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Song 0 — Hindi
(201)धन धन धन जग त्राता,धन त्रिभुवन स्वामी।
धन धन धन पितु माता,धन अन्तर्यामी ।
प्रभुधन अन्तर्यामी।
भक्ति भाव स्वामी पाऊँ,चरन शरन ध्याऊँ।
चरनन चित्त लगाऊँ,सेवा में धाऊँ,प्रभु सेवा में धाऊँ।
आदि गुरु परमातम,तुम मंगलकारी।
जन सेवक सुखदायक,जीवन हितकारी,
प्रभु जीवन हितकारी।
प्रेम रूप करतारा,घट घट के बासी।
मन बुद्धि से पारा,अनुपम अविनासी,
प्रभु अनुपम अविनासी।।
प्रेम दान मोहे दीजे,सन्तन की सेवा।
सत संगत फल पाऊँ,देवन के देवा,
प्रभु देवन के देवा।।
त्रिविध ताप दुख मेटो,करलो मोहे अपना।
अवगुन चित्त न लाओ,दूर करो तपना,
प्रभु दूर करो तपना।
तज तीनों जल्दी प्रभु,पद:चौथा पाऊँ।
काल जाल से भागू,राधास्वामी गुन गाऊँ,
प्रभु राधास्वामी गुन गाऊँ ॥
लावनी
धन धन धन पितु माता,धन अन्तर्यामी ।
प्रभुधन अन्तर्यामी।
भक्ति भाव स्वामी पाऊँ,चरन शरन ध्याऊँ।
चरनन चित्त लगाऊँ,सेवा में धाऊँ,प्रभु सेवा में धाऊँ।
आदि गुरु परमातम,तुम मंगलकारी।
जन सेवक सुखदायक,जीवन हितकारी,
प्रभु जीवन हितकारी।
प्रेम रूप करतारा,घट घट के बासी।
मन बुद्धि से पारा,अनुपम अविनासी,
प्रभु अनुपम अविनासी।।
प्रेम दान मोहे दीजे,सन्तन की सेवा।
सत संगत फल पाऊँ,देवन के देवा,
प्रभु देवन के देवा।।
त्रिविध ताप दुख मेटो,करलो मोहे अपना।
अवगुन चित्त न लाओ,दूर करो तपना,
प्रभु दूर करो तपना।
तज तीनों जल्दी प्रभु,पद:चौथा पाऊँ।
काल जाल से भागू,राधास्वामी गुन गाऊँ,
प्रभु राधास्वामी गुन गाऊँ ॥
लावनी
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Song 1 — Hindi
(1-202)कर निश्चय गुरु का चरन सीस पर धारा।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ॥
क्यों सोच से तू नित व्याकुल रहता है।
क्यों भरम में पड़कर दुख सुख को सहता है।
क्यों उलटी सुलटी बात बना कहता है ।।
क्यों नहीं चरन की ओट छांह गहता है।
जिस का सतगुरु रूप सदा रखवारा।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।1।।
गुरु हैं हितकारी तेरे समझ ले मन में ।
तु चाहे रहे कहीं घर परबत और वन में।
रह रात दिवस गुरु देव के प्रेम लगन में ।
नहीं चिंता का ले भार भरम के यतन में।
बेखटके जो करता है।यहाँ गुजारा ।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।।।
भृगी ने कीट को जोर से अपने पकड़ा।
और उसे बन्द छत में लाकर जकड़ा।
पहले वह भय बस भयो मोह का लकड़ा ।
फिर ध्यान से बन गया भृगी अच्छा तकड़ा।
जो लेता है गुरु देव का ऐसा सारा ।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥3॥
कर भजन ध्यान सुमिरन नित उठ कर भाई ।
इन ही बातों से होगी तेरी भलाई।
तज दे सर आलस नींद मोह कदाई।
बिगड़ी सब तेरी बनत बनत बन जई है।
जो दुविधा दुचिताई से गहे किनारा ।।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥4॥
राधास्वामी संत रूप धर जग में आये ।।
भूले भटकों को सत की राह चलाये।
जो अचेत थे दया से उन्हें चेताये ।।
सुरत शब्द मत योग का सच्चा यतन सिखाये।
शरणागत जो हुआ तरा और तारा ।
वह होगा आप एक दिन भी जल पारा ।।5।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ॥
क्यों सोच से तू नित व्याकुल रहता है।
क्यों भरम में पड़कर दुख सुख को सहता है।
क्यों उलटी सुलटी बात बना कहता है ।।
क्यों नहीं चरन की ओट छांह गहता है।
जिस का सतगुरु रूप सदा रखवारा।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।1।।
गुरु हैं हितकारी तेरे समझ ले मन में ।
तु चाहे रहे कहीं घर परबत और वन में।
रह रात दिवस गुरु देव के प्रेम लगन में ।
नहीं चिंता का ले भार भरम के यतन में।
बेखटके जो करता है।यहाँ गुजारा ।।
वह होगा आप एक दिन भव जल पारा ।।।।
भृगी ने कीट को जोर से अपने पकड़ा।
और उसे बन्द छत में लाकर जकड़ा।
पहले वह भय बस भयो मोह का लकड़ा ।
फिर ध्यान से बन गया भृगी अच्छा तकड़ा।
जो लेता है गुरु देव का ऐसा सारा ।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥3॥
कर भजन ध्यान सुमिरन नित उठ कर भाई ।
इन ही बातों से होगी तेरी भलाई।
तज दे सर आलस नींद मोह कदाई।
बिगड़ी सब तेरी बनत बनत बन जई है।
जो दुविधा दुचिताई से गहे किनारा ।।
वह होगा आप एक दिन भवजल पारा ॥4॥
राधास्वामी संत रूप धर जग में आये ।।
भूले भटकों को सत की राह चलाये।
जो अचेत थे दया से उन्हें चेताये ।।
सुरत शब्द मत योग का सच्चा यतन सिखाये।
शरणागत जो हुआ तरा और तारा ।
वह होगा आप एक दिन भी जल पारा ।।5।।
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Song 2 — Hindi
(2-203)जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।
उसका हुआ भव सागर से बेड़ा पारा।।
नहीं साँचे भक्त किसी से कभी हैं डरते।
नहीं भय से काले करम के हैं वह मरते।।
गुरु उनकी पल पल में है रक्षा करते।
वह सहज सहज में जग के निधि से तरते ।
गुरु की कृपा से हुआ उनका निस्तारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।1।।
नहीं धरम करम से लगा किसी का ठिकाना।
नहीं संयम नियम में परमारथ का निशाना।
सब वृथा जीन ज्ञान ध्यान अनुमाना।
केवल सतगुरु की दया में है निरवाना है।
गुरु भक्ति से होगा आप ही भला तुम्हारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।2।।
मीरी गणिका रैदास और सदन कसाई।
इन सबको गुरु की भक्ति हुई सुखदाई ।
तर गया गुरु की भक्ति से पीपा नाई।
गुरु रात दिवस अपने भक्तों के सहाई ॥
सब त्याग मोह भ्रमजाल किया भक्ति से गुजारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु के बल यह मन तुम्हरे बश में आवे।।
गुरु के बल नर भव द्वन्द को सहज नसावे।।
गुरु के बल पाप प्रभाव न अपना दिखावे।
गुरु के बल प्रानी यम का फंद कटावे ॥
गुरु नर स्वरूप में धरा सन्त अवतारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु की कर जीते जी क्षण क्षण तू सेवा।
गुरु सम इस जग में नहीं है कोई देवा ॥
गुरु की कृपा मिटे सब भूल भर्म का भेवा।
गुरु शब्द जहाज के बने आप ही खेवा ॥
राधास्वामी ने बख्शा यह गुर सार का सारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ॥5॥
उसका हुआ भव सागर से बेड़ा पारा।।
नहीं साँचे भक्त किसी से कभी हैं डरते।
नहीं भय से काले करम के हैं वह मरते।।
गुरु उनकी पल पल में है रक्षा करते।
वह सहज सहज में जग के निधि से तरते ।
गुरु की कृपा से हुआ उनका निस्तारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।1।।
नहीं धरम करम से लगा किसी का ठिकाना।
नहीं संयम नियम में परमारथ का निशाना।
सब वृथा जीन ज्ञान ध्यान अनुमाना।
केवल सतगुरु की दया में है निरवाना है।
गुरु भक्ति से होगा आप ही भला तुम्हारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।2।।
मीरी गणिका रैदास और सदन कसाई।
इन सबको गुरु की भक्ति हुई सुखदाई ।
तर गया गुरु की भक्ति से पीपा नाई।
गुरु रात दिवस अपने भक्तों के सहाई ॥
सब त्याग मोह भ्रमजाल किया भक्ति से गुजारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु के बल यह मन तुम्हरे बश में आवे।।
गुरु के बल नर भव द्वन्द को सहज नसावे।।
गुरु के बल पाप प्रभाव न अपना दिखावे।
गुरु के बल प्रानी यम का फंद कटावे ॥
गुरु नर स्वरूप में धरा सन्त अवतारा ।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ।।4।।
गुरु की कर जीते जी क्षण क्षण तू सेवा।
गुरु सम इस जग में नहीं है कोई देवा ॥
गुरु की कृपा मिटे सब भूल भर्म का भेवा।
गुरु शब्द जहाज के बने आप ही खेवा ॥
राधास्वामी ने बख्शा यह गुर सार का सारा।
जिसने निश्चय से गुरु का लिया सहारा ॥5॥
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Song 3 — Hindi
(3-204)नामी हुए उसी दिन जिस दिन,चित से गुरु का नाम लिया।
जीते जी यश कीर्ति प्रतिष्ठा,और पीछे सेते धाम लिया।
अर्थ लिया और धर्म लिया और,मोक्ष लिया और काम लिया।
चार पदारथ हाथ में आये,तब जाकर विश्राम लिया।
मन चंचल की दुविधा मेटी,शान्ती आठों याम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।1।।
जीने की नहीं मन में इच्छा,मरने का डर नहीं करते हैं।
अजर अमर है रूप हमारा,प्रेमी जन कब मरते हैं।
भार बिपति आपति और दुख का,सिर पर कभी न धरते हैं।
कमल फूल ज्यों हम भव सागर,के जल में तरते रहते हैं।
मन का घोड़ा रान के नीचे,हाथ में उसका लगाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥2॥
खाकर दाना भक्ति का हम,प्रेम का पानी पीते है।
हृष्ट पुष्ट होकर संसार में,सुख आनन्द से जीते हैं।
हम नहीं हिंसक हंस हैं पूरे,बन के सिंह ने चीते हैं।
बिरह बान से फटे कलेजे,के चीरे को सोते हैं।
गुरु भक्ति का सौदा सच्चा,विना मोल बेदाम लिया।।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥3॥
ब्राह्मण को मिला ब्रह्म,क्षत्री क्षत्रपति कहलाता है।।
वैश्य को धन है शुद्र कला,कौशल की पदवी पाता है।
गाने बजाने वाला तान से,तान को अपना भिलाता है।
योगी सिद्धि शक्ति का भूका,योग के मारग जाता है।
हमको नाम की लगन लगी,ऊँचे चढ़ नाम का ग्राम लिया।।
सिर पर चार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥4॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आये,ओम् की बानी सहज सुनी।।
सुन्न में सहज समाध रचाई,महासुन्न के बने मुनी।।
भंवरगुफा चढ़ बन्शी बजाई,अवगुण मेंट के हुए गुनी।।
मत्तधाम धुर बीन की धुन सुन,सत धुनि बीन के धुनके धनी।।
अलख अगम पर बैठक ठानी,राधास्वामी धाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।5।।
जीते जी यश कीर्ति प्रतिष्ठा,और पीछे सेते धाम लिया।
अर्थ लिया और धर्म लिया और,मोक्ष लिया और काम लिया।
चार पदारथ हाथ में आये,तब जाकर विश्राम लिया।
मन चंचल की दुविधा मेटी,शान्ती आठों याम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।1।।
जीने की नहीं मन में इच्छा,मरने का डर नहीं करते हैं।
अजर अमर है रूप हमारा,प्रेमी जन कब मरते हैं।
भार बिपति आपति और दुख का,सिर पर कभी न धरते हैं।
कमल फूल ज्यों हम भव सागर,के जल में तरते रहते हैं।
मन का घोड़ा रान के नीचे,हाथ में उसका लगाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥2॥
खाकर दाना भक्ति का हम,प्रेम का पानी पीते है।
हृष्ट पुष्ट होकर संसार में,सुख आनन्द से जीते हैं।
हम नहीं हिंसक हंस हैं पूरे,बन के सिंह ने चीते हैं।
बिरह बान से फटे कलेजे,के चीरे को सोते हैं।
गुरु भक्ति का सौदा सच्चा,विना मोल बेदाम लिया।।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥3॥
ब्राह्मण को मिला ब्रह्म,क्षत्री क्षत्रपति कहलाता है।।
वैश्य को धन है शुद्र कला,कौशल की पदवी पाता है।
गाने बजाने वाला तान से,तान को अपना भिलाता है।
योगी सिद्धि शक्ति का भूका,योग के मारग जाता है।
हमको नाम की लगन लगी,ऊँचे चढ़ नाम का ग्राम लिया।।
सिर पर चार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ॥4॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आये,ओम् की बानी सहज सुनी।।
सुन्न में सहज समाध रचाई,महासुन्न के बने मुनी।।
भंवरगुफा चढ़ बन्शी बजाई,अवगुण मेंट के हुए गुनी।।
मत्तधाम धुर बीन की धुन सुन,सत धुनि बीन के धुनके धनी।।
अलख अगम पर बैठक ठानी,राधास्वामी धाम लिया।
सिर पर वार न आने पाया,काल चक्र को थाम लिया ।।5।।
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Song 4 — Hindi
(4-205)घर छोड़ा और देश देश में,घूम फिरे मारे मारे।
मन तपवन उपवन मधुबन सब,देख लिये न्यारे न्यारे।
परबत और पहाड़ की चोटी,चढ़ चढ़कर थक थक हारे।
गरे प्रेम में प्रीतम प्यारे,अन्त में पाया तुझे वारे ।
ॐघट का परदा खोल के गुरु ने,तेरे रूप को दरसाया।।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥1॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता,नहीं काशी का तू बासी।।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी,कहां बसा है अविनासी।
तू नहीं जपी तपी बन चंडी,नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी,कैसे कहे कोई आकासी।।
सत संगत के सुने बैन,समझाने वाले ने समझाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥2॥
खट पट में पोथियों के पड़कर,अटपट चाल चले दिन दिन।
सार मिला नहीं जी घबराया,तत्वों की गिनती गिन गिन।।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में,द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन।
जिसको देखा पक्षपात बस,करता रहता है भिन भिन।
गुरु मिले निज बचन सुनाया,अनुभव गम गति लखदाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥3॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि,शक्ति के मारग भरमाने।
मन को सोधा तन को साधा,साधन कर कर उक्ताने।
आसन मारा साँस को रोका,यतन किये बहु मन माने।
लगी समाध तुझे नहीं पाया,कैसे कोई तुझको जाने।
आप आप में आप समाया,अपना आपा बन आया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।4।।
साध की संगत गुरु की सेवा,सहज रीति जब बन आई।
सहज में सहज सहज में साधन,सहज भावना चितलाई।
सहज रूप है सहज नाम में,सहज काम नहीं कठिनाई।।
राधास्वामी की सत संगत में,सहज दृटि मैंने पाई।।
सहज दृष्टि में सहज रूप का,सहज ज्ञान सहजे छायो।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।5।।
घट का परदा खोल के गुरु ने, तेरे रूप को दरसाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥1 ॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता, नहीं काशी का तू बासी ।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी, कहां बसा है अविनासी ।
तू नहीं जपी तपी बन स्त्रंडी, नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी, कैसे कहे कोई आकासी ।
सत संगत के सुने बैन, समझाने वाले ने समझाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥2 ॥
खट पट में पोथियों के पड़कर, अटपट चाल चले दिन दिन ।
सार मिला नहीं जी घबराया, तत्वों की गिनती गिन गिन ।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में, द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन ।
जिसको देखा पक्षपात बस, करता रहता है भिन भिन ।
गुरु मिले निज बचन सुनाया, अनुभव गम गति लखवाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥3 ॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि, शक्ति के मारग भरमाने ।
मन को सोधा तन को साधा, साधन कर कर उक्ताने ।
आसन मारा साँस को रोका, यतन किये बहु मन माने ।
लगी समाध तुझे नहीं पाया, कैसे कोई तुझको जाने ।
आप आप में आप समाया, अपना आपा बन आया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥4 ॥
साध की संगत गुरु की सेवा, सहज रीति जब बन आई ।
सहज में सहज सहज में साधन, सहज भावना चितलाई ।
सहज रूप है सहज नाम में, सहज काम नहीं कठिनाई ।
राधास्वामी की सत संगत में, सहज दृष्टि मैंने पाई ।
सहज दृष्टि में सहज रूप का, सहज ज्ञान सहजे छाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥5 ॥
मन तपवन उपवन मधुबन सब,देख लिये न्यारे न्यारे।
परबत और पहाड़ की चोटी,चढ़ चढ़कर थक थक हारे।
गरे प्रेम में प्रीतम प्यारे,अन्त में पाया तुझे वारे ।
ॐघट का परदा खोल के गुरु ने,तेरे रूप को दरसाया।।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥1॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता,नहीं काशी का तू बासी।।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी,कहां बसा है अविनासी।
तू नहीं जपी तपी बन चंडी,नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी,कैसे कहे कोई आकासी।।
सत संगत के सुने बैन,समझाने वाले ने समझाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥2॥
खट पट में पोथियों के पड़कर,अटपट चाल चले दिन दिन।
सार मिला नहीं जी घबराया,तत्वों की गिनती गिन गिन।।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में,द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन।
जिसको देखा पक्षपात बस,करता रहता है भिन भिन।
गुरु मिले निज बचन सुनाया,अनुभव गम गति लखदाया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ॥3॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि,शक्ति के मारग भरमाने।
मन को सोधा तन को साधा,साधन कर कर उक्ताने।
आसन मारा साँस को रोका,यतन किये बहु मन माने।
लगी समाध तुझे नहीं पाया,कैसे कोई तुझको जाने।
आप आप में आप समाया,अपना आपा बन आया।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।4।।
साध की संगत गुरु की सेवा,सहज रीति जब बन आई।
सहज में सहज सहज में साधन,सहज भावना चितलाई।
सहज रूप है सहज नाम में,सहज काम नहीं कठिनाई।।
राधास्वामी की सत संगत में,सहज दृटि मैंने पाई।।
सहज दृष्टि में सहज रूप का,सहज ज्ञान सहजे छायो।
दर्शन रतन की खान खुली,अपने अन्तर तुझको पाया ।।5।।
घट का परदा खोल के गुरु ने, तेरे रूप को दरसाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥1 ॥
मूरत तीरथ में नहीं रहता, नहीं काशी का तू बासी ।
मथुरा पुरी द्वारका नगरी, कहां बसा है अविनासी ।
तू नहीं जपी तपी बन स्त्रंडी, नहीं कभी तू सन्यासी ।
अग्नी पवन नीर नहीं पृथवी, कैसे कहे कोई आकासी ।
सत संगत के सुने बैन, समझाने वाले ने समझाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥2 ॥
खट पट में पोथियों के पड़कर, अटपट चाल चले दिन दिन ।
सार मिला नहीं जी घबराया, तत्वों की गिनती गिन गिन ।
माया ब्रह्म के द्वन्दवाद में, द्वन्द के फंद फंसे छिन छिन ।
जिसको देखा पक्षपात बस, करता रहता है भिन भिन ।
गुरु मिले निज बचन सुनाया, अनुभव गम गति लखवाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥3 ॥
योग युक्तिकर योगी सिद्धि, शक्ति के मारग भरमाने ।
मन को सोधा तन को साधा, साधन कर कर उक्ताने ।
आसन मारा साँस को रोका, यतन किये बहु मन माने ।
लगी समाध तुझे नहीं पाया, कैसे कोई तुझको जाने ।
आप आप में आप समाया, अपना आपा बन आया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥4 ॥
साध की संगत गुरु की सेवा, सहज रीति जब बन आई ।
सहज में सहज सहज में साधन, सहज भावना चितलाई ।
सहज रूप है सहज नाम में, सहज काम नहीं कठिनाई ।
राधास्वामी की सत संगत में, सहज दृष्टि मैंने पाई ।
सहज दृष्टि में सहज रूप का, सहज ज्ञान सहजे छाया ।
दर्शन रतन की खान खुली, अपने अन्तर तुझको पाया ॥5 ॥
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Song 5 — Hindi
206. सोहं अस्मि जब हमने कहा, तब सोहंगम हंकार बना ।
तत्वमसी जो मुंह से निकला, वाच लक्ष जंजार बना ।
मनन किया मन बना चित्त से, चिंतन का सत्कार बना ।
बुद्धि निश्चयात्मक आई, जब ही विवेक विचार बना ।
पुरुष हुये तब बनी प्रकृति, कुल कुटुम्ब परिवार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥1 ॥
अपने आप में आप समाने, हिरण्य गर्भ की गति पाई ।
अन्तर्यामी बने जो अपने, अन्तर में ली अंगड़ाई ।
खोली आँख विराट कहाये, ठकुराई मन को भाई ।
सृष्टि स्थिति लय की ठानी, सत रज तम की प्रभुताई ।
तीन गुणों को एक किया और, अ, उ, म, ओम्कार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥2 ॥
यह ब्रह्मांड की सूक्ष्म है रचना, सूक्ष्म से आप स्थूल बना ।
कारण बीज से अँखुआ फूटा, फल पत्ता और फूल बना ।
द्वन्द भाव के घट आते ही, अनुकूल और प्रतिकूल बना ।
सुख वासना की छाया फूटी, रोग सोग दुख सूल बना ।
तीन त्रिलोकी हमने रचाई, सो निज सिर का भार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥3 ॥
जब सर्वज्ञ तो ब्रह्म बने, और त्रिलोकी में व्याप रहे ।
जब अल्पज्ञ तो जीव हैं, अन्तःकरण में पुण्य और पाप रहे ।
काल करम बस योनी भटके, कहीं माता कहीं बाप रहे ।
लोक परलोक के द्वन्द जगत को, निज माया से माप रहे ।
एक अवस्था निरमल सुन्दर, और दो से विभिचार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥4 ॥
आने आप में भूले भटके, अपने आप में भरमाने ।
अपने आपकी सुध नहीं पाई, पक्ष के उलझन उलझाने ।
राधास्वामी सतगुरु आये, आँख खुली तब पहचाने ।
कर सतसंग सार रस पाया, अपने आपको तब जाने ।
मेरा तेरा पना छूट गया, परमारथ का सार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥5 ॥
तत्वमसी जो मुंह से निकला, वाच लक्ष जंजार बना ।
मनन किया मन बना चित्त से, चिंतन का सत्कार बना ।
बुद्धि निश्चयात्मक आई, जब ही विवेक विचार बना ।
पुरुष हुये तब बनी प्रकृति, कुल कुटुम्ब परिवार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥1 ॥
अपने आप में आप समाने, हिरण्य गर्भ की गति पाई ।
अन्तर्यामी बने जो अपने, अन्तर में ली अंगड़ाई ।
खोली आँख विराट कहाये, ठकुराई मन को भाई ।
सृष्टि स्थिति लय की ठानी, सत रज तम की प्रभुताई ।
तीन गुणों को एक किया और, अ, उ, म, ओम्कार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥2 ॥
यह ब्रह्मांड की सूक्ष्म है रचना, सूक्ष्म से आप स्थूल बना ।
कारण बीज से अँखुआ फूटा, फल पत्ता और फूल बना ।
द्वन्द भाव के घट आते ही, अनुकूल और प्रतिकूल बना ।
सुख वासना की छाया फूटी, रोग सोग दुख सूल बना ।
तीन त्रिलोकी हमने रचाई, सो निज सिर का भार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥3 ॥
जब सर्वज्ञ तो ब्रह्म बने, और त्रिलोकी में व्याप रहे ।
जब अल्पज्ञ तो जीव हैं, अन्तःकरण में पुण्य और पाप रहे ।
काल करम बस योनी भटके, कहीं माता कहीं बाप रहे ।
लोक परलोक के द्वन्द जगत को, निज माया से माप रहे ।
एक अवस्था निरमल सुन्दर, और दो से विभिचार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥4 ॥
आने आप में भूले भटके, अपने आप में भरमाने ।
अपने आपकी सुध नहीं पाई, पक्ष के उलझन उलझाने ।
राधास्वामी सतगुरु आये, आँख खुली तब पहचाने ।
कर सतसंग सार रस पाया, अपने आपको तब जाने ।
मेरा तेरा पना छूट गया, परमारथ का सार बना ।
मेरे तेरे पने की इच्छा, जब प्रगटी संसार बना ॥5 ॥
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Song 6 — Hindi
207. भव सागर में भाटा आया, लहर का हेरा फेरा है ।
बह बह गया जो धार की राह में, डाला अपना डेरा है ।
मन चंचल मूरख अज्ञानी, चेत ले अभी सवेरा है ।
मोह भरम अज्ञान अविद्या, ने क्यो तुझको घेरा है ।
कंकर चुन चुन कर महल बनाया, कहता है घर मेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥1 ॥
किस विरते पर तत्ता पानी, कुप्पे जैसा फूल गया ।
अपना रूप स्वरूप भुलाया, अपने आपको भूल गया ।
देख ले अगमा पाई जग से, कारण सूक्ष्म स्थूल गया ।
एक रहा नहीं नाम लेने को, अनुकूल प्रतिकूल गया ।
काल चक्र के घेरे में, प्रकाश है कहीं अँधेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥2 ॥
रामचन्द्र जी जैसे राजा, गये गई सीता रानी ।
विश्वामित्र वशिष्ठ गये, गौतम कनाड से विज्ञानी ।
जपी तपी नियमी और धरमी, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी ।
काल ने सबको ग्रास लिया, फिर तू क्यों हुआ है अभिमानी ।
तू कब आप किसी का होगा, कोई जब नही तेरा है ।
‘ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥3 ॥
देह का यह परिणाम देख ले, किसी को आग में दिया जला ।
किसी को कीड़ों मकोड़ों ने खाया, जब मिट्टी में गाड़ दिया ।
खुली जगह जंगल में कौव्वों, चील गिद्ध ने नोच लिया ।
पानी ने भी उसे न छोड़ा, छिन में लोन समान गला ।
चेत चेत ले चेत चेत ले, चेत चेत का बेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥4 ॥
राधास्वामी की संगत में, अपना जनम बना ले तू ।
त्याग भरम का रस्ता सच्चे, ज्ञान का रस्ता पाले तू ।
शब्द योग अभ्यास के साधन, से कुछ भक्ति कमाले तू ।
छोड़ काल माया का घर, सत धाम में सुरत बसा ले तू ।
भव सागर तरने का सन्तों, ने बांधा यह बेड़ा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥5 ॥
बह बह गया जो धार की राह में, डाला अपना डेरा है ।
मन चंचल मूरख अज्ञानी, चेत ले अभी सवेरा है ।
मोह भरम अज्ञान अविद्या, ने क्यो तुझको घेरा है ।
कंकर चुन चुन कर महल बनाया, कहता है घर मेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥1 ॥
किस विरते पर तत्ता पानी, कुप्पे जैसा फूल गया ।
अपना रूप स्वरूप भुलाया, अपने आपको भूल गया ।
देख ले अगमा पाई जग से, कारण सूक्ष्म स्थूल गया ।
एक रहा नहीं नाम लेने को, अनुकूल प्रतिकूल गया ।
काल चक्र के घेरे में, प्रकाश है कहीं अँधेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥2 ॥
रामचन्द्र जी जैसे राजा, गये गई सीता रानी ।
विश्वामित्र वशिष्ठ गये, गौतम कनाड से विज्ञानी ।
जपी तपी नियमी और धरमी, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी ।
काल ने सबको ग्रास लिया, फिर तू क्यों हुआ है अभिमानी ।
तू कब आप किसी का होगा, कोई जब नही तेरा है ।
‘ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥3 ॥
देह का यह परिणाम देख ले, किसी को आग में दिया जला ।
किसी को कीड़ों मकोड़ों ने खाया, जब मिट्टी में गाड़ दिया ।
खुली जगह जंगल में कौव्वों, चील गिद्ध ने नोच लिया ।
पानी ने भी उसे न छोड़ा, छिन में लोन समान गला ।
चेत चेत ले चेत चेत ले, चेत चेत का बेरा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥4 ॥
राधास्वामी की संगत में, अपना जनम बना ले तू ।
त्याग भरम का रस्ता सच्चे, ज्ञान का रस्ता पाले तू ।
शब्द योग अभ्यास के साधन, से कुछ भक्ति कमाले तू ।
छोड़ काल माया का घर, सत धाम में सुरत बसा ले तू ।
भव सागर तरने का सन्तों, ने बांधा यह बेड़ा है ।
ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा है ॥5 ॥
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Song 7 — Hindi
208. अजल से था यह अहद रहूँगा, साथ साथ दूंगा तेरा ।
भूलू गा नहीं कौल यह समझूगा, तू साथी है मेरा ।
आकर तेरी सँभाल करूंगा, दो अलम ने जब घेरा ।
तेरे दिल को बनाऊँगा, अपने रहने का मैं डेरा ।
जा दुनिया में फिक्र न कर, कुछ दिन के लिये दुनिया में जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥1 ॥
आशिक ने यह बात सुनी, माशूक की खुश होकर बोला ।
तेरे हुकम से मैं जाता हूँ, जाने की नहीं कुछ परवा ।
हिजर अज़ाब जान है बेशक, वस्ल है राहत और मजा ।
जब तू मेरा और मैं तेरा, फिक्र का फिर क्यों हो सौदा ।
वह बोला मैं सच कहता हूँ, कुछ नहीं कहता सच के सिवा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥2 ॥
अहर हुआ और कौल हुआ, आशिक ने छोड़ा अशवरी ।
उतर के कुर्सी से वह माँ के, हमल में हुआ करार गजीं ।
पलक सर जो रूह थी हुक्म से, आकर होगई खाक नशीं ।
रिज्क रसां माशूक साथ था, उसी मकां का होके मकी ।
तंग जगह में आशिक सुनता, रहता था बस यही सदा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥3 ॥
माँ के हमल से गिरा खाक पर, लगा लोटने खाक में वह ।
कभी पाक हालत थी उसकी, कभी हालत नापाक में वह ।
गिरा उठा उठकर फिर संभला, खौफ बीम और वाक में यह ।
कभी रोया कभी हँसा कभी, लोटा खस में खाशाक में वह ।
बात बात में बात में दिल में, बात ने उसके की थी जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥4 ॥
बालिग हुआ समझ कुछ पाई, पढ़ लिखकर हुशियार बना ।
औरों की बातों में बहका, बेदीन और दीदार बना ।
मज़हब भिन्लत के झगड़ों में, फंस फंस कर लाचार बना ।
कभी तकवा की उसको सूझी, कभी मयकश मयख्यार बना ।
अक्ल इल्म के धन्दों से वह, कौल करार को भूल गया ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥5 ॥
आखिर अपने को समझा तब, गालि और नाकार बना ।
बहम गुमां में फंसा गले का, वहम तब उसके हार बना ।
शादी की और फिक्र कसब में, बेहुरमत और ख्यार बना ।
गई जवानी आई पीरी, सुस्त हुआ बीमार बना ।
याद न आया कौल, दाम दुनिया में जब बे तरह फंसा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥6 ॥
जौफ नकाहत के हुये हमले, रफता रफता जईफ हुआ ।
तन में उसके आई लागरी, जार निज़ार नहीफ हुआ ।
जिसे लताफत का सौदा था, देखो कैसा कसीफ हुआ ।
हन्स सिफालत और रज़ालत, का महबूस शरीफ हुआ !
यह हुआ ख याल रहा नहीं, अहद का अपने बना भूठा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥7 ॥
यह हालत माशूक ने देखी, दिल में शर्म हया आई ।
मेरे आशिक ने कैसी, कर ली है अपनी रुस्वाई ।
जो मसजूद मलायक था कभी, दुनिया का हुआ शैदाई ।
अशरफअकबर अकमल अफजल, को यह हालत क्यों भाई ।
कुछ नहीं मेरे कौल को भूला, मैंने तो उसको यही कहा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥8 ॥
गैरत आई ओर हमिय्यत’ का, जज़बा जब उमगाया ।
वह असली माशूक यहां, हादी की सूरत में आया ।
राज नियाज़ के परदों में, छुप छुप कर यह नग्मा गाया ।
मेरा था क्यों मुझे भुलाया, मुझे छोड़ कर क्या पाया ।
अब आकर फिर तुझे, सुना देता हूँ वह कदीम नुक्ता ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥९ ॥
तेरे दिल के हुजरे का, हर वक्त मकी मैं रहता हूँ ।
अर्श फर्श पर नहीं न कुर्सा, और जमीं में रहता हूँ ।
हूतुलहूत के परदों में घुस, परदा नशीं में रहता हूँ ।
जहां है तू यह समझ ले अपने, दिल में वहीं मैं रहता हूँ ।
आंख कान जवां बन्द कर, देख अपने अन्दर में आ ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जदा ॥10 ॥
सदा मेरी खामोश नहीं है, अब भी गाफिल सोच जरा ।
आंख कान और जवां बंद कर, सुनले उलफत का नग्मा ।
सोते सरमदी सोते नसीरा”, सोतुल सोत 12 की शक्ल निदा ।
गूंज रही है तेरे अन्दर, गफलत का दे उठा परदा ।
वही कौल मेरा है प्यारे, अहः का मुझे समझ पक्का ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥11 ॥
आशिक ने यह सदा सुनी, होश आया नींद से जाग गया ।
बाहर की दुनिया से हटकर, वह बातिन में भाग गया ।
सुलतानुल अजकार कौल था, उसकी धुन में लाग गया ।
इस्म आजम पाया दुनिया का, और दीन और राग गया ।
नासूत और मलकूत के ऊपर, चढ़ जबरुत में आप सुना ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥12 ॥
लाहूती तबके में आया, की जुलमात की मंजिल ते ।
आब हयात’ पिया तब कर दिया, अरजियात दुनिया को के ।
गनी हुआ दिल सैर हुआ, इस्तगना फना नहीं कुछ शै ।
आशिक और माशूक मिले हैं, एक जान दो कालिब है ।
राधास्वामी आये अनहद, बानी का फैला चरचा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥13 ॥
अर्थ (1) दुर्गति (2) देवता (3) देवता (4)(प्रेमी) (5) लज्जा (6) गुरु (7)
कोठरी 8) आकाश (९) आठवाँ आकाश (10) (11) (12) अन्तरी शब्द ।
भूलू गा नहीं कौल यह समझूगा, तू साथी है मेरा ।
आकर तेरी सँभाल करूंगा, दो अलम ने जब घेरा ।
तेरे दिल को बनाऊँगा, अपने रहने का मैं डेरा ।
जा दुनिया में फिक्र न कर, कुछ दिन के लिये दुनिया में जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥1 ॥
आशिक ने यह बात सुनी, माशूक की खुश होकर बोला ।
तेरे हुकम से मैं जाता हूँ, जाने की नहीं कुछ परवा ।
हिजर अज़ाब जान है बेशक, वस्ल है राहत और मजा ।
जब तू मेरा और मैं तेरा, फिक्र का फिर क्यों हो सौदा ।
वह बोला मैं सच कहता हूँ, कुछ नहीं कहता सच के सिवा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥2 ॥
अहर हुआ और कौल हुआ, आशिक ने छोड़ा अशवरी ।
उतर के कुर्सी से वह माँ के, हमल में हुआ करार गजीं ।
पलक सर जो रूह थी हुक्म से, आकर होगई खाक नशीं ।
रिज्क रसां माशूक साथ था, उसी मकां का होके मकी ।
तंग जगह में आशिक सुनता, रहता था बस यही सदा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥3 ॥
माँ के हमल से गिरा खाक पर, लगा लोटने खाक में वह ।
कभी पाक हालत थी उसकी, कभी हालत नापाक में वह ।
गिरा उठा उठकर फिर संभला, खौफ बीम और वाक में यह ।
कभी रोया कभी हँसा कभी, लोटा खस में खाशाक में वह ।
बात बात में बात में दिल में, बात ने उसके की थी जा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥4 ॥
बालिग हुआ समझ कुछ पाई, पढ़ लिखकर हुशियार बना ।
औरों की बातों में बहका, बेदीन और दीदार बना ।
मज़हब भिन्लत के झगड़ों में, फंस फंस कर लाचार बना ।
कभी तकवा की उसको सूझी, कभी मयकश मयख्यार बना ।
अक्ल इल्म के धन्दों से वह, कौल करार को भूल गया ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥5 ॥
आखिर अपने को समझा तब, गालि और नाकार बना ।
बहम गुमां में फंसा गले का, वहम तब उसके हार बना ।
शादी की और फिक्र कसब में, बेहुरमत और ख्यार बना ।
गई जवानी आई पीरी, सुस्त हुआ बीमार बना ।
याद न आया कौल, दाम दुनिया में जब बे तरह फंसा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥6 ॥
जौफ नकाहत के हुये हमले, रफता रफता जईफ हुआ ।
तन में उसके आई लागरी, जार निज़ार नहीफ हुआ ।
जिसे लताफत का सौदा था, देखो कैसा कसीफ हुआ ।
हन्स सिफालत और रज़ालत, का महबूस शरीफ हुआ !
यह हुआ ख याल रहा नहीं, अहद का अपने बना भूठा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥7 ॥
यह हालत माशूक ने देखी, दिल में शर्म हया आई ।
मेरे आशिक ने कैसी, कर ली है अपनी रुस्वाई ।
जो मसजूद मलायक था कभी, दुनिया का हुआ शैदाई ।
अशरफअकबर अकमल अफजल, को यह हालत क्यों भाई ।
कुछ नहीं मेरे कौल को भूला, मैंने तो उसको यही कहा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥8 ॥
गैरत आई ओर हमिय्यत’ का, जज़बा जब उमगाया ।
वह असली माशूक यहां, हादी की सूरत में आया ।
राज नियाज़ के परदों में, छुप छुप कर यह नग्मा गाया ।
मेरा था क्यों मुझे भुलाया, मुझे छोड़ कर क्या पाया ।
अब आकर फिर तुझे, सुना देता हूँ वह कदीम नुक्ता ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥९ ॥
तेरे दिल के हुजरे का, हर वक्त मकी मैं रहता हूँ ।
अर्श फर्श पर नहीं न कुर्सा, और जमीं में रहता हूँ ।
हूतुलहूत के परदों में घुस, परदा नशीं में रहता हूँ ।
जहां है तू यह समझ ले अपने, दिल में वहीं मैं रहता हूँ ।
आंख कान जवां बन्द कर, देख अपने अन्दर में आ ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जदा ॥10 ॥
सदा मेरी खामोश नहीं है, अब भी गाफिल सोच जरा ।
आंख कान और जवां बंद कर, सुनले उलफत का नग्मा ।
सोते सरमदी सोते नसीरा”, सोतुल सोत 12 की शक्ल निदा ।
गूंज रही है तेरे अन्दर, गफलत का दे उठा परदा ।
वही कौल मेरा है प्यारे, अहः का मुझे समझ पक्का ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥11 ॥
आशिक ने यह सदा सुनी, होश आया नींद से जाग गया ।
बाहर की दुनिया से हटकर, वह बातिन में भाग गया ।
सुलतानुल अजकार कौल था, उसकी धुन में लाग गया ।
इस्म आजम पाया दुनिया का, और दीन और राग गया ।
नासूत और मलकूत के ऊपर, चढ़ जबरुत में आप सुना ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥12 ॥
लाहूती तबके में आया, की जुलमात की मंजिल ते ।
आब हयात’ पिया तब कर दिया, अरजियात दुनिया को के ।
गनी हुआ दिल सैर हुआ, इस्तगना फना नहीं कुछ शै ।
आशिक और माशूक मिले हैं, एक जान दो कालिब है ।
राधास्वामी आये अनहद, बानी का फैला चरचा ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ, तुझ से कभी न हूँगा जुदा ॥13 ॥
अर्थ (1) दुर्गति (2) देवता (3) देवता (4)(प्रेमी) (5) लज्जा (6) गुरु (7)
कोठरी 8) आकाश (९) आठवाँ आकाश (10) (11) (12) अन्तरी शब्द ।
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Song 8 — Hindi
209. दिल में शान दिलबरी आई, जब तब वह दिलदार बना ।
दिल देने वाला मैं ठहरा, वह दिलवर हुशियार बना ।
मुझमें ददों गम व अलम थे, वह सच्चा गमवार बना ।
वह तबीव की शक्ल में आया, जिस दम मैं बीमार बना ।
वह मेरा है मैं उसका हूँ, मैं आशिक वह यार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥1 ॥
वह वाहिद वह जमा जरब, तफरीक हुआ तक्सीम हुआ ।
इल्म का ऐन लाम वह मेरे, और आखिर में मीम हुआ ।
मेरी तंग नजरों में वह खुद, दौलत जर और सीम हुआ ।
जब वह मेरा हुआ दूर तब, दिल से खौफ और बीम हुआ ।
बेखौकी से उसके इश्क का, जाम पिया सरशार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिवे दीदार बना ॥2 ॥
यह है कौन कौन हूँ मैं, जहां जात सिफात का धोका है ।
वह कालिब है नजर में सबके, जात पात का धोका है ।
किसी किसी की जबां पर आया, नफी’ असबात का धोका है ।
हम गुमां में पड़े सभी हैं, बात बात का धोका है ।
वहदत में कसरत जब आई, पांच सात दो चार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिये दीदार बना ॥3 ॥
मैं जुज वह कुल जरी मैं, वह आफताब की है सूरत ।
मुझे बर्गे गुल समझो तुम, और वह गुलाब की है सूरत ।
दरिया जात अनीम है उसकी, मेरी हुबाब की है सूरत ।
मैं मजद लफज की सूरत, यह किताब की है सूरत ।
करम की नजर से देखा, उसके गले का तब मैं हार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥4 ॥
आशिक है दिल का जेवर, माशूक उसी का सौदा है ।
इश्क के सिवा गरज नहीं उसको, वह माशूक पे शैदा है ।
इश्क की धुन में पक्का होकर, गली गली वह रुस्वा है ।
आसां नहीं इश्क समझ लो, जीते जी मर मिटना है ।
माशूक आया गले लगाया, आशिक जिस दम बार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥
(1) अमृत (2) बेपरवाही (3) लय ।
दिल देने वाला मैं ठहरा, वह दिलवर हुशियार बना ।
मुझमें ददों गम व अलम थे, वह सच्चा गमवार बना ।
वह तबीव की शक्ल में आया, जिस दम मैं बीमार बना ।
वह मेरा है मैं उसका हूँ, मैं आशिक वह यार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥1 ॥
वह वाहिद वह जमा जरब, तफरीक हुआ तक्सीम हुआ ।
इल्म का ऐन लाम वह मेरे, और आखिर में मीम हुआ ।
मेरी तंग नजरों में वह खुद, दौलत जर और सीम हुआ ।
जब वह मेरा हुआ दूर तब, दिल से खौफ और बीम हुआ ।
बेखौकी से उसके इश्क का, जाम पिया सरशार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिवे दीदार बना ॥2 ॥
यह है कौन कौन हूँ मैं, जहां जात सिफात का धोका है ।
वह कालिब है नजर में सबके, जात पात का धोका है ।
किसी किसी की जबां पर आया, नफी’ असबात का धोका है ।
हम गुमां में पड़े सभी हैं, बात बात का धोका है ।
वहदत में कसरत जब आई, पांच सात दो चार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिये दीदार बना ॥3 ॥
मैं जुज वह कुल जरी मैं, वह आफताब की है सूरत ।
मुझे बर्गे गुल समझो तुम, और वह गुलाब की है सूरत ।
दरिया जात अनीम है उसकी, मेरी हुबाब की है सूरत ।
मैं मजद लफज की सूरत, यह किताब की है सूरत ।
करम की नजर से देखा, उसके गले का तब मैं हार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥4 ॥
आशिक है दिल का जेवर, माशूक उसी का सौदा है ।
इश्क के सिवा गरज नहीं उसको, वह माशूक पे शैदा है ।
इश्क की धुन में पक्का होकर, गली गली वह रुस्वा है ।
आसां नहीं इश्क समझ लो, जीते जी मर मिटना है ।
माशूक आया गले लगाया, आशिक जिस दम बार बना ।
आकर मुझे दिखाई सूरत, मैं तालिबे दीदार बना ॥
(1) अमृत (2) बेपरवाही (3) लय ।
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Song 9 — Hindi
210. किसी को राज की इज्जत बख्शी, उसने किसी को पाट दिया ।
किसी को लाकर बिठाया तख्त पर, किसी को टूटी खाट दिया ।
बाढ़ जो माँगा बाढ़ दिया, और घाट जो माँगा घाट दिया ।
हाट वाल को हाट दिया, और बाट वाले को बाट दिया ।
जिसने दुनिया दबाना चाहा, धर कर उसको डाट दिया ।
मस्तों को वेफिकरी, बेखौफी मस्ती का ठाठ दिया ॥1 ॥
जर परस्त का खुदा है जर,जर परस्त को जर ओर सीम’ दिया ।
बुज दिल डरने वाले दिल को, खौफ दिया और बीम दिया ।
इल्म के जो शायक थे उनको, ऐन लाम और मीम’ दिया ।
ताज पसंद को ते और अलिफ के, साथ मिलाकर जीम दिया ।
रजवाड़े को राजपूत, और जटवाड़े को जाट दिया ।
मस्तों को बेफिकरी बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥2 ॥
मोहताजों को मोहताजी दी, गनी’ को इस्तगना’ बख्शी ।
दोजख बद आमालों को, नेकों को खुल्द में जा बख्शी ।
मछली को पानी में मसकिन, परदारों को हवा बख्शी ।
नूर पसंद तवे को नूर, तजल्ली और जिया’ बख्शी ।
ज्वाला मुखी पहाड़ को जगमग, ज्वाला मुखी का लाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥3 ॥
पस्त दिली और पस्त हिम्मती, बालों को उसने दी पस्ती ।
जंगल मिला है जंगली को, बस्ती वालों को मिली बस्ती ।
कतराये जो कीमत देने से, हाथ में ली अशिया सस्ती ।
बे परवाह सेर दिल आली, हिम्मत को दे दी मस्ती ।
जो खरीदने जैसा सौदा आया, उसको वैसा हाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥4 ॥
शरवत और शौकत वालों को, जाह जलाल मुबारक हो ।
मुल्क माल की गरज है जिनको, मुल्क और माल मुबारक हो ।
कोल काल’ आलिम को, और सूफी को हाल मुबारक हो ।
आशिक खस्ता दिल को इश्क का, दर्द मलाल मुबारक हो ।
जो कुछ जिन्होंने माँगा, उनमें उसी चीज को बांट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥5 ॥
जो जैसा था जैसी की ख्वाहिश, वैसी हालत पाई ।
इसमें नहीं कुसूर किसी का, दिल में गौर करो भाई ।
जैसा अपना जरफ बनाया, जरफ में जैसी गहराई ।
फिर भी नहीं कनाअत’ की, हरगिज तुममें आदत आई ।
धार छुरी छुरे को जब दी, तेग दुदम को काट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥6 ॥
शाकिर नहीं अपनी किस्मत पर, रंज न करो न फिक्र करो ।
सोहबत में मुरशद के जाकर, रंग ढंग उसका सीखो ।
बातें कहता रहता है वह, गोस होश’ से रोज सुनो ।
फिर अमली जिंदगी बनाकर, जल्द असलियत पर आजाओ ।
हवस रहेगी नहीं उलट जब, हिर्स हवस का टाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥7 ॥
अर्थ (1) चाँदी (2) इल्म (3) बे परव ह (4) बे परवारी (5) प्रकाश (6)
माल (7) पद () कहना सुनना । (1) नेति (2) ऐति ।
किसी को लाकर बिठाया तख्त पर, किसी को टूटी खाट दिया ।
बाढ़ जो माँगा बाढ़ दिया, और घाट जो माँगा घाट दिया ।
हाट वाल को हाट दिया, और बाट वाले को बाट दिया ।
जिसने दुनिया दबाना चाहा, धर कर उसको डाट दिया ।
मस्तों को वेफिकरी, बेखौफी मस्ती का ठाठ दिया ॥1 ॥
जर परस्त का खुदा है जर,जर परस्त को जर ओर सीम’ दिया ।
बुज दिल डरने वाले दिल को, खौफ दिया और बीम दिया ।
इल्म के जो शायक थे उनको, ऐन लाम और मीम’ दिया ।
ताज पसंद को ते और अलिफ के, साथ मिलाकर जीम दिया ।
रजवाड़े को राजपूत, और जटवाड़े को जाट दिया ।
मस्तों को बेफिकरी बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥2 ॥
मोहताजों को मोहताजी दी, गनी’ को इस्तगना’ बख्शी ।
दोजख बद आमालों को, नेकों को खुल्द में जा बख्शी ।
मछली को पानी में मसकिन, परदारों को हवा बख्शी ।
नूर पसंद तवे को नूर, तजल्ली और जिया’ बख्शी ।
ज्वाला मुखी पहाड़ को जगमग, ज्वाला मुखी का लाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥3 ॥
पस्त दिली और पस्त हिम्मती, बालों को उसने दी पस्ती ।
जंगल मिला है जंगली को, बस्ती वालों को मिली बस्ती ।
कतराये जो कीमत देने से, हाथ में ली अशिया सस्ती ।
बे परवाह सेर दिल आली, हिम्मत को दे दी मस्ती ।
जो खरीदने जैसा सौदा आया, उसको वैसा हाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥4 ॥
शरवत और शौकत वालों को, जाह जलाल मुबारक हो ।
मुल्क माल की गरज है जिनको, मुल्क और माल मुबारक हो ।
कोल काल’ आलिम को, और सूफी को हाल मुबारक हो ।
आशिक खस्ता दिल को इश्क का, दर्द मलाल मुबारक हो ।
जो कुछ जिन्होंने माँगा, उनमें उसी चीज को बांट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥5 ॥
जो जैसा था जैसी की ख्वाहिश, वैसी हालत पाई ।
इसमें नहीं कुसूर किसी का, दिल में गौर करो भाई ।
जैसा अपना जरफ बनाया, जरफ में जैसी गहराई ।
फिर भी नहीं कनाअत’ की, हरगिज तुममें आदत आई ।
धार छुरी छुरे को जब दी, तेग दुदम को काट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥6 ॥
शाकिर नहीं अपनी किस्मत पर, रंज न करो न फिक्र करो ।
सोहबत में मुरशद के जाकर, रंग ढंग उसका सीखो ।
बातें कहता रहता है वह, गोस होश’ से रोज सुनो ।
फिर अमली जिंदगी बनाकर, जल्द असलियत पर आजाओ ।
हवस रहेगी नहीं उलट जब, हिर्स हवस का टाट दिया ।
मस्तों को बेफिक्री बेखौफी, मस्ती का ठाठ दिया ॥7 ॥
अर्थ (1) चाँदी (2) इल्म (3) बे परव ह (4) बे परवारी (5) प्रकाश (6)
माल (7) पद () कहना सुनना । (1) नेति (2) ऐति ।
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Song 10 — Hindi
211. अदम’ से निकले तलाशे दिलवर, मैं मैदां जगल देखे ।
कभी नदी और नाले देखे, कहीं गहरे दलदल देखे ।
रेगिस्तान के टीले वीराने, सब घर से निकल देखे ।
चीते शेर के करतब देखे, गीदड़ के छल बल देखे ।
कफे अफसोस दद हसरत से, किसी वक्त मल मल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥1 ॥
जुदा हुऐ दिलदार से जब, यह हालत नहीं पसंद आई ।
हिज्र में सोजो गुदाज़ की सूझी, हुए उसी के शैदाई ।
हाजिर में वह हुजूर में था, गायब में है सौदाई ।
हाजिर गायब में यकसा है, इसकी समझ किसे आई ।
काबा’ में ढंढा जाकर, मंदिर और देवल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥3 ॥
अपने सिर में तलाश का सौदा, समाया होगये मुतलाशी ।
कभी मदीना मक्का पहुँचे, कभी पहुँचे मथुरा काशी ।
कभी नमाज की उठक बैठक, कभी था सिजड़ा फर्राशी ।
बैतुल्हम हम कभी गये, और कभी सुमेरु कभी कैलाशी ।
हास थी आज भी देखें उसको, हमने जिसको कल देखा ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखा ॥3 ॥
हाथ में ली तस्बीह सुमरनी, निर्दजवा था नाम उसका ।
लगा लबों से मिल के हमेशा, था तलाश का जाम उसका ।
दिल में तलब की तड़प उठी,जब याद किया तब काम उसका ।
शेख से पंडित से यूला कहिये, हमें बतादो नाम उसका ।
जाहिर बातिन बरजक के नजारे सब पल पल देखें ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखें ॥4 ॥
मिला नहीं लेकिन मायूसी से, हम नहीं हरगिज घबराये ।
कसरत के ते किये मनाजिल, तबकएवहदत में आये ।
कसरत वह त के मुकाम, और मसकिन सब खाली पाये ।
महरमेराज कहाँ था कोई, भेद जो उसका बतलाये !
पानी में ठिठरे और गले, आग तक में भी जल देखे
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगन देखे ॥5 ॥
वेद पढ़े कुरएन पड़े, पढ़ पढ़ का उनको रट डाला ।
आजिज हुए पड़ा है कैसे, कैसे मूजियों से पाला ।
तेग तअस्सुन की कहीं चमकी, पक्षपात का कहीं भाला ।
नूर सदाकत’ कहीं न पाया, समझा दाल में है काला ।
चिल्ला खींच समाध लगाई, गार गुफा में चल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥6 ॥
इस तलाश से काम न निकला, तब आखिर में पछताये ।
सोहबत में मुरशिद के पहुँचे, दिल में अपने घबराये ।
उसने दिल की किताब पढ़ाई, दिल के राज कुछ समझाये ।
दिल में दिलवर मिला तो, खुश होकर दिलदार के पास आये ।
फिर नहीं देखी तीखी नजर,अवरूप न किसी के न बल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥7 ॥
अर्थ (1) काबा के भीतरी भाग (2) निरंतर () मृत्यु से प्रलय तक (4 }
अद्वैत (5) द्वैत (6) भेद ज्ञातए । अर्थ(1) संतोष (2) चेतन के काम से (3) नेस्ती (4) हथेली (5) बियोग (6) तड़प ।
बिनती
कभी नदी और नाले देखे, कहीं गहरे दलदल देखे ।
रेगिस्तान के टीले वीराने, सब घर से निकल देखे ।
चीते शेर के करतब देखे, गीदड़ के छल बल देखे ।
कफे अफसोस दद हसरत से, किसी वक्त मल मल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥1 ॥
जुदा हुऐ दिलदार से जब, यह हालत नहीं पसंद आई ।
हिज्र में सोजो गुदाज़ की सूझी, हुए उसी के शैदाई ।
हाजिर में वह हुजूर में था, गायब में है सौदाई ।
हाजिर गायब में यकसा है, इसकी समझ किसे आई ।
काबा’ में ढंढा जाकर, मंदिर और देवल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥3 ॥
अपने सिर में तलाश का सौदा, समाया होगये मुतलाशी ।
कभी मदीना मक्का पहुँचे, कभी पहुँचे मथुरा काशी ।
कभी नमाज की उठक बैठक, कभी था सिजड़ा फर्राशी ।
बैतुल्हम हम कभी गये, और कभी सुमेरु कभी कैलाशी ।
हास थी आज भी देखें उसको, हमने जिसको कल देखा ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखा ॥3 ॥
हाथ में ली तस्बीह सुमरनी, निर्दजवा था नाम उसका ।
लगा लबों से मिल के हमेशा, था तलाश का जाम उसका ।
दिल में तलब की तड़प उठी,जब याद किया तब काम उसका ।
शेख से पंडित से यूला कहिये, हमें बतादो नाम उसका ।
जाहिर बातिन बरजक के नजारे सब पल पल देखें ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखें ॥4 ॥
मिला नहीं लेकिन मायूसी से, हम नहीं हरगिज घबराये ।
कसरत के ते किये मनाजिल, तबकएवहदत में आये ।
कसरत वह त के मुकाम, और मसकिन सब खाली पाये ।
महरमेराज कहाँ था कोई, भेद जो उसका बतलाये !
पानी में ठिठरे और गले, आग तक में भी जल देखे
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगन देखे ॥5 ॥
वेद पढ़े कुरएन पड़े, पढ़ पढ़ का उनको रट डाला ।
आजिज हुए पड़ा है कैसे, कैसे मूजियों से पाला ।
तेग तअस्सुन की कहीं चमकी, पक्षपात का कहीं भाला ।
नूर सदाकत’ कहीं न पाया, समझा दाल में है काला ।
चिल्ला खींच समाध लगाई, गार गुफा में चल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥6 ॥
इस तलाश से काम न निकला, तब आखिर में पछताये ।
सोहबत में मुरशिद के पहुँचे, दिल में अपने घबराये ।
उसने दिल की किताब पढ़ाई, दिल के राज कुछ समझाये ।
दिल में दिलवर मिला तो, खुश होकर दिलदार के पास आये ।
फिर नहीं देखी तीखी नजर,अवरूप न किसी के न बल देखे ।
आखिर ऐसा जमाना आया, जंगल में मंगल देखे ॥7 ॥
अर्थ (1) काबा के भीतरी भाग (2) निरंतर () मृत्यु से प्रलय तक (4 }
अद्वैत (5) द्वैत (6) भेद ज्ञातए । अर्थ(1) संतोष (2) चेतन के काम से (3) नेस्ती (4) हथेली (5) बियोग (6) तड़प ।
बिनती
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Song 11 — Hindi
(212 कुल संख्या 1116)
तुम्ही पिता और तुम्ही हो माता,
तुम्ही हो बहन और तुम्ही हो भ्राता ।
तुम्हीं हो धन धाम और सुख के दाता,
तुम्ही हो परम पुरुष सतगुरु विधाता ॥
नहीं ज्ञान विद्या नहीं भक्ति करमा,
नहीं योग युक्ति नहीं ध्यान घरमा ।
तुम्हीं मेरे हो जंत्र मंत्र और मरमा,
तुम्हारे ही संग से गये मन के भरमा ।
झुकाया कमल पद में निज सिर को जाना,
मिली अब शरन पागया हूँ ठिकाना ।
अर्थ – (1) सच्चाई ।
मिटा है सकल काम मद मोह माना,
छुटा है सहज जगत का आना जाना । ।
बचन को सुने रूप अपना पिछाना,
नहीं हो अलग मुझसे तुम मैंने जाना ।
तुम्हारे ही गुन का है दिन रात गाना,
तुम्हारा ही है चित्र मन में समाना । ।
तुम्हीं हो योग और तुम आप युक्ति,
तुम्ही में है सद्गति तुम्ही में हैं मुक्ति ।
मेरे तुम हो पुरुषार्थ बल और शक्ति,
सताते नहीं अब मुझे बन्ध मुक्ति । ।
नमो हां नमो राधास्वामी प्यारे,
हुये हो तुम अब मेरे आँखों के तारे ।
रहूँ मैं सहा आप ही के सहारे,
फिस जगत में सारे दुख सुख बिसारे ।
तुम्ही पिता और तुम्ही हो माता,
तुम्ही हो बहन और तुम्ही हो भ्राता ।
तुम्हीं हो धन धाम और सुख के दाता,
तुम्ही हो परम पुरुष सतगुरु विधाता ॥
नहीं ज्ञान विद्या नहीं भक्ति करमा,
नहीं योग युक्ति नहीं ध्यान घरमा ।
तुम्हीं मेरे हो जंत्र मंत्र और मरमा,
तुम्हारे ही संग से गये मन के भरमा ।
झुकाया कमल पद में निज सिर को जाना,
मिली अब शरन पागया हूँ ठिकाना ।
अर्थ – (1) सच्चाई ।
मिटा है सकल काम मद मोह माना,
छुटा है सहज जगत का आना जाना । ।
बचन को सुने रूप अपना पिछाना,
नहीं हो अलग मुझसे तुम मैंने जाना ।
तुम्हारे ही गुन का है दिन रात गाना,
तुम्हारा ही है चित्र मन में समाना । ।
तुम्हीं हो योग और तुम आप युक्ति,
तुम्ही में है सद्गति तुम्ही में हैं मुक्ति ।
मेरे तुम हो पुरुषार्थ बल और शक्ति,
सताते नहीं अब मुझे बन्ध मुक्ति । ।
नमो हां नमो राधास्वामी प्यारे,
हुये हो तुम अब मेरे आँखों के तारे ।
रहूँ मैं सहा आप ही के सहारे,
फिस जगत में सारे दुख सुख बिसारे ।
तेईसवी धुन
प्रार्थना
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Song 12 — Hindi
213. धन्य धन्य दयाल सतगुरु, दीन हितकारी महा ।
चरन कमल की ओट गहकर, भक्त परमानंद लहा । ।
आप प्रगटे इस जगत में, जीव के उपकार को ।
निज दया से नाम देकर, किया जीव सुधार को ।
कर्म धर्म और भरम और, अज्ञान दुख के मूल थे ।
यह हैं कांटे कष्ट के और, जीव समझे फूल थे ।
शब्दयोग की आप ही ने, आप दी शिक्षा हमें ।
सुगम रीति से मिलगई, भव तरन की दीक्षा हमें ।
राधास्वामी सतगुरु, करुना सदन दे नाम दान ।
सहज में हमको उबारो, बख्शो अपना सत्यज्ञान । ।
ॐ बसन्त
चरन कमल की ओट गहकर, भक्त परमानंद लहा । ।
आप प्रगटे इस जगत में, जीव के उपकार को ।
निज दया से नाम देकर, किया जीव सुधार को ।
कर्म धर्म और भरम और, अज्ञान दुख के मूल थे ।
यह हैं कांटे कष्ट के और, जीव समझे फूल थे ।
शब्दयोग की आप ही ने, आप दी शिक्षा हमें ।
सुगम रीति से मिलगई, भव तरन की दीक्षा हमें ।
राधास्वामी सतगुरु, करुना सदन दे नाम दान ।
सहज में हमको उबारो, बख्शो अपना सत्यज्ञान । ।
ॐ बसन्त
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Song 13 — Hindi
214. देखो सखी आई ऋतु बसंत ।
बसो गुरु के पास करो दुख का अन्त । ।
प्रेम कमल विगसे अनन्त ।
कोई टूढो चलकर साधु सन्त ।
बस बस के चसो बसन्त बास ।
दुर्गन्धि जगत की जाये नास । ।
नहीं मन में उपजे क्रोध काम !
रहे होठों पर राधास्वामी नाम ।
सतसंग दुकान का गंधी खोज ।
करो चरन बास गह पद सरोज । ।
नर जनम बसन्त है माघ मास ।
चहुँ ओर प्रेम की फूटी बास । ।
सीखो भक्ति भाव का रंग ढंग ।
करो माया काल को दंग तंग ॥
चौरासी फांस का बंध काट ।
लो साज भक्ति दल साज ठाठ ॥
सतसंग की महिमा अपार ।
बिन संग जाय न भरम विकार ॥
बसो सन्त पास सोई बसन्त ।
लो शब्द योग का सीख मन्त्र ॥
घट अन्तर जो अपने बसन्त ।
वह समझे क्या है ऋतु बसंत ।
बस बस कर प्रेम बास पास ।
बसो तब बसंत की पूरी आस ।
बिन संत चरन के निकट बास ।
नहीं परमारथ की बुझे प्यास ॥
चुनो फूल कमल के गुथ के हार ।
दो प्रेम साथ गले गुरु के डार । ।
मिल छिड़को बसंत बसंती रंग ।
तब भीजे तुम्हारा अंग अंग ॥
जो यह बसंत समझाया गाय ।
कोई प्रेमी बसंत का ममें पाय । ।
बसे बास पास जो खोज सन्त ।
बस उसी के लिये है ऋतु बसंत। ।
राधास्वामी ने भेद बताया सार ।
नहीं बूझे हिये का जो गवार ।
बसो गुरु के पास करो दुख का अन्त । ।
प्रेम कमल विगसे अनन्त ।
कोई टूढो चलकर साधु सन्त ।
बस बस के चसो बसन्त बास ।
दुर्गन्धि जगत की जाये नास । ।
नहीं मन में उपजे क्रोध काम !
रहे होठों पर राधास्वामी नाम ।
सतसंग दुकान का गंधी खोज ।
करो चरन बास गह पद सरोज । ।
नर जनम बसन्त है माघ मास ।
चहुँ ओर प्रेम की फूटी बास । ।
सीखो भक्ति भाव का रंग ढंग ।
करो माया काल को दंग तंग ॥
चौरासी फांस का बंध काट ।
लो साज भक्ति दल साज ठाठ ॥
सतसंग की महिमा अपार ।
बिन संग जाय न भरम विकार ॥
बसो सन्त पास सोई बसन्त ।
लो शब्द योग का सीख मन्त्र ॥
घट अन्तर जो अपने बसन्त ।
वह समझे क्या है ऋतु बसंत ।
बस बस कर प्रेम बास पास ।
बसो तब बसंत की पूरी आस ।
बिन संत चरन के निकट बास ।
नहीं परमारथ की बुझे प्यास ॥
चुनो फूल कमल के गुथ के हार ।
दो प्रेम साथ गले गुरु के डार । ।
मिल छिड़को बसंत बसंती रंग ।
तब भीजे तुम्हारा अंग अंग ॥
जो यह बसंत समझाया गाय ।
कोई प्रेमी बसंत का ममें पाय । ।
बसे बास पास जो खोज सन्त ।
बस उसी के लिये है ऋतु बसंत। ।
राधास्वामी ने भेद बताया सार ।
नहीं बूझे हिये का जो गवार ।
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Song 14 — Hindi
215. घट मांहि बसे राधास्वामी संत ।
मैंने समझा मूल बसंत का तन्त ॥
जब लग घट निकट न बसे कंत ।
तब न बसन्त का सूझे मन्त ।
बिन बसन्त सब जीव जन्त ।
चौरासी लक्ष रहे भरमन्त । ।
जब मन में बसे कोई आके सन्त ।
सब दुख कलेश का होय अन्त ।
गुरु पास में बसना है बसन्त ।
भक्ति बास में बसना है बसन्त ।
नहीं कोई बसन्त का अर्थ और ।
जो समझे पावे ठिकाना ठौर ॥
राधास्वामी मर्म लखाया आन ।
बसे सन्त शरन में कोई सुजान । ।
मैंने समझा मूल बसंत का तन्त ॥
जब लग घट निकट न बसे कंत ।
तब न बसन्त का सूझे मन्त ।
बिन बसन्त सब जीव जन्त ।
चौरासी लक्ष रहे भरमन्त । ।
जब मन में बसे कोई आके सन्त ।
सब दुख कलेश का होय अन्त ।
गुरु पास में बसना है बसन्त ।
भक्ति बास में बसना है बसन्त ।
नहीं कोई बसन्त का अर्थ और ।
जो समझे पावे ठिकाना ठौर ॥
राधास्वामी मर्म लखाया आन ।
बसे सन्त शरन में कोई सुजान । ।
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Song 15 — Hindi
216. गुरु चरन जब लग बसन्त ।
तब लग समझो ऋतु बसन्त । ।
गुरु चरन बास बस बस बसंत ।
यही मेरे लिये सच्चा बसन्त । ।
जब लग नहीं बास निकट सन्त ।
तब लगकोई बुझेन ऋतु बसंत ॥
भक्ति कुसुम की फली बास ।
मैं आय बसा जब गुरु के पास । ।
सरसों फूली मस्ती की आय ।
मैं पड़ा गुरु के चरण धाय । ।
हुआ मोह भरम का आज अन्त ।
मिले ऋतु बसंत राधास्वामी कंत ॥
दिया सुरत शब्द का मूल मन्त ।
हुआ गुरु मन्दिर का मैं महन्त ॥
राधास्वामी धाम में पाय ठाम ।
लू छिन प्रति छिन राधास्वामी नाम चौरासी
का बन्धन कटाय ।
राधास्वामी कृपा निरवान पाय । ।
तब लग समझो ऋतु बसन्त । ।
गुरु चरन बास बस बस बसंत ।
यही मेरे लिये सच्चा बसन्त । ।
जब लग नहीं बास निकट सन्त ।
तब लगकोई बुझेन ऋतु बसंत ॥
भक्ति कुसुम की फली बास ।
मैं आय बसा जब गुरु के पास । ।
सरसों फूली मस्ती की आय ।
मैं पड़ा गुरु के चरण धाय । ।
हुआ मोह भरम का आज अन्त ।
मिले ऋतु बसंत राधास्वामी कंत ॥
दिया सुरत शब्द का मूल मन्त ।
हुआ गुरु मन्दिर का मैं महन्त ॥
राधास्वामी धाम में पाय ठाम ।
लू छिन प्रति छिन राधास्वामी नाम चौरासी
का बन्धन कटाय ।
राधास्वामी कृपा निरवान पाय । ।
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Song 16 — Hindi
217. खेलो भक्ति फाग आया ऋतु बसंत ।
है राधास्वामी सतगुरु परमसंत। ।
चित उमगा प्रेम न हिये समाय ।
मैं चरण गुरु पड़, धाय धाय ॥
नहीं काम क्रोध न मोह व्याप ।
मिटी चिन्ता दुविधा आज आप ॥
गुरु चरन शरन है मूल मन्त्र ।
जो गहे वही सच्चा महन्त ॥
राधास्वामी धाम में बास पाय ।
मैं समय बिताऊँ नाम गाय ॥
है राधास्वामी सतगुरु परमसंत। ।
चित उमगा प्रेम न हिये समाय ।
मैं चरण गुरु पड़, धाय धाय ॥
नहीं काम क्रोध न मोह व्याप ।
मिटी चिन्ता दुविधा आज आप ॥
गुरु चरन शरन है मूल मन्त्र ।
जो गहे वही सच्चा महन्त ॥
राधास्वामी धाम में बास पाय ।
मैं समय बिताऊँ नाम गाय ॥
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Song 17 — Hindi
218. सिंध प्रेम में गोते मार ।
गहो भक्ति मुक्ति मोती अपार ॥
यह मोती रतन अनमोल जान ।
जो पावे सोई भागवान ॥
चले कमल नीर गति चलन चाल |
गुरु चरन लाग रहे नित निहाल। ।
नहीं व्याये काल करम की गत ।
जो धारे राधास्वामी भक्ति का मत ॥
धन उसका भाग जो पाये सन्त ।
बस राधास्वामी धाम खेले बसन्त । ।
गहो भक्ति मुक्ति मोती अपार ॥
यह मोती रतन अनमोल जान ।
जो पावे सोई भागवान ॥
चले कमल नीर गति चलन चाल |
गुरु चरन लाग रहे नित निहाल। ।
नहीं व्याये काल करम की गत ।
जो धारे राधास्वामी भक्ति का मत ॥
धन उसका भाग जो पाये सन्त ।
बस राधास्वामी धाम खेले बसन्त । ।
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Song 18 — Hindi
219. बेचन निकसी रस प्रेम का ले ।
राधास्वामी सन्त मग में मिले । ।
एक पन्थ दो काज भया ।
व्यापे न गुजरिया को मोह माया। ।
खा माखन सार छाछ को त्याग ।
मेरी प्यारी गुजरिया के जागे भाग ।
यह माखन गुरु की भक्ति जान |
और छाछ जगत का लाभ हान । ।
राधास्वामी ने भक्ति का गुरु बताय ।
लिया प्यारी गुजरिया को अंग
लगाय ॥
राधास्वामी सन्त मग में मिले । ।
एक पन्थ दो काज भया ।
व्यापे न गुजरिया को मोह माया। ।
खा माखन सार छाछ को त्याग ।
मेरी प्यारी गुजरिया के जागे भाग ।
यह माखन गुरु की भक्ति जान |
और छाछ जगत का लाभ हान । ।
राधास्वामी ने भक्ति का गुरु बताय ।
लिया प्यारी गुजरिया को अंग
लगाय ॥
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Song 19 — Hindi
220.गुरु पद बास बसन्त जान |
गुरु भक्ति सुबास बसन्त ज्ञान । ।
भातु बसन्त में खेल फाग ।
गुरु चरन पकड़ तज द्वेष राग । ।
भव दुख का करदे भक्त अन्न ।
तब जाने क्या है ऋतु बसन्त । ।
राधास्वामी दया से जागा भाग ।
वह धन्य जो भक्ति प्रेम रस पाग । ।
गुरु भक्ति सुबास बसन्त ज्ञान । ।
भातु बसन्त में खेल फाग ।
गुरु चरन पकड़ तज द्वेष राग । ।
भव दुख का करदे भक्त अन्न ।
तब जाने क्या है ऋतु बसन्त । ।
राधास्वामी दया से जागा भाग ।
वह धन्य जो भक्ति प्रेम रस पाग । ।
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Song 20 — Hindi
221. सुरत चढ़ी अधर अब तज के खंड ।
लख छांड दिया ब्रह्मांड अंड ॥
घट भीतर शब्द की धुन प्रचंड ।
वह कैसे ठहरे पिंड बंड ॥
माया मद हो गये अंड बंड ।
ब्रह्मांड के कर दिये खंड खंड ॥
नहीं काम दाम धन धाम दंड ।
महा काल का सब टूटा घमंड ॥
राधास्वामी दया जब हुई प्रचंड ।
कर्म जाल की रचना का भया भंड ।
लख छांड दिया ब्रह्मांड अंड ॥
घट भीतर शब्द की धुन प्रचंड ।
वह कैसे ठहरे पिंड बंड ॥
माया मद हो गये अंड बंड ।
ब्रह्मांड के कर दिये खंड खंड ॥
नहीं काम दाम धन धाम दंड ।
महा काल का सब टूटा घमंड ॥
राधास्वामी दया जब हुई प्रचंड ।
कर्म जाल की रचना का भया भंड ।
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Song 21 — Hindi
222. खेलो खेलो ऋतु आई बसन्त ।
बसो प्रेम बास मिल साध सन्त ॥
फूले बन में टेसू अनन्त ।
नहीं कुसुम फूल का आदि अन्त ॥
आनन्द मिला घट लखा कंत ।
सुरत सखी शब्द संग सुख करन्त । ।
ऋतु बसन्त है प्रेम पन्थ ।
नहीं जाने मन वाला महन्त ॥
राधास्वामी दया ले जीव जन्त ।
अब नहीं भव दुख निधि जल परंत । ।
दोहा प्रेम बास से जो बसे, सोई बसन्त कहाय ।
बसे जो निकट में सन्त के,वह बसन्त सुख पाय ॥
यह बसन्त के अर्थ दो, समझे साध सुजान |
यही अर्थ है मुख्य कर, दूजा गौण समान ।
बसो प्रेम बास मिल साध सन्त ॥
फूले बन में टेसू अनन्त ।
नहीं कुसुम फूल का आदि अन्त ॥
आनन्द मिला घट लखा कंत ।
सुरत सखी शब्द संग सुख करन्त । ।
ऋतु बसन्त है प्रेम पन्थ ।
नहीं जाने मन वाला महन्त ॥
राधास्वामी दया ले जीव जन्त ।
अब नहीं भव दुख निधि जल परंत । ।
दोहा प्रेम बास से जो बसे, सोई बसन्त कहाय ।
बसे जो निकट में सन्त के,वह बसन्त सुख पाय ॥
यह बसन्त के अर्थ दो, समझे साध सुजान |
यही अर्थ है मुख्य कर, दूजा गौण समान ।
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Song 22 — Hindi
223. गुरु बास सुबास से मन बसन्त, परमारथ का है सो बसन्त । ।
खुली आँख सहस दल कमल आय, त्रिकुटी चढ़ निरखा ओम जाय ॥
किया जिसने चित से संग सन्त, परमारथ का है सो बसन्त ।
गई सुन्न शिखर सुरत झूम झूम, मची सुन्न समाध की घट में धूम ॥
हुआ काम क्रोध का यहां अन्त, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सोहंग धुन बंसी बजाय, नसे माया काल के सब उपाय ।
हुई मतवाली सुरत अब महंत, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सद पद सत लोक में बजी बीन, लिया सुरत ने अपना रूप चीन्ह ।
हुआ शब्द सुरत का सच्चा कंत, परमारथ का है सो बसन्त ॥
लख अलख को अगम की गम को पाय, तुर्या से पहुँची ऊची जाय ।
राधास्वामी पद में नित बसन्त, परमारथ का है सो बसन्त ॥
खुली आँख सहस दल कमल आय, त्रिकुटी चढ़ निरखा ओम जाय ॥
किया जिसने चित से संग सन्त, परमारथ का है सो बसन्त ।
गई सुन्न शिखर सुरत झूम झूम, मची सुन्न समाध की घट में धूम ॥
हुआ काम क्रोध का यहां अन्त, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सोहंग धुन बंसी बजाय, नसे माया काल के सब उपाय ।
हुई मतवाली सुरत अब महंत, परमारथ का है सो बसन्त । ।
सद पद सत लोक में बजी बीन, लिया सुरत ने अपना रूप चीन्ह ।
हुआ शब्द सुरत का सच्चा कंत, परमारथ का है सो बसन्त ॥
लख अलख को अगम की गम को पाय, तुर्या से पहुँची ऊची जाय ।
राधास्वामी पद में नित बसन्त, परमारथ का है सो बसन्त ॥
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Song 23 — Hindi
224. सुन फकीर आई ऋतु बसन्त की ।
धार हिये अब रीति संत की ।
गुरु के पास बसे जो बसन्त ।
गुरु के बास बसे सो सन्त ॥
तू राधास्वामी के शरन में आया ।
चरन कमल में बासा पाया ।
ऋतु बसन्त की यह एक रीत ।
पाल चरन की प्रेम प्रीत ॥
कर सतसंग विचार के साथ ।
तेरे सीस रहे गुरु का हाथ ॥
दोहे धाम बसन्ता ग्राम है, बसे जो गांव बसन्त ।
सन्त निकट आकर बसे, पावे पदवी सन्त ।
इस बसन्त के तीन गुन, समझ समझ हरखाय ।
मन में सोच विचार कर, तू मत धोका खाय । ।
कहता हूँ कहजात हूँ, कही सुनी मत मान ।
कही सुनी प्रथम दशा, तीन गुनन की खान ॥
सत रज तम को निरख कर, गुन का कर व्यौहार ।
सगुन रूप तेरा बने, सन्त मते का सार । ।
तम है दृढ़ता मूढ़ता, शिव के देह का गुन ।
ज्ञान पाय दृढ़ मूढ़ हो, कथन को मेरे सुन ।
भरत की दृढ़ता परख कर, हो जा मूढ़ का भाव ।
तब आगे पग धार तू , सूझे सहज उपाय ॥
जान बूझ अनजान बन, ज्ञान पाय अज्ञान ।
चल पौरुष ले निबल हो, सो सच्चा बलवान ॥
फिर चल रज की राह पर, करम धरम व्यौहार ।
मूढ़ भाव करनी करे, धार हिये में प्यार ॥
करम करे करता नहीं, अभिमानी बिन मान ।
विन बानी बातें करे, बिन पग चले सुजान ।
बिना नैन दृष्टा बने, देखे बिमल बहार ।
परबत बन सब ते करे, बिन वाहन असवार ॥
सालोकी सामीपता, सारूपी चित धार ।
तीन गुनन का परख गुन, साँच बसन्त विचार । ।
सत संगत में आय कर, बस जा मेरे पास ।
यह बसन्त का मेद है, धार गुरु की आस ॥
धार हिये अब रीति संत की ।
गुरु के पास बसे जो बसन्त ।
गुरु के बास बसे सो सन्त ॥
तू राधास्वामी के शरन में आया ।
चरन कमल में बासा पाया ।
ऋतु बसन्त की यह एक रीत ।
पाल चरन की प्रेम प्रीत ॥
कर सतसंग विचार के साथ ।
तेरे सीस रहे गुरु का हाथ ॥
दोहे धाम बसन्ता ग्राम है, बसे जो गांव बसन्त ।
सन्त निकट आकर बसे, पावे पदवी सन्त ।
इस बसन्त के तीन गुन, समझ समझ हरखाय ।
मन में सोच विचार कर, तू मत धोका खाय । ।
कहता हूँ कहजात हूँ, कही सुनी मत मान ।
कही सुनी प्रथम दशा, तीन गुनन की खान ॥
सत रज तम को निरख कर, गुन का कर व्यौहार ।
सगुन रूप तेरा बने, सन्त मते का सार । ।
तम है दृढ़ता मूढ़ता, शिव के देह का गुन ।
ज्ञान पाय दृढ़ मूढ़ हो, कथन को मेरे सुन ।
भरत की दृढ़ता परख कर, हो जा मूढ़ का भाव ।
तब आगे पग धार तू , सूझे सहज उपाय ॥
जान बूझ अनजान बन, ज्ञान पाय अज्ञान ।
चल पौरुष ले निबल हो, सो सच्चा बलवान ॥
फिर चल रज की राह पर, करम धरम व्यौहार ।
मूढ़ भाव करनी करे, धार हिये में प्यार ॥
करम करे करता नहीं, अभिमानी बिन मान ।
विन बानी बातें करे, बिन पग चले सुजान ।
बिना नैन दृष्टा बने, देखे बिमल बहार ।
परबत बन सब ते करे, बिन वाहन असवार ॥
सालोकी सामीपता, सारूपी चित धार ।
तीन गुनन का परख गुन, साँच बसन्त विचार । ।
सत संगत में आय कर, बस जा मेरे पास ।
यह बसन्त का मेद है, धार गुरु की आस ॥
×
Song 24 — Hindi
225. सुन फकीर अब भेद अनूप ।
समझ बसन्त का दजा रूप ॥
तिल से तेल फूल संग बासा ।
सो बसन्त है अगम अभासा । ।
फूल के संग मिले जब तेल ।
बसा बास तब बने फुलेल ।
यह फुलेल सब के मन भावे ।
तिल का तेल न फूल कहावे । ।
राजा रानी के सिर चढ़े ।
सिर की पीड़ा तुरत ही हरे । ।
यह बसन्त है अगम अपारा ।
समझे कोई गुरु मुख प्यारा ॥
जीवन मुक्त दशा में बरते ।
देह गेह गहि उत्तम परखे । ।
अछत देह पावे निरवान !
यह धुर पद यह सत पद जान । ।
जनक राज की फिरे दुहाई ।
ज्ञान मार्ग ऋषि मुनि सिखाई ॥
जीवन मुक्त विदेह अवस्था ।
इस बसन्त की घारे कक्षा । ।
दोहे तीन गुनन के त्याग से, चौथे पद में आय ।
ताको सब कोई कहत है, सायुज गति सो पाय ॥
बस बसन्त के निकट में, धार ले रीति बसन्त ।
चौथे पद में बास कर, छोड़ तीन का तन्त ॥
ऐ फकीर आ पास में, गहले बास सुबास ।
बस बस मेरे रूप में, हो सन्तों का दास ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाना ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याना ।
राधास्वामी सन्त रूप धर आये ।
तीन छोड़ चौथा पद गाये ॥
राधास्वामी अगम अपार अमाना ।
राधास्वामी अलख अथाह महाना । ।
राधास्वामी धुरपद सतपद सांचा। ।
राधास्वामी लख फकीर तब नाचा ॥
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी तब हैं अब राधास्वामी ।
राधास्वामी किरन भान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह जान राधास्वामी ॥
राधास्वामी सिंधु बुन्द राधास्वामी ।
राधास्वामी एक द्वन्द राधास्वामी ॥
दोहे भेद बसन्त बताय कर, सार बताऊँ तन्त ।
इसका करदे अन्त अब, यह बसन्त बस अन्त । ।
जो समझे इस भेद को, साई दास फकीर ।
ज्ञान करम का भेद लख, होजा मत का धीर ॥
राधास्वामी की दया, हिये में धार फकीर ।
होजा सबका पीर तू , समझ पराई पीर ॥
समझ बसन्त का दजा रूप ॥
तिल से तेल फूल संग बासा ।
सो बसन्त है अगम अभासा । ।
फूल के संग मिले जब तेल ।
बसा बास तब बने फुलेल ।
यह फुलेल सब के मन भावे ।
तिल का तेल न फूल कहावे । ।
राजा रानी के सिर चढ़े ।
सिर की पीड़ा तुरत ही हरे । ।
यह बसन्त है अगम अपारा ।
समझे कोई गुरु मुख प्यारा ॥
जीवन मुक्त दशा में बरते ।
देह गेह गहि उत्तम परखे । ।
अछत देह पावे निरवान !
यह धुर पद यह सत पद जान । ।
जनक राज की फिरे दुहाई ।
ज्ञान मार्ग ऋषि मुनि सिखाई ॥
जीवन मुक्त विदेह अवस्था ।
इस बसन्त की घारे कक्षा । ।
दोहे तीन गुनन के त्याग से, चौथे पद में आय ।
ताको सब कोई कहत है, सायुज गति सो पाय ॥
बस बसन्त के निकट में, धार ले रीति बसन्त ।
चौथे पद में बास कर, छोड़ तीन का तन्त ॥
ऐ फकीर आ पास में, गहले बास सुबास ।
बस बस मेरे रूप में, हो सन्तों का दास ॥
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाना ।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ध्याना ।
राधास्वामी सन्त रूप धर आये ।
तीन छोड़ चौथा पद गाये ॥
राधास्वामी अगम अपार अमाना ।
राधास्वामी अलख अथाह महाना । ।
राधास्वामी धुरपद सतपद सांचा। ।
राधास्वामी लख फकीर तब नाचा ॥
राधास्वामी सब हैं सब राधास्वामी ।
राधास्वामी तब हैं अब राधास्वामी ।
राधास्वामी किरन भान राधास्वामी ।
राधास्वामी देह जान राधास्वामी ॥
राधास्वामी सिंधु बुन्द राधास्वामी ।
राधास्वामी एक द्वन्द राधास्वामी ॥
दोहे भेद बसन्त बताय कर, सार बताऊँ तन्त ।
इसका करदे अन्त अब, यह बसन्त बस अन्त । ।
जो समझे इस भेद को, साई दास फकीर ।
ज्ञान करम का भेद लख, होजा मत का धीर ॥
राधास्वामी की दया, हिये में धार फकीर ।
होजा सबका पीर तू , समझ पराई पीर ॥
×
Song 25 — Hindi
226. सुन फकीर तोहि भेद सुनाऊँ ।
शब्दयोग खुलकर समझाऊँ ॥
सहस कमल दल रहे अनेक ।
इस पद में नहीं सूझे एक । ।
वह विराट का रूप कहावे ।
दो प्रकार का शब्द सुनावे । ।
ज्योति निरंजन माया ईश्वर ।
प्रगटे महा स्थूल रूप धर । ।
सहस आँख और सहस कान हैं ।
सहस कला के यह स्थान हैं ।
देख बिराट की अगम छबि, चित में हो प्रसन्न ।
तव त्रिकुटी की ओर चल, धर गुरु मूरत मन ॥
त्रिकुटी पद में है ओम्कारा ।
त्रिलोकी का सार पसारा ॥
अ उ म का शब्द रसाल ।
धुन प्रगटे सुन चित संभाल ॥
लाली उषा दृष्टि में आई ।
सुरत देख देख हर्षाई । ।
गुरु ने धारा लाल स्वरूप ।
श्रुति संयुक्त त्रिलोकी भूप ॥
सत रज तम की धारा तीन ।
प्रगटी यहां से सुन सुन चीन्ह । ।
वेद धाम प्रणव दशा, सहज उद्गीत का साज ।
राग सुनावे अद्भुती, तीन त्रिपुटि दल साज । ।
गुरु से भेद पाय चल आगे ।
सुरत प्रेम के रस में पागे ।
सुन्न शिखर चढ़ ध्यान लगावे ।
यहां द्वत पद रूप दिखावे । ।
ध्येय ध्याता और ज्ञानी ज्ञाता ।
सुन में द्वैत भाव रहे माता ॥
किंगरी और सारंगी की धुन ।
दोय धार हुई मुझसे सुन ।
पुरुष प्रकृति का अस्थाना } लीला रची विचार महाना । ।
यह सर्विकल्प समाधि का, धाम है मेरे फकीर ।
योगी योग के सिद्धि से, देह की भूले पीर । ।
महासुन्न तिस परे सुहाई ।
ब्रह्मरेन्द्र की चौकी माई ॥
घोर अँधेरा छाया जहां ।
गुरु बल ले सुरत चली वहां । ।
प्रगटा सूर विचित्र अपारा ।
उज्जल विमल अमल अति प्यारा ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
जाय लगाया गुरु का ध्यान ॥
लगी समाधि अखण्ड अनूप ।
नहीं वहां परजा नहीं वहाँ भूप ॥
निर्विकल्प पद तेहि निरख, यह अद्वत का धाम ।
साध ताहि तू सुरत से, ले ले गुरु का नाम ॥
कसरत असनियत और वहदत ।
वीनों का अति भेद है अद्भुत ॥
योगी ज्ञानी ऋषि मुनि भाई ।
इन तीनों में रहे लुभाई ॥
सत चित आनन्द में ठहराई ।
देह बुद्धि सुरत में भरमाई ॥
सत है देह योगी का योग ।
चित है मन ज्ञानी का सोग ॥
आनन्द ब्रह्म सुरत की लीला ।
माया काल ने उसको कीला । ।
तीनों तीनों में फंसे, सतगुरु मिला न कोय ।
यह सब भूले आप में, गये भरम में खोय ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीन ।
सृष्टि स्थिति प्रलय चीन्ह ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल को जान ।
जीव देश और ब्रह्म पिछान ।
स्थूल सूक्ष्म में रहे भुलाने ।
नहीं कोई पहुँचा ठौर ठिकाने ॥
तुर्यातीत का भेद न जाना ।
तुर्यातीत का मिला न ज्ञाना ।
कैसे खोल खोल समझाऊ ।
मिथ्याराद को केहि विधि गाऊ ।
देह सत और कर्म है, मन चित ही है ज्ञान ।
सुरत आनन्द का रूप है, यह विचार ले मान ॥
यहां तक सबकी गम है भाई ।
आगे की कोई खबर न पाई ॥
सुन सतगुरु का तू उपदेशा ।
आगे धाम में कर प्रवेशा ॥
भंवर गुफा की खिड़की खोल ।
सुन सोहंग की बंसी बोल ॥
माया काल का भेद पिछान ।
तब सतगुरु का पावे ज्ञान ।
मन है ज्ञान चित मेरे भाई ।
बिचली दशा न जा भरमाई ॥
सच्ची तुर्या यहाँ मिले, तुर्यातीत परख ।
दोनों की गम गुफा में, मन में आने निरख ।
चल आगे को मर्द फकीर ।
सतपद सतगुरु पद ले धीर ।
बीन की धुन जहां प्रगटी सत सत ।
सत्तपुरुष का दरस परस तत । ।
यहाँ नहीं देह न गेह न माया ।
यहाँ नहीं सूरज चांद न छाया ॥
एक सत्त का भाव फकीरा ।
अलख अगम चल गहर गंभीरा । ।
राधास्वामी अचल मुकाम ।
यहां मिले सांचा बिसराम ॥
भेद बताया मूल यह, सन्त मते का सार ।
सत संगत अभ्यास बिन, समझ बूझ से पार ॥
शब्द योग को साधकर, सुन संगत के बैन ।
तब समझेगा तत्व को, तत्व भेद है सैन ।
सैन बैन को जो लखे, सोई संत फकीर ।
राधास्वामी की दया, नहिं व्यापे भव पीर ॥
बिनती (212 कुल संख्या 1130) गुरु धरा शीश पर हाथ, मन क्यों फिकर करे ।
गुरु रक्षा हरदम संग, क्यों नहीं धीर धरे ।’
गुरु राखें राखनहार, इनसे काज सरे ।
मेरी करें पक्ष दिन रात, उनसे काल डरे ॥
मेरे मात पिता गुरु देव, महिमा कौन करे ।
राधास्वामी दीन दयाल, तुमसे काज सरे ॥
131
चौबीसवी धुन
प्रार्थना
शब्दयोग खुलकर समझाऊँ ॥
सहस कमल दल रहे अनेक ।
इस पद में नहीं सूझे एक । ।
वह विराट का रूप कहावे ।
दो प्रकार का शब्द सुनावे । ।
ज्योति निरंजन माया ईश्वर ।
प्रगटे महा स्थूल रूप धर । ।
सहस आँख और सहस कान हैं ।
सहस कला के यह स्थान हैं ।
देख बिराट की अगम छबि, चित में हो प्रसन्न ।
तव त्रिकुटी की ओर चल, धर गुरु मूरत मन ॥
त्रिकुटी पद में है ओम्कारा ।
त्रिलोकी का सार पसारा ॥
अ उ म का शब्द रसाल ।
धुन प्रगटे सुन चित संभाल ॥
लाली उषा दृष्टि में आई ।
सुरत देख देख हर्षाई । ।
गुरु ने धारा लाल स्वरूप ।
श्रुति संयुक्त त्रिलोकी भूप ॥
सत रज तम की धारा तीन ।
प्रगटी यहां से सुन सुन चीन्ह । ।
वेद धाम प्रणव दशा, सहज उद्गीत का साज ।
राग सुनावे अद्भुती, तीन त्रिपुटि दल साज । ।
गुरु से भेद पाय चल आगे ।
सुरत प्रेम के रस में पागे ।
सुन्न शिखर चढ़ ध्यान लगावे ।
यहां द्वत पद रूप दिखावे । ।
ध्येय ध्याता और ज्ञानी ज्ञाता ।
सुन में द्वैत भाव रहे माता ॥
किंगरी और सारंगी की धुन ।
दोय धार हुई मुझसे सुन ।
पुरुष प्रकृति का अस्थाना } लीला रची विचार महाना । ।
यह सर्विकल्प समाधि का, धाम है मेरे फकीर ।
योगी योग के सिद्धि से, देह की भूले पीर । ।
महासुन्न तिस परे सुहाई ।
ब्रह्मरेन्द्र की चौकी माई ॥
घोर अँधेरा छाया जहां ।
गुरु बल ले सुरत चली वहां । ।
प्रगटा सूर विचित्र अपारा ।
उज्जल विमल अमल अति प्यारा ॥
मान सरोवर कर अस्नान ।
जाय लगाया गुरु का ध्यान ॥
लगी समाधि अखण्ड अनूप ।
नहीं वहां परजा नहीं वहाँ भूप ॥
निर्विकल्प पद तेहि निरख, यह अद्वत का धाम ।
साध ताहि तू सुरत से, ले ले गुरु का नाम ॥
कसरत असनियत और वहदत ।
वीनों का अति भेद है अद्भुत ॥
योगी ज्ञानी ऋषि मुनि भाई ।
इन तीनों में रहे लुभाई ॥
सत चित आनन्द में ठहराई ।
देह बुद्धि सुरत में भरमाई ॥
सत है देह योगी का योग ।
चित है मन ज्ञानी का सोग ॥
आनन्द ब्रह्म सुरत की लीला ।
माया काल ने उसको कीला । ।
तीनों तीनों में फंसे, सतगुरु मिला न कोय ।
यह सब भूले आप में, गये भरम में खोय ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीन ।
सृष्टि स्थिति प्रलय चीन्ह ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल को जान ।
जीव देश और ब्रह्म पिछान ।
स्थूल सूक्ष्म में रहे भुलाने ।
नहीं कोई पहुँचा ठौर ठिकाने ॥
तुर्यातीत का भेद न जाना ।
तुर्यातीत का मिला न ज्ञाना ।
कैसे खोल खोल समझाऊ ।
मिथ्याराद को केहि विधि गाऊ ।
देह सत और कर्म है, मन चित ही है ज्ञान ।
सुरत आनन्द का रूप है, यह विचार ले मान ॥
यहां तक सबकी गम है भाई ।
आगे की कोई खबर न पाई ॥
सुन सतगुरु का तू उपदेशा ।
आगे धाम में कर प्रवेशा ॥
भंवर गुफा की खिड़की खोल ।
सुन सोहंग की बंसी बोल ॥
माया काल का भेद पिछान ।
तब सतगुरु का पावे ज्ञान ।
मन है ज्ञान चित मेरे भाई ।
बिचली दशा न जा भरमाई ॥
सच्ची तुर्या यहाँ मिले, तुर्यातीत परख ।
दोनों की गम गुफा में, मन में आने निरख ।
चल आगे को मर्द फकीर ।
सतपद सतगुरु पद ले धीर ।
बीन की धुन जहां प्रगटी सत सत ।
सत्तपुरुष का दरस परस तत । ।
यहाँ नहीं देह न गेह न माया ।
यहाँ नहीं सूरज चांद न छाया ॥
एक सत्त का भाव फकीरा ।
अलख अगम चल गहर गंभीरा । ।
राधास्वामी अचल मुकाम ।
यहां मिले सांचा बिसराम ॥
भेद बताया मूल यह, सन्त मते का सार ।
सत संगत अभ्यास बिन, समझ बूझ से पार ॥
शब्द योग को साधकर, सुन संगत के बैन ।
तब समझेगा तत्व को, तत्व भेद है सैन ।
सैन बैन को जो लखे, सोई संत फकीर ।
राधास्वामी की दया, नहिं व्यापे भव पीर ॥
बिनती (212 कुल संख्या 1130) गुरु धरा शीश पर हाथ, मन क्यों फिकर करे ।
गुरु रक्षा हरदम संग, क्यों नहीं धीर धरे ।’
गुरु राखें राखनहार, इनसे काज सरे ।
मेरी करें पक्ष दिन रात, उनसे काल डरे ॥
मेरे मात पिता गुरु देव, महिमा कौन करे ।
राधास्वामी दीन दयाल, तुमसे काज सरे ॥
131
चौबीसवी धुन
प्रार्थना
×
Song 26 — Hindi
×
Song 27 — Hindi
228. भक्ति दान गुरु दे मुझे, तू अन्तर्यामी ।
शीस झुके पद कमल में, बहु बार नमामी ॥
दाता दान साइयाँ, सब का हितकारी ।
केहि विधि स्तुति मैं करूँ, तू अन्तर्यामी ।
गुरु देवन का देव तू , घट घट का बासी ।
अगम अपार अखंड नित, सुखमय सुख रासी ।
सत चित आनन्द रूप की, महिमा अति भारी ।
सहज अनादि अनंत विभु, को बरणे पारी ॥
अलख अगाध अथाह बहु, नहीं रंग न रूपा ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब अमर अनूपा । ।होली
शीस झुके पद कमल में, बहु बार नमामी ॥
दाता दान साइयाँ, सब का हितकारी ।
केहि विधि स्तुति मैं करूँ, तू अन्तर्यामी ।
गुरु देवन का देव तू , घट घट का बासी ।
अगम अपार अखंड नित, सुखमय सुख रासी ।
सत चित आनन्द रूप की, महिमा अति भारी ।
सहज अनादि अनंत विभु, को बरणे पारी ॥
अलख अगाध अथाह बहु, नहीं रंग न रूपा ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब अमर अनूपा । ।होली
×
Song 28 — Hindi
229.होरी खेले सुरत सत संग ॥टेक ॥
सहस कमल दल धूर उड़ाई, त्रिकुटी गुलाल का रंग ।
सुन्न स्वेत का पहरा चाना, भंवर राग सोहंग । ।
होरी सत पद बीन मधुर धुन बाजी, उपजी मन में उमंग । ।
अलख अगम राधास्वामी गति परखी,काल भया दिल तंग । होरी
घंटा शंख सरगी बाजे, तबला और मृदंग ।
बंसी शोर जोर कर व्यापा, कोटि कृष्ण रहे दंग ॥
होरी नाचत सुरत अप्सरा प्यारी, धार भक्ति का ढंग ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई, सूझी सहज उचंग ॥ होरी0
राधास्वामी संग सुरत खेले होरी, अद्भुत अगम अमंग ।
तन मन की सुध बुध सब भूली, पी पी प्रेम की भंग ॥ होरी0
सहस कमल दल धूर उड़ाई, त्रिकुटी गुलाल का रंग ।
सुन्न स्वेत का पहरा चाना, भंवर राग सोहंग । ।
होरी सत पद बीन मधुर धुन बाजी, उपजी मन में उमंग । ।
अलख अगम राधास्वामी गति परखी,काल भया दिल तंग । होरी
घंटा शंख सरगी बाजे, तबला और मृदंग ।
बंसी शोर जोर कर व्यापा, कोटि कृष्ण रहे दंग ॥
होरी नाचत सुरत अप्सरा प्यारी, धार भक्ति का ढंग ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई, सूझी सहज उचंग ॥ होरी0
राधास्वामी संग सुरत खेले होरी, अद्भुत अगम अमंग ।
तन मन की सुध बुध सब भूली, पी पी प्रेम की भंग ॥ होरी0
×
Song 29 — Hindi
230. ठगनी आई ठगन संसार ॥टेक ।
रमा के रूप में विष्णु को लूटा, पारवती त्रिपुरार ।
गायत्री बन ब्रह्म ही घाला, माया चंचल नार ॥
ठगनी0 भक्ति भाव लख भक्त लुभाने, ज्ञानी ज्ञान हंकार ।
योगी ऋधि सिधि नौ निधि भूले, माया महा बरियार । ।
ठगनी0 ब्राह्मण बरन गोत्र कुल पाखंड, क्षत्री भुज बल भार ।
शूद्र मोह वैश्य धन दौलत, माया का भेस अपार ॥
ठगनी0 माया अगुन सगुन की मूरत, निराकर साकार ।
तीरथ बरत कर्म और धरमा, माया नरक विचार ॥
ठगनी0 एक बचा सतगुरु का सेवक, टेक गुरु की धार ।
राधास्वामी बल ले भया बलाना,माया को दिया पछार ॥
रमा के रूप में विष्णु को लूटा, पारवती त्रिपुरार ।
गायत्री बन ब्रह्म ही घाला, माया चंचल नार ॥
ठगनी0 भक्ति भाव लख भक्त लुभाने, ज्ञानी ज्ञान हंकार ।
योगी ऋधि सिधि नौ निधि भूले, माया महा बरियार । ।
ठगनी0 ब्राह्मण बरन गोत्र कुल पाखंड, क्षत्री भुज बल भार ।
शूद्र मोह वैश्य धन दौलत, माया का भेस अपार ॥
ठगनी0 माया अगुन सगुन की मूरत, निराकर साकार ।
तीरथ बरत कर्म और धरमा, माया नरक विचार ॥
ठगनी0 एक बचा सतगुरु का सेवक, टेक गुरु की धार ।
राधास्वामी बल ले भया बलाना,माया को दिया पछार ॥
×
Song 30 — Hindi
231.होरी खेलत सुरत नई ॥टेका ।
शब्द सुरत बनी शब्द की मूरत, शब्द के धाम गई ।
शब्द में शब्द शब्द लखपाया, सब कुछ शब्द मई ॥
जैसे जल में कमल निरालम, मुरगावी निशानिये ।
सुरत शब्द भवसागर तरिये, नानक नाम बखानिये ॥
होरी0 शब्द समानी सूरत प्यारी, शब्द सुने जो कई । ।
सुन धुन छाँट विवेक बिचारा, बहुर अशब्द भई ॥ होरी0
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय ।
सुरत समानी शब्द में, ताहि काल नहीं खाये ।
होरी0 राधास्वामी ऐसी खेलाई होरी, चरन शरन में लई ।
दुविधा द्वन्द विकार नसाया, रहा न प्रान रई ॥
होरी0 सत तक रूप रंग की रेखा, आगे चढ़कर कुछ नहीं देखा ।
जो कोई इतने ऊँचे चढ़े, रूप रंग रेखा से टरे ॥ होरी0
शब्द सुरत बनी शब्द की मूरत, शब्द के धाम गई ।
शब्द में शब्द शब्द लखपाया, सब कुछ शब्द मई ॥
जैसे जल में कमल निरालम, मुरगावी निशानिये ।
सुरत शब्द भवसागर तरिये, नानक नाम बखानिये ॥
होरी0 शब्द समानी सूरत प्यारी, शब्द सुने जो कई । ।
सुन धुन छाँट विवेक बिचारा, बहुर अशब्द भई ॥ होरी0
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय ।
सुरत समानी शब्द में, ताहि काल नहीं खाये ।
होरी0 राधास्वामी ऐसी खेलाई होरी, चरन शरन में लई ।
दुविधा द्वन्द विकार नसाया, रहा न प्रान रई ॥
होरी0 सत तक रूप रंग की रेखा, आगे चढ़कर कुछ नहीं देखा ।
जो कोई इतने ऊँचे चढ़े, रूप रंग रेखा से टरे ॥ होरी0
×
Song 31 — Hindi
232. जगत से नाता तोड़, सुरत आज खेलत होरी ।।टेक ॥
माया के घर आग लगाई, काल करम सिर फोरी ।
काम क्रोध की खाक उड़ाई, मोह से मुख को मोरी ॥
सुरत आज तत्व विवेक हाथ पिचकारी, प्रेम का रंग भरोरी ।
बुक्का श्वेत शुद्ध भक्ति का, गुरु के चरन छिरकोरी ॥
प्रीत वस्त्र से अंग सजाया, श्रद्धा गुलाल मलो री ।
नाचत गावत धूम मचाक्त, शोर अकास गयो री ॥
ठुमक ठुमक थिरकत पग धारत, सत पुर ओर चलो री ।
सुरत सुहागिन निरत रूप धर, गुरु आगे मचलो री ॥
माया के घर आग लगाई, काल करम सिर फोरी ।
काम क्रोध की खाक उड़ाई, मोह से मुख को मोरी ॥
सुरत आज तत्व विवेक हाथ पिचकारी, प्रेम का रंग भरोरी ।
बुक्का श्वेत शुद्ध भक्ति का, गुरु के चरन छिरकोरी ॥
प्रीत वस्त्र से अंग सजाया, श्रद्धा गुलाल मलो री ।
नाचत गावत धूम मचाक्त, शोर अकास गयो री ॥
ठुमक ठुमक थिरकत पग धारत, सत पुर ओर चलो री ।
सुरत सुहागिन निरत रूप धर, गुरु आगे मचलो री ॥
×
Song 32 — Hindi
घुमर घुमर राधास्वामी परिक्रमा, उमंग से पद पकरोरी ।
गाय ध्याय कर भक्ति भाव का, फगुवा माँग लियोरी ।।
233. खेलू अनहद फाग अपार ॥टेक। ।
दुख नहीं व्यापे मोह न मोहे, उपजे न भरम विकार ।
राधास्वामी नाम का सुमिरन निसदिन,गुरुपद प्रेम पियार ॥खेलू0
राधास्वामी इष्ट का ध्यान रहे घट, देखे ज्योत अपार । ।
गुरु की मूरत हिये विराजे, त्याग के सोच विचार खेलू
घंटा शंख बजे मेरे अन्तर, प्रगटे धुन झनकार । ।
राधास्वामी शब्द गूंज रहा सिर में, पल छिन बारम्बार खेलू0
गाय ध्याय कर भक्ति भाव का, फगुवा माँग लियोरी ।।
233. खेलू अनहद फाग अपार ॥टेक। ।
दुख नहीं व्यापे मोह न मोहे, उपजे न भरम विकार ।
राधास्वामी नाम का सुमिरन निसदिन,गुरुपद प्रेम पियार ॥खेलू0
राधास्वामी इष्ट का ध्यान रहे घट, देखे ज्योत अपार । ।
गुरु की मूरत हिये विराजे, त्याग के सोच विचार खेलू
घंटा शंख बजे मेरे अन्तर, प्रगटे धुन झनकार । ।
राधास्वामी शब्द गूंज रहा सिर में, पल छिन बारम्बार खेलू0
×
Song 33 — Hindi
234. होली खेल ले दिन चार टेक ॥
फागुन मस्त महीना आया, पिया संग धर उर प्यार |
चरन लाग तन मन की सुध बुध, त्याग प्रेम चित धार होली0
दोऊ नयन की बना पिचकारी, भक्ति रंग बहार ।
हँस हँस गा गा भर भर छिन छिन, पिया के अंग पर डार होली0
सुरत की चतुर सियानी गुजरिया, तन मन सकल सिंगार ।
राधास्वामी अपने पिया को रिझाले, सुन्दर अबला नार होली
फागुन मस्त महीना आया, पिया संग धर उर प्यार |
चरन लाग तन मन की सुध बुध, त्याग प्रेम चित धार होली0
दोऊ नयन की बना पिचकारी, भक्ति रंग बहार ।
हँस हँस गा गा भर भर छिन छिन, पिया के अंग पर डार होली0
सुरत की चतुर सियानी गुजरिया, तन मन सकल सिंगार ।
राधास्वामी अपने पिया को रिझाले, सुन्दर अबला नार होली
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Song 34 — Hindi
235. होली खेलू चरन गुरु लाग ।टेक ॥
जग की मोह नींद नहीं व्यापे, सत संगत में जाग ।
वचन विलास भजन और सुमिरन, गाऊँ अनहद राग होली0
मन पर करू पल पल असवारी, फेर निरोध की बाग ।
गुरु के पन्थ किया पयाना, चित घर सहज विराग होली0
सेवक रूप में पद की सेवा, फगुवा भक्ति का मांग ।
चिंता भरम की ओर न चालू , धर श्रद्धा अनुराग होली0
प्रेम भंग पी मस्त रहूँ नित, भरम विकार को त्याग ।
राधास्वामी धाम की रहे परिक्रमा, यह मेरा अद्भुत भाग होली
जग की मोह नींद नहीं व्यापे, सत संगत में जाग ।
वचन विलास भजन और सुमिरन, गाऊँ अनहद राग होली0
मन पर करू पल पल असवारी, फेर निरोध की बाग ।
गुरु के पन्थ किया पयाना, चित घर सहज विराग होली0
सेवक रूप में पद की सेवा, फगुवा भक्ति का मांग ।
चिंता भरम की ओर न चालू , धर श्रद्धा अनुराग होली0
प्रेम भंग पी मस्त रहूँ नित, भरम विकार को त्याग ।
राधास्वामी धाम की रहे परिक्रमा, यह मेरा अद्भुत भाग होली
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Song 35 — Hindi
236. होली खेलू रंग भरी ॥टेका ।
आलस नींद प्रमाद को त्यागू, चित गुरु चरन वरी ।
सुमिरन भजन ध्यान घट भीतर, तन मन सुध
बिसरी होली जग चिंता की धूर उड़ाई, माया देख मरी ।
प्रेम गुलाल मला जब मुख पर, काल की गति बिगरी
होली अनहद धुन का हुआ दिवाना, मोह की विपत हरी ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई थेई, नाचत सुरत परी होली
मेरी होली है सबसे न्यारी, सच्ची सहज खरी ।
कोई कोई जाने साध सुजाना, धुन जेहि कान परी ॥होली0
राधास्वामी संग दह फाग रचाया, माया संग लरी ।
सुरत निरत ले कुल परिवारा, भव के सिंध तरी होली0
आलस नींद प्रमाद को त्यागू, चित गुरु चरन वरी ।
सुमिरन भजन ध्यान घट भीतर, तन मन सुध
बिसरी होली जग चिंता की धूर उड़ाई, माया देख मरी ।
प्रेम गुलाल मला जब मुख पर, काल की गति बिगरी
होली अनहद धुन का हुआ दिवाना, मोह की विपत हरी ।
थिक थिक थिक थिक थेई थेई थेई, नाचत सुरत परी होली
मेरी होली है सबसे न्यारी, सच्ची सहज खरी ।
कोई कोई जाने साध सुजाना, धुन जेहि कान परी ॥होली0
राधास्वामी संग दह फाग रचाया, माया संग लरी ।
सुरत निरत ले कुल परिवारा, भव के सिंध तरी होली0
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Song 36 — Hindi
237. होली खेल ले आये फागुन के दिन चार ॥टेक ॥
यह नर जनम फाग की ऋतु है, सुगम सुहेल अपार ।
प्रेम गुलाल अबीर भक्ति का, बुक्का प्रीत पियार होली0
अनहद धुन का राग सुहाना, मस्ती विवेक बिचार ।
खेल खेल में दोनों सुधरे, परमारथ व्यौहार होली
गुरु का सतसंग राग अखाड़ा, बाजे घट झनकार ।
सुरत की चाल को नाच समझ ले, सुखमन तार
सितार होली सहस कमल घंटा मृदुबानी, त्रिकुटी ताल ओम्कार ।
सुन्न सारंगी भंवर में बसी, सत पद बीन का सार
होली यह होली कोई गुरु मुख खेले, त्यागे भरम विकार । ।
रच अचिन्त गुरु चरन कमल लग, राधास्वामी की बलिहार ॥
यह नर जनम फाग की ऋतु है, सुगम सुहेल अपार ।
प्रेम गुलाल अबीर भक्ति का, बुक्का प्रीत पियार होली0
अनहद धुन का राग सुहाना, मस्ती विवेक बिचार ।
खेल खेल में दोनों सुधरे, परमारथ व्यौहार होली
गुरु का सतसंग राग अखाड़ा, बाजे घट झनकार ।
सुरत की चाल को नाच समझ ले, सुखमन तार
सितार होली सहस कमल घंटा मृदुबानी, त्रिकुटी ताल ओम्कार ।
सुन्न सारंगी भंवर में बसी, सत पद बीन का सार
होली यह होली कोई गुरु मुख खेले, त्यागे भरम विकार । ।
रच अचिन्त गुरु चरन कमल लग, राधास्वामी की बलिहार ॥
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Song 37 — Hindi
238. होली आई खेल ले फाग ॥टेक ॥
पुरुष प्रकृति का ब्याह रचा है, जागे सबके भाग ।
पुरुष लाल रंग बाना धारा, प्रकृति बसन्ति सुहाग होली0
सूरज चाँद नक्षत्र बराती, गाते मंगल राग ।
अनहद धुन का शोर मचा है, बाजे प्रेम अनुराग होली0
ममता मोह घोड़ा असवारी, मोड़ हिये की बाग ।
निश्चल दृढ़ भक्ति के हाथी, ऊंट त्याग वैराग होली
सुरत शिरोमनि नाचन लागी, मोह नींद से जाग ।
चित विरती का किया निरोधा, गुरु चरनन से लाग होली0
प्रीत समाज की सजी बराता, सुन्दर सहज सुभाग ।
राधास्वामी पद मंडप अस्थाना, ब्याह भक्ति का फाग होली0
पुरुष प्रकृति का ब्याह रचा है, जागे सबके भाग ।
पुरुष लाल रंग बाना धारा, प्रकृति बसन्ति सुहाग होली0
सूरज चाँद नक्षत्र बराती, गाते मंगल राग ।
अनहद धुन का शोर मचा है, बाजे प्रेम अनुराग होली0
ममता मोह घोड़ा असवारी, मोड़ हिये की बाग ।
निश्चल दृढ़ भक्ति के हाथी, ऊंट त्याग वैराग होली
सुरत शिरोमनि नाचन लागी, मोह नींद से जाग ।
चित विरती का किया निरोधा, गुरु चरनन से लाग होली0
प्रीत समाज की सजी बराता, सुन्दर सहज सुभाग ।
राधास्वामी पद मंडप अस्थाना, ब्याह भक्ति का फाग होली0
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Song 38 — Hindi
239. होरी ब्रज में कैसी मचोरी ॥टेक। ।
यह ब्रज भूमी ब्रज का मंडल, अद्भुत साज सजोरी ।
नंद आनन्द यशोदा प्रकृति घर, मन कान्हा प्रगटोरी ॥होरी0
इन्द्री गोप गोपी संग मिल जुल, रास बिहार रचोरी ।
सुरत सार माखन रस चाहे, नित प्रति उठ करे चोरी ॥होरी0
जमुना करम धरम की धारा, बिटप विराट लखोरी। ।
चीर हरी गोपिन की सारी, कदम्ब के गाछ चढ़ोरी ॥होरी0
सखा गोप ले ग्वाल मंडली, करम खेल बिलसोरी ।
काली दह में गेंद गिरी जब, उछल के कूद परो री ॥
होरी0 विषधर नाग मलिन मनकी गति, फन पर अभय चढ़ोरी ।
बंसी बट बंसी धुन गाई, थिरक थिरक नाचो री॥होरी0
राधा सुरत के रूप पे मोहा, अंग संग अपने कियो री ।
मथुरा नगर कंस अज्ञाना, ताहि मार नासो री ॥
होरी कर अज्ञान का नास कृष्ण सोई, दसम द्वार पहुँचो री ।
का है ब्रह्म द्वार दरवाजा, द्वारका जाये धरो री ।
होरी0 सोहंग सोहंग मुरली बजावे, सोहंग धाम लियो री ।
ओम के ऊपर सोहंग की गति, भँवर गुफा मचलोरी ॥
होरी0 यह होरी ब्रज भवर की होरी, कोई कोई साधू कहो री। ।
राधास्वामी संग सार हम पाया, सत पद खेल गयो री॥होरी0
यह ब्रज भूमी ब्रज का मंडल, अद्भुत साज सजोरी ।
नंद आनन्द यशोदा प्रकृति घर, मन कान्हा प्रगटोरी ॥होरी0
इन्द्री गोप गोपी संग मिल जुल, रास बिहार रचोरी ।
सुरत सार माखन रस चाहे, नित प्रति उठ करे चोरी ॥होरी0
जमुना करम धरम की धारा, बिटप विराट लखोरी। ।
चीर हरी गोपिन की सारी, कदम्ब के गाछ चढ़ोरी ॥होरी0
सखा गोप ले ग्वाल मंडली, करम खेल बिलसोरी ।
काली दह में गेंद गिरी जब, उछल के कूद परो री ॥
होरी0 विषधर नाग मलिन मनकी गति, फन पर अभय चढ़ोरी ।
बंसी बट बंसी धुन गाई, थिरक थिरक नाचो री॥होरी0
राधा सुरत के रूप पे मोहा, अंग संग अपने कियो री ।
मथुरा नगर कंस अज्ञाना, ताहि मार नासो री ॥
होरी कर अज्ञान का नास कृष्ण सोई, दसम द्वार पहुँचो री ।
का है ब्रह्म द्वार दरवाजा, द्वारका जाये धरो री ।
होरी0 सोहंग सोहंग मुरली बजावे, सोहंग धाम लियो री ।
ओम के ऊपर सोहंग की गति, भँवर गुफा मचलोरी ॥
होरी0 यह होरी ब्रज भवर की होरी, कोई कोई साधू कहो री। ।
राधास्वामी संग सार हम पाया, सत पद खेल गयो री॥होरी0
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Song 39 — Hindi
240. खेली चित प्रसन्न, आज अन्तर घट होली ।।टेका ।
महस कमल में फंसी उमंग से, सुरत निरत की टोली ।
गुरु पद ओम्कार जा पहुँची, त्रिकुटो महल में डोली खेली ।
लाल गुलाल प्रेम रंग भरकर, हिये पिचकारी खोली ।
तक तक मारा गुरु के चरनन, बुक्के की उल्टी झोली खेली0
फाग राग मंगल मृदुबानी, ओम् शब्द धुन बोली ।
गाय रिझाय मनाय गुरु को, दृष्टि दृष्टि से तोली ॥
हृदय पात्र में भंग भाव की, साहस जल में घोली ।
पीते ही तन की सुध बिसरी, सूझी सहज ठिठोली ॥
गिरत पड़त भूमत पग धारत, चरन शरन में रोली ।
राधास्वामी अंग लिया लपटाई, समझ सुरत को भोली ॥
महस कमल में फंसी उमंग से, सुरत निरत की टोली ।
गुरु पद ओम्कार जा पहुँची, त्रिकुटो महल में डोली खेली ।
लाल गुलाल प्रेम रंग भरकर, हिये पिचकारी खोली ।
तक तक मारा गुरु के चरनन, बुक्के की उल्टी झोली खेली0
फाग राग मंगल मृदुबानी, ओम् शब्द धुन बोली ।
गाय रिझाय मनाय गुरु को, दृष्टि दृष्टि से तोली ॥
हृदय पात्र में भंग भाव की, साहस जल में घोली ।
पीते ही तन की सुध बिसरी, सूझी सहज ठिठोली ॥
गिरत पड़त भूमत पग धारत, चरन शरन में रोली ।
राधास्वामी अंग लिया लपटाई, समझ सुरत को भोली ॥
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Song 40 — Hindi
241. खेल री अपने घट होरी ॥टेक ॥
चित की दुचिता जला दे मन से, दुविधा से नाता तोरी ।
शम दम साध के कर सतसंगत, नेह गुरु से जोरी खेल री0
प्रपंच से मुख मोरी ॥
बचन विलास सेवा और पूजा, सतसंग चित धरो री ।
बाहर मुखी बिरती को त्यागो, अन्तर मुखी गहोरी ॥
दर्शन गुरु घट में करो री ॥
काम क्रोध को आग लगाई, जरबर भस्म भयो री ।
भक्ति भाव अबीर गुलाला, गुरु पद में छिरकोरी ॥
मान की मटकी फोरी ॥
शंख मृदंग बजा कर अन्तर, फाग राग गायो री ।
अनहद धुन व्यापी घट भीतर, अमृत भंग पियो री ॥
बुद्धि मति हो गई भोरी ।
यह होरी कोई साधु खेले, गुरु गम ज्ञान लियो री ।
गधास्वामी पद बिसराम मिले तब, यम भयत्रास गयोरी । ।
करे माया न ठगोरी । ।
चित की दुचिता जला दे मन से, दुविधा से नाता तोरी ।
शम दम साध के कर सतसंगत, नेह गुरु से जोरी खेल री0
प्रपंच से मुख मोरी ॥
बचन विलास सेवा और पूजा, सतसंग चित धरो री ।
बाहर मुखी बिरती को त्यागो, अन्तर मुखी गहोरी ॥
दर्शन गुरु घट में करो री ॥
काम क्रोध को आग लगाई, जरबर भस्म भयो री ।
भक्ति भाव अबीर गुलाला, गुरु पद में छिरकोरी ॥
मान की मटकी फोरी ॥
शंख मृदंग बजा कर अन्तर, फाग राग गायो री ।
अनहद धुन व्यापी घट भीतर, अमृत भंग पियो री ॥
बुद्धि मति हो गई भोरी ।
यह होरी कोई साधु खेले, गुरु गम ज्ञान लियो री ।
गधास्वामी पद बिसराम मिले तब, यम भयत्रास गयोरी । ।
करे माया न ठगोरी । ।
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Song 41 — Hindi
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Song 42 — Hindi
242. सुरत प्यारी होरी खेले आज नई टेक ॥
अपने गुरु की बनी है पियारी, प्रेम प्रतीत मई ।
भजन ध्यान सुमिरन को चित दे, मन में मगन भई ।
सुरत0 प्यार अबीर गुलाल हाथ ले, प्रीत पिचकारी गही ।
गुरु के चरन छिड़क निस बासर, सुख आनन्द लही ।
सुरत0 गुरु समान कोई दृष्टि न आवे, गुरु गम ज्ञान लही ।
नाचे उमंग से लज्जा तज कर, थिक थिक थेई थेई । ।
सुरत0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, भक्ति दान दई ।
सुरत प्यारी हुई गुरु पियारी, गुरु की गोद रही । ।
सुरत0
अपने गुरु की बनी है पियारी, प्रेम प्रतीत मई ।
भजन ध्यान सुमिरन को चित दे, मन में मगन भई ।
सुरत0 प्यार अबीर गुलाल हाथ ले, प्रीत पिचकारी गही ।
गुरु के चरन छिड़क निस बासर, सुख आनन्द लही ।
सुरत0 गुरु समान कोई दृष्टि न आवे, गुरु गम ज्ञान लही ।
नाचे उमंग से लज्जा तज कर, थिक थिक थेई थेई । ।
सुरत0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, भक्ति दान दई ।
सुरत प्यारी हुई गुरु पियारी, गुरु की गोद रही । ।
सुरत0
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Song 43 — Hindi
243. खेल न जाने होरी, सुरत जो मति की भोरी ॥टेक। ।
विरती न रोके मन नहीं सोधे, चित गुरु चरनन जोरी ।
सुने न फाग राग अन्तर घट, अनहद होरी मचोरी ॥
सुरत जो0 मन के हाथ नहीं पिचकारी, रंग उमंग न भरो री ।
ऊँचे चढ़ कर इष्ट रूप का, दरस परस न करो री ॥
शम दम की कुछ कर ले कमाई, आलस नींद तजोरी। ।
तब दरशन राधास्वामी का पावे, अद्भुत ज्योत लखोरी ॥
विरती न रोके मन नहीं सोधे, चित गुरु चरनन जोरी ।
सुने न फाग राग अन्तर घट, अनहद होरी मचोरी ॥
सुरत जो0 मन के हाथ नहीं पिचकारी, रंग उमंग न भरो री ।
ऊँचे चढ़ कर इष्ट रूप का, दरस परस न करो री ॥
शम दम की कुछ कर ले कमाई, आलस नींद तजोरी। ।
तब दरशन राधास्वामी का पावे, अद्भुत ज्योत लखोरी ॥
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Song 44 — Hindi
244. आंखों ने होली सिखाई, हां तेरी आंखों ने होली सिखाई ॥टेक। ।
जब से रूप का दर्शन पाया, सुध बुध सब बिसराई ।
मतवाला बन झूम रहा हूँ, भूली अपनी पराई ।
नहि चित में दुचिताई ॥
हां तेरी आंख में अमृत विष है तेरे, आंख में मद मदताई ।
देखत जियत मरत मदमातत, दशा विचित्र बनाई ।
लखे कोई ज्ञानी आई ॥
हां तेरी0
आँख में तीन रंग के डोरे, लाल स्वेत कजराई ।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था, दृष्टि में तेरे समाई ।
कहे कोई कैसे बनाई ॥
हां तेरी0 आंख में सृष्टि प्रलय और उत्पति, रचना रचत रचाई ।
ब्रह्मा विष्णु महेश तीन मिल, अपनी रीति चलाई ।
मरम कोई जान न पाई ॥
हां तेरी0 बुक्का गुलाल अबीर आँख में, झोली विचित्र सजाई ।
दृष्टि हाथ पिचकारी से छिड़का, गुरु चरनन चितलाई ।
भेद राधास्वामी बताई ।
हां तेरी
जब से रूप का दर्शन पाया, सुध बुध सब बिसराई ।
मतवाला बन झूम रहा हूँ, भूली अपनी पराई ।
नहि चित में दुचिताई ॥
हां तेरी आंख में अमृत विष है तेरे, आंख में मद मदताई ।
देखत जियत मरत मदमातत, दशा विचित्र बनाई ।
लखे कोई ज्ञानी आई ॥
हां तेरी0
आँख में तीन रंग के डोरे, लाल स्वेत कजराई ।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था, दृष्टि में तेरे समाई ।
कहे कोई कैसे बनाई ॥
हां तेरी0 आंख में सृष्टि प्रलय और उत्पति, रचना रचत रचाई ।
ब्रह्मा विष्णु महेश तीन मिल, अपनी रीति चलाई ।
मरम कोई जान न पाई ॥
हां तेरी0 बुक्का गुलाल अबीर आँख में, झोली विचित्र सजाई ।
दृष्टि हाथ पिचकारी से छिड़का, गुरु चरनन चितलाई ।
भेद राधास्वामी बताई ।
हां तेरी
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Song 45 — Hindi
245. होली होली होनी जो थी गुरु कृपा होली ॥टेक। ।
सत रज तम की खाक उड़ाई, अबीर प्रेम की घोली ।
गुरु के चरन मार पिचकारी, निज ममता सब धोली
होली जिभ्या कान आंख को मीचा, अन्तर के पट खोली। ।
भूल राग जग के अन्तर में, अनहद की धुन बोली होली
प्रीत रीत के रंग रंगी है, तन की मन की चोली ।
सब विधि भक्ति रंग से भरली, हिया की अपनी झोली होली
फगुवा खेलत फाग मनावत, आई सुरत की टोली ।
शब्द सुहाने गावन लागी, अन्तर मुख को खोली होली
गधास्त्रामी रंग रंगाया, दे सिर माथे रोली ।
अब तो रंग गई गुरु के रंग से, मेरी सूरत भोली होली
सत रज तम की खाक उड़ाई, अबीर प्रेम की घोली ।
गुरु के चरन मार पिचकारी, निज ममता सब धोली
होली जिभ्या कान आंख को मीचा, अन्तर के पट खोली। ।
भूल राग जग के अन्तर में, अनहद की धुन बोली होली
प्रीत रीत के रंग रंगी है, तन की मन की चोली ।
सब विधि भक्ति रंग से भरली, हिया की अपनी झोली होली
फगुवा खेलत फाग मनावत, आई सुरत की टोली ।
शब्द सुहाने गावन लागी, अन्तर मुख को खोली होली
गधास्त्रामी रंग रंगाया, दे सिर माथे रोली ।
अब तो रंग गई गुरु के रंग से, मेरी सूरत भोली होली
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Song 46 — Hindi
246. सुरत आज खेलत फाग नई ॥टेक ॥
आये बसन्त कंत मुख देखा, आनन्द धूम मची ।
काल करम का चुका है लेखा, अब गुरु रंग रची ।
माया मौन भई ॥ सुरत
अचल सुहाग दिया गुरु पूरे, प्रेम के बास बसी ।
मोती हीरे निछावर कीन्हे, मुखड़ा देख हसी। ।
मंगल प्रेम मई ॥
सुरत0 राधास्वामी फाग रचाया, अद्भुत अगम महा ।
बाजी गत प्रगटी धुन अद्भुत, हर्ष हुलास लहा ।
चिन्ता सकल गई ॥
सुरत0
आये बसन्त कंत मुख देखा, आनन्द धूम मची ।
काल करम का चुका है लेखा, अब गुरु रंग रची ।
माया मौन भई ॥ सुरत
अचल सुहाग दिया गुरु पूरे, प्रेम के बास बसी ।
मोती हीरे निछावर कीन्हे, मुखड़ा देख हसी। ।
मंगल प्रेम मई ॥
सुरत0 राधास्वामी फाग रचाया, अद्भुत अगम महा ।
बाजी गत प्रगटी धुन अद्भुत, हर्ष हुलास लहा ।
चिन्ता सकल गई ॥
सुरत0
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Song 47 — Hindi
247. सखी मेरी न्यारी है सबसे होली ॥टेक ॥
सबकी होली पुरानी लीक है, मेरी तो है बर होली ।
बिरह की आग कलेजे भड़के, जल रहे पंजर झोली ॥सखी0
ज्वाला न फटे धुवां न निकसे, समझे कौन मेरी बोली ।
आंखों की पिचकारी बनी है, रक्त रंग हिया घोली ॥सखी0
बिरह की होली की धूम मची है, ब्रज की ठिठोली। ।
तन मन की नहीं सुध कुछ मुझको, खाली प्रेम की गोली ॥सखी0
भंग धतूरे की मस्ती नहीं है, यह है मस्ती अतोली ।
और तो डफ मृदंग बजावे, तन मेर ढोल अडोली ।सखी0
नस नाड़ी का तार बना है, इन्द्री है फाग की टोली ।
मति गति अनहद राग अनोखे, गाती है सूरत भोली सखी0
हिया जिया उमंग प्रेम से भरा है, भरम की गुंडी खोली ।
राधास्वामी चरन धूर का टीका, यह मस्तक की रोली ।।सखी0
सच्ची होली मेरी सजनी, और है आंख मिचौली ।
राधास्वामी संग खेल रही निसदिन, होली होली होली ॥सखी0
सबकी होली पुरानी लीक है, मेरी तो है बर होली ।
बिरह की आग कलेजे भड़के, जल रहे पंजर झोली ॥सखी0
ज्वाला न फटे धुवां न निकसे, समझे कौन मेरी बोली ।
आंखों की पिचकारी बनी है, रक्त रंग हिया घोली ॥सखी0
बिरह की होली की धूम मची है, ब्रज की ठिठोली। ।
तन मन की नहीं सुध कुछ मुझको, खाली प्रेम की गोली ॥सखी0
भंग धतूरे की मस्ती नहीं है, यह है मस्ती अतोली ।
और तो डफ मृदंग बजावे, तन मेर ढोल अडोली ।सखी0
नस नाड़ी का तार बना है, इन्द्री है फाग की टोली ।
मति गति अनहद राग अनोखे, गाती है सूरत भोली सखी0
हिया जिया उमंग प्रेम से भरा है, भरम की गुंडी खोली ।
राधास्वामी चरन धूर का टीका, यह मस्तक की रोली ।।सखी0
सच्ची होली मेरी सजनी, और है आंख मिचौली ।
राधास्वामी संग खेल रही निसदिन, होली होली होली ॥सखी0
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Song 48 — Hindi
248.| खेले होली सुरतिया उमंग भरी ।।टेक। ।
इंगला पिंगला त्याग के दोनों, सुखमन मध्य सिधाई ।
केसर तिलक थाल भ्र मध्य में, त्रिकुटी गढ़ चढ़ धाई ॥ खेले0
घंटा शंख पखावज बाजे, ओम की धुन सुन पाई ।
गुरु चेले का साथ हुआ है, सुन्न सरोवर आई ॥
खेले0 सारंग सारंग धूम मची जब, भवर की खिड़की निरखी ।
चन्द्र सूर घट तारे चमके, अपनी गति मति परखी।
नाची नाच सुहाना घट में, गा गा अनहद बानी ।
सतपद गूंज रही धुन बानी, हुई सहज निरवानी । ।
अलख अगम के पार ठिकाना, थिरकत ठुमकत नाची ।
राधास्वामी धाम में पाया बासा,भक्ति अंग संग रांची ॥
इंगला पिंगला त्याग के दोनों, सुखमन मध्य सिधाई ।
केसर तिलक थाल भ्र मध्य में, त्रिकुटी गढ़ चढ़ धाई ॥ खेले0
घंटा शंख पखावज बाजे, ओम की धुन सुन पाई ।
गुरु चेले का साथ हुआ है, सुन्न सरोवर आई ॥
खेले0 सारंग सारंग धूम मची जब, भवर की खिड़की निरखी ।
चन्द्र सूर घट तारे चमके, अपनी गति मति परखी।
नाची नाच सुहाना घट में, गा गा अनहद बानी ।
सतपद गूंज रही धुन बानी, हुई सहज निरवानी । ।
अलख अगम के पार ठिकाना, थिरकत ठुमकत नाची ।
राधास्वामी धाम में पाया बासा,भक्ति अंग संग रांची ॥
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Song 49 — Hindi
249. सुन्दर फाग रचाया, सुरत मेरी खेले होली ॥टेका ।
होली जलाई खाक उड़ाई, माया की करी ठिठोली ।
काल कर्म को माटी मिलाई, चढ़ी शब्द की डोली ॥सुरत0
रज का गुलाल मला मुख ऊपर, मस्तक प्रेम की रोली ।
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ धाई, शब्द अनाहद बोली ॥
सतसंगत सत सगुन के संग में, सत सत्ता की बानी। ।
गुरु के बचन का श्रवन मनन नित, निध्यासन निरवानी ॥
सुमिरन भजन ध्यान रस पागी, एकरस जीवन व्यापा ।
सुरत शिरोमनि लख निज आपा, परख लिया निज आपा ॥
तीन त्याग चोथे पद आई, गुरु के बचन प्रमाना ।
शब्द अनुमान प्रमान लखे सब, प्रगटा हिये सत ज्ञाना ॥
तीन त्रिलोकी का नाता तोड़ा, अ उ म गति बूझी। ।
सोचा समझा विचारा मन में, अलख अगम की सूझी ॥
तीन त्रिलोकी में नाम कहां है, चौथे नाम का वासा ।
कोई कोई जाने साधु विवेकी, त्याग त्रिलोकी आसा ॥
जो कोई तीन की आसा धारे, चौथे पद नहीं आवे ।
गुमिरन भजन ध्यान गहि राखे, तब चौथे पद पावे ॥
सतसंगी बने साध की गति ले, हंस भाव चित लावे ।
शब्द नीर को मन कर छाने, परम हंस गति पावे ॥
सुरत0 इन चारों के ऊपर भाई, संत की पदवी भाई ।
नाम रहे सतगुरु आधीना, राधास्वामी भेद बताई ॥
कोई कोई परखे राधास्वामी बना, बैना रटन लगावे । ।
तब सत मत का सार पिछाने, जीते मुक्ति मनावे ॥
होली जलाई खाक उड़ाई, माया की करी ठिठोली ।
काल कर्म को माटी मिलाई, चढ़ी शब्द की डोली ॥सुरत0
रज का गुलाल मला मुख ऊपर, मस्तक प्रेम की रोली ।
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ धाई, शब्द अनाहद बोली ॥
सतसंगत सत सगुन के संग में, सत सत्ता की बानी। ।
गुरु के बचन का श्रवन मनन नित, निध्यासन निरवानी ॥
सुमिरन भजन ध्यान रस पागी, एकरस जीवन व्यापा ।
सुरत शिरोमनि लख निज आपा, परख लिया निज आपा ॥
तीन त्याग चोथे पद आई, गुरु के बचन प्रमाना ।
शब्द अनुमान प्रमान लखे सब, प्रगटा हिये सत ज्ञाना ॥
तीन त्रिलोकी का नाता तोड़ा, अ उ म गति बूझी। ।
सोचा समझा विचारा मन में, अलख अगम की सूझी ॥
तीन त्रिलोकी में नाम कहां है, चौथे नाम का वासा ।
कोई कोई जाने साधु विवेकी, त्याग त्रिलोकी आसा ॥
जो कोई तीन की आसा धारे, चौथे पद नहीं आवे ।
गुमिरन भजन ध्यान गहि राखे, तब चौथे पद पावे ॥
सतसंगी बने साध की गति ले, हंस भाव चित लावे ।
शब्द नीर को मन कर छाने, परम हंस गति पावे ॥
सुरत0 इन चारों के ऊपर भाई, संत की पदवी भाई ।
नाम रहे सतगुरु आधीना, राधास्वामी भेद बताई ॥
कोई कोई परखे राधास्वामी बना, बैना रटन लगावे । ।
तब सत मत का सार पिछाने, जीते मुक्ति मनावे ॥
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Song 50 — Hindi
250. होली होली होली होली, सुरत खेले भक्ति की होली ॥टेक। ।
काल कर्म माया ने सब विधि, जग में दिया झकोली ।
तब सूरत को सुरता आई, त्यागी आंख मिचोली ॥
सुरत0 शारद शेष गनेश महेशा, ब्रह्मा विष्णु की टोली ।
यह नहीं जाने मरम संतों का, मरम नहीं है ठिठोली ॥
पुस्तक योथी में भेद कहां है, भेद है संत की झोली ।
घट झोली रहे ज्ञान अबीरा, प्रेम गुलाल की गोली ॥
भौं के मध्य पाये पिचकारी, गुरु चरनन झकझोली ।
गावे आनन्द राग सुहाना, निरख सन्त मत बोली ॥
पीकर प्याला नाम अमीरस, हो रहे बारी भोली ।
नशा न उतरे प्रेम भंग का, घट प्याले में घोली ॥
चित की वृत्ति निरोध किया तब, होगई अटल अडोली । ।
तब आई गुरु की शरनागत, चरन छांह में डोली ॥
सहजे सहजे फेरो मन को, जैसे पान तम्बोली ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, जो होनी थी होली ॥
काल कर्म माया ने सब विधि, जग में दिया झकोली ।
तब सूरत को सुरता आई, त्यागी आंख मिचोली ॥
सुरत0 शारद शेष गनेश महेशा, ब्रह्मा विष्णु की टोली ।
यह नहीं जाने मरम संतों का, मरम नहीं है ठिठोली ॥
पुस्तक योथी में भेद कहां है, भेद है संत की झोली ।
घट झोली रहे ज्ञान अबीरा, प्रेम गुलाल की गोली ॥
भौं के मध्य पाये पिचकारी, गुरु चरनन झकझोली ।
गावे आनन्द राग सुहाना, निरख सन्त मत बोली ॥
पीकर प्याला नाम अमीरस, हो रहे बारी भोली ।
नशा न उतरे प्रेम भंग का, घट प्याले में घोली ॥
चित की वृत्ति निरोध किया तब, होगई अटल अडोली । ।
तब आई गुरु की शरनागत, चरन छांह में डोली ॥
सहजे सहजे फेरो मन को, जैसे पान तम्बोली ।
राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, जो होनी थी होली ॥
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Song 51 — Hindi
251. खेले सुरत आज सतज्ञान की होली ।।टेक। ।
शब्द का वन मनन अर्थ का, आशय का निदिध्यासन ।
भजन ध्यान सुमिरन की यह विधि,हो रही अमल अतोली ॥ खेले0
सतसंगत में गुरु के आई, नाम वाक्य चित धारा ।
घट में विवेक विचार संभारा, अनहद धुन तब बोली । ।
खेले0 ज्ञान भक्ति में भेद नहीं कुछ, कोई कोई बिरला जाने ।
सुरत सखी पहनी जब चित से, गुरुमुखता की चोली ॥दम
इन्द्रिन का शम निज मन का, समाधान संशय का। ।
भक्ति मुक्ति इच्छा उपजे चित, यह सिद्धांत अमोली ॥
चौसाधन बिन ज्ञान है निष्फल, नहीं अधिकारी कोई। ।
महावाक्य की विधि तब सूझे, ज्ञान का परदा खोली ॥
गुरुमुख शब्द वाच है सांचा, लक्ष गुरु का रूपा ।
पिये भंग चिन्तन का नित ही, प्रेम के जल में घोली ॥
अधिष्ठान में वृत्ति जमावे, रहे मगन मन अपने ।
शब्द ओम्कार सुरत घट निर्मल, सत पद जाय टटोली ॥
सुन्न शिखर पर ध्यान जमावे, भँवर में बंसी बजावे ।
सतपद में करे सदा निवासा, अमल विमल सुरत भोली ॥
यहि विधि होली खेले सजनी, नाम संग गुरु साथा ।
राधास्वामी दया रूप तब दरसे, लगे समाधि अडोली ॥
शब्द का वन मनन अर्थ का, आशय का निदिध्यासन ।
भजन ध्यान सुमिरन की यह विधि,हो रही अमल अतोली ॥ खेले0
सतसंगत में गुरु के आई, नाम वाक्य चित धारा ।
घट में विवेक विचार संभारा, अनहद धुन तब बोली । ।
खेले0 ज्ञान भक्ति में भेद नहीं कुछ, कोई कोई बिरला जाने ।
सुरत सखी पहनी जब चित से, गुरुमुखता की चोली ॥दम
इन्द्रिन का शम निज मन का, समाधान संशय का। ।
भक्ति मुक्ति इच्छा उपजे चित, यह सिद्धांत अमोली ॥
चौसाधन बिन ज्ञान है निष्फल, नहीं अधिकारी कोई। ।
महावाक्य की विधि तब सूझे, ज्ञान का परदा खोली ॥
गुरुमुख शब्द वाच है सांचा, लक्ष गुरु का रूपा ।
पिये भंग चिन्तन का नित ही, प्रेम के जल में घोली ॥
अधिष्ठान में वृत्ति जमावे, रहे मगन मन अपने ।
शब्द ओम्कार सुरत घट निर्मल, सत पद जाय टटोली ॥
सुन्न शिखर पर ध्यान जमावे, भँवर में बंसी बजावे ।
सतपद में करे सदा निवासा, अमल विमल सुरत भोली ॥
यहि विधि होली खेले सजनी, नाम संग गुरु साथा ।
राधास्वामी दया रूप तब दरसे, लगे समाधि अडोली ॥
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Song 52 — Hindi
252. होली आई खेले फाग, सुरतिया सुहाग भरी ॥टेक। ।
दोऊ आँखों की बनी पिचकारी, प्रेम रंग भरपूर ।
तक तक गुरु मूरति पर छिड़का, भक्ति दृष्टि से धूर ॥
सुरतिया हिये की झोली गुलाल प्रीति का, बुक्का भाव सुहाना ।
गोला कुमकुम फेंक के मारा, रूप बनाया निशाना ॥
अनहद राग फाग धुन लागी, सहज भक्ति की होली ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत सुहागिन भोली ॥
दोऊ आँखों की बनी पिचकारी, प्रेम रंग भरपूर ।
तक तक गुरु मूरति पर छिड़का, भक्ति दृष्टि से धूर ॥
सुरतिया हिये की झोली गुलाल प्रीति का, बुक्का भाव सुहाना ।
गोला कुमकुम फेंक के मारा, रूप बनाया निशाना ॥
अनहद राग फाग धुन लागी, सहज भक्ति की होली ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत सुहागिन भोली ॥
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Song 53 — Hindi
253. होली आई खेले फाग, सुरतिया सुहाग भरी ॥टेक। ।
सोलह शृंगार के भूषन पहने साड़ी प्रीत की धारी ।
प्रेम अबीर गुलाल भक्ति ले, ठुमक चली मतवारी ॥
होली तिल पर सहस कमल का बिंदा, माथे टीका त्रिकुटी ।
सुन्न की टिकली सोहे मध्य में, भंवर की झूमर प्रगटी ॥
भक्ति सेंदूर से माँग भराई, सत मोतिन लड़ माला ।
राधास्वामी चरन परिक्रमा फिरती,सुरति नारि बर वाला ॥
सोलह शृंगार के भूषन पहने साड़ी प्रीत की धारी ।
प्रेम अबीर गुलाल भक्ति ले, ठुमक चली मतवारी ॥
होली तिल पर सहस कमल का बिंदा, माथे टीका त्रिकुटी ।
सुन्न की टिकली सोहे मध्य में, भंवर की झूमर प्रगटी ॥
भक्ति सेंदूर से माँग भराई, सत मोतिन लड़ माला ।
राधास्वामी चरन परिक्रमा फिरती,सुरति नारि बर वाला ॥
बिनती
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Song 54 — Hindi
(254 कुल संख्या 1156) आंख में रूप अनूप बिराजे, जिभ्या पर तेरा नाम रहे ।
मन में तेरा भजन ध्यान हो, इसी से मुझको काम रहे ॥
जो कुछ देखू तेरी हो लीला, जो कुछ कहूँ हो नाम तेरा ।
जो कुछ करूं हो सेवा तेरी, सुमिरन आठों याम तेरा ॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, दया दृष्टि मुझ पर कीजे ।
जग के मोह जाल कटवाकर, चरन शरन में लीजे ॥
145
पच्चीसवी धुन
प्रार्थना
मन में तेरा भजन ध्यान हो, इसी से मुझको काम रहे ॥
जो कुछ देखू तेरी हो लीला, जो कुछ कहूँ हो नाम तेरा ।
जो कुछ करूं हो सेवा तेरी, सुमिरन आठों याम तेरा ॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, दया दृष्टि मुझ पर कीजे ।
जग के मोह जाल कटवाकर, चरन शरन में लीजे ॥
145
पच्चीसवी धुन
प्रार्थना
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Song 55 — Hindi
( 254) करम भोग अति कर सहे, पाया विपति कलेश ।
दाता अब तो दया कर, पहुँचू सत के देश ।
काल करम व्याये नहीं, मिटे मोह संसार ।
सहजे ही भव सिंध से, कर बेड़े को पार ॥
ज्ञान ज्ञान का ज्ञान तू, ध्यान ध्यान का ध्यान ।
तेरी कृपा महान से, छूटे सब अज्ञान ॥
तुझ में बल और शक्ति है, तू है शक्तिवान ।
अपने बल और शक्ति से, मेरा लगादे ठिकान । ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब कर मेरी सहाय ।
सुरत बहिरमुख ना रहे, अन्वरमुख बन जाय ।
सोहर
दाता अब तो दया कर, पहुँचू सत के देश ।
काल करम व्याये नहीं, मिटे मोह संसार ।
सहजे ही भव सिंध से, कर बेड़े को पार ॥
ज्ञान ज्ञान का ज्ञान तू, ध्यान ध्यान का ध्यान ।
तेरी कृपा महान से, छूटे सब अज्ञान ॥
तुझ में बल और शक्ति है, तू है शक्तिवान ।
अपने बल और शक्ति से, मेरा लगादे ठिकान । ।
राधास्वामी आदि गुरु, अब कर मेरी सहाय ।
सुरत बहिरमुख ना रहे, अन्वरमुख बन जाय ।
सोहर
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Song 56 — Hindi
255. घरसत धार अखण्ड, द बिन पानी हो ।
ललना, उठत फुहार, सुरत मुसकानी हो ॥1 ॥
बिन वाती बिन दीप, ज्योत प्रकासे हो ।
ललना, ज्योत ज्योत विचित्र, प्रकाश विकासे हो ॥2 ॥
लीला अगम अथाह, अगाध की खानी हो ।
ललना, देखि सुरत हैरान, चकित मन बानी हो ॥3 ॥
हरखि हरखि हरखान, न जाय बखानी हो ।
ललना, जाने कैसे असन्त, सन्त कोई जानी हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, बिलास विलासी हो ।
ललना, हुलसी हुलसी हुलास, हटी भव त्रासी हो ॥5 ॥
ललना, उठत फुहार, सुरत मुसकानी हो ॥1 ॥
बिन वाती बिन दीप, ज्योत प्रकासे हो ।
ललना, ज्योत ज्योत विचित्र, प्रकाश विकासे हो ॥2 ॥
लीला अगम अथाह, अगाध की खानी हो ।
ललना, देखि सुरत हैरान, चकित मन बानी हो ॥3 ॥
हरखि हरखि हरखान, न जाय बखानी हो ।
ललना, जाने कैसे असन्त, सन्त कोई जानी हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, बिलास विलासी हो ।
ललना, हुलसी हुलसी हुलास, हटी भव त्रासी हो ॥5 ॥
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Song 57 — Hindi
2256. ब्रह्मा चौ मुख हीन, वेद मत सृष्टि हो ।
ललना, हंस समान उड़ान, नयन बिन दृष्टि हो ॥1 ॥
विना शंख का विष्णु, नाद धुनि गाजे हो ।
ललना, गदा पदम नहीं चक्र, बजावे बाजे हो ॥2 ॥
बिन त्रिशूल का शम्भु, जगत संहारा हो ।
ललना, बिना सीस का शेष, धरे महि भारा हो ॥3 ॥
मुख बिन बानी बोल, पांव बिन चाले हो ।
ललना, बिनकर करे सुकर्म, कृपाल दयाला हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, देखि हरखानी हो ।
ललना, लखि लखि अलख विलास,हिया मगनानी हो ॥शा
ललना, हंस समान उड़ान, नयन बिन दृष्टि हो ॥1 ॥
विना शंख का विष्णु, नाद धुनि गाजे हो ।
ललना, गदा पदम नहीं चक्र, बजावे बाजे हो ॥2 ॥
बिन त्रिशूल का शम्भु, जगत संहारा हो ।
ललना, बिना सीस का शेष, धरे महि भारा हो ॥3 ॥
मुख बिन बानी बोल, पांव बिन चाले हो ।
ललना, बिनकर करे सुकर्म, कृपाल दयाला हो ॥4 ॥
भाग्यवती बरनारि, देखि हरखानी हो ।
ललना, लखि लखि अलख विलास,हिया मगनानी हो ॥शा
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Song 58 — Hindi
257. है कोई साध सुजान, शब्द अर्थ जाने हो ।
ललना, भाग्यवती मनमान, मन ही मन माने हो ॥1 ॥
बुंद सिंध के रूप, सिंध गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती लख दशा, मगन मन मोहे हो ॥2 ॥
किरन में भानु प्रकासे, किरन भई भानु हो ।
ललना, भाग्यवती के भाव, दोऊ एक ठानू हो ॥3 ॥
जीव में ब्रह्म समान, ब्रह्म जीव खानी हो ।
ललना, भाग्यवती सब जान, भई असमानी हो ॥4 ॥
पृथवी अकास विराज, पिंड ब्रह्मांडा हो ।
ललना, भाग्यवती चढ़ी गगन, किया खंड खंडा हो ॥5 ॥
ललना, भाग्यवती मनमान, मन ही मन माने हो ॥1 ॥
बुंद सिंध के रूप, सिंध गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती लख दशा, मगन मन मोहे हो ॥2 ॥
किरन में भानु प्रकासे, किरन भई भानु हो ।
ललना, भाग्यवती के भाव, दोऊ एक ठानू हो ॥3 ॥
जीव में ब्रह्म समान, ब्रह्म जीव खानी हो ।
ललना, भाग्यवती सब जान, भई असमानी हो ॥4 ॥
पृथवी अकास विराज, पिंड ब्रह्मांडा हो ।
ललना, भाग्यवती चढ़ी गगन, किया खंड खंडा हो ॥5 ॥
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Song 59 — Hindi
258. गोद में मचल दयाल, खेल नित खेले हो ।
ललना, भाग्यवती है निहाल, मेल सत मेले हो ॥1 ॥
गोद में बाल गोपाल घर में ढिंडोरा हो ।
ललना, भाग्यवती लखि हाल, चकित मन मेरा हो ॥2 ॥
बालक खेले गोद, खोज कहां कीजे हो ।
ललना, भाग्यवती कर दृष्टि, प्रेम रस भीजे हो ॥3 ॥
गर्भ में बालक आय, गर्भ के बाहर हो ।
ललना, भाग्यवती घट देखे, यहां वहां जाहिर हो ॥4 ॥
अन्तर बाहर एक, एक में एकी हो ।
ललना, भाग्यवती रही झूम, ‘दयाल’ की टेकी हो ॥5 ॥
ललना, भाग्यवती है निहाल, मेल सत मेले हो ॥1 ॥
गोद में बाल गोपाल घर में ढिंडोरा हो ।
ललना, भाग्यवती लखि हाल, चकित मन मेरा हो ॥2 ॥
बालक खेले गोद, खोज कहां कीजे हो ।
ललना, भाग्यवती कर दृष्टि, प्रेम रस भीजे हो ॥3 ॥
गर्भ में बालक आय, गर्भ के बाहर हो ।
ललना, भाग्यवती घट देखे, यहां वहां जाहिर हो ॥4 ॥
अन्तर बाहर एक, एक में एकी हो ।
ललना, भाग्यवती रही झूम, ‘दयाल’ की टेकी हो ॥5 ॥
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Song 60 — Hindi
259. सहस कमल दल मांह, चन्द्र रवि तारा हो ।
ललना, भाग्यवती चढ़ि देख, निरंजन द्वारा हो ॥1 ॥
त्रिकुटी महल गुरु धाम, ओम धुन बानी हो ।
ललना, भाग्यवती सुन कान, वेद परमानी हो ॥2 ॥
मुन्न शिखर अस्थान, अर्धशशी ज्योती हो ।
ललना, भाग्यवती लखि रूप, समाहित होती हो ॥3 ॥
भंवर गुफा के बीच, बांसरी बाजी हो ।
ललना; भाग्यवती सुन कान, सोहमस्मि राजी हो ॥4 ॥
सत्त लोक धुनबीन, अनोखी निराली हो ।
ललना, भाग्यवती सुरतनारि, भई मतवाली हो ॥5 ॥
ललना, भाग्यवती चढ़ि देख, निरंजन द्वारा हो ॥1 ॥
त्रिकुटी महल गुरु धाम, ओम धुन बानी हो ।
ललना, भाग्यवती सुन कान, वेद परमानी हो ॥2 ॥
मुन्न शिखर अस्थान, अर्धशशी ज्योती हो ।
ललना, भाग्यवती लखि रूप, समाहित होती हो ॥3 ॥
भंवर गुफा के बीच, बांसरी बाजी हो ।
ललना; भाग्यवती सुन कान, सोहमस्मि राजी हो ॥4 ॥
सत्त लोक धुनबीन, अनोखी निराली हो ।
ललना, भाग्यवती सुरतनारि, भई मतवाली हो ॥5 ॥
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Song 61 — Hindi
260. चुवत अमी रस चूद, छमा छम बरसे हो ।
ललना, भूमी पताल अघाय, पपीहा तरसे हो ॥1 ॥
प्रगटे दयाल कृपाल, दया की खानी हो ।
ललना, दीन अधीन निहाल, दुखी अभिमानी हो ॥2 ॥
उदय प्रभात का सूर, कमल मुस्काने हो ।
ललना, उल्लू गेदुरा डरे, वृक्ष में लुकाने हो ॥3 ॥
भाग्यवती लखि दशा, विचार परायन हो ।
ललना; भाग्य सराहत धाय, परी गुरु पायन हो ॥4 ॥
बरस बरस चहुँ ओर, दया का पानी हो ।
ललना, रिमझिम चहुँदिस होय, सुरत मगनानी हो ॥5 ॥
देह की चुनर भीज, ताप त्रय हारी हो ।
ललना, चरन दयाल के पाय, सन्त मत धारी हो ॥6 ॥
गुरु दयाल खिलाय, बाल गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती का भाग, अलख लखि मोहे हो ॥7 ॥
ललना, भूमी पताल अघाय, पपीहा तरसे हो ॥1 ॥
प्रगटे दयाल कृपाल, दया की खानी हो ।
ललना, दीन अधीन निहाल, दुखी अभिमानी हो ॥2 ॥
उदय प्रभात का सूर, कमल मुस्काने हो ।
ललना, उल्लू गेदुरा डरे, वृक्ष में लुकाने हो ॥3 ॥
भाग्यवती लखि दशा, विचार परायन हो ।
ललना; भाग्य सराहत धाय, परी गुरु पायन हो ॥4 ॥
बरस बरस चहुँ ओर, दया का पानी हो ।
ललना, रिमझिम चहुँदिस होय, सुरत मगनानी हो ॥5 ॥
देह की चुनर भीज, ताप त्रय हारी हो ।
ललना, चरन दयाल के पाय, सन्त मत धारी हो ॥6 ॥
गुरु दयाल खिलाय, बाल गति सोहे हो ।
ललना, भाग्यवती का भाग, अलख लखि मोहे हो ॥7 ॥
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Song 62 — Hindi
261बरसत धार अखण्ड, सुधा रस पानी हो ।
ललना, धार में उठत फुहार, शब्द संग बानी हो ॥1 ॥
चमकत ज्योत अपार, ज्योत की खानी हो ।
ललना, रवि शशि गयले लजाय, दृश्य असमानी हो ॥2 ॥
बिन बाती जले दिया, दिया परमानी हो ।
ललना, सूझे पिंड ब्रह्मांड, अकथ सो अगम कहानी हो ॥3 ॥
भीज रही सुरत नार, अंग नहीं पानी हो। ।
ललना, सुरत निरत के रूप, सहज मुसकानी हो ॥4 ॥
घट में अघट का पन्थ, चले गुरु ज्ञानी हो ।
ललना, बूझे बिरला भेद, साधु कोई सन्त सुहानी हो ॥5 ॥
शब्द सुरत की बात, शब्द अलगानी हो ।
ललना, अटक भटक मिट जाय, अभर लटकानी हो ॥6 ॥
कमल नीर की रहनी, जल पंछी जानी हो ।
ललना, जो कोई बुझे भेद, बने निरबानी हो ॥7 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश, न गति यह जानी हो ।
ललना, क्योंकर कहे सुनाय, कोई नर ज्ञानी हो ॥8 ॥
भाग्यवती नित मुने, यह राग पुरानी हो ।
ललना, सुन सुन रीझे सन्त जन, मुनि ज्ञानी हो ॥6 ॥
ललना, धार में उठत फुहार, शब्द संग बानी हो ॥1 ॥
चमकत ज्योत अपार, ज्योत की खानी हो ।
ललना, रवि शशि गयले लजाय, दृश्य असमानी हो ॥2 ॥
बिन बाती जले दिया, दिया परमानी हो ।
ललना, सूझे पिंड ब्रह्मांड, अकथ सो अगम कहानी हो ॥3 ॥
भीज रही सुरत नार, अंग नहीं पानी हो। ।
ललना, सुरत निरत के रूप, सहज मुसकानी हो ॥4 ॥
घट में अघट का पन्थ, चले गुरु ज्ञानी हो ।
ललना, बूझे बिरला भेद, साधु कोई सन्त सुहानी हो ॥5 ॥
शब्द सुरत की बात, शब्द अलगानी हो ।
ललना, अटक भटक मिट जाय, अभर लटकानी हो ॥6 ॥
कमल नीर की रहनी, जल पंछी जानी हो ।
ललना, जो कोई बुझे भेद, बने निरबानी हो ॥7 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश, न गति यह जानी हो ।
ललना, क्योंकर कहे सुनाय, कोई नर ज्ञानी हो ॥8 ॥
भाग्यवती नित मुने, यह राग पुरानी हो ।
ललना, सुन सुन रीझे सन्त जन, मुनि ज्ञानी हो ॥6 ॥
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Song 63 — Hindi
262. प्रगट भईले राधास्वामी, ध्यान गर्भ फूटल हो ।
ललना, दरस परस सत्कार, जगत जस लूटल हो ॥1 ॥
चहुँ दिस मंगल राग, नाद धुनि गाजल हो ।
ललना, त्रिकुटी महल अपार, अनाहद वाजल हो ॥2 ॥
सुरत सखी रही भूम, मगन मन नाचल हो ।
ललना, पी पी अमृत रस सार, निरत रहि मातल हो ॥3 ॥
पंडित वेद उचारि के, चौक पुरायल हो ।
ललना, बन्दनवार सजाय, द्वार बंधायल हो ॥4 ॥
छबि पर बल बल जाय, उमंग बढ़ावल हो ।
ललना, भाग्यवती बन याचक, भक्ति बर मांगल हो ॥5 ॥
ललना, दरस परस सत्कार, जगत जस लूटल हो ॥1 ॥
चहुँ दिस मंगल राग, नाद धुनि गाजल हो ।
ललना, त्रिकुटी महल अपार, अनाहद वाजल हो ॥2 ॥
सुरत सखी रही भूम, मगन मन नाचल हो ।
ललना, पी पी अमृत रस सार, निरत रहि मातल हो ॥3 ॥
पंडित वेद उचारि के, चौक पुरायल हो ।
ललना, बन्दनवार सजाय, द्वार बंधायल हो ॥4 ॥
छबि पर बल बल जाय, उमंग बढ़ावल हो ।
ललना, भाग्यवती बन याचक, भक्ति बर मांगल हो ॥5 ॥
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Song 64 — Hindi
263. कहां कहां गइलिंउं, कहां कहां नित भरमइलिउँ हो ।
ललना, देवी पितर मनव लिउँ, जती सती पुजलिउँ हो ॥1 ॥
बाम्हन विप्र जेवइलिउ, बरत बहु करलिउ हो ।
ललना, घूमेउँ देस विदेस, मन में पछतइलिउँ हो ॥2 ॥
निकसत एक न काम, चित्त में लजइलिउ हो ।
ललना, जंतर मंतर करइलिउँ, वयस वितइलिउँ हो ॥3 ॥
इहवां उहवाँ फिइरलिउँ, धूरि उड़इलिउँ हो ।
ललना, अन्त मिलेन गुरुदेव, जन्म फल पवइलिउँ हो ॥4 ॥
घट कई खुलल कपाट, घटहि गुरु पइठलिउँ हो ।
ललना, घट में ठाकुर द्वार, घटहि गुरु पवलिउँ हो ॥5 ॥
प्रगटल ज्योत अनंत, आरती कइलिउ हो ।
ललना, बाजल अनन्द वधाव, हरखि हरखइलिउँ हो ॥6 ॥
धनि धनि सतगुरु देव, चरन में अइलिउँ हो ।
ललना, भाग्यवती सुखी भइलिउ, तब भाग सरहलिउ हो॥7 ॥
ललना, देवी पितर मनव लिउँ, जती सती पुजलिउँ हो ॥1 ॥
बाम्हन विप्र जेवइलिउ, बरत बहु करलिउ हो ।
ललना, घूमेउँ देस विदेस, मन में पछतइलिउँ हो ॥2 ॥
निकसत एक न काम, चित्त में लजइलिउ हो ।
ललना, जंतर मंतर करइलिउँ, वयस वितइलिउँ हो ॥3 ॥
इहवां उहवाँ फिइरलिउँ, धूरि उड़इलिउँ हो ।
ललना, अन्त मिलेन गुरुदेव, जन्म फल पवइलिउँ हो ॥4 ॥
घट कई खुलल कपाट, घटहि गुरु पइठलिउँ हो ।
ललना, घट में ठाकुर द्वार, घटहि गुरु पवलिउँ हो ॥5 ॥
प्रगटल ज्योत अनंत, आरती कइलिउ हो ।
ललना, बाजल अनन्द वधाव, हरखि हरखइलिउँ हो ॥6 ॥
धनि धनि सतगुरु देव, चरन में अइलिउँ हो ।
ललना, भाग्यवती सुखी भइलिउ, तब भाग सरहलिउ हो॥7 ॥
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Song 65 — Hindi
264. सुमिर सुमिर राधास्वामी, नाम अमोला हो ।
ललना, आय गई नभ पार, सुन्न के हिंडोला हो ॥1 ॥
धूम मची अति घोर, रंग मृदु बानी हो ।
ललना, प्रगटा चन्द्र ललाट, स्वेत की निशानो हो ॥2 ॥
चन्द्र मौली सुरत बनी, समाधि रचाई हो ।
ललना, काल भया तब मौन, मौन साया माई हो ॥3 ॥
बिस्माधी अस्थान, सूझ नहिं सूझे हो ।
ललना, लखे सुसन्त सुजान, साध कोई बूझे हो ॥4 ॥
भाग्यवती को देख, दयाल बतावे हो ।
ललना, यह नहीं ठहरन धाम, महासुन्न धावे हो ॥5 ॥
बिनती
ललना, आय गई नभ पार, सुन्न के हिंडोला हो ॥1 ॥
धूम मची अति घोर, रंग मृदु बानी हो ।
ललना, प्रगटा चन्द्र ललाट, स्वेत की निशानो हो ॥2 ॥
चन्द्र मौली सुरत बनी, समाधि रचाई हो ।
ललना, काल भया तब मौन, मौन साया माई हो ॥3 ॥
बिस्माधी अस्थान, सूझ नहिं सूझे हो ।
ललना, लखे सुसन्त सुजान, साध कोई बूझे हो ॥4 ॥
भाग्यवती को देख, दयाल बतावे हो ।
ललना, यह नहीं ठहरन धाम, महासुन्न धावे हो ॥5 ॥
बिनती
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Song 66 — Hindi
(265 कुल संख्या 1167) तड़प रही दिन रेन, चित्त को शान्ति न आवे ।
व्याकुल मन घबराय, कहीं सुख चैन न पावे ॥
मोह जाल में फंस रही, मुझे भरमावे माया ।
परख न आवे हाय, धूप क्या क्या है छाया ।
नहीं जब सूझा उपाय, पड़ी आकर गुरु द्वारे । ।
अब कुछ करो सहाय, तुम्हीं सच्चे रखवारे ।
हरो हिये की पीर, बचन से मिले दिलासा ।
छोड़ी सबकी आस, तुम्हारी अब रही आसा ।
आस बँधाओ धरि धरि, गुरु राधास्वामी ।
चरन कमल में बार बार, मैं करूँ परनामी ॥
151
छब्बीसवी धुन
प्रार्थना
व्याकुल मन घबराय, कहीं सुख चैन न पावे ॥
मोह जाल में फंस रही, मुझे भरमावे माया ।
परख न आवे हाय, धूप क्या क्या है छाया ।
नहीं जब सूझा उपाय, पड़ी आकर गुरु द्वारे । ।
अब कुछ करो सहाय, तुम्हीं सच्चे रखवारे ।
हरो हिये की पीर, बचन से मिले दिलासा ।
छोड़ी सबकी आस, तुम्हारी अब रही आसा ।
आस बँधाओ धरि धरि, गुरु राधास्वामी ।
चरन कमल में बार बार, मैं करूँ परनामी ॥
151
छब्बीसवी धुन
प्रार्थना
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Song 67 — Hindi
266. आनन्द मंगल साज, साज की बजी बधाई ।
सतगुरु आये जगत में, मुझे लिया अपनाई । ।
जनम जनम भटकत फिरा, नहीं मिला ठिकाना ।
आय मिले गुरुदेव, नाम का दे दियो दाना ।
नाम पाय पाई सरन, पद कमल में बासा ।
आस लगी गुरु चरन की, मन क्यों हो उदासा ॥
सुरत शब्द अभ्यास का, करू नित अब साधन ।
निर्धनता का भय नहीं,मिला प्रेम का जब धन ।
राधास्वामी की दया, मेरी बन आई ।
दुखदाई संसार, बन गया अब सुखदाई ॥
कुण्डलियाँ ॐ
सतगुरु आये जगत में, मुझे लिया अपनाई । ।
जनम जनम भटकत फिरा, नहीं मिला ठिकाना ।
आय मिले गुरुदेव, नाम का दे दियो दाना ।
नाम पाय पाई सरन, पद कमल में बासा ।
आस लगी गुरु चरन की, मन क्यों हो उदासा ॥
सुरत शब्द अभ्यास का, करू नित अब साधन ।
निर्धनता का भय नहीं,मिला प्रेम का जब धन ।
राधास्वामी की दया, मेरी बन आई ।
दुखदाई संसार, बन गया अब सुखदाई ॥
कुण्डलियाँ ॐ
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Song 68 — Hindi
267. परमारथ का सार, साध कोई बिरला जाने ।
विरला जाने साध, करे सतगुरु की सेवा ।
सेवा के प्रताप मिटे, सब भरम के भेवा ॥1 ॥
भेव भेद को त्याग, न राखे मन में शंका । ।
धर विवेक चित माँहि, चढ़े त्रिकुटी गढ़ लंका ॥2 ॥
लंका चढ़ दससीस, रजोगुण रावण मारा ।
कुम्भकर्ण तम त्याग, विभीषण सत को धारा ॥3 ॥
मेघनाद को जीत, शब्द के चढ़े विमाने ।
परमारथ का सार, साध कोई विरला जाने ॥4 ॥
विरला जाने साध, करे सतगुरु की सेवा ।
सेवा के प्रताप मिटे, सब भरम के भेवा ॥1 ॥
भेव भेद को त्याग, न राखे मन में शंका । ।
धर विवेक चित माँहि, चढ़े त्रिकुटी गढ़ लंका ॥2 ॥
लंका चढ़ दससीस, रजोगुण रावण मारा ।
कुम्भकर्ण तम त्याग, विभीषण सत को धारा ॥3 ॥
मेघनाद को जीत, शब्द के चढ़े विमाने ।
परमारथ का सार, साध कोई विरला जाने ॥4 ॥
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Song 69 — Hindi
268. सुख परमारथ सार, सार लख पावे कोई ॥
लख पावे कोई एक, पुरुष जो होय सियाना ।
तज अज्ञान विकार, विचार से गुरु का ज्ञाना ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान के संग, परम पद आसा लावे ।
आशा मन में लाय, सुन्न पद जाय समावे ॥2 ॥
सुन्न समाध लगाव, दशम दर पाट खुलाई। ।
मन के सकल विकल्प, त्याग करे शब्द कमाई ॥3 ॥
शब्द में वृत्ति जोड़, रूप है उसका सोई ।
सुख परमारथ सार, सार लख पावे सोई ॥4 ॥
लख पावे कोई एक, पुरुष जो होय सियाना ।
तज अज्ञान विकार, विचार से गुरु का ज्ञाना ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान के संग, परम पद आसा लावे ।
आशा मन में लाय, सुन्न पद जाय समावे ॥2 ॥
सुन्न समाध लगाव, दशम दर पाट खुलाई। ।
मन के सकल विकल्प, त्याग करे शब्द कमाई ॥3 ॥
शब्द में वृत्ति जोड़, रूप है उसका सोई ।
सुख परमारथ सार, सार लख पावे सोई ॥4 ॥
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Song 70 — Hindi
269. सुख का चिंतन यू करो, जैसे लोभी दाम । ।
जैसे लोभी दाम, चित्त वाही में राखे ।
गढ़ा खजाना नाक में, नित धन धन भाखे ॥1 ॥
धन धन भाखे लालची, चिंता रहे धन की ।
धन दौलत की चाह है, यह गति है मन की ॥2 ॥
गति है मन की यही, रात दिन धन का ध्याना ।
धन की लालच में फंसा, हरदम अज्ञाना ॥3 ॥
अज्ञाना को लालसा, धन से रखना काम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे लोभी दाम ॥4 ॥
जैसे लोभी दाम, चित्त वाही में राखे ।
गढ़ा खजाना नाक में, नित धन धन भाखे ॥1 ॥
धन धन भाखे लालची, चिंता रहे धन की ।
धन दौलत की चाह है, यह गति है मन की ॥2 ॥
गति है मन की यही, रात दिन धन का ध्याना ।
धन की लालच में फंसा, हरदम अज्ञाना ॥3 ॥
अज्ञाना को लालसा, धन से रखना काम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे लोभी दाम ॥4 ॥
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Song 71 — Hindi
270. सुख का चिंतन यू करो, जैसे कामी काम ॥
जैसे कामी काम, कामिनी को चित धारे ।
सोये जागे बैठे उठे, नहिं ताहि बिसारे ॥1 ॥
ताहि विसारे नाहिं, जागते सुमिरन उसका ।
सोते देखे स्वप्न, रहे मन में वही खटका ॥2 ॥
खटका खटकत रहे, खटक नहिं हिय से जावे ।
त्यागे जग व्यौहार, और कुछ मन नहिं लावे ॥3 ॥
मन नहिं लावे आपने, कामिन उसकी राम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे कामी काम ॥4 ॥
जैसे कामी काम, कामिनी को चित धारे ।
सोये जागे बैठे उठे, नहिं ताहि बिसारे ॥1 ॥
ताहि विसारे नाहिं, जागते सुमिरन उसका ।
सोते देखे स्वप्न, रहे मन में वही खटका ॥2 ॥
खटका खटकत रहे, खटक नहिं हिय से जावे ।
त्यागे जग व्यौहार, और कुछ मन नहिं लावे ॥3 ॥
मन नहिं लावे आपने, कामिन उसकी राम ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे कामी काम ॥4 ॥
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Song 72 — Hindi
271. सुख का चिंतन यू करो, जैसे मन संकल्प ॥
जैसे मन संकल्प, रूप औरन का धारे ।
हो जाये वही रूप, व अपना रूप बिसारे ॥1 ॥
अपना त्यागे रूप, और का रूप बनावे ।
भृगी कीट समान, कीट भृगी हो जावे ॥2 ॥
भृगी कीट बना, त्याग पृथ्वी को उड़ता ।
अपना नाता तोड़, उसी की ओर वह मुड़ता ॥3 ॥
मुड़ता सब संकल्प ले, तजा विकार विकल्प ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे मन संकल्प ॥4 ॥
जैसे मन संकल्प, रूप औरन का धारे ।
हो जाये वही रूप, व अपना रूप बिसारे ॥1 ॥
अपना त्यागे रूप, और का रूप बनावे ।
भृगी कीट समान, कीट भृगी हो जावे ॥2 ॥
भृगी कीट बना, त्याग पृथ्वी को उड़ता ।
अपना नाता तोड़, उसी की ओर वह मुड़ता ॥3 ॥
मुड़ता सब संकल्प ले, तजा विकार विकल्प ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे मन संकल्प ॥4 ॥
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Song 73 — Hindi
272. सुख का चिंतन 5 करो, जैसे पानी मीन ।
जैसे पानी मीन, तज नीर न जाये ।
कबहूँ होय विछोह, जीव और प्रान गवावे ॥1 ॥
प्रान गवाये आपना, पानी सों यू प्रीति ।
यही सार है भक्ति का, यही प्रेम की रीति ॥2 ॥
यही प्रेम की रीत है, महा कठिन व्यौहार ।
ऐसे ही सुख परमात्म का, मन में रहे पियार ॥3 ॥
रहे पियार विचार तज, दीन अधीन प्रवीन ।
सुख का चिंतन 5 करो, जैसे पानी मीन ॥4 ॥
जैसे पानी मीन, तज नीर न जाये ।
कबहूँ होय विछोह, जीव और प्रान गवावे ॥1 ॥
प्रान गवाये आपना, पानी सों यू प्रीति ।
यही सार है भक्ति का, यही प्रेम की रीति ॥2 ॥
यही प्रेम की रीत है, महा कठिन व्यौहार ।
ऐसे ही सुख परमात्म का, मन में रहे पियार ॥3 ॥
रहे पियार विचार तज, दीन अधीन प्रवीन ।
सुख का चिंतन 5 करो, जैसे पानी मीन ॥4 ॥
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Song 74 — Hindi
273. सुख की चिंता यूँ करो, ज्यों विरती व्यौहार ॥
ज्यों विरती व्यौहार, धार जो मन से निकसी ।
जाय मिले जिस वस्तु से, वा से नहीं बिछड़ी ॥1 ॥
वा से बिछड़ी नाहिं, उसी का रूप कहावे । ।
उसी की होकर रहे, उसी से नेह लगावे ॥2 ॥
नेह लगावे ब्रह्म से, विरती ब्रह्माकार ।
ब्रह्मानन्द का भान हो, सत संकल्प विचार ॥3 ॥
सत संकल्प विचार से, गुन गह तजे विकार ।
सुख का साधन यूँ करो, ज्यों वृती व्यौहार ॥4 ॥
ज्यों विरती व्यौहार, धार जो मन से निकसी ।
जाय मिले जिस वस्तु से, वा से नहीं बिछड़ी ॥1 ॥
वा से बिछड़ी नाहिं, उसी का रूप कहावे । ।
उसी की होकर रहे, उसी से नेह लगावे ॥2 ॥
नेह लगावे ब्रह्म से, विरती ब्रह्माकार ।
ब्रह्मानन्द का भान हो, सत संकल्प विचार ॥3 ॥
सत संकल्प विचार से, गुन गह तजे विकार ।
सुख का साधन यूँ करो, ज्यों वृती व्यौहार ॥4 ॥
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Song 75 — Hindi
274. सुख का चिंतन यू करो, जैसे वृत्ति विवेक ॥
जैसे वृत्ति विवेक, सार गहे तजे असारा ।
बूद लहर को छोड़, लहे सत सिंध अपारा ॥1 ॥
सिंध अपार महान, वह सबका है आधार ।
निराधार रह आप में, सबका उस पर भार ॥2 ॥
सबका उस पर भार है, भार को भार न जान ।
भार अभार का द्वन्द लख, रह निरद्वन्द महान ॥3 ॥
रह निरद्वन्द समान जब, व्यारे नहीं अनेक ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे वृत्ति विवेक ॥4 ॥
जैसे वृत्ति विवेक, सार गहे तजे असारा ।
बूद लहर को छोड़, लहे सत सिंध अपारा ॥1 ॥
सिंध अपार महान, वह सबका है आधार ।
निराधार रह आप में, सबका उस पर भार ॥2 ॥
सबका उस पर भार है, भार को भार न जान ।
भार अभार का द्वन्द लख, रह निरद्वन्द महान ॥3 ॥
रह निरद्वन्द समान जब, व्यारे नहीं अनेक ।
सुख का चिंतन यू करो, जैसे वृत्ति विवेक ॥4 ॥
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Song 76 — Hindi
275. सुख की जड़ निज रूप में, बिरला जाने कोय ॥
बिरला जाने कोय, जिसे गुरु संग मिला है ।
उसका मन निज रूप के, बीच में जाय पिला है ॥1 ॥
जाय पिला है मन तब, निज रूप लखे वह ।
लख लख कर निज रूप, सांच सत बात भखे वह ॥2 ॥
बात भखे वह जान, समझ औरन समझावे ।
आप तरे भव सिंध, और दूजे को तरावे ॥3 ॥
दना दिया तराय कर, सो परमारथी होय ।
सुख की जड़ निज रूप में, बिरला जाने कोय ॥4 ॥
बिरला जाने कोय, जिसे गुरु संग मिला है ।
उसका मन निज रूप के, बीच में जाय पिला है ॥1 ॥
जाय पिला है मन तब, निज रूप लखे वह ।
लख लख कर निज रूप, सांच सत बात भखे वह ॥2 ॥
बात भखे वह जान, समझ औरन समझावे ।
आप तरे भव सिंध, और दूजे को तरावे ॥3 ॥
दना दिया तराय कर, सो परमारथी होय ।
सुख की जड़ निज रूप में, बिरला जाने कोय ॥4 ॥
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Song 77 — Hindi
276. निज सुख आतम राम में, सन्तन किया विचार ।
सन्तन किया विचार, खोज कर पता लगाया ।
सतचित आनन्द भानु, रूप प्रगट होय आया ॥1 ॥
रूप प्रगट होय आया, रूप का किया विवेका ।
तज अनेक मत बाद, चित में धारा ऐका ॥2 ॥
धारा एका सोच समझ कर, ज्ञान बनाया ।
यही एक है सार, और सब झूठी माया ॥3 ॥
झूठी माया जान कर, जगत पे डारी छार ।
निज सुख आतम राम में, सन्तन किया बिचार ॥4 ॥
सन्तन किया विचार, खोज कर पता लगाया ।
सतचित आनन्द भानु, रूप प्रगट होय आया ॥1 ॥
रूप प्रगट होय आया, रूप का किया विवेका ।
तज अनेक मत बाद, चित में धारा ऐका ॥2 ॥
धारा एका सोच समझ कर, ज्ञान बनाया ।
यही एक है सार, और सब झूठी माया ॥3 ॥
झूठी माया जान कर, जगत पे डारी छार ।
निज सुख आतम राम में, सन्तन किया बिचार ॥4 ॥
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Song 78 — Hindi
277 इस जग में तुम य रहो, ज्यों मुरगाची नीर । ।
ज्यों मुरगावी नीर, नीर में गोते खावे ।
जल के बाहर आय, न अपनो पंख भिगोये ॥1 ॥
पंख न भीगे कभी, रहे सूखे का सूखा ।
जल थल एक समान, नहीं वह तृप्त न भूका ॥2 ॥
तृप्त न भूका नीरका, यू उमर बिताये ।
हँस गति वह पाय, जो मानसरोवर नहावे ॥3 ॥
मान सरोवर नहाय कर, हँस न पावे पीर ।
इस जग में तुम यू रहो, ज्यों मुरगावी नीर ॥4 ॥
ज्यों मुरगावी नीर, नीर में गोते खावे ।
जल के बाहर आय, न अपनो पंख भिगोये ॥1 ॥
पंख न भीगे कभी, रहे सूखे का सूखा ।
जल थल एक समान, नहीं वह तृप्त न भूका ॥2 ॥
तृप्त न भूका नीरका, यू उमर बिताये ।
हँस गति वह पाय, जो मानसरोवर नहावे ॥3 ॥
मान सरोवर नहाय कर, हँस न पावे पीर ।
इस जग में तुम यू रहो, ज्यों मुरगावी नीर ॥4 ॥
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Song 79 — Hindi
278. सबसे मिल जुल चालिये, रूप न अपनो त्याग ॥
रूप न अपनो त्याग, रूप में स्थिर रहना ।
भव की धार प्रवाह वेग में, कबहुँ न बहना ॥1 ॥
कबहुँ न बहना धार, शान्त होय निश्चल रहिये ।
चंचलता को त्याग, निश्चल की आदत लहिये ॥2 ॥
आदत लहिये साध, साध साधन का नेमी ।
जो कोई साधे भक्ति, ताहि को कहिये प्रेमी ॥3 ॥
प्रेमी जन का संग कर, सुख निदरा में जाग ।
सबसे मिल जुल चालिये, रूप न अपनो त्याग ॥4 ॥
रूप न अपनो त्याग, रूप में स्थिर रहना ।
भव की धार प्रवाह वेग में, कबहुँ न बहना ॥1 ॥
कबहुँ न बहना धार, शान्त होय निश्चल रहिये ।
चंचलता को त्याग, निश्चल की आदत लहिये ॥2 ॥
आदत लहिये साध, साध साधन का नेमी ।
जो कोई साधे भक्ति, ताहि को कहिये प्रेमी ॥3 ॥
प्रेमी जन का संग कर, सुख निदरा में जाग ।
सबसे मिल जुल चालिये, रूप न अपनो त्याग ॥4 ॥
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Song 80 — Hindi
279.गुरु विवेकी जब मिले, तब सूझे निरवान ॥
तब सूझे निरवान, नहीं कुछ समझ में आवे ।
सैन बेन के बीच, सन्त कोई सार लखावे ॥1 ॥
सार लखावे सन्त, सन्त की संगत करना ।
हित अनहित को त्याग, सन्त के गह ले चरना ॥2 ॥
गह ले चरना सन्त, सन्त तेरे हितकारी ।
राधास्वामी चरन शरन की, जा बलिहारी ॥3 ॥
जा बलिहारी गुरु के, गुरु से ले निज ज्ञान ।
गुरु विवेकी जब मिलें, तब सूझे निरवान ॥4 ॥
तब सूझे निरवान, नहीं कुछ समझ में आवे ।
सैन बेन के बीच, सन्त कोई सार लखावे ॥1 ॥
सार लखावे सन्त, सन्त की संगत करना ।
हित अनहित को त्याग, सन्त के गह ले चरना ॥2 ॥
गह ले चरना सन्त, सन्त तेरे हितकारी ।
राधास्वामी चरन शरन की, जा बलिहारी ॥3 ॥
जा बलिहारी गुरु के, गुरु से ले निज ज्ञान ।
गुरु विवेकी जब मिलें, तब सूझे निरवान ॥4 ॥
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Song 81 — Hindi
280. बिन साधन नहीं होय कुछ, यह जाने सब कोय ॥
यह जाने सब कोय, आग रहे लकड़ी भीतर ।
बिना मथे नहीं प्रगट होय, वह किंचित बाहर ॥1 ॥
किंचित बाहर प्रकट न होय, मेंहदी की लाली । ।
जो कोई पीसे ताहि करे, सो हाथ गुलाली ॥2 ॥
हाथ गुलाली होय, पीस मेंहदी जब लावे ।
तसे ही ब्रह्म का दरस, पुरुष साधन सों पावे ॥3 ॥
साधन सों सब पाइये, ऋद्धि सिद्धि बुद्धि सोय । ।
बिन साधन नहीं होय कुछ, यह जाने सब कोय ॥4 ॥
यह जाने सब कोय, आग रहे लकड़ी भीतर ।
बिना मथे नहीं प्रगट होय, वह किंचित बाहर ॥1 ॥
किंचित बाहर प्रकट न होय, मेंहदी की लाली । ।
जो कोई पीसे ताहि करे, सो हाथ गुलाली ॥2 ॥
हाथ गुलाली होय, पीस मेंहदी जब लावे ।
तसे ही ब्रह्म का दरस, पुरुष साधन सों पावे ॥3 ॥
साधन सों सब पाइये, ऋद्धि सिद्धि बुद्धि सोय । ।
बिन साधन नहीं होय कुछ, यह जाने सब कोय ॥4 ॥
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Song 82 — Hindi
281 बिन साधन के साधुवा, कोई साध न होय ॥
कोई साध न होय, जो साधन चित नहीं लावे ।
जानो ताहि असाध, सदा सो विपत कमावे ॥1 ॥
बिपत कमावे दुखी रहे, पड़ा काल के फंदा ।
ऐसा प्रानी मूढ़ रहे, बनत खुदा का बंदा ॥2 ॥
खुदा का बंदा बना, बंदगी जान है उसकी । ।
बंदा बन्धुआ होय, बन्ध गति शान है उसकी ॥3 ॥
शान है उसकी बंदगी, स्वतन्त्रता खोय ।
बिन साध न के साधुवा, कोई साध न होय ॥4 ॥
कोई साध न होय, जो साधन चित नहीं लावे ।
जानो ताहि असाध, सदा सो विपत कमावे ॥1 ॥
बिपत कमावे दुखी रहे, पड़ा काल के फंदा ।
ऐसा प्रानी मूढ़ रहे, बनत खुदा का बंदा ॥2 ॥
खुदा का बंदा बना, बंदगी जान है उसकी । ।
बंदा बन्धुआ होय, बन्ध गति शान है उसकी ॥3 ॥
शान है उसकी बंदगी, स्वतन्त्रता खोय ।
बिन साध न के साधुवा, कोई साध न होय ॥4 ॥
×
Song 83 — Hindi
282. साधन मन का खेल है, और कहो मत ताहि । ।
और कहो मत ताहि, यह मन है बड़ा खिलाड़ी ।
कबहुँ होय सचेत तो, कबहुँ निपट अनाड़ी ॥1 ॥
निपट अनाड़ी बना, कुबुद्धि की चढ़ी कमानी ।
त्याग दिया जब कुबुद्धि तो, होगया ज्ञानी ध्यानी ॥2 ॥
ज्ञानी ध्यानी बना जोड़कर, वृत्ती अपनी ।
वृत्ती वियोग कलेश, मेल ही सुख की रहनी ॥3 ॥
सुख की रहनी वृत्ती में, वृती साधन माह ।
साधन मन का खेल है, और कहो मत ताहि ॥4 ॥
और कहो मत ताहि, यह मन है बड़ा खिलाड़ी ।
कबहुँ होय सचेत तो, कबहुँ निपट अनाड़ी ॥1 ॥
निपट अनाड़ी बना, कुबुद्धि की चढ़ी कमानी ।
त्याग दिया जब कुबुद्धि तो, होगया ज्ञानी ध्यानी ॥2 ॥
ज्ञानी ध्यानी बना जोड़कर, वृत्ती अपनी ।
वृत्ती वियोग कलेश, मेल ही सुख की रहनी ॥3 ॥
सुख की रहनी वृत्ती में, वृती साधन माह ।
साधन मन का खेल है, और कहो मत ताहि ॥4 ॥
×
Song 84 — Hindi
283. मन का अमन बिमन करे, सोहै सन्त सुजान । ।
सोहै सन्त सुजान, ज्ञान का रूप है सोई ।
आवागवन को मेट, लीन निज रूप में होई ॥1 ॥
लीन रूप में रहे, योनी का भर्म मिटावे ।
करम धरम पाखंड के, फिर फन्द न आवे ॥2 ॥
फन्द न आवे सन्त, काल यम से वह नहीं डरते ।
न वह जन्मे कभी, जनम जनम कर फिर नहीं मरते ॥3 ॥
फिर नहीं मरते सन्त कभी, मन के परे ठिकान ।
मन को अमन विमन करे, सोहै सन्त सुजान ॥4 ॥
सोहै सन्त सुजान, ज्ञान का रूप है सोई ।
आवागवन को मेट, लीन निज रूप में होई ॥1 ॥
लीन रूप में रहे, योनी का भर्म मिटावे ।
करम धरम पाखंड के, फिर फन्द न आवे ॥2 ॥
फन्द न आवे सन्त, काल यम से वह नहीं डरते ।
न वह जन्मे कभी, जनम जनम कर फिर नहीं मरते ॥3 ॥
फिर नहीं मरते सन्त कभी, मन के परे ठिकान ।
मन को अमन विमन करे, सोहै सन्त सुजान ॥4 ॥
×
Song 85 — Hindi
284. सहज समाध विचित्र गति, वरन बखान न जाय । ।
बरन बखान न जाय, थके जिम्या मन बानी ।
अनुभव से लख पाय, कोई कोई बिरला ज्ञानी ॥1 ॥
बिरला ज्ञानी लखे, अलख गति अगम निशानी ।
जड़ चैतन नहीं होय, न बन्ध न मुक्ति कहानी ॥2 ॥
मुक्ति कहानी कहो, सूक्ष्म स्थूल न कारन ।
निरविकल्प सविकल्प, न सुन्न न मोहन मारन ॥3 ॥
मोहन मारन कल्पना, कल्पित कल्प रहाय ।
सहज साधना विचित्र गति, बरन बखान न जाय ॥4 ॥
बरन बखान न जाय, थके जिम्या मन बानी ।
अनुभव से लख पाय, कोई कोई बिरला ज्ञानी ॥1 ॥
बिरला ज्ञानी लखे, अलख गति अगम निशानी ।
जड़ चैतन नहीं होय, न बन्ध न मुक्ति कहानी ॥2 ॥
मुक्ति कहानी कहो, सूक्ष्म स्थूल न कारन ।
निरविकल्प सविकल्प, न सुन्न न मोहन मारन ॥3 ॥
मोहन मारन कल्पना, कल्पित कल्प रहाय ।
सहज साधना विचित्र गति, बरन बखान न जाय ॥4 ॥
×
Song 86 — Hindi
285. ज्ञानी मूढ़ की एक गति समझ लेउ मनमांह ॥
समझ लेव मन माँह, समझ कर भ्रान्ती हटाओ ।
मेटो जग जंजाल, काम को तुरत बनाओ ॥1 ॥
तुरत बनाओ काम, फिर अवसर नहीं ऐसा ।
सन्त शरन में जाय, संग करो जैसा तैसा ॥2 ॥
जैसा तैसा करो संग, संगत फल लहना ।
अपने मन ही विचार, शान्त मति चुप होय रहना ॥3 ॥
चुप होय रहना हृदय में, सतगुरु चरन की छांह ।
ज्ञानी मूढ़ की एक गति, समझ लेउ मन माह ॥4 ॥
समझ लेव मन माँह, समझ कर भ्रान्ती हटाओ ।
मेटो जग जंजाल, काम को तुरत बनाओ ॥1 ॥
तुरत बनाओ काम, फिर अवसर नहीं ऐसा ।
सन्त शरन में जाय, संग करो जैसा तैसा ॥2 ॥
जैसा तैसा करो संग, संगत फल लहना ।
अपने मन ही विचार, शान्त मति चुप होय रहना ॥3 ॥
चुप होय रहना हृदय में, सतगुरु चरन की छांह ।
ज्ञानी मूढ़ की एक गति, समझ लेउ मन माह ॥4 ॥
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Song 87 — Hindi
286. अपनी ओर निहारिये, औरन से क्या काम ॥
औरन से क्या काम, काम अब अपना कीजे ।
समय अमोलक मिला, चित कहीं और न दीजे ॥1 ॥
चित न दीजे और ठौर, नर जनम सुफल हो ।
अपना करो उपकार, हृदय तब शुद्ध बिमल हो ॥2 ॥
शुद्ध बिमल हो हृदय, सोध ले अपनी काया ।
काया मध्ये रहे, ब्रह्म जग, संस्त्रित माया ॥3 ॥
संश्रित माया कल्पना, कल्पित क्रोध और काम ।
अपनी ओर निहारिये, औरन से क्या काम ॥4 ॥
औरन से क्या काम, काम अब अपना कीजे ।
समय अमोलक मिला, चित कहीं और न दीजे ॥1 ॥
चित न दीजे और ठौर, नर जनम सुफल हो ।
अपना करो उपकार, हृदय तब शुद्ध बिमल हो ॥2 ॥
शुद्ध बिमल हो हृदय, सोध ले अपनी काया ।
काया मध्ये रहे, ब्रह्म जग, संस्त्रित माया ॥3 ॥
संश्रित माया कल्पना, कल्पित क्रोध और काम ।
अपनी ओर निहारिये, औरन से क्या काम ॥4 ॥
×
Song 88 — Hindi
287. भक्ति पन्थ में आय कर, तज दे भर्म विकार ॥
तज कर भरम विकार, ध्यान भगवत का करना ।
छूत छात बिसराय, नाम पर उसके मरना ॥1 ॥
प्रेम भाव से राम ने, खाये झूठे बेर ।
शबरी प्यारी भक्तिनी, लाई राम को घेर ॥2 ॥
साग बिदुर घर खालिया, तज दुर्योधन खीर ।
कृष्ण को प्यारे भक्त हैं, धीर भीर गम्भीर ॥3 ॥
धर्मराज के यज्ञ में, घंटा बोला नाहिं ।
ऋषि मुनि खाली भक्ति से, भक्ति श्वपच के मांहि ॥4 ॥
छूत छात और वरन का, भक्ति में कहाँ विचार ।
भक्ति पन्थ में आय कर, तज दे भरम विकार ॥1 ॥
तज कर भरम विकार, ध्यान भगवत का करना ।
छूत छात बिसराय, नाम पर उसके मरना ॥1 ॥
प्रेम भाव से राम ने, खाये झूठे बेर ।
शबरी प्यारी भक्तिनी, लाई राम को घेर ॥2 ॥
साग बिदुर घर खालिया, तज दुर्योधन खीर ।
कृष्ण को प्यारे भक्त हैं, धीर भीर गम्भीर ॥3 ॥
धर्मराज के यज्ञ में, घंटा बोला नाहिं ।
ऋषि मुनि खाली भक्ति से, भक्ति श्वपच के मांहि ॥4 ॥
छूत छात और वरन का, भक्ति में कहाँ विचार ।
भक्ति पन्थ में आय कर, तज दे भरम विकार ॥1 ॥
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Song 89 — Hindi
288. सूरज चमका गगन में, मिटा जगत अंधियार । ।
मिटा जगत अंधियार, कमल बिगसे बन अन्दर ।
भागा तिमिर विकार, रहा नहीं उसका कुछ डर ॥1 ॥
डर कोई कैसे करे, चोर डाकू सब भागे ।
पन्थी धरमी संयमी, पुरुषारथ लागे ॥2 ॥
दीपक जैसे दिप्त हो, निज घट दीवा बार ।
सूरज चमका गगन में, मिटा जगत अंधियार ॥3 ॥ बिनती
मिटा जगत अंधियार, कमल बिगसे बन अन्दर ।
भागा तिमिर विकार, रहा नहीं उसका कुछ डर ॥1 ॥
डर कोई कैसे करे, चोर डाकू सब भागे ।
पन्थी धरमी संयमी, पुरुषारथ लागे ॥2 ॥
दीपक जैसे दिप्त हो, निज घट दीवा बार ।
सूरज चमका गगन में, मिटा जगत अंधियार ॥3 ॥ बिनती
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Song 90 — Hindi
(289 कुल संख्या 1161) आनन्द की वर्षा हुई, धुनि नाम जो पाया ।
दुख कलेश का भय मिटा, गुरु ने की दाया ॥1 ॥
भक्ति युक्ति का दान दे, मुझको किया अपना ।
मेट दिया निज कृपा से, भव दुख का सपना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु देव, दया सागर धनी ।
दिया छुड़ा संसार गति, मझ्या मनी ॥3 ॥
जन्म जन्म शरना गत, पद कमल को आसा ।
अब न सतावे काल करम, जग द्वन्द वासा ॥4 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीनन के सहाई ।
रहूँ मगन दिन रात, पाई चरनन शरनाई ॥1 ॥
161 सत्ताईसवी धुन
प्रार्थना
दुख कलेश का भय मिटा, गुरु ने की दाया ॥1 ॥
भक्ति युक्ति का दान दे, मुझको किया अपना ।
मेट दिया निज कृपा से, भव दुख का सपना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु देव, दया सागर धनी ।
दिया छुड़ा संसार गति, मझ्या मनी ॥3 ॥
जन्म जन्म शरना गत, पद कमल को आसा ।
अब न सतावे काल करम, जग द्वन्द वासा ॥4 ॥
राधास्वामी दीन हित, दीनन के सहाई ।
रहूँ मगन दिन रात, पाई चरनन शरनाई ॥1 ॥
161 सत्ताईसवी धुन
प्रार्थना
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Song 91 — Hindi
290. दीन बन्धु दयाल स्वामी, तुम दया के सिन्ध ।
निज दया से बन्ध काटो, छूटे द्वन्द का बन्ध ।
काल करम का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटन की, उरझ उरझ फसाय ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे दरश, कटें जग के पाप ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पावें परम पद को, चित चरन से मेल ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
सब जपें हित चित से निस दिन; पावें अमृत धाम । ।
ॐ फुटकल शब्द
निज दया से बन्ध काटो, छूटे द्वन्द का बन्ध ।
काल करम का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटन की, उरझ उरझ फसाय ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे दरश, कटें जग के पाप ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पावें परम पद को, चित चरन से मेल ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
सब जपें हित चित से निस दिन; पावें अमृत धाम । ।
ॐ फुटकल शब्द
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Song 92 — Hindi
291. दयानिधि दीन दुख भंजन, कृपामय नाथ जन रंजन ॥टेक ॥
चरन की ओट में लीजे, मुझे भक्ति का धन दीजे । ।
दुखी हूँ तीन तापों से, मलिन मन जग के पापों से । ।
दया पड़ी अज्ञान की फाँसी, छुड़ालो आके अविनाशी ।
तुम्हारा नाम लेता हूँ, चरन में चित को देता हूँ ।
दया0 तुम्हारा एक सहारा है, नहीं कोई हमारा है ।
खुली दृष्टि तो यह जाना, तुम्हीं को मीत पहचाना ।
चरन की ओट में लीजे, मुझे भक्ति का धन दीजे । ।
दुखी हूँ तीन तापों से, मलिन मन जग के पापों से । ।
दया पड़ी अज्ञान की फाँसी, छुड़ालो आके अविनाशी ।
तुम्हारा नाम लेता हूँ, चरन में चित को देता हूँ ।
दया0 तुम्हारा एक सहारा है, नहीं कोई हमारा है ।
खुली दृष्टि तो यह जाना, तुम्हीं को मीत पहचाना ।
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Song 93 — Hindi
292 गहो तुम बांह अब मेरी, न लाओ नाथ कुछ देरी। ।
रहे लौ नाम की निस दिन, भजू मैं आपको छिन छिन ॥4 ॥
चरन को छोड़ कहाँ जाऊँ, सदा मन बुद्धि से ध्याऊँ ।
सुफल कर दो जनम मेरा, मिटे संसार का फेरा ॥5 ॥
यही बिनती हमारी है, तुम्हीं से आस भारी है ।
दया राधास्वामी अब कीजे, चरन की छाँह में लीजे ॥6 ॥
रहे लौ नाम की निस दिन, भजू मैं आपको छिन छिन ॥4 ॥
चरन को छोड़ कहाँ जाऊँ, सदा मन बुद्धि से ध्याऊँ ।
सुफल कर दो जनम मेरा, मिटे संसार का फेरा ॥5 ॥
यही बिनती हमारी है, तुम्हीं से आस भारी है ।
दया राधास्वामी अब कीजे, चरन की छाँह में लीजे ॥6 ॥
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Song 94 — Hindi
292. है कोई ज्ञानी ध्यानी, सत तत्व भेद पहिचानी ॥टेक ॥
सिंध में सीप सीप मुख मोती, मोती आब रहानी ।
चारों क्या है समझ न आवे, बुद्धि भई दीवानी ॥1 ॥
केला और प्याज को देखा, पात पात अलगाया ।
निरख परख कर सोच विचारा, तत्व सार नहीं पाया ॥2 ॥
बरफ में जल जल भाप रहावे, तीन तीन के रूपा ।
इनके अन्तर क्या कोई देखे, पड़े भरम के कूपा ॥3 ॥
बीज में अंकुर पात फूल सब, फूल में फल का बासा ।
फल में बीज अनेक भाँति के, हेर फेर का पांसा ॥4 ॥
माटी कमल कमल में डंडी, डंडी फूल बिराजा ।
फूल में बास है किसकी फूटी, कौन है सब का राजा ॥5 ॥
सत में चित चित में है आनन्द, सतचित आनन्द एका ।
तीन के अन्तर चौथा क्या है, कोई करे विवेका ॥6 ॥
तत्व भेद द्रोपदी की साड़ी, तह पर तह की खानी ।
दुश्शासन को नजर न आवे, देखे अजुन ज्ञानी ॥7 ॥
गुप्त में प्रकट प्रकट में गुप्ती, गुप्त प्रकट की रचना ।
गुप्त प्रकट का अन्त कहा है, कैसे कहे कोई बचना ॥2 ॥
तुझे प्रगट किया गुरु ने गुप्त हो, सीख भक्ति की रीती ।
आप गुप्त कर प्रगट गुरु को, तब प्रगटेगी प्रीती ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु की संगत में जा, सीख शब्द मत युक्ति ।
तब कुछ पावे भेद तत्व का, मिले भरम से मुक्ति ॥10 ॥
तीन छोड़ चौथा पद दरसे, सत्त नाम गति जाने ।
बिन जाने कोई कैसे बखाने, जाने तब मन माने ॥11 ॥
तेजस विश्व पराज्ञ तीन हैं, लख तीनों का भेदा ।
अन्तरयामी विराट हिरण्यगर्भ, ब्रह्म सुनावे वेदा ॥12 ॥
चौथा पद इनसे है न्यारा, राधास्वामी बतायें ।
तुर्या तुर्यातीत नहीं वह, बिरले कोई कोई जानें ॥13 ॥
सिंध में सीप सीप मुख मोती, मोती आब रहानी ।
चारों क्या है समझ न आवे, बुद्धि भई दीवानी ॥1 ॥
केला और प्याज को देखा, पात पात अलगाया ।
निरख परख कर सोच विचारा, तत्व सार नहीं पाया ॥2 ॥
बरफ में जल जल भाप रहावे, तीन तीन के रूपा ।
इनके अन्तर क्या कोई देखे, पड़े भरम के कूपा ॥3 ॥
बीज में अंकुर पात फूल सब, फूल में फल का बासा ।
फल में बीज अनेक भाँति के, हेर फेर का पांसा ॥4 ॥
माटी कमल कमल में डंडी, डंडी फूल बिराजा ।
फूल में बास है किसकी फूटी, कौन है सब का राजा ॥5 ॥
सत में चित चित में है आनन्द, सतचित आनन्द एका ।
तीन के अन्तर चौथा क्या है, कोई करे विवेका ॥6 ॥
तत्व भेद द्रोपदी की साड़ी, तह पर तह की खानी ।
दुश्शासन को नजर न आवे, देखे अजुन ज्ञानी ॥7 ॥
गुप्त में प्रकट प्रकट में गुप्ती, गुप्त प्रकट की रचना ।
गुप्त प्रकट का अन्त कहा है, कैसे कहे कोई बचना ॥2 ॥
तुझे प्रगट किया गुरु ने गुप्त हो, सीख भक्ति की रीती ।
आप गुप्त कर प्रगट गुरु को, तब प्रगटेगी प्रीती ॥6 ॥
राधास्वामी गुरु की संगत में जा, सीख शब्द मत युक्ति ।
तब कुछ पावे भेद तत्व का, मिले भरम से मुक्ति ॥10 ॥
तीन छोड़ चौथा पद दरसे, सत्त नाम गति जाने ।
बिन जाने कोई कैसे बखाने, जाने तब मन माने ॥11 ॥
तेजस विश्व पराज्ञ तीन हैं, लख तीनों का भेदा ।
अन्तरयामी विराट हिरण्यगर्भ, ब्रह्म सुनावे वेदा ॥12 ॥
चौथा पद इनसे है न्यारा, राधास्वामी बतायें ।
तुर्या तुर्यातीत नहीं वह, बिरले कोई कोई जानें ॥13 ॥
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Song 95 — Hindi
293. है कोई चतुर सियाना ज्ञानी, लखे गुरु की बानी ॥टेक। ।
रेत में गिरी शकर की पुड़िया, शकर रेत बिलगावे ।
चिउटी बन कर निज युक्ति से, रेत से शकर हटावे ॥1 ॥
बानी बन में भरमे पंडित, अर्थ अनर्थ बतावें ।
अर्थ समझ नहीं आने उनके, भूल भरम भरमावें ॥2 ॥
नीर से क्षीर मिलाकर देखो, एक अंग बन जाये ।
हंस विवेकी त्याग नीर को, क्षीर क्षीर पी जाने ॥3 ॥
जड़ चेतन की पड़ी है गांठी, छूटत अति कठिनाई ।
बिन गुरु ज्ञान के सुरझे केहि विधि, उरझ उरम उरझाई ॥4 ॥
बेद उपनिषद नहीं हैं भूठे, झूठा जो न बिचारे । ।
बिन विचार के सार न पाने, अटके भरम के मारे ॥5 ॥
श्रुति वह है जो सुनी गई है, और श्रुति नहीं कोई ।
ऋषियों ने चढ़ सुना अधर में, अपने घट बिच सोई ॥6 ॥
श्रुति धुन मात्र है अनहद बानी, वेद वरन के रूपा ।
धुन को सुने वरन को त्यागे, तब घट दरसे भूपा ॥7 ॥
ओम् ओम् सब कोई कहते, आम् का समझ न आई ।
है उद्गीत ओम धुन बानी, नहीं वह बरन में भाई ॥8 ॥
धुन को सुने ओम् गति दरसे, असुर मार रण जीते । ।
जनम मरन का खटका छूटे, अमी धार रस पीते ॥6 ॥
लाख द पढ़े लाख उपनिषद, ओम् सार नहीं पाये ।
देवियान पन्थ जब पग धारे, तब धुन कान में आये ॥10 ॥
पित्रयान है करम का रस्ता, जो आया भरमाया ।
ऊँचे नीचे चढ़ा विकट मग, करनी फल बिलगाया ॥11 ॥
देवियान है मरम का रस्ता, सूरज ज्ञान प्रकासा ।
गुरु की दया चला जो प्रानी, सहे न यम के त्रासा ॥12 ॥
पग पग पर ज्योती की धारा, जगमग ज्योति सुहानी ।
चांद सूर तारागन मंडल, सो प्रकाश की खानी ॥13 ॥
गुप्त भेद क्या मुख से भाखू, सैन बैन का रस्ता ।
गांठी का कोई दाम न छीने, सौदा बहुत है सस्ता ॥14 ॥
गुरु से मिल उपासना कीजे, भेद भाव सुन लीजे ।
उप है निकट तो आसन बैठक, कुछ दिन संगत कीजे ॥1 ॥
संग में कीट भृग गति धारे, रूप गुरु चित आने ।
तब सत नाम के पाय भेद को, सत्त धाम चलि जागे ॥16 ॥
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ आओ, सहस कमल दल बासा ।
फिर त्रिकुटी ओंमकार की धुन सुन,देखो अजब तमासा ॥17 ॥
वहां उद्गीत की धुन को सुनना, सुन सुन चित ठराना ।
लाली उषा निरख पड़े जब, निरख परख मन माना ॥18 ॥
आगे तिसके सुन्न मंडल है, सुन्न समाध रचाओ ।
चन्द्रलोक में बासा पाकर, अधर धाम चढ़ जाओ ॥16 ॥
महासुन्न में मानसरोवर, हंसन संग दिलासा ।
नहाओ अमी अहार को खाओ, हिये आनन्द हुलासा ॥20 ॥
लगी समाध अखंड अपारा, रारंग सारंग बानी ।
यह बानी है मंगल खानी, सुगम सुसाध सुहानी ॥21 ॥
जब उत्थान समाध का देखो, चलो भँवर के देसा ।
सोहंग सोहंग बजे बाँसुरी, दुख नहीं वहां लवलेसा ॥22 ॥
सोहंग सूर विमल प्रकाशा, नूर तूर का मंडल ।
कुछ दिन ठहर के लीला देखो, फिर साजो सत का दल ॥23 ॥
सत धाम सुख बीना बाजे, सत्त पुरुष का लोका ।
कोटि सूर चन्दा की ज्योति, अद्भुत महा अशोका ॥24 ॥
अलख अगम अव्यक्त अनामी, अमर अजर अविनासी ।
आनन्द घन चेतन घन निर्मल, सतघन सुकृति सुबासी ॥25 ॥
राधास्वामी चरन पखारो, गुरु चेला व्यौहारा ।
फिर नहीं गुरु नहीं कोई चेला, ध्यान न सोच विचारा ॥26 ॥
जो कोई इस मारग में आवे, सहज ज्ञान निधि पावे। ।
राधास्वामी की बलिहारी, भव सागर तर जावे ॥27 ॥
रेत में गिरी शकर की पुड़िया, शकर रेत बिलगावे ।
चिउटी बन कर निज युक्ति से, रेत से शकर हटावे ॥1 ॥
बानी बन में भरमे पंडित, अर्थ अनर्थ बतावें ।
अर्थ समझ नहीं आने उनके, भूल भरम भरमावें ॥2 ॥
नीर से क्षीर मिलाकर देखो, एक अंग बन जाये ।
हंस विवेकी त्याग नीर को, क्षीर क्षीर पी जाने ॥3 ॥
जड़ चेतन की पड़ी है गांठी, छूटत अति कठिनाई ।
बिन गुरु ज्ञान के सुरझे केहि विधि, उरझ उरम उरझाई ॥4 ॥
बेद उपनिषद नहीं हैं भूठे, झूठा जो न बिचारे । ।
बिन विचार के सार न पाने, अटके भरम के मारे ॥5 ॥
श्रुति वह है जो सुनी गई है, और श्रुति नहीं कोई ।
ऋषियों ने चढ़ सुना अधर में, अपने घट बिच सोई ॥6 ॥
श्रुति धुन मात्र है अनहद बानी, वेद वरन के रूपा ।
धुन को सुने वरन को त्यागे, तब घट दरसे भूपा ॥7 ॥
ओम् ओम् सब कोई कहते, आम् का समझ न आई ।
है उद्गीत ओम धुन बानी, नहीं वह बरन में भाई ॥8 ॥
धुन को सुने ओम् गति दरसे, असुर मार रण जीते । ।
जनम मरन का खटका छूटे, अमी धार रस पीते ॥6 ॥
लाख द पढ़े लाख उपनिषद, ओम् सार नहीं पाये ।
देवियान पन्थ जब पग धारे, तब धुन कान में आये ॥10 ॥
पित्रयान है करम का रस्ता, जो आया भरमाया ।
ऊँचे नीचे चढ़ा विकट मग, करनी फल बिलगाया ॥11 ॥
देवियान है मरम का रस्ता, सूरज ज्ञान प्रकासा ।
गुरु की दया चला जो प्रानी, सहे न यम के त्रासा ॥12 ॥
पग पग पर ज्योती की धारा, जगमग ज्योति सुहानी ।
चांद सूर तारागन मंडल, सो प्रकाश की खानी ॥13 ॥
गुप्त भेद क्या मुख से भाखू, सैन बैन का रस्ता ।
गांठी का कोई दाम न छीने, सौदा बहुत है सस्ता ॥14 ॥
गुरु से मिल उपासना कीजे, भेद भाव सुन लीजे ।
उप है निकट तो आसन बैठक, कुछ दिन संगत कीजे ॥1 ॥
संग में कीट भृग गति धारे, रूप गुरु चित आने ।
तब सत नाम के पाय भेद को, सत्त धाम चलि जागे ॥16 ॥
पृथ्वी छोड़ गगन चढ़ आओ, सहस कमल दल बासा ।
फिर त्रिकुटी ओंमकार की धुन सुन,देखो अजब तमासा ॥17 ॥
वहां उद्गीत की धुन को सुनना, सुन सुन चित ठराना ।
लाली उषा निरख पड़े जब, निरख परख मन माना ॥18 ॥
आगे तिसके सुन्न मंडल है, सुन्न समाध रचाओ ।
चन्द्रलोक में बासा पाकर, अधर धाम चढ़ जाओ ॥16 ॥
महासुन्न में मानसरोवर, हंसन संग दिलासा ।
नहाओ अमी अहार को खाओ, हिये आनन्द हुलासा ॥20 ॥
लगी समाध अखंड अपारा, रारंग सारंग बानी ।
यह बानी है मंगल खानी, सुगम सुसाध सुहानी ॥21 ॥
जब उत्थान समाध का देखो, चलो भँवर के देसा ।
सोहंग सोहंग बजे बाँसुरी, दुख नहीं वहां लवलेसा ॥22 ॥
सोहंग सूर विमल प्रकाशा, नूर तूर का मंडल ।
कुछ दिन ठहर के लीला देखो, फिर साजो सत का दल ॥23 ॥
सत धाम सुख बीना बाजे, सत्त पुरुष का लोका ।
कोटि सूर चन्दा की ज्योति, अद्भुत महा अशोका ॥24 ॥
अलख अगम अव्यक्त अनामी, अमर अजर अविनासी ।
आनन्द घन चेतन घन निर्मल, सतघन सुकृति सुबासी ॥25 ॥
राधास्वामी चरन पखारो, गुरु चेला व्यौहारा ।
फिर नहीं गुरु नहीं कोई चेला, ध्यान न सोच विचारा ॥26 ॥
जो कोई इस मारग में आवे, सहज ज्ञान निधि पावे। ।
राधास्वामी की बलिहारी, भव सागर तर जावे ॥27 ॥
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Song 96 — Hindi
294. तेरी लगन में हुई दिवानी, मेरे सतगुरु सत अस्थानी ॥टेक ॥
बिछुड़ी और बिछुड़ के रोई, तन मन की बुध सुध खोई ।
मेरी दशा न जाने कोई, दिन रात फिरूं घबरानी ॥तेरी0
अँखियों में से बहे जल धारा, हिया चीरे विरह का आरा ।
क्यों देता नहीं मुझे सहारा, आयु मेरी विपत बितानी ॥
तेरी0 मैं पृथवी तू नभ का बासी, मैं दुखी हूँ तू सुखरासी ।
तू स्त्रांती मैं पपीहा प्यासी, हो कैसे मेल मिलानी ॥
तेरी0 घट घट का तू अन्तरयामी, सुइयाल सुसाध सुस्वामी । ।
रज चरन सरोज नमामी, दे मेट द्वन्द की गलानी ॥ तेरी0
दरसत चित आनन्द धन खानी, कूटस्थ आधार महानी ।
तेरी महिमा कौन बखानी, कर अपनी मुझे अभिमानी ॥
तेरी0 राधास्वामी दीन दयाला, करुणा मय सहज कृपाला ।
भक्ति दे करदेय निहाला, यही विनती नित्त सुनानी ॥ तेरी0
बिछुड़ी और बिछुड़ के रोई, तन मन की बुध सुध खोई ।
मेरी दशा न जाने कोई, दिन रात फिरूं घबरानी ॥तेरी0
अँखियों में से बहे जल धारा, हिया चीरे विरह का आरा ।
क्यों देता नहीं मुझे सहारा, आयु मेरी विपत बितानी ॥
तेरी0 मैं पृथवी तू नभ का बासी, मैं दुखी हूँ तू सुखरासी ।
तू स्त्रांती मैं पपीहा प्यासी, हो कैसे मेल मिलानी ॥
तेरी0 घट घट का तू अन्तरयामी, सुइयाल सुसाध सुस्वामी । ।
रज चरन सरोज नमामी, दे मेट द्वन्द की गलानी ॥ तेरी0
दरसत चित आनन्द धन खानी, कूटस्थ आधार महानी ।
तेरी महिमा कौन बखानी, कर अपनी मुझे अभिमानी ॥
तेरी0 राधास्वामी दीन दयाला, करुणा मय सहज कृपाला ।
भक्ति दे करदेय निहाला, यही विनती नित्त सुनानी ॥ तेरी0
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Song 97 — Hindi
295.. आजा गले लग जा, मुझे मोहनी रूप दिखाजा ॥टेका ।
तुझ बिन मुझको चैन न आने, पीर बिरह की बहुत सताये ।
रह रह कर हिया जिया मुरझाने, जलती आग बुझाजा आजा0
दिन में सोच तेरा है पल पल, रात को तन में रहती हलचल ।
आजा प्रेम डगर में चलचल, सुख का भेद बताजा ॥तड़
तरसू प्यारे कारन, बिलपू दम दम छिन छिन ।
व्याप रही चित चिंता डायन, उसका फन्द कटाजा ॥
मन मन्दिर मेरा पड़ा है सूना, विपत कलेश रहे दिन राती ।
तू क्यों हुआ बेहरदी ऊना, घट के घर को बसाजा ॥
ज्योत में ज्योत जले दिन राती, अन्धकार की मिटे उत्पाती ।
तेरी छवि अति मुझको भाती, सूरज चन्द्र लजाजा ॥
अँखियन बहे नीर की धारा, जग में मेरा कोई न सहारा ।
तू ही सांचा है रखवारा, काल से अब तू बचाजा ॥
योग विराग कछू नहिं सूझे, ज्ञान ध्यान गम नेक न बुझे। ।
माया करम से नित ही जूझे, भव दुस्ख आप हटाजा ॥
सतगुरु रूप का दर्शन प्यारा, गुरु मूरती है सार का सारा ।
मैं हूँ प्रेम प्यास का मारा, अमृत बूद पिलाजा ॥
तू है दाता तू हितकारी, तू समरथ तू जगदाधारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी मेरी बनाजा ।।
तुझ बिन मुझको चैन न आने, पीर बिरह की बहुत सताये ।
रह रह कर हिया जिया मुरझाने, जलती आग बुझाजा आजा0
दिन में सोच तेरा है पल पल, रात को तन में रहती हलचल ।
आजा प्रेम डगर में चलचल, सुख का भेद बताजा ॥तड़
तरसू प्यारे कारन, बिलपू दम दम छिन छिन ।
व्याप रही चित चिंता डायन, उसका फन्द कटाजा ॥
मन मन्दिर मेरा पड़ा है सूना, विपत कलेश रहे दिन राती ।
तू क्यों हुआ बेहरदी ऊना, घट के घर को बसाजा ॥
ज्योत में ज्योत जले दिन राती, अन्धकार की मिटे उत्पाती ।
तेरी छवि अति मुझको भाती, सूरज चन्द्र लजाजा ॥
अँखियन बहे नीर की धारा, जग में मेरा कोई न सहारा ।
तू ही सांचा है रखवारा, काल से अब तू बचाजा ॥
योग विराग कछू नहिं सूझे, ज्ञान ध्यान गम नेक न बुझे। ।
माया करम से नित ही जूझे, भव दुस्ख आप हटाजा ॥
सतगुरु रूप का दर्शन प्यारा, गुरु मूरती है सार का सारा ।
मैं हूँ प्रेम प्यास का मारा, अमृत बूद पिलाजा ॥
तू है दाता तू हितकारी, तू समरथ तू जगदाधारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी मेरी बनाजा ।।
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Song 98 — Hindi
296. ऐसी अभिमानी अज्ञानी है, यह दुनिया ॥टेक। ।
सत को त्याग असत को धावे, झूठे भरम फंसानी दुनिया ।
गुरु की संगत को नहीं दे चित, अटकी पत्थर पानी यह दुनिया ।
दोहारामकृष्ण जब लग जिये, निंदित रहा संसार । ।
पीछे देवल साज कर, अब पूजा सत्कार, दुनिया ॥
ऐसी0 जीते पिता का करें अनादर, मुये श्राद्ध रचानी दुनिया ।
सतगुरु देव प्रत्यक्ष न पूजे, गढ़ मूरत पुजवानी यह दुनिया ।
दोहामुये बैल की आख बड़ी, यह जग का व्यौहार ।
मिली वस्तु का ध्यान नहीं, अनमिल सोच विचार दुनिया ॥
सत संगत में कभी न बैठे, तीरथ बरत दिवानी दुनिया ।
सोच विचार विवेक ज्ञान नहीं, भेड़ की चाल चलानी यह दुनिया ।
दोहातीरथ राज समाज गुरु का, सुख मंगल की खान ।
सो तो नहाते ना बने, बन परबत हैरान दुनिया ॥
साँची बात कह नहीं कोई, भूठे को पतियानी दुनिया ।
मानुप जनम का सार न जाने, भव की धार बहानी, यह दुनिया ।
दोहानर शरीर उत्तम महा, सुर को दुर्लभ जान ।
अपनी गति मति ना लखे, देवी देव भुलान ।
दुनिया ॥इस दुनिया की लीला अद्भुत, अकथ अपार कहानी, दुनिया ।
गधास्वामी दया ज्ञान गम पाया, छूटी द्वन्द गलानी, यह दुनिया ।
दोहा धन्य भाग सतगुरु मिले, जनम को दिया सुधार ।
सत संगत के बचन सुन, हो गया भवके पार, दुनिया ॥
सत को त्याग असत को धावे, झूठे भरम फंसानी दुनिया ।
गुरु की संगत को नहीं दे चित, अटकी पत्थर पानी यह दुनिया ।
दोहारामकृष्ण जब लग जिये, निंदित रहा संसार । ।
पीछे देवल साज कर, अब पूजा सत्कार, दुनिया ॥
ऐसी0 जीते पिता का करें अनादर, मुये श्राद्ध रचानी दुनिया ।
सतगुरु देव प्रत्यक्ष न पूजे, गढ़ मूरत पुजवानी यह दुनिया ।
दोहामुये बैल की आख बड़ी, यह जग का व्यौहार ।
मिली वस्तु का ध्यान नहीं, अनमिल सोच विचार दुनिया ॥
सत संगत में कभी न बैठे, तीरथ बरत दिवानी दुनिया ।
सोच विचार विवेक ज्ञान नहीं, भेड़ की चाल चलानी यह दुनिया ।
दोहातीरथ राज समाज गुरु का, सुख मंगल की खान ।
सो तो नहाते ना बने, बन परबत हैरान दुनिया ॥
साँची बात कह नहीं कोई, भूठे को पतियानी दुनिया ।
मानुप जनम का सार न जाने, भव की धार बहानी, यह दुनिया ।
दोहानर शरीर उत्तम महा, सुर को दुर्लभ जान ।
अपनी गति मति ना लखे, देवी देव भुलान ।
दुनिया ॥इस दुनिया की लीला अद्भुत, अकथ अपार कहानी, दुनिया ।
गधास्वामी दया ज्ञान गम पाया, छूटी द्वन्द गलानी, यह दुनिया ।
दोहा धन्य भाग सतगुरु मिले, जनम को दिया सुधार ।
सत संगत के बचन सुन, हो गया भवके पार, दुनिया ॥
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Song 99 — Hindi
297. उठ जाग सबेरारी, सुरत मेरी भागवती ।
मिटा भरम अंधेरा री, धारले हिये सुमती ॥टेक। ।
क्या तू सोई मोह नींद में, उठ के भजन में लाग ।
सोये होय अकाज पियारी, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0 चेत चेत है चेत का अवसर, काल है फन धर नाग ।
कब डस ले क्या कोई जाने, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत प्रेम प्रीत परतीत उमंग से, धर गुरु पद अनुराग ।
जो सोया सो खोया प्राणी, जाग जाग उठ जाग ।
सुरत0 सीतल मंद सुगंध पवन बहे, गा गुरु मंगल राग ।
यह सोने का समय नहीं है, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत राधास्वामी तोहि चितावन, बख्शा अचल सुहाग ।
तज परमाद की निन्द्रा, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0
मिटा भरम अंधेरा री, धारले हिये सुमती ॥टेक। ।
क्या तू सोई मोह नींद में, उठ के भजन में लाग ।
सोये होय अकाज पियारी, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0 चेत चेत है चेत का अवसर, काल है फन धर नाग ।
कब डस ले क्या कोई जाने, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत प्रेम प्रीत परतीत उमंग से, धर गुरु पद अनुराग ।
जो सोया सो खोया प्राणी, जाग जाग उठ जाग ।
सुरत0 सीतल मंद सुगंध पवन बहे, गा गुरु मंगल राग ।
यह सोने का समय नहीं है, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत राधास्वामी तोहि चितावन, बख्शा अचल सुहाग ।
तज परमाद की निन्द्रा, जाग जाग उठ जाग ॥
सुरत0
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Song 100 — Hindi
298. पिला दे भक्ति का ऐसा प्याला, ममत्व मैं अपने मन का खोदूं ।
न बुधि रहे और न सुधि रहे कुछ,अहंपना सारा मनका खोदूं ॥टेका
पि0 जपू तर्पू और भजू न सुमिरूँ, न योग युक्ति के पन्थ दौडूं ।
न नाम की माला हाथ में हो, हिये की माला का मनका खोदू । ।
पि0 वह राग क्या जिसमें राग आये, वह त्याग क्या त्याग में फसाये ।
न बन्ध और मुक्ति का हो खटका, विवेक घर और बन का खोदू ॥
न दुख की दुविधा न सुख की चिंता,न चित की दुचिता का भय हो
किंचिता न ज्ञान और ध्यान की हो इच्छा, विचार साधन यतन का खोदू ॥
न द्वन्द निरद्वन्द का हो झगड़ा, न त अद्वत का हो बखेड़ा ।
झुका के सिर राधास्वामी पद में, विचार तक दास पन का खोदू ॥
न बुधि रहे और न सुधि रहे कुछ,अहंपना सारा मनका खोदूं ॥टेका
पि0 जपू तर्पू और भजू न सुमिरूँ, न योग युक्ति के पन्थ दौडूं ।
न नाम की माला हाथ में हो, हिये की माला का मनका खोदू । ।
पि0 वह राग क्या जिसमें राग आये, वह त्याग क्या त्याग में फसाये ।
न बन्ध और मुक्ति का हो खटका, विवेक घर और बन का खोदू ॥
न दुख की दुविधा न सुख की चिंता,न चित की दुचिता का भय हो
किंचिता न ज्ञान और ध्यान की हो इच्छा, विचार साधन यतन का खोदू ॥
न द्वन्द निरद्वन्द का हो झगड़ा, न त अद्वत का हो बखेड़ा ।
झुका के सिर राधास्वामी पद में, विचार तक दास पन का खोदू ॥
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Song 101 — Hindi
299.साकारम निराकार ॥टेक प्रथम सहस्रार, दुजे समझ ओंकार ।
तीजे शून्य महा शून्य, चौथे सोहंग सार ।
पंचम सतपद विचार, अलख अगम धुर अधार ।
सोच समझ बार बार, चित मध्य धार धार ॥
साकारम0 सगुन अगुन गुन प्रचंड, खंड खंड ब्रह्म अंड ।
व्यापे सब करके पिंड, निश्फल सहे यम का दंड ।
भूल गये मति के मंद, फंस काम क्रोध फंद ।
भागें नित जगत द्वन्द, हिया जिया को हार हार ॥
सतसंग में जाय जाय’ गुरु स्वरूप ध्याय ध्याय ।
धुरपद चित में बसाय, घट मंदिर में समाय ।
अनहद धुन गाय गाय, दर्शन ज्योति का पाय ।
मुक्ति युक्ति कर उपाय, सूझे अपरम अपार ॥
गुरु स्वरूप धार रंग, भवका भाव कर दे भंग ।
चित हो ज्यों कीट भृग, रुके घट निध के तरंग ।
शब्द सुनत हो कुरंग, कमल नीर सीख ढंग ।
हो असंग रहके संग, जग चिन्ता जार जार ॥
राधास्वामी परम रूप, चेतन रचना के भूप ।
रूपवान और अरूप, ब्रह्म परब्रह्म कूप ।
नहीं छांह नहीं धूप, अचरज अद्भुत अनूप ।
नीर क्षीर सोत कूप, व्याप रहे वार पार ॥
तीजे शून्य महा शून्य, चौथे सोहंग सार ।
पंचम सतपद विचार, अलख अगम धुर अधार ।
सोच समझ बार बार, चित मध्य धार धार ॥
साकारम0 सगुन अगुन गुन प्रचंड, खंड खंड ब्रह्म अंड ।
व्यापे सब करके पिंड, निश्फल सहे यम का दंड ।
भूल गये मति के मंद, फंस काम क्रोध फंद ।
भागें नित जगत द्वन्द, हिया जिया को हार हार ॥
सतसंग में जाय जाय’ गुरु स्वरूप ध्याय ध्याय ।
धुरपद चित में बसाय, घट मंदिर में समाय ।
अनहद धुन गाय गाय, दर्शन ज्योति का पाय ।
मुक्ति युक्ति कर उपाय, सूझे अपरम अपार ॥
गुरु स्वरूप धार रंग, भवका भाव कर दे भंग ।
चित हो ज्यों कीट भृग, रुके घट निध के तरंग ।
शब्द सुनत हो कुरंग, कमल नीर सीख ढंग ।
हो असंग रहके संग, जग चिन्ता जार जार ॥
राधास्वामी परम रूप, चेतन रचना के भूप ।
रूपवान और अरूप, ब्रह्म परब्रह्म कूप ।
नहीं छांह नहीं धूप, अचरज अद्भुत अनूप ।
नीर क्षीर सोत कूप, व्याप रहे वार पार ॥
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Song 102 — Hindi
300 अस्त्रियां खुली रहें दिन रात ॥टेक ॥
खुले नयन से रूप का दर्शन, खुले कान सुन बात ।
खुली जीभ से नाम का सुमिरन, खुले हाथ परसात
अखियाँ तह में तह है तह में तह है, तह में तह के साथ ।
आँख खुले तह दरस में आवे, केले का लख पात ॥
तह अस्थूल सूक्ष्म भी तह है, कारन तह की जात। ।
बिना आंख क्या कोई देखे, आंख खोल कर बात ॥
बाहर तो सब कोई देखे, अन्तर दृष्टि न जात ।
अन्तर बाहर नैन खुलें जब, तब सत रूप लखात ॥अखियाँ 0
राधास्वामी गुरु की दया भई है, धरा सीस पर हाथ ।
अन्तर बाहर आँख खुलानी, भया तत्व का साथ ॥
खुले नयन से रूप का दर्शन, खुले कान सुन बात ।
खुली जीभ से नाम का सुमिरन, खुले हाथ परसात
अखियाँ तह में तह है तह में तह है, तह में तह के साथ ।
आँख खुले तह दरस में आवे, केले का लख पात ॥
तह अस्थूल सूक्ष्म भी तह है, कारन तह की जात। ।
बिना आंख क्या कोई देखे, आंख खोल कर बात ॥
बाहर तो सब कोई देखे, अन्तर दृष्टि न जात ।
अन्तर बाहर नैन खुलें जब, तब सत रूप लखात ॥अखियाँ 0
राधास्वामी गुरु की दया भई है, धरा सीस पर हाथ ।
अन्तर बाहर आँख खुलानी, भया तत्व का साथ ॥






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