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[67 867 ] निष्फल सब धन्धा भजन बिना ॥टेक॥ जप तप किरिया करम धरम से, कटे न फन्दा भजन बिना निष्फल ज्ञान ध्यान से काम न निकले, डोले नर अंधा भजन बिना ॥ जो कोई पोथी पत्रा सोधे, बन्धे का बन्धा भजन बिना ॥ राधास्वामी प्रीति न मन में उपजी, सुमति का मन्दा भजन बिना ॥
[67 867 ] निष्फल सब धन्धा भजन बिना ॥टेक॥
जप तप किरिया करम धरम से, कटे न फन्दा भजन बिना निष्फल
ज्ञान ध्यान से काम न निकले, डोले नर अंधा भजन बिना ॥
जो कोई पोथी पत्रा सोधे, बन्धे का बन्धा भजन बिना ॥
राधास्वामी प्रीति न मन में उपजी, सुमति का मन्दा भजन बिना ॥
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[68 868 ] भजन बिना अबसर बीता जात
[68 868 ] भजन बिना अबसर बीता जात ।।टेका॥
नर देही की सार न जानी, चित नहीं गुरू बसात ॥
भजन सुख निद्रा में रात गवाई, दिवस गवाया खात ॥
भजन देखत देखत बिनसेंगे सब, ज्यों तारा परभात ।॥
भजन अवसर पाय न चेते प्रानी, अन्त सहे यम लात ॥
भजन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु यह भेद बतात ॥ भजन
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[88 869 तेरे घट में बोले कौन ॥टेक॥ मिट्टी है जल है कि अग्नी, है आकास या पौन ॥ तेरे0 बोली बोले मधुरी कोमल, छिन भर भी नहीं मौन ॥ तेरे तेरा रूप वही है सच्चा, जो वह है तू तौन ॥ तेरे नीचे पता न पायेगा उसका, ऊँचे चढ़कर गौन ॥ तेरे राधास्वामी दया सार गम लखले, लख निज आपा जौन ॥ तेरे
[88 869 तेरे घट में बोले कौन ॥टेक॥
मिट्टी है जल है कि अग्नी, है आकास या पौन ॥
तेरे0 बोली बोले मधुरी कोमल, छिन भर भी नहीं मौन ॥
तेरे तेरा रूप वही है सच्चा, जो वह है तू तौन ॥
तेरे नीचे पता न पायेगा उसका, ऊँचे चढ़कर गौन ॥
तेरे राधास्वामी दया सार गम लखले, लख निज आपा जौन ॥ तेरे
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[100 870 ] माई गुरु भक्ति चित लाना
[100 870 ] माई गुरु भक्ति चित लाना ।।टेक।॥
गुरु की भक्ति सदा सुख दाई, इसे न कभी भुलाना ।॥
माई वृथा जीवन समय न खोना, अपना जनम बनाना ॥
माई प्रेम प्रीत की राह में पग दे, नित प्रति गुरु गुन गाना ॥
माई जग में यह धन दुर्लभ माई, कठिन योग से पाना ॥
माई राधास्वामी गुरु की दया भई है, गुरु से लगन लगाना ॥ माई
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[101 871 ] सुरत प्यारी अपना आपा जान ॥टेक
[101 871 ] सुरत प्यारी अपना आपा जान ॥टेक।॥
आपा में तेरे सकल पसारा, चौदह भुवन की खान ॥
सुरत जीव में ब्रह्म परब्रह्म व्यापा, बुन्द सिंध लहरान ।॥
सुरत अपना आपा तज सब भरमे, परबत बन मैदान ॥
सुरत अपना सोध सोध निज आपा, गुरुगम ले पहचान ।॥
सुरत राधास्वामी सहज लखा आपा, सुरत शब्द मत ठान ॥सुरत
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[102 872 ] सुरत प्यारी सुन सतगुरु का ज्ञान
[102 872 ] सुरत प्यारी सुन सतगुरु का ज्ञान ।।टेक॥
माया में ब्रह्म ब्रह्म में माया, दोनों एक समान ॥
सुरत नहीं बलवान से बल है न्यारा, बल ही में बलवान ॥
सुरत एक में भया अनेक में धोका, धोके धोक रहान ॥
सुरत बीज में फूल पात फल लीला, समझे साध सुजान ॥
सुरत राधास्वामी घट का भेद बतावें, घट है सब की खान ॥ सुरत
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[ 103 873 ] सखी खट पट में उमर गई ॥टेक
[ 103 873 ] सखी खट पट में उमर गई ॥टेक।॥
ज्ञान गया और योग मिला नहीं, भक्ति विसर गई ।॥
सखी0 ज्ञान ध्यान मेरे हाथ में आया, इधर न उधर गई ॥
सखी अब तो राधास्वामी शरन मिली है, सँभल के ठहर गई ॥ सखी
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[104 874 ] बिन नाम कुशल नहीं जग में ॥टेक॥ नाम बिना कोई पन्थ न चालो, गड़ें काँटे पग पग में ॥ बिना0 जो नर नाम से विमुख फिरत है, सो समझो है योनी खग में ॥ लूट पड़ी माया तेहि लूटे, चैन कहाँ डाकू और ठग में ॥ बिना नाम करनी सब निष्फल, काल करम भरमावे मग में ॥ राधास्वामी नाम है औषधि दुख की, नाम मिलेगा साध समग में ॥
[104 874 ] बिन नाम कुशल नहीं जग में ॥टेक॥
नाम बिना कोई पन्थ न चालो, गड़ें काँटे पग पग में ॥
बिना0 जो नर नाम से विमुख फिरत है, सो समझो है योनी खग में ॥
लूट पड़ी माया तेहि लूटे, चैन कहाँ डाकू और ठग में ॥
बिना नाम करनी सब निष्फल, काल करम भरमावे मग में ॥
राधास्वामी नाम है औषधि दुख की, नाम मिलेगा साध समग में ॥
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[105 875 ] मौज की रचना न्यारी है
[105 875 ] मौज की रचना न्यारी है ।।टेका॥
किसी को मौज बनावे राजा, किसी को रंक भिखारी ॥
मौज0 किसी को दे सुख चैन बिलासा, करे किसी को दुखारी ॥
मौज जो कुछ है सो मौज की लीला, मौज की गति मति भारी ||
मौज मौज मौज की मौज मौज की, लीला अगम अपारी ॥
मौज मौज निरख हमको मिली शान्ती, राधास्वामी की बलिहारी ॥
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[106 876 ] सजनी सजन से नाता जोड़ टेक॥ काल करम के बन्ध से छुटजा, माया का सिर फोड़ ॥ सजनी प्रीति प्यार की करले कमाई, जग से नेह को मोड़ ॥ सजनी कलह कला के झगड़े मेंट कर, इनसे धागा तोड़ ॥ सजनी प्रेम भक्ति के मारग आजा, वह है सब का निचोड़ ॥ सजनी नू प्यारी राधास्वामी गुरु की, मन ले फटक पिछोड़ ॥ सजनी [107 877 ] गुरु दाता लगा दो पार मुझे ॥टेक॥ टूटी नय्या भँवर पड़ी है, काढ़ निकारो किनार मुझे ॥ गुरु0 काल करम का बोझ पड़ा सिर, नहीं भावे यह भार मुझे ॥ तुम समान कोई नजर न आवे, खेवटिया हुशियार मुझे ॥ गुरु0 बन्धन में माया के उलझा, जग है कारागार मुझे ॥ राधास्वामी आन बताओ, परमारथ का सार मुझे ॥
[106 876 ] सजनी सजन से नाता जोड़ टेक॥
काल करम के बन्ध से छुटजा, माया का सिर फोड़ ॥
सजनी प्रीति प्यार की करले कमाई, जग से नेह को मोड़ ॥
सजनी कलह कला के झगड़े मेंट कर, इनसे धागा तोड़ ॥
सजनी प्रेम भक्ति के मारग आजा, वह है सब का निचोड़ ॥
सजनी नू प्यारी राधास्वामी गुरु की, मन ले फटक पिछोड़ ॥ सजनी
[107 877 ] गुरु दाता लगा दो पार मुझे ॥टेक॥
टूटी नय्या भँवर पड़ी है, काढ़ निकारो किनार मुझे ॥
गुरु0 काल करम का बोझ पड़ा सिर, नहीं भावे यह भार मुझे ॥
तुम समान कोई नजर न आवे, खेवटिया हुशियार मुझे ॥
गुरु0 बन्धन में माया के उलझा, जग है कारागार मुझे ॥
राधास्वामी आन बताओ, परमारथ का सार मुझे ॥
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[108 878 ] जगत में दो दिन का रहना ॥टेक
[108 878 ] जगत में दो दिन का रहना ॥टेक।॥
हँसी खुशी से समय बिताओ, दुख कलेश को क्यों सहना ॥
जगत गुरु चरन से जोड़ो चित को, भव की धार नहीं बहना ॥
जगत है प्रपंच सब जगत की माया, उसकी ओट न तुम गहना ॥
जगत परमारथ का करो व्यौहारा, सत्त नाम का लहो लहना ॥
जगत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,राधास्वामी राधास्वामी नित कहना
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[106 879 ] माई चिन्ता चित्त न धार ॥टेक
[106 879 ] माई चिन्ता चित्त न धार ॥टेक।॥
जब आई तू गुरु की शरनी, गुरु ही करेंगे सभार ॥
माई0 सुमिरन कर गा गुरु की बानी, तेरे सीस न भार ॥
माई मन में ध्यान रहे सतगुरु का, नहीं व्यापे संसार ॥
माई छोड़ आस जग की सुन माई, गुरु से करले प्यार ॥
माई राधास्वामी दया मेहर करें पूरी, एक दिन बेड़ा पार ॥ माई
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[110 880 ] गुरु प्रेमी आनन्द पाते हैं
[110 880 ] गुरु प्रेमी आनन्द पाते हैं ।।टेक।॥
घट में बैठक ठानी अपने, कहीं आते नहीं जाते हैं ॥
गुरु0 अनहद बानी मंगल खानी, की धुन अन्तर गाते हैं॥
गुरु गुरु से जब लगन लगी सच्ची नहीं, और से नेह लगाते हैं ।।
गुरु सुख जीवन की चूटी पाई, सुख चैन से समय बिताते है ॥
गुरु राधास्वामी के गुन गा गा, भव द्वन्द जाल कटवाते है ॥
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111 881] बतादो साई परमारथ की पात ॥टेक॥ कौन देश से हंसा आया, कौन देश को जात ॥ बतादो0 कैसे बँधा आय माया संग, केसे छूटे साथ ॥ बतादो रात अधेरी नींद न आवे, कब होगी परभात
111 881] बतादो साई परमारथ की पात ॥टेक॥
कौन देश से हंसा आया, कौन देश को जात ॥
बतादो0 कैसे बँधा आय माया संग, केसे छूटे साथ ॥
बतादो रात अधेरी नींद न आवे, कब होगी परभात ।॥
बतादो सुध बुध अपनी आय न बूझे, मन रह रहकर पछतात ।॥
बतादो राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पद चित ठैरात ॥ बतादो
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[112 882 ] सुरत प्यारी कर सतगुरु का ध्यान टेक॥ सतगुरु तेरे घट में बसते, तू फिरे चारों खान
[112 882 ] सुरत प्यारी कर सतगुरु का ध्यान टेक॥
सतगुरु तेरे घट में बसते, तू फिरे चारों खान ।॥
सुरत भों के मध्य में तिल है तीसरा, वहाँ है ठौर ठिकान ॥
सुरत जगमग ज्योत सुनहरी ज्वाला, ज्योत में ज्योत महान ॥
सुरत वह है बिम्ब और तू है प्रतिबिम्ब, एक में एक समान ॥
सुरत एक में दो का भाव कहाँ है, दुजा मिथ्या जान ॥
सुरत तिल को छोड़ गगन में धस चल, ॐ रूप दरसान ॥
सुरत सुन्न मंडल में प्रीतम ‘बसता, सुन्न सुन्न पहचान ॥
सुरत खिड़की खोल भंवर की तत छिन, सुन सोहंग धुन कान ॥
सुरत सो है गुरु अहं तू प्यारी, अपना रूप पिछान ॥
सुरत सोहंग परे सत्त का बासा, सत्त सत्त का भान ॥
सुरत सत है अलख अगम ये सत है, कैसे करू बखान ॥
सरत राधास्वामी संगत कुछ दिन करले, तब पावे गुरु ज्ञान ॥
सुरत
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[113 883 ] सुरत प्यारी सुन अनहद धुन तान ॥टेक॥ शब्द है ब्रह्म शब्द परब्रह्म, ईश्वर शब्द प्रमान ॥ सुरत माया काल शब्द की मूरत, शब्द में शब्द समान
[113 883 ] सुरत प्यारी सुन अनहद धुन तान ॥टेक॥
शब्द है ब्रह्म शब्द परब्रह्म, ईश्वर शब्द प्रमान ॥
सुरत माया काल शब्द की मूरत, शब्द में शब्द समान ।॥
सुरत शब्द ने रची त्रिलोकी सारी, शब्द है सब का प्रान ॥ सुरत
सहस कँवल दल शंख घंट सुन, त्रिकुटी ओउम् निशान ॥
सुरत0 सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, भवर सोहंगम जान ।॥
सत पद अलख अगम को परखा, व्यापा शब्द महान ॥
जो कोई शब्द की करे कमाई, फंसे न चारों खान ॥
नाम है शब्द अनाम शब्द है, समझे साधु सुजान ॥
गुप्त प्रगट में शब्द विराजा, सुरत शब्द पहचान ॥
बाच लक्ष सब शब्द रूप में, तत्व में तत्व सुजान ॥
ज्ञान अनुमान प्रमान समाना, यह सब शब्द न आन ॥
साधु सन्त और हंस शब्द है, क्षीर नीर के छान ॥
लगन लगे घट में तब प्रगटे, जीते जी निरवान ॥
शब्द ही मारे शब्द जिलावे, शब्द का कर अनुमान ॥
सतगुरु बानी शब्द की खानी, राधास्वामी किया बखान ॥
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[ 114 884 ] मनुआ तू है बड़ा कठोर ॥टेक॥ कहा न माने मेरी सुने नहीं, अति चंचल चित चोर ॥ मनुआ0 खेल खिलावे खेल अनोखे, बुद्धि को दे झकझोर ॥ मनुआ कभी अकाश की ओर सिधाये, कभी समुद्र सिर जोर
[ 114 884 ] मनुआ तू है बड़ा कठोर ॥टेक॥
कहा न माने मेरी सुने नहीं, अति चंचल चित चोर ॥
मनुआ0 खेल खिलावे खेल अनोखे, बुद्धि को दे झकझोर ॥
मनुआ कभी अकाश की ओर सिधाये, कभी समुद्र सिर जोर ।॥
मनुआ कबहुँ नये नित उत्पात मचावे, करे शोर घनघोर ॥
मनुआ राधास्वामी की ले शरनाई, गुरु है बन्दी छोर ॥ मनुआ
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[115 885 ] करो चित देकर शब्द अभ्यास ॥ टेका सुमिरन भजन ध्यान हो प्रति दिन, मन में धर विश्वास ॥ करो0 गुरू का नाम रहे अन्तर घट, जाप हो साँसों साँस ॥ मन चंचल की दुविधा मेटो, हिया जिया हर्ष हुलास ॥ यहि विधि कुछ दिन करो कमाई, गुरू है अंग संग पास ॥ राधास्वामी की दाया से, दुख नहीं पावे दास ॥
[115 885 ] करो चित देकर शब्द अभ्यास ॥
टेका सुमिरन भजन ध्यान हो प्रति दिन, मन में धर विश्वास ॥
करो0 गुरू का नाम रहे अन्तर घट, जाप हो साँसों साँस ॥
मन चंचल की दुविधा मेटो, हिया जिया हर्ष हुलास ॥
यहि विधि कुछ दिन करो कमाई, गुरू है अंग संग पास ॥
राधास्वामी की दाया से, दुख नहीं पावे दास ॥
Hindi
116 886 ] भजन बिन जीवन है निष्फल ॥टेक
116 886 ] भजन बिन जीवन है निष्फल ॥टेक।॥
मृग तृष्णा मरुदल भूमी, सार हीन निरजल ॥
भजन काल करम माया बरियाई, फाँसे जीव निरबल ॥
भजन संभल संभल कर पग का धरना, कहीं न जाना फिसल ॥
भजन भजन प्रताप बचे कोई प्रानी, शब्द के मारग चल ॥
भजन राधास्वामी दीन सहाई, अपना दे निज बल ॥ भजन
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[117 887 ] मनुआ काहे मचावे रार ॥टेका॥ भरम भ्रान्ती में पड़ा निस दिन, जग भया कारागार ॥ मनुआ0 नहीं विश्वास न श्रद्धा भक्ति, नहीं चित प्रेम न प्यार ॥ घर में रहे तो अनबन ठाने, बन सिर दुख का भार
[117 887 ] मनुआ काहे मचावे रार ॥टेका॥
भरम भ्रान्ती में पड़ा निस दिन, जग भया कारागार ॥
मनुआ0 नहीं विश्वास न श्रद्धा भक्ति, नहीं चित प्रेम न प्यार ॥
घर में रहे तो अनबन ठाने, बन सिर दुख का भार ।॥
कैसी करूँ उपाय न सूझे, रहती हूँ मन मार ॥
राधास्वामी चरन में मुझको पटकू, तुझसे गई मैं हार ॥
Hindi
[118 888 ] मनुआ तुझे मैं गया पहवान ॥टेक॥ पल में राजा पल में परजा, पल में निर्धन धनवान
[118 888 ] मनुआ तुझे मैं गया पहवान ॥टेक॥
पल में राजा पल में परजा, पल में निर्धन धनवान ।॥
मनुआ0 पल में ज्ञानी ध्यानी पक्का, पल मूरख अन्जान ॥
कबहुँ माटी से करे मैला, कबहुँ चढ़े असमान ॥
तेरी दसा अनौखी न्यारी, समझे कोई सुजान ॥
तुझसे जीत सका नहीं कोई, निबल सबल बलवान ॥
हार मान सब तुझसे हारे, सब का भया अपमान ।॥
राधास्वामी चरन में अरपू तुझको, लिया यह मैंने ठान ॥
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[116 889 ] मनुआ तू समझ समझ पग धार ॥टेक॥ पन्थ में आया भया पन्थाई, चल चल डगर निहार ॥ मनुआ0 मारग कठिन भयंकर भूमी, काम क्रोध बट मार ॥ मनुआ0 लोभ मोह दोऊ प्रान के घातक, महा शत्रु हंकार ॥ माया ठगनी करे ठगेरी, बचा काल का वार ॥ तू है अकेला पाँच हैं बैरी, पाँचों बड़े बरियार ॥ गुरु को संग ले शरन में आकर, वह करे तेरी संभार ॥ शब्द रूप गुरु घट में विराजे, शब्द सुनो झनकार ॥ राधास्वामी दया चढ़ शब्द की नौका, जा भवसागर पार ॥
[116 889 ] मनुआ तू समझ समझ पग धार ॥टेक॥
पन्थ में आया भया पन्थाई, चल चल डगर निहार ॥ मनुआ0
मारग कठिन भयंकर भूमी, काम क्रोध बट मार ॥
मनुआ0 लोभ मोह दोऊ प्रान के घातक, महा शत्रु हंकार ॥
माया ठगनी करे ठगेरी, बचा काल का वार ॥
तू है अकेला पाँच हैं बैरी, पाँचों बड़े बरियार ॥
गुरु को संग ले शरन में आकर, वह करे तेरी संभार ॥
शब्द रूप गुरु घट में विराजे, शब्द सुनो झनकार ॥
राधास्वामी दया चढ़ शब्द की नौका, जा भवसागर पार ॥
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[ 120 890 ] मनुआ तू चंचल चित दे त्याग ॥टेक
[ 120 890 ] मनुआ तू चंचल चित दे त्याग ॥टेक।॥
कुबुद्धि कुकरमी कुभाष कुकामी, कुटिल कुपन्थ कुभाग ॥ मनुआ0
अशुभ कमाई करे दिन राती, अशुभ वासना लाग ॥
दुख भोगे आपति नित झेले, नहीं धारे अनुराग ॥
जैसी करनी वैसी भग्नी, मोह नींद से जाग ॥
राधास्वामी गुरु की कर सतसंगत, जागे सोया भाग ॥
Hindi
[ 121 891 ] गुरु चरन कमल की दासी बनी ॥टेका॥ सहस कमल दल सहस रूप हो, सहस्त्रार सहबासी बनी
[ 121 891 ] गुरु चरन कमल की दासी बनी ॥टेका॥
सहस कमल दल सहस रूप हो, सहस्त्रार सहबासी बनी ।॥
गुरु0 त्रिकुटी तत्व में वाच लक्ष लख, ओंकार केलासी बनी ॥
सुन्न गई महासुन्न को निरखा, जग दारुण से उदासी बनी ।॥
, भँवर में भंवराकृत होय डोली, सोहंकार निवासी बनी ॥
सतपद सत्यामृत पी परखी, सचमुच मैं सुखरासी बनी ॥
अलख अनाम अगम को पाया, सुख स्वरूप दुख नासी बनी ॥
राधास्वामी गुरु ने मुझे चिताया, अब मैं ज्ञान प्रकासी बनी ॥
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[ 122 892 ] आके बंधादे धीर प्यारे ॥टेक॥ मन में विकलता तन में विकलता, व्यापी कलेजे पीर
[ 122 892 ] आके बंधादे धीर प्यारे ॥टेक॥
मन में विकलता तन में विकलता, व्यापी कलेजे पीर ।॥
प्यारे0 फिरू निरासी चित में उदासी, लगा विरह का तीर ॥
बुद्धि न बूझे आँख न सूझे, काँपे सकल शरीर ॥
कोई न जाने गति न पिछाने, कैसे करूँ तदवीर ॥
दो शरनाई बनो सहाई, राधास्वामी धीर गम्भीर ॥
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[123 893 ] बरसे गगन रस बूद, चुनरिया भीज रही ॥टेक
[123 893 ] बरसे गगन रस बूद, चुनरिया भीज रही ॥टेक।॥
चूनर पहर ओढ़ सुरत निकसी, माया निरख कर मींज रही ॥
बरसे0 सदा सुहाग गुरु ने दीन्हा, घट घर दूज और तीज रही ॥
सूत न बिखरे तार न बिगड़े, काल की गति मति छीज रही।
निरखा रंग चूनर का निर्मल, नहीं अंड बंड उदबीज रही ॥
राधास्वामी गुरु का रंग लगा है, चूनर उत्तम चीज रही ॥
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[124 894 ] गुरु प्यारे के चरनों की दासी बनी, दासी बनी प्रेम प्यासी बनी॥टेक॥ सहस कमल दल निरख सहस छवि, सहसासन सहसासी बनी ॥ गुरु0 त्रिकुटी ततत्वम वाच लक्ष लख, ओमकार सहबासी बनी ॥ , सुन्न में द्वन्द आस्था मेटी, सहस समाधि उदासी बनी ॥ भँवर में भवराकृत हो डोली, सोहंगम आकासी बनी ॥ सतपद जाय मिली सतगुरु से, आनन्दित सुखरासी बनी ॥ , अलख अनाम अगम पद परसा, अजर अमर अविनासी बनी
[124 894 ] गुरु प्यारे के चरनों की दासी बनी, दासी बनी प्रेम प्यासी बनी॥टेक॥
सहस कमल दल निरख सहस छवि, सहसासन सहसासी बनी ॥
गुरु0 त्रिकुटी ततत्वम वाच लक्ष लख, ओमकार सहबासी बनी ॥
, सुन्न में द्वन्द आस्था मेटी, सहस समाधि उदासी बनी ॥
भँवर में भवराकृत हो डोली, सोहंगम आकासी बनी ॥
सतपद जाय मिली सतगुरु से, आनन्दित सुखरासी बनी ॥
, अलख अनाम अगम पद परसा, अजर अमर अविनासी बनी ।॥
राधास्वामी धाम में डेरा डाला, ज्ञान भक्ति प्रकाशी बनी ॥
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[ 125 895 ] गुरु चरनन से मेरी लव लगी रहे
[ 125 895 ] गुरु चरनन से मेरी लव लगी रहे ।।टेक॥
दुख कलेश नहीं मुझे सतावे, माया दुचिता भगी रहे ॥
गुरु0 मोह नींद आलस से उठकर, सुरत सुहागिन जगी रहे ||
मान मनी से नाता तोगुरु भक्ति मेरी सगी रहे ॥
सुमिरन ध्यान भजन चित लागे, सुरत प्रेम में पगी रहे ॥
राधास्वामी नाम धन पाया, दासी गुरु रंग रंगी रहे ॥
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[ 126 896 ] कोई अवघट घाट भरे गगरी ॥टेका॥ औंधा कुआ अकास में पानी, हाथ पड़ा औंधी गगरी ॥ कोई0 पानी भरन जब निकसी घर से, कान्हा काल रोके डगरी ॥ मैं तो उड़ी चली नभ ऊपर, कान्हा ने पकड़ लिया पगरी ॥ मैं बोली जा अपना काम कर, अपनी संभाल आप मगरी ॥ मैं तेरे बस की नाहीं कान्हा, तेरी रोक वृथा सगरी ॥ सत की गगरिया चित से भरूँगी, जाऊँगी मैं आनन्द नगरी ॥ राधास्वामी बल से हुई बलवानी, सुरत शब्द से बनी नगरी ॥
[ 126 896 ] कोई अवघट घाट भरे गगरी ॥टेका॥
औंधा कुआ अकास में पानी, हाथ पड़ा औंधी गगरी ॥
कोई0 पानी भरन जब निकसी घर से, कान्हा काल रोके डगरी ॥
मैं तो उड़ी चली नभ ऊपर, कान्हा ने पकड़ लिया पगरी ॥
मैं बोली जा अपना काम कर, अपनी संभाल आप मगरी ॥
मैं तेरे बस की नाहीं कान्हा, तेरी रोक वृथा सगरी ॥
सत की गगरिया चित से भरूँगी, जाऊँगी मैं आनन्द नगरी ॥
राधास्वामी बल से हुई बलवानी, सुरत शब्द से बनी नगरी ॥
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[127 897 ] मनुआ सोच समझ ले नाम ॥टेक
[127 897 ] मनुआ सोच समझ ले नाम ॥टेक।॥
सुमिरन ध्यान भजन गुरू सेवा, इनसे मिले बिसराम ॥
मनुआ0 आलस छोड़ छोड़ कदराई, करले अपना काम ।॥
मनुआ चलते फिरते उठते बैठते, गुरू भज आठों याम ॥
मनुआ घट में नित हो भजन बन्दगी, घट राधास्वामी धाम ॥
मनुआ राधास्वामी तेरे साँचे रक्षक, उनके चरन को थाम ॥ मनुआ
Hindi
[128 898 ] मन का झगड़ा मेटो, साधु मन का झगड़ा मेटो
[128 898 ] मन का झगड़ा मेटो, साधु मन का झगड़ा मेटो।टेक।॥
माया जीव ब्रह्म अविनासी, इनका टाट लपेटो ॥ साधु0
बन में गये तो मन से अनबन, घर उत्पात झोटो ॥
साधु0 झूठी माया झूठी काया, भूठ तिया सुत बेटो ॥
साधु मन को सोधो मन परबोधो, मन की गुफा में लेटो ॥
साधु जब लग मन में संशय दुविधा, सत से होय न भेटो ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मन करो अपना हेटो ॥ साधु
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126 899 ] पीले तू प्याला मेरे प्यारे, पीले तू प्याला ॥टेक॥ प्याला नाम अमी का तू पीले, होजा मतवाला ॥ मेरे प्यारे काल कर्म को आग लगादे, करदे मुख काला ॥ मेरे प्यारे निस दिन माया भर्म भुलावे, यासों पड़ा पाला ॥ मेरे प्यारे राधास्वामी धाम में जाकर, काटो यह जंजाला ॥मेरे प्यारे
126 899 ] पीले तू प्याला मेरे प्यारे, पीले तू प्याला ॥टेक॥
प्याला नाम अमी का तू पीले, होजा मतवाला ॥
मेरे प्यारे काल कर्म को आग लगादे, करदे मुख काला ॥
मेरे प्यारे निस दिन माया भर्म भुलावे, यासों पड़ा पाला ॥
मेरे प्यारे राधास्वामी धाम में जाकर, काटो यह जंजाला ॥मेरे प्यारे
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[130 900 ] बिरह का लगा कलेजे तीर, कसक की साले उरमें पीर ॥टेक
[130 900 ] बिरह का लगा कलेजे तीर, कसक की साले उरमें पीर ॥टेक।॥
दरस बिन चित नहीं शान्ती पावे, कोई इस मन को क्या समझावे॥
रात को नींद न दिन को चैन, सुनावे कोई धीरज के बैन ॥
गुरु से विनती है यह मेरी, दया से काटो दुख की बेरी ॥
परी त्रय दुख के मैं पाले, फसी माया के जंजाले ॥
विकल मन चहुँ दिस भरम रहा, बिपति के मारे सहम रहा ॥
दया अब कीजे राधास्वामी, शरन में लो अन्तरयामी ॥
Hindi
[131 901 ] सुरत प्यारी अधर की ओर चली ॥टेक॥ तीन ताप से रही मुरझाई, अब तो खिल गई मन की कली ॥ सुरत0 ऊँचा महल सुहाना बंगला, झंझरी झरोका लागे भली ॥ नौबत झड़ती पिया के मन्दिर में, छिन छिन दम दम पली पली ॥ ज्योत में ज्योत ज्योत अति अद्भुत, ज्योत में ज्योत की बाती बलीराधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काल कर्म की बला टली ॥
[131 901 ] सुरत प्यारी अधर की ओर चली ॥टेक॥
तीन ताप से रही मुरझाई, अब तो खिल गई मन की कली ॥ सुरत0
ऊँचा महल सुहाना बंगला, झंझरी झरोका लागे भली ॥
नौबत झड़ती पिया के मन्दिर में, छिन छिन दम दम पली पली ॥
ज्योत में ज्योत ज्योत अति अद्भुत, ज्योत में ज्योत
की बाती बलीराधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काल कर्म की बला टली ॥
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[ 132-902 ] गुरु बिन पन्थ में पग नहीं धरना, मारग कठिन महान हो ॥टेक
[ 132-902 ] गुरु बिन पन्थ में पग नहीं धरना, मारग कठिन महान हो ॥टेक।॥
रस्ते में है काल का डेरा, भरम के जाल फैसना हो ॥
गुरु0 जो कोई गुरु का संग न कीन्हा, काल करम उरझाना हो ॥
गुरु के सतसंग पूछ निरन्तर, घट की राह रुकाना हो ॥
बिन गुरु हाथ न लागे कुछ भी, पाये न ठौर ठिकाना हो ॥
पिन गुरु ज्ञान कथे निस बासर, सो नर मूढ़ अज्ञाना हो ॥
गुरु की दया साध की संगत, उपजे निर्मल ज्ञाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मैं गुरु चरन दिवाना हो।
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[133 903 ] गुरु दरयाव बहा अति निर्मल, गुरु मुख आन नहाना हो ॥टेक
[133 903 ] गुरु दरयाव बहा अति निर्मल, गुरु मुख आन नहाना हो ॥टेक।॥
जल प्रवाह बचन की धारा, सत संग घाट बिठाना हो ॥
गुरु0 प्रेमी जन नित गोते मारे, मन का मैल छुड़ाना हो ।॥
गुरु तीन ताप की तपन बुझाई, शान्त चित्त बन जाना हो ॥
गुरु चंचल से जब होगये निश्चल, सूझा अगम ठिकाना हो ॥
गुरु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पर बल बल जाना हो।
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[134 904] गुरु दरयाव की महिमा भारी, कर अस्नान तर जाना हो ॥टेक
[134 904] गुरु दरयाव की महिमा भारी, कर अस्नान तर जाना हो ॥टेक।॥
प्रेमी जन सब जुड़ मिल आये, उत्सव परम महाना हो ॥
गुरु0 मंगल राग गुरु की अस्तुति, उमंग उमंग नित गाना हो ॥
चंदन फूल अरगजा चूवा, गुरु के चरनन चढ़ाना हो ॥
पूजा गुरु की सेवा गुरु की, हिया गुरु ज्योत जगाना हो ॥
प्रेम थाल में आरत लेकर, गुरु छवि निरख भुनाना हो ॥
अन्तर गुरु है बाहर गुरू है, और न कोई दरसाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कर स्नान मगनाना हो ॥
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905 गुरू एक अनादि अनन्त महा, पद कमल में आन के शरन गहा ॥ तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको, निज भक्ति का पन्थ दिखा मुझको ॥ तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले, तेरे चरण सरोज का ध्यान मिले ॥ अविनाशी है तू सुखराशी है, तू घट घट का गुरूबासी है॥ विश्व विश्वम्भर जगधारी, सुर नर मुनि सब का हितकारी ॥ मेरे मन से दूर मदमान रहे, मुझे सदा तेरा अभिमान रहे ॥ सब के प्राणों का प्राण है तूदे प्रेम जो प्रेम की खान है तू ॥ घट तिमिर मिटे कर उजियारी, तेरे चरन शरन की बलिहारी ॥ राधास्वामी देवन के देवा, करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥
905 गुरू एक अनादि अनन्त महा, पद कमल में आन के शरन गहा ॥
तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको, निज भक्ति का पन्थ दिखा मुझको ॥
तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले, तेरे चरण सरोज का ध्यान मिले ॥
अविनाशी है तू सुखराशी है, तू घट घट का गुरूबासी है॥
विश्व विश्वम्भर जगधारी, सुर नर मुनि सब का हितकारी ॥
मेरे मन से दूर मदमान रहे, मुझे सदा तेरा अभिमान रहे ॥
सब के प्राणों का प्राण है तूदे प्रेम जो प्रेम की खान है तू ॥
घट तिमिर मिटे कर उजियारी, तेरे चरन शरन की बलिहारी ॥
राधास्वामी देवन के देवा, करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥







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