राजस्थाक की ललित ललनाये
लेखक महर्षि शिवव्रतलाल वर्मन एम. ए.
ऐडीटर
नन्दू भाई, निजामाबाद (हैदराबाद दखन)
समाचार जगत शब्द जब मानस देह मिली तुमको इस देह से औरों को कुछ दो। जीते जी इस संसार में कीर्ति यश आदर सनमान को लो ।। धनवान हो तो तुम धन को दो विद्या वाले हो विद्या दो। जिस गुण का तुमको भाग मिला दो–दो कुछ तुम उसको दो ।। नद नाले अग्नि गंगा की सागर की देख दशा प्यारे । औरों के काम यह आते हैं औरों को हैं यह सारे ।। सूरज की चन्द्र की तारों की ज्योति को देख समझ मन में । यह औरों के काम आते हैं चाहे हो कोई घर में बन में ।। अपने लिये बन मधु बन उपवन अपने लिये देख खानि तप बन । यह दूसरों के लिये हैं सब कुछ समझ सोच ले अपने मन ।। जो देता है वह लेता है जो लेता है वह देता है। जो नहीं देता वह क्या लेगा फिर नाम धनी का लेता है ॥ दो दान दया का दानी हो दो ज्ञान ज्ञान के ज्ञानी हो । क्यों निष्फल जन्म गंवाते हो अभिमानी मानी गुमानी हो । लेना हो तो यश कुछ देकर संसार की हाट में आये हो । जो पहले दिया था उसके बदले आज यह सब कुछ पाये हो ।। राधास्वामी आये जग में भक्ति का दान दिया नन्दू ।। दो प्रेम भक्ति तुम औरों को बदले में पद निर्माण का लो ।।
वर्ष १ ] अगस्त सन् १९५५ ई० [ तरंग ६
प्रार्थना प्रेम की डगर दिखा दोजी, मुझे प्रेम की डगर दिखादो जी ।
हाँ जी प्रेम की डगर बतादो जी ।। टेक रैन अँधेरी पंथ न सूझे, हाथ पकड़ के जतादो जी । पीर विरह की कलेजे साले, पिया से मोय मिलादो जी ।। भूख प्यास दुख अधिक सतावे, अमृत धार पिलादो जी । हाय हाय पिया किहि विधि पाऊ‘, कोई जतन बतादो जी ।। पिया का बोल सुहावन लागे, अनहद तूर बजादो जी ।। अँखियन नीर बहे जल धारा, विरह की आग लगादो जी ॥ आशा तृष्णा सब विधि मेंटो, धुर पद के लखादो जी । जिया घबराय हिया अकुलावे, जी की जलन मिटादो जी ।। निसदिन तड़पू निसदिन तरसू, प्रेमनगर पहुँचादो जी। फल मीठे मिलें दया से, बूद अमी की पिलादो जी ॥ व्याकुल हो चहुँ दिश में भटकू, भूल–भ्रम को घटादों जी ।। विरहिन देत संदेशा अपना, पिया को मेरे सुनादो जी ॥ : घर की हुई न राह बाट की, हिया का कष्ट हटादो जी ।
• राधा स्वामी चरण शरण बलिहारी, जम का जाल कटादों जी ।
• भूमिका | यदि मनुष्य को स्त्री का संग न मिले तो इसमें शक नहीं कि वह पशु से भी गया गुजरा बन जाय । जो मनुष्य जीवन की प्रथम श्रेणी में हैं उनके लिये स्त्री का साथ अमृत के तुल्य है। माना कुछ आयु व्यतीत होने पर मनुष्य बिना स्त्री के भी रह सकता है। पर युवकों के दिल के लिये ईश्वर भक्ति के बाद यह ही एक प्रेम–प्रीति का संग है जो इनके मन को जीतकर सुमार्ग पर लगा सके । वास्तव में एक सुशील और सदाचार वालो रमणी ही इसको कुमार्ग से बचा सकती है और उसकी गढ़त करके उसको देवता बना सकती है। लोग कहते हैं कि स्त्री सारे दुखों की मूल है । पर याद रहे एकांत का जीवन और आयु पर्यन्त कुमार बन रहना सच्चे सुख और शांति का हेतु कभी नहीं बन सकता। माना एकांतसेवी अपना समय जप–तप स्वाध्याय आदि में काट सकता है पर जो सुख एक जीवन में एक सच्चे मित्र से मिलता है, बाल बच्चों के जी बहलाव का साधन और बुढ़ापे में दुख दर्द का पूछने वाला, वह तो एक सदाचारिणी देवी के ही बाँट की वस्तु है।
जिस प्रकार एक थका हुआ पथिक बादलों में से निकलते हुये सूर्य को देखकर प्रसन्न हो जाता है, उसी तरह दिन भर मेहनत और कमाई करता हुआ पुरुष जब शाम को घर आता है, दिनभर काम करते २ एक तरह पर थका हुआ होता है। ज्योंहीं वह
घर आया कि उसकी स्त्री जो दिनभर उसकी राह देखती रही थी। मुस्कराती हुई शीघ्र ही उसके सुख के साधन जुटाने में लग जाती है। उधर बाल बच्चे हंसते खेलते उससे लिपट जाते हैं और वह उस समय अपनी दिनभर की थकान को भूलकर स्वर्गधाम का
आनन्द लेता है। यह सुख सौभाग्य से किसी २ को नसीब होता है। यदि कहीं इसके विपरीत किसी कुलटा और बुरे स्वभाव
शिव की स्त्री से पाला पड़ जाय तो फिर उसकी दशा दयनीय भी हो । जाती है। स्त्रियों का धर्म है कि वह अपनी जादूभरी मुस्कराहट से पति के दुख क्लेशों को हरती रहें, क्योंकि इस जगत में पुरुषों को अक्सर जीवन में कभी २ संकट भी आते रहते हैं। यदि स्त्री सुशील और धर्मपरायण है तो सब आपत्ति विपत्ति सहज में खुशी के साथ कट जाती हैं और एक सदाचारिणी घर को स्वर्गधाम बना देती है। जिसे देखकर उसके पति का दिल वैसे ही खिल जाता है। जैसे कमल का फूल सूर्य को देखकर खिल जाता है । जिसको नेक स्त्री मिल गई वह ऐसा सुख भोगने में राजे–महाराजों से भी बड़भागी है।
नेक स्त्री ईश्वर की देन है। | ईश्वर ने सबसे श्रेष्ठ देन और अमूल्य रत्न जो मनुष्य को प्रदान किया है वह इसकी धर्मपरायण स्त्री है। यह वह देवी है जो उसकी सच्ची रक्षक है। यह वह मंत्री है जो इसको भला व बुरा जताती रहती है । यह वह हीरा है जिसकी चमक उसकी गुलाबी मुस्कराहट है । यह वह चन्द्रमा है जिसके प्रकाश से. घर जगमगाता रहता है । स्त्री की निष्काम सेवा, इसका भोलापन उसकी प्रेम और जादूभरी प्यार की दृष्टि, उसकी सच्ची मनोहर और मोहनी बातें ! ओह ! यह सब तो ऐसे रत्न हैं जिनको मूल्य कोई चुका नहीं सकता। इसके परिश्रम से घर में खुशहाली और किफायतशारी से घर चेत जाता है। गुलाब की पंखड़ियों के समान चटखते हुये इसके होंट सच्चे और स्पष्ट सहयोग के खजाने की कुजी हैं। वह इस धरातल को स्वर्गधाम का नमूना बना देती है। पति इसकी मीठी और मधुर बातों को सुनकर अपना सब दुख भूल जाता है और किसी कष्ट और संकट के समय ईश्वर भी ऐसी पतिव्रत पालन करने वाली देवियों की
२]
शिव के स्वभाविक प्रार्थना को तत्काल सुनता है जिससे घर में सब सुखी हो जाते हैं।
जब तुम पर कोई मुसीबत आ पड़े फौरन अपनी स्त्री से । बिना संकोच के कह दो। यह न समझो वह नादान और कम समझ है । कभी नहीं ! स्त्रीयों का दिल दिमाग कुदरती तौर पर मरदों से कहीं अधिक उन्नति शील होता है। तुम नहीं देखते कुमारी युवतियाँ अपनी सास के घर जाते ही किस प्रकार से दूसरे घर पर अपनी युक्ति और चतुराई से सबके दिल मुट्ठी में कर लेती हैं। स्त्रीयों की चित्त शक्ति पुरुषों से कहीं बढ़ी चढ़ी होती है। मर्द हज़ार पढ़ा लिखा हो समय पर वह भी चूक जाता है। पर स्त्री वह अचूक शस्त्र है जो वक्त पड़े पर काम अवश्य देता है। इस बात की पुष्टि तुम अपनी बहिन माता स्त्री आदि से समय पड़ने पर सलाह लेकर कर सकते हो। स्त्री पुरुष को आधा अंग यानी अर्धाङ्गिनी कहलाती है। बिना इसके पुरुष किसी काम का नहीं है। स्त्री घर की महारानी और पुरुष की सच्ची मंत्री हैं। बेचारी स्त्रियाँ तो ज़रा २ सी बात तक पुरुषों से कह देती हैं पर कितने खेद का विषय है कि पुरुष इस सम्बन्ध में गुमराह हो रहे हैं । जहाँ और जिस घर में दुराव रहता है वहाँ से सुख और चैन दूर भाग जाते हैं और कलह और क्लेश का सामना करना पड़ता है। प्रेम और सहयोग संसार में अमूल्य वस्तु हैं। संसारी व्यवहार में कुआरे लोग कम सफल होते हैं। इसी कारण शादी करना जरूरी अंग है। क्या इतिहास इस बात का साक्षी नहीं है कि जो काम पुरुष नहीं कर सके उसको स्त्रियों ने चुटकी बजाते किस प्रकार सरल बना दिया । यदि यह मंजूर है कि घर स्वर्गधाम बन जाय तो स्त्री पुरुष प्रेम व प्यार से रहें, स्त्रियों का विश्वास
और आदरमान करें, तो फिर देखें कोई शिकायत का अवसर रह जाता है ?
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शिव अपनो माता का सनमान व आदर करो जिसकी माता जीवित है वह सचमुच बड़ा भाग्यशाली है। क्योंकि जिस दुग्ध ने प्रेम व हमदर्दी के स्रोत को बहा कर तेरा लालनपालन किया था वह जीते जी सूख नहीं गया है। शास्त्र कहते हैं माता का दायत्व ( हक ) पिता और आचार्य से भी बढ़कर है। यह क्यों ? क्योंकि जिसके कारण तेरा अस्तित्व है, वजूद बना है, वह माँ का है और मां ने जिस प्रकार तेरी ‘परवरिश और देख भाल की है वह सर्व श्रेष्ट निष्काम सेवा थी ।
| हम जानते हैं कि तू बुद्धिमान और तजुर्बेकार है । अपनी माता से कभी २ सम्मति ले लिया कर । यथा सम्भव कभी २ उसके कष्ट सहन का बदला चुकाने का यत्न किया कर । तेरे थोड़े से ही भाव प्रगट करने से उसका दिल बल्लियों उछलने लगेगा।
और उसके मन का, आत्मा का, गुप्त आकर्षक आशीर्वाद तुझको खुश और चैन से रहने में जादू का असर दिखावेगा। | उसकी राय का आदर कर, यह कभी मत ख्याल कर वह बूढी बावली है। तेरे कालिज की शिक्षा, बर्तमान समय का तजुर्बा, यह सब उसके प्रेम के व्यवहार और अभ्यास के आगे तुच्छ और अपूर्ण ठहरेंगे। क्योंकि इसमें असलीयत रहती है और वह ज्यादा तर झूठे हैं, बनाबटी हैं।
माता के धार्मिक विश्वास की निन्दा न कर न उसकी हंसी उड़ा। माना तेरे विचार विशाल हैं उसकी धर्म निष्टा में तंग ख्याली है । पर तू कभी इस खास विषय में उसको दुखी मत कर। | जब कभी सम्भव हो अपनी युवक मित्र मंडल और प्यारों को उसके पास लाया कर और अपने सब दुख सुख और खेलकूद के कामों में उसकी सलाह ले लिया कर जिससे उसको अपने बुढ़ापे में तेरी जवानी की उमंगों का सुख मिल जाया करे। यदि कभी प्रेम के भाव में आकर वह तेरी पीठ पर हाथ फेरे तो ।
शिव से तू उसके आगे एक छोटे बालक के समान उसकी गोद में खेलता हुआ जान । माता की दृष्टि में एक ज्यादा उम्र का भी बच्चे के समान है। | यदि तू अभी बालक है तो अपनी पुस्तक कलम बुदि का इत्यादि सब उसको दिखलाया कर अपना सबक भी सुनाया कर । इससे उसकी आत्मा को महान् सुख मिलता है। | यदि तू युवक होगया है और माँ बूढ़ी है तो यह कभी न समझ कि वह बेकाम होगई। अपनी स्त्री और बच्चों को साथ लेकर प्रातः ही सब उसके पैर छुआ कर, उसको प्रणाम किया कर,
और जो वह आशीर्वाद दे उसको एक अमूल्य ईश्वर की देन
• जान । आज के समय में आशीर्वाद के महत्व को न जानने का ही
फल है जो हमारे दुख और संकटों की मात्रा दिन प्रतिदिन बढ़ रही है । | जो युवक इस प्रकार माता का आशीर्वाद लेता रहता है। उसकी सब संसारी कामनायें सफल होती हैं। लोगों की दृष्टि में आदर मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और लोक परलोक के यश का भागी बनता है। । जो लोग माता की ऐसी मान–प्रतिष्ठा करते हैं हम उनको
आदर की दृष्टि से देखते हैं क्योंकि वह संसार में सबसे अधिक सुखी भाग्यशाली और सबसे अधिक सदाचारी हैं।
| स्त्रियों को शिक्षा चाहे जैसी उच्चकोटि की क्यों न दीजाय । जब तक इनको घरेलू जीवन के इन्तजाम की लियाकत नहीं है। इनकी शिक्षा पूर्ण न होगी न पूर्ण समझी जायगी। माना राज्यकाज के कामों में अधिक उच्चशिक्षा की जरूरत है पर घरेलू कामों के लिये भी यह सब गुण जरूरी हैं। जैसे एक सिपाही को उन्नति करते २ एक बड़े अफसर बनने पर उसको निचली सब जगहों का तजुब होता है उसी तरह स्त्रियों को भी हर घरेलू
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* शिव काम में दक्ष होने की जरूरत है। जब ही अपने बाबचियों, नौकरों और खानसामांओं से काम लेने में सुभीता रह सकता है। अनाड़ियों की भांति बने रहने से शासने भले प्रकार नहीं कर सकतीं । | आज समय के लिखे पढ़े बाबू लोग हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता की हँसी ऐसी उड़ाते हैं कि बस रे बस ! पर यह नहीं देखते कि उनके जीवन के सब महकमे कैसे पूर्ण थे । खेद है वह अब नष्ट हो रहे हैं । और कम लोगों की निगाह इनके गुणों की ओर जाती है और फिर इनसे बचाव का सवाल तो पैदा ही, नहीं होता ।।
| आज समय के समान चाहे, कन्या महाविद्यालय उस समय नहीं थे, पर फिर भी जरूरी शिक्षा खेल–कूद में ही सिखाने का नियम था जिसको हिन्दू लड़कियाँ गुडडा–गुड्डी के खेल में घर ही सीख लेती थीं। शादी, बरात, महमान्दारी, दहेज, दावत, खाना, पकाना, काढ़ना, सीना–पिरोना, लड़के का जन्म, पूजापाठ, मृत्यु में शोक, इत्यादि सब कुछ इसी खेल के सिलसिले में जान लेती थीं । और जब शादी के बाद अपने पति के घर जाती थीं, वे ही खेल के अनुभव इनके वहाँ सहायक बनते थे, जिसके फलस्वरूप वह अपने व्यवहार से सबको खुश और वश में कर लेती थीं । क्या आज की नई रोशनी की शिक्षा का ऐसा प्रभाव है ? सम्भव है हमारे इस कथन को नई रोशनी के युवक और युवतियां घृणा और दोष दृष्टि से देखें । पर हम स्पष्ट रूप में विना कहे भी रह नहीं सकते कि हाल की शिक्षाप्रणाली इस विषय में बुरी तरह से पिछड़ रही हैं और आगे भी ऐसे ही चिह्न नजर आते हैं क्योंकि हिन्दुओं में जितना यूरुप के रहनसहन का ढांचा बदलता जायगा उसी मात्रा में हमारा हिन्दुत्व जिसमें घरेलू जीवन की सच्ची खुशियाँ जो केवल हिन्दू घरों की
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शिव मीरास (उत्तरदाइत्व) हैं भागती नज़र आयेंगी। । शिक्षक हिन्दू समाज अपने बुद्धि विचार पर गर्व करता है। पर वास्तव में देखा जाय तो जाति की रक्षकं स्त्रियां जो ऐसी योग्य होती थीं कि वह अक्षरों का बोध भी न होते हुए सारे कर्मकांड से इतनी परिचित होती थीं कि एक पुस्तक भी क्या बता सकती है। । शास्त्र और पुराणों के उदाहरण उनको अपनी माता, सखी सहेलियों की संगति से कठांय रहते थे। वह साक्षात् पुस्तक रूप थीं । वक्त पड़े पर उनकी सम्मति ली जाती थी। वह जानती थीं किस समय क्या करना चाहिये ? अब हमारे भाव के समझने में कठिनाई न होगी। खेद है ! अब यह प्राचीन हिन्दू स्त्रियों की नस्ल का खात्मा हो रहा है। हम साहस पूर्वक कह सकते हैं कि जब तक इस नई शिक्षा प्रणाली में प्राचीन सभ्यता के गुणों और नियमों को शामिल न किया जायगा, याद रखो हमारी जाति
को पछताना पड़ेगा।
| सच्ची माता कैसी होती है ? एक नगर में दो स्त्रियाँ एक लड़के के लिये झगड़ रही थीं। मामला मजिस्ट्रेट की कचहरी में पहुँचा। दोनों ही अपना २ हक लड़के पर इस तरह बयान करती थीं कि मजिस्ट्रेट सा० भी अपनी मजिस्ट्रटी भूल गये। अत‘ में हार कर उन्होंने अपनी घरवाली की इस मामले में राय ली। जो उस नगर के भाग में अपनी चतुराई को बहुत प्रसिद्ध थी। और अड़ोस पड़ोस में उसका बहुत मान था । उसने थोड़ी देर इस मामले पर विचार किया और कहा नौकर से बच्चे के बराबर के कुद की एक मछली मँगवा दीजिये। जो उसी समय मंगा दीगई। फिर बच्चे को अपने पास मंगा लिया। और उन दोनों स्त्रियों को
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शिव है बाहर के कमरे में बुलवा लिया। मजिस्ट्रोटिन ने लड़के के कपड़े उतार कर मछली को पहना दिये और नौकर को आज्ञा दी कि दोनों स्त्रियों के सामने लड़के को दरिया में फेंक दे । नौकर ने। आज्ञा का पालन किया । मछली पानी में फेंक दी गई । वह उसमें । उछलने लगी । और कपड़े के कारण तड़पड़ाने लगी। इसका अभाव स्त्रियों पर क्या पड़ा ? एक तो चुपचाप बैठी देखती रहीं, दूसरी चिल्ला कर निडर होकर पानी में कूद पड़ी जिससे बच्चे की जान बचे । मजिस्ट्रेट की पत्नि ने कहा देखो यह ही बच्चे की असली माँ है । उसको पानी से निकाला गया मजिस्ट्रटनी की बड़ी तारीफ हुई। उसने बच्चे को अच्छे खूबसूरत वस्त्र और मिठाई देकर उसकी माता के हवाले किया जो दुआयें देती हुई अपने घर गई ।
। नेक पतनी वह मर्द अकसर भूले हुये हैं जो अपनी स्त्री की कदर नहीं
• करते। उसकी प्रेम भरी बातों का अनादर करते हैं। स्त्री स्वाभाविक ही पुरुषों से अधिक चतुर, दूरदर्शी और प्रेम प्रगट करने वाली होती हैं। इसकी चतुराई को मर्द नहीं पहुँच सकता। “स्त्री चरित्रम पुरुशष्य भाग्यम् देवो न जानी किती मनुष्यः”
अथवा स्त्री के चरित्र और पुरुष के भाग्य को दैव भी नहीं ।
• जानता तो मनुष्य की क्या हस्ती है १ .
सूक्ष्म बुद्धि और पवित्रता के साक्षात रूप ! तू सचमुच संसार में पूजा और सम्मान के योग्य है ! यदि तू न होती तो संसार का क्या हाल होता ? भय, अपवित्रता, पशुपन और व्यभिचार के दृश्य चारों ओर नज़र आते ! तू वास्तव में ऐसी देवी है जो समाज के चाल चलन और रीति रस्म में सहूलियत, मुलामियत, सुन्दरता और पवित्रता पैदा करती है। क्रोध में मनुष्य पशु बन जाता
* शिव के है। पर जहां सुलक्षण स्त्री की जादू भरी प्रेम की दृष्टि उस पर पड़ी नहीं कि वइ फौरन संभल बैठता है। मर्द लाख कहें कि औरतों की बात न मानें। पर स्त्री अपनी किसी न किसी युक्ति से उसको अपने अधीन बना कर उसको सद राह पर ले आवेगी । कौन सा मर्द है जिसको कभी मौका पड़ने पर अपनी स्त्री की , चतुराई देखकर झपना न पड़ा हो ! कोई माने या न माने जो २
अच्छी घटना यहाँ पर कभी २ घटती हैं उनमें अधिकांश स्त्रियों की सम्मति का ही प्रणाम है। कभी माता के रूप में बच्चों के दिमाग में आगामी मान बड़ाई के बीज बोती है। कभी बहन बनकर भाई को वीर और उत्साही बनने का संचार करती है ।। पत्नि के रूप में घर को स्वर्ग धाम बनाती हुई पति को धर्म के मार्ग पर कायम रखना इसी देवी का काम है। और फिर पुत्री के रूप में अपनी सादगी और तोतली जुबान से किस कदर माता पिता को मुग्ध करती है। कुआरे मर्दो को देखो वह जन्म भर दुखी रहते हुये जान देते हैं। स्त्रियों के नेत्र बड़े तेज़, चित्त उदार, और दिमाग बड़ा विवेक विचार वाला होता है । चालक से चालाक मर्द भी स्त्री की तेज़ समझ पर विजयी नहीं हो सकता । जो मर्द अपनी नेक स्त्री से सम्मति लेकर काम करेगा वह कभी दरिद्रता का शिकार न बनेगा । इसलिये हमारा फर्ज है कि इस सम्बंध में हम विचार से काम लेना सीखें जिससे हमारा लोक व परलोक दोनों का सुधार हो ?
मालिक सद्बुद्धि दे कि हम सद्मार्ग को ग्रहण करें ।
© बनदेवी । कबीर मर–मर पच रहा कोई न बुझे सार । वह तो हरि का दास है मौत रही थक हार। दुख कलेश और आपदा राम कसौटी जान । धीरज दृढ़ता राम की को मारे बलवान ।। कोच न अग्नि ताइये रंग रूप होय भंग। साधू कंचन ताइये चढ़े सवाया रंग ।। मैं पनिव्रता पीउ की कबहु न होय अकाज । पतिव्रता नाँगी रहे तो ‘वाही पति को लाज ।। शून्य सनेही पाईया तहाँ मरजीवा मन ।। कबीर चुन–चुन ले गया भीतर राम रतन ।। धारा नगरी का उद्यादित्य नामी एक राजा गुजरा है। बनदेवी उसकी पुत्री थी और यह स्त्री बड़ी सुन्दर धर्मात्मा और धैर्यवान थी । धर्मपरायण रह कर सदा संत मार्ग पर चलती थी । इसकी माता का नाम मनोहरीदेवी था। इसने बनदेवी का पालन पोषण किया था। बनदेवी पढ़ी लिखी नहीं थी। पर जो पढ़ने लिखने का प्रयोजन है उसमें कूट २ कर भरा था। जब लड़की सयानी हुई पिता को इसके विवाह की चिंता हुई । देश २ के राजाओं के संदेश आये । पर उद्यादित्य ने किसी को स्वीकृति नहीं दी । अन्त में कल्याणनगर का राजा इसकी दृष्टि में योग्य मालूम हुआ क्योंकि वह वीर, सुशील, विख्यात, नीतिवान, साहसी और दयालू था। सब उसकी प्रशंसा करते थे। इस कारण उद्यादित्य ने उसको बुलाकर उसके साथ क्विाह कर दिया और कहा मैं तुमको ऐसा अमूल्य रत्न देता हूँ जो कि किसी राजा के कोष में कठिनाई से निकलेगा—तुम इसकी इज्जत करना और ईश्वर
शिव को तुम्हारा भला करेगा। सूरज सिंह ने शीश नवाकर कृतज्ञता प्रगट की । और बनदेवी को ब्याह कर अपने घर लेगया। वहाँ
आकर वह सचमुच कीमती जवाहर साबित हुई। सूरजसिंह उसके गुण और स्वभाव को देख कर मोहित रहता था। और उसका इतना मान और आदर करता था कि उसको सम्मति के विना राज–काज का कोई काम न करता था। रानी की कोख से दो पुत्र चन्द्रसिंह और विपयसिंह पैदा हुये जो अपने माता पिता के समान नेक और सुशील थे। राजा रानी दोनों खुश थे । देश आबाद था । प्रजा सुखी थी। दोनों पुत्र होनहार दीखते थे। उनके सांसारिक सुख में किसी बात की कमी न थी। । पर दुनिया की दशा एक समान नहीं रहती। कभी सुबह है कभी शाम है। जीवन का यह अंजाम है। कभी रात है कभी दिन है, दुस्ख और सुख सब पर आते हैं। रामचन्द्र जी महाराज ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम और महाराज युधिष्ठिर ऐसे धर्मराज भी इससे न बच सके थे। राजा चतुरसिंह ने धारानगर पर चढ़ाई करदी । सूरजसिंह दिल खोल कर लड़ा । पर समय विपरीत था । सैना काम आई । और इसको अपनी रानी और दोनों पुत्रों को साथ लेकर भाग कर जान बचानी पड़ी। देखो समय का फेर ! कहाँ एक देश का राजा और कहाँ यह दशा कि सेवा के लिये एक आदमी भी साथ नहीं ! रानी जिसने बड़ी मान और प्रतिष्ठा में परिवरिश पाई थी, जिसकी सेवा के लिये सैकड़ों बांदियाँ हाथ बाँधे खड़ी रहती थीं वह आज जंगल–जंगल में पैर घसीटते मारी फिर रही है। एक पुत्र पिता के कंधे पर और दूसरा माता की गोद में था । बन और उपवनों में घूमते फिरते चले जा रहे थे । कभी पैरों में कांटे चुभ जाते थे, कभी भूख प्यास सताती । रास्ते की थकान से रानी को ज्वर हो जाता। कभी २ वह दुख
[ ११ से रो भी पड़ती ! पर विवश ! जाने बचाना भी जरूरी था। वह इस प्रकार पैदल चलते हुये दिल्ली पहुँचे । और एक धर्मशाला में आकर ठहर गये । क्योंकि मकान किराये पर लेकर ठहरने को पैसा कौड़ी पास न था । दिल्ली आने को तो आगये पर चान्डाल पेट नहीं मानता था। किसी न किसी उद्यम को तलाश करना जरूरी था । भीख मांगी नहीं जा सकती थी। अन्त में दोनों ने यह सलाह की कि लड़के तो दोनों किसी की गाय भैंस चरायें और वह दोनों जंगल से लकड़ी लाकर बेचे । जिससे रोज़ के खर्च का गुजारा चले । राजा शरीर का पुष्ट था वह हाथ में कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटता, एक बोझ तो रानी के सिर पर रख देता और दूसरा खुद उठा लात्ता और दोनों शहर में बेच लेते । । एक दिन रानी जंगल से पहले चली आई। वह अकेली थी। शहर के दरवाजे पर किसी सौदागर ने डेरा गाई रक्खा था। वह लकड़ी बेचने की नीयत से उस ओर जा निकली। उसकी आवाज बड़ी मधुर थी । सौदागर ने उसकी आवाज सुनी । सोचने लगा जिसकी आवाज़ इतनी अच्छी है वह खुद कैसी सुन्दर होगी । उसने रानी को बुला भेजा। नौकरों ने कहा चल सेठ तुझको अच्छे दाम देगा। वह लोभ के वश डेरे के पास चली गई। सौदागर का विचार ठीक निकली । उसका मुख चन्द्रमा की भाँति चमक रहा था । दुनिया में ऐसी स्त्री उसकी दृष्टि में नहीं गुजरी थी । | सोडागर की नीयत बिगड़ गई। वह गिड़गिड़ाती आवाज में पूछने लगा । तू कौन है ? तेरा नाम क्या है ? किस जाति की है । कहाँ की रहने वाली है ? तू तो किसी अच्छे कुल और ऊँचे घराने की नारि मालूम होती है। क्यों इस कुदर दुख क्दाश्त
शिव के करके महनत मजदूरी का काम करती है ? यह शब्द सुनकर रानी का जी भर आया ! कहने लगी महाराज ! मैं दुख की सताई हुई हूँ । मेरा हाल कुछ न पूछो। हम लोग इसी प्रकार विपत्ति और दुख में दिन काट रहे हैं। पहले जन्म में न ईश्वर भक्ति की थी न शुभ कर्म किये थे। इस कारण दुख भोग रहे हैं। कर्म पर किसी का बस नहीं । जो जैसा कर्म करता है वैसा फल पाता है। आप लकड़ियों का मोल भाव कीजिये मुझ दुखिया का नाम ग्राम पूछने की क्या जरूरत है ? साहूकार ने उसके लबलहजे से समझ लिया कि वह जरूर किसी उच्च कुल की स्त्रीं है। उसने कहा अच्छा तू अपना नाम मत बता। पर यदि तू मेरे पास रहना पसंद करे तो तेरे कष्ट कलेश दूर हो जाँयगे । मैं रात दिन तेरी दिलजोई में रहूँगा। तुझ जैसी अबला को घुट २‘कर मरना उचित नहीं । बनदेवी समझ गई । इसके मन में पाप बस गया है। वह उलटे पाँव वहां से चल दी। पर सौदागर ने उस समय उसको पकड़ लिया । और डेरा वगेरः वहाँ से उखाड़ कर कूच कर दिया । और उसको भी रथ पर बिठा कर भाग निकला । वनदेवी डर के मारे ऐसी काँप रही थी जैसे कसाई को देखकर गाय काँपती है। वह रोती जाती थी। शोक से उसका मुख ऐसा सूख गया था जैसे बिना जल के नर्म पौधे कुम्हिला जाते हैं। वह अपने पति के प्रेम और पुत्रों के बिछोह को याद कर–कर के बिलाप करती जाती थी। सौदागर ने उसको बड़े लोभ लालच दिखाये। दुनिया के भले बुरे की बातें समझाई‘, पर रानी ने कहा भाई मैं पतिव्रता स्त्री हूं । जान जाये तो जाये मैं धर्म नहीं त्यागूगी। मुझे चाहे जान से मार दे पर ऐसे आयोग्य बचन मत बोल । बहतर हैं तू मुझे मेरे पति के पास पहुँचादे। मैं पति से अलग रह कर संसार में जीवित
[ १३ रहना नहीं चाहती। जिसने सदा अच्छे पदार्थ खाये हैं वह भूख लगने पर विष कभी न खायगा । सिंह का भूखा बच्चा घास कभी न खायगा । तू मुझे मत सता ।
अग्नि में जलना भला, भला है विष का पान । त्याग शील का नहीं भला नहीं कछ शील समान ।। गिरयो पपीहा सुरसरी लग्यो बधिक को बान । | मुख मू दे सुरत गगन में निकस गये यों प्रान ।।
यदि तू दया न करेगा तो मैं अवश्य ही अपने प्राण त्याग ‘दूगी । पर सौदागर इसकी बात कब सुनने लगा था। वह काम
के बश में था । वह फिर तरह २ के डर और लोभ लालच दिखाने लगा । रानी ने फिर उससे कुछ न कहा। उसने सोचा यह मेरी अब कोई बात ने सुनेगा । इस लिये चुप हो रही । जब शाम हुई सौदागर ने एक जगह डेरा गाड़ने का हुक्म दिया । रानी को एक अलग डेरे में जगह दी गई। इसके पहरे पर। चारों ओर स्त्रीयां तईनातं की गई। खाने पीने का सामान पेश किया गया। पर रानी ने दृष्टि उठाकर भी नहीं देखा। | रात हो गई करीब २ सब सो गये । इसने रोते हुये ईश्वर को याद किया । हे दीना नाथ ! अब इस समय तेरे सिवाय कोई सहारा नहीं । न किसी की आस भरोस है। हे प्रभू ! मेरी लाज तेरे हाथ हैं। तू अपने दीन और दुखी बालकों की ऐसे समय में जरूर रक्षा करता है ! तू मेरी भी सुध ले ! ।
सुरत करो मेरी सांईयाँ मैं हूँ भव जल मांह ।
आपे ही बह जाऊगी जो नहि पकड़ो बाँह ।। औसर, बीता अल्प तन पीउ रहा परदेश । सुधि मेरी लीजो हे प्रभु ! काटो कष्ट कलेश ।
…….
…
===-=-=-=-=
१४]
शिव । | रानी ईश्वर की स्तुति करके खूब रोई। प्रार्थना करने से चिंत्त में कुछ ढाढस बँधी ! उसने आँसू पूँछे, सिर ऊँचा करके देखा ! सब बेखबरी की नींद में सो रहे थे। मौका अच्छा था । वह दबे पांव उठी और भाग कर जंगल की ओर चली गई । जब वह दूर निकल गई तब जी को चैन आया। जान में जान आई । राम–राम कह कर पिशाच से पीछा छुटा । जहाँ आकर वह ठहरी थी वहाँ फाड़खाने वाले पशु बहुतायत से थे । यहाँ
आकर उसने दम लिया। और एक वृक्ष के नीचे बैठकर फिर वह जोर २ से विलाप करने लगी। इसके रोने और चिल्लाने की आवाज़ से सारा जंगज़ गूज उठा। वह अपने पुत्रों का नाम ले ले कर चिल्लाती थी। पर वह कहाँ थे जो इसकी सुनते । रोते २ बेहोश हो गई बृक्ष के नीचे पड़ रही। नींद आगई और वह पृथ्वी पर पड़ गई। जब नींद खुली देखतो क्या है ? दो लुटेरे पास खड़े हुए आपस में झगड़ रहे हैं। एक कहता था मैंने इसको पहले देखा है। इसलिये यह मेरी स्त्री होगी । दूसरा कहता था नहीं मैं तुझ से बड़ा हूँ। इस लिये इस पर मेरा हक है। रानी घबराई ! हा परमात्मन् !
एक अफत से तो मर मर के हुआ था जीना ।
पड़ गई कैसी ! मुसीबत यह मेरे प्रभु ! नई ।। | क्या करू ! किधर जाऊ जमीं सख्त है। असमान दूर है । वह तो इस चिंता में थी उधर दोनों में तलवार चलने लगी । अंत में जो बली था उसने दुसरे कमजोर को मार कर पृथ्वी पर डाल दिया। और आकर रानी का हाथ जबरदस्ती पकड़ने लगा। रानी ने उसका हाथ छुटा दिया। लुटेरे ने कहा देख मैंने तेरे लिये अपने साथी को मार डाला। अभी तलवार म्यान में नहीं गई। जो व्यक्ति अपने साथी को मार सकता है, वह स्त्री की
शिव के
[१५ क्या परवाह करेगा। बहतर है तू मेरे साथ चल नहीं तो इसी खड़ग से तेरा भी काम तमाम कर दूगा । रानी वीराङ्गना और साहसी थी, वह कहने लगी ! पापी तू मुझे क्या डराता है ? ईश्वर की इच्छा के बिना तू मुझको क्या मार सकता है ? यदि मेरी मृत्यु हो गई है तो मैं तैयार हूँ, तेरे साथ कभी न चलूगी। जो कुछ तुझसे बने कर, मैं तनिक भी तुझसे नहीं डरती न तेरा कहना मानूगी। लुटेरे ने फिर उसको मुलायमी से समझाना चाहा पर उसने साफ इन्कार कर दिया। आखिर उसने क्रोध में अाकर तलवार को फिर हाथ से उठा लिया और करीब था कि रानी के सिर को धड़ से अलग कर दें । इतने में एक सनसनाता हुआ तीर उसकी छाती में लगा । लुटेरा तो वहाँ का वहीं नोटपोट हो गया । नलवार पृथ्वी पर गिर पड़ी, रानी चकित होकर देखने लगी ! सामने से एक भील तीर कमान लिये हुये आया । बहिन ! तू आज से मेरी धर्म की बहिन है। तू कौन कहाँ जाती है ! कहाँ से आई है ? वह तेरा कौन था। मैं तुझको कभी न सताऊगा। तू मेरी मुह बोली आज से बहिन है। जिससे तुझे सुख मिले वह तेरी सेवा करूगा । और मेरी स्त्री भी तेरा सत्कार करेगी । | भील की बातों से सहानुभूति टपकती थी। रानी ने उससे कुछ दुरावं न किया । सारा हाल कह सुनाया। मैं समझ गया था कि यह आदमी पापी है तुझको दुख देना चाहता था। इस कारण जब मैंने इसकी धींगामुस्ती और तेरा इन्कार सुनाइसके मारने में ही भलाई देखी । मेरा झोंपड़ा पास ही है। देख वह नजर आ रहा है। इस बन में तेरा कोई साथी और मददगार नहीं है । यदि तू मुझे अपना भाई समझती है और मेरे सक्थ रहने में कुछ संकोच नहीं है तो चल कुछ दिन हमारे संग जीवन बिता । मैं तेरे पति की भी खोज कर दूगा ।।
शिव १४, रानी ने रजामन्दी प्रगट की और खुशी के साथ भील के
झोंपड़े में आकर रही । यहाँ दोनों स्त्री पुरुष बड़े प्रेम व आदर के साथ पेश आते थे। और हर प्रकार से उसकी दिलजोई करते थे।
यह तो रानी का हाल था। अब राजा की मुसीबत की कहानी सुनिये ।
सूरजसिंह लकड़ी का गंडा सिर पर धरे शहर में आया । रानी न मिली। दो घंटे चार घंटे इन्तजार किया मगर वह नहीं आई । वह एक तरफ दुखी था। दूसरी ओर दोनों लड़के माता के लिये बिलक रहे थे ! पिता जी ! माता कहाँ गई.? बेटे संतोष करो आती होगी, पर माता कहाँ थी ? जो वहाँ आती। दीन बालकों को रोता छोड़ कर शहर के सारे मोहल्ले छान डाले पर कहीं पता नहीं लगा। एक दिन, दो दिन, चार दिन धैर्य धरा । पर आखिर धैर्य की भी सीमा है। वह छोटे बालक माता के बिना कल नहीं लेते थे। जब वह रोने लग जाते तो घंटों ही रोते रहते । सूरजसिंह उनकी बड़ी तसल्ली करता पर वह भी अपने आंसू नहीं रोक सकता था । मुसीबत ! आखिर तेरी भी हद होनी चाहिये । राजपाट गया, धन, मान प्रतिष्ठा सब गई लकड़ी बेचने की नौबत आई। फिर भी तुझको सब्र न आया।
चौथे दिन जब लड़के अति व्याकुल हुये सूरजसिंह का भी ; जी भर आया ! इसने दोनों को अपने कन्धों पर बिठा लिया
और जंगल–जंगल गाँव–गाँव बनदेवी का नाम पुकारता हुआ चल निकला । लोग इसको देख कर हंसी ठट्ठा करते थे कि यह : कहीं पागल तो नहीं होगया । बनदेवी का नाम भी कुछ भौंड़ा: सा था । किसी से कुछ पता न लगा और वह इस प्रकार कई दिन बच्चों को लादे हुए उसकी खोज में भटकता रहा। इस
शिव
[.१७ समय बालकों की आयु पांच छः वर्ष की रही होगी, इनमें चन्द्र बड़ा और विपय छोटा था। दोनों जंगल में अपनी माता को पुकारते हुए चले जा रहे थे । जब कुछ उत्तर न मिलता वे निराश होकर रोने लग जाते । उस समय सूरजसिंह के जी का हाल कुछ न पूछो ।…
राह में एक गहरी नदी पड़ी जिसका न थल न बेड़ा। कैसे * पार करता ? अन्त में उसने लकड़ी काट कर एक बेड़ा बनाया। इस पर अपने दोनों बच्चों को सवार किया और आप भी बैठ गया। लोग सत्य कइते हैं मुसीबत अकेली नहीं आती ! जब बेड़ा मेजधार में लगा वहां जल की धार बड़ी तेज थी। बेड़ा संभल न सका, उलट गया। दोनों लड़के गोता खाते हुये बह निकले । सूरजसिंह भी ज्यों–त्यों करके डूबने से बचा। बेचारा बड़ी कठिनता से तट पर आया। बच्चों का कहीं पता नहीं था। न इनकी लाश ही मिली । राजा ने समझा वे दोनों डूब गये। विवश होकर तन तकदीर वह जार २ रोता हुआ आगे बढ़ा राज गया ! पतिव्रता स्त्री से बिछोह हुआ ! दो लड़के जो आँखों के तारे थे वह भी नदी केप्रवाह की भेंट हुये !
अब उसने देखा कि चिन्ता करना व्यर्थ है। आखिर जंगल में रहने लगा और वह थोड़े आदमियों का जत्था बनाकर उसका सरदार बन गया और जंगल की पैदावार पर जीवन निर्वाह करने लगा। दो तीन वर्ष के भीतर उसका बल इतना बढ़ गया कि जब उसने सुना कि रामनगर का राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और उसके देश का कोई उत्तराधिकारी नहीं है उसने अपने आदमियों को बुलाकर कहा भाइयो ! मैं धारानगर का राजा था। भाग्य बिगड़ गया। अब तक मारा २ फिरता रहा। मैंने सुना है रामनगर का राजा मर गया है कोई उस राजा का वाली वारिस नहीं है, इस कारण मैं उस पर अधिकार करके शासन करने का
१६}
• शिव के इरादा रखता हूँ। कहो आप लोगों की क्या सम्मति है ? सबने । हाथ उठाकर इसका संग देने की साक्षी दी । राजा ने सुअवसर जानकर शहर पर धावा बोल दिया। और आनन फानन में नगर पर अधिकार जमा लिया। जब लोगों को मालूम हुआ कि यह धारानगर का राजा है वे चित्त में बड़े प्रसन्न हुए । सूरजसिंह नेक और न्यायप्रिय भी था। थोड़े समय में ही वह रामनगर की प्रजा की दृष्टि में सर्व प्रिय बन गया और भले प्रकार से राज–काज करने लगा। पर स्त्री और पुत्रों के विछोह का डाह उसको बुरी तरह सताता था । कई राजाओं ने उसको अपनी लड़कियाँ देनी चाहीं पर वह सदा इन्कार करता रहा और किसी दिन भी उसके चित्त से बनदेवी का ध्यान दूर नहीं हुआ। उरूने जगह २ पर उसकी खोज में आदमी रवाने किये पर सदा असफल रहा।
चंन्द्र और विपय भी डूबने से बच गये थे। केवल जल के प्रवाह में बह गये थे। ईश्वर ने उनके प्राणों की रक्षा की थी ! एक को तो किसी मछये ने पकड़ लिया। दसरा किसी लकडहारे के हाथ लगा। दोनों का वहाँ पालन पोषण होने लगा। चाहे वह लकड़हारे और मल्लाह के घर रहते थे पर दोनों को सैर व शिकार का शौक था और क्षत्री वंश के सब गुण उनमें मौजूद थे । यह आसपास के देहात में ही रहते थे ,पर आपस में मिलने का कभी अवसर नहीं हुआ था।
सती बनदेवी भील के यहां रहती थी । चाहे वहाँ उसे किसी प्रकार का दुख नही था पर पुत्रों और पति के बिछोह दुखी रहती थी। भील ने बहुतेरा तलाश किया पर पति और पुत्रों का कहीं पता ने लगा। एक दिन का जिक्र है कि जब भील शिकार खेलने गया हुआ था और भीलनी निकट के खेत में घास छील रही थी। वह अकेली झोंपड़े में बेसुध सो रही थी । एक सिंह
शिव
[ १६ जो ताक में लग रहा था झोंपड़े में आ पहुँचा और उसको उठा ले गया । भीलनी की निगाह पड़ी। वह चिल्लाने लगी। जब भील आया उसने रोकर कहा मेरी नन्द को तो शेर उठा ले गया। भील को जो दुख हुआ वह वयान से बाहर है। वह बनदेवी को प्यार करने लगा था । और सचमुच अपनी असली बहन समझने लगा था । जब उसने सुना कि बनदेवी को तो शेर ले गया वह रोता हुआ तीर कमान लेकर सिंह की भाट की ओर चला, स्त्री साथ थी । ईश्वर की लीला ! शेर सोया हुआ था। रानी घायल थी और उसके पास बेसुध पड़ी थी । सांस रही थी । भील ने जाना बहिन अव तक जीवित है। कोई चिन्ता नहीं वह बच जायगी। यह कह कर उसने दो तीर लगातार शेर की दोनों आँखों में मारे और जब वह उछलने को हुआ कमर से कटार खींचकर उस पर जा टूटा। और उसका काम तमाम कर दिया। भीलनी की खुशी की कोई सीमा न रही ? उसने बनदेवी को गोद में उठा लिया और प्रेम के आंसू बहाने लगी। फिर भील उसको झोंपड़े में लाया । और घाव की मरहम पट्टी की गई।
| थोड़े समय में ही घाव भर गये और बनदेवी आराम से रहने लगी। पर भील उसको देखकर दुखी होता । एक दिन उसने कहा बहिन यदि तू राजी हो तो हम तीनों बहनोई की तलाश में घर से बाहर निकलें । यहाँ बैठे २ कैसे पता चलेगा । यदि वह मिल जाँय तो हम सब मिलकर जंगल में बड़े आनन्द से रहेंगे। बनदेवी की मन चाही हुई और वे तीनों खोज को चल दिये ।।
तीनों सलाह करके सूरजसिंह की तलाश में दिल्ली की ओर चल दिये । पर राह में एक और दुर्घटना घटी । जहाँ यह लोग ठहर रहे थे पास ही किसी सौदागर का डेरा लगा हुआ था। उसे मालूम हुआ कि भीलों के संग एक बड़ी सुन्दर और रूपवती
२०] ।
* शिव स्त्री आई हुई है वह उसके देखने के लिये भीलों के पास आया और उनको लोभ लालच देकर बनदेवी के हवाले करने को कहा । सदाचारी वली भील कब ऐसी बात सुनने वाला था। अंत में लड़ाई की नौबत आई । सौदागर ने भील और बनदेवी को गिरफ्तार करना चाहा । भील में इतनी शक्ति कहाँ थी कि वह सारे लशकर पर विजयी हो पाता उसने भाग कर निकट ही राजा के दरबार में फरियाद की कि मेरी बहिन को एक सौदागर जबरदस्ती पकड़ कर लिये जारहा है। संयोगवश यह दरबार सरजसिंह का था। उसने फौरन कर्मचारी भेज दिये । सौदागर बन्दी बना हुआ पेश हुआ। संध्या समय था । सूरजसिंह ने बनदेवी को देखा वह अत्यंत निर्बल होरही थी । मगर रूप रंग को कुछ हानि नहीं पहुँची थी। फिर भी राजा पहिचान न सका । बनदेवी को ज़रूर कुछ संशय हुआ। पर वह चुप रही। राजा ने अपने दरवार की किसी कोठरी में बनदेवी और भीलनी को ठहरने को जगह दी । सौदागर हिरासत में ले लिया गया और राजा ने हुक्म दिया कल तुम्हारे मुकद्दमे की सुनाई होगी।
जिस समय यह आयुश हुआ उसी समय दो नवयुवक राजा के पास लड़ते झगड़ते हुये आ पहुँचे। दोनों बड़े सुन्दर और बली थे। इनमें से जो बड़ा था कहने लगा मैंने जंगल में एक हिरन को मारा । इसका तीर बाद को लगा । पर यह कहता है कि शिकार मेरा है । छोटे ने कहा धर्मावतार ! हमारा न्याय आपके हाथ है। निःसन्देह तीर तो इसी ने पहले चलाया पर हिरन घायल मेरे ही तीर से होकर गिर पड़ा, आप न्याय करें। इन युवकों के सुभाव में क्षत्रीपन था। राजा ने पूछा तुम कौन हो ? एक ने कहा मैं मल्लाह का बेटा हूँ। दूसरा कहने लगा मैं लकड़हारा हूं। राजा ने कहा तुम दोनों भी यहीं आराम करो। आज संध्या समय होगया है. कल तुम्हारा भी न्याय किया जायगा । वह दोनों एक साथ वहाँ ठहर गये ।।
।
६ शिव
[ २१ | राजा को मन में अति आश्चर्य हुआ ! वह विचारने लगा न यह स्त्री भीलनी प्रतीत होती है न यह दोनों युवक मल्लाह और लकड़हारे हैं। इनका रूप रंग ढंग वार्तालाप उच्च कुल का सा मालूम होता है । हो न हो इसमें कोई रहस्य अवश्य है। चलो भेष बदल कर हम भी इनके पास ही छिप र हैं और सुनें वह आपस में क्या बात–चीत करते हैं। इससे सम्भव है कले इनके न्याय करने में कुछ सहायता मिले । यह सोच कर वह कोठरी के निकट ही आकर छिप रहा। जब सब लोग सो रहे, बड़ा लड़का कहने लगा। देखो बैठेबिठाये हमने भी क्या
आफत मोल ली । आखिर शिकार के लिये झगड़ने की क्या जरूरत थी । आधा २ बांट लेते । यहाँ व्यर्थ में ही हँसे । छोटे ने कहा भाई बात तो सत्य कहते हो। पर अब तो जो कुछ होना था होगया । पर मैं तुमसे पूछता हूँ यह तो बताओ तुम कौन हो ? मेरा चित तुम्हारी ओर खिंचा जाता है। उसने उत्तर दिया मैं क्या कहूं । वास्तव में बात तो यह है मैं मल्लाह का लड़का नहीं हूँ। मेरा पिता सूरजसिंह धारानगर का राजा था । मेरा नाम चन्द्रसिंह था । अब मल्लाह ने कुछ ओर रख लिया है । इतना सुनना था कि दूसरा लड़का उछल कर उसकी छाती से चिपट गया। भाई मैं भी विपयसिंह तुम्हारा छोटा भाई हूं। मुझको नदी में से लकड़हारे ने निकाला था।
दोनों मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। फिर विपयसिंह कहने लगा सुनो यह कोठरी के भीतर दो स्त्रियां क्या कह रही हैं ? दोनों कान लगाकर सुनने लगे। बनदेवी रोकर भीलनी से कह रही थी । देखो ईश्वर की लीला ! मुझ पर कैसी विपत्ति आई है। आज मेरा पति जीवित होता तो क्या आज मैं ऐसी दरबदर मारी–मारी फिरती ! या चन्द्रसिंह और विपयसिंह ही मौजूद होते तो अपनी माता का इस प्रकार निरादर और अवज्ञा न होने
२२]
शिव के देते ! हा दैव तेरी लीला अपरम्पार है ! दोनों लड़कों के कान खड़े हुए यह तो कोई हमारा ही हाल कह रही है । उसी समय उठे, दरवाजा खोलो ? किसने चन्द्रसिंह और विपयसिंह का नाम लिया है ? हम दोनों यहाँ मौजूद हैं। बात कहने में देर लगती है दूसरी घड़ी ही द्वार खुल गया। बनदेवी दिये के प्रकाश में अपने कॅन्दा और विपय को देख कर झपटी, मेरे प्यारे पुत्रो ! मैरे कलेजे के टुकड़ो ! और उसने रोते–रोते दोनों को अपनी छाती से चिपटा लिया और आँखें चाहे वृता खा जांय पर माता की आँखें अपने पुत्रों की सुरत नहीं भूलतीं। | सूरजसिंह का जी उछलने लगा। उसने धैर्य धरने की कोशिश की पर धैर्य कैसे बंध सकता था। आखिर उससे भी न रहा गया। वह कोठरी में चला आया । और उनकी ओर देख कर कहने लगा । मैं अभागा सूरजसिंह हूँ। पुत्र और स्त्री सब इससे चिपट गये । बनदवी इससे कहने लगी। प्राणनाथ ! तुम्हारा बियोग कठिन था। यह कह कर वह पृथ्वी पर गिर पड़ी और बेसुध होगई ! | राजा डरा ! कहीं इसकी अधिक खुशी होने से मृत्यु न हो आय ! पर इसी समय इसके मुख पर गुलाब जल छिड़का गया । उसने नेत्र खोल दिये। चारों आदमी मिलकर खुश हुये ! रानी उसी समय भीलनी के संग महल को गई । राजा रानी और पुत्रों से उनके हालात सुनें और अपनी बीती उनको सुनाई। फिर भील और भीलनी का उपकार सुनकर उनकी कृतज्ञता प्रगट की। | प्रातः दरवार में सब मुजरिम हाजिर किये गये । राजा ने सौदागर को देशनिकाला दिया । भील को अपना सलाहकार बनाया और भीलनी को रानी के साथ रहने का आयुश दिया।
[ २३ इस घटना के दो वर्ष बाद उसने चढ़ाई करके धारानगर को भी जीत लिया और उनकी शेष आयु सुख चैन में व्यतीत हुई ।।
जिस तरह आपस में इनको मिलाया ।। | विछड़े सब मिलें मेरे रघुराया ।। धन्य हैं वह प्राणी जो भगवान् पर भरोसा रखते हुए धर्म के पथ को नहीं त्यागते । क्योंकि वह ईश्वर के सच्चे पुत्र कहलायंगे और साँसारिक परीक्षा और कष्टों के उपरांत इनको प्रभु के चरणकमल की छत्रछाया में जीवन व्यतीत करने का । सुअवसर प्रदान होगा।
कबीर चिता क्या करे चिंता से क्या होय । मेरी चिंता हरि करे, चिनो मोहि न कोय । अंडा पालै कालु बिन थेन राखै पोख। यों करता सबको करे पाले तीनों लोक ।।
उभय कुमारी प्रेम भक्ति के पथ पर विरला चाले कोय ।।
सती चले कै साधुओं और से भक्ति न होय । उभयकुमारि मालवा देश की चन्देरी नगरी के राजा प्रताप सिंह की सुन्दर और धर्मात्मा पुत्रवधु थी । यह चित्त की उदार और दयालु थी। इसको विवाह सूरसैन नामी सोनगपुर के राजकुमार के साथ हुआ था। यह भी बड़ा सभ्य और सुशीले स्वभाव का युवक था । जब से उभयकुमारि इसके यहां ब्याह कर आई थी । वह नित्य प्रति बिना चूक के सूरसैन की सेवा को अपना धर्म समझती थी । कहने को तो यह दोनों पति स्त्री थे । पर दोनों ही बड़े धमत्मिा थे। उभयकुमारि पति से दो चार दिन के लिये भी अलग नहीं रहना चाहती थी।
२४]
शिव कहते हैं सूर सैन किसी वजह से श्रावस्ती नगरी के राजा–के आधीन था। साल में कभी–कभी इसके दरबार में जाना पड़ता था । राजा ने इसकी पुरानी सेवाओं के फलस्वरूप कुछ गांव भी दे रखे थे । जिनका यह राजपूत सरदार बना हुआ था। सुरसैन यों तो हर तरह से नेक था पर स्वामिभक्ति का गुण इसमें कूट–कूट कर भरा था । श्रावस्ती नगरी का राजा इसके बल पराक्रम और पुरुषार्थ से अति प्रसन्न रहता था और चाहता था कि वह बहुधा दरबार में आता रहे जिससे उसको उसकी सलाह मशवरा लेने का लाभ मिलता रहे। पर सूरसैन को फिर भी अपने इलाके के बन्दोबस्त को आना ही पड़ता था ।
जब इसकी शादी होगई इसने समझा अच्छा हुआ। उभयकुमारी रियासत के बन्दोबस्त में सहायक रहेगी। दोनों शादी होने से खुश थे और दोनों ही एक दूसरे को चाहते थे ।
और तन मन से एक दूसरे पर निछावर थे। * संयोग वश एक बार ऐसा अवसर हुआ कि श्रावस्ती नगरी के राजा ने सूरसैन को बुलाकर किसी पर चढ़ाई करने का हुक्म दिया । जहाँ इसकी सेवा की २–४ महिनों को बड़ी जरूरत थी । सरसैन घर पर अपनी नेक स्त्री से विदा होने को आया । यहाँ उसने अपनी सैना को संभाला और उभयकुमारि को राजा का
आदेश सुनाया । उभयकुमारि बोली आप राजपूत हैं जहाँ काम पड़े वहां जांय । चाहे मुझे आपकी जुदाई से दुख हो पर क्षत्री धर्म के सामने उसका लिहाज नहीं किया जा सकता। आप शोक से चले जाइये और संग्राम में राजा का हाथ बटाइये । मैं कुछ दिन के लिये अकेली ही रह जाऊंगी। मगर मेरे प्राण आपके साथ रहेंगे। सूरसैन ने कहा प्रिये ! मैं बिवश हूँ मेरा मन भी तेरे पास होगा । पर राजा की आज्ञा का पालन करना जरूरी है हम उसकी प्रजा हैं, उसका नमक खाते हैं। पीड़ी दर पीड़ी से
शिव ।।
[ २५ हमारा खानदान उसके अधीन है। मैं तुझको भी साथ ले चलता पर संग्रामभूमि में स्त्री का साथ रखना वर्जित है। और फिर अपने इलाके का इंतजाम भी करना जरूरी है। मुझको दो मास से अधिक समय न लगेगा । मैं संग्राम को सर करके शीघ्र ही तेरे पास जाऊगा । उभयकुमारि बोली प्राणेश्वर ! जो कुछ आप कहते हो सत्य है, जिस प्रकार तुमको अपने स्वामी का आयुश सिरोधार्य है मैं भी पतिपरायण हूँ। कभी तुम्हारी मर्जी के खिलाफ काम करना नहीं चाहती। पर एक वर आपसे मांगती हूं। वह यह है कि तीजों के दिन आप यहां अवश्य आजावें जो मैं आपकी . पूजा कर सकें। आज से चार महिने बाद तीजों का दिन आवेगा । उस समय तक आपकी बाट देख सकती हैं। यदि आप तीजों तक न आये तो फिर ईश्वर जानें मेरा क्या हाल होगा ? सूरसैन ने हंस कर उत्तर दिया। तू तीज को कहती है मैं जल्दी ही संग्राम को जीत कर आजाऊगा । और तीज को तो ज़रूर ही यहाँ हूँगा। तू खातिर जमा रख मैं हजार नुकसान करके भी यहाँ आजाऊगा । इसमें लेशमात्र भी शंका न होगी। तू उस दिन जरूर मेरे इतजार में रहना । | इस प्रकार ढाढस देकर सूरसैन तो अपनी सैना को साथ लेकर संग्राम में चला गया । उभयकुमारि ने अपने वस्त्र आभूषण उतार कर रख दिये। साधारण एक सफेद धोती पहन ली और उस दिन से अपने पति के स्थान पर रियासत का काम काज खुद करने लग गई । राते दिन उसको अपने प्राणपति का ध्यान रहता था। जिस प्रकार योगी परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते हैं। यह ही उसकी दशा थी, दो मास बीते सूरसैन नहीं आया । पर सती के चित में स्थिरता थी । वह जानती थी तीजों के दिन जरूर आजायँगे । हिन्दू स्त्रीयों में तीजों का दिन बड़ा पुनीत त्यौहार माना जाता है। हम इसकी असलीयत तो नहीं जानते
२६] ।
‘ शिव पर इस दिन सुहागिन स्त्रीयां व्रत रखती हैं और अपने पति की सलामती के लिये प्रार्थना करती हैं। वह पति पूजा का दिन समझा जाता है । उभयकुमारि को पूर्ण विश्वास था कि उसका पति उस दिन जरूर आजायगा क्योंकि वह प्रतिज्ञा करके गया था।
चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे मेरु गम्भीर । टरे न टारे वचन को, । टरते नहीं योधा धीर रणवीर ।।
इस समय सूरसैन बराबर शत्रुओं से लड़ता रहा । उसको अवकाश तक न मिला कि घर को खबर तो भेजदे । न उभयकुमारि ने ही कोई आदमी उसकी खबर लेने को भेजा उसने संग्राम तो जीत लिया। शत्रुओं को मार काट कर श्रावण के महीने में श्रावस्ती नगरी पहुंचा। तीज के त्यौहार के केवल एक या दो दिन ही वाकी रह गये थे। श्रावस्ती के राजा ने उसका भारी मान
आदर किया। और इच्छुक हुआ कि वह दो चार दिन वहाँ ठहरे पर उसने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की श्री महाराज ! मेरी ग्त्री भरोसे होगी यदि मैं तीजों के दिन घर न पहुंचा तो फिर खैर नहीं है ! राजा ने फिर रोकना ठीक न समझा । थका मांदा सूरसैन एक तेज साँडनी पर सवार हुआ । पानी रिमझिम रिमझिम बरस रहा था। विजली कांध रही थी पर वह अकेला ही सांडनी पर सवार होकर चल दिया ।
अब जरा उभयकुमारि का हाल सुनिये, वह रोज २ इन्तजार करती रही आखिर तीजों का दिन आ ही पहुँचा। उस दिन वह बड़ी प्रसन्न थी क्योंकि पति से मिलने की आशा थी, उसने स्नान करके अच्छे वस्त्र आभूषण पहने । फूलों की बेनी अपने केशों में लगाली । सारा दिन पूजा और त्यौहार की रीति रस्म में व्यतीत हुआ। शाम हो गई सूरसैन न आये । अब कुछ
[२७
शिव व्याकुलता बढ़ने लगी ! वह लड़ाई में गये थे ईश्वर जाने क्या हुआ हो ! खबर भी कुछ नहीं मिली थी। उसकी चिंता घड़ीघड़ी बढ़ने लगी । अब तक उसने कुछ सोच विचार नहीं किया था। क्या कारण हुआ जो स्वामी अब तक न आये। आधी रात के लगभग व्यतीत होने को आई कुछ खबर नहीं मिली ! वर्षा जोर शोर से हो रही है। विजली कड़क रही है । किसी आदमी के आने की आहट तक नहीं मिलती । हे ईश्वर ! क्या हुआ ? वह क्यों नहीं आये ? क्षत्री के बचन झूठे नहीं होते । आखिर क्या कारण है ? इसके चित्त में चिंता की आग जलने लगी। वह रह रह कर अति व्याकुल होती थीं। दिल को कल नहीं पड़ती थी।
बिरहन दिया संदेशरा सुनो हमारे पीउ। जल बिन मछली क्यों जिये पानी में का जीउ ।। कबीर सुन्दर यों कहे सुनिये कंथ सुजान , बेग मिलौ तुम आय के नहीं तो तजू प्राण । मानस गया पिंजर रहा ताकन लागे काग। साहब अबहु न आइये कोई मन्द हमारे भाग । कै बिरहन को मौत दे के बेगि सुरत दिखाय ।
आठ पहर का बाजना मोपै सहा न जाय । बिरह प्रवल दल साज कर घेर लिया मोहि आये ।। नहीं मारे छोड़े नहीं, तड़प तड़प जिया जाय । देखत देखत दिन गया निश भी देखत जाय। बिरहन पिया. पावे नहीं बेकल जिया घबराय । सो दिन कैसा होइगा हरि गहेंगे बाँह । अपना कर बैठावहिं चरन कमल की छांह ।। हृदय भीतर दो जले धूआँ न प्रगट होय ।। जाके लागी सो लखै के जन लाई सोय ।
शिव बिरह भुअगिन बस करी किया, कलेजा घाव ।। बिरहन अँग न मोड़हि ज्यों भावे त्यों खाव । सती का प्रेम अंग बढ़ता गया । बिरह की अग्नि प्रचण्ड हो उठी ! पास एक खाट पड़ी हुई थी। उस दिन स्त्रीयाँ खाट पर नहीं सोतीं । पर प्रेम के अग में कुछ नहीं सूझता ! रस्म रिवाज का ध्यान भी मन से जाता रहता है। वह साधवी स्त्री उस पर पड़ रही । समाधि की दशा लग गई। दीन व दुनिया का विचार जाता रहा । और इसी दशा में पति के बियोग में उसने रात के तीसरे पहर में अपने प्राण त्याग दिये और प्रेम की पदवी को इस प्रकार प्राप्त कर लिया।
जब पति ही हाथ से ऐ दिल मेरे जाता रहा। * दिल की भी परवा नहीं जाता रहा जाता रहा। किस कदर बिरहा का पति के मुझे अफसोस है।
लेटते ही प्राण पक्षी जिस्म से जाता रहा। इधर साँडनी सवार भी भागा चला आ रहा है। साँडनी बहुत तेज है वह सिर से पांव तक तर बतर हो रहा है। पर शौक का कदम आगे पढ़ता जाता है। न मेह का ध्यान न विजली का डर । वह ऐसा बेसुध होकर बगदट चला आ रहा है। राम राम करके किसी प्रकार रास्ता तै हुआ। वह घर पहुँचा। दरबान ने पुकारा कौन ? उसने कहा मैं हूँ सूर सैन, दरवाजा खोलो ? फाटक खोल दिया गया। नौकर चाकर स्वामी का बोल सुनकर जाग उठे। पर अभयकुमारि नहीं आई। सूरसैन ने पूछा रानी कहां है ? एक बांदी ने हाथ जोड़ कर कहा महाराज ! रानी जी ने आज व्रत रखा था। दिन भर आपके मिलने की खुशी में मग्न थीं। शाम तक आपका भरोसा रहा । आज ४ महीने के बाद रानी जी ने नये कपड़े और जेवर पहिने थे। आपकी पूजा के लिये व्याकुल थीं। जब आधी रात बीत गई आप नहीं आये तब मन मार कर सो रहीं।
शिव
[ २९ सूरसैन ने नये वस्त्र पहने और सीधा वहां पहुंचा जहां सती खाट पर पड़ी थी। सूरसैन ने पुकारा ? प्रये ! उठो सूरसैन अगया। पर उठता कौन ! इसको आश्चर्य हुआ ! उसने शीश पर हाथ फेरा । सिर में कुछ २ गम शेष थी। हाथ पांव ठंडे पड़ गये थे । हाय प्यारी ! तू दो घण्टे भी सत्रे न कर सकी । सूरसैन के लिये दुनिया को अँधेरा कर चली । सूर सैन की जो हालत थी उसका वर्णन कठिन है। उसने बांदियों को आवाज दी । सब
आई और रानी की दशा देख कर वह रोना पीटना मचा कि जिसका कोई ठिकाना नहीं। | सूरसैन ने कहा अच्छा जो होना था हो चुका अब बाहर जाओ ? और जब वह बाहर चली गई सरसैन ने एक नजर अपनी पत्नी को देखा । यह मालूम होता था मानो अब भी वह सुहागवति है। रोते हुये सूर सैन ने उसको प्रेम भरी दृष्टि से देखा । और कमर से कटार खींच कर अपने कलेजे में भौंक ली
और उसके साथ उसो खाट पर सो रहा । इस प्रकार दो प्यार करने वाली पवित्र आत्मा दम के दम में दुनिया से सिधार गयीं । प्रातः एक के बदले दो के विमान निकाले गये । जिस २ ने सुना वह ही उनके सच्चे प्रेम की प्रशंसा करने लगा।
कबीर भट्टी प्रेम की बहुतक बैठे आय । सिर सोंपे सो पीयेंगे औरसे पिया न जाय । जब लग मरने से डरे तब लग प्रेमी नाँह । बड़ी दूर है प्रेम घर समझ लेउ मनमाहिं ।
व्यहूला भक्त भाव भादों नदी सब ही चलें इठलाय ।। सरिता सोई सराहिये जो आठ मास उहय ।।
शिव जल ज्यों प्यारी मांछली लोभी प्यारा दाम । माता प्यारा बालका भक्ति प्यारी राम ।। सीस उतारि भुइये धरे तापर राखे पाव । दास कबीरा यों कहैं ऐसा होय तो आव ।। प्रेम प्याला भर पिया राच रहा गुरु ज्ञान । दिया नगाड़ा शब्द का लाल खड़े मैदान ।। – जीऊ तो पीया संग रहूं मरत न छाँडू‘ संग ।।
पिया रंग राती रात दिन कबहु न होउँ कुरंग ।।। ‘नचहनी नगर कोई छोटा कसबा था। वहाँ सायन नाम का एक व्यापारी रहता था। व्यहूला इस व्यापारी की धर्मपरायण पुत्री थी। इसकी माता का नाम अमलासुन्दरि था । इस बात के कहने की आवश्यकता नहीं कि वह नेक, धर्मात्मा, सच्ची और सुशील थी । क्योंकि हम ऐसे ही प्राणियों के चरित्र आपको सुनाते हैं जो धर्म और सभ्यता की दृष्टि से परिपूर्ण हों।
सायन के घर एक समय महाभारत की कथा सुनाई जा रही थी । व्यहूला अपनी माता के साथ कथा सुनने जाया करती थी। जब उसने दमयन्ती और सावित्री के इतिहास सुने उसके नेत्रों से आँसू जारी हुए और वह अमलासुन्दरि से कहने लगी माता! मैं भी सावित्री के समान पतिपरायण बनूगी।
अमला हँसी ! बेटी स्त्री जाति का आदर्श यह ही है कि वह थति की सेवा करे। यह शरीर धन–धाम सब पति का है। पति के बिना वह संसार शून्य है। कौन किसके लिये और क्यों जीये? संसार का सुख क्यों पति के साथ है ? पुत्र, धन–धान्य
और सब सामग्री पति से मिलती है। इसलिये सावित्री ने किसी हालत में पतिं का संग नहीं छोड़ा और जगत में अपना यश छोड़ मई।
यह बातें यों ही साधारण ढंग में हुई थीं। लोग रोज़ अपने
शिव घरों में कहा सुना करते हैं। पर व्यहूला अधिकारिणी थी। इन उपदेशों का उसके चित पर गहरा प्रभाव पड़ा ।
जब व्यहूला १४–१५ वर्ष की हुई, माता पिता ने चपनकनगर के एक व्यापारी चाँद के पुत्र निखन्दर के साथ उसका विवाह कर दिया । जो रूप–रंग का सुन्दर धर्मात्मा और सुशील
था। व्यहूला की सास का नाम सनकासुन्दरी था। | व्यहूला जब से पति के घर ब्याह कर आई सच–मुच सावित्री के समान उसकी सेवा करने लगी। पहले जब उससे मिलती उसके चरण छू कर बात–चीत करती । सास इसको देख कर बड़ी प्रसन्न रहती और व्यहूला के प्रेम और सेवा ने इसके दिल में इतनी जगह करली थी कि वह इसको अपनी बेटी से अधिक प्यार करती थी । अड़ोस–पड़ोस की स्त्रियां भी इसके चलन से बड़ी प्रसन्न रहती थीं और उसके स्वभाव की प्रशंसा करती थीं। | कई वर्ष सुख–चैन में बीते पर कर्म गति ! एक दिन जब पतिपत्नी सो रहे थे। छत से एक विषधर सर्प गिरा । और उसने सोते हुये निखन्दर को काट लिया । व्यहूला जाग रही थी । उसने सांप को देखकर शोर मचाया । द्वार खोला गया । सबने आकर देखा । सांप ने निखन्दर की जान लेली थी। वह अँगड़ाई ले रहा
था । मुख से झाग निकल रहे थे। | यह दशा थोड़ी देर तक रही । फिर उसने आंखें बन्द करली. और लकड़ी के समान अडोल बन गया । माता पिता ने बहुत कुछ दवा इलाज कराये पर किसी से कुछ लाभ न हुआ । सोने वाले ने फिर आँख न खोलीं । निखन्दर अपने माता–पिता का इकलौता पुत्र था। घर में ऐसा शोक छा गया कि जिसका कहना कठिन है। रोने वाले रो–पीट कर चुप हो रहे । मौत पर किसका चश है ? काल से कौन लड़ सकता है । पर व्यहूला का रोना बन्द न हुआ । सबने समझाया सब्र–संतोष करने को कहा सनका
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शिव सुन्दरी ने इसको गोद से चिपटा कर ढाढस दिया हाथ से आँसू पोंछे पर इसके चित्त को धैर्य न बँधा वह अपनी सास से कहने लगी ।।
| बालकपन में एक दिन मेरी माना ने कहा था कि किसी का परिश्रम असफल नहीं होता । “मनुष्य प्रयत्न ईश्वर सहायता” । सावित्री ने अपने पति को जीवित कराया था । मेरा पति मरा. नहीं है, केवल सांप सूघ गया है। लोग कहते हैं साँप के काटे हुए की उम्मेद छः मास तक रहती है। मैं स्वामी के शव को लेकर जाऊगी। कोई जानने वाला मिल ही जायगा । यदि वह जी उठे तो ही मैं लौट कर आऊगी नहीं तो इस शरीर का भी अत इनके ही साथ होगा।
दृढ़ विश्वास का कौन सामना कर सकता है ? जो किसो धुन में लग जाते हैं वह बावले होजाते हैं उनके विवेक विचार और बुद्धि सब एक केन्द्र पर स्थिर होजाते हैं। वह न किसी की सुनते हैं न किसी की मानते हैं। अपने विचार में ऐसे दृढ़ होजाते हैं कि इनके स्वभाव की स्थिरता दूसरों की दृष्टि में पागलपन की सीमा को पहुँच जाती है। “बावले से बचकर रहो । मार बैठेगा यह एक साधारण सी कहावत है। व्यहूला की भी यह ही दशा थी । इस अबला ने पति के मृतक शरीर को पीठ पर लाद लिया गंगा के किनारे आई, इसके सुसर की एक छोटी नवका बंधी थी । लाश को हिफाजत के साथ इस पर लिटा दिया और नवका की रस्सी को खोलकर आप उस पर चढ़ बैठी। शरीर पर न कहीं आभूषण हैं न अच्छे वस्त्र ही हैं। केश बिखर रहे हैं। सूरत से शोक बरस रहा है। नवका पर बैठकर तन बतकदीर वहाँ से पच्छिम की ओर रवाने हुई । पुरवाई हवा चल रही थी। उसके झोंके इसको बहा ले चले । जिसने सती को देखा अफसोस करता था और कहता था पति के साथ इसकी बुद्धि भी मारी गई ।
शिव
[३३ दीवाना बन जा गुम जो खांय और भी । ।
बुद्धि बढ़ी क्या जान आफत में आगई ।। नवका बहते–बहते एक गाँव के किनारे लगी । व्यहूला के रोने की आवाज सुनकर बहुत सी स्त्रियां जो स्नान को आई थीं। इसके पास चली आई‘ इसके रंज का सबब पूछने लगीं । उगली से इशारा करके व्यहूला ने पति की लाश दिखलाई । सांप इनको संघ गया है कोई दवा जानता हो तो बतादो । मैं बड़ा अहसान मानू गी । स्त्रियों का जी मुलायम होता है। उसके दुख को देख कर वह रो कर कहने लगीं । बहिन यहाँ कोई स्याना नहीं है अब इनकी आसा छोड़ दे । सती बोली में दूसरी सावित्री हूँ। जाने देना सरल है। मैं जब से यह मरे हैं कुछ खाती पीती नहीं हूँ। मुझे अपने शरीर को भी कुछ ध्यान नहीं है । यह हाड़ माँस का बना हुआ शरीर स्वामी का है। स्वामी के संग जायगा । पर अब तक बन पड़ेगा दवा की तलाश करती रहूंगी । जब हार थक कर बैठ जाऊगी प्राणों को त्याग देंगी।
सती यह बात कहती जाती थी और रोती जाती थी। घाट की स्त्रियों को इस पर तसे आया । और जब ब्यहूला को मालूम हुआ कि इस गाँव में कोई स्याना नहीं है तब आगे को चल दी ।। कुछ देर के बाद नवका नछनी नगर में पहुंची। इसके माता पिता का घर नदी के तट के निकट था। इसके बिलाप की आवाज़ सुनकर अमलासुन्दरि ने अपने पति से कहा। यह आवाज़ तो व्यहूला की है । इस पर क्या आफुत आई जो इस प्रकार दहाड़े मार कर रो रही है। वह पुत्री को बहुत प्यार करते थे। घर से उसी घड़ी बाहर निकले । देखते क्या हैं कि इनकी लड़की का चेहरा उड़ा हुआ है। दशा दीन है और पास ही निखन्दर बेहोश पड़ा हुआ है। दोनों ने अपना सिर धुन लिया । व्यहूला ने
अपनी मुसीबत की कहानी रो रो कर सुनाई।
३४)
शिव छ अमलासुन्दरि ने कहा बेटी भाग्य पर किस का अधिकार है ? बहतर है अब तू नवका से उतर आ । उसने उत्तर दिया जीवन में मैंने इनका संग दिया यदि मरण में इनका साथ न दूगी तो फिर सम्बन्ध कैसा ? सायन बोला।।
| व्यहूला आखिर यह तेरा घर है यहाँ आकर कुछ दम ले ले फिर जो तेरे जी में आवे वह करना । बेटी ने उत्तर में कहा यह सब सत्य है मगर मुझको अपने घर में न बुलाओ। यह पापी जीवन है अब व्यहूला किसको क्या मुह दिखाये । घर–द्वार जिसका था वह तो चल बसा । मैं इस लाश को कभी छोड़ नहीं सकती। नवका से बाहर निकलना अधर्म है। माता ने मुझको सावित्री की कथा सुनाते समय कहा था कि नारी का धर्म यह ही है कि पति परायण हो। मैं तो दुखी हूं अब तुमको क्या दुखी करू‘ । मेरी चिन्ता न करो। समझ लो कि मैं भी मर गई। यदि किसी हकीम ने इनको अच्छा कर दिया तो जीते आ मिलेंगे
नहीं तो मेरा इनका संग होगा। जीवन का अंत होगा ।
अभी इनकी बातें पूरी नहीं हुई थीं कि एक हवा का झोंका इसकी नवका को मंझधार में बहा लेगया । माता पिता विलाप करते रह गये । प्यारी बेटी ! क्या हमारी गोद खाली कर जायगी। व्यहूला ने सबका रुदन सुना पर उसकी नवका वेग के साथ पच्छिम की ओर बह निकली । लड़की ने पति के प्रति माता–पिता के मोह का कुछ ध्यान न किया। उनके नाते–रिश्ते के बन्धन को सहज ही में तोड़ दिया। माता पिता विवश और निराश होकर घर गये और घंटों सिर नीचा करके रोते रहे।
वायु तेज थी । छोटा (बादवान) एक तरह का पर्दा जिसके सहारे वायु की सहायता से नवका चलती हैं। नवका को तेजी से बहा ले गया। गंगा की लहरें आकाश से बातें कर रही थीं व्यहूला में कहां बल था जो नवका को संभालती । इतने में आकाश में कुछ
… “
शिव
[३५ बादल के फोईये प्रगट हुये। चारों ओर घटाटोप अधेिरा छागया कुछ वर्षा के छींटे पड़ने लगे । जब बिजली कौंधती मेघ मंडल कड़क उठता । फिर जोर शोर से वायु के झोंके चलने लगे । सती ने सोचा ऐसा न हो नवका उलट जाय और पति से व्योम हो जाय । उसने पति के शव को अपने शरीर से कस लिया और रो–रो कर विलाप करने लगी। पर्मदेव पर्मेश्वर ! क्या दीन–दुखी व्यहूला के दुख–दर्द का कोई अन्त नहीं है ? गहरी नदी है। हर चारों ओर घटाटोप अँधियारी छाई हुई है ! वायु के झोकों से नवका के उलट जाने का भय है ! अँधेरा बराबर, बढ़ता चला जा रहा है। हाय ! वह लोग जो किनारे पर हैं मुझ बिलकती अबला के दर्द को क्या समझ सकते हैं । केवल एक ही आसरा है कि स्वामी का शरीर अब मुझसे अलग न हो सकेगा।
वह इसी चिन्ता में थी कि तूफान और तेजी से आगया। सम्भव था कि नवका और उसके सवार डूब जाते । एक मल्लाह को बिजली के कौंधे में यह नवका दीख गई । उसकी एक बड़ी नाव जो किनारे से बँधी थी उसको खोल कर बड़ी जल्दी ही. उसने व्यहूला की नवका को पकड़ लिया और अपनी नाव से कस कर बाँध लिया । इतने में फिर बिजली चमकी मल्लाह. ने व्यहूला को देखा। पूछा तू कौन है ? और यह लाश कैसी है ? वह बोली यह मेरे स्वामी की लाश है। सती की सुन्दर अनुपम थी । देख कर उसके जी में पाप. बस गया। वह कहने लगा सुन्दरि ! मृतक पति को क्यों गले से बाँध रक्खा है ? यह बड़ी बुरी बात है। अब इसको छोड़ उसकी आशा त्याग । मेरे घर में ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ है, मैं तेरी सब प्रकार से रक्षा करूगा।
व्यहुला ने कई दिन से खाना पीना त्याग रक्खा था । चिन्तः और दुख में, पलक से पलक नहीं झपका था। उसने मन में
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शिव के विचार किया। सास सुसर का घर छुटा, माता पिता के प्रेम से मुख मोड़ा, अब भाग्य ने यह दिन दिखाया कि एक माँझी मुझसे ऐसे दुरवचन बोल रहा है। हे विधाता ! तुझ पर किस का बस है ? अब तक भी लाश उससे कसी थी। जी में आता था कि वह चुप हो रह पर हालत और थी । मांझी ने उसकी जान बचाई थी । उसने सिर उठा कर कहा । भाई मांझी ! तू क्या कहता है ? ऐसी बात मुंह से निकालनी उचित नहीं है। मैं सावित्री हूँ इस प्रकार की बात–चीत मुझको पसन्द नहीं हैं। मल्लाह ने सोचा यह सीधी तरह से न मानेगी। इसको नवका से अलग करना चाहिये । इस भाव से वह इसकी ओर झुका व्यहूला डरी ऐसा न हो पति से अलग हो जाऊं। उस समय किसी का सहारा नहीं रहा था। उसने आकाश की ओर दृष्टि करके कहा। प्रभो ! जहाँ किसी का सहारा नहीं होता वहाँ तुम ही केवल एक सहारे बनते हो। अब देरी न करो। इसके नेत्रों से अश्रु धारा बह रही थी। . आस अब किसकी करू‘ ! जब आशा तेरी रह गई।
माता–पिता पति सब ही छूटे अबला तेरी रह गई ।। माँझी डोंगी की रस्सी को पकड़ कर अपनी नाव की ओर खींच ने लगा और जब करीब आगई उसने चाहा कि डोंगी पर पाँव रक्खे इतने में फिर बिजली चमकी और हवा का ऐसा जोर का तूफान
आया कि मांझो अपने पांव को न सँभाल सका और नदी में गि पड़ा। उधर नवका का रस्सा टूट गया जिससे हवा उसको उड़ा कर दूसरे किनारे पर लेगई जहां एक कहार ने उसको घाट पर रोक लिया । | बुरे दिन एक तरफ से नहीं आते जब आते हैं चारों ओर से आते हैं । घाट पर यह कहार बैठा हुआ था । वह जाल बिछाने का अवसर देख रहा था। पर वायु के वेग के वश विवश था।
……. —१४ : ५
* शिव
[ ३७ उसने व्यहूला की सुन्दरता को देखा । इधर सती ने भी लाश को अपने से अलग कर लिया था। कहार की भी नीयत बिगड़ी। मांझी की भांति वह भी अनाप–शनाप बात–चीत करने लगा। सती ने उससे कहा तू मेरे पिता के तुल्य है तूने इस समय मेरी नवका को नदी की लहरों से बचाया है। यह जीवन तेरा बखशा हुआ है । तुझको बेटी की रक्षा करना उचित है। एक पुत्री को बुरी दृष्टि से देखना महा पाप है। पर कुटिल कहार पर इन उपदेशों का क्या प्रभाव होता । वह काम–क्रोध के वशीभूत अंधा हो रहा था कहने लगा मैं तो अब तुझको किसी हाल में भी न छोडूगा । घर में सव तरह का सुख–चैन है चल वहाँ मुख से जीवन व्यतीत करना । और घर की सब स्त्रियाँ तेरी सेवा–टहल में रहेंगी। तू कहाँ २ जल में बहती फिरेगी।
बेचारी दीन व्यहूला भय से काँपने लगी। उसने विचारा यदि इससे न बच सकेंगी तो जल में डूब कर जान दे दूगी ।।
आखिर उसने एक दफे और कहार से कहा। यह तुम्हारा ख्याल बिलकुल पोच है। मैं किसी के धन की भूखी नहीं हूँ न सुख की इच्छा रखती हूं। यह मेरा शरीर पति का है। पति के संग जायगा । कोई पुरुष कैसा ही बली क्यों न हो मुझको अपने प्रण व प्रतिज्ञा से हटा नहीं सकता। मैं तो दुखिया पति की दवा की तलाश में फिर रही हैं यह बच जांय, तो अच्छा वरना मैं भी इनके साथ ही अपने प्राण त्याग दूगी। मेरे घर में धन–दौलत की कमी नहीं है। नौकर–चाकर भी बहुत । यदि सांसारी ख्याल होता तो मैं यहां क्यों मारी फिरती । याद रखें अगर तू सख्ती करेगा तो मैं यहाँ ही अपने प्राणों को आहुत कर दूगी और तुझको एक अबला के मारने की हत्या लग जायगी ।
इन सती के वचनों से कुछ कहार का दिल पसीजा। उसने नवका को छोड़ दिया। सती इस समय डांडे लगाकर डेंगी को
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शिव चलाने लगी और थोड़ी देर में ही नवका घाट से थोड़े फासले वर आगई । कहार ने कहा जा कम्बख्त तेरी किस्मत खराब है। तुझको सुख न मिलेगा । और मृतक के संग तेरी भी जान अजाये जायगी।
. गरीब व्यहूला को घाट पर आराम लेने का मौका न मिला वह नवका को चलाती हुई चल निकली । फिर एक दफे और आकाश बादलों से घिर आया। घटाटोप अधेरा छागया। हाथ को हाथ नहीं सूझता था। वायु के तमांचों से नवका करवट बदलती थी । जब मूसला धार पानी वर्षने लगा व्यहूला ने समझा हो न हो अब जीवन का अंत निकट है। पर वह तन व तकदीर उसी तरह नवका में पति की लाश को छाती से लगाये बैठी थी । रान आई और उसके साथ दारुण दुख ने एक उग्र और भयानक रूप धारण कर लिया। इसने फिर दूसरी बार पति की लाश को अपनी कमर से कस कर बाँध लिया । और ईश्वर का नाम लेकर नवका में पड़ गई और बेसुध हो गई ।। | जब प्रभात हुआ उसकी आंखें खुलीं । नवका एक गाँव के किनारे लगी हुई थी। एक व्यक्ति वहाँ नहा–धो रहा था। उसने डबडबाई हुई आंखों से उससे पूछा हे धर्मात्मा ! क्या तुम्हारे गाँव में कोई साँप के काटे की भी दवा जानता है ? वह आदमी खुद वैद्य था। वह कहने लगा मैं इसको अच्छा कर दूगा। पर शर्त यह है कि तुम इस शव को छोड़ कर मेरे संग घर चलो। मैं दवा दे दूगा। व्यहूला उसके चहरे की ओर गौर से देखकर कहने लगी महाराज !
जा कारण घर छोड़ियां घूमी देश विदेश ।।
सो पति कैसे त्यागिवे यह अति कठिन कलेश ।। मैंने इस नवका से उतरने की शपथ ली है यदि पति देव का मिलन भाग्य में बदा होगा तो इसी में मिलेंगे वरन्, यह हम दोनों
शिव
[ ३६ के लिये मृत्यु शय्या का काम देगी। आपको मेरे ऊपर कुछ तसं
आता है तो कृपा करके औषधि यहीं ले आइये नहीं तो हम मृत्यु – के लिये तो तैयार ही बैठे हैं।‘
वैद्य ने कहा तू आत्मघात करना चाहती है। यह पाप है। राजा सुनेगा तो दंड देगा। यदि तू नवका से नहीं उतरती है तो मैं जबरदस्ती पकड़ लेजाऊगा । राजा से मेरा मिलना–बैठना है इसलिये अच्छा है कि तू मेरे साथ चले ।।
सती ने कहा वैद्यराज ! राजा का डर तो चोर डाकू को होता है मैंने तो न किसी का कुछ बिगाड़ा है न अपराध किया है। मुझे कोई क्यों दंड देने लगा । – यह सुनकर वैद्य ने नवका को हाथ लगाया कि उसको रोक ले और स्त्री को नीचे उतारे । इसकी हरकत देखकर सती ने चिल्लाना शुरू किया। निकट ही दूसरे घाट पर कुछ लोग स्नान कर रहे थे। स्त्री की पुकार सुनकर दौड़ पड़े । सती ने रो–रो कर अपनी दशा और वैद्य के कपट भाव का वृतान्त कह सुनाया । यह सब वैद्य को लानत मुलामत करने लगे। इसको पकड़ कर नवका से दूर खेंच लाये । इस यात्रा में सती के कष्ट कलेश की अंतिम सीमा थी। उसने फिर नवका को वहाँ से चला दिया। और वह बहतेबहते वहां आई जहां प्रयागराज में गंगा जमुना और सरस्वति का संगम है । त्रवेणी के तट पर पहुँचकर जब उसने चारों ओर देखा तो जल ही जल नजर आया । आज इस दीन दुखी विपता की मारी हुई को बिना जलपाने के कई दिन बीत चुके थे । न कोई सहायक था न संगी साथी । त्रवेणी की उठती हुई लहरों को देख कर इसका जी भर आया ! और वह पुकार–पुकार कर ईश्वर से प्रार्थना करने लगीः
प्रभो ! करुणाकर स्वामी ! दीन बन्धो ! तुमने व्यहूला की सुध कैसे भुलादी ? भगवन् ! तुम्हारे सिवाय इस अबलर का अब
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शिव के कौन है। जिस प्रकार अपने पति को वियोग कराया है उसी : प्रकार यदि पति को अच्छा नहीं करना है तो इस व्यहूला को
भी मौत तो भेज दीजिये । परमात्मन ! त्रवेणी की लहरों को ही । आयुष मिले कि वह हम दोनों को डुबा कर अपनी गोद में लेलें ! नाथ ! अब यह दुख सहा नहीं जाता ! व्यहूला अब हर प्रकार से निःसहाय और बल पौरष खो बैठी है !
दीनबन्धु दीनानाथ ! मेरी सुधि लीजिये । संगी नाहें साथी नाहें बलं नाहें साहस नाहें । विद्या नाहे बुद्धि नाहे जासे कछु कीजिये । दीन० |घर छूटा द्वार छटा कुटुम्ब परिवार छुटा ।
देश छूटा लोक–परलोक छूटा अब तो सुधि कीजिये ।दीन० उसके विलाप की पुकार बन्द होने पर नहीं आती थी। फिर विल विलक–विलक कर रोने लगी।
प्रभू नजर महर की करदे जो जिया चाहे । सब में वह ही सुहागिन जिसको कि फ्यिा चाहे ।। मेरे जी की प्रभो ! जो आज किया चाहे । तो दया ऐसी करदे उठ कर ही पीया चाहे ।। जब तेरे सिवा दयालु ! कोई नहीं है मेरा ।। फिर किस पे यह दिल झेऔर किसको जीया चाहे । एक दिल है पास मेरे प्रीतम का है वह सो भी । यह जान है अब बाकी जाना जो लिया चाहे ।। मैं प्रेम में मतवाली सब लाज भी धो डाली । मुझको या डुबा दे या पीया उठ के चाहे ।। व्यहूला के इस करुण भरे रुदन कन्दन के विलाप को सुनकर किनारे के पशु–पक्षी भी सहम गये ! घाट सुनसान था। केवल एक धोबिन के वहाँ और कोई पास नहीं था । यह कपड़ा धोने आई हुई थी। जब सती के विलाप को सुना वह नवक
* शिव
[४१ की ओर आई और एक दृष्टि से सती को देखकर कहने लगी बेटी ! तू कौन है ? तेरा विलाप सुनकर मेरी छाती फटी जाती है । सती वोली माता ! स्वामी को सांप से घ गया मैं अकेली ही इन के शरीर को लिये तरह–तरह के कष्ट भोगती हुई यहां आ निकली हूं । कोई वैद्य नहीं मिलता जो इनको अच्छा कर दे। राह में दुष्टों ने मुझे बड़ा सतायो । अत में निराश होकर ईश्वर से विनय कर रही हूं कि पति के संग मुझे भी मृत्यु दे ! धोबिन की आंखों से आंसू जारी हुए । चाहे वह एक नीच जाति की अनपढ़ स्त्री थी पर वह सती को समझा कर कहने लगी बेटी ! कुछ चिन्ता न कर भगवान ने यह सब आपत्ति–विपत्ति और तूफान इत्यादि इसलिये पैदा कर दिये कि तेरा हृदय पवित्र होकर यहां जल्दी आजाय ! घबराने की कोई बात नहीं अभी इस पुत्र को मरे इतनी देर नहीं हुई कि इसकी दवा न हो सके । इस संसार में दुख के संग सुख लगा रहता है जहाँ मरण है वहाँ जीवन भी है। जहाँ शहद होता है वहां मक्खियों का डंक भी है । जहाँ विष है वहाँ अमृत भी है। तेरा सुयश तुझे यहाँ लाया ईश्वर मेरे इस पुत्र को भला चंगा कर देगा । धैर्य धर !
हमदर्दी ! दया ! तुम में कितनी शक्ति है ? तू किस प्रकार टूटे हुए दिलों को जोड़ती है। तुझसे घायल चोट खाये हुये चित्तों को मरहम और भूले भटकों को राह मिलती है । सती ने हाथ जोड़कर धोबिन से कहा मातेश्वरी ! तू कोई देवी है या साक्षात सरस्वती है जो मुझको ऐसी बाते सुना रही है। मैं तो निराश हो बैठी थी यदि यह जी पड़े तो मैं आयुपर्यन्त तेरी दासी होकर रहूँगी। वह बोली पुत्री ! मैं देवी नहीं एक आँवारि धोबिन हूँ। तू क्यों निर श हुई। ईश्वर के दरबार में निराश्ता का शब्द ही नहीं है।
४२] .
शिव राई को पर्वत करे पर्वत धूल समान ।
क्षण में चाहे जो करे समरथ है भगवान ।। मैं एक सेठ के कपड़े धोती हूं वह सांप के काटे का इलाज करता है। तू थोड़ी देर धैर्य धर मैं जाकर दवा ले आती हूँ। ईश्वर चाहेगा तो यह भले चंगे हो जाँयगे और आज ही उठ खड़े होंगे । यह कह कर धोबिन फौरन ही वहाँ से चल दी । कपड़ों को भी वहीं बिखरा छोड़कर बड़ी तेजी से शहर की ओर भाग निकली । और जब उसने रो–रो कर सेठ को उस अबला पतिव्रत
सती की कथा सुनाई, सेठ खुद गंगा के किनारे चला आया।
सेती इन्तजार कर रही थी। सेठ ने बड़ी सावधानी से निखन्दर की लाश को देखा सांप के काटे पर दवा लगाई जिससे पानी बहना शुरू हुआ फिर उसने दाँत खोल कर कुछ अर्क मख में डाला थोड़ी देर में ही निखन्दर ने आँख खोल दीं । पानी जोर से शब्द कर रहा था। किनारे के वृक्ष लहरों के कारण गिर रहे थे । व्यहूला नवका में पास बैठी थी। समीप धोबिन खड़ी थी। सेठ जी हाथ में दवा की शीशियाँ लेकर खड़े थे। उसने पूछा यह क्या मामला है ? मैं कहाँ हूँ ? व्यहूला ने सारी कथा
आदि से अन्त तक सुना दी । जब उसको अपनी स्त्री के यश का सब हाल मालूम हुआ वह चित्त में प्रसन्न हुआ। दोनों स्त्री पुरुप धोबिन और सेठ के पाँव पड़े। व्यहूला ने धोबिन से कहा माई ! तेने मेरा सुहाग लौटाया है। मैं तेरी दासी हूं कुछ दिनों अपने घर सेवा के लिये रहने दे पर धोबिन राजी न हुई । और सेठ इसकी भक्ति और पति परायणता को देख कर इतना खुश हुआ कि उसने एक अच्छी नाव का उनको पहुँचाने के लिये इन्तजाम कर दिया। वे दोनों इनसे मिलकर और उनकी कृतज्ञता प्रगट करके खुशी २ अपने घर को चले ।
पहले यह नछनी नगर में पहुंचे और नाव से उतर कर सामन
* शिव
[४३ और अमला सुन्दर से मिलने गये । जव से व्यहूला गई थी माता ने रो २ कर जीवन व्यतीत किया था। इनको देख कर झपटो
और दोनों को गोद में लेकर प्रेम के आंसुओं से इनके कपड़े भिगो दिये । मेरी सावत्री ! तू साक्षात सावत्री की औतार है। तेरी धर्म निष्टा ने दोनों कुल को तार दिया जो एक आदर्श वीरांगना और पुत्री का जन्म सिद्ध अधिकार है। चाहे आज समय विप्रीत हो पर इनकी कीर्ति अमर रहेगी। निखन्दर ने यहाँ अधिक ठहरना उचित न समझा । उनसे उसी समय बिदा होकर चम्पक नगर में आये । घर में यहां भी कोहराम मचा रहता था। माता अधमरी हो रही थी । पिता की दशा भी बड़ी करुणाजनक थी। यहूला पृथम अपनी सास के पाँव पड़ी और जब उसने पति के जीने का शुभ समाचार सुनाया माता का दिल खुशी से बल्लियों उछलने लगा। और वह सब सुध–बुध खो बैठी, जब ज़रा होश
आया उसने व्यहूला और निखन्दर दानों को गोद में भर लिया । उनके आने से जिसने सुना सब ने खुशी मनाई। और जब यह समाचार नगर में फैल गया फिर तो सब ही सती वृतान्त सुनने
और उसके दर्शन के लिये गुट के गुट आने लगे। | ईश्वर ने इस प्रकार व्यहूला पर दया की और वह बहुत दिनों तक सुख चैन का जीवन व्यतीत करने लगे। धन दौलत सन्तान सब कुछ उनको भोगने को मिला और पति से पहिले ही संसार से कूच किया। जिसकी हर हिन्दू स्त्री लालायत रहती है ।।
ईश्वर करे हमारे सज्जन पाठकों में भी ऐसे भक्तिभाव और पवित्र भावनायें उत्पन्न हों जिससे देश में जाग्रित्त हो !
कदली गर्भा प्रेम भक्ति अति कठिन है ज्यों खड़े की धार । बिना सांच पहुंचे नहीं महा कठिन व्यवहार ।
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शिव के
भक्ति दुहेत पील की नही कायर का काम । शीष उतारे हाथ स. वह ले ली संत नाम ।। जब लग भक्ति सकाम है तब लग निश्फल मेव ।। कहे कबीर वह क्यों मिले निःकामी निज देव । भौर भये अभी सूर्य नारायण अपनी किरणों से सृष्टि को भले प्रकार प्रकाशमान नहीं कर पाये थे कि कदलीवन के एक केले के वृक्ष के नीचे एक अति सुन्दर बालिका जोर २ से रो रही थी। ऐसे सुनसान स्थान में कैसे आशा की जा सकती थी कि एक नवं जाति शिशु जीवित रह सके। पर वह विशाल शक्ति जो दीन दुखी की माता, वेवारिसों की पिता और बेबसों की रक्षक है सदैव अपनी करुणा और दया की शक्ति से काम करती रहती है । संसार के माता पिता कभी २ अपने स्वार्थ संकोच और जज्जावश दीन–हीन बालकों को गृद्ध और चीलों का खाजा बनने के लिये छोड़ जाते हैं और विश्वास कर लेते हैं कि वह जीवित न बचेंगे। पर उस सच्चे पिता और सच्ची माता की दृष्टि ऐसे निस्सहाय बालकों की ओर लगी रहती है। और वह किसी न किसी उपाय से ऐसों की रक्षा का प्रबन्ध करा ही लेती है।
जिस सुबह के समय का हम वर्णन कर रहे हैं उस समय एक सच्चे पुण्यात्मा तपस्वी मनकनिक ऋषि का आगमन उस ओर हुआ । जहाँ वह छोटी उम्र की बालिका मुख में अंगूठा दबाये रो रही थी । तपस्वी ने उसको देखा। लड़की जमीन पर पड़ी हुई थी। निदेई माता ने इतना भी ख्याल नहीं किया था कि इसके शरीर को कपड़ों से तो ढक देती। लड़की अति सुन्दर थी। ऋषि के हृदय में दया आई। और उसने इस मांस के लोथड़े को गोद से चिपटा लिया। और कहने लगा अफसोस ! मैंनका ! तू संसार में किस तरह बदकारी का जीवन बिता रही है। सम्भव नहीं कि तू अपने कर्मों की सजा से मुक्त हो सके ! मैंनका इस लड़की की माता थी।
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* शिव
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• वह समय आज कल के समान झूठे वर्णाश्रम का समय नहीं था जब नाम के द्वज मनुष्यता को बट्टा लगाते । दयालु ऋषि लड़की को गोद में लिये हुये आश्रम में आया और अपनी स्त्री से कहने लगा। प्रये ! देख आज ईश्वर ने हम पर कैसी दया प्रगट की है। इस पुत्री के लालन–पालन का पुनीत कर्म हम को सोंपा गया है। आज से यह हमारी पुत्री है । और कदली वृक्ष के नीचे पड़ी मिली है इम कारण इसका नाम भी कदली गभ बिख्यात होगा। | मनकनिक ऋषि यदि देवता था तो उसकी स्त्री भी सच्ची देवी थी। उसने लड़की को अपनी पुत्री की भांति अपनी गोद में ले लिया और उसके मुख को चूमा, प्यार किया और जिस प्रकार लोग अपनी औलाद को पालन करते हैं उसी तरह कदलीगर्भा का लालन–पालन प्रेम के साथ होने लगा।
ऋषि का आश्रम अनुमती नदी के तट पर अनुमतीनगर के सहारे दो–चार मील की दूरी पर था। आश्रम के चारों ओर सुन्दर उपवन था । जिस में तरह २ के फल और वृक्ष लगे थे। कदलीगभ जब ५–४ वर्ष की हुई वह अपने पुनीत व पवित्र स्वाभाविक वृति से अआश्रम के आस–पास यथा योग्य स्थानों पर बेल–बूटे लगाती । अपने हाथ से उनको सींचती और अपनी मधुर और प्यारी २ बातों से अपने माता पिता के चित्त को प्रसन्न करती । उसको कुछ समय तक यह परिचय नहीं हुआ कि वह ऋपिपुत्री नहीं है । और हम कहेंगे कि यह न समझना उसके लिये एक अति प्रसन्नता की वस्तु और प्रभु की दैन थी । मनकनिक जब जंगल से फलफूल लेकर आता कदलीगभ उछलती कूदती हुई खुशी से उससे चिपट जाती । ऋषि पत्नि उसको घड़ी भर के लिये भी अपनी आंखों से अलग नहीं करती थी, जब कभी कोई मेहमान आता सबसे प्रथम कदलीगभई उसको
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शिव अर्घ देने को दौड़ती। सब लोग उसके अनुपम सौन्दर्य और उसकी सादा तबियत को देख कर खुश होते थे। जंगल में वह सामान कहाँ था जो शहर के रहने वालों को पर्याप्त है। तो भी वृक्षों की छाल से उसका शरीर शोभायमान था और कंदमूल फल ही उसका सर्व श्रेष्ठ भोजन था। जब वह थोड़ी स्यानी हुई ऋषि ने उसको सदशास्त्र जिनमें वेद वेदांग इत्यादि शामिल हैं पढ़ाये ।। और जिस प्रकार संगमरमर के टुकड़े को गढ़ कर एक योग्य । कलाकार इसमे विचित्र खूबसूरती दिखलाता है और ऐसी चित्रकारी करता है कि देखने वाले चकित रह जाते हैं इसी प्रकार वह वेदाध्ययन की सहायता से कदलीगर्भा की सब मानसिक फुरनायें जो गुप्त थीं फुरने लगीं । और वह अपने समय की न केवल सबसे अधिक रूपवती बल्कि सब स्त्रियों में बुद्धिमान, नीतिवान, धार्मिक, शील सम्पन्न, साहसी और वीरांगना थी। । जब वह ८–१० वर्ष की हुई उसने घर का सारा भार अपने सिर पर लेलिया । पिता से विद्या पढ़ती और माता के घर के काम में सहयोग देती । उसने घर में अनेक प्रकार के पशु पाल रक्खे थे। तोता, मैना, कोयल, मोर, हंस, हिरणी । जब वह घड़ा हाथ में लेकर वृक्ष और नेताओं को सींचने के लिये निकलती यह सब उसके पीछे लग लेते । जितने सुन्दर, शोभायमान, और सुगन्धित फूल हैं सब आश्रम की वाटिका में मौजूद थे। चम्पा, मोतिया, मोंगरा, चमेली, जूही, गुलाब, केतकी, दाऊदी । ऋषि इसकी मेहनत को देखकर मुस्कराता हुआ प्रसन्न होता और पुचवारना। | अब कदलीगभ की आयु १६–१७ वर्ष की हुई । ऋषि आश्रम से बाहर फल–फूल लाने गया था। ऋषि पत्नि घर के काम–काज में लग रही थी । कदलीगभ दो एक सहेलियों के साथ बाटिका में घूम फिर रही थी । संयोगवश राजा दृढ़वर्मा का इधर आगमन हुआ। ऐसी रूपवती स्त्री उसकी निगाह में पहले नहीं
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शिव
[४७ दीखी थी। वह चकित होकर खड़ा उसको देखने लगा । कदक्तीगर्भा को एक अपरचित व्यक्ति का ऐसा विचित्र व्यवहार देखकर आश्चर्य हुआ। राजा भी अति सुन्दर था। कुछ तो लज्जावश और कुछ भय संकोच से वह वृक्ष की ओट में जाकर छिप रही । पर दोनों के बीच केवल २–४ गज का ही अतर था। दृढ़ वर्मा अपने मन में कहने लगा हो न हो यह मन कणिक ऋषि की पुत्री है ! जिसके सौन्दर्य की आज संसार में धूम है । जिस प्रकार दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ शादी की थी उसी प्रकार मैं भी इस ऋषि पुत्री को अपनी रानी बनाऊ‘गा। वह इसी फिक्र में था कि ऋषि भी वहां पहुंचा । राजा ने नमस्कार किया । ऋषि सादर उसका उत्तर देकर कलीगर्भा से सम्बोधन करते हुये कहने लगा । वत्स ! आज तुझको क्या होगया ! जो तू राजा से शर्म करती है। राजा हम सबका रक्षक है। तू आज भूल गई इस माननीय मेहमान को अर्घ नहीं दिया जल्दी कर । कदलीगर्भा ने उसी वक्त शमती लजाती और मुस्कराती हुई राजा को अर्घ दिया और जब वह आसन पर बैठ गया । लड़की तो
आवभक्ति का सामान लेने कुटिया में गई यहां राजा ने मनकनिक ऋषि से अपने मन की बात कही। ऋषि ने इसकी प्रार्थना की अति प्रसन्नता पूर्वक स्वीकृति देदी और बिना किसी संकोच के कदलीगभ की शादी राजा के साथ करदी । और राजा रानी दोनों उसी समय अपनी राजधानी की ओर चले गये ।
रानी निहायत बुद्धिमान और चतुर स्त्री थी। इसने राजधानी में पहुंचते ही राजा को इस तरह राज–काज के मामलों में राय देना शुरू किया कि थोड़े ही दिनों में प्रजा की सारी शिकायतें दूर होगई राजा इसका बड़ा मान करने लगा। प्रजा ने इसको देवी की उपाधि दीं। पर अफसोस ! कदलीगभ की मान प्रतिष्ठा दूसरी रानियों की दृष्टि में खटकने लगी। राज्य
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शिव अधिक समय उसी के महल में व्यतीत करने लगा। इससे और भी इनके डाह और द्वेष की अग्नि को प्रचंड होने का अवसर मिल गया। पर रानी अति पवित्र और पुनीत थी उसके नष्ट करने की सारी युक्तियाँ असफल रहीं। अंत में रानियों ने एक बूढ़े ब्राह्मण और एक नाई से मिलकर इस प्रकार मशहूर किया कि कदलीग जंगली स्त्री होने के कारण मनुष्यों के माँस का अहार करती है। राजा ने दो एक दफे ऐसे अफवाह सुने पर कुछ ध्यान नहों दिया। अंत में रानियों ने एक दिन एक मुर्दे की लाश नदी के किनारे से मंगवा कर कदलीगभ के महल के उस हिस्से में रखवा दी जहां होकर राजा आया जाया करते थे।
राजा ने लाश को अपना आँखों से देख लिया । रानी की ओर से इसको चित्त में ग्लानी पैदा हुई । वह महल में तो गया। रानी ने उसका शुभागमन किया । पर राजा ने कुछ बातचीत नहीं की और उल्टे पाँव वापिस चला आया। रानी अति व्याकुल हुई। यह मामला क्या है ? वह नहीं जानती थी कि इसके विरुद्ध क्या षड़यंत्र रचा जारहा है। सारी रैन चिन्ता में बीती । सुबह के वक्त दो मनुष्य राजा के हुक्म से महल में आये और रानी से। कहा कि राजा का आयुश है कि तुम महल में रहने योग्य नहीं हो। अच्छा हो जंगल में जाकर बसो ! रानी के चित को जो इस हुक्म के सुनने से अपार दुख हुआ उसका वर्णन व्यर्थ है ! वह अति व्याकुल होगई ! पर करती भी क्या ? राजा का हुक्म था ।
न सुध बुद्ध की न खबर मंगल की ली ।। | निकल घर से बस राह जंगल की ली ।। उन आदिमियों के साथ आश्रम की ओर रवाना हुई । महल के एक कोने में मुर्दे की लाश को देखती गई थी। समझो क्या अजब ! इस लाश की मौजूदगी ही मेरी बरबादी का कारण बनी हो । पर अब सोचने बिचारने और किसी से कहने का
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• * शिव अवसर कहाँ था ? इसके देश निकाले का समाचार नगर में आग के समान फैल गया था। पर रानी के कान इस षड़यंत्र के समाचार से अपरिचित थे । और नगर निवासी न केवल इसके दोष लगाने से ही परिचित होगये थे बल्कि वह यह भी जान गये थे कि और रानियों के सौतिया डाह का यह सब परिणाम है ।। | जब रानी महल से निकल कर जारही थी तो हजारों मनुष्यों की भीड़ उसके दर्शन के हेतु पहले से ही इकट्ठी हो रही थी। क्योंकि जिस दिन से इक्षुमति में उसके चरण पधारे थे वह बरकत और इकबालमन्दी की जगह बन गई थी । जन साधारण इसको निर्दोष और पुनीत देवी समझते थे। सबकी हित कामनायें इसके साथ थीं। रानी के नेत्र डबडबाये हुये थे। वह नीची गर्दन किये हुये जारही थी । नगर निवासी भी देखकर शोक में आँसू बहा रहे थे। पर रोक कौन सकता था। राजा हुक्म दे चुका था। उसकी अदालत का अंतिम निर्णय हो चुका था। मंत्रियों ने बार–बार दृढ़वम को सोच विचार की सम्मति दी थी । पर उसका दिल भर चुका था। उसने एक की भी बात न सुनी । और अपनी नेक स्त्री को देश निकाला दे ही दिया।
संसार की लीला कुछ विचित्र है ! यहां कोई किस बात की आशा करे । पल क्षण में क्या हो जायगा कोई कुछ नहीं कह सकता है इसलिये वह मनुष्य जो दुनियाँ को ही सब कुछ जानते हैं ! इसके सम्बन्ध के ही बन्धन में भूले हुए हैं। इन महात्मा के शब्दों को सुन रखें जो इनकी भलाई के हेतु सुना गया है !
आज कहे मैं काल भजू गा काल हे फिर काल । आज काल के करत ६ अवसर जासी चाल ।। पाव पलक की सुदि नहीं करे काल का साज । काल अचानक मारसं ज्यों, ती तर को बाज ।। पाव पलक तो दूर है मो १ कहा न जाय । ना जानू क्या होयगा पल के चौथे भाय ।।
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शिव .. जब वह गरीब दुनिया में आई थी माता पिता ने निर्दयता से गोद से उठाकर पृथ्वी पर पटक दिया था। अब पति ने नादानी से उसको घर से बाहर कर दिया ! बेचारी ऋषि के आश्रम में गई । क्योंकि परमात्मा के आयुश से वहाँ माता पिता के लाड़–प्यार का द्वार खोला गया था। वह रोती बिलबिलाती हुई आश्रम में आई ! स्त्री के लिये इससे अधिक और क्या अपमान हो सकता था। कि पति अपने घर से निकाल बाहर कर दे ! वह आते ही माता की गोद से चिपट कर बिलक बिलक कर रोने लगी ! क्या हुआ ? क्या बात है ? तू क्यों रोती है ? पर कदलीगर्भा क्या उत्तर देतो ? पति की बुराई करना हिन्दू स्त्रियाँ महापाप समझती हैं। इतने में ऋषि भी आगये । उन्होंने पुत्री के सिर को पुचकार कर कहा वत्स तू क्यों रोती है ? संसार में इस प्रकार की परीक्षा बहुधा सदा होती रहती हैं। कभी २ झूठ को सत्य पर विजय प्राप्त होजाती है। पर अन्त में सत्य का ही बोलबाला रहता है। मैं तेरे अपमान और निरादर की घटना से अपरिचित नहीं हूँ। मैं जानता हूं रानियाँ किस प्रकार के षड़यंत्र रच रहीं थीं और मुझे इसका भी पता है कि राजा का एक कर्मचारी नदी किनारे से एक साधू के शव को उठा ले गया है। मेरे शिष्य जाँच कर रहे हैं। तू मत रो ! चल उल्टे पाँव दृढ़वर्मा के दरबार की ओर कदम बढ़ा और मैं देखूगा राजा किस तरह एक ऋषि पुत्री का अपमान करता है ।।
ऋषि अपने दो चार शिष्यों को साथ लेकर नगर में आया। पीछे–पीछे लज्जा से मुख ढके हुए कदलीगभ भी थी। यह सब दरबार में चले गये। किसी ने भी रोकटोक नहीं की । राजा ऋषि के आगमन के लिए उठा । जब वह आसन पर बैठ गया ऋषि ने कहा राजन् !
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शिव के बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय ।।
काम बिगाड़े आपनो जग में होत हँमाय । | तुमने मेरी बेटी का बड़ा अपमान किया। मैं उसकी ओर से तुमसे कुछ न कहूंगा क्योंकि वह फिर भी तुम्हारी धर्म पत्नि है। चाहे वह मेरी पुत्री है मगर शायद वह पिता के मुख से पति की शान में अयोग्य शब्द सुनना सहन न करेगी। मैं इतना करने
आया हूं कि शायद तुमने उसको भूल से घर से निकाला है। तुम्हारे सारे महल की रानियां इससे द्वेष रखती हैं। जो कार्यवाही इसके बरबाद करने की हुई है वह केवल एक षड़यंत्र है । राजा ने कहा सम्भव है आप जो कुछ कहते हैं सत्य हो पर एक मुर्दे की लाश वहां पाये जाने के विरुद्ध आपके पास क्या उत्तर है ? ऋषि ने कहा राजन् ! इस समय तुम अपने आप में नहीं हो। ऋषि की बात को सुनकर यह कहना कि सम्भव है वह सच हो उसका अति अपमान करना है। चाहिये यह था कि उसकी आप तहकीकात करते और फिर मेरी पुत्री को दंड देते ।।
| जब ऋषि राजा को समझा रहा था एक शिष्य की दृष्टि नाई पर पड़ी, उसने कहा यह मनुष्य है जो लाश के निकट देखा गया था। ऋषि ने उनसे पूछा, सत्य–सत्य बता यह क्या बात है ? कोई बात छिपा न रख ? उसने हाथ बांध कर कहा महाराज ! मेंने रुपये के लालच में रानियों की बातों में आकर ऐसा घृणित कर्म किया है यह रानी निर्दोष है। बूढ़े. ब्राह्मण ने भी अपने अपराध को स्वीकार किया। | जब राजा ने देखा कि कदलीगभा निर्दोष है उसने हाथ जोड़ कर ऋषि से अपने अपराध की क्षमा माँगी। नाई और ब्राह्मण को देश निकाला दे दिया और और महल की रानियों को भी यथा योग्य दंड दिया गया। उसने कदली गर्भा का हाथ पकड़ लिया और जब अपने किये का पश्चाताप करने लगा। देवी ने
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शिव अति दीनता और नम्रता से विनय की महाराज ! मैं आपकी दासी हूँ आपके आधीन हूँ जी चाहे जैसा सलूक करें।
दावा बराबरी का नहीं अधाग्नि हूँ मैं।
दासो हूँ चरण रज को धारू‘ हूँ शीश मैं ।। पति पत्नी का मिलाप करा कर ऋषि अपने आश्रम को चला गया। उस दिन से रानी की मान प्रतिष्ठा राजा के चित्त में
और भी अधिक होगई ।।
संसार उलझन, परीक्षा और जांच का स्थल है। जो इसके परीक्षण में पूरे उतरते हैं वह सदैव मान प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचते हैं। निष्काम, इन्द्रजीत, और सत् जीवन का इतना महत्व है जिसका कोई मूल्य नहीं ।।
जीवित मृतक हो रहो तजो खुलक की आस ।। रक्षक समरथ सतगुरु क्यों दुख पावे. दास। कबीर मन मृतक भया दुर्बल भया शरीर।।
पाछे लागे हरि फिरे कहे कबीर कबीर ।। रानी महल में गई। राजा इसपर बराबर महरबान बना रहा। पर उसने न कभी अपने अपमान की शिकायत की और न अन्य रानियों की । सबके अवगुणों को क्षमा करा दिया और पति की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करने लगी। कदलीगर्भा के समस्त जीवन की विवेचना को एक बड़ी पुस्तक की आवश्यकता है । हमको संक्षेप में ही इतिहास सुनाना मंजूर है । इसी दृष्टि से व्याख्या
| कदलीगभ को सैर व शिकार का भी शौक था वह अकसर राजा के साथ शिकार खेलने को जाया करती थी। एक दिन राजा शिकार की नीयत से जंगल को गया था। रानी और राजा दोनों घोड़ों पर सवार थे और बह ऐसी तेजी से भागे जारहे थे कि राजा ने उनको रोकना उचित न समझा नतीजा .
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• शिव
| [५३ यह हुआ कि वह दोनों अपने लश्कर से दूर होगये । और कोई शिकार भी हाथ न लगा। मध्याह्न वह एक सुनसान बन में दाखिल हुये । भूक प्यास से ब्याकुल थे । राजा ने वृक्षों से फल फूल तोड़ कर अपनी भूक बुझाई । और अपनी हराहर दूर करने के हेतु दोनों एक वृक्ष की छाया में बैठ गये । रानी बहुत थक गई थीं । उसको तो नींद आगई मगर राजा जागता रहा । आधे घंटे बाद वह रानी को अचेत जानकर उठा और वन में घूमने लेगा । एक सिंह उसके समीप आया । राजा ने दाल संभाल ली। और तलवार से उस पर वार करना चाहा पर अभाग्यवश तलवार का वार एक वृक्ष के तने से लगा । वार खाली गया और सिंह ने उसको बुरी तरह से घायल करके एक मरा हुआ जान अपनी मांद के निकट डाल दिया और आप पास ही पड़ रहा । राजा बड़ी तादाद में खून बहने से अति बलहीन हो गया था। उसको रह रह कर रानी की याद आती थी। पर विवश था पास ही शेर सोया हुआ था। सिरपर एक पत्थर की शिला लटक रही थी । यदि मौका होता तो धीरे से उस पर चढ़ जाता पर चढ़ने का कोई साधन नहीं था।
जब रानी की नींद खुली पति को पास न देखकर वह मन में भयभीत हुई। घोड़ा पास बंधा था सोचा इधर–उधर घूम–फिर रहे होंगे । अंत में देर तक इंतजार करने के बाद वह उठी और पग चिन्हों को देखते हुये तलाश में वह चल पड़ी । थोड़ी दूर जाकर उसको खून की बूदें दीख पड़ीं। वह सहम गई ! कहीं जंगली कोई फाड़ खाने वाला पशु तो राजा को नहीं पकड़ लेगया आखिर उसकी दृष्टि सोते हुये सिंह पर पड़ी और पास ही राजा भी बेबसी की दशा में पड़ा था। रानी ने बड़े ध्यान से उसकी हालत देखली । राजा ने भी कुछ इशारा किया जिसको वह समझ गई । अंत में वह घोड़ों के पास आई और काग डरेर
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शिव . अलग करके लटकी हुई शिला पर चढ़ गई और उसके सिरे को नीचे लटका कर राजा को ऊपर चढ़ आने का मौका दिया।
* राजा की जान तो बच गई पर जब ही उसने ऊपर पग धरा एक पत्थर का टुकड़ा लुढ़कते हुये नीचे गिरा। सिंह की आँख खुल गई । वह इधर उधर देखने लगा । जब उसको पता लगा । कि शिकार हाथ से निकल गया सिंह ने ऊपर की
ओर छलांग मारी । रानी इसके लिये चौकस बैठी थी तलवार के एक ही वार ने उसके सर को धड़ से अलग कर दिया उस समय राजा रानी दोनों को जो खुशी हुई वह लेखनी की शक्ति से बाहर है ! रानी सिंह को घसीटते हुए घोड़ों के पास ले आई। । लशकर के अदभी पीछे चले आ रहे थे। जब इनको रानी, की शूरवीरता का हाल मालूम हुआ वे अति प्रसन्न हुए और उस शेर की खाल को इस शिकार की यादगार में शहर को ले गये ।।
एक और समय की बात है चन्द्रावति नगरी के राजा प्रताप ने अनुमती पर चढ़ाई की। शत्रु के पास सैना अधिक थी। दृढ़वर्मा का लशकर इस कदर मजबूत नहीं था कि उसका सामना कर सकता । सब लोग परेशान थे। किसी की समझ में नहीं आता था कि किस तरह काम करें । रानी ने कहा प्राण नाथ ! ऐसी दशा में केवल दो बातों से काम लिया जाता है। एक तो यह कि शत्र का अधिकार मान लिया जाय । दूसरे जी खोल कर लड़ा जाय । मेरी यह कभी सम्मति नहीं है कि आप प्रताप की शर्तों का पालन करें। वह राज ही क्या जो दूसरे के आधीन हो । मेरी सलाह यह है कि आप उसके मुकाबले पर जाँय और मुझको आज्ञा दीजिये कि मैं दूसरी ओर से शत्रु पर आक्रमण करू‘ । और जब राजा ने मान लिया रानी ने सब शहर वालों को बुला
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शिव
[५५ कर समझाया । शत्रु निकट आ पहुँचा है। जान–माल और आबरू तीनों खतरे में हैं। बहतर है जिसको अपने नगर की नाक रखने का विचार है वह मेरे साथ शरीक हों ।। | राजा के साथ तो सैना अधिक थी। रानी ने रंगरूटों को ज्यादा पसंद किया । और जब दृढ़ वर्मा प्रताप से लड़ने को निकला और उनमें खूब लड़ाई छिड़ गई रानी सब हथियारों से लैस होकर जरा बकतर पहने मैदान में निकली। इसके साथ कुछ थोड़ी सैना शाही थी बाकी अधिक हिस्सा नवयुवक रंगरूटों का था। जब प्रताप और दृढ़वर्मा लड़ रहे थे इसने किले के दूसरे फाटक से निकल कर पीछे की तरफ से शत्रु पर धावा बोल दिया । नवयुवकों की सैना रानी की दिलेरी देखकर जान पर खेलने को तैयार हो गई। शत्रु दोनों ओर से घमासान लड़ाई देखकर घबरा गया। उनके पांव उखड़ गये और भाग निकले । पर भाग कर जा कहाँ सकते थे । रानी की चालाकी ने इनके अधिक हिस्से का वहाँ ही सफाया कर दिया । और राजा रानी दोनों आमने सामने की ओर से लड़ते हुये शत्रु को कुचलने के बाद एक स्थान पर आ मिले । । दूसरे दिन प्रताप ने नाउम्मेद होकर सुलह का प्रस्ताव रक्खा । जिसको कदलीगर्भा ने आगा पीछा सब सोचकर मंजूर कर लिया। | कदलीगर्भा की बुद्धिमानी और वीरता की कुछ ऐसी धाक बँध गई कि फिर इसके जीवन पर्यन्त किसी शत्रु को अनुमती पर हमला करने का साहस नहीं हुआ । देश हर प्रकार से बाद था । सब खुश थे। और हर व्यक्ति रानी को हित–चित से दुआये देता था।
रानी माता पिता से आश्रम में बहुधा मिलने जाया करती थी । वहाँ इसका बर्ताव रानियों जैसा नहीं था । बल्कि एक सादर
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शिव मिजाज पुत्री का था । जब उससे किसी ने कहा कि ऋषि तुम्हारा पिता नहीं है। उसके चित्त को एक प्रकार का दुख हुआ। क्योंकि वह इस घटना को जानना नहीं चाहती थी। तो भी वह उनको जीवन पर्यन्त सदा माता पिता ही समझती रही और वे भी इस को सदा बेटी मानते थे।
इसके जीवन का अधिक भाग शांति व सुख चैन में व्यतीत हुआ । जव आयु अधिक हुई दृढ़ वर्मा ने राज–काज अपने पुत्र के हवाले किया और स्त्री पुरुष बन में जाकर दोनों तपस्या का जीवन ब्यतीत करने लगे । और वही उनके परमपुनीत और पवित्र जीवन का अंत हुआ ! क्या हम इससे कुछ शिक्षा गृहणकरें !
स्वामी सेवक एक मत जो मत में मत मिल जाय ।। चतुराई रीझे नहीं रीझे मन के भाय ।।
सरदारवाई यह पतिव्रता वीरांगना राजधानी पाटन के निकट रानीपुर की रहने वाली थी। वहां कल्याण वंश का राजा क्षेमराज राज करता था। वह उसकी पुत्री थी। उस समय गुजरात दिल्ली राजधानी के सूबे के अधीन था । पर फिर भी गुजरात का उत्तरी भाग किसी अश में आजाद समझा जाता था। क्योंकि यहाँ के बसने वाले मनचले राजपूत बादशाह के अधीन नहीं रहना चाहते थे । पाटन में बादशाह की ओर से रहमत खां नामी सूबेदार मुकरिर था। संयोगवश एक बार सूबेदार रानीपुर
या। राजा क्षेमराज ने उसका बड़ा आदर सत्कार किया। और यथा सम्भव महमानी में कोई कमी न रक्खी । संयोगवश जब एक समय सूबेदार राजमहल में जारहा था। सरदारबाई बाग में सैर कर रही थी । सूबेदार को देख कर उसने
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शिव अपने मुख को ढक लिया। पर अकस्मात वायु के झोंके से उसका मुख खुल गया । और रहमतखां देखते ही उस पर मोहित होगया। पहले इसका विचार रानीपुर में ठहरने का नहीं था । पर सरदारबाई के रूप और लावण्य ने कुछ ऐसा बेसुध बना दिया कि वह अपने विचार के विरुद्ध वहां ज्यादाठहरने को विवश हुआ । अब वह इस चिंता में रहने लगा कि सरदार बाई किस तरह उसके हाथ आये । वह भले प्रकार जानता था कि क्षेमराज अपनी पुत्री की शादी उसके साथ कदापि न करेगा। इसलिए उसने उसके पुत्र मूलाराज के साथ अपना याराना स्थापित किया । और उसको अपने जाल में फॉस लिया । मूलराज सीधा और बेवकूफ भी था संध्या समय जब वह रहमतखां से मिलने आया उसने उसको खूब मदिरा पिलादी । और वह जब बेसुध होने लगा उसके साथ जुआ खेलना शुरू किया। राजकुमार हारता गया। जब उसके पास कुछ न रहा रहमतखां ने हंसी–हंसी में कहा कि तुम अपनी बहिन सरदारबाई को दाव पर लगा दो । अगर तुम्हारी जीत हुई तो उत्तर का सारा इलाका इसके बदले में तुमको दे दूगा वरन् तुमको अपनी बहिन सरदारबाई का विवाह मेरे साथ करना होगा । मूलराज बेसुधी की दशा में था ! जूये की हार बुरी होती है। उसने इस बुरी शर्त को मान लिया । बाजो बदी गई । और जब पासा डाला गया फिर भी रहमतखां की जीत हुई । अब जाकर कहीं राजकुमार का नशा किरकिरा हुआ। अपन किये पर मन ही मन पछिताने लगा। और अफ़सोस करने लगा। पर क्या करता ! मजबूर ! काटो तो लोहू नहीं बदन में चहरे का रंग बिलकुल फीका पड़ गया !
अर्धरात्रि का समय हो चुका था । वह अपने कुटिल यार से रुखसत होकर अपने महल में आया। उसकी रानी रूपानदे देर से उसकी बाट देख रही थी । देर के बाद यह वहाँ पहुंचा। सूरत ।
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शिव शकल उतरी हुई, औसान खता थे। रानी ने बातचीत करना उचित नहीं समझा और सो रहने की बिनय की । क्योंकि नींद सदा भयभीत होने की दशा में एकमात्र औषधि समझी जाती है। पर मूलराज को नींद कहां। वह पलंग पर रातभर मछली के समान तड़पती रही। पलक से पलक न लगा नींद हराम होगई । रूपानदे अत में अपने धैर्य को कायम ने रख सकी । उससे पूछने लगी क्या बात है ? किस कारण आप इतने व्याकुल हैं ? और जब इसने आदि से अत तक सारा हाल कह सुनाया। तो उसका भी माथा ठनका । और वह खेद में चिंतित होकर कहने लगी कि आपने भारी गलती की। रहमतखाँ ने आपके भोलेपन का लाभ उठाया । आपको अधिकार ही क्या था कि वहिन को दाव पर लगाते । मूलराज क्या उत्तर दे ? चुप ! “तीर कमान से निकल चुका था। अब उसका वापिस आना।
कठिन था।
सूर्य के उदय होते ही रहमतखां ने थोड़े आदमियों के साथ एक पालकी मूलराज के महल में भिजवाई । क्षेमराज को कुछ खबर नहीं थी । पालकी देखकर आश्चर्य चकित रह गया ! पर रूपानदे ने सारा हाल अपनी नन्द को कह सुनाया । और उसको भाई के पामे में हारने का सब ब्यौरा आद्योपांत कह दिया । सरदारबाई के जी में उसी समय आग लग गई। वह कहने लगी भाभी ! भाई पागल हो गया है। उसको ने अपने कुल की मर्यादा का ध्यान है, न क्षत्रीवंश की ही परम्परा का । इस कारण मेरी सम्मति में उसके बचनों का कोई महत्व नहीं । मेरे ऊपर इसके अतिरिक्त पिता के जीते जी भाई का बहिन पर कोई अधिकार नहीं । इसको क्या हुक था कि वह बहिन को दाव पर लगा बैठा मेरी जान में जब तक जान है मैं कभी अपने वंश को दाग ने लगने देंगी । दुनिया इधर की उधर हो जाये । पर मैं कभी अव: ।
शिव
[५६ सर न आने देंगी कि भाई की बुद्धि हीनता के कारण मेरे कुल को बट्टा लगे । इस समय अधिक बार्तालाप करने की शक्ति नहीं रही थी। वह उठी और सीधी अपने कमरे की ओर चली गई। दरवाजे के सामने सुन्दर दर्पण मौजूद था। उस पर निगाह गई ।
और अपने रूप स्वरूप की छाया देखकर कहने लगी । धिक्कार है ! मेरी इस सुन्दरता रूप और लावण्य पर ! न रहमतखांत ने बाग में मुझे देखा होता न आज यह महान आपत्ति हमारे कुन पर आई होती ।।
जब क्षेमराज को यह हाल मालुम हा । उसने पालकी को वापिस कर दिया । और रहमत खां को कहला भेजा कि मूलराज को कोई अधिकार नहीं था कि वह तुमको इस प्रकार का बचने देता। इसलिये मैं इसकी बात को कभी मानने वाला नहीं । जिस समय पालकी वापिस गई और सूबेदार ने राजा का संदेश सुना। उसकी क्रोधाग्नि भभक उठी और उसी समय वहां से कूच करके अपनी राजधानी में वापिस आया। और सैना के संग्रह करने में लग गया । क्ष मराज जानता था कि इस मामले का अंत खूनखच्चर होगा। पर अव्वल तो इसका राज छोटा था। दूसरे इसकी फौजी ताकृत इतनी कम थी कि शाही सूबेदार के मुकाबले में उसको विजय पाने का अनुमान भी नहीं हो सकता था। परिणाम यह हुआ कि जब रहमतखाँ की भारी सैना रानीपुर पर चढ़ दौड़ी यह अपने किले दरियागढ़ में घिर गया। किसी को साहस नहीं था कि मुसलमानों का मुकाबला करता । रुपानदे ने अवश्य जी खोल कर शत्रुओं का मुकाबला किया। इसके साथ रानीपुर के रजपूत मी सबके सब कट–कट कर मर गये और रूपानदे ने भी निहायत मर्दानगी से जान दी। कई घंटे तक संग्राम छिड़ा रहा। अन्त में जब योद्धा मर खिप गये किलर भी हमला करने वालों को न रोक सका। क्षेमराज, मूलराज और सरदारवाई
६०]
शिव तीनों बन्दी बना लिये गये। मूलराज कायर था । इसने रहमत खां की बात में आकर मुसलमानी धर्म इख्त्यार कर लिया। और सूबेदार ने इसको आजाद करके राजनीतिक चाल के बहाने कहीं और जगह भेज दिया। यह बूढे राजा–रानी और कुमारी सरदारबाई बन्दी बना कर पाटन लाये गये। जहां एक २ को अलग २ स्थानों में रखा गया। और बड़ी चौकसी के साथ चौकी पहरे का बन्दोबस्त किया गया। रहमतखां सरदारबाई की सुन्दरता पर मोहित था। तीन दिन तक राह में इसने कुछ छेड़–छाड़ न की । चौथे दिन उसने कहल। भेजा कि मैं आज तुम्हारे डेरे में आऊ‘गा। सरदारवाई की दशा विचित्र थी। पहले तो इसको अपने भाई की हरकत पर अति क्रोध था । पर अब चित्त में एक प्रकार का धैर्य और संतोष आगया था। उसने सूबेदार के संदेशे का कोई उत्तर न दिया। और शाम से पहले वह सज–धज कर उसके इंतजार में बैठी रही । जब रहमतखां आया वह सनमानपूर्वक उठी और उसको सादर आसन दिया। जहां सूबेदार उसके रूप और लावण्य पर मुग्ध था तो अब उसके आदर और शिष्टाचार पर भी लट्टू होगया । इसने सरदारबाई से सुरा का प्याला मांगा । उसने बड़ी खुशी और प्रेम के साथ उसकी मदिरापान की भी सेवा की। बात–चीत कुछ नहीं हुई। पर जब मुस्करा कुर सरदारबाई उसको सुरा के प्याले पर प्याले झुकाती, वह बड़े प्रेम से सिर झुका कर पीता जाता । और झूम २ कर कहता जाताः
गर यार मय पिलाये तो फिर क्यों न पीजिये ।
पुजारी नहीं मैं शेख नहीं बिरहमन भी नहीं । परिणाम यह हुआ कि मदिरा ने उसको बदमस्त कर दिया। और जब वह पूरे तौर पर बेहोश होगया । सरदार बाई अपनी जगह से उठी । उसके वस्त्र पहने और पहरे वालों की नजर बचा कर एक ओर को चलती बनी । कई मील के फासले पर एक योगी
[६१
शिव का आश्रम था। सरदारबाई वहाँ पहुँची । और सारे शरीर पर भस्म लगाकर उसने भी वहाँ योगिन का भेष धारण कर लिया। यहां रहते २ कुछ काल बीत गया । संयोगवश चन्द्रावति नगर का राजकुमार वीर सिंह जिसको सरदारबाई जानती थी वहाँ अ) निकला । उसने राजकुमारी को नहीं पहचाना । पर सरदारबाई ने उसको देखकर सब हाल आदि से लेकर अन्त तक कह सुनाया। वीरसिंह को खुद भी सरदारवाई की तलाश थी। वह प्रसन्न होकर कहने लगा, आज से आठवें दिन मैं पाटन पर कब्जा कर लूगा । बहतर है तुम भी हमारे संग,चलो । चन्द्रावति से जब हम सेना लेकर आयेंगे, शत्रुओं के छक्के छुड़ादेंगे। सरदारबाई बोली नहीं तुम जाकर अपनी सेना ले आओ। मैं अम्बा भवानी पर इसी भेष में तुम्हारा इन्तजार करूगी।
वीरसिंह तो उसी घड़ी चन्द्रावति को चल दिया। पर अभी मुश्किल से दो–चार मील ही गया होगा कि सूबेदार के आदमियों ने सरदारवाई को पहचान लिया । और वह उनके हाथ पड़ गई। जिस समय यह पाटन से भागी थी आदमियों की अनेक टोली इसकी खोज में जगह २ को भेज दी गई थीं । और सूबेदार ने पता लगाने वालों को बहुत कुछ इनाम व इक्राम देने का वचन भी दिया था। उसकी खोज बड़े उत्साह के साथ की जा रही थी। सिपाहियों ने दीन–दुखी राजकुमारी को एक पिंजड़े में पशुओं के
समान बन्द कर लिया । और पाटन की ओर चलते बने।
ईश्वर की लीला भी कुछ विचित्र होती है । जब सिपाहियों का कफिला अम्बा भवानी के निकट होकर जा रहा था। इनमें आपस में इनाम के बारे में झगड़ा होने लगा । गाली–गलोज की नौबत पहुँची । तलवारें म्यान से निकल कर आपस में चलने लगीं। और सब कट २ कर मर गये । गाड़ी वाला शेष रहा था । उसने सोचा, चलो अच्छा हुआ। सारा इनाम मुझको ही
६२]
शिव के मिल जायगा। पर बेचारा थोड़ी दूर ही गया होगा कि एक भयानक चीते ने झपट कर उसका काम तमाम कर दिया । बैल चीते के डर से बगटट भागने लगे । पिंजड़ा गाड़ी से नीचे गिर गया । और यह पता नहीं लगा कि बैल गाड़ी को किस तरफ़ लेगये ।
जब पिंजड़ा गाड़ी से नीचे गिरा। सरदारबाई के थोड़ी–सी चोट आगई थी । पर वैसे वह सब तरह से ठीक थी । प्रातःकाल जब सूर्य उदय होने को हुआ, गिद्ध और कौए जहां सिपाहियों की लाशें पड़ी हुई थीं उसके चारों ओर मंडराने लगे। जंगल के उस भाग में फावड़ा एक जंगली जाति बस रही थी। जब उन लोगों ने वहां मनुष्यों की लाशें पड़ी हुई देखीं और सरदारबाई को पिंजड़े में बंद पाया उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह विश्वास के कच्चे थे, कहने लगे देखो अम्बे भवानी ने किस प्रकार शत्रुओं के हाथ से अपने जन की रक्षा की है। यह कह कर वह खुशी–खुशी पिजड़े को उठा लाये और अम्बे भवानी के पंडे की सुपुर्द कर दिया।
सरदाबाई ने इन जंगली जाति के लोगों के सद्व्यवहार और पुजारी की दया और करुणा को देखकर अपने गले से मोतियों का हार उतार कर उनको बाँट दिया । वह वहाँ उनकी देखरेख में छिपे रूप में किसी स्वरक्षित स्थान में रहने लगी।
सरदारवाई अम्बा भवानी में रह रही है। उसको कई दिन वहाँ बीत चुके । वीरसिंह के कुछ राजपूत उसकी खोज में आये पर किसी को उसका पता नहीं चला। क्योंकि पुजारी इसका भेद किसी को नहीं देता था। दूसरे सरदार बाई मर्दाने भेष में किसी गुफा में छिपी रहती थी। तलाश करने वाले बड़े परेशान हुए । पर जब पुजारी को यह भले प्रकार से ज्ञात होगया कि यह । वीरसिंह के भेजे हुए हैं। वह इनको सरदारबाई के पास ले आया और इस प्रकार वीरसिंह और सरदारवाई परस्पर मिलकर बड़े
।
शिव के
[६३ प्रसन्न हुए । उनकी यह सम्मति हुई कि दोनों को पाटन पर धावा बोलकर राजा और रानी को कैद से आजाद कराना चाहिये।
और इस इरादे से वह वहाँ से रवाने हुए । | अब पाटन का हाल सुनिये। सरदार बाई के भाग जाने पर रहमतवां को भारी अफ़सोस था। उसने हर प्रकार से उसकी चोज करनी चाही। पर जब कहीं खोज न चला वह बड़ा व्याकुल होगया । और बेचारे बूढे राजा और रानी पर अपने अत्याचार का बुखार उतारने लगा। इसका स्वभाव इतना बिगड़ गया था कि वह रानीपुर के सारे कैदी हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाने लगा और जिस किसी ने मुसलमान होने से इन्कार किया वह बड़ी निर्दयता के साथ फांसी पर लटका दिये गये। रहमतखां ने राजा और रानी से भी मुसलमान होने का आग्रह किया । पर उन्होंने स्पष्ट रूप में इन्कार कर दिया। अब तो उसकी क्रोधाग्नि और भी प्रचंड होगई और उसने हुक्म दिया कि यदि यह चौबीस घंटे के अंदर मुसलमान न बने तो दोनों को फाँसी पर लटका दिया जाय ।
चोमराज और उसकी रानी को फांसी पर लटकाने का समाचार जंगल की आग के समान चारों ओर फैल गया। और जब कहने वालों ने सरदारवाई और बीरसिंह को इस घटना की खबर दी, उन्होंने सैना के एक बड़े भाग को पीछे छोड़ दिया। इने गिने पचास साठ सवार साथ लेकर तेजी के साथ उस स्थान पर पहुंचे जहां राजा और रानी को अपने धर्म पर दृढ़ता से कायम रहने का दंड दिये जाने को था । फाँसी खड़ी हुई थी । स्त्री पुरुष दोनों अपनी मृत्यु की घड़ियां गिन रहे थे। तमाशा देखने वालों की भीड़ इनके चारों ओर इकट्ठी होरही थी । सब समझ रहे थे कि अब यह बृद्ध दो–चार घड़ी के महमान हैं। दुनिया की कोई शक्ति अब इनको मौत के पंजे से छुटा नहीं सकती ।
शिव पर देखो जिस समय उनके फांसी पर चढ़ाये जाने की अंतिम आज्ञा दी जारही थी। ठीक उसी समय राजपूत सवारों के तेज रफ्तार घोड़ों का एक दुल मुसलमानों को अपने टाप से कुचलता हुआ दम के दम में वहां पहुंचा। एक तलवार ने राजा के जल्लाद का और दूसरी ने रानी के जल्लाद का सिर देखते २ धड़ से अलग कर दिया । और इस बात को प्रत्यक्ष कर दिखाया कि “मारने वाले से बचाने वाले का हाथ कहीं बलवान और महान होताहै । ” माता पिता दोनों ने सरदार बाई को पहचान लिया। वह समय कुछ और तरह का था । राजपूतों को बहुत कुछ काम करना बाकी था। सरदारबाई और वीरसिंह दोनों मुसलमानों की मारकाट मचाने लगे। रहमतखां सरदारबाई के हाथ से कृतल हुआ । जिस समय सरदार बाई का हाथ सूबेदार के सिर पर पड़ा यह आवाज सुनाई दी “देखो यह परिणाम है एक राजपूतनि की हविस करने का ।।
अभी इस मार–काट की हलचल खनम न होने पाई थी कि वीर सिंह की बची हुई सेना ने पाटन पर धावा बोल दिया। और सूबेदार की गैरहाजिरी में जब कोई और अफसर न रहा, शाही फौज इधर–उधर भाग निकली और उस दिन पाटन नगर के ऊचे बुर्जी पर चन्द्रावति नगरी का झंडा लहराने लगा। । जब हर ओर से घेरा डाल दिया और शत्रुओं का सब खटका जाता रहा, सरदारबाई ने वीर सिंह को अपने माता–पिता के समीप उपस्थित किया और उसकी वीरता का समाचार कह सुनाया। दोनों वीरसिंह से परिचित थे। उनका हृदय गद्गद् था। अधिक वार्तालाप की शक्ति नहीं रही थी ! सरदार बाई का हाथ पकड़ कर माता–पिता दोनों ने बीरसिंह के चरणों में डाल दिया और बोले । आपकी दया और करुणा का बदला हम कुछ
१०, १२
शिव के चुकाने के योग्य नहीं ! सरदारवाई को आपकी दासी के समान अर्पण करते हैं । वीर सिंह ने सिर झुका कर खुशी जाहिर की ।,
इसके बाद इन दोनों का विवाह रचा गया । रानीपुर पर पहले की भांति क्षेमराज को कुब्जा दिलाया गया। पाटन और चन्द्रावति पर बीर सिंह राज करने लगा। कुछ समय तक दोनों का जीवन सुख–चैन से व्यतीत हुआ। पर जब दिल्ली के बादशाह को पाटन के हाथ से निकल जाने का समाचार मिला। वह रात–दिन बीरसिंह को दंड देने की चिंता में रहने लगा। और उसने फिर जीतेजी इनको सुख–चैन से रहने नहीं दिया ।
कुछ काल पर्यन्त दिल्ली के बादशाह का भरोसे का सरदार खुसरो खाँ बहुत बड़ी सेना लेकर चन्द्रावति पर चढ़ दौड़ा है। राजपूत और पठानों में घोर संग्राम हुआ। वीरसिंहं अधिक समय तक दिल्ली की सेना के साथ लड़ता रहा । पर अन्त में उसकी सफलता न हुई । और खुसरोखां के हाथ से मारा गया । जिसः समय उसके छोटे भाई ने संग्राम सूमि से भाग कर सरदारबाई को वीरसिंह के मरजाने का समाचार सुनाया । उसके अङ्ग अङ्ग में क्रोधाग्नि की जलन भड़क उठी । और जिन शब्दों में उसने मानसिंह को उसके कायरपन पर धिक्कारा है। वह वास्तव में सोचने और विचार करने योग्य है । वह मानसिंह से कहती है । रे नीच ! कायर तुझको लज्जा नहीं आई कि संग्राम से भाग कर तू मुखें दिखाने आया ‘हे । धिक्कार है ! उस घड़ी को जिसमें तेरा जन्म हुआ । धिक्कार है उन नक्षत्रों को जिसके उदय होने के समय तुझ जैसे कुलघाती ने जन्म लिया। तेरा कर्तव्य था कि तू अपने राजा के साथ स्वर्ग धाम को जाता। तेरा कार्य था कि राजा के शत्रुओं से उसका बदला लेता। तेरा धर्म था कि सिंह के समान वाद करता हुआ जिधर विफरता उधर ही शत्रुओं के परे के परे तलवार के घाट उतार देत ।। रे
६६]
| शिव दुष्ट ! यदि तू मेरे पति का भाई न होता तो इसी समय तुझको अपने हाथ से कतल कर देती । जा मेरी आँखों के आगे से दूर होजा । मानसिंह वहाँ से नार नीची करके चला आया। इतने में समाचार मिला कि जिस समय वीर सिंह पृथ्वी पर गिरा वह सरदार ! सरदार !चिल्ला रहा था । और मुसलमान बरावर बढ़ते हुए चले आरहे थे।
| मानसिंह को जीवित देख उसकी माता, भावज और बहिन । सबने ही इसका तिरस्कार कर दिया। जब माता की इस पर निगाह पड़ी वह बोली । रे निर्लज्ज के पुत्र ! दूर हो अपना मुख मत दिखा।
। वास्तव में बात यह थी कि मानसिंह कायर था। उसमें लड़ने भिड़ने का साहस था न बल पराक्रम । सरदार की अनुपस्थित को महसूस करके सरदारबाई उठ खड़ी हुई और अपने आठ महिने के पुत्र को सास की गोद में बिठाकर कहने लगी । माताजी ! पति ने मरते समय कई बार सरदार शब्द उच्चारण किया था। इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो यह कि कोई वीर पुरुष उसके पीछे अपने सिर पर सरदारी ले ले। दूसरे सम्भव है वह मृत्युकाल में भी मेरे वियोग को सहन न कर सके ! लो अब यह तुम्हारा पुत्र ! और तुम ही इस की माता हो। और मैं । अपना धर्म पालन करने जाती हूं। सरदारबाई ने अपने जुनाने वस्त्र उतार दिये और जरा बकतर पहन लिया। और शस्त्रों से सुसज्जित हो, तेज़ क़दम घोड़े पर सवार होकर संग्राम भूमि में पहुँची ! इसको देखकर राजपूतों में नई शक्ति का संचार हो। आया। वह ऐसी प्रतीत होती थी मानो वीर, शक्ति स्वयं रूप धारण करके मैदान में आ डटी है। उसकी ललकार को सुनकर राजपूत सैना उमड़ती हुई लहरों के समान आगे बढ़ने लगी। और शत्रु को आगे बढ़ने से रोक दिया । और बड़ी शीघ्रता से
[६० शिव किले के सब बुर्जी पर सिपाहियों की सेना रक्षा के हेतु जा धमकीं। किले का फाटक इसकी आज्ञा से बंद कर दिया गया। पर शत्रुओं के मुकाबले की चिंता में वह खुद भीतर न जा सकी । और सौ रणधीर सरदारों को साथ लिये हुए फाटक पर खड़ी होगई ! खुसरोखां को आशा थी कि वीरसिंह के मरने के बाद फिर किसी को मुकाबले का साहस ने होगा। पर जिस समय इसने फाटक पर खड़ी हुई इस वीर ललित ललना को देखा वह
आश्चर्य चकित रह गया । और कहने लगा । यह राजपूतिदेवी है। जिसके फलस्वरूप पाटन मुसलमानों के हाथ से निकल गया था । रानी और उसके बांके शूरवीर बड़े साहस और वीरता से लड़ते रहे। सौ सरदारों में से कुछ थोड़े से ही शेष रहे थे। बाकी काम आये । इनमें राजपूत सिपाहियों की गिनती नहीं है। मुसलमानों की सेना को रानी पर विजय पाने का अवसर नहीं मिला । अंत में जब उनका लशकर डेरे की ओर चला आया । किले का फाटक खोल दिया गया । और रानी अपनी थोड़ी सी सैना के साथ अंदर दाखिल हुई। * दिल्ली की सैना अनगनित थी। सरदारबाई के आदमी इने गिने थे। वह किले में ही घिर गई । एक महिने तक किले में घिरी २ अनेक कष्ट और क्लेश सहन करती हुई शत्रुओं का मुकाबला करती रही। पर जब देखा कि रसद की कमी है और सब लोग घिरे हुए कष्ट और विपत्ति में हैं, उसने संध्या समय राजपूत सरदारों को बुलाया और कहने लगी । वीरो ! समय विपरीत है! अब हमारे जीवन की अंतिम घड़ी निकट है। एक ।
और स्वर्ग है दूसरी ओर नर्क है। यदि मरते हैं तो स्वर्ग का सुख भोगने को मिलेगा। यदि जीवन की लालसा है तो नीचता है । “ख्वारी है। बरबादी है। अवज्ञा है। मैं जानती हूँ तुम क्या चाहते हो। मैं जानती हूँ तुम्हारे मन में क्या क्या है। राजपूत
६८]
शिव कभी अवज्ञा और कायरपन सहन नहीं करते। आज अंतिम दिन तुम्हारी रानी तुमको पान का बीड़ा बांटती है। उसको लो
और केसरिया बाना पहन कर कल प्रातः ही अपने राजा के मार्ग के अनुगामी बनो! । सरदारों के समाज में सन्नाटा छा गया ! सबने ही प्रसन्न चित्त से शीश नवा कर रानी के हाथ से बीड़े लिये और अपनी बातों और चलन से यह साबित कर दिखाया कि उनके बीच एक भी ऐसा कायर नहीं है जो धर्म क्षेत्र, रणक्षेत्र में जान देने से जी चुराता हो ।
सारी रैन शस्त्रों की सफाई और प्रात:काल के इन्तज़ार में व्यतीत हुई जब प्रातःकाल का समय हुआ। सरदारबाई और उसके बाँके वीर राजपूत केसरिया बाना पहन कर किले से बाहर निकले । और वह थोड़े से वीर ही मुसलमानों की सैना पर इस तरह टूट पड़े जैसे भूखा सिंह भेड़ बकरियों के गल्ले पर बिफर जाता है। भूमि लाशों से पट गई। जगह–जगह पर खून की धारा बह चली। ऐसी वीरता ! हथेली पर सिर रक्खे हुए, निर्भय साहस और पराक्रम का दृश्य कठिनता से किसी के देखने में आया होगा। रानी की तलवार की काट और चमक तो बिजली के समान थी। जिसकी गर्दन पर पड़ी वही काम आया. प्रतीत होता था मानो स्वयं महाकाली हाथ में खप्पर लिये खून की प्यासी है | एक २ ने सैकड़ों को मारा । और इस प्रकार मार–काट करते हुये शत्रुओं की लाशों पर लेटकर वह पवित्र आत्मायें स्वर्गधाम को सिधार गई। सबसे अन्त में सरदार बाई घायल होकर घोड़े की पीठ पर से नीचे गिर पड़ी । और सहज ही शत्रओं के हाथ, गिरफ्तार होगई। खुसरोखाँ ने कुछ सोच–समझकर इसको अपने डेरे में स्थान दिया । खुसरोखाँ नीच जाति का हिन्दू था । मुस
[ ६९ जमान होगया था। जब वह सामने आई। घायल, बेबस, बेकस, दीन–दुखी सरदारेबाई के साथ इस नीच, कुटिल और कमीने हिन्दू ने अपनी स्त्री बनने की इच्छा प्रगट की । या तो वह घावों से अधिक खून बह जाने के कारण अति बलहीन होरही थी। और चह कहां अब क्रोध के कारण उसने खुसरोखाँ को लानतान देना
शुरू किया। वह बोली ! रे दुष्ट ! पापी ! निर्दई ! हत्यारे ! | तुझको न ईश्वर का डर है। न धर्म का भय है। न लोक–लाज,
है न परलोक का भय है। नीच ! तूने दुनिया के लालच से अपने धर्म को बेच दिया। वेदोक्त मार्ग के बदले मुसलमानों के धर्म को ग्रहण किया । तू गीदड़ होकर सिंहाने के हाथ का इच्छुक है । मुझको भी देवलदेवी और कमलादेवी समझा होगा। इस प्रकार उत्तेजित होकर उसने उसको हजार बातें कहीं। बुरी से बुरी बातें सुनाई। और परिणाम यह हुआ कि वह बेसुध होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। खुसरोखाँ ने उसको उठाकर एक खाट पर डाल दिया। और खुद उस खाट पर बैठ कर पखा झलने लगा। दो–चार घड़ी पीछे जब उसने आँखें खोलीं। खुसरोखाँ को देखकर उसके नेत्रों में खून उतर आया। उस समय उसने कमर से कटॉर खींच ली । अगर खुसरोखाँ हट न जाता तो क्या अजब वह उस पर बिजली के समान गिर पड़ती ! जब वह हट गया उसने वही कटार अपने पेट में भोक ली । आंतें बाहर निकल पड़ीं। और जब देखा कि डेरे में कोई नहीं है। वह उठ कर भाग निकली। और चन्द्रावति की ओर चल पड़ी। पर आप ख्याल कर सकते हैं कि ऐसा घायल प्राणी कैसे रास्ता तै कर सकता है थिोड़ी दूर ही चल कर वह गिर पड़ी और बेसुध होगई। संयोगवश चन्द्राः वति का भाट वारुण आ रहा था। उसने अपनी रानी को पहिचान लिया। और उसकी आँतों को पेट में दबाकर अपनी पांठ पर लाद लिया। और एक गांव के निकट ले आया। जब
शिव के रानी की मूछा जागी । उसने चारुण से कहा। मेरे शरीर पर जल छोड़ो। चाँडाल ने मुझको छू लिया है। भाट जान गया रानी का अन्तिम समय आ पहुंचा है। इसलिये उसने उसी समय अपने हाथों से स्नान कराया। और लीपी हुई जगह पर लिटा दिया। रानी बोली, सबकी जय हो ! अपने पुत्र को तुम सब लोगों के हाथ सोंपती हैं। देखना मेरे बूढ़े सास सुसर को दुख न होने पावे। ईश्वर ! चन्द्रावति नगरी की प्रजा की रक्षा करे ! सब अपने धर्म पर आरूढ़ रहें ! लो अब मैं जाती हैं। राम ! राम !! . “इस प्रकार बोलते २ इस वीर, पवित्र और पतिपरायण ललित ललना ने अपने प्राण त्याग दिये । और इस प्रकार संसार में सत्य , व्रत की नजीर कायम की । वह धन्य थी ! उसका पराक्रम धन्य था। और उसका धर्ममाव सराहनीय था ।
पाठकजन ! ईश्वर करे इस पर्म पुनीत और पवित्र वीराङ्गना का सूक्ष्म इतिहास आप लोगों को भी सत्य का मार्ग दर्शाये ! गुरु अबका कल्याण करे !
| सजनी शील क्षमा चित धार । टेक जग में आई नर तन पाया औसर मिला अपार ।। सुमिरन भजन ध्वान पति करले जा भव जल के पार ।। प्रेम प्रीत की रीति है न्यारी कर सबसे प्रेम प्यार। तू तो तरी चरन लग पति के तारदे कुल परिवार ।। मीठे बचन बोल नित मुख से मन रहे. बुद्धि विचार । दृष्टि रहे चरण कमल में पति के साध परमारथ सार ।। पति का नाम न भूले चित से आठ पहर हुश्यार । परमारथ का गुरु यह प्यारी ऐस! कर व्योहार ॥ आनन्द खुख का जीवन जीना दुख न हिये में धार । राधास्वामी दया संभल कर रहना द्वेष भाव को टार ।







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