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Song 0 — Hindi
301. दया मय दीन दुख भंजन, कृपा निधि भक्त मन रंजन ।
कमल पद की शरन दीजे, पतित की लाज रख लीजै ॥
दया0 जगत में कष्ट बहु पाया, चरन में आपके आया ।
विकल मन चित्त घबराया, तुम्हारा ध्यान तब आया ॥ दया0
चरन की ओट में लीजे, अटल भक्ति का बर दीजे ।
भिकारी आपके द्वारे, पड़ा त्रयताप के मारे ।
दया0 पिला दो प्रेम का प्याला, रहे दिन रात मतवाला ।
करम के जाल से भागे, अमी रस नाम में पागे ॥
दया0 यही मन की है अभिलाषा, करो पूरी प्रभू आसा ।
विनय राधास्वामी हितकारी, सुनो भव से करो पारी ॥
कमल पद की शरन दीजे, पतित की लाज रख लीजै ॥
दया0 जगत में कष्ट बहु पाया, चरन में आपके आया ।
विकल मन चित्त घबराया, तुम्हारा ध्यान तब आया ॥ दया0
चरन की ओट में लीजे, अटल भक्ति का बर दीजे ।
भिकारी आपके द्वारे, पड़ा त्रयताप के मारे ।
दया0 पिला दो प्रेम का प्याला, रहे दिन रात मतवाला ।
करम के जाल से भागे, अमी रस नाम में पागे ॥
दया0 यही मन की है अभिलाषा, करो पूरी प्रभू आसा ।
विनय राधास्वामी हितकारी, सुनो भव से करो पारी ॥
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Song 1 — Hindi
302. गुरु पूरे ने दिखाया अपना धाम ॥टेक ॥
सहज योग की विधि बतलाई, बख्शा सांचा नाम ।
सुमिरन भजन ध्यान निस बासर, व्याये क्रोध न काम ॥
गुरु0 प्रथम बंद जब तीन लगाये, मन को दिया लगाम ।
जब मन गगना चढ़ा सुरत ले, बंद का फिर नहीं काम । ।
गुरु0 क्यों कोई कान आंख को मदे, क्यों चित राखे थाम । ।
सुरत शब्द का साधन अद्भुत, अन्तर मूल कलाम ।
गुरु0 चढ़ी सुरत छोड़ा नौ द्वारा, गनन में किया बिसराम ।
पिंड ब्रह्मांड से ऊंची पहुँची, जहां न दक्ष न वाम ।गुरु0
सहस कमल दल त्रिकुटी मंडल, सुन्न महासुन्न ठाम ।
भंवर गुफा सतलोक अलख लख, अगम परे गुरु धाम ॥
गुरु0 राधास्वामी पद में ठौर ठिकाना, वहां सुबह नहीं शाम । ।
जो कोई घट चढ़ यहां तक पहुँचे, बिसमध आठों याम ॥
गुरु0 मूल योग यह सबका टीका, निर्मल सुगम सुहाम ।
राधास्वामी दया से काल दंड का, भेद साम नहीं दाम ॥
गुरु0
सहज योग की विधि बतलाई, बख्शा सांचा नाम ।
सुमिरन भजन ध्यान निस बासर, व्याये क्रोध न काम ॥
गुरु0 प्रथम बंद जब तीन लगाये, मन को दिया लगाम ।
जब मन गगना चढ़ा सुरत ले, बंद का फिर नहीं काम । ।
गुरु0 क्यों कोई कान आंख को मदे, क्यों चित राखे थाम । ।
सुरत शब्द का साधन अद्भुत, अन्तर मूल कलाम ।
गुरु0 चढ़ी सुरत छोड़ा नौ द्वारा, गनन में किया बिसराम ।
पिंड ब्रह्मांड से ऊंची पहुँची, जहां न दक्ष न वाम ।गुरु0
सहस कमल दल त्रिकुटी मंडल, सुन्न महासुन्न ठाम ।
भंवर गुफा सतलोक अलख लख, अगम परे गुरु धाम ॥
गुरु0 राधास्वामी पद में ठौर ठिकाना, वहां सुबह नहीं शाम । ।
जो कोई घट चढ़ यहां तक पहुँचे, बिसमध आठों याम ॥
गुरु0 मूल योग यह सबका टीका, निर्मल सुगम सुहाम ।
राधास्वामी दया से काल दंड का, भेद साम नहीं दाम ॥
गुरु0
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Song 2 — Hindi
303. नाम रस पीले मेरे भाई ।।टेका ।
ध्रव प्रहलाद नाम रस माते, माती मीरा बाई ।
शिव सनकादिक नाम दिवाने, गनिका सदन कसाई ॥
नाम0 ब्रह्मा नाम जपे निस बासर, शिव रहे तारी लाई । ।
विष्णु गनेश नाम आधारा, शेष सहस मुख गाई ॥
नामक नानक जपे नाम गुरु निस दिन, सन्त कबीर बताई ।
शबरी भीलनी नाम के पुन से, राम से नेह लगाई ॥
नाम0 तुलसी जपे प्रभु नाम निरन्तर, जपत सदा लौ लाई ।
सूरदास नाम के बल से, हिये की आंख खलाई ॥
नाम0 नाम बिना जीवन है बिरथा, बहु पाछे पछताई। ।
गुरु की कृपा मिला शुभ अवसर, नाम रतन धन पाई ॥
नाम0 गुरु की सेवा साध की संगत, दिन दिन चढ़े सवाई ।
राधास्वामी नाम गुरु से मिलिया, परगट तोहि जताई । ।
नाम
ध्रव प्रहलाद नाम रस माते, माती मीरा बाई ।
शिव सनकादिक नाम दिवाने, गनिका सदन कसाई ॥
नाम0 ब्रह्मा नाम जपे निस बासर, शिव रहे तारी लाई । ।
विष्णु गनेश नाम आधारा, शेष सहस मुख गाई ॥
नामक नानक जपे नाम गुरु निस दिन, सन्त कबीर बताई ।
शबरी भीलनी नाम के पुन से, राम से नेह लगाई ॥
नाम0 तुलसी जपे प्रभु नाम निरन्तर, जपत सदा लौ लाई ।
सूरदास नाम के बल से, हिये की आंख खलाई ॥
नाम0 नाम बिना जीवन है बिरथा, बहु पाछे पछताई। ।
गुरु की कृपा मिला शुभ अवसर, नाम रतन धन पाई ॥
नाम0 गुरु की सेवा साध की संगत, दिन दिन चढ़े सवाई ।
राधास्वामी नाम गुरु से मिलिया, परगट तोहि जताई । ।
नाम
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Song 3 — Hindi
304. सतगुरु एक तुम्हारी आस, दाता एक तुम्हारी आस ॥टेक। ।
भूल भरम पड़ समझी अलग हूँ, तुम तो मेरे पास ।
रोम रोम व्यापक मेरे तन में, तुम सांसों के सांस ।सतगुरु0
तुम नहीं गगन पताल न पृथवी, तुम न मेरु कैलास ।
हृदय गुफा में मेरे विराजे, अन्तर घट में बास । ।
सहसकमलदल सहस रूप हो, अ दल मध्य निवास ।
त्रिकुटी त्रिपुटी रूप त्रिगुन विधि, अ उ म परकास ॥
सतगुरु0 सुन्न में दुविधि प्रकृति पुरुष तुम, स्वामी सेवक दास ।
महासुन्न अद्वैत तत्व एक, स्वांस कहूँ के भास ॥
भंवर में काली काल बन व्यापे, काल में काल बिलास ।
आगे सत पद सत्त तत्व प्रभु, सत में सत्त उजास ॥
अलख अगम राधास्वामी अनामी, सतचित आनन्द रास ।
सर्व कला संग मुझ में समाने, कैसे होऊँ उदास ॥
भूल भरम पड़ समझी अलग हूँ, तुम तो मेरे पास ।
रोम रोम व्यापक मेरे तन में, तुम सांसों के सांस ।सतगुरु0
तुम नहीं गगन पताल न पृथवी, तुम न मेरु कैलास ।
हृदय गुफा में मेरे विराजे, अन्तर घट में बास । ।
सहसकमलदल सहस रूप हो, अ दल मध्य निवास ।
त्रिकुटी त्रिपुटी रूप त्रिगुन विधि, अ उ म परकास ॥
सतगुरु0 सुन्न में दुविधि प्रकृति पुरुष तुम, स्वामी सेवक दास ।
महासुन्न अद्वैत तत्व एक, स्वांस कहूँ के भास ॥
भंवर में काली काल बन व्यापे, काल में काल बिलास ।
आगे सत पद सत्त तत्व प्रभु, सत में सत्त उजास ॥
अलख अगम राधास्वामी अनामी, सतचित आनन्द रास ।
सर्व कला संग मुझ में समाने, कैसे होऊँ उदास ॥
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Song 4 — Hindi
305. फकीरा रूप तेरा अति पारा ॥टेक ॥
तू सत चित आनन्द की मूरत, तू तीनों से न्यारा ।
तेरी गति मति बुधि न जाने, अटक रही मझधारा ॥फकीरा0
करम किया सत की चढ़ा घाटी, चिर में विवेक विचारा। ।
सत्त चित्त आनन्द विलासा, चहुँ दिस हर्ष पसारा फकीरा0
तीन त्याग चौथे को धारे, सी सबका अधारा ।
द्वन्द जगत त्रिपुटी की त्रिकुटी, छड़ चला घरबारा ॥फकीरा0
नहीं तू दोय न तीन चार है, नह तू सहस हजारा। ।
एक एक है एक एक है, जाम जानन हारा ॥फकीरा0
एक अनेक कहां है तुझ में, यह जी भूल विकारा ।
राधास्वामी दया रूप लख अपना, ई व्यापक संसारा फकीरा0
तू सत चित आनन्द की मूरत, तू तीनों से न्यारा ।
तेरी गति मति बुधि न जाने, अटक रही मझधारा ॥फकीरा0
करम किया सत की चढ़ा घाटी, चिर में विवेक विचारा। ।
सत्त चित्त आनन्द विलासा, चहुँ दिस हर्ष पसारा फकीरा0
तीन त्याग चौथे को धारे, सी सबका अधारा ।
द्वन्द जगत त्रिपुटी की त्रिकुटी, छड़ चला घरबारा ॥फकीरा0
नहीं तू दोय न तीन चार है, नह तू सहस हजारा। ।
एक एक है एक एक है, जाम जानन हारा ॥फकीरा0
एक अनेक कहां है तुझ में, यह जी भूल विकारा ।
राधास्वामी दया रूप लख अपना, ई व्यापक संसारा फकीरा0
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Song 5 — Hindi
306. दुविधा है संसारा, कोई समझे गुरु का प्यारा ॥टेक। ।
सत में एक अनेक नहीं है, वह है अमर अपारा ।
निराधार कूटस्थ अवस्था, अष्ठिान आधारा ॥दुविधा0
जैसे सिंध में लहर उठत है, लारी लहर पसारा ।
तसे सत की दशा फकीरा, कहन सुनन से न्यारा ॥
लहर उठी हुई मौज अनोखी, प्रगटे बुद फुहारा ।
बुंद सिंध से भये बिलगाने, मन बुधि चित हंकारा ॥दुविधा
अहंकार में दृढ़ता आई, धरा रूप विस्तारा ।
दृढ़ता के बस मन न चिन्ता, चिन्तन बुद्धि विकारा ॥
बुद्धि ने प्रपंच रचाया, बुद सिंध भये न्यारा ।
कारन सूक्ष्म स्थूल बनाया, रचा प्रपंच अपारा ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ गई, कठिन भया छुटकारा ।
मध्य दशा में आन बिराजा, उपजा सोच विचारा ॥
कभी नीचे कभी ऊचे फुदके, कभी मध्य की धारा ।
एक धार से सहस धार बन, धारा मूल विकारा॥
क्लिपे तड़पे चैन न आवे, जनम जुआ गले डारा ।
जनम मरन भोगें चौरासी, लखे न सार असारा ॥
दुर्मति आई कुमति बसाई, स्वारथ बस भटकाया ।
लोक परलोक में डोलत प्रानी, कभी जीता कभी हारा । ।
कोटि जनम से धोखा खाया, काल कर्म का मारा ।
अपनी चिन्ता और की चिन्ता, भोग संयोग अधिकारा ॥
भरमे भरम भूल की लीला, नहीं पाये छुटकारा ।
तीन ताप का बन्धन गाढ़ा, आय फैसा नो द्वारा ॥
यह दुविधा है यह दुचिताई, दुख सुख सिर पर भारा ।
करम हिंडोले भूले प्रानी, नहीं पावे निस्तारा ॥
बल में निवल निबल बल संयुत, करे उपाय निकारा। ।
दहे शरीर जरे उर निस दिन, रोय रोय विकरारा ॥
सतगुरु दया देख तब उमड़ी, धरा सन्त अवतारा। ।
जीव चितावन आये राधास्वामी, शब्द जहाज संवारा ॥
सुरत शब्द की युक्ति बताई, मुख से शब्द उचारा ।
मैं तोहि लेऊँ छुड़ाय काल से, बन्धन का, सारा ॥दुविधा0
एक अनेक की तज दे दुबिधा, ले अब मेरा सहारा ।
तब फकीर ने दृष्टि उठाई, लखा रूप चमकारा ॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आया, सुन्न महासुन्न पग धारा ।
सहज समाधि रचाया अद्भुत, गुफा का निरख फुहारा ॥
जब सत पद को ओर दृष्टि गई चमका रवि शशी तारा ।
एक अनेक की दरमति नासी, नसा मूल हंकारा ॥
जीवन मुक्त की पदवी पाई, व्यापे न जग धन दारा ।
राधास्वामी खेल खेल में, किया सकल निरवारा ॥
सत में एक अनेक नहीं है, वह है अमर अपारा ।
निराधार कूटस्थ अवस्था, अष्ठिान आधारा ॥दुविधा0
जैसे सिंध में लहर उठत है, लारी लहर पसारा ।
तसे सत की दशा फकीरा, कहन सुनन से न्यारा ॥
लहर उठी हुई मौज अनोखी, प्रगटे बुद फुहारा ।
बुंद सिंध से भये बिलगाने, मन बुधि चित हंकारा ॥दुविधा
अहंकार में दृढ़ता आई, धरा रूप विस्तारा ।
दृढ़ता के बस मन न चिन्ता, चिन्तन बुद्धि विकारा ॥
बुद्धि ने प्रपंच रचाया, बुद सिंध भये न्यारा ।
कारन सूक्ष्म स्थूल बनाया, रचा प्रपंच अपारा ॥
जड़ चेतन की गांठी पड़ गई, कठिन भया छुटकारा ।
मध्य दशा में आन बिराजा, उपजा सोच विचारा ॥
कभी नीचे कभी ऊचे फुदके, कभी मध्य की धारा ।
एक धार से सहस धार बन, धारा मूल विकारा॥
क्लिपे तड़पे चैन न आवे, जनम जुआ गले डारा ।
जनम मरन भोगें चौरासी, लखे न सार असारा ॥
दुर्मति आई कुमति बसाई, स्वारथ बस भटकाया ।
लोक परलोक में डोलत प्रानी, कभी जीता कभी हारा । ।
कोटि जनम से धोखा खाया, काल कर्म का मारा ।
अपनी चिन्ता और की चिन्ता, भोग संयोग अधिकारा ॥
भरमे भरम भूल की लीला, नहीं पाये छुटकारा ।
तीन ताप का बन्धन गाढ़ा, आय फैसा नो द्वारा ॥
यह दुविधा है यह दुचिताई, दुख सुख सिर पर भारा ।
करम हिंडोले भूले प्रानी, नहीं पावे निस्तारा ॥
बल में निवल निबल बल संयुत, करे उपाय निकारा। ।
दहे शरीर जरे उर निस दिन, रोय रोय विकरारा ॥
सतगुरु दया देख तब उमड़ी, धरा सन्त अवतारा। ।
जीव चितावन आये राधास्वामी, शब्द जहाज संवारा ॥
सुरत शब्द की युक्ति बताई, मुख से शब्द उचारा ।
मैं तोहि लेऊँ छुड़ाय काल से, बन्धन का, सारा ॥दुविधा0
एक अनेक की तज दे दुबिधा, ले अब मेरा सहारा ।
तब फकीर ने दृष्टि उठाई, लखा रूप चमकारा ॥
सहस कमल चढ़ त्रिकुटी आया, सुन्न महासुन्न पग धारा ।
सहज समाधि रचाया अद्भुत, गुफा का निरख फुहारा ॥
जब सत पद को ओर दृष्टि गई चमका रवि शशी तारा ।
एक अनेक की दरमति नासी, नसा मूल हंकारा ॥
जीवन मुक्त की पदवी पाई, व्यापे न जग धन दारा ।
राधास्वामी खेल खेल में, किया सकल निरवारा ॥
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Song 6 — Hindi
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Song 7 — Hindi
307. फकीरा जा भव सागर पारा ।।टेका ।
जग है दुविधा जग दुरिताई, जग दुई व्यवहारा ।
सुख दुख राग द्वेष विष अमृत, यह सब द्वन्द पसारा फकीरा0
सहज में जग का रूप लखाऊँ, सहित विवेक विचारा ।
यह समझाय तोहि अपनाऊँ, मेटू द्वन्द विकारा ॥
यह अनेक है द्वत भा है, द त में द्वत की धारा ।
द्वत में खींच तान है प्यारे, ले अद्वत सहारा ॥
सत संगत जब किया गुरु का, मिला ज्ञान मत सारा ।
लखा जगत का रूप अनोखा, लख लख किया प्रतिहारा ।
गुरु से प्रेम बढ़ाया तूने, गुरु चेला व्यौहारा ।
गुरु चेला मिल एक हुये जब, एक का मिला सहारा ॥
मिला एक यह नियम है भाई, चित से द्वन्द बिसारा !
मिला है यम, यम और नहीं कुछ, नियम में चित को धारा ॥
सत का ग्रहण नियम है सांचा, यम असत्य छुटकारा ।
समझ जो आई फुरा विवेका, सुख से आसन मारा।
आसन मार विचार की दृढ़ता, प्राणायाम तत सारा ।
इस विचार में रेचक पूरक, कुम्भक का व्यौहारा ॥फकीरा0
चित की वृत्ती निरोध को पाकर, प्रत्याहार संभारा ।
कर अभ्यास मगन मन माना, सत को चित से धारा ॥
यही धारना धारन करना, ध्यान का भया उभारा ।
ध्यान बना जब हुआ फकीरा, तब समाधि बिस्तारा ।
समता जागी ममता भागी, चमका ज्ञान का तारा ।
निरविकल्प सरिकल्प समाधी, शम्भु ने मन को मारा ॥
यह अष्टांग योग है गुरु का, सांचा सहज अकारा ।
सुरत शब्द योग के साधन, मिटा भरम अंधियारा ॥
छुटी समाधि भया उत्थाना, फिर प्रपंच परिवारा ।
साधन साध सन्त मत समझा, सहज समाधि संवारा । ।
सहज समाध सहज चित वृत्ती, सहज योग चित धारा ।
सहज में सहज सहज चित डोले, जीवन मुक्त उद्धारा ॥
सहस कमल दल ज्योति का दर्शन, त्रिकुटी धुन ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न हंसन लीला, सोहंग भँवर फुहारा ॥
ऊंचे चढ़ सत पद में बासा, रूप रंग तज डारा ।
अलख अगम की सुन्दरताई, राधास्वामी नाम निहारा ॥
जीते जी व्यौहार परमारथ, नहीं मीठा नहीं खारा ।
नहीं कड़वा नहीं तीखा लागे, कोमल नहीं करारा ॥
यह विदेह गति जीवन मुक्ति, यह सिद्धांत अपारा ।
मैंने यह सब तुझे सुझाया, मेटा सकल विकारा ।
सहज में तेरा काम बना है, सहज सहज छुटकारा । ।
सहज में सहज रूप पद दरसा, काल कमे भय टारा ।
राधास्वामी दीन दयाला, सन्त रूप अवतारा ।
‘सालिग्राम’ गुरु की दाया, भया सहज निस्तारा ॥
जब लग प्रालब्ध है भाई, भोग काट दे सारा ।
भोगे प्रालब्ध तब कुछ नाहीं, आगे अगम अपारा फकीरा0
कट गई काल कर्म की फांसी, जनम जुआ नहीं हारा ।
राधास्वामी की बलिहारी, रहे फकीर सुखारा ॥फकीरा0
जग है दुविधा जग दुरिताई, जग दुई व्यवहारा ।
सुख दुख राग द्वेष विष अमृत, यह सब द्वन्द पसारा फकीरा0
सहज में जग का रूप लखाऊँ, सहित विवेक विचारा ।
यह समझाय तोहि अपनाऊँ, मेटू द्वन्द विकारा ॥
यह अनेक है द्वत भा है, द त में द्वत की धारा ।
द्वत में खींच तान है प्यारे, ले अद्वत सहारा ॥
सत संगत जब किया गुरु का, मिला ज्ञान मत सारा ।
लखा जगत का रूप अनोखा, लख लख किया प्रतिहारा ।
गुरु से प्रेम बढ़ाया तूने, गुरु चेला व्यौहारा ।
गुरु चेला मिल एक हुये जब, एक का मिला सहारा ॥
मिला एक यह नियम है भाई, चित से द्वन्द बिसारा !
मिला है यम, यम और नहीं कुछ, नियम में चित को धारा ॥
सत का ग्रहण नियम है सांचा, यम असत्य छुटकारा ।
समझ जो आई फुरा विवेका, सुख से आसन मारा।
आसन मार विचार की दृढ़ता, प्राणायाम तत सारा ।
इस विचार में रेचक पूरक, कुम्भक का व्यौहारा ॥फकीरा0
चित की वृत्ती निरोध को पाकर, प्रत्याहार संभारा ।
कर अभ्यास मगन मन माना, सत को चित से धारा ॥
यही धारना धारन करना, ध्यान का भया उभारा ।
ध्यान बना जब हुआ फकीरा, तब समाधि बिस्तारा ।
समता जागी ममता भागी, चमका ज्ञान का तारा ।
निरविकल्प सरिकल्प समाधी, शम्भु ने मन को मारा ॥
यह अष्टांग योग है गुरु का, सांचा सहज अकारा ।
सुरत शब्द योग के साधन, मिटा भरम अंधियारा ॥
छुटी समाधि भया उत्थाना, फिर प्रपंच परिवारा ।
साधन साध सन्त मत समझा, सहज समाधि संवारा । ।
सहज समाध सहज चित वृत्ती, सहज योग चित धारा ।
सहज में सहज सहज चित डोले, जीवन मुक्त उद्धारा ॥
सहस कमल दल ज्योति का दर्शन, त्रिकुटी धुन ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न हंसन लीला, सोहंग भँवर फुहारा ॥
ऊंचे चढ़ सत पद में बासा, रूप रंग तज डारा ।
अलख अगम की सुन्दरताई, राधास्वामी नाम निहारा ॥
जीते जी व्यौहार परमारथ, नहीं मीठा नहीं खारा ।
नहीं कड़वा नहीं तीखा लागे, कोमल नहीं करारा ॥
यह विदेह गति जीवन मुक्ति, यह सिद्धांत अपारा ।
मैंने यह सब तुझे सुझाया, मेटा सकल विकारा ।
सहज में तेरा काम बना है, सहज सहज छुटकारा । ।
सहज में सहज रूप पद दरसा, काल कमे भय टारा ।
राधास्वामी दीन दयाला, सन्त रूप अवतारा ।
‘सालिग्राम’ गुरु की दाया, भया सहज निस्तारा ॥
जब लग प्रालब्ध है भाई, भोग काट दे सारा ।
भोगे प्रालब्ध तब कुछ नाहीं, आगे अगम अपारा फकीरा0
कट गई काल कर्म की फांसी, जनम जुआ नहीं हारा ।
राधास्वामी की बलिहारी, रहे फकीर सुखारा ॥फकीरा0
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Song 8 — Hindi
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Song 9 — Hindi
308. विदेसी समझ ले अपने मन में ॥टेका ।
सबको देखा किया परेखा, समझ पड़ा नहीं जग का लेखा ।
भोगा बिपत कलेश विशेखा, मन में रही पछताय विदेसी0
कल्पित जग का भोग बिलासा, कल्पित सब प्रपंच तमासा ।
कल्पित आसा कल्पित बासा, मुख से निकसत हाय ॥
भाई बन्धु कबीले सारे, निज स्वारथ बस लाग प्यारे ।
बिगड़े समय हुये सब न्यारे, एक न आवे जाय ॥
तेरा प्रीतम तेरे घट में, तू है पड़ी जग की खटपट में ।
क्यों नहीं देखे तू तिलपट में, रहा हृदय में छाय ॥
क्यों फिरती है मारी मारी; क्यों जग भरम में हुई दुखारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट गुरु चरन समाय ॥
सबको देखा किया परेखा, समझ पड़ा नहीं जग का लेखा ।
भोगा बिपत कलेश विशेखा, मन में रही पछताय विदेसी0
कल्पित जग का भोग बिलासा, कल्पित सब प्रपंच तमासा ।
कल्पित आसा कल्पित बासा, मुख से निकसत हाय ॥
भाई बन्धु कबीले सारे, निज स्वारथ बस लाग प्यारे ।
बिगड़े समय हुये सब न्यारे, एक न आवे जाय ॥
तेरा प्रीतम तेरे घट में, तू है पड़ी जग की खटपट में ।
क्यों नहीं देखे तू तिलपट में, रहा हृदय में छाय ॥
क्यों फिरती है मारी मारी; क्यों जग भरम में हुई दुखारी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट गुरु चरन समाय ॥
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Song 10 — Hindi
309. गुरु स्वामी दया करो आज नई ॥टेका ।
वन्धन छूटे मोह भरम का, मन से चिंता भागे ।
दुख आपति और संकट जावे, भक्ति भजन चित लागे ।
आज0 मात पिता की सेवा धारू, साध चरन में प्रीती ।
सत संगत के बचन सुनू, जब, उपजे घट परतीती ॥
आज0 सुमति बसे मन कुमति बिनासे, प्रेम प्यार उर आवे ।
ज्ञान ध्यान से नह लगाऊ, दुख दारुन न सतावे । ।
आज0 मन कर्म वचन रहूँ नित सेवक, सहा तुम्हारा ध्याना ।
सुमिरन भजन में समय बिताऊँ, यही मूल है ज्ञाना ।
आज0
राधास्वामी सदा मनाऊँ, राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी नाम जप और, राधास्वामी ध्याऊ ।
आज
वन्धन छूटे मोह भरम का, मन से चिंता भागे ।
दुख आपति और संकट जावे, भक्ति भजन चित लागे ।
आज0 मात पिता की सेवा धारू, साध चरन में प्रीती ।
सत संगत के बचन सुनू, जब, उपजे घट परतीती ॥
आज0 सुमति बसे मन कुमति बिनासे, प्रेम प्यार उर आवे ।
ज्ञान ध्यान से नह लगाऊ, दुख दारुन न सतावे । ।
आज0 मन कर्म वचन रहूँ नित सेवक, सहा तुम्हारा ध्याना ।
सुमिरन भजन में समय बिताऊँ, यही मूल है ज्ञाना ।
आज0
राधास्वामी सदा मनाऊँ, राधास्वामी गाऊँ ।
राधास्वामी नाम जप और, राधास्वामी ध्याऊ ।
आज
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Song 11 — Hindi
310. नाम गुरु नित गाओ मेरे साधु, नाम गुरु नित गाओ ॥टेक। ।
नाम ही ज्ञान ध्यान पुनि नाम ही, नाम ही गाय सुनाओ ।
नाम ही पाठ नाम ही पूजा, नाम से नेह लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही योग और नाम ही मुद्रा, नाम ही ताड़ी लाओ ।
नाम नाम में अन्तर नहीं कुछ, भेद अलौकिक पाओ ॥
मेरे साधु0 नाम की महिमा क्या कोई जाने, नाम जपो जपवाओ ।
नौका नाम नाम है खेवट, नान से तरो तराओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही सेतबन्ध रामेश्वर, नाम से लंक जिताओ ।
लौ लगी रहे नाम संग निसदिन, नाम पदारथ पाओ ॥
मेरे साधु0 जप तप तीरथ सब कुछ त्यागो, नाम की ज्योत जगाओ ।
नाम से रूप गुरु हिये दरसे, नाम से अलख लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम द्वत का भरम बिनासे, पद अत में जाओ ।
प्रेम प्रीत रहे नाम के अन्तर, नाम भजो भजवाओ ॥
मेरे साधु0 नाम सार घट के भीतर, नाम की धूनी रमाओ ।
नाम अमीरस प्रेम पियाला, अमृत नाम चखाओ । ।
मेरे साधु0 नाम की बंसी नाम की मुरली, नाम का शंख बजाओ ।
मोर तोर की कठिन जेवरी, नाम से बंध कटाओ ॥
मेरे साधु0 दाह जगत से चित्त हटाओ, घट में शोर मचाओ ।
राधास्वामी नाम जात है गुरु की, नाम हिये में बसाओ ॥
मेरे साधु0
नाम ही ज्ञान ध्यान पुनि नाम ही, नाम ही गाय सुनाओ ।
नाम ही पाठ नाम ही पूजा, नाम से नेह लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही योग और नाम ही मुद्रा, नाम ही ताड़ी लाओ ।
नाम नाम में अन्तर नहीं कुछ, भेद अलौकिक पाओ ॥
मेरे साधु0 नाम की महिमा क्या कोई जाने, नाम जपो जपवाओ ।
नौका नाम नाम है खेवट, नान से तरो तराओ ॥
मेरे साधु0 नाम ही सेतबन्ध रामेश्वर, नाम से लंक जिताओ ।
लौ लगी रहे नाम संग निसदिन, नाम पदारथ पाओ ॥
मेरे साधु0 जप तप तीरथ सब कुछ त्यागो, नाम की ज्योत जगाओ ।
नाम से रूप गुरु हिये दरसे, नाम से अलख लगाओ ॥
मेरे साधु0 नाम द्वत का भरम बिनासे, पद अत में जाओ ।
प्रेम प्रीत रहे नाम के अन्तर, नाम भजो भजवाओ ॥
मेरे साधु0 नाम सार घट के भीतर, नाम की धूनी रमाओ ।
नाम अमीरस प्रेम पियाला, अमृत नाम चखाओ । ।
मेरे साधु0 नाम की बंसी नाम की मुरली, नाम का शंख बजाओ ।
मोर तोर की कठिन जेवरी, नाम से बंध कटाओ ॥
मेरे साधु0 दाह जगत से चित्त हटाओ, घट में शोर मचाओ ।
राधास्वामी नाम जात है गुरु की, नाम हिये में बसाओ ॥
मेरे साधु0
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Song 12 — Hindi
311. ब्रह्म क्या है ब्रह्म की, सबको समझ आती नहीं ।
गुरु की जब संगत मिली, फिर माया भरमाती नहीं ॥1 ॥
‘वृह’ बढ़ना ‘म’ मनन और, सोचना है जान लो । ।
सोचना बढ़ना है लक्षण, ब्रम का तुम मान लो ॥2 ॥
जगत है सब ब्रह्ममय, और ब्रह्म सबका खेल है ।
बुन्द गति है सिंध की गति, दोनों ही का मेल है ॥3 ॥
ऐसी दृष्टि जब मिले, तब ब्रह्म की आवे समझ ।
ब्रह्म जब आवे समझ में, भरम की जावे समझ ॥4 ॥
सच्ची बातें राधास्वामी, ने बताई आन कर ।
भूल में अब तुम न पड़ना, मेरे प्यारे जानकर ॥5 ॥
बिनती
गुरु की जब संगत मिली, फिर माया भरमाती नहीं ॥1 ॥
‘वृह’ बढ़ना ‘म’ मनन और, सोचना है जान लो । ।
सोचना बढ़ना है लक्षण, ब्रम का तुम मान लो ॥2 ॥
जगत है सब ब्रह्ममय, और ब्रह्म सबका खेल है ।
बुन्द गति है सिंध की गति, दोनों ही का मेल है ॥3 ॥
ऐसी दृष्टि जब मिले, तब ब्रह्म की आवे समझ ।
ब्रह्म जब आवे समझ में, भरम की जावे समझ ॥4 ॥
सच्ची बातें राधास्वामी, ने बताई आन कर ।
भूल में अब तुम न पड़ना, मेरे प्यारे जानकर ॥5 ॥
बिनती
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Song 13 — Hindi
(312 कुल संख्या 1214) बन्दना करता हूँ अपनी, और की क्या बन्दना ।
कोई जब हो दूसरा, उसका करूँ तब सामना ॥1 ॥
द्वरत है अद्वैत द्वताद्वत, और कुछ भी नहीं ।
जिस जगह देखो हूँ व्यापा, आप मैं हूँ सब कहीं ॥2 ॥
शुद्ध चित हूँ बुद्ध हूँ, निन्द हूँ नित मुक्त हूँ ।
सबसे न्यारा सब में पूरा, पृथक और संयुक्त हूँ ॥3 ॥
सत्त चित आनन्द हूँ, तीनों में मेरा भास है। ।
मेरे ही आधार पर, जल थल पवन आकास है ॥4 ॥
ब्रह्म हूँ सर्वज्ञ मैं, और जीव हूँ अल्पज्ञ मैं ।
यज्ञ का मन्तव्य हूँ, और आहुती हूँ यज्ञ में ॥5 ॥
जब मिले अनुभव तो मेरे, रूप की पहचान हो ।
ज्ञान हो अनुमान हो, सत मत हो और विज्ञान हो ॥6 ॥
राधास्वामी के बचन, सतसंग में जाकर सुनो ।
अपने आपा को पिछानोगे, जो सुनकर तुम गुनो ॥7 ॥
फुटकल शब्द है
धुन 20 1
कोई जब हो दूसरा, उसका करूँ तब सामना ॥1 ॥
द्वरत है अद्वैत द्वताद्वत, और कुछ भी नहीं ।
जिस जगह देखो हूँ व्यापा, आप मैं हूँ सब कहीं ॥2 ॥
शुद्ध चित हूँ बुद्ध हूँ, निन्द हूँ नित मुक्त हूँ ।
सबसे न्यारा सब में पूरा, पृथक और संयुक्त हूँ ॥3 ॥
सत्त चित आनन्द हूँ, तीनों में मेरा भास है। ।
मेरे ही आधार पर, जल थल पवन आकास है ॥4 ॥
ब्रह्म हूँ सर्वज्ञ मैं, और जीव हूँ अल्पज्ञ मैं ।
यज्ञ का मन्तव्य हूँ, और आहुती हूँ यज्ञ में ॥5 ॥
जब मिले अनुभव तो मेरे, रूप की पहचान हो ।
ज्ञान हो अनुमान हो, सत मत हो और विज्ञान हो ॥6 ॥
राधास्वामी के बचन, सतसंग में जाकर सुनो ।
अपने आपा को पिछानोगे, जो सुनकर तुम गुनो ॥7 ॥
फुटकल शब्द है
धुन 20 1
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Song 14 — Hindi
313. बाँसुरी बाजी मधु बन में ॥टेका ।
बंसी की धुन सुन जिया हिया मोहे, सुध बुध नहीं रही तन में ।
गोप प्रेम मद माते डोले, गोपी अचेत है मन में ॥
बांसुरी0 बंसी रस कोई नहीं जाने, वह नहीं श्रवन मनन में ।
ज्ञानी ज्ञान ध्यान में भूले, जोगी जोग जतन में ॥
सोहंग सोहंग बंसी बोले, जाग्रत और स्वपन में ।
सुषुप्ति में व्यापी धुन अद्भुत, व्यापी चौथे पन में ॥
मन बानी से ऊंची बंसी, वह नहीं कहन सुनन में। ।
गूजत पिंड ब्रह्मांड के अन्तर, गूजत बस्ती बन में ॥
अनहद नाद शब्द सुन सूरत, लड़न चली है रन में ।
माया कर्म का माथा काटा, धसी धुर पद छिन छिन में ॥
बंसी की धुन सुन जिया हिया मोहे, सुध बुध नहीं रही तन में ।
गोप प्रेम मद माते डोले, गोपी अचेत है मन में ॥
बांसुरी0 बंसी रस कोई नहीं जाने, वह नहीं श्रवन मनन में ।
ज्ञानी ज्ञान ध्यान में भूले, जोगी जोग जतन में ॥
सोहंग सोहंग बंसी बोले, जाग्रत और स्वपन में ।
सुषुप्ति में व्यापी धुन अद्भुत, व्यापी चौथे पन में ॥
मन बानी से ऊंची बंसी, वह नहीं कहन सुनन में। ।
गूजत पिंड ब्रह्मांड के अन्तर, गूजत बस्ती बन में ॥
अनहद नाद शब्द सुन सूरत, लड़न चली है रन में ।
माया कर्म का माथा काटा, धसी धुर पद छिन छिन में ॥
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Song 15 — Hindi
धुन 16 314. बाँसुरी बाजी बाजी बाजी ॥टेक। ।
ऋषि मुनि का ध्यान छूट गयो, शब्द अनाहत गाजी ॥1 ॥
प्रीतम प्रेमी संग मिल बैठे, हो गये दोनों राजी ॥2 ॥
यह बंसी धुन भंवर गुफा की, ढोल पखावज लाजी ॥3 ॥
भक्ति भाव की धूम मची है, साज अनूपम साजी ॥4 ॥
ऋषि मुनि का ध्यान छूट गयो, शब्द अनाहत गाजी ॥1 ॥
प्रीतम प्रेमी संग मिल बैठे, हो गये दोनों राजी ॥2 ॥
यह बंसी धुन भंवर गुफा की, ढोल पखावज लाजी ॥3 ॥
भक्ति भाव की धूम मची है, साज अनूपम साजी ॥4 ॥
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Song 16 — Hindi
धुन 16 315. जनम अन्मोल नसाय रहो री ।।टेक ॥
उत्तम करनी उत्तम रहनी, उत्तम कथनी भुलाय रहो री ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं कीन्हा, भूल भरम अटकाय रहो री ॥2 ॥
चित मलीन हीन हिय व्याकुल, रात दिवस पछताय रहो री ॥3 ॥
जड़ चेतन की गांठ न खोली, उरझ उरझ उरझाय रहो री ॥4 ॥
कर्म फांस जम काल कठिन अति, छिन छिन अधिक फंसाय रहोरी ॥5 ॥
साज साज कुसंग कुबुद्धि, मन तीनों से लगाय रहो री ॥6 ॥
काल कराल बयाल इन्द्रिन को, गल में हार पहनाय रहो री ॥7 ॥
साधु संग तज तज सतसंगत, माया में लपटाय रहो री ॥8 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम्हरे द्वारे आय रहो री ॥6 ॥
उत्तम करनी उत्तम रहनी, उत्तम कथनी भुलाय रहो री ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन नहीं कीन्हा, भूल भरम अटकाय रहो री ॥2 ॥
चित मलीन हीन हिय व्याकुल, रात दिवस पछताय रहो री ॥3 ॥
जड़ चेतन की गांठ न खोली, उरझ उरझ उरझाय रहो री ॥4 ॥
कर्म फांस जम काल कठिन अति, छिन छिन अधिक फंसाय रहोरी ॥5 ॥
साज साज कुसंग कुबुद्धि, मन तीनों से लगाय रहो री ॥6 ॥
काल कराल बयाल इन्द्रिन को, गल में हार पहनाय रहो री ॥7 ॥
साधु संग तज तज सतसंगत, माया में लपटाय रहो री ॥8 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम्हरे द्वारे आय रहो री ॥6 ॥
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Song 17 — Hindi
धुन 20 316. गुरु चरन की आसा निस दिन, गुरु चरन की आसा ।।टेक। ।
स्वाँति बून्द गति चित्त बसावे, रहत पपीहा प्यासा ।
पल पल पल पल पी पी रटते, काल करम की त्रासा ॥
गुरु0 पूरी आस लगी गुरु पद से, जग से सदा निरासा ।
जा को चरन प्राप्त गुरू का, सो क्यों होय उदासा ॥
गुरु खुल खेले संसार खेल में, काट मोह का फाँसा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सकल अविद्या नासा ॥
गुरु
स्वाँति बून्द गति चित्त बसावे, रहत पपीहा प्यासा ।
पल पल पल पल पी पी रटते, काल करम की त्रासा ॥
गुरु0 पूरी आस लगी गुरु पद से, जग से सदा निरासा ।
जा को चरन प्राप्त गुरू का, सो क्यों होय उदासा ॥
गुरु खुल खेले संसार खेल में, काट मोह का फाँसा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सकल अविद्या नासा ॥
गुरु
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Song 18 — Hindi
धुन 17 317. प्रान दाता दान दाता, नाम दीजे दान ।
भक्ति दीजे पतित पावन, नष्ट हो मदमान ॥1 ॥
कष्ट दारुन दूर कीजे, मेट कर अज्ञान ।
चरन शरन की ओट पकड़ी, बख्शिये निज ज्ञान ।।2। ।
आया शरनागत तुम्हारी, राख लीजे लाज ।
राधास्वामी की दया से, मेरा हो न अकाज ॥3 ॥
भक्ति दीजे पतित पावन, नष्ट हो मदमान ॥1 ॥
कष्ट दारुन दूर कीजे, मेट कर अज्ञान ।
चरन शरन की ओट पकड़ी, बख्शिये निज ज्ञान ।।2। ।
आया शरनागत तुम्हारी, राख लीजे लाज ।
राधास्वामी की दया से, मेरा हो न अकाज ॥3 ॥
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Song 19 — Hindi
धुन 16 318.मन का रूप निहारो साधु, मन का रूप निहारो ॥टेक ॥
मन ही राजा मन ही परजा, मन का सकल पसारो ॥
साधु0 मन ही कुटिल मन ही है निर्मल, मन है अति ही करारो॥
मन रथ गज है मन सब कुछ है, मन ही बनो असबारो॥
मन परलोक लोक यह मन है, मन ही जगत बिस्तारो ॥
साधु0 ज्ञान विराग भक्ति सब मन है, मन की इष्ट करतारो ॥
समझ बूझ अनुभव सब मन है, मन ही आचार विचारो ॥
मन तिरिया मन मातु बंधु कुल, मन सुत गृह परिवारो॥
मन सुध बुध मन काम क्रोध, मन में भरो विकारो॥
मन को सोध चलो गगना पर, सुनो राधास्वामी पुकारो॥
मन ही राजा मन ही परजा, मन का सकल पसारो ॥
साधु0 मन ही कुटिल मन ही है निर्मल, मन है अति ही करारो॥
मन रथ गज है मन सब कुछ है, मन ही बनो असबारो॥
मन परलोक लोक यह मन है, मन ही जगत बिस्तारो ॥
साधु0 ज्ञान विराग भक्ति सब मन है, मन की इष्ट करतारो ॥
समझ बूझ अनुभव सब मन है, मन ही आचार विचारो ॥
मन तिरिया मन मातु बंधु कुल, मन सुत गृह परिवारो॥
मन सुध बुध मन काम क्रोध, मन में भरो विकारो॥
मन को सोध चलो गगना पर, सुनो राधास्वामी पुकारो॥
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Song 20 — Hindi
धुन 16 319. धन्य धन्य सतगुरु दयाला, कृपा सागर दुख भंजन ।
संकट मोचन भव भय खंजन, काम निकंदन जन रंजन ॥1 ॥
कोटि काम छवि अंग बिराजे, शोभा धारी हितकारी ।
सुर मुनि ऋषि सब ध्यान लगावें, इन्द्र वरुण आज्ञाकारी ॥2 ॥
शेष सहस मुख बरणे महिमा, नारद शारद गुन गायें ।
अस्तुति ठान पूजा धार, भक्ति अनूपम बर पाव ॥3 ॥
अपरम्पार पार पुरुषोत्तम, व्यापक वरज महान महा ।
वेद बरखाने लीला तेरी, समझ समझ पद पदकमल गहा ॥4 ॥
तू है सिंध अगाध गंभीरा, लहर विष्णु अज त्रिपुरारी ।
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, धन धन तू जगदा धारी ॥5 ॥
सबका प्यारा सबका प्रीतम, घट घट का तू नित बासी ।
आनन्द मंगल रूप है तेरा, आनन्द मय आनन्द रासी ॥6 ॥
सहस कमल में ज्योति निरंजन, त्रिकुटी पद का ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न पारब्रह्म तू , भवर गुफा सोहंग सारा ॥7 ॥
सत्तलोक का सत्त पुरुष तू , अलख अगम का करतारा ।
राधास्वामी धाम में राधास्वामी, सुरत शब्द का भंडारा ॥8 ॥
तेरी सेवा तेरी पूजा, तेरा सुमिरन ध्यान रहे ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तेरा ज्ञान हर आन रहे ॥6 ॥
संकट मोचन भव भय खंजन, काम निकंदन जन रंजन ॥1 ॥
कोटि काम छवि अंग बिराजे, शोभा धारी हितकारी ।
सुर मुनि ऋषि सब ध्यान लगावें, इन्द्र वरुण आज्ञाकारी ॥2 ॥
शेष सहस मुख बरणे महिमा, नारद शारद गुन गायें ।
अस्तुति ठान पूजा धार, भक्ति अनूपम बर पाव ॥3 ॥
अपरम्पार पार पुरुषोत्तम, व्यापक वरज महान महा ।
वेद बरखाने लीला तेरी, समझ समझ पद पदकमल गहा ॥4 ॥
तू है सिंध अगाध गंभीरा, लहर विष्णु अज त्रिपुरारी ।
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, धन धन तू जगदा धारी ॥5 ॥
सबका प्यारा सबका प्रीतम, घट घट का तू नित बासी ।
आनन्द मंगल रूप है तेरा, आनन्द मय आनन्द रासी ॥6 ॥
सहस कमल में ज्योति निरंजन, त्रिकुटी पद का ओंकारा ।
सुन्न महासुन्न पारब्रह्म तू , भवर गुफा सोहंग सारा ॥7 ॥
सत्तलोक का सत्त पुरुष तू , अलख अगम का करतारा ।
राधास्वामी धाम में राधास्वामी, सुरत शब्द का भंडारा ॥8 ॥
तेरी सेवा तेरी पूजा, तेरा सुमिरन ध्यान रहे ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तेरा ज्ञान हर आन रहे ॥6 ॥
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Song 21 — Hindi
धुन 17 320. अपरम्पार पार गुरु देवा, बार पार से पार रहा ।
पार वार नहीं पाये कोई, पार रहा और वार रहा ॥1 ॥
धन्य धन्य है तेरी महिमा, क्या कोई जाने ऋषि मुनि ।
करता धरता आदि निरंजन, नागर आगर परम गुनि ॥2 ॥
चतुर सियाना पंडित ज्ञानी, मन बुद्धि के पार है तू । ।
सब में रहता सबसे न्यारा, प्रेत प्रीत भंडार है तू ॥3 ॥
तू महेश है तू ब्रह्मा है, तू है विष्णु जगत पति । ।
लीला तेरी विचित्र रूप की, तू नेती नहीं नहीं एती ॥4 ॥
पार वार नहीं पाये कोई, पार रहा और वार रहा ॥1 ॥
धन्य धन्य है तेरी महिमा, क्या कोई जाने ऋषि मुनि ।
करता धरता आदि निरंजन, नागर आगर परम गुनि ॥2 ॥
चतुर सियाना पंडित ज्ञानी, मन बुद्धि के पार है तू । ।
सब में रहता सबसे न्यारा, प्रेत प्रीत भंडार है तू ॥3 ॥
तू महेश है तू ब्रह्मा है, तू है विष्णु जगत पति । ।
लीला तेरी विचित्र रूप की, तू नेती नहीं नहीं एती ॥4 ॥
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Song 22 — Hindi
धुन 17 321. आदि अन्त के मरम को, सतसंग में पाया ।
खुली आँख तव तत्व पद, दृष्टि में आया ॥1 ॥
अपने आप में खो गये, भूला निज आपा ।
मापा आरे को नहीं, किया सबका मापा ॥2 ॥
गुरु मिले निज दया से, आपा दरसाया ।
अपने आरे में थे छुपे, सब ब्रह्म और माया ॥3 ॥
अपने आपका ज्ञान नहीं, औरों को जाना ।
सब विधि जान अनजान था, विन गुरु के ज्ञाना ॥4 ॥
आपे में गुरु ज्ञान था, गुरु आप लखाया ।
भरम मिटा दुर्मति गई, आधे को पाया ॥5 ॥
आप आप में आप था, आपे के भीतर ।
आप मिला निज घट मिला, कुछ रहा न बाहर ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, आपे को बुझा ।
आपे को जब लख लिया, सब कुछ तब सूझा ॥7 ॥
शिव शब्द सांगर
खुली आँख तव तत्व पद, दृष्टि में आया ॥1 ॥
अपने आप में खो गये, भूला निज आपा ।
मापा आरे को नहीं, किया सबका मापा ॥2 ॥
गुरु मिले निज दया से, आपा दरसाया ।
अपने आरे में थे छुपे, सब ब्रह्म और माया ॥3 ॥
अपने आपका ज्ञान नहीं, औरों को जाना ।
सब विधि जान अनजान था, विन गुरु के ज्ञाना ॥4 ॥
आपे में गुरु ज्ञान था, गुरु आप लखाया ।
भरम मिटा दुर्मति गई, आधे को पाया ॥5 ॥
आप आप में आप था, आपे के भीतर ।
आप मिला निज घट मिला, कुछ रहा न बाहर ॥6 ॥
राधास्वामी की दया, आपे को बुझा ।
आपे को जब लख लिया, सब कुछ तब सूझा ॥7 ॥
शिव शब्द सांगर
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Song 23 — Hindi
धुन 16 322. प्रेमी सुनो प्रेम की बात ॥टेक। ।
सेवा करो प्रेम से गुरु की, और दर्शन पर बल बल जात ॥प्रेमी0
बचन पियारे गुरु के ऐसे, जस माता सुत तोतरी बात |प्रेमी
जस कामी को कामिन प्यारी अस गुरुमुख को गुरु का गात ॥प्रेमी
खाते पीते चलते फिरते, सोबत जागत बिसर न जात ॥प्रेमी
खटकत रहे भाल ज्यों हियरे, दर्दी के ज्यों दर्द समात ॥प्रेमी
ऐसी लगन गुरु संग जाकी, वह गुरुमुख परमारथ पात ॥प्रेमी
जब लग गुरु प्यारे नहीं ऐसे, तब लग हिरसी जानो जात ॥प्रेमी
मन मुख फिरे किसी का नाहीं, कहो क्योंकर परमारथ पात ॥प्रेमी
राधास्वामी कहत सुनाई, अब सतगुरु का पकड़ो हाथ ॥प्रेमी
सेवा करो प्रेम से गुरु की, और दर्शन पर बल बल जात ॥प्रेमी0
बचन पियारे गुरु के ऐसे, जस माता सुत तोतरी बात |प्रेमी
जस कामी को कामिन प्यारी अस गुरुमुख को गुरु का गात ॥प्रेमी
खाते पीते चलते फिरते, सोबत जागत बिसर न जात ॥प्रेमी
खटकत रहे भाल ज्यों हियरे, दर्दी के ज्यों दर्द समात ॥प्रेमी
ऐसी लगन गुरु संग जाकी, वह गुरुमुख परमारथ पात ॥प्रेमी
जब लग गुरु प्यारे नहीं ऐसे, तब लग हिरसी जानो जात ॥प्रेमी
मन मुख फिरे किसी का नाहीं, कहो क्योंकर परमारथ पात ॥प्रेमी
राधास्वामी कहत सुनाई, अब सतगुरु का पकड़ो हाथ ॥प्रेमी
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Song 24 — Hindi
धुन 16 323. सजनी गुरु का मिला संदेशा ॥टेक। ।
धीरज धरो शान्ति चित राखो, यह है निज उपदेशा ।
माया काल की बस्ती तज कर, जाओ गुरु के देशा सजनी0
नहीं वहां शोक न चिंता व्यापे, नहीं वहां कलह कलेशा। ।
नित आनन्द विलास चैन सुख, धरो हंस का भेसा ॥सजनी
नहिं वहां ब्रह्मा नहीं वहां विष्णु, नहीं वहां इन्द्र गनेसा ।
नहीं वहां वरुण न वायु न अग्नि, नहीं जल थल नहीं सेसा सजनी
नहीं वहां पिंड नहीं ब्रह्मडा; गांव न बस्ती देसा ।
एक रस जीवन पद निरवाना, दुख सुख नहीं लवलेसा ॥सजनी
जो चल जाये राधास्वामी धामा, दुख सुख नहीं लवसेसा ।
भाग्यवती चल काल लोक तज, त्याग जगत का अंदेसा ।।सजनी
धीरज धरो शान्ति चित राखो, यह है निज उपदेशा ।
माया काल की बस्ती तज कर, जाओ गुरु के देशा सजनी0
नहीं वहां शोक न चिंता व्यापे, नहीं वहां कलह कलेशा। ।
नित आनन्द विलास चैन सुख, धरो हंस का भेसा ॥सजनी
नहिं वहां ब्रह्मा नहीं वहां विष्णु, नहीं वहां इन्द्र गनेसा ।
नहीं वहां वरुण न वायु न अग्नि, नहीं जल थल नहीं सेसा सजनी
नहीं वहां पिंड नहीं ब्रह्मडा; गांव न बस्ती देसा ।
एक रस जीवन पद निरवाना, दुख सुख नहीं लवलेसा ॥सजनी
जो चल जाये राधास्वामी धामा, दुख सुख नहीं लवसेसा ।
भाग्यवती चल काल लोक तज, त्याग जगत का अंदेसा ।।सजनी
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Song 25 — Hindi
धुन 17 324. नारी देख काम अंग उपजे, साधु देखे भक्ति ।
जल के देखे निर्मलताई, यह विचित्र है युक्ति ॥1 ॥
लोभी लोभ हृदय जब आवे, लालच अधिक सतावे ।
पीक पान की रतन दिखावे, गोपी चन्द भरमावे ॥2 ॥
लालच बस जब निरखी सीपी, रूपा समझ उठाया ।
भूला भटका चतुर सयाना, पीछे बहु पछताया ॥3 ॥
तृष्णा जल की हिये में व्यापी, मृग लख रेत में पानी ।
मृग तृष्णा जल भरम भुलाना, अन्त में प्रान गवानी ॥4 ॥
भय बस भूत ठूठ में भासा, नसी बुद्धि चतुराई । ।
वंद विचारे औषध लाये, भई न कोई भलाई ॥5 ॥
यह जग है माया की छाया, माया आप है झाई ।
जो कोई माया चित बसाये, पड़े भरन में साई ॥6 ॥
प्रातः काल की प्रार्थना के
जल के देखे निर्मलताई, यह विचित्र है युक्ति ॥1 ॥
लोभी लोभ हृदय जब आवे, लालच अधिक सतावे ।
पीक पान की रतन दिखावे, गोपी चन्द भरमावे ॥2 ॥
लालच बस जब निरखी सीपी, रूपा समझ उठाया ।
भूला भटका चतुर सयाना, पीछे बहु पछताया ॥3 ॥
तृष्णा जल की हिये में व्यापी, मृग लख रेत में पानी ।
मृग तृष्णा जल भरम भुलाना, अन्त में प्रान गवानी ॥4 ॥
भय बस भूत ठूठ में भासा, नसी बुद्धि चतुराई । ।
वंद विचारे औषध लाये, भई न कोई भलाई ॥5 ॥
यह जग है माया की छाया, माया आप है झाई ।
जो कोई माया चित बसाये, पड़े भरन में साई ॥6 ॥
प्रातः काल की प्रार्थना के
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Song 26 — Hindi
धुन 20 325. तुम्हारा एक सहारा नाथ ॥टेक। ।
मैं अजान चिन्ता बस व्याकुल, मन में भरा हंकारा ।
तीन ताप की अग्नि जलाये, कौन करे निस्तारा ॥ तुम्हारा
लोभ माह ने मुझे फंसाया, बझे वार न पारा ।
गुरु उपदेश न चित्त समावे, हार हार बहु हारा ॥
तुम्हारा धीरज दे मेरी बांह पकड़ कर, भव से करो किनारा !
राधास्वामी सतगुरु दाता, मैं हूँ दास तुम्हारा ॥
तुम्हारा मध्यान काल की प्रार्थना
मैं अजान चिन्ता बस व्याकुल, मन में भरा हंकारा ।
तीन ताप की अग्नि जलाये, कौन करे निस्तारा ॥ तुम्हारा
लोभ माह ने मुझे फंसाया, बझे वार न पारा ।
गुरु उपदेश न चित्त समावे, हार हार बहु हारा ॥
तुम्हारा धीरज दे मेरी बांह पकड़ कर, भव से करो किनारा !
राधास्वामी सतगुरु दाता, मैं हूँ दास तुम्हारा ॥
तुम्हारा मध्यान काल की प्रार्थना
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Song 27 — Hindi
धुन 20 326. आस लगी तुम्हरे दरस की, दरस दिखा दो नाथ ॥टेका
मात पिता भाई सम्बन्धी, इनके झूठे प्रेम में बधी ।
मैं तो सब विधि भई हूँ अन्धी, सांची डगर दिखाओ नाथ । ।
आस0 आओ आओ चित में समाओ, सांवरी मूरति हिये बस जाओ ।
बिगड़ी मेरी बना भी जाओ, प्रीत की रीत सिखादो नाथ ।।आस0
तुम हो सांचे सखा संघाती, तुम्हें रिझाऊँ दिन और राती ।
राधास्वामीमेटो सब उत्पाती, घट का मरम लखा दो नाथ ॥आस
सोने से पूर्व की प्रार्थना ॥
मात पिता भाई सम्बन्धी, इनके झूठे प्रेम में बधी ।
मैं तो सब विधि भई हूँ अन्धी, सांची डगर दिखाओ नाथ । ।
आस0 आओ आओ चित में समाओ, सांवरी मूरति हिये बस जाओ ।
बिगड़ी मेरी बना भी जाओ, प्रीत की रीत सिखादो नाथ ।।आस0
तुम हो सांचे सखा संघाती, तुम्हें रिझाऊँ दिन और राती ।
राधास्वामीमेटो सब उत्पाती, घट का मरम लखा दो नाथ ॥आस
सोने से पूर्व की प्रार्थना ॥
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Song 28 — Hindi
धुन 20 327. मेरा संकट काटो नाथ ॥टेक ॥
दीन दुखित और मलीन चित; कोई संग न साथ ।
कैसे दुखी जीवन को बिताऊँ, धरो सिर पर हाथ ॥
मेरा0 तुम हो मेरे सांचे रक्षक, मैं अजान अनाथ ।
भूल चूक को क्षमा करो प्रभु, चरन झुकाऊ माथ ॥
मेरा0 साँची भक्ति दो दयामय, और प्रेम की दात ।
राधास्वामी की कृपा से, छूटे सब उत्पातः । । मेरा0
दीन दुखित और मलीन चित; कोई संग न साथ ।
कैसे दुखी जीवन को बिताऊँ, धरो सिर पर हाथ ॥
मेरा0 तुम हो मेरे सांचे रक्षक, मैं अजान अनाथ ।
भूल चूक को क्षमा करो प्रभु, चरन झुकाऊ माथ ॥
मेरा0 साँची भक्ति दो दयामय, और प्रेम की दात ।
राधास्वामी की कृपा से, छूटे सब उत्पातः । । मेरा0
×
Song 29 — Hindi
धुन 16 328. दीन हीन शरण में आया, भेट भाव स्वामी लीजे ।
कृपा दृष्टि से अपने दाता, शरणागत धन दीजे ॥1 ॥
मैं तो निबल कुटिल खल कामी, क्रोधी महा मलीना ।
तुमने अवगुन देख के मेरे, दया पात्र मोहि कीना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु परम सनेही, परम दयाल कृपाला ।
तिमिर मिटा अज्ञान भरम का, हृदय भया उजाला ॥3 ॥
कृपा दृष्टि से अपने दाता, शरणागत धन दीजे ॥1 ॥
मैं तो निबल कुटिल खल कामी, क्रोधी महा मलीना ।
तुमने अवगुन देख के मेरे, दया पात्र मोहि कीना ॥2 ॥
धन्य धन्य गुरु परम सनेही, परम दयाल कृपाला ।
तिमिर मिटा अज्ञान भरम का, हृदय भया उजाला ॥3 ॥
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Song 30 — Hindi
धुन 17 329. धन्य धन्य गुरु लीला तेरी, धन्य तेरी है बानी ।
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, अगम अथाह निशानी ॥1 ॥
आप प्रगट हो मुझे बनाया, निज उपदेश सुनाया ।
जोग जुक्त की रीति सिखाई, भक्ति का पन्थ चलाया ॥2 ॥
ममें लखाया मेद बताया, पड़त जीव तराया ।
शन्द जहाज बिठाकर तूने, भव के पार लगाया ॥3 ॥
तेरी महिमा अगम अलौकिक, क्या कोई वरन सुनावे ।
आप कहे तब समझ में आवे, द्वन्द फाँस कट जावे ॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु पाया, चरन शरन गह पकड़ा ।
बन्ध मुक्ति का संशय मेटा, तोड़ा काल का सकड़ा ॥5 ॥
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, अगम अथाह निशानी ॥1 ॥
आप प्रगट हो मुझे बनाया, निज उपदेश सुनाया ।
जोग जुक्त की रीति सिखाई, भक्ति का पन्थ चलाया ॥2 ॥
ममें लखाया मेद बताया, पड़त जीव तराया ।
शन्द जहाज बिठाकर तूने, भव के पार लगाया ॥3 ॥
तेरी महिमा अगम अलौकिक, क्या कोई वरन सुनावे ।
आप कहे तब समझ में आवे, द्वन्द फाँस कट जावे ॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु पाया, चरन शरन गह पकड़ा ।
बन्ध मुक्ति का संशय मेटा, तोड़ा काल का सकड़ा ॥5 ॥
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Song 31 — Hindi
धुन 17 330. योग को है वियोग का डर, भोग रोग और सोग ।
द्वन्द रचना में पड़े हैं, कैसे समझे लोग ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान की गम नहीं, नहीं बानी मन में सार ।
भक्ति मुक्ति के फल को क्या हूँ, वह है मनन विचार ॥2 ॥
सुन्न सिखर पर मार आसन, चित्त ध्यान लगाय ।
जप किया बहु तप किया बहु, जड़ समाध रचाय ॥3 ॥
हाथ आया कुछ नहीं, नहीं खुले हिय के नेन ।
आपके चरनों में आया, तब मिला सुख चैन ॥4 ॥
पाय कर सुख चैन कुछ दिन, साध शब्द का योग । ।
सार समझा भेट लीजे, आज सन्त संजोग ॥5 ॥
द्वन्द रचना में पड़े हैं, कैसे समझे लोग ॥1 ॥
ज्ञान ध्यान की गम नहीं, नहीं बानी मन में सार ।
भक्ति मुक्ति के फल को क्या हूँ, वह है मनन विचार ॥2 ॥
सुन्न सिखर पर मार आसन, चित्त ध्यान लगाय ।
जप किया बहु तप किया बहु, जड़ समाध रचाय ॥3 ॥
हाथ आया कुछ नहीं, नहीं खुले हिय के नेन ।
आपके चरनों में आया, तब मिला सुख चैन ॥4 ॥
पाय कर सुख चैन कुछ दिन, साध शब्द का योग । ।
सार समझा भेट लीजे, आज सन्त संजोग ॥5 ॥
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Song 32 — Hindi
धुन 16 331. माया छाया एक रूप हैं, पकड़े हाथ न आवे ।
रूप जान ले इनका भाई, फिर नहीं यह भरमावे ॥1 ॥
जो भागे माया के भय से, वह कायर अज्ञानी ।
माया मिथ्या कल्पित झूठी, नाटक खेल की खानी ॥2 ॥
नाटकशाला सत्र जाते हैं, देखन खेल तमाशा ।
किसी के चित्त उदासी आई, किसी को हर्ष हुलासा ॥3 ॥
साधु साक्षी रूप से देखें, अपना रूप न त्यागे ।
नहीं वह भिड़े न लड़ भिड़ कल्प, नहीं माया से भाग ॥4 ॥
स्म बना माया की गठड़ी, अर्थ का लाड़ पियारा ।
सखी माल दौलत को भोगे, रहे सदा छुटकारा ॥5 ॥
माया नहीं हैं दुख का कारन, दुख भज्ञान है भाई ।
समझले अपना रूप अनूपा, फिर यह हो सुखदाई ॥6 ॥
काम है माया धर्म है माया, अर्थ है माया रूपा । ।
जो नहीं इनका रूप पिछाने, गिरे भरम के कूपा ॥7 ॥
कूप गिरे सो गोते खावे, कभी नीचे कभी ऊपर । ।
चेत न आवे समझ न पावे, भार कष्ट का सिर पर ॥8 ॥
सन्त समागम जो कोई आवे, सार मेद कुछ बुझे ।
राधास्वामी गुरु की दाया, निज स्वरूप की सूझे ॥6 ॥
रूप जान ले इनका भाई, फिर नहीं यह भरमावे ॥1 ॥
जो भागे माया के भय से, वह कायर अज्ञानी ।
माया मिथ्या कल्पित झूठी, नाटक खेल की खानी ॥2 ॥
नाटकशाला सत्र जाते हैं, देखन खेल तमाशा ।
किसी के चित्त उदासी आई, किसी को हर्ष हुलासा ॥3 ॥
साधु साक्षी रूप से देखें, अपना रूप न त्यागे ।
नहीं वह भिड़े न लड़ भिड़ कल्प, नहीं माया से भाग ॥4 ॥
स्म बना माया की गठड़ी, अर्थ का लाड़ पियारा ।
सखी माल दौलत को भोगे, रहे सदा छुटकारा ॥5 ॥
माया नहीं हैं दुख का कारन, दुख भज्ञान है भाई ।
समझले अपना रूप अनूपा, फिर यह हो सुखदाई ॥6 ॥
काम है माया धर्म है माया, अर्थ है माया रूपा । ।
जो नहीं इनका रूप पिछाने, गिरे भरम के कूपा ॥7 ॥
कूप गिरे सो गोते खावे, कभी नीचे कभी ऊपर । ।
चेत न आवे समझ न पावे, भार कष्ट का सिर पर ॥8 ॥
सन्त समागम जो कोई आवे, सार मेद कुछ बुझे ।
राधास्वामी गुरु की दाया, निज स्वरूप की सूझे ॥6 ॥
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Song 33 — Hindi
धुन 16 332. काम से उपजी मन में आसा, आसा चित में धारी ।
आसा बासा दृढ़ता आहे, दृढ़ता मूल विकारी ॥1 ॥
इस दृढ़ता में बन्धन की जड़, सूत कात मन लाया ।
ताना बाना तान चलाया, बन्धन बीच फसाया ॥2 ॥
बन्धन के बस दुचिता बाढ़ी, दुविधा दुर्मति खानी ।
साँप छछू दर की गति जैसी, वैसा ही अज्ञानी ॥3 ॥
आस न तोड़े पास न छोड़े, रहे ताहि के पासा ।
जहाँ आसा तहाँ बासा पावे, अचरज अजब तमासा ॥4 ॥
यह बन्धन है काल की रसरी, विरला कोई लख पावे ।
राधास्वामी दया करें जब, मन की दुविधा जावे ॥5 ॥
आसा बासा दृढ़ता आहे, दृढ़ता मूल विकारी ॥1 ॥
इस दृढ़ता में बन्धन की जड़, सूत कात मन लाया ।
ताना बाना तान चलाया, बन्धन बीच फसाया ॥2 ॥
बन्धन के बस दुचिता बाढ़ी, दुविधा दुर्मति खानी ।
साँप छछू दर की गति जैसी, वैसा ही अज्ञानी ॥3 ॥
आस न तोड़े पास न छोड़े, रहे ताहि के पासा ।
जहाँ आसा तहाँ बासा पावे, अचरज अजब तमासा ॥4 ॥
यह बन्धन है काल की रसरी, विरला कोई लख पावे ।
राधास्वामी दया करें जब, मन की दुविधा जावे ॥5 ॥
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Song 34 — Hindi
धुन 21 333. मुक्ति साधु रूप में, साधु मुक्ति रूप ॥टेक ॥
कमल नीर सम जग में रहनी, देखें वास सुबास ।
जहां जायें जंगल में मंगल, दुख नहीं साधू पास ॥
सच्चे अगम अनूप ॥1 ॥
देह गेह की चिंता नाही, करें और का हित ।
यह बर दीजे सतगुरु स्वामी, साध सेव करू नित । ।
पड़, न भर्म के कूप ॥2 ॥
राधास्वामी दया के सागर, दया मेहर की खान ।
सन्त रूप धर मुख से अपना, महिमा साध बखान । ।
अचरज अमर अरूप ॥3 ॥
कमल नीर सम जग में रहनी, देखें वास सुबास ।
जहां जायें जंगल में मंगल, दुख नहीं साधू पास ॥
सच्चे अगम अनूप ॥1 ॥
देह गेह की चिंता नाही, करें और का हित ।
यह बर दीजे सतगुरु स्वामी, साध सेव करू नित । ।
पड़, न भर्म के कूप ॥2 ॥
राधास्वामी दया के सागर, दया मेहर की खान ।
सन्त रूप धर मुख से अपना, महिमा साध बखान । ।
अचरज अमर अरूप ॥3 ॥
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Song 35 — Hindi
धुन 17 334. | बीज से अंकुर अंकुर कोंपल, पात फूल सक आये ।
फूल से फल फल मीठा लागा, खाय ताहि तृप्ताये ॥1 ॥
काम से धर्म धर्म से सबको, अर्थ प्रापत होई ।
रचना का सिद्धान्त अद्भुत, बिरला समझे कोई ॥2 ॥
राधास्वामी मौज दिखाया, सार तत्व समझाया ।
जो नहीं सार वस्तु को समझे, मानुष जनम गँवाया ॥3 ॥
फूल से फल फल मीठा लागा, खाय ताहि तृप्ताये ॥1 ॥
काम से धर्म धर्म से सबको, अर्थ प्रापत होई ।
रचना का सिद्धान्त अद्भुत, बिरला समझे कोई ॥2 ॥
राधास्वामी मौज दिखाया, सार तत्व समझाया ।
जो नहीं सार वस्तु को समझे, मानुष जनम गँवाया ॥3 ॥
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Song 36 — Hindi
धुन 20 335. साधु मिला ओम् अस्थान ॥टेक ।
सहस कमल दल वृत्ति जमाई, विश्वमित्र धर ध्यान ।
भ्र मध्य मिथिला पर ठहरे, तोड़ी शिव की कमान ॥1 ॥
सीता सती से विवाह रचाया, राम हुये बलवान ।
आये अवध शरीर को सोधा, दशरथ का किया हान ॥2 ॥
बन में जप तप संजम नेमा, कर बाढ़ा अभिमान ।
सूर्पनखा की नाक कटाई, खर दूषन घुमसान ॥3 ॥
रज रावन ने सीता हरली, पाया दुख महान ।
चल विहंग मारग के रस्ते, कपि मारग दरसान ॥4 ॥
कपि की चाल कठिन अति भारी, पहुँचे बीर हनुमान ।
लंका जाय अशोक बाटिका, देखी सीता आन ॥5 ॥
तब पिपीलिका मारग सोधा, सप्त सिंध गति जान ।
बानर रीछ राक्षस सैना, लंका किया चढ़ान ॥6 ॥
रज तम सत गुन इनको समझो, वृत्ति सुशील सुहान ।
रज रावण तम कुम्भकर्ण को, मारा तक तक बान ॥7 ॥
मेघनाद त्रिकुटी गढ़ जीता, सत विभीषन सन्मान ।
सीता सत वृत्ति ले लौटे, चढ़ पुष्पक बीमान ॥8 ॥
देह अवध का काज सुधारा, पाया अद्भुत ज्ञान । ।
ताके पीछे गुप्त घाट में, घट सरजू में आन ॥6 ॥
कथा सुनी पर मेद न पाया, खुली न हिय की खान ।
राधास्वामी की दाया से, सुरत शब्द मिल छान ॥10
सहस कमल दल वृत्ति जमाई, विश्वमित्र धर ध्यान ।
भ्र मध्य मिथिला पर ठहरे, तोड़ी शिव की कमान ॥1 ॥
सीता सती से विवाह रचाया, राम हुये बलवान ।
आये अवध शरीर को सोधा, दशरथ का किया हान ॥2 ॥
बन में जप तप संजम नेमा, कर बाढ़ा अभिमान ।
सूर्पनखा की नाक कटाई, खर दूषन घुमसान ॥3 ॥
रज रावन ने सीता हरली, पाया दुख महान ।
चल विहंग मारग के रस्ते, कपि मारग दरसान ॥4 ॥
कपि की चाल कठिन अति भारी, पहुँचे बीर हनुमान ।
लंका जाय अशोक बाटिका, देखी सीता आन ॥5 ॥
तब पिपीलिका मारग सोधा, सप्त सिंध गति जान ।
बानर रीछ राक्षस सैना, लंका किया चढ़ान ॥6 ॥
रज तम सत गुन इनको समझो, वृत्ति सुशील सुहान ।
रज रावण तम कुम्भकर्ण को, मारा तक तक बान ॥7 ॥
मेघनाद त्रिकुटी गढ़ जीता, सत विभीषन सन्मान ।
सीता सत वृत्ति ले लौटे, चढ़ पुष्पक बीमान ॥8 ॥
देह अवध का काज सुधारा, पाया अद्भुत ज्ञान । ।
ताके पीछे गुप्त घाट में, घट सरजू में आन ॥6 ॥
कथा सुनी पर मेद न पाया, खुली न हिय की खान ।
राधास्वामी की दाया से, सुरत शब्द मिल छान ॥10
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Song 37 — Hindi
धुन 17 336. शिव बैठे कैलास शिला पर, नन्दी वाहन संग ।
जगमग चन्द्र ललाट पै सोहे, सिर से बहती गंग ॥1 ॥
पारवती संसार की माता, बायें अंग विराजी । ।
दायें गनपत स्वामिकार्तिक, शिव के नित्य समाजी ॥2 ॥
नीलकंठ विख्यात जगत में, गले मुन्ड की माला ।
कर में डम डम बाजे डमरू, साथ भूत बैताला ॥3 ॥
ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, मेरु सुमेरु बिलासा ।
मानसरोवर हंस विराज, धार शिव की आसा ॥4 ॥
ज्ञान ध्यान बैराग की मूरत, समझे कोई कोई ज्ञानी ।
गुरु मिलें तब भेद बतायें, राधास्वामी की सहदानी ॥5 ॥
जगमग चन्द्र ललाट पै सोहे, सिर से बहती गंग ॥1 ॥
पारवती संसार की माता, बायें अंग विराजी । ।
दायें गनपत स्वामिकार्तिक, शिव के नित्य समाजी ॥2 ॥
नीलकंठ विख्यात जगत में, गले मुन्ड की माला ।
कर में डम डम बाजे डमरू, साथ भूत बैताला ॥3 ॥
ब्रह्मरेन्द्र के ऊँचे शिखर पर, मेरु सुमेरु बिलासा ।
मानसरोवर हंस विराज, धार शिव की आसा ॥4 ॥
ज्ञान ध्यान बैराग की मूरत, समझे कोई कोई ज्ञानी ।
गुरु मिलें तब भेद बतायें, राधास्वामी की सहदानी ॥5 ॥
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Song 38 — Hindi
धुन 2 337. सत है सुख चित है सुख, सुख आनन्द ही का रूप है ।
यह हमारी देह क्या है, ब्रह्म मुख का कूप है ॥1 ॥
सोत निर्मल जल का जैसे, कूप के है बीच में । ।
वैसे ही सुख का भी झरना, रूप के है बीच में ॥2 ॥
बाहरी वृत्ती हटाकर, जर हुये अन्तरमुखी ।
भने दुख का मिट गया, हम होगये सच्चे सुखी ॥3 ॥
अंतरी बिरती के साधन से, गये सब रोग सोग ।
योग सुख का होगया, इससे न होगा अब वियोग ॥4 ॥
राधास्वामी ने बताया, मुख का साधन बानकर ।
अपने अन्तर देख लो तुम, पुतलियों को तानकर ॥1 ॥
घट में अनहद धुन सुनो, बाहर लगाकर तीन बंद। ।
सुन्न में जाते ही मिट जायेगा, सब भवदुख का द्वन्द ॥6 ॥
शब्द सुख है सुरत सुख है, घट में सुख भंडार है ।
शब्द के साधन से, भव सागर से बेड़ा पार है॥7 ॥
यह हमारी देह क्या है, ब्रह्म मुख का कूप है ॥1 ॥
सोत निर्मल जल का जैसे, कूप के है बीच में । ।
वैसे ही सुख का भी झरना, रूप के है बीच में ॥2 ॥
बाहरी वृत्ती हटाकर, जर हुये अन्तरमुखी ।
भने दुख का मिट गया, हम होगये सच्चे सुखी ॥3 ॥
अंतरी बिरती के साधन से, गये सब रोग सोग ।
योग सुख का होगया, इससे न होगा अब वियोग ॥4 ॥
राधास्वामी ने बताया, मुख का साधन बानकर ।
अपने अन्तर देख लो तुम, पुतलियों को तानकर ॥1 ॥
घट में अनहद धुन सुनो, बाहर लगाकर तीन बंद। ।
सुन्न में जाते ही मिट जायेगा, सब भवदुख का द्वन्द ॥6 ॥
शब्द सुख है सुरत सुख है, घट में सुख भंडार है ।
शब्द के साधन से, भव सागर से बेड़ा पार है॥7 ॥
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Song 39 — Hindi
धुन 27 338. आके बंधादे धीर प्यारे, आके बंधादे धीर ।।टेका ।
जग जी भूल भुलैय्यां फंसी हूँ; माया के दलदल में फंसी हूँ ।
भरम की रस्सी से मैं कसी हूँ, उर में साले पीर प्यारे ॥1 ॥
दुख की गले में फांसी पड़ी है, पीछे की उलझी गांठ कड़ी है ।
क्या कहूँ आपत विपत बड़ी है, नैनों बहता नीर प्यारे ॥2 ॥
टूटी नाव भंवर में अटकी, दशा देख बुद्धि मेरी खटकी ।
कब तक रहूँ दुविधा में लटकी, करदे भव जल तीर प्यारे॥3 ॥
नहीं मुझे समझ बूझ है प्यारे, रहती हूँ नित तेरे सहारे ।
सबके भरोसे त्याग दिये सारे, तेरी आस शरीर प्यारे ॥4 ॥
राधास्वामी दीन दयाला, तू दुखियों का है प्रतिपाला ।
चरन लगादे करदे निहाला, भीर धीर गम्भीर प्यारे ॥5 ॥
जग जी भूल भुलैय्यां फंसी हूँ; माया के दलदल में फंसी हूँ ।
भरम की रस्सी से मैं कसी हूँ, उर में साले पीर प्यारे ॥1 ॥
दुख की गले में फांसी पड़ी है, पीछे की उलझी गांठ कड़ी है ।
क्या कहूँ आपत विपत बड़ी है, नैनों बहता नीर प्यारे ॥2 ॥
टूटी नाव भंवर में अटकी, दशा देख बुद्धि मेरी खटकी ।
कब तक रहूँ दुविधा में लटकी, करदे भव जल तीर प्यारे॥3 ॥
नहीं मुझे समझ बूझ है प्यारे, रहती हूँ नित तेरे सहारे ।
सबके भरोसे त्याग दिये सारे, तेरी आस शरीर प्यारे ॥4 ॥
राधास्वामी दीन दयाला, तू दुखियों का है प्रतिपाला ।
चरन लगादे करदे निहाला, भीर धीर गम्भीर प्यारे ॥5 ॥
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Song 40 — Hindi
धुन 3 339. गुरु दाता ने मेद बतला दिया ॥टेक। ।
भेद बताया गुर जतलाया, अन्तर दृष्टि खुलाई ।
कर्म ज्ञान का सार सुझाया, घट की राह दिखाई ॥
बतला
चात बनाना छोड़ो भाई, बात का सार पिछानो ।
जान पिछान मान मन अपने, करनी गति चित ठानो ॥
बतला पक पक पक कर कुत्ता मर गया, शीश महल की छाया ।
भोंका भोंक के होगया निरचल, यू ही प्रान गंवाया ॥
आप पियासा पानी न पीवे, ध दान औरों को ।
देने चला पियासा मर गया, जान प्रान तन मन खो॥
चक पक करना सहज रीत है, इसमें क्या कठिनाई ।
बोल बोल कर बुद्धि मति खोई, अन्त में मिली राई ॥
बात सुनी तो करनी कर फिर, कथनी बदनी छोड़ी ।
करनी तो पूरी उतरेगी, जब बक से मुंह मोड़ी ॥
पुस्तक पढ़ी पोथी नित बांची, पड़ा ग्रन्थ के बन्धन । ।
जड़ चेतन की ग्रन्थि गढ़ी हुई, सुलझी एक न उलझन ॥
करनी वाले निकट हैं मुझ से, बकवासी रहें दूरी । ।
करनी करो तो अंग लगा लूँ, कसै कामना पूरी ॥
इस संसार में जब आये हो, सार ग्रहण कर लीजे। ।
तज असार मन मनसा त्यागी, चित गुरु चरनन दीजे ॥
औरों के विचार का झूठा, कब तक खाओगे भाई ।
क्यों नहीं करनी को चित देते, करनी में हैं भलाई ॥
कुत्ते का स्वभाव नहीं अच्छा, टुकड़े कारन भरमा ।
हाथी रहे एक अस्थल में, जाने कर्म का मरमा ।
झूठी पत्चल क्यों नित चाटो, सीखो सिंह की रीती ।
अपना झूठा औरों देदे, जो मति नहीं विपरीती ॥
राधास्वामी जग में आये, सुरत शब्द मत गाया ।
निज अनुभव का पन्थ दिखाया, जो आया सो पाया । ।
भेद बताया गुर जतलाया, अन्तर दृष्टि खुलाई ।
कर्म ज्ञान का सार सुझाया, घट की राह दिखाई ॥
बतला
चात बनाना छोड़ो भाई, बात का सार पिछानो ।
जान पिछान मान मन अपने, करनी गति चित ठानो ॥
बतला पक पक पक कर कुत्ता मर गया, शीश महल की छाया ।
भोंका भोंक के होगया निरचल, यू ही प्रान गंवाया ॥
आप पियासा पानी न पीवे, ध दान औरों को ।
देने चला पियासा मर गया, जान प्रान तन मन खो॥
चक पक करना सहज रीत है, इसमें क्या कठिनाई ।
बोल बोल कर बुद्धि मति खोई, अन्त में मिली राई ॥
बात सुनी तो करनी कर फिर, कथनी बदनी छोड़ी ।
करनी तो पूरी उतरेगी, जब बक से मुंह मोड़ी ॥
पुस्तक पढ़ी पोथी नित बांची, पड़ा ग्रन्थ के बन्धन । ।
जड़ चेतन की ग्रन्थि गढ़ी हुई, सुलझी एक न उलझन ॥
करनी वाले निकट हैं मुझ से, बकवासी रहें दूरी । ।
करनी करो तो अंग लगा लूँ, कसै कामना पूरी ॥
इस संसार में जब आये हो, सार ग्रहण कर लीजे। ।
तज असार मन मनसा त्यागी, चित गुरु चरनन दीजे ॥
औरों के विचार का झूठा, कब तक खाओगे भाई ।
क्यों नहीं करनी को चित देते, करनी में हैं भलाई ॥
कुत्ते का स्वभाव नहीं अच्छा, टुकड़े कारन भरमा ।
हाथी रहे एक अस्थल में, जाने कर्म का मरमा ।
झूठी पत्चल क्यों नित चाटो, सीखो सिंह की रीती ।
अपना झूठा औरों देदे, जो मति नहीं विपरीती ॥
राधास्वामी जग में आये, सुरत शब्द मत गाया ।
निज अनुभव का पन्थ दिखाया, जो आया सो पाया । ।
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Song 41 — Hindi
धुन 2 340. देख चिन्ता नाम की कर, और सब चिन्ता बिसार ।
तुझ को गुरु से प्यार है तो, गुरु को होगा तुझसे प्यार ॥1 ॥
ध्यान धरं सुमिरन भजन में, गुरु की मूरत का सदा ।
शान्त हो निर्धात हो, निरद्वन्द होकर कर संभार ॥2 ॥
जिस को जिस से हेत है, वह है उसी के अंग संग ।
इसको समझेगा कभी, मन में जो आवेगा विचार ॥3 ॥
करता धरता तू नहीं है, करता धरता और है ।
मौज में रह मौज ही से, आप ही होगा सुधार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया से, मिल गई गुरु की शरन ।
होके शरनागत जुये में, मन में आने को न हार ॥5 ॥
तुझ को गुरु से प्यार है तो, गुरु को होगा तुझसे प्यार ॥1 ॥
ध्यान धरं सुमिरन भजन में, गुरु की मूरत का सदा ।
शान्त हो निर्धात हो, निरद्वन्द होकर कर संभार ॥2 ॥
जिस को जिस से हेत है, वह है उसी के अंग संग ।
इसको समझेगा कभी, मन में जो आवेगा विचार ॥3 ॥
करता धरता तू नहीं है, करता धरता और है ।
मौज में रह मौज ही से, आप ही होगा सुधार ॥4 ॥
राधास्वामी की दया से, मिल गई गुरु की शरन ।
होके शरनागत जुये में, मन में आने को न हार ॥5 ॥
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Song 42 — Hindi
धुन 16 341. सोचा समझा समझ विचारा, सार हाथ नहीं आया ।
पक्षपात के उलझन उलझे, अपना भेद न पाया ॥1 ॥
पंडित शेख किताब में अटके, भोगे दुख सुख नाना ।
पशुओं के सरदार बने वह, ज्यों अन्धों में काना ॥2 ॥
नहीं खुदा के मेद को समझा, नहीं ईश्वर पहिचाना ।
अपने रूप की गम नहीं पाई, कैसे कहूँ सियाना ॥3 ॥
राधास्वामी सन्त रूप घर, बख्श दिया निज झाना ।
जीते जी है जीवन मुक्ति, जीते जी निरवाना ॥4 ॥
पक्षपात के उलझन उलझे, अपना भेद न पाया ॥1 ॥
पंडित शेख किताब में अटके, भोगे दुख सुख नाना ।
पशुओं के सरदार बने वह, ज्यों अन्धों में काना ॥2 ॥
नहीं खुदा के मेद को समझा, नहीं ईश्वर पहिचाना ।
अपने रूप की गम नहीं पाई, कैसे कहूँ सियाना ॥3 ॥
राधास्वामी सन्त रूप घर, बख्श दिया निज झाना ।
जीते जी है जीवन मुक्ति, जीते जी निरवाना ॥4 ॥
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Song 43 — Hindi
धुन 20 342. जो आया गुरु चरन छांह में, मोक्ष भक्ति पल पावेगा टेका ।
हुई चरन में दृढ़ प्रतीती, मन में बसी भक्ति की रीती ।
सत सुगम सहज साधन से, नया नित अनुराग बढावेगा ।
जो दिन दिन गुरु रंग रंगाना, संसार के पन्थ नहीं जाना ।
पी प्रेम का मद मस्ताना, पपिहा बन भक्ति गगन मंडल
में पी पी रटन लगावेगा ।।
हुई चरन में दृढ़ प्रतीती, मन में बसी भक्ति की रीती ।
सत सुगम सहज साधन से, नया नित अनुराग बढावेगा ।
जो दिन दिन गुरु रंग रंगाना, संसार के पन्थ नहीं जाना ।
पी प्रेम का मद मस्ताना, पपिहा बन भक्ति गगन मंडल
में पी पी रटन लगावेगा ।।
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Song 44 — Hindi
राधास्वामी दीन दयाला, कर देंगे वह आप निहाला ।
सुरत शब्द का जोग सुखाला, बिन जुक्ति जतन करतूत सतपद ओर
धुन 20 343. सिधावेगा ।प्रेम की सड़कें देखीं यार ॥टेक
पहली सड़क सुनहरे रंग की, खिली बसन्त बहार ।
जग मग जोत दिया बिन बाती, जोती जोत मंझार ॥
प्रेम दजी सड़क लाल रंग बाना, बीर बहूटि के रंग ।
चली सुरत अखियां भई लाली, सुनी थाप मृदंग ॥
तीजी सड़क नील परवत पर, चन्द्र जोत उजियारा ।
अमी कुड बने दायें बायें, बरनत बने न पारा ॥
चौथी स्वेत बरन छबि अद्भुत, देख सुरत हरषानी ।
यहां आये मन शान्ती आई, सो नहीं जाय बखानी ॥
चारों सड़क लांघ पद सूझा, प्रेम का महल दिखाना ।
सतगुरु का दर्शन तब पाया, मिल गया ठौर ठिकाना ॥
घट के भीतर चार सड़क यह, प्रेमी पन्थी जाने ।
बिन देखे परतीत न आये, कैसे कोई माने ॥
राधास्वामी दया साध की संगत, हम धरपद चल आये। ।
प्रेम की धार हृदय से फूटी, प्रेम में आय समाये ॥
सुरत शब्द का जोग सुखाला, बिन जुक्ति जतन करतूत सतपद ओर
धुन 20 343. सिधावेगा ।प्रेम की सड़कें देखीं यार ॥टेक
पहली सड़क सुनहरे रंग की, खिली बसन्त बहार ।
जग मग जोत दिया बिन बाती, जोती जोत मंझार ॥
प्रेम दजी सड़क लाल रंग बाना, बीर बहूटि के रंग ।
चली सुरत अखियां भई लाली, सुनी थाप मृदंग ॥
तीजी सड़क नील परवत पर, चन्द्र जोत उजियारा ।
अमी कुड बने दायें बायें, बरनत बने न पारा ॥
चौथी स्वेत बरन छबि अद्भुत, देख सुरत हरषानी ।
यहां आये मन शान्ती आई, सो नहीं जाय बखानी ॥
चारों सड़क लांघ पद सूझा, प्रेम का महल दिखाना ।
सतगुरु का दर्शन तब पाया, मिल गया ठौर ठिकाना ॥
घट के भीतर चार सड़क यह, प्रेमी पन्थी जाने ।
बिन देखे परतीत न आये, कैसे कोई माने ॥
राधास्वामी दया साध की संगत, हम धरपद चल आये। ।
प्रेम की धार हृदय से फूटी, प्रेम में आय समाये ॥
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Song 45 — Hindi
धुन 21 344. घट का परदा खोल रे, घट जगत पसारा ।।टेक ॥
घट में कासी घट में फांसी, घट में जम का द्वारा ।
घट में ज्ञान ध्यान सन्यासी, घट ही में निस्तारा ।
घट में घट को तोल रे, घट अगम अपारा ॥
घट का0 घट में ब्रह्मा वेद विचारे, घट में विष्णु करतारा ।
घट में शिव संसार संहारे, घट शक्ति की धारा ।
घट में शब्द अनमोल रे, घट का लेउ सहारा । । घट का0
घट का घाट पाट पहिचानो, पिंड देस दस द्वारा ।
घट में खेल खिलाड़ी जानो, घट है जीत और हारा ।
घट के बीच तू डोल रे, घट सब से न्यारा ॥
घट का0 घट में अटपट घट में सटपट, घट में मोह अहंकारा ।
घट में घटपट घट में चटपट, घट में ब्रह्म उचारा ।
घट की बानी बोल रे, घट अधिक पियारा ॥
घट का0 घट की निरख परख रखवारी, घट का करे विचारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट का खुला किवारा ।
बाजत अनहद ढोल रे, घट का चमका तारा । ।
घट का0
घट में कासी घट में फांसी, घट में जम का द्वारा ।
घट में ज्ञान ध्यान सन्यासी, घट ही में निस्तारा ।
घट में घट को तोल रे, घट अगम अपारा ॥
घट का0 घट में ब्रह्मा वेद विचारे, घट में विष्णु करतारा ।
घट में शिव संसार संहारे, घट शक्ति की धारा ।
घट में शब्द अनमोल रे, घट का लेउ सहारा । । घट का0
घट का घाट पाट पहिचानो, पिंड देस दस द्वारा ।
घट में खेल खिलाड़ी जानो, घट है जीत और हारा ।
घट के बीच तू डोल रे, घट सब से न्यारा ॥
घट का0 घट में अटपट घट में सटपट, घट में मोह अहंकारा ।
घट में घटपट घट में चटपट, घट में ब्रह्म उचारा ।
घट की बानी बोल रे, घट अधिक पियारा ॥
घट का0 घट की निरख परख रखवारी, घट का करे विचारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट का खुला किवारा ।
बाजत अनहद ढोल रे, घट का चमका तारा । ।
घट का0
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Song 46 — Hindi
धुन 17 345. गुरु की बानी महा अनुभवी, कोई समझे गुरु ज्ञानी ।
समझ समझ बूझे मन अपने, बचन सार निज जानी ॥1 ॥
पक्षपात तज मर्म लखाऊँ, सच्ची बात सुनाऊँ ।
जो कोई आवे प्रेम भाव ले, ताही भेद बताऊ ॥2 ॥
गुरु ने जेसे मुझे चिताया, मैं भी सर्वाह चिताऊ ।
नाम रतन धन खान खुली है, नित्त प्रति दिलवाऊँ ॥3 ॥
बिन गाहक बिन पारख पाये, केहि विधि रतन दिखाऊँ ।
पारख गाहक जो कोई पाऊँ, प्रेम से अंग लगाऊँ ॥4 ॥
गुरु का सोंपू माल खजाना, निरख परख अधिकारी ।
अपने साथ औरन को तारू, राधास्वामी की बलिहारी ॥5 ॥
समझ समझ बूझे मन अपने, बचन सार निज जानी ॥1 ॥
पक्षपात तज मर्म लखाऊँ, सच्ची बात सुनाऊँ ।
जो कोई आवे प्रेम भाव ले, ताही भेद बताऊ ॥2 ॥
गुरु ने जेसे मुझे चिताया, मैं भी सर्वाह चिताऊ ।
नाम रतन धन खान खुली है, नित्त प्रति दिलवाऊँ ॥3 ॥
बिन गाहक बिन पारख पाये, केहि विधि रतन दिखाऊँ ।
पारख गाहक जो कोई पाऊँ, प्रेम से अंग लगाऊँ ॥4 ॥
गुरु का सोंपू माल खजाना, निरख परख अधिकारी ।
अपने साथ औरन को तारू, राधास्वामी की बलिहारी ॥5 ॥
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Song 47 — Hindi
धुन 18 346. सर्व समरथ साइयाँ, तुम जगत के आधार ।
जीव भव जल में पड़े हैं, तुम लगाओ पार ॥1 ॥
भँवर में नैया फंसी है, बुद्धि से लाचार ।
रात गहरी बहु अधेरी, सूझे बार न पार ॥2 ॥
आओ आओ आओ दाता, कर दो बेड़ा पार ।
तुम सहाई जीव निर्बल, करो आज संभार ॥3 ॥
शब्द डोरी हाथ देकर, खींच लो करतार । ।
धाम में दो अपने बासा, तुमहि हो रखवार ॥4 ॥
राधास्वामी दया सागर, दया के भंडार । ।
दीन हीन शरन में आये, करो सब की सुधार ॥5 ॥
जीव भव जल में पड़े हैं, तुम लगाओ पार ॥1 ॥
भँवर में नैया फंसी है, बुद्धि से लाचार ।
रात गहरी बहु अधेरी, सूझे बार न पार ॥2 ॥
आओ आओ आओ दाता, कर दो बेड़ा पार ।
तुम सहाई जीव निर्बल, करो आज संभार ॥3 ॥
शब्द डोरी हाथ देकर, खींच लो करतार । ।
धाम में दो अपने बासा, तुमहि हो रखवार ॥4 ॥
राधास्वामी दया सागर, दया के भंडार । ।
दीन हीन शरन में आये, करो सब की सुधार ॥5 ॥
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Song 48 — Hindi
धुन 17 347. चल सुरत गुरु देस को, जहां अनहद बाजे ।
जगमग जोत प्रकाश लख, शत सूरज लाजे ॥1 ॥
अमृत द्वन्द फुहार रस, बरसा बिन पानी ।
महिमा अकथ अपार अति, क्या बरने बानी ॥2 ॥
प्रेम झरे बिगसे कँवल, भँवरा मंडलाने ।
मलियागर की बास सों, मन चित हरषाने ॥3 ॥
धर्मी करमी संजमी, क्या जाने महिमा ।
तीन लोक के अंड की, नहीं ताम् उपमा ॥4 ॥
जब लग देखे न नैन से, क्या कोई बखाने । ।
राधास्वामी दीन उपदेस जब, तब ही मन माने ॥1 ॥
जगमग जोत प्रकाश लख, शत सूरज लाजे ॥1 ॥
अमृत द्वन्द फुहार रस, बरसा बिन पानी ।
महिमा अकथ अपार अति, क्या बरने बानी ॥2 ॥
प्रेम झरे बिगसे कँवल, भँवरा मंडलाने ।
मलियागर की बास सों, मन चित हरषाने ॥3 ॥
धर्मी करमी संजमी, क्या जाने महिमा ।
तीन लोक के अंड की, नहीं ताम् उपमा ॥4 ॥
जब लग देखे न नैन से, क्या कोई बखाने । ।
राधास्वामी दीन उपदेस जब, तब ही मन माने ॥1 ॥
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Song 49 — Hindi
धुन 27 348. आ जा आ जा मेरे पास, या मुझे बुलाले पास ॥टेका ।
मैं हूँ तेरे जीव का जीवन, मैं हूँ तेरी सांस ।
मैं तो घट में तेरे बसता, तू क्यों भया उदासा । ।
आजा0 मुझ को देख देख घट अपने, धर चरनन विश्वास ।
एक पनक बिसरू नहीं तुझको, तेरा करूँ सुपास ॥
आजा मेरी आस धार ले चित में, जग से होय निरास । ।
मेरी आस से काम किया कर, कभी न सहना त्रास ॥
मैं हूँ ज्ञान ध्यान भी मैं हूँ, मैं दासों का दास ।
दास दुखी तो मुझे भी दुख हो, करद दुख का नास ॥
आजा0 द्वादस चक्र छोड़ चढ़ ऊचे, कर सत पद में बास ।
वही रूप मेरा है साधु, स्वयम् ज्ञान प्रकास ॥
आजा0 मेरा धाम नहीं काशी में, ना गिरवर कैलास ।
तेरे घट में रहूँ बिराजत, कर ले वहां तलास ॥
आजा0 राधास्वामी चरन शरन में, सुख आनन्द हुलास ।
भवरा पद सरोज का होजा, पाय सुरंग सुबास ॥ आजा0
मैं हूँ तेरे जीव का जीवन, मैं हूँ तेरी सांस ।
मैं तो घट में तेरे बसता, तू क्यों भया उदासा । ।
आजा0 मुझ को देख देख घट अपने, धर चरनन विश्वास ।
एक पनक बिसरू नहीं तुझको, तेरा करूँ सुपास ॥
आजा मेरी आस धार ले चित में, जग से होय निरास । ।
मेरी आस से काम किया कर, कभी न सहना त्रास ॥
मैं हूँ ज्ञान ध्यान भी मैं हूँ, मैं दासों का दास ।
दास दुखी तो मुझे भी दुख हो, करद दुख का नास ॥
आजा0 द्वादस चक्र छोड़ चढ़ ऊचे, कर सत पद में बास ।
वही रूप मेरा है साधु, स्वयम् ज्ञान प्रकास ॥
आजा0 मेरा धाम नहीं काशी में, ना गिरवर कैलास ।
तेरे घट में रहूँ बिराजत, कर ले वहां तलास ॥
आजा0 राधास्वामी चरन शरन में, सुख आनन्द हुलास ।
भवरा पद सरोज का होजा, पाय सुरंग सुबास ॥ आजा0
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Song 50 — Hindi
धुन 16 349. घट मंन्दिर पट खोल कर, कर दर्शन चितलाय ।
अपना आपा त्याग कर, गुरु आपा नित ध्याय ॥1 ॥
आरत कर गा अस्तुति, घंटा शंख बजाय ।
बीन पखावज बांसुरी, अनहद नाद गुजाय ॥2 ॥
दीवा वाला प्रेम का, जोती जगमग होय ।
लख प्रकाश बिच हिये में, मन मंदिर में सोय ॥3 ॥
तेरा तुझ में क्या रहा, तेरा सब कुछ मोर ।
मेरा ले अपना बना, फिर कर मोर न तोर ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, रह अलमस्त फकीर ।
कभी न व्याये जगत गति, उर नाहीं साले पीर ॥5 ॥
अपना आपा त्याग कर, गुरु आपा नित ध्याय ॥1 ॥
आरत कर गा अस्तुति, घंटा शंख बजाय ।
बीन पखावज बांसुरी, अनहद नाद गुजाय ॥2 ॥
दीवा वाला प्रेम का, जोती जगमग होय ।
लख प्रकाश बिच हिये में, मन मंदिर में सोय ॥3 ॥
तेरा तुझ में क्या रहा, तेरा सब कुछ मोर ।
मेरा ले अपना बना, फिर कर मोर न तोर ॥4 ॥
राधास्वामी की दया, रह अलमस्त फकीर ।
कभी न व्याये जगत गति, उर नाहीं साले पीर ॥5 ॥
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Song 51 — Hindi
धुन 20 350. मौज आधीन दास रहे निसदिन, एक दिन काम करें गुरु पूरा ।।टेक ।
सेवक भाव कठिन है भाई, नहीं रन में ठहरे नर कूरा ।
मौज निहार करे सेवकाई, सीस उतार लड़े कोई सूरा ॥1 ॥
सुमिरन भजन ध्यान सेवा से, काम क्रोध मद सब हो चूरा ।
घट की खटपट चटपट पलटे,प्रगट हिये रवि शशि का नूरा ॥2 ॥
167 दुविधा दुचिताई न सतावे, बाजे सुहाना अनहद तूरा ।
राधास्वामी मौज निरख कर चाले, लोभ के सिर पर मारे हूरा ॥3 ॥
सेवक भाव कठिन है भाई, नहीं रन में ठहरे नर कूरा ।
मौज निहार करे सेवकाई, सीस उतार लड़े कोई सूरा ॥1 ॥
सुमिरन भजन ध्यान सेवा से, काम क्रोध मद सब हो चूरा ।
घट की खटपट चटपट पलटे,प्रगट हिये रवि शशि का नूरा ॥2 ॥
167 दुविधा दुचिताई न सतावे, बाजे सुहाना अनहद तूरा ।
राधास्वामी मौज निरख कर चाले, लोभ के सिर पर मारे हूरा ॥3 ॥
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Song 52 — Hindi
धुन 16 351. घट में जब अनहद राग सुना, बाहर का गाना छोड़ दिया ।
जब गुरु चरनन से मेल मिला, भव फन्द में आना छोड़ दिया ॥1 ॥
अन्दर में जोत जगी जगमग, हुये दूर लोभ मद मोह के ठग ।
नहीं रोके कोई मेरा अब मग, माया का ठिकाना छोड़ दिया ॥2 ॥
संसार है यह अगमापाई, नहीं अपने मीत पुत्र भाई ।
गुरु की जब पाई शरनाई, मन इनसे लगाना छोड़ दिया ॥3 ॥
लो नींद गई मन जाग गया, भय द्वन्द से आप ही भाग गया ।
वराग गया अनुराग गया, यह ताना बाना छोड़ दिया ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दया भारी, अधिकारी भया अन अधिकारी ।
सुरत सत पद की हुई दरबारी, सब करना कराना छोड़ दिया ॥5 ॥
जब गुरु चरनन से मेल मिला, भव फन्द में आना छोड़ दिया ॥1 ॥
अन्दर में जोत जगी जगमग, हुये दूर लोभ मद मोह के ठग ।
नहीं रोके कोई मेरा अब मग, माया का ठिकाना छोड़ दिया ॥2 ॥
संसार है यह अगमापाई, नहीं अपने मीत पुत्र भाई ।
गुरु की जब पाई शरनाई, मन इनसे लगाना छोड़ दिया ॥3 ॥
लो नींद गई मन जाग गया, भय द्वन्द से आप ही भाग गया ।
वराग गया अनुराग गया, यह ताना बाना छोड़ दिया ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दया भारी, अधिकारी भया अन अधिकारी ।
सुरत सत पद की हुई दरबारी, सब करना कराना छोड़ दिया ॥5 ॥
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Song 53 — Hindi
धुन 16 352. शब्द का भेद बता दो, सतगुरु शब्द का भेद बता दो ॥टेक ॥
कैसे मन चढ़े गगन के ऊपर, वह उपाय समझा दो ॥
सत0 प्रगटे जोत में अद्भुत जोती, हिये की आँख खुला दो ॥
सत0 जोत देख सुध बुध तन बिसरू, ऐसी लगन लगा दो ॥
सत घट में शब्द की हो भनकारा, अनहद नाद सुना दो ।
सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चौथा पद दरसा दो ॥
सत
कैसे मन चढ़े गगन के ऊपर, वह उपाय समझा दो ॥
सत0 प्रगटे जोत में अद्भुत जोती, हिये की आँख खुला दो ॥
सत0 जोत देख सुध बुध तन बिसरू, ऐसी लगन लगा दो ॥
सत घट में शब्द की हो भनकारा, अनहद नाद सुना दो ।
सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चौथा पद दरसा दो ॥
सत
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Song 54 — Hindi
धुन 20 353. | घट का शब्द सुने कोई ज्ञानी ॥टेक ॥
शब्द की महिमा अगम अपारा, क्या कोई बरने बरनन हारा ।
शब्दहि मुक्ति जुक्ति भंडारा, शब्द सुरत की खानी ॥
घट का0 शब्द का योग महा सुखदाई, शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
सुरत शब्द की करो कमाई, सूझे अगम निशानी ॥
शब्द भेद ले घट में आओ, शब्द धाम पर सुरत लगाओ ।
मन चंचल को तहां ठहराओ, मिटे भरम की खानी ॥
घट का0 बिना शब्द झूठा सब धन्दा, बिना शब्द नर डोले अंधा ।
गले पड़ा है काल का फन्दा, छूटन विधि नहीं जानी ॥
शब्द शब्द का सकल पसारा, शब्द है सार सार का सारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु की सहदानी ॥
शब्द की महिमा अगम अपारा, क्या कोई बरने बरनन हारा ।
शब्दहि मुक्ति जुक्ति भंडारा, शब्द सुरत की खानी ॥
घट का0 शब्द का योग महा सुखदाई, शब्द योग में नहीं कठिनाई ।
सुरत शब्द की करो कमाई, सूझे अगम निशानी ॥
शब्द भेद ले घट में आओ, शब्द धाम पर सुरत लगाओ ।
मन चंचल को तहां ठहराओ, मिटे भरम की खानी ॥
घट का0 बिना शब्द झूठा सब धन्दा, बिना शब्द नर डोले अंधा ।
गले पड़ा है काल का फन्दा, छूटन विधि नहीं जानी ॥
शब्द शब्द का सकल पसारा, शब्द है सार सार का सारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु की सहदानी ॥
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Song 55 — Hindi
धुन 20 354. अब मैं नाथ शरन में आया ॥टेक। ।
मैं अजान अज्ञान की मूरत, मोह मान लपटाया ।
बुद्धि विवेक समझ नहीं मुझ में, मन भरमा भरमाया ॥
अब0 बाल जान अन्जान परख कर, दीजे पद की छाया ।
दुखी अधीन दीन चित व्याकुल, जान न आप पराया ॥
भूल चूक अपराध मेट कर, कीजे करुना दाया ।
वाह वाह प्रभु रक्षा कीजे, करम ने बहुत सताया ॥
अब नहीं सहन की शक्ति स्वामी, चित है अधिक घबराया ।
मुझे तो इतनी समझ न आई, क्या अपराध कमाया ।
शरन में आया है शरनागत, मटका धोखा खाया ।
राधास्वासी परम दयाला, अब नहीं व्यापे माया ॥
मैं अजान अज्ञान की मूरत, मोह मान लपटाया ।
बुद्धि विवेक समझ नहीं मुझ में, मन भरमा भरमाया ॥
अब0 बाल जान अन्जान परख कर, दीजे पद की छाया ।
दुखी अधीन दीन चित व्याकुल, जान न आप पराया ॥
भूल चूक अपराध मेट कर, कीजे करुना दाया ।
वाह वाह प्रभु रक्षा कीजे, करम ने बहुत सताया ॥
अब नहीं सहन की शक्ति स्वामी, चित है अधिक घबराया ।
मुझे तो इतनी समझ न आई, क्या अपराध कमाया ।
शरन में आया है शरनागत, मटका धोखा खाया ।
राधास्वासी परम दयाला, अब नहीं व्यापे माया ॥
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Song 56 — Hindi
धुन 20 355. नन्दु माया की निन्दा नहीं करना ॥टेक। ।
माया अगुन सगुन की खानी, निराकार साकारा ।
माया चेतन जड़ की सूरत, माया ब्रह्म पसारा नहीं करना0
माया रोक थाम है प्यारे, माया सिद्धि शक्ति । ।
माया जोग जुगत व्यौहारा, माया प्रेम और भक्ति ॥
माया बुद्धि विवेक जगत में, माया सत सत ज्ञाना ।
माया जप तप संयम क्रिया, माया सुमिरन ध्याना ।
माया अन्त आदि है सबकी, माया मध्य की बासी ।
त्रिगुनात्मक माया को जीते, तब हो पुरुष अविनासी ॥
नहीं करना माया पारवती सावित्री, माया लक्ष्मी मूरत । ।
माया काली कराल बिकराली, माया सारद सूरत ॥
माया बिन कोई रहे न जग में, माया पाले पोसे ।
कैसा मूरख है वह प्राणी, नित उठ माया जो कोसे ॥
माया बनी सहाई सबकी, करतब करम सिखाये। ।
धरम मरम की राह दिखाकर, सत्तलोक पहुँचावे ॥
करनी करो तो रहनी आवे, रहनी अनुभव जागे’ नन्द
गुरु सेवा में रह कर, और वस्तु नहीं मांगे ॥
राधास्वामी मन में आकर, कोई यथार्थ गति बुझे ।
करनी की जब करे कमाई, सार तत्व तब सूझे । ।
माया अगुन सगुन की खानी, निराकार साकारा ।
माया चेतन जड़ की सूरत, माया ब्रह्म पसारा नहीं करना0
माया रोक थाम है प्यारे, माया सिद्धि शक्ति । ।
माया जोग जुगत व्यौहारा, माया प्रेम और भक्ति ॥
माया बुद्धि विवेक जगत में, माया सत सत ज्ञाना ।
माया जप तप संयम क्रिया, माया सुमिरन ध्याना ।
माया अन्त आदि है सबकी, माया मध्य की बासी ।
त्रिगुनात्मक माया को जीते, तब हो पुरुष अविनासी ॥
नहीं करना माया पारवती सावित्री, माया लक्ष्मी मूरत । ।
माया काली कराल बिकराली, माया सारद सूरत ॥
माया बिन कोई रहे न जग में, माया पाले पोसे ।
कैसा मूरख है वह प्राणी, नित उठ माया जो कोसे ॥
माया बनी सहाई सबकी, करतब करम सिखाये। ।
धरम मरम की राह दिखाकर, सत्तलोक पहुँचावे ॥
करनी करो तो रहनी आवे, रहनी अनुभव जागे’ नन्द
गुरु सेवा में रह कर, और वस्तु नहीं मांगे ॥
राधास्वामी मन में आकर, कोई यथार्थ गति बुझे ।
करनी की जब करे कमाई, सार तत्व तब सूझे । ।
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Song 57 — Hindi
धुन 20 356. गुरु ने चिताया जग में आकर ॥टेक ॥
नर शरीर सतगुरु ने धारा, जीव निबल को दिया सहारा ।
भव सागर के पार उतारा, अपना सच्चा रूप दिखाकर ॥
गुरु0 शब्द योग की विधि बताई, सुखमन मध्य राह दरसाई। ।
सोई सुरत को लिया जगाई, दया से अपने अंग लगाकर ॥
सतसंग द्वारा बचन सुनाया, सहज रीति से जीव चिताया ।
अपना आपा उसे दिखाकर, अनहद बानी घट में सुनाकर ॥
सहम कमल त्रिकुटी लखपाई, सुन्न महासुन्न गति परखाई ।
भँवर में माया काल लखाई, अन्त में सतपद धाम में लाकर ॥
अगम अलख के पार अनामी, सन्त कहें जिसे राधास्वामी ।
उसके चरन सरोज नमामी, प्रीत रीति प्रतीत दिलाकर ॥
नर शरीर सतगुरु ने धारा, जीव निबल को दिया सहारा ।
भव सागर के पार उतारा, अपना सच्चा रूप दिखाकर ॥
गुरु0 शब्द योग की विधि बताई, सुखमन मध्य राह दरसाई। ।
सोई सुरत को लिया जगाई, दया से अपने अंग लगाकर ॥
सतसंग द्वारा बचन सुनाया, सहज रीति से जीव चिताया ।
अपना आपा उसे दिखाकर, अनहद बानी घट में सुनाकर ॥
सहम कमल त्रिकुटी लखपाई, सुन्न महासुन्न गति परखाई ।
भँवर में माया काल लखाई, अन्त में सतपद धाम में लाकर ॥
अगम अलख के पार अनामी, सन्त कहें जिसे राधास्वामी ।
उसके चरन सरोज नमामी, प्रीत रीति प्रतीत दिलाकर ॥
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Song 58 — Hindi
धुन 20 357. तू हूँ किसको प्यारे, मैं तो निसदिन तेरे संग ॥टेक। ।
नहीं मैं जोग जुगत में रहता, मैं तेरे अंग संग ।
घट में अपने ढूँढ ले मुझको, चित न हो फिर भंग ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन और सेवा, कर तू सहित उमंग ।
आरत ठान धाम त्रिकुटी में, धारे मेरा रंग ॥2 ॥
तेरे भीतर जमुना सरस्वति, बहती निर्मल गंग ।
कर अस्नान ध्यान और पूजा, सबसे होय असंग ॥3 ॥
त्याग भरम दुविधा चतुराई, मन के सभी उचंग ।
निश्चय धार गुरु को चित में, काल को करदे दंग ॥4 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी; कर माया से जंग ।
जो कोई गुरु का ध्यान लगावे, जग में होय न तंग ॥5 ॥
नहीं मैं जोग जुगत में रहता, मैं तेरे अंग संग ।
घट में अपने ढूँढ ले मुझको, चित न हो फिर भंग ॥1 ॥
सुमिरन ध्यान भजन और सेवा, कर तू सहित उमंग ।
आरत ठान धाम त्रिकुटी में, धारे मेरा रंग ॥2 ॥
तेरे भीतर जमुना सरस्वति, बहती निर्मल गंग ।
कर अस्नान ध्यान और पूजा, सबसे होय असंग ॥3 ॥
त्याग भरम दुविधा चतुराई, मन के सभी उचंग ।
निश्चय धार गुरु को चित में, काल को करदे दंग ॥4 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी; कर माया से जंग ।
जो कोई गुरु का ध्यान लगावे, जग में होय न तंग ॥5 ॥
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Song 59 — Hindi
धुन 20 358. सुरत सुन्दर नार जगत में, कोई कोई बिरला जाने ।।टेक। ।
कर सिंगार पुरुष तर रीझे, रीझ रीझ हरखावे ।
नार का रूप सुहाना लागे, हर्ष के अंग लगावे ॥
सुरत भौं के बीच सुनहिला बिंदा, ऊपर टिकली सोहे ।
टिकली लाल लाल रहे जगमग, शोभा देख मन मोहे ॥
टिकली पर है दुपहले टीके, टीके को न भुलावे ।
माथे पर झूमर की सोभा, जगमग जोत दिखावे ॥
मांग काढ के लट बिलगावे, मोतिन माँग भरावे ।
बीच में हीरे पन्ने का गहना, रूप विचित्र बनावे ॥
सिर पर है सोने का झूपना, निश्चल अधर कहावे ।
यह सिंगार है सुरत नारका, कोई समझे समझाये ।
सुरत सहेली रंग रंगीली, अलबेली मतवाली ।
अटखेली खेले नित पिउ से, लाड़ प्यार की पाली ॥
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, मेद सार का सारा ।
गावे सुरत जब शब्द सुहाने, पिया का परखे प्यारा ॥
कर सिंगार पुरुष तर रीझे, रीझ रीझ हरखावे ।
नार का रूप सुहाना लागे, हर्ष के अंग लगावे ॥
सुरत भौं के बीच सुनहिला बिंदा, ऊपर टिकली सोहे ।
टिकली लाल लाल रहे जगमग, शोभा देख मन मोहे ॥
टिकली पर है दुपहले टीके, टीके को न भुलावे ।
माथे पर झूमर की सोभा, जगमग जोत दिखावे ॥
मांग काढ के लट बिलगावे, मोतिन माँग भरावे ।
बीच में हीरे पन्ने का गहना, रूप विचित्र बनावे ॥
सिर पर है सोने का झूपना, निश्चल अधर कहावे ।
यह सिंगार है सुरत नारका, कोई समझे समझाये ।
सुरत सहेली रंग रंगीली, अलबेली मतवाली ।
अटखेली खेले नित पिउ से, लाड़ प्यार की पाली ॥
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, मेद सार का सारा ।
गावे सुरत जब शब्द सुहाने, पिया का परखे प्यारा ॥
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Song 60 — Hindi
धुन 21 359. चल गिरवर कैलास, जो तू सच्चा पन्थाई ॥टेक ॥
हर की पौढ़ी हरद्वार चढ़, सहसकमलदल घाटी ।
रुद्र नेत्र को खोल अन्तर में, समझले जग को माटी ।
आज तेरी बन आई ॥
चल जगमग ज्योत प्रकाशे घट में, ज्योतिर्लिंग अकारा ।
जोत जोत में जोत का दर्शन, जोत में जोत पसारा ।
जोत में जोत समाई ।
चल डमरू शब्द की गूज परख सुन, भ्रमध्य आसन डारी ।
व्याये जोर शोर तहाँ छन पल, प्रेम प्रतीत संभाली ।
घंटा शंख बजाई ।
चल0 सुरत के अरघ में जोतर्लिंग का, दरस परस ततकाला ।
सुमिरन भजन ध्यान का लेले, हाथ त्रिशूल का भाला ।
रूप में मन को लगाई ॥
चल नन्द वाहन कर असवारी, परध वृत्ति चित लाना ।
परब को साध पार्वती मति संग, तब समझे गुरु ज्ञाना । ।
रहे समता लव लाई ॥
चल परवत के आकार अटल बन, संग भूत बैताला ।
राग सुहाना अद्भुत सुन सुन, मधुर मनोहर ताना ॥
अनहद धुन सुखदाई ।
चल पीले भंग प्रेम भक्ति की, चित चंचलता भागे ।
काम क्रोध नहीं तुझे सतावे, शब्दयोग मन लागे ।
नहीं रहे मन दुचिताई ॥
चल प्रथम अस्थान त्याग अब प्यारे, त्रिपुर ओर सिधारो ।
अ उ म मृदंग ओम् सुन, सत रज तम को मारो ।
गुरु के सन्मुख जाई ।
दूजा त्रिकुटी पद का मंडल, बीज मन्त्र उच्चारन ।
गुरु चेले की जुग जब सूझे, बने अनोखा चारन ॥
यह युक्ति अनूप सुहाई ॥
चल तीजी मंजिल सुन्न देश की, ब्रह्म सिखर कैलासा ।
मानसरोवर कर असनाना, हो रह गुरु का दासा । ।
सहज समाध लगाई ।
चल सुन्न में सूझे पद निरवाना, हंस गति को पाना ।
शिव का रूप बने फिर तेरा, यही परम कल्याना ॥
समझ मन अपने भाई ॥ चल0 ।
आगे भंवर गुफा की खिड़की, बंसी धुन जहां गाजी ।
काया माया काल जीत ले, अपना आपा साजी । ।
न हो फिर जग दुखदाई । ।
चल सतपद अलख अगम चढ़जा तू , धर राधास्वामी की आसा ।
संतन का यह बल अस्थाना, पावे गुरुमुख दासा । ।
करे जो सहज कमाई ॥ चल
हर की पौढ़ी हरद्वार चढ़, सहसकमलदल घाटी ।
रुद्र नेत्र को खोल अन्तर में, समझले जग को माटी ।
आज तेरी बन आई ॥
चल जगमग ज्योत प्रकाशे घट में, ज्योतिर्लिंग अकारा ।
जोत जोत में जोत का दर्शन, जोत में जोत पसारा ।
जोत में जोत समाई ।
चल डमरू शब्द की गूज परख सुन, भ्रमध्य आसन डारी ।
व्याये जोर शोर तहाँ छन पल, प्रेम प्रतीत संभाली ।
घंटा शंख बजाई ।
चल0 सुरत के अरघ में जोतर्लिंग का, दरस परस ततकाला ।
सुमिरन भजन ध्यान का लेले, हाथ त्रिशूल का भाला ।
रूप में मन को लगाई ॥
चल नन्द वाहन कर असवारी, परध वृत्ति चित लाना ।
परब को साध पार्वती मति संग, तब समझे गुरु ज्ञाना । ।
रहे समता लव लाई ॥
चल परवत के आकार अटल बन, संग भूत बैताला ।
राग सुहाना अद्भुत सुन सुन, मधुर मनोहर ताना ॥
अनहद धुन सुखदाई ।
चल पीले भंग प्रेम भक्ति की, चित चंचलता भागे ।
काम क्रोध नहीं तुझे सतावे, शब्दयोग मन लागे ।
नहीं रहे मन दुचिताई ॥
चल प्रथम अस्थान त्याग अब प्यारे, त्रिपुर ओर सिधारो ।
अ उ म मृदंग ओम् सुन, सत रज तम को मारो ।
गुरु के सन्मुख जाई ।
दूजा त्रिकुटी पद का मंडल, बीज मन्त्र उच्चारन ।
गुरु चेले की जुग जब सूझे, बने अनोखा चारन ॥
यह युक्ति अनूप सुहाई ॥
चल तीजी मंजिल सुन्न देश की, ब्रह्म सिखर कैलासा ।
मानसरोवर कर असनाना, हो रह गुरु का दासा । ।
सहज समाध लगाई ।
चल सुन्न में सूझे पद निरवाना, हंस गति को पाना ।
शिव का रूप बने फिर तेरा, यही परम कल्याना ॥
समझ मन अपने भाई ॥ चल0 ।
आगे भंवर गुफा की खिड़की, बंसी धुन जहां गाजी ।
काया माया काल जीत ले, अपना आपा साजी । ।
न हो फिर जग दुखदाई । ।
चल सतपद अलख अगम चढ़जा तू , धर राधास्वामी की आसा ।
संतन का यह बल अस्थाना, पावे गुरुमुख दासा । ।
करे जो सहज कमाई ॥ चल
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Song 61 — Hindi
धुन 5 360. मेरा रूप लखे नहीं कोई, जग में मैं हूँ सुन्दर नार ॥टेक ॥
पति के प्रेम में सदा दिवानी, पतिव्रत धर्म रीति हिये ठानी ।
पति की मूरत लख हर्षानी, चित धर प्रेम पियार ॥
मेरा0 आंख के भीतर पति विराजे, सूरज चन्द्र देख छबि लाजे ।
घंटा शंख सहस दल बाजे, पति का रूप निहार । ।
मेरा0 शील सिंदूर से माँग भराई, धर्म वस्त्र से देह सजाई ।
पति को निरख निरख मुस्काई, आपा सकल बिसार ॥
मेरा0 नाम रूप की है अधिकाई, पति सेवा में रहे भलाई ।
पति से मिल गई सुन्दरताई, पति सांचे भरतार । ।
पति की सेवा हिये बसाऊँ, पति को सुमिरू पतिहि मनाऊँ ।
पति से निस दिन नेह लगाऊँ, राधास्वामी भये दयार ।मेरा0
पति के प्रेम में सदा दिवानी, पतिव्रत धर्म रीति हिये ठानी ।
पति की मूरत लख हर्षानी, चित धर प्रेम पियार ॥
मेरा0 आंख के भीतर पति विराजे, सूरज चन्द्र देख छबि लाजे ।
घंटा शंख सहस दल बाजे, पति का रूप निहार । ।
मेरा0 शील सिंदूर से माँग भराई, धर्म वस्त्र से देह सजाई ।
पति को निरख निरख मुस्काई, आपा सकल बिसार ॥
मेरा0 नाम रूप की है अधिकाई, पति सेवा में रहे भलाई ।
पति से मिल गई सुन्दरताई, पति सांचे भरतार । ।
पति की सेवा हिये बसाऊँ, पति को सुमिरू पतिहि मनाऊँ ।
पति से निस दिन नेह लगाऊँ, राधास्वामी भये दयार ।मेरा0
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Song 62 — Hindi
धुन 16 361. भाग जगा गुरु पूरा पाया, अब माया भरमावे क्यों ।
काल कर्म का बन्धन कट गया, मोह जाल फैलावै क्यों ॥1 ॥
धन्य धन्य गुरु तेरी लीला, गुन गाकर हरषाता हूँ ।
तेरी चरन कमल में आकर, जीव निबल कहीं जावे क्यों ।।2। ।
तू है मेरा मैं हूँ तेरा, मेरा तेरा है व्यवहार ।
परमारथ का भेद मिला जब, जग प्रपंच बहकावे क्यों ॥3 ॥
तू है सिंध बुन्द मैं तेरा, बुन्द सिंध से अलग है कब ।
सिंध बुन्द है बुन्द सिंध है, इसको कोई बिलगावे क्यों॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु परमदयाला, सिर पर हाथ रहे तेरा। ।
तेरा हाथ चरन पर तेरे, सेवक हाथ हटावे क्यों ॥5 ॥
काल कर्म का बन्धन कट गया, मोह जाल फैलावै क्यों ॥1 ॥
धन्य धन्य गुरु तेरी लीला, गुन गाकर हरषाता हूँ ।
तेरी चरन कमल में आकर, जीव निबल कहीं जावे क्यों ।।2। ।
तू है मेरा मैं हूँ तेरा, मेरा तेरा है व्यवहार ।
परमारथ का भेद मिला जब, जग प्रपंच बहकावे क्यों ॥3 ॥
तू है सिंध बुन्द मैं तेरा, बुन्द सिंध से अलग है कब ।
सिंध बुन्द है बुन्द सिंध है, इसको कोई बिलगावे क्यों॥4 ॥
राधास्वामी सतगुरु परमदयाला, सिर पर हाथ रहे तेरा। ।
तेरा हाथ चरन पर तेरे, सेवक हाथ हटावे क्यों ॥5 ॥
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Song 63 — Hindi
धुन 2 362. ढूँढ़ लो तुम घट में अपने, घट ही उसका धाम है ।
द्द कर हो नाम का जप, घट में उसका नाम है ॥1 ॥
वह अवश्य घट में मिलेगा, घट में रहता है सदा ।
घट ही में है शान्ती, और घट ही में विश्राम है ॥2 ॥
वह न तीरथ बरत में है, और न वह मंदिर में है ।
पाता है उसको जो जपता, घट में आठों याम है ॥3 ॥
तुम न बहको तुम न भटको, और न आओ धोके में ।
है अघट घट में तुम्हारे, और उसी से काम है ॥4 ॥
ढूँढ़ो ढूढो ढूंढो ढूँढ़ो, नाम जब है ढूँढ़ राव ।
ढूँढ़ने में मुक्ति है, और धर्म है सत काम है ॥5 ॥
204.
द्द कर हो नाम का जप, घट में उसका नाम है ॥1 ॥
वह अवश्य घट में मिलेगा, घट में रहता है सदा ।
घट ही में है शान्ती, और घट ही में विश्राम है ॥2 ॥
वह न तीरथ बरत में है, और न वह मंदिर में है ।
पाता है उसको जो जपता, घट में आठों याम है ॥3 ॥
तुम न बहको तुम न भटको, और न आओ धोके में ।
है अघट घट में तुम्हारे, और उसी से काम है ॥4 ॥
ढूँढ़ो ढूढो ढूंढो ढूँढ़ो, नाम जब है ढूँढ़ राव ।
ढूँढ़ने में मुक्ति है, और धर्म है सत काम है ॥5 ॥
204.
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Song 64 — Hindi
धुन 17 363. चल चल सुरत उस देस को, जहां अनहद बाजे ।
सत्त पुरुष की आन, नित छिन प्रति छिन राजे ॥1 ॥
बानी अद्भुत अचरजी, धुन कान में आवे ।
सुन सुन सुन तारी लगे, नहीं मन भरमावे ॥2 ॥
रम्भा सुन्दर अप्सरा, थिक थिक थिक नाचें ।
वह सब सुरत स्वरूप हैं, सत लोक में राचे ॥3 ॥
जमघट हंसों की बनी, हंसन की पांती ।
वहां न वरण न आश्रम, नहीं कुल नहीं जाती ॥4 ॥
दुख कलेश का नाम नहीं, आनन्द दिन राती। ।
रैन दिवस की गम कहां, पपीहा नहीं स्वांती ॥5 ॥
आनन्द मंगल होत नित, एक चित मन रमा ।
चकित भई यह लख दशा, लक्ष्मी और उमा ॥6 ॥
जनम मरन का दुख मिटे, अमरापुर जाये । ।
जो कोई पहुँचे सत्त पद, अजरा बन जाये ॥7 ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल से, ऊंचा है सत पद । ।
बानी सुन नहीं कह सकें, वह गद या निज पद ॥ ॥
गद से पद का भास है, भाषा में भाखा । ।
बानी निर्मल विमल सुन, निज हृदय राखा ॥6 ॥
दिश दस मंगल होय, मंगला रागनी ।
कुन्डलनी पहुँचे नहीं, नहीं नागनी ॥10 ॥
शक्ति युक्त संयुक्त वह, मुक्ति अस्थाना । ।
जब सुरत पहुँची वहां निश्चय कर जाना ॥11 ॥
बिन जाने कोई क्या कहे, कैसे मन माने ।
बिन माने निश्चय नहीं, निश्चय नहीं आने ॥12 ॥
निज नैनों से देख कर, संशय न रहाई ।
वह इनका विश्राम है, जो धुन लव लाई ॥13 ॥
सतपद धुरपद एक है, सुन सूरत बाता ।
सतपद पहुंचे सन्त जन, त्यागा उत्पाता ॥14 ॥
नहीं काल नहीं कर्म वहां, नहीं माया लवलेस ।
मैं कहूँ तोय समझाय कर, घर सतपद भेस ॥1 ॥
कर साधन इस शब्द का, बन साधन सम्पन्न तू ।
कुछ दिन पीछे आय, हो साधन सम्पन्न तू ॥16 ॥
अनुभव बिन कोई क्या कहे, क्या समझे बानी ।
सतगुरु मिलें तो भेद दें, और भेद निशानी ॥17 ॥
जब लग गुरु से गम नहीं, गुरु गम न विचारा ।
बिन विचार कैसे मिले, निज सार का सारा ॥18 ॥
गुरु बिन मत चल पन्थ में, बिन गुरु दुहीला। ।
गुरु संग जो कोई चले, तब पन्थ सुहीला ॥16 ॥
पुस्तक पोथी क्या पढ़े, क्या उनमें पावे ।
पोथी पढ़ भ्रम में फसे, औरन भरमावे ॥20 ॥
वाचक ज्ञानी बहु मिले, करनी के द्रोही ।
वाचक ज्ञान के बीच में, बने क्रोधी मोही ॥21 ॥
तू इस मारग मत चले, अन्धों का रस्ता ।
अन्धा चले टटोल कर, दुख सहता सहता ॥22 ॥
कथनी तज करनी करे, करनी चित लावे ।
करनी से रहनी मिले, रहनी पद पावे ॥23 ॥
करनी वाला पुत्र है, सतगुरु का साथी। ।
कथनी वाला दूर है, सम्बन्धी नाती ॥23 ॥
रहनी है गुरु नाम में, गुरु इष्ट का साखी ।
आप इष्ट का रूप वह, सच्ची मैं भाखी ॥24 ॥
राधास्वामी की दया, पाया निरवाना ।
सूरत सुन मेरी बात को, कर सत का पयाना ॥26 ॥
सत्त पुरुष की आन, नित छिन प्रति छिन राजे ॥1 ॥
बानी अद्भुत अचरजी, धुन कान में आवे ।
सुन सुन सुन तारी लगे, नहीं मन भरमावे ॥2 ॥
रम्भा सुन्दर अप्सरा, थिक थिक थिक नाचें ।
वह सब सुरत स्वरूप हैं, सत लोक में राचे ॥3 ॥
जमघट हंसों की बनी, हंसन की पांती ।
वहां न वरण न आश्रम, नहीं कुल नहीं जाती ॥4 ॥
दुख कलेश का नाम नहीं, आनन्द दिन राती। ।
रैन दिवस की गम कहां, पपीहा नहीं स्वांती ॥5 ॥
आनन्द मंगल होत नित, एक चित मन रमा ।
चकित भई यह लख दशा, लक्ष्मी और उमा ॥6 ॥
जनम मरन का दुख मिटे, अमरापुर जाये । ।
जो कोई पहुँचे सत्त पद, अजरा बन जाये ॥7 ॥
कारण सूक्ष्म स्थूल से, ऊंचा है सत पद । ।
बानी सुन नहीं कह सकें, वह गद या निज पद ॥ ॥
गद से पद का भास है, भाषा में भाखा । ।
बानी निर्मल विमल सुन, निज हृदय राखा ॥6 ॥
दिश दस मंगल होय, मंगला रागनी ।
कुन्डलनी पहुँचे नहीं, नहीं नागनी ॥10 ॥
शक्ति युक्त संयुक्त वह, मुक्ति अस्थाना । ।
जब सुरत पहुँची वहां निश्चय कर जाना ॥11 ॥
बिन जाने कोई क्या कहे, कैसे मन माने ।
बिन माने निश्चय नहीं, निश्चय नहीं आने ॥12 ॥
निज नैनों से देख कर, संशय न रहाई ।
वह इनका विश्राम है, जो धुन लव लाई ॥13 ॥
सतपद धुरपद एक है, सुन सूरत बाता ।
सतपद पहुंचे सन्त जन, त्यागा उत्पाता ॥14 ॥
नहीं काल नहीं कर्म वहां, नहीं माया लवलेस ।
मैं कहूँ तोय समझाय कर, घर सतपद भेस ॥1 ॥
कर साधन इस शब्द का, बन साधन सम्पन्न तू ।
कुछ दिन पीछे आय, हो साधन सम्पन्न तू ॥16 ॥
अनुभव बिन कोई क्या कहे, क्या समझे बानी ।
सतगुरु मिलें तो भेद दें, और भेद निशानी ॥17 ॥
जब लग गुरु से गम नहीं, गुरु गम न विचारा ।
बिन विचार कैसे मिले, निज सार का सारा ॥18 ॥
गुरु बिन मत चल पन्थ में, बिन गुरु दुहीला। ।
गुरु संग जो कोई चले, तब पन्थ सुहीला ॥16 ॥
पुस्तक पोथी क्या पढ़े, क्या उनमें पावे ।
पोथी पढ़ भ्रम में फसे, औरन भरमावे ॥20 ॥
वाचक ज्ञानी बहु मिले, करनी के द्रोही ।
वाचक ज्ञान के बीच में, बने क्रोधी मोही ॥21 ॥
तू इस मारग मत चले, अन्धों का रस्ता ।
अन्धा चले टटोल कर, दुख सहता सहता ॥22 ॥
कथनी तज करनी करे, करनी चित लावे ।
करनी से रहनी मिले, रहनी पद पावे ॥23 ॥
करनी वाला पुत्र है, सतगुरु का साथी। ।
कथनी वाला दूर है, सम्बन्धी नाती ॥23 ॥
रहनी है गुरु नाम में, गुरु इष्ट का साखी ।
आप इष्ट का रूप वह, सच्ची मैं भाखी ॥24 ॥
राधास्वामी की दया, पाया निरवाना ।
सूरत सुन मेरी बात को, कर सत का पयाना ॥26 ॥
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Song 65 — Hindi
धुन 20 364.. गुरु तेरे चरन की बलिहारी ॥टेक। ।
भरम मिटाया मोह नसाया, माया की कटी जड़ सारी ।
सार सुझाया तत्व लखाया, नहीं रहा मैं संसारी ।
गुरु0 भय न सतावे भव न डरावे, निस दिन तेरी रखबारी ।
मोह मया चिंता नहीं व्यापे, मेरी अवस्था भई न्यारी ॥
गुरु0 जाग्रत स्वप्न एक सम लेखा, हटी हिये की अधियारी ।
निज स्वरूप का दर्शन पाया, चहुँ दिस रहे मंगलकारी ॥ गुरु0
अघट प्रेम घट अंतर आया, प्रेम की फूली फुलवारी ।
चम्पा श्रद्धा भक्ति चमेली, निरखू हृदय की क्यारी । ।
गुरु0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, होगया मैं आज्ञाकारी। ।
शब्द योग की करू कमाई, ज्ञान भान घट उजियारी ॥ गुरु0
भरम मिटाया मोह नसाया, माया की कटी जड़ सारी ।
सार सुझाया तत्व लखाया, नहीं रहा मैं संसारी ।
गुरु0 भय न सतावे भव न डरावे, निस दिन तेरी रखबारी ।
मोह मया चिंता नहीं व्यापे, मेरी अवस्था भई न्यारी ॥
गुरु0 जाग्रत स्वप्न एक सम लेखा, हटी हिये की अधियारी ।
निज स्वरूप का दर्शन पाया, चहुँ दिस रहे मंगलकारी ॥ गुरु0
अघट प्रेम घट अंतर आया, प्रेम की फूली फुलवारी ।
चम्पा श्रद्धा भक्ति चमेली, निरखू हृदय की क्यारी । ।
गुरु0 राधास्वामी गुरु ने अंग लगाया, होगया मैं आज्ञाकारी। ।
शब्द योग की करू कमाई, ज्ञान भान घट उजियारी ॥ गुरु0
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Song 66 — Hindi
धुन 17 365. कुरुक्षेत्र यह तन नगरी है, अर्जुन तीर चलावे ।
अन्ध तीर दुर्योधन मारे, भरम अज्ञान मिटावे ॥1 ॥
अर्जुन दास गुरु का बांका, धीर भीर गम्भीरा ।
साधे तीर ज्ञान का पल पल, सोधे विकल शरीरा ॥2 ॥
कृष्ण सारथी गुरु मूरत है, रथ यह देही भाई। ।
अहंकार मन बुद्धि चित्त सब, घोड़ों की समुदाई ॥3 ॥
लड़े भिड़े शत्रू दल मारे, रन भूमी यश पाये ।
पांडवों को जय विजय दिलावे, अंध का वंश मिटावे ॥4 ॥
सहज सहज में काम बनाव, घर राधास्वामी की आस ।
ऐसा सेवक प्यारा मुझको, सो है अर्जुन दास ॥5 ॥
अन्ध तीर दुर्योधन मारे, भरम अज्ञान मिटावे ॥1 ॥
अर्जुन दास गुरु का बांका, धीर भीर गम्भीरा ।
साधे तीर ज्ञान का पल पल, सोधे विकल शरीरा ॥2 ॥
कृष्ण सारथी गुरु मूरत है, रथ यह देही भाई। ।
अहंकार मन बुद्धि चित्त सब, घोड़ों की समुदाई ॥3 ॥
लड़े भिड़े शत्रू दल मारे, रन भूमी यश पाये ।
पांडवों को जय विजय दिलावे, अंध का वंश मिटावे ॥4 ॥
सहज सहज में काम बनाव, घर राधास्वामी की आस ।
ऐसा सेवक प्यारा मुझको, सो है अर्जुन दास ॥5 ॥
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Song 67 — Hindi
धुन 2 366. ध्यान मन मोहन का करके, मैं भी मोहन होगया ।
दुख गया चिन्ता मिटी, आनन्द तन मन होगया ॥1 ॥
कीट भृगी की दशा है, रंग गुरु का धार कर ।
जब खिला घट में कमल, घट मेरा मधुबन होगया ॥2 ॥
ढूँढ़ता फिरता किसे है, किस लिये तू रात दिन ।
अपने हृदय में जब उसका, आप दर्शन होगया ॥3 ॥
अपने आप को भुलाकर, गुरु का आपा धारकर ।
आप में आपा लखा, मन आप दरपन होगया ॥4 ॥
राधास्वामी की दया का, पात्र तुम समझो मुझे ।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, यह सहज साधन होगया ॥2 ॥
दुख गया चिन्ता मिटी, आनन्द तन मन होगया ॥1 ॥
कीट भृगी की दशा है, रंग गुरु का धार कर ।
जब खिला घट में कमल, घट मेरा मधुबन होगया ॥2 ॥
ढूँढ़ता फिरता किसे है, किस लिये तू रात दिन ।
अपने हृदय में जब उसका, आप दर्शन होगया ॥3 ॥
अपने आप को भुलाकर, गुरु का आपा धारकर ।
आप में आपा लखा, मन आप दरपन होगया ॥4 ॥
राधास्वामी की दया का, पात्र तुम समझो मुझे ।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, यह सहज साधन होगया ॥2 ॥
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Song 68 — Hindi
धुन 16 367. प्यारी रंगी प्रेम के रंग में, अब प्यारी घबराये क्यों ।
प्रेम प्यार का रस है मीठा, जग की प्यास सतावे क्यों ॥1 ॥
गुरु ने धरा हाथ सिर ऊपर, रक्षा पल पल होती है ।
मन चंचल क्यों धूम मचावे, भूल भरम भरमावे क्यों ॥2 ॥
चिंता किसकी प्यारी तुझको, अब निचित रह सब विधि तू ।
तेरी चिंता गुरु को रहती, चिंता बस तू आवें क्यों ॥3 ॥
तेरे मन में मेरे तन में, रोम रोम गुरु व्याप रहे ।
उनका बल ले घट में प्यारी, अबला कोई बताये क्यों ॥4 ॥
राधास्वामी अचल मुकामी, अंग संग तेरे रहते हैं ।
घट में दर्शन कर हित चित से, इधर उधर तू जावे क्यों ॥5 ॥
प्रेम प्यार का रस है मीठा, जग की प्यास सतावे क्यों ॥1 ॥
गुरु ने धरा हाथ सिर ऊपर, रक्षा पल पल होती है ।
मन चंचल क्यों धूम मचावे, भूल भरम भरमावे क्यों ॥2 ॥
चिंता किसकी प्यारी तुझको, अब निचित रह सब विधि तू ।
तेरी चिंता गुरु को रहती, चिंता बस तू आवें क्यों ॥3 ॥
तेरे मन में मेरे तन में, रोम रोम गुरु व्याप रहे ।
उनका बल ले घट में प्यारी, अबला कोई बताये क्यों ॥4 ॥
राधास्वामी अचल मुकामी, अंग संग तेरे रहते हैं ।
घट में दर्शन कर हित चित से, इधर उधर तू जावे क्यों ॥5 ॥
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Song 69 — Hindi
धुन 15 368. क्यों तू भरम रही संसार, तेरा स्वामी तेरे घर में ॥टेक। ।
मन्दिर पूजा तीरथ नहाया, तिलक लगाया भाई ।
माला फेरी ध्यान जमाया, घट का मर्म न पाई ॥ तेरा0
पुरी द्वारिका काशी मथुरा, भरम फिरा चौदेसा ।
अटपट खटपट उमर गंवाई, ज्ञान नहीं लवलेसा ॥
तेरा0 गीता पढ़ी भागवत बाँची, रामायण पढ़ भूली ।
सार पदारथ हाथ न आया, आगे यम की मूली ॥
स्वांग बनाया भेस बनाया, यह पाखंड पसारा ।
भेस से न्यारा साहेब तेरा, लख निज घट मत सारा ॥
अपने घट में बैठक ठानो, घट में करो गुरु पूजा। ।
राधास्वामी भेद बतायें, स्वामी और न दूजा ॥
मन्दिर पूजा तीरथ नहाया, तिलक लगाया भाई ।
माला फेरी ध्यान जमाया, घट का मर्म न पाई ॥ तेरा0
पुरी द्वारिका काशी मथुरा, भरम फिरा चौदेसा ।
अटपट खटपट उमर गंवाई, ज्ञान नहीं लवलेसा ॥
तेरा0 गीता पढ़ी भागवत बाँची, रामायण पढ़ भूली ।
सार पदारथ हाथ न आया, आगे यम की मूली ॥
स्वांग बनाया भेस बनाया, यह पाखंड पसारा ।
भेस से न्यारा साहेब तेरा, लख निज घट मत सारा ॥
अपने घट में बैठक ठानो, घट में करो गुरु पूजा। ।
राधास्वामी भेद बतायें, स्वामी और न दूजा ॥
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Song 70 — Hindi
धुन 6 366. सुन चित से उपदेस, सुरत मेरी भाग्यवती ।।टेक ॥
मन इन्द्री के देस पड़ी है, यह नहीं तेरा देस ॥
सुरत0 देस तेरा राधास्वामी धामा, यह तो है परदेस ॥
प्रेम प्रीत की पहर ले चूनर, धार हंसनी भेस ॥
करम बचन को साथ ले अपने, मन को न दे तू ठेस ॥
राधास्वामी धाम की बांध ले आसा, जहां न दुख लवलेस ॥
मन इन्द्री के देस पड़ी है, यह नहीं तेरा देस ॥
सुरत0 देस तेरा राधास्वामी धामा, यह तो है परदेस ॥
प्रेम प्रीत की पहर ले चूनर, धार हंसनी भेस ॥
करम बचन को साथ ले अपने, मन को न दे तू ठेस ॥
राधास्वामी धाम की बांध ले आसा, जहां न दुख लवलेस ॥
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Song 71 — Hindi
धुन 22 370. मैंने अपना रूप बिसारा, तब आप ही अन्जान बना ।
भर्म विकार की हुई उत्पत्ति, काम क्रोध मद मान बना ।
भूला भटका और भर्माया, क्या था और क्या आन बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलाबान बना ॥1 ॥
कर्म किया हट साधन किया, तपसी जपी भक्ति साधी ।
ईश्वर की भक्ति को चित दिया, वह भी ठहरी उपाधी ।
चैन न पाया शान्ति न आई, पूरी मिली नहीं आधी ।
जोग जुगत कर थका, जतन ने बुद्धि को बाधी ।
मन चंचल में दुविधा आई, चित चिन्ता की खान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥2 ॥
206 गुरु मिले सतसंग कराया, सत संगत के सुने बचन ।
चित को रोका मन को रोका, रोक थाम से किया श्रवन ।
श्रवन किया तो फिर इस श्रवन का, सहज में होगया आप मनन ।
श्रवन मनन के पीछे कर लिया, उस बानी का निध्यासन ।
तत्वमसि कहा तब गुरु ने, तब स्वरूप का ज्ञान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥3 ॥
मैं हूँ ब्रह्म ब्रह्म नहीं मुझसे, कभी अलग और नहीं न्यारा ।
मेरा रूप अगम और अलख है, मैं इनसे भी हूँ पारा ।
अपना प्यार प्रेम जब भाया, अपने आपका मैं प्यारा ।
मैं हूँ परे पार हूँ सबसे, और कोई होगा वारा ।
सोहं अहं ब्रह्मास्मि कह निकला, ब्रह्म का पहिचान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥4 ॥
मैं नहीं कान आँख और देही, मैं नहीं मन चित हंकारा ।
मैं नहीं कर्म भक्ति और बुद्धि, रूप मेरा सबसे न्यारा ।
मैं नहिं उनका यह रहते हैं, क्यों मेरे आधारा ।
अयं आत्मा ब्रह्म अखंडं, अद्वतीय अमृत सारा ।
अपनी समझ आप अब आई, शान्ति का अवसान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥5 ॥
चौथे पद की समझ तब आई, तुर्या पद सहजहि पाई ।
समझ बूझ नहिं किंचित मुझको, नहीं सहनी पड़ी कठिनाई ।
तुर्या छोड़ा तुर्यातीत हुआ, तब मेरी बन आई ।
अपने में अब आप समाना, कैसी दुर्मति दुचिताई ।
गुरु दाता गुरु ज्ञानी ध्यानी, गुरु से नाम का दान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, केसा लीलावान बना ॥6 ॥
मैं क्या हूँ कोई कैसे जाने, कहन सुनन में नहीं आता ।
नहीं मरता नहीं जीता हूँ मैं, नहीं आता कहीं नहीं जाता ।
आप भरम कर आपको भूला, कैसे कोई भरमाता ।
यह भी लीला एक थी मेरी, नहीं तू क्यों धोका खाता ।
राधास्वामी सतगुरु पूरे, मिले तो ज्ञान और ध्यान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥7 ॥
भर्म विकार की हुई उत्पत्ति, काम क्रोध मद मान बना ।
भूला भटका और भर्माया, क्या था और क्या आन बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलाबान बना ॥1 ॥
कर्म किया हट साधन किया, तपसी जपी भक्ति साधी ।
ईश्वर की भक्ति को चित दिया, वह भी ठहरी उपाधी ।
चैन न पाया शान्ति न आई, पूरी मिली नहीं आधी ।
जोग जुगत कर थका, जतन ने बुद्धि को बाधी ।
मन चंचल में दुविधा आई, चित चिन्ता की खान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥2 ॥
206 गुरु मिले सतसंग कराया, सत संगत के सुने बचन ।
चित को रोका मन को रोका, रोक थाम से किया श्रवन ।
श्रवन किया तो फिर इस श्रवन का, सहज में होगया आप मनन ।
श्रवन मनन के पीछे कर लिया, उस बानी का निध्यासन ।
तत्वमसि कहा तब गुरु ने, तब स्वरूप का ज्ञान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥3 ॥
मैं हूँ ब्रह्म ब्रह्म नहीं मुझसे, कभी अलग और नहीं न्यारा ।
मेरा रूप अगम और अलख है, मैं इनसे भी हूँ पारा ।
अपना प्यार प्रेम जब भाया, अपने आपका मैं प्यारा ।
मैं हूँ परे पार हूँ सबसे, और कोई होगा वारा ।
सोहं अहं ब्रह्मास्मि कह निकला, ब्रह्म का पहिचान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥4 ॥
मैं नहीं कान आँख और देही, मैं नहीं मन चित हंकारा ।
मैं नहीं कर्म भक्ति और बुद्धि, रूप मेरा सबसे न्यारा ।
मैं नहिं उनका यह रहते हैं, क्यों मेरे आधारा ।
अयं आत्मा ब्रह्म अखंडं, अद्वतीय अमृत सारा ।
अपनी समझ आप अब आई, शान्ति का अवसान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥5 ॥
चौथे पद की समझ तब आई, तुर्या पद सहजहि पाई ।
समझ बूझ नहिं किंचित मुझको, नहीं सहनी पड़ी कठिनाई ।
तुर्या छोड़ा तुर्यातीत हुआ, तब मेरी बन आई ।
अपने में अब आप समाना, कैसी दुर्मति दुचिताई ।
गुरु दाता गुरु ज्ञानी ध्यानी, गुरु से नाम का दान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, केसा लीलावान बना ॥6 ॥
मैं क्या हूँ कोई कैसे जाने, कहन सुनन में नहीं आता ।
नहीं मरता नहीं जीता हूँ मैं, नहीं आता कहीं नहीं जाता ।
आप भरम कर आपको भूला, कैसे कोई भरमाता ।
यह भी लीला एक थी मेरी, नहीं तू क्यों धोका खाता ।
राधास्वामी सतगुरु पूरे, मिले तो ज्ञान और ध्यान बना ।
इस प्रपंच की लीला न्यारी, कैसा लीलावान बना ॥7 ॥
×
Song 72 — Hindi
धुन 8 371. दया कीजै मुझको चरनों में लीजे, बैठा संग में ज्ञान गम आप दीजे ।
समझ आये संसार का तत्व सारा, मिटे भर्म माया करम का विकारा ।
बिमल चित मन शुद्ध बुद्धि हो निर्मल, अहंकार में सच्ची शक्ति
का हो बल ।
खुले अनुभव और ब्रह्म का भेद पाऊँ, वह क्या है वह कैसा है
सब को जताऊ ॥
दया दृष्टि हो दास पर राधास्वामी, कमल पद में निस दिन
नमामी नमामी ।
समझ आये संसार का तत्व सारा, मिटे भर्म माया करम का विकारा ।
बिमल चित मन शुद्ध बुद्धि हो निर्मल, अहंकार में सच्ची शक्ति
का हो बल ।
खुले अनुभव और ब्रह्म का भेद पाऊँ, वह क्या है वह कैसा है
सब को जताऊ ॥
दया दृष्टि हो दास पर राधास्वामी, कमल पद में निस दिन
नमामी नमामी ।
×
Song 73 — Hindi
धुन 17 372. धन्य धन्य गुरु देव दया सागर धनी ।
बख्शा सुरत शब्द भेद किया
दिल का गनी ॥
चरन कमल की धूर आंख में जब लगाई ।
खान खुली निज हृदय में
सुख सम्पत पाई ॥
सहस कवल दल में किया ज्योती का दर्शन ।
घंटा शंख की नाद का
हुआ सहज ही श्रवन ॥
बंकनाल के पार चढ़ त्रिकुटी पद परसा ।
सुनी ओउम् धुनी घट में ही
ओंकार जो दरसा ॥
सुन्न महासुन्न दसम दर मानस अस्नाना ।
हंसगती जब पाईया चुना
मोती ज्ञाना । ।
चार शब्द जहां गुप्त हैं बानी अति निर्मल ।
अधिकारी कोई सुन हिये
सुरत का बल ॥ आला
भंवर गुफा के मध्य में मुरली धुन बाजी ।
सुन सुन सूरत हरपती
हुई मन में राजी ॥
सोहंग से परचा भया सोहंग गति पाई ।
अब भव में नहीं मैं फंसू
गुरु की शरनाई ॥
सतपद में सत धाम है सत बीन का राजा ।
सत्त सत्त का शब्द याम
आठों तहां गाजा ॥
अलख अगम के पार पार संतन का धामा ।
राधास्वामी धाम में मिला
अब विश्रामा ॥
धन्य धन्य तू धन्य है यह धन्य कमाई ।
सहजहि कट गया जाल
छुटा जग अगमा पाई ।
बाहर भीतर एक रस निज रूप पसारा ।
प्रगटे दीन दयाल दिया
मोहि आप सहारा ॥
राधास्वामी नाम कह कह तारी लागी ।
सुरत शब्द के योग से
सुरत भई विस्माधी ॥
बख्शा सुरत शब्द भेद किया
दिल का गनी ॥
चरन कमल की धूर आंख में जब लगाई ।
खान खुली निज हृदय में
सुख सम्पत पाई ॥
सहस कवल दल में किया ज्योती का दर्शन ।
घंटा शंख की नाद का
हुआ सहज ही श्रवन ॥
बंकनाल के पार चढ़ त्रिकुटी पद परसा ।
सुनी ओउम् धुनी घट में ही
ओंकार जो दरसा ॥
सुन्न महासुन्न दसम दर मानस अस्नाना ।
हंसगती जब पाईया चुना
मोती ज्ञाना । ।
चार शब्द जहां गुप्त हैं बानी अति निर्मल ।
अधिकारी कोई सुन हिये
सुरत का बल ॥ आला
भंवर गुफा के मध्य में मुरली धुन बाजी ।
सुन सुन सूरत हरपती
हुई मन में राजी ॥
सोहंग से परचा भया सोहंग गति पाई ।
अब भव में नहीं मैं फंसू
गुरु की शरनाई ॥
सतपद में सत धाम है सत बीन का राजा ।
सत्त सत्त का शब्द याम
आठों तहां गाजा ॥
अलख अगम के पार पार संतन का धामा ।
राधास्वामी धाम में मिला
अब विश्रामा ॥
धन्य धन्य तू धन्य है यह धन्य कमाई ।
सहजहि कट गया जाल
छुटा जग अगमा पाई ।
बाहर भीतर एक रस निज रूप पसारा ।
प्रगटे दीन दयाल दिया
मोहि आप सहारा ॥
राधास्वामी नाम कह कह तारी लागी ।
सुरत शब्द के योग से
सुरत भई विस्माधी ॥
×
Song 74 — Hindi
धुन 4 373. तू अमीर तू वजीर, तू फकीर सांचा ।
तू गुरु की अब पकड़ी ओट, त्याग जगत भाव खोट ।
सही घनी जम की चोट, अब न लगे आँचा । ।
तू0 सार गह तज असार, झूटा जग का पसार ।
सतगुरु को कर ले यार, सांच मीत जांचा ॥
तू0 राधास्वामी राधास्वामी, सतगुरु हैं तेरे हामी ।
राधास्वामी पद नमामी, गह के चरन बांचा ॥ तू0
तू गुरु की अब पकड़ी ओट, त्याग जगत भाव खोट ।
सही घनी जम की चोट, अब न लगे आँचा । ।
तू0 सार गह तज असार, झूटा जग का पसार ।
सतगुरु को कर ले यार, सांच मीत जांचा ॥
तू0 राधास्वामी राधास्वामी, सतगुरु हैं तेरे हामी ।
राधास्वामी पद नमामी, गह के चरन बांचा ॥ तू0
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Song 75 — Hindi
धुन 16 374. मैं पैय्यां परूँ अब मेरा आप सुधार करो टेक। ।
भव जल में नहीं नाव न बेड़ा, बहियां पकर मुझे पार करो ॥
मैं गोते खाते बहु दिन बीते, अब तो गुरु निस्तार करो ॥
लहर लहर बिच भँवर भैर है, अपनी दया उद्धार करो ॥
मैं0 हाथ पांव नहीं शक्ति है बाकी, समरथ तुम ही संभार करो ॥
मैं0 राधास्वामी चरन शरनं बलिहारी, प्रेम अगनी उदगार करो ॥ मैं0
भव जल में नहीं नाव न बेड़ा, बहियां पकर मुझे पार करो ॥
मैं गोते खाते बहु दिन बीते, अब तो गुरु निस्तार करो ॥
लहर लहर बिच भँवर भैर है, अपनी दया उद्धार करो ॥
मैं0 हाथ पांव नहीं शक्ति है बाकी, समरथ तुम ही संभार करो ॥
मैं0 राधास्वामी चरन शरनं बलिहारी, प्रेम अगनी उदगार करो ॥ मैं0
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Song 76 — Hindi
धुन 16 375. लीला तेरी न्यारी प्रभु जी, लीला तेरी न्यारी ॥टेका ।
ब्रह्मा विष्णु भेद नहीं पावे, नहीं जाने त्रिपुरारी ॥
प्रभु जी0 माया बस सब रहे भुलाने, भटक भटक भटकानी ॥
करम जाल और काल चक्र में, निसदिन जिया दुखारी ॥
सबहि नचावत नाच अनोखा, राजा रंक भिकारी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चकित भये नरनारी ॥
ब्रह्मा विष्णु भेद नहीं पावे, नहीं जाने त्रिपुरारी ॥
प्रभु जी0 माया बस सब रहे भुलाने, भटक भटक भटकानी ॥
करम जाल और काल चक्र में, निसदिन जिया दुखारी ॥
सबहि नचावत नाच अनोखा, राजा रंक भिकारी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चकित भये नरनारी ॥
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Song 77 — Hindi
धुन 16 376. आजा रंगीले यार, छवि तेरी घुझको भागई ॥टेक। ।
सूना पड़ा था यह मन मंदिर, अब तेरी मूरत आगई ।आजा0
सुरत को घंटा शंख मिला जब, अनहद नाद बजा गई ॥
तिल को उलट सहस कमल में, जोत में जोत समा गई ।
त्रिकुटी में ओंकार की लीला, अद्भुत रूप दिखा गई ॥
दृष्टि खुली हिया जिया हर्षाना, सुन्न समाध रचा गई ॥
भँवर गुफा में बंसी बाजी, कोटिन कृष्ण लजा गई ॥
सतपद अलख अगम राधास्वामी, चरन शरन गुरु पा गई ।
सूना पड़ा था यह मन मंदिर, अब तेरी मूरत आगई ।आजा0
सुरत को घंटा शंख मिला जब, अनहद नाद बजा गई ॥
तिल को उलट सहस कमल में, जोत में जोत समा गई ।
त्रिकुटी में ओंकार की लीला, अद्भुत रूप दिखा गई ॥
दृष्टि खुली हिया जिया हर्षाना, सुन्न समाध रचा गई ॥
भँवर गुफा में बंसी बाजी, कोटिन कृष्ण लजा गई ॥
सतपद अलख अगम राधास्वामी, चरन शरन गुरु पा गई ।
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Song 78 — Hindi
धुन 17 377. गुरु दरस दिखा गुरु दरस दिखा, तेरा अद्भुत रूप है प्यारा ।
मन तिमिर मिटा मन तिमिर मिटा, घट चमके रवि शशी तारा ॥1 ॥
तेरी बांकी अदा तेरी बांकी अदा, मेरे हिया जिया को अति भाई ।
तेरा ध्यान करूँ तेरा ध्यान करूं, हित चित से मैं दिन राती ॥2 ॥
घट भीतर आ घट भीतर आ, घट का घर पड़ा है सूना ।
तेरी लगन लगी तेरी लगन लगी, बिरह ज्वाला तपे दिन दूना ॥3 ॥
मन तिमिर मिटा मन तिमिर मिटा, घट चमके रवि शशी तारा ॥1 ॥
तेरी बांकी अदा तेरी बांकी अदा, मेरे हिया जिया को अति भाई ।
तेरा ध्यान करूँ तेरा ध्यान करूं, हित चित से मैं दिन राती ॥2 ॥
घट भीतर आ घट भीतर आ, घट का घर पड़ा है सूना ।
तेरी लगन लगी तेरी लगन लगी, बिरह ज्वाला तपे दिन दूना ॥3 ॥
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Song 79 — Hindi
धुन 16 378. प्रेम की भट्टी प्रेमी बैठे, पीते प्रेम पियाला हो ।टेका ।
अमृत रस से भरा पियाला, अद्भुत अधिक रसाला हो । ।
जो नहीं पिया स्वाद क्या जाने, कैसे बने मतवाला हो ।
इस प्याले का कठिन है पीना, मांगे सीस कलाला हो ।
लोभी तन मन सीस न अरपे, उरझा जम की ज्वाला हो ।
साधु संग में गुरु गम पाये, दुर्मति घट से निकाला हो ।
पी पी तृप्त भये दिन राती, छूटा जग जंजाला हो ।
लाली लाली अखिया गुरु छवि देखी, अन्तर भया उजाला हो ।
मतवाले से कोई न हटके, हानी करे नहीं काला हो ।
कुंजी घर की सुरत शब्द की, खुल गया मनका ताला हो ।
आपहि द्वन्द मिटा सब भव का, सुख से भया निराला हो ।
नहीं कोई गुरु बिन है अपना, बहु विधि देखा भाला हो ।
एकचित होय स्वामी चरनन लागा, दुचिता का भय टाला हो ।
नाम सुधा रस गुरु ने बख्शा, तन भया प्रेम पियाला हो ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगया सहज निहाला हो ।
अमृत रस से भरा पियाला, अद्भुत अधिक रसाला हो । ।
जो नहीं पिया स्वाद क्या जाने, कैसे बने मतवाला हो ।
इस प्याले का कठिन है पीना, मांगे सीस कलाला हो ।
लोभी तन मन सीस न अरपे, उरझा जम की ज्वाला हो ।
साधु संग में गुरु गम पाये, दुर्मति घट से निकाला हो ।
पी पी तृप्त भये दिन राती, छूटा जग जंजाला हो ।
लाली लाली अखिया गुरु छवि देखी, अन्तर भया उजाला हो ।
मतवाले से कोई न हटके, हानी करे नहीं काला हो ।
कुंजी घर की सुरत शब्द की, खुल गया मनका ताला हो ।
आपहि द्वन्द मिटा सब भव का, सुख से भया निराला हो ।
नहीं कोई गुरु बिन है अपना, बहु विधि देखा भाला हो ।
एकचित होय स्वामी चरनन लागा, दुचिता का भय टाला हो ।
नाम सुधा रस गुरु ने बख्शा, तन भया प्रेम पियाला हो ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगया सहज निहाला हो ।
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Song 80 — Hindi
धुन 21 379. आजा रंगीले यार तेरी छवि चित में समा गई ॥टेक। ।
दुर्मति त्यागू चरनों लागू, जग के मोह मया से भागू ।
बाँकी अदा मन भागई ॥
अरे आजा रंगीले0 सबको छोड़ा, नाता तोड़ा, तुझसे नेह का रिश्ता जोड़ा ।
तेरे शरन में आ गई ॥
अरे आजा0 ।
नहीं संसारी न मैं विभिचारी, तुझ से होगई मेरी यारी ।
भक्ति भाव फल पा गई ॥
अरे आजा0
गुरु है दाता गुरु पितु माता, गुरु हैं सम्बन्धी हित भ्राता ।
गुरु के रंग रंगा गई ॥
अरे आजा0 जगदाधारी जग हितकारी, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
माया ओर मैं ना गई ॥
अरे आजा0
दुर्मति त्यागू चरनों लागू, जग के मोह मया से भागू ।
बाँकी अदा मन भागई ॥
अरे आजा रंगीले0 सबको छोड़ा, नाता तोड़ा, तुझसे नेह का रिश्ता जोड़ा ।
तेरे शरन में आ गई ॥
अरे आजा0 ।
नहीं संसारी न मैं विभिचारी, तुझ से होगई मेरी यारी ।
भक्ति भाव फल पा गई ॥
अरे आजा0
गुरु है दाता गुरु पितु माता, गुरु हैं सम्बन्धी हित भ्राता ।
गुरु के रंग रंगा गई ॥
अरे आजा0 जगदाधारी जग हितकारी, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।
माया ओर मैं ना गई ॥
अरे आजा0
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Song 81 — Hindi
धुन 18 380. दीन बन्धु दयाल स्वामी, तुम दया के सिंध ।
निज दया से बंध काटो, छूटे द्वन्द का बंध ॥1 ॥
काल कर्म का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटने की, उरझ उरझ फंसाय ॥2 ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे चरन में, कट जग के पाप ॥3 ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पायें परम पद को, चित चरन से मेल ॥4 ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
दान दीजे बासना से, चित्त हो उपराम ॥5 ॥
निज दया से बंध काटो, छूटे द्वन्द का बंध ॥1 ॥
काल कर्म का कड़ा बन्धन, जीव रहे लपटाय ।
विधि न जाने छूटने की, उरझ उरझ फंसाय ॥2 ॥
दया कीजे भक्ति दीजे, तार लीजे आप ।
पुण्य फल तुम्हरे चरन में, कट जग के पाप ॥3 ॥
सुरत शब्द का योग निर्मल, सहज सुगम सुहेल ।
जीव पायें परम पद को, चित चरन से मेल ॥4 ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम ।
दान दीजे बासना से, चित्त हो उपराम ॥5 ॥
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Song 82 — Hindi
धुन 66 381. सतगुरु प्यारे ने सुनाया, पिया का संदेशा हो ।टेक। ।
सुन सुन सुरत भई मस्तानी, मेटा भव का अंदेसा हो ॥1 ॥
छिन भंगी माया विस्तारा, व्यापा भरम कलेसा हो ॥2 ॥
काल मते की दुर्मति छोड़ी, ममता नहीं लवलेसा हो ॥3 ॥
तिल की ओट पहाड़ लखा जब, त्रिकुटी किया प्रवेशा हो ॥4 ॥
सुन्न में पहुँची सुन्न गति निरखी, महासुन्न का देसा हो ॥5 ॥
भँवर गुफा की खिड़का अद्भुत, पहुँचे कोई दस्वेसा हो ॥6 ॥
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी धाम उजेसा हो ॥7 ॥
215
सुन सुन सुरत भई मस्तानी, मेटा भव का अंदेसा हो ॥1 ॥
छिन भंगी माया विस्तारा, व्यापा भरम कलेसा हो ॥2 ॥
काल मते की दुर्मति छोड़ी, ममता नहीं लवलेसा हो ॥3 ॥
तिल की ओट पहाड़ लखा जब, त्रिकुटी किया प्रवेशा हो ॥4 ॥
सुन्न में पहुँची सुन्न गति निरखी, महासुन्न का देसा हो ॥5 ॥
भँवर गुफा की खिड़का अद्भुत, पहुँचे कोई दस्वेसा हो ॥6 ॥
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी धाम उजेसा हो ॥7 ॥
215
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Song 83 — Hindi
धुन 16 382. हम होगये गुरु के गुरु के, नाता नहीं जग से कुल से ।।टेक। ।
गुरु देवन के देवा, सब करो’ गुरु की सेवा ॥1 ॥
गुरु मानुष तन धर आये, गुरु गुप्त भेद दरसाये ॥2 ॥
गुरु सम नहीं कोई रक्षक, सम्बन्धी जानो तक्षक ॥3 ॥
गुरु रूप लखे नैनों से, गुरु शब्द सुने श्रवन से ॥4 ॥
गुरु ने सत रूप दिखाया, गुरु अलख अगम दरसाया ॥5 ॥
गुरु रूप धरा राधास्वामी, गुरु के पद कमल नमामी ॥6 ॥
गुरु देवन के देवा, सब करो’ गुरु की सेवा ॥1 ॥
गुरु मानुष तन धर आये, गुरु गुप्त भेद दरसाये ॥2 ॥
गुरु सम नहीं कोई रक्षक, सम्बन्धी जानो तक्षक ॥3 ॥
गुरु रूप लखे नैनों से, गुरु शब्द सुने श्रवन से ॥4 ॥
गुरु ने सत रूप दिखाया, गुरु अलख अगम दरसाया ॥5 ॥
गुरु रूप धरा राधास्वामी, गुरु के पद कमल नमामी ॥6 ॥
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Song 84 — Hindi
धुन 17 383. धन्य घड़ी धन्य दिवस, धन्य समय आया ।
धन्य धन्य धन्य धन्य, धन्य तेरी माया ॥1 ॥
भूले थे जग आस, ज्ञान रतन पाया ।
तुझसे नहीं कोई निराश, धन्य तेरी दाया ॥2 ॥
भक्तन लाज काज, जोड़ा मंगल समाज ।
आनन्द सुख बिभो आज, चारों ओर छाया ॥3 ॥
धन्य धन्य धन्य धन्य, धन्य तेरी माया ॥1 ॥
भूले थे जग आस, ज्ञान रतन पाया ।
तुझसे नहीं कोई निराश, धन्य तेरी दाया ॥2 ॥
भक्तन लाज काज, जोड़ा मंगल समाज ।
आनन्द सुख बिभो आज, चारों ओर छाया ॥3 ॥
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Song 85 — Hindi
धुन 16 384. गुरु जम का फन्द कटा दिया, भव दारुन द्वन्द हटा दिया ॥टेक। ।
माया जाल का उलझन भारी, घटते घटते घटा दिया ॥1 ॥
अमृत नाम स्वाद रस मीठा, हितचित आन चटा दिया ॥2 ॥
नाम रतन के जो अधिकारी, तिन में आप बटा दिया ॥3 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिभ्या नाम रटा दिया ॥4 ॥
माया जाल का उलझन भारी, घटते घटते घटा दिया ॥1 ॥
अमृत नाम स्वाद रस मीठा, हितचित आन चटा दिया ॥2 ॥
नाम रतन के जो अधिकारी, तिन में आप बटा दिया ॥3 ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जिभ्या नाम रटा दिया ॥4 ॥
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Song 86 — Hindi
धुन 16 385. चल गुरु मारग चल गुरु मारग, जगत वासना प्यारी रे ॥टेक। ।
कान पड़े जब शब्द रसीला, सोया मनुआ जागी रे ॥1 ॥
मया मोह दुर्मति चतुराई, सबही अचानक भागी रे ॥2 ॥
पग पग बरसे अमृत धारा, जड़ी अखंडित लागी रे ॥3 ॥
भक्ति भाव सुख आनन्द मंगल, सूरत भई सुहागी रे ।
चलत चलत धुरपद नियरानी, मन हुआ सहज विरागी रे ॥
कर्म धर्म का बन्धन टूटा, जम घर देदी आगी रे ।
चमकत विजली बोलत दादुर, चातक भये अति रागी रे ॥
गुरु दया से निज पद पाया, अब क्या काहु से मांगी रे ।
मेरु सुमेरु शिखर जब दरसा, मन भया सत अनुरागी रे । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, परम प्रीति रस पागी रे ॥
कान पड़े जब शब्द रसीला, सोया मनुआ जागी रे ॥1 ॥
मया मोह दुर्मति चतुराई, सबही अचानक भागी रे ॥2 ॥
पग पग बरसे अमृत धारा, जड़ी अखंडित लागी रे ॥3 ॥
भक्ति भाव सुख आनन्द मंगल, सूरत भई सुहागी रे ।
चलत चलत धुरपद नियरानी, मन हुआ सहज विरागी रे ॥
कर्म धर्म का बन्धन टूटा, जम घर देदी आगी रे ।
चमकत विजली बोलत दादुर, चातक भये अति रागी रे ॥
गुरु दया से निज पद पाया, अब क्या काहु से मांगी रे ।
मेरु सुमेरु शिखर जब दरसा, मन भया सत अनुरागी रे । ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, परम प्रीति रस पागी रे ॥
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Song 87 — Hindi
धुन 16 386. तेरे भक्ति भाव नहीं मन में प्रानी,
भूला माया के पन में ॥टेका काम क्रोध और छल चतुराई, रहा इसी के जतन में ॥
गुरु का ध्यान न गुरु की पूजा, नहीं तू गुरु की लगन में ॥
मानुष जनम मिला रहो निस दिन, सुमिरन ध्यान भजन में ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भजले गुरु छिन छिन में ।
भूला माया के पन में ॥टेका काम क्रोध और छल चतुराई, रहा इसी के जतन में ॥
गुरु का ध्यान न गुरु की पूजा, नहीं तू गुरु की लगन में ॥
मानुष जनम मिला रहो निस दिन, सुमिरन ध्यान भजन में ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भजले गुरु छिन छिन में ।
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Song 88 — Hindi
धुन 16 387. छोड़ो मन कुटिलाई साधो, छोड़ो मन कुटिलाई ॥टेक ।
अनहोनी कभी होनी नाही, होनी काटि न जाई ।
वृथा उपाय करे कर मूरख, गह सतगुरु शरनाई ॥
सिंध अपार अगम जल भरिया, रह रह कर लहराई । ।
ता में जीव जन्तु बहुतेरा, थाह न कोई पाई ॥
बाढ़े घटे घटे और बादे, रोक सके को आई ॥
देव द्वत नर सुर मुनि बड़े, बूड़ी सब दुनियाई ॥
ऊँचे गगन मंडल शशि डोले, प्रतिबिम्ब होय आई । ।
जब लग चंद उदय हुये तारे, सिंघ बाढ़ किम जाई । ।
मिट गये चंद गुप्त भये बादर, धरती आकास समाई ॥
आवागवन के फंद कटाने, राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
अनहोनी कभी होनी नाही, होनी काटि न जाई ।
वृथा उपाय करे कर मूरख, गह सतगुरु शरनाई ॥
सिंध अपार अगम जल भरिया, रह रह कर लहराई । ।
ता में जीव जन्तु बहुतेरा, थाह न कोई पाई ॥
बाढ़े घटे घटे और बादे, रोक सके को आई ॥
देव द्वत नर सुर मुनि बड़े, बूड़ी सब दुनियाई ॥
ऊँचे गगन मंडल शशि डोले, प्रतिबिम्ब होय आई । ।
जब लग चंद उदय हुये तारे, सिंघ बाढ़ किम जाई । ।
मिट गये चंद गुप्त भये बादर, धरती आकास समाई ॥
आवागवन के फंद कटाने, राधास्वामी हुये हैं सहाई ॥
×
Song 89 — Hindi
धुन 17 388. साधो यह जग अगमापाई, तासों कौन भलाई ॥टेक ॥
छिन में उपजे छिन में बिनसे, ज्यों बादर की छांई ।
धन दौलत का रूप पिछानो, सपना है रैनाई ॥
बालू भीत उठाई दिन दिन, तासों नेह लगाई ।
पल छिन भीतर विनस जात है, यह तो महा दुखदाई ॥
पढ़ा लिखा भरमा भरमाया, भाई बुद्धि चतुराई ।
अध घटी काया भई निबेल, सूझ परी तब भाई ॥
आसा तृष्णा काल का फांसा, उरझ उरझ उरझाई ।
केसे छूटन होय तुम्हारा, जो नहीं गुरु सुरझाई । ।
त्राह त्राह कर सतसंग आओ, ले उनकी शरनाई ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी बात बनाई ।
छिन में उपजे छिन में बिनसे, ज्यों बादर की छांई ।
धन दौलत का रूप पिछानो, सपना है रैनाई ॥
बालू भीत उठाई दिन दिन, तासों नेह लगाई ।
पल छिन भीतर विनस जात है, यह तो महा दुखदाई ॥
पढ़ा लिखा भरमा भरमाया, भाई बुद्धि चतुराई ।
अध घटी काया भई निबेल, सूझ परी तब भाई ॥
आसा तृष्णा काल का फांसा, उरझ उरझ उरझाई ।
केसे छूटन होय तुम्हारा, जो नहीं गुरु सुरझाई । ।
त्राह त्राह कर सतसंग आओ, ले उनकी शरनाई ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बिगड़ी बात बनाई ।
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Song 90 — Hindi
धुन 16 389. चरन गुरु हिरदे धार रही ॥टेक। ।
भव की धार कठिन अति भारी, सो अब उलट वही ।
गुरु बिन कौन संभारे मन को, सुरत उमंग अब शब्द गही ।
कोटिन जन्म भरमते बीते, काहू मेरी आन न बांह गही ।
अपके सतगुरु मिले दया कर, शब्द भेद उन सार दई ।
नी को छोड़ द्वार दस लागी, अक्षर मय नौनीत लई ।
नौका पार चली अब गुरु बल, अगम पदारथ लान सही । ।
क्या क्या कहूँ कहूँ गति नाही, सुरत शब्द मिल एक हुई ।
रहनी गहनी की बात नियारी, सन्त बिना कोई नाहिं कही ।
सुन्न शिखर चढ़ महा सुन्न लख, भवर गुफा पर ठाठ ठई । ।
सत्त नाम सत धाम निरख धुर, अलख अगम गति पाय गई ।
सुरत निरत संग चली अगाड़ी, राधास्वामी राधास्वामी चरन मई । ।
अब आरत सिंगार सुधारी, प्रेम उमंग भी बहुत चही ॥
काल कला सब दर बिडारी, दयाल सरन अब आन लई ॥
पचरंग बाना पहन विराजे, शोभा धारी आज नई ।
जीव काज निज भवन छोड़कर, जमा दूध फिर होत दही । ।
मथ मथ माखन काढ़ निकारा, बिरले गुरुसुख चाख चखी ।
राधास्वामी दीन दयाला, चढ़ो अधर निज धाम यही ॥
भव की धार कठिन अति भारी, सो अब उलट वही ।
गुरु बिन कौन संभारे मन को, सुरत उमंग अब शब्द गही ।
कोटिन जन्म भरमते बीते, काहू मेरी आन न बांह गही ।
अपके सतगुरु मिले दया कर, शब्द भेद उन सार दई ।
नी को छोड़ द्वार दस लागी, अक्षर मय नौनीत लई ।
नौका पार चली अब गुरु बल, अगम पदारथ लान सही । ।
क्या क्या कहूँ कहूँ गति नाही, सुरत शब्द मिल एक हुई ।
रहनी गहनी की बात नियारी, सन्त बिना कोई नाहिं कही ।
सुन्न शिखर चढ़ महा सुन्न लख, भवर गुफा पर ठाठ ठई । ।
सत्त नाम सत धाम निरख धुर, अलख अगम गति पाय गई ।
सुरत निरत संग चली अगाड़ी, राधास्वामी राधास्वामी चरन मई । ।
अब आरत सिंगार सुधारी, प्रेम उमंग भी बहुत चही ॥
काल कला सब दर बिडारी, दयाल सरन अब आन लई ॥
पचरंग बाना पहन विराजे, शोभा धारी आज नई ।
जीव काज निज भवन छोड़कर, जमा दूध फिर होत दही । ।
मथ मथ माखन काढ़ निकारा, बिरले गुरुसुख चाख चखी ।
राधास्वामी दीन दयाला, चढ़ो अधर निज धाम यही ॥
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Song 91 — Hindi
धुन 20 390. खोज री पिया को निज घट में ॥टेका
जो तुम पिया से मिलना चाहो, तो भटको मत मग में ।
तीरथ बरत कर्म आचारा, यह अटकावे मग में ॥
खोज री जब लग सतगुरु मिले न पूरे, पड़े रहोगे अघ में ।
नाम सुधारस कभी न पाआ, भरमो योनी खग में ॥
पंडित काजी भेष शेख सब, अटक रहे डग डग में ॥
इनके संग पिया नहीं मिलना, पिया मिले कोई साध समग में ॥
यह तो भूले विषय वास में, भर्म बसे इनकी रग रग में ।
बिना संत कोई भेद न पावे, वे तोहि कहें अलग में ॥
जब लग संत मिले नहीं तुमको, खाय ठगोरी तू इन ठग में ।
राधास्वामी शरन गहो तो, रखो जोति जगमग में ॥
जो तुम पिया से मिलना चाहो, तो भटको मत मग में ।
तीरथ बरत कर्म आचारा, यह अटकावे मग में ॥
खोज री जब लग सतगुरु मिले न पूरे, पड़े रहोगे अघ में ।
नाम सुधारस कभी न पाआ, भरमो योनी खग में ॥
पंडित काजी भेष शेख सब, अटक रहे डग डग में ॥
इनके संग पिया नहीं मिलना, पिया मिले कोई साध समग में ॥
यह तो भूले विषय वास में, भर्म बसे इनकी रग रग में ।
बिना संत कोई भेद न पावे, वे तोहि कहें अलग में ॥
जब लग संत मिले नहीं तुमको, खाय ठगोरी तू इन ठग में ।
राधास्वामी शरन गहो तो, रखो जोति जगमग में ॥
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Song 92 — Hindi
धुन 16 391. राधास्वामी करो मेरा बेड़ा पार ।।टेक। ।
मुझ समान दुखिया नहीं कोई, देख लिया तिहुँ लोक मॅझार ।
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा, कर्म का पड़ा बहुत सिर भार ॥
रा0 रहा किसी का नहीं सहारा, मेरी लाज के तुम रखवार ॥
अपने बैरी पराये शत्रु, मेरी दृष्टि नरक संसार ॥+
चरन कमल में आन पड़ी हूँ, राधास्वामी करो सँभार ॥
मुझ समान दुखिया नहीं कोई, देख लिया तिहुँ लोक मॅझार ।
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा, कर्म का पड़ा बहुत सिर भार ॥
रा0 रहा किसी का नहीं सहारा, मेरी लाज के तुम रखवार ॥
अपने बैरी पराये शत्रु, मेरी दृष्टि नरक संसार ॥+
चरन कमल में आन पड़ी हूँ, राधास्वामी करो सँभार ॥
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Song 93 — Hindi
धुन 17 392. मेरे घट में अनहद बाजे बाजे बाजे ।
धुन मधुर रसीले गाजे गाजे गाजे ॥1 ॥
सत सार शब्द अब पाया पाया पाया ।
सुरत साज अनूपम साजे साजे साजे ॥2 ॥
मन अद्भुत रंग दिखाया दिखाया दिखाया ।
मद मोह लोभ सब भाजे भाजे भाजे ॥3 ॥
प्रकाश विचित्र प्रकाशा प्रकाशा प्रकाशा ।
हिये सतगुरु मेरे विराजे विराजे विराजे ॥4 ॥
राधास्वामी खेल खिलाया खिलाया खिलाया ।
निरवानी हुआ मैं आजे आजे आजे ॥5 ॥
धुन मधुर रसीले गाजे गाजे गाजे ॥1 ॥
सत सार शब्द अब पाया पाया पाया ।
सुरत साज अनूपम साजे साजे साजे ॥2 ॥
मन अद्भुत रंग दिखाया दिखाया दिखाया ।
मद मोह लोभ सब भाजे भाजे भाजे ॥3 ॥
प्रकाश विचित्र प्रकाशा प्रकाशा प्रकाशा ।
हिये सतगुरु मेरे विराजे विराजे विराजे ॥4 ॥
राधास्वामी खेल खिलाया खिलाया खिलाया ।
निरवानी हुआ मैं आजे आजे आजे ॥5 ॥
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Song 94 — Hindi
धुन 17 393. धुन अनहद में चित लाया लाया लाया ।
चढ़ अधर घाट गुरु पाया पाया पाया ॥1 ॥
सुरत झूम चली मद माती माती माती ।
घट राग सुहावन गाया गाया गाया ॥2 ॥
उत्तम पद निश्चल दरसा दरसा दरसा ।
माया का देखा छाया छाया छाया ॥3 ॥
माया करम सब त्यागा त्यागा त्यागा ।
धुरपद में आया आया आया ॥4 ॥
राधास्वामी मौज दिखाई दिखाई दिखाई ।
गुरु चरन ओर तष धाया धाया धाया ॥
चढ़ अधर घाट गुरु पाया पाया पाया ॥1 ॥
सुरत झूम चली मद माती माती माती ।
घट राग सुहावन गाया गाया गाया ॥2 ॥
उत्तम पद निश्चल दरसा दरसा दरसा ।
माया का देखा छाया छाया छाया ॥3 ॥
माया करम सब त्यागा त्यागा त्यागा ।
धुरपद में आया आया आया ॥4 ॥
राधास्वामी मौज दिखाई दिखाई दिखाई ।
गुरु चरन ओर तष धाया धाया धाया ॥
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Song 95 — Hindi
धुन 16 394. नर भजन बिना पछतायेगा, नर अन्तकाल पछतायेगा ।।टेक। ।
सांसों सांस जात है अवसर, फिर यह हाथ न आयेगा ।
आवेगी जब लहर मौत की, फिर न संभाला जायेगा । ।
मुट्ठी बाँधे आया है नर, मुट्ठी बांधे जायेगा ॥
नर0 जग का भूठा सकल पसारा, इससे क्या तू पायेगा ।
करना है सो करले पानी, नहीं तो मुंह की खायेगा ।
ज्ञान ध्यान भक्ति गुरु सेवा, फिर क्या करे करायेगा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,भव के भरम मिटायेगा ।
सांसों सांस जात है अवसर, फिर यह हाथ न आयेगा ।
आवेगी जब लहर मौत की, फिर न संभाला जायेगा । ।
मुट्ठी बाँधे आया है नर, मुट्ठी बांधे जायेगा ॥
नर0 जग का भूठा सकल पसारा, इससे क्या तू पायेगा ।
करना है सो करले पानी, नहीं तो मुंह की खायेगा ।
ज्ञान ध्यान भक्ति गुरु सेवा, फिर क्या करे करायेगा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,भव के भरम मिटायेगा ।
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Song 96 — Hindi
धुन 17 395. मुझको बतादे अपना ठिकाना, तेरा है धाम कहां साधु ।
नाम बतादे पता बतादे, अपना जतादे निशां साधु ॥
तेरी कुटी है किस तीरथ में, किस जां तेरा मकां साधु ।
मैं भी करूँ हित चित से दर्शन, रहता है तू जहाँ साधु । ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी तेरी जवां साधु ॥1 ॥
पढ़ा लिखा कुछ समझ न आया, भूल भरमें में मन अटका ।
जम के हाथ बिके सब प्रानी, माया काल का पड़ा झटका ॥
दुख कलेश से दुखी हैं सारे, जनम मरन का है खटका ।
दया से नेह से हमें सुनादे, भेद गुप्त मानुष घट का ॥
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥2 ॥
भवसागर का अगम पंथ है, नाव पड़ी मझधारा है ।
पग पग पड़े भंवर का धोका, यहां से दूर किनारा है । ।
काली घटा गगन में छाई, मूझे वार न पारा है ।
सुन सुन कहते हैं क्या प्रानी, चहुँ दिस हाहाकारा है ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥3 ॥
तीन ताप के अग्नि कुन्ड में, सब निस बासर जलते है ।
छोड़ धरम का सीधा रस्ता, टेढ़े रस्ते चलते हैं । ।
स्वर्ग नर्क में जीव जन्तु सब, नित नया चोला बदलते हैं ।
दे उपदेश दीन दुखियों को, हाथ शोक से मलते हैं ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥4 ॥
कोई अद्वत द्वैत में भूले, कोई बने योगी ज्ञानी ।
किसी ने न्यारा पंथ चलाया, किसी की चाल है मनमानी ।
भक्ति भाव से नहीं परिचय कुछ, प्रेम की महिमा नहीं जानी ।
दरस दिखा दे डगर बता दे, आके सुना अपनी बानी ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥5 ॥
नाम बतादे पता बतादे, अपना जतादे निशां साधु ॥
तेरी कुटी है किस तीरथ में, किस जां तेरा मकां साधु ।
मैं भी करूँ हित चित से दर्शन, रहता है तू जहाँ साधु । ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी तेरी जवां साधु ॥1 ॥
पढ़ा लिखा कुछ समझ न आया, भूल भरमें में मन अटका ।
जम के हाथ बिके सब प्रानी, माया काल का पड़ा झटका ॥
दुख कलेश से दुखी हैं सारे, जनम मरन का है खटका ।
दया से नेह से हमें सुनादे, भेद गुप्त मानुष घट का ॥
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥2 ॥
भवसागर का अगम पंथ है, नाव पड़ी मझधारा है ।
पग पग पड़े भंवर का धोका, यहां से दूर किनारा है । ।
काली घटा गगन में छाई, मूझे वार न पारा है ।
सुन सुन कहते हैं क्या प्रानी, चहुँ दिस हाहाकारा है ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवां साधु ॥3 ॥
तीन ताप के अग्नि कुन्ड में, सब निस बासर जलते है ।
छोड़ धरम का सीधा रस्ता, टेढ़े रस्ते चलते हैं । ।
स्वर्ग नर्क में जीव जन्तु सब, नित नया चोला बदलते हैं ।
दे उपदेश दीन दुखियों को, हाथ शोक से मलते हैं ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥4 ॥
कोई अद्वत द्वैत में भूले, कोई बने योगी ज्ञानी ।
किसी ने न्यारा पंथ चलाया, किसी की चाल है मनमानी ।
भक्ति भाव से नहीं परिचय कुछ, प्रेम की महिमा नहीं जानी ।
दरस दिखा दे डगर बता दे, आके सुना अपनी बानी ।
तेरी बानी अमृत मय है, मीठी है तेरी जवाँ साधु ॥5 ॥
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Song 97 — Hindi
धुन 1 396. गुरु नाम से बेड़ा पार हुआ, सुखदाई सकल संसार हुआ ।
अब जग नहीं कारागार हुआ, सुख चैन का नित व्यवहार हुआ ॥1 ॥
चिंता न रही दुविधा न रही, मन की सब दुर्मति दूर हुई ।
मैं क्या थी क्या से क्या हूँ बनी, कैसे कहूँ क्या निस्तार हुआ ॥2 ॥
घर में सुख है मन में सुख है, सुख ही सुख व्याप रहा चहुँ दिस ।
गुरु भक्ति में आनन्द हुआ, सब विधि मेरा उद्धार हुआ ॥3 ॥
सुख का जब तार बंधा जगमग, घट में प्रगटा भक्ति का मग ।
भक्ति सुखदाई हुई मुझको, सुख भक्ति का व्यौहार हुआ ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दयाभारी, अब मैं नहीं किंचित संसारी ।
जल पक्षी का जीवन प्राप्त हुआ, गुरु भक्ति का विस्तार हुआ ॥5 ॥
अब जग नहीं कारागार हुआ, सुख चैन का नित व्यवहार हुआ ॥1 ॥
चिंता न रही दुविधा न रही, मन की सब दुर्मति दूर हुई ।
मैं क्या थी क्या से क्या हूँ बनी, कैसे कहूँ क्या निस्तार हुआ ॥2 ॥
घर में सुख है मन में सुख है, सुख ही सुख व्याप रहा चहुँ दिस ।
गुरु भक्ति में आनन्द हुआ, सब विधि मेरा उद्धार हुआ ॥3 ॥
सुख का जब तार बंधा जगमग, घट में प्रगटा भक्ति का मग ।
भक्ति सुखदाई हुई मुझको, सुख भक्ति का व्यौहार हुआ ॥4 ॥
राधास्वामी ने की है दयाभारी, अब मैं नहीं किंचित संसारी ।
जल पक्षी का जीवन प्राप्त हुआ, गुरु भक्ति का विस्तार हुआ ॥5 ॥
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Song 98 — Hindi
धुन 3 397.. राधास्वामी की मौज रहूँ चित धार ॥टेक। ।
जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज विरुद्ध न करना ।
मौज में सदा भलाई सबकी, क्यों चिन्ता कर मरना ॥रा0
स्वा0 बलि को इन्द्रासन की इच्छा, यज्ञ विधान रचाया ।
मौज से वामन रूप प्रगट भया, तुरत पताल पठाया ॥
दशरथ राम तिलक को चाहे, करे उपाय घनेरी । ।
मौज उसे बनबासी बनावे, कथा ऐसी बहुतेरी ॥
दुर्योधन धन धाम का भूका, पांडव धोका दीन्हा ।
मौज हुई महाभारत ठन गई, कुल कलंक सिर लीना ॥
यह सब हैं इतिहास पुराने, सोच समझ मन आया ।
राधास्वामी दया से मौज पिछानी, मौज से चित्त लगायारा0स्वा0 धुन 2
जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज विरुद्ध न करना ।
मौज में सदा भलाई सबकी, क्यों चिन्ता कर मरना ॥रा0
स्वा0 बलि को इन्द्रासन की इच्छा, यज्ञ विधान रचाया ।
मौज से वामन रूप प्रगट भया, तुरत पताल पठाया ॥
दशरथ राम तिलक को चाहे, करे उपाय घनेरी । ।
मौज उसे बनबासी बनावे, कथा ऐसी बहुतेरी ॥
दुर्योधन धन धाम का भूका, पांडव धोका दीन्हा ।
मौज हुई महाभारत ठन गई, कुल कलंक सिर लीना ॥
यह सब हैं इतिहास पुराने, सोच समझ मन आया ।
राधास्वामी दया से मौज पिछानी, मौज से चित्त लगायारा0स्वा0 धुन 2
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Song 99 — Hindi
398. जिन को गुरु से प्रेम है, वह मौज के आधार हैं ।
उनके बेड़े भव के सागर से, सहज में पार हैं ॥1 ॥
थिर वचन मन थिर सुरत थिर, तन को अपने थिर करो ।
नाम फिर सतगुरु का, स्थिरताई से घट में तुम जपो ॥2 ॥
बंद मुंह हो कान और, आँखों को अपने करलो बंद ।
नाम लो इस रीत से, घट में प्रगटे सूर चन्द ॥3 ॥
किसकी इच्छा है तुम्हें, इच्छा ही यम की फांस है ।
जब नहीं इच्छा रही, दुख और भरम का नास है ॥4 ॥
राधास्वामी गाइये, और राधास्वामी ध्याइये ।
राधास्वामी नाम ले ले, राधास्वामी पाइये ॥5 ॥ धुन 20
उनके बेड़े भव के सागर से, सहज में पार हैं ॥1 ॥
थिर वचन मन थिर सुरत थिर, तन को अपने थिर करो ।
नाम फिर सतगुरु का, स्थिरताई से घट में तुम जपो ॥2 ॥
बंद मुंह हो कान और, आँखों को अपने करलो बंद ।
नाम लो इस रीत से, घट में प्रगटे सूर चन्द ॥3 ॥
किसकी इच्छा है तुम्हें, इच्छा ही यम की फांस है ।
जब नहीं इच्छा रही, दुख और भरम का नास है ॥4 ॥
राधास्वामी गाइये, और राधास्वामी ध्याइये ।
राधास्वामी नाम ले ले, राधास्वामी पाइये ॥5 ॥ धुन 20
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Song 100 — Hindi
399. मनुआ सोच समझ पग धरना ॥टेक। ।
चंचल मनुआ कहा न माने, क्या उपाय अब करना ।
गुरु के नाम का सुमिरन निसदिन, या विधि भवजल तरना ॥1 ॥
रोग सोग में आयु बीती, ठंडी सांस का भरना। ।
गुरु के नाम से संकट भागे, क्यों नहीं नाम सुमिरना ॥2 ॥
सतगुरु तेरे सदा सहाई, यम के भय से डरना । ।
राधास्वामी अंग संग जब, क्यों फिर दुख से मरना ॥3 ॥ धुन 11
चंचल मनुआ कहा न माने, क्या उपाय अब करना ।
गुरु के नाम का सुमिरन निसदिन, या विधि भवजल तरना ॥1 ॥
रोग सोग में आयु बीती, ठंडी सांस का भरना। ।
गुरु के नाम से संकट भागे, क्यों नहीं नाम सुमिरना ॥2 ॥
सतगुरु तेरे सदा सहाई, यम के भय से डरना । ।
राधास्वामी अंग संग जब, क्यों फिर दुख से मरना ॥3 ॥ धुन 11
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Song 101 — Hindi
400. है पिंड घट तुम्हारा, ब्रह्मांड घट बना है ।
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥
दोनों की न्यारी लीला, दोनों में घट पना है ॥1 ॥
है ब्रह्म उससे व्यापक, और तुम हो इसमें व्यापक ।
दोनों की एकता है, दोनों का सामना है ॥2 ॥
जो इसमें उसमें भी वह, समझेगा कोई ज्ञानी ।
अज्ञानी समझे कैसे, अज्ञान में सना है ॥3 ॥
सतसंग गुरु का करले, जिससे विवेक बाढ़े ।
तब समझे भेद घट का, क्यों भरम से तना है ॥4 ॥
मन मत की चाल तजकर, गुरु मत का ले सहारा ।
मन मत भरम है मद है, और जग की वासना है ॥5 ॥
झूठी है देह काया, भूठे हैं काल माया ।
झूठी है चित की छाया, सब झूठी कामना है ॥6 ॥
बात यह भेद की हैं, राधास्वामी ने बताया ।
बिन गुरु दया पवन को, मुठी में बांधना है ॥7 ॥







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