी भागे बन में ॥
बाँसुरी भूले भटके राह न पाई, उलझे लाख जतन में ॥
बॉसुरी गोपी गोप गोप में भूले, भक्ति रही नहीं मन में ॥ बाँसुरी
शिव सनकादिक मर्म न जाना, सार है नाम रतन में ॥
बाँसुरी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुनली अनहद धुन में ॥ बाँसुरी
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863 साधु गुरु का रूप लखाऊँ
863 साधु गुरु का रूप लखाऊँ ।टेक॥
जो कोई आवे मेरी सभा में, गुरु का रूप लखाऊँ ॥
साधु0 सत रज तम के हर से बाहर, गुरु मूरति दरसाऊ॥
साधु निर्गुन सगुन देह नहीं जाके, अद्भुत भेद जताऊँ ॥
साधु हाड़ मॉस नाड़ी नहीं जाके, वाके रूप न नाऊ ॥
साधु सबका सबमें सबसे न्यारा, मरम विचित्र जताऊ ।॥
साधु रूप अरूप स्वरूप अनूपा, निराकार ठहराऊ ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पल पल गुरु गुन गाऊ॥
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[64 864 ] तिरछी नजरिया माया ने मारा टेका॥ भव भरमाने रूप लुभाने, भटके बारम्बारा ॥ तिरछी0 ममता मोह में आन फंसाने, ठिठके सब नौ द्वारा ॥ तिरछी घायल हुये दुचिताई आई, सूझे वार न पारा ॥ तिरछी हिया जिया तड़फे कल नहीं आवे, कोई न देत सहारा
[64 864 ] तिरछी नजरिया माया ने मारा टेका॥
भव भरमाने रूप लुभाने, भटके बारम्बारा ॥
तिरछी0 ममता मोह में आन फंसाने, ठिठके सब नौ द्वारा ॥
तिरछी घायल हुये दुचिताई आई, सूझे वार न पारा ॥
तिरछी हिया जिया तड़फे कल नहीं आवे, कोई न देत सहारा ।॥
तिरछी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगये भव जल पारा॥
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[65 865 ] सब माया का खेल ॥ टेका यह ब्रह्माण्ड माया का अण्डा, जैसे बन की बेल ॥ सब0 वृक्ष में बीज बीज में अखुआ, खूब मिला है मेल
[65 865 ] सब माया का खेल ॥
टेका यह ब्रह्माण्ड माया का अण्डा, जैसे बन की बेल ॥
सब0 वृक्ष में बीज बीज में अखुआ, खूब मिला है मेल ।॥
सब जड़ में चेतन बसे निरन्तर, ज्यों तिल माही तेल ।॥
सब मन माया दोऊ भये शिकारी, मारे जीव गुलेल ॥
सब राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, नहीं अब रहा दबेल ॥ सब
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[66 866 ] मेरी बीती उमरिया भजन बिना ॥टेक
[66 866 ] मेरी बीती उमरिया भजन बिना ॥टेक।॥
पन्थ में आय बने पन्थाई, सूझी न डगरिया भजन बिना ॥
मेरी0 भक्ति का सौदा नहीं कीना, बन्द बजरिया भजन बिना ॥
मेरी0 मन हुआ टूक करेजा फाटे, माया की नजरिया भजन बिना ॥
मेरी0 अबहूँ सोच समझ अज्ञानी, जा गुरु की सेजरिया भजन बिना ॥
राधास्वामी चरन की ओट पकडले, नाम बिसरिया भजन बिना ॥







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