Shiva Shabda Sagar 1

  1. मंगलम् गुरुदेव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।

मंगलम् अव्यक्त अनुपम, मंगलम् भव गंजनम् ॥

मंगलम् धुरपद निवासी, मंगलम् सत् आसनम् ।

मंगलम् निर्वाण सद्गति, मंगलम् जन रन्जनम् ॥

मंगलम् ज्ञान स्वरूपम्, मंगलम् आनन्द रूप ।

मंगलम् चैतन्य सदनम्, मंगलम् सत सत्य भूप ।।

मंगलम् योगीन्द्र माया, तीत मंगल दायकम् ।

मंगलम् संसार सारम्, अद्भुतम् मुनि नायकम् ॥

मंगलम् त्रय गुण रहित,अपरोक्ष परोक्ष निवासनम् ।

मंगलम् त्रय काल ज्ञाता, मंगलम् भव नाशनम् ।।

आदि कारण मूल कारण, मध्य आदि अनन्त जो ।

मंगलम् करुणा सदन, शुभ तत्व परम जगत प्रभो ।।।

आप प्रगटे इस जगत में, जीव काज सुधारने ।

शब्द नाव बनाये सुन्दर, जीव दुखिन उबारने ।

प्राण तन मन कर्म बानी, सबही अपेण लीजिये ।

में हूँ शरणागत तुम्हारा, दास अप्रना कीजिये ।।

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।

न्याग जंग के मोह धन्धे, पाऊँ भक्ति सम्पदा ।।

2.तेरी स्तुति हित चित से गाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ।

तेरे ध्यान में हिय जिय उमगाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

गुरु रूप में प्रगट हुआ जग में, जीवों को चिताके किया मग में।

है विनय तेरा दर्शन पाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

मंगल मय मंगल की खानी, मंगल स्वरूप मंगल दानी ।

क्षण प्रतिक्षण मैं तुझको ध्याऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

तू सब में है सब से न्यारा, तेरा रूप लगे अति ही प्यारा ।

तेरा चरण छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन घन घन राधास्वामी ॥॥

तू निस दिन मेरे मन में बसे, अब मन नहीं माया मोह फँसे ।।

राधास्वामी नाम जय हरपाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

गुरु नाम में हिया जिया उमगाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ।

गुरु दरस पाय मन मगनाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

गुरु रूप में दरस दियो जग में, अपना के कियो मुझको मग में ।

तेरा चरणा छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन धन घन राधास्वामी ॥॥

तेरा सुमिरन ध्यान भजन नित हो, तेरा श्रवण मनन निध्यासन हो ।

धारू मन में तेरा रूप सदा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

तू दाता दीन दयाला है, भक्तों का तू प्रतिपाला है।

तेरे चरण में तन मन बिसरा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

राधास्वामी ने की है दया भारी, गुरु चरण कमल पर बलिहारी।

गुरु वचन सुनू और नित गाऊ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

चमका घट भक्ति का तारा, धन धन धन धन राधास्वामी ।

जीते जी हुआ भव जल पारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

नहीं काम क्रोध के भये मन में, नहीं रोग सोग व्यापा तन में ।

हुआ करम भरम से मैं न्यारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

दुविधा न रही चिन्ता न रही, माया न रही ममता न रही ।।

सतगुरु मेरा हो गया रखवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

जब आँख खुली तब पहिचाना, गुरु गम गति लख मन ने माना।

भरमू नहिं सुख घर परिवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

सुरत सखी नभ चढ़ आई, गुरु मूरति ने छवि दरसाई ।।

धुरपद का खुला घट में द्वारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥

गुरु नाम मिला मुझको प्यारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।

सब नामों से है। यह न्यारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥

दल सहस कमल सुमिरन साधा, त्रिकुटी चढ़ ध्यान को आराधा ।

मृग्न महासुन दुचिता जारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।

मुरत शब्द जोग मत अति है सुगम, कोई अधिकारी पाता है गम ।

गुरु ने मुझे दिया मरम सारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥

जगमग जगमग ज्योती दमकी, ज्योती विचित्र घट में चमकी ।

है, मगन जो देखा चमकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥

महम कमल घंटा बाजा, और शून्य में रारंग धुन गाजा ।।

पद में गरजा कारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।

की थी यह त्रिलोकी, यह त्रिलोकी मैंने छोड़ी ।।

सूरत को गारा, राधास्त्रामी, राधास्वामी ॥।।

नाम की धुन पाई, प्यारी धुन यह मुझको भाई।

मुना में भेवर पद से पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।

सतलोक में बीन की गति प्रगटी, निरखी वहां सतगुरु की भृकुटी ।

सतगुरु मेरे हो गये रखवारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।

लख अलख की शोभा बेहु न्यारी, गम अगम की महिमा थी प्यारी ।

ऊँचे चढ़ हो गया भव पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥

गुरु नाम की धुन पहचान लिया, प्रकाश में रूप को जान लिया।

मिल गया काल से छुटकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी मैं गाता हूँ।

मैं तरा साथ सब को तारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥Audio

आलसी हाँ प्रेम मारग में, नहीं होना कभी ।।

भर्म की निद्रा बुरी, इस में न तुम सोना कभी ॥॥

रात दिन सुमिरन भजन हो, रात दिन हो गुरु का नाम ।।

खेत में हृदय के भक्ति, बीज को बोना कभी ।।।।

क्या समय अच्छा मिला है, जनम नर को पा गये ।

इस समय को भर्म में, पड़ कर नहीं खोना कभी ॥॥

अपनी आंखों आप देखो, उन्नति के दृश्य को ।।

कोष में घट के भिलेगा, मुक्ति का सोना कभी ॥॥

राधास्वामी की दया से, सुख लहो सुख धाम लो ।

जो न संभलेंगे पड़ेगा, अन्त में रोना कभी ॥॥

आस अब किसकी करू, जब दास तेरा होगया ।

मैं हुआ तेरा तो तू भी, स्वामी मेरा होगया ॥१॥

तू है मेरे साथ पलछिन, क्यों हो अब चिन्ता कोई ।

मेरे घट में तेरे रहने का, जो डेरा होगया ।।२।।

सीस पर तूने दया का, हाथ रख परिचय दिया।

मैंने समझा काल का, सब हेरा फेरा होगया ॥३॥

जग नहीं स्थिर न, स्थिरताई जग की वस्तु में ।

यह तो चिड़िया रैन का, सचमुच बसेरा होगया ॥४॥

राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।

नाम भव के सिंध के, तरने का बेड़ा होगया ॥५॥

अपनी दो पहिचान, तुम मेरे सद्गुरु दाता।।
सत हो या आनन्द की मूरत, या हो तत्व के ज्ञान तुम मेर 
कोई कहे गुन सगुन हो निगुन, कोई रचना की जान तुम मेरे 
निराकार साकार अकारा, इनके नाम निशान तुम मेरे
शब्द अशब्द सुरत भंडारा, या इनसे अलगान तुम।।मेरे

कौन हो क्या हो क्या कोई जाने, अपनी को बखान तुम मेरे 
जगदाधारी जगत से न्यारे, निराधार निव्रान तुम मेरे 
निगम अगम भूले चतुराई, ‘नेति ‘एति की खान तुम मेरे 
साखी शब्द कहत सकुचाऊँ, ज्ञान अनुमान प्रमान तुम मेरे 
राधास्वामी अपना भेद बताओ, मेरी ओर दो कान तुम मेरेAudio

आया तेरी शरण में, कर मेरी लाज व्यारे ।

तेरी दया से यूरा, हो मेरा काज प्यारे ।।१।।

भक्ति का आसरा हो, भक्ति दे अपनी मुझको हैं ।

हिस चित से मैं सजाऊँ, भक्ति का साज प्यारे ॥२॥

तुम में है सारी शक्ति, तुम में है योग युक्ति ।

दुख से दिला दे मुक्ति, तेरा है राज प्यारे ॥३॥

जब आगया शरन में, दुख दूर करदे मेरा ।।

कल का भरोसा क्या है, कर काम आज प्यारे ।।४।।

गुरु दाता राधास्वामी, तेरा ही आसरा है।

आया शरण में तेरे, सब जग से भाज प्यारे ।।५।।

एक चिन्ता नाम की कर, जग की चिन्ता मेटकर ।।

चलते फिरते नाम ले तू , बैठकर या लेटकर ॥॥

गुरु के चरणों में झुका, मस्तक डहे सब मान मद ।

कर कमाई भक्ति की, और प्रेम गुरु के भंट कर ।।।।

चित से कब जाने लगा है, मान मद हंकार का ।

सीस अपना राधास्वामी, पद के आगे भेंट कर ।।।।

करता धरती और है, तुम ध्यान में उसके लगो ।

वह है क्या सतसंग कर, पहचान में उसके लगो ।।।।

नाम का सुमिरन करो, वृत्ती को चित के रोक कर ।।

महज साधन में रहो, और ज्ञान में उसके लगो ॥॥

कुछ नहीं दुर्गम, सुगम सब है, जो मन निर्धान्त हो ।

सच्चा स्वामी घट में है, अभिमान में उसके लगो ॥॥

सोचो समझो परखो निरखो, जागे अनुभव काम हो ।

है तुम्हारे तन में वह, अनुमान में उसके लगो ॥॥

राधास्वामी नाम लो, पढ़ राधास्वामी योग को ।

अपने अन्तर आयो खोज, और जान में उसके लगो ॥॥Audio

क्या है तू और कौन है तू , किसको आई यह समझ ।

चुप हुआ चुप होके बैठा, मुझको भाई यह समझ ॥॥

कोई कहता है सगुन, निगु न बताता है कोई ।।

किसने तेरे समझने की, कब है पाई यह समझ ॥॥

तू नहीं है बंध मुक्ति, जोग जुक्ति तू नहीं ।

भेद पाये कोई क्योंकर, मुंह की खाई यह समझ ॥॥

सब है और कुछ भी नहीं है, है नहीं के बीच में ।

अन्त में यह बात से झी, रंग लाई यह समझ ॥॥

राधास्वामी ने कहा, बन्द ऑख कान और होंठ कर ।

मैंने जब ऐसा किया, तब तेरी आई यह समझ ।।।।

कौन तेरा है यहाँ, कोई नहीं तेरा यहाँ ।

साथ किसका कौन देता है, कोई देगा कहाँ ॥॥

चार दिन का है यह मेला, नाव नद संजोग हैं।

सब बिछुड़ जायेंगे, कोई है यहाँ कोई वहाँ ॥॥

झूठे नाते बाँध कर, तू हुआ मन में दुखी ।।

देख अपने रूप को, दो दिन का जग का समाँ ॥॥

रोक सब बाहर की वृत्ती, होके तू अन्तरमुखी ।

शब्द का अभ्यास कर, जैसी दशा में हो जहाँ ॥॥

राधास्वामी का सहारा लेके कर सुमिरन भजन ।।

थोड़े दिन पीछे यह अवसर, हाथ आयेगा कहाँ ।।।।

काम करता हूँ तेरा, स्वामी सदा निष्काम बन ।।

लाभ की और हानि की, चिंता नहीं कुछ मेरे मन ॥॥

मौज को लेकर सहारा, हूँ मैं जीवन काटता ।

चाहे रखे घर में चाहे, भेजदे तु सघन बन ॥॥

चित में क्यों हो भ्रान्ती, जब तू सहायक होगया ।

आस है तेरी दया की, और नहीं कोई जतन ॥॥

जीने की इच्छा नहीं, मरने से भय खाता नहीं ।

दोनों ही सम होगये हैं, मुझको अब जीवन मरन ।।।।

कोई दुख सुख का नहीं, दाता तेरी है भूल सब ।।

कर्म अपने करते हैं, अनुकूल और प्रतिकूल सब ॥॥

कर्म की प्रधानता की, क्या नहीं तुझको समझ ।

कर्म से आनन्द है, और कर्म ही है सूल सब ॥॥

यह जगत है वाटिका, करते हैं प्रानी आके काम ।

कर्म के अनुसार इनके, काँटे हैं और फूल सब ॥॥

जो ठगेगा वह ठगा जायेगा, निस्संदेह आप ।।

प्रेमीजन ही पाते हैं, और प्रेम के बहुमूल सब ॥॥

अपनी करनी आप भरनी, पड़ती है संसार में ।।

अपने घर की आप उठाया, करते ही हैं चूल सब ॥॥

किस भरम में तू पड़ा, औरों की बात छोड़ दे।

काम में लग अपने करले, कर्म निज अनुकूल सब ॥॥

राधास्वामी नाम भज, झगड़ों से बचकर रह सदा ।

जो नहीं समझा तो पढ़ना, लिखना होगा धूल सब ।।।।Audio

कुछ नहीं दुर्गम सुगम सब, कुछ जो गुरु के दास हो ।।

दास वह सच्चा है, जिसमें भक्ति हो विश्वास हो ॥॥

मैं हूँ तुझमें तू है मुझमें, मेरा तेरा है भरम ।।

छोड़ मैं तू को भरम, निज रूप की जब आस हो ॥॥

मुझको सुमिरो मुझको ध्याचो, हो भजन मेरा सदा ।

ध्यान सुमिरन और भजन की, रीत साँसों साँस हो ।।।।

हुँगा प्रगट जब बुलाओगे, कभी तुम चाह से।

मेरे रहने की जगह, भूमी नहीं आकाश हो ॥॥

राधास्वामी ने दया की, भेद अन्तर का दिया ।

देख लोगे मुझको जब, नित शब्द का अभ्यास हो ।।।।Audio

गुरु के दर्शन के बिना, अब नींद तक आती नहीं।

जग की वस्तु कोई भी, मन को मेरे भाती नहीं ॥१॥

आवो प्यारे देवो दर्शन, हूँ विकल मैं रात दिन ।

ताकती हूँ राह तेरी, छवि ही नजर आती नहीं ॥२॥

मैं तो तेरे शरण आई, तुमको मेरी लाज है।

छोड़ कर तेरे चरण मैं, अब कहीं जाती नहीं ॥३॥

तेरा ही विश्वास है, और तेरी मुझको आस है।

तू है साथी एक मेरा, और कोई साथी नहीं ॥४॥

मेट कर त्रय ताप चित को, मेरे करदे आप शान्त ।।

राधास्वामी भक्ति दीजे, शक्ति घबराती नहीं ॥५॥

गुरु हुये संसार में परगट, गुरु से ज्ञान लो ।।

छोड़ दो पाखंड को, गुरु मत की महिमा जान लो ॥॥

गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु ही शिव के रूप हैं।

ब्रह्म गुरु परब्रह्म गुरु है, गुरु को सब कुछ मान लो ।।।।

ज्ञान है आधार गुरु के, भक्ति गुरु के आसरे ।

गुरु के सनमुख जाके तुम, सतगुरु से नाम का दान लो ॥॥

आया शुभ अवसर न इस, अवसर को छोड़ो हाथ से ।।

गुरु से मिलकर जीते जी, कैवल्य पद निर्वान लो ।।।।

राधास्वामी की दया से, गुरु की आई अब समझ ।।

जनम को करलो सुफल, निज रूप को पहचान लो ॥॥Audio

गुरु समरथ दाता तारेंगे, गुरु समरथ ॥टेका।

मन में सोच करे क्यों मूरख, बिगड़ी तेरी सुधारेंगे ।

गुरु० भूल चूक की चिंता क्यों है, करनी तेरी बिसारेंगे ॥

गोते खाते बहु दिन बीते, भव जल पार उतारेंगे ।

दृष्टि नहीं तेरे करतब पर, अपनी ओर निहारंगे ॥

राधास्वामी शरन में जो नहीं आये, जीती बाजी हारेंगे ।Audio

गुरु दाता लगा दो पार मुझे ॥टेको ।

टूटी नव्या भंवर पड़ी है, काढ़ निकारो किनार मुझे ॥

गुरु० काल करम का बोझ पड़ा सिर, नहीं भावे यह भार मुझे ॥

तुम समान कोई नजर न आवे, खेवटिया हुशियार मुझे ।।

गुरु० बन्धन में माया के उलझा, जग है कारागार मुझे ॥ ॥

राधास्वामी आन बताओ, परमारथ का सार मुझे ।।

घट का घर सूना पड़ा है, उसमें आप आ जाइये ।।

दास हूँ सेवक हैं सच्ची, अब तो आप अपनाइये ।।॥

काम का मद मोह का, माया का कूड़ा हट गया।

शुद्ध निर्मल और सुथरी, कोठरी में आइये ॥॥

घट का घर मेरी बने, मन्दिर सुहाना अद्भुती ।।

मूरती आकर बिराजे, अपनी छबि दिखलाइये ॥॥

मैं तुम्हारा तुम हो मेरे, यह समझ में आगया।

भर्म और अज्ञान माया, मोह को मिटवाइये ॥॥

आरती साजू जलाऊ, जोत भक्ति प्रेम की ।

राधास्वामी नाद घंटा, शंख में सुनवाइये ॥॥

घट में गुरु के रूप का, परकाश तारा होगया ।।

मिट गया मन का अंधेरा, और उजारा होगया ॥॥

प्रीत और परतीत से, विश्वास से साधन किया ।

नाम सच्चा मिल गया, जब वह सहारा होगया ॥॥

भाग अपना क्या सराहूँ, बन गया मेरा जनम ।।

प्रेम के मन आते ही, जग का दुलारा होगया ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।

राधास्वामी नाम, जीने का सहारा होगया ॥॥

घट में दर्शन पाओगे, संदेह कुछ इसमें नहीं ।

मैं तो घट में हूँ तुम्हारे, ढूंढ़ लो मुझको वहीं ॥॥

शब्द सुनते हो मेरा, अन्तर में चित को साध कर ।।

सुरत मेरा रूप है, इसको समझ लेना यहीं ॥॥

सूक्ष्म हूँ स्थूल हूँ, कारन हूँ कारन से परे ।

देख दृश्टि को जमाकर, अपने अन्तर में कहीं ॥॥

चाह जब दरशन की होगी, देख लोगे आप, तुम ।।

जागते में सोते में, संध्या में मैं हूँ सब कहीं ॥॥

राधास्वामी धाम में, सेवक हूँ राधास्वामी को ।

मेल मेला राम में, इसकी परख आई नहीं ॥॥

चित की वृत्ती हो न चंचल, करले उसकी रोक थाम ।

उसके पीछे बैठकर, एकान्त में लो गुरु का नाम ॥॥

नाम के सुमिरन से, आजायेगी तुझमें धारना ।।

धारना से ध्यान होगा, ध्यान होगा आठों याम ॥॥

ध्यान से प्रगटेगी अन्तर, सतगुरु की मूरती ।।

मूरती का कर भजन, चिन्तन भजन का कर तू काम ॥॥

इस भजन चिन्तन के अन्तर, राम अनहद है छुपी ।।

सुन उसे लय होजा उसमें, गह ले सुन्न में लय का ठाम ।।।।

जब सहज आये समाधी, दौड़ चल सत लोक को ।।

लख अलख गम ले अगम की, पाले राधास्वामी धाम ॥॥

जिसने बन्धन में फंसाया, है छुड़ायेगा वही ।

जाल माया मोह के, आकर कटायेगा वही ॥॥

गर्भ में माता के जो रक्षक, बना था हर घड़ी ।

जागता जीता पुरुष, अब भी बचायेगा वही ॥॥

सोच क्यों करता है, और इस सोच से क्या लाभ है।

तेरी करनी लाभ को, कारन बनायेगा वही ॥॥

ध्यान कर सुमिरन भजन कर, मन में उसकी आस कर ।

होके परगट भीतर और बाहर चितायेगा वही ॥॥

तन में तेरे मन में तेरे, तेरे सांसों सांस है।

रह के अपना रूप भी, तुझको दिखायेगा वही ॥॥

घट में है वह पट में है, संसार के खटपट में है।

तुझको क्यों चिंता है, खटपट को मिटायेगा वही ॥॥

राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।

नाम की धुन राग अनहद में, सुनायेगा वही ॥॥

जब गुरु रक्षक हुआ मेरा, तो भय किस बात का ।।

ध्यान क्यों करने लगी, संसार के उत्पात का ॥॥

जागती हूँ मैं तो पाती हूँ, गुरु को साथ में ।

सोई पहरेदार वह, रहता है मेरा रात का ॥॥

चलते फिरते काम करते, नाम उसका लेती हूँ।

डर नहीं अब करती हूँ, माया की यम की घात का ॥॥

एक रस जीवन है, संशय से नहीं अब काम कुछ ।

दिन हो चाहे गरमी का, जाड़े का और बरसात का ॥॥

सोने से पहले सदा, भजती हूँ राधास्वामी नाम ।

जागने पर राग सुख से, गाती हूँ परभात का ॥॥

जनम नर का पाके, सत जीवन का भागी बन के रह ।।

भोग ज्ञान आनन्द को, और तू न त्यागी बन के रह ॥॥

बैल गदहा कुत्ता बंदर, बनने की इच्छा को छोड़ ।

इच्छा माया फाँस है, इसमें विरागी बन के रह ॥॥

भक्त बन हो ज्ञानी ध्यानी, और विवेकी पारखी ।

कौन कहता है तुझे, जग में अभागी बनके रह ॥॥

करके सतसंगत गुरु की, रूप अपनी जान ले ।

सच्चिदानन्दम् अखंडम् , तू न साँगी बनके रह ॥॥

राधास्वामी की दया से, तू तो है सबसे बड़ा ।

शब्द का अभ्यास कर, और शब्द रागी बनके रह ।।।।

जाके गुरु के पास बैठो, और बचन उनके सुनो।

जो सुनो उसको विचारो, जो बिचारो वह गुनो ॥॥

सुन लो गुनके नित करो, बचनों को उनके तुम अहार ।।

तुष्ट होकर साधना से, करलो सब साक्षात्कार ॥॥

गुरु की संगत बिन नहीं, अधिकार होता ज्ञान का ।

जब तलक संगत न हो, मिटता नहीं मद मान का ॥॥

मान मद अभिमान मन मत, के सभी समझो विकार ।

मानी अभिमानी को कब, सूझे कभी सार और असार ॥॥

राधास्वामी योग सीखो, जो सहज है और सुगम ।

जीतेजी पाजाओ मुक्ति, और बनालो निज जनम ॥॥

जिसकी तुझको खोज है, परगट वह तेरे मन में है।

भर्मा भूला भटका क्यों, दिन रात घर और बन में है ॥॥

इन्द्रियों में है वही, बुद्धि में चित अहंकार में।

मास में है प्रान में, नस नाड़ी में और तन में है ॥॥

खोल कर कहता नहीं, कोई कभी इस बात को ।

अपने आये को समझ, वह तेरे आपापन में है ॥॥

तू कहाँ और किसमें करता है, भजन किसके लिये ।।

सोच इसको मन में वह, अन्तर तेरे पल छिन में है ॥॥

राधास्वामी धाम घट में, घट में राधास्वामी नाम ।

सुरत में वह शब्द में वह, और वही साधन में है ॥॥

जब तुम्हें चिन्ता सतावे, गुरु का तुमको ध्यान हो ।

मिट रहे अज्ञान पल छिन, में जो सच्चा ज्ञान हो ।।।।

दुख में संकट में बिपत में, सोच में चिन्ता में भी ।

नाम की सुमिरन सदा हो, नाम का अनुमान हो ॥॥

सोते उठते बैठते, और खाते पीते जागते ।।

गुरु को अपने पास समझो, परचे का परमान हो ॥॥

कौनसी आपत है जो, टाले नहीं टलती कभी ।।

नाम है हथियार जानो, तुम नहीं अनजान हो ॥॥

राधास्वामी की दया से, जब शरण तुझको मिली ।।

कुछ दिनों अभ्यास पीछे, जीते जी निरवान हो ॥॥

दीन हीन शरन में आया, कीजे आप सहाय ।

काल का भय सहज मेटो, अपने चरन लगाय ॥

सिंधु भव अति अगम दुस्तर, सूझे वार न पार ।

हो दया की दृष्टि साई, नाव है मंझधार ।।

पतित पावन तरन तारन, यह तुम्हारा नाम ।

बाल बिनती सुनो चित से, मन को दो विश्राम ।।

ज्ञान नहीं निरवान नहीं, अनुमान से नहीं काम ।।

शब्द को दे आसरा प्रभु, बख्श दीजे नाम ।।

नाम दान प्रदान कीजे, नाम रतन महान |

राधास्वामी दया सागर, कीजिये कल्यान ।।

राधास्वामी सतगुरु, करतार संकट काट दे।

छीन ले सब सम्पदा, भक्ति का मुझको ठाठ दे ।

ध्यान में गुरु मूरती को, ध्यान देकर ध्यान दो ।

ध्यान की जड़ समझो सुमिरन, इसको तन और प्राण दो ॥॥

जब भजन हो मेट दो, संकल्प की बातों को सब ।।

शब्द का श्रवण करो, और पुतलियों को तान दो ॥॥

मन की दुविधा छोड़कर, दृष्टि जमाओ रूप पर ।।

मूरती को तीसरे तिल में, सदा स्थान दो ॥॥

ध्यान और सुमिरन भजन से, लव लगाओ रात दिन ।

जो सुनो अन्तर में उसकी, ओर चित के कान दो ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।

साधना सतसंग करने वालों को सन्मान दो ॥॥

नेति नेति “एति एति में, पड़े अनजान सच ।।

उनकी युक्ति सब है मिथ्या, और मिथ्या ज्ञान सच ।।।।

बातों से यह सिद्ध करना चाहते हैं रूप को ।।

जब न हो अनुभव तो निष्फल, उनका है अनुमान सब ।।।।

मैं नहीं जाता वहाँ, बानी की गम उसमें नहीं ।

बुद्धि से सुलझायेंगे क्या, गुत्थी बुद्धिमान सब ।।।।

तत्व सब का एक है, इसमें नहीं संशय कोई ।।

बातों को फैला बतंगड़, भर्म है अज्ञान सब ।।।।

काग विष्टा जगको कहना, और गिरना मुंह के बल ।।

है दशा यह कैसी सोचे, जगके विद्यावान सब ।।।।

जाके सतसंग में गुरु के, हमने पाया भेद को ।।

भेदवादी हम नहीं, अब छुट गया अभिमान सब ।।।।

गधास्वामी नाम लो, साधन करो कुछ शब्द का ।

पाओगे गुरु की दया से, रूप का तब ज्ञान सब ।।।।

पद कमल में सिर झुके नित, दोनों कर को जोड़कर ।।

आपही का हो रहूँ, मन मोड़ तोड़ मरोड़ कर ॥॥

कठिन माया जाल है, और कठिन काल कराल है ।।

कठिन जग जंजाल है, दुख पाया नाता जोड़कर ॥॥

शान्ती जाती रही, और भ्रान्ती चित में बसी ।।

आप पर दृषि गई, आया शरण सब छोड़कर ॥॥

– ।। दूँ दू मुझको अपने मन में, मैं तो तेरे पास हूँ।

मैं न कासी हूँ न मथुरा, मैं न गिर कैलास हूँ ॥॥

तू हुआ मेरा तो मैं भी, देख तेरा बन गया ।

कर भरोसा तेरा मैं ही, तेरी सच्ची आस हूँ ॥॥

तेरे भीतर मेरी बैठक, आँख से ले देख अब ।।

मैं नहीं पृथ्वी की मूरत, मैं नहीं आकास हूँ ॥॥

किस भरम में है पड़ा, निर्धान्त चित से शान्त हो ।

आप मैं हूँ योग युक्ति, आप शब्द अभ्यास हूँ ॥॥

राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।

सुख ले और आनन्द ले मुझसे, मैं ही सुख रास हूँ ॥॥

पाके सुमती दुर्मती में, भूल में क्यों आ गया ।।

छोड़कर आनन्द सुख, दुख सूल में क्यों आ गया ॥॥

तू था नर के रूप, नारायण का सच्चा मित्र था ।

हाय माया और ,भरम के, भूल में क्यों आ गया ॥॥

जो चमकता रहता है, राजाओं के क्रीट और मुकट में ।

अब वही अनमोल हीरा, धूल में क्यों आ गया ॥॥

गिर गया निज पद से, कारन का पता पाया नहीं ।

सूक्ष्म होकर मुंह के बल, स्थूल में क्यों आ गया ॥॥

अब संभल जा यह संभलने, का है अवसर जान लें ।

राधास्वामी को सुमिर, प्रतिकूल में क्यों आ गया ॥॥

प्रेमी और प्रीतम नहीं दो, एक हैं वह एक हैं।

कौन कह सकता है दो, उनमें नहीं तू है न मैं ॥॥

तन को मनको धन को अरपा, अपने प्रीतम के लिये ।

आप मरकर सच्चे प्रेमी, प्रेम का जीवन जिये ॥॥

मैं जो कहता है, अहंकारी विकारी वह हुआ ।

तू जो कहता है, भरम के बस अनारी वह हुआ ॥॥

तोड़ दे मैं तू को बन्धन, मुक्त हो और शुद्ध हो ।

रूप को समझेगा तब तू, ज्ञान पाकर बुद्ध हो ॥॥

राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।।

प्रेम में जो लय हुये हैं, क्या सुनायें कह तुम्हें ॥॥

प्रेम दुख संकट नहीं है, प्रेम के मारग में आ ।।

प्रेम का रस्ता सुगम है, प्रेम को ले आसरा ॥॥

प्रेम सुख आनन्द है, और प्रेम में है शान्ती ।

यह समझले अपने मनमें अपने, यह नहीं दुख आपदा ॥॥

सोना अग्नी में पड़ा, उसको सुहागा जब मिला ।

चमका दमका मैला सोना, तप से फिर कुन्दन बना ।।।।

सोच अपने मन में, प्रेम और प्रीति के व्यौहार को ।

प्रेम में परतीत में, भक्ति में दे मन को लगा ॥॥

प्रेम का प्याला पिया, जिसने वही मतवालो है।

राधास्वामी प्रेम मत है, समझा जो ज्ञानी हुआ ।।।।

ब्रह्म में माया है, यह उससे अलग होती नहीं ।

चांद और सूरज से न्यारी, दोनों की जोती नहीं ॥॥

जागता है ब्रह्म तब, माया है उसकी जानती ।

भिन्न होकर ब्रह्म से, माया कभी सोती नहीं ॥॥

बल सदा बलवान में, और शक्ति शक्तिमान में ।

शिव से शक्ति न्यारी होकर, हँसती और रोती नहीं ॥॥

सत में जो सत्ता है दह, सत्ता नहीं सत से पृथक ।

सत की सत्ता साथ है, और साथ से खौती नहीं ॥॥

राधास्वामी संग में, आई समझ अब रूप की ।

भिन्न सागर से कभी, मूंगा नहीं मोती नहीं ।।।।

भाग सोया जाग उठा हैं, गुरु की किरपा होगई ।

काल का भय अब नहीं, जब उसकी रक्षा होगई ॥॥

नाम पाया भक्ति का धन, पाया मन में हूँ सुखी ।

सुख मिला संकट कटा, अब छाया माया होगई ॥॥

ध्यान और सुमिरन भजन, करने जो बैठा शान्त हो ।

शब्द परगट होगया, जोती की बरषा होगई ॥॥

बर मिले भक्ति का बल का, दान दो शक्ति मिले ।

मेरे सिर पर आपके, चरनों की छाया होगई ।।।।

धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।

इस अधम पर आपकी, अब सच्ची दाया होगई ।।।।

मौज के आधीन जब, मन कर्म और बानी हुई।

भव का दुख संकट भिटा, जीते जी निबनी हुई ॥॥

तिल को तिलपट में उलटकर गुरु का दर्शन कर लिया ।

पाया गुरु का ज्ञान गुरुमत, पाके गुरु ज्ञानी हुई ॥॥

थिर नहीं संसार, थिरताई कहां माया में है।

सुरत को आई समझ, तब आप विज्ञानी हुई ॥॥

वह है राजा इस जगह, जिसको मिला है नाम धन ।।

भक्ति शक्ति योग युक्ति, पाई वह रानी हुई ।।।।

तन में रहकर राधास्वामी, नाम ले घट में सखी ।।

तब कहूँगा राधास्वामी, धाम स्थानी हुई ॥॥

मन में आशा गुरु की रखकर, काम में लग जाओ तुम ।

पूछना गछना है क्या, सत नाम में लग जाओ तुम ॥॥

यह समय अनमोल है, विरथा नहीं खोना कभी ।

काम में लग जाओ तुम, और नाम में लग जाओ तुम ॥॥

साधं कर चित को करो, व्यौहार परमारथ के साथ ।।

मैं नहीं कहता कि धन और, दाम में लग जाओ तुम ॥॥

मौज पर निश्चत रहो, निश्चल रहो निष्काम बन ।।

धर्म अर्थ और मोक्ष में, और काम में लग जाओ तुम ॥॥

घट में सब कुछ है तुम्हारे, घट घट का रूप है।

अपने घट में राधास्वामी, धाम में लग जाओ तुम ॥॥

मेरे बाबा इस जनम का, काम पूरा होगया ।।

दुख का बर्वत करले निश्चय, चूर चूरा होगया ॥॥

प्रेम में शक्ति है बल है, प्रेम में है बीरता ।

इस बुढ़ापे में तू , रण की सच्चा सूरा होगया ॥॥

नाम पाया नाम में, विश्राम पाया जीते जी ।।

शब्द की धुन घट में प्रगटी, तन तमूरा होगया ॥॥

फाँसने को तेरे, आडम्बर रचा था काल ने ।

नाम की बिजली जो भड़की, जल के धूरा होगया ॥॥

राधास्वामी की दया से, तूने पाई है विजय ।

अब नहीं चिंता रही, अमृत धतूरा होगया ।।।।

मन मगन मेरा है सुख का, चैन का भागी हुआ ।

गुरु की किरपा होगई, गुरु पद का अनुरागी हुआ ॥॥

भाग क्या अपना सराहूँ, बालपन में गुरु मिले ।।

गाके स्तुति और भजन, भक्ति के मैं रागी हुआ ॥॥

राधास्वामी मैं हूँ बालक, बाल विनती सुनके अब ।।

दीजिये अपनी शरण, तब समझे बड़भागी हुआ ॥॥

बेकार न समय व्यतीत करो, नहीं समय मिला है गंवाने को ।

तुम जग में आये औरों का, और अपना काम बनाने को ॥॥

कथनी बदनी से लाभ नहीं, करनी से चित को लगा रखना ।।

करनी में सुख आनन्द रहते, कथनी है मन बहलाने को ॥॥

कथनी के सूरे बहुत मिले, करनी से उनको काम नहीं ।।

उनका जीवन है बातों को, यह जन्मे बात बनाने को ॥॥

पुस्तक पोथी के ज्ञानी हैं, और झूठे ज्ञान के मानी हैं।

अनुभव नहीं नहीं रहनी बदलो, भरमे आये भरमाने को ॥॥

जग को यह मिथ्या कहते हैं, जग की आशा में रहते हैं ।

बातों से रूप को सिद्ध किया, पहुँचे नहीं ठौर ठिकाने को ।।।।

कथनी तज करनी करो भाई, करनी से बना रहनी अपनी ।

करनी से रहनी पाओगे, करनी है रहनी पाने को ॥॥

राधास्वामी यू कहते हैं, करनी से मिलती है रहनी ।।

अभ्यास शब्द का नित करना, चित वृती के ठहराने को ।।।।

जब गुरु की दया की आस नहीं, तुझ में भक्ति विश्वास नहीं ।

जिसने परचे पाया गुरु का, वह आस से कभी निरास नहीं ॥॥

गुरु तेरे पितु और माता हैं, गुरु करता धरता विधाता हैं।

गुरु सम्बन्धी और भ्राता हैं, क्या पल छिन तेरे पास नहीं ॥।।

घट तेरे गुरु का धाम बना, घट सुमिरन आठों जाम बना ।

गुरु नाम से निज विसराम बना, गुरु काशी नहीं कैलाश नहीं ॥॥

भज नाम गुरु का नित प्रतिछन, कर गुरु का सुमिरन रात और दिन ।

ले जग जस कीरति को गिन गिन, गुरु तुझमें भूमि आकाश नहीं ।।।।

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।

राधास्वामी राधास्वामी, जो नहीं भजता है दास नहीं ॥॥

नहीं आपसे आये हम प्यारे, और आपसे हम जाते भी नहीं ।

है सत चित आनन्द रूप हमारा, धोके में आते भी नहीं ॥॥

गुन कर्म स्वभाव ज्ञान सारे, रहते हैं अपने सहारे सव ।

हम यह नहीं यह हमसे हैं अलग, यह हमें छोड़ जाते भी नहीं ॥॥

यह कर्म ज्ञान आनन्द हमारे, भोग हैं भोग से क्यों डर हो ।

जब रूप को अपने जोन लिया, धोका भव का खाते भी नहीं ॥॥

की साध की संगत हित चित से, तब रूप की अपने समझ आई।

इस रूप में स्थिरताई है, चिन्ता चित में लाते भी नहीं ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।

इस राग को छोड़ राग दूसरा, भूल के हम गाते भी नहीं ।।।।

जो आते हैं वह जाते हैं, जो गये लौट नहीं आते हैं।

मैं किससे पूजू पथिक राह में, केसे सुख दुख पाते हैं ॥।।

अब आये हाथ न था कुछ भी, जब गये तो हाथ नहीं कुछ था ।

क्यों जाते समय है दुख इनको, कारन नहीं कोई बताते हैं ॥॥

मान लोभ में भूल गये, और भरम हिंडोले झूल गये ।

अह कार से फूल गये, और अन्त काल पछताते हैं ॥॥

जो आये हैं बह जायेंगे, जो भिले बिछुड़ना है उनको ।

जो समझ गये वह भूल के भी, चिन्ता नहीं मन में लाते हैं ।।।।

संसार नहीं स्थिर भाई, है इसमें नहीं स्थिरताई ।।

ज्ञानीं इस दशा को समझ गये, इसमें नहीं चित को लगाते हैं ॥॥

जो करना धरना है तुम को, वह करो और अपनी राह लगो ।

डरते हो काल से माया से, यह जीव को फाँस हँसाते हैं ॥॥

यह जान लो कोई नहीं अपना, संसार रैन का सपना है ।

सोचो विवेक से निज मन में, भूठे सब रिस्ते नाते हैं ॥॥

दिन ढला रात की बारी है, कर सोने की अब तय्यारी ।

आयु गई नाम जो लेते हैं, भव सागर से तर जाते हैं ।।।।

सत संगत में सतगुरु के जा, कुछ दिनों शब्द का साधन कर ।

राधास्वामी की कृपा से, सेवक नहीं धोखा खाते हैं ॥॥

पृथ्वी मंडल को छोड़ दिया, भक्ति बलले आकास चढ़ा ।

जब ब्रह्मरेन्द्र पर चढ़ आया, फिर सिखर मेरु कैलास चढ़ा ॥॥

माया ममता घट से भागी, सोई हुई सुरत जागी ।

मिट गयी अंधेरा अविद्या का, फिर विद्या के प्रकाश चढ़ा ।।।।

चढ़ने चलने की तय्यारी की, सतगुरु ने मेरी रखवारी की ।

दृढ़ता से उदान का आसरा ले, घट गगन में सांसों सांस चढ़ा ॥॥

सुन्न महासुन के पार गया, फिर भवर की खिड़की जाके घुसा ।।

सतपद में सतगुरु का दर्शन, ले मन में सच्ची आस चढ़ा ।।।।

लख अलख अगम की गम पाई, ली राधास्वामी की शरनाई ।।

ऊचा शब्द का डोर पकड़े, राधास्वामी का दास चढ़ा ।।॥

आसा इस भव के कारागार में, सचमुच जम की फाँसी है ।।

आसा का बन्धन काटे वह, गुरुमुख है गुरु विश्वासी है ॥॥

आसा वाले को चैन कहाँ, आसा के साथ है त्रास धनी ।

मंगल आनन्द का भागी वह, संसार से जिसको उदासी है ॥॥

जैसी आसा वैसी बासी, जब लग आसा तब लग बासा ।।

जो आसा का बन्धन काटे, सत मत का वह अभ्यासी है ॥॥

आसा है जन्म मरन प्यारे, आसा तज दे फिर मुक्ति है।

आसा को सोच विचार ले तू, जड़ चेतन ग्रन्थि की गांसी है ॥॥

आसा में दुविधा दुचिताई, असा में भय लज्जा रहते ।।

यह तीनों पाप अवस्था हैं, तज इनको फिर सुखरासी है ।।॥

आसा त्रिगुण की खानी है, यह सत रज तम की है रस्सी ।।

रजे ब्रह्मा सत है विष्णु बली, तम शिव शम्भू केलाशी है ॥॥

आशा है काम क्रोध लालच, असा मद मोह द्वेष की जड़।

क्यों आस में पड़ के निराश हुआ, तेरा रूप अजर अविनाशी है ॥॥

सतसंगत में सतगुरु के जा, सुन हित चित से गुरु की बानी ।।

बानी सुन सुन निर्बानी हो, गुरु बानी सर्व प्रकाशी है ॥॥

राधास्वामी ने समझाया, घट ही में है तेरे सब कुछ।

घट में धंस आप अपना परख, जल में क्यों मीन पियासी है ॥॥

अद्वैत द्वैत के फेर पड़ा, अभिमानी एक का दो का है।

मैं सच सच तुझसे कहता हूँ, यह भूल भरभ और धोका है ॥॥

नहीं एक न दो नहीं तीन चार, नहीं सौ पचास नहीं सहस्रार ।

तू जैसा चाहे माना कर, इस मान से किसने रोका है ॥॥

जैसा है तैसा समझ उसे, नहीं वह ऐसा नहीं वह वैसा ।

नहीं एति न नेति न सत न असत,न असोक सोक नहीं सोका है ॥॥

बातों के फेर पड़े ज्ञानी, अभिमानी मानी गमानी बने ।

ह ज्ञान नहीं अज्ञान नहीं, नहीं बन्द न खुला झरोका है ।।।।

ना कुछ दिन कर संगत गुरु की, तब सार तत्व को जानेगा ।

किसने उसे जाना बूझा है, और जान बूझकर ठोका है ॥॥

सब कुछ है और कुछ भी नहीं, लव अलख अगम गम है दोनों ।।

वह वार न पार न आदि अंत, नहीं सिरा है और न नूका है ॥॥

राधास्वामी की शरन में आ, तब अनुभव से कुछ जानेगा ।

वह रुद्र वसु आदित्य नहीं, नहीं नीर पवन का झोंका है ॥॥

भवसागर अगम अथाह से पार, करा दिया सतगुरु दाता ने ।

मुभु दीन अधीन को ठौर ठिकाने, लगा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥

संसार महा दुखदाई था, नहीं अपना कोई सहाई था ।

निज दया से मेरा बिगड़ा काम, बना दिया सतगुरु दाता ने ॥॥

मन चंचल था अज्ञानी था, अभिमानी मानी गुमानी था ।

सुरत शब्द योग विधि से निश्चल, करवा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥

घट अघट का भेद दिया मुझको, चरणों में अपने लिया मुझको ।

सतसग के अमृत बचन सुना, के चिता दिया सतगुरु दाता ने ॥॥

मैं अब चरणों की बनी दासी, सुख पाकर हो गई सुखरासी ।

राधास्वामी धाम का देके पता, पहुँचा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥

किस मुख से तेरी महिमा गाऊँ, तू सत्त पुरुष अविनासी है ।

चेतन घन अमल विमल निर्मल, सत सदन परम सुखरासी है ॥॥

कोई अगन कहे कोई सगुन कहे, कोई निराकार साकार कहे ।।

तू सब कुछ है और कुछ भी नहीं, धुरपद धुरधाम निवासी है ॥॥

नहीं मन ने थाह कभी पाई, नहीं बुद्धि में आई चतुराई ।

चित चिंतन कैसे करे तेरा, तू द्वैत अद्वेत प्रकाशी है ॥॥

मन बना बिह गम मीन मकर, मरकट बनकर कूदा अन्दर ।

चींटी की चाल चला घट में, कह उठा तू अगम उदासी है ।।।।

राधास्वामी रूप में प्रकट हुआ, दर्शन देकर कृतार्थ किया ।

निज शब्द से अपना भेद दिया, घट अघट का सत्य निवासी है ॥॥

जीते जी मुक्ति की पदवी को, दिलवा दिया राधास्वामी ने ।

मद मोह मान का महा जाल, कटवा दिया राधास्वामी ने ॥॥

चहकी भरमी भूली भटकी, झिझकी ठिठकी अटकी लटकी ।।

इन संस्कारों की गुत्थी को, सुलझा दिया राधास्वामी ने ॥॥

निज घट का मारग दिखलाया, सत सार शब्द मत दरसाया ।

बाहर मुखता के अवगुण को, छुड़वा दिया राधास्वामी ने ॥॥

जब सहसकमल दल चढ़ आई, शिवनेत्र की ज्योती झलकाई ।।

घंटा और शंख के काजों को, बजवा दिया राधास्वामी ने ॥॥

त्रिकुटी में ऊँ राग गाया, मृदंग की धुन को लखवाया ।

ऋग्वेद की ऋचा की बाणी को, सुनवा दिया राधास्वामी ने ॥॥

एक अक्षर मंत्र का जाप किया, तब शून्य में सहज समाध लिया ।।

अद्भुत निर्मल शशि मस्तक पर, प्रकटा दिया राधास्वामी ने ॥॥

सतगुरु ने मुझको तार दिया, सहजे भवसागर पार किया ।।

पद कमल की शरन दया से दिया, अपनालिया राधास्वामी ने ।।।

किस भर्म में भूला है भाई, जग चिड़िया रैन बसेरा है ।

यहां कोई किसी का कभी नहीं, झूठा सब मेरा तेरा है ॥॥

तू भूल भर्म में भूला है, अज्ञान हिंडोले झूला है।

क्यों मान गुमान में फूला है, ले चेत चेत को बेरा है ॥॥

झूठा रिश्ता और नाता है, कोई किसी के काम न आता है।

जो आता है वह जाता है, यह काल का हेरा फेरा है ॥॥

भत्र दारुण अति दुखदाई है, जीवन में बड़ी कठिनाई है।

जो है वह अंगमापाई है, तू संभल जा अभी सबेरा है ॥॥

भव सागर से तारा गुरु ने, दे प्रेम किया प्यारा गुरु ने ।

राधास्वामी अमृत नाम पिया, माया ने उसे नहीं घेरा है ॥॥

दुखियों दोनों पर दया हुई, भव पार किया गुरु प्यारे ने ।

निर्धन को भक्ति योग युक्ति का, दान दिया गुरु प्यारे ने ॥॥

मद मान ने अति भरमाया था, माया के फाँस फसाया था।

अब घट में जलाया अपनी मेहर से, ज्ञान दिया गुरु प्यारे ने ॥॥

योनी के हिंडोले झूले थे, अपने आपे को भूले थे ।

चित देके चिताया चिताउनी दे, अपना कर लिया गुरु प्यारे ने ॥॥

चौरासी का खटका भिटा सारा, गुरु दया हुई अपरमपारा ।

घट फटगया था दे भक्ति का टांका, अब तो सिया गुरु प्यारे ने ॥॥

सुखमन में ज्योति जली जगमग,सुरत शब्द से प्रगट हुआ घट ग ।

राधास्वामी नाम दे अब तो किया, उत्साह दिया गुरु प्यारे ने ॥॥

गरु दाता दया की दृष्टि करो, जग में नहीं कोई हमारा है।

स्वारथ के सम्बन्धी सब हैं, अब आपका एक सहारा है ॥॥

तन विकल तो मन अति चंचल है,नस नाड़ियों तक में हलचल है।

शान्ति का कोसों पता नहीं, ये काल करम ने मारा है ॥॥

नहीं योग युक्ति का कोई यतन, नहीं ज्ञान ध्यान का है साधन ।।

दुविधा दुचिताई ने घेर लिया, इस घेर का वार न पारा है ॥॥

आपत और विपत का सामना है, क्योंकर इस मन की थामना है।

इस बात का पूरा निश्चय हुआ, दुखदाई महा संसारा है ॥॥

क्या कहूँ कहाँ आऊँ जाऊँ, किस विधि शान्ति की दशा पाऊँ।

मेरे गले पड़ी दुख की फांसी, यह काल बड़ा हत्यारा है ॥॥

सत संगत के नहीं वचन सुने, सुनकर भी नहीं होता है मनन ।

निष्फल जाता है मेरा जनम, मन हारा हारा हारा है ॥॥

अब आपके चरणों में आया, मुझको अपनी दो शरनाई ।

राधास्वामी नाम का दान मिले, यह नाम मुझे अति प्यारा है ॥॥

मैं किस पर गर्व गुमान करू, जग के सब झूठे नाते है।

अपना नहीं कोई भी सम्बन्धी, झूठे सब भाव बताते हैं ॥॥

सुन नर मुनि की यह रीती, स्वारथ वश करते हैं प्रती ।।

जब स्वारथ सिद्ध नहीं होता, तब कोई न आते जाते हैं ॥॥

सब देख लिया सब जान लिया, नहीं संशय एक रही मन में ।

अज्ञान भरम के फन्दे में, भरमे हुए आके फँसाते हैं ॥॥

है भूल भुलैया संसारा, भूला भूलो भूला निसदिन ।

इस भूल में कौन सहाई हो, भूले हुए को और भुलाते हैं ॥॥

कुमती ने मार दिया मन को, सुमती के पन्थ से दूर है वह ।।

दुविधा दुचिता संशय तीनों, सौ सौ सौ नाच नचाते हैं ॥॥

छाया के पीछे दौड़ चुका, माया के पीछे दौड़ चुका है।

दोनों में सार नहीं किंचित, कब किसके हाथ यह आते हैं ।।॥

निज दया करो राधास्वामी, परपंच से मुझको मुक्ति मिले ।

मैं हारा हारा हूँ सब विधि, भव भय अब अधिक डराते हैं ॥॥

क्यों भरम में भूला है प्यारे, इस जगत में सुख विसराम कहां ।।

जो आये हैं वह जायेंगे, रहने का नहीं हैं काम यहां ॥॥

जो गये हैं उनका किसे पता, यह भेद मिला नहीं किसी को भी ।

तुम जानते हो तो बतादो जी, सीता है कहां और राम कहां ।।।।

झूठे हैं नाम निशां झूठे, जग झूठा सब कुछ झूठे हैं।

इम झूठ के गोरखधन्धे में, सत सार का सच्चा नाम कहां ॥॥

झठा सब सेर तमाशा है, झूठा आनन्द हुलासा है ।।

जग जल के बीच बतासा है, गल गया तो धूम और धाम कहां ॥॥

ले नाम गुरु का तू भाई, संसार है। यह अगमापाई ।

राधास्वामी की ले शरनाई, क्यों भटका आठों याम यहाँ ॥॥

दुखदाई जगत में आन फँसा, भव सागर नाव न बेरा है।

मंझधार में टूटी नाव पड़ी, सब दायें बायें अँधेरा है ॥॥

साथी संगी सोने वाले, अति घोर नींद में मतवाले ।

है भंवर का खटका आठ पहर, दुख आपत विपति ने घेरा है ॥॥

चित चैन न मन को शान्ती है, व्यापी आलस और भ्रान्ती है।

खेवट भी पास नहीं कोई, लहरों को हेरा फेरा है ॥॥

नभ मंडल काली घटा छाई, बादल बरसे रिम झिम आई ।

क्या करू उपाय नहीं सूझे, मन में अब त्रास घनेरा है ॥॥

राधास्वामी दया की दृष्टि करो, यह संकट आपति बिपत हरो ।।

अब आस तुम्हारी है केवल, हो मेहर मेहर का बेरा है ॥॥

तू घट का मेरे बासी बने, तेरा ही मन में ध्यान रहे ।।

तेरा ही सुमिरन भजन हो नित, तेरा ही नित अनुमान रहे ॥॥

तू कौन है क्या है क्योंकर है, इसकी नहीं मुझे समझ आई ।

आँखों को मिले दर्शन तेरा, बस यही बात परमान रहे ॥॥

अव्यापक सर्वव्यापक है, गुन अगुन सगुन सब कुछ भी है।

इन से नहीं काम मुझे किंचित, तेरा मन में अस्थान रहे ॥॥

सामान्य की मुझको चाह नहीं, चेतन विशेष की महिमा है।

चेतन विशेष की लगन लगे, और उसी का निस दिन ध्यान रहे ॥॥

मैं रूप का तेरे दरस करू, पद कमल का कर से स्पर्श करू ।।

सुख मंगल हर्ष हुलास लहूं, तेरे शब्द की ओर में कान रहे ॥।।

तू जैसा है मैं वैसा बनू, भृङ्गी और कीट की देख दशा ।।

मेरा भाव अभाव स्वभाव सभी, तेरी निज लीला के समान रहे ॥॥

रसना से कहूं राधास्वामी, कानों से सुनू राधास्वामी ।

हृदय से भजू राधास्वामी, यह नाम जान और प्रान रहे ॥॥

हम दीन अधीन दुखी जीवों को, चिता दिया सतगुरु स्वामी ने ।

भव सिंध में डूबने वाले को, तैरा दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।

मद मोह माया के मारे थे, दुख आपति से दुखियारे थे ।

कर दया दृटि छुटकारा इन से, दिला दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।

अज्ञान ने भरमाया था हमें, और करम ने बहकाया था हमें ।।

सत संगत के बचन से भरम, मिटा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

पहले नहीं गुरु गम को जाना, जब आँख खुली तब पहचाना ।

निज रूप का दर्शन अपने घट में, करा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

तज पिंड को पहुँचा ब्रह्मांडा, आगे बढ़ आया सच खंडा ।।

सतधाम से सत का विमल स्वरूप,दिखा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

लख अलख अगम की गम पाई, ली राधास्वामी पद की शरनाई ।।

धुर धाम संत विसराम लोक, पहुँचा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।

राधास्वामी के नाम का मरम, जता दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।

तू सत है सत की दे सत्ता, सत की सत्ता से काम बने ।

तू चित है चित का चिंतन दे, लय चिंतन से विश्राम बने ॥॥

तू शान्ति है दे शांति को, हिया जिया में कुछ शान्ति मिले ।।

दुख चिंता से छुटकारा मिले, जोवन मेरा निष्काम बने ॥॥

तू अर्थ है अर्थ मिले मुझको, तू धर्म है धर्म मिले मुझको ।।

तू मुक्त है मुझको मुक्ति दे, सेवक का पूरन काम बने ।।।।

दे नाम हुआ नामी जब तू , दे रूप रूप जब धारा है।

जो नाम रूप नहीं कोई तेरा, तो यह भी अरूप अनाम बने ॥॥

राधास्वामी तू कहलाया, राधास्वामी पद दरसाया ।

इस नाम का सुमिरन छिन पल हो, यह सुमिरन आठों याम बने ॥॥

[ राधास्वामी मत वह क्या समझे, जो निगुरा और अज्ञानी है।

सत तत्व सार वह क्या जाने, गुरुमत नहीं नहीं गुरु ज्ञानी है ॥॥

कोई लोक लाज में अटका है, कोई रीति रसम में लटका है ।।

अज्ञान से उसने पकड़ी है, जो लोक में लीक पुरानी है ॥॥

बे ठौर ठिकाने की भक्ति, क्या देनी उसे सिद्धि शक्ति ।।

नहीं सूझी योग यतन युक्ति, निष्फल सब मानी गुमानी है ॥॥

नहीं नाम की महिमा को जाना, नहीं नामी पद को पहिचाना ।

तोते की रटन से अटकाना, सब भूल भरम भरमानी है ॥॥

जप तप में आयु गई सारी, रहा संसारी का संसारी ।।

अपना भी नहीं वह हितकारी, यह लाभ नहीं है हानी हैं ॥॥

नीचे नहीं नाम कोई पावे, ऊचे चढ़ चौथा पद पावे ।।

तब नाम राग की धुन गावे, वह पृथ्वी नहीं असमानी हैं ॥॥

नर देह की गति मति को जानो, जो कहता हूँ उसको पहचानो।

निज अनुभव से अपने मानो, नहीं भर्म के फाँस हँसाना है ॥॥

हैं कर्म इन्द्री नीचे भाई, ऊचे ज्ञान इन्द्री जगा पाई ।।

मन बुद्धि से जब ऊँचे जाई, इस विधि तुमको समझाना है ।।।।

तीनों से ऊँचे सुरत रहे, ऊँचे चढ़ कर वह शब्द गहे ।

इस शब्द में नाम का रूप लहे, यह नाम महा सुखदानी हैं ॥॥

नीचे कहाँ नाम का है बासा, चौथे पद बांध उसकी आशा ।

त्रिलोक में काल का हैं फाँसा, यह मर्म तुझे जतलानी हैं ।।॥

कर शब्द सुरत का तू साधन, तब हाथ आयेगा नाम रतन ।

राधास्वामी योग का सीख जतन, जो यह नहिं भर्म कहानी है ॥॥

मन में जब रम गई छबि सतगुरु की, योग युक्ति से ध्यान बना।

नर जनम सुफल भयो सहज रीति से,चित आनन्द की खान बना ॥॥

घट प्रकट विवेक की गति उमगी, साधन सम्पन्न हुआ जीवन ।।

इस साधन के प्रताप महातम से, अनुभव और ज्ञान बना ॥॥

बन में जाकर क्या लेता था, क्या लाभ था धूल उड़ाने में ।

मेरी दृष्टि में घर परबत और वन, सब ही एक समान बना ।।।।

रवि चन्द्र की कला प्रभा प्रकटी, जगमग जगमग हुई उजियारी ।।

उस ज्योति की ज्योति में रूपलखा, यू मेरा आत्मज्ञान बना ॥॥

नहीं काल कर्म व्यापे मुझको, नहीं चिन्ता दुविधा का भय हैं।

सुध बुध भूली है तन मन की, ममता तज गुरु अभिमान बना ॥॥

ब्यौहार में परमारथ आया, दोनों में भेद नहीं किंचित ।।

समदृष्टि समज्ञानी हो, समता से अब कल्यान बना ॥॥

राधास्वामी की है दया भारी, तारा तारा तारा मुझको ।।

भवसागर पार हुआ जीते जी, सत पद में अस्थान बना ॥॥

चेला नहीं एक मिला कोई, जो मिला वही गुरु ज्ञानी मिला ।

जोगी न मिला जंगम न मिला,तपसी न मिला नहीं ध्यानी मिला ॥॥

गुरु कपटी चेला पाखंडी, कोई नियमी धर्मी त्रिदंडी ।।

विश्वास के रूप में बनखंडी, अभिमानी मानी गुमानी मिला ॥॥

सिख साखा बहु किया करता है, क्यों मोह माया में मरता है ।।

दुख भार स स पर धरता है, अमृत तज तुझको पानी मिला ॥॥

ले चेत चेत चेत का बेरा है, तू चेत ले अभी सवेरा है।।

आगे फिर घोर अंधेरा है, नहीं चेती तो लाज लजानी मिला ॥॥

सतगुरु ने तेरी भलाई की, पद कमल की शरण दया से दी ।।

गुन राधास्वामी के गाओ, तब कहूँगा ठौर ठिकाना मिला ॥॥

गुरुभक्ति के पंथ में दया से मुझको, लगा दिया सतगुरु प्यारे ने ।

मेरी पकड़ के बांह को प्रेमनगर, पहुँचा दिया सतगरु प्यारे ने ॥॥

तीरथ देखे मूरत देखे, इन से क्या सार हाथ आता ।।

सतसंग में सारे तत्व का मरम, जता दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥

बाहर मुरवता के जाल फैसा, तरपा तरसा बेचैन हुआ ।

अन्तर साधन की विधि सिखलाके, चिता दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥

मैं कौन हूँ क्या हूँ कैसा हूँ, यह बात न समझा था अब तक।

घट की गुत्थी उलझी थी बहुत, सुलझा दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥

शबरी को राम ने तारा था, मीरा को श्याम ने तारा था ।

मैं तो राधास्वामी के चरण पड़ा, तरवा दिया सतगुरु प्यारे ने ।।।।

वह बच गया इस भवसागर से, सतगुरु ने जिसको तार दिया।

जिसे गुरु की संगत नहीं मिली, उसे काल करम ने मार दिया ।।।।

हुआ भाग उदय मेरा सजनी, मैं आ गया सतगुरु की शरनी ।।

संतसंग के बचन अमोल सुना कर, तत्व के सार का सार दिया ॥॥

माया का जाल बहुत भारी, जो फँस गया हो रहा संसारी ।

शुभ अशुभ करम के बदले में, यमराज ने कारागार दिया ।।।।

त्रयताप महा है दुखदाई, मुक्ति मिलनी है कठिनाई ।।

जो भरमा भूला जग में उसके सर पर दुख का भार दिया ॥॥

राधास्वामी परम संत आये, निज दया से मुझको अपनाये ।

हिये में था दबी प्रेम अग्नि, कृपा से उसे उद्गार दिया ।।।।

तुम व्यापक चर और अचर में हो, किस जगह हैं दृने जाऊँ मैं।

सब नाम और रूप तुम्हारे हैं, किस नाम रूप को ध्याऊँ मैं ॥॥

तुम शब्द स्पर्श रूप में हो, तुम रस में हो तुम गंध में हो ।

तुम देश में काल में वस्तु में हो, तुमको क्या कहकर गाऊँ मैं ॥॥

यह जीव जन्तु सत्ता हैं तुम्हारे, लोक परलोक सभी तुम हो ।

फिर किसको मन से छोड़े, मैं, और किसको मन से पाऊँ मैं ॥॥

अज्ञान में हो तुम ज्ञान में हो, विद्या में अविद्या में भी हो ।

किसको मैं मुंह से बुरा कहूँ, और अच्छा किसको बताऊँ मैं ॥॥

कहने वाले में रहते हो, सुनने वाले में बसते हो ।

किससे मैं तुम्हारी दू’ उपमा, किस किस का भेद सुनाऊँ मैं ।।।।

आकाश पवन अग्नि जल पृथ्वी, रूप तुम्हारे हैं स्वामी ।

स्वामी में सेवक में तुम हो, किस विधि से तुम्हें मनाऊँ मैं ।।।।

राधास्वामी का रूप लखा, चेतन विशेष का दरस मिला ।।

सामान्य को तज कर इस विशेष से, सच्चा नेह लगाऊँ मैं ।।।।

तू जान अजान से न्यारा है, तू जान नहीं अनजान नहीं ।

किसने तुझे जाना पहचाना, तू ज्ञान नहीं अनुमान नहीं ॥॥

इस बानी ने नहीं गम पाई, नहीं बुद्धि में आई चतुराई ।।

मन अमन बना घबराया हुआ, तू मान नहीं अभिमान नहीं ॥॥

अनजान को क्या कोई जानेगा, अदृष्ट को क्या पहचानेगा ।

जोगी ज्ञानी थक कर बैठे, उन्हें जान नहीं पहचान नहीं ॥॥

सच कहने को तो कहते हैं, कहकर संशय में रहते हैं।

इन कहने सुनने वालों में, अनुमान नहीं परमान नहीं ।।।।

कहाँ जाकर कोई तुझे पावे, कैसे तू किसी के हाथ आवे ।।

तर निश्चित कोई इस जग में है, ठिकान नहीं अस्थान नहीं ।।।।

स्वर्ग न नर्क का वासी तू , नहीं दुखरासी नहीं सुखरासी ।।

गम अगम को मथकर देखा, तू गान नहीं स्वर तान नहीं ।।।।

गाम्मामी सतगुरु आये, सुरत शब्द भेद कहकर गाये ।।

न भी ममाहित तब मेरा, इस समता का उत्थान नहीं ॥॥

भक्ति का तारा घट चमका, घट मेरो शोभा धाम बना ।

मानुष जीवन का फल पाया, हिया जिया का सुख विश्राम बना ॥॥

सत संगत में गुरु के आया, गुरु नाम दान ले हरषाया ।

गई काल करम की ठकुराई, बिगड़ा हुआ सारा काम बना ॥॥

क्रान्ती आई शान्ती आई, और चित में निर्धान्तिी आई ।।

गति नीर कमल की मुझे भाई, निबनी हुआ निष्काम बना ॥॥

गुरु नाम का तार बँधा घट में, नहीं पड़ता जग की खटपट में ।

क्यों अटकू माया की अटसट में, जब सच्चा सहाई नाम बना ॥॥

राधास्वामी ने तारा है, राधास्वामी ने बिगड़ी संचारा है।

पछताता नहीं न लजाता हूँ, सुख जीवन आठों याम बना ॥॥

भक्ति शोभा है जीवन की, भक्ति पाकर मैं संवर गई ।

बिगड़ी बहकी भरमी पहले, अब दया से गुरु के सुधर गई ॥॥

मद मोह लोभ और क्रोध गये, निर्मल मन सहज हुआ मेरा ।।

कोई कुटिल कुचाल कुरूप कहे, मैं तो अब सब विधि निखर गई ॥॥

संसार में रहती हैं सजनी, संसार हुआ अब सुखदाई ।।

माया और मोह का भेद मिटा, मैं इधर से लौट के उधर गई ॥॥

घट के अन्तर बैठक पाई, हुई सहज आप अब कठिनाई ।।

अन्तरै मुख जीवन मुझे भिला, माया की रसरी बिखर गई ।।।।

राधास्वामी ने की है दया भारी, दुख संकट दूर हुये सारे ।।

दुविधा ने संग तजा मेरा, अब सत्त लोक के डगर गई ॥॥

सतगुरु के चरन में आन पड़ी, पद कमल की सच्ची दासी बनी।।

दुख बिपत कलेश कटे मन के, सुख सहज भिला सुखरासी बनी ॥॥

अज्ञान अविद्या दूर हुये, अभिमान मोह मद चूर हुये ।

माया ममता सब दूर हुये, सत चित आनन्द प्रकाशी बनी ॥॥

फस भूल भुलैय्याँ भरमाई, और भरम में आकर घबराई ।

गुरु की संगत हुई सुखदाई, मैं मीन प्रेम जल प्यासी बनी ॥॥

खटका मिटा भरने जीने का, भय नहीं सिर भार के धरने का ।।

अब ध्यान है तारने तरने का, यह समझ गई अधिनासी बनी ॥॥

तारा चमका घट भक्ति का, राधास्वामी योग की युक्ति का ।।

संशय नहीं जीवन मुक्ति का, धुरं पद सत धाम निवासी बनी ॥॥

पीलिया पियाला भक्ति का, मतवाली हुई मस्तानी बनी ।

आनन्द मिला जब सूरत को, हरषानी हुई मगनानी बनी ॥॥

क्या प्रेम की महिमा कहे कोई, मन बानी शक्ति नहीं पाते ।।

बुद्धि, निबुद्वि है बनी चकित, वह असुध तो यह निर्बानी बनी ॥॥

यह प्रेम कठिन है और सुगम, जो अरये सीस सुगम उसको ।

दुविधा दुचिताई की पहुँच नहीं, वह अबल तो यह अज्ञानी बनी ॥॥

घटता नहीं दिन दिन बढ़ता है, है प्रेम में ब्रह्म का रूप सदा ।।

सिद्धि न शक्ति से हाथ लगे, वह भूली तो यह भरमानी बनी ।।।।

राधास्वामी ने ज्ञान दिया, सतगुरु पद का अभिमान दिया ।

माया ममता थककर भागी, वह ठिठकी तो यह घबरानी बनी ॥॥

भक्ति का प्याला मुँह से लगा, सुध तन मन धन की भूल गई ।

आनन्द मिला मतवाली बनी, सुख पाकर हर्ष से फूल गई ॥॥

अग्यों की पुतली का पाट बना, पलकों की चिक को नीचे गिरा।।

या प्यार को प्यार से अंग लगा, अब प्रेम हिंडोले झूल गई ॥॥

प्रेम महा सुखदाई है, यह प्रेम ही सच्चा सहाई है ।

गुरु से लगाई है, उसकी बिपता और सूल गई ।।।।

अपने पिया को मनाती है, वह प्रेम का गाना गाती है ।

हँसती है और मुसकाती है, माया बैरन निर्मूल गई ॥॥

राधास्वामी दया से दर्शन दो, मुझको भक्ति का अब धन दो ।

तब कहेगी वह संसारी चाह, कारन और सूक्ष्म अस्थूल गई ।।।।

डंके की चोट सुनी घट में, मेरी सुरत सखी मतवारी, बनी ।।

रन भूमी में काल कर्म के पग धर, लड़ने की अधिकारी बनी ॥॥

जो धनुष बान से लड़ते हैं, वह सच्चे वीर कहाँ सजनी ।।

इसलिये सुरत मेरी भक्ति पंथ, में आकर परउपकारी बनी ॥॥

मद मोह मान को विजय किया, माया ठगनी को मार दिया।

मन में नहीं किंचित डाह द्वेष, सतगुरु प्यारे की प्यारी बनी ॥॥

गढ़ अहंकार का तोड़ दिया, और कर्म का मटका फोड़ दिया ।

सतगुरु से नाता जोड़ दिया, नहीं भूले भी संसारी बनी ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित गाती हूँ।

अब राधास्वामी नाम दान की, सच्ची आज भिकारी बनी ।।।।

श्रुति स्मृति सद्ग्रन्थ का भेद, बता दिया सतगुरु स्वामी ने ।।

सन्तों का रहस्य विचित्र रूप, दरसा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

घट में सच्ची श्रुति मैंने सुनी, जिसे कभी सुनते थे ऋषि मुनि ।।

अवगन को त्याग के बनी गुनी, समझा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

यह गति मति कोई नहीं जाने, बिन जाने हुए कैसे माने ।।

अमृत रस बद की वर्षा को, बरसा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

लीला सब देखी नई नई, परगट हुए दृश्य भी कई कई ।।

उद्गीत राग की बानी को, सुनवा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥

घट विजय की बीना बाज रही, धुन शब्द अनाहद गाज रही ।।

नभ मंडल में तारा चमका, चमका दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।

जब मानुष देह मिली तुमको, इस देह से औरों को कुछ दो।

जीतेजी इस संसार में कीरति, यश अदर सन्मान को लो ॥॥

धनवान हो तो तुम धन को दो, विद्या बाले हो तो विद्या दो।।

जिस गुण का तुम को भाग मिला,दो दो कुछ कुछ उससे दो दो ॥॥

नद नाले मेह की गंगा की, सागर की देख दशा प्यारे ।।

औरों के लिये यह हैं सारे, आते हैं यह काम में औरों को ।।।।

सूरज की चन्द्र की तारों की, जोती को देख समझ मन में ।

यह औरों के काम में आते हैं, चाहे घर में हो कोई बन में हो ।।।।

अपने लिये बन मधुबन उपवन, अपने लिये देख कहाँ तपवन ।।

यह औरों ही के लिये सब हैं, अपने मन तुम सोचो समझो ।।।।

जो देता है। वह लेता है, जो लेता है वह देता है।

जो नहीं देते वह क्यों निष्फल, फिर नाम धनी को लेते हो ॥॥

दो दान दया का दानी हो, दो दान ज्ञान का ज्ञानी हो ।

क्यों निष्फल जनम गंवाते हो, अभिमानी मानी गुमानी हो ।।।।

लेना हो तो लो यश कुछ देकर, जगत की हाट में आये हो ।

जो पहिले दिया था उसके बदले, आज यह सब कुछ पाते हो ॥॥

राधास्वामी जग में आये, भक्ति का दान दिया हम को ।।

दो प्रेम भक्ति तुम औरों को, बदले में पद निवनि को लो ।।।।

जब गुरु ने प्रेम दिया तुझको, सुन पल पल उसका ध्यान रहे ।।

कर भक्ति गुरु की तू निस दिन,और गुरु का छिन छिन ज्ञान रहे ।।।।

कोई साथी नहीं कोई संगी है, संसार महा क्षण भंगो है ।।

जा भूला दुखी हुआ मन में, और दुख में सब अनजान रहे ।।।।

माया का जगत में डेरा है, घर चिड़िया रैन बसेरा है। 1

मोच ले अभी सवेरा है, नहीं काम क्रोध मद मान रहे ।।।।

नहीं बाय न माँ नहीं भाई है, व्यवहार यह अगमापाई है।

गुरु भक्ति में तेरी भलाई है, कर भला बुराई से हानि रहे ॥॥

कोई किसी में भगन कोई किसीमें मगन, तेरी लागे गुरु चरनन में लगन ।

राधास्वामी का है। यह बचन, तुझे गुरु सुमिरन का ध्यान रहे ॥॥

जब अन्तर शब्द की धुन प्रगटी, बाहर का गाना भूल गया ।

घट में अपने बैठक पाई, मन द्वन्द मचाना भूल गया ॥॥

दृष्टि सृटि गति समझ पड़ी, जैसी दृष्टि तैसी सृष्टि ।

काल कई माया और भर भर, आँख दिखाना भूल गया ॥॥

तीन ताप की बिएत गई, कलि के कलेश दारुन मेटे ।।

गुरु चरन कमल की छाँह मिली, उत्पात में आना भूल गया ॥॥

शान्ती है निभ्रान्ती है, आनन्द है सुख का जीवन है ।

दुखदाई जग सुखदाई है, दुचिता दुख पाना भूल गया ॥॥

राधास्वामी की ली शरनाई, निज रूप की मुझको समझ आई ।

समझा सत्र को अगनापाई, मन इससे लगाना भूल गया ॥॥

{ मन में नहीं चिन्ता कोई रही, जब चित से राधास्वामी नाम लिया ।।

गुरु की संगत पाई जब से, दुचिता दुर्मति सब भाग गई ।

आनन्द हर्ष च दिश छाया, सुख शान्ती आठों याम लिया ।।।।

जब फन्द कटे निरद्वन्द बने, संतोष क्षमा का धन पाया ।

गुरु दया से अर्थ धर्म मुक्ति, और योग युक्ति से काम लिया ॥॥

बल शक्ति मिली है गुरु की दया, उत्साह हीन अब हम न रहे ।

जब नाम की ढाल हाथ में ली, तब काल चक्र को थाम लिया ॥॥

भव भय का भाव मिटा मन से, निर्भय निद्वन्द अवस्था है।

सुमिरन और ध्यान भजन क्रिया से,सोध के मन विश्राम लिया ॥॥

राधास्वामी ने की दया अद्भुत, चरनों में लगा कर अपनाया ।

कुछ दिन जग जीवन के पीछे, फिर राधास्वामी धाम लिया ॥॥

जब घट विवेक सागर न्हाया, तन मन शुद्ध हुये सारे ।

कुछ तज निर्मल विमल बना, तरकर कुटुम्ब और कुल तारे ॥॥

नभ मंडल सुरत चली पग दे, चढ़ त्रिकुटी के स्थल आई ।

प्रकाश चांद सूरज का है, जगमग जगमग लाखों तारे ॥॥

वहाँ लाखों शिव ब्रह्मा विष्णु, देवी देवों की नहीं गिनती ।

यह किसी में सिद्धि शक्ति नहीं, जो गिने उन्हें न्यारे न्यारे ॥॥

सत रज तम है यह ओम् रूप, और ओम् में हैं यह तीनों गुन ।

मृदंग की धुन जब पड़ी कान में, तन मन सब मेरा हुलसारे ।।।।

राधास्वामी ने नाम दिया, बिगड़ा हुआ मेरा काम किया ।।

भय चिंता किसकी करू भाई, जब सतगुरु हो गये रखवारे ॥॥

है भक्ति सकाम मेरी स्वामी, यह भक्ति मेरी निष्काम बने ।।

में आरत बन कर आया हूँ, इस आरत का अब काम बने ॥॥

अर्थ धर्म काम और मुक्ति, सब गुरु की संगत से मिलते ।।

मेरा अर्थ बने मेरा धर्म बने, मेरी मुक्ति बने मेरा काम बने ।।।।

मन चंचल है अज्ञानी है, मन मेरा मानी गुमानी है ।

इस मन से छुटकारा दीजे, मन निश्चल हो निष्काम बने ॥॥

अथ काम न मेरा बनाओगे, निष्काम नहीं मन होने का ।

हो कामना मन की सभी, तब इस मन का विश्राम बने ॥॥

भी नहीं हैं नहीं जिज्ञासु, आरत नहीं मैं निज स्वार्थी हूँ ।

की ओर दृष्टि मेरी, इस अर्थ में धन और धाम बने ॥॥

से मना हैं विकल सदा, दुख आपत संकट से घिरा ।

संकट को मेरे, सुख आनन्द आठों याम बने ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित गाता हूँ ।

हो ऐसी दया मेरा मस्तक अब, राधास्वामी धाम बने ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।

राधास्वामी सतगुरु परमसंत के, चरन कमल में परनामी ॥॥

राधास्वामी दयाल जग में आये, सुरत शब्द योग मत दरसाये।

दुखियों दीनों को अपनाये, दी पद सरोज में विश्रामी ॥॥

राधास्वामी नाम की धुन गाई, धुन आत्मिक विधि से समझाई।

चित चेत गया ली शरनाई, धुन पर उपकारी निकामी ॥॥

राधास्वामी ने घट का पता दिया, घट के रस्ते को बता दिया ।

घर चलने का उलटा है रस्ता, उलटावे नाम मिले नामी ॥॥

राधास्वामी पद सबसे ऊँचा, कोई विरला संत वहाँ पहुँचा ।

नीचे उसके हैं पद सारे, राधास्वामी भज आठों यामी ॥॥

गुनातीत गुन सगुन स्वरूपम्, अविनाशी राधास्वामी ।

निराकार साकार अनूपम, सुखरासी राधास्वामी ॥॥

दीनानाथ कृपाल दयाला, प्रतिपाला जगदाधारी ।

सत्तलोक सतधाम निवासी, सतबासी राधास्वामी ॥॥

विरज विभो मंगल दानी, चेतन धन विमल आनन्द महा ।।

काम अकाम सकाम प्रकाशी, कैलाशी राधास्वामी ॥॥

रूप रहित आकार रहित, मन अमन रहित अद्भुत धामी ।

नहीं नाम अनाम नहीं नामी, सवनामी राधास्वामी ॥॥

गुरु रूप में तेरी महिमा है, इस रूप में प्रेम मिले मुझको ।।

मन बचन कर्म से जपा करू, राधास्वामी राधास्वामी ।।।।

चांद सूर तारागन अग्नी, में तेरा चमकारा है।

चाँद सूर तारागने अग्नी, की आँखों का तारा है ॥॥

नाम न रूप न रंग न रेखा, एक अनेक नहीं है तू ।।

कैसे तेरी अस्तुति गाऊँ, तू मन बानी के पारा है ॥॥

कहना सुनना मन की कल्पना, मन की पहुंच नहीं तुझमें ।।

मन नहीं अमन नहीं तू स्वामी, मन और अमन से न्यारा है ॥॥

नेति नेति कह वेद पुकारें, एति एति संसार कहे ।

क्या है किसने जाना तुझको, सब में तेरा पसारा है ॥॥

हां और नहीं के बीच में रह कर, सत है और असत है तू ।।

हां और नहीं के मध्य का बासी, दोनों का विस्तारा है ॥॥

यह है वह है यह नहीं वह नहीं, बुद्धि बनी अबुद्धि मेरी ।

अगुन सगुन गुन कैसे कहे कोई, तू दोनों का सहारा है ॥॥

जो देश काल और वस्तु नहीं है, देश काल और वस्तु है तू ।।

तू व्यापक तू अव्यापक है, तू उनका भी आधारा है ।।।।

मैं हूँ तेरा तू है मेरा, मै तू तू मैं यह समझा।

तू तू मैं मैं में पड़ कर फिरता, जीव मारा मारा है ॥॥

क्या कहूँ ठिकाने बुद्धि नहीं, फिर भी यह कहता रहता हूँ ।

नृ भ्राता है पितु माता है, तू ही सम्बन्धी पियारा है ।।।।

1 दृष्टा मेरी दृष्टि का, तू सृष्टा मेरी सृष्टि का ।।

1 मुझ में हैं मैं तुझमें हूँ, तेरी ही दया ने तारा है ॥॥

राधास्वामी बन आया, अपने आप को दरसाया ।

क रूप की लीला दिखलाया, बंधन से मेरा छुटकारा है ॥॥

मायामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।

परम मंत्र में सब कुछ है, यह सुरत शब्द भंडारा है ॥॥

हमें भी दे तार लाखों तारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।

लगादे भव जल के अब किनारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।।।।

न ही किसी से हमारा नाता, न हम किसी का सहारा है।

रहें सदा तेरे ही सहारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥

न मोह माया का मन में खटका,न काल और कर्म का हो झटका।।

निवास कर मन में अब हमारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥

दे प्रेम भक्ति का दान हमको, न दे तू सन्मान मान हमको ।

यही है बिनती हमारी निस दिन,दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥

दे खोल दृष्टि तुझे पिछाने, दरस परस करके तुझको मानें ।

उदय हों घट स्वर चन्द्र तारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।।।।

अलख अगम का दिखा तमाशा, दिलादे निज धाम में तू बासा ।।

चरन कमल के रहें सहारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥

जपू सदा मन से राधास्वामी, कहूँ सदा मुख से राधास्वामी ।।

दिला दिला नाम धन दुलारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥

था असत में सत सत जब प्रगटा, सत्ता से तब संत नाम बना ।।

सत में सोहं फुरना प्रकटी, सोहं सोहं का धाम बना ॥॥

सोहं से हिरण्यगर्भ प्रगटा, यह शून्य अवस्था है प्यारे ।।

इस सोहं शून्य से ओम् बना, और ओम् त्रिगुन का ठाम बना ॥॥

यह ओंकार है सूक्ष्म, सूक्ष्म में, जब स्थल की गति आई ।।

स्थूल विराट हुआ भाई, इससे सृष्टि का काम बना ॥॥

पहिले नहीं एक न दो था कभी, सत भाव में एक का है बासा ।।

यह एक अनेक में आप फिरा, और उसी से रूप और नाम बना ।।।।

धारा फटी जीव जन्तु बने, सुषुप्ति में प्राग्य दशा प्रगटी ।

सुषुप्ति से स्वप्न की उत्पति है, तेजोमय और सत काम बना ।।।।

जाग्रत आई तब विश्व हुआ, इस विश्व को समझे संसारी ।।

धर्म अर्थ मुक्ति और काम आये, दुख और सुख आठों याम बना ॥॥

यह लोक परलोक के झगड़े हैं, और पाप पुण्य के रगड़े हैं।

इन से फिर भेद दंड प्रगटे, और दाम बना और साम बना ॥॥

जो इनमें फंसा वह मारा गया, वह बचा जो इनसे न्यारा है।

जिसको यह भेद दिया गुरु ने, सत भाव बना सत काम बना ॥॥

राधास्वामी ने समझाया, सुरत शब्द को मारग दरसायो ।

इस पन्थ में भाग्य से जो आया, जीते ही जी विश्राम बना ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी पल छिन गाना ।

राधास्वामी है मूल यतन, भक्ति और योग युक्ति ज्ञाना ॥॥

जब से गुरु चरणों में आया, फल नर जीवन का सहज पाया।

छुट गये मान ममता माया, जब निज स्वरूप को पहचाना ॥॥

नहीं कहीं आया नहीं कहीं गया, नहीं जपी तपी बनखंडी भया ।।

सतगुरु दाता की हुई दया, घट भेद मिला है मन माना ॥॥

मुखमन की सीधी राह चला, इस राह में आकर नहीं टला ।

मतगुरु स्वामी की गोद पला, सतगुरु ने कर दिया मस्ताना ॥॥

गुरु जगत में सच्चे दाता हैं, पितु माता धरता विधाता हैं।

गुरु सम्बन्धी हित भ्राता हैं, गुरु राधास्वामी को जाना ।।।।

राधास्वामी के चरन कमल में, बार बार परनाम करूँ ।।

तन मन अरपूँ सीस नवाऊँ, स्तुति आठों याम करूँ ॥॥

अपने आपे की सुध भूलू, गुरु आपा मेरे चित्त बसे ।।

यह दोनों मिलकर एक बने, मैं समझ बझकर काम करूँ ॥॥

मतगुरु का रूप है रूप मेरा, और नाम गुरु का नाम मेरा।।

म रूपका चिंतन मनन करू,और नाम सुमिर विश्राम करू ॥॥

नहीं काम से काम मुझे भाई, नहीं लोभ से लोभ की जड़ताई ।

बेकार नहीं रहता हूँ कभी, मैं काम जो हो निष्काम करू ॥॥

गुरु द्वौत नहीं अद्वैत नहीं, गुरु मेरा वसिप्ट अद्वत नहीं ।

गुरु द्वेताद्वैत नहीं प्यारे, गुरुपद को समझ गुरुनाम करू ।।।।

सतसंगत में जो बचन सुने, श्रवण और मनन की जान विधि ।

निधिध्यासन करके चैन लहूँ, वृत्ति की रोक और थाम करू ॥॥

तन में मेरे सतगुरु व्यापा है, गुरु का आया मेरा आपा है ।।

मस्तक में गुरु का बासा है, बासा राधास्वामी धाम करू ॥॥

पी नाम सुधारस प्यास बुझे, आशा की अग्नी मंद पड़े ॥

जो आस की फंद पड़ा प्राणी, तू जान अनाड़ी अज्ञानी ।

भव द्वन्द के कीचड़ में सानी, चौरासी की योनी में सड़े ॥पी नाम

बल बुद्धि विवेक में जो पूरा, रनधीर वीर योद्धा सूरा ।

करे मान मोह मद का चूरा, माया की रन भूमी में लड़े ॥पी नाम

जो खाता पीता सता है, आलस में जनम को खोता है।

वह अन्त काल में रोता है, नरकों की कुन्ड में आय गड़े ॥पी नाम

झूठा सब भोग विलासा है, झूठा सब सैर तमाशा है।

नर पानी बीच बतासा है, क्यों भर्म भ्रान्ति गढ्डे में अड़े ॥पी नाम

भज राधास्वामी नाम सदा, जल्दी सतगुरु की शरन में आ ।

ले नर जीवन को अपने बना, नहीं काज तेरा सारा बिगड़े ।।पी नाम

जब नाम का हीरा हाथ लगा, मद मोह के धन को त्याग दिया ।

जिसने मेरे साथ द्वष ठानी, की द्रोह ईष्या मन मानी ।।

मैंने उसे सोच समझ मन में, सप्रेम भाव का भाग दिया ।।।।

मन मन्दिर मेरा सुहाना बना, भक्ति की सजावट पाके सजा ।

माया ममता भय अहं के घर को, तत्छन आय ही त्याग दिया ॥॥

पर निंदा निंदक करते हैं, और पापकी मौत से मरते हैं ।

मुझे नाम का दान दिया गुरु ने, मैंने सबको अनुराग दिया ॥॥

सुखमान सरोवर में न्हाया, हंस संग मोती चुन लाया ।

राधास्वामी संग चित से भाया, अधिकारी को भक्ति मांग दिया ॥॥

। जब घर में अनहद तान सुनी, मुख से फिर नाम लिया न लिया।

जिन या संसार की गति जानी,जिसके वश में कर्म और मन बानी।

जिन परहित निज स्वारथ मानी,उन धन का दान दिया न दिया ॥॥

जिन काम क्रोध मद तज डारे, जिन लोभ मोह से भये न्यारे ।

गुरु प्रेम अमी रस मतवारे, उन गंगा नीर पिया न पिया ॥॥

जिन सार अर्थ सतसंग पाया, भ्रम फॉस केटी छटी माया ।

राधास्वामी नाम सुन हर्षाया, उन योग विराग किया न किया ॥॥

किस मुह से तेरी स्तुति गाऊँ, तू आदि अन्त अविनासी है।

नहीं काल करम का भय तुझको, तू आनन्द धन सुखरासी है ॥॥

सब में है सब से न्यारा है, कुल सृष्टि में तेरा पसारा है ।।

त सबका सहज सहारा है, सत पद धुर धाम निवासी है ॥॥

हर वस्तु में आकर व्यापा है, तेरा ही सब में आपा है।

तग सब तोला लाया है, घट घट को निस दिन बासी है ॥॥

५ोती की ज्योति है तू प्यारे, क्या चन्द्र सूर्य और क्या तारे ।।

न ही हैं सब आधारे, ज्योतिर्मय सर्व प्रकाशी है ॥॥

मी राधास्वामी, तेरे चरन कमल में परनामी ।

नाम का तू नामी, तेरे बिन सब में उदासी है ॥॥

अमन बना आप ही, बानी तजकर निबनी हुआ।

गया में विदेह बना, अज्ञान को छोड़ा ज्ञानी हुआ ।।।

जड़ता त्यागी चेतन हूँ अब, चेतन को त्याग बना हूँ सत् ।।

नहीं सत का असत का संशय रहा, संशय को तज विज्ञानी हुआ ॥॥

सम्बन्ध किया जिससे मैंने, रूप उसका धार लिया मन में ।।

सम्बन्ध में मानी गुमानी बना, यह छूट गया तो अमानी हुआ ॥॥

भक्ति आई मैं भक्त बना, वैराग्य किया वैरागी बना ।।

जब ग्रहण त्याग दोनों छोड़े, केवल कैवल्य अभिमानी हुआ ।।।।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति छोड़ी, तुरिया पद में जाकर पहुँचा ।।

तुरिया गई तुरियातीत बना, निज रूप का फिर अस्थानी हुआ ॥॥

नामी बना नाम से लव लाया, तज नाम अनामी कहलाया ।

तज नाम रूप दोनों भाई, पानी पानी मिल पानी हुआ ।।।।

राधास्वामी सतगुरु आये, इस तत्व रहस्य को समझाया ।।

जो बना वह बिगड़ेगा एक दिन, परखा जिसने गुरु ज्ञानी हुआ ।।॥

। संसार असार में भूला है, संसार असार में सार नहीं ।

सब भूल भुलैय्याँ है भाई, इस भूल का वारा पार नहीं ॥॥

अनयास ताप में तपता है, यह घर रेन का स्वपना है ।

सपने की चिंता क्या करना, सपने ही का विस्तारा है ॥॥

जब सोये स्वप्न का दृश्य लखा, जब जागे दृश्य तो लोप हुआ ।

इस दशा को सोच समझ मन में, यह भरम का सकल पसारा है ॥॥

यहां नहीं कहीं है। स्थिरताई, स्थिरता यहां कैसे आई ।।

है। नाशवान हर वस्तु यहां, तूने नहीं कभी विचारा है ॥॥

अज्ञान अविद्या के बन्धन हैं, फंसे बुद्धि चित और मन हैं ।

जिसे ज्ञान मिला गुरु की संगत, उसको केवल छुटकारा है ।।।।

जिसमें नहीं ज्ञान नहीं भक्ति, जिसमें विवेक की नहीं शक्ति ।

यह समझ ले उसको करम काल, ने और माया ने मारा है ॥॥

भज भज ले नाम सदा गुरु का, भटका नहीं खा सतपंथ में आ ।

राधास्वामी ने समझाया, जो समझे गुरु का प्यारा है ॥॥

किस भर्म में भूला है भाई, अनजान है या तू सियाना है ।

संसार है यह अगमापाई, नहीं मन को इससे लगाना है ॥॥

इस द्वन्द अवस्था में पड़कर, बुद्धि नहीं तेरी ठिकाने रही ।।

दुविधा दुचिताई के फंदे, इन फन्दों में तुझको फंसाना है ॥॥

दिनरात है जनम है और मरन, सृष्टि प्रलय विष और अमृत ।।

जहां लोक है वहां परलोक भी है,यह भेद तुझे समझाना है ॥॥

यह तेरे सहारे रहते हैं, तू उनके सहारे नहीं रहता ।।

इनको समझा सुख प्राप्त हुआ,नहीं समझा तो आंसू बहाना है ।।।।

तू आंख नहीं तू कान नहीं, दोनों से न्यारा रहता है।

यह देह नहीं है रूप तेरा, इसे मिट्टी में मिल जाना है ।।।।

तू अजर अमर है अविनाशी, तू सत चित आनन्द का रासी ।

अपने सत में सत प्रकाशी, बस इतना ही जतलाना है ॥॥

राधास्वामी सतगुरु आये, सत पद को मारग दरसाये ।

सुरत शब्द योग विधि सिखलाये, भक्ति के पंथ चलाना है ।।।।

गधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।

गधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।

गधास्वामी दिवसं राधास्वामी रैनं, राधास्वामी बैनं राधास्वामी सैनं ।

गधास्वामी भजो आठों यामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।

गधास्वामी पितरं राधास्वामी माता,राधास्वामी करता धरता विधाता ।

गधास्वामीपद में विश्रामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥

गधास्वामी विद्या राधास्वामी द्रव्यं,राधास्वामी मूलं राधास्वामी सर्व ।।

गधास्वामी मेरे अन्तर्यामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥

राधास्वामी सत्यं चितानन्दं, राधास्वामी गुप्तं राधास्वामी विदितं ।

राधास्वामी सुमिरो निकामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥

राधास्वामी शुद्ध नित्य विमुक्त, राधास्वामी ज्ञान भक्ति संयुक्त ।।

राधास्वामी अनाम राधास्वामी नामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी

क्यों रोता रहता है हरदम, क्या लुप्त है आँसू बहाने में ।

हँस खेल मिलेगी खुशी तुझे, हँसने में और हँसाने में ॥॥

इल्म में अक्ल में होश खिरद के, बनने में जो जौहर है निहां ।

वह शक्ल बदल कर है जाहिर, नादान में और दिवाने में ॥॥

साये में नूर में फर्क कहां, जो असल में है वह नकल में है ।

जो दिल में रूह में है मक्फी, वही जिस्म के है काशाने में ॥॥

सच झूठ की है बुनियाद एक, किसको कहूँ बद और किसको नेक ।।

है बात की बात में बात ओ खुद, शामिल है बात बनाने में ॥॥

आवाज में है और साज में है, वह राज में नाजो नियाज में है।

दमबाज में है दमसाज में है, बाजे में है बाजे बजाने में है ॥॥

वहदत में कसरत का है पता, कसरत में खिलवत की है जा ।

है एक हजार लाख जब खुद, क्या धरा है गिनती गिनाने में ॥॥

वहदत का जाम पी ले जाबित, हरहाल में मस्ती खुशी मिले।

है राधास्वामी की यह सुनले सदा,और खुशी है दिल बहलाने में ॥॥

कोई कैसे जाने हकीकत को, हक से नहीं है जब काम उसे ।

हक नाहक की कुछ समझ नहीं, नहीं हक का मिला पैगाम उसे ॥॥

है वहम में फसकर हैरानी, और हैरानी से परेशानी ।।

दिल उसका हुआ बेचैन चैन से, समझलो तुम नाकाम उसे ॥॥

नहीं संगत सतगुरु की पाई, नहीं सच्ची समझ बुझ आई ।।

फिर जात की कैसे मिलती खबर, घेरे हुये हैं औहाम उसे ॥॥

दया कीजे मेहर कीजे, लीजे चरनों में लगा ।।

आपको मैं हो रहूँ, भरमों का मटका फोड़कर ॥॥

राधास्वामी दीन हित, भवनिध से बेड़ा पार कर ।

यह है मेरी बेदना, संसार से मुख मोड़ कर ॥॥

गुरु के दर्शन के बिना, अब नींद तक आती नहीं।

जग की वस्तु कोई भी, मन को मेरे भाती नहीं ॥॥

आवो प्यारे देवो दर्शन, हूँ विकल मैं रात दिन ।

ताकती हूँ राह तेरी, छवि ही नजर आती नहीं ॥॥

मैं तो तेरे शरण आई, तुमको मेरी लाज है।

छोड़ कर तेरे चरण मैं, अब कहीं जाती नहीं ॥॥

तेरा ही विश्वास है, और तेरी मुझको आस है।

तू है साथी एक मेरा, और कोई साथी नहीं ॥॥

मेट कर त्रय ताप चित को, मेरे करदे आप शान्त ।।

राधास्वामी भक्ति दीजे, शक्ति घबराती नहीं ॥॥

शान्ती सच्ची सदा, गुरु नाम के सुमिरन में है।

आप जानोगे कि दुख सुख, खेल सारा मन में है ॥॥

अपने आप में रहो, चित की रहे नित रोक थाम ।

शान्ती उसको कहाँ, दिन रात जो अनबन में है ॥॥

वस्तु है घर में तुम्हारे, खोज घर ही में करो ।।

शान्ती की वस्तु घट के, अपने ही बरतन में है ॥॥

त्तियों को चित की, अंतर में करोगे जो निरोध ।।

यह समझलोगे कि, सिद्धि शक्ति सब साधन में है ॥॥

राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम लो ।

नाम का विश्राम प्यारे, शब्द के श्रवण में है ॥॥

– मैं हूँ उसका वह है मेरा, बस यही एक आस है ।।

संसार मेरे नयनों की, परमात्मा की सांस है ॥॥

मन में वह आकार समावे, उसका मन हो मेरो मन ।।

एक दिन ऐसा ही होगा, होगा यह विश्वास है ॥॥

उसमें मैं रहता हूँ, सोता खाता पीता जागता ।।

जब सुषुप्ती आई वह, प्रीतम निकट और पास है ॥॥

भर्म से अज्ञान है, उसकी समझ मुझको नहीं ।

जब भरम जाता रहेगा, फिर वह सांस और भास है ॥॥

राधास्वामी की दया से, उससे अब होगा मिलाप ।।

वह मिला पहिले से, केवल देह का अध्यास है ॥॥

क्या है ईश्वर किसमें ईश्वर, है कहां रहता है वह ।

करता क्या धरती क्या है, और क्या कहता है वह ॥॥

कुछ दिनों सतसंग हो, ईश्वर की तब आवे समझ ।

जो समझता ही नहीं, भव सिंध में बहता है वह ॥॥

तुमने कब समझा उसे, और कैसे आई यह समझ ।

अंन समझ दुख अग्नि में, संसार के दहता है वह ॥॥

जितनी जल्दी हो सके, संगत करो संगत करो ।।

जिसको सतसंगत नहीं, आपति बिपत सहता है वह ॥॥

राधास्वामी ने दया की, दी कमल पद की शरन ।

यह शरन हाथ आई जिसके, चैन सुख लहता है वह ।।।।

– । आये थे बहरे जहाँ में, हुम नहाने के लिये ।।

यह न समझे आये थे हम, गोते खाने के लिये ॥॥

तुमको देखा तुम थे गोते, खाते रहमें आया हमें ।

हाथ फैलाया उसी दम, फिर बचाने के लिये ॥॥

बच गया अच्छा हुआ, अच्छा हुआ तुम बच गये ।

हम चले अब राह जब, आये थे जाने के लिये ॥॥

सैर दुनियां होगई, तेरे नहाये चल बसे ।।

बदनसीब आया यहां, आंसू बहाने के लिये ॥॥

मिल गया मुर्शद दिया, उसने मुझे हक का पयाम ।।

राधास्वामी आये वह, नुक्ता सुनाने के लिये ॥॥

– रोशनी का तार जब, जाहिर हुआ तारा बना ।।

आस्मां पर जाके चमका, सबका खुद प्यारा बना ॥॥

नूर की सबको तलब है, वह है मैराजे तलब ।

तालिबे हक के लिये, वह हक को चमकारा बना ॥॥

इल्मे हस्ती औ खुशी, तीनों हैं जलवे नूर के ।।

नूर नूरानी हुआ, और नूर नज्मे आरा हुआ ॥॥

माद्द में नूर है और, नूर ही है रूह में ।।

गौर करके देखा जब वह, सारे का सारा बना ॥॥

राधास्वामी की मेहर से, नूर का कर इक्त साब।

नूर इस आलिम में, सिकन्दर बना दारा बना ॥॥

– वह सुखी है जिसमें दुबिधा, और दुचिताई नहीं ।

वह दुखी है जिसमें गुरु का नाम सुखदाई नहीं ॥॥

गुरु की संगत की सहज में, पाया गुरु का संस्कार ।।

बुद्धि मेरी तब से चक्कर में कभी आई नहीं ॥॥

शब्द का साधन सहज है, और सहज है नाम योग ।।

सहज में सुमिरन करो तुम, कोई कठिनाई नहीं ॥॥

जब समय हो तुम करो, अभ्यास नित चित को लगा।

हो कहां उसका भला, जिसको यह गति भाई नहीं ।।।।

धास्वामी की दया से, तुमको शुभ अवसर मिला ।।

लो कमाई कुछ करो, यह जगत स्थाई नहीं ॥॥

बैठकर दिन रात घट में, गुरु का सुमिरन ध्यान कर ।

गुरु से रक्षा होगी तेरी, सोच ले अनुमान कर ॥॥

जग है दुखदाई न इसके फंद में आना कभी ।।

जो फैसा मारा गया, तू बचके चल भय मान कर ॥॥

नाम ले विश्राम ले, है नाम में सुख शान्ती ।

नाम का ले आसरा, दिन रात उसको गान कर ॥॥

नाम ले ले तर गये, कामी क्रोधी लालची ।।

नाम को मत भूल, महिमा नाम की तू जानकर ॥॥

राधास्वामी ने बताया, नाम लेने की बिंधी ।

शब्द का अभ्यास कर, अन्तरे में अपने आनकर ।।।

– गुरु की महिमा कौन गाये, उसका गाना है कठिन ।

पहुँचने वाले कहां तुझ, तक हैं बानी और बचन ॥॥

बुद्धि निर्णय कर नहीं सकती, न चित चिंतन के योग ।।

सोचने और समझने की, शक्ति पाता है न मन ।।।।

ज्ञानी अपनी युक्ति भूले, ध्यानी भूले ध्यान कर ।।

योगी थककर हार बेटे, कर चुके जब सब जतन ॥॥

तू नहीं काशी ने मथुरा, द्वारका में तू नहीं ।।

टूटने बन खंडी और, तपसी चले हैं सूना बन ॥॥

मेरे हृदय में बसा रहता है, निस्सन्देह तू ।।

राधास्वामी भेद बतलाया, लगी तुझसे लगन ।।।।

दुनियाँ के दीन के झगड़े हैं, इन झगड़ों ने धर कर रगड़े हैं।

इन झगड़ों रगड़ों में जो फसा, दिन रात कहां आराम उसे ।।।।

कह दो उनसे कुछ सहबत कर, ले दिल में अपने गुरु का असर।।

बेफिकरी से हो जिंदगी बसर, न फंसायेगा दुनियाँ का दाम उसे ॥॥

खिलवत कसरत की समझ आये, नहीं भरम करम नित भरमाये ।

वहदत का रंग कुछ जम जाये, मिल जायेगा मस्ती का जाम उसे ॥॥

दुनियां और द का बन बंदा, बंदा बनके हुआ है गंदा ।

यह गंदगी सब मिट जायेगी, नजर आये जो हक का नाम उसे ।।।।

न वह भूल के दुनियां घर छोड़े, नहीं जर्मी न जन नहीं जर छोड़े।

सतगुरु से नाते को जोड़े, फिर सुख है सुबह व शाम उसे ॥॥

जब तक गुरु हाथ न आयेगा, कोई पता न हक का पायेगा ।

नित भरमेगा भरमायेगा, छोड़गे न दर्द आलाम उसे ॥॥

गर शौक हो तुमको बिसाले सनम,सुलतानुलजकार का शागिल बन ।

फिर दिल से कलामे हक को सुन,है राधास्वामी का पैगाम उसे ॥॥Updated: November 22, 2018 — 2:38 am← Previous Post

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Updated: May 2, 2020 — 3:51 am

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