1.मंगलम्
मंगलम् गुरुदेव मूरति, मंगलम् पद पंकजम् ।
मंगलम् अव्यक्त अनुपम, मंगलम् भव गंजनम् ॥
मंगलम् धुरपद निवासी, मंगलम् सत् आसनम् ।
मंगलम् निर्वाण सद्गति, मंगलम् जन रन्जनम् ॥
मंगलम् ज्ञान स्वरूपम्, मंगलम् आनन्द रूप ।
मंगलम् चैतन्य सदनम्, मंगलम् सत सत्य भूप ।।
मंगलम् योगीन्द्र माया, तीत मंगल दायकम् ।
मंगलम् संसार सारम्, अद्भुतम् मुनि नायकम् ॥
मंगलम् त्रय गुण रहित,अपरोक्ष परोक्ष निवासनम् ।
मंगलम् त्रय काल ज्ञाता, मंगलम् भव नाशनम् ।।
आदि कारण मूल कारण, मध्य आदि अनन्त जो ।
मंगलम् करुणा सदन, शुभ तत्व परम जगत प्रभो ।।।
आप प्रगटे इस जगत में, जीव काज सुधारने।
शब्द नाव बनाये सुन्दर, जीव दुखिन उबारने ।
प्राण तन मन कर्म बानी, सबही अपेण लीजिये ।
में हूँ शरणागत तुम्हारा, दास अप्रना कीजिये ।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
न्याग जंग के मोह धन्धे, पाऊँ भक्ति सम्पदा ।।
2.तेरी स्तुति हित चित से गाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ।
तेरे ध्यान में हिय जिय उमगाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
गुरु रूप में प्रगट हुआ जग में, जीवों को चिताके किया मग में।
है विनय तेरा दर्शन पाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
मंगल मय मंगल की खानी, मंगल स्वरूप मंगल दानी ।
क्षण प्रतिक्षण मैं तुझको ध्याऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
तू सब में है सब से न्यारा, तेरा रूप लगे अति ही प्यारा।
तेरा चरण छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन घन घन राधास्वामी ॥॥
तू निस दिन मेरे मन में बसे, अब मन नहीं माया मोह फँसे ।।
राधास्वामी नाम जय हरपाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
3.गुरु नाम में हिया जिया उमगाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ।
गुरु दरस पाय मन मगनाऊँ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
गुरु रूप में दरस दियो जग में, अपना के कियो मुझको मग में ।
तेरा चरणा छोड़ नहीं कहीं जाऊँ, धन धन धन घन राधास्वामी ॥॥
तेरा सुमिरन ध्यान भजन नित हो, तेरा श्रवण मनन निध्यासन हो ।
धारू मन में तेरा रूप सदा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
तू दाता दीन दयाला है, भक्तों का तू प्रतिपाला है।
तेरे चरण में तन मन बिसरा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
राधास्वामी ने की है दया भारी, गुरु चरण कमल पर बलिहारी।
गुरु वचन सुनू और नित गाऊ, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
चमका घट भक्ति का तारा, धन धन धन धन राधास्वामी ।
जीते जी हुआ भव जल पारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
नहीं काम क्रोध के भये मन में, नहीं रोग सोग व्यापा तन में ।
हुआ करम भरम से मैं न्यारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
दुविधा न रही चिन्ता न रही, माया न रही ममता न रही ।।
सतगुरु मेरा हो गया रखवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
जब आँख खुली तब पहिचाना, गुरु गम गति लख मन ने माना।
भरमू नहिं सुख घर परिवारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
सुरत सखी नभ चढ़ आई, गुरु मूरति ने छवि दरसाई ।।
धुरपद का खुला घट में द्वारा, धन धन धन धन राधास्वामी ॥॥
4.गुरु नाम मिला मुझको प्यारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।
सब नामों से है। यह न्यारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
दल सहस कमल सुमिरन साधा, त्रिकुटी चढ़ ध्यान को आराधा ।
मृग्न महासुन दुचिता जारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
मुरत शब्द जोग मत अति है सुगम, कोई अधिकारी पाता है गम ।
गुरु ने मुझे दिया मरम सारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
जगमग जगमग ज्योती दमकी, ज्योती विचित्र घट में चमकी ।
है, मगन जो देखा चमकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
महम कमल घंटा बाजा, और शून्य में रारंग धुन गाजा ।।
पद में गरजा कारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
की थी यह त्रिलोकी, यह त्रिलोकी मैंने छोड़ी ।।
सूरत को गारा, राधास्त्रामी, राधास्वामी ॥।।
नाम की धुन पाई, प्यारी धुन यह मुझको भाई।
मुना में भेवर पद से पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
सतलोक में बीन की गति प्रगटी, निरखी वहां सतगुरु की भृकुटी ।
सतगुरु मेरे हो गये रखवारा, राधास्वामी, राधास्वामी ।।।।
लख अलख की शोभा बेहु न्यारी, गम अगम की महिमा थी प्यारी ।
ऊँचे चढ़ हो गया भव पारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
गुरु नाम की धुन पहचान लिया, प्रकाश में रूप को जान लिया।
मिल गया काल से छुटकारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी मैं गाता हूँ।
मैं तरा साथ सब को तारा, राधास्वामी, राधास्वामी ॥॥
5.बेकार न समय व्यतीत करो, नहीं समय मिला है गंवाने को ।
तुम जग में आये औरों का, और अपना काम बनाने को ॥॥
कथनी बदनी से लाभ नहीं, करनी से चित को लगा रखना ।।
करनी में सुख आनन्द रहते, कथनी है मन बहलाने को ॥॥
कथनी के सूरे बहुत मिले, करनी से उनको काम नहीं ।।
उनका जीवन है बातों को, यह जन्मे बात बनाने को ॥॥
पुस्तक पोथी के ज्ञानी हैं, और झूठे ज्ञान के मानी हैं।
अनुभव नहीं नहीं रहनी बदलो, भरमे आये भरमाने को ॥॥
जग को यह मिथ्या कहते हैं, जग की आशा में रहते हैं ।
बातों से रूप को सिद्ध किया, पहुँचे नहीं ठौर ठिकाने को ।।।।
कथनी तज करनी करो भाई, करनी से बना रहनी अपनी ।
करनी से रहनी पाओगे, करनी है रहनी पाने को ॥॥
राधास्वामी यू कहते हैं, करनी से मिलती है रहनी ।।
अभ्यास शब्द का नित करना, चित वृती के ठहराने को ।।।।
6.जब गुरु की दया की आस नहीं, तुझ में भक्ति विश्वास नहीं ।
जिसने परचे पाया गुरु का, वह आस से कभी निरास नहीं ॥॥
गुरु तेरे पितु और माता हैं, गुरु करता धरता विधाता हैं।
गुरु सम्बन्धी और भ्राता हैं, क्या पल छिन तेरे पास नहीं ॥।।
घट तेरे गुरु का धाम बना, घट सुमिरन आठों जाम बना ।
गुरु नाम से निज विसराम बना, गुरु काशी नहीं कैलाश नहीं ॥॥
भज नाम गुरु का नित प्रतिछन, कर गुरु का सुमिरन रात और दिन ।
ले जग जस कीरति को गिन गिन, गुरु तुझमें भूमि आकाश नहीं ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी राधास्वामी, जो नहीं भजता है दास नहीं ॥॥
8.नहीं आपसे आये हम प्यारे, और आपसे हम जाते भी नहीं ।
है सत चित आनन्द रूप हमारा, धोके में आते भी नहीं ॥॥
गुन कर्म स्वभाव ज्ञान सारे, रहते हैं अपने सहारे सव ।
हम यह नहीं यह हमसे हैं अलग, यह हमें छोड़ जाते भी नहीं ॥॥
यह कर्म ज्ञान आनन्द हमारे, भोग हैं भोग से क्यों डर हो ।
जब रूप को अपने जोन लिया, धोका भव का खाते भी नहीं ॥॥
की साध की संगत हित चित से, तब रूप की अपने समझ आई।
इस रूप में स्थिरताई है, चिन्ता चित में लाते भी नहीं ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
इस राग को छोड़ राग दूसरा, भूल के हम गाते भी नहीं ।।।।
9.जो आते हैं वह जाते हैं, जो गये लौट नहीं आते हैं।
मैं किससे पूजू पथिक राह में, केसे सुख दुख पाते हैं ॥।।
अब आये हाथ न था कुछ भी, जब गये तो हाथ नहीं कुछ था ।
क्यों जाते समय है दुख इनको, कारन नहीं कोई बताते हैं ॥॥
मान लोभ में भूल गये, और भरम हिंडोले झूल गये ।
अह कार से फूल गये, और अन्त काल पछताते हैं ॥॥
जो आये हैं बह जायेंगे, जो भिले बिछुड़ना है उनको ।
जो समझ गये वह भूल के भी, चिन्ता नहीं मन में लाते हैं ।।।।
संसार नहीं स्थिर भाई, है इसमें नहीं स्थिरताई ।।
ज्ञानीं इस दशा को समझ गये, इसमें नहीं चित को लगाते हैं ॥॥
जो करना धरना है तुम को, वह करो और अपनी राह लगो ।
डरते हो काल से माया से, यह जीव को फाँस हँसाते हैं ॥॥
यह जान लो कोई नहीं अपना, संसार रैन का सपना है ।
सोचो विवेक से निज मन में, भूठे सब रिस्ते नाते हैं ॥॥
दिन ढला रात की बारी है, कर सोने की अब तय्यारी ।
आयु गई नाम जो लेते हैं, भव सागर से तर जाते हैं ।।।।
सत संगत में सतगुरु के जा, कुछ दिनों शब्द का साधन कर ।
राधास्वामी की कृपा से, सेवक नहीं धोखा खाते हैं ॥॥
10.पृथ्वी मंडल को छोड़ दिया, भक्ति बलले आकास चढ़ा ।
जब ब्रह्मरेन्द्र पर चढ़ आया, फिर सिखर मेरु कैलास चढ़ा ॥॥
माया ममता घट से भागी, सोई हुई सुरत जागी ।
मिट गयी अंधेरा अविद्या का, फिर विद्या के प्रकाश चढ़ा ।।।।
चढ़ने चलने की तय्यारी की, सतगुरु ने मेरी रखवारी की ।
दृढ़ता से उदान का आसरा ले, घट गगन में सांसों सांस चढ़ा ॥॥
सुन्न महासुन के पार गया, फिर भवर की खिड़की जाके घुसा ।।
सतपद में सतगुरु का दर्शन, ले मन में सच्ची आस चढ़ा ।।।।
लख अलख अगम की गम पाई, ली राधास्वामी की शरनाई ।।
ऊचा शब्द का डोर पकड़े, राधास्वामी का दास चढ़ा ।।॥
11.आसा इस भव के कारागार में, सचमुच जम की फाँसी है ।।
आसा का बन्धन काटे वह, गुरुमुख है गुरु विश्वासी है ॥॥
आसा वाले को चैन कहाँ, आसा के साथ है त्रास धनी ।
मंगल आनन्द का भागी वह, संसार से जिसको उदासी है ॥॥
जैसी आसा वैसी बासी, जब लग आसा तब लग बासा ।।
जो आसा का बन्धन काटे, सत मत का वह अभ्यासी है ॥॥
आसा है जन्म मरन प्यारे, आसा तज दे फिर मुक्ति है।
आसा को सोच विचार ले तू, जड़ चेतन ग्रन्थि की गांसी है ॥॥
आसा में दुविधा दुचिताई, असा में भय लज्जा रहते ।।
यह तीनों पाप अवस्था हैं, तज इनको फिर सुखरासी है ।।॥
आसा त्रिगुण की खानी है, यह सत रज तम की है रस्सी ।।
रजे ब्रह्मा सत है विष्णु बली, तम शिव शम्भू केलाशी है ॥॥
आशा है काम क्रोध लालच, असा मद मोह द्वेष की जड़।
क्यों आस में पड़ के निराश हुआ, तेरा रूप अजर अविनाशी है ॥॥
सतसंगत में सतगुरु के जा, सुन हित चित से गुरु की बानी ।।
बानी सुन सुन निर्बानी हो, गुरु बानी सर्व प्रकाशी है ॥॥
राधास्वामी ने समझाया, घट ही में है तेरे सब कुछ।
घट में धंस आप अपना परख, जल में क्यों मीन पियासी है ॥॥
12.अद्वैत द्वैत के फेर पड़ा, अभिमानी एक का दो का है।
मैं सच सच तुझसे कहता हूँ, यह भूल भरभ और धोका है ॥॥
नहीं एक न दो नहीं तीन चार, नहीं सौ पचास नहीं सहस्रार ।
तू जैसा चाहे माना कर, इस मान से किसने रोका है ॥॥
जैसा है तैसा समझ उसे, नहीं वह ऐसा नहीं वह वैसा ।
नहीं एति न नेति न सत न असत,न असोक सोक नहीं सोका है ॥॥
बातों के फेर पड़े ज्ञानी, अभिमानी मानी गमानी बने ।
ह ज्ञान नहीं अज्ञान नहीं, नहीं बन्द न खुला झरोका है ।।।।
ना कुछ दिन कर संगत गुरु की, तब सार तत्व को जानेगा ।
किसने उसे जाना बूझा है, और जान बूझकर ठोका है ॥॥
सब कुछ है और कुछ भी नहीं, लव अलख अगम गम है दोनों ।।
वह वार न पार न आदि अंत, नहीं सिरा है और न नूका है ॥॥
राधास्वामी की शरन में आ, तब अनुभव से कुछ जानेगा ।
वह रुद्र वसु आदित्य नहीं, नहीं नीर पवन का झोंका है ॥॥
13.भवसागर अगम अथाह से पार, करा दिया सतगुरु दाता ने ।
मुभु दीन अधीन को ठौर ठिकाने, लगा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
संसार महा दुखदाई था, नहीं अपना कोई सहाई था ।
निज दया से मेरा बिगड़ा काम, बना दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
मन चंचल था अज्ञानी था, अभिमानी मानी गुमानी था ।
सुरत शब्द योग विधि से निश्चल, करवा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
घट अघट का भेद दिया मुझको, चरणों में अपने लिया मुझको ।
सतसग के अमृत बचन सुना, के चिता दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
मैं अब चरणों की बनी दासी, सुख पाकर हो गई सुखरासी ।
राधास्वामी धाम का देके पता, पहुँचा दिया सतगुरु दाता ने ॥॥
14.किस मुख से तेरी महिमा गाऊँ, तू सत्त पुरुष अविनासी है ।
चेतन घन अमल विमल निर्मल, सत सदन परम सुखरासी है ॥॥
कोई अगन कहे कोई सगुन कहे, कोई निराकार साकार कहे ।।
तू सब कुछ है और कुछ भी नहीं, धुरपद धुरधाम निवासी है ॥॥
नहीं मन ने थाह कभी पाई, नहीं बुद्धि में आई चतुराई ।
चित चिंतन कैसे करे तेरा, तू द्वैत अद्वेत प्रकाशी है ॥॥
मन बना बिह गम मीन मकर, मरकट बनकर कूदा अन्दर ।
चींटी की चाल चला घट में, कह उठा तू अगम उदासी है ।।।।
राधास्वामी रूप में प्रकट हुआ, दर्शन देकर कृतार्थ किया ।
निज शब्द से अपना भेद दिया, घट अघट का सत्य निवासी है ॥॥
15.जीते जी मुक्ति की पदवी को, दिलवा दिया राधास्वामी ने ।
मद मोह मान का महा जाल, कटवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
चहकी भरमी भूली भटकी, झिझकी ठिठकी अटकी लटकी ।।
इन संस्कारों की गुत्थी को, सुलझा दिया राधास्वामी ने ॥॥
निज घट का मारग दिखलाया, सत सार शब्द मत दरसाया ।
बाहर मुखता के अवगुण को, छुड़वा दिया राधास्वामी ने ॥॥
जब सहसकमल दल चढ़ आई, शिवनेत्र की ज्योती झलकाई ।।
घंटा और शंख के काजों को, बजवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
त्रिकुटी में ऊँ राग गाया, मृदंग की धुन को लखवाया ।
ऋग्वेद की ऋचा की बाणी को, सुनवा दिया राधास्वामी ने ॥॥
एक अक्षर मंत्र का जाप किया, तब शून्य में सहज समाध लिया ।।
अद्भुत निर्मल शशि मस्तक पर, प्रकटा दिया राधास्वामी ने ॥॥
सतगुरु ने मुझको तार दिया, सहजे भवसागर पार किया ।।
पद कमल की शरन दया से दिया, अपनालिया राधास्वामी ने ।।।
16.किस भर्म में भूला है भाई, जग चिड़िया रैन बसेरा है ।
यहां कोई किसी का कभी नहीं, झूठा सब मेरा तेरा है ॥॥
तू भूल भर्म में भूला है, अज्ञान हिंडोले झूला है।
क्यों मान गुमान में फूला है, ले चेत चेत को बेरा है ॥॥
झूठा रिश्ता और नाता है, कोई किसी के काम न आता है।
जो आता है वह जाता है, यह काल का हेरा फेरा है ॥॥
भत्र दारुण अति दुखदाई है, जीवन में बड़ी कठिनाई है।
जो है वह अंगमापाई है, तू संभल जा अभी सबेरा है ॥॥
भव सागर से तारा गुरु ने, दे प्रेम किया प्यारा गुरु ने ।
राधास्वामी अमृत नाम पिया, माया ने उसे नहीं घेरा है ॥॥
17.दुखियों दोनों पर दया हुई, भव पार किया गुरु प्यारे ने ।
निर्धन को भक्ति योग युक्ति का, दान दिया गुरु प्यारे ने ॥॥
मद मान ने अति भरमाया था, माया के फाँस फसाया था।
अब घट में जलाया अपनी मेहर से, ज्ञान दिया गुरु प्यारे ने ॥॥
योनी के हिंडोले झूले थे, अपने आपे को भूले थे ।
चित देके चिताया चिताउनी दे, अपना कर लिया गुरु प्यारे ने ॥॥
चौरासी का खटका भिटा सारा, गुरु दया हुई अपरमपारा ।
घट फटगया था दे भक्ति का टांका, अब तो सिया गुरु प्यारे ने ॥॥
सुखमन में ज्योति जली जगमग,सुरत शब्द से प्रगट हुआ घट ग ।
राधास्वामी नाम दे अब तो किया, उत्साह दिया गुरु प्यारे ने ॥॥
18.गरु दाता दया की दृष्टि करो, जग में नहीं कोई हमारा है।
स्वारथ के सम्बन्धी सब हैं, अब आपका एक सहारा है ॥॥
तन विकल तो मन अति चंचल है,नस नाड़ियों तक में हलचल है।
शान्ति का कोसों पता नहीं, ये काल करम ने मारा है ॥॥
नहीं योग युक्ति का कोई यतन, नहीं ज्ञान ध्यान का है साधन ।।
दुविधा दुचिताई ने घेर लिया, इस घेर का वार न पारा है ॥॥
आपत और विपत का सामना है, क्योंकर इस मन की थामना है।
इस बात का पूरा निश्चय हुआ, दुखदाई महा संसारा है ॥॥
क्या कहूँ कहाँ आऊँ जाऊँ, किस विधि शान्ति की दशा पाऊँ।
मेरे गले पड़ी दुख की फांसी, यह काल बड़ा हत्यारा है ॥॥
सत संगत के नहीं वचन सुने, सुनकर भी नहीं होता है मनन ।
निष्फल जाता है मेरा जनम, मन हारा हारा हारा है ॥॥
अब आपके चरणों में आया, मुझको अपनी दो शरनाई ।
राधास्वामी नाम का दान मिले, यह नाम मुझे अति प्यारा है ॥॥
19.मैं किस पर गर्व गुमान करू, जग के सब झूठे नाते है।
अपना नहीं कोई भी सम्बन्धी, झूठे सब भाव बताते हैं ॥॥
सुन नर मुनि की यह रीती, स्वारथ वश करते हैं प्रती ।।
जब स्वारथ सिद्ध नहीं होता, तब कोई न आते जाते हैं ॥॥
सब देख लिया सब जान लिया, नहीं संशय एक रही मन में ।
अज्ञान भरम के फन्दे में, भरमे हुए आके फँसाते हैं ॥॥
है भूल भुलैया संसारा, भूला भूलो भूला निसदिन ।
इस भूल में कौन सहाई हो, भूले हुए को और भुलाते हैं ॥॥
कुमती ने मार दिया मन को, सुमती के पन्थ से दूर है वह ।।
दुविधा दुचिता संशय तीनों, सौ सौ सौ नाच नचाते हैं ॥॥
छाया के पीछे दौड़ चुका, माया के पीछे दौड़ चुका है।
दोनों में सार नहीं किंचित, कब किसके हाथ यह आते हैं ।।॥
निज दया करो राधास्वामी, परपंच से मुझको मुक्ति मिले ।
मैं हारा हारा हूँ सब विधि, भव भय अब अधिक डराते हैं ॥॥
20.क्यों भरम में भूला है प्यारे, इस जगत में सुख विसराम कहां ।।
जो आये हैं वह जायेंगे, रहने का नहीं हैं काम यहां ॥॥
जो गये हैं उनका किसे पता, यह भेद मिला नहीं किसी को भी ।
तुम जानते हो तो बतादो जी, सीता है कहां और राम कहां ।।।।
झूठे हैं नाम निशां झूठे, जग झूठा सब कुछ झूठे हैं।
इम झूठ के गोरखधन्धे में, सत सार का सच्चा नाम कहां ॥॥
झठा सब सेर तमाशा है, झूठा आनन्द हुलासा है ।।
जग जल के बीच बतासा है, गल गया तो धूम और धाम कहां ॥॥
ले नाम गुरु का तू भाई, संसार है। यह अगमापाई ।
राधास्वामी की ले शरनाई, क्यों भटका आठों याम यहाँ ॥॥
21.दुखदाई जगत में आन फँसा, भव सागर नाव न बेरा है।
मंझधार में टूटी नाव पड़ी, सब दायें बायें अँधेरा है ॥॥
साथी संगी सोने वाले, अति घोर नींद में मतवाले ।
है भंवर का खटका आठ पहर, दुख आपत विपति ने घेरा है ॥॥
चित चैन न मन को शान्ती है, व्यापी आलस और भ्रान्ती है।
खेवट भी पास नहीं कोई, लहरों को हेरा फेरा है ॥॥
नभ मंडल काली घटा छाई, बादल बरसे रिम झिम आई ।
क्या करू उपाय नहीं सूझे, मन में अब त्रास घनेरा है ॥॥
राधास्वामी दया की दृष्टि करो, यह संकट आपति बिपत हरो ।।
अब आस तुम्हारी है केवल, हो मेहर मेहर का बेरा है ॥॥
22.तू घट का मेरे बासी बने, तेरा ही मन में ध्यान रहे ।।
तेरा ही सुमिरन भजन हो नित, तेरा ही नित अनुमान रहे ॥॥
तू कौन है क्या है क्योंकर है, इसकी नहीं मुझे समझ आई ।
आँखों को मिले दर्शन तेरा, बस यही बात परमान रहे ॥॥
अव्यापक सर्वव्यापक है, गुन अगुन सगुन सब कुछ भी है।
इन से नहीं काम मुझे किंचित, तेरा मन में अस्थान रहे ॥॥
सामान्य की मुझको चाह नहीं, चेतन विशेष की महिमा है।
चेतन विशेष की लगन लगे, और उसी का निस दिन ध्यान रहे ॥॥
मैं रूप का तेरे दरस करू, पद कमल का कर से स्पर्श करू ।।
सुख मंगल हर्ष हुलास लहूं, तेरे शब्द की ओर में कान रहे ॥।।
तू जैसा है मैं वैसा बनू, भृङ्गी और कीट की देख दशा ।।
मेरा भाव अभाव स्वभाव सभी, तेरी निज लीला के समान रहे ॥॥
रसना से कहूं राधास्वामी, कानों से सुनू राधास्वामी ।
हृदय से भजू राधास्वामी, यह नाम जान और प्रान रहे ॥॥
23.हम दीन अधीन दुखी जीवों को, चिता दिया सतगुरु स्वामी ने ।
भव सिंध में डूबने वाले को, तैरा दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।
मद मोह माया के मारे थे, दुख आपति से दुखियारे थे ।
कर दया दृटि छुटकारा इन से, दिला दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।
अज्ञान ने भरमाया था हमें, और करम ने बहकाया था हमें ।।
सत संगत के बचन से भरम, मिटा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
पहले नहीं गुरु गम को जाना, जब आँख खुली तब पहचाना ।
निज रूप का दर्शन अपने घट में, करा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
तज पिंड को पहुँचा ब्रह्मांडा, आगे बढ़ आया सच खंडा ।।
सतधाम से सत का विमल स्वरूप,दिखा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
लख अलख अगम की गम पाई, ली राधास्वामी पद की शरनाई ।।
धुर धाम संत विसराम लोक, पहुँचा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी के नाम का मरम, जता दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।
24.तू सत है सत की दे सत्ता, सत की सत्ता से काम बने ।
तू चित है चित का चिंतन दे, लय चिंतन से विश्राम बने ॥॥
तू शान्ति है दे शांति को, हिया जिया में कुछ शान्ति मिले ।।
दुख चिंता से छुटकारा मिले, जोवन मेरा निष्काम बने ॥॥
तू अर्थ है अर्थ मिले मुझको, तू धर्म है धर्म मिले मुझको ।।
तू मुक्त है मुझको मुक्ति दे, सेवक का पूरन काम बने ।।।।
दे नाम हुआ नामी जब तू , दे रूप रूप जब धारा है।
जो नाम रूप नहीं कोई तेरा, तो यह भी अरूप अनाम बने ॥॥
राधास्वामी तू कहलाया, राधास्वामी पद दरसाया ।
इस नाम का सुमिरन छिन पल हो, यह सुमिरन आठों याम बने ॥॥
25.राधास्वामी मत वह क्या समझे, जो निगुरा और अज्ञानी है।
सत तत्व सार वह क्या जाने, गुरुमत नहीं नहीं गुरु ज्ञानी है ॥॥
कोई लोक लाज में अटका है, कोई रीति रसम में लटका है ।।
अज्ञान से उसने पकड़ी है, जो लोक में लीक पुरानी है ॥॥
बे ठौर ठिकाने की भक्ति, क्या देनी उसे सिद्धि शक्ति ।।
नहीं सूझी योग यतन युक्ति, निष्फल सब मानी गुमानी है ॥॥
नहीं नाम की महिमा को जाना, नहीं नामी पद को पहिचाना ।
तोते की रटन से अटकाना, सब भूल भरम भरमानी है ॥॥
जप तप में आयु गई सारी, रहा संसारी का संसारी ।।
अपना भी नहीं वह हितकारी, यह लाभ नहीं है हानी हैं ॥॥
नीचे नहीं नाम कोई पावे, ऊचे चढ़ चौथा पद पावे ।।
तब नाम राग की धुन गावे, वह पृथ्वी नहीं असमानी हैं ॥॥
नर देह की गति मति को जानो, जो कहता हूँ उसको पहचानो।
निज अनुभव से अपने मानो, नहीं भर्म के फाँस हँसाना है ॥॥
हैं कर्म इन्द्री नीचे भाई, ऊचे ज्ञान इन्द्री जगा पाई ।।
मन बुद्धि से जब ऊँचे जाई, इस विधि तुमको समझाना है ।।।।
तीनों से ऊँचे सुरत रहे, ऊँचे चढ़ कर वह शब्द गहे ।
इस शब्द में नाम का रूप लहे, यह नाम महा सुखदानी हैं ॥॥
नीचे कहाँ नाम का है बासा, चौथे पद बांध उसकी आशा ।
त्रिलोक में काल का हैं फाँसा, यह मर्म तुझे जतलानी हैं ।।॥
कर शब्द सुरत का तू साधन, तब हाथ आयेगा नाम रतन ।
राधास्वामी योग का सीख जतन, जो यह नहिं भर्म कहानी है ॥॥
26.मन में जब रम गई छबि सतगुरु की, योग युक्ति से ध्यान बना।
नर जनम सुफल भयो सहज रीति से,चित आनन्द की खान बना ॥॥
घट प्रकट विवेक की गति उमगी, साधन सम्पन्न हुआ जीवन ।।
इस साधन के प्रताप महातम से, अनुभव और ज्ञान बना ॥॥
बन में जाकर क्या लेता था, क्या लाभ था धूल उड़ाने में ।
मेरी दृष्टि में घर परबत और वन, सब ही एक समान बना ।।।।
रवि चन्द्र की कला प्रभा प्रकटी, जगमग जगमग हुई उजियारी ।।
उस ज्योति की ज्योति में रूपलखा, यू मेरा आत्मज्ञान बना ॥॥
नहीं काल कर्म व्यापे मुझको, नहीं चिन्ता दुविधा का भय हैं।
सुध बुध भूली है तन मन की, ममता तज गुरु अभिमान बना ॥॥
ब्यौहार में परमारथ आया, दोनों में भेद नहीं किंचित ।।
समदृष्टि समज्ञानी हो, समता से अब कल्यान बना ॥॥
राधास्वामी की है दया भारी, तारा तारा तारा मुझको ।।
भवसागर पार हुआ जीते जी, सत पद में अस्थान बना ॥॥
27.चेला नहीं एक मिला कोई, जो मिला वही गुरु ज्ञानी मिला ।
जोगी न मिला जंगम न मिला,तपसी न मिला नहीं ध्यानी मिला ॥॥
गुरु कपटी चेला पाखंडी, कोई नियमी धर्मी त्रिदंडी ।।
विश्वास के रूप में बनखंडी, अभिमानी मानी गुमानी मिला ॥॥
सिख साखा बहु किया करता है, क्यों मोह माया में मरता है ।।
दुख भार स स पर धरता है, अमृत तज तुझको पानी मिला ॥॥
ले चेत चेत चेत का बेरा है, तू चेत ले अभी सवेरा है।।
आगे फिर घोर अंधेरा है, नहीं चेती तो लाज लजानी मिला ॥॥
सतगुरु ने तेरी भलाई की, पद कमल की शरण दया से दी ।।
गुन राधास्वामी के गाओ, तब कहूँगा ठौर ठिकाना मिला ॥॥
28.गुरुभक्ति के पंथ में दया से मुझको, लगा दिया सतगुरु प्यारे ने ।
मेरी पकड़ के बांह को प्रेमनगर, पहुँचा दिया सतगरु प्यारे ने ॥॥
तीरथ देखे मूरत देखे, इन से क्या सार हाथ आता ।।
सतसंग में सारे तत्व का मरम, जता दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥
बाहर मुरवता के जाल फैसा, तरपा तरसा बेचैन हुआ ।
अन्तर साधन की विधि सिखलाके, चिता दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥
मैं कौन हूँ क्या हूँ कैसा हूँ, यह बात न समझा था अब तक।
घट की गुत्थी उलझी थी बहुत, सुलझा दिया सतगुरु प्यारे ने ॥॥
शबरी को राम ने तारा था, मीरा को श्याम ने तारा था ।
मैं तो राधास्वामी के चरण पड़ा, तरवा दिया सतगुरु प्यारे ने ।।।।
29.वह बच गया इस भवसागर से, सतगुरु ने जिसको तार दिया।
जिसे गुरु की संगत नहीं मिली, उसे काल करम ने मार दिया ।।।।
हुआ भाग उदय मेरा सजनी, मैं आ गया सतगुरु की शरनी ।।
संतसंग के बचन अमोल सुना कर, तत्व के सार का सार दिया ॥॥
माया का जाल बहुत भारी, जो फँस गया हो रहा संसारी ।
शुभ अशुभ करम के बदले में, यमराज ने कारागार दिया ।।।।
त्रयताप महा है दुखदाई, मुक्ति मिलनी है कठिनाई ।।
जो भरमा भूला जग में उसके सर पर दुख का भार दिया ॥॥
राधास्वामी परम संत आये, निज दया से मुझको अपनाये ।
हिये में था दबी प्रेम अग्नि, कृपा से उसे उद्गार दिया ।।।।
30.तुम व्यापक चर और अचर में हो, किस जगह हैं दृने जाऊँ मैं।
सब नाम और रूप तुम्हारे हैं, किस नाम रूप को ध्याऊँ मैं ॥॥
तुम शब्द स्पर्श रूप में हो, तुम रस में हो तुम गंध में हो ।
तुम देश में काल में वस्तु में हो, तुमको क्या कहकर गाऊँ मैं ॥॥
यह जीव जन्तु सत्ता हैं तुम्हारे, लोक परलोक सभी तुम हो ।
फिर किसको मन से छोड़े, मैं, और किसको मन से पाऊँ मैं ॥॥
अज्ञान में हो तुम ज्ञान में हो, विद्या में अविद्या में भी हो ।
किसको मैं मुंह से बुरा कहूँ, और अच्छा किसको बताऊँ मैं ॥॥
कहने वाले में रहते हो, सुनने वाले में बसते हो ।
किससे मैं तुम्हारी दू’ उपमा, किस किस का भेद सुनाऊँ मैं ।।।।
आकाश पवन अग्नि जल पृथ्वी, रूप तुम्हारे हैं स्वामी ।
स्वामी में सेवक में तुम हो, किस विधि से तुम्हें मनाऊँ मैं ।।।।
राधास्वामी का रूप लखा, चेतन विशेष का दरस मिला ।।
सामान्य को तज कर इस विशेष से, सच्चा नेह लगाऊँ मैं ।।।।
31.तू जान अजान से न्यारा है, तू जान नहीं अनजान नहीं ।
किसने तुझे जाना पहचाना, तू ज्ञान नहीं अनुमान नहीं ॥॥
इस बानी ने नहीं गम पाई, नहीं बुद्धि में आई चतुराई ।।
मन अमन बना घबराया हुआ, तू मान नहीं अभिमान नहीं ॥॥
अनजान को क्या कोई जानेगा, अदृष्ट को क्या पहचानेगा ।
जोगी ज्ञानी थक कर बैठे, उन्हें जान नहीं पहचान नहीं ॥॥
सच कहने को तो कहते हैं, कहकर संशय में रहते हैं।
इन कहने सुनने वालों में, अनुमान नहीं परमान नहीं ।।।।
कहाँ जाकर कोई तुझे पावे, कैसे तू किसी के हाथ आवे ।।
तर निश्चित कोई इस जग में है, ठिकान नहीं अस्थान नहीं ।।।।
स्वर्ग न नर्क का वासी तू , नहीं दुखरासी नहीं सुखरासी ।।
गम अगम को मथकर देखा, तू गान नहीं स्वर तान नहीं ।।।।
गाम्मामी सतगुरु आये, सुरत शब्द भेद कहकर गाये ।।
न भी ममाहित तब मेरा, इस समता का उत्थान नहीं ॥॥
32.भक्ति का तारा घट चमका, घट मेरो शोभा धाम बना ।
मानुष जीवन का फल पाया, हिया जिया का सुख विश्राम बना ॥॥
सत संगत में गुरु के आया, गुरु नाम दान ले हरषाया ।
गई काल करम की ठकुराई, बिगड़ा हुआ सारा काम बना ॥॥
क्रान्ती आई शान्ती आई, और चित में निर्धान्तिी आई ।।
गति नीर कमल की मुझे भाई, निबनी हुआ निष्काम बना ॥॥
गुरु नाम का तार बँधा घट में, नहीं पड़ता जग की खटपट में ।
क्यों अटकू माया की अटसट में, जब सच्चा सहाई नाम बना ॥॥
राधास्वामी ने तारा है, राधास्वामी ने बिगड़ी संचारा है।
पछताता नहीं न लजाता हूँ, सुख जीवन आठों याम बना ॥॥
33.भक्ति शोभा है जीवन की, भक्ति पाकर मैं संवर गई ।
बिगड़ी बहकी भरमी पहले, अब दया से गुरु के सुधर गई ॥॥
मद मोह लोभ और क्रोध गये, निर्मल मन सहज हुआ मेरा ।।
कोई कुटिल कुचाल कुरूप कहे, मैं तो अब सब विधि निखर गई ॥॥
संसार में रहती हैं सजनी, संसार हुआ अब सुखदाई ।।
माया और मोह का भेद मिटा, मैं इधर से लौट के उधर गई ॥॥
घट के अन्तर बैठक पाई, हुई सहज आप अब कठिनाई ।।
अन्तरै मुख जीवन मुझे भिला, माया की रसरी बिखर गई ।।।।
राधास्वामी ने की है दया भारी, दुख संकट दूर हुये सारे ।।
दुविधा ने संग तजा मेरा, अब सत्त लोक के डगर गई ॥॥
34.सतगुरु के चरन में आन पड़ी, पद कमल की सच्ची दासी बनी।।
दुख बिपत कलेश कटे मन के, सुख सहज भिला सुखरासी बनी ॥॥
अज्ञान अविद्या दूर हुये, अभिमान मोह मद चूर हुये ।
माया ममता सब दूर हुये, सत चित आनन्द प्रकाशी बनी ॥॥
फस भूल भुलैय्याँ भरमाई, और भरम में आकर घबराई ।
गुरु की संगत हुई सुखदाई, मैं मीन प्रेम जल प्यासी बनी ॥॥
खटका मिटा भरने जीने का, भय नहीं सिर भार के धरने का ।।
अब ध्यान है तारने तरने का, यह समझ गई अधिनासी बनी ॥॥
तारा चमका घट भक्ति का, राधास्वामी योग की युक्ति का ।।
संशय नहीं जीवन मुक्ति का, धुरं पद सत धाम निवासी बनी ॥॥
35.पीलिया पियाला भक्ति का, मतवाली हुई मस्तानी बनी ।
आनन्द मिला जब सूरत को, हरषानी हुई मगनानी बनी ॥॥
क्या प्रेम की महिमा कहे कोई, मन बानी शक्ति नहीं पाते ।।
बुद्धि, निबुद्वि है बनी चकित, वह असुध तो यह निर्बानी बनी ॥॥
यह प्रेम कठिन है और सुगम, जो अरये सीस सुगम उसको ।
दुविधा दुचिताई की पहुँच नहीं, वह अबल तो यह अज्ञानी बनी ॥॥
घटता नहीं दिन दिन बढ़ता है, है प्रेम में ब्रह्म का रूप सदा ।।
सिद्धि न शक्ति से हाथ लगे, वह भूली तो यह भरमानी बनी ।।।।
राधास्वामी ने ज्ञान दिया, सतगुरु पद का अभिमान दिया ।
माया ममता थककर भागी, वह ठिठकी तो यह घबरानी बनी ॥॥
36.भक्ति का प्याला मुँह से लगा, सुध तन मन धन की भूल गई ।
आनन्द मिला मतवाली बनी, सुख पाकर हर्ष से फूल गई ॥॥
अग्यों की पुतली का पाट बना, पलकों की चिक को नीचे गिरा।।
या प्यार को प्यार से अंग लगा, अब प्रेम हिंडोले झूल गई ॥॥
प्रेम महा सुखदाई है, यह प्रेम ही सच्चा सहाई है ।
गुरु से लगाई है, उसकी बिपता और सूल गई ।।।।
अपने पिया को मनाती है, वह प्रेम का गाना गाती है ।
हँसती है और मुसकाती है, माया बैरन निर्मूल गई ॥॥
राधास्वामी दया से दर्शन दो, मुझको भक्ति का अब धन दो ।
तब कहेगी वह संसारी चाह, कारन और सूक्ष्म अस्थूल गई ।।।।
37.डंके की चोट सुनी घट में, मेरी सुरत सखी मतवारी, बनी ।।
रन भूमी में काल कर्म के पग धर, लड़ने की अधिकारी बनी ॥॥
जो धनुष बान से लड़ते हैं, वह सच्चे वीर कहाँ सजनी ।।
इसलिये सुरत मेरी भक्ति पंथ, में आकर परउपकारी बनी ॥॥
मद मोह मान को विजय किया, माया ठगनी को मार दिया।
मन में नहीं किंचित डाह द्वेष, सतगुरु प्यारे की प्यारी बनी ॥॥
गढ़ अहंकार का तोड़ दिया, और कर्म का मटका फोड़ दिया ।
सतगुरु से नाता जोड़ दिया, नहीं भूले भी संसारी बनी ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित गाती हूँ।
अब राधास्वामी नाम दान की, सच्ची आज भिकारी बनी ।।।।
38.श्रुति स्मृति सद्ग्रन्थ का भेद, बता दिया सतगुरु स्वामी ने ।।
सन्तों का रहस्य विचित्र रूप, दरसा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
घट में सच्ची श्रुति मैंने सुनी, जिसे कभी सुनते थे ऋषि मुनि ।।
अवगन को त्याग के बनी गुनी, समझा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
यह गति मति कोई नहीं जाने, बिन जाने हुए कैसे माने ।।
अमृत रस बद की वर्षा को, बरसा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
लीला सब देखी नई नई, परगट हुए दृश्य भी कई कई ।।
उद्गीत राग की बानी को, सुनवा दिया सतगुरु स्वामी ने ॥॥
घट विजय की बीना बाज रही, धुन शब्द अनाहद गाज रही ।।
नभ मंडल में तारा चमका, चमका दिया सतगुरु स्वामी ने ।।।।
39.जब मानुष देह मिली तुमको, इस देह से औरों को कुछ दो।
जीतेजी इस संसार में कीरति, यश अदर सन्मान को लो ॥॥
धनवान हो तो तुम धन को दो, विद्या बाले हो तो विद्या दो।।
जिस गुण का तुम को भाग मिला,दो दो कुछ कुछ उससे दो दो ॥॥
नद नाले मेह की गंगा की, सागर की देख दशा प्यारे ।।
औरों के लिये यह हैं सारे, आते हैं यह काम में औरों को ।।।।
सूरज की चन्द्र की तारों की, जोती को देख समझ मन में ।
यह औरों के काम में आते हैं, चाहे घर में हो कोई बन में हो ।।।।
अपने लिये बन मधुबन उपवन, अपने लिये देख कहाँ तपवन ।।
यह औरों ही के लिये सब हैं, अपने मन तुम सोचो समझो ।।।।
जो देता है। वह लेता है, जो लेता है वह देता है।
जो नहीं देते वह क्यों निष्फल, फिर नाम धनी को लेते हो ॥॥
दो दान दया का दानी हो, दो दान ज्ञान का ज्ञानी हो ।
क्यों निष्फल जनम गंवाते हो, अभिमानी मानी गुमानी हो ।।।।
लेना हो तो लो यश कुछ देकर, जगत की हाट में आये हो ।
जो पहिले दिया था उसके बदले, आज यह सब कुछ पाते हो ॥॥
राधास्वामी जग में आये, भक्ति का दान दिया हम को ।।
दो प्रेम भक्ति तुम औरों को, बदले में पद निवनि को लो ।।।।
40.जब गुरु ने प्रेम दिया तुझको, सुन पल पल उसका ध्यान रहे ।।
कर भक्ति गुरु की तू निस दिन,और गुरु का छिन छिन ज्ञान रहे ।।।।
कोई साथी नहीं कोई संगी है, संसार महा क्षण भंगो है ।।
जा भूला दुखी हुआ मन में, और दुख में सब अनजान रहे ।।।।
माया का जगत में डेरा है, घर चिड़िया रैन बसेरा है। 1
मोच ले अभी सवेरा है, नहीं काम क्रोध मद मान रहे ।।।।
नहीं बाय न माँ नहीं भाई है, व्यवहार यह अगमापाई है।
गुरु भक्ति में तेरी भलाई है, कर भला बुराई से हानि रहे ॥॥
कोई किसी में भगन कोई किसीमें मगन, तेरी लागे गुरु चरनन में लगन ।
राधास्वामी का है। यह बचन, तुझे गुरु सुमिरन का ध्यान रहे ॥॥
41.जब अन्तर शब्द की धुन प्रगटी, बाहर का गाना भूल गया ।
घट में अपने बैठक पाई, मन द्वन्द मचाना भूल गया ॥॥
दृष्टि सृटि गति समझ पड़ी, जैसी दृष्टि तैसी सृष्टि ।
काल कई माया और भर भर, आँख दिखाना भूल गया ॥॥
तीन ताप की बिएत गई, कलि के कलेश दारुन मेटे ।।
गुरु चरन कमल की छाँह मिली, उत्पात में आना भूल गया ॥॥
शान्ती है निभ्रान्ती है, आनन्द है सुख का जीवन है ।
दुखदाई जग सुखदाई है, दुचिता दुख पाना भूल गया ॥॥
राधास्वामी की ली शरनाई, निज रूप की मुझको समझ आई ।
समझा सत्र को अगनापाई, मन इससे लगाना भूल गया ॥॥
42.मन में नहीं चिन्ता कोई रही, जब चित से राधास्वामी नाम लिया ।।
गुरु की संगत पाई जब से, दुचिता दुर्मति सब भाग गई ।
आनन्द हर्ष च दिश छाया, सुख शान्ती आठों याम लिया ।।।।
जब फन्द कटे निरद्वन्द बने, संतोष क्षमा का धन पाया ।
गुरु दया से अर्थ धर्म मुक्ति, और योग युक्ति से काम लिया ॥॥
बल शक्ति मिली है गुरु की दया, उत्साह हीन अब हम न रहे ।
जब नाम की ढाल हाथ में ली, तब काल चक्र को थाम लिया ॥॥
भव भय का भाव मिटा मन से, निर्भय निद्वन्द अवस्था है।
सुमिरन और ध्यान भजन क्रिया से,सोध के मन विश्राम लिया ॥॥
राधास्वामी ने की दया अद्भुत, चरनों में लगा कर अपनाया ।
कुछ दिन जग जीवन के पीछे, फिर राधास्वामी धाम लिया ॥॥
43.जब घट विवेक सागर न्हाया, तन मन शुद्ध हुये सारे ।
कुछ तज निर्मल विमल बना, तरकर कुटुम्ब और कुल तारे ॥॥
नभ मंडल सुरत चली पग दे, चढ़ त्रिकुटी के स्थल आई ।
प्रकाश चांद सूरज का है, जगमग जगमग लाखों तारे ॥॥
वहाँ लाखों शिव ब्रह्मा विष्णु, देवी देवों की नहीं गिनती ।
यह किसी में सिद्धि शक्ति नहीं, जो गिने उन्हें न्यारे न्यारे ॥॥
सत रज तम है यह ओम् रूप, और ओम् में हैं यह तीनों गुन ।
मृदंग की धुन जब पड़ी कान में, तन मन सब मेरा हुलसारे ।।।।
राधास्वामी ने नाम दिया, बिगड़ा हुआ मेरा काम किया ।।
भय चिंता किसकी करू भाई, जब सतगुरु हो गये रखवारे ॥॥
44.है भक्ति सकाम मेरी स्वामी, यह भक्ति मेरी निष्काम बने ।।
में आरत बन कर आया हूँ, इस आरत का अब काम बने ॥॥
अर्थ धर्म काम और मुक्ति, सब गुरु की संगत से मिलते ।।
मेरा अर्थ बने मेरा धर्म बने, मेरी मुक्ति बने मेरा काम बने ।।।।
मन चंचल है अज्ञानी है, मन मेरा मानी गुमानी है ।
इस मन से छुटकारा दीजे, मन निश्चल हो निष्काम बने ॥॥
अथ काम न मेरा बनाओगे, निष्काम नहीं मन होने का ।
हो कामना मन की सभी, तब इस मन का विश्राम बने ॥॥
भी नहीं हैं नहीं जिज्ञासु, आरत नहीं मैं निज स्वार्थी हूँ ।
की ओर दृष्टि मेरी, इस अर्थ में धन और धाम बने ॥॥
से मना हैं विकल सदा, दुख आपत संकट से घिरा ।
संकट को मेरे, सुख आनन्द आठों याम बने ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित गाता हूँ ।
हो ऐसी दया मेरा मस्तक अब, राधास्वामी धाम बने ॥॥
45.राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
राधास्वामी सतगुरु परमसंत के, चरन कमल में परनामी ॥॥
राधास्वामी दयाल जग में आये, सुरत शब्द योग मत दरसाये।
दुखियों दीनों को अपनाये, दी पद सरोज में विश्रामी ॥॥
राधास्वामी नाम की धुन गाई, धुन आत्मिक विधि से समझाई।
चित चेत गया ली शरनाई, धुन पर उपकारी निकामी ॥॥
राधास्वामी ने घट का पता दिया, घट के रस्ते को बता दिया ।
घर चलने का उलटा है रस्ता, उलटावे नाम मिले नामी ॥॥
राधास्वामी पद सबसे ऊँचा, कोई विरला संत वहाँ पहुँचा ।
नीचे उसके हैं पद सारे, राधास्वामी भज आठों यामी ॥॥
46.गुनातीत गुन सगुन स्वरूपम्, अविनाशी राधास्वामी ।
निराकार साकार अनूपम, सुखरासी राधास्वामी ॥॥
दीनानाथ कृपाल दयाला, प्रतिपाला जगदाधारी ।
सत्तलोक सतधाम निवासी, सतबासी राधास्वामी ॥॥
विरज विभो मंगल दानी, चेतन धन विमल आनन्द महा ।।
काम अकाम सकाम प्रकाशी, कैलाशी राधास्वामी ॥॥
रूप रहित आकार रहित, मन अमन रहित अद्भुत धामी ।
नहीं नाम अनाम नहीं नामी, सवनामी राधास्वामी ॥॥
गुरु रूप में तेरी महिमा है, इस रूप में प्रेम मिले मुझको ।।
मन बचन कर्म से जपा करू, राधास्वामी राधास्वामी ।।।।
47.चांद सूर तारागन अग्नी, में तेरा चमकारा है।
चाँद सूर तारागने अग्नी, की आँखों का तारा है ॥॥
नाम न रूप न रंग न रेखा, एक अनेक नहीं है तू ।।
कैसे तेरी अस्तुति गाऊँ, तू मन बानी के पारा है ॥॥
कहना सुनना मन की कल्पना, मन की पहुंच नहीं तुझमें ।।
मन नहीं अमन नहीं तू स्वामी, मन और अमन से न्यारा है ॥॥
नेति नेति कह वेद पुकारें, एति एति संसार कहे ।
क्या है किसने जाना तुझको, सब में तेरा पसारा है ॥॥
हां और नहीं के बीच में रह कर, सत है और असत है तू ।।
हां और नहीं के मध्य का बासी, दोनों का विस्तारा है ॥॥
यह है वह है यह नहीं वह नहीं, बुद्धि बनी अबुद्धि मेरी ।
अगुन सगुन गुन कैसे कहे कोई, तू दोनों का सहारा है ॥॥
जो देश काल और वस्तु नहीं है, देश काल और वस्तु है तू ।।
तू व्यापक तू अव्यापक है, तू उनका भी आधारा है ।।।।
मैं हूँ तेरा तू है मेरा, मै तू तू मैं यह समझा।
तू तू मैं मैं में पड़ कर फिरता, जीव मारा मारा है ॥॥
क्या कहूँ ठिकाने बुद्धि नहीं, फिर भी यह कहता रहता हूँ ।
नृ भ्राता है पितु माता है, तू ही सम्बन्धी पियारा है ।।।।
1 दृष्टा मेरी दृष्टि का, तू सृष्टा मेरी सृष्टि का ।।
1 मुझ में हैं मैं तुझमें हूँ, तेरी ही दया ने तारा है ॥॥
राधास्वामी बन आया, अपने आप को दरसाया ।
क रूप की लीला दिखलाया, बंधन से मेरा छुटकारा है ॥॥
मायामी राधास्वामी, राधास्वामी राधास्वामी ।
परम मंत्र में सब कुछ है, यह सुरत शब्द भंडारा है ॥॥
48.हमें भी दे तार लाखों तारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।
लगादे भव जल के अब किनारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।।।।
न ही किसी से हमारा नाता, न हम किसी का सहारा है।
रहें सदा तेरे ही सहारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥
न मोह माया का मन में खटका,न काल और कर्म का हो झटका।।
निवास कर मन में अब हमारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥
दे प्रेम भक्ति का दान हमको, न दे तू सन्मान मान हमको ।
यही है बिनती हमारी निस दिन,दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥
दे खोल दृष्टि तुझे पिछाने, दरस परस करके तुझको मानें ।
उदय हों घट स्वर चन्द्र तारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ।।।।
अलख अगम का दिखा तमाशा, दिलादे निज धाम में तू बासा ।।
चरन कमल के रहें सहारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥
जपू सदा मन से राधास्वामी, कहूँ सदा मुख से राधास्वामी ।।
दिला दिला नाम धन दुलारे, दयाल दाता कृपाल स्वामी ॥॥
49.था असत में सत सत जब प्रगटा, सत्ता से तब संत नाम बना ।।
सत में सोहं फुरना प्रकटी, सोहं सोहं का धाम बना ॥॥
सोहं से हिरण्यगर्भ प्रगटा, यह शून्य अवस्था है प्यारे ।।
इस सोहं शून्य से ओम् बना, और ओम् त्रिगुन का ठाम बना ॥॥
यह ओंकार है सूक्ष्म, सूक्ष्म में, जब स्थल की गति आई ।।
स्थूल विराट हुआ भाई, इससे सृष्टि का काम बना ॥॥
पहिले नहीं एक न दो था कभी, सत भाव में एक का है बासा ।।
यह एक अनेक में आप फिरा, और उसी से रूप और नाम बना ।।।।
धारा फटी जीव जन्तु बने, सुषुप्ति में प्राग्य दशा प्रगटी ।
सुषुप्ति से स्वप्न की उत्पति है, तेजोमय और सत काम बना ।।।।
जाग्रत आई तब विश्व हुआ, इस विश्व को समझे संसारी ।।
धर्म अर्थ मुक्ति और काम आये, दुख और सुख आठों याम बना ॥॥
यह लोक परलोक के झगड़े हैं, और पाप पुण्य के रगड़े हैं।
इन से फिर भेद दंड प्रगटे, और दाम बना और साम बना ॥॥
जो इनमें फंसा वह मारा गया, वह बचा जो इनसे न्यारा है।
जिसको यह भेद दिया गुरु ने, सत भाव बना सत काम बना ॥॥
राधास्वामी ने समझाया, सुरत शब्द को मारग दरसायो ।
इस पन्थ में भाग्य से जो आया, जीते ही जी विश्राम बना ॥॥
50.राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी पल छिन गाना ।
राधास्वामी है मूल यतन, भक्ति और योग युक्ति ज्ञाना ॥॥
जब से गुरु चरणों में आया, फल नर जीवन का सहज पाया।
छुट गये मान ममता माया, जब निज स्वरूप को पहचाना ॥॥
नहीं कहीं आया नहीं कहीं गया, नहीं जपी तपी बनखंडी भया ।।
सतगुरु दाता की हुई दया, घट भेद मिला है मन माना ॥॥
मुखमन की सीधी राह चला, इस राह में आकर नहीं टला ।
मतगुरु स्वामी की गोद पला, सतगुरु ने कर दिया मस्ताना ॥॥
गुरु जगत में सच्चे दाता हैं, पितु माता धरता विधाता हैं।
गुरु सम्बन्धी हित भ्राता हैं, गुरु राधास्वामी को जाना ।।।।
51.राधास्वामी के चरन कमल में, बार बार परनाम करूँ ।।
तन मन अरपूँ सीस नवाऊँ, स्तुति आठों याम करूँ ॥॥
अपने आपे की सुध भूलू, गुरु आपा मेरे चित्त बसे ।।
यह दोनों मिलकर एक बने, मैं समझ बझकर काम करूँ ॥॥
मतगुरु का रूप है रूप मेरा, और नाम गुरु का नाम मेरा।।
म रूपका चिंतन मनन करू,और नाम सुमिर विश्राम करू ॥॥
नहीं काम से काम मुझे भाई, नहीं लोभ से लोभ की जड़ताई ।
बेकार नहीं रहता हूँ कभी, मैं काम जो हो निष्काम करू ॥॥
गुरु द्वौत नहीं अद्वैत नहीं, गुरु मेरा वसिप्ट अद्वत नहीं ।
गुरु द्वेताद्वैत नहीं प्यारे, गुरुपद को समझ गुरुनाम करू ।।।।
सतसंगत में जो बचन सुने, श्रवण और मनन की जान विधि ।
निधिध्यासन करके चैन लहूँ, वृत्ति की रोक और थाम करू ॥॥
तन में मेरे सतगुरु व्यापा है, गुरु का आया मेरा आपा है ।।
मस्तक में गुरु का बासा है, बासा राधास्वामी धाम करू ॥॥
52.पी नाम सुधारस प्यास बुझे, आशा की अग्नी मंद पड़े ॥
जो आस की फंद पड़ा प्राणी, तू जान अनाड़ी अज्ञानी ।
भव द्वन्द के कीचड़ में सानी, चौरासी की योनी में सड़े ॥
बल बुद्धि विवेक में जो पूरा, रनधीर वीर योद्धा सूरा ।
करे मान मोह मद का चूरा, माया की रन भूमी में लड़े ॥
जो खाता पीता सता है, आलस में जनम को खोता है।
वह अन्त काल में रोता है, नरकों की कुन्ड में आय गड़े ॥
झूठा सब भोग विलासा है, झूठा सब सैर तमाशा है।
नर पानी बीच बतासा है, क्यों भर्म भ्रान्ति गढ्डे में अड़े ॥
भज राधास्वामी नाम सदा, जल्दी सतगुरु की शरन में आ ।
ले नर जीवन को अपने बना, नहीं काज तेरा सारा बिगड़े ।।
53.जब नाम का हीरा हाथ लगा, मद मोह के धन को त्याग दिया ।
जिसने मेरे साथ द्वष ठानी, की द्रोह ईष्या मन मानी ।।
मैंने उसे सोच समझ मन में, सप्रेम भाव का भाग दिया ।।।।
मन मन्दिर मेरा सुहाना बना, भक्ति की सजावट पाके सजा ।
माया ममता भय अहं के घर को, तत्छन आय ही त्याग दिया ॥॥
पर निंदा निंदक करते हैं, और पापकी मौत से मरते हैं ।
मुझे नाम का दान दिया गुरु ने, मैंने सबको अनुराग दिया ॥॥
सुखमान सरोवर में न्हाया, हंस संग मोती चुन लाया ।
राधास्वामी संग चित से भाया, अधिकारी को भक्ति मांग दिया ॥॥
54. जब घर में अनहद तान सुनी, मुख से फिर नाम लिया न लिया।
जिन या संसार की गति जानी,जिसके वश में कर्म और मन बानी।
जिन परहित निज स्वारथ मानी,उन धन का दान दिया न दिया ॥॥
जिन काम क्रोध मद तज डारे, जिन लोभ मोह से भये न्यारे ।
गुरु प्रेम अमी रस मतवारे, उन गंगा नीर पिया न पिया ॥॥
जिन सार अर्थ सतसंग पाया, भ्रम फॉस केटी छटी माया ।
राधास्वामी नाम सुन हर्षाया, उन योग विराग किया न किया ॥॥
55.किस मुह से तेरी स्तुति गाऊँ, तू आदि अन्त अविनासी है।
नहीं काल करम का भय तुझको, तू आनन्द धन सुखरासी है ॥॥
सब में है सब से न्यारा है, कुल सृष्टि में तेरा पसारा है ।।
तु सबका सहज सहारा है, सत पद धुर धाम निवासी है ॥॥
हर वस्तु में आकर व्यापा है, तेरा ही सब में आपा है।
तग सब तोला लाया है, घट घट को निस दिन बासी है ॥॥
५ोती की ज्योति है तू प्यारे, क्या चन्द्र सूर्य और क्या तारे ।।
न ही हैं सब आधारे, ज्योतिर्मय सर्व प्रकाशी है ॥॥
मी राधास्वामी, तेरे चरन कमल में परनामी ।
नाम का तू नामी, तेरे बिन सब में उदासी है ॥॥
56.अमन बना आप ही, बानी तजकर निबनी हुआ।
गया में विदेह बना, अज्ञान को छोड़ा ज्ञानी हुआ ।।।
जड़ता त्यागी चेतन हूँ अब, चेतन को त्याग बना हूँ सत् ।।
नहीं सत का असत का संशय रहा, संशय को तज विज्ञानी हुआ ॥॥
सम्बन्ध किया जिससे मैंने, रूप उसका धार लिया मन में ।।
सम्बन्ध में मानी गुमानी बना, यह छूट गया तो अमानी हुआ ॥॥
भक्ति आई मैं भक्त बना, वैराग्य किया वैरागी बना ।।
जब ग्रहण त्याग दोनों छोड़े, केवल कैवल्य अभिमानी हुआ ।।।।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति छोड़ी, तुरिया पद में जाकर पहुँचा ।।
तुरिया गई तुरियातीत बना, निज रूप का फिर अस्थानी हुआ ॥॥
नामी बना नाम से लव लाया, तज नाम अनामी कहलाया ।
तज नाम रूप दोनों भाई, पानी पानी मिल पानी हुआ ।।।।
राधास्वामी सतगुरु आये, इस तत्व रहस्य को समझाया ।।
जो बना वह बिगड़ेगा एक दिन, परखा जिसने गुरु ज्ञानी हुआ ।।॥
57. संसार असार में भूला है, संसार असार में सार नहीं ।
सब भूल भुलैय्याँ है भाई, इस भूल का वारा पार नहीं ॥॥
अनयास ताप में तपता है, यह घर रेन का स्वपना है ।
सपने की चिंता क्या करना, सपने ही का विस्तारा है ॥॥
जब सोये स्वप्न का दृश्य लखा, जब जागे दृश्य तो लोप हुआ ।
इस दशा को सोच समझ मन में, यह भरम का सकल पसारा है ॥॥
यहां नहीं कहीं है। स्थिरताई, स्थिरता यहां कैसे आई ।।
है। नाशवान हर वस्तु यहां, तूने नहीं कभी विचारा है ॥॥
अज्ञान अविद्या के बन्धन हैं, फंसे बुद्धि चित और मन हैं ।
जिसे ज्ञान मिला गुरु की संगत, उसको केवल छुटकारा है ।।।।
जिसमें नहीं ज्ञान नहीं भक्ति, जिसमें विवेक की नहीं शक्ति ।
यह समझ ले उसको करम काल, ने और माया ने मारा है ॥॥
भज भज ले नाम सदा गुरु का, भटका नहीं खा सतपंथ में आ ।
राधास्वामी ने समझाया, जो समझे गुरु का प्यारा है ॥॥
58.किस भर्म में भूला है भाई, अनजान है या तू सियाना है ।
संसार है यह अगमापाई, नहीं मन को इससे लगाना है ॥॥
इस द्वन्द अवस्था में पड़कर, बुद्धि नहीं तेरी ठिकाने रही ।।
दुविधा दुचिताई के फंदे, इन फन्दों में तुझको फंसाना है ॥॥
दिनरात है जनम है और मरन, सृष्टि प्रलय विष और अमृत ।।
जहां लोक है वहां परलोक भी है,यह भेद तुझे समझाना है ॥॥
यह तेरे सहारे रहते हैं, तू उनके सहारे नहीं रहता ।।
इनको समझा सुख प्राप्त हुआ,नहीं समझा तो आंसू बहाना है ।।।।
तू आंख नहीं तू कान नहीं, दोनों से न्यारा रहता है।
यह देह नहीं है रूप तेरा, इसे मिट्टी में मिल जाना है ।।।।
तू अजर अमर है अविनाशी, तू सत चित आनन्द का रासी ।
अपने सत में सत प्रकाशी, बस इतना ही जतलाना है ॥॥
राधास्वामी सतगुरु आये, सत पद को मारग दरसाये ।
सुरत शब्द योग विधि सिखलाये, भक्ति के पंथ चलाना है ।।।।
59.राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।
राधास्वामी दिवसं राधास्वामी रैनं, राधास्वामी बैनं राधास्वामी सैनं ।
राधास्वामी भजो आठों यामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।
राधास्वामी पितरं राधास्वामी माता,राधास्वामी करता धरता विधाता ।
राधास्वामीपद में विश्रामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी विद्या राधास्वामी द्रव्यं,राधास्वामी मूलं राधास्वामी सर्व ।।
राधास्वामी मेरे अन्तर्यामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी सत्यं चितानन्दं, राधास्वामी गुप्तं राधास्वामी विदितं ।
राधास्वामी सुमिरो निकामी, राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ॥
राधास्वामी शुद्ध नित्य विमुक्त, राधास्वामी ज्ञान भक्ति संयुक्त ।।
राधास्वामी अनाम राधास्वामी नामी,राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी
60.क्यों रोता रहता है हरदम, क्या लुप्त है आँसू बहाने में ।
हँस खेल मिलेगी खुशी तुझे, हँसने में और हँसाने में ॥॥
इल्म में अक्ल में होश खिरद के, बनने में जो जौहर है निहां ।
वह शक्ल बदल कर है जाहिर, नादान में और दिवाने में ॥॥
साये में नूर में फर्क कहां, जो असल में है वह नकल में है ।
जो दिल में रूह में है मक्फी, वही जिस्म के है काशाने में ॥॥
सच झूठ की है बुनियाद एक, किसको कहूँ बद और किसको नेक ।।
है बात की बात में बात ओ खुद, शामिल है बात बनाने में ॥॥
आवाज में है और साज में है, वह राज में नाजो नियाज में है।
दमबाज में है दमसाज में है, बाजे में है बाजे बजाने में है ॥॥
वहदत में कसरत का है पता, कसरत में खिलवत की है जा ।
है एक हजार लाख जब खुद, क्या धरा है गिनती गिनाने में ॥॥
वहदत का जाम पी ले जाबित, हरहाल में मस्ती खुशी मिले।
है राधास्वामी की यह सुनले सदा,और खुशी है दिल बहलाने में ॥॥
61.कोई कैसे जाने हकीकत को, हक से नहीं है जब काम उसे ।
हक नाहक की कुछ समझ नहीं, नहीं हक का मिला पैगाम उसे ॥॥
है वहम में फसकर हैरानी, और हैरानी से परेशानी ।।
दिल उसका हुआ बेचैन चैन से, समझलो तुम नाकाम उसे ॥॥
नहीं संगत सतगुरु की पाई, नहीं सच्ची समझ बुझ आई ।।
फिर जात की कैसे मिलती खबर, घेरे हुये हैं औहाम उसे ॥॥
दुनियाँ के दीन के झगड़े हैं, इन झगड़ों ने धर कर रगड़े हैं।
इन झगड़ों रगड़ों में जो फसा, दिन रात कहां आराम उसे ।।।।
कह दो उनसे कुछ सहबत कर, ले दिल में अपने गुरु का असर।।
बेफिकरी से हो जिंदगी बसर, न फंसायेगा दुनियाँ का दाम उसे ॥॥
खिलवत कसरत की समझ आये, नहीं भरम करम नित भरमाये ।
वहदत का रंग कुछ जम जाये, मिल जायेगा मस्ती का जाम उसे ॥॥
दुनियां और द का बन बंदा, बंदा बनके हुआ है गंदा ।
यह गंदगी सब मिट जायेगी, नजर आये जो हक का नाम उसे ।।।।
न वह भूल के दुनियां घर छोड़े, नहीं जर्मी न जन नहीं जर छोड़े।
सतगुरु से नाते को जोड़े, फिर सुख है सुबह व शाम उसे ॥॥
जब तक गुरु हाथ न आयेगा, कोई पता न हक का पायेगा ।
नित भरमेगा भरमायेगा, छोड़गे न दर्द आलाम उसे ॥॥
गर शौक हो तुमको बिसाले सनम,सुलतानुलजकार का शागिल बन ।
फिर दिल से कलामे हक को सुन,है राधास्वामी का पैगाम उसे ॥॥
62. मौजूद वजूद की है सूरत, मौजूद ही आप वजूद हुआ ।
हाजिर में हुज्जत है बेजा, गायब का दम बेसूद हुआ ॥॥
जो गायब में है वह गायब है, गायब के खयाल से बाज आओ ।।
हाजिर को बचश्म हाल देखो, हाजिर ही कमाल नमूद हुआ ।।।।
मोजूद वजूद समूद बऊद, हालात हाल के हैं जाहिर ।।
जो जाहिर है वही बतिन है, जाहिर बातिन का शहूद हुआ ॥॥
किस खुदा का सिदा करते हो, क्यों बंदा बनकर मरते हो ।
क्या नहीं सुना है। तुमने कभी, सबका आदम मस्ज़द हुआ ।।।।
अशरफ अकमल अकबर अजमल, औसाफ हैं यह सब आदम के ।
आदम अफजल है मोकद्दस है, आदम मंजिले मकसूद हुआ ।।।।
आदम में खुदा को तलाश करो, इस राज को कभी न फाश करो।
आदम मजहर है हकीकत का, आदम ही कुल बहबूद हुआ ॥।।
जो हक है हक की हकीकत है, वह हक से जुदा नहीं हरगिज ।
क्या यहाँ है हक के सिवा भाई, यह हक ही नुजूलो सऊद हुआ ।।।।
मैराजे तमन्ना है आदम, काभिल इन्साँ का कमाल सुनो।
मस्जूद मलिक और नूर फलक, वही जैमी में खुद मसऊद हुआ ॥॥
लोलाक का कल्मा पढ़ो खादिर, मसजूद मलायक तुम खुद हो ।
आदम को न सिजदा किया जिसने, मखहूर हुआ मरद हुआ ॥॥
जो अलरफनफसहू को जाना, उसने रब को भी पहचाना ।
है राधास्वामी का फरमाना, यह खुद ही खुद माद हुआ ॥॥
63.॥ बन्दनम् ॥
बन्दनम् संत ज्ञान दाता, बन्दनम् सत ज्ञान मय ।।
बन्दनम् निर्वाण राता, बन्दनम् निर्वाणि मय ॥॥
भक्ति मुक्ति योग युक्ति, आपके आधीन सब ।।
आप ही हैं सिंध सद्गति, जीव जन्तु मीन सब ॥॥
आप गुरु सतगुरु दया, और प्रेम के भंडार हैं।
आप करता धरता हैं, करतार जगदाधार है ॥॥
ऋद्धि सिद्धि शक्ति नवनिधि, हैं चरन में आपके ।
बच गया भव दुख से, जो आया शरण में आपके ॥॥
भक्ति दीजे नाम की, सत नाम में विश्राम दे ।।
राधास्वामी अपना कीजे, राधास्वामी धाम दे ।।।।
64.मंगलम्
मंगलम् गुरु शब्द रूप, अनाम नाम प्रकाशनम् ।।
मंगलम् शब्दार्थ शब्दाधार, शब्द निवासनम् ॥॥
गुप्त अपने आप में, जब अलख अगम अनाम आप ।।
जब प्रगट आनन्द ज्ञानाकार, और सत धाम आप ॥॥
साज संत समाज मंगल, काज जीव उद्धार को ।
आपने धारन किया है, परम सन्त अवतार को ।।।।
आप हैं आधार सब के, आपके आधार संब।
चार पार से रहित आप हैं, आप वारापार सब ॥॥
संग देकर सत का सतसंगत में, जीव अधीन को ।
सिंध सद्गति से मिलाया, जीव रूपी मीन को ॥॥
सैन बैन का असर, सतसंग द्वारा दान दे ।
शब्द योग सिखाया अनहद, धामपद निर्वानि दे ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, पार भव से कीजिये ।
भक्ति युक्ति योग जुगती, ज्ञान शक्ति दीजिये ।।।।
दया कीजे मेहर कीजे, लीजे चरनों में लगा ।।
आपको मैं हो रहूँ, भरमों का मटका फोड़कर ॥॥
राधास्वामी दीन हित, भवनिध से बेड़ा पार कर ।
यह है मेरी बेदना, संसार से मुख मोड़ कर ॥॥
65. पहली धुन
- करता धरता और है, तुम ध्यान में उसके लगो ।
वह है क्या सतसंग कर, पहचान में उसके लगो ।।।।
नाम का सुमिरन करो, वृत्ती को चित के रोक कर ।।
महज साधन में रहो, और ज्ञान में उसके लगो ॥॥
कुछ नहीं दुर्गम, सुगम सब है, जो मन निर्धान्त हो ।
सच्चा स्वामी घट में है, अभिमान में उसके लगो ॥॥
सोचो समझो परखो निरखो, जागे अनुभव काम हो ।
है तुम्हारे तन में वह, अनुमान में उसके लगो ॥॥
राधास्वामी नाम लो, पढ़ राधास्वामी योग को ।
अपने अन्तर आयो खोज, और जान में उसके लगो ॥॥
66.सब में है और सबसे न्यारा, क्या कहे कोई उसे ।
सबके अन्दर है वह प्यारा, क्या कहे कोई उसे ॥॥
वह अचल निश्चल है, मन बानी नहीं पाते उसे ।
सार का है सार सारा, क्या कहे कोई उसे ॥॥
दूर है और सन्निकट है, सन्निकट है दूर है।
दोनों ही काम हे सहारा, क्या कहे कोई उसे ॥॥
बुद्धि निर्णय कर नहीं सकती, न मन की है पहुँच ।।
विद्या ने दोनों को मारा, क्या कहे कोई उसे ।।।।
इन्द्रियों से हाथ आना उसका, कभी समझो नहीं ।
किसने पाया वार पारा, क्या कहे कोई उसे ॥॥
मन चली बुद्धि चले, यह थक गया वह बढ़ गया ।
वह न सुत धन और दारः, क्या कहे कोई उसे ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, ज्ञान का परिचय दिया ।
पहुँचे भवसागर के पारा, क्या कहे कोई उसे ॥॥
67.पद कमल में सिर झुके नित, दोनों कर को जोड़कर ।।
आपही का हो रहूँ, मन मोड़ तोड़ मरोड़ कर ॥॥
कठिन माया जाल है, और कठिन काल कराल है ।।
कठिन जग जंजाल है, दुख पाया नाता जोड़कर ॥॥
शान्ती जाती रही, और भ्रान्ती चित में बसी ।।
आप पर दृषि गई, आया शरण सब छोड़कर ॥॥
दया कीजे मेहर कीजे, लीजे चरनों में लगा ।।
आपको मैं हो रहूँ, भरमों का मटका फोड़कर ॥॥
राधास्वामी दीन हित, भवनिध से बेड़ा पार कर ।
यह है मेरी बेदना, संसार से मुख मोड़ कर ॥॥
68.गुरु के दर्शन के बिना, अब नींद तक आती नहीं।
जग की वस्तु कोई भी, मन को मेरे भाती नहीं ॥॥
आवो प्यारे देवो दर्शन, हूँ विकल मैं रात दिन ।
ताकती हूँ राह तेरी, छवि ही नजर आती नहीं ॥॥
मैं तो तेरे शरण आई, तुमको मेरी लाज है।
छोड़ कर तेरे चरण मैं, अब कहीं जाती नहीं ॥॥
तेरा ही विश्वास है, और तेरी मुझको आस है।
तू है साथी एक मेरा, और कोई साथी नहीं ॥॥
मेट कर त्रय ताप चित को, मेरे करदे आप शान्त ।।
राधास्वामी भक्ति दीजे, शक्ति घबराती नहीं ॥॥
69.शान्ती सच्ची सदा, गुरु नाम के सुमिरन में है।
आप जानोगे कि दुख सुख, खेल सारा मन में है ॥॥
अपने आप में रहो, चित की रहे नित रोक थाम ।
शान्ती उसको कहाँ, दिन रात जो अनबन में है ॥॥
वस्तु है घर में तुम्हारे, खोज घर ही में करो ।।
शान्ती की वस्तु घट के, अपने ही बरतन में है ॥॥
त्तियों को चित की, अंतर में करोगे जो निरोध ।।
यह समझलोगे कि, सिद्धि शक्ति सब साधन में है ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम लो ।
नाम का विश्राम प्यारे, शब्द के श्रवण में है ॥॥
- मैं हूँ उसका वह है मेरा, बस यही एक आस है ।।
संसार मेरे नयनों की, परमात्मा की सांस है ॥॥
मन में वह आकार समावे, उसका मन हो मेरो मन ।।
एक दिन ऐसा ही होगा, होगा यह विश्वास है ॥॥
उसमें मैं रहता हूँ, सोता खाता पीता जागता ।।
जब सुषुप्ती आई वह, प्रीतम निकट और पास है ॥॥
भर्म से अज्ञान है, उसकी समझ मुझको नहीं ।
जब भरम जाता रहेगा, फिर वह सांस और भास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, उससे अब होगा मिलाप ।।
वह मिला पहिले से, केवल देह का अध्यास है ॥
71.क्या है ईश्वर किसमें ईश्वर, है कहां रहता है वह ।
करता क्या धरती क्या है, और क्या कहता है वह ॥॥
कुछ दिनों सतसंग हो, ईश्वर की तब आवे समझ ।
जो समझता ही नहीं, भव सिंध में बहता है वह ॥॥
तुमने कब समझा उसे, और कैसे आई यह समझ ।
अंन समझ दुख अग्नि में, संसार के दहता है वह ॥॥
जितनी जल्दी हो सके, संगत करो संगत करो ।।
जिसको सतसंगत नहीं, आपति बिपत सहता है वह ॥॥
राधास्वामी ने दया की, दी कमल पद की शरन ।
यह शरन हाथ आई जिसके, चैन सुख लहता है वह ।।।।
72. आये थे बहरे जहाँ में, हुम नहाने के लिये ।।
यह न समझे आये थे हम, गोते खाने के लिये ॥॥
तुमको देखा तुम थे गोते, खाते रहमें आया हमें ।
हाथ फैलाया उसी दम, फिर बचाने के लिये ॥॥
बच गया अच्छा हुआ, अच्छा हुआ तुम बच गये ।
हम चले अब राह जब, आये थे जाने के लिये ॥॥
सैर दुनियां होगई, तेरे नहाये चल बसे ।।
बदनसीब आया यहां, आंसू बहाने के लिये ॥॥
मिल गया मुर्शद दिया, उसने मुझे हक का पयाम ।।
राधास्वामी आये वह, नुक्ता सुनाने के लिये ॥॥
73. रोशनी का तार जब, जाहिर हुआ तारा बना ।।
आस्मां पर जाके चमका, सबका खुद प्यारा बना ॥॥
नूर की सबको तलब है, वह है मैराजे तलब ।
तालिबे हक के लिये, वह हक को चमकारा बना ॥॥
इल्मे हस्ती औ खुशी, तीनों हैं जलवे नूर के ।।
नूर नूरानी हुआ, और नूर नज्मे आरा हुआ ॥॥
माद्द में नूर है और, नूर ही है रूह में ।।
गौर करके देखा जब वह, सारे का सारा बना ॥॥
राधास्वामी की मेहर से, नूर का कर इक्त साब।
नूर इस आलिम में, सिकन्दर बना दारा बना ॥॥
74. वह सुखी है जिसमें दुबिधा, और दुचिताई नहीं ।
वह दुखी है जिसमें गुरु का नाम सुखदाई नहीं ॥॥
गुरु की संगत की सहज में, पाया गुरु का संस्कार ।।
बुद्धि मेरी तब से चक्कर में कभी आई नहीं ॥॥
शब्द का साधन सहज है, और सहज है नाम योग ।।
सहज में सुमिरन करो तुम, कोई कठिनाई नहीं ॥॥
जब समय हो तुम करो, अभ्यास नित चित को लगा।
हो कहां उसका भला, जिसको यह गति भाई नहीं ।।।।
धास्वामी की दया से, तुमको शुभ अवसर मिला ।।
लो कमाई कुछ करो, यह जगत स्थाई नहीं ॥॥
75.बैठकर दिन रात घट में, गुरु का सुमिरन ध्यान कर ।
गुरु से रक्षा होगी तेरी, सोच ले अनुमान कर ॥॥
जग है दुखदाई न इसके फंद में आना कभी ।।
जो फैसा मारा गया, तू बचके चल भय मान कर ॥॥
नाम ले विश्राम ले, है नाम में सुख शान्ती ।
नाम का ले आसरा, दिन रात उसको गान कर ॥॥
नाम ले ले तर गये, कामी क्रोधी लालची ।।
नाम को मत भूल, महिमा नाम की तू जानकर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, नाम लेने की बिंधी ।
शब्द का अभ्यास कर, अन्तरे में अपने आनकर ।।।
76. गुरु की महिमा कौन गाये, उसका गाना है कठिन ।
पहुँचने वाले कहां तुझ, तक हैं बानी और बचन ॥॥
बुद्धि निर्णय कर नहीं सकती, न चित चिंतन के योग ।।
सोचने और समझने की, शक्ति पाता है न मन ।।।।
ज्ञानी अपनी युक्ति भूले, ध्यानी भूले ध्यान कर ।।
योगी थककर हार बेटे, कर चुके जब सब जतन ॥॥
तू नहीं काशी ने मथुरा, द्वारका में तू नहीं ।।
टूटने बन खंडी और, तपसी चले हैं सूना बन ॥॥
मेरे हृदय में बसा रहता है, निस्सन्देह तू ।।
राधास्वामी भेद बतलाया, लगी तुझसे लगन ।।।।
77.दूँ दू मुझको अपने मन में, मैं तो तेरे पास हूँ।
मैं न कासी हूँ न मथुरा, मैं न गिर कैलास हूँ ॥॥
तू हुआ मेरा तो मैं भी, देख तेरा बन गया ।
कर भरोसा तेरा मैं ही, तेरी सच्ची आस हूँ ॥॥
तेरे भीतर मेरी बैठक, आँख से ले देख अब ।।
मैं नहीं पृथ्वी की मूरत, मैं नहीं आकास हूँ ॥॥
किस भरम में है पड़ा, निर्धान्त चित से शान्त हो ।
आप मैं हूँ योग युक्ति, आप शब्द अभ्यास हूँ ॥॥
राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।
सुख ले और आनन्द ले मुझसे, मैं ही सुख रास हूँ ॥॥
78. आके सत संगत में ले, अपने जनम को तू बना ।।
त्याग दुर्मति दुर्गति, दुचिताई और दुविधापना ।।।।
खाना दिन को रात को, सो रहना तेरा काम हैं।
है पशु जोनी में पशु ज्यों, कर रहा है कल्पना ।।।।
देह नर की पाके क्या, करने लगा है भूलकर ।।
अन्त में सहना पड़ेगा, यम के हाथों ताड़ना ॥॥
जसी आसा तैसी बासा, जैसी मति तैसी गति ।।
मुन गुरु के वचन तज कर, झूठे जग की बासना ।।।।
शब्द का अभ्यास कर, अनुभव का जीवन प्राप्त कर ।।
राधास्वामी की दया से, कुछ दिनों कर साधना ।।।।
79. मौज परखो मौज के अनुसार सारा काम हो ।
माज का लो आसरा, और मौज में विश्राम हो ।।।।
मेंज से होता है सब कुछ, मौज में वरतो सदा ।।
मौज में रह पाओ सुख, निद्वन्द और निष्काम हो ॥॥
मौज में रहते हैं सेवक, मौज की गति को परख ।
भय नहीं चिंता नहीं, चित में न इनका नाम हो ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन, नित नियम लो अपना बना।
गुरु का चरचा रात दिन हो, और आठों याम हो ॥॥
पूरी होगी कामना, सन्देह कुछ इसमें नहीं ।
हां तुम्हारा इष्ट मन में, राधास्वामी धाम हो ॥॥
80. बन के बनबासी बने, बन बन के फल खाने लगे ।
बन के बनकर बन के बाहर, बन से क्यों जाने लगे ॥॥
बन गये जब बनने वाले, किस से अब अब अनबन करें।
बन के जो बिगड़े नहीं, वह बन के कहलाने लगे ॥॥
बन गये बन बन गये, जब बन गये तब बन गये ।
बनने वाले रूप बन का, बन के दिखलाने लगे ॥॥
कृष्ण बृन्दावन गये, और राम दंडक बन गये ।
प्रेम के मधुबन में प्रेमी, भक्त बन आने लगे ॥॥
राधास्वामी ने बनाया, बन गये बन बन गये ।
बन की बानी सुन के, बनबासी उसे गाने लगे ।।।।
81. जग की चिंता छोड़ कर, चिंता करो सतनाम की ।
झूठी और मिथ्या है चिंता, तन की धन की धाम की ॥॥
आये हैं जो जायेंगे, रहने नहीं आया कोई ।।
नाम लो और नाम लेकर, सोचो अब विश्राम की ॥॥
ब्रह्म के औतार तक, रहने नहीं पाये यहां ।।
सोच कर पढ़लो कहानी, अपने सीता राम की ॥॥
मोह माया में फंसे जो, उनको है कब शान्ती ।
है गले में फांसी उनके, लोभ मद और काम की ॥॥
राधास्वामी नाम लो, और नाम आठों याम लो ।।
नाम की चिंता हो घट में, राधास्वामी धाम की ।।।।
82. मौज से जो होने वाला है, वह होगा आप से ।।
लाभ कुछ होता नहीं, चिंता के तोल और नाप से ॥॥
हम न आये इस जगत में, आप जाते भी नहीं ।
मौज जब लाई वह ले जायगी, आकर आप से ॥॥
नाम जो जपते हैं उनका, काम होता है सदा ।
किसको मिलता है यहाँ कुछ, माल धन के जाप से ॥॥
अपनी करनी आय भरनी, और को क्या आसरा ।
काम कब किसका बना, भाई से और माँ बाप से ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
नाम छुटकारा दिलायेगा, भरम से पाप से ॥॥
83. भक्ति की शक्ति मिली, और शक्ति वाली होगई ।
शक्ति वाली सहज में, अब भक्ति वाली होगई ॥॥
किसकी मुक्ति किसका बन्धन, खेल दोनों मन में हैं।
जो नहीं इसको समझते, समझ लो उलझन में हैं ॥॥
मौज में रहती है दासी, नाम जपतो है सदा ।।
नाम में विश्राम सुख और, शान्ती है सर्वदा ॥॥
सोते बैठते जागते, होठों पे गुरु को नाम है।
चाहे जैसी हो अवस्था, नाम ही से काम है ।।।।
राधास्वामी की दया से, घट में गुरु दर्शन मिला ।।
अब नहीं दासी को चिंता, नाम धन जब पा लिया ॥॥
84- मौज के आधीन जब, मन कर्म और बानी हुई।
भव का दुख संकट भिटा, जीते जी निबनी हुई ॥॥
तिल को तिलपट में उलटकर गुरु का दर्शन कर लिया ।
पाया गुरु का ज्ञान गुरुमत, पाके गुरु ज्ञानी हुई ॥॥
थिर नहीं संसार, थिरताई कहां माया में है।
सुरत को आई समझ, तब आप विज्ञानी हुई ॥॥
वह है राजा इस जगह, जिसको मिला है नाम धन ।।
भक्ति शक्ति योग युक्ति, पाई वह रानी हुई ।।।।
तन में रहकर राधास्वामी, नाम ले घट में सखी ।।
तब कहूँगा राधास्वामी, धाम स्थानी हुई ॥॥
85 आलसी हाँ प्रेम मारग में, नहीं होना कभी ।।
भर्म की निद्रा बुरी, इस में न तुम सोना कभी ॥॥
रात दिन सुमिरन भजन हो, रात दिन हो गुरु का नाम ।।
खेत में हृदय के भक्ति, बीज को बोना कभी ।।।।
क्या समय अच्छा मिला है, जनम नर को पा गये ।
इस समय को भर्म में, पड़ कर नहीं खोना कभी ॥॥
अपनी आंखों आप देखो, उन्नति के दृश्य को ।।
कोष में घट के भिलेगा, मुक्ति का सोना कभी ॥॥
राधास्वामी की दया से, सुख लहो सुख धाम लो ।
जो न संभलेंगे पड़ेगा, अन्त में रोना कभी ॥॥
86. पाके सुमती दुर्मती में, भूल में क्यों आ गया ।।
छोड़कर आनन्द सुख, दुख सूल में क्यों आ गया ॥॥
तू था नर के रूप, नारायण का सच्चा मित्र था ।
हाय माया और ,भरम के, भूल में क्यों आ गया ॥॥
जो चमकता रहता है, राजाओं के क्रीट और मुकट में ।
अब वही अनमोल हीरा, धूल में क्यों आ गया ॥॥
गिर गया निज पद से, कारन का पता पाया नहीं ।
सूक्ष्म होकर मुंह के बल, स्थूल में क्यों आ गया ॥॥
अब संभल जा यह संभलने, का है अवसर जान लें ।
राधास्वामी को सुमिर, प्रतिकूल में क्यों आ गया ॥॥
87. क्या है तू और कौन है तू , किसको आई यह समझ ।
चुप हुआ चुप होके बैठा, मुझको भाई यह समझ ॥॥
कोई कहता है सगुन, निगु न बताता है कोई ।।
किसने तेरे समझने की, कब है पाई यह समझ ॥॥
तू नहीं है बंध मुक्ति, जोग जुक्ति तू नहीं ।
भेद पाये कोई क्योंकर, मुंह की खाई यह समझ ॥॥
सब है और कुछ भी नहीं है, है नहीं के बीच में ।
अन्त में यह बात से झी, रंग लाई यह समझ ॥॥
राधास्वामी ने कहा, बन्द ऑख कान और होंठ कर ।
मैंने जब ऐसा किया, तब तेरी आई यह समझ ।।।।
88. तीन त्रिलोकी में फंसकर, चौथे को जाना नहीं ।
लाख समझाया समझकर, भी उसे माना नहीं ॥॥
जागते हैं सोते हैं, जाते हैं गहरी नींद में ।।
सूक्ष्म स्थूल और कारन, के परे माना नहीं ॥॥
तीनों चौथे पद के हैं, आधार ही पर सर्वदा ।
कहते हैं हम बात सच्ची, हमको भरमाना नहीं ॥॥
ब्रह्मा सृष्टि करता, विष्णु पालते शिव मेटते ।
तीन गुन के राग तजकर, चौथे को गाना नहीं ॥॥
सृष्टि स्थिति और परलय, के परे क्या वस्तु है ।
जान जाये फिर उसे, भव जाल में आना नहीं ।।।।
द्वत और अद्वत, द्वैताद्वैत की बांधी है टेक ।।
यह हैं गोरख धन्धे गुत्थी, इनसे सुलझाना नहीं ।।।।
तीन पद को त्यागकर, चौथे का फिर निश्चय दिया ।।
राधास्वामी ने उन्हें, माया में उलझाना नहीं ॥॥
89. देख दलदल से निकल कर, सीधे तू मारग में चल ।।
दुख का रस्ता छोड़ दे, कहता हूँ अब कुछ जा संभल ॥॥
प्रेम और परतीत में, आनन्द है यह जान ले ।।
ईर्षा और द्वेष को तज, इनके फन्दों से निकल ॥॥
रोग से डर सोग से डर, भोग से डर चेत कर ।
काल सिर पर आ रहा है, अब न ममता से मचल ॥॥
सोने वाले सोया है क्यों, आँख को अब अपनी खोल ।
सामने तेरे है गड्ढा, देख मत जाना फिसल ।।।।
राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।
शान्ती के पंथ में चल, गुरु से लेकर गुरु का बल ॥॥
90. बुद्धि निश्चय आत्मक, तुझमें अभी आई नहीं ।।
सोचने और समझने की, शक्ति तक पाई नहीं ॥॥
सत है क्या और क्या असत है,नित है क्या और क्या अनित ।
क्योंकि सतसंगत की इच्छा, की रुचि भाई नहीं ॥॥
बारता गाना बजाना, यह कभी सतसंग नहीं ।
सते की संगत ही है सतसंग, और मेरे भाई नहीं ।।।।
शब्द क्या है क्या है साखी, जानता है तो बता ।
शब्द साखी वास्तव में, दोहा चौपाई नहीं ।।।।
साक्षी का रूप बन जा, शब्द घट के सुन सदा ।।
तब तू जानेगा मरम यह, मरम दुखदाई नहीं ॥॥
लाभ क्या संवाद से, और काम क्या बकवास से ।
है वही भेदी जिसे, माया नै भरमाई नहीं ।।॥
संत मत सिद्धान्त का, कैसे पता पायेगा तू ।।
जब कि घट में बैठकर, गुरु पद से लव लाई नहीं ॥॥
शब्द तू है शब्द घट की, धुन है गुरु है शब्द रूप ।
सुरत साखी है समझ मन, में जो दुचिताई नहीं ॥॥
कुछ दिनों सतसंग कर, सतगुरु का कुछ दिन शब्द योग ।
राधास्वामी धाम को जा, जग यह स्थाई नहीं ॥॥
91. सिंधु मेरी देह मन है, सीप मोती नाम है ।।
नाम जब गुरु का मिला, तब शान्ती विश्राम हैं ॥॥
सीप स्वाती बूद पाकर, बन्द जब मुख को किया ।
बुद जब मोती बना, मोती ही शोभा धाम है ॥॥
खारे जल से सिंध के, क्या सीप को सम्बन्ध है ।।
उसको स्वांती की है इच्छा, इच्छा आठों याम है ॥॥
स्वती गुरु के नाम को, सामान्य धुन को जान लो ।।
कर लिया साधन बना मोती, इसी से काम है ।।।।
राधास्वामी नाम पाया, मन हुआ मेरा सुखी ।
सुख से दुख से अब जगत के, चित्त को उषराम है ॥॥
92. आपके अर्पन है यह, मेरा नहीं तन आप का ।।
ले लो चरनों में लगा लो, मेरा है मन आप का ॥॥
मेरा तो कुछ भी नहीं है, किस ममता मैं करू।।
आप ही का तन है मन है, और है धन आपका ॥॥
मन की चंचलता से क्यों हो, दुख जो यह मेरा नहीं ।
योग युक्ति आप की है, और है साधन आप का ॥॥
भूल थी मैंने जो समझा, मेरे ही हैं देह मन ।
अब तो यह सिर झुक रहा है, और चरन है आप का ॥॥
राधास्वामी मौज की, अब तक न आई थी समझ ।
स्वामीपन है आपका, और दासपन है आपका ॥॥
93. गुरु हैं मेरे मैं गुरु की, गुरु से मेरा काम है।
सिर में मन में तन में मेरे, व्यापा गुरु का नाम है ॥॥
भजती हूँ मैं गुरु को, उठते बैठते चलते हुये ।।
जागते सोते गुरु का, ध्यान आठों याम है ॥॥
क्यों मुझे चिंता सतावे, क्यों मेरे मन को हो दुख ।।
नाम गुरु का लेती हैं, और नाम में विश्राम है ॥॥
चारों बातें मुझको मिल जावेगी, गुरु की भक्ति से ।
गुरु की भक्ति अर्थ धर्म और, मोक्ष है और काम है ।।।।
राधास्वामी की दया से, घट में गुरु दर्शन मिला ।।
घट में राधास्वामी घट में, राधास्वामी धाम है ।।।।
94. मन में आशा गुरु की रखकर, काम में लग जाओ तुम ।
पूछना गछना है क्या, सत नाम में लग जाओ तुम ॥॥
यह समय अनमोल है, विरथा नहीं खोना कभी ।
काम में लग जाओ तुम, और नाम में लग जाओ तुम ॥॥
साधं कर चित को करो, व्यौहार परमारथ के साथ ।।
मैं नहीं कहता कि धन और, दाम में लग जाओ तुम ॥॥
मौज पर निश्चत रहो, निश्चल रहो निष्काम बन ।।
धर्म अर्थ और मोक्ष में, और काम में लग जाओ तुम ॥॥
घट में सब कुछ है तुम्हारे, घट घट का रूप है।
अपने घट में राधास्वामी, धाम में लग जाओ तुम ॥॥
95. प्रेम में चिंता हो कैसी, प्रेम दुचिताई नहीं ।
प्रेम को नाता अलग, इसमें बहन भाई नहीं ॥॥
प्रेम जल प्रीतम तो मछली, प्रेमी उनमें प्रेम है ।
जल से यह मछली अलग, होती मेरे भाई नहीं ॥॥
प्रेम है प्रेमी में, प्रेमी और प्रीतम एक हैं।
देखो सूरज और किरन, क्या उनमें एकताई नहीं ॥॥
आना जाना प्रेम में केसा, मुझे भी दो बता ।।
रूप में है रूपता, जानी नहीं आई नहीं ॥॥
जोत दीपक की हुई, परगट पतिंगा आगया ।।
पूछने की भावना, उसको कभी आई नहीं ॥॥
कीट भृगी फूल भवरे, नीर मछली शशी चकोर ।।
प्रेमी और प्रीतम की छवि, क्या गुरु ने बतलाई नहीं ॥॥
राधास्वामी ने दया की, प्रेम की आई समझ ।
यह समझ पहले भी थी, समझे को समझाई नहीं ।।।।
96. दसहरा दस को हरा जब, फिर दिवाली आ गई ।
मिट गया घट का अँधेरा, और उजाली आगई ॥॥
दस हमारी इन्द्रियाँ हैं, पाई है उन पर विजय ।।
जीत कर अन्तर में सूरत, भोली भाली आगई ॥॥
तीसरे तिल के सहसदल, के कमल के बिगसते ।।
देख ले सुख की अवस्था, मन के माली गई ॥॥
खिल गये अन्तर कमल, और फूट निकली उनकी बास ।।
प्रेम के रस की तरावट, डाली डाली गई ॥॥
लाल गुरु का रूप है, तिरकूट के अस्थान पर ।
देखने लाली चला, आँखों में लाली गई ॥॥
टूटा गढ़ लंका का, रज रावण का भय जाता रहा ।।
अब तो रमता राम के, चित में निहाली आगई ॥॥
जोत जगमग हो रही है, राज है परकाश का ।
कौन कहता है अविद्या, काली काली गई ॥॥
सन्त मत की इस दिवाली को, कोई जानेगा क्या ।।
घट में सूरज चाँद तारों की, उजाली आगई ॥॥
राधास्वामी ने दिया, हमको दिवाली का पता ।।
घट में भक्ति आप सुख की, देने वाली आगई ॥॥
97. हो के गुरु मत में गुरु के, ज्ञान से ज्ञानी बना ।।
मूरती चित में बसी जब, सहज में ध्यानी बना ॥॥
द्वत हूँ अद्वत हूँ, दोनों से मैं न्यारा भी हूँ ।
क्या कहे बानी चकित, उसको जो निर्वानी बना ॥॥
सिंध की रहती है शक्ति, सारी पीछे बूद के।।
जिसको आई यह समझ, वह सच्चा विज्ञानी बना ॥॥
किसने सूरज के कभी, फैलाव का पाया पता ।
सर्व स्थानी है वह, जो एक स्थानी बना ॥॥
कट गया मेरेपने, तेरेपने का बंध आप ।।
मुक्त हूँ निरद्वन्द, राधास्वामी अभिमानी बना ।।।।
98. नाम के लेते ही नामी, की शरन में आगया।
ध्यान के धरते ही मन, गुरु के चरन में आगया ॥॥
किसको देखें आँख से, कानों से क्या चरचा सुनू ।।
वह तो मेरा होगया, अन्तःकरण में आगया ॥॥
मैं हूँ उसका वह है मेरा, और से क्या काम है।
वह हुआ मेरा जो मेरे, स्मरण में आगया ॥॥
जीने की इच्छा नहीं, मरने का भय जाता रहा ।
इच्छा चाला ही यहाँ, जनम और मरन में आगया ॥॥
राधास्वामी धुन सुनी, घट में लिया फिर मुख से नाम ।
पहले जो धुनात्मक था, अब बरन में आगया ।।।।
99. घट में कर दर्शन गुरु का, घट की महिमा जान ले ।।
पिंड में ब्रह्मांड है, सतसंग कर पहचान ले ॥॥
साक्षी के रूप में सुन, शब्द की धुन को सदा ।
शब्द है गुरु रूप गुरु है, शब्द इसको मान ले ॥॥
शब्द है आकाश को गुन, शब्द ही है तत्व सार ।
शब्द नामी है अनामी, शब्द मथ कर छान ले ॥॥
शब्द है प्रकाश ज्योती, शब्द के हैं आसरे ।
रूप नाम हैं शब्द, शब्द की टेक मन में ठान ले ।।।।
शब्द ब्रह्मा शब्द विष्णु, शब्द शिव है ब्रह्म शब्द ।
शब्द गुरु के साथ रहकर, शब्द ही का ज्ञान ले ।।।।
शब्द के अभ्यास से जब, मन में आई शान्ती ।।
लोक और परलोक में यश, कीरती सन्मान ले ।।।।
शब्द सुन सुन दर में जा, सुन्न की समाधी साधकर ।
सहज जीवन मुक्ति का धन, तू मेरे धनवान ले ।।।।
शब्द पारख शब्द है टकसार, शब्द अलख अगम ।।
शब्द की डोरी पकड़ चढ़, शब्द का स्थान ले ॥॥
शब्द साखी की समझ, अब तक तुझे आई नहीं ।
राधास्वामी शब्द सुन, धुर धाम पद निरवान ले ।।।।
100. जिसके साधन से मिले, सत नाम धन वह जोग है।
नाम से समता न आवे, मन में तब वह रोग है ॥॥
नाम क्या है सुनलो तुम, है नाम गुरु के आसरे ।
पोथियों का नाम दुख, चिंता बिपत को सोग है ॥॥
जब सतगुरु के हुआ, सतसंग से कुछ तुमको लाभ ।
यह समझ लो भाग सोया, जागा सुख संजोग है ॥॥
नाम लो तब गुरु से, अन्तर चढ़ो युक्ति से आप ।
नाम सच्चा हर्ष और आनन्द, सुख का भोग है ॥॥
दुख छुटे भव भय मिटे, राधास्वामी के सतसंग से ।।
इसकी महिमा से यहां, अनजान सारा लोग है ॥॥
101 मैं सुखी हूँ दुख नहीं, आता मेरे मन में कभी ।
चाहे मैं घर में रहूँ, चाहे बसें बन में कभी ॥॥
सत हूँ चित आनन्द हैं, मैं मुक्त शुद्ध हूँ सर्वदा ।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, आया न बन्धन में कभी ॥॥
कब मुझे माया, फैसा सकती है माया जाल में ।
पुरुष की छाया को, किसने पकड़ा दरपन में कभी ॥॥
दोनों व्यौहार और परमारथ को, समझो मेरा खेल ।।
हूँ कभी निरद्वन्द, और रहता हूँ साधने में कभी ॥॥
राधास्वामी की दया से, मेरा तुम पाओगे भेद ।।
सोचो सतसंगत के बचन, आयें श्रवण में कभी ॥॥
102- घट का घर सूना पड़ा है, उसमें आप आ जाइये ।।
दास हूँ सेवक हैं सच्ची, अब तो आप अपनाइये ।।॥
काम का मद मोह का, माया का कूड़ा हट गया।
शुद्ध निर्मल और सुथरी, कोठरी में आइये ॥॥
घट का घर मेरी बने, मन्दिर सुहाना अद्भुती ।।
मूरती आकर बिराजे, अपनी छबि दिखलाइये ॥॥
मैं तुम्हारा तुम हो मेरे, यह समझ में आगया।
भर्म और अज्ञान माया, मोह को मिटवाइये ॥॥
आरती साजू जलाऊ, जोत भक्ति प्रेम की ।
राधास्वामी नाद घंटा, शंख में सुनवाइये ॥॥
103.मेरे बाबा इस जनम का, काम पूरा होगया ।।
दुख का बर्वत करले निश्चय, चूर चूरा होगया ॥॥
प्रेम में शक्ति है बल है, प्रेम में है बीरता ।
इस बुढ़ापे में तू , रण की सच्चा सूरा होगया ॥॥
नाम पाया नाम में, विश्राम पाया जीते जी ।।
शब्द की धुन घट में प्रगटी, तन तमूरा होगया ॥॥
फाँसने को तेरे, आडम्बर रचा था काल ने ।
नाम की बिजली जो भड़की, जल के धूरा होगया ॥॥
राधास्वामी की दया से, तूने पाई है विजय ।
अब नहीं चिंता रही, अमृत धतूरा होगया ।।।।
104- मैं तो जंगल में पड़ा हूँ, और तुम बस्ती में हो ।
ऊँचे चढ़ आया बहुत मैं, और तुम पस्ती में हो ॥॥
प्यार करना जिंदगी है, जिंदगी औरों को दो ।
तब कहूँगा सच्चे दिल से, तबकये हस्ती में हो ॥॥
जीना और मरना मेरा है, दूसरों के वास्ते ।
तुम पियो उलफत की मय, मेरी तरह मस्ती में हो ॥॥
करके संगत सतगुरु की, भेद अपना जान लो ।
राधास्वामी नाम का, सुमिरन भजन और ध्यान है ॥॥
105. घट में गुरु के रूप का, परकाश तारा होगया ।।
मिट गया मन का अंधेरा, और उजारा होगया ॥॥
प्रीत और परतीत से, विश्वास से साधन किया ।
नाम सच्चा मिल गया, जब वह सहारा होगया ॥॥
भाग अपना क्या सराहूँ, बन गया मेरा जनम ।।
प्रेम के मन आते ही, जग का दुलारा होगया ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
राधास्वामी नाम, जीने का सहारा होगया ॥॥
106. अस कर गुरु की दया की, हो निरास न तू कभी ।।
जो निरास हुआ समझले, गुरु का दास न तू कभी ॥॥
जग के फन्दों में पड़ा, समझा नहीं उपदेश को ।।
तज के पृथ्वी को चढ़ा, प्यारे को आकाश न तू कभी ॥॥
माया छाया एक है, दोनों में सार की गम कहाँ ।
यह समझ आजाये होगा, फिर उदास न तू कभी ॥॥
कैसे अपने रूप की, आती समझ प्यारे तुझे ।।
आया बरस में पक्ष मास में, गुरु के पास न तू कभी ॥॥
नाम से मिटते हैं संकट, नाम गुरु का मन्त्र है।
नाम से काटा है माया, जाल फाँस न तू कभी ॥॥
अब संभलजा नाम में, विश्राम आठों याम ले ।।
किया राधास्वामी नाम से, दुख का नास न तू कभी ।।॥
107. मैं भली हूँ या बुरी हूँ, तुम से प्रयोजन ही है क्या ।।
लड़ते क्यों रहते मुझसे, सच कहो अनबन है क्या ।।।।
बावली हूँ प्रेम के मारग, में बुद्धि खोगई ।
सामने भक्ति के युक्ति, योग और साधन है क्या ॥॥
रात दिन लेती हूँ, गुरु का नाम सोते जागते ।।
मुझको बहकाये भला, बलवान चंचल मन है क्या ॥॥
अपने आप में नहीं, घर और बाहर एक हैं।
मेरी दृष्टि के लिये, घर परबत और मधुबन है क्या ॥॥
राधास्वाभी राधास्वामी, राधास्वामी जपती हूँ।
राधास्वामी नाम का, हीरा मिला अब धन है क्या ।।।।
108. मीत जब यह होगया, सब से मिताई होगई ।
मिल गई संगत भले की, जब भलाई होगई ।।।।
रह के चन्दन के निकट, चन्दन बने नीम और पलास ।
बास अब चन्दन की उनमें, मेरे भाई होगई ॥॥
गाँव की मैली नदी, गंगा से जब जाकर मिली ।।
अब नहीं मेली नदी वह, गंगा माई होगई ॥॥
आत्मा परमात्मा के मेल से निश्चल हुआ ।
जग की चिंता मिटगई, वह अगमापाई होगई ॥॥
राधास्वामी ने दया की, आसरा अयना दिया ।
पाके भक्ति माया परबत, रूप राई होगई ॥॥
109.आये थे रोते चले, हँसते हुये संसार से ।।
क्या हमारा बिगड़ा सृष्टि, करम के व्यौहार से ॥॥
रोये क्यों इसका पता, अब हमने पाया सोच कर ।।
बिछड़े थे गुरु के चरण, सतलोक के परिवार से ॥॥
क्यों हँसे इसका भी कारन, खोल कर कहते हैं अब ।
सस गुरुपद से लगाया, प्रेम से और प्यार से ॥॥
जिसके जो आता है जी में, वह कहे हमको सदा ।
फल को क्यों हानि पहुचे, मेघ की बौछार से ।।।।
राधास्वामी की दया से, रूप की आई समझे ।
मन नहीं दबता है मुक्ति, बन्ध के अब भार से ॥॥
110- हम न आये आपसे, और आप से जाते नहीं ।
लाया जो ले जायेगा, अब दुख से घबराते नहीं ॥॥
रहते हैं निरद्वन्द हँसते, खेलते दिन रात हम ।।
होगा क्यो कल आज चिन्ता, अपने चित लाते नहीं ॥॥
सुख हमारा रूप है, सुख में कहाँ दुख को पता ।।
मिट गया अपना भरम, औरों को भरमाते नहीं ॥॥
प्रेम के मारग में आये, द्वेष दृष्टि छिन गई ।
छोड़ कर अनुराग कोई, रागनी गाते नहीं ॥॥
राधास्वामी जपते हैं बस, राधास्वामी धाम में ।
राधास्वामी नाम पाया, यम का भय खाते नहीं ॥॥
111- सहज में तुम सहज ही, रीती से गुरु का नाम लो ।
शब्द योग सहज है सहज में, सहज सहज से काम लो ॥॥
फल पकेगा जो सहज में, होगा मीठा और मधुर ।
जिसमें खींचातान हो, भुले न उसका नाम लो ॥॥
सुरत को अपनी लगा भ्र, मध्य में लो चित को सोध ।
मन न होने पावे चंचल, उसकी बिरती थाम लो ॥॥
करके साधन सुख लगे, मिलने यह पहला लाभ है।
पीछे जीवन मुक्ति का, सुख आप आठों याम लो ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
तन के रहते तनके अन्दर, राधास्वामी धाम लो ।।।।
112- भाग सोया जाग उठा हैं, गुरु की किरपा होगई ।
काल का भय अब नहीं, जब उसकी रक्षा होगई ॥॥
नाम पाया भक्ति का धन, पाया मन में हूँ सुखी ।
सुख मिला संकट कटा, अब छाया माया होगई ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन, करने जो बैठा शान्त हो ।
शब्द परगट होगया, जोती की बरषा होगई ॥॥
बर मिले भक्ति का बल का, दान दो शक्ति मिले ।
मेरे सिर पर आपके, चरनों की छाया होगई ।।।।
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
इस अधम पर आपकी, अब सच्ची दाया होगई ।।।।
113- नाम पाया गुरु से तूने, नाम से नामी हुआ ।
काम कर निष्काम होकर, जब तू निष्कामी हुआ ।।॥
नाम जिसको मिल गया, सो देवराज सुरेन्द्र है ।।
सुख है उसको नाम ले लेकर, जो विश्रामी हुआ ॥॥
जीते जी है हर्ष आनन्द, पीछे मुक्ति शान्ती ।
उसकी महिमा क्या कहे, कोई जो सतधामी हुआ ॥॥
राधास्वामी नाम जो लेता है, तज कर काम क्रोध ।
वह कहाँ बंधुआ हो जग का, सब का वह स्वामी हुआ ।।।।
114- जिसने बन्धन में फंसाया, है छुड़ायेगा वही ।
जाल माया मोह के, आकर कटायेगा वही ॥॥
गर्भ में माता के जो रक्षक, बना था हर घड़ी ।
जागता जीता पुरुष, अब भी बचायेगा वही ॥॥
सोच क्यों करता है, और इस सोच से क्या लाभ है।
तेरी करनी लाभ को, कारन बनायेगा वही ॥॥
ध्यान कर सुमिरन भजन कर, मन में उसकी आस कर ।
होके परगट भीतर और बाहर चितायेगा वही ॥॥
तन में तेरे मन में तेरे, तेरे सांसों सांस है।
रह के अपना रूप भी, तुझको दिखायेगा वही ॥॥
घट में है वह पट में है, संसार के खटपट में है।
तुझको क्यों चिंता है, खटपट को मिटायेगा वही ॥॥
राधास्वामी नाम ले, और नाम में विश्राम ले ।
नाम की धुन राग अनहद में, सुनायेगा वही ॥॥
115- । जब गुरु रक्षक हुआ मेरा, तो भय किस बात का ।।
ध्यान क्यों करने लगी, संसार के उत्पात का ॥॥
जागती हूँ मैं तो पाती हूँ, गुरु को साथ में ।
सोई पहरेदार वह, रहता है मेरा रात का ॥॥
चलते फिरते काम करते, नाम उसका लेती हूँ।
डर नहीं अब करती हूँ, माया की यम की घात का ॥॥
एक रस जीवन है, संशय से नहीं अब काम कुछ ।
दिन हो चाहे गरमी का, जाड़े का और बरसात का ॥॥
सोने से पहले सदा, भजती हूँ राधास्वामी नाम ।
जागने पर राग सुख से, गाती हूँ परभात का ॥॥
116- मन मगन मेरा है सुख का, चैन का भागी हुआ ।
गुरु की किरपा होगई, गुरु पद का अनुरागी हुआ ॥॥
भाग क्या अपना सराहूँ, बालपन में गुरु मिले ।।
गाके स्तुति और भजन, भक्ति के मैं रागी हुआ ॥॥
राधास्वामी मैं हूँ बालक, बाल विनती सुनके अब ।।
दीजिये अपनी शरण, तब समझे बड़भागी हुआ ॥॥
117- प्रेम औषधि ईर्षा, और द्वेष मन के रोग हैं।
रोग जब हों दुख बिपत, आपत कलेस और सोग हैं ॥॥
सब हैं उसके वह है सबका, उससे न्यारा कौन है ।।
भूल में कैसे पड़े, भरमे हुये सब लोग हैं ॥॥
फूट का फल दुख है, दुख में सत का जीवन कहां ।।
संग सत का फल चखो, इस ही में सुख के भोग हैं ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।
प्रेम में सुख शान्ती, आनन्द के संजोग हैं ॥॥
118- प्यार कर सब से भरम की, द्वेष दृष्टि त्याग कर ।।
रूप है यह जगत तेरा, इससे तू अनुराग कर ॥॥
तू यहां है तू वहां है, लोक में परलोक में ।
किस जगह जायेगा इस, रचना से कहदे भाग कर ॥॥
‘नेति क्यों कहता है, ‘एति भाव को चित दे सदा ।।
नेति है। वैराग, ‘एति भाव से अनुराग कर ॥॥
‘नेति ‘एति’ दोनों कल्पित, इनका तू स्थान है।
त्यागना हो त्याग दोनों, मोह नींद से जाग कर ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु, के बचन सुन प्रेम से ।।
पद कमल में सिर झुका, भक्ति अटल बर मांग कर ।।।।
119- प्रेम छाया से किया, छाया का गुन जाना नहीं ।।
तूने अपना और उसका, रूप पहचाना नहीं ॥॥
ब्रह्म में माया है शक्ति, शक्ति दुखदाई कहाँ ।
भरम से बलवान ने, बल पाके बल माना नहीं ॥॥
माया छाया एक है, दौड़ो तो दौड़े और चले ।
रुकने से रुकती है, उस से भय कभी खाना नहीं ॥॥
जान लो पहचान लो, और अपनी शक्ति मान लो ।।
जान कर पहचान कर, भ्रान्ति में चित लाना नहीं ॥॥
राधास्वामी संग कर, कुछ दिन कि तुझको ज्ञान हो ।
ज्ञान पाकर भूल के चक्कर में फिर आना नहीं ॥॥
120- ब्रह्म में माया है, यह उससे अलग होती नहीं ।
चांद और सूरज से न्यारी, दोनों की जोती नहीं ॥॥
जागता है ब्रह्म तब, माया है उसकी जानती ।
भिन्न होकर ब्रह्म से, माया कभी सोती नहीं ॥॥
बल सदा बलवान में, और शक्ति शक्तिमान में ।
शिव से शक्ति न्यारी होकर, हँसती और रोती नहीं ॥॥
सत में जो सत्ता है दह, सत्ता नहीं सत से पृथक ।
सत की सत्ता साथ है, और साथ से खौती नहीं ॥॥
राधास्वामी संग में, आई समझ अब रूप की ।
भिन्न सागर से कभी, मूंगा नहीं मोती नहीं ।।।।
121.जनम नर का पाके, सत जीवन का भागी बन के रह ।।
भोग ज्ञान आनन्द को, और तू न त्यागी बन के रह ॥॥
बैल गदहा कुत्ता बंदर, बनने की इच्छा को छोड़ ।
इच्छा माया फाँस है, इसमें विरागी बन के रह ॥॥
भक्त बन हो ज्ञानी ध्यानी, और विवेकी पारखी ।
कौन कहता है तुझे, जग में अभागी बनके रह ॥॥
करके सतसंगत गुरु की, रूप अपनी जान ले ।
सच्चिदानन्दम् अखंडम् , तू न साँगी बनके रह ॥॥
राधास्वामी की दया से, तू तो है सबसे बड़ा ।
शब्द का अभ्यास कर, और शब्द रागी बनके रह ।।।।
122.राधास्वामी आये जग में, सन्त का अवतार धार ।।
शब्द मत सिखलाके, जीवों का किया सच्चा सुधार ॥॥
दुर्मती को त्याग दो, द्वेष ईर्षा अच्छी नहीं ।
मन में हो परतीत प्रीत, और प्रेम भक्ति से हो पियार ।।।।
साम दाम और भेद से, और दंड से निकला न काम ।
प्रेम के मारग में आओ, प्रेम का करके विचार ।।।।
प्रेम में शक्ति है रहती, द्वष में है निबलता ।।
प्रेम का बल लेके अब, होजाओ भवसागर से पार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, राधास्वामी योग साध ।।
योग का संयोग हो, इसका करो निस दिन प्रचार ॥॥
123. राग अनहद को सुनो, अन्तर में अपने आनकर ।
चित की विरती रोक लो, सुमिरन भजन और ध्यान कर ॥॥
आँख कान और मुखको मू दो, यह सुगम साधन करो ।।
चढ़ चलो घट के गगन में, पुतलियों को तान कर ॥॥
गुरु से गुरु गम लेके, सत्र संगत में सीखो यह जतन ।।
काम में लग जाओ, गुरु उपदेश को सत मानकर ॥॥
बाहरी बातों को छोड़ो, अन्तरी साधन करो ।।
शब्द का लो आसरा, तुम इसकी महिमा जानकर ।।॥
राधास्वामी ने कहा, गुरु करना गुरु को जानकर ।
पानी पीना पीछे, पहले पानी लेना अन कर ।।।।
124. सब रहो मिल जुलके, मिल जुलकर करो सब काम को ।।
देखना अनबन न होने, पावे तुममें नाम को ॥॥
दुख वहाँ रहता है, कुमति का जहाँ डेरा पड़ा ।।
सुमति से पाता है प्राणी, चेन और विश्राम को ॥॥
तज के आलस और निद्रा, त्याग दो परमाद को ।।
काम में लाओ सदा तुम, दिन के आठों यमि को ॥॥
एक छिन बेकाम रहना, भी कभी अच्छा नहीं ।
काम से पाते हैं नर, धर्म अर्थ मुक्ति काम को ॥॥
राधास्वामी योग साधो, राधास्वामी योग सीख ।।
जीते जी सुख अन्त में लो, सत को और सतधाम को ।।।।
125. प्राण की है मुख्यता, और प्राण सबका सार है ।
प्राण में बल शक्ति है, दोनों का यह भंडार है ।।।।
प्राण को समझो समझकर, शब्द साधो प्राण संग ।।
साधना से सहज में, भव जल से बेड़ा पार है ॥॥
प्राण का भी शब्द ही है, सार शब्द को भी लो परख ।
यह परख आयेगी, सतसंग के बचन की धार से ॥॥
प्राण के समझे बिना, मत शब्द का अभ्यास कर ।
फिर न छूटेगा कभी तू , जग के कारागार से ॥॥
राधास्वामी गुरु की संगत, पहले कर फिर से दयो ।
इसके पीछे शब्द साधन, मुक्ति ले संसार से ।।।।
126. गुरु के मत में अके, गुरु गम पन्थ को पहचान ले ।।
गुरु की संगत करके, गुरु का मर्म ले गुर ज्ञान ले ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु है शिव की मूरती ।।
ब्रह्म है परब्रह्म गुरु है, गुरु से गुर को जान ले ॥॥
गुरु मिले सब कुछ मिला, अब किसकी मन में चाह हो ।
अर्थ धर्म और मोक्ष की, और कामना की खान ले ॥॥
ज्ञान भक्ति दोनों गुरु के, आसरे हैं यह समझ ।
गुरु दया से दोनों पाले, जीते जी निरवान ले ॥॥
राधास्वामी सन्त सतगुरु, रूप में परगट हुये ।
ले शरन अब पद कमल में, झुक के मेरी मान ले ॥॥
127. सब जगह रहता हूँ, और सब में मेरा स्थान है ।।
देख लेता है मुझे वह, जिसमें मेरा ज्ञान है ॥॥
आँख वाले देखते हैं, रूप मेरा सब जगह ।
वह समझ लेते हैं, जिनमें समझ है अनुमान है ॥॥
काम करता हूँ सभी, निष्काम मेरा काम सब ।
मुझ में ज्ञान अनुमान है, और मुझ ही में परमान है ॥॥
मुझ में सृटि स्थिति, और लय के सब प्रबन्ध हैं।
नाम जो लेते हैं मेरा, उनको पद निर्वाण है ॥॥
राधास्वामी नाम लेकर, राधास्वामी धाम लो ।
लोक यश परलोक आनन्द, का जो तुमको ध्यान है ।।।।
128. सबके घट घट का है बासी, घट ही उसका धाम है ।
रूप भी सब हैं उसी के, उसके लाखों नाम हैं ॥॥
भक्त की भक्ति है, शक्तिवान की शक्ति है वह ।।
ज्ञान हे ज्ञानी का, और सन्तों का वह विश्राम है ॥॥
एक है और सहस्त्र है, और सहस्र से भी है अधिक ।।
सब का है सब में है, सब जग का वह रमता राम है ॥॥
फूल फल पत्त कली पौदा है, पौदों का है बीज ।
देह में वह बल में वह है, उसमें धन और दाम है ॥॥
राधास्वामी ने बताया, उसके होकर तुम रही।
वह है उसका जो सुमिरता, उसको आठों याम है ॥॥
129. बुद्धि जब तुमको मिली, मिलजुल के रहना सीख लो ।
द्वष तजकर प्रेम की, युक्ति का गहना सीख लो ॥॥
भाइयों से बैर त्यागो, मित्रता का भाव लो ।।
मुख से मीठे और मधुर, बचनों का कहना सीख लो ॥॥
लड़ते लड़ते होगये हो, अब निंबल सोचो भी कुछ ।
यह दशा अच्छी नहीं, सुमती को लहना सीख लो ॥॥
ऐसा हो व्योहार जिससे, सुख भिले और शान्ती ।।
कौन कहता है कि दुख, सागर में बहना सीख लो ।।।।
राधास्वामी जग में आये, प्रेम का परिचय दिया ।
मेल का साधन हो, मिलजुल कर निबहना सीख लो ॥॥
130. पाके नर जीवन न समझा, तत्व को और सार को ।।
क्यों बुरा कहते हो तुम, ईश्वर को और संसार को ॥॥
बुद्धि उसने दी तुम्हें, बुद्धि की शक्ति युक्ति दी ।।
क्यों बिगाड़ा पाके सब, परमार्थ और व्यौहार को ।।।।
देवताओं से भी उत्तम, उसने तुमको कर दिया।
भरम में फंसकर न समझा, तुमने वार और पार को ।।।।
करलो सतसंगत गुरु की, ज्ञान की दृष्टि खुले ।।
लाओ तट पर नाव अपनी, छोड़कर मॅझधार को ॥॥
राधास्वामी की दया से, जनम को करलो सुफल ।।
काटो बन्धन भरम के, और त्यागो कारागार को ।।।।
131.प्रेमी और प्रीतम नहीं दो, एक हैं वह एक हैं।
कौन कह सकता है दो, उनमें नहीं तू है न मैं ॥॥
तन को मनको धन को अरपा, अपने प्रीतम के लिये ।
आप मरकर सच्चे प्रेमी, प्रेम का जीवन जिये ॥॥
मैं जो कहता है, अहंकारी विकारी वह हुआ ।
तू जो कहता है, भरम के बस अनारी वह हुआ ॥॥
तोड़ दे मैं तू को बन्धन, मुक्त हो और शुद्ध हो ।
रूप को समझेगा तब तू, ज्ञान पाकर बुद्ध हो ॥॥
राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रस्ता हमें ।।
प्रेम में जो लय हुये हैं, क्या सुनायें कह तुम्हें ॥॥
132. नेति नेति “एति एति में, पड़े अनजान सच ।।
उनकी युक्ति सब है मिथ्या, और मिथ्या ज्ञान सच ।।।।
बातों से यह सिद्ध करना चाहते हैं रूप को ।।
जब न हो अनुभव तो निष्फल, उनका है अनुमान सब ।।।।
मैं नहीं जाता वहाँ, बानी की गम उसमें नहीं ।
बुद्धि से सुलझायेंगे क्या, गुत्थी बुद्धिमान सब ।।।।
तत्व सब का एक है, इसमें नहीं संशय कोई ।।
बातों को फैला बतंगड़, भर्म है अज्ञान सब ।।।।
काग विष्टा जगको कहना, और गिरना मुंह के बल ।।
है दशा यह कैसी सोचे, जगके विद्यावान सब ।।।।
जाके सतसंग में गुरु के, हमने पाया भेद को ।।
भेदवादी हम नहीं, अब छुट गया अभिमान सब ।।।।
गधास्वामी नाम लो, साधन करो कुछ शब्द का ।
पाओगे गुरु की दया से, रूप का तब ज्ञान सब ।।।।
133. कौन तेरा है यहाँ, कोई नहीं तेरा यहाँ ।
साथ किसका कौन देता है, कोई देगा कहाँ ॥॥
चार दिन का है यह मेला, नाव नद संजोग हैं।
सब बिछुड़ जायेंगे, कोई है यहाँ कोई वहाँ ॥॥
झूठे नाते बाँध कर, तू हुआ मन में दुखी ।।
देख अपने रूप को, दो दिन का जग का समाँ ॥॥
रोक सब बाहर की वृत्ती, होके तू अन्तरमुखी ।
शब्द का अभ्यास कर, जैसी दशा में हो जहाँ ॥॥
राधास्वामी का सहारा लेके कर सुमिरन भजन ।।
थोड़े दिन पीछे यह अवसर, हाथ आयेगा कहाँ ।।।।
134.गुरु हुये संसार में परगट, गुरु से ज्ञान लो ।।
छोड़ दो पाखंड को, गुरु मत की महिमा जान लो ॥॥
गुरु है ब्रह्मा गुरु है विष्णु, गुरु ही शिव के रूप हैं।
ब्रह्म गुरु परब्रह्म गुरु है, गुरु को सब कुछ मान लो ।।।।
ज्ञान है आधार गुरु के, भक्ति गुरु के आसरे ।
गुरु के सनमुख जाके तुम, सतगुरु से नाम का दान लो ॥॥
आया शुभ अवसर न इस, अवसर को छोड़ो हाथ से ।।
गुरु से मिलकर जीते जी, कैवल्य पद निर्वान लो ।।।।
राधास्वामी की दया से, गुरु की आई अब समझ ।।
जनम को करलो सुफल, निज रूप को पहचान लो ॥॥
135. जाके गुरु के पास बैठो, और बचन उनके सुनो।
जो सुनो उसको विचारो, जो बिचारो वह गुनो ॥॥
सुन लो गुनके नित करो, बचनों को उनके तुम अहार ।।
तुष्ट होकर साधना से, करलो सब साक्षात्कार ॥॥
गुरु की संगत बिन नहीं, अधिकार होता ज्ञान का ।
जब तलक संगत न हो, मिटता नहीं मद मान का ॥॥
मान मद अभिमान मन मत, के सभी समझो विकार ।
मानी अभिमानी को कब, सूझे कभी सार और असार ॥॥
राधास्वामी योग सीखो, जो सहज है और सुगम ।
जीतेजी पाजाओ मुक्ति, और बनालो निज जनम ॥॥
136. ध्यान तक करता नहीं है, कोई मेरी बात का ।।
क्या कहूँ है भेद उनमें, मुझमें दिन का ति का ॥॥
काल ने चोटी पकड़ रखी है, सब की हाथ में ।
फिर भी यह करते हैं झगड़ा, पाँत का और जात का ॥॥
सबकी उत्पति स्थिती, और लय की लीला एक है।
जिसको देखा न्यून जीवन, कीड़ा था बरसात का ॥॥
आये है सो जायेंगे, रहने नहीं आया कोई ।।
ज्ञान होता ही नहीं है, इनको यम की घात का ॥॥
यह सहेंगे कष्ट आपत, सुनने वाला कौन है ।
बात को कब मानता है, देवता जो लात का ।।।।
राधास्वामी ने कहा, सब प्रेम के रस्ते चलें ।
ध्यान यह करते नहीं हैं, सतगुरु की बात का ।।।।
137. प्रम का सौदा करो तुम, प्रेम के व्यौहार में ।
हानी और घाटा नहीं है, प्रेम के व्यौपार में ।।।।
प्रम में है स्वाद अद्भुत, प्रेम का प्याला पियो ।
होके मतवाला विचरना, सीखो इस संसार में ॥॥
प्रेम से मन जीतलो, सबसे निराला शस्त्र है ।।
जीत देखो अपनी पक्की, जय है इसके हार में ॥॥
मेरे दाता प्रेम दे, अपना न दे तू कुछ मुझे ।
इसमें सुख है, मीठा रस मिलता है इसकी मार में ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम की नौका चढ़ो ।
पार जाओ डूबते हो, क्यों पड़े मॅझधार में ॥॥
138. सच्ची बन कर रात दिन, तुम सत गुरु का नाम लो ।
शील लो संतोष लो, संसार में धन दाम लो ॥॥
मन में जब विश्वास हो, दुर्लभ नहीं फिर कोई वस्तु ।।
धर्म लो तुम अर्थ लो, मोक्ष लो सत काम लो ॥॥
इसके सुमिरन से कटेंगे, फन्द माया जाल के ।
मन की सब खटपट मिटे, और उसकी विरती थामलो ॥॥
उठते बैठते चलते फिरते, जागते सोते हुये ।।
खाते पीते नाम लो, और नाम आठों याम लो ।।।।
जीते जी यश कीरती लो, भक्ति के मारग में आ ।।
तन छुटे पीछे सहज में, राधास्वामी धाम लो ॥॥
139. काम जो करना हो, चित दे उसे करते रहो ।
छोड़ो दुविधा दुर्मति, दुचिताई से डरते रहो ।।।।
यह समझ लो तुम हुये, जैसा किया कर्म और विचार ।।
अपनी करनी पार उतरनी, है यही उपदेश सार ॥॥
सोचो मन में अपने, औरों से न पूछो बात को ।।
बचके चलना दूर करके, मन के सब उत्पात को ॥॥
एक चित होकर करो, सुमिरन भजन दिन रात तुम ।।
करनी से हो लगन सच्ची, कथनी को दो मात तुम ॥॥
सहज में साधन हो; कठिनाई की चिंता छोड़ कर ।।
काम में अपने लगो, बातों से मुह को मोड़ कर ॥॥
जो करो पूरा करो, करना हो जो वह करलो आज ।
भक्ति मुक्ति योग युक्ति, को सजा लो विमल साज ।।।।
राधास्वामी की दया से, जन्म अपना लो बना ।
गुरु की सतसंगत करो, सब पूरी होगी कामना ।।॥
140.ध्यान में गुरु मूरती को, ध्यान देकर ध्यान दो ।
ध्यान की जड़ समझो सुमिरन, इसको तन और प्राण दो ॥॥
जब भजन हो मेट दो, संकल्प की बातों को सब ।।
शब्द का श्रवण करो, और पुतलियों को तान दो ॥॥
मन की दुविधा छोड़कर, दृष्टि जमाओ रूप पर ।।
मूरती को तीसरे तिल में, सदा स्थान दो ॥॥
ध्यान और सुमिरन भजन से, लव लगाओ रात दिन ।
जो सुनो अन्तर में उसकी, ओर चित के कान दो ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी जप सदा ।।
साधना सतसंग करने वालों को सन्मान दो ॥॥
141. भक्ति की चूनर पहन ली, और सुशीला बन गई।
रूखापन चित से गया जब, तब रसीला बन गई ॥॥
चित में है परतीत भक्ति, मन दया का पात्र है ।।
रंग गुरु को चढ़ गया, रंग ले रंगीला बन गई ॥॥
मीठी बानी बोलती है, प्रेम के रस से भरी ।।
दुर्वचन क्यों निकले मुह से, जब छबीला बन गई ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाले नित ।।
कौन कह सकता है अब, तुझको हठीला बन गई ॥॥
142 ज्ञान है गुरु ज्ञान गुरु के, नाम ही में ज्ञान है ।।
नाम का सुमिरन करो नित, नाम में कल्यान है ॥॥
नाम हो धुनात्मक, वर्णात्मक को छोड़ कर ।।
गायो अन्तर में उसे, अनहद से अनहद तान है ॥॥
नाम ले नामी का अनुभव, जाग उठेगा आप से ।।
नाम के अन्तरमुखी, सुमिरन में उसका ध्यान है ॥॥
नाम और नामी में क्या है, भेद उसको जान लो ।।
जानकर सुमिरन हो वह, क्या जाने जो अनजान है ॥॥
चाहे आलस क्रोध चाहे, भाव हो या वह नहीं ।
नाम में निस दिन है मंगल, नाम मंगल खान है ।॥॥
हो सहज सुमिरन, सहज रीती से विरती हो सहज ।।
शान्त चित जब नाम का, निंभ्रान्त होकर गान है ।।।।
राधास्वामी ने बताया, पास हो नामी के तुम ।
सुरत की बैठक जो घट में, नामी का स्थान है ॥॥
143. ज्ञान की करनी करो, और तज दो बाचक ज्ञान को ।।
करनी से अनुभव बढ़ेगा, मैटकर मद मान को ।।।।
भूख हो उद्यम करो, खाना पकाकर खाओ तुम ।।
त्याग दो मिथ्या समझकर, बालों के पकवान को ।।।।
करनी को चित दे नहीं, कथनी से निस दिन काम है।
भोंक कर मर जायेगा, तुम कहदो ऐसे स्वान को ।।॥
वह है प्यारा मुझको जो, करता करनौ रात दिन ।
सम किया है करनी से, जिसने अपान व व्यान को ।।।।
ज्ञान का कथना सुगम है, करनी का जीवन कठिन ।।
हम तो करनी के हैं साथी, गह लिया गुरु ज्ञान को ।।।।
जब तलक देखा न अपनी, आँखों क्या कहने से लाभ ।
करनी करने से बढ़ालो, अनुभव और अनुमान को ॥॥
कहने को तो सब बहुत कुछ कहते रहते हैं सदा ।।
जब करेंगे करनी, पायेंगी, तभी परमान को ॥॥
राधास्वामी ने कहा, कथनी तजो करनी करो ।।
दो यही उपदेश अपने, जान को पहचान को ॥॥
144. सहज में सब काम करना, सहज विरती धार कर ।
सहज में परमार्थ हो, और सहज में व्यौहार कर ॥॥
सहज विरती मुख्य है, उत्तम है सुमिरन और भजन ।
है अधम तीरथ बरत, संगत से सत के प्यार कर ॥॥
गुरु पशु बनना नहीं, अच्छा गुरु का मन्त्र ले ।।
मन्त्र लेकर सहज में, भव जल से बेड़ा पार कर ॥॥
भक्ति कर भक्ति समझकर, भक्ति को चित दे सदा ।।
भक्त होजा भक्त जन के, मेल का सत्कार कर ॥॥
राधास्वामी मत है क्या, अनुभव से समझेगा उसे ।
अनुभवी हो काम मद और, लोभ मन से मार कर ॥॥
145. पुत्र पति सम्बन्धियों से, प्रेम का व्यौहार कर ।।
घर में रहकर हो भजन और, इस भजन से प्यार कर ॥॥
पाया शुभ अवसर न इसको, हाथ से खोना कभी ।।
मन से दुविधा मेटकर, निश्चय को अंगीकार कर ॥॥
उठते चलते बैठते, सुमिरन रहे सतनाम का ।
नाम में जीवन हो तेरा, नाम का परचार कर ॥॥
भाग को अपने बढ़ाले, सिंध बुद की गति परख ।
गुन्द हो सत सिंध ऐसे, प्रेम का विस्तार कर ॥॥
राधास्वामी की दया ले, बेन दया की मूरती ।।
शील पाकर हो सुशीला, चित की दुचिता टोर कर ॥॥
146. प्रेम दुख संकट नहीं है, प्रेम के मारग में आ ।।
प्रेम का रस्ता सुगम है, प्रेम को ले आसरा ॥॥
प्रेम सुख आनन्द है, और प्रेम में है शान्ती ।
यह समझले अपने मनमें अपने, यह नहीं दुख आपदा ॥॥
सोना अग्नी में पड़ा, उसको सुहागा जब मिला ।
चमका दमका मैला सोना, तप से फिर कुन्दन बना ।।।।
सोच अपने मन में, प्रेम और प्रीति के व्यौहार को ।
प्रेम में परतीत में, भक्ति में दे मन को लगा ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वही मतवालो है।
राधास्वामी प्रेम मत है, समझा जो ज्ञानी हुआ ।।।।
147. प्रेम जिसके मन में आया, प्रेम से प्रेम बना ।।
संयम है प्रेम का वह, प्रेम का नियमी बना ॥॥
योग क्या है प्रेम है, वेदान्त क्या है प्रेम है।
शान्त क्या है प्रेम है, निंभ्रान्त क्या है प्र म है ॥॥
प्रेम हैं आनन्द यह, आनन्द का भंडार है ।
प्रेम ही को सत्य समझो, प्रेम सबका सार है ॥।।
प्रेम से अन्तःकरण हो, शुद्ध निर्मल बुद्धि हो ।
कब अशुद्धि रह सकेगी, प्रेम की जब शुद्धि हो ।।।।
नित्य है। यह प्र में, मुक्ति प्रेम के अधीन है ।
ज्ञान भक्ति शक्ति युक्ति, प्रेम के आधीन है ॥॥
प्रम की विद्या अविद्या, रोग की है औषधी ।।
क्या कहूँ संसार के यह, सोग की है औषधी ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, जिसने वह मतवाला बना ।।
दुर्मति जाती रही, भोला बना बाला बना ॥॥
कैसी पूजापाठ संध्या, कैसे धर्म और कर्म अब ।
हट गये झगड़े मिला है, प्रेम का सत मर्म अब ॥॥
प्रेम है आनन्द दाता, प्रेम का प्याला रसाल ।
माँगता है उसके बदले, सीस तन मन को कलाल ॥॥
जीते जी मरजाना हो, इस रास्ते में आओ तुम ।
सहज में शम दम तितिक्षा, मुक्ति के फल खाओ तुम ॥॥
काग से कोयल बनो, बगले से अब होजाओ होस ।
थोड़ा ही जो हाथ आजाये, तुम्हारे प्रेम अंस ॥॥
प्रेम प्रेमी और प्रीतम को, मिला करता है एक ।।
प्रेम ही है ज्ञान धन, और प्रेम ही सच्चा विवेक ।।॥
प्रेम ही सुमिरन भजन है, प्रेम ही है ज्ञान ध्यान ।
करलो संगत प्रेमियों की, कुछ दिनों इसको पिछान ।।॥
प्रेम भव से पार ले जाने का, नौका बन गया।
चित की दुचिताई हटी, दुविधा मिटी तन मन गया ॥॥
राधास्वामी प्रेम के हैं, सिंध और हम बद हैं।
बृद जब उसमें मिला, तब फिर कहाँ तू और मैं ॥॥
148. तारने वाले ने तारा, तर गये सब तर गये ।।
जिसको तरना था तरे, भवनिधि के वह तट पर गये ।।॥
लालची कामी तरे, क्रोधी तरे मोही तरे ।।
नीची योनी में जो थे, वह नाम ले ऊपर गये ॥॥
तारने वाले ने तारा, तार तरने का बँधा ।
अब हो क्या चिंता किसी को, उसके जो दर पर गये ।।।।
आये शरनागत जो उसके, कर लिया जीवन सुफल ।।
॥ ॥ अब नहीं तरने में संशय, काम अपना कर गये ॥॥
राधास्वामी ने दया की, लाये नौका शब्द की ।
जो चढ़े वह तर चले, चूके जो वह सब मर गये ॥॥
149. चित की वृत्ती हो न चंचल, करले उसकी रोक थाम ।
उसके पीछे बैठकर, एकान्त में लो गुरु का नाम ॥॥
नाम के सुमिरन से, आजायेगी तुझमें धारना ।।
धारना से ध्यान होगा, ध्यान होगा आठों याम ॥॥
ध्यान से प्रगटेगी अन्तर, सतगुरु की मूरती ।।
मूरती का कर भजन, चिन्तन भजन का कर तू काम ॥॥
इस भजन चिन्तन के अन्तर, राम अनहद है छुपी ।।
सुन उसे लय होजा उसमें, गह ले सुन्न में लय का ठाम ।।।।
जब सहज आये समाधी, दौड़ चल सत लोक को ।।
लख अलख गम ले अगम की, पाले राधास्वामी धाम ॥॥
150. मौज के आधार रहना, मौज का लो आसरा ।
मौज की हो बात निस दिन, मौज में बरतो सदा ॥॥
मीत है स्वामी तेरा, कोई नहीं है और मीत ।
शत्रु कोई है कहाँ, वह आप जब रक्षक हुआ ॥॥
सुख में दुख में शान्ती हो, चित की दुविधा मेट कर ।।
शान्ती में सुख है, दुचिताई में दुख़ और आपदा ॥॥
मन बचन और कर्म से, चित के दुखाने से बचो ।
चित दुखाना ही है हिंसा, पाप यह सबसे बड़ा ॥॥
अपने जैसों से हो मिलना, छोटों पर करुणा रहे ।
बच के चलना शत्रु से, और हो बड़ों से नम्रता ॥॥
काम में मन को लगाओ, मिथ्या बातें छोड़कर ।
काम में जो रहते हैं, उनको नहीं वह व्यापता ॥॥
राधास्वामी ने बताया, प्रेम के रस्ते चलो ।
नाव नद संजोग है, बिछड़ेगा जो आकर मिला ॥॥
151. सहज बेड़ा पार है अब, नाव थी मॅझधार में ।
डूबने का भय मिटा है, दुख नहीं संसार में ॥॥
एक रस जीवन मिला, निद्वन्द हूँ निर्धान्त हूँ।
अब नहीं है भेद, परमारथ में और व्यौहार में ॥॥
द्वत हूँ अद्वैत हूँ, दोनों का आधार हैं।
किसको पूजू किसको ध्याऊँ, पन्थ की भरमार में ॥॥
पढ़ के पोथी खोगये, अपना पता पाया नहीं ।
पंडितों को लाभ क्या था, धरम के व्यौपार में ।।।।
राधास्वामी ने दया की, गुर बताया ज्ञान को ।
सार पाकर सार का मैं, हो रहा हूँ सार का ॥॥
152. साध ले तन मन को अपने, मन से करले यह जतन ।।
सुरत को थिर कर मिलेगा, तुझको परमारथ को धन ।।।।
करनी में चित को लगादे, बातें कहना छोड़दे ।।
यह तो है करनी का साधन, तू लगादे इसमें मने ॥॥
थिर हो असन थिर हो बानी, थिर हो चित तेरा सदा ।।
आयेगी स्थिरता लगेगी, आप फिर सच्ची लगन ।।।।
प्रम और भक्ति के मारग में, है मुख्यता प्रम की ।
प्र में का श्रवण मनन हो, प्रेम ही का हो कथन ।।।।
राधास्वामी नाम ले, और नाम आठों याम ले ।
नाम का हो ध्यान सुमिरन, नाम ही का हो भजन ।।।
153. ध्यान में चित को लगा, बातें बनाना छोड़ दे ।
भरम और अज्ञान के, रस्ते में आना छोड़ दे ॥॥
सीस पर जब सतगुरु ने, हाथ तेरे रख दिया ।
मन में कर विश्वास, और धोके में जाना छोड़ दे ॥॥
काम वह आपहि करेगी, और करायेगा वही ।
आस कर सतगुरु की और, भव भय का खाना छोड़ दे ॥॥
चित हो चरनों में गुरु के, मन हो उसके ध्यान में ।
मोह और माया का मन में, ध्यान लाना छोड़ दे ॥॥
राधास्वामी नित जपा कर, जाप अजपा जाप हो ।
है यही करतब इसे कर, और बहाना छोड़ दे ॥॥
154. त्याग दे आसा जगत की, आसा दुख का मूल है ।
आसा वाले के लिये जग, शम्भु का त्रिसूल है ॥॥
किसकी आसा कर रहा है, अस करती है निरास ।।
आसा ही अज्ञान है, और आसा तृष्णा भूल है ।।।।
पाके नर जीवन समझ ले, सार और निर्धान्त हो ।
फिर तुझे प्रतिकूल जग ही, सर्वदा अनुकूल है ॥॥
कृष्ण ने अर्जुन को यह, समझाया कर निष्काम कर्म ।।
मुस्कुराता हँसता खिलता, रह जो सच्चा फूल है ।।।।
राधास्वामी ने दया की, प्रेम का रस्ता दिया ।
प्रेम सब का सार है, और शेष मिट्टी धूल है ।।।।
155. आस अब किसकी करू, जब दास तेरा होगया ।
मैं हुआ तेरा तो तू भी, स्वामी मेरा होगया ॥॥
तू है मेरे साथ पलछिन, क्यों हो अब चिन्ता कोई ।
मेरे घट में तेरे रहने का, जो डेरा होगया ।।।।
सीस पर तूने दया का, हाथ रख परिचय दिया।
मैंने समझा काल का, सब हेरा फेरा होगया ॥॥
जग नहीं स्थिर न, स्थिरताई जग की वस्तु में ।
यह तो चिड़िया रैन का, सचमुच बसेरा होगया ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
नाम भव के सिंध के, तरने का बेड़ा होगया ॥॥
156 काम करता हूँ तेरा, स्वामी सदा निष्काम बन ।।
लाभ की और हानि की, चिंता नहीं कुछ मेरे मन ॥॥
मौज को लेकर सहारा, हूँ मैं जीवन काटता ।
चाहे रखे घर में चाहे, भेजदे तु सघन बन ॥॥
चित में क्यों हो भ्रान्ती, जब तू सहायक होगया ।
आस है तेरी दया की, और नहीं कोई जतन ॥॥
जीने की इच्छा नहीं, मरने से भय खाता नहीं ।
दोनों ही सम होगये हैं, मुझको अब जीवन मरन ।।।।
राधास्वामी नाम हो, होठों में सोते जागते ।।
राधास्वामी को हो निसदिन, ध्यान और सुमिरन भजन ।।।।
जग की लीला देख ली, स्वारथ के हैं साथी सभी ।
अपना कोई भी नहीं, इससे लगी तुझसे लगन ॥॥
स्तुति और निन्दा का डर, मन को सताता अब नहीं ।
मैं हूँ जैसा जानता है, तुझसे करू मैं क्या कथन ॥॥
मेरे दाता दीन हूँ, आधीन हूँ मैं सर्वदा ।।
यह दया कर तेरी बानी, का रहे श्रवन मनन ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नाम लू ।।
राधास्वामी छोड़कर, भावे नहीं कोई बचन ॥॥
157. नाम की औषधि मिली, संसार का क्यों रोग हो ।
नाम लेने वालों को क्यों, इस जगत में सोग हो ॥॥
नाम का साधन किया, जिसने उसे सब कुछ मिला ।।
लाभदायक अब उसे क्या, ज्ञान कर्म और योग है ॥॥
तीन तापों की है औषधि, राधास्वामी नाम एक ।
दुख सतावे किसको जब, गुरु नाम को संजोग है ॥॥
मेल है जब नाम से तब, सुख का मेला होगया ।।
नाम ही हो भगत को, जीवन यह उसका भोग है ॥॥
राधास्वामी नाम के, सुमिरन में सिद्धिं शक्ति है।
योगी पूरी कर कमाई, नाम ही का जोग है ॥॥
158. एक चिन्ता नाम की कर, जग की चिन्ता मेटकर ।।
चलते फिरते नाम ले तू , बैठकर या लेटकर ॥॥
गुरु के चरणों में झुका, मस्तक डहे सब मान मद ।
कर कमाई भक्ति की, और प्रेम गुरु के भंट कर ।।।।
चित से कब जाने लगा है, मान मद हंकार का ।
सीस अपना राधास्वामी, पद के आगे भेंट कर ।।।।
159. तेरी लीला कौन समझे, तु, तो अपरम्पार है।
एक दृष्टि से तेरे, दुखियों का बेड़ा पार है ।।।।
दुख में सुख रहता है तो, हमको नया कुछ भी नहीं ।
मौज को क्या जीव जाने, दुविधा का सिर भार है ।।।।
दुख में सुख रहता है छुपकर, कष्ट का परिणाम सुख ।
बन्ध में मुक्ति की छाया, मुक्ति बन्धाकार है ॥॥॥ ।।
राधास्वामी पूरे सतगुरु, ने बताया भेद को ।
मन में अब चिन्ता नहीं है, सुखदाई यह संसार है ॥॥
160. कोई दुख सुख का नहीं, दाता तेरी है भूल सब ।।
कर्म अपने करते हैं, अनुकूल और प्रतिकूल सब ॥॥
कर्म की प्रधानता की, क्या नहीं तुझको समझ ।
कर्म से आनन्द है, और कर्म ही है सूल सब ॥॥
यह जगत है वाटिका, करते हैं प्रानी आके काम ।
कर्म के अनुसार इनके, काँटे हैं और फूल सब ॥॥
जो ठगेगा वह ठगा जायेगा, निस्संदेह आप ।।
प्रेमीजन ही पाते हैं, और प्रेम के बहुमूल सब ॥॥
अपनी करनी आप भरनी, पड़ती है संसार में ।।
अपने घर की आप उठाया, करते ही हैं चूल सब ॥॥
किस भरम में तू पड़ा, औरों की बात छोड़ दे।
काम में लग अपने करले, कर्म निज अनुकूल सब ॥॥
राधास्वामी नाम भज, झगड़ों से बचकर रह सदा ।
जो नहीं समझा तो पढ़ना, लिखना होगा धूल सब ।।।।
161. राधास्वामी मेरी विनती, प्रेम से सुन लीजिये ।
चित हटाकर जगत से, चरणों की छाया दीजिये ॥॥
मन हो निश्चल ध्यान धरने, से वह उकताये नहीं ।
सुरत ठहरे और ठहरने, से वह घबराये नहीं ॥॥
रात दिन सुमिरन हो रसना, नाम का रस ले सदा ।।
मैं भजू हित चित से गुरु के, नाम ही को सर्वदा ॥॥
रूप का हो ध्यान सुमिरन, नाम का अन्तर में हो ।
शब्द का साधन भजन हो, तन की सुधबुध सारी खो ॥॥
तन मन में इन्द्रियों में बुद्धि, और तुम चित में बसो ।
अंग संग दिन रात मेरे, घट के भीतर तुम रहो ॥॥
हाथ में आओ करू, व्यौहार मैं उपकार के ।
पाँव ऐसे हों, चलू मैं पन्थ में करतार के ॥॥
आँख में बैठो जगत मैं, आपकी मूरत लखें ।।
कान में बैठो सदा मैं, शब्द अनहद का सुनू ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते रहो तुम साथ में ।
सहज में आजाये, परमारथ की निधि सिधि हाथ में ॥॥
मेरा आपा लय तुम्हारे, आपो में होजाये अब ।।
सुरत जागे गगन में, पृथवी में वह सो जाये अब ॥6॥
तू का मैं का मिथ्या झगड़ा, छूटे जीवन मुक्त हूँ ।
शुद्ध निर्मल आत्मा हो, सुख से आनन्द से जिऊँ ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर, हो सत करतार हो ।
ऐसी कृपा कीजिये, अब लोप यह संसार हो ॥॥
162.कौन कहता है तुम्हें, भाई कि संसारी बनो ।
मैं यह कहता हूँ कि तुम, भक्ति के अधिकारी बनो ॥॥
चित रहे गुरु के चरन में, मन रहे गुरु ध्यान में ।।
चाहे तुम परमारथी हो, चाहे व्यौपारी बनो ॥॥
हाट में संसार के, आये हो सौदा के लिये ।।
प्रेम का व्यौहार करके, सच्चे व्यौपारी बनो ॥॥
साथ अपने औरों के भी, हित को तुमको ध्यान हो ।
अपना हित करते रहो, औरों के भी हितकारी बनो ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो उठते बैठते ।।
पाके नर तन रहके तन में, तुम निःहंकारी बनो ।।।।
163. मौज की आई परख अब, चित में दुचिताई कहाँ ।
मौज के होते हुये, दुचिताई फिर आई कहाँ ।।।।
करने वाला काम करता है, हमारा नाम है।
करतो धरता आप वह, कुछ मुझसे बन आई कहाँ ॥॥
अगमा पाई जगत है, दो दिन के मेले का है ढंग ।।
बिछड़ेंगे सब एक दिन, माँबाप और भाई कहाँ ॥॥
और को है हाथ और, तलवार करती काट है ।
काट हर तलवार कब, अपनी कभी लाई कहाँ ॥॥
मित्र से क्या नेह और, क्या शत्रुओं से द्वेष हो ।
मित्रता और शत्रुता, किस पुरुष को भाई कहाँ ॥॥
सब ही उसके वह है सब को, सबको उससे काम है।
तूने निष्फल और मिथ्या, ममता को पाई कहाँ ॥॥
राधास्वामी संत सतगुरु ने, हटाया फंद को ।।
सब का दाता आप वह है, दाई और माई कहाँ ।।।।
164. तेरे घट में राधास्वामी, राधास्वामी नाम है।
घट के भीतर तू परखले, राधास्वामी धाम है ॥॥
एक कर व्यौहार परमारथ, जो दीक्षा भिल गई।
शब्द के साधन में लगजा, शब्द से बिसराम है ।।।।
लाभ और हानी की चिंता, को न आने चित में दे।
काम कर मन को लगाकर, काम ही से काम है ॥॥
जिसके मन में शान्ती हो, भ्रान्ती से वह बचे ।
भ्रान्ती व्याये नहीं अब; शान्ती आठों याम है ।।।।
जिसने गुरु को मुख्य समझा, कहते हैं गुरुमुरव उसे ।।
भय नहीं है भेद का, नहीं दंड को नहीं साम को ।।।।
दास को दुर्लभ नहीं है, कृतकार्यता गुरु दया से ।।
प्राप्त उसको धर्म अर्थ और, मोक्ष है और काम है ॥॥
राधास्वामी सब जगह हैं, सिंध में और बुन्द में ।
मोती और मू गे में भी, यह समझो तब बिसराम है ॥॥
165. क्या कहूँ सुमिरन नियम, संजम है सुमिरन योग है।
धारना है ध्यान सुख, आनन्द मंगल भोग है ॥॥
ज्ञान का फाटक है सुमिरन, ज्ञान का वह धाम है।
भाग वाला है जिसे, सुमिरन से कुछ संजोग है ॥॥
सुख की चाहत हो करो, सुमिरन कि दुख संकट हटे ।।
औषधि इसकी करो, तुमको जो भवका रोग है ॥॥
इससे बढ़कर कुछ नहीं, वृत्ती में जो दृढ़ता रहे ।
लौ लगे गुरुचरन में, अन्तर जो मन में सोग है ॥॥
राधास्वामी नाम का, सुमिरन हो सोते जागते ।।
उसकी महिमा से यहाँ, अनजान सारा लोग है ॥॥
166. जिसकी तुझको खोज है, परगट वह तेरे मन में है।
भर्मा भूला भटका क्यों, दिन रात घर और बन में है ॥॥
इन्द्रियों में है वही, बुद्धि में चित अहंकार में।
मास में है प्रान में, नस नाड़ी में और तन में है ॥॥
खोल कर कहता नहीं, कोई कभी इस बात को ।
अपने आये को समझ, वह तेरे आपापन में है ॥॥
तू कहाँ और किसमें करता है, भजन किसके लिये ।।
सोच इसको मन में वह, अन्तर तेरे पल छिन में है ॥॥
राधास्वामी धाम घट में, घट में राधास्वामी नाम ।
सुरत में वह शब्द में वह, और वही साधन में है ॥॥
167. घट में दर्शन पाओगे, संदेह कुछ इसमें नहीं ।
मैं तो घट में हूँ तुम्हारे, ढूंढ़ लो मुझको वहीं ॥॥
शब्द सुनते हो मेरा, अन्तर में चित को साध कर ।।
सुरत मेरा रूप है, इसको समझ लेना यहीं ॥॥
सूक्ष्म हूँ स्थूल हूँ, कारन हूँ कारन से परे ।
देख दृश्टि को जमाकर, अपने अन्तर में कहीं ॥॥
चाह जब दरशन की होगी, देख लोगे आप, तुम ।।
जागते में सोते में, संध्या में मैं हूँ सब कहीं ॥॥
राधास्वामी धाम में, सेवक हूँ राधास्वामी को ।
मेल मेला राम में, इसकी परख आई नहीं ॥॥
168. कुछ नहीं दुर्गम सुगम सब, कुछ जो गुरु के दास हो ।।
दास वह सच्चा है, जिसमें भक्ति हो विश्वास हो ॥॥
मैं हूँ तुझमें तू है मुझमें, मेरा तेरा है भरम ।।
छोड़ मैं तू को भरम, निज रूप की जब आस हो ॥॥
मुझको सुमिरो मुझको ध्याचो, हो भजन मेरा सदा ।
ध्यान सुमिरन और भजन की, रीत साँसों साँस हो ।।।।
हुँगा प्रगट जब बुलाओगे, कभी तुम चाह से।
मेरे रहने की जगह, भूमी नहीं आकाश हो ॥॥
राधास्वामी ने दया की, भेद अन्तर का दिया ।
देख लोगे मुझको जब, नित शब्द का अभ्यास हो ।।।।
169. जब तुम्हें चिन्ता सतावे, गुरु का तुमको ध्यान हो ।
मिट रहे अज्ञान पल छिन, में जो सच्चा ज्ञान हो ।।।।
दुख में संकट में बिपत में, सोच में चिन्ता में भी ।
नाम की सुमिरन सदा हो, नाम का अनुमान हो ॥॥
सोते उठते बैठते, और खाते पीते जागते ।।
गुरु को अपने पास समझो, परचे का परमान हो ॥॥
कौनसी आपत है जो, टाले नहीं टलती कभी ।।
नाम है हथियार जानो, तुम नहीं अनजान हो ॥॥
राधास्वामी की दया से, जब शरण तुझको मिली ।।
कुछ दिनों अभ्यास पीछे, जीते जी निरवान हो ॥॥
170. तू दया का रूप प्यारे, तू दया भंडार है।
कर दयादृष्टि दया मय, तुझ ही से अधिकार है ॥॥
सन्त सतगुरु तुझको कहते हैं, नहीं हैं जानता ।
मेरे अनुभव में, दया करुणा का तू भंडार है ॥॥
मेरे दाता सीस, पर, मेरे दया का हाथ रख ।।
तू है दानी दीनबन्धु, जगत का दातार है ॥॥
मेरे अन्तर में समाना, मेरे साँसों साँस में ।।
तू है व्यापक यह समझ दे, सच्चा जो अधिकार है ॥॥
आस रख कर गुरु कृपा की, नित करो अभ्यास तुम ।।
रात दिन छिन छिन तुम्हारा, वह सदा रखवार है ॥॥
छोड़ो ममता छल कपट, चतुराई गुरु से नेह जोड़ ।।
भक्ति उसकी कर वह सच्चा, प्रेम का भंडार है ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी को सुमिर ।।
राधास्वामी सर्व रक्षक, सर्वदा हितकार है ।।।।
171. गुरु के चरनों में पड़ा जब, बन गया मेरा जनम ।।
बन गया अब बन गया, फिर क्या बिगाड़ेगा करम ॥॥
चलते फिरते जागते, सोते में सुमिरन नाम का ।। ।।
यह धरम मेरा हुआ, क्या धारू अब दूजा धरम ॥॥
भूला भटका काल माया, ने किया मेरा अकाज ।
मिल गये सतगुरु छुटा, जन्मों का अब सारा भरम ॥॥
सैकड़ों पोथी पढ़ीं, निकला न कोई मेरा काम ।
गुरु की संगत पाई तब, सूझा ठिकाने का मरम ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, धन्य महिमा आपकी ।
हो दया सुमिरन भजन, और ध्यान हो मेरा नियम ॥॥
172. कहता हूँ सच घट में तेरे, राधास्वामी धाम है ।।
घट में सतगुरु सत की संगत, सत सभा सत नाम है ॥॥
होगया बाहर मुखी तब, भूला अपने आप को ।।
धेस के अन्तर खोज अन्तर, ही में सबका ठाम है ॥॥
मैं हूँ तेरे घट का बासी, और नहीं तुझ से पृथक ।।
मिलता हैं चिंता जिसे, मेरी ही आठों याम है ॥॥
राधास्वामी धाम को, दर्शन जो घट में हो तुझे ।।
जीते जी निर्वाण सुख, आनन्द और बिसराम है ॥॥
173. छोड़ खटपट मन की अपने मन में अपना रूप देख ।।
मन ही के दरपन में जग की, सब प्रजा और भूप देख ॥॥
मन ही विष्णु लोक है, सत लोक है धुर धाम है।
मन में अमृत कुन्ड मन में, नरक का भी कूप देख ॥॥
सोचकर तब खोल मुह को, सिद्धि सारी मन में है ।
मन की साधारण गति है, मन में अगम अनूप देख ॥॥
मन में सब की खान है, मन गुन है मन निगुन सगुन ।
मन में रूप स्वरूप है, और मन में अपना रूप देख ॥॥
साध ले निजं मन को अब तू , शब्द के अभ्यास से ।।
सिर झुका चरनों में मन में, राधास्वामी भूप देख ॥॥
174. ज्ञान दीजे ज्ञान दाता, ज्ञान के भंडार से ।
सहज छुटकारा मिले, सबको कठिन संसार से ॥॥
कहने को तो बंध मुक्ति, कल्पना मन की सही ।।
बिन दया सतगुरु के वह, भिटते नहीं हैं जीते जी ॥॥
नाम का दे आसरा, चरनों में अपने लीजिये।
शब्द की महिमा बताकर, अपनी सेवक कीजिये ॥॥
सच्चिदानन्दम् अखंडम्, केवलम् निज रूप हो ।
निज दया से जाये, दुखदाई महा भव कूप खो ॥॥
आपका है आसरा, और आपको विश्वास है ।।
राधास्वामी तारिये, यह भी तुम्हारा दास है ।।।।
175. जब दया गुरु की हुई, चरनों की भक्ति मिल गई ।।
सब निबलता मिट गई, निश्चय की शक्ति मिल गई ॥॥
आगये सतसंग में, और संग सत का हो गया।
दुर्मति जाती रही, जब गुरु के मत का हो गया ॥॥
प्रेम का प्याला पिया, पीते ही मतवाला बना ।।
मन की सुध बुध खोगई, भोला बना भाला बनीं ॥॥
पांच में मस्तक नवाया, चित से धारा गुरु का रंग ।
कीट जिसको पहिले सब, कहते थे अब ठहरा भिरंग ॥॥
आप में आपा लखा, आपे में पा ज्ञान था ।
। भरम में लटका हुआ, भूला था और अज्ञान था ।।।।
शब्द के सुनते ही अन्तर, में जो विरती सोगई ।।
छिन पल में वासना, माया की सारी खोगई ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी राग को ।।
गारहा हूँ धन्य मैं, कहता हूँ अपने भाग को ॥॥
176. है यही शिक्षा गुरु की, गुरु का गुन गाओ सदा ।।
गुरु चरन में करदो अरपन, देह धन मन सर्वदा ॥॥
गुरु तुम्हारे घट में है, घट ही में दर्शन की चाह ।
शब्द गुरु का संग हो, कोई नहीं गुरु दूसरा ॥॥
वह तुम्हारा तुम हो उसके, है वह घट में रात दिन ।
घट में दुदो घट में पाओ, घट का परदा दो उठा ॥॥
वह अघट व्यापा है घट में, घट ही में पाओगे तुम ।
बात मैं कहता हूँ सच, जिसको मिला घट में मिला ॥॥
राधास्वामी की दया से पूरा करलो काम अब ।।
नाम लो बिसराम लो, धन धाम लो तुम घट में अब ॥॥
177. दुहृता फिरता है किसको, दुइ वह तु आप है।
तू नहीं समझा अभी तक, यह हृदय का ताप है ॥॥
चाह करना हो तो कर, अपनी यही अच्छी है चाह ।।
भूठे बेटे और बहू सब, झूठे माँ और बाप है ॥॥
त्याग चिंता मन से संबकी, अब समझले मर्म को ।
क्या कहूँ चिन्ता का निसदिन, तुझको रहता ताप है ॥॥
तूने अपने को फंसाया, मोह के जंजाल में ।
मोह माया कल्पना यह, मन की तोल और नाप है ॥॥
आप ही अपनी परख कर, आप को पहचान ले ।
तू अकेला एक है, संसार सब चुपचाप है ।।॥
करले संगत गुरु की कुछ दिन, आये आये की समझ)।
गढ़ के मूरत मूरती, पूजक बना क्यों आप है ॥॥
राधास्वामी की दया से, ज्ञान हो निज आप का ।।
आप निज को भूलना ही, है भरम और पाप है ॥॥
178. सहज में भव पार कर दो, नाव है मॅझधार में ।
है। तुम्हारे हाथ रक्षा, हूँ दुखी संसार में ॥॥
शब्द साखी क्या सुनू मैं, सुनते जी अब भर गया ।
मुझको जीता अब न समझो, जीते जी मैं मर गया ॥॥
तुमने मेरी बांह पकड़ी, अब तुम्हीं को लाज है।
राधास्वामी सतगुरु मेरे, मेरा अटका कांज है ॥॥
179. मन मगन जब होगया, और उसे क्या चाहिये ।
मन की दुचिताई मिटे, और दुविधा चाहिये ।।।।
है यह मन चंचल इसे, निश्चल करो अभ्यास से ।।
रात दिन उसको गुरु, पद से लगाना चाहिये ।।।।
जब गुनाचन यह मचावे, नाम का सुमिरन करो ।।
जो न समझो बात यह, सतगुरु से पूछा चाहिये ॥॥
एक संशय भी न रहने पाये, संशय कष्ट है।
करले संगत यह भरम, चित से मिटाना चाहिये ॥॥
राधास्वामी की दया से, इसका परिचय ले सदा ।।
पाके परिचय अपने अनुभव को बढ़ाना चाहिये ।।।।
180. राधास्वामी माँ हैं मेरे, राधास्वामी बाप हैं ।।
राधास्वामी मित्र गुरु, सम्बन्धी सब कुछ आप हैं ॥॥
राधास्वामी कर्म भक्ति, राधास्वामी ज्ञान हैं।
राधास्वामी ध्यान सुमिरन, और भजन अनुमान हैं ॥॥
राधास्वामी सिद्धि शक्ति, परम पद और मुक्ति है।
राधास्वामी साधना हैं, योग है और युक्ति हैं ॥॥
राधास्वामी करता थरता, राधास्वामी भूप हैं।
राधास्वामी सिंध सद्गति, ताल झील और कूप हैं ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, नाम का परिचय दिया ।
नाम हैं वह रूप हैं वह, और अनाम अरूप हैं ॥॥
181. किसकी हम चिंता करे, चिंता है कब किस काम की ।
आत्म अनुभव होगया, सूझी है अब विसराम की ॥॥
कृष्ण और अर्जुन कहां हैं, और युधिष्ठर क्या हुये ।।
यह कथा हमको सुनाओ, बसुदेव और बलराम की ॥॥
मोह किसका शोक किसका, रूप को पहचान ली ।।
आत्मा की साधना हो, तुम में आठों याम की ।।।।
यह जगत तो स्थिर नहीं, स्थिरताई पाओगे कहाँ ।
क्यों पड़ी है रात दिन, यह तुम को धूम और धाम की ॥॥
धन्य सतगुरु राधास्वामी, ज्ञान का परिचय दिया ।
अब लगन है हमको निस दिन, राधास्वामी धाम की ॥॥
182. शब्द है आधार सब को, शब्द का तू ध्यान कर ।
शब्द के साधन में लगजा, उसकी महिमा जान कर ।।।।
ब्रह्म क्या है शब्द है, परब्रह्म क्या है शब्द है ।
गुरु की संगत कुछ दिनों हो, शब्द का अनुमान कर ।।।।
शब्द में है नाम और इस, शब्द ही में रूप है ।।
मुन गुरु का शब्द निस दिन, शब्द का सन्मान कर ॥॥
शब्द तू है शब्द मैं हूँ, शब्द सब का सार है।
ना जर की पहिचान कर ॥॥
शब्द ब्रह्मा शब्द विष्णु, शब्द शिव का रूप है।
शब्द को मथ कर परख ले, दूध जल को छानकर ॥॥
शब्द से रचना है सारी, शब्द ही से है प्रकाश ।।
राधास्वामी की दया ले, शब्द महिमा गान कर ॥॥
183. योग युक्ति भक्ति मुक्ति, सिद्धि शक्ति ज्ञान है ।
वह इसे समझे जिसे कुछ, ज्ञान का अनुमान है ॥॥
ज्ञान अनुभव ज्ञान साधन, ज्ञान के अधीन सब ।
ज्ञान ही अनुमान है, और ज्ञान ही परमान है ॥॥
पहिले साधन हो तो पीछे, ज्ञान की आसा करो ।
सच्चा साधन सतगुरु को, प्रेम और सतनाम है ॥॥
जाओ सतसंगत में गुरु के, जाके बैठो संग में ।
फिर बचन चित से सुनो, जो ज्ञान और विज्ञान है ॥॥
चित की विरती रोक लो, बचनों से करो यह योग तुम।।
शम की दम की उपरती की, जो तुम्हें पहचान है ।।।।
शब्द का लो आसरा, हो शब्द का श्रवण मनन ।
पीछे निध्यासन हो, निध्यासन ही उसकी जान है ॥॥
होगा निध्यासन से गुरु की, बानी का साक्षात्कार ।।
विरती अन्तर में जमे, यह शून्य का स्थान है ।।॥
शून्य में समता है और, समता समाधी है सही ।।
शून्य का है स्थल समाधी, समता की सच्ची खान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, पहुँचोगे सतपद में फिर ।।
यह है तुरिया और, तुरियातीत का स्थान है ॥॥
184. न यहाँ हूँ न वहाँ हूँ, ने वहाँ हूँ न यहाँ ।
ढूंढ़ने जाता है वयों, पोयेगा तू मुझको कहाँ ॥॥॥ ।।
मन में भक्तों के छुपा बैठी हूँ, जो उनसे तू मिल ।
यह बतायेंगे बतायेंगे, मैं रहता हूँ जहाँ ॥॥
स्वर्ग में पायेगा तू किसको, वहाँ क्या है धरा ।
मैं कहीं अता न जाता हूँ, जहाँ का हूँ तहाँ ॥॥
ज्ञान में हूँ ध्यान में हैं, हूँ क्षमा और शील में ।
मैं जहाँ रहता हूँ ज्ञान, और शील रहते हैं वहाँ ॥॥
सत है क्या समझा नहीं, जाना असत को भी नहीं ।
राधास्वामी मत को समझो, खोगई बुद्धि कहाँ ।।।।
185. सत हो सत का रूप, सतनामी हो राधास्वामी तुम ।
सत चरित सत शब्द, सतधामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
सत पुरुष सतलोक बासी, सत निवासी सत्य सत ।।
सत सहायक और, सत कामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
सत हो तो सत्ता मिले, चित हो तो चेतनता मिले ।।
मैं हूँ सेवक और, सत स्वामी हो राधास्वामी तुम ॥॥
जीतेजी निर्वाण पद को, सत का जीवन है वही ।।
कहते हैं सतपद के, विश्रामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी नित जपू ।।
है मुझे विश्वास, सतगामी हो राधास्वामी तुम ।।।।
186. जिसमें है भक्ति की शक्ति, वह नहीं अबला कभी ।
भक्ति से दुख दूर होंगे, होगी तुम निस दिन सुखी ॥॥
रात दिन सुमिरन भजन हो, मन में गुरु का ध्यान हो ।
तुम बचोगी कष्ट से, आपत से सुनलो जीतेजी ।।।।
जब कभी हो सामना, संकट का चरनों में झुको ।।
गुरु से रक्षा होगी सच्ची, बात यह मानो सही ॥॥
मन में गुरु हों तन में गुरु हों, गुरु हों साँसों साँस में ।
ऐसे साधन में लगो, और भूल जाओ सब अजी ॥॥
राधास्वामी की दया, तुम पर रहेगी रात दिन ।
सार सबका इसको जानो, यह है मक्खन सब दही ॥॥
187. पदम कहते हैं कमल को, मन कमल का रूप है।
मन ही गृही है विरागी, मन ही परजा भूप है ॥॥
मन में सारी योग युक्ति, मन की शक्ति साथ है।
मन को करता धरता समझो, मन ही पाँव और हाथ है ॥॥
रूप जिसने मन का समझा, वह नहीं होगा दुखी ।।
आगई मन की समझ, जिसमें रहेगा वह सुखी ॥॥
मन गुफा में बैठ कर तुम, मन से गुरु का नाम लो ।।
चैन लो सुख शान्ती, निरवान लो धुर धाम लो ॥॥
मन को बस में करलो, और सब जगत बस में आयेगा।
राधास्वामी की दया से, दास सुख धन पायेगा ।।।।
188. जो रमा रहता है सब में, सब का रमता राम है।
उसको सच्चे मन से चित से, बुद्धि से प्रनाम है ॥॥
प्रेम का भंडार करुणा, और दया का मूल है ।
शान्ती आनन्द दायक, सतचित उसका नाम है ॥॥
उसकी भक्ति कीजिये, उससे रहे लौ सर्वदा ।
जिसके घट में रम के वह, बैठा उसे विश्राम है ॥॥
सच्चिदानन्द अखंडम्, केवलम् आनन्द दा ।।
ब्रह्म सर्वाधार सवधार, सवधाम है ॥॥
रमने वाले के रमजा, हृदय को बैठक बना ।
फिर तो यह घट ही हमारा, राधास्वामी धाम है ॥॥
189. राधास्वामी की शरन ले, जनम को अपने बना ।।
छोड़ दे अब मेरे भाई, दुर्गति आलसपना ॥॥
काम कर दिन रात डट कर, काम ही से काम रख ।
काम हो निष्काम तेरा, उसकी नित कर कल्पना ॥॥
काम ले तू अर्थ ले तू , धर्म ले तू मोक्ष ले ।।
काल माया कर्म का, कर वीरता से सामना ॥॥
सोचले अपनी दशा को, क्या था कैसा होगया ।।
है कठिन संसार मग में, पाँव का अब थामना ।।।।
राधास्वामी की दया से, संग सत का मिल गया ।
सुन वचन हित चित से प्यारे, सोचना और जाँचना ।।।।
190.गुरु की संगत से हटेंगे, कर्म माया काल सब ।
काट देगा तू सहज में, आप ही भव जाल सब ॥॥
मुख्य साधन संग सत का, और शेष हैं समझ गौण ।
इससे सूझेगी परम गति, सद्गति की चाल सब ॥॥
जिसने पाया पाया सत संग से, भक्ति ज्ञान गम ।
तू उतारेगा विवेक और, तरकन की खाल सब ॥॥
कुछ दिनों संगत हो कुछ दिन, नाम कुछ दिन मुक्त गति ।।
इसके पीछे पद है सत का, सत्व की रीती पाल सब ॥॥
अर्थ धर्म और काम मुक्ति, की है कु जी सत्र का संग ।।
राधास्वामी संग कर, दे काट अब जंजाल सब ॥॥
191. जो हुये बाहर सुखी, क्या जाने अन्तर में है क्या ।।
जो रहे अन्तर मुखी, क्या समझे बाहर में है क्या ॥॥
माया ने डाला है अयो, कर लिया माया मुखी ।।
जब नहीं ईश्वर मुखी, क्यों माने ईश्वर में हैं क्या ॥॥
काल मुखता मन में आई, कमल मुख वह हो गये ।।
क्या बताये काल में, और उसके चक्कर में है क्या ॥॥
मन मुखी जब ठहरे, गुरु मुखता से फिर जाते रहे ।
कह नहीं सकते हैं, मन के नीचे ऊपर में है क्या ॥॥
राधास्वामी क दया, आये तो गुरु मुखता मिले।
फिर पता देगे अवर में, और इस घर में है क्या ।।।।
मन मुखी माया मुर्ख है, जीव मुख और काल मुख ।
भरम से क्या देखे अन्तर, और बाहर में है क्या ॥
राधास्वामी दीन हित, अज्ञान मेंटों ज्ञान दो ।
चर अचर को देखकर, समझे चराचर में है क्या ।।।।
192. घट में हैं घट का है वासी, घट में रहता है सदा ।।
आप वह इस घट में रहकर, घट की कहता है सदा ।।।।
घट में जो है गुप्त परगट, उसको परगट करलो तुम ।।
चूका परगट करने से जो, दुख बिंपत सहता है वह ॥॥
घट में दूदो घट में पाओगे, नहीं सन्देह कुछ।
मन की खटपट में जो पड़ा, भवसिंधु में बहता है वह ॥॥
राधास्वामी ने दया की, शब्द का परिचय दिया ।।
प्रेम सेवक को मिला, आनन्द धुन गहता है वह ।।।।
193. सच्चिदानन्दम् अखण्डम्, कैवलम् शुद्धम् सदा ।।
नित्य मुक्तम् रूप अपना, तुम समझलो सर्वदा ॥।।
ज्ञान है सुख चित है सुख, सत्य सुख का रूप है।
क्या कहूँ में आत्मा, सुख शान्ती का कूप है ॥
आत्मा जब सुख हुआ, फिर दुख का भय क्यों मन में हो ।
दुख सतावे क्यों उसे, सुख ही के जो साधन में है ॥॥
सुरत सुख है शब्द सुख है, सुख में सुख का बास है।
शब्द की करलो कमाई, दूर यम का त्रास है ॥॥
राधास्वामी की दया से, सुख का अब जीवन मिला ।
सुख मिला घट शब्द के, मिलने का जब साधन मिला ।।।।
194. ज्ञान गुरु का रूप है, इस ज्ञान का कुछ ज्ञान है ।।
ज्ञान से बढ़कर नहीं कुछ, समझो जो है ज्ञान है ॥॥
शोल में है ज्ञान वह तन, और यह है आत्मा ।।
समझो बूझो तुम मनन श्रवण, से जो अनुमान है ॥॥
तन में जब है आत्मा, फिर किसकी चिंता है तुम्हें ।
सोच लो चिन्ता से दुचिताई से, कैसी हान है ॥॥
चित न हो चंचल न मन, विक्षिप्त होने न पाये कभी ।
फिर तो केवल ज्ञान है, हाँ ज्ञान है हाँ ज्ञान है ॥॥
राधास्वामी की दया से, अब समझलो ज्ञान को ।।
ज्ञान ही से भक्ति मुक्ति, ध्यान और अवसान है ॥॥
195. छोड़ दो दुविधा को दुविधा, दुख का कारन मूल है।
जो फैसा दुविधा में उसको, दुविधा दुख का मूल है ॥॥
नाम लो और नाम ही में, शान्ती विश्राम लो ।।
नाम लेने वाले को यह, जग सदा अनुकूल है ॥॥
मन की चंचलता मिटेगी, नाम का सुमिरन किये ।।
नाम की महिमा बड़ी, यह नाम ही बहुमूल है ॥॥
क्या कहूँ कैसे कहूँ, तुम आप समझो मन में कुछ।
नाम का लो आसरा, फिर कुछ नहीं प्रतिकूल है ॥॥
राधास्वामी की दया से, आप ही उतरेगा सब ।।
मन के ऊपर , भर्म का, अज्ञान का जो झूल है ।।।।
196. मन के मन में अपने मन को, जब लगाऔगे कभी ।।
आयेगी उसकी समझ, और ज्ञान पाओगे कभी ॥॥
मान का है मान वह, और सार को वह सार है।
उसको जो समझे तो, भव सागर से बेड़ा पार है ॥॥
ज्ञानी को अभिमान मिंध्या, हो रही है ज्ञान को ।।
वह विषय क्या है भला, इस ज्ञान का अनुमान का ॥॥
बानी मन की गम नहीं, बुद्धिं वहां जाती नहीं ।
भेद उस अनजान, अनजाने का वह पाती नहीं ।।।।
करलो सतसंग कुछ दिनों, गुरु का तो आये कुछ समझ।।
राधास्वामी की दया से, दास पाये कुछ समझ ।।।।
197. जब गुरु की शरन पाई, आस पूरी हो गई ।।
मिल गई गुरु पद से जब, माया से दुरी हो गई ।।।।
उठ गया परदा भरम का, मर्म सारा मिल गया।
अपने आपे की कहाँ, सुध हो हुजूरी हो गई ।।।।
क्याँ सतावे अब झमेला, काल का और कर्म का ।।
शान्त हूँ निर्धान्त हूँ, गुरु पद की बुरी हो गई ॥॥
भय मिटी संकट कटा, भ्रान्ती गई शान्ती मिली।
अब नहीं ठग सकती, माया की भगोरी हो गई ।।।।
ज्ञान का परकाश, राधास्वामी ने अब कर दिया।
भाग जागा नूर पाकर, अब मैं नूरी हो गई ।।।।
198. चुन लिया है ज्ञान के, मोती को भवसागर में आ ।
झान ही को है सहारा, ज्ञान ही का आसरा ॥॥
ज्ञान जब पाया गुरु का, छोड़ कर अज्ञान को ।
सार आया हाथ में, अब कुछ नहीं है कल्पना ॥॥
किसको युक्ति सूझे जब तक, ज्ञान का परिचय नहीं ।
जब नहीं अनुभव तो निष्फल, है बनाना बात को ॥॥
मिथ्या वाचक ज्ञान उसका, मिथ्या सब अभिमान है।
मिथ्या ही मद मान और, अनुमान देता हूँ जता ॥॥
राधास्वामी कह गये, धोका है वाचक ज्ञान में ।।
करले करनी रहके रहनी, तेरा तब होगा भला ।।।।
199. आगये जब पन्थ में, गुरु के तो पग हटता नहीं ।
छोड़ कर गुरु नाम कोई, नाम अब रटता नहीं ।।।।
पत्ता पत्ता कौन सींचे, सींचने में लाभ क्या ।।
मूल पकड़ा हाथ में, यह हाथ से छुटता नहीं ॥॥
गह लिया जब मूल को; हाथ आगये फल फूल सब ।।
चित की दुर्मत मिट गई, गुरु प्रेम अब घटता नहीं ।।।।
जब मिला परिचय तो, परिचय से ही अनुभव बढ़ गया।
मन में आई शान्ती, दुचिता से वह बटता नहीं ॥॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी रट लगी।
मन का अब विश्वास, भय की धार से कटता नहीं ॥॥
200. है सुफल नर जनम उसका, जो लगा है काम में ।
काम की जड़ है छुपी, गुरुदेवजी के नाम में ।।।।
चलते फिरते जागते सोते, समाधी हो लगी ।॥
भूलने के न गुरु का, नाम आठों याम मैं ॥॥
प्रेम भक्ति की कमाई, में लगे हैं भक्त जन ।
यह न समझो मन लगा है, जगत के धन धाम में ॥॥
टूट जाये लंक गढ़, रावण का भय जाता रहे ।
मानसिक फुरना यही है, अब तो रमतो राम में ॥॥
हम हुये सेवक हमारा, धर्म सेवा बन गया।
सेवा रह कर करते हैं, हम राधास्वामी धाम में ॥॥
201. ज्ञान का जब धन मिला है, ज्ञान के भंडार से।
भय हो क्यों अज्ञान से, और उसके कारागार से ॥॥
सुरत में है शब्द और है, शब्द उसका आसरा ।।
यह बसेगी अब वहाँ, निज शब्द के आधार से ॥॥
चढ़ गया पहिले सहस दल के, कंवल में ध्यान कर।
फिर हुआ सम्बन्ध गहरा, अन्तरी ओंकार से ॥॥
सुन्न पर बैठक बनाई, और आसन जब जमा ।
शून्य की प्रगटी समाधी, सुन के व्यौहार से ॥॥
कुछ दिनों ऐसा जतन हो, इस जतन से काम है।
सुरत चढ़ ऊँचे मिलेगी, रूप सत्याकार से ॥॥
सत के आगे है अलख और, है अलख ही में अगम ।
भेद पाया मैंने, राधास्वामी के दरबार से ॥॥
मेरी बन आई, बनी बिगड़ी मेरी संदेह क्या ।।
राधास्वामी ने छुड़ाया, जगत के जंजार से ॥॥
202. आई शरणागत तुम्हारे, आके कैसी खोगई ।।
जागने की विधि न सूझी, मोह निद्रा सोगई ।।॥
इतकी ठहरी और न उतकी, क्या करू” मैं हूँ दुखी ।
जनम पाकर नर को अपने, जनम को मैं रोगई ॥॥
सुख नहीं संसार का, पाया न सुधरा मेरा काम ।।
लोक और परलोक खोये, क्या से क्या मैं होगई ॥॥
आई थी सतसंग में, करने कमाई धर्म की ।
बीज मेन के खेत में, द्वष ईर्षा के बोगई ॥॥
राधास्वामी तुम दया सागर हो, कुछ करदो दया ।
हाथ मैं तो आप, परमारथ से भी अब थोगई ।।।।
203. हंस हो और हंस के, राजा हो ऐसा जान लो ।
हंस होकर हँसपन के, रूप को पहचान लो ॥॥
दूध और पानी मिला है, द्वन्द के संसार में ।
पानी छोड़ो दूध पीलो, ऐसा गुरु का ज्ञान लो ॥॥
तुमको क्या चिन्ता हुई, चिन्ता भी है किस काम की ।।
गुरु सहायक हैं तुम्हारे, गुरु दया का दान लो ॥॥
जो चरन में गुरु के आया, वह नहीं रहता दुखी ।
गुरु है रक्षक ऐसा निश्चय, अपने मन में मान लो ॥॥
राधास्वामी की दया से, कुछ करो सुमिरन भजन ।
घट के भीतर आके बैठो, पुतलियों को तान लो ॥॥
204. नाम जब गुरु का लिया, हो जाओ गुरु का ध्यान कर ।
कीट भृगी की दशा हो, ध्यान हो मन मान कर ॥॥
गुरु की संगत के बिना, अधिकार कसे पाओगे ।।
यह समझ लो तुम, भली प्रकार से अनुमान कर ॥॥
जिनको दर्शन की है चिन्ता, पायेगा दर्शन वही ।।
भूल मत इस बात को, सच्चे बचन को मान कर ॥॥
गुरु की संगत से मिलेगा, ज्ञान अपने रूप का ।
देख लोगे अपना आपा, आप तुम पहचान कर ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का साधन करो ।
घट में अपने आन कर, और पुतलियों को तान कर ॥॥
205. जब सुशीला होगई, आनन्द मन को मिल गया ।।
जगत की चिन्ता हटी, फिर सुख तो तन को मिल गया ॥॥
शील है सच्चा रतन, अनमोल इसको जान लो ।।
वह हुआ धनवान निर्धन, आप धन को मिल गया ॥॥
शील ही आनन्द है, और शील ही है शान्ती ।।
शान्तीपन हाथ है, आनन्दपन को मिल गया ॥॥
राधास्वामी ने बताया, शब्द का अभ्यास कर ।
जो करेगा यह यतन, समझो यतन है मिल गया ॥॥
206. ज्ञान जब पाया तो, फिर अज्ञान की क्यों चाह हो ।
भूलने का भय हो कैसे, दृष्टि में जब राह हो ॥॥
गोता मारा सिंध में, और मोती लाया हाथ में ।
वह न डूबेगा जिसे, गहराई की जब थाह हो ॥॥
चोर चोरी इसलिये करता है, निरधन है बहुत ।।
चोरी कैसे वह करे, जो मालोधन का शाह हो ॥॥
तुमको चिन्ता क्यों हुई, चिन्ता से अब क्या हानि लाभ।।
बाँह में जब गुरु के निस दिन, बाँह ही में बाँह हो ।।।।
राधास्वामी की दया से, होगया है मन निडर ।।
अब उसे यम काल माया की, कहाँ परवाह हो ।।।।
207. ज्ञान का ले आसरा, और ज्ञान का आधार हो ।
फिर सहज भव सिंध से, बेड़ा तुम्हारा पार हो ।।।।
शब्द में है अर्थ, और अर्थ में है ज्ञान गम ।
चित की विरती रोक लो, और शब्द गुरुमत सार हो ॥॥
मुंह से निकले बचन मीठे, मन में हो करुणा सदा ।।
दीन दुखियों पर दया, घर वालों से नित प्यार हो ॥॥
भाग जब उदय होगया, फिर चिंता से क्या लाभ है ।।
उसको क्या खटका रहा, गुरु जिसका राखनहार हो ॥॥
राधास्वामी नाम की, घट में लगे सच्ची लगन ।।
यह लगन सच्ची लगे, फिर जग न कारागार हो ॥॥






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