×
Song 0 — Hindi
400. है पिंड घट तुम्हारा, ब्रह्मांड घट बना है ।
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥
धुन 17
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥
धुन 17
×
Song 1 — Hindi
401. क्यों सोवे जग में नींद भरी, उठ जागो जलदी भोर भई ।
पन्थी सब उठकर राह लई, तू मंजिल अपनी बिसर गई ॥1 ॥
सतगुरु का खोज करो प्यारी, संग उनके घाट चलो न्यारी ।
भवसागर है गहिरा भारी, गुरु बिन को जाय सके पारी ॥2 ॥
भक्ति की रीति सुनो प्यारी, गुरु चरनन प्रीति करो सारी ।
तज संशय, भरम करम जारी, तब सुरत अधर घर पग धारी ॥3 ॥
चढ़ गगन शिखर तन वन वारी, धुन बीन सुनो सतपद न्यारी ।
फिर अलख अगम जा परसा री, राधास्वामी चरन पर बलिहारी ॥4 ॥
पन्थी सब उठकर राह लई, तू मंजिल अपनी बिसर गई ॥1 ॥
सतगुरु का खोज करो प्यारी, संग उनके घाट चलो न्यारी ।
भवसागर है गहिरा भारी, गुरु बिन को जाय सके पारी ॥2 ॥
भक्ति की रीति सुनो प्यारी, गुरु चरनन प्रीति करो सारी ।
तज संशय, भरम करम जारी, तब सुरत अधर घर पग धारी ॥3 ॥
चढ़ गगन शिखर तन वन वारी, धुन बीन सुनो सतपद न्यारी ।
फिर अलख अगम जा परसा री, राधास्वामी चरन पर बलिहारी ॥4 ॥
×
Song 2 — Hindi
402. उदय हुआ मेरा भाग री, राधास्वामी गुरु पाया टेक। ।
जब से गुरु के चरन में आई, सोया मनुआ जाग री, व्यापे नहीं माया ॥
उदय जनम जनम के संकट मेटे, पाया अचल सोहाग री, सत गुरु की दाया । ।
आंख खुली निज रूप संभाला, द्वन्द जगत से भाग री,मोहे नहीं काया ॥
उदय0 ज्ञान ध्यान का सार मिला अब, भक्ति अटल बर मांग री,
सुख चहुँ दिस छाया ॥कहना मान पियारी मेरा, राधास्वामी पद से लाग री,
तज अपना पराया ॥
जब से गुरु के चरन में आई, सोया मनुआ जाग री, व्यापे नहीं माया ॥
उदय जनम जनम के संकट मेटे, पाया अचल सोहाग री, सत गुरु की दाया । ।
आंख खुली निज रूप संभाला, द्वन्द जगत से भाग री,मोहे नहीं काया ॥
उदय0 ज्ञान ध्यान का सार मिला अब, भक्ति अटल बर मांग री,
सुख चहुँ दिस छाया ॥कहना मान पियारी मेरा, राधास्वामी पद से लाग री,
तज अपना पराया ॥
×
Song 3 — Hindi
403. सुरत चली पग धार री, राधास्वामी धुर धामा टेका ।
पहली मंजिल सहस कमल दल, पीत ज्योत की धार री, घंटा धुन काना ॥
सुरत0 दूसरी मंजिन त्रिकुटी आई, काल सूर बिस्तार री,
धुन ओम का गाना ॥तीसरी मंजिल सुन्न महासुन्न, सैत चन्द्र उजियार री,
सारंग गत जाना॥चौथी मंजिल भँवर गुफा की, सेत सूर पर कार री,
मुरली बजवाना॥पांचवीं मंजिल सत्त धाम की, ज्योती की भरमार री,
राधास्वामी बखाना ॥
पहली मंजिल सहस कमल दल, पीत ज्योत की धार री, घंटा धुन काना ॥
सुरत0 दूसरी मंजिन त्रिकुटी आई, काल सूर बिस्तार री,
धुन ओम का गाना ॥तीसरी मंजिल सुन्न महासुन्न, सैत चन्द्र उजियार री,
सारंग गत जाना॥चौथी मंजिल भँवर गुफा की, सेत सूर पर कार री,
मुरली बजवाना॥पांचवीं मंजिल सत्त धाम की, ज्योती की भरमार री,
राधास्वामी बखाना ॥
×
Song 4 — Hindi
404. तार सुमिरन का बंधा जब, समझो तब तरजाओगे ।
जीते जी सुमिरन भजन और, ध्यान का फल पाओगे ॥1 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, नाम की जब लौ लगी ।
वह तरेगा तारेगा लाखों को, अपने जीते जी ॥2 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, तार को रखो संभाल ।
अन्त में है मुक्ति पद, हो जाओगे इससे निहाल ॥3 ॥
225 तार सुमिरन का न टूटा, नाम की तारी लगी ।
शब्द धुन की गूंज मन को, मीठी और प्यारी लगी ॥4 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, सुमिरो साँसों सांस तुम ।
राधास्वामी की दया से, कर लो पूरी आस तुम ॥ ॥
जीते जी सुमिरन भजन और, ध्यान का फल पाओगे ॥1 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, नाम की जब लौ लगी ।
वह तरेगा तारेगा लाखों को, अपने जीते जी ॥2 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, तार को रखो संभाल ।
अन्त में है मुक्ति पद, हो जाओगे इससे निहाल ॥3 ॥
225 तार सुमिरन का न टूटा, नाम की तारी लगी ।
शब्द धुन की गूंज मन को, मीठी और प्यारी लगी ॥4 ॥
तार सुमिरन का न टूटे, सुमिरो साँसों सांस तुम ।
राधास्वामी की दया से, कर लो पूरी आस तुम ॥ ॥
×
Song 5 — Hindi
405. लगी लगन उस पीव से, अब नहीं टूटे तार ॥
अब नहीं टूटे तार, प्रीत प्रीतम से लागी ।
जग की आस भरोस, हिये से अपने त्यागी ।
त्याग के तप से तपी, तपी मैं दिन और राती ।
हृदय विरह की आग तपे, ज्यों दीपक बाती ।
प्रीत रीति अति कठिन है, कोई सके नहीं टार ।
लागी लगन उस पीव से, अब नहीं टूटे तार ॥
अब नहीं टूटे तार, प्रीत प्रीतम से लागी ।
जग की आस भरोस, हिये से अपने त्यागी ।
त्याग के तप से तपी, तपी मैं दिन और राती ।
हृदय विरह की आग तपे, ज्यों दीपक बाती ।
प्रीत रीति अति कठिन है, कोई सके नहीं टार ।
लागी लगन उस पीव से, अब नहीं टूटे तार ॥
×
Song 6 — Hindi
406. प्रेम में वर्ण विषेक नहीं, नहीं अचार व्यवहार । ।
नहीं अचार व्यवहार, कठिन है प्रेम का नाता ।
प्रेम पन्थ की डगर, कोई कोई बिरला जाता ।
बिरला जाता कोई, वरण और कुल को तज के ।
प्रभु को ले अपनाय, नाम उस प्रभु का भज के ॥
खाये बेर प्रसन्न हो, शबरी से कर प्यार ।
प्रेम में वरण विवेक नहीं, नहीं अचार व्यौहार ।
नहीं अचार व्यवहार, कठिन है प्रेम का नाता ।
प्रेम पन्थ की डगर, कोई कोई बिरला जाता ।
बिरला जाता कोई, वरण और कुल को तज के ।
प्रभु को ले अपनाय, नाम उस प्रभु का भज के ॥
खाये बेर प्रसन्न हो, शबरी से कर प्यार ।
प्रेम में वरण विवेक नहीं, नहीं अचार व्यौहार ।
×
Song 7 — Hindi
407. लौ लागी जब जानिये, तार टूट नहीं जाय । ।
तार टूट नहीं जाय, एक रस समय बितावे ।
दुख सुख के व्यौहार भाव को, मन नहीं लावे । ।
अटल अचल दृढ़ प्रेम, मगन घट अन्तर रहना ।
सुने न और की बात, न अपने मन की कहना । ।
जीते सुमिरे पीव को, मर कर पीव समाय ।
लौ लागी तब जानिये, तार टूट नहीं जाय ॥
तार टूट नहीं जाय, एक रस समय बितावे ।
दुख सुख के व्यौहार भाव को, मन नहीं लावे । ।
अटल अचल दृढ़ प्रेम, मगन घट अन्तर रहना ।
सुने न और की बात, न अपने मन की कहना । ।
जीते सुमिरे पीव को, मर कर पीव समाय ।
लौ लागी तब जानिये, तार टूट नहीं जाय ॥
×
Song 8 — Hindi
408. लगी लगन छूटे नहीं, कितनो करो उपाय । ।
कितनो करो उपाय, रोग यह बड़ा है भारी ।
सहे कलेजे घाव, लगी जब बिरह कटारी ॥
घायल की गति लख, कौन जो घाव न खावे ।
अन्तर में है चोट, कोई कैसे दरसावे । ।
प्रेम का मारा न जिये, सिसक सिसक दम जाय ।
लगी लगन छूटे नहीं, कितनो करो उपाय ॥
कितनो करो उपाय, रोग यह बड़ा है भारी ।
सहे कलेजे घाव, लगी जब बिरह कटारी ॥
घायल की गति लख, कौन जो घाव न खावे ।
अन्तर में है चोट, कोई कैसे दरसावे । ।
प्रेम का मारा न जिये, सिसक सिसक दम जाय ।
लगी लगन छूटे नहीं, कितनो करो उपाय ॥
×
Song 9 — Hindi
409. परमारथ धन क्यों मिले, लिया टके का मन्त्र ।
लिया टके का मंत्र, गुरु किया भिक्ष भिकारी ।
मांगे सबसे भीख, भीख का बन व्यवहारी ॥
और की रोटी खाय, खोय पुरषारथ अपना ।
जागृत में भी देखे तत्व का, वह नहीं सपना ।
झूठा पाखंड यन्त्र है, भूठा ही है तन्त्र ।
परमारथ धन क्यों मिले, लिया टके का मन्त्र ।
लिया टके का मंत्र, गुरु किया भिक्ष भिकारी ।
मांगे सबसे भीख, भीख का बन व्यवहारी ॥
और की रोटी खाय, खोय पुरषारथ अपना ।
जागृत में भी देखे तत्व का, वह नहीं सपना ।
झूठा पाखंड यन्त्र है, भूठा ही है तन्त्र ।
परमारथ धन क्यों मिले, लिया टके का मन्त्र ।
×
Song 10 — Hindi
410. ब्रह्म बढ़े चिन्तन करे, यही ब्रह्म का अर्थ ॥
यही ब्रह्म का अर्थ, और कोई अर्थ न दूजा ।
सोये बढ़े सो ब्रह्म, वही करे ब्रह्म की पूजा ।
बढ़ो बढ़ो बढ़ चलो, सोच कर नित ही बढ़ना ।
जीवन का रस मिले, वृद्धि में जीवन गढ़ना । ।
वृद्धि भाव चिन्तन नहीं, उसका जीना व्यर्थ ।
ब्रह्म बड़े चिन्तन करे, यही ब्रह्म का अर्थ ॥
यही ब्रह्म का अर्थ, और कोई अर्थ न दूजा ।
सोये बढ़े सो ब्रह्म, वही करे ब्रह्म की पूजा ।
बढ़ो बढ़ो बढ़ चलो, सोच कर नित ही बढ़ना ।
जीवन का रस मिले, वृद्धि में जीवन गढ़ना । ।
वृद्धि भाव चिन्तन नहीं, उसका जीना व्यर्थ ।
ब्रह्म बड़े चिन्तन करे, यही ब्रह्म का अर्थ ॥
×
Song 11 — Hindi
411. लेना हो सो जल्द ले, अवसर जासी चाल ।
अवसर के चूके नरा, मारे काल कराल ॥1 ॥
मारे काल कराल, फंसावे यम की फांसी ।
बिगड़े अपना काम, होय जग भीतर हांसी ॥2 ॥
दया राखिये चित्त में, कीजे दुखी निहाल ।
लेना हो सो जल्द ले, अवसर जासी चाल ॥3 ॥
अवसर के चूके नरा, मारे काल कराल ॥1 ॥
मारे काल कराल, फंसावे यम की फांसी ।
बिगड़े अपना काम, होय जग भीतर हांसी ॥2 ॥
दया राखिये चित्त में, कीजे दुखी निहाल ।
लेना हो सो जल्द ले, अवसर जासी चाल ॥3 ॥
×
Song 12 — Hindi
412. दया धरम यह लीजिये, यही वस्तु है सार ।
दया धर्म का मूल है, साधो करो विचार ॥1 ॥
साधो करो विचार, मनुष देही जो पाई ।
वृथा जन्म गया बीत, जो मन में दया न आई ॥2 ॥
जब लग स्वाँसा पिंड में, करले पर उपकार ।
दया धरम गह लीजिये, यही वस्तु है सार ॥3 ॥
कुण्डलियाँ है
दया धर्म का मूल है, साधो करो विचार ॥1 ॥
साधो करो विचार, मनुष देही जो पाई ।
वृथा जन्म गया बीत, जो मन में दया न आई ॥2 ॥
जब लग स्वाँसा पिंड में, करले पर उपकार ।
दया धरम गह लीजिये, यही वस्तु है सार ॥3 ॥
कुण्डलियाँ है
×
Song 13 — Hindi
413. मैंना तोता बोल कर, पड़े फन्द के जाल ।
जो नर बोले चोल अति, कैसे होय निहाल ॥1 ॥
कैसे होय निहाल, शक्ति तन मन की खोवे । ।
बने दुखी और दीन, वह जन्मों को रोवे ॥2 ॥
रोवे जनम जनम को, सुखी न हो बाचाल ।
मैंना तोता बोल कर, पड़े फन्द के जाल ॥3 ॥
जो नर बोले चोल अति, कैसे होय निहाल ॥1 ॥
कैसे होय निहाल, शक्ति तन मन की खोवे । ।
बने दुखी और दीन, वह जन्मों को रोवे ॥2 ॥
रोवे जनम जनम को, सुखी न हो बाचाल ।
मैंना तोता बोल कर, पड़े फन्द के जाल ॥3 ॥
×
Song 14 — Hindi
414. करम किया भक्ति किया ज्ञान कथा भाई ।
हिये ना विवेक आया सार ना सुझाई । ।
गनपत है कर्म रूप विष्णु भक्ति देवा ।
शिव हैं विज्ञानवान सुर नर करें सेवा ॥
तीनों के तीन काम तीन भाव प्यारे ।
तीन ही गुन तीन रूप तीन आधारे ॥
गनपति से स्टष्टि कर्म विष्णु पालन पोषन । ।
शिव जी से ज्ञान मर्म हृदय आये तो बन ॥
रज है गनेश सत विष्णु की बड़ाई ।
तम शिव है महादेव दीनन सुखदाई ॥
हिये ना विवेक आया सार ना सुझाई । ।
गनपत है कर्म रूप विष्णु भक्ति देवा ।
शिव हैं विज्ञानवान सुर नर करें सेवा ॥
तीनों के तीन काम तीन भाव प्यारे ।
तीन ही गुन तीन रूप तीन आधारे ॥
गनपति से स्टष्टि कर्म विष्णु पालन पोषन । ।
शिव जी से ज्ञान मर्म हृदय आये तो बन ॥
रज है गनेश सत विष्णु की बड़ाई ।
तम शिव है महादेव दीनन सुखदाई ॥
×
Song 15 — Hindi
415. चूहा गनेश चढ़े गरुड़ विष्णु वाहन ।
नन्दी बेल पीठ शम्भु मारें निज आसन ॥
पांच हाथ के गनेश पांच भुजा धारी ।
मस्तक संदूर सोहे मूष की सवारी ॥
विष्णु स्वरूप देखा चार भुजा वाला ।
मस्तक पर तिलक केसर उर मुक्ता माला ॥
शिव का दर्शन विचित्र दोय भुजा सोहे ।
भस्म देह चन्द्र मूल मुन्डमाल मोहे । ।
गनपत का लाल रंग विष्णु रंग नीला ।
इन्द कुन्द शम्भु अद्भुत छबि लीला ॥
नन्दी बेल पीठ शम्भु मारें निज आसन ॥
पांच हाथ के गनेश पांच भुजा धारी ।
मस्तक संदूर सोहे मूष की सवारी ॥
विष्णु स्वरूप देखा चार भुजा वाला ।
मस्तक पर तिलक केसर उर मुक्ता माला ॥
शिव का दर्शन विचित्र दोय भुजा सोहे ।
भस्म देह चन्द्र मूल मुन्डमाल मोहे । ।
गनपत का लाल रंग विष्णु रंग नीला ।
इन्द कुन्द शम्भु अद्भुत छबि लीला ॥
×
Song 16 — Hindi
416. तीनों तीन प्रश्न मैंने पूछे मन से ।
यह क्या है कोई आखे भिन्न भिन्न तिनके ।
उत्तर यह मिला मुझे मन की प्रभुताई ।
तीन के हैं तीन मन सोच समझ भाई । ।
मूढ़ मूस गुरुड़ चंचल बैल है अज्ञानी ।
इनकी दशा कोई लखे गुरु के संग प्रानी ॥
कर्म करे मूढ़ भक्ति चंचल सुविवेका ।
ज्ञान अज्ञानी लहे धरे चित्त एका ॥
तीन के उपाय तीन तीन का हो साधन ।
तीन देव तीन विधि तीन आराधन ॥
यह क्या है कोई आखे भिन्न भिन्न तिनके ।
उत्तर यह मिला मुझे मन की प्रभुताई ।
तीन के हैं तीन मन सोच समझ भाई । ।
मूढ़ मूस गुरुड़ चंचल बैल है अज्ञानी ।
इनकी दशा कोई लखे गुरु के संग प्रानी ॥
कर्म करे मूढ़ भक्ति चंचल सुविवेका ।
ज्ञान अज्ञानी लहे धरे चित्त एका ॥
तीन के उपाय तीन तीन का हो साधन ।
तीन देव तीन विधि तीन आराधन ॥
×
Song 17 — Hindi
417. मूढ़ मूष के शरीर गनपत बन चढ़ना ।
कर्म धर्म साध कर्म पन्थ में न अड़ना ॥
चंचल गरुड़ चेत जाय विष्णु भार पाकर ।
अज्ञानी भी बैल चढ़े शम्भु रूप आकर ॥
कर्म लहे भक्ति लहे ज्ञान लहे निर्मल ।
सिद्धि ऋद्धि शक्ति लहे मन को करे प्रबल ॥
तीन गुन जीते या विधि आगे पद धारे ।
चौथा पद समझ आवे संगत के सहारे । ।
तब गिरे गुरु के चरन त्रिगुन दोष खोकर ।
जागे तब सोया हदय मोह नींद सोकर । ।
कर्म धर्म साध कर्म पन्थ में न अड़ना ॥
चंचल गरुड़ चेत जाय विष्णु भार पाकर ।
अज्ञानी भी बैल चढ़े शम्भु रूप आकर ॥
कर्म लहे भक्ति लहे ज्ञान लहे निर्मल ।
सिद्धि ऋद्धि शक्ति लहे मन को करे प्रबल ॥
तीन गुन जीते या विधि आगे पद धारे ।
चौथा पद समझ आवे संगत के सहारे । ।
तब गिरे गुरु के चरन त्रिगुन दोष खोकर ।
जागे तब सोया हदय मोह नींद सोकर । ।
×
Song 18 — Hindi
418. एक जन्म कर्म करे दूजे जन्म भक्ति ।
तीजे जन्म ज्ञान लहे सूझे निज युक्ति ॥
चौथे गुरु चरन कमल बास लौ लावे ।
नर शरीर सुफल करे भरम में न आवे ॥
मन चित बुद्धि त्याग दृढ़ किया हंकारा। ।
शूद्र चैश्य क्षत्री छोड़ ब्राह्मण तन धारा ॥
ब्रह्मचर्य गृही और तपसी बनबासी ।
चौथा तब सार लहें कोई सन्यासी । ।
सार पाय पार जाय सुरत शब्द मत से। ।
शब्द सार निरख परख तब सतपद पावे ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
तीजे जन्म ज्ञान लहे सूझे निज युक्ति ॥
चौथे गुरु चरन कमल बास लौ लावे ।
नर शरीर सुफल करे भरम में न आवे ॥
मन चित बुद्धि त्याग दृढ़ किया हंकारा। ।
शूद्र चैश्य क्षत्री छोड़ ब्राह्मण तन धारा ॥
ब्रह्मचर्य गृही और तपसी बनबासी ।
चौथा तब सार लहें कोई सन्यासी । ।
सार पाय पार जाय सुरत शब्द मत से। ।
शब्द सार निरख परख तब सतपद पावे ॥
प्रेम प्रीति परतीत लख, मेट हिये का मूल ।
राधास्वामी बाग में, खिला सुहाना फूल ॥3 ॥
×
Song 19 — Hindi
×
Song 20 — Hindi
×
Song 21 — Hindi
×
Song 22 — Hindi
×
Song 23 — Hindi
×
Song 24 — Hindi
424. फूटी आंख विवेक की, लखे न सन्त असन्त ।
जाके संग दस बीस है, ताका नाम महन्त ॥
ताका नाम महन्त, करे अनुचित व्यवहारा ।
त्याग सन्त मत राह, जनम के जुये में हारा । ।
सिख साखा तो बहुत हैं, सतगुरु संग न भाव ।
ऐसे जन के निकट में, भूल कोई मत आव ॥
फूटी भांख विवेक की, लखे न सन्त असन्त ।
जाके संग दस बीस हैं, ताका नाम महन्त ।
जाके संग दस बीस है, ताका नाम महन्त ॥
ताका नाम महन्त, करे अनुचित व्यवहारा ।
त्याग सन्त मत राह, जनम के जुये में हारा । ।
सिख साखा तो बहुत हैं, सतगुरु संग न भाव ।
ऐसे जन के निकट में, भूल कोई मत आव ॥
फूटी भांख विवेक की, लखे न सन्त असन्त ।
जाके संग दस बीस हैं, ताका नाम महन्त ।
×
Song 25 — Hindi
425. सिंहों के लँहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत ।
लालों की नहीं बोरियां, साफ न चलें जमात ॥
साध न चलें जमात, रहें वह सब से न्यारे ।
दया भाव हिये धार, सदा सतगुरु के प्यारे ।
प्रेम प्रीत परतीत में, अघट अमोघ अगाध ।
दम्भ चाल करनी करे, ताहि कहो मत साध ॥
सिहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत ।
लानों की नहीं बोरियां, सन्त न चलें जमात । ।
लालों की नहीं बोरियां, साफ न चलें जमात ॥
साध न चलें जमात, रहें वह सब से न्यारे ।
दया भाव हिये धार, सदा सतगुरु के प्यारे ।
प्रेम प्रीत परतीत में, अघट अमोघ अगाध ।
दम्भ चाल करनी करे, ताहि कहो मत साध ॥
सिहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत ।
लानों की नहीं बोरियां, सन्त न चलें जमात । ।
×
Song 26 — Hindi
426. गिरही में तो प्रेम गति, दासा तन का भाव ।
नन्दू सहज है साधना, जो कोई जाने दाब । ।
दास बना तो दे सभी, इष्ट नाम तब ले ।
सेवक है तो सेव कर, चित, गुरु चरनन दे । ।
क्या गिरही का धर्म है, समझ के कर व्यवहार ।
बिन समझे पग दे नहीं, मन में रहे विचार ।
नन्दू सहज है साधना, जो कोई जाने दाब । ।
दास बना तो दे सभी, इष्ट नाम तब ले ।
सेवक है तो सेव कर, चित, गुरु चरनन दे । ।
क्या गिरही का धर्म है, समझ के कर व्यवहार ।
बिन समझे पग दे नहीं, मन में रहे विचार ।
×
Song 27 — Hindi
427. भावी अटल अपार है, कोई समझे ज्ञानी ॥
समझे ज्ञानी ज्ञान से, नहिं बुद्धि लड़ावे ।
तके कुतके निशर के, क्यों साख बढ़ावे ॥1 ॥
भावी बस श्रीराम, हिरन को मार गिराया ।
रावन से अनबन हुई, बहु युद्ध मचाया ॥2 ॥
धर्मराज की बुद्धि को, भावी ने बिगाड़ा ।
बन बन डोलत फिरे, बजा भारत का नगाड़ा ॥3 ॥
भावी बस श्री कृष्ण ने, अपना कुल मारा ।
भावी बस नर का छुटे, सब बुद्धि विचारा ॥4 ॥
दुर्योधन की आंख में, पड़ी भर्म की धूरी। ।
आसा तृष्णा राज की, कर सका न पूरी ॥5 ॥
होनहार होकर रहे, यह निज कर जानी। ।
भावी अटल पर है, कोई समझे ज्ञानी ॥6 ॥
समझे ज्ञानी ज्ञान से, नहिं बुद्धि लड़ावे ।
तके कुतके निशर के, क्यों साख बढ़ावे ॥1 ॥
भावी बस श्रीराम, हिरन को मार गिराया ।
रावन से अनबन हुई, बहु युद्ध मचाया ॥2 ॥
धर्मराज की बुद्धि को, भावी ने बिगाड़ा ।
बन बन डोलत फिरे, बजा भारत का नगाड़ा ॥3 ॥
भावी बस श्री कृष्ण ने, अपना कुल मारा ।
भावी बस नर का छुटे, सब बुद्धि विचारा ॥4 ॥
दुर्योधन की आंख में, पड़ी भर्म की धूरी। ।
आसा तृष्णा राज की, कर सका न पूरी ॥5 ॥
होनहार होकर रहे, यह निज कर जानी। ।
भावी अटल पर है, कोई समझे ज्ञानी ॥6 ॥
×
Song 28 — Hindi
428. जग की आसा त्यागकर, कर सतगुरु की आस ।
शक्ति शक्तिवान है, क्यों वह होय निरास ॥1 ॥
शक्ति शक्तिवान है, शक्ति सबका सार ।
शक्ति गुरु की भक्ति में, शक्ति करे विचार ॥2 ॥
शक्ति में नहीं निचलता, सबला कहिये सोय ।
शक्ति में शक्ति रहे, नहीं वह अबला होय ॥3 ॥
पदम रूप जल में रहे, नहीं व्याये संसार ।
क्षीर नीर का मथन कर, पिये अमीरस धार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, भक्ति पदारथ पाय ।
शक्ति में शक्ति रहे, शक्ति पाय हर्षाय ॥
शक्ति शक्तिवान है, क्यों वह होय निरास ॥1 ॥
शक्ति शक्तिवान है, शक्ति सबका सार ।
शक्ति गुरु की भक्ति में, शक्ति करे विचार ॥2 ॥
शक्ति में नहीं निचलता, सबला कहिये सोय ।
शक्ति में शक्ति रहे, नहीं वह अबला होय ॥3 ॥
पदम रूप जल में रहे, नहीं व्याये संसार ।
क्षीर नीर का मथन कर, पिये अमीरस धार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, भक्ति पदारथ पाय ।
शक्ति में शक्ति रहे, शक्ति पाय हर्षाय ॥
×
Song 29 — Hindi
429. गुरु से मेरी प्रीत लगी भारी ।
भक्ति मिली अब नहीं संसारी ॥
नित शीत प्रसाद को खाती हूँ ।
पी चरनामृत तृप्ताती हूँ ।
सुमिरन और भजन से लगन लगी ।
फिरती हूँ जग से भगी भगी ॥
माया से मुझको नहीं हानी ।
गुरु व्याप रहे तन मन बानी ॥
राधास्वामी मेरे प्रीतम प्यारे ।
दिन रात साथ के रखवारे ।
भक्ति मिली अब नहीं संसारी ॥
नित शीत प्रसाद को खाती हूँ ।
पी चरनामृत तृप्ताती हूँ ।
सुमिरन और भजन से लगन लगी ।
फिरती हूँ जग से भगी भगी ॥
माया से मुझको नहीं हानी ।
गुरु व्याप रहे तन मन बानी ॥
राधास्वामी मेरे प्रीतम प्यारे ।
दिन रात साथ के रखवारे ।
×
Song 30 — Hindi
(430 कुल संख्या 1332) न अपना नाम रखना तुम, न दुनियां में निशां रखना ।
नहीं की जब गई आदत, जबां पर तब न हां रखना ॥
मुकर होना अबस है, और मुनकर होना है गलती ।
न सिर में ऐसे सौदा का, कभी बारे गिरां रखना । ।
न साहिबे दिल न बेदिल, बनने की तुममें हविस आये ।
न दिल देना न दिल लेना, न बहरे दिलस्ताँ रखना । ।
अगर है तर्क तर्क करदो, तर्क का भी तर्क बेगुमां ।
मकां जब छुट गया फिर, क्यों खयाले लामकां रखना ॥
खामोशी मानये दारद, कि दर गुफ्तन नमी आयद ।
न सच और झूठ कहने, के लिये मुह में जुबां रखना । ।
सहज योग सहज सुमिरन
नहीं की जब गई आदत, जबां पर तब न हां रखना ॥
मुकर होना अबस है, और मुनकर होना है गलती ।
न सिर में ऐसे सौदा का, कभी बारे गिरां रखना । ।
न साहिबे दिल न बेदिल, बनने की तुममें हविस आये ।
न दिल देना न दिल लेना, न बहरे दिलस्ताँ रखना । ।
अगर है तर्क तर्क करदो, तर्क का भी तर्क बेगुमां ।
मकां जब छुट गया फिर, क्यों खयाले लामकां रखना ॥
खामोशी मानये दारद, कि दर गुफ्तन नमी आयद ।
न सच और झूठ कहने, के लिये मुह में जुबां रखना । ।
सहज योग सहज सुमिरन
×
Song 31 — Hindi
431. अगम अपार अगाध अनामी ।
अलख अनादि आदि राधास्वामी ॥
सत्त रूप सतपद सत धामी ।
अक्षर निःअक्षर राधास्वामी ।
अमर अजर अव्यक्त अकामी ।
अगथ अनेह व्यक्त राधास्वामी ॥
सुलभ सुगम सुविचार मुकामी ।
आतम परमातम राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी ॥
दोहाएड़ी से चोटी तलक, सब राधास्वामी रूप ।
निराकार साकार दोऊ, रूपावन्त अरूप ॥
राधास्वामी कारन राधास्वामी कारज ।
राधास्वामी गुरु राधास्वामी अचारज ॥
राधास्वामी फल हैं फूल राधास्वामी ।
राधास्वामी बीज मूल राधास्वामी ॥
राधास्वामी तन राधास्वामी मन ।
राधास्वामी वित्त राधास्वामी धन ॥
राधास्वामी भक्ति ज्ञान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह प्राण राधास्वामी ।
राधास्वामी कठिन सुगम राधास्वामी ।
राधास्वामी अगम निगम राधास्वामी ॥
दोहापावक गगन समीर जल, पृथ्वी राधास्वामी रूप ।
निराधार आधार गति, अकह अनाम अरूप ॥
सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
क्रिया भक्ति ज्ञान राधास्वामी ॥
तीरथ बरत धरम राधास्वामी ।
गुप्त अगुप्त मरम राधास्वामी ॥
शब्द स्पर्श रूप राधास्वामी ।
रसमय गन्ध कूप राधास्वामी ॥
अगुन सगुन सब गुन की खान ।
राधास्वामी मेरे पुरुष महान ॥
अक्षर निःअक्षर के पार ।
निराकार नहिं नहीं साकार ॥
दोहा एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहत लजाऊँ ।
एक अनेक के परे लख, राधास्वामी ठांऊँ ।
राधास्वामी पिता मात राधास्वामी ।
राधास्वामी बन्धु तात राधास्वामी राधास्वामी ऋषी मुनी राधास्वामी ।
राधास्वामी वेद गुनी राधास्वामी राधास्वामी शब्द धार राधास्वामी ।
राधास्वामी मन विचार राधास्वामी राधास्वामी मुक्त बद्ध राधास्वामी ।
राधास्वामी नित्य शुद्ध राधास्वामी राधास्वामी पार वार राधास्वामी ।
राधास्वामी तत्व सार राधास्वामी
दोहाराधास्वामी सहस गति, राधास्वामी द्वत ।
राधास्वामी एक हैं, सत धुर पद अद्वत ।
रेचक पूरक हैं राधास्वामी ।
प्राण योग कुम्भक राधास्वामी ॥
सहस कमल दल त्रिकुटी धाम ।
सुन्न महासुन्न राधास्वामी ठाम । ।
सोहंग रूप जान राधास्वामी ।
सत्य स्वरूप मान राधास्वामी ।
लख गम अलख अगम बिस्तार ।
राधास्वामी पद में रा0स्वा0 सार ।
रात दिवस गाओ राधास्वामी ।
छिन प्रतिछिन ध्याओ रा0स्वामी । ।
दोहासुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सांस सांस सुमिरन करो, राधास्वामी के गुन गाय ॥
सहज ध्यान
अलख अनादि आदि राधास्वामी ॥
सत्त रूप सतपद सत धामी ।
अक्षर निःअक्षर राधास्वामी ।
अमर अजर अव्यक्त अकामी ।
अगथ अनेह व्यक्त राधास्वामी ॥
सुलभ सुगम सुविचार मुकामी ।
आतम परमातम राधास्वामी ॥
राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी ॥
दोहाएड़ी से चोटी तलक, सब राधास्वामी रूप ।
निराकार साकार दोऊ, रूपावन्त अरूप ॥
राधास्वामी कारन राधास्वामी कारज ।
राधास्वामी गुरु राधास्वामी अचारज ॥
राधास्वामी फल हैं फूल राधास्वामी ।
राधास्वामी बीज मूल राधास्वामी ॥
राधास्वामी तन राधास्वामी मन ।
राधास्वामी वित्त राधास्वामी धन ॥
राधास्वामी भक्ति ज्ञान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह प्राण राधास्वामी ।
राधास्वामी कठिन सुगम राधास्वामी ।
राधास्वामी अगम निगम राधास्वामी ॥
दोहापावक गगन समीर जल, पृथ्वी राधास्वामी रूप ।
निराधार आधार गति, अकह अनाम अरूप ॥
सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
क्रिया भक्ति ज्ञान राधास्वामी ॥
तीरथ बरत धरम राधास्वामी ।
गुप्त अगुप्त मरम राधास्वामी ॥
शब्द स्पर्श रूप राधास्वामी ।
रसमय गन्ध कूप राधास्वामी ॥
अगुन सगुन सब गुन की खान ।
राधास्वामी मेरे पुरुष महान ॥
अक्षर निःअक्षर के पार ।
निराकार नहिं नहीं साकार ॥
दोहा एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहत लजाऊँ ।
एक अनेक के परे लख, राधास्वामी ठांऊँ ।
राधास्वामी पिता मात राधास्वामी ।
राधास्वामी बन्धु तात राधास्वामी राधास्वामी ऋषी मुनी राधास्वामी ।
राधास्वामी वेद गुनी राधास्वामी राधास्वामी शब्द धार राधास्वामी ।
राधास्वामी मन विचार राधास्वामी राधास्वामी मुक्त बद्ध राधास्वामी ।
राधास्वामी नित्य शुद्ध राधास्वामी राधास्वामी पार वार राधास्वामी ।
राधास्वामी तत्व सार राधास्वामी
दोहाराधास्वामी सहस गति, राधास्वामी द्वत ।
राधास्वामी एक हैं, सत धुर पद अद्वत ।
रेचक पूरक हैं राधास्वामी ।
प्राण योग कुम्भक राधास्वामी ॥
सहस कमल दल त्रिकुटी धाम ।
सुन्न महासुन्न राधास्वामी ठाम । ।
सोहंग रूप जान राधास्वामी ।
सत्य स्वरूप मान राधास्वामी ।
लख गम अलख अगम बिस्तार ।
राधास्वामी पद में रा0स्वा0 सार ।
रात दिवस गाओ राधास्वामी ।
छिन प्रतिछिन ध्याओ रा0स्वामी । ।
दोहासुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सांस सांस सुमिरन करो, राधास्वामी के गुन गाय ॥
सहज ध्यान
×
Song 32 — Hindi
432. राधास्वामी संत रूप धर आये ।
राधास्वामी तत्व सार समझाये ॥
सुन्दर शान्त विशुद्ध शरीरा ।
रा0 स्वा0 प्रगटे धीर गम्भीरा ॥
सोभा धाम अकाम अमाया ।
रा0 स्वा0 अचरज भेष बनाया ।
निराकार साकार स्वरूप ।
पद अनाम में नामी भूप ॥
अवगति गति तज गतिगत भाई ।
राधास्वामी संत समाज सजाई ।
दोहारूप रङ्ग रेखा नहीं, रूप रङ्ग से न्यार ।
रूप रङ्ग रेखा गहा, जीवों के उद्धार ॥
दया भाव ले जग में आये ।
राधास्वामी राधास्वामी पंथ चलाये ॥
सुरत शब्द की राह चलाई ।
शब्दयोग राधास्वामी बतलाई ।
सेत सिंहासन विमल विराजे ।
राधास्वामी साज अनूपम साजे ।
मृदुल मनोहर गात सुहाना ।
राधास्वामी धरा सन्त का बाना । ।
साध हंस संतन गति गाई ।
राधास्वामी सहज किया कठिनाई । ।
दोहासांस योग हठ योग का, सब विधि किया निषेध ।
शब्दयोग उत्तम कहा, दिया ध्यान का योग । ।
सहसकमलदल पुरुष विराट ।
राधास्वामी जोत निरंजन ठाट ।
पंच भूत पचरंग फुलवारी ।
श्याम कुंज राधास्वामी सवारी ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
राधास्वामी छबि अद्वत सुहीला ॥
लाल रंग का चमका भान ।
राधास्वामी किया प्रणव अस्थान । ।
वेद ज्ञान का मूल मुकाम ।
अव्याकृत राधास्वामी नाम । ।
दोहात्रिकुटी पद ओंकार बन, ब्रह्म सिखर पद ठाम ।
तेज पुंज सुप्रकाश मय, राधास्वामी ॐके नाम ।
सुन्न महासुन्न शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ कारन अविकार ॥
मानसरोवर मानस पार ।
ब्रह्म शिखर कैलास बिहार ॥
हंस भाव सीतला सोम छबि ।
अन्ध घोर के परे स्वेत रवि ॥
अमृत मय अमृत की खान ।
सत सत्ता का नाम निशान ।
गुप्त धार की निर्मल सोती ।
बीजा अन्धकार और जीती । ।
दोहाजब लग हंस स्वभाव लग, ले नहीं राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी शून्य सरूप में, नहीं प्रगटे विश्राम ॥
उलट हंस सोहंग गति भाई ।
सोहंग ‘मैं हूँ’ शब्द सुनाई । ।
जगमग बिजली जोत अपार ।
सोहंगम झूमर आकार । ।
रूप रंग रेखा की खानी ।
सोहंग पुरुष राधास्वामी जानी ॥
भाप में ज्यों मूरज छबि प्रगटे ।
आदि माया सोहंग त्यों दरसे ॥
भँवरगुफा भँवराकृत काल ।
राधास्वामी सोहंगम गति पाल ।
दोहाबरे सत्य पद के लखा, सोहंगम स्थान ।
राधास्वामी का यह रूप, लख पावे कोई सुजान । ।
है है है है सहज विचार ।
सो “हैपनाहै सत्याकार ॥
सत्य भाव सत रूप सलोक ।
नहीं वहां चिंता नहीं वहां शोक ॥
जोत प्रकाश का सोत महान ।
राधास्वामी सत्य पुरुष परधान ॥
सुरत शब्द दुरवीन जो पावे ।
तब सतपुरुष के दरशन पावे । ।
सत सत सत सत है जोई ।
राधास्वामी सत्य पुरुष कहो सोई । ।
दोहायहाँ लग रूप व रंग हैं, रेखा और आकार ।
___ राधास्वामी सतगुरु रूप धर, सत्य सत्य दरबार ॥
अलख लखे और लखा न जाये, राधास्वामी अलख दशा कहलाये ।
अगम की गम गम अगम की नाहीं ।
राधास्वामी अगम अमन दरसाही नाम अनाम नाम नहिं जाका ।
राधास्वामी गाड़ा नाम पताका ॥
क्या है सो कोई नहिं भाखे ।
अलख अनाम अगम कह आखे ॥
अचरज अचरज अचरज होई ।
अद्भुत अद्भुत समझो सोई ॥
दोहाइसके ऊपर परे गति, राधास्वामी का धाम ।
सन्तन राधास्वामी नाम कहा,सो सन्तन का ठाम। ।
ही सत नहीं असत के रीत ।
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ॥
नहीं रूप नहीं सो अरूप ।
नहीं वह परजा नहीं वह भूप । ।
नहीं जोत नहीं जोत्याकार ।
नहीं तिमिर न तिमिर विस्तार ।
आदि आदि और अनन्त अनन्ता ।
साध न परखे परखे सन्ता ।
रूप अरूप नाम नहीं नामी ।
वरन सुनाया राधास्वामी ।
दोहामन बानी की गम नहीं, अगम निगम गम नहिं ।
राधास्वामी इष्ट धुर, पद राधास्वामी माहि ॥
236
8 सहजरूपता 8
राधास्वामी तत्व सार समझाये ॥
सुन्दर शान्त विशुद्ध शरीरा ।
रा0 स्वा0 प्रगटे धीर गम्भीरा ॥
सोभा धाम अकाम अमाया ।
रा0 स्वा0 अचरज भेष बनाया ।
निराकार साकार स्वरूप ।
पद अनाम में नामी भूप ॥
अवगति गति तज गतिगत भाई ।
राधास्वामी संत समाज सजाई ।
दोहारूप रङ्ग रेखा नहीं, रूप रङ्ग से न्यार ।
रूप रङ्ग रेखा गहा, जीवों के उद्धार ॥
दया भाव ले जग में आये ।
राधास्वामी राधास्वामी पंथ चलाये ॥
सुरत शब्द की राह चलाई ।
शब्दयोग राधास्वामी बतलाई ।
सेत सिंहासन विमल विराजे ।
राधास्वामी साज अनूपम साजे ।
मृदुल मनोहर गात सुहाना ।
राधास्वामी धरा सन्त का बाना । ।
साध हंस संतन गति गाई ।
राधास्वामी सहज किया कठिनाई । ।
दोहासांस योग हठ योग का, सब विधि किया निषेध ।
शब्दयोग उत्तम कहा, दिया ध्यान का योग । ।
सहसकमलदल पुरुष विराट ।
राधास्वामी जोत निरंजन ठाट ।
पंच भूत पचरंग फुलवारी ।
श्याम कुंज राधास्वामी सवारी ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
राधास्वामी छबि अद्वत सुहीला ॥
लाल रंग का चमका भान ।
राधास्वामी किया प्रणव अस्थान । ।
वेद ज्ञान का मूल मुकाम ।
अव्याकृत राधास्वामी नाम । ।
दोहात्रिकुटी पद ओंकार बन, ब्रह्म सिखर पद ठाम ।
तेज पुंज सुप्रकाश मय, राधास्वामी ॐके नाम ।
सुन्न महासुन्न शून्याकार ।
हिरण्यगर्भ कारन अविकार ॥
मानसरोवर मानस पार ।
ब्रह्म शिखर कैलास बिहार ॥
हंस भाव सीतला सोम छबि ।
अन्ध घोर के परे स्वेत रवि ॥
अमृत मय अमृत की खान ।
सत सत्ता का नाम निशान ।
गुप्त धार की निर्मल सोती ।
बीजा अन्धकार और जीती । ।
दोहाजब लग हंस स्वभाव लग, ले नहीं राधास्वामी नाम ।
राधास्वामी शून्य सरूप में, नहीं प्रगटे विश्राम ॥
उलट हंस सोहंग गति भाई ।
सोहंग ‘मैं हूँ’ शब्द सुनाई । ।
जगमग बिजली जोत अपार ।
सोहंगम झूमर आकार । ।
रूप रंग रेखा की खानी ।
सोहंग पुरुष राधास्वामी जानी ॥
भाप में ज्यों मूरज छबि प्रगटे ।
आदि माया सोहंग त्यों दरसे ॥
भँवरगुफा भँवराकृत काल ।
राधास्वामी सोहंगम गति पाल ।
दोहाबरे सत्य पद के लखा, सोहंगम स्थान ।
राधास्वामी का यह रूप, लख पावे कोई सुजान । ।
है है है है सहज विचार ।
सो “हैपनाहै सत्याकार ॥
सत्य भाव सत रूप सलोक ।
नहीं वहां चिंता नहीं वहां शोक ॥
जोत प्रकाश का सोत महान ।
राधास्वामी सत्य पुरुष परधान ॥
सुरत शब्द दुरवीन जो पावे ।
तब सतपुरुष के दरशन पावे । ।
सत सत सत सत है जोई ।
राधास्वामी सत्य पुरुष कहो सोई । ।
दोहायहाँ लग रूप व रंग हैं, रेखा और आकार ।
___ राधास्वामी सतगुरु रूप धर, सत्य सत्य दरबार ॥
अलख लखे और लखा न जाये, राधास्वामी अलख दशा कहलाये ।
अगम की गम गम अगम की नाहीं ।
राधास्वामी अगम अमन दरसाही नाम अनाम नाम नहिं जाका ।
राधास्वामी गाड़ा नाम पताका ॥
क्या है सो कोई नहिं भाखे ।
अलख अनाम अगम कह आखे ॥
अचरज अचरज अचरज होई ।
अद्भुत अद्भुत समझो सोई ॥
दोहाइसके ऊपर परे गति, राधास्वामी का धाम ।
सन्तन राधास्वामी नाम कहा,सो सन्तन का ठाम। ।
ही सत नहीं असत के रीत ।
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ॥
नहीं रूप नहीं सो अरूप ।
नहीं वह परजा नहीं वह भूप । ।
नहीं जोत नहीं जोत्याकार ।
नहीं तिमिर न तिमिर विस्तार ।
आदि आदि और अनन्त अनन्ता ।
साध न परखे परखे सन्ता ।
रूप अरूप नाम नहीं नामी ।
वरन सुनाया राधास्वामी ।
दोहामन बानी की गम नहीं, अगम निगम गम नहिं ।
राधास्वामी इष्ट धुर, पद राधास्वामी माहि ॥
236
8 सहजरूपता 8
×
Song 33 — Hindi
433. सहज सहज है सृष्टी कर्म ।
सहज ही सहज सहज का मर्म ।
सहज ब्रह्म है सहज है माया ।
सहज रूप है सहज है छाया ॥
सहज स्थूल सूक्ष्म और कारण ।
सहज बोल है सहज उचारण ।
सहज ज्ञान है सहज अनुमान ।
इन्द्रिय पंच सहज परमान ॥
सहज शक्ति है सहज है शिव ।
सहज प्रेम प्रेमी और पीव । ।
दोहाजो समझे सुख सहज को, उपजे सहज विचार ।
सहज नाव व्यौहार चढ़, जावे भव जल पार ॥
सहज पके सो मीठा होय ।
खींच तान है कड़वा सोय ॥
सहज बूझ का सहज विचार ।
कठिनाई में रहे बिकार । ।
सहज की खेती सहज का बान ।
सहज की सेवा मंगल खान ॥
सहज शब्द है सहजहि साखी ।
लखें जो मिले सहज की आँखी । ।
सहज सन्त मत सुगम सुहेला ।
कठिन जगत मत दुगम दुहेला ॥
दोहाकमल नीर रहनी रहे, कभी न व्यापे मोह ।
सहज दशा करनी करे, उपजे काम न कोह । ।
सहज तजे और गहे कठिनाई ।
रहे सो भरम फन्द उरझाई । ।
भरम भूल है भरम अज्ञान ।
भरम छुटे तब सहज का ज्ञान ॥
भरम में दुविधा और दुचिताई ।
सार तजे संसार फँसाई ॥
व्याये अहंकार और ममता ।
चित से हटे सुशील सुसमता । ।
अहंकार है मोर और तोर ।
मोर तोर में काल का जोर ॥
दोहामोर तोर की जेवरी, बट बाँधा संसार ।
दास कबीरा क्यों बधे, सहज नाम आधार । ।
मोर तोर की रसरी भारी ।
बद्ध जीव भये कठिन दुखारी । ।
मोर तोर का मिथ्या भाव ।
पड़े जीव माया के दाव ॥
मैं तू मोर तोर है माया ।
माया बस रहा भरम भुलाया ।
कल्पित बिरथा कहे सब कोई ।
तदपि न झूठ कठिन अति सोई । ।
मोर तोर के बन्धन नाना ।
को सुरझावे कठिन महाना । ।
दोहा उरम उरक उरझे सकल, सुरझा नाहीं कोय !
__ ऋषि मुनि सुर नर प्रीतजन, गये भरम में खोय ॥
नर्क स्वर्ग अपवर्ग त्रिलोकी ।
जनम मरन सहे जीव विशोकी । ।
लख चौरासी योनि फंसाने ।
छूटन की विधि कोई न जाने ।
तीन तार की अग्नि प्रचण्ड ।
तरे भोग माया के दंड । ।
पुरुष दयाल दया उमगाई ।
सन्त रूप धर जग में आई ॥
दुखी जीव को दिया दिलासा ।
सहज चाल जाओ सत देसा ॥
दोहा सत्त सत्त वह धाम है, माया नहीं कलेस ।
साध शब्द की सुगम विधि, धार शब्द का भेष ॥
नहीं यह कर्म न धर्म कहानी ।
नहीं यह जप तप संयम खानी । ।
नहीं यह तुरिया न तुरियातीत ।
नहीं तीरथ नहीं बरत की नीत । ।
नहीं पाखंड न वाद विवाद ।
वाचक ज्ञान की नहीं मरियाद । ।
शब्द भेद घट शब्द चढ़ाई ।
अन्तर शब्द का साधन भाई । ।
शब्द का सुमिरन शब्द का ध्यान ।
शब्द का भजन सन्त परमान
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, परख साक्षी मत सार ।
साखी शब्द जहाज चढ़, जा भवसागर पार ॥
साधन शब्द विना नहीं साखी ।
खुले न शब्द बिना हिय आंखी । ।
जो कोई समझे शब्द हमारा ।
समझ जाय भव निधि के पारा ॥
जो कोई गावे हमारी सारखी ।
काल न सके त्रिलोकी राखी । ।
कबीर का बझा जो कोई बुझे ।
तीन लोक सब पल में सूझे । ।
कबीर का गाया जो कोई गावे ।
तीन त्याग चौथा पद पारे ।
241 दोहा शब्द साक्षी रूप है, साक्षी रहे असंग ।
__ संग दोष ब्यापे नहीं, सुन सतगुरु परसंग ॥
राधास्वामी संत कबीर ।
तुलसी जग जीवन मति धीर ॥
नानक पलटू दास बखाना ।
गुरु की दया हमहुँ कछु जाना ।
वेद पढ़े और पढ़ा पुरान ।
सांख्य वेदान्त का परखा ज्ञान । ।
प्राण योग कर आसन मारा ।
तो भी हाथ लगा नहीं सारा ॥
भेद गुप्त बानी में है कुछ ।
समझे ताहि न जीव अधम तुछ ॥
दोहा राधास्वामी प्रगट किया, शब्द योग की रीत ।
सोई संत की बानी में, श्रुति संयुत उद्गीत ॥
पंचम नाम के पंच विधान ।
पंच अग्नि परचंड महान । ।
पंच यज्ञ परमारथ बाद ।
नहीं वह आशय बाद विवाद । ।
करनी करे सो भेद को पावे ।
कथनी कथे सो अवध गवावे ॥
करनी करे सो सेवक पूरा ।
करनी कर कायर हो सूरा ॥
कथनी बदनी जब कोई त्यागे ।
तब करनी के शब्द में लागे ।
दोहा यह करनी का भेद है, नाही बुद्धि विचार ।
कथनी तज करनी करे, तब पावे कुछ सार ॥
सहज शब्द निर्णय
सहज ही सहज सहज का मर्म ।
सहज ब्रह्म है सहज है माया ।
सहज रूप है सहज है छाया ॥
सहज स्थूल सूक्ष्म और कारण ।
सहज बोल है सहज उचारण ।
सहज ज्ञान है सहज अनुमान ।
इन्द्रिय पंच सहज परमान ॥
सहज शक्ति है सहज है शिव ।
सहज प्रेम प्रेमी और पीव । ।
दोहाजो समझे सुख सहज को, उपजे सहज विचार ।
सहज नाव व्यौहार चढ़, जावे भव जल पार ॥
सहज पके सो मीठा होय ।
खींच तान है कड़वा सोय ॥
सहज बूझ का सहज विचार ।
कठिनाई में रहे बिकार । ।
सहज की खेती सहज का बान ।
सहज की सेवा मंगल खान ॥
सहज शब्द है सहजहि साखी ।
लखें जो मिले सहज की आँखी । ।
सहज सन्त मत सुगम सुहेला ।
कठिन जगत मत दुगम दुहेला ॥
दोहाकमल नीर रहनी रहे, कभी न व्यापे मोह ।
सहज दशा करनी करे, उपजे काम न कोह । ।
सहज तजे और गहे कठिनाई ।
रहे सो भरम फन्द उरझाई । ।
भरम भूल है भरम अज्ञान ।
भरम छुटे तब सहज का ज्ञान ॥
भरम में दुविधा और दुचिताई ।
सार तजे संसार फँसाई ॥
व्याये अहंकार और ममता ।
चित से हटे सुशील सुसमता । ।
अहंकार है मोर और तोर ।
मोर तोर में काल का जोर ॥
दोहामोर तोर की जेवरी, बट बाँधा संसार ।
दास कबीरा क्यों बधे, सहज नाम आधार । ।
मोर तोर की रसरी भारी ।
बद्ध जीव भये कठिन दुखारी । ।
मोर तोर का मिथ्या भाव ।
पड़े जीव माया के दाव ॥
मैं तू मोर तोर है माया ।
माया बस रहा भरम भुलाया ।
कल्पित बिरथा कहे सब कोई ।
तदपि न झूठ कठिन अति सोई । ।
मोर तोर के बन्धन नाना ।
को सुरझावे कठिन महाना । ।
दोहा उरम उरक उरझे सकल, सुरझा नाहीं कोय !
__ ऋषि मुनि सुर नर प्रीतजन, गये भरम में खोय ॥
नर्क स्वर्ग अपवर्ग त्रिलोकी ।
जनम मरन सहे जीव विशोकी । ।
लख चौरासी योनि फंसाने ।
छूटन की विधि कोई न जाने ।
तीन तार की अग्नि प्रचण्ड ।
तरे भोग माया के दंड । ।
पुरुष दयाल दया उमगाई ।
सन्त रूप धर जग में आई ॥
दुखी जीव को दिया दिलासा ।
सहज चाल जाओ सत देसा ॥
दोहा सत्त सत्त वह धाम है, माया नहीं कलेस ।
साध शब्द की सुगम विधि, धार शब्द का भेष ॥
नहीं यह कर्म न धर्म कहानी ।
नहीं यह जप तप संयम खानी । ।
नहीं यह तुरिया न तुरियातीत ।
नहीं तीरथ नहीं बरत की नीत । ।
नहीं पाखंड न वाद विवाद ।
वाचक ज्ञान की नहीं मरियाद । ।
शब्द भेद घट शब्द चढ़ाई ।
अन्तर शब्द का साधन भाई । ।
शब्द का सुमिरन शब्द का ध्यान ।
शब्द का भजन सन्त परमान
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, परख साक्षी मत सार ।
साखी शब्द जहाज चढ़, जा भवसागर पार ॥
साधन शब्द विना नहीं साखी ।
खुले न शब्द बिना हिय आंखी । ।
जो कोई समझे शब्द हमारा ।
समझ जाय भव निधि के पारा ॥
जो कोई गावे हमारी सारखी ।
काल न सके त्रिलोकी राखी । ।
कबीर का बझा जो कोई बुझे ।
तीन लोक सब पल में सूझे । ।
कबीर का गाया जो कोई गावे ।
तीन त्याग चौथा पद पारे ।
241 दोहा शब्द साक्षी रूप है, साक्षी रहे असंग ।
__ संग दोष ब्यापे नहीं, सुन सतगुरु परसंग ॥
राधास्वामी संत कबीर ।
तुलसी जग जीवन मति धीर ॥
नानक पलटू दास बखाना ।
गुरु की दया हमहुँ कछु जाना ।
वेद पढ़े और पढ़ा पुरान ।
सांख्य वेदान्त का परखा ज्ञान । ।
प्राण योग कर आसन मारा ।
तो भी हाथ लगा नहीं सारा ॥
भेद गुप्त बानी में है कुछ ।
समझे ताहि न जीव अधम तुछ ॥
दोहा राधास्वामी प्रगट किया, शब्द योग की रीत ।
सोई संत की बानी में, श्रुति संयुत उद्गीत ॥
पंचम नाम के पंच विधान ।
पंच अग्नि परचंड महान । ।
पंच यज्ञ परमारथ बाद ।
नहीं वह आशय बाद विवाद । ।
करनी करे सो भेद को पावे ।
कथनी कथे सो अवध गवावे ॥
करनी करे सो सेवक पूरा ।
करनी कर कायर हो सूरा ॥
कथनी बदनी जब कोई त्यागे ।
तब करनी के शब्द में लागे ।
दोहा यह करनी का भेद है, नाही बुद्धि विचार ।
कथनी तज करनी करे, तब पावे कुछ सार ॥
सहज शब्द निर्णय
×
Song 34 — Hindi
434. शब्द गुप्त तब रहा अनामी ।
शब्द प्रगट तब प्रगटा नामी ॥
गुप्त प्रगट दोउ शब्द स्वरूप ।
रंक प्रजा कहीं राजा भूप । ।
कहीं सामान्य और कहीं विशेष ।
कहीं विस्तार कहीं है शेष ॥
सब में शब्द है ओत परोत ।
कहीं धार गति कहीं है सोत । ।
माला मनका और सुमेर ।
गांठ गांठ में हेरा फेर ।
दोहा जहां छोब गति गम लहे, तहां शब्द की धार ।
जहां छोब की गम नहीं, अधिष्ठान आधार । ।
निराकार साकार की खानी ।
कारन सूक्ष्म स्थूल निशानी ॥
श्रुति जब अन्तःकरण में आवे ।
गगन मंडल उद्गीत कहावे ॥
जिभ्यातट सोई बने सुबानी ।
ब्रह्मा शारद शेस बखानी ॥
अनहद निराकार धुन सोहे ।
मुख जिभ्या बानी है मोहे ॥
बानी में सब गये भुलाई ।
अनहद धुन उनमुनि नहीं पाई । ।
दोहा बानी वरनात्मक है, सगुन गुनन की खान ।
अनहद धुनात्मक धुन, निर्गुन अगुन महान ॥
शब्द शब्द का रचा पसारा ।
शब्द शब्द त्रिगुण बिस्तारा । ।
अधि दैविक अधि भौतिक जानो ।
सोई अध्यात्मक रूप पिछानो ।
शब्द भेद है शब्द अभेद ।
शब्द मुक्ति शब्दहि भव भेद । ।
एक शब्द भव फन्द कटावे ।
एक शब्द गले फाँसी लावे ॥
एक शब्द आनन्द विलास ।
एक शब्द दारुण दुख त्रास । ।
दोहा एक शब्द के सुनत ही, लगे कलेजे घाव ।
एक शब्द औषधि करे, अपने सहज स्वभाव । ।
भोग शब्द उपजावे भोग ।
जोग शब्द प्रगटावे जोग । ।
एक शब्द हिये आवे ज्ञान ।
एक शब्द सुन बन्द निदान ॥
शब्द विवेक से बुझे एक ।
भव के शब्द से लखे अनेक ॥
एक अनेक शब्द परमाना ।
सोई अद्वत और द्रुत कहाना ।
माया ब्रह्म पुरुष प्रकृति ।
शब्द ही जीव शिव और शक्ति ॥
दोहा गुरु मुख शब्द में रहत है, अद्भुत अनन्त विचार ।
गुरु का शब्द जो लख पड़े, सूझे अगम अपार ॥
शब्दहि मारे बन को जाये ।
शब्द से लोक परलोक नसाये ॥
शब्द सबारे लोक परलोक ।
शब्दहि टारे भव का शोक ॥
शब्द वेद और शब्द पुरान ।
शब्दहि श्रुति स्मृति की जान ।
शब्दहि प्रश्न शब्द ही उत्तर ।
शब्दहि मौन और शब्द ही सूत्तर ॥
शब्दहि उन्मन शब्द समाधी ।
शब्दहि बन्धन शब्द उपाधी । ।
दोहाशब्द शब्द में भेद है, शब्द शब्द में भाव ।
___ गुरु का शब्द से पाइये, भक्ति मुक्ति का दाव ॥
शब्द त्रिलोकी रचा पसारा ।
शब्द मांहि त्रिगुन निस्तारा ॥
गगन पवन अगनी जल पृथ्वी ।
शब्द आदि जानो इन सबकी ।
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध ।
शब्द मुक्ति और शब्द है बन्ध ।
शब्द पुरुष है शब्द प्रकृति ।
शब्द शम्भु और शब्द है शक्ति ।
जीव ब्रह्म ईश्वर और माया ।
शब्द तत्व और शब्द है काया ॥
दोहाबिना शब्द रचना नहीं, शब्द है सबका सार ।
कोई कोई सन्त जन, शब्द का करे विचार ॥
शब्द से सुरत सुरत से शब्द ।
शब्द अलब्ध शब्द है लब्ध ॥
त्वचा आँख जिभ्या और कान ।
शब्द है शब्द रूप पहिचान । ।
पश्यन्ती मध्यमा बैखरी ।
अपरा परा शब्द है बैखरी ॥
निराधार और सर्वाधार ।
अधिष्ठान गति शब्द विचार ॥
तुरिया तुरियातीत शब्द ।
साध सन्त अतीत शब्द सब ॥
सोरठारवि शशि मंगल बुद्ध, और बृहस्पति शुक्र शनि ।
__ शब्दहि शुद्ध अशुद्ध, निरख परख पहिचान ले ॥
शब्द विराट शब्द है माया ।
जोत निरंजन शब्द की काया ॥
शब्द है मूल मंत्र ओंकार ।
अन्तरयामी शब्द मंझार । ।
सुन्न महासुन्न शब्द पसार ।
शब्द भंवर सोहं झनकार । ।
शब्द पुरुष है शब्द अकार ।
शब्द करे सत धाम पुकार । ।
अलख है शब्द अगम है शब्द ।
अगम है शब्द निगम है शब्द । ।
दोहाराधास्वामी शब्द है, मुख से लेते नाम ।
गुप्त तो शब्द अशब्द है, अमला अचल अनाम । ।
244.
सहज सुरत निर्णय
शब्द प्रगट तब प्रगटा नामी ॥
गुप्त प्रगट दोउ शब्द स्वरूप ।
रंक प्रजा कहीं राजा भूप । ।
कहीं सामान्य और कहीं विशेष ।
कहीं विस्तार कहीं है शेष ॥
सब में शब्द है ओत परोत ।
कहीं धार गति कहीं है सोत । ।
माला मनका और सुमेर ।
गांठ गांठ में हेरा फेर ।
दोहा जहां छोब गति गम लहे, तहां शब्द की धार ।
जहां छोब की गम नहीं, अधिष्ठान आधार । ।
निराकार साकार की खानी ।
कारन सूक्ष्म स्थूल निशानी ॥
श्रुति जब अन्तःकरण में आवे ।
गगन मंडल उद्गीत कहावे ॥
जिभ्यातट सोई बने सुबानी ।
ब्रह्मा शारद शेस बखानी ॥
अनहद निराकार धुन सोहे ।
मुख जिभ्या बानी है मोहे ॥
बानी में सब गये भुलाई ।
अनहद धुन उनमुनि नहीं पाई । ।
दोहा बानी वरनात्मक है, सगुन गुनन की खान ।
अनहद धुनात्मक धुन, निर्गुन अगुन महान ॥
शब्द शब्द का रचा पसारा ।
शब्द शब्द त्रिगुण बिस्तारा । ।
अधि दैविक अधि भौतिक जानो ।
सोई अध्यात्मक रूप पिछानो ।
शब्द भेद है शब्द अभेद ।
शब्द मुक्ति शब्दहि भव भेद । ।
एक शब्द भव फन्द कटावे ।
एक शब्द गले फाँसी लावे ॥
एक शब्द आनन्द विलास ।
एक शब्द दारुण दुख त्रास । ।
दोहा एक शब्द के सुनत ही, लगे कलेजे घाव ।
एक शब्द औषधि करे, अपने सहज स्वभाव । ।
भोग शब्द उपजावे भोग ।
जोग शब्द प्रगटावे जोग । ।
एक शब्द हिये आवे ज्ञान ।
एक शब्द सुन बन्द निदान ॥
शब्द विवेक से बुझे एक ।
भव के शब्द से लखे अनेक ॥
एक अनेक शब्द परमाना ।
सोई अद्वत और द्रुत कहाना ।
माया ब्रह्म पुरुष प्रकृति ।
शब्द ही जीव शिव और शक्ति ॥
दोहा गुरु मुख शब्द में रहत है, अद्भुत अनन्त विचार ।
गुरु का शब्द जो लख पड़े, सूझे अगम अपार ॥
शब्दहि मारे बन को जाये ।
शब्द से लोक परलोक नसाये ॥
शब्द सबारे लोक परलोक ।
शब्दहि टारे भव का शोक ॥
शब्द वेद और शब्द पुरान ।
शब्दहि श्रुति स्मृति की जान ।
शब्दहि प्रश्न शब्द ही उत्तर ।
शब्दहि मौन और शब्द ही सूत्तर ॥
शब्दहि उन्मन शब्द समाधी ।
शब्दहि बन्धन शब्द उपाधी । ।
दोहाशब्द शब्द में भेद है, शब्द शब्द में भाव ।
___ गुरु का शब्द से पाइये, भक्ति मुक्ति का दाव ॥
शब्द त्रिलोकी रचा पसारा ।
शब्द मांहि त्रिगुन निस्तारा ॥
गगन पवन अगनी जल पृथ्वी ।
शब्द आदि जानो इन सबकी ।
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध ।
शब्द मुक्ति और शब्द है बन्ध ।
शब्द पुरुष है शब्द प्रकृति ।
शब्द शम्भु और शब्द है शक्ति ।
जीव ब्रह्म ईश्वर और माया ।
शब्द तत्व और शब्द है काया ॥
दोहाबिना शब्द रचना नहीं, शब्द है सबका सार ।
कोई कोई सन्त जन, शब्द का करे विचार ॥
शब्द से सुरत सुरत से शब्द ।
शब्द अलब्ध शब्द है लब्ध ॥
त्वचा आँख जिभ्या और कान ।
शब्द है शब्द रूप पहिचान । ।
पश्यन्ती मध्यमा बैखरी ।
अपरा परा शब्द है बैखरी ॥
निराधार और सर्वाधार ।
अधिष्ठान गति शब्द विचार ॥
तुरिया तुरियातीत शब्द ।
साध सन्त अतीत शब्द सब ॥
सोरठारवि शशि मंगल बुद्ध, और बृहस्पति शुक्र शनि ।
__ शब्दहि शुद्ध अशुद्ध, निरख परख पहिचान ले ॥
शब्द विराट शब्द है माया ।
जोत निरंजन शब्द की काया ॥
शब्द है मूल मंत्र ओंकार ।
अन्तरयामी शब्द मंझार । ।
सुन्न महासुन्न शब्द पसार ।
शब्द भंवर सोहं झनकार । ।
शब्द पुरुष है शब्द अकार ।
शब्द करे सत धाम पुकार । ।
अलख है शब्द अगम है शब्द ।
अगम है शब्द निगम है शब्द । ।
दोहाराधास्वामी शब्द है, मुख से लेते नाम ।
गुप्त तो शब्द अशब्द है, अमला अचल अनाम । ।
244.
सहज सुरत निर्णय
×
Song 35 — Hindi
435. शब्द सोत से निकली धार ।
पिंड में आय फंसी नौ द्वार ।
अन्तःकरण चार से मिली ।
इन्द्री ज्ञान कर्म संग पिली । ।
सोई धार सुरत सार कहावे ।
कल्प विकल्प के साथ रहावे । ।
जब लग देह गेह संयोग ।
आवागमन के भोगे योग । ।
जब ठहरी तब सुख संयोग ।
हटी तो दुख से भया वियोग । ।
दोहादुख सुख द्वन्द अवस्था, ऊपर नीचे जाय ।
नव द्वारे जब लग रहे, भरम के फंद फंसाय । ।
देव भूत आतम का फंद ।
तीन ताप में व्यापा द्वन्द ॥
एक चित होय न आनन्द पावे ।
द्विचिताई के बन्ध रहावे ॥
दुविधा द्विचिताई संसार ।
गह असार वह लहे न सार ॥
असत भाव में लख चौरासी ।
भरमत भिरी सुरत अविनासी ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ी ।
सुरत गांठि संग पड़कर अड़ी ॥
दोहागांठी कल्पित सर्वदा, मिथ्या वृथा के भाव ।
___ कहत कठिन समझत कठिन, खुलत न सहस उपाय । ।
नव को छोड़ दसम दर लागे ।
हिये के मोह लोभ सब त्यागे ।
सुन्दर सुन्दर रूप निहारे ।
ज्ञान पाय गांठी निरवारे ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
शब्द गुरु का लावे ध्यान ॥
ध्यान में लागे सहज समाध ।
तब मन के सब हटें उपाध । ।
वृत्ति साध मेटे सब व्याध ।
सुरत निरत तब हो विस्माध ॥
दोहाबिसमिध हुये उत्थान पर, करे विचार अपार ।
तजे बासना जगत की, सहज होय निस्तार ॥
तीन छोड़ चौथे पद धावे ।
चौथे सुरत को निरत करावे ॥
सुरत धारना निरत है ध्यान ।
धारे अधिष्ठान अस्थान । ।
245 सत पद है कूटस्थ का थाना ।
अचरज अद्भुत अकह अमाना ।
अलख अगम और राधास्वामी ।
निगम अगम के पार मुकामी । ।
साखी शब्द शब्द और साखी ।
जिनकी गति है पहले भाखी ।
दोहा शब्द कमाय साखी लहे, साक्षी रूप प्रमान ।
धुर पद जीवन मुक्त मति, आवागवन नसान । ।
सुरत टिके अन्तर कर बासा ।
सतचित आनन्द लहे बिलासा । ।
सत में बल चित में है ज्ञान ।
आनन्द है आनन्द के ध्यान । ।
तीन त्रिवेणी कर अस्नान ।
मेटे सत रज तम का मान । ।
मान सरोवर मारे गोता ।
निर्मल होय अमी के सोता ॥
तब चौथा पद पड़े लखाई ।
बिन चौथे पद नहीं भलाई ॥
दोहा तीन छोड़ चौथा दिया, पाया पद निर्माण ।
राधास्वामी दीन हित, सतगुरु संत महान । ।
सहज चेतावनी
पिंड में आय फंसी नौ द्वार ।
अन्तःकरण चार से मिली ।
इन्द्री ज्ञान कर्म संग पिली । ।
सोई धार सुरत सार कहावे ।
कल्प विकल्प के साथ रहावे । ।
जब लग देह गेह संयोग ।
आवागमन के भोगे योग । ।
जब ठहरी तब सुख संयोग ।
हटी तो दुख से भया वियोग । ।
दोहादुख सुख द्वन्द अवस्था, ऊपर नीचे जाय ।
नव द्वारे जब लग रहे, भरम के फंद फंसाय । ।
देव भूत आतम का फंद ।
तीन ताप में व्यापा द्वन्द ॥
एक चित होय न आनन्द पावे ।
द्विचिताई के बन्ध रहावे ॥
दुविधा द्विचिताई संसार ।
गह असार वह लहे न सार ॥
असत भाव में लख चौरासी ।
भरमत भिरी सुरत अविनासी ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ी ।
सुरत गांठि संग पड़कर अड़ी ॥
दोहागांठी कल्पित सर्वदा, मिथ्या वृथा के भाव ।
___ कहत कठिन समझत कठिन, खुलत न सहस उपाय । ।
नव को छोड़ दसम दर लागे ।
हिये के मोह लोभ सब त्यागे ।
सुन्दर सुन्दर रूप निहारे ।
ज्ञान पाय गांठी निरवारे ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
शब्द गुरु का लावे ध्यान ॥
ध्यान में लागे सहज समाध ।
तब मन के सब हटें उपाध । ।
वृत्ति साध मेटे सब व्याध ।
सुरत निरत तब हो विस्माध ॥
दोहाबिसमिध हुये उत्थान पर, करे विचार अपार ।
तजे बासना जगत की, सहज होय निस्तार ॥
तीन छोड़ चौथे पद धावे ।
चौथे सुरत को निरत करावे ॥
सुरत धारना निरत है ध्यान ।
धारे अधिष्ठान अस्थान । ।
245 सत पद है कूटस्थ का थाना ।
अचरज अद्भुत अकह अमाना ।
अलख अगम और राधास्वामी ।
निगम अगम के पार मुकामी । ।
साखी शब्द शब्द और साखी ।
जिनकी गति है पहले भाखी ।
दोहा शब्द कमाय साखी लहे, साक्षी रूप प्रमान ।
धुर पद जीवन मुक्त मति, आवागवन नसान । ।
सुरत टिके अन्तर कर बासा ।
सतचित आनन्द लहे बिलासा । ।
सत में बल चित में है ज्ञान ।
आनन्द है आनन्द के ध्यान । ।
तीन त्रिवेणी कर अस्नान ।
मेटे सत रज तम का मान । ।
मान सरोवर मारे गोता ।
निर्मल होय अमी के सोता ॥
तब चौथा पद पड़े लखाई ।
बिन चौथे पद नहीं भलाई ॥
दोहा तीन छोड़ चौथा दिया, पाया पद निर्माण ।
राधास्वामी दीन हित, सतगुरु संत महान । ।
सहज चेतावनी
×
Song 36 — Hindi
436. रचना सहज सहज प्रकृति ।
सहज वृत्ति में सहज सुकृति । ।
सहज सरल चित कबहुँ न त्यागे ।
बाल दशा व्यौहार में लागे ।
सनक सनन्दन सनत कुमारा ।
सहज वृत्ति को चित में धारा ॥
तजे न चित से रूप आनन्द ।
भूल न व्यापे जग का द्वन्द ।
अहंकार से खींचा तान ।
ता से उपजे मन अज्ञान । ।
दोहा यह अज्ञान है भरम गति, जग का मूल विकार ।
__भूल भरम में जो फैसा, खोया तत्व का सार ॥
काम क्रोध मद लोभ प्रचंड ।
अनसमझी से बढ़ा घमंड ॥
यह घमंड जाके चित आया ।
ताके हृदय व्यापी माया ॥
माया सौ सौ नाच नचावे ।
छल बल जीव को अधिक सतावे। ।
कहीं दारा कहीं धन परिवारा ।
कहीं दल बादल सजकर मारा ॥
कहीं युक्ति बिन दाँव चलाई ।
कहीं सक्ति होय आँख दिखाई ॥
दोहा अमी हलाहल मद भरे, दृष्टि पियाले माहि ।
जेहि देखा सो जिया मरा, गिरत पड़त सुध नाहिं ॥
ऐसी नहीं कोई दृष्टि में आया ।
जाके हृदय न व्यापी माया ॥
जड़ताई दुर्योधन मारा ।
विश्वामित्र का तप संहारा ॥
शिव मोहनी के रूप लुभाने ।
ब्रह्मा कामातुर जग जाने ।
शृंगी ऋषि पर दाव चलाई ।
माया दशरथ घर ले आई ॥
नारद आदि ऋषि विज्ञानी ।
माया के रहे बन्ध बधानी ॥
दोहा है नाहीं डोलत फिरे, कोई न देखे नैन ।
नैन बिना वह पापनी, मारे दृष्टि के नैन ।
शत रूपा शत भाव गोसाई ।
कहीं परकाश कहीं परछाई ।
कभी आस दे कभी निरास ।
कभी त्रास दे करे उदास ।
रोय गाय प्रान हर लेवे ।
हसी खेल में विष मुख देवे ॥
दुविधा दुरमति और द्विचिताई ।
कपट ईर्षा बुद्धि चतुराई ।
सहस बांह सहसा बलवान ।
सहस बान से बेधे प्रान ॥
दोहा ऋषि मुनि सुर नर सकल विधि, माया के आधीन ।
जप तप संयम छोड़ कर, पुरषारथ से हीन ॥
सुख सम्पत्ति धन धाम बड़ाई ।
माया कल्पित फाँसी लाई ॥
पांच लड़ी की रस्सी बटी ।
बांधे सबको माया नटी ।
एक लड़ काम दूजा हंकार ।
तीजा लोभ है मूल विकार । ।
चौथा मोह पांचवां क्रोध ।
जिनसे जग में बढ़ा विरोध ।
पांच विकार का सकल पसारा ।
उपज प्रपंच अकथ बिस्तारा ॥
दोहा करम करें सब शुभ अशुभ, भोर्ग फल दिन रात ।
जनम जनम बिलपत फिरें, नसे न जग उत्पात ॥
247 सहज चेतावनी (नं0 2)
सहज वृत्ति में सहज सुकृति । ।
सहज सरल चित कबहुँ न त्यागे ।
बाल दशा व्यौहार में लागे ।
सनक सनन्दन सनत कुमारा ।
सहज वृत्ति को चित में धारा ॥
तजे न चित से रूप आनन्द ।
भूल न व्यापे जग का द्वन्द ।
अहंकार से खींचा तान ।
ता से उपजे मन अज्ञान । ।
दोहा यह अज्ञान है भरम गति, जग का मूल विकार ।
__भूल भरम में जो फैसा, खोया तत्व का सार ॥
काम क्रोध मद लोभ प्रचंड ।
अनसमझी से बढ़ा घमंड ॥
यह घमंड जाके चित आया ।
ताके हृदय व्यापी माया ॥
माया सौ सौ नाच नचावे ।
छल बल जीव को अधिक सतावे। ।
कहीं दारा कहीं धन परिवारा ।
कहीं दल बादल सजकर मारा ॥
कहीं युक्ति बिन दाँव चलाई ।
कहीं सक्ति होय आँख दिखाई ॥
दोहा अमी हलाहल मद भरे, दृष्टि पियाले माहि ।
जेहि देखा सो जिया मरा, गिरत पड़त सुध नाहिं ॥
ऐसी नहीं कोई दृष्टि में आया ।
जाके हृदय न व्यापी माया ॥
जड़ताई दुर्योधन मारा ।
विश्वामित्र का तप संहारा ॥
शिव मोहनी के रूप लुभाने ।
ब्रह्मा कामातुर जग जाने ।
शृंगी ऋषि पर दाव चलाई ।
माया दशरथ घर ले आई ॥
नारद आदि ऋषि विज्ञानी ।
माया के रहे बन्ध बधानी ॥
दोहा है नाहीं डोलत फिरे, कोई न देखे नैन ।
नैन बिना वह पापनी, मारे दृष्टि के नैन ।
शत रूपा शत भाव गोसाई ।
कहीं परकाश कहीं परछाई ।
कभी आस दे कभी निरास ।
कभी त्रास दे करे उदास ।
रोय गाय प्रान हर लेवे ।
हसी खेल में विष मुख देवे ॥
दुविधा दुरमति और द्विचिताई ।
कपट ईर्षा बुद्धि चतुराई ।
सहस बांह सहसा बलवान ।
सहस बान से बेधे प्रान ॥
दोहा ऋषि मुनि सुर नर सकल विधि, माया के आधीन ।
जप तप संयम छोड़ कर, पुरषारथ से हीन ॥
सुख सम्पत्ति धन धाम बड़ाई ।
माया कल्पित फाँसी लाई ॥
पांच लड़ी की रस्सी बटी ।
बांधे सबको माया नटी ।
एक लड़ काम दूजा हंकार ।
तीजा लोभ है मूल विकार । ।
चौथा मोह पांचवां क्रोध ।
जिनसे जग में बढ़ा विरोध ।
पांच विकार का सकल पसारा ।
उपज प्रपंच अकथ बिस्तारा ॥
दोहा करम करें सब शुभ अशुभ, भोर्ग फल दिन रात ।
जनम जनम बिलपत फिरें, नसे न जग उत्पात ॥
247 सहज चेतावनी (नं0 2)
×
Song 37 — Hindi
437. चोटी जीव की काल के हाथ ।
सौ सौ बात की एक यह बात । ।
काल चलावे चोखा बान ।
बन परबत ऊसर मैदान ॥
काल बली सिर ऊपर ठाढ़ा ।
लखे शिकारी जैसे पाढ़ा ॥
बिना हते नहीं छोड़े प्रान ।
कोई किसका करे अभिमान ।
मद अभिमान काम नहीं आये ।
काल हाथ से कोई न बचावे ॥
दोहा—कबीर काहे गरभिया, काल गहे कर केस ।
ना जाने कित मारसी, क्या घर क्या परदेस ।
देह से होय प्रान जब न्यारा ।
घर से तत छिन देहिं निकारा ॥
कोई अर्थी सज मरघट लावे ।
अग्नि प्रचंड में ताहि जलावे ॥
कोई गाड़े माटी ले आई ।
माटी में तेहि देह मिलाई ॥
कोई फेके पर्वत मैदाना ।
पशु पक्षी तेहि खाई निदाना ॥
कोई नद नाला करे प्रवाह ।
खायें कच्छ मच्छ सब आह ॥
दोहायह परिणाम है देह का, सोच समझ मन धीर ।
आसा तज दे देह की, फिर नहिं व्यापे पीर ।
सड़े गले जर बर होय राख ।
क्या है इस देही का साख ।
राजा मरे मरे पटरानी ।
मूरख मरे मरे नर ज्ञानी ।
मृत्यु हाथ से कोई न बांचा ।
समझ देह को तू घट कांचा । ।
अन्त काल कोई नहिं साथी ।
क्या होवे दल बाँधे हाथी ।
जिनके घर हैं लाख करोड़ ।
मारे काल सीस को फोड़ ॥
दोहादेह जले ज्यों लाकड़ी, केस जले ज्यों घास । ।
सब जग जलता देखकर, भये कबीर उदास ॥
गर्व गुमान छोड़ दे बन्दे ।
कर कुछ भक्ति युक्ति के धन्दे ॥
अन्त समय नहीं कोई सहाई ।
साथ चले नहीं सुत पितु माई ॥
झूठी है तिरिया अरधंगी ।
वह कब हुई चिता की संगी ॥
प्रेत भूत कह घर से काढ़े ।
रूप कुरूप देख भय बाढ़े ॥
स्वारथ बस सब जीवहि घेरी ।
निकसत प्रान पीठ ले फेरी ॥
दोहाजीते जी व्यवहार है, जीते के सब मीत ।
झूठा नाता जगत का, झूठी प्रीत प्रतीत ॥
कंकर चुन चुन महल बनाया ।
दो दिन पीछे रहन न पाया ॥
आस त्रास लग अवधि गवाई ।
अन्त समय कछु साथ न जाई ।
धन दौलत और माल खजाना ।
सब तज हंस अकेले जाना । ।
धूम धाम जीते बहु किया ।
चलती बेर हाथ क्या लिया ।
खाली आया खाली गया ।
आसा बांध निरासा भया ।
दोहाऊचे महल चुनावते, करते होड़म होड़ ।
खाली हाथों बह गये, जिनके लाख करोड़ ॥
सहज चेतावनी नं 3
सौ सौ बात की एक यह बात । ।
काल चलावे चोखा बान ।
बन परबत ऊसर मैदान ॥
काल बली सिर ऊपर ठाढ़ा ।
लखे शिकारी जैसे पाढ़ा ॥
बिना हते नहीं छोड़े प्रान ।
कोई किसका करे अभिमान ।
मद अभिमान काम नहीं आये ।
काल हाथ से कोई न बचावे ॥
दोहा—कबीर काहे गरभिया, काल गहे कर केस ।
ना जाने कित मारसी, क्या घर क्या परदेस ।
देह से होय प्रान जब न्यारा ।
घर से तत छिन देहिं निकारा ॥
कोई अर्थी सज मरघट लावे ।
अग्नि प्रचंड में ताहि जलावे ॥
कोई गाड़े माटी ले आई ।
माटी में तेहि देह मिलाई ॥
कोई फेके पर्वत मैदाना ।
पशु पक्षी तेहि खाई निदाना ॥
कोई नद नाला करे प्रवाह ।
खायें कच्छ मच्छ सब आह ॥
दोहायह परिणाम है देह का, सोच समझ मन धीर ।
आसा तज दे देह की, फिर नहिं व्यापे पीर ।
सड़े गले जर बर होय राख ।
क्या है इस देही का साख ।
राजा मरे मरे पटरानी ।
मूरख मरे मरे नर ज्ञानी ।
मृत्यु हाथ से कोई न बांचा ।
समझ देह को तू घट कांचा । ।
अन्त काल कोई नहिं साथी ।
क्या होवे दल बाँधे हाथी ।
जिनके घर हैं लाख करोड़ ।
मारे काल सीस को फोड़ ॥
दोहादेह जले ज्यों लाकड़ी, केस जले ज्यों घास । ।
सब जग जलता देखकर, भये कबीर उदास ॥
गर्व गुमान छोड़ दे बन्दे ।
कर कुछ भक्ति युक्ति के धन्दे ॥
अन्त समय नहीं कोई सहाई ।
साथ चले नहीं सुत पितु माई ॥
झूठी है तिरिया अरधंगी ।
वह कब हुई चिता की संगी ॥
प्रेत भूत कह घर से काढ़े ।
रूप कुरूप देख भय बाढ़े ॥
स्वारथ बस सब जीवहि घेरी ।
निकसत प्रान पीठ ले फेरी ॥
दोहाजीते जी व्यवहार है, जीते के सब मीत ।
झूठा नाता जगत का, झूठी प्रीत प्रतीत ॥
कंकर चुन चुन महल बनाया ।
दो दिन पीछे रहन न पाया ॥
आस त्रास लग अवधि गवाई ।
अन्त समय कछु साथ न जाई ।
धन दौलत और माल खजाना ।
सब तज हंस अकेले जाना । ।
धूम धाम जीते बहु किया ।
चलती बेर हाथ क्या लिया ।
खाली आया खाली गया ।
आसा बांध निरासा भया ।
दोहाऊचे महल चुनावते, करते होड़म होड़ ।
खाली हाथों बह गये, जिनके लाख करोड़ ॥
सहज चेतावनी नं 3
×
Song 38 — Hindi
438. जब सुख मिला तो रहा अचेत ।
दुख जब सहा हुआ कुछ चेत । ।
चेत चेत यह बचन सुनाया ।
रहा हाय ! माया लपटाया । ।
आज नहीं तो काल भजू गा ।
गह गुरु चरन विचार तजू गा ॥
आज गया फिर आया काल ।
काल करत ही अवसर चाल ।
काल काल कह काल बुलाया ।
अन्त काल जिया में पछताया ।
दोहाएक पलक की सुध नहीं, करे काल का साज ।
काल अचानक मारि है, ज्यों तीतर को बाज ॥
समय खोय नर अन्त में रोया ।
ज्ञान त्याग अज्ञान में सोया ।
काल शिकारी सिर पर गाजे ।
साज द्वन्द का नित ही साजे । ।
गुरु सतसंग मिले जब प्रानी ।
सार की समझ बूझ तब आनी । ।
इष्ट धार चित करे कमाई ।
सहज हि काल फन्द छुट जाई ॥
निरख परख कर करतब पाले ।
संशय रहित काल घर घाले ॥
दोहागहे दयाल के चरन को, काल की चिंता त्याग ।
___आज सवारे काम को, लहे सुभाव सुभाग ॥
आज की कर चिन्ता कुछ प्रानी ।
काल रूप को ले पहचानी ।
काल काल है महा कराल ।
कठिन भयानक अति विकराल ।
काल सहस मुख सीस और पाँव ।
खेले काल सहस नित दांव ॥
शरन दयाल जो चित नहीं आवे ।
काल के भय से मुक्ति न पावे । ।
इसी काल की माया नार ।
ठौर ठौर में वह बटमार ॥
दोहाएक शत्रु भयभीत कर, चित उपजावे भर्म ।
यहां शत्रु दो संग है, समझ गुरु का मर्म ॥
आज का अवसर मिला है तुझको ।
मूल भरम में इसे न तू खो ॥
करले आज आज का काम ।
भज ले अविनाशी गुरु नाम ।
सांस सांस जो सुमिरे नाम ।
अन्त काल पावे विश्राम ॥
तज सुख निद्रा नींद का साज ।
जाग सबार आपनो काज । ।
नेह लगाले नाम रतन से ।
नाम रतन तू पाय जतन से ॥
दोहासांस सांस पर नाम ले, वृथा जनम मत खोय ।
को जाने इस सांस का, आबन होय न होय ॥
जो कोई काल की चिन्ता लावे ।
काल सहसमुख तिस को खावे । ।
दुविधा तज तज दे दुचिताई ।
ले तुरन्त सतगुरु शरनाई । ।
सतगुरु संग बांध जुग चाल ।
चोट न खाय न व्याये काल ॥
गोट बांध जुग चौसर चले ।
असह योग का सो दल दले ॥
लाल होय निज घर नो आवे ।
सहजहि अपना जनम बनावे । ।
दोहा बिन सतगुरु बिन गुरु नहीं, चित में आवे एक ।
पौ लख चौरासी लहे, सूझे भरम अनेक । ।
250.
सहज सत्त
दुख जब सहा हुआ कुछ चेत । ।
चेत चेत यह बचन सुनाया ।
रहा हाय ! माया लपटाया । ।
आज नहीं तो काल भजू गा ।
गह गुरु चरन विचार तजू गा ॥
आज गया फिर आया काल ।
काल करत ही अवसर चाल ।
काल काल कह काल बुलाया ।
अन्त काल जिया में पछताया ।
दोहाएक पलक की सुध नहीं, करे काल का साज ।
काल अचानक मारि है, ज्यों तीतर को बाज ॥
समय खोय नर अन्त में रोया ।
ज्ञान त्याग अज्ञान में सोया ।
काल शिकारी सिर पर गाजे ।
साज द्वन्द का नित ही साजे । ।
गुरु सतसंग मिले जब प्रानी ।
सार की समझ बूझ तब आनी । ।
इष्ट धार चित करे कमाई ।
सहज हि काल फन्द छुट जाई ॥
निरख परख कर करतब पाले ।
संशय रहित काल घर घाले ॥
दोहागहे दयाल के चरन को, काल की चिंता त्याग ।
___आज सवारे काम को, लहे सुभाव सुभाग ॥
आज की कर चिन्ता कुछ प्रानी ।
काल रूप को ले पहचानी ।
काल काल है महा कराल ।
कठिन भयानक अति विकराल ।
काल सहस मुख सीस और पाँव ।
खेले काल सहस नित दांव ॥
शरन दयाल जो चित नहीं आवे ।
काल के भय से मुक्ति न पावे । ।
इसी काल की माया नार ।
ठौर ठौर में वह बटमार ॥
दोहाएक शत्रु भयभीत कर, चित उपजावे भर्म ।
यहां शत्रु दो संग है, समझ गुरु का मर्म ॥
आज का अवसर मिला है तुझको ।
मूल भरम में इसे न तू खो ॥
करले आज आज का काम ।
भज ले अविनाशी गुरु नाम ।
सांस सांस जो सुमिरे नाम ।
अन्त काल पावे विश्राम ॥
तज सुख निद्रा नींद का साज ।
जाग सबार आपनो काज । ।
नेह लगाले नाम रतन से ।
नाम रतन तू पाय जतन से ॥
दोहासांस सांस पर नाम ले, वृथा जनम मत खोय ।
को जाने इस सांस का, आबन होय न होय ॥
जो कोई काल की चिन्ता लावे ।
काल सहसमुख तिस को खावे । ।
दुविधा तज तज दे दुचिताई ।
ले तुरन्त सतगुरु शरनाई । ।
सतगुरु संग बांध जुग चाल ।
चोट न खाय न व्याये काल ॥
गोट बांध जुग चौसर चले ।
असह योग का सो दल दले ॥
लाल होय निज घर नो आवे ।
सहजहि अपना जनम बनावे । ।
दोहा बिन सतगुरु बिन गुरु नहीं, चित में आवे एक ।
पौ लख चौरासी लहे, सूझे भरम अनेक । ।
250.
सहज सत्त
×
Song 39 — Hindi
439. असत न होय सत्त कहूँ कैसे ।
देखा अनदेखा दोऊ तैसे ॥
अपनी आँखी मैं नित देखू ।
बिन देखे का भेद न लेखू ॥
आँख खुली वह दृष्टि में आया ।
दृष्टि खुली वह गया गँवाया ।
ऐसी बात कहे को आय ।
कोई क्यों उसको पतियाय । ।
मैं जानूं रह रह अनजान ।
अनजानी कहूँ कैसे जान । ।
दोहा होने को तो है सही, अनहोना नहीं सोय ।
है नाहीं के बीच में, कैसे समझे सोय ॥
बिन कर करम करे व्यवहारा ।
मिन पग चले सो कोस हजारा ॥
विना नैन का दृष्टा भाई ।
नाक विना सूघे सब आई । ।
बिन जिभ्या बानी बहु गावे ।
बिन जिभ्या स्वाद रस खावे ॥
बिना कान श्रोता सज्ञानी ।
बिना मान के मान अभिमानी ।
बिना देह के देहाधारी ।
बिन अकार के सोई साकारी । ।
दोहा बिना रूप का रूप है, बिन अकार साकार ।
निराधार आधार जग, सब विधि किया विचार ॥
मुक्त न बद्ध न शुद्ध अशुद्ध ।
ज्ञानी बड़ वक्ता बड़ बुद्ध ॥
निरबुद्धि नहीं बुद्धिमान ।
किस विधि तिसका करू बखान ।
बिना चेत चेतन की खानी ।
अमन समन नहीं मन अनुमानी ॥
करता धरता सबका भाई ।
करता धरता सो न रहाई । ।
बिना सीस धारे महि धारा ।
नहीं असार वह सबका सारा ॥
दोहा अवगति की गति कठिन है, निरालम्ब निरदेव ।
व्यापक सुर अरु असुर में, अद्भुत अचरज देव ॥
फूल मध्य ज्यों बास समाना ।
मेंहदी की लाली परमाना ।
चकमक मध्ये आग विराजा ।
राज विचित्र करे महाराजा । ।
251 प्राण का प्राण जान का जान ।
देह अदेह विदेह बखान ॥
अर्थ धर्म काम का दाता ।
अधिकारी को मुक्ति दिलाता ॥
काम अकाम अनर्थ अर्थ जो ।
मुक्त अमुक्त है धर्म मर्म जो । ।
दोहा सब कुछ है और कुछ नहीं, कहा सुना नहीं जाय ।
कथन सुनन बिन जीव से, चुप भी रहा न जाय ॥
देस अदेस विदेस महाना ।
रूप अरूप स्वरूप बखाना ॥
अगुन सगुन गुनवान है सोई ।
मायातीत शक्तिधर होई ॥
जड़ नहीं चेतन कैसे कहूँ ।
जड़ चेतन लख मौनी गहूँ ।
जड़ चेतन में व्यापा सोई ।
बिन अधार ठहरे नहीं कोई ॥
सत तप मह जन ऋषि बखाने ।
सोह भुवः भूः मुनि जन जाने ।
दोहा जोत निरंजन सहसदल, त्रिकुटी पद ओंकार ।
सुन्न महासुन्न हंसगति, भवर का सोहंग सार ।
कहीं विराट कहीं अव्याकृत ।
कहीं हिरण्यगर्भ करे चरित्र । ।
कर चरित्र सब के मन भाया ।
सबसे मिल जुल रह विलगाया ।
अलग बिलग ताकी गति नाहीं ।
प्रतिविम्बित रहे बुद्धि माहीं ॥
मति नहीं लखे सुमति लख पावे ।
बिनती निगम गम एति बतावे ॥
एति नेति दोनों से न्यारा ।
पार अपार वार के वारा ॥
दोहा सत्त पुरुष सतलोक का, अगम अलख निरवान ।
राधास्वामी धाम में, राधास्वामी जान ॥
सहज भेद नं 1
देखा अनदेखा दोऊ तैसे ॥
अपनी आँखी मैं नित देखू ।
बिन देखे का भेद न लेखू ॥
आँख खुली वह दृष्टि में आया ।
दृष्टि खुली वह गया गँवाया ।
ऐसी बात कहे को आय ।
कोई क्यों उसको पतियाय । ।
मैं जानूं रह रह अनजान ।
अनजानी कहूँ कैसे जान । ।
दोहा होने को तो है सही, अनहोना नहीं सोय ।
है नाहीं के बीच में, कैसे समझे सोय ॥
बिन कर करम करे व्यवहारा ।
मिन पग चले सो कोस हजारा ॥
विना नैन का दृष्टा भाई ।
नाक विना सूघे सब आई । ।
बिन जिभ्या बानी बहु गावे ।
बिन जिभ्या स्वाद रस खावे ॥
बिना कान श्रोता सज्ञानी ।
बिना मान के मान अभिमानी ।
बिना देह के देहाधारी ।
बिन अकार के सोई साकारी । ।
दोहा बिना रूप का रूप है, बिन अकार साकार ।
निराधार आधार जग, सब विधि किया विचार ॥
मुक्त न बद्ध न शुद्ध अशुद्ध ।
ज्ञानी बड़ वक्ता बड़ बुद्ध ॥
निरबुद्धि नहीं बुद्धिमान ।
किस विधि तिसका करू बखान ।
बिना चेत चेतन की खानी ।
अमन समन नहीं मन अनुमानी ॥
करता धरता सबका भाई ।
करता धरता सो न रहाई । ।
बिना सीस धारे महि धारा ।
नहीं असार वह सबका सारा ॥
दोहा अवगति की गति कठिन है, निरालम्ब निरदेव ।
व्यापक सुर अरु असुर में, अद्भुत अचरज देव ॥
फूल मध्य ज्यों बास समाना ।
मेंहदी की लाली परमाना ।
चकमक मध्ये आग विराजा ।
राज विचित्र करे महाराजा । ।
251 प्राण का प्राण जान का जान ।
देह अदेह विदेह बखान ॥
अर्थ धर्म काम का दाता ।
अधिकारी को मुक्ति दिलाता ॥
काम अकाम अनर्थ अर्थ जो ।
मुक्त अमुक्त है धर्म मर्म जो । ।
दोहा सब कुछ है और कुछ नहीं, कहा सुना नहीं जाय ।
कथन सुनन बिन जीव से, चुप भी रहा न जाय ॥
देस अदेस विदेस महाना ।
रूप अरूप स्वरूप बखाना ॥
अगुन सगुन गुनवान है सोई ।
मायातीत शक्तिधर होई ॥
जड़ नहीं चेतन कैसे कहूँ ।
जड़ चेतन लख मौनी गहूँ ।
जड़ चेतन में व्यापा सोई ।
बिन अधार ठहरे नहीं कोई ॥
सत तप मह जन ऋषि बखाने ।
सोह भुवः भूः मुनि जन जाने ।
दोहा जोत निरंजन सहसदल, त्रिकुटी पद ओंकार ।
सुन्न महासुन्न हंसगति, भवर का सोहंग सार ।
कहीं विराट कहीं अव्याकृत ।
कहीं हिरण्यगर्भ करे चरित्र । ।
कर चरित्र सब के मन भाया ।
सबसे मिल जुल रह विलगाया ।
अलग बिलग ताकी गति नाहीं ।
प्रतिविम्बित रहे बुद्धि माहीं ॥
मति नहीं लखे सुमति लख पावे ।
बिनती निगम गम एति बतावे ॥
एति नेति दोनों से न्यारा ।
पार अपार वार के वारा ॥
दोहा सत्त पुरुष सतलोक का, अगम अलख निरवान ।
राधास्वामी धाम में, राधास्वामी जान ॥
सहज भेद नं 1
×
Song 40 — Hindi
440 1 जो कोई घर की ओर सिधावे ।
सहज भेद युक्ति चित लावे । ।
जल थल पावक गगन समीरा ।
पंच तत्व से बना शरीरा । ।
पंच तत्व के पंच अस्थान ।
कोई कोई जाने चतुर सुजान ॥
गुदा चक्र में पृथवी बासा ।
इन्द्री में जल करे निवासा ॥
नाभी अग्नि हृदय में पवन ।
कंठ अकास बसे रह मौन ॥
दोहा पाँच चक्र यह तत्व के, बसते पिंड मझार ।
____इन्हें त्याग आगे चले, छटे चक्र के द्वार ॥
छटा चक्र शिव नेत्र कहावे ।
कोई कोई तीजा तिल कह गावे ॥
छटे चक्र में जीव निवासा ।
जीव ब्रह्म संग करे बिलासा ॥
रुद्र नेत्र जीव का धाम ।
तिस पर सहसकमलदल ठाम ।
दोनों मिल एक साथ रहाई ।
इनकी गति कोई बिरला पाई ॥
छटे सातवें चक्र हैं पास ।
जीव ब्रह्म मिल करें निवास ॥
दोहा शब्दयोग साधन करे, रुद्र नेत्र में आय ।
सहजहि सहसकमल में, ब्रह्म की संगत पाय ॥
आगे का सुन लीजो भेद ।
मिटे भरम संशय का खेद ॥
जीव चक्र में चित को जोड़ो ।
पुतली उलट गगन को फोड़ो ॥
श्याम कंज का तिमिर बिनासे ।
तब विराट का रूप प्रकासे । ।
यह साधन अति सुगम सुहेल ।
जीव विराट का समझो मेल ॥
जगमग ज्योति दृष्टि में आवे ।
देख देख मन अति हरखावे ॥
दोहा यह पहला अस्थान है, बिरला भेदी जान ।
विन सतगुरु की दया के, नहीं कोई पावे ज्ञान । ।
जाग्रत स्वप्न सुषप्ति तीन ।
तीन अवस्था जीव के चन्हि । ।
तीन अवस्था के सुन नाम ।
तेजस विश्व प्राज्ञ से काम ॥
जाग्रत विश्व स्वप्न है तेजस ।
सुषुप्ति प्राज्ञ नाम है सह रस ॥
ब्रह्म की तीन अवस्था जान ।
सृष्टि स्थिति प्रलय पिछान ॥
तीन अवस्था नाम हैं तीन ।
जो नहीं जाने मति का हीन ॥
दोहा सृष्टि विराट का नाम है, स्थिति अव्याकृत ।
हिरण्यगर्भ प्रलय दशा, यह अचरजी चरित्र ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
नाम रूप से है बिलगान ।
ब्रह्म महा सर्वज्ञ कहावे ।
जीव नाम अल्पज्ञ का पावे ॥
सिंध मध्य ज्यों बुन्द समाना ।
तैसे हि ब्रह्म जीव अस्थाना ॥
बिलगाये नहीं बिलगें सोई ।
एक साथ दोउ मिल एक होई । ।
जीव रहे माया आधीन ।
मायाधीश ब्रह्म परवीन । ।
दोहाजीव ब्रह्म का भेद यह, सार तत्व का सार ।
बिन विवेक समझे नहीं, फुरे न हृदय विचार ॥
पिंड देश में जीव रहाई ।
देश ब्रह्मड ब्रह्म ठकुराई ।
ब्रह्म जगत त्रिलोकी नामा ।
एक अनेक बीज के धामा ।
जगत अनेक विराट महाना ।
अव्याकृत त्रिकुटी परमाना ॥
हिरण्यगर्भ द्वत अद्वत ।
भेद अगम कोई ज्ञानी देत ।
बीज रूप तुम इसको जानो ।
गुप्त बात सुन मन से मानो ॥
दोहाइष्ट नहीं पद ब्रह्म का, सन्तन किया विचार ।
तीन छोड़ चौथा गहे, तब पाव कुछ सार ॥
सहसबाहु सहसासिर राजा ।
सहसानन बन कौतुक साजा ॥
माल सूत ज्यों मनके रहें ।
त्यों विराट सबको संग गहें ।
यह विराट का रूप है भाई ।
संत मिले तब भेद बताई ॥
अव्याकृत है ओम् का इष्ट ।
समझ न पाव मनुष कनिष्ट ॥
बिन पग चले हाथ बिन कामा ।
नैन बिना देखे सब ठामा ।
दोहा हिरण्यगर्भ अद्वैत पद, है वह एक और दोय ।
__ जैसे बीज के मध्य में, सब रहे आपा खोय ॥
भेदी सुनो भेद की बानी ।
जा से छूटे द्वन्द गलानी ॥
सहसकमलदल जोत निरंजन ।
सो विराट का रूप समझ मन ।
त्रिकुटी में अव्याकृत रहाई ।
प्रणव ॐ की पदवी गहई ॥
हिरण्यगर्भ रहे शून्य मझार ।
बीज रूप सोई अपरम्पार ॥
तीन चक्र यह मस्तक मध्य ।
विन बूझे क्या जाने बद्ध ।
दोहासुन्न के फिर दो भेद हैं, सुन्न महासुन्न जान ।
___यह मस्तिक में गुप्त हैं, कर साधन पहिचान ।
सुन्न देश में है सविकल्प ।
महासुन्न नहीं कल्प विकल्प ॥
उत्पति बीज यहां से आव ।
स्थिति सृष्टि का रूप दिखावे ॥
ज्यों सुषप्ति का होय उत्थाना ।
सुन्न से त्यों सृष्टि उत्पाना ।
एक सवल है एक है शुद्ध ।
लख पात्र’ कोई ज्ञानी बुद्ध ।
सृष्टि स्थिति लय व्यौहारा ।
तीनों हि समझो बीज पसारा ॥
दोहाकाल चक्र कौतुक महा, जाका आदि न अन्त ।
भूले सुर नर ताहि लख, पाया मूल न तन्त ।
सुन्न के परे काल बरियार ।
भँवरगुफा रहा बैठक मार । ।
ज्यों कुम्हार निज चक्र चलाने ।
गढ़ बासन फिर ताहि नसावे । ।
जैसे सिंध में लहर बूंद जल ।
तैसेहि काल में चल और निश्चल ॥
कभी द्वन्द और कभी निरद्वन्द ।
काल चक्र का फेला फन्द ॥
काल में जीव ब्रह्म लपटाने ।
द्वैत अद्व त में रहे लुभाने । ।
दोहासिन्ध मध्य ज्यों लहर है, बुद बुद नीर तरंग ।
काल चक्र में सब रहे, पाय सुसंग कुसंग ॥
काल चक्र के परे अधार ।
सतपद धुरपद अगम अपार ॥
अधिष्ठान कूटस्थ समाना ।
अहिरन लोह के रूप पिछाना ॥
नहीं वहां एक न दोय न तीना ।
नहीं वहां सिंध तरंग नवीना ॥
नहीं कैत अद्धत का भाव ।
नहीं अज्ञान न ज्ञान का दाव । ।
‘है पद’ सतपद शब्द के योग ।
नहिं वेदान्त न साँख्य न योग । ।
दोहामति न लखे जेहि मति लखे, कुमति सुमति मति नाहिं ।
अनुभव सिद्ध अलख अगम, राधास्वामी माहिं ॥
सहज भेद नं 2
सहज भेद युक्ति चित लावे । ।
जल थल पावक गगन समीरा ।
पंच तत्व से बना शरीरा । ।
पंच तत्व के पंच अस्थान ।
कोई कोई जाने चतुर सुजान ॥
गुदा चक्र में पृथवी बासा ।
इन्द्री में जल करे निवासा ॥
नाभी अग्नि हृदय में पवन ।
कंठ अकास बसे रह मौन ॥
दोहा पाँच चक्र यह तत्व के, बसते पिंड मझार ।
____इन्हें त्याग आगे चले, छटे चक्र के द्वार ॥
छटा चक्र शिव नेत्र कहावे ।
कोई कोई तीजा तिल कह गावे ॥
छटे चक्र में जीव निवासा ।
जीव ब्रह्म संग करे बिलासा ॥
रुद्र नेत्र जीव का धाम ।
तिस पर सहसकमलदल ठाम ।
दोनों मिल एक साथ रहाई ।
इनकी गति कोई बिरला पाई ॥
छटे सातवें चक्र हैं पास ।
जीव ब्रह्म मिल करें निवास ॥
दोहा शब्दयोग साधन करे, रुद्र नेत्र में आय ।
सहजहि सहसकमल में, ब्रह्म की संगत पाय ॥
आगे का सुन लीजो भेद ।
मिटे भरम संशय का खेद ॥
जीव चक्र में चित को जोड़ो ।
पुतली उलट गगन को फोड़ो ॥
श्याम कंज का तिमिर बिनासे ।
तब विराट का रूप प्रकासे । ।
यह साधन अति सुगम सुहेल ।
जीव विराट का समझो मेल ॥
जगमग ज्योति दृष्टि में आवे ।
देख देख मन अति हरखावे ॥
दोहा यह पहला अस्थान है, बिरला भेदी जान ।
विन सतगुरु की दया के, नहीं कोई पावे ज्ञान । ।
जाग्रत स्वप्न सुषप्ति तीन ।
तीन अवस्था जीव के चन्हि । ।
तीन अवस्था के सुन नाम ।
तेजस विश्व प्राज्ञ से काम ॥
जाग्रत विश्व स्वप्न है तेजस ।
सुषुप्ति प्राज्ञ नाम है सह रस ॥
ब्रह्म की तीन अवस्था जान ।
सृष्टि स्थिति प्रलय पिछान ॥
तीन अवस्था नाम हैं तीन ।
जो नहीं जाने मति का हीन ॥
दोहा सृष्टि विराट का नाम है, स्थिति अव्याकृत ।
हिरण्यगर्भ प्रलय दशा, यह अचरजी चरित्र ।
जीव ब्रह्म दोउ एक समान ।
नाम रूप से है बिलगान ।
ब्रह्म महा सर्वज्ञ कहावे ।
जीव नाम अल्पज्ञ का पावे ॥
सिंध मध्य ज्यों बुन्द समाना ।
तैसे हि ब्रह्म जीव अस्थाना ॥
बिलगाये नहीं बिलगें सोई ।
एक साथ दोउ मिल एक होई । ।
जीव रहे माया आधीन ।
मायाधीश ब्रह्म परवीन । ।
दोहाजीव ब्रह्म का भेद यह, सार तत्व का सार ।
बिन विवेक समझे नहीं, फुरे न हृदय विचार ॥
पिंड देश में जीव रहाई ।
देश ब्रह्मड ब्रह्म ठकुराई ।
ब्रह्म जगत त्रिलोकी नामा ।
एक अनेक बीज के धामा ।
जगत अनेक विराट महाना ।
अव्याकृत त्रिकुटी परमाना ॥
हिरण्यगर्भ द्वत अद्वत ।
भेद अगम कोई ज्ञानी देत ।
बीज रूप तुम इसको जानो ।
गुप्त बात सुन मन से मानो ॥
दोहाइष्ट नहीं पद ब्रह्म का, सन्तन किया विचार ।
तीन छोड़ चौथा गहे, तब पाव कुछ सार ॥
सहसबाहु सहसासिर राजा ।
सहसानन बन कौतुक साजा ॥
माल सूत ज्यों मनके रहें ।
त्यों विराट सबको संग गहें ।
यह विराट का रूप है भाई ।
संत मिले तब भेद बताई ॥
अव्याकृत है ओम् का इष्ट ।
समझ न पाव मनुष कनिष्ट ॥
बिन पग चले हाथ बिन कामा ।
नैन बिना देखे सब ठामा ।
दोहा हिरण्यगर्भ अद्वैत पद, है वह एक और दोय ।
__ जैसे बीज के मध्य में, सब रहे आपा खोय ॥
भेदी सुनो भेद की बानी ।
जा से छूटे द्वन्द गलानी ॥
सहसकमलदल जोत निरंजन ।
सो विराट का रूप समझ मन ।
त्रिकुटी में अव्याकृत रहाई ।
प्रणव ॐ की पदवी गहई ॥
हिरण्यगर्भ रहे शून्य मझार ।
बीज रूप सोई अपरम्पार ॥
तीन चक्र यह मस्तक मध्य ।
विन बूझे क्या जाने बद्ध ।
दोहासुन्न के फिर दो भेद हैं, सुन्न महासुन्न जान ।
___यह मस्तिक में गुप्त हैं, कर साधन पहिचान ।
सुन्न देश में है सविकल्प ।
महासुन्न नहीं कल्प विकल्प ॥
उत्पति बीज यहां से आव ।
स्थिति सृष्टि का रूप दिखावे ॥
ज्यों सुषप्ति का होय उत्थाना ।
सुन्न से त्यों सृष्टि उत्पाना ।
एक सवल है एक है शुद्ध ।
लख पात्र’ कोई ज्ञानी बुद्ध ।
सृष्टि स्थिति लय व्यौहारा ।
तीनों हि समझो बीज पसारा ॥
दोहाकाल चक्र कौतुक महा, जाका आदि न अन्त ।
भूले सुर नर ताहि लख, पाया मूल न तन्त ।
सुन्न के परे काल बरियार ।
भँवरगुफा रहा बैठक मार । ।
ज्यों कुम्हार निज चक्र चलाने ।
गढ़ बासन फिर ताहि नसावे । ।
जैसे सिंध में लहर बूंद जल ।
तैसेहि काल में चल और निश्चल ॥
कभी द्वन्द और कभी निरद्वन्द ।
काल चक्र का फेला फन्द ॥
काल में जीव ब्रह्म लपटाने ।
द्वैत अद्व त में रहे लुभाने । ।
दोहासिन्ध मध्य ज्यों लहर है, बुद बुद नीर तरंग ।
काल चक्र में सब रहे, पाय सुसंग कुसंग ॥
काल चक्र के परे अधार ।
सतपद धुरपद अगम अपार ॥
अधिष्ठान कूटस्थ समाना ।
अहिरन लोह के रूप पिछाना ॥
नहीं वहां एक न दोय न तीना ।
नहीं वहां सिंध तरंग नवीना ॥
नहीं कैत अद्धत का भाव ।
नहीं अज्ञान न ज्ञान का दाव । ।
‘है पद’ सतपद शब्द के योग ।
नहिं वेदान्त न साँख्य न योग । ।
दोहामति न लखे जेहि मति लखे, कुमति सुमति मति नाहिं ।
अनुभव सिद्ध अलख अगम, राधास्वामी माहिं ॥
सहज भेद नं 2
×
Song 41 — Hindi
441. सहज सहज की चाले चाल ।
तब समझे गति माया काल ।
शब्द योग की करे कमाई ।
कुछ दिन गुरु संगत लौ लाई ॥
गुरु बिन पावे भक्ति न ज्ञान ।
गुरु बिन हिये न मोह न मान । ।
गुरु बिन सार तत्व क्यों बूझे ।
गुरु मिलें तो सब कुछ सूझे ॥
गुरुमत हो मनमत को त्याग ।
गुरु बिन पंथ के पंथ न लाग ॥
दोहा कबीर निगुरा ना मिले, पापी मिलें हजार ।
एक निगुरे के सीस पर, लख पापी का भार ॥
गुरु वही जो शब्द सनेही ।
गुरु बिन दूसरे और न सेई । ।
लक्ष का लक्ष वाच का वाच ।
गुरु का रूप लख भक्ति में राच । ।
गुरु संगत है सत का संग ।
सत के संग धार सत रंग ॥
गुरु की भक्ति रहे निष्काम ।
धर्म अर्थ मुक्ति सत काम ॥
गुरु से पाव बिना प्रयास ।
ताते कर गुरु दया की आस ॥
दोहागुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान ।
गुरु विन नाम हराम है, जाय पूछो वेद पुरान ।
जब कुछ दिन सतसंग अभ्यास ।
तब गुरुमुख गुरु का निज दास ॥
गुरु हर बैठ सहारा देव ।
चेला बेहद चढ़ सुख लेवे ॥
हद बेहद के परे ठिकाना ।
सत्त लोक सतगुरु अस्थाना ॥
वहां गुरु का पात्र भेद ।
नहीं वहां कथा कतेब न वेद ॥
यहां कथा वहां कथा नहीं है ।
कैसे कोई समझे कथे झूठी है ।
दोहा नहीं कथनी का देश वह, अनुभव गति मन सार ।
सो तो निश्चय पाइये, सतगुरु के उपकार ॥
अकथ अलौकिक अगम कहानी ।
जान अजान सुजान अजानी ॥
नहीं वह सत्त असत्त कहावे ।
बिना कहे क्यों समझ में आये ॥
समझ बूझ की पहुँच से पार ।
समझ बूझ तिस के आधार ॥
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ।
नहीं ऊष्ण और नहीं वह तत ॥
अन्धे हाथी हाथ टटोले ।
कहते निज मन भिन्न भिन्न बोले । ।
दोहासबमें है सबसे पृथक, है नहिं नहिं है सोय ।
गुरु की दया अपार बिन, लख पाव नहीं कोय ॥
अकथ कहन में कैसे आवे ।
बिना कहे कोई क्या बतलाये ॥
सैन बैन की युक्ति न्यारी ।
हद बेहद चढ़ कोई विचारी ॥
नहीं वह बुन्द न सिंध समान ।
नहीं मिलाप गम नहीं अलगान ।
रूप अरूप सरूप बिहीना ।
राव रंक नहीं दीन प्रवीना ॥
जीव न ईश न ब्रह्म न माया ।
नाम अनाम स नाम कहाया । ।
दोहाजीव मुक्त न विदेह है, कसे कहूँ सुझाय ।
राधास्वामी सैन लख, अनुभव में कुछ आय । ।
8 सहज कीर्तन ,
तब समझे गति माया काल ।
शब्द योग की करे कमाई ।
कुछ दिन गुरु संगत लौ लाई ॥
गुरु बिन पावे भक्ति न ज्ञान ।
गुरु बिन हिये न मोह न मान । ।
गुरु बिन सार तत्व क्यों बूझे ।
गुरु मिलें तो सब कुछ सूझे ॥
गुरुमत हो मनमत को त्याग ।
गुरु बिन पंथ के पंथ न लाग ॥
दोहा कबीर निगुरा ना मिले, पापी मिलें हजार ।
एक निगुरे के सीस पर, लख पापी का भार ॥
गुरु वही जो शब्द सनेही ।
गुरु बिन दूसरे और न सेई । ।
लक्ष का लक्ष वाच का वाच ।
गुरु का रूप लख भक्ति में राच । ।
गुरु संगत है सत का संग ।
सत के संग धार सत रंग ॥
गुरु की भक्ति रहे निष्काम ।
धर्म अर्थ मुक्ति सत काम ॥
गुरु से पाव बिना प्रयास ।
ताते कर गुरु दया की आस ॥
दोहागुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान ।
गुरु विन नाम हराम है, जाय पूछो वेद पुरान ।
जब कुछ दिन सतसंग अभ्यास ।
तब गुरुमुख गुरु का निज दास ॥
गुरु हर बैठ सहारा देव ।
चेला बेहद चढ़ सुख लेवे ॥
हद बेहद के परे ठिकाना ।
सत्त लोक सतगुरु अस्थाना ॥
वहां गुरु का पात्र भेद ।
नहीं वहां कथा कतेब न वेद ॥
यहां कथा वहां कथा नहीं है ।
कैसे कोई समझे कथे झूठी है ।
दोहा नहीं कथनी का देश वह, अनुभव गति मन सार ।
सो तो निश्चय पाइये, सतगुरु के उपकार ॥
अकथ अलौकिक अगम कहानी ।
जान अजान सुजान अजानी ॥
नहीं वह सत्त असत्त कहावे ।
बिना कहे क्यों समझ में आये ॥
समझ बूझ की पहुँच से पार ।
समझ बूझ तिस के आधार ॥
नहीं तुरिया नहीं तुरियातीत ।
नहीं ऊष्ण और नहीं वह तत ॥
अन्धे हाथी हाथ टटोले ।
कहते निज मन भिन्न भिन्न बोले । ।
दोहासबमें है सबसे पृथक, है नहिं नहिं है सोय ।
गुरु की दया अपार बिन, लख पाव नहीं कोय ॥
अकथ कहन में कैसे आवे ।
बिना कहे कोई क्या बतलाये ॥
सैन बैन की युक्ति न्यारी ।
हद बेहद चढ़ कोई विचारी ॥
नहीं वह बुन्द न सिंध समान ।
नहीं मिलाप गम नहीं अलगान ।
रूप अरूप सरूप बिहीना ।
राव रंक नहीं दीन प्रवीना ॥
जीव न ईश न ब्रह्म न माया ।
नाम अनाम स नाम कहाया । ।
दोहाजीव मुक्त न विदेह है, कसे कहूँ सुझाय ।
राधास्वामी सैन लख, अनुभव में कुछ आय । ।
8 सहज कीर्तन ,
×
Song 42 — Hindi
442. कथा कीर्तन का व्यवहार ।
सहज करे भवसागर पार ॥
कथा चित्त उत्साह बढ़ाने ।
सत मारग की राह दिखाने ।
जिसका निस दिन कथा का नेम ।
ता संग अवश्य कीजिये प्रेम ॥
नहीं कीर्तन जिसको प्यारा ।
सो तो भरम रहा संसारा ॥
करम बोझ लादे सिर ऊपर ।
जग में जीव ज्यों खर कूकर ॥
दोहाकथा कीर्तन जगत में, उत्तम साधन जान ।
धीरे धीरे सहज में, उपजाव सत ज्ञान ॥
जो नित कथा करे चितलाई ।
बिगड़ी बनत बनत बन जाई । ।
कथा प्रेम प्रतीत की खानी ।
श्रद्धा की जड़ सन्त बखानी ॥
कथा कीर्तन कथा प्रसंग ।
करे जो चढ़े परमारथ रंग ॥
काम कथा से उपजे काम ।
नाम कथा पावे गुरु नाम ॥
एक चौरासी धार बहावे ।
दूजा काई किनारे लावे । ।
दोहाकथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे सनेह ।
जीवन मुक्त गति सोलहे, नहीं यामें संदेह ॥
रस रस सोत से पानी आवे ।
कथा प्रसंग हृदय गुन पावे ॥
कथा दृढ़ावे नाम की आस ।
बिना कथा नर फिरे उदास ।
नहीं प्राप्त जाको सतसंग ।
सो नित धारे कथा प्रसंग ॥
मलिन वासना मन से जावे ।
शुभ इच्छा सहजहि उपजावे ॥
शुभ विचार शुभ इच्छा साथ ।
ज्ञान रतन धन आव हाथ ॥
दोहाकथा ज्ञान की भूमिका, पहिली सीढ़ी जान ।
तिसके पीछे ज्ञान है, साध बचन परमान ॥
कथा कीर्तन कर गुरु संग ।
बिन गुरु निष्फल कथा प्रसंग ॥
कथा कीर्तन जोग अष्टांग ।
और सकल बहु रूप का सांग ॥
गुरु समीप बैठे सोई आसन ।
त्याग ग्रहन यम नियम का साधन ।
गहे बचन सो प्राणायाम ।
सांस सांस ले गुरु का नाम ।
बार बार जो करे विचार ।
सोई जानो प्रत्याहार ॥
धारन करे सोई धारना ।
ध्यान धारना में मन मारना ।
गूढ ध्यान है गूढ़ समाधी ।
कथा कीर्तन मिटे उपाधी । ।
दोहाकथा कीर्तन नित किये, मन बाढ़े गुरु प्रीत ।
प्रीत प्रेम की वृद्धि से, उपजे दृढ़ परतीत ॥
कथा कीर्तन जो नहीं करे ।
बहु दुख व्यापे दुख में मरे ।
नित प्रति कथा कीर्तन करना ।
प्रीत प्रेम चित बासन भरना । ।
कथा कीर्तन सबका सार ।
सहज जनम का होय सुधार ।
पढ़े सुने जो नित गुरु बानी ।
बने विवेकी साधु ज्ञानी ।
कथा कीर्तन नहीं कठिनाई ।
सहज सहज में होय भलाई । ।
दोहाराधास्वामी की या, कर गुरु का सतसंग ।
कथा कीर्तन संग गुरु, फिर नहीं चित हो भंग ।
सहज गुरु विचार
443. राधास्वामी पद में कोटि प्रणाम ।
राधास्वामी राधास्वामी धारा नाम ।
गुरु स्वरूप धर जग प्रगटाने ।
निजपद अपना आप बखाने ।
राधास्वामी द्वन्द का फंद कटाया ।
चार खान के पार लगाया ।
आप आप में आप दिखाया ।
आप आप को आप लखाया । ।
‘मैं छुड़ाय ‘तू’ में ठहराया ।
‘मैं’ ‘तू’ का फिर भेद मिटाया ।
दोहा भली भई जो गुरु मिले, मन का भरम नसान ।
मन का भरम है फन्द जम, चार योनि की खान ।
गुरु समुद्र सिख बुन्द समान ।
गुरु में लाभ बिना गुरु हान । ।
हानि लाभ का संशय मेटा ।
मोर तोर का सिर किया हेटा ॥
राधास्वामी धर कुम्हार का भेस ।
घड़ सिख कुम्भ दिया उपदेश ।
घड़ धड़ मन के खोट निकारे ।
वचन चोट दे ताहि संवारे ॥
माटी ले जब कुम्भ सजाया ।
वस्तु विचित्र अपार बनाया । ।
दोहा धर्म दया श्रद्धा क्षमा, प्रेम प्रतीत पियार ।
राधासामी की दया, चित्त पात्र लिया धार ॥
गुरु का निरख आँख और माथा ।
सत का नूर रहे जिस साथा । ।
अस चिन्ह देख करे पहिचान ।
जाके मन सतगुरु का ज्ञान ॥
अन्धा काना ऐंचा तान ।
आँख दोष यह ले पहिचान ॥
सिमटा माथा कुबुद्धि निशानी ।
ऐसे गुरु के संग में हानी ॥
द्रोह ईर्षा द्वेष की खान ।
समझ बूझ गुरु संगत ठान ॥
दोहा पानी पीजिये छानकर, गुरु को कीजे जान ।
यह लक्षण गुरु रूप का, सन्तन किया बखान ।
शब्द भेद के मरम को जाने ।
सन्त मता का सार बखाने ।
परिचय देवे सैन बुझाये ।
बचन प्रभाव युक्त समझावे ॥
माँग ताँग नहीं व्यवहार ।
ऐसे गुरु से सहज सुधार ॥
ममता नहिं नहिं मन हंकार ।
केवल परमारथ आधार ॥
अन्तर मुखी सिखाने साधन ।
परिचय दे कराने निध्यासन ॥
दोहा ऐसे गुरु के संग से, लाभ होय ततकाल ।
माया का संकट कटे, अन्तर जीव निहाल ॥
गुरु के पद जब हो परतीती ।
तब तो सीख शब्द मति रीती ॥
सुमिरन भजन ध्यान लौ लाई ।
कर अन्तर घट सहज चढ़ाई ॥
घट चढ़ गुरु की गति मति देख ।
निरख परख लख अगम अलेख ॥
सहज जोग थोड़े दिन साध ।
मेट द्वन्द के कठिन उपाध ॥
सहज जोग सहज है युक्ति ।
साधन कर ले जीवन मुक्ति ।
दोहा राधास्वामी की दया, कमल नीर व्यवहार ।
जग में रह जग करम कर, नहीं व्यापे संसार ।
सहज शब्दार्थ
सहज करे भवसागर पार ॥
कथा चित्त उत्साह बढ़ाने ।
सत मारग की राह दिखाने ।
जिसका निस दिन कथा का नेम ।
ता संग अवश्य कीजिये प्रेम ॥
नहीं कीर्तन जिसको प्यारा ।
सो तो भरम रहा संसारा ॥
करम बोझ लादे सिर ऊपर ।
जग में जीव ज्यों खर कूकर ॥
दोहाकथा कीर्तन जगत में, उत्तम साधन जान ।
धीरे धीरे सहज में, उपजाव सत ज्ञान ॥
जो नित कथा करे चितलाई ।
बिगड़ी बनत बनत बन जाई । ।
कथा प्रेम प्रतीत की खानी ।
श्रद्धा की जड़ सन्त बखानी ॥
कथा कीर्तन कथा प्रसंग ।
करे जो चढ़े परमारथ रंग ॥
काम कथा से उपजे काम ।
नाम कथा पावे गुरु नाम ॥
एक चौरासी धार बहावे ।
दूजा काई किनारे लावे । ।
दोहाकथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे सनेह ।
जीवन मुक्त गति सोलहे, नहीं यामें संदेह ॥
रस रस सोत से पानी आवे ।
कथा प्रसंग हृदय गुन पावे ॥
कथा दृढ़ावे नाम की आस ।
बिना कथा नर फिरे उदास ।
नहीं प्राप्त जाको सतसंग ।
सो नित धारे कथा प्रसंग ॥
मलिन वासना मन से जावे ।
शुभ इच्छा सहजहि उपजावे ॥
शुभ विचार शुभ इच्छा साथ ।
ज्ञान रतन धन आव हाथ ॥
दोहाकथा ज्ञान की भूमिका, पहिली सीढ़ी जान ।
तिसके पीछे ज्ञान है, साध बचन परमान ॥
कथा कीर्तन कर गुरु संग ।
बिन गुरु निष्फल कथा प्रसंग ॥
कथा कीर्तन जोग अष्टांग ।
और सकल बहु रूप का सांग ॥
गुरु समीप बैठे सोई आसन ।
त्याग ग्रहन यम नियम का साधन ।
गहे बचन सो प्राणायाम ।
सांस सांस ले गुरु का नाम ।
बार बार जो करे विचार ।
सोई जानो प्रत्याहार ॥
धारन करे सोई धारना ।
ध्यान धारना में मन मारना ।
गूढ ध्यान है गूढ़ समाधी ।
कथा कीर्तन मिटे उपाधी । ।
दोहाकथा कीर्तन नित किये, मन बाढ़े गुरु प्रीत ।
प्रीत प्रेम की वृद्धि से, उपजे दृढ़ परतीत ॥
कथा कीर्तन जो नहीं करे ।
बहु दुख व्यापे दुख में मरे ।
नित प्रति कथा कीर्तन करना ।
प्रीत प्रेम चित बासन भरना । ।
कथा कीर्तन सबका सार ।
सहज जनम का होय सुधार ।
पढ़े सुने जो नित गुरु बानी ।
बने विवेकी साधु ज्ञानी ।
कथा कीर्तन नहीं कठिनाई ।
सहज सहज में होय भलाई । ।
दोहाराधास्वामी की या, कर गुरु का सतसंग ।
कथा कीर्तन संग गुरु, फिर नहीं चित हो भंग ।
सहज गुरु विचार
443. राधास्वामी पद में कोटि प्रणाम ।
राधास्वामी राधास्वामी धारा नाम ।
गुरु स्वरूप धर जग प्रगटाने ।
निजपद अपना आप बखाने ।
राधास्वामी द्वन्द का फंद कटाया ।
चार खान के पार लगाया ।
आप आप में आप दिखाया ।
आप आप को आप लखाया । ।
‘मैं छुड़ाय ‘तू’ में ठहराया ।
‘मैं’ ‘तू’ का फिर भेद मिटाया ।
दोहा भली भई जो गुरु मिले, मन का भरम नसान ।
मन का भरम है फन्द जम, चार योनि की खान ।
गुरु समुद्र सिख बुन्द समान ।
गुरु में लाभ बिना गुरु हान । ।
हानि लाभ का संशय मेटा ।
मोर तोर का सिर किया हेटा ॥
राधास्वामी धर कुम्हार का भेस ।
घड़ सिख कुम्भ दिया उपदेश ।
घड़ धड़ मन के खोट निकारे ।
वचन चोट दे ताहि संवारे ॥
माटी ले जब कुम्भ सजाया ।
वस्तु विचित्र अपार बनाया । ।
दोहा धर्म दया श्रद्धा क्षमा, प्रेम प्रतीत पियार ।
राधासामी की दया, चित्त पात्र लिया धार ॥
गुरु का निरख आँख और माथा ।
सत का नूर रहे जिस साथा । ।
अस चिन्ह देख करे पहिचान ।
जाके मन सतगुरु का ज्ञान ॥
अन्धा काना ऐंचा तान ।
आँख दोष यह ले पहिचान ॥
सिमटा माथा कुबुद्धि निशानी ।
ऐसे गुरु के संग में हानी ॥
द्रोह ईर्षा द्वेष की खान ।
समझ बूझ गुरु संगत ठान ॥
दोहा पानी पीजिये छानकर, गुरु को कीजे जान ।
यह लक्षण गुरु रूप का, सन्तन किया बखान ।
शब्द भेद के मरम को जाने ।
सन्त मता का सार बखाने ।
परिचय देवे सैन बुझाये ।
बचन प्रभाव युक्त समझावे ॥
माँग ताँग नहीं व्यवहार ।
ऐसे गुरु से सहज सुधार ॥
ममता नहिं नहिं मन हंकार ।
केवल परमारथ आधार ॥
अन्तर मुखी सिखाने साधन ।
परिचय दे कराने निध्यासन ॥
दोहा ऐसे गुरु के संग से, लाभ होय ततकाल ।
माया का संकट कटे, अन्तर जीव निहाल ॥
गुरु के पद जब हो परतीती ।
तब तो सीख शब्द मति रीती ॥
सुमिरन भजन ध्यान लौ लाई ।
कर अन्तर घट सहज चढ़ाई ॥
घट चढ़ गुरु की गति मति देख ।
निरख परख लख अगम अलेख ॥
सहज जोग थोड़े दिन साध ।
मेट द्वन्द के कठिन उपाध ॥
सहज जोग सहज है युक्ति ।
साधन कर ले जीवन मुक्ति ।
दोहा राधास्वामी की दया, कमल नीर व्यवहार ।
जग में रह जग करम कर, नहीं व्यापे संसार ।
सहज शब्दार्थ
×
Song 43 — Hindi
444. जैसे सहज संत का पन्थ ।
तैसे उनके सहज है ग्रन्थ । ।
सहज बात और सहजहि बानी ।
सहज ज्ञान और सहज अनुमानी ॥
साधारण वार्ता विलाप ।
साधारण गत और अलाप ॥
खींच तान नहीं तोड़ मरोड़ ।
नहीं कहीं जोड़ नहीं कहीं तोड़ ॥
जैसा शब्द वैसा ही अर्थ ।
अर्थ का कभी न करें अनर्थ ॥
दोहा शब्द अर्थ के बीच में, नहीं युक्ति नहीं दाव ।
जो बोल सो सरल है, सरल स्वभाव उपाय । ।
सतसंग कहिये सत्त का संग ।
सत जीवन और संग प्रसंग । ।
सत जीवन कहिये गुरु देव ।
तिन का संग करो निर भेव ॥
सत का अर्थ जो दजा हो ।
भरम फांस में फंस कर मरे ॥
बिन सत संग विवेक न आवे ।
बचन बिना कोई क्या समझाने ।
जीवन गुरु के संग में जाय ।
सुन गुन बचन के जनम बनाय ॥
दोहा यह सतसंग का अर्थ है, नहीं सो कथा विलाप ।
सत जीवन के मेल को, कहिये सहज मिलाप । ।
उप है निकट और आसन बैठना ।
नहीं वह कर्म धर्म में ऐंठना ॥
यह उपासना का सिद्धांत ।
निकट बैठ मन को कर शान्त । ।
प्रश्न पूछ कर उत्तर लीजे ।
उत्तर सुन चित उसको दीजे । ।
और उपासना का अर्थ बताय ।
सरल जीव को भरम फंसाय ॥
भर्म फंसाय जनम को नाशे ।
समझ पड़े नहीं भर्म न आशे ॥
___ दोहा नहीं उपासना और कोई, कहिये तहिं सतसंग ।
गुरु समीप आसन करे, धारे गुरु का रंग ॥
उप है निकट देस अस्थाना ।
यह उपदेश का अर्थ बखाना ॥
सहज योग की करे कमाई ।
गुरु गम लहे देश बदलाई ॥
तीन देश में पिंड मझार ।
काया काल दयाल विचार ॥
काया पिंड देश है भाई ।
काल देश ब्रह्मांड कहाई ॥
देश दयाल काल के परे ।
चेतन शुद्ध का निर्णय करे ॥
दोहा यह उपदेश का अर्थ है, सुन लीजे सब कोय ।
देश न बदले सुरत के, परमारथ नहीं होय ॥
बृः बढ़ना और मनन मन ।
सोचे बढ़े “ब्रह्मतेहि भिन ॥
सोचे बढ़े सो ब्रह्म कहाने ।
यही अर्थ सन्तन को भाव । ।
ब्रह्म अधिष्ठित अचल न होई ।
नाम अर्थ भेद कहो सोई ॥
ब्रह्मांडी मन सोई ब्रह्म ।
जो समझे मन रहे न भर्म ॥
अ उ म ओंकार सो जाना ।
सतरज तम का रूप पिछान ॥
दोहा ब्रह्म भेद निर्णय किया, चित में आने मान ।
माने कसे जीव यह, जब लग अर्थ न जान ॥
परब्रह्म है परे का ब्रह्म ।
शुद्ध सतोगुन का लख मर्म ।
महाकाल की गति मति सोई ।
ब्रह्म में गति मति दोनों होई । ।
गति है चाल मति है बुद्धि ।
सोच समझ कर मनकी शुद्धि ।
ब्रह्म न परब्रह्म है इष्ट ।
इनको जान के हो न कनिष्ट ॥
ऊँचा इष्ट सन्त मत का ये ।
कर सतसंग तो समझे आशे ।
दोहा सतपद धुरपद इष्ट है, शब्द योग कर जान ।
___ऊंचे चढ़ सत धाम ले, सार तत्व पहिचान ॥
जीव जो जीवन की करे आशा ।
ईश ब्रह्म निज भाव प्रकाशा ।
जीव पिंड धारी अल्पज्ञ ।
दृष्टि ब्रह्मांड से वह सर्वज्ञ ॥
जीव ब्रह्म का इतना भेद ।
नहीं तो दोनों रहें अभेद ॥
यहां जाग्रत और स्वप्न सुषुप्ति ।
वहां प्रलय सृष्टि और स्थिति ॥
तेजस विश्व प्राज्ञ है जीव ।
तीनहि नाम ब्रह्म लख पीव ॥
सोरठा अन्तरर्यामी विराट, हिरण्यगर्भ यह ब्रह्म है ।
लख कर इनका ठाठ, जीव ब्रह्म का भेद भिन्न ॥
‘मा’ है माप और ‘या’ है यंत्र ।
यह माया का अर्थ स्वतन्त्र ॥
यंत्र से जो सब वस्तु को मापे ।
माया भेद संत यह थापे ।
माया और नहीं वह बुद्धि ।
यह व्यष्टि रहे वहां समष्टि ।
नहीं वह हुई नहीं अनहुई ।
व्यक्त अव्यक्त के रूप है सोई ॥
ब्रह्म के साथ शक्ति बन रहे ।
जीव के संग बुद्धि सब कहे ॥
दोहा माया का यह अर्थ है, सन्तमता के भाव ।
कर सतसंग विवेक से, तब मन आवे दाव ॥
गुरु महिमा
तैसे उनके सहज है ग्रन्थ । ।
सहज बात और सहजहि बानी ।
सहज ज्ञान और सहज अनुमानी ॥
साधारण वार्ता विलाप ।
साधारण गत और अलाप ॥
खींच तान नहीं तोड़ मरोड़ ।
नहीं कहीं जोड़ नहीं कहीं तोड़ ॥
जैसा शब्द वैसा ही अर्थ ।
अर्थ का कभी न करें अनर्थ ॥
दोहा शब्द अर्थ के बीच में, नहीं युक्ति नहीं दाव ।
जो बोल सो सरल है, सरल स्वभाव उपाय । ।
सतसंग कहिये सत्त का संग ।
सत जीवन और संग प्रसंग । ।
सत जीवन कहिये गुरु देव ।
तिन का संग करो निर भेव ॥
सत का अर्थ जो दजा हो ।
भरम फांस में फंस कर मरे ॥
बिन सत संग विवेक न आवे ।
बचन बिना कोई क्या समझाने ।
जीवन गुरु के संग में जाय ।
सुन गुन बचन के जनम बनाय ॥
दोहा यह सतसंग का अर्थ है, नहीं सो कथा विलाप ।
सत जीवन के मेल को, कहिये सहज मिलाप । ।
उप है निकट और आसन बैठना ।
नहीं वह कर्म धर्म में ऐंठना ॥
यह उपासना का सिद्धांत ।
निकट बैठ मन को कर शान्त । ।
प्रश्न पूछ कर उत्तर लीजे ।
उत्तर सुन चित उसको दीजे । ।
और उपासना का अर्थ बताय ।
सरल जीव को भरम फंसाय ॥
भर्म फंसाय जनम को नाशे ।
समझ पड़े नहीं भर्म न आशे ॥
___ दोहा नहीं उपासना और कोई, कहिये तहिं सतसंग ।
गुरु समीप आसन करे, धारे गुरु का रंग ॥
उप है निकट देस अस्थाना ।
यह उपदेश का अर्थ बखाना ॥
सहज योग की करे कमाई ।
गुरु गम लहे देश बदलाई ॥
तीन देश में पिंड मझार ।
काया काल दयाल विचार ॥
काया पिंड देश है भाई ।
काल देश ब्रह्मांड कहाई ॥
देश दयाल काल के परे ।
चेतन शुद्ध का निर्णय करे ॥
दोहा यह उपदेश का अर्थ है, सुन लीजे सब कोय ।
देश न बदले सुरत के, परमारथ नहीं होय ॥
बृः बढ़ना और मनन मन ।
सोचे बढ़े “ब्रह्मतेहि भिन ॥
सोचे बढ़े सो ब्रह्म कहाने ।
यही अर्थ सन्तन को भाव । ।
ब्रह्म अधिष्ठित अचल न होई ।
नाम अर्थ भेद कहो सोई ॥
ब्रह्मांडी मन सोई ब्रह्म ।
जो समझे मन रहे न भर्म ॥
अ उ म ओंकार सो जाना ।
सतरज तम का रूप पिछान ॥
दोहा ब्रह्म भेद निर्णय किया, चित में आने मान ।
माने कसे जीव यह, जब लग अर्थ न जान ॥
परब्रह्म है परे का ब्रह्म ।
शुद्ध सतोगुन का लख मर्म ।
महाकाल की गति मति सोई ।
ब्रह्म में गति मति दोनों होई । ।
गति है चाल मति है बुद्धि ।
सोच समझ कर मनकी शुद्धि ।
ब्रह्म न परब्रह्म है इष्ट ।
इनको जान के हो न कनिष्ट ॥
ऊँचा इष्ट सन्त मत का ये ।
कर सतसंग तो समझे आशे ।
दोहा सतपद धुरपद इष्ट है, शब्द योग कर जान ।
___ऊंचे चढ़ सत धाम ले, सार तत्व पहिचान ॥
जीव जो जीवन की करे आशा ।
ईश ब्रह्म निज भाव प्रकाशा ।
जीव पिंड धारी अल्पज्ञ ।
दृष्टि ब्रह्मांड से वह सर्वज्ञ ॥
जीव ब्रह्म का इतना भेद ।
नहीं तो दोनों रहें अभेद ॥
यहां जाग्रत और स्वप्न सुषुप्ति ।
वहां प्रलय सृष्टि और स्थिति ॥
तेजस विश्व प्राज्ञ है जीव ।
तीनहि नाम ब्रह्म लख पीव ॥
सोरठा अन्तरर्यामी विराट, हिरण्यगर्भ यह ब्रह्म है ।
लख कर इनका ठाठ, जीव ब्रह्म का भेद भिन्न ॥
‘मा’ है माप और ‘या’ है यंत्र ।
यह माया का अर्थ स्वतन्त्र ॥
यंत्र से जो सब वस्तु को मापे ।
माया भेद संत यह थापे ।
माया और नहीं वह बुद्धि ।
यह व्यष्टि रहे वहां समष्टि ।
नहीं वह हुई नहीं अनहुई ।
व्यक्त अव्यक्त के रूप है सोई ॥
ब्रह्म के साथ शक्ति बन रहे ।
जीव के संग बुद्धि सब कहे ॥
दोहा माया का यह अर्थ है, सन्तमता के भाव ।
कर सतसंग विवेक से, तब मन आवे दाव ॥
गुरु महिमा
×
Song 44 — Hindi
445. गुरु पूजो गुरु पुजवाओ ।
गुरु बिन कोई देव न ध्याओ ॥
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
गुरु शेष धनेश गणेशा ॥
262. गुरु ब्रह्म सच्चिदानन्दम ।
गुरु व्यापक अमित अखंडम ॥
गुरु परब्रह्म अविनाशी ।
गुरु सबके घट घट बासी ।
गुरु परम तत्व परमाना ।
गुरु ज्ञानी ज्ञाता ज्ञाना ।
गुरु का दरस आंख से कीजे ।
गुरु के चरणों में चित दीजे ॥
गुरु सुमिरो दिन और राती ।
गुरु मेट सब भव उत्पाती ।
गुरु रूप से प्रेम बढ़ाना गुरु आगे नित सीस झुकाना ॥
गुरु पर तन मन धन अर्पण ।
गुरु पद सब करो समर्पन ।
गुरु भक्ति सबका सारा ।
गुरु अस्तुति कर करो बिचारा ॥
गुरु ही गुरु निसदिन भजना ।
गुरुमुखता गुरु से लेना ॥
गुरु की महिमा है भारी ।
गुरु जगजीवन हितकारी ॥
गरु प्रेम अमी मतवाले ।
नहीं पड़ें काल के पाले ॥
गरु संगत में नित जाओ ।
गुरु से परमारथ पाओ ॥
गुरु बिन नहीं करम न धरमा ।
गरु बिन नहीं भक्ति का मरमा ।
दोहाजो रांचे गुरु रूप पर, दुख न सहे संसार ।
राधास्वामी नाम ले, उतरे भव जल पार ॥
गुरु बिन कोई देव न ध्याओ ॥
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
गुरु शेष धनेश गणेशा ॥
262. गुरु ब्रह्म सच्चिदानन्दम ।
गुरु व्यापक अमित अखंडम ॥
गुरु परब्रह्म अविनाशी ।
गुरु सबके घट घट बासी ।
गुरु परम तत्व परमाना ।
गुरु ज्ञानी ज्ञाता ज्ञाना ।
गुरु का दरस आंख से कीजे ।
गुरु के चरणों में चित दीजे ॥
गुरु सुमिरो दिन और राती ।
गुरु मेट सब भव उत्पाती ।
गुरु रूप से प्रेम बढ़ाना गुरु आगे नित सीस झुकाना ॥
गुरु पर तन मन धन अर्पण ।
गुरु पद सब करो समर्पन ।
गुरु भक्ति सबका सारा ।
गुरु अस्तुति कर करो बिचारा ॥
गुरु ही गुरु निसदिन भजना ।
गुरुमुखता गुरु से लेना ॥
गुरु की महिमा है भारी ।
गुरु जगजीवन हितकारी ॥
गरु प्रेम अमी मतवाले ।
नहीं पड़ें काल के पाले ॥
गरु संगत में नित जाओ ।
गुरु से परमारथ पाओ ॥
गुरु बिन नहीं करम न धरमा ।
गरु बिन नहीं भक्ति का मरमा ।
दोहाजो रांचे गुरु रूप पर, दुख न सहे संसार ।
राधास्वामी नाम ले, उतरे भव जल पार ॥
×
Song 45 — Hindi
446 सुरत है पात्र शब्द है धार ।
सुरत शब्द के है आधार ।
ज्यों बासन में जल ठहराय ।
शब्द सुरत में रहा समाय ॥
अंधी सुरत शब्द बिन जान ।
शब्द सुरत की जान और प्रान ॥
शब्द प्रेम सुरत शब्द की प्रेमी ।
शब्द नेम सुरत शब्द की नेमी ।
शिव शक्ति का ज्यों व्यवहार ।
सुरत शब्द संग करे बिहार । ।
विष्णु लक्ष्मी दोउ मिल एक ।
सुरत शब्द त्यों नहीं अनेक । ।
ब्रह्मा शब्द सुरत गायत्री ।
ऋषि सत शब्द सुरत सावित्री । ।
शब्द नाद घट करे पुकार ।
सुरत सुने चित वृत्ती धार ॥
सुरत स्मृति आस विश्वासा ।
शब्द है निश्चय त्रिमल प्रकाशा ॥
जग जग जो नहीं चहे त्रास ।
कर घट सुरत शब्द अभ्यास ॥
सुरत शब्द का आतम जोग ।
सुरत दुखी लख शब्द वियोग । ।
सुरत शब्द की जग में रचना ।
सुरत शब्द बिन बीन न बजना ॥
प्रगटे शब्द जो लिंगाकार ।
अर्घ बन सुरत सहित विचार । ।
संतन सुरत शब्द मत गाया ।
जो माना तेहि पार लगाया ।
सुरत शब्द की अकथ कहानी ।
सुरत शब्द मिल ही निर्बानी ॥
दोहासुरत साध कर शब्द सुन, अन्तर बाहर दोय ।
राधास्वामी की दया, नहीं भरमावे कोय ॥
सुरत शब्द के है आधार ।
ज्यों बासन में जल ठहराय ।
शब्द सुरत में रहा समाय ॥
अंधी सुरत शब्द बिन जान ।
शब्द सुरत की जान और प्रान ॥
शब्द प्रेम सुरत शब्द की प्रेमी ।
शब्द नेम सुरत शब्द की नेमी ।
शिव शक्ति का ज्यों व्यवहार ।
सुरत शब्द संग करे बिहार । ।
विष्णु लक्ष्मी दोउ मिल एक ।
सुरत शब्द त्यों नहीं अनेक । ।
ब्रह्मा शब्द सुरत गायत्री ।
ऋषि सत शब्द सुरत सावित्री । ।
शब्द नाद घट करे पुकार ।
सुरत सुने चित वृत्ती धार ॥
सुरत स्मृति आस विश्वासा ।
शब्द है निश्चय त्रिमल प्रकाशा ॥
जग जग जो नहीं चहे त्रास ।
कर घट सुरत शब्द अभ्यास ॥
सुरत शब्द का आतम जोग ।
सुरत दुखी लख शब्द वियोग । ।
सुरत शब्द की जग में रचना ।
सुरत शब्द बिन बीन न बजना ॥
प्रगटे शब्द जो लिंगाकार ।
अर्घ बन सुरत सहित विचार । ।
संतन सुरत शब्द मत गाया ।
जो माना तेहि पार लगाया ।
सुरत शब्द की अकथ कहानी ।
सुरत शब्द मिल ही निर्बानी ॥
दोहासुरत साध कर शब्द सुन, अन्तर बाहर दोय ।
राधास्वामी की दया, नहीं भरमावे कोय ॥
×
Song 46 — Hindi
447. शब्द अपार शब्द है पार ।
शब्द का नहीं है वारापार ॥
शब्द की महिमा कही न जाय ।
शब्दहि मारे शब्द जिलाय ॥
शब्द की जग में सारी रचना ।
शब्द राग धुन शब्दहि वचना ।
शब्द से सब होते व्यवहार ।
शब्द है परमारथ का सार ।
शब्द ब्रह्म और माया शब्द ।
शब्द जोति और छाया शब्द ।
शिव है शब्द शब्द है शक्ति ।
शब्द ज्ञान और शब्द है भक्ति ।
धरम करम सब शब्दहि शब्द ।
मरम भरम सब शब्दहि शब्द ॥
शब्द है गन और शब्द अगन है ।
शब्द त्रिकुटी शब्दहि सुन्न है ।
शब्द औषधी शब्द है रोग ।
शब्द बियोग शब्द है योग ।
शब्द समझ और बूझ है शब्द ।
बुद्धि शब्द और सूझ है शब्द ॥
शब्दर्हि बन्धन शब्दहि मुक्ति ।
शब्द उपाय शब्द है नीति ॥
शब्द करे सबका निरवार ।
शब्द फसावे भव मझार ॥
शब्द की समझ बूझ तब आवे ।
शब्द गुरु जब चरन लगावे ॥
बिना शब्द निष्फल सब काम ।
शब्द से मिले परम पद धाम ॥
शब्द सिंध और शब्द है मीन ।
शब्द सबल और शब्द दीन ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया ।
शब्द योग की रीत सिखाया ।
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, ले सतगरु का नाम ।
जीते जी इस जनम में, चढ़ राधास्वामी धाम ॥
शब्द का नहीं है वारापार ॥
शब्द की महिमा कही न जाय ।
शब्दहि मारे शब्द जिलाय ॥
शब्द की जग में सारी रचना ।
शब्द राग धुन शब्दहि वचना ।
शब्द से सब होते व्यवहार ।
शब्द है परमारथ का सार ।
शब्द ब्रह्म और माया शब्द ।
शब्द जोति और छाया शब्द ।
शिव है शब्द शब्द है शक्ति ।
शब्द ज्ञान और शब्द है भक्ति ।
धरम करम सब शब्दहि शब्द ।
मरम भरम सब शब्दहि शब्द ॥
शब्द है गन और शब्द अगन है ।
शब्द त्रिकुटी शब्दहि सुन्न है ।
शब्द औषधी शब्द है रोग ।
शब्द बियोग शब्द है योग ।
शब्द समझ और बूझ है शब्द ।
बुद्धि शब्द और सूझ है शब्द ॥
शब्दर्हि बन्धन शब्दहि मुक्ति ।
शब्द उपाय शब्द है नीति ॥
शब्द करे सबका निरवार ।
शब्द फसावे भव मझार ॥
शब्द की समझ बूझ तब आवे ।
शब्द गुरु जब चरन लगावे ॥
बिना शब्द निष्फल सब काम ।
शब्द से मिले परम पद धाम ॥
शब्द सिंध और शब्द है मीन ।
शब्द सबल और शब्द दीन ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया ।
शब्द योग की रीत सिखाया ।
दोहा शब्द सुरत एक अंग कर, ले सतगरु का नाम ।
जीते जी इस जनम में, चढ़ राधास्वामी धाम ॥
×
Song 47 — Hindi
448. ले सतगुरु से नाम की भीख ।
सुरत शब्द का साधन सीख ॥
तिल को फोड़ सहसदल आयो ।
फिर त्रिकुटी ओंकार को पाओ ॥
त्रिकुटी ऊपर सुन्न अस्थान ।
नहीं मंडली शोभा मान ।
मानसरोवर कर स्नान ।
होकर शुद्ध ले गुरु का ज्ञान ।
गंग जमन सरस्वती की धारा ।
अन्तर लख हो देह से न्यारा ॥
महासुन्न पर आसन मार ।
सहज समाध का कर व्यवहार ॥
कुछ दिन सुन्न समाध अवस्था ।
भवरगुफा की देख व्यवस्था ।
सोहंग धुन सोहंग गति जान ।
फिर आगे का साधो ज्ञान ॥
आगे अलख अगम मैदाना ।
अद्भुत ग्राम अद्भुत थाना ।
लख लख अलख अगम की गम ले ।
फिर राधास्वामी को चित दे ।
यही सुन्न का है निज ठाम ।
सुरत शब्द में ले विश्राम । ।
दोहा राधास्वामी योग कर, शब्द सुरत व्यवहार ।
शब्द सुरत मिल एक जब, तब माया रहे हार । ।
दोहे ॐ
सुरत शब्द का साधन सीख ॥
तिल को फोड़ सहसदल आयो ।
फिर त्रिकुटी ओंकार को पाओ ॥
त्रिकुटी ऊपर सुन्न अस्थान ।
नहीं मंडली शोभा मान ।
मानसरोवर कर स्नान ।
होकर शुद्ध ले गुरु का ज्ञान ।
गंग जमन सरस्वती की धारा ।
अन्तर लख हो देह से न्यारा ॥
महासुन्न पर आसन मार ।
सहज समाध का कर व्यवहार ॥
कुछ दिन सुन्न समाध अवस्था ।
भवरगुफा की देख व्यवस्था ।
सोहंग धुन सोहंग गति जान ।
फिर आगे का साधो ज्ञान ॥
आगे अलख अगम मैदाना ।
अद्भुत ग्राम अद्भुत थाना ।
लख लख अलख अगम की गम ले ।
फिर राधास्वामी को चित दे ।
यही सुन्न का है निज ठाम ।
सुरत शब्द में ले विश्राम । ।
दोहा राधास्वामी योग कर, शब्द सुरत व्यवहार ।
शब्द सुरत मिल एक जब, तब माया रहे हार । ।
दोहे ॐ
×
Song 48 — Hindi
449. आज्ञाकारी दास मैं, नहीं ममता अभिमान ।
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, त्याग मोह मद मान ॥1 ॥
वह स्वामी मैं दास हूँ, जहां भेजे तहां जाउँ ।
हर्ष शोक में सम सदा, ले सतगुरु का नाउँ ॥2 ॥
जो चाहे सो करे वह, करता धरता वह ।
मुझको दुख व्यापे नहीं, दुख का हरता वह ॥3 ॥
काला पानी क्यों गहे, क्यों नहीं सागर क्षीर ।
परख मौज कर बन्दगी, सेवक धीर गम्भीर ॥4 ॥
जहां चाहे गुरु हैं वहां, करे तहां सतसंग ।
प्रेम भाव जो मन बसे, कबहुँ न हो चित भंग ॥5 ॥
धीरज धरकर जतन कर, व्याकुल चित्त न होय ।
कुछ दिन के अभ्यास से, बदले मन ढंग सोय ॥6 ॥
जग में आया क्या भया, नहीं होनी है तोर ।
कर प्रार्थना हृदय में, फिर आवेगा ठौर ॥7 ॥
दया की आस भरोस कर, आस भाव चित धार ।
आस भाव है दास का, दास मौज आधार ॥8 ॥
राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाव ।
राधास्वामी सुमिर नित, पाव अपार स्वभाव ॥6 ॥
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, त्याग मोह मद मान ॥1 ॥
वह स्वामी मैं दास हूँ, जहां भेजे तहां जाउँ ।
हर्ष शोक में सम सदा, ले सतगुरु का नाउँ ॥2 ॥
जो चाहे सो करे वह, करता धरता वह ।
मुझको दुख व्यापे नहीं, दुख का हरता वह ॥3 ॥
काला पानी क्यों गहे, क्यों नहीं सागर क्षीर ।
परख मौज कर बन्दगी, सेवक धीर गम्भीर ॥4 ॥
जहां चाहे गुरु हैं वहां, करे तहां सतसंग ।
प्रेम भाव जो मन बसे, कबहुँ न हो चित भंग ॥5 ॥
धीरज धरकर जतन कर, व्याकुल चित्त न होय ।
कुछ दिन के अभ्यास से, बदले मन ढंग सोय ॥6 ॥
जग में आया क्या भया, नहीं होनी है तोर ।
कर प्रार्थना हृदय में, फिर आवेगा ठौर ॥7 ॥
दया की आस भरोस कर, आस भाव चित धार ।
आस भाव है दास का, दास मौज आधार ॥8 ॥
राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाव ।
राधास्वामी सुमिर नित, पाव अपार स्वभाव ॥6 ॥
×
Song 49 — Hindi
450. सुख का जीवन पाय कर, मन का भया मलीन ।
हसी आवे मोहि देखकर, जल में प्यासी मीन ॥1 ॥
मानुष तन जब मिल गया; सो सुर दुर्लभ जान ।
साधन सहज उपाय ते, लह सुख भक्ति सुज्ञान ॥2 ॥
सत के संग में बैठकर, सुन सतसंग के बैन ।
योग युक्ति गुरु भक्ति का, तब पायेगा नैन ॥3 ॥
बिन सतसंग विवेक नहिं, बिन विवेक नहिं ज्ञान ।
बिन गुरु सतसंगत नहीं, गुरु सत रूप पिछान ॥4 ॥
सतसंगत अभ्यास दोऊ, नर का जनम बनाय ।
राधास्वामी नाम ले, सोई सहज उपाय ॥5 ॥
हसी आवे मोहि देखकर, जल में प्यासी मीन ॥1 ॥
मानुष तन जब मिल गया; सो सुर दुर्लभ जान ।
साधन सहज उपाय ते, लह सुख भक्ति सुज्ञान ॥2 ॥
सत के संग में बैठकर, सुन सतसंग के बैन ।
योग युक्ति गुरु भक्ति का, तब पायेगा नैन ॥3 ॥
बिन सतसंग विवेक नहिं, बिन विवेक नहिं ज्ञान ।
बिन गुरु सतसंगत नहीं, गुरु सत रूप पिछान ॥4 ॥
सतसंगत अभ्यास दोऊ, नर का जनम बनाय ।
राधास्वामी नाम ले, सोई सहज उपाय ॥5 ॥
×
Song 50 — Hindi
451. सत श्रद्धा विश्वास से, सो आस्तिक का रूप ।
बिन श्रद्धा विश्वास के, नास्तिक गिरा भवकूप ॥1 ॥
अपनी अपनी क्या करे, अपना आपा ठान ।
सेवक मौज अधीन है, मौजवान गुनवान ॥2 ॥
गुरु चरनन में सीस दे, जो न उभारे सीस ।
पहुँचेगा गुरु धाम में, सेवक बिस्वा बीस ॥3 ॥
सीस दिया नहीं आपना, सो नहीं मौज अधार ।
अपना आपा ठानकर, क्यों न सहे सिर मार ॥4 ॥
गुरु समरथ ने बांह गही, करेंगे पूरा काज ।
क्यों निचिंत होता नहीं, बांह गहे की लाज ॥5 ॥
संस्कार गुरु भक्ति का, गुरु दयाल ने दीन ।
काम करेंगे आपना, मन क्यों किया मलीन ॥6 ॥
निश्चय कर विश्वास कर, नित सतसंग विलास ।
राधास्वामी दीन हित, पूरी करेंगे आस ॥7 ॥
जो करना है कर सदा, दुविधा दुर्मति खोय ।
मन न दुखावे किसी का तू , संत का मारग सोय ॥8 ॥
समझ बूझ कर बन्दगी, मिथ्या बचन न बोल ।
गुरु के शब्द अमोल को, हिये तराजू तोल ॥6 ॥
धिरता समता चित्त धर, भक्ति साज दल साज । ।
सेवक का होता नहीं, जग में कभी अकाज ॥10 ॥
दुविधा दुर्मति त्याग दे, ले राधास्वामी नाम ।
गुरु समरथ की दया से, एक दिन पूरा काम ॥11 ॥
अरदास ( साखी)
बिन श्रद्धा विश्वास के, नास्तिक गिरा भवकूप ॥1 ॥
अपनी अपनी क्या करे, अपना आपा ठान ।
सेवक मौज अधीन है, मौजवान गुनवान ॥2 ॥
गुरु चरनन में सीस दे, जो न उभारे सीस ।
पहुँचेगा गुरु धाम में, सेवक बिस्वा बीस ॥3 ॥
सीस दिया नहीं आपना, सो नहीं मौज अधार ।
अपना आपा ठानकर, क्यों न सहे सिर मार ॥4 ॥
गुरु समरथ ने बांह गही, करेंगे पूरा काज ।
क्यों निचिंत होता नहीं, बांह गहे की लाज ॥5 ॥
संस्कार गुरु भक्ति का, गुरु दयाल ने दीन ।
काम करेंगे आपना, मन क्यों किया मलीन ॥6 ॥
निश्चय कर विश्वास कर, नित सतसंग विलास ।
राधास्वामी दीन हित, पूरी करेंगे आस ॥7 ॥
जो करना है कर सदा, दुविधा दुर्मति खोय ।
मन न दुखावे किसी का तू , संत का मारग सोय ॥8 ॥
समझ बूझ कर बन्दगी, मिथ्या बचन न बोल ।
गुरु के शब्द अमोल को, हिये तराजू तोल ॥6 ॥
धिरता समता चित्त धर, भक्ति साज दल साज । ।
सेवक का होता नहीं, जग में कभी अकाज ॥10 ॥
दुविधा दुर्मति त्याग दे, ले राधास्वामी नाम ।
गुरु समरथ की दया से, एक दिन पूरा काम ॥11 ॥
अरदास ( साखी)
×
Song 51 — Hindi
452. गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि परनाम ।
गुरु के पद में मुक्ति पद, सतपद धुरपद ठाम ॥1 ॥
गरु बानी सत मान सर, मैं तो हंस स्वरूप ।
अमृत पान सदा करू , त्याग भरम भव कूप ॥2 ॥
गुरु बानी सुख दायनी, निर्वानी निज सार। ।
बोलू तो गरु बचन नित, महिमा अगम अपार ॥3 ॥
गुरु संगत जग दुख मिटा, सूझा अलख अरूप ।
गुरु में गुरुपद तत्व सब, गुरु सत मत के भूप ॥4 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, निगम अगम सद्ग्रन्थ ।
गुरु पद नख में सब बसें, वेद शास्त्र शुचि पंथ ॥5 ॥
गुरु के पद में मुक्ति पद, सतपद धुरपद ठाम ॥1 ॥
गरु बानी सत मान सर, मैं तो हंस स्वरूप ।
अमृत पान सदा करू , त्याग भरम भव कूप ॥2 ॥
गुरु बानी सुख दायनी, निर्वानी निज सार। ।
बोलू तो गरु बचन नित, महिमा अगम अपार ॥3 ॥
गुरु संगत जग दुख मिटा, सूझा अलख अरूप ।
गुरु में गुरुपद तत्व सब, गुरु सत मत के भूप ॥4 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सुर, निगम अगम सद्ग्रन्थ ।
गुरु पद नख में सब बसें, वेद शास्त्र शुचि पंथ ॥5 ॥
×
Song 52 — Hindi
453. ईश ब्रह्म अवगत कला, उन्मनि लगी समाध ।
जब मस्तक गुरु पद झुका, पाया अगम अगाध ॥1 ॥
सगुन अगुन गुन सम्पदा, माया ब्रह्म विचार । ।
गुरु संगत मिल सब लखें, तज अविवेक विचार ॥2 ॥
सहसकमलदल जोति मय, त्रिकुटी ओउम् अस्थान ।
सुन्न भवर सत धाम गति, गुरु के वचन निशान ॥3 ॥
शब्द अशब्द अनाम अज, अद्भुत विमल प्रकाश ।
एक गुरु के बचन में, आस सुआस सुपास ॥4 ॥
विज्ञानी ज्ञानी यती, योग युक्ति के दाव ।
बिन गुरु ममें न पावहीं, कोटिन करे उपाव ॥5 ॥
जब मस्तक गुरु पद झुका, पाया अगम अगाध ॥1 ॥
सगुन अगुन गुन सम्पदा, माया ब्रह्म विचार । ।
गुरु संगत मिल सब लखें, तज अविवेक विचार ॥2 ॥
सहसकमलदल जोति मय, त्रिकुटी ओउम् अस्थान ।
सुन्न भवर सत धाम गति, गुरु के वचन निशान ॥3 ॥
शब्द अशब्द अनाम अज, अद्भुत विमल प्रकाश ।
एक गुरु के बचन में, आस सुआस सुपास ॥4 ॥
विज्ञानी ज्ञानी यती, योग युक्ति के दाव ।
बिन गुरु ममें न पावहीं, कोटिन करे उपाव ॥5 ॥
×
Song 53 — Hindi
454. जप तप संयम बहु किये, घूमे देश विदेश ।
भटक भटक भटकत मरे, बिन गरु के उपदेश ॥1 ॥
विद्या बुद्धि चातुरी, भूठा वाद विवाद ।
गुरु पद मिल सबका तजा, लागी सुन्न समाध ॥2 ॥
भरम मिटा संशय गया, खुली ममे की खान ।
जड़ चेतन ग्रन्थी खिसी, जब पाया गुरु ज्ञान ॥3 ॥
पढ़ लिख दुविधा में फंसे, मन तो भया अशान्त ।
जब आये गुरु चरण में, बुद्धि भई निरभ्रान्त ॥4 ॥
तीरथ में पाषान जल, बन परबत दुख धाम ।
बिन गुरु कृपा न गम लखे, मिले न सत सतनाम ॥5 ॥
भटक भटक भटकत मरे, बिन गरु के उपदेश ॥1 ॥
विद्या बुद्धि चातुरी, भूठा वाद विवाद ।
गुरु पद मिल सबका तजा, लागी सुन्न समाध ॥2 ॥
भरम मिटा संशय गया, खुली ममे की खान ।
जड़ चेतन ग्रन्थी खिसी, जब पाया गुरु ज्ञान ॥3 ॥
पढ़ लिख दुविधा में फंसे, मन तो भया अशान्त ।
जब आये गुरु चरण में, बुद्धि भई निरभ्रान्त ॥4 ॥
तीरथ में पाषान जल, बन परबत दुख धाम ।
बिन गुरु कृपा न गम लखे, मिले न सत सतनाम ॥5 ॥
×
Song 54 — Hindi
455. साध समान न कोई सगा, सन्त समान न मीत ।
गुरु सम हितकारी नहीं, लहे न प्रेम प्रतीत ॥1 ॥
विद्या पढ़ पंडित मुये, अटके माया जाल ।
ज्ञान कथन ज्ञानी थके, शब्द जाल जंजाल ॥2 ॥
वेद पढ़ा तो खेद अति, शास्त्र शासना पाय ।
ऐसा कोई ना मिला, सहजे लिया छुड़ाय ॥3 ॥
ऐसे तो सतगुरु मिले, दीनबन्धु सुदयाल । ।
बांह पकड़ खींचा अधर, आपहि लिया सभाल ॥4 ॥
हाथी अटका कीच में, केहि विधि निकसे आय। ।
जितना बल पौरुष करे, उतना ही धस जाय ॥5 ॥
गुरु सम हितकारी नहीं, लहे न प्रेम प्रतीत ॥1 ॥
विद्या पढ़ पंडित मुये, अटके माया जाल ।
ज्ञान कथन ज्ञानी थके, शब्द जाल जंजाल ॥2 ॥
वेद पढ़ा तो खेद अति, शास्त्र शासना पाय ।
ऐसा कोई ना मिला, सहजे लिया छुड़ाय ॥3 ॥
ऐसे तो सतगुरु मिले, दीनबन्धु सुदयाल । ।
बांह पकड़ खींचा अधर, आपहि लिया सभाल ॥4 ॥
हाथी अटका कीच में, केहि विधि निकसे आय। ।
जितना बल पौरुष करे, उतना ही धस जाय ॥5 ॥
×
Song 55 — Hindi
456. निज बल त्याग भरोस गुरु, आस कुआस निरास ।
प्रगटे पल में सतगुरु, छुटा फंद से दास ॥1 ॥
ऋद्धि सिद्धि नौ निद्धि यह, माया ही के भर्म ।
सिद्ध साधक भूले सकल, लखा न निज पद मर्म ॥2 ॥
उरझ उरझ उरझे महा, अब सुरझावे कौन ।
मुरझावन हारा गुरु, कर जो संगत गौन ॥3 ॥
ना विद्या ना बांह बल, ना मन में हंकार ।
ना भक्ति ना प्रीत रुचि, सतगुरु करो उदार ॥4 ॥
गुरु से कोई नहीं बड़ा, यह जाना अब जान । ।
गुरु चरनन पर वारिया, देह गेह मन प्रान ॥5 ॥
प्रगटे पल में सतगुरु, छुटा फंद से दास ॥1 ॥
ऋद्धि सिद्धि नौ निद्धि यह, माया ही के भर्म ।
सिद्ध साधक भूले सकल, लखा न निज पद मर्म ॥2 ॥
उरझ उरझ उरझे महा, अब सुरझावे कौन ।
मुरझावन हारा गुरु, कर जो संगत गौन ॥3 ॥
ना विद्या ना बांह बल, ना मन में हंकार ।
ना भक्ति ना प्रीत रुचि, सतगुरु करो उदार ॥4 ॥
गुरु से कोई नहीं बड़ा, यह जाना अब जान । ।
गुरु चरनन पर वारिया, देह गेह मन प्रान ॥5 ॥
×
Song 56 — Hindi
457. गुरु से भेद जो मिल गया, सीस उतारा आप ।
चरन शरन बल बल गये, मिटा देह का पाप ॥1 ॥
मानुष जनम अमोल था, नहीं तोल नहीं मोल ।
सुफल भया जब गुरु मिले, सुनी जो अबुत बोल ॥2 ॥
एक आस गुरु चरन की, एक भरोसा मन ।
एक दास की बीनती, एक ही प्रेम जतन ॥3 ॥
प्रेम गुरु से कीजिये, गुरु जो करे सहाय ।
जो गुरु शरणागत भया, फिर नहीं भटका खाय ॥4 ॥
आप मिले आपहि कहा, आपहि लिया बुझाय । ।
आप आप मिल आप है, आप आप समझाय ॥5 ॥
चरन शरन बल बल गये, मिटा देह का पाप ॥1 ॥
मानुष जनम अमोल था, नहीं तोल नहीं मोल ।
सुफल भया जब गुरु मिले, सुनी जो अबुत बोल ॥2 ॥
एक आस गुरु चरन की, एक भरोसा मन ।
एक दास की बीनती, एक ही प्रेम जतन ॥3 ॥
प्रेम गुरु से कीजिये, गुरु जो करे सहाय ।
जो गुरु शरणागत भया, फिर नहीं भटका खाय ॥4 ॥
आप मिले आपहि कहा, आपहि लिया बुझाय । ।
आप आप मिल आप है, आप आप समझाय ॥5 ॥
×
Song 57 — Hindi
458. गुरु समुद्र हैं अगम गति, लहर देव मुनि बृन्द ।
ईश ब्रह्म हैं धार सम, जीव जन्तु सब बुन्द ॥1 ॥
प्रगट प्रगट प्रगटा प्रगट, आप जीव के काज ।
अब तो मैं गुरु का भया, त्याग जगत की लाज ॥2 ॥
गुरु तड़ाग मैं कमल जिमि, शोभा पाया आय ।
जग में फैली बास भली, गुरु चरनन बल जाय ॥3 ॥
गुरु तो चन्द्र स्वरूप हैं, मैं चकोर बलवान ।
पल पल गुरु मूर्ती लखू, कहीं और नहीं ध्यान ॥4 ॥
गुरु गम सिंध अगाध में, करूं सदा अस्नान ।
त्यागू जग का मैल सब, पाऊ गति मति ज्ञान ॥5 ॥
ईश ब्रह्म हैं धार सम, जीव जन्तु सब बुन्द ॥1 ॥
प्रगट प्रगट प्रगटा प्रगट, आप जीव के काज ।
अब तो मैं गुरु का भया, त्याग जगत की लाज ॥2 ॥
गुरु तड़ाग मैं कमल जिमि, शोभा पाया आय ।
जग में फैली बास भली, गुरु चरनन बल जाय ॥3 ॥
गुरु तो चन्द्र स्वरूप हैं, मैं चकोर बलवान ।
पल पल गुरु मूर्ती लखू, कहीं और नहीं ध्यान ॥4 ॥
गुरु गम सिंध अगाध में, करूं सदा अस्नान ।
त्यागू जग का मैल सब, पाऊ गति मति ज्ञान ॥5 ॥
×
Song 58 — Hindi
459. मैं बालक गुरु मात पितु, खेलू प्रेम की गोद ।
संशय भरम में ना पड़े , पाऊँ बोध सुबोध ॥1 ॥
नाथ तुम्हारा आसरा, तुमने किया सनाथ । ।
साथ न छोड़, चरन का, रहूँ तुम्हारे साथ ॥2 ॥
काम सकाम अकाम की, रहे न मन में आस ।
तुम तो सांचे सतगुरु, मैं सांचा सत दाम ॥3 ॥
सेवा हित चित से करूँ, फल की चाह न कोय ।
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, होना होय सो होय ॥4 ॥
किसकी कीजे बन्दना, किसकी कीजे सेव ।
केहि बल जीतू जगत को, पूज कौन सत देव ॥5 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, गुरु की कीजे सेव ।
गुरु बल जीतो जगत को, पूज पूज गुरु देव ॥6 ॥
संशय भरम में ना पड़े , पाऊँ बोध सुबोध ॥1 ॥
नाथ तुम्हारा आसरा, तुमने किया सनाथ । ।
साथ न छोड़, चरन का, रहूँ तुम्हारे साथ ॥2 ॥
काम सकाम अकाम की, रहे न मन में आस ।
तुम तो सांचे सतगुरु, मैं सांचा सत दाम ॥3 ॥
सेवा हित चित से करूँ, फल की चाह न कोय ।
सुख दुख सिर ऊपर सहूँ, होना होय सो होय ॥4 ॥
किसकी कीजे बन्दना, किसकी कीजे सेव ।
केहि बल जीतू जगत को, पूज कौन सत देव ॥5 ॥
गुरु की कीजे बन्दना, गुरु की कीजे सेव ।
गुरु बल जीतो जगत को, पूज पूज गुरु देव ॥6 ॥
×
Song 59 — Hindi
460. लहर जो उठी समुद्र में, बुन्द पड़ा अति दूर ।
बिलपे तड़पे रात दिन, यह वियोग दुख मूर ॥1 ॥
देख दशा तब बुन्द की, छोभा सिंध अपार ।
लहरी आई दया की, बुन्दहि लिया संभार ॥2 ॥
बुन्द सिंध की एक गति, लख पावे कोई साध ।
जब लख पावे मर्म यह, छूटे सकल उपाध ॥3 ॥
पंडित तो पोथी पढ़े, मन में बड़ा हंकार ।
पाँडे तीरथ में खपे, दान दक्षिणा लार ॥4 ॥
भेख सती का भेष घर, घर घर माँगी भीख ।
सतगुरु की संगत बिना, लही न पूरी सीख ॥5 ॥
ज्ञानी ग्रन्थन में बंधे, नहीं कुछ जाना भेद ।
बक बक निस दिन खोगये, हटा न संशय खेद ॥6 ॥
माया ब्रह्म समान दोऊ, दोउ द्वन्द अज्ञान ।
द्वन्द बास जब मन बसे, केहि विधि सूझे ज्ञान ॥7 ॥
बिलपे तड़पे रात दिन, यह वियोग दुख मूर ॥1 ॥
देख दशा तब बुन्द की, छोभा सिंध अपार ।
लहरी आई दया की, बुन्दहि लिया संभार ॥2 ॥
बुन्द सिंध की एक गति, लख पावे कोई साध ।
जब लख पावे मर्म यह, छूटे सकल उपाध ॥3 ॥
पंडित तो पोथी पढ़े, मन में बड़ा हंकार ।
पाँडे तीरथ में खपे, दान दक्षिणा लार ॥4 ॥
भेख सती का भेष घर, घर घर माँगी भीख ।
सतगुरु की संगत बिना, लही न पूरी सीख ॥5 ॥
ज्ञानी ग्रन्थन में बंधे, नहीं कुछ जाना भेद ।
बक बक निस दिन खोगये, हटा न संशय खेद ॥6 ॥
माया ब्रह्म समान दोऊ, दोउ द्वन्द अज्ञान ।
द्वन्द बास जब मन बसे, केहि विधि सूझे ज्ञान ॥7 ॥
×
Song 60 — Hindi
461. मैं तो गुरु चरनन लगा, जैसे दीप पतंग ।
जरी कामना कल्पना, रहा न बाकी अंग ॥1 ॥
मैं तो कीट समान हूँ, गुरु मुंगी के रूप ।
ध्यान लगा पद कमल का, प्रगटा अमर अरूप ॥2 ॥
मैं हूँ बन की मृगनी, गुरु बीन के बोल ।
तन मन की सुधि बिसर कर, सहजे भई अडोल ॥3 ॥
मैं मछली गुरु सिंध गति, खेलू जल के माहिं ।
मीन सिंध गति क्यों तजे, सतगुरु पकड़ी बाँह ॥4 ॥
मैं तो किरन के भाव हूँ, सतगुरु भानु महान ।
किरनी मिली जो भानु में,क्या कोई सके अलगान ॥5 ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये, चरन पखारू नित ।
चरनामृत की लालसा, और न कोई चित ॥6 ॥
निरबेरी निहकामना, निहकामी निज दास ।
राधास्वामी दया कीजिये, सबसे रहूँ उदास ॥7 ॥
प्रार्थना
जरी कामना कल्पना, रहा न बाकी अंग ॥1 ॥
मैं तो कीट समान हूँ, गुरु मुंगी के रूप ।
ध्यान लगा पद कमल का, प्रगटा अमर अरूप ॥2 ॥
मैं हूँ बन की मृगनी, गुरु बीन के बोल ।
तन मन की सुधि बिसर कर, सहजे भई अडोल ॥3 ॥
मैं मछली गुरु सिंध गति, खेलू जल के माहिं ।
मीन सिंध गति क्यों तजे, सतगुरु पकड़ी बाँह ॥4 ॥
मैं तो किरन के भाव हूँ, सतगुरु भानु महान ।
किरनी मिली जो भानु में,क्या कोई सके अलगान ॥5 ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये, चरन पखारू नित ।
चरनामृत की लालसा, और न कोई चित ॥6 ॥
निरबेरी निहकामना, निहकामी निज दास ।
राधास्वामी दया कीजिये, सबसे रहूँ उदास ॥7 ॥
प्रार्थना
×
Song 61 — Hindi
462 विद्या बुद्धि विवेक की, चरन कमल में खान ।
दया मेहर गुरु कीजिये, दीजे शुभ मति ज्ञान ॥1 ॥
प्रेम भक्ति सद्गति सुगति, सब तुम्हरे आधीन ।
दया दृष्टि गुरु कीजिये, चरन पड़ा जन दीन ॥2 ॥
खटक खटक सालत रहे, दुख दारुण उर मूल ।
अपनी दया से काटिये, भव कलेश का मूल ॥3 ॥
चन्दन के ढिंग आय के, सुधरे नीम पलास । ।
मैं आया तुम शरन में, कीजे अपना दास ॥4 ॥
चरन ओट में राखिये, शरनागत पहिचान । ।
राधास्वामी सतगुरु, दीजे भक्ति दान ॥5 ॥
272. ॐ अभ्यास की विधि चौपाई
दया मेहर गुरु कीजिये, दीजे शुभ मति ज्ञान ॥1 ॥
प्रेम भक्ति सद्गति सुगति, सब तुम्हरे आधीन ।
दया दृष्टि गुरु कीजिये, चरन पड़ा जन दीन ॥2 ॥
खटक खटक सालत रहे, दुख दारुण उर मूल ।
अपनी दया से काटिये, भव कलेश का मूल ॥3 ॥
चन्दन के ढिंग आय के, सुधरे नीम पलास । ।
मैं आया तुम शरन में, कीजे अपना दास ॥4 ॥
चरन ओट में राखिये, शरनागत पहिचान । ।
राधास्वामी सतगुरु, दीजे भक्ति दान ॥5 ॥
272. ॐ अभ्यास की विधि चौपाई
×
Song 62 — Hindi
463. गुरु की दया सुसंगत पाई ।
प्रेम उमंग रहा मन में छाई । ।
यह प्रपंच है दुख की खानी ।
काल कर्म के जाल फंसानी ॥
तलपत बिलपत अवध सिरानी ।
छूटन की कोई विधि नहीं जानी। ।
उर में तीर विपत का साले ।
वैद न मिला जो ताहि निकाले ।
कसक कसक भई पीर घनेरी ।
तड़प रहा ज्यों भग्नि #मेरी । ।
तीरथ बरत धरम अटकाना ।
पूजा पाठ नेम अभिमाना ।
जप तप संयम बहु बिधि किया ।
शान्ति न पाई भरमत रहा । ।
भेद भाव से जब घबराया ।
गुरु सतसंग महिमा सुन पाया ।
दोहाश्रद्धा भाव की भेंट ले, आया गुरु दरबार ।
दर्शन करतहि मिट गया, भव भ्रम मूल विकार ।
प्रेम उमंग रहा मन में छाई । ।
यह प्रपंच है दुख की खानी ।
काल कर्म के जाल फंसानी ॥
तलपत बिलपत अवध सिरानी ।
छूटन की कोई विधि नहीं जानी। ।
उर में तीर विपत का साले ।
वैद न मिला जो ताहि निकाले ।
कसक कसक भई पीर घनेरी ।
तड़प रहा ज्यों भग्नि #मेरी । ।
तीरथ बरत धरम अटकाना ।
पूजा पाठ नेम अभिमाना ।
जप तप संयम बहु बिधि किया ।
शान्ति न पाई भरमत रहा । ।
भेद भाव से जब घबराया ।
गुरु सतसंग महिमा सुन पाया ।
दोहाश्रद्धा भाव की भेंट ले, आया गुरु दरबार ।
दर्शन करतहि मिट गया, भव भ्रम मूल विकार ।
×
Song 63 — Hindi
464. गुरु ने हाथ सीस पर फेरा ।
दिया ज्ञान निज करके चेरा ॥
जीव ईश का मर्म जनाया ।
माया काल का भेद बताया ॥
सतसंग की महिमा अति भारी ।
शेष महेश न बरने पारी ॥
सहज योग सतसंग प्रतापा ।
करे तो समझ परे निज आपा ॥
आपा समझ ईश पद सूझे ।
ब्रह्म सरल शुद्ध की गति बुझे ।
ज्ञान ध्यान की विधि मन भाई ।
गुरु संगत में सब सुधि पाई ॥
समझ परी श्रीगुरु मुख बानी ।
लखा अलख सतपद निर्वानी ॥
हिये उठा आनन्द महाना ।
गुरु की दया सन्त गति जाना ।
दोहा बाच लक्ष निर्णय किया, अजा प्रेम प्रतीत ।
अनुभव मिला विचार पद, मूझ पड़ी धर्म नीत। ।
दिया ज्ञान निज करके चेरा ॥
जीव ईश का मर्म जनाया ।
माया काल का भेद बताया ॥
सतसंग की महिमा अति भारी ।
शेष महेश न बरने पारी ॥
सहज योग सतसंग प्रतापा ।
करे तो समझ परे निज आपा ॥
आपा समझ ईश पद सूझे ।
ब्रह्म सरल शुद्ध की गति बुझे ।
ज्ञान ध्यान की विधि मन भाई ।
गुरु संगत में सब सुधि पाई ॥
समझ परी श्रीगुरु मुख बानी ।
लखा अलख सतपद निर्वानी ॥
हिये उठा आनन्द महाना ।
गुरु की दया सन्त गति जाना ।
दोहा बाच लक्ष निर्णय किया, अजा प्रेम प्रतीत ।
अनुभव मिला विचार पद, मूझ पड़ी धर्म नीत। ।
×
Song 64 — Hindi
465. तब गुरु ने यों दिया संदेसा ।
करो जतन जाओ सत देसा ॥
काल देश और माया देश ।
नित उपजावे कष्ट कलेश ॥
भूल भरम के यह अस्थान ।
यहां जीव रहे बंध फसान ॥
जाग्रत स्वप्न का ज्यों व्यवहार ।
तैसाहि समझो जगत असार । ।
निश्चल अचल न होय मन चंचल ।
डांवाडोल रहे अति बेकल ॥
ज्ञान कथा मन काज कमाओ ।
धर विवेक उर ध्यान लगाओ ॥
बाचक ज्ञान का नहीं ठिकाना ।
यह नहीं मुख्य न सांचा ज्ञाना । ।
बिना योग नहीं ज्ञान अखंड ।
बिन साधन नहीं सुमति प्रचंड ॥
दोहाब्रह्माकार न वृत्ति जब, निष्फल वाचक ज्ञान ।
गुरु मत ले कुछ युक्ति कर, मेट देउ अज्ञान ॥
करो जतन जाओ सत देसा ॥
काल देश और माया देश ।
नित उपजावे कष्ट कलेश ॥
भूल भरम के यह अस्थान ।
यहां जीव रहे बंध फसान ॥
जाग्रत स्वप्न का ज्यों व्यवहार ।
तैसाहि समझो जगत असार । ।
निश्चल अचल न होय मन चंचल ।
डांवाडोल रहे अति बेकल ॥
ज्ञान कथा मन काज कमाओ ।
धर विवेक उर ध्यान लगाओ ॥
बाचक ज्ञान का नहीं ठिकाना ।
यह नहीं मुख्य न सांचा ज्ञाना । ।
बिना योग नहीं ज्ञान अखंड ।
बिन साधन नहीं सुमति प्रचंड ॥
दोहाब्रह्माकार न वृत्ति जब, निष्फल वाचक ज्ञान ।
गुरु मत ले कुछ युक्ति कर, मेट देउ अज्ञान ॥
×
Song 65 — Hindi
466. गुरत शब्द का योग सुहावन ।
सुगम सुसाधन सुरुचि सुभावन । ।
शब्द में सुरत आपनी जोड़ो ।
सहजे भव के बन्धन तोड़ो ॥
चित को साध बैठ एकान्त ।
साधन कर मन को करो शान्त ॥
जब यह चित निर्मल हो जावे ।
तब कुछ रस साधन में पावे ॥
ज्यों ज्यों अधिक स्वादरस प्रगटे ।
त्यों त्यों मनकी गांठी खुले ॥
जड़ चेतन की ग्रंथी भारी ।
उरम उरक जीव भये दुखारी ॥
साधन से जब गांठी खोले ।
तब नहीं मन चंचल होय डोले ।
मन चंचल का ज्ञान न निर्मल ।
चंचल नहीं है आतम निश्चल । ।
दोहागुरु का यह उपदेश सुन, पूछे शिष्य सुजान ।
प्रभु साधन की विधि कहो, दीन दुखी मोहि जान । ।
सुगम सुसाधन सुरुचि सुभावन । ।
शब्द में सुरत आपनी जोड़ो ।
सहजे भव के बन्धन तोड़ो ॥
चित को साध बैठ एकान्त ।
साधन कर मन को करो शान्त ॥
जब यह चित निर्मल हो जावे ।
तब कुछ रस साधन में पावे ॥
ज्यों ज्यों अधिक स्वादरस प्रगटे ।
त्यों त्यों मनकी गांठी खुले ॥
जड़ चेतन की ग्रंथी भारी ।
उरम उरक जीव भये दुखारी ॥
साधन से जब गांठी खोले ।
तब नहीं मन चंचल होय डोले ।
मन चंचल का ज्ञान न निर्मल ।
चंचल नहीं है आतम निश्चल । ।
दोहागुरु का यह उपदेश सुन, पूछे शिष्य सुजान ।
प्रभु साधन की विधि कहो, दीन दुखी मोहि जान । ।
×
Song 66 — Hindi
467. सतगुरु ने तब बचन सुनाया ।
शब्द योग साधन ठहराया ॥
उलटो पुतली रोको मन को ।
विधि से नित प्रति करो जतन को ।
गुरु का नाम सुमिर हिय अंदर ।
योग कमाई करो निरन्तर । ।
पहिले सहसकमल चढ़ जाओ ।
महिमा जोति का दीप जलाओ ॥
जब आँखों पर बांधे बन्द ।
जोती निरख प्रगटे आनन्द ।
तत्व भास की लीला निरखो ।
बिमल बिलास हिये बिच परखो ।
ज्यों जोती बीच जले पतिंगा ।
जरत न मोड़े अपनो अंगा ।
त्यों तुम ध्यान जोति में लाओ ।
जोति देखकर चित ठहराओ ॥
दोहाध्यान सुगम है जोति का, जोती अद्भुत रूप ।
इस जोती के मध्य में, व्यापक पुरुष अनूप ॥
शब्द योग साधन ठहराया ॥
उलटो पुतली रोको मन को ।
विधि से नित प्रति करो जतन को ।
गुरु का नाम सुमिर हिय अंदर ।
योग कमाई करो निरन्तर । ।
पहिले सहसकमल चढ़ जाओ ।
महिमा जोति का दीप जलाओ ॥
जब आँखों पर बांधे बन्द ।
जोती निरख प्रगटे आनन्द ।
तत्व भास की लीला निरखो ।
बिमल बिलास हिये बिच परखो ।
ज्यों जोती बीच जले पतिंगा ।
जरत न मोड़े अपनो अंगा ।
त्यों तुम ध्यान जोति में लाओ ।
जोति देखकर चित ठहराओ ॥
दोहाध्यान सुगम है जोति का, जोती अद्भुत रूप ।
इस जोती के मध्य में, व्यापक पुरुष अनूप ॥
×
Song 67 — Hindi
468. फिर तुम सुनो शब्द झनकारा ।
घंटा शंख की ध्वनी अपारा ॥
जब प्रगटे धुन घट में भाई ।
तब समझो घट पन्थ खुलाई ॥
धुन में नाम नाम में धुन है ।
गुन में गुनी गुनी में गुन है ।
घंटा शंख बजे घट अन्तर ।
उपजे प्रेम प्रतीत निरंतर ॥
चित नहीं डोले रहे अडोल ।
आप न बोले सुन धुन बोल ॥
भाव कुभाव चित जब रुके ।
धुन आप ही प्रगटे मन नसे ॥
धुन से खिंचे सुरत धुन माहीं ।
अन्त न मन और चित कहूँ जाहीं ।
तार न टूटे ध्यान न छूटे ।
सहजहि मन आतम सुख लूटे ।
दोहादेवल सहसकमलदल, प्रथम आरती कीन ।
दीना वाला जोति का, घंटा शब्द प्रवीन ॥
घंटा शंख की ध्वनी अपारा ॥
जब प्रगटे धुन घट में भाई ।
तब समझो घट पन्थ खुलाई ॥
धुन में नाम नाम में धुन है ।
गुन में गुनी गुनी में गुन है ।
घंटा शंख बजे घट अन्तर ।
उपजे प्रेम प्रतीत निरंतर ॥
चित नहीं डोले रहे अडोल ।
आप न बोले सुन धुन बोल ॥
भाव कुभाव चित जब रुके ।
धुन आप ही प्रगटे मन नसे ॥
धुन से खिंचे सुरत धुन माहीं ।
अन्त न मन और चित कहूँ जाहीं ।
तार न टूटे ध्यान न छूटे ।
सहजहि मन आतम सुख लूटे ।
दोहादेवल सहसकमलदल, प्रथम आरती कीन ।
दीना वाला जोति का, घंटा शब्द प्रवीन ॥
×
Song 68 — Hindi
469. पहिली मंजिल हो गई पूरी ।
सुरत निबल अब हो गई सूरी ॥
गुरु बल पाय चली आगे को ।
तोड़ दिया भव के तागे को ।
दूसरी मंजिल त्रिकुटी धाम ।
ओंकार का यही मुकाम ॥
एक ओं सतगुरु प्रसाद ।
पाय सुरत लागी स्मिाध ॥
मूल मंत्र का यह अस्थान ।
ॐ प्रणव श्रुति पथ का ज्ञान । ।
सूरज मंडल लाली उषा ।
निरख हटाया मन का दोषा ।
गुरु पद गुरु संग गुरु का मंडल ।
गुरु की बानी निर्मल निश्चल ॥
ओंकार की लाली जोत ।
है त्रिलोकी का यह सोत । ।
दोहाव्यापक ओम् का शब्द है, ज्यों मृदंग की धुन ।
सुरत हुई अति बिमल गति, ओम् ओम् धुन सुन ।
सुरत निबल अब हो गई सूरी ॥
गुरु बल पाय चली आगे को ।
तोड़ दिया भव के तागे को ।
दूसरी मंजिल त्रिकुटी धाम ।
ओंकार का यही मुकाम ॥
एक ओं सतगुरु प्रसाद ।
पाय सुरत लागी स्मिाध ॥
मूल मंत्र का यह अस्थान ।
ॐ प्रणव श्रुति पथ का ज्ञान । ।
सूरज मंडल लाली उषा ।
निरख हटाया मन का दोषा ।
गुरु पद गुरु संग गुरु का मंडल ।
गुरु की बानी निर्मल निश्चल ॥
ओंकार की लाली जोत ।
है त्रिलोकी का यह सोत । ।
दोहाव्यापक ओम् का शब्द है, ज्यों मृदंग की धुन ।
सुरत हुई अति बिमल गति, ओम् ओम् धुन सुन ।
×
Song 69 — Hindi
470. मेघनाद लंका की बानी ।
रावणगढ़ की अटल निशानी ॥
जो कोई इस पद बासा पावे ।
सहजहि इन्द्री जीत हो जावे ॥
गगन चढ़े सुरत सुघड़ सहेली ।
अलबेली अल्लहड़ी नवेली । ।
यकटक होय लखे गुरु मूरत ।
अगम अगोचर अद्भुत मूरत ।
मस्ती छाई ध्यान जमाया ।
ओंकार पद लख हरषाया ।
काम क्रोध के मस्तक फोड़े ।
लोभ मोह के नाते तोड़े ।
गम रूप मन सीता पाई ।
अबध राज की ली ठकुराई ॥
तन में रहे काज सब करे ।
तन के मोह मया सब हरे ॥
दोहाजैसे जल के बीच में, कमल रहा बिगसाय ।
तैसी देह के बीच में, सुरत रही अलगाय ॥
रावणगढ़ की अटल निशानी ॥
जो कोई इस पद बासा पावे ।
सहजहि इन्द्री जीत हो जावे ॥
गगन चढ़े सुरत सुघड़ सहेली ।
अलबेली अल्लहड़ी नवेली । ।
यकटक होय लखे गुरु मूरत ।
अगम अगोचर अद्भुत मूरत ।
मस्ती छाई ध्यान जमाया ।
ओंकार पद लख हरषाया ।
काम क्रोध के मस्तक फोड़े ।
लोभ मोह के नाते तोड़े ।
गम रूप मन सीता पाई ।
अबध राज की ली ठकुराई ॥
तन में रहे काज सब करे ।
तन के मोह मया सब हरे ॥
दोहाजैसे जल के बीच में, कमल रहा बिगसाय ।
तैसी देह के बीच में, सुरत रही अलगाय ॥
×
Song 70 — Hindi
471. जब लग ओंकार नहीं दरसे ।
तब लग कबहुँ न कारज सरसे । ।
ओम् विशेष पुरुप गुरु रूप ।
ओम् त्रिलोकी का निज भूप । ।
ओम् बीज है ओम् है सार ।
त्रिलोकी का यह आधार ।
ओम् तीन साधन का मूल ।
ओम् जाप जग मेटे मूल ॥
ओम् आधार ओम् करतार ।
ओम् मूल बाकी सब डार ।
ओम् तत्व है ओम् है मुख ।
ओम् से उपजे हिये का सुख । ।
ओम् वेद है ओम् पुरान ।
ओम् श्रुति स्मृति की जान ।
निगुन सगुन में निर्गुन ओम् ।
व्याप रहा जग में धुन ओम् ॥
दोहा उत्पति सृष्टि प्रलय जग, प्रलय के आधार ।
ब्रह्म खंड त्रिलोक में, ओम् है सबका सार ॥
276. शिव शन्द सागर
तब लग कबहुँ न कारज सरसे । ।
ओम् विशेष पुरुप गुरु रूप ।
ओम् त्रिलोकी का निज भूप । ।
ओम् बीज है ओम् है सार ।
त्रिलोकी का यह आधार ।
ओम् तीन साधन का मूल ।
ओम् जाप जग मेटे मूल ॥
ओम् आधार ओम् करतार ।
ओम् मूल बाकी सब डार ।
ओम् तत्व है ओम् है मुख ।
ओम् से उपजे हिये का सुख । ।
ओम् वेद है ओम् पुरान ।
ओम् श्रुति स्मृति की जान ।
निगुन सगुन में निर्गुन ओम् ।
व्याप रहा जग में धुन ओम् ॥
दोहा उत्पति सृष्टि प्रलय जग, प्रलय के आधार ।
ब्रह्म खंड त्रिलोक में, ओम् है सबका सार ॥
276. शिव शन्द सागर
×
Song 71 — Hindi
472. त्रिकुटी लख सुरत बढ़ी अगाड़ी ।
सुन्न समाध की आशा बाढ़ी ॥
कभी चिउंटी बन कभी विहंगम ।
मकर तार गति मीन दीन सम ।
कपि की चाल कूद मतवारी ।
सुन्न नगर की करी तैयारी ॥
स्वेत चन्द्र की जोत अपारा ।
आई दसवें द्वार पसारा ॥
नौ को छोड़ दसम दर लागी ।
नौ की नींद से सुन्न में जागी ।
नौ के पार का नौका पाया ।
जल थल वन उपवन मन भाया ।
ऊँचा परवत गहरी खाड़ी ।
लख लख चली सुरत मति गाढ़ी ।
सारंग सारंग धुनी विचित्र ।
सुन्न में देखी सुन्न चरित्र ॥
दोहागति सो सूक्ष्म निर्मल अमल, सुरत निरत रही झूम ।
सारंग सारंग शब्द की, पड़ी सुन्न में धूम ॥
सुन्न समाध की आशा बाढ़ी ॥
कभी चिउंटी बन कभी विहंगम ।
मकर तार गति मीन दीन सम ।
कपि की चाल कूद मतवारी ।
सुन्न नगर की करी तैयारी ॥
स्वेत चन्द्र की जोत अपारा ।
आई दसवें द्वार पसारा ॥
नौ को छोड़ दसम दर लागी ।
नौ की नींद से सुन्न में जागी ।
नौ के पार का नौका पाया ।
जल थल वन उपवन मन भाया ।
ऊँचा परवत गहरी खाड़ी ।
लख लख चली सुरत मति गाढ़ी ।
सारंग सारंग धुनी विचित्र ।
सुन्न में देखी सुन्न चरित्र ॥
दोहागति सो सूक्ष्म निर्मल अमल, सुरत निरत रही झूम ।
सारंग सारंग शब्द की, पड़ी सुन्न में धूम ॥
×
Song 72 — Hindi
473. सुरत देख अति चित हरखानी ।
ज्ञान दशा लख भई विज्ञानी ॥
आनन्द दरसा अमित अपारा ।
शेष गनेश न बरने पारा ॥
आगे महासुन्न मैदाना ।
घोर तिमिर प्रकाश छुपाना ।
कभी आगे कभी पीछे चाली ।
नाम सुमिरि मिली शक्ति निराली। ।
गुरु बल अंधकार सब नासा ।
पुरुषारथ की पाई आशा ॥
मान सरोवर किया अस्नान ।
हंसन गति लख लागा ध्यान ।
सुरत हुई सहजहि विस्माध ।
ताड़ी लागी अगम अगाध ॥
चित भया अचित विमन मन भया ।
चार शब्द सुने गुरु की दया ॥
दोहाघोर अखंड समाध लगी, तन मन की सुध नाहिं ।
महासुन्न कैलास गति, ब्रह्म शिखर के माहिं ॥
ज्ञान दशा लख भई विज्ञानी ॥
आनन्द दरसा अमित अपारा ।
शेष गनेश न बरने पारा ॥
आगे महासुन्न मैदाना ।
घोर तिमिर प्रकाश छुपाना ।
कभी आगे कभी पीछे चाली ।
नाम सुमिरि मिली शक्ति निराली। ।
गुरु बल अंधकार सब नासा ।
पुरुषारथ की पाई आशा ॥
मान सरोवर किया अस्नान ।
हंसन गति लख लागा ध्यान ।
सुरत हुई सहजहि विस्माध ।
ताड़ी लागी अगम अगाध ॥
चित भया अचित विमन मन भया ।
चार शब्द सुने गुरु की दया ॥
दोहाघोर अखंड समाध लगी, तन मन की सुध नाहिं ।
महासुन्न कैलास गति, ब्रह्म शिखर के माहिं ॥
×
Song 73 — Hindi
474. आनन्द हर्ष अपार महाना ।
अचल अमल निर्मल गति भाना ॥
गुरु की दया सुरत जब जागी ।
प्रेम प्रीत भक्ति रस पागी ॥
निरविकल्प सविकल्प अस्थाना ।
देखा उपजा मन गुरु ज्ञाना ।
हंस मंडली अद्भुत लीला ।
अमी अहार सप्रेम सुशीला ॥
सम दर्शी समचित सविवेका ।
पद दरसा नहीं एक अनेका ।
कहत न आवे मुख से चैन ।
गुरु लख दीन्ही अपनी सैन ।
बोले यह नहीं ठहरन धाम ।
चलो बढ़ो ले सतगुरु नाम ॥
सुरत नवीन चली जब आगे ।
पहुँची भवरगुफा के नाके ।
दोहाभँवर के बीच में गुफा है, सोत विचित्र अनूप ।
चक्कर खाता रात दिन, रूप कहूँ कि अरूप ॥
अचल अमल निर्मल गति भाना ॥
गुरु की दया सुरत जब जागी ।
प्रेम प्रीत भक्ति रस पागी ॥
निरविकल्प सविकल्प अस्थाना ।
देखा उपजा मन गुरु ज्ञाना ।
हंस मंडली अद्भुत लीला ।
अमी अहार सप्रेम सुशीला ॥
सम दर्शी समचित सविवेका ।
पद दरसा नहीं एक अनेका ।
कहत न आवे मुख से चैन ।
गुरु लख दीन्ही अपनी सैन ।
बोले यह नहीं ठहरन धाम ।
चलो बढ़ो ले सतगुरु नाम ॥
सुरत नवीन चली जब आगे ।
पहुँची भवरगुफा के नाके ।
दोहाभँवर के बीच में गुफा है, सोत विचित्र अनूप ।
चक्कर खाता रात दिन, रूप कहूँ कि अरूप ॥
×
Song 74 — Hindi
475. सूर स्वेत पर दृष्टि जमाई ।
महा प्रकाश तेज अधिकाई । ।
कोटि कृष्ण छबि रही लजाई ।
मुरली धुन तहां पड़ी सुनाई ॥
सोहंग सोहंग बानी प्रगटी ।
अटल अटूट नहीं अबढ़न अघटी ।
ओम भया सोहंग आकार ।
“हूँया “हूअव्यक्त अपार । ।
सूक्ष्म प्रमाणु दृष्टि सब आये ।
लख लख सुरत निरत हरखाये । ।
माया काल के रूप दिखाने ।
बिन यहां पहुँचे कोई क्यों जाने ।
महाकाल का यह अस्थान ।
तर जप धाम अलौकिक भवन । ।
यही चक्र रचना की आदि ।
लखे सन्त बिरला बिस्माधि ॥
दोहाजो कोई इतने पद चढ़े, काल करे नहीं हान ।
सृष्टि प्रलय उत्पति विषय, का तब पावे ज्ञान ।
महा प्रकाश तेज अधिकाई । ।
कोटि कृष्ण छबि रही लजाई ।
मुरली धुन तहां पड़ी सुनाई ॥
सोहंग सोहंग बानी प्रगटी ।
अटल अटूट नहीं अबढ़न अघटी ।
ओम भया सोहंग आकार ।
“हूँया “हूअव्यक्त अपार । ।
सूक्ष्म प्रमाणु दृष्टि सब आये ।
लख लख सुरत निरत हरखाये । ।
माया काल के रूप दिखाने ।
बिन यहां पहुँचे कोई क्यों जाने ।
महाकाल का यह अस्थान ।
तर जप धाम अलौकिक भवन । ।
यही चक्र रचना की आदि ।
लखे सन्त बिरला बिस्माधि ॥
दोहाजो कोई इतने पद चढ़े, काल करे नहीं हान ।
सृष्टि प्रलय उत्पति विषय, का तब पावे ज्ञान ।
×
Song 75 — Hindi
476. सतगुरु कृपा हंस कोई आया ।
पूछा कौन कहां से आया ।
बोली सुरत संत की दासी ।
सन्त मिले तब भई उदासी ॥
सत्य धाम की आसा धार ।
पहुँची यहां लग संग विचार ॥
हंस सुरत को लेकर साथ ।
चला जहां सत पद पद नाथ ॥
सत्य पुरुष का दर्शन दीन्हा ।
लख प्रकाश रूप सत चीन्हा । ।
कोटिन चन्द्र सूर उजियारी ।
बीन सुनी सत सत धुन भारी ॥
यह है सत सब और असत ।
यह हक नाहक और सब मत ॥
माया काल से ऊचा धाम ।
सन्तन का सतपद सत नाम ।
दोहायही ज्ञान का मूल है, यही रूप की खान ।
सतपद धुरपद आदि पद, अन्तिम पद निरवान । ।
पूछा कौन कहां से आया ।
बोली सुरत संत की दासी ।
सन्त मिले तब भई उदासी ॥
सत्य धाम की आसा धार ।
पहुँची यहां लग संग विचार ॥
हंस सुरत को लेकर साथ ।
चला जहां सत पद पद नाथ ॥
सत्य पुरुष का दर्शन दीन्हा ।
लख प्रकाश रूप सत चीन्हा । ।
कोटिन चन्द्र सूर उजियारी ।
बीन सुनी सत सत धुन भारी ॥
यह है सत सब और असत ।
यह हक नाहक और सब मत ॥
माया काल से ऊचा धाम ।
सन्तन का सतपद सत नाम ।
दोहायही ज्ञान का मूल है, यही रूप की खान ।
सतपद धुरपद आदि पद, अन्तिम पद निरवान । ।
×
Song 76 — Hindi
477. ली दुरबीन सुरत ले बढ़ी ।
आगे अलख अगम पद चढ़ी । ।
कौन लखे लख अलख निशानी ।
कौन कथे यह अकथ कहानी । ।
गम के पार अगम का देस ।
क्या कोई दे तिस का संदेश । ।
मन बानी दोउ रहे अलसाने ।
ज्ञानी योगी भेद न जाने । ।
अलख अगम के पार अनामी ।
अगति अगाध पुरुष राधास्वामी । ।
रूप न रंग न रेख न काया ।
अजर अमर अव्यक्त अमाया ॥
निज प्रकाश शोभा अति भारी ।
राधास्वामी धाम अपारी ॥
यह सत सिंध सत्य निज धाम ।
अनल अचल अधिकार अकाम ।
दोहापाई सतगुरु की दया, आदि अनादि अगाध ।
निज स्वरूप निज रूप, तिन धन चतन्य अबाध ॥
आगे अलख अगम पद चढ़ी । ।
कौन लखे लख अलख निशानी ।
कौन कथे यह अकथ कहानी । ।
गम के पार अगम का देस ।
क्या कोई दे तिस का संदेश । ।
मन बानी दोउ रहे अलसाने ।
ज्ञानी योगी भेद न जाने । ।
अलख अगम के पार अनामी ।
अगति अगाध पुरुष राधास्वामी । ।
रूप न रंग न रेख न काया ।
अजर अमर अव्यक्त अमाया ॥
निज प्रकाश शोभा अति भारी ।
राधास्वामी धाम अपारी ॥
यह सत सिंध सत्य निज धाम ।
अनल अचल अधिकार अकाम ।
दोहापाई सतगुरु की दया, आदि अनादि अगाध ।
निज स्वरूप निज रूप, तिन धन चतन्य अबाध ॥
×
Song 77 — Hindi
478. धन्य धन्य गुरु धन्य दयाला धन्य उदार सुसहज कृपाला ॥
तुम्हारी दया कटी जम फांसी ।
तुम्हरी कृपा अविद्या नासी । ।
जड़ चेतन का बन्ध कटाना ।
सकल उपाधी भरम हटाना । ।
अब नहीं व्यापे काल न माया ।
अब मैं रहूँ न जग उरझाया ।
जीवन मुक्ति दशा चित लाऊँ ।
जल में कमल समान रहाऊँ ।
कर्म अकर्म ज्ञान अज्ञाना ।
द्वन्द अवस्था से बिलगाना ॥
चेतन धन आनन्द धन बासी ।
धन आनन्द न पास सुपासी ॥
जीवन में विदेह गति पाई ।
जनक राज की बजी बधाई ॥
दोहागुरु मिले सीतल भया, दूर भया उत्पात ।
राधास्वामी की दया, काल करे नहीं घात ॥
276
साखी
तुम्हारी दया कटी जम फांसी ।
तुम्हरी कृपा अविद्या नासी । ।
जड़ चेतन का बन्ध कटाना ।
सकल उपाधी भरम हटाना । ।
अब नहीं व्यापे काल न माया ।
अब मैं रहूँ न जग उरझाया ।
जीवन मुक्ति दशा चित लाऊँ ।
जल में कमल समान रहाऊँ ।
कर्म अकर्म ज्ञान अज्ञाना ।
द्वन्द अवस्था से बिलगाना ॥
चेतन धन आनन्द धन बासी ।
धन आनन्द न पास सुपासी ॥
जीवन में विदेह गति पाई ।
जनक राज की बजी बधाई ॥
दोहागुरु मिले सीतल भया, दूर भया उत्पात ।
राधास्वामी की दया, काल करे नहीं घात ॥
276
साखी
×
Song 78 — Hindi
479. शब्द अगम साखी निगम, महिमा अमित महान ।
साखी शब्द को जानिये, निगमागम की खान ॥1 ॥
श्रुति स्मृति का सार है, मर्म न जाने कोय ।
जो कोई पढ़े विचार से, सहजे पंडित होय ॥2 ॥
श्रुति धुनात्मक नाम घट, श्रुति गुरु का बैन ।
मूल शब्द सिद्धान्त है, सुन चित प्रगटे चैन ॥3 ॥
साखी साक्षी स्वरूप है, स्मृति सुमिरन सार । ।
सुरत सखी साखी बनी, शब्द का किया निरवार ॥4 ॥
राधास्वामी नाम है, सुरत शब्द भंडार ।
भाग्यवती गुरु नाम से, उपजे विमल विचार ॥5 ॥
साखी शब्द को जानिये, निगमागम की खान ॥1 ॥
श्रुति स्मृति का सार है, मर्म न जाने कोय ।
जो कोई पढ़े विचार से, सहजे पंडित होय ॥2 ॥
श्रुति धुनात्मक नाम घट, श्रुति गुरु का बैन ।
मूल शब्द सिद्धान्त है, सुन चित प्रगटे चैन ॥3 ॥
साखी साक्षी स्वरूप है, स्मृति सुमिरन सार । ।
सुरत सखी साखी बनी, शब्द का किया निरवार ॥4 ॥
राधास्वामी नाम है, सुरत शब्द भंडार ।
भाग्यवती गुरु नाम से, उपजे विमल विचार ॥5 ॥
×
Song 79 — Hindi
480. कथा कीर्तन जगत में, अति उत्तम व्यवहार ।
भाग्यवती इस जगत से, गह परमारथ सार ॥1 ॥
कथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे विचार ।
भाग्यवती व्यापे नहीं, उसको अशुभ विकार ॥2 ॥
कथा कीर्तन सुगम है, तू इसको चित दे ।
भाग्यवती संसार में, धर्म मुक्ति फल ले ॥3 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, त्याग मोह मद काम । ।
भाग्यवती भव दुख मिटे, मन पाये विश्राम ॥4 ॥
नाय पड़ी मंझधार में, केहि विधि उतरे पार ।
भाग्यवती गुरु नाम ले, कथा कीर्तन सार ॥5 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, सतगुरु के आधार । ।
भाग्यवती सहजे मिले, सत दयाल करतार ॥6 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भक्ति साज दल साज ।
भाग्यवती मन में जुड़े, मंगल मोद समाज ॥7 ॥
कथा कीतेन सार है, साधन सुगम सुभाव । ।
भाग्यवती जग तरन का, नही कोई और उपात्र ॥8 ॥
कथा कीर्तन के किये, उपजे हृदय विवेक ।
भाग्यवती इस विधि लहे, इष्ट देव की टेक ॥6 ॥
कथा कीर्तन ध्यान है, सुमिरन भजन सुसंग ।
भाग्यवती सहजे बने, कीट से भृग सुरंग ॥10 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भाग्यवती निष्काम ।
ऐड़ी से चोटी तलक, व्यापे गुरु का नाम ॥11 ॥
कथा कीर्तन में रहे, ज्ञान भक्ति का मूल ।
भाग्यवती सब भूल जा, किचिंत इसे न भूल ॥12 ॥
कथा कीर्तन में बसे, जप तप परम विराग ।
भाग्यवती कर ग्रहन यह, और सबन को त्याग ॥13 ॥
कथा कीर्तन में बसें, डार पात फल फूल ।
भाग्यवती अब क्या गहे, गह लिया भक्ति का मूल ॥14 ॥
कथा कीर्तन का मिला, दान तो हुई निहाल ।
ध्यान गर्म से भाग्यवती, प्रगटे गोद दयाल ॥1 ॥
आंख कान मुख नासिका, मस्तक तन भये गोद ।
खेले गोद दयाल नित, भाग्यवती लह मोद ॥16 ॥
लाल दयाल हुए मेरे, मैं हो गई निहाल ।
भाग्यवती लख लाल को, व्यापा चहुँ दिस लाल ॥17 ॥
लाली अपने लाल की, जहां देखू तहां लाल । ।
भाग्यवती खोजे किसे, यहां वहां लाल दयाल ॥18 ॥
लाल लाल सब लाल है, प्रगटा लाल गुलाल ।
भाग्यवती सहजे तरी, सतगुरु हुये दयाल ॥16 ॥
कथा कीर्तन में मिला, राधास्वामी नाम ।
भाग्यवती हुई मगन मन, सब विधि पूरन काम ॥20 ॥
राधास्वामी गायकर, जनम सुफल कर ले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने घर ले ॥21 ॥
॥
चौगई ॥
भाग्यवती इस जगत से, गह परमारथ सार ॥1 ॥
कथा कीर्तन रात दिन, जो कोई करे विचार ।
भाग्यवती व्यापे नहीं, उसको अशुभ विकार ॥2 ॥
कथा कीर्तन सुगम है, तू इसको चित दे ।
भाग्यवती संसार में, धर्म मुक्ति फल ले ॥3 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, त्याग मोह मद काम । ।
भाग्यवती भव दुख मिटे, मन पाये विश्राम ॥4 ॥
नाय पड़ी मंझधार में, केहि विधि उतरे पार ।
भाग्यवती गुरु नाम ले, कथा कीर्तन सार ॥5 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, सतगुरु के आधार । ।
भाग्यवती सहजे मिले, सत दयाल करतार ॥6 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भक्ति साज दल साज ।
भाग्यवती मन में जुड़े, मंगल मोद समाज ॥7 ॥
कथा कीतेन सार है, साधन सुगम सुभाव । ।
भाग्यवती जग तरन का, नही कोई और उपात्र ॥8 ॥
कथा कीर्तन के किये, उपजे हृदय विवेक ।
भाग्यवती इस विधि लहे, इष्ट देव की टेक ॥6 ॥
कथा कीर्तन ध्यान है, सुमिरन भजन सुसंग ।
भाग्यवती सहजे बने, कीट से भृग सुरंग ॥10 ॥
कथा कीर्तन कीजिये, भाग्यवती निष्काम ।
ऐड़ी से चोटी तलक, व्यापे गुरु का नाम ॥11 ॥
कथा कीर्तन में रहे, ज्ञान भक्ति का मूल ।
भाग्यवती सब भूल जा, किचिंत इसे न भूल ॥12 ॥
कथा कीर्तन में बसे, जप तप परम विराग ।
भाग्यवती कर ग्रहन यह, और सबन को त्याग ॥13 ॥
कथा कीर्तन में बसें, डार पात फल फूल ।
भाग्यवती अब क्या गहे, गह लिया भक्ति का मूल ॥14 ॥
कथा कीर्तन का मिला, दान तो हुई निहाल ।
ध्यान गर्म से भाग्यवती, प्रगटे गोद दयाल ॥1 ॥
आंख कान मुख नासिका, मस्तक तन भये गोद ।
खेले गोद दयाल नित, भाग्यवती लह मोद ॥16 ॥
लाल दयाल हुए मेरे, मैं हो गई निहाल ।
भाग्यवती लख लाल को, व्यापा चहुँ दिस लाल ॥17 ॥
लाली अपने लाल की, जहां देखू तहां लाल । ।
भाग्यवती खोजे किसे, यहां वहां लाल दयाल ॥18 ॥
लाल लाल सब लाल है, प्रगटा लाल गुलाल ।
भाग्यवती सहजे तरी, सतगुरु हुये दयाल ॥16 ॥
कथा कीर्तन में मिला, राधास्वामी नाम ।
भाग्यवती हुई मगन मन, सब विधि पूरन काम ॥20 ॥
राधास्वामी गायकर, जनम सुफल कर ले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने घर ले ॥21 ॥
॥
चौगई ॥
×
Song 80 — Hindi
481. गधास्वामी मेरे धीर गम्भीर ।
राधास्वामी जोधा राधास्वामी वीर । ।
गधास्वामी गुन आगर गुन नागर ।
राधास्वामी दया प्रेम के सागर । ।
गधास्वामी सुरत शब्द भंडारा ।
राधास्वामी मन बानी के पारा ।
गधास्वामी अधिष्ठान आधार ।
राधास्वामी अचल अटल भव पार । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याऊँ ॥
दोहापतित पावन भय नसावन, दया करुना रूप ।
राधास्वामी सन्त सतगुरु, पद अगाध अनूप । ।
गधास्वामी नाम जो चित से धारे ।
सहज जाय भव सागर पारे ।
गधास्वामी नाम हिये से गावे ।
करम भरम के फन्द कटावे । ।
राधास्वामी नाम नाम निज नामा ।
जो गावे सो पूरन कामा । ।
गधास्वामी महिमा बरनि न जाय ।
शेष महेश रहे सकुचाय ॥
राधास्वामी सुमिर सुमिर राधास्वामी ।
राधास्वामी चरनन सदा नमामी
दोहाबसे हृदय में हमारे, राधास्वामी जान हो ।
राधास्वामी ठहरे मन के, ज्ञान सत अनुमान हो ।
गधास्वामी सन्त भेष जब धारा ।
राधास्वामी रूप लगा अति प्यारा ॥
गधास्वामी भाव बसा जब मन में ।
राधास्वामी छवि छाई नेनन में ॥
राधास्वामी शब्द पड़ा श्रवन में ।
जाग सुरत लगी शब्द जतन में ।
कुण्डलिनी शक्ती सुरत वारी ।
बसी सहसदल मूलाधारी । ।
राधास्वामी शब्द रूप जब परखी ।
खिसकी अधर धाम गति निरखी ॥
दोहात्रिकुटी महल में आन पहुँची, ओम् के दरबार ।
धुन मृदंग कानों सुनी, मिला पद ओंकार ॥
राधास्वामी अलख अगम राधास्वामी ।
राधास्वामी ताल सुसम राधास्वामी ॥
राधास्वामी नाम अनाम अनामी ।
राधास्वामी इष्ट धाम निज धामी ॥
राधास्वामी शब्द सुरत के पार ।
राधास्वामी शब्द शब्द से न्यार । ।
राधास्वामी धुन राधास्वामी राग ।
राधास्वामी प्रेम भक्ति बेराग ॥
राधास्वामी चमन फल राधास्वामी ।
राधास्वामी पौद मूल राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी नाम में जी, रत रहे दिन रैन ।
राधास्वामी की दया से, पावे आनन्द चैन ।
सतपद सत्य रूप राधास्वामी ।
सोहंग भवर भूप राधास्वामी ॥
निःअक्षर पद शून्याकार ।
अक्षर धाम रूप ओंकार । ।
क्षर में सहस सहस के भाव ।
राधास्वामी नाम से लहे उपाय ॥
आदि अनादि जुगादि अनाम ।
राधास्वामी अर्थ धर्म सतकाम । ।
राधास्वामी मुक्ति युक्ति निरवान ।
राधास्वामी भक्ति भजन विज्ञान ।
दोहाराधास्वामी नाम धन नित, सुरत निरत से गाइये ।
राधास्वामी पद कमल में, अपना सीस झुकाइये ॥
राधास्वामी जोधा राधास्वामी वीर । ।
गधास्वामी गुन आगर गुन नागर ।
राधास्वामी दया प्रेम के सागर । ।
गधास्वामी सुरत शब्द भंडारा ।
राधास्वामी मन बानी के पारा ।
गधास्वामी अधिष्ठान आधार ।
राधास्वामी अचल अटल भव पार । ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याऊँ ॥
दोहापतित पावन भय नसावन, दया करुना रूप ।
राधास्वामी सन्त सतगुरु, पद अगाध अनूप । ।
गधास्वामी नाम जो चित से धारे ।
सहज जाय भव सागर पारे ।
गधास्वामी नाम हिये से गावे ।
करम भरम के फन्द कटावे । ।
राधास्वामी नाम नाम निज नामा ।
जो गावे सो पूरन कामा । ।
गधास्वामी महिमा बरनि न जाय ।
शेष महेश रहे सकुचाय ॥
राधास्वामी सुमिर सुमिर राधास्वामी ।
राधास्वामी चरनन सदा नमामी
दोहाबसे हृदय में हमारे, राधास्वामी जान हो ।
राधास्वामी ठहरे मन के, ज्ञान सत अनुमान हो ।
गधास्वामी सन्त भेष जब धारा ।
राधास्वामी रूप लगा अति प्यारा ॥
गधास्वामी भाव बसा जब मन में ।
राधास्वामी छवि छाई नेनन में ॥
राधास्वामी शब्द पड़ा श्रवन में ।
जाग सुरत लगी शब्द जतन में ।
कुण्डलिनी शक्ती सुरत वारी ।
बसी सहसदल मूलाधारी । ।
राधास्वामी शब्द रूप जब परखी ।
खिसकी अधर धाम गति निरखी ॥
दोहात्रिकुटी महल में आन पहुँची, ओम् के दरबार ।
धुन मृदंग कानों सुनी, मिला पद ओंकार ॥
राधास्वामी अलख अगम राधास्वामी ।
राधास्वामी ताल सुसम राधास्वामी ॥
राधास्वामी नाम अनाम अनामी ।
राधास्वामी इष्ट धाम निज धामी ॥
राधास्वामी शब्द सुरत के पार ।
राधास्वामी शब्द शब्द से न्यार । ।
राधास्वामी धुन राधास्वामी राग ।
राधास्वामी प्रेम भक्ति बेराग ॥
राधास्वामी चमन फल राधास्वामी ।
राधास्वामी पौद मूल राधास्वामी। ।
दोहाराधास्वामी नाम में जी, रत रहे दिन रैन ।
राधास्वामी की दया से, पावे आनन्द चैन ।
सतपद सत्य रूप राधास्वामी ।
सोहंग भवर भूप राधास्वामी ॥
निःअक्षर पद शून्याकार ।
अक्षर धाम रूप ओंकार । ।
क्षर में सहस सहस के भाव ।
राधास्वामी नाम से लहे उपाय ॥
आदि अनादि जुगादि अनाम ।
राधास्वामी अर्थ धर्म सतकाम । ।
राधास्वामी मुक्ति युक्ति निरवान ।
राधास्वामी भक्ति भजन विज्ञान ।
दोहाराधास्वामी नाम धन नित, सुरत निरत से गाइये ।
राधास्वामी पद कमल में, अपना सीस झुकाइये ॥
×
Song 81 — Hindi
482. राधास्वामी साँस भास राधास्वामी ।
राधास्वामी भाव आस राधास्वामी राधास्वामी प्रान व्यान राधास्वामी ।
सम समता समान राधास्वामी ।
तीजे तिल उदान राधास्वामी ।
मूला चक्र अपान राधास्वामी ॥
राधास्वामी श्रोत्र नैन राधा मी ।
राधास्वामी वचन बैन राधास्वामी राधा अंतर राधास्वामी बाहर ।
राधास्वामी घट राधारामी जाहिर ।
दोहा दृष्टि सृष्टि दृश्य को लखि, राधास्वामी गाइये ।
राधास्वामी की दया से, राधारामी पाइये ॥
गधास्वामी ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
राधास्वामी देवी देव गनेशा ॥
गधास्वामी ब्रह्म ब्रह्म के भेस ।
राधास्वामी परब्रह्म के देस ।
गधास्वामी ईश्वर और परमेश्वर ।
राधास्वामी अक्षर और निःअक्षर । ।
गधास्वामी सम कोई और न जानू ।
राधास्वामी सबमें व्यापक मानू ।
मापको करूँ प्रनाम सप्रीती ।
गुरुपद इष्ट यही शुभ नीती ॥
दोहा राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी ध्यान हो ।
राधास्वामी धुन का अन्तर, ऊँचे घाट में गान हो ।
गधास्वामी पंथ राधास्वामी पंथी ।
राधास्वामी ग्रन्थ राधास्वामी ग्रन्थी गधास्वामी लोक वेद राधास्वामी ।
राधास्वामी मर्म भेद राधास्वामी गधास्वामी नाम से नाता जोड़ा ।
जगत के मत से नाता जोड़ा ।
गधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी।राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी उनु बैठे खड़े उताने ।
राधास्वामी भजत रहूँ मन माने ।
दोहासांस सांस में सुमिर गुरु को, गुरु के ध्यान में मगन हो ।
लाग सच्ची मन से हो, इस रीति सच्ची लगन हो ॥
गधास्वामी जोति राधासामी झाई ।
राधास्वामी दीप दीप परछाई गधास्वामी जाग्रत राधास्वामी सुपने ।
सुषुप्ति में राधास्वामी अपने गधास्वामी तुरिया तुरियातीत ।
राधास्वामी पद दोनों से अतीत गधास्वामी लोक लोक से न्यारे ।
राधास्वामी उदासीन सत प्यारे जल थल पावक गगन समीरा ।
राधास्वामी के सब देह शरीरा दोहा सब में व्यापक सबसे न्यारा, राधास्वामी का है रूप ।
रूप रंग नहीं कोई अद्भुत, विचित्र अगम अनूप ।
गधास्वामी सुन राधास्वामी गुन ।
राधारामी राग ताल सम धुन गहमकमलदल राधास्वामी गाना ।
घंटा शंख के शब्द अनुमाना ।
त्रिकुटी राधासामी ओम् अलाए ।
ज्यों मृदंग थप थापा थाप । ।
सुन्न में राधास्वामी रारंकार ।
भँवर बांसुरी सोहंकार ॥
सतपद बीन मधुर धुन गाजी ।
सत्त सत्त राग निज साजी । ।
दोहाऐसा हो अभ्यास निस दिन, सुरत शब्द की रीति से ।
राधास्वामी अलख अगम को, पाइये परतीत से ॥
राधास्वामी भाव आस राधास्वामी राधास्वामी प्रान व्यान राधास्वामी ।
सम समता समान राधास्वामी ।
तीजे तिल उदान राधास्वामी ।
मूला चक्र अपान राधास्वामी ॥
राधास्वामी श्रोत्र नैन राधा मी ।
राधास्वामी वचन बैन राधास्वामी राधा अंतर राधास्वामी बाहर ।
राधास्वामी घट राधारामी जाहिर ।
दोहा दृष्टि सृष्टि दृश्य को लखि, राधास्वामी गाइये ।
राधास्वामी की दया से, राधारामी पाइये ॥
गधास्वामी ब्रह्मा विष्णु महेशा ।
राधास्वामी देवी देव गनेशा ॥
गधास्वामी ब्रह्म ब्रह्म के भेस ।
राधास्वामी परब्रह्म के देस ।
गधास्वामी ईश्वर और परमेश्वर ।
राधास्वामी अक्षर और निःअक्षर । ।
गधास्वामी सम कोई और न जानू ।
राधास्वामी सबमें व्यापक मानू ।
मापको करूँ प्रनाम सप्रीती ।
गुरुपद इष्ट यही शुभ नीती ॥
दोहा राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी ध्यान हो ।
राधास्वामी धुन का अन्तर, ऊँचे घाट में गान हो ।
गधास्वामी पंथ राधास्वामी पंथी ।
राधास्वामी ग्रन्थ राधास्वामी ग्रन्थी गधास्वामी लोक वेद राधास्वामी ।
राधास्वामी मर्म भेद राधास्वामी गधास्वामी नाम से नाता जोड़ा ।
जगत के मत से नाता जोड़ा ।
गधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी।राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी उनु बैठे खड़े उताने ।
राधास्वामी भजत रहूँ मन माने ।
दोहासांस सांस में सुमिर गुरु को, गुरु के ध्यान में मगन हो ।
लाग सच्ची मन से हो, इस रीति सच्ची लगन हो ॥
गधास्वामी जोति राधासामी झाई ।
राधास्वामी दीप दीप परछाई गधास्वामी जाग्रत राधास्वामी सुपने ।
सुषुप्ति में राधास्वामी अपने गधास्वामी तुरिया तुरियातीत ।
राधास्वामी पद दोनों से अतीत गधास्वामी लोक लोक से न्यारे ।
राधास्वामी उदासीन सत प्यारे जल थल पावक गगन समीरा ।
राधास्वामी के सब देह शरीरा दोहा सब में व्यापक सबसे न्यारा, राधास्वामी का है रूप ।
रूप रंग नहीं कोई अद्भुत, विचित्र अगम अनूप ।
गधास्वामी सुन राधास्वामी गुन ।
राधारामी राग ताल सम धुन गहमकमलदल राधास्वामी गाना ।
घंटा शंख के शब्द अनुमाना ।
त्रिकुटी राधासामी ओम् अलाए ।
ज्यों मृदंग थप थापा थाप । ।
सुन्न में राधास्वामी रारंकार ।
भँवर बांसुरी सोहंकार ॥
सतपद बीन मधुर धुन गाजी ।
सत्त सत्त राग निज साजी । ।
दोहाऐसा हो अभ्यास निस दिन, सुरत शब्द की रीति से ।
राधास्वामी अलख अगम को, पाइये परतीत से ॥
×
Song 82 — Hindi
483. राधास्वामी अगम अनाम अनूपा ।
राधास्वामी अलख अपार अरूपा ॥
राधास्वामी दीनबन्धु जग दाता ।
राधास्वामी सबके पितु और माता। ।
राधास्वामी गुप्त प्रकट राधास्वामी ।
राधास्वामी अघट सुघट राधास्वामी
राधास्वामी यहां वहाँ राधास्वामी ।
राधास्वामी जहां तहां राधास्वामी
पृथ्वी आकास गगन राधास्वामी ।
ऊसर परबत बन राधास्वामी ॥
दोहादृश्य तेरा रात दिन, आँखों में अब आकर रहे ।
शब्द तेरा कान में हो, नाम मुख रसना लहे ॥
राधास्वामी वार पार राधास्वामी ।
राधास्वामी तट मझार राधास्वामी राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी तीन चार और एक न मानू ।
सब में व्यापक राधास्वामी मानू ॥
राधास्वामी घट में किया निवासा |
राधास्वामी चहुँदिस किया प्रकाशा
राधास्वामी चरन कमल में बास ।
राधास्वामी रात दिवस मेरे पास ॥
दोहा ऐसा सुमिरन नाम का हो, टूटने पाये न तार ।
राधास्वामी जीत राधा, स्वामी मन के मेरे हार ।
राधास्वामी चन्द्र जोत राधास्वामी राधास्वामी
सिंध सोत राधास्वामी राधास्वामी कला सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी वृक्ष मूल राधास्वामी। ।
राधास्वामी जान प्रान राधास्त्रामी राधास्वामी ज्ञान मान
राधास्वामी सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
राधास्वामी शब्द तान राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामीराधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
दोहामुझको अपने पद का ऐसा, प्रेम गहरा दीजिये ।
अपना जन मुझको बनाकर, तब शरन में लीजिये ।
राधास्वामी आये जीव उबारन ।
राधास्वामी सहज बने जग तारन ।
सन्त भेस धर यहाँ चल आये ।
राधास्वामी जीव को अंग लगाये । ।
राधास्वामी जीव जन्तु घट वासी ।
राधास्वामी अमल विमल सुखरासी राधास्वामी निराधार आधारा ।
राधास्वामी वार पार से न्यारा ॥
राधास्वामी राधास्वामी बारम्बारा ।
कहत सुनत रहूँ सहित विचारा ॥
दोहादया कीजे महर कीजे, भक्ति दीजे दीन को ।
सिंध की सद्गति में दीजे, बासा अपने मीन को ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी जान जान से प्यारे ।
राधास्वामी मेरे आँखों के तारे ।
मेरे हृदय करें निवास ।
राधास्वामी मैं निज दास ।
सांस साँस भजू राधास्वामी ।
आस भास सुमिरू राधास्वामी ॥
राधास्वामी मंगल मंगलकारी ।
राधास्वामी पाय न रहूँ दुखारी । ।
दोहा तारिये और तार लीजे, नाम रतन का दान दे ।
राधास्वामी अपना कीजे, चरन शरन की ओट दे ॥
राधास्वामी अलख अपार अरूपा ॥
राधास्वामी दीनबन्धु जग दाता ।
राधास्वामी सबके पितु और माता। ।
राधास्वामी गुप्त प्रकट राधास्वामी ।
राधास्वामी अघट सुघट राधास्वामी
राधास्वामी यहां वहाँ राधास्वामी ।
राधास्वामी जहां तहां राधास्वामी
पृथ्वी आकास गगन राधास्वामी ।
ऊसर परबत बन राधास्वामी ॥
दोहादृश्य तेरा रात दिन, आँखों में अब आकर रहे ।
शब्द तेरा कान में हो, नाम मुख रसना लहे ॥
राधास्वामी वार पार राधास्वामी ।
राधास्वामी तट मझार राधास्वामी राधास्वामी आदि अंत राधास्वामी ।
राधास्वामी साध संत राधास्वामी तीन चार और एक न मानू ।
सब में व्यापक राधास्वामी मानू ॥
राधास्वामी घट में किया निवासा |
राधास्वामी चहुँदिस किया प्रकाशा
राधास्वामी चरन कमल में बास ।
राधास्वामी रात दिवस मेरे पास ॥
दोहा ऐसा सुमिरन नाम का हो, टूटने पाये न तार ।
राधास्वामी जीत राधा, स्वामी मन के मेरे हार ।
राधास्वामी चन्द्र जोत राधास्वामी राधास्वामी
सिंध सोत राधास्वामी राधास्वामी कला सूर राधास्वामी ।
राधास्वामी वृक्ष मूल राधास्वामी। ।
राधास्वामी जान प्रान राधास्त्रामी राधास्वामी ज्ञान मान
राधास्वामी सुमिरन भजन ध्यान राधास्वामी ।
राधास्वामी शब्द तान राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामीराधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
दोहामुझको अपने पद का ऐसा, प्रेम गहरा दीजिये ।
अपना जन मुझको बनाकर, तब शरन में लीजिये ।
राधास्वामी आये जीव उबारन ।
राधास्वामी सहज बने जग तारन ।
सन्त भेस धर यहाँ चल आये ।
राधास्वामी जीव को अंग लगाये । ।
राधास्वामी जीव जन्तु घट वासी ।
राधास्वामी अमल विमल सुखरासी राधास्वामी निराधार आधारा ।
राधास्वामी वार पार से न्यारा ॥
राधास्वामी राधास्वामी बारम्बारा ।
कहत सुनत रहूँ सहित विचारा ॥
दोहादया कीजे महर कीजे, भक्ति दीजे दीन को ।
सिंध की सद्गति में दीजे, बासा अपने मीन को ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी जान जान से प्यारे ।
राधास्वामी मेरे आँखों के तारे ।
मेरे हृदय करें निवास ।
राधास्वामी मैं निज दास ।
सांस साँस भजू राधास्वामी ।
आस भास सुमिरू राधास्वामी ॥
राधास्वामी मंगल मंगलकारी ।
राधास्वामी पाय न रहूँ दुखारी । ।
दोहा तारिये और तार लीजे, नाम रतन का दान दे ।
राधास्वामी अपना कीजे, चरन शरन की ओट दे ॥
×
Song 83 — Hindi
484. उत्तम वृत्ती सहज की, सहज भाव चित दे ।
सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥1 ॥
सहजा वृती उत्तमा, मध्य धारना ध्यान ।
अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥2 ॥
जाकी जैसी प्रकृति, तसे तिस का काम । ।
छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥3 ॥
जो बन आवे सहज में, सोई सहज का रूप ।
जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप ॥4 ॥
सहज सहज जो सहज विधि, सो फल मीठा होय ।
और युक्ति से जो पके, सुन्दर मधुर न सोय ॥5 ॥
साधन सुमिरन सहज का, सहजाहि सहज विधान । ।
सहज वृद्धि सहज आचरन, अन्त सहज निर्वान ॥6 ॥
निर्विकल्प सविकल्प नहीं, उत्तम सहज समाध ।
सहज समाध सहजहि मिले, छूटे सहज उपाध ॥
जा सहज में नहीं कठिनता, सीख सहज मत रीत । ।
साधन सहज की प्रबलता, उपजे प्रेम प्रतीत ॥8 ॥
प्रेम प्रतीत सहज विधि, कठिन न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, भरम न छूटे ग्रन्थ ॥6 ॥
ग्रन्थ पढ़ा तो क्या भया, मिला न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम युक्ति सहजे खुले, जड़ चेतन की ग्रन्थ ॥10 ॥
सुरत शब्द अभ्यास से, वृत्ति सहज हो प्राप्त ।
निज अनुभव साक्षात्कार, सहज शब्द मत आप्त ॥11 ॥
सहज इन्द्री का ज्ञान है, सहज ज्ञान अनुमान ।
सहज शब्द निज ज्ञान है, यही है मुख्य प्रमान ॥12 ॥
तुझमें मान प्रमान है, तुझमें ज्ञान अनुमान है ।
तुझमें शब्द की खान है, आप्त बचन सुन कान ॥13 ॥
कठिन ग्रन्थ की जेवरी, बंधि रहे चतुर सुजान । ।
निज अनुभव सूझा नहीं, पाया वाचक ज्ञान ॥14 ॥
वाचक ज्ञान को त्याग दे, महा कठिन व्यवहार । ।
प्रेम प्रतीत प्रभाव से, पावे उत्तम सार ॥15 ॥
सहज रीति सत्संग कर, सहज श्रवन और मनन ।
सहज शब्द अभ्यास है, सुमिरन सहज भजन ॥16 ॥
मिश्री जब जल से मिली, होगई जल का अंग। ।
वैसे ही गुरु के संग को, समझ सत्य का अंग ॥17 ॥
नोन गला पानी भया, भरे कौन अब गोन ।
सतसंगत परताप से, मन बानी चित मौन ॥18 ॥
सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥1 ॥
सहजा वृती उत्तमा, मध्य धारना ध्यान ।
अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥2 ॥
जाकी जैसी प्रकृति, तसे तिस का काम । ।
छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥3 ॥
जो बन आवे सहज में, सोई सहज का रूप ।
जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप ॥4 ॥
सहज सहज जो सहज विधि, सो फल मीठा होय ।
और युक्ति से जो पके, सुन्दर मधुर न सोय ॥5 ॥
साधन सुमिरन सहज का, सहजाहि सहज विधान । ।
सहज वृद्धि सहज आचरन, अन्त सहज निर्वान ॥6 ॥
निर्विकल्प सविकल्प नहीं, उत्तम सहज समाध ।
सहज समाध सहजहि मिले, छूटे सहज उपाध ॥
जा सहज में नहीं कठिनता, सीख सहज मत रीत । ।
साधन सहज की प्रबलता, उपजे प्रेम प्रतीत ॥8 ॥
प्रेम प्रतीत सहज विधि, कठिन न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, भरम न छूटे ग्रन्थ ॥6 ॥
ग्रन्थ पढ़ा तो क्या भया, मिला न प्रेम का पन्थ ।
प्रेम युक्ति सहजे खुले, जड़ चेतन की ग्रन्थ ॥10 ॥
सुरत शब्द अभ्यास से, वृत्ति सहज हो प्राप्त ।
निज अनुभव साक्षात्कार, सहज शब्द मत आप्त ॥11 ॥
सहज इन्द्री का ज्ञान है, सहज ज्ञान अनुमान ।
सहज शब्द निज ज्ञान है, यही है मुख्य प्रमान ॥12 ॥
तुझमें मान प्रमान है, तुझमें ज्ञान अनुमान है ।
तुझमें शब्द की खान है, आप्त बचन सुन कान ॥13 ॥
कठिन ग्रन्थ की जेवरी, बंधि रहे चतुर सुजान । ।
निज अनुभव सूझा नहीं, पाया वाचक ज्ञान ॥14 ॥
वाचक ज्ञान को त्याग दे, महा कठिन व्यवहार । ।
प्रेम प्रतीत प्रभाव से, पावे उत्तम सार ॥15 ॥
सहज रीति सत्संग कर, सहज श्रवन और मनन ।
सहज शब्द अभ्यास है, सुमिरन सहज भजन ॥16 ॥
मिश्री जब जल से मिली, होगई जल का अंग। ।
वैसे ही गुरु के संग को, समझ सत्य का अंग ॥17 ॥
नोन गला पानी भया, भरे कौन अब गोन ।
सतसंगत परताप से, मन बानी चित मौन ॥18 ॥
×
Song 84 — Hindi
485. चित चरनों से जोड़िये, साक्षी भाव समान ।
तब सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥1 ॥
सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ।
सहज भजन और ध्यान हो, सहजहि सुमिरन नाम ।।2। ।
सहज भाव को समझ लो, कठिनाई को त्याग । ।
कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥3 ॥
सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ।
कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥4 ॥
सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ।
सहज वृत्ति है नम्रता, खींच तान अभिमान ॥5 ॥
सहज मौज की रीति है, सहज चले जो कोय ।
सहज भाव अन्तर बसे, घट मे दर्शन होय ॥6 ॥
सुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सहज सहज सुमिरन करो, एक दिन गुरु मिल जाय॥7 ॥
सहज समाना सहज में, सहजे चित्त में चेत ।
माधन सहज सुलभ सदा, सहजहि से हो हेत ॥8 ॥
राधास्वामी की दया, सहज योग चित लाय ।
भव तरने का सेत यह, और न कोई उपाय ॥6 ॥
तब सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥1 ॥
सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ।
सहज भजन और ध्यान हो, सहजहि सुमिरन नाम ।।2। ।
सहज भाव को समझ लो, कठिनाई को त्याग । ।
कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥3 ॥
सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ।
कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥4 ॥
सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ।
सहज वृत्ति है नम्रता, खींच तान अभिमान ॥5 ॥
सहज मौज की रीति है, सहज चले जो कोय ।
सहज भाव अन्तर बसे, घट मे दर्शन होय ॥6 ॥
सुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ।
सहज सहज सुमिरन करो, एक दिन गुरु मिल जाय॥7 ॥
सहज समाना सहज में, सहजे चित्त में चेत ।
माधन सहज सुलभ सदा, सहजहि से हो हेत ॥8 ॥
राधास्वामी की दया, सहज योग चित लाय ।
भव तरने का सेत यह, और न कोई उपाय ॥6 ॥
×
Song 85 — Hindi
486. करनी से चित लाइये, तजिये बचन असार ।
कथनी है निश्फल सदा, अपने हृदय विचार ॥1 ॥
संशय भरम को त्याग कर, करनी को चित दे ।
करनी से रहनी मिले, गुरु भक्ति फल ले ॥2 ॥
कथनी है निश्फल सदा, अपने हृदय विचार ॥1 ॥
संशय भरम को त्याग कर, करनी को चित दे ।
करनी से रहनी मिले, गुरु भक्ति फल ले ॥2 ॥
रत्ती भक्ति नाम की, फल लावे तत्काल ।
बात चीत में जो फसा, ताहि सतावे काल ॥3 ॥
बातों में है क्या धरा, बात बात की बात ।
बात से नहीं परदा खुले, लख केले का पात ॥4 ॥
सहज कमाई नाम की, नाम से लौ रहे लाग ।
राधास्वामी की दया, पावे भाग सुभाग ॥5 ॥
×
Song 86 — Hindi
487. सबसे उत्तम शील धन, जाने कोई सुशील ।
और सकल निरधन यहाँ, शील बिना सब भील ॥1 ॥
नम्र भाव चित में बसे, प्रेम हिये में व्याप ।
नर सुशील के तन बदन, साहब बसता आप ॥2 ॥
साहब शील महान है, शीलबन्त है दास ।
शील का धन जब मिलगया, दास न रहे उदास ॥3 ॥
बड़ा पदारथ शील है, शील क्षमा का रूप ।
जिसमें शील क्षमा नहीं, बड़े भव जल कूप ॥4 ॥
शील ज्ञान दोऊ एक है, मन में रहे विचार ।
राधास्वामी की दया, भव से बेड़ा पार ॥5 ॥
और सकल निरधन यहाँ, शील बिना सब भील ॥1 ॥
नम्र भाव चित में बसे, प्रेम हिये में व्याप ।
नर सुशील के तन बदन, साहब बसता आप ॥2 ॥
साहब शील महान है, शीलबन्त है दास ।
शील का धन जब मिलगया, दास न रहे उदास ॥3 ॥
बड़ा पदारथ शील है, शील क्षमा का रूप ।
जिसमें शील क्षमा नहीं, बड़े भव जल कूप ॥4 ॥
शील ज्ञान दोऊ एक है, मन में रहे विचार ।
राधास्वामी की दया, भव से बेड़ा पार ॥5 ॥
×
Song 87 — Hindi
488. पर उपकारी आत्मा, सहे न कोई दुख ।
यही तो परमानन्द है, यही सुक्ख है सुख ॥1 ॥
देह मिली तो देह कुछ, देह देह कुछ देह ।
नहीं भरोसा देह का, देह होगई खेह ।।2। ।
खाली आये जगत में, खाली हाथों जाय ।
पर उपकारी आत्मा, दान का द्रव्य कमाय ॥3 ॥
लेना हो सत नाम ले, देना अन्न का दान । ।
राधास्वामी की दया, निश्चल हो कल्यान ॥4 ॥
यही तो परमानन्द है, यही सुक्ख है सुख ॥1 ॥
देह मिली तो देह कुछ, देह देह कुछ देह ।
नहीं भरोसा देह का, देह होगई खेह ।।2। ।
खाली आये जगत में, खाली हाथों जाय ।
पर उपकारी आत्मा, दान का द्रव्य कमाय ॥3 ॥
लेना हो सत नाम ले, देना अन्न का दान । ।
राधास्वामी की दया, निश्चल हो कल्यान ॥4 ॥
×
Song 88 — Hindi
489. जाके मन विश्वास है, सदा रहे गुरु साथ ।
काल कर्म व्यापे नहीं, हाथ में गुरु का हाथ ॥1 ॥
सीस में गुरु मूरत बसे, धरे सीस पर हाथ ।
भय चिंता क्यों हो मुझे, सदा जो गुरु का साथ ॥2 ॥
घट अन्तर बैठक किया, रहना गुरु के संग ।
कैसे फिर संसार से, मेरा चित हो भंग ॥3 ॥
गगन गुरु घट शिष्य है, दो देही एक प्रान ।
सुरत शब्द मेला भया, समझे साधु सुजान ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मिला शब्द का भेद ।
चिंता दुविधा मिट गई, रहा न मन में भेद ॥ ॥
काल कर्म व्यापे नहीं, हाथ में गुरु का हाथ ॥1 ॥
सीस में गुरु मूरत बसे, धरे सीस पर हाथ ।
भय चिंता क्यों हो मुझे, सदा जो गुरु का साथ ॥2 ॥
घट अन्तर बैठक किया, रहना गुरु के संग ।
कैसे फिर संसार से, मेरा चित हो भंग ॥3 ॥
गगन गुरु घट शिष्य है, दो देही एक प्रान ।
सुरत शब्द मेला भया, समझे साधु सुजान ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मिला शब्द का भेद ।
चिंता दुविधा मिट गई, रहा न मन में भेद ॥ ॥
×
Song 89 — Hindi
490 सेवक सेवा में रहे, सेवा में दे चित ।
जो सेवा में आलसी, क्या हो उसका हित ॥1 ॥
आज्ञाकारी सेवका, आज्ञा सीस धरे ।
अपना आपा मेटकर, गुरु की भक्ति करे ॥2 ॥
अपना तो कुछ भी नहीं, गुरु दाता का सब ।
ऐसी समझ जब मन बसे, सेवक कहिये तब ॥3 ॥
करता चन करनी करे, हठ को मन में ठान ।
ऐसे सेवक का कहो, केहि विधि हो कल्यान ॥4 ॥
गुरु मस्तक व्यापे सदा, गुरु को सिर पर धार ।
ऐसा सेवक जगत में, सहे न दुख का भार ॥5 ॥
मनमत त्याग गुरुमत बने, गुरुमत है सिद्धान्त । ।
राधास्वामी की दया, सेवक रहे निर्धान्त ॥6 ॥
जो सेवा में आलसी, क्या हो उसका हित ॥1 ॥
आज्ञाकारी सेवका, आज्ञा सीस धरे ।
अपना आपा मेटकर, गुरु की भक्ति करे ॥2 ॥
अपना तो कुछ भी नहीं, गुरु दाता का सब ।
ऐसी समझ जब मन बसे, सेवक कहिये तब ॥3 ॥
करता चन करनी करे, हठ को मन में ठान ।
ऐसे सेवक का कहो, केहि विधि हो कल्यान ॥4 ॥
गुरु मस्तक व्यापे सदा, गुरु को सिर पर धार ।
ऐसा सेवक जगत में, सहे न दुख का भार ॥5 ॥
मनमत त्याग गुरुमत बने, गुरुमत है सिद्धान्त । ।
राधास्वामी की दया, सेवक रहे निर्धान्त ॥6 ॥
×
Song 90 — Hindi
491 दृष्टि सृष्टि का भेद है, और नहीं कुछ भेद ।
दृष्टि सृष्टि का मर्म लख, मिटे जगत का खेद ॥1 ॥
दृष्टी में सृष्टी रहे, सृष्टि दृष्टि आधार ।
मोर तोर जब दृष्टि में, तब दृष्टी संसार ॥2 ॥
ज्ञान दृष्टि लवलीन जब, ज्ञान सृष्टि तब होय ।
जो अज्ञान है दृष्टि में, सृष्टि अज्ञान की सोय ॥3 ॥
दिल का परदा खोलकर, देख गुरु का रूप ।
गुरु सृष्टि गुरु दृष्टि में, फिर नहीं भव का कूप ॥4 ॥
गुरुमत सृष्टी ज्ञान की, मनमत सृष्टि अज्ञान ।
राधास्वामी की दया, अपना रूप पिछान ॥शा
दृष्टि सृष्टि का मर्म लख, मिटे जगत का खेद ॥1 ॥
दृष्टी में सृष्टी रहे, सृष्टि दृष्टि आधार ।
मोर तोर जब दृष्टि में, तब दृष्टी संसार ॥2 ॥
ज्ञान दृष्टि लवलीन जब, ज्ञान सृष्टि तब होय ।
जो अज्ञान है दृष्टि में, सृष्टि अज्ञान की सोय ॥3 ॥
दिल का परदा खोलकर, देख गुरु का रूप ।
गुरु सृष्टि गुरु दृष्टि में, फिर नहीं भव का कूप ॥4 ॥
गुरुमत सृष्टी ज्ञान की, मनमत सृष्टि अज्ञान ।
राधास्वामी की दया, अपना रूप पिछान ॥शा
×
Song 91 — Hindi
492. सतसंग करना सुगम है, सतसंग किया न सोय ।
पारस से परदा रहे, कंचन केहि विधि होय ॥1 ॥
नाम लिया तो क्या हुआ, बकबक में गये खोय ।
रसना में रस नाम नहिं, सो सुमिरन नहीं होय ॥2 ॥
मनमत है गुरुमत नहीं, चंचल मन को कीन ।
ध्यान ज्ञान बेकाम सब, चित नहीं गुरु में लीन ॥3 ॥
कथनी का सुमिरन किया, कथनी का किया ध्यान ।
अनुभव जागे क्यों तेरा, कथनी का रहा ज्ञान ॥4 ॥
सुरत निरत थिर कीजिये, फिर लीजे गुरु नाम ।
छिन पल के अभ्यास में, सब विधि पूरन काम ॥5 ॥
समझ समझ पग धारिये, पंथ है सुगम सुहेल ।
पंथ में पंथाई चले, जो हो गुरु से मेल ॥6 ॥
गुरु अलग चेला अलग, अलग चाल चले मन ।
मैं तोहि पूछू साधुवा, यह कैसा है जतन ||7||
राधास्वामी नाम भज, धुन आत्मक सो होय ।
वर्णात्मक का काम नहीं, गये वर्ण सब खोय ॥8 ॥
पारस से परदा रहे, कंचन केहि विधि होय ॥1 ॥
नाम लिया तो क्या हुआ, बकबक में गये खोय ।
रसना में रस नाम नहिं, सो सुमिरन नहीं होय ॥2 ॥
मनमत है गुरुमत नहीं, चंचल मन को कीन ।
ध्यान ज्ञान बेकाम सब, चित नहीं गुरु में लीन ॥3 ॥
कथनी का सुमिरन किया, कथनी का किया ध्यान ।
अनुभव जागे क्यों तेरा, कथनी का रहा ज्ञान ॥4 ॥
सुरत निरत थिर कीजिये, फिर लीजे गुरु नाम ।
छिन पल के अभ्यास में, सब विधि पूरन काम ॥5 ॥
समझ समझ पग धारिये, पंथ है सुगम सुहेल ।
पंथ में पंथाई चले, जो हो गुरु से मेल ॥6 ॥
गुरु अलग चेला अलग, अलग चाल चले मन ।
मैं तोहि पूछू साधुवा, यह कैसा है जतन ||7||
राधास्वामी नाम भज, धुन आत्मक सो होय ।
वर्णात्मक का काम नहीं, गये वर्ण सब खोय ॥8 ॥
×
Song 92 — Hindi
493. मनमत मन का दास है, गुरुमत गुरु का दास ।
मनमत सदा उदास है, गुरुमत मन विश्वास ॥1 ॥
गुरुमत मौज अधीन नित, परखे मौज की बात ।
मनमत मन के बन्ध बधे, बिलये दिन और रात ॥2 ॥
दुख सुख सिर ऊपर सहे, भजे गुरु का नाम ।
गुरुमत आनन्द रूप है, दिन के आठों याम ॥3 ॥
गुरुमत शील क्षमा दिया, धारे अपने मन ।
मनमत को है दुख धना, चैन न पावे तन ॥4 ॥
गुरुमत पतिव्रत रूप है, हृदय पिया का ध्यान ।
मनमत है व्यभिचारिणी, भोगे नरक निदान ॥5 ॥
पतिव्रता पति को भजे, एक पति की आस ।
व्यभिचारिन को दुख महा, नहीं आस विश्वास ॥6 ॥
पिउ पिउ पिउ पिउ नित भजे, सदा सुशीला नार ।
ताके शील चरित्र के, गुरु सदा रखवार ॥7 ॥
पतिव्रता मैली भली, भाव आस चित एक ।
मन मैली व्यभिचारिनी, बँधी जो बन्ध अनेक ॥8 ॥
एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास । ।
ऐसी नारि सुन्दर महा, कबहुँ न होय उदास ॥6 ॥
मोती चमके क्रीट संग, गगन में चमके भान ।
पतिव्रता पति संग में, भलके झलक महान ॥10 ॥
पति पत्नी व्यवहार लख, मेरा चित आनन्द ।
यही भोग और जोग है, क्या समझे मतिमन्द ॥11 ॥
ज्ञानी भूला ज्ञान में, जोगी भूला जोग ।
पति पत्नी के मेल का, नहीं समझे संजोग ॥12 ॥
भया सुशीला नारि का, ज्ञान के संग विवाह ।
शील ज्ञान मिल एक हैं, गुरु के हाथ निबाह ॥13 ॥
ज्ञान सुशीला संग नित, प्रेम प्रीति व्यवहार ।
नर का जनम सुफल भया, कोई समझे वर नार ॥14 ॥
राधास्वामी की दया, मिला भक्ति का दान ।
भक्ति के अंग संग रहे, शील दया और ज्ञान ॥15 ॥
मनमत सदा उदास है, गुरुमत मन विश्वास ॥1 ॥
गुरुमत मौज अधीन नित, परखे मौज की बात ।
मनमत मन के बन्ध बधे, बिलये दिन और रात ॥2 ॥
दुख सुख सिर ऊपर सहे, भजे गुरु का नाम ।
गुरुमत आनन्द रूप है, दिन के आठों याम ॥3 ॥
गुरुमत शील क्षमा दिया, धारे अपने मन ।
मनमत को है दुख धना, चैन न पावे तन ॥4 ॥
गुरुमत पतिव्रत रूप है, हृदय पिया का ध्यान ।
मनमत है व्यभिचारिणी, भोगे नरक निदान ॥5 ॥
पतिव्रता पति को भजे, एक पति की आस ।
व्यभिचारिन को दुख महा, नहीं आस विश्वास ॥6 ॥
पिउ पिउ पिउ पिउ नित भजे, सदा सुशीला नार ।
ताके शील चरित्र के, गुरु सदा रखवार ॥7 ॥
पतिव्रता मैली भली, भाव आस चित एक ।
मन मैली व्यभिचारिनी, बँधी जो बन्ध अनेक ॥8 ॥
एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास । ।
ऐसी नारि सुन्दर महा, कबहुँ न होय उदास ॥6 ॥
मोती चमके क्रीट संग, गगन में चमके भान ।
पतिव्रता पति संग में, भलके झलक महान ॥10 ॥
पति पत्नी व्यवहार लख, मेरा चित आनन्द ।
यही भोग और जोग है, क्या समझे मतिमन्द ॥11 ॥
ज्ञानी भूला ज्ञान में, जोगी भूला जोग ।
पति पत्नी के मेल का, नहीं समझे संजोग ॥12 ॥
भया सुशीला नारि का, ज्ञान के संग विवाह ।
शील ज्ञान मिल एक हैं, गुरु के हाथ निबाह ॥13 ॥
ज्ञान सुशीला संग नित, प्रेम प्रीति व्यवहार ।
नर का जनम सुफल भया, कोई समझे वर नार ॥14 ॥
राधास्वामी की दया, मिला भक्ति का दान ।
भक्ति के अंग संग रहे, शील दया और ज्ञान ॥15 ॥
×
Song 93 — Hindi
494. देह धरा तो देह तू , कर्म धर्म सत ज्ञान ।
कर्म धर्म सत ज्ञान से, और का हो कल्यान ॥1 ॥
देह धरा तो देह तू , अन्न द्रव्य का दान ।
अन्न द्रव्य के दान से, तेरा हो कल्यान ॥2 ॥
देह धरा तो देह तू , मुख से मीठे बैन ।
मुख के मीठे बैन से, सबको हो सुख चैन ॥3 ॥
देह धरा तो देह तू , औरों का सन्मान ।
औरन के सम्मान से, तुझे मिलेगा मान ॥4 ॥
देह धरा तो देह तू , सतगुरु का सत नाम ।
सतगुरु के सत नाम से, पावेगा विश्राम ॥5 ॥
देह धरा तो देह तू , प्रेम प्रीत परतीत ।
प्रेम प्रीत परतीत से, होगा तेरा हीत ॥6 ॥
देह धरा तो देह तू , विद्या बुद्धि विचार ।
विद्या बुद्धि विचार से, हो तेरा उपकार ॥7 ॥
देह धरा तो सेव कर, सेवक का यह धर्म ।
सेवा कर गुरु देव की, समझ भक्ति का मर्म ॥8 ॥
देह धरा अच्छा भया, देह देह अब देह ।
धन दे मन दे देह दे, अशरन को दे गेह ॥6 ॥
देह धरा अच्छा भया, जी औरों के हेत ।
औरों का उपकार है, भव तरने का सेत ॥10 ॥
देह धरा तो देह अब, जब लग तेरी देह । ।
देह देह दे देह दे, देह गेह अरु नेह ॥11 ॥
देह धरा तो देह तू , तन मन निज मन देह । ।
देह खेह हो जायगी, फिर कौन कहेगा देह ॥12 ॥
जीना मरना एक है, दोनों एक समान ।
नर की देही जब मिली, कर सबका कल्यान ॥13 ॥
नदी वहे नहीं आपको, फल नहीं खावे पेड़ ।
जो नर ऐसा नहीं है, उसे काल का एड ॥14 ॥
सन्तन का मत है यही, देह देह कुछ देह ।
जो नहीं देगा देह को, देह अन्त में खेह ॥15 ॥
लेना हो सतनाम ले, देना हों अन्न दान ।
लेने देने को समझ, यह सिद्धान्त महान ॥16 ॥
जो देगा लेगा वही, समझ गुरु की बात ।
जो देने वाला नहीं, सहेगा जम की घात ॥17 ॥
अपने लिये न जी कभी, यह गुरु का उपदेश । ।
जीतू औरों के लिये, यह है सन्त सन्देश ॥18 ॥
मरा जो औरों के लिये, वह जीवित है नर ।
जिया जो अपने देह को, वह है कूकर खर ॥16 ॥
सेवक सेवा करे नित, सेवा गुरु की रीत ।
सेवा के परताप से, लेगा काल को जीत ॥20 ॥
काल कर्म को जीतकर, चल सतगुरु के धाम । ।
धुरपद सतपद पहुँच कर, ले सच्चा विश्राम ॥21 ॥
मात्र लेना हो सो जल्द ले, कही सुनी मत मान ।
लेना दान का रूप है, गुरु बानी परमान ॥22 ॥
कर्म धर्म सत ज्ञान से, और का हो कल्यान ॥1 ॥
देह धरा तो देह तू , अन्न द्रव्य का दान ।
अन्न द्रव्य के दान से, तेरा हो कल्यान ॥2 ॥
देह धरा तो देह तू , मुख से मीठे बैन ।
मुख के मीठे बैन से, सबको हो सुख चैन ॥3 ॥
देह धरा तो देह तू , औरों का सन्मान ।
औरन के सम्मान से, तुझे मिलेगा मान ॥4 ॥
देह धरा तो देह तू , सतगुरु का सत नाम ।
सतगुरु के सत नाम से, पावेगा विश्राम ॥5 ॥
देह धरा तो देह तू , प्रेम प्रीत परतीत ।
प्रेम प्रीत परतीत से, होगा तेरा हीत ॥6 ॥
देह धरा तो देह तू , विद्या बुद्धि विचार ।
विद्या बुद्धि विचार से, हो तेरा उपकार ॥7 ॥
देह धरा तो सेव कर, सेवक का यह धर्म ।
सेवा कर गुरु देव की, समझ भक्ति का मर्म ॥8 ॥
देह धरा अच्छा भया, देह देह अब देह ।
धन दे मन दे देह दे, अशरन को दे गेह ॥6 ॥
देह धरा अच्छा भया, जी औरों के हेत ।
औरों का उपकार है, भव तरने का सेत ॥10 ॥
देह धरा तो देह अब, जब लग तेरी देह । ।
देह देह दे देह दे, देह गेह अरु नेह ॥11 ॥
देह धरा तो देह तू , तन मन निज मन देह । ।
देह खेह हो जायगी, फिर कौन कहेगा देह ॥12 ॥
जीना मरना एक है, दोनों एक समान ।
नर की देही जब मिली, कर सबका कल्यान ॥13 ॥
नदी वहे नहीं आपको, फल नहीं खावे पेड़ ।
जो नर ऐसा नहीं है, उसे काल का एड ॥14 ॥
सन्तन का मत है यही, देह देह कुछ देह ।
जो नहीं देगा देह को, देह अन्त में खेह ॥15 ॥
लेना हो सतनाम ले, देना हों अन्न दान ।
लेने देने को समझ, यह सिद्धान्त महान ॥16 ॥
जो देगा लेगा वही, समझ गुरु की बात ।
जो देने वाला नहीं, सहेगा जम की घात ॥17 ॥
अपने लिये न जी कभी, यह गुरु का उपदेश । ।
जीतू औरों के लिये, यह है सन्त सन्देश ॥18 ॥
मरा जो औरों के लिये, वह जीवित है नर ।
जिया जो अपने देह को, वह है कूकर खर ॥16 ॥
सेवक सेवा करे नित, सेवा गुरु की रीत ।
सेवा के परताप से, लेगा काल को जीत ॥20 ॥
काल कर्म को जीतकर, चल सतगुरु के धाम । ।
धुरपद सतपद पहुँच कर, ले सच्चा विश्राम ॥21 ॥
मात्र लेना हो सो जल्द ले, कही सुनी मत मान ।
लेना दान का रूप है, गुरु बानी परमान ॥22 ॥
×
Song 94 — Hindi
495. घट में नूर प्रकाशिया, बरस गया चहुँ ओर ।
जगमग जगमग हो रहा, बढ़ा नूर का जोर ॥1 ॥
नूर नूर सब कोई कहे, नूर न जाने कोय ।
गुरु गम परख का ज्ञान जो, नूर कहावे “सोय ॥2 ॥
आदि अन्त यह नूर है, छाय रहा भरपूर ।
जो न लखे इस नूर को, तिस आंखन में धूर ॥3 ॥
घट में प्रेम प्रगट भया, आंसू निकले नैन ।
धोगये छिन में नैन दोउ, अब लख नूर का सैन ॥4 ॥
राधास्वामी रूप में, दरस नूर का पाय ।
तिमिर मिटा अज्ञान का, सतगुरु भये सहाय ॥5 ॥
जगमग जगमग हो रहा, बढ़ा नूर का जोर ॥1 ॥
नूर नूर सब कोई कहे, नूर न जाने कोय ।
गुरु गम परख का ज्ञान जो, नूर कहावे “सोय ॥2 ॥
आदि अन्त यह नूर है, छाय रहा भरपूर ।
जो न लखे इस नूर को, तिस आंखन में धूर ॥3 ॥
घट में प्रेम प्रगट भया, आंसू निकले नैन ।
धोगये छिन में नैन दोउ, अब लख नूर का सैन ॥4 ॥
राधास्वामी रूप में, दरस नूर का पाय ।
तिमिर मिटा अज्ञान का, सतगुरु भये सहाय ॥5 ॥
×
Song 95 — Hindi
496. दुख आया जब देह में, मीठा लागा नाम ।
यह सुख गति अनमोल है, हिय पाया विश्राम ॥1 ॥
दुख साबुन है देह का, मल दे छांट बहाय ।
मल तज निर्मलता मिले, जो गुरु होय सहाय ॥2 ॥
दुख आया और सुख गया, पाया दंड शरीर ।
कर्जा मेटा काल का, चित से बना गंभीर ॥3 ॥
सुख से भूला नाम को, दूजा ने दिलाई याद ।
बुरा कहूँ क्यों दुख को, दुख में सुख का स्वादः ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मेटो मन की पीर ।
नाम जपू लवलीन हो, हिय रहे धीर गंभीर ॥5 ॥
यह सुख गति अनमोल है, हिय पाया विश्राम ॥1 ॥
दुख साबुन है देह का, मल दे छांट बहाय ।
मल तज निर्मलता मिले, जो गुरु होय सहाय ॥2 ॥
दुख आया और सुख गया, पाया दंड शरीर ।
कर्जा मेटा काल का, चित से बना गंभीर ॥3 ॥
सुख से भूला नाम को, दूजा ने दिलाई याद ।
बुरा कहूँ क्यों दुख को, दुख में सुख का स्वादः ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, मेटो मन की पीर ।
नाम जपू लवलीन हो, हिय रहे धीर गंभीर ॥5 ॥
×
Song 96 — Hindi
497. रंग रंगी जब घट की चुनरिया ।
नाचे रंगीली सुरत बहुरिया ॥
गुरु ने रंग दिया गाढ़ा रंग ।
क्यों करे काल करम चित भंग ॥
नहीं हो सुरत कुरंगी मेरी ।
लाख हो माया की हेरा फेरी ॥
दुख न सतावे न चिंता व्याये ।
अन्तर में रहूँ आपहि आपे ।
कोटि काल झकझोले माया ।
चित न भंग हो गुरु की दाया ॥
अंतमती सत गति मेरे भाई ।
राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाय ।
सुरत बहुरिया गुरु गुन गाय ॥
नाचे रंगीली सुरत बहुरिया ॥
गुरु ने रंग दिया गाढ़ा रंग ।
क्यों करे काल करम चित भंग ॥
नहीं हो सुरत कुरंगी मेरी ।
लाख हो माया की हेरा फेरी ॥
दुख न सतावे न चिंता व्याये ।
अन्तर में रहूँ आपहि आपे ।
कोटि काल झकझोले माया ।
चित न भंग हो गुरु की दाया ॥
अंतमती सत गति मेरे भाई ।
राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
राधास्वामी राधास्वामी चित्त बसाय ।
सुरत बहुरिया गुरु गुन गाय ॥
×
Song 97 — Hindi
498. जाके मन विश्वास है, सो है मन का धीर ।
शान्त चित्त निर्धान्त भया, आनन्द हर्ष शरीर ॥1 ॥
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।
होनी अनहोनी दोउ, टार सके नहिं कोय ॥2 ॥
दाता मौज की परख नहीं, मौज अगाध की बात ।
के जाने सेवक कोई, के जाने कोई साध ॥3 ॥
मौज भरोसे साध जन, मौज का घर विश्वास ।
मौज अधीन बसे सदा, धार गुरु की आस ॥4 ॥
राधास्वामी मौज में, रहूँ मगन मन माँह । ।
क्यों मन अब चंचल बने, गुरु ने पकड़ी बाँह ॥1 ॥
शान्त चित्त निर्धान्त भया, आनन्द हर्ष शरीर ॥1 ॥
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।
होनी अनहोनी दोउ, टार सके नहिं कोय ॥2 ॥
दाता मौज की परख नहीं, मौज अगाध की बात ।
के जाने सेवक कोई, के जाने कोई साध ॥3 ॥
मौज भरोसे साध जन, मौज का घर विश्वास ।
मौज अधीन बसे सदा, धार गुरु की आस ॥4 ॥
राधास्वामी मौज में, रहूँ मगन मन माँह । ।
क्यों मन अब चंचल बने, गुरु ने पकड़ी बाँह ॥1 ॥
×
Song 98 — Hindi
499. एक भरोसा गुरु का, मन व्यापा दिन रात ।
सोते फिरते जागते, गुरु का सिर पर हाथ ॥1 ॥
शब्द गुरु चेला सुरत, रूप अनूप महान । ।
एक घट में एक गगन में, सुरत शब्द पहिचान ॥2 ॥
शब्द सुरत मिल एक जब, गुरु चेला तब एक ।
मुरत शब्द अभ्यास से, उपजे हिये विवेक ॥3 ॥
सुरत शब्द भंडार है, शब्द सुरत भंडार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, प्रगटा हिये विचार ॥4 ॥
बिना शब्द के सुरत नहीं, सुरत बिना नहीं शब्द ।
गुरु मुख प्यारा कोई लखे, क्या है शब्द अशब्द ॥5 ॥
सोते फिरते जागते, गुरु का सिर पर हाथ ॥1 ॥
शब्द गुरु चेला सुरत, रूप अनूप महान । ।
एक घट में एक गगन में, सुरत शब्द पहिचान ॥2 ॥
शब्द सुरत मिल एक जब, गुरु चेला तब एक ।
मुरत शब्द अभ्यास से, उपजे हिये विवेक ॥3 ॥
सुरत शब्द भंडार है, शब्द सुरत भंडार ।
सुरत शब्द अभ्यास से, प्रगटा हिये विचार ॥4 ॥
बिना शब्द के सुरत नहीं, सुरत बिना नहीं शब्द ।
गुरु मुख प्यारा कोई लखे, क्या है शब्द अशब्द ॥5 ॥
×
Song 99 — Hindi
500. राधास्वामी सत्त है, और सकल सब झूट ।
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खूट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम गह, मन मन्सा को त्याग । ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
सुमिरन राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद हैं, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोट कोट परनाम ॥5 ॥
जो सुमिरे इस नाम को, छुटे काल का खूट ॥1 ॥
राधास्वामी नाम गह, मन मन्सा को त्याग । ।
यही मुख्य अनुराग है, यही मुख्य वैराग ॥2 ॥
राधास्वामी भजन है, राधास्वामी ध्यान ।
सुमिरन राधास्वामी नाम है, राधास्वामी ज्ञान ॥3 ॥
राधास्वामी गुरु मिलें, राधास्वामी देव ।
राधास्वामी चरन की, निसदिन कीजे सेव ॥4 ॥
राधास्वामी आदि जुगाद हैं, राधास्वामी धुरपद धाम ।
राधास्वामी चरन सरोज में, कोट कोट परनाम ॥5 ॥
×
Song 100 — Hindi
चौपाई ॥
501नाम रूप दोउ अकथ कहानी ।
बरनत बने न जाय बखानी ॥
जो चाहे सत आनन्द ज्ञाना ।
गुरु समीप सो जाय सुजाना । ।
: तसंग करे बचन को सुने ।
सुन सुन बचन चित्त से गुने ।
गुन कर बचन सो करे अहारा ।
परमारथ से बाढ़े प्यारा ।
पुष्ट होय मन को सोधे ।
निर्मल मन निर्मलता बोधे ।
दोहामन की निर्मलता मिले, भागे मन से पाप ।
गुरु का रूप लखे तब, गुरु फिर प्रगटें आप । ।
श्रद्धा बड़े प्रीत हिय बाढ़े ।
चित की दुचिताई को काड़े ॥
गुरु से नाम की विधि तब पूछे ।
करे कमाई तब कुछ सूझे ॥
प्रथम सहस दल करे निबासा ।
देखे घट में बिमल बिलासा ॥
जोति विराट का दर्शन पावे ।
जोति निरंजन लख हरखावे ॥
घंटा शंख सुने धुन दोई ।
चित से दुर्मति अवगुन खोई ॥
दोहानाम रूप जब लख परे, उपजे अति आनन्द ।
हरख हरख आलस तजे, सुमति होय मति मन्द ॥
कुछ दिन सहसकमल में बासा ।
फिर आगे पग धरे हुलासा ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
सुगम सुभाव सुकृत सुशीला ॥
लाली उषा लाली जोती ।
लाल रंग के पन्ना मोती ।
श्रुति स्मृति का ज्ञान बिचारे ।
सुन सुन श्रुति अपना मन हारे ॥
ओम् मृदंग की धुन अति निर्मल ।
वेद मंत्र का धारे चित बल ॥
दाहायह गुरु का अस्थान है, यह रचना की खान ।
ओम् मंत्र का बीज है, मूल तत्व का ज्ञान । ।
घट में गुरु घट ही में चेला ।
घट में खेले खेल सुहेला ॥
घट का सतसंग यहां तब पावे ।
गुरु मिले तब भेद बतावे ॥
गुप्त भेद यह मर्म कहानी ।
समझे कोई गुरु मुख गुरु ज्ञानी ।
शब्द गुरु चेला सुरत होई ।
शब्द सुरत मिलि भव दुख खोई । ।
शब्द सुरत गुरु चेला जान ।
जो गुरु कहे सुरत सोई मान ।
501नाम रूप दोउ अकथ कहानी ।
बरनत बने न जाय बखानी ॥
जो चाहे सत आनन्द ज्ञाना ।
गुरु समीप सो जाय सुजाना । ।
: तसंग करे बचन को सुने ।
सुन सुन बचन चित्त से गुने ।
गुन कर बचन सो करे अहारा ।
परमारथ से बाढ़े प्यारा ।
पुष्ट होय मन को सोधे ।
निर्मल मन निर्मलता बोधे ।
दोहामन की निर्मलता मिले, भागे मन से पाप ।
गुरु का रूप लखे तब, गुरु फिर प्रगटें आप । ।
श्रद्धा बड़े प्रीत हिय बाढ़े ।
चित की दुचिताई को काड़े ॥
गुरु से नाम की विधि तब पूछे ।
करे कमाई तब कुछ सूझे ॥
प्रथम सहस दल करे निबासा ।
देखे घट में बिमल बिलासा ॥
जोति विराट का दर्शन पावे ।
जोति निरंजन लख हरखावे ॥
घंटा शंख सुने धुन दोई ।
चित से दुर्मति अवगुन खोई ॥
दोहानाम रूप जब लख परे, उपजे अति आनन्द ।
हरख हरख आलस तजे, सुमति होय मति मन्द ॥
कुछ दिन सहसकमल में बासा ।
फिर आगे पग धरे हुलासा ॥
त्रिकुटी ओंकार की लीला ।
सुगम सुभाव सुकृत सुशीला ॥
लाली उषा लाली जोती ।
लाल रंग के पन्ना मोती ।
श्रुति स्मृति का ज्ञान बिचारे ।
सुन सुन श्रुति अपना मन हारे ॥
ओम् मृदंग की धुन अति निर्मल ।
वेद मंत्र का धारे चित बल ॥
दाहायह गुरु का अस्थान है, यह रचना की खान ।
ओम् मंत्र का बीज है, मूल तत्व का ज्ञान । ।
घट में गुरु घट ही में चेला ।
घट में खेले खेल सुहेला ॥
घट का सतसंग यहां तब पावे ।
गुरु मिले तब भेद बतावे ॥
गुप्त भेद यह मर्म कहानी ।
समझे कोई गुरु मुख गुरु ज्ञानी ।
शब्द गुरु चेला सुरत होई ।
शब्द सुरत मिलि भव दुख खोई । ।
शब्द सुरत गुरु चेला जान ।
जो गुरु कहे सुरत सोई मान ।
×
Song 101 — Hindi
502. जब लग कोई न समझे बात ।
सुने कहे चाहे उत्पात ॥
अन्ध बहर को क्यों समझाये ।
बिन विवेक कुछ हाथ न आवे । ।
गुरु पशु सार भेद नहीं पाये ।
विद्या पशु बातों अटकावे ॥
ज्ञान पशु समझे नहीं ज्ञान ।
मान पशु तप अटका अभिमान । ।
योग पशु सिद्धि में जकड़ा ।
तय पशु ता धूनी का लकड़ा । ।
भक्ति पशु सूझे न विवेक ।
यह नहीं लखे अनेक न एक । ।
सार भेद किसको समझाऊँ ।
झगड़ा मेट मौन बन जाऊँ ॥
राधास्वामी गुरु ने तत्व लखाया ।
उनकी दया हमहुँ कुछ पाया ।
सुने कहे चाहे उत्पात ॥
अन्ध बहर को क्यों समझाये ।
बिन विवेक कुछ हाथ न आवे । ।
गुरु पशु सार भेद नहीं पाये ।
विद्या पशु बातों अटकावे ॥
ज्ञान पशु समझे नहीं ज्ञान ।
मान पशु तप अटका अभिमान । ।
योग पशु सिद्धि में जकड़ा ।
तय पशु ता धूनी का लकड़ा । ।
भक्ति पशु सूझे न विवेक ।
यह नहीं लखे अनेक न एक । ।
सार भेद किसको समझाऊँ ।
झगड़ा मेट मौन बन जाऊँ ॥
राधास्वामी गुरु ने तत्व लखाया ।
उनकी दया हमहुँ कुछ पाया ।
×
Song 102 — Hindi
503. नाम भेद है सबका सार ।
नाम दुख से दे छुटकार । ।
नाम बसे त्रिलोकी पार ।
तू टू हे जिभ्या रस द्वार ।
नाम ओम् है नाम है सोहंग ।
नामहि सारंग नामहि रारंग ॥
नाम सत्त है सत्त की धुन ।
नाम की धुन ऊचे चढ़ सुन ।
पंच नाम का लेकर भेद ।
जप निज नाम मिटे जग खेद ॥
बिन गुरु नाम हाथ नहीं आवे ।
गुरु मिले तब नाम बतावे ॥
नाम श्रवन कर नाम मनन ।
नाम धार तब निध्यासन ।
साक्षात जब नाम करेगा ।
तब नहिं जग के शोक मरेगा ।
राधास्वामी सन्त स्वरूप ।
नाम दान मेटा भव कूप ।
नाम दुख से दे छुटकार । ।
नाम बसे त्रिलोकी पार ।
तू टू हे जिभ्या रस द्वार ।
नाम ओम् है नाम है सोहंग ।
नामहि सारंग नामहि रारंग ॥
नाम सत्त है सत्त की धुन ।
नाम की धुन ऊचे चढ़ सुन ।
पंच नाम का लेकर भेद ।
जप निज नाम मिटे जग खेद ॥
बिन गुरु नाम हाथ नहीं आवे ।
गुरु मिले तब नाम बतावे ॥
नाम श्रवन कर नाम मनन ।
नाम धार तब निध्यासन ।
साक्षात जब नाम करेगा ।
तब नहिं जग के शोक मरेगा ।
राधास्वामी सन्त स्वरूप ।
नाम दान मेटा भव कूप ।







Hits Today : 840
Total Hits : 1712643