401.नहीं तेरा है देश यह, मेरी प्यारी सजनी।।
सत पद तेरा निज अस्थाना, आन पड़ी परदेश यह मेरी प्यारी
कठिन कमे के काट दे बन्धन, धार सहज उपदेश यह मेरी।।
इन्द्री मन नहीं रूप हैं तेरे, सब माया के भेस यह मेरी।।
घट में शब्द धार जो प्रगटी, सोई सत्त संदेश यह मेरी।।
राधास्वामी सहजयोग बिधि गाई,नहीं कठिन लवलेश यह मेरी।।
402.भूल भरम सब त्याग री, मेरी प्यारी सहेली।।
इसका विष चढ़कर नहीं उतरे, जग है काला नाग री मेरी
प्यारी शब्द डोर गह घट में चढ़ चल, जागे भाग सुभाग री मेरी।।
त्रिकुटी में लव गुरु की मूरत, चरन कमल में लाग री मेरी।।
सुन्न में सहज समाध रचाले, दुचिता को दे आग री मेरी।।
राधास्वामी दया के सागर, देगे अचल सुहाग री मेरी।।
- प्रेम भाव उर धार री, मेरी प्यारी सरतिया।।
टेक। अंतर में गुरु की संगत कर, दरस परस सत्कार री मेरी प्यारी
तिलपट मध्ये अद्भुत मूरत, अचरज अगम अपार री मेरी प्यारी
मन माथे दे तिलक केरिया, डाल गये बिच हार री मेरी।।
तिल की जोत में साधले आरत, जगमग रूप निहार री मेरी।।
घट में पूजा घट में सेवा, घट में भक्ति बहार री मेरी।।
घंटा शंख बजे मन मन्दिर, अनहद धुन झनकार री मेरी।।
सुमिरन भजन ध्यानकर मन में,राधास्वामी की बलिहार री मेरी।।
404.गुरु चरनन चित धार री, मेरी प्यारी सुरतिया।।
टेका। अपने स्वारथ वश लिपटाने, कुल कुटुम्ब परिवार री मेरी
प्यारी एक में सुख और अनेक में दुख है, टेक एक की धार री मेरी।।
कर्म की गठरी को हलकी करले, राख न सिरपर भार री मेरी।।
एक आस विश्वास गुरु का, भक्ति ज्ञान का सार री मेरी।।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,होजा द्वन्द के पार री मेरी।।
405.भोग वासना भूल री, अलबेली सहेली।।
दुख कलेश को मेट दे संशय, प्रेम हिंडोले झूल री।।अलबेली
क्यों मुरझाई सुख से खुलजा, जैसे हँसता फल री।।अलबेली
जो प्रतिकूल पन्थ नहीं पग दे, तिसके सब अनुकूल री।।अलबेली
लत फिरे भरम वश प्रानी, ममता नर का झूल री।।अलबेली
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हो पदकमल की धूल रीअलबेली
406.प्रेम का कर सरकार री, मेरी सुरत सुशीला।।
टेका। प्रेम है भूषण सन्दर बस्तर, प्रेम का कर सिंगार री मेरी।।
सुरत प्रेम ही मूल तत्व है प्यारी, प्रेम का कर त्र्यौहार री मेरी।।
सुरत प्रेम प्रेम कर प्रेम को चित दे, प्रेम का पन्थ संवार री मेरी।।
सरत प्रेम योग है प्रेम है भक्ति, प्रेम का आसन मार री मेरी।।
प्रेम ज्ञान का सच्चा साथी, प्रेम विवेक विचार री मेरी।।
सुरत प्रेम की हाट में प्रेम का सौदा, प्रेम बनजि व्यौपार री मेरी।।
सुरत राधास्वामी प्रेम रूप धर आये, परम सन्त औतार री मेरी।।सुरत
- चल गुरु के सतसंग री, मेरी सुरत सहेली।।
सतसंगत अमृत जल बरसे, सतसंग निर्मल गंग री मेरी सखी
सतसंग प्रेम सिंध है सजनी, उमड़े प्रीत तरंग री मेरी।। सखी
बास सुबास मिले सत संगत, पाचे रंग सुरंग री मेरी।।सखी
सतसंगत को ध्यान रहे नित, कीट सहज हो भृग री मेरी।।सखी
राधास्वामी गुरु की कर सतसंगत, काल करम कर भंग री मेरी।।सखी
- गुरु पद का करले ध्यान री, मेरी सुरत सहेली
आज गुरु की शरणागत में, सब विधि हो कल्यान री मेरी।।
सुरत चिंता त्याग त्याग दे चिंता, यही है सच्चा ज्ञान री मेरी।।
सुरत जो कुछ होगा मौज से होगा, मौज को परख सुजान री मेरी।।
सुरत अंतर में तेरे सतगुरु बसते, घट में रूप पिछान री मेरी।।
सुरत गुरु के चरन शरन जो आया, नहीं उनकी हो हान री मेरी।।
सुरत सुमिरन ध्यान भजन कर सजनी शब्दयोग की जान री मेरी।।
सुरत राधास्वामी नाम जो कोई सुभिरे, जीते जी निवन री मेरी।।सुरत
- करले अपना काम अब, मेरी चतुर सरतिया।।
आलस तज निद्रा को तजदे, तज मद मोह निकाम अब।।
मेरी समिरन ध्यान भजन नित करना, सुमिर सुमिर गुरुनाम अब।।
मेरी गुरु से पावे चार पदारथ, मोक्ष धर्म धन काम अब।।
मेरी जो आया गुरु की शरणागत, सब विधि पूरन काम अब।।
मेरी जीते यश कीर्ती इस जग में, पीछे राधास्वामी धाम अब।।मेरी
- थिर नहीं वह संसार री, सुन सखी सहेली।।टेका।
जो आये हैं जायंगे सजनी, कुछ अब सोच विचार री सुन।।सखी
बन्धन काट मोह माया के, यह उसके परिवार री सुन।।सखी
संगी साथी कोई नहीं है, यह अपने चित धार री सुन।।सखी
मिथ्या है सब जगत पसारा, मिथ्या में क्या सार री सुन।।सखी
राधास्वामी नाम सुमिर घट भीतर,मानुष जनम सुधार री सुन।।सखी
411.अपनी ओर निहार री, अलबेली सुरतिया।।
औरन को क्या निरखे सजनी, तू है सबका सार री।।अलवेलीं
घट में तेरे प्रीतम बसता, हित चित से कर प्यार री।।अलबेली
तू है प्रेम की मूरत प्यारी, प्रेम की तू भंडार री।।अलबेली
सब कुछ तेरे घट में बसत है, घट के नैन उघार री।।अलबेली
बाहर की सब आसा तज दे, अंतर दृटि पसार री।।अलबेली
घट चेला गुरु गगन विराजे, सुरत से मन में विचार री।।अलबेली
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, चरन कमल सिर धार री।।अलबेली
412.गुरु संग नेह लगाओ री, मेरी प्यारी सुरतिया।।टेका।
सुमिरन भजन ध्यानकर चित में, मोक्ष पदारथ पाओ री मेरी।सुरत
गुरु का रूप बसा तेरे अंतर, उस पर वृत्ति जमाओ री मेरी।।सुरत
लख लख अलख दशा घट भीतर,अनहद धुन नित गा र मेरी।।
सुमिरन सबका सार है प्यारी, सुमिरन सहज उपाओ री मेरी।।सुरत
ध्यान गुरु का रूप है सजनी, रूप अनूप को ध्याओ री मेरी।।सुरत
नाम का तार गूज रहा अंतर, सुन मुख आनन्द पाओ री मेरी।।सुरत
दुख को त्याग हर्ष नित बाढ़, उसकी चाह बढ़ाओ री मेरी सूरत
भंवर में जीवन नाव पड़ी है, तट पर उसको लाओ री मेरी।।सुरत
राधास्वामी गुरु का दयाभाव ले, चरन शरन में जाओ री मेरी।।सुरत
413.अपना रूप सँभार री, तू रंगीली बहुरिया।।
शील क्षमा का भूपन सुन्दर, पहर के करले सिंगार री
तू रंगीली मीठे बचन मधुर रस बानी, मुख से सदा निकार री तू।।
दया भाव की ओढ़ चुनरिया, अपने आप संवार री तू।।
कर्म बचन मन से सब का हित, कर सजनी उपकार री तू।।
साँच चदरिया तन पर सोहे, काम क्रोध मद मार री तू।।
सब कोई हर्ष से करे बड़ाई, यह सुन्दर बरनार री तू।।
राधास्वामी पंथ ठुमक कर पगदे, सतगुरु नाम उचार री तू।।
- कर दो भव सागर पार, तुम मेरे सतगुरु दाता।।
डूबत कोई न संग न साथी, काढ़ो आज किनारे तुम।।
मेरे मैं अचेत अज्ञान की मूरत, ज्ञानी पुरुष अपार तुम।।
मेरे मैं बिलपू भर दुख के कारन, देखो नैन निहार तुम।।
मेरे असा बासा सब की त्यागी, हो साँचे रखवार तुम।।
मेरे राधास्वामी दीन दयाला, सृष्टि के आधार तुम।। मेरे
415.बंसी की धुन सुन कान, सुरत मेरी गगन चढ़ी।।
सहस कमलदल घंटा बाजा, जब तिल को दिया तान सुरत।।
मेरी त्रिकुटी ओंकार धुन मृदंग, सुन हुआ चतुर सुजान सुरत।।
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, किंगरी शब्द प्रमान सुरत।।
भंवर गुफा सोहंगम वंसी, बंसीधर लिया जान सुरत।।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, पहुँची ठौर ठिकान सुरत।।
36-415 बंसी की धुन सुन कान, सुरत मेरी गगन चढ़ी ॥टेक।।
सहस कमलदल घंटा बाजा, जब तिल को दिया तान सुरत ।मेरी
त्रिकुटी ओंकार धुन मृदंग, सुन हुआ चतुर सुजान सुरत ।।
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, किंगरी शब्द प्रमान सुरत ।।
भंवर गुफा सोहंगम वंसी, बंसीधर लिया जान सुरत ।।
सतपद अलख अगम राधास्वामी, पहुँची ठौर ठिकान सुरत ।”
37-416 ।। सोच विवेक विचार, जो तू सच्चा ज्ञानी ।।टेक।।
मन के अटपट खटपट सूझी, झटपट ताहि सुधार जो
तू सच्चा बिन साधन अनुभव नहिं जागे, साधन से कर प्यार जो ।।तू सच्चा202 ।।
वाचक ज्ञान से काम बने नहीं, वाच वो लक्ष्य सँभार जो ।।तू सच्चा
तत्व भेद सतसंग में पाले, सतसंग सबका सार जो ।। ।।
प्रीत प्रतीत के पंथ में पग दे, प्रेम का पंथ सँवार जो ।। ।।
जीत काम मद मोह लोभ को, मार अहम् अहंकार जो ।। ।।
सुरत शब्द का सहज है साधन, सहज सहज निवर जो । ”
घर में रह घर का उद्यम, घट में कर दीदार जो ।। ।।
राधास्वामी जीव चितवन आये, धार सन्त अवतार जो ।।तू सच्चा
उनकी शरन में जल्दी आजा, कर अपना उपकार जो तू सच्चा
राधास्वामी योग की बने कमाई, जा भवसागर पार जो तू सच्चा
कोइ न तेरा तू न किसी का, कुल कुटुम्ब परिवार जो तू सच्चा
राधास्वामी नाम सुमिर नित, जीवन का आधार जो ।। तू सच्चा
38-417 सतगुरु परम दयाल री, कोई कदर न जाने टेका।।
देह धरे जीव भार उठावे, काटें यम का जाल री कोई कदर
जीव अनाड़ी जग झकमारे, दुख सुख संग बेहालरी कोई ।।कदर
दया मेहर निज बचन सुनावे, मेटें घट दुख सालरी कोई कदर
छूटन की वह युक्ति बतावे, घट में चलावें चल री कोई कदर
दया मेहर से करनी करावे, करदे मालामाल री कोई कदर
घट के बैरी सभी नसावे, मारे काल कराल री कोई ।।
कदर निस दिन तेरी दया बिचारें, जस माता संग बालरी कोई कदर
अन्त समय जब तेरा आवे, आप हुये रखवाल री कोई कदर
घट तेरे में प्रगट करावे, अपना रूप विशाल री कोई कदर
पकड़ चरन तू निज घर जावे, काल करम पामोल री कोई कदर
राधास्वामी सतगुरु मोहि अस भेटे, होगई मैं खुशहाल री कोई।।कदर
36-418 गुरु मूरत हिये में धारो री, गुरु मूरति ।।टेक।
गुरु बिन काल नहीं पड़त घड़ी एक, छिन छिन रूप निहारो री ।।गुरु।।
काम क्रोध मद लोभ ईर्षा, घट से सकल निकारो री ।।गुरु मूरति
कोटिन चन्द सूर उदय तारे, तिमिर विकार निकारो री ।।गुरु मूरति
गुरु की आसा चित्त बसाओ, जगत वासना जारो री गुरु मूरति
तिल को उलट करो नित दर्शन, सहज ही होत उजारो री गुरु मूरति
वन्धन काटो मोह मया के, गुरु का नाम पुकारो री ।।
गुरु मूरति राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु चरनन मन बारोरी।।गुरु मूरति
36-419 सुरत चढ़ी आकास री, अपने अन्तर घट ।।टेक।
सहस कमल दल दृष्टि डाली, गुरु दरशन की आस री,
खोला निज तिलपट ।। सुरत
त्रिकुटी गुरु मूरति लख पाई, कर अज्ञान को नास री,
तज मन के खटपट ।।
सुरत सुन्न में सहज समाध रचाई, आई गिरि कैलास री,
हंसन के जमघट । सुरत
भंवर गुफा सोहंग धुन बंसी, माया काल विलास री,
सत धाम अधर बट । सुरत
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी पद में बास री,
| दर्शन कर झटपट । सुरत
40-420 | राधास्वामी नाम प्रभाव री सुख जीवन मिलना ।।टेक।
राधास्वामी शब्द गूज रहा घट में, चित की वृत्ति लगाव री,
सुरत कान से सुनना ।।राधा0
राधास्वामी रूप लगे अति प्यारा, अन्तर दृष्टि जमाव री,
ले रूप का झरना ।।राधा0
राधास्वामी पद परसा जब घट ने, मिला आनंद का दाव री,
मुख से क्या कहना ।।राधा0
राधास्वामी बस सुबास बसा हूँ, प्रेम के फल चढ़ाव री,
सेवा न बिसरना ।।राधा0
राधास्वामी चरनामृत नित पीना, सत प्रसादी खाद री,|
आनन्द से जीना ।।राधा0
41-421 साज के सन्त समाज री, सतगुरु हुये परगट ।।टेक।।
घट के अन्तर मन मन्दिर में, ठाड़े गुरु महाराज री,
भूमध्य के तिल पट ।।साज
सहस जोत का दीवा बाला, चांद सूरज दोऊ लाज री,
जोती के जमघट ।।साज
सखियां आरत मंगल गावे, मन ममता को मांज री,
तज मन के खटपट ।।साज
दया क्षमा करुना चित बाढ़ी, जुड़ा विचित्र समाज री,
अपने अन्तर घट ।।साज
राधास्वामी का दर्शन कर चित से, छोड़ कुटुम्ब कुल लाज री,
चढ़ बैंक के अधट ।। साज
42-422 आये गुरु महाराज री, अपने दासी घरे ।।टेक।।
लाई प्रेम की थाली दासी, मंगल आरत साज री, ।
लख गुरु प्रतम वर ।। आये
प्रीति प्रतीति के भूषन बस्तर, अरपे सन्त समाज री,
मन धन न्यौछावर । आये
चरन कमल लग उमंग बढ़ाया, मनमानो कियो काज री,
मांगा भक्ति वर ।। आये,
शबरी के बेर राम बन खाये, रखली दया से लाज री,
करुणा के सागर । आये
राधास्वामी दीन दयाला, हुए प्रसन्न चित आज री,
दासी के ऊपर ।। आये। |
43-423 चल सतगुरु के देस तू, मेरी सुरत सहेली ।।टेका।
माया मंडल दुख अस्थाना, क्यों सहे बिपत कलेस तू,
योनी की खानी । चल
द्वन्द जगत मन का विस्तारा, मन की न सुन लवलेस तू,
हो गुरु गम ज्ञानी । चल
घट में भोग अघट रेस भक्ति, धार प्रेम का भेस तू,
रह नित हरखानी । चल
नींद भूख परमाद त्याग दे, धर चित गुरु उपदेस तू,
तजे मान गुमानी ।।
चल दे बिखेर राधास्वामी दया से, काल करम के केस तू,
ले पद निर्वानी ।। चल
44-424 | आई राधास्वामी धाम री, तज जग की आसा ।।टेका।
पहिले पहुँची सहस कमल दल, जगमग जोत की ठाम री,
ज्यों दीप उजासा ।।आई
फिर त्रिकुटी में डेरा डाला, ओम् को लेकर नाम री,
ब्रह्मरेन्द्र निवासा ।।आई
ताके आगे सुन्न मैदाना, हंसन का विश्राम री,
गिरवर कैलासा ।।आई
भंवर गुफा की खिड़की खोली, माया काल को थाम री,
गुरु बल विश्वासा ।।आई
सत पद अलख अगम जा पहुँची, पूरा करलिया काम री,
राधास्वामी पद बासा ।। आई
45-425 राधास्वामी धुन नित गाज री, अपने अन्तर घट ।।टेक।।
राधास्वामी दर्शन भाग से पाया, सहसे कमल दल आज री,
जब उलटा तिलपट । राधा
राधास्वामी ओम रूप गढ़ त्रिकुटी, सौभा सहित विराज री,
तज मन के खटपट ।। राधा0
राधास्वामी शून्य पुरुष सुन मंडल, संग ले हंस समाज री,
मानसरोवर के तट ।। राधा0
राधास्वामी सोहंग भंवर गुफा में, कोटि कृष्ण छवि लाज री,
सच्चे बंसी बट ।। राधा0
राधास्वामी सतपद अलख अगम में, दरस परस किया काज री,
बच काल के औचट । राधा0
46-426 जागे पूरन भाग री, नर जनम बनाया ।।टेक।
माया ममता छल चतुराई, सब को दीना त्याग री,
जब गुरु संग पाया । जगे
सुरत कुवारी शब्द से ब्याही, सहित सुभाग सुहाग री,
सिंगार कराया । जागे
नाक के सीध लगाई कंवी, काही चित की मांग री,
संदूर भराया। जागे माथे बिंदी जगमग झूमर, लड़ मोतिन की मांग री,
निज रूप सजाया । जागे
घंटा बीन मरंग बाजी, अनहद मंगल राग री,
राधास्वामी गाया ।। जागे
47-427 अनहद बाजे बाज री, सुन सुरत के काना ।।टेक।।
सहस कमल दल घन्टा बाजे, धुन रही चहुँ दिस गाज री,
क्या करू बखाना ।।अनहद
थाप मृदंग पखावज त्रिकुटी, साधू जन के समाज री,
गुरु पद अस्थाना ।।अनहद
रारंग सारंग सुम्न में सरंगी, हंस मंडली साज री,
अमृत जल पाना ।।अनहद
भंवर गुफा में मुरली बंसी, महाकाल के राज री,
कोई मर्म न जाना ।अनहद
सतपद बीन मधुर मुद मंगल, यहां किया अपना काज री;
राधास्वामी धर ध्याना ।अनहद
48-428 | चल राधास्वामी धाम री तज काया कासी ।।टेक।।
सहसे कमल हरद्वार की पौड़ी, ले सतगुरु का नाम री, ।
नित भज अविनासी ।। चल
राज प्रयाग ब्रह्म गढ़ त्रिकुटी, ओंकार गुरु ठाम री,
सत चित सुखरासी । चल
सुन्न मानसर गिरि कैलासा, हंसन का विश्राम री,
नहीं चित में उदासी । चल
महासुन्न को ऊँचा परवत, सहज समाध अकाम री,
सुरत भई अकासी ।।
चल भंवर गुफा घाटी अति सुन्दर, महाकाल को ग्राम री,
माया हुई दासी ।। चल
सत सुमेर सतपद अस्थाना, आनन्द आठों याम री,
नहीं आस निरासी । चल
अलख अनाम अगम के पारा, राधास्वामी धाम से काम री,
निज रूप प्रकाशी ।। चल
46-429 मेरी सुरत सहेली आओ री, सतगुरु के चरना ।।टेक।।
जग में प्रगट भये राधास्वामी, दरस परस चित लाओ री,
आ उनके शरना । मेरी
जुगन जुगन का प्यासा मनुआ, गुरु उपदेश चिताओ री,
क्यों आलस करना । मेरी
सत संगत की अमृत बानी, सुनकर जनम बनाओ री,
सहज भव तरना । मेरी
कुछ दिन सतसंग वचन विलासा, फिर निज घट में न्हाओ री,
सुरत शब्द के झरना । मेरी
जीते जी जीवन मुक्ति फल, राधास्वामी दया से पाओ री,
अवसर न बिसरना । मेरी
50-430 | राधास्वामी धाम सिधार री, सखी सुरत सियानी ।।टेक।।
नहीं वहाँ काल कलेस न माया, नहीं सिर कर्म का भार री,
आनन्द की खानी ।। राधा0
नहीं वहां तीन ताप का भय दुख, नहीं यम का अधिकार री, ।
वह पद निवनी ।। राधा0
द्वन्द द्वत पाखंड विवादा, नहीं सत असत विचार री,
जाये मन नहीं बानी ।। राधा0
तीन त्रिलोकी काल रचाई, वह है इसके पार री,
अनुभव गति जानी ।।
राधा राधास्वामी आये दिया संदेशा, सुरत का पाऊँ उभार री,
हो धुर अस्थानी ।। राधा0
बिनती
431 दया दृष्टि कीजे, मुझे तार लीजे ।
लगा अपने चरनों में, भव पार कीजे ।
रहे वासना नाम को, भी न मन में ।
कटे दिन मेरा, भक्ति में और भजन में ।।
सदा सर्वदा, नाम ही की लगन हो ।
तुम्हारा ही सुमिरन, तुम्हारा मनन हो ।
तजी वासना, और चरनों में आया ।
न व्यापे मुझे, जगत की मोह माया ।।
जपूँ जागते सोते, मैं राधास्वामी ।।
कहूँ पद में झुककर, नमामी नमामी ।।
प्रार्थना
432 दया दृश्टि से, खोलदे आँख मेरी ।।
रहे वासना, मन में भक्ति की तेरी ।।
तेरी आस है, और तेरा ही सहारा ।
शरण देके कर, सिंधु से भव के पारा ।।
करू तन से और मन से, मै काम तेरा ।
रहे रात दिन, होठों पर नाम तेरा ।।
सदा सर्वदा मन में, हो ध्यान तेरा ।
तेरा ही हो अनुमान, और ज्ञान तेरा ।।
जपू राधास्वामी, भज़ राधास्वामी ।
पढ़, राधास्वामी, लिखें राधास्वामी ।।
सातवी धुन
1-433 | कैसे अपना भाग सराहूँ ।।टेक।।
प्रेम प्रीति परतीति पदारथ, प्राप्त भये अब कुछ नहीं चाहूँ ।। कैसे
श्रद्धा भक्ति हो टेक गुरु की, जीते जी यह परन निबाहूँ । कैसे
चरण न छूटे तन चाहें छूटे, अब तो राधास्वामी शरन पड़ा हूँ।। केसे
निरख परख कर घट की लीला, सत्तलोक की ओर चला हूँ ।। कैसे
राधास्वामी धाम में बासा पाया, चौरासी के भय से छुटा हूँ ।।
2-434 मैं तो होगया नाम दिवाना ।।टेक।
सांसों सांस नाम का सुमिरन, यही मेरा है पानी दाना । मैं तो
नहीं कोई जाने नाम महातम, जो जाने सो चतुर सुजाना ।। मैं तो
चलते फिरते सोते जगते, जपत हिया जिया हरषाना । मैं तो
धर्म कर्म संयम तप किरिया, भूल गये नहीं नाम भुलाना । मैं तो
राधास्वामी नाम जो कोई सुमिरे,सहज ही पावे पद निवना ।। मैं तो
3-435 नित प्रति गुरु की अस्तुति गाना ।।टेका।
परनिन्दा की ओर न चित दू, मन तो गुरु गुन मांहिं लुभाना ।।नित
अन्तर प्रगटी अद्भुत मूरत, देखि देखि तेहि जिया ललचाना ।।नित
जगमग जोत सहसइल निरखी, त्रिकुटी पद ओंकार लखाना ।।नित
सुन्न महासुन्न स्वेत प्रकाशा, भवर गुफा सूरज दरसाना नित
सतपद अलख अगम राधास्वामी,मिलगया सुरत को शब्द ठिकाना ।”
4-436 प्रगटी अनहद धुन घट अंतर ।।टेक।
सहसकमलदल घंट शंख सुनि, त्रिकुटी पद ओंकार का मंतर ।।प्रगटी
सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, भंवर में सोहंग बंसी जंतर ।।प्रगटी
सत में बीन मधुर धुन गाजी, अलख अगम का सूझा तंतर ।।प्रगटी
राधास्वामी बल जब पाया, निबल सहज भयो बलवंतर ।।प्रगटी
धनधन राधास्वामी सतगुरु पूरे, जीव दुखी के सुखी करंतर ।।प्रगटी
5-437 राधास्वामी सत चित आनन्द मूरत ।।टेक।।
जा दिन गुरु पद सीस झुकाया, समझो आया शुभ महूरत ।।राधा0
सत भी पाया चित भी पाया, देखी आनन्द वाली मूरत ।।राधा0
गुरु भक्ति को दीवा वाला, प्रेम प्रति की बाती पूरत ।।राधा0
कर्म धर्म संयम जप तप की, मुझको अब नहीं रही जरूरत ।।राधा0
राधास्वामी मौज दिखाई, मिट गई मन की सभी कदूरत ।।राधा0
6-438 कैसे गुरु के मैं गुन गाउँ ।।टेक।।
जग के आस फन्द सब काटे, ऐसी दया पर बलि बलि जाऊँ कैसे
बिपत पड़ी रक्षा गुरु पाई, अब क्यों दूजा देव मनाऊँ ।”
नाम दान दे किया निहाला, अब नहीं जग की आस बढ़ाऊँ ।”
पकड़ी बांह दया से मेरी, चरन कमल लग नित लपटाऊँ ।”
राधास्वामी दीन दयाला, तुम्हरी दया पार भव जाऊँॐ ।।
7-439 बरसे गगन बदरिया रसीले ।।टेक।
श्याम कुञ्ज में बिजली चमके, ठहरे नाहिं नजरिया रसीले ।।
बरसे जोत निरंजन श्याम घटा में, सूझे कैसे डगरिया रसीले ।।
बरसे त्रिकुटी सुन्न भैंबर को निरखा, नहीं यह तेरी नगरिया रसीले ।।
बरसे पन्थ में आई हूँ आसा लेकर, पहुँचें सत की सिजरिया रसीले ।।
बरसे अमृत बन्द प्रेम से भरदे, सुरत निरत की गगरिया रसीले ।।
बरसे प्रीति की धार बहादे प्यारे, भीजे तन की चुनरिया रसीले बरसे
राधास्वामी तेरी खातिर, माया काल से झगरिया रसीले ।बरसे
8-440 रंगदे मन की साड़ी रंगीले ।।टेक।।
जनम जनम की मैली साड़ी, मैल बोझ से भारी रंगीले ।।
रंगदे काम क्रोध कीचड़ में लतपत, होगई फूहड़ नारी रंगीले ।।
रंगदे सतसंग शिला ज्ञान का साबुन, मलमल धो साड़ी कारी रंगीले।।
रंगदे प्रेम का रंग सुहाना लगादे, अब न फिरू मारी मारी रंगीले ।।
रंगदे राधास्वामी प्रीतम अंग लगाले, तेरी हो जाऊँ प्यारी रंगीले रंगदे
6-441 छबि अद्भुत दिखलादे छबीले ।।टेका।
मैं प्यासी तेरे दर्शन जल की, अमृत बून्द पिलादे छबीले । छबि
मन बुद्धि की सुकड़ी कली को, हँसी खुशी से खिलादे छबीले ।छबि
बिरह के काँटे से फटा कलेजा, भक्ति टाँका सिलादे छबीले । छबि
काल करम माया की मारी, अपनी दया से जिलादे छबीले । छबि
राधास्वामी सतगुरु दाता, प्रेम की दात दिला दे छबीले ।। छवि
10-442 रंग दे चूनर मोरी रंगरेजवा ।।टेक।
शब्द सुरत का ताना बाना, सुरत चूनर मोरी कोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
चुन्नट देदे गोट लगादे, करा दे शब्द की डोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
पैयाँ परूगी गुन मानेगी, अस्तुति करूगी तोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
प्रीत के कुड प्रेम रंग भरकर, बोर के दे झकझोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
ठुमक ठुमक पिया के घर जाऊँ,माया काल की चोरी रंगरेजवा ।।रंगदे
ऐसी सजीली चूनर निकसे, कोई करे न ठिठोली रंगरेजवा ।।रंगदे
पहर ओढ़ राधास्वामी रिझाऊँ, खेलू भक्ति की होरी रंगरेजवा ।।रंगदे
बिनती।
443 न मन में हो भव भय, न आशा किसी की ।
न चिन्ता न दुविधा, न त्रासा किसी की ।
न अभिमान मद मान, का भाव भावे ।
न द्वष ईष मेरे, चित को सतावे ।।
कमल पद की लू, छाँह में नित बसेरा ।
मेरे मन के भीतर, रहे तेरा डेरा ।।
भजन ध्यान सुमिरन, करू चलते फिरते ।
चलू पन्थ पर तेरे, मैं गिरते पड़ते ।।
कहूँ राधास्वामी, सुन राधास्वामी ।
लिखू राधास्वामी, गुन् राधास्वामी ।
प्रार्थना
444 साज मंगल साज आये, जगत गुरु दातार ।
भक्त काज समाज साजी, धन्य पतित उधार ।।
शब्द नाव चढ़ाये जन को, किया भव जल पार ।
दीन हीन अधीन की सुध, लीन कृपा धार ।।
भक्ति भाव की रीति निर्मल, जाने क्या संसार ।
आप सतगुरु ने सिखाई, धार सन्तु अवतार ।।
नाथ बिनती सुनो मेरी, तुम हो परम दयार ।
जो न पकड़ो बाँह को तुम, बृढ़ काली धार ।।
सर्व समरथ साईयाँ, दुख बिपत मेटनहार ।
राधास्वामी कृपा सागर, तुम मेरे रखवार ।
आठवी धुन
1-445 भरोसा तेरी है तेरी आस मन में ।
लगा रहता हूँ तेरे सुमिरन भजन में ।
यही है जतन और यही काम मेरा ।
जपा करता हूँ रात दिन नाम तेरा ।।
तेरी मौज में रह के निस दिन सुखी हूँ।
नहीं भय न चिंता न जग से दुखी हूँ ।।
खुली आँख से तेरा दर्शन जो पाया।
मिटे सहज में मान मद मोह माया ।।
न जोगी न साधु न ज्ञानी बना मैं ।
न भोगी असाधु न मानी बना मैं ।।
जो था पहले अब भी वही रूप मेरा ।।
न व्यापा मुझे काल का हेरा फेरा ।।
न जागा न सोया ने सुषुप्ति में आया ।।
न आसा निरासा के भय ने सताया ।
न दौड़ा न बैठा न लेटा कभी मैं।
न माता पिता और न बेटा कभी मैं ।।
नहीं ब्रह्म माया का है द्वन्द मुझको ।
न उलझा सका कर्म का फन्द मुझको ।
सहज रूप है और सहज कर्म बानी ।
सहज में सहज की सहज हो निशानी ।।
सहसदल अनेक और त्रिकुटी की त्रिपुटी ।।
दशा द्वैत की सुन्न में भी न प्रगटी ।
महासुन्न अद्वैत का भाव छूटा ।
भंवर में नहीं काल माया ने लूटा ।।
अलख हूँ अगम हूँ अनामी बना हूँ ।।
कहूँ कैसे कैसा कहाँ और क्या हूँ ।।
गुरु राधास्वामी ने आकर चिताया।
मेरा रूप मुझको सहज में लखाया ।।
2-446 । जहाँ आँख खोली वहीं तुझको पाया ।।
कहीं ज्योति था तू कहीं था तू छाया ।
कमल है कमल का बना रूप तुझसे ।।
हुआ भंवरा और बास तू लेने आया ।।
पवन है अकास आग मिट्टी है पानी ।।
तू सब कुछ है और सब में है छाया ।।
कहीं होके परगट दिया सबको दर्शन ।।
कहीं छुपगया छुपके छबि को छुपाया ।।
छुपा आग के रूप चकमक में बैठा ।
हरी मेंहदी में लाली का रंग लाया ।।
जिधर देखता हूँ तुझे देखता हूँ।
मेरी दृश्टि में आप तू ब्रह्म माया ।।
दया राधास्वामी की मुझ पर हुई अब ।
परम सन्त औतार धरकर चिताया ।।
3-447 तेरा आसरा है तेरा है सहारा ।।
शरण में पड़ा तेरे तू है हमारा ।।
निरास हूँ जग से मैं आसा तेरी है ।
दया की हो दृश्टि मिटे कष्ट सारा ।।
खुली आँख से मैं करू तेरा दर्शन ।
चला जाऊंगा फिर मैं भव सिंधु पारा ।।
अमृत पिला मुझको दे सत का जीवन ।।
काल और करम का हूँ मैं मारा मारा ।।
साहस नहीं दिल में शक्ति नहीं है।
संग्राम में जग के सच से है हारा ।।
माया मुखी होके मन से दुखी हूँ ।।
समेट अपनी माया को घट चमके तारा ।।
सुरत शब्द से मेरा घट हो उजाला ।
मेरे मैट अज्ञान का अंधकारा ।।
अलख और अगम के परे धाम तेरा ।।
मैं चढ़ जाऊँगा जो तू देगा सहारा ।।
गुरु राधास्वामी की हम पर दया हो ।
हमें तार दो समझे तुम जग को तारा ।।
4-448 दया दृष्टि हो नित दया हो दया हो ।
मेरे अवगुणों पर तुम्हारी क्षमा हो ।।
नहीं ज्ञान भक्ति नहीं कर्म सेवा ।।
न मन का मिटा आज लग भर्म भेवा ।।
विवेकी नहीं हूँ न पंडित न ज्ञानी ।
बना हूँ सकल विधिं से अज्ञान खानी ।।
पड़ा हूँ शरण में शरण दीजिये अब ।।
मुझे छांह में चरनों के लीजिये अब ।।
दया अद्भुती कीजिये राधास्वामी ।।
तुम्हारे चरन में नमाम नमामी ।।
5-449 न काशी न काबा न कैलास में है ।
तू देख अपने घट में तेरे पास में है ।।
तेरे घट के भीतर वह मालिक बसा है।
न मसजिद न मन्दिर न आकास में है ।।
नहीं खाली उससे यह सारा जहां है ।
कहां देखता किसकी तलास में है ।।
लगा बन्द तीनों सुरत को चढ़ाओ ।।
अनहद की धुन घट के आकाश में है ।।
गंगा के जल से नहीं होगी तृप्ति ।
चलो घाट मन के जो तू प्यास में है ।।
वह व्यापक हो रग रग में आकर समाया।
तेरी जान तन में तेरी सांस में है ।।
भरम में पड़ा तू किधर हूँढ़ता है।
गुरु तेरे अन्तर वह परकाश में है ।।
कहीं नाम है और कहीं बेनिशां है।
हमारे ही मन के वह विश्वास में है ।।
राधास्वामी ने भेद अपना बताया ।
उसे मिलने की युक्ति अभ्यास में है ।।
6-450 सदा नाम से लौ लगाया करो तुम ।।
सुफल अपना जीवन बनाया करो तुम ।।
बसाकर गुरु मूरती मन के मन्दिर ।।
सिर्फ प्रेम दीपक जलाया करो तुम ।।
कभी तो उन्हें भी खबर हो रहेगी ।
करुणा राग अपना सुनाया करो तुम ।।
वह दाता दयालु अवश्य देंगे दर्शन ।
सदा ध्यान उनको लगाया करो तुम ।।
भजन ध्यान से यह भटकने न पावे ।।
निठुर मन को निसदिन चिताया करो तुम ।।
मिलेंगे गुरु अपने जीवन के साथी ।
तड़प मन में दर्शन बढ़ाया करो तुम ।।
मनोकामना होगी पूरन तुम्हारी ।।
राधास्वामी का नाम गाया करो तुम ।।
7-451 मुझे रूप का अपने निज ज्ञान दीजे । |
वह क्या कैसा है उसका परमान दीजे ।।
जो यह ज्ञान का चन्द्र रूप साई ।।
पड़ी दुख की इस जोति में कैसे झांई ।।
कहा करते हैं ज्ञानी माया नहीं है।
जो माया न होगी तो काया नहीं है ।।
बिना काया कैसे यह संभव कथन है ।
असंभव सभी योग युक्ति मथन है ।।
श्रवण और मनन कैसे फिर होंगे दाता ।।
बिना इसके मन ध्यान किसमें लगाता ।।
है क्या भेद मन और माया में प्यारे ।
बतादो मैं समझे उसी के सहारे ।।
बतादो मुझे सार तुम राधास्वामी ।।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
8-452 । सुनो मेरे भाई कथा यह पुरानी ।
नहीं जानते आज कल जिसको ज्ञानी ।।
नहीं ब्रह्म माया में है भेद कोई ।
जो है ब्रह्म माया भी है वस्तु सोई ।।
जो सत है वही सुख वही चित है प्यारे ।।
कथन के लिये तीन हैं एक सारे ।।
करम सत में और चित में है ज्ञान की गम ।
यही आत्मा में है आनन्द उत्तम ।।
जहाँ सत वहीं वहीं सुख है व्याया।
जो तीनों को समझे लखे अपना आपा ।।
इसी आये का रूप अपना समझना ।।
समझकर ने अज्ञान में फंस भटकना ।6।।
करे गुरु की संगत समझ तब यह आवे ।
मिले राधास्वामी जुगत जोग पावे ।।
6-453 मेरे अवगुणों की करो तुम न गिनती ।
सुनो करके करुणा मेरे मन की विनती ।।
दया रूप हो तुम दया दृष्टि कीजे ।
मेरी भावनाओं की शुभ सृष्टि कीजे ।।
कमल पद की अपने मुझे छह दीजै ।।
मेरी बाँह में अपनी अब बाँह दीजे ।।
तुम्ही मेरे दाता तुम्ही मेरे स्वामी ।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
बनादो मुझे तुम दया से सुशीला ।।
से देखें संतोष भक्ति की लीला ।।
सदा सर्वदा मन में सुमिरन भजन हो ।
तुम्हारी दया बानी का नित कथन हो ।।
दयासिंधु हो राधास्वामी दयाला ।
करो दीन दुखियों का अब प्रतियाला ।।
10-454 नहीं सिर्फ शहरों में तू कूबकू है।
जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ।।
मेरे दायें बायें मेरे आगे पीछे ।
मेरे साथ में है मेरे रूबरू है ।।
मेरी साँस साँस और दम का हमदम ।।
मेरी जान तन है मेरे दुबदू है ।।
है कसरत में वहदत में खिल्लत में जाहिर ।
बनों का है बातिन तुही मूबसू है ।।
खियाबाने गुलशन में है तू तरावत ।।
नमू बर्ग में और फूलों में बू है ।।
तेरी ही है रग रग में रेशा रवानी ।
तू खुद मैं में मैं है तू ही तू में तू है ।।
अगर नैकदे का है पीरेमु माँ तू ।
तो तू मैं है और जाम मीना सुबू है ।।
राधास्वामी ने भेद मुझको बताया।
तेरी जाँ की जाँ है तेरी रूह की रूह है ।।
11-455 निहाँ में अयाँ है अयाँ में निहाँ है।
बताऊँ मैं क्या तू यहाँ है वहाँ है ।।
मुहीते गुजो कुल है कुल और जुज है।
भरा हर जगह तुझसे सारा जहाँ है ।।
कहीं हद कहीं तू बना आप बेहद ।।
कही बामकाँ है कहीं लामकाँ है ।।
गुलिस्ताँ में गुलबर्ग गुल की नजाकत ।
बना कोयल और बाग में नग्मेख्वाँ है ।।
समाया मेरे रंग में रेशे में आकर ।
नहीं तुझसे खाली मेरा जिस्म जाँ है ।।
यह जो सूरतें हैं तेरी सूरतें हैं ।
कहीं नाम है तू कहीं तू निशाँ है ।।
जहाँ मैंने देखा फक्त तुझको देखा ।।
हजारों ही शक्लों में जल्वा कुना है ।।
लतीफा है जौहर खुलासा है सबको ।
सताइश में हर नुक्तेदाँ तर जुबा है ।।
मुकद्दर है मकदुर खुदरत बना तू ।
यह खादिर हमेशा तेरा मदहरूवाँ है ।।
वह हैरत बना आप खुद राधास्वामी ।
जो मुर्शद के फज्लोकरम में अयाँ है ।।
12-456 गुरु ने सहजयोग आकर सिखाया, परमार्थ पुरुषार्थ को गुर बताया ।
संचाई के अनुभव का मारग दिखाया, कृपा दृष्टि की रास्तेपर लगाया ।।
जगाया उठे नींद से सोने वाले ।
वह संभले जो पहले न संभले संभाले ।।
कटे मोह के और अविद्या के बंधन,नहीं अब कहीं नाम को भी है उलझन
बचन सुनते ही शब्द का भाया साधन, मिला सच्चिदानंद का घट में दर्शन
थे बाहरमुखी जो वह अन्तरमुखी है ।।
मिटा दुख कलेश और अब वह सुखी है ।।
सहारा दिया संग को अपने आकर ।
लगाया कमल पद में चित से चिताकर ।।
दया के क्षमा के बचन निज सुना कर ।।
सरल भाव भक्ति की महिमा जताकर ।
भजन ध्यान सुमिरन की युक्ति बताई।
खुली आँख से जग की दुरगति दिखाई ।।
नहीं द्रुतवादी के उलझन फंसे हम ।।
न अद्वैतादी के दलदल से हम ।।
चरन की मिली छाँह उसमें बसे इम ।।
स्वरूप अपना देखा सहज में हसे हम ।।
किनारे लगी आके नौका हमारी ।।
है अब भक्ति की रीति मन को पियारी ।।
सहज रूप हैं और सहज कर्म बानी ।
सहज ज्ञान के हम सहज ही हैं ज्ञानी ।।
नहीं पक्ष के और नहीं मत के मानी ।।
कमल पत्र सम तेरे भवनिधि के पानी ।।
कहाँ ब्रह्म माया का है द्वन्द हम में ।
न बन्धन न उलझन का है फन्द हम में ।।
सहसदलकमल तीसरे तिल को फोड़ा ।
चढ़े त्रिकुटी ओम् से नाता जोड़ा ।
महासुन और सुन मद मोह छोड़ा }
भंवर में महाकाल का मान तोड़ा ।।
पहुँचकर अधर सत की सत्ता लखी जब ।।
सुफल अपना जीवन सहज में किया तब ।।
अलख लख अगमलोक के ठहरे बासी ।
हुये सुख के रूप और आनन्द रास ।।
नहीं धृथवीं के हम न हम हैं अकासी । ।
हैं भत्र द्वन्द की ओर से अब उदास ।
दया अद्भुती तुमने की राधास्त्राम ।।
तुम्हारे चरन में नमामी नमामी ।।
.
बिनती
457 सुनो विनती नाथ मेरी, जीव सहत कलेश ।
भच का बन्धन काट इनके, दया करो विशेष ।।
तरन तारन नाम धारा, तार दीजे आज ।
है तुम्हारे हाथ अब तो, स्वामी सब की लाज ।।
रोग भोग वियोग में, नहीं भक्ति साधन जोग ।
दीन बन्धु बख्श दीजे, शरन का संजोग ।
नाम दीजे काम कीजे, लीजे चरन लगाय ।
सब भिखारी हैं तुम्हारे, इनकी कीजे सहाय ।।
पतित पावन भय मिटावन, यह कहूँ कर जोर ।
राधास्वामी की मेहर से, छूटे मोर और तोर ।।
प्रार्थना
458 कृपा सिंधु पूरन धनी, तुम सब के हितकारी ।
मंगल मय मंगल सदन, गुरु मंगलकारी ।।
दीन बन्धु करुना अयन, करुना के सागर ।
सगुन अगुन गुनवान हो, नागर गुन आगर ।
नहीं कोई महिमा कह सके, तुम अपरम्पारा ।
दया दृष्टि से देखिये, दे अपना सहारा ।
नाम रूप के जगत से, प्रभु तुम हो न्यारे ।।
नाम रूप दरसाय कर, बने सत्र के प्यारे ।।
भक्ति दान को दान दे, अपना कर लीजे ।
राधास्वामी नाम धन, कृपा मोहे दीजे ।।
नवी धुन
1-459 प्रेम नगर के डमर में सजनी, सिरके बल तू आवरी ।।टेक।
प्रत रीति अमृत रस मीठा, हित चिंत. मन कर्म पावरी ।
जग का फीका स्वाद त्याग दे, मन बचन मेरा बाबरी ।।प्रेमनगर
मानुष देह दया से पाया, फिर नहीं ऐसा दाव री ।।
नर शरीर सुर को भी दुर्लभ, सुगम सुसाध सुभाव री ।।प्रेमनगर
जैसे बने तैसे करले कमाई, मन धर भक्ति का भाव री ।
घट में परगट गुरु की लीला, निरख निरख हरषाव री ।।प्रेमनगर
अन्तर में तेरे नौबत झड़ती, धम चल सहित हियाव री ।
अनहद बानी मंगल खानी, नित प्रति निसदिन गाव री ।।प्रेमनगर
राधास्वामी दया की मुरत, सांच दिल दरयाव री ।
चरण कमल की ओट पकड़ले, सूझे सुगम उपाव री ।।प्रेमनगर
2-460 | पृथवी मंडल छोड़ के सजनी, उलट के चल असमान री ।।टेक।
सीधा मारग त्याग दे चित से, उलटे का कर ध्यान री ।
उलटे पन्थ है घर का रस्ता, कहना मेरा मान री ।।पृथवी
पृथ्वी गगन मंडल में सहस कमलदल, ओंकार अस्थान री ।।
घंटा शंख पखावज बाजे, सुन अनहद के कान री ।।पृथवी
सुन्न में गंग जमुन की धारा, तिरबेनी अस्नान री । ।
मान सरोवर हंस केल करे, नीर क्षीर को छान री ।।पृथवी
भंवर गुफा सोहंग धुन बंसी, कोटि कृष्ण करें गान री ।।
कोई कोई अवधू ज्ञानी समझे, गोपी गोप का तान री ।।पृथवी
सत्त धाम में बीन सुहानी, सुख आनन्द की खान री ।।
अलख अगम राधास्वामी पद ऊँचा, पहुँचे संत सुज्ञान री ।।पृथवी
उलट के अन्तर लख घट लीला, तब पावे गुरु ज्ञान री ।।
दहि जगत की सुख सब झूठा, अपनी बुद्धि पहचान री ।।पृथवी
धृथवी गुरु गम सुगम सुहावन प्यारी, कैसे करू बखान री ।
राधास्वामी दया करे जब पूरी, सूझे पद निरवान री ।।पृथवी
462 त्याग भरोसे जगत को प्यारी, धार गुरु की असि तू ।।टेक।।
गुरु को खोज चरन में लगजा, भजे गुरु साँसों साँस तू ।
गुरु समन कोई देव न दूजा, देखले धरन अकोस तू ।।
त्यान गुरु की देयी जीते जी पाले, आनन्द हर्ष हुलास री ।
तन के चिछड़े सत्तधाम में, करे सदा सहवास तू त्याग
सोच समझ कुछ मन में अपने, जग में रही निवास तू ।।
स्वारथ बस सब कुटुम्ब कबीले, इनसे भई उदास तू ।।
त्याग बिपत पड़े तन मन सब बैरी, उरझी चिंता फाँस तु ।
असो तृणो मोह मयो सब, समझे काल को अस तू त्यांग
राधास्वामी सदा सहाई, आजा उनके पास तू ।
हो सतसंग विवेक सहित नित, कर अज्ञान का नास तू ।।त्याग
4-462 ।। बिरह आगे कलेजे भड़की, निस दिन सोच रहे मन में री ।।टेक।
जा दिन पियो से भयो विछोहा, आये पड़ी पिंजरे तन में री ।।
बिलपू तड़पू पिया के कारन, मृगनी भटकी ज्यों बन में री ।।बिरह
अखियन नीर बहे जल धारा, जीत नहीं मेरे नैनन में री ।
काँटा विरह को उरमें साले, कैसी फैसी हूँ उलझन में री ।।
विरह बाँती छ । जस रटत पपिहरा, मैं रटती पिया छिन छिन में री ।
पिया बिन कोई नर मोहि सुहावे,सुख नहिं विन पिया जीवन में री बिरह
मैं धृथवी पियो गगन विराजे, कैसे मिले सजनी छिन में री ।।
पैसे नहीं जो उड़कर चालू, जीव पड़ा नित चिंतन में री ।।विरह
राधास्वामी दया के सागर, दया करो प्रभू इस पन में री ।
पल में चाहो पिया से मिलावो, सुरत शब्द के साधन में री ।।विरह
5-463 आये पड़े भव के दुख सागर, डूब रही मॅझधार में रे ।।
टेका। गोते खाते बिकल शरीरा, कष्ट अधिक संसार में रे ।
है कोई ऐसा चतुर खिवय्या, करदे काढ़ किनार में रे ।।
आये अपना बल कुछ काम न आवे, चित है सोच विचार में रे ।।
कौन सुने मेरी किसको सुनाऊँ, शक्ति नहीं है पुकार में रे ।
आये संकट भारी बिपत घनेरी, रहा न वार न पार में रे ।।
बुड़त का कोई संग न साथी, कुल कुटुम्ब परिवार में रे ।
आये हाय हाय मैं केहि विधि निक, बैरी काल शिकार में रे ।
एक भरोसा राधास्वामी का, संत जीव उपकार में रे ।
आये राधास्वामी दाता दया बिचारो, मैं नहीं वार न पार में रे ।
बाँह पकड़ मोहि आप बचाओ, खींचो निज दरबार में रे । आये
बिनती।
464 आदि अनादि अनन्त अमाया, निःकाया महिमा भारी ।
देव दनुज नर किन्नर करता, सन्त जनन के हितकारी ।।
क्या कोई जाने तुम्हारी लीला, अगम अपार अरूप हो तुम ।
भेद न पावे ऋषि मुनि कोई, सारे जगत के भूप हो तुम ।।
सुनत कान बिन लखत नैन बिन, चलत बिना पद निस बासर ।
बिन जिभ्या बोले बहु बानी, ग्रहन करत सब कुछ बिन कर ।।
प्रार्थना
466 मंगल मय गुरु चरन, ताप त्रय हर लेने वाले ।
भव दुख सकल मिटाय, शान्त पद देने वाले ।।
भव सागर अति अगम पन्थ, नहीं सूझे कोई ।।
शब्द जहाज चढ़ाय, पार गुरु कीन्हा सोई ।।
बूढ़त रहे मॅझधार, मिला नहीं कोई सहाई ।
आये गुरु दातार, बाँह गह मेरी ठौर लगाई ।।
नाम रूप का भेद दिया, भरम भेद मिटाया ।
पद अभेद दरसाय, भेद को फन्द छुड़ाया ।।
राधास्वामी पद कमल, मन मधुप लुभाना ।
मने बानी के परे, मिला धुर पद निरवाना ।।
दसवी धुन
1-467 राधास्वामी नाम की बलिहारी, गुरु नाम महा मंगलकारी ।।टेका।
राधास्वामी नाम को, जो गावे तर जाय।
कलि कलेश सब नाश हों, सुख पावे दुख जाय ।।
हो सहज सहज भवजल पारी । राधास्वामी
ऐसा नाम अपार, कोई न जाने भेद ।।
जो जाने सो पार हो, सहे न योनि का खेद ।।
जीवन न बने कभी संसारी ।। राधास्वामी
राधास्वामी गाय कर, जनम सुफल करले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने धरले ।।
यही नाम है सच्चा हितकारी ।। राधास्वामी0
राधा सुरत का मूल है, स्वामी शब्द का मूल ।
सब आये इस वृक्ष में, डाल पात फल फूल ।।
राधास्वामी नाम है सरकारी ।। राधास्वामी0
बैठक स्वामी अद्भुती, राधा निरखन हार ।
और न कोई लख सके, शोभा अगम अपार ।।
शोभा ही बने शोभा धारी ।। राधास्वामी0
गुप्त रूप जहाँ धारिया, राधास्वामी नाम ।
बिना मेहर नहिं पावई, जहाँ कोई विश्राम ।।
कोई समझे रहस्य को अधिकारी ।। राधास्वामी0
राधास्वामी सुमरिये, राधास्वामी गाय ।
राधास्वामी ध्याइये, मन चित बुद्धि लगाय ।।
गुरु देव करें तेरी रखवारी ।। राधास्वामी0
2-468 राधास्वामी नाम की बलिहारी, गुरु नाम महा मंगलकारी ।।टेक।
राधास्वामी नाम को, जो गावे तर जाय ।
कलि कलेश सब नाश हों, सुख पावे दुख जाय ।।
इस नाम की महिमा है भारी ।। राधास्वामी0
ऐसा नाम अपार यह, भेद न कोई जान ।
जो जाने सो पार है, जग नहीं जन्मे आन ।
मिलती है बन्ध से छुटकारी ।। राधास्वामी
राधास्वामी गायकर, जनम सुफल करले ।
यही नाम निज नाम है, मन अपने धर ले ।।
नहीं कृत्रिम नाम हो हितकारी ।।
राधास्वामी0 राधा सुरत का मूल है, स्वामी शब्द का मूल ।
निज स्वरूप के वृक्ष में, डाल पात फल फल ।।
यह नाम नहीं है संसारी ।। राधास्वामी
बैठक स्वामी अद्भुति, राधा निरखनहार ।
और न कोई लख सके, शोभा अगम अपार ।।
निज सुरत है शब्द की दरबारी ।। राधास्वामी0
गुप्त रूप जहाँ धारिया, राधास्वामी नाम ।
बिना मेहर नहीं पावई, जहाँ कोई विश्राम ।।
बड़ भागी कोई हो अधिकारी ।। राधास्वामी0
अलख अगस अनाम का, राधास्वामी नाम ।।
तिरलोकी के है परे, राधास्वामी धाम ।।
वहाँ रंग न रूप न रेखा री ।। राधास्वामी0
3-469 तेरी दया का दृढ़ विश्वास हुआ, चरनों में पड़ा निज दास हुआ ।।टेक।
करू बनती दोऊ कर जोरी, अरज सुनो राधास्वामी मोरी ।
संसार से सहज उदास हुआ ।। तेरी दया0
सत्त पुरुष तुम सतगुरु दाता, सब जीवन के पितु और माता ।
ढारस बाँधी घट में उजास हुआ । तेरी दया0
दया धार अपना कर लीजे, काल जाल से न्यारा कीजे ।
तब समझे गा माया को नास हुआ ।। तेरी दया0
सतयुग त्रेता द्वापर बीता, काहु न जानी शब्द की रीता ।
सब में अज्ञान का बास हुआ ।तेरी दया0
कलयुग में स्वामी दया बिचारी, परगट करके शब्द पुकारी ।
विद्या संत ज्ञान को भास हुआ ।। तेरी दया0 ।
जीव काज स्वामी जग में आये, भव सागर से पार लगाये ।
तब दुखी जीव सुख रास हुआ ।। तेरी दया0
तीन छोड़ चौथा पद दीना, सतनाम सत गुरु गति चीन्हा ।।
अनुभव का आप विकास हुआ ।। तेरी दया0
जगमग जोत होत उजियारा, गगन सोत पर चन्द्र निहारा ।
घट ब्रह्मरेन्द्र कैलास हुआ ।। तेरी दया0 ।
स्वेत सिंघासन छत्र बिंराजे, अनहद शब्द गैव धुन गाजे ।
हिंया उमगा हर्ष हुलास हुआ ।। तेरी दया0
क्षर अक्षर निह अक्षर पारा, बिनती करे जहाँ दास तुम्हारा ।।
पृथवी छूटी गुजर आकास हुआ ।। तेरी दया0
लोक अलोक पाऊँ सुख धामा, चरन शरन दीजे विश्रामा ।
राधास्वामी चरन निवास हुआ ।। तेरी दया0
4-470 तुझे किसने कहा कि वह पास नहीं, वह तुझमें है कासी कैलास नहीं टेक
हूँढ़त हूँढ़त थक गये, पता न देने कोय ।
सन्तों के सतसंग में, उसका दर्शन होय ।
यह समझ ले पृथ्वी आकाश नहीं ।। तुझे0
घट में हैं सूझे नहीं, घट नहीं हूँढे कोय ।
चारों धाम में थक गये, अपना आपा खोय ।
निगुरा क्या पाच वह दास नहीं ।। तुझे0
साँस साँस में रम रहा, सबको रमता राम ।
आँख खुले दर्शन मिले, घट में जपे जब नाम । |
वह करम धरम अभ्यास नहीं ।। तुझे
अपना आपा परख ले, सुरत शब्द की चाल ।
अपने आप में वह रहे, समझो के हो तू निहाल ।
इसे कैसे मिले जिसे आस नहीं ।। तुझे
राधास्वामी नाम ले, घट में बंद लगाय ।
तब तत छिन दर्शन मिले, भ्रान्ती भरम भुलाय ।
वह तीरथ बरत उपवास नहीं ।। तुझे
5-471 क्या करना था क्यों मैंने किया, संसार को क्यों चित अपना दिया ।।टेक
भूली भूली क्यों फिरी, फूली काम के संग ।।
बिसराया गुरुदेव को, अपना मन किया भंग ।।
नहीं घट में जलाया भक्ति दीया । संसार को
मान ईर्षा द्वेष की, अन्तर में खुली खान ।
ज्ञान रतन परखा नहीं, व्याप रहा अज्ञान ।
क्या लेना था, क्या मैंने लिया है। संसार को
प्रेम पियाला पटक कर, विषय घुट क्यों पी ।।
जो कोई विष को पिये, वह फिर कैसे जी ।।
नित विषय के विष को घोल पिया ।।
संसार को जीना उसका सुफल है, जिये जो प्रेम के कोज ।
नहिं तो मरजाना भला, यहि जीवन को लाज ।
जिया अपने लिये तो क्या वह जिया ।।
संसार को राधास्वामी दीन हित, कीजे मेरी सहाय ।
रहूँ चरन की ओट में, त्याग भरम समुदाय ।।
तुम ही हो प्यारे सच्चे पिया । संसार को
6-472 संसार महा दुखदाई है, क्यों धोखे में मेरे भाई है ।।टेक।।
क्यों आया क्या कर चला, क्या लिया अपने साथ ।।
गये जो क्या लेकर गये, क्या था उनके हाथ ।
कर ध्यान तू क्या सौदाई है ।। संसार
मेरा तेरा कर मरा, कोई गया नहीं संग ।
देह तजी चलते समय, ज्यों केचुली भुजंग ।।
अब भी तुझे समझ न आई है ।।संसार
फूल खिले मुरझो गये, कुमलाये गये सुख ।
ऐसे ही सबकी दशा, डाली जड़ और रूखे ।
यहाँ जो है अगमा पाई है ।। संसार
जगमग तारे रात के कहने लगे प्रभात ।
मंद दशा अपनी हुई, क्या कह मुख से बात ।
क्यों आलस तुझको भाई हैं। संसार
पंच तत्व के मेल से, बना है नर को शरीर ।
पाँच, पाँच में मिलेंगे, कैसे आवे धीर ।
यह दशा तो सब पर आई है। संसार
प्रान देह के संग को, देख है कैसा मेल ।
प्रान देह तजकर चला, क्या विचित्र है खेल ।
कोई यहां न संग सहाई हैं । संसार
राधास्वामी संग में, करने अपना काज ।
काल सदा सिर पर खड़ा, सज चलने का साज ।
सत संगत ही सुखदाई है ।। संसार
7-473 दुर्लभ अधिकारी को क्या है जी, अधिकार बिना क्या मिला है जी टेक
खोजी तो कोई नहीं, सब करें वाद विवाद ।
बिंन करन केसे मिले, निकट प्रेम का स्वाद ।।
बातों में न कुछ भी धरा हैं जी ।। दुर्लभ
आरत अधिकारी मिले, साधु होय दयाल ।
कुञ्जी भेद की दान दे, छिन में करे निहाल ।।
फिर तीर निशाने लगा है। जी ।। दुर्लभ
शम दम सावधान मन, युक्ति की हो चित चाह ।।
दयावंत गुरुदेव तब, आप लखावें राह है
अधिकार का उनको पता है। जी ।। दुलझ
आये समुन्दर के निकट, मन में धार उमंग ।।
मोती तो उसको मिले, डूबे सिंध अभंग ।
तटवासी निराश रहा है जी ।। दुर्लभ
प्रेम पियाला वह पिये, तन की छाँड़े आस ।।
तन का प्यार जिसे रहा, अंत में हुआ उदास ।।
राधास्वामी ने भेद दिया है जी ।। दुर्लभ
8-474 भव जनम का हेरा फेरा है, क्यों तुझको संशय ने घेरा है ।।टेक।
नहीं आई अब तक समझ, अब कुछ समझले मीत ।।
आलस निद्रा छोड़ अब, आयु जायेगी बीत ।
झूठा सब मेरा तेरा है ।। भव
आये है सो जायेंगे, जाना बिस्वा बीस ।
जनम मरन चक्की चले, डालेगे उनको पीस ।।
यहाँ कोई सहाई न तेरा है ।। भव
पन्थी आया पन्थ में, एन्थाई के भाव ।
आगे को पग दे नहीं, कैसे सूझे उपाव ।
दुविधा दुचिता का डेरा है । भव
दस दिन जीना जगत में, जीने की नहीं आस ।।
इसकी आसा क्या करे, गुरुमुख गुरु का दास ।
जग चिड़िया रैन बसेरा है. ।। भव
काल शिकारी ताक में, तू है वारा बाट ।
सोच सोच कुछ सोचले, कर चलने का ठाठ ।।
क्यों बाढ़ का राह में डेरा है ।। भव
ज्ञान सूर परकाश से, करले अपना काम ।
काम सहज है बंधुआ, भज भज गुरु का नाम ।
आगे फिर घोर अंधेरा है ।।भव
सुमिरन भजन और ध्यान में अपना लगाले चित ।
राधास्वामी की दया, कुछ तो कर निज हित ।
उठ जाग तु अभी सवेरा है ।। भव
8-475 गुरु चरणों में ठौर ठिकाना मिले;पदकमल की छाँह में आना मिले ।।टेक।।
देखा माना जान लिया, दुखदाई संसार ।।
भव सागर गम्भीर अति, सूझे वार न बार ।।
तरने को इससे बहाना मिले ।।
गुरु भक्ति मिले परतीत मिले, निश्चय श्रद्धा पाय ।।
प्रेम मगन मन निस रे, तन का सोच भुलाय ।
जो दिवाना बनाये दिवाना मिले ।।गुरु
नशा चढ़े इस ढंग का, उतरे नहीं खुमार ।।
नाम अटल माता रहे, पिये अभी रस धार ।
दे मस्ती ऐसी मस्ताना मिले । गुरु
भूखा प्रेम अहार का, प्यासा प्रेम के नीर ।।
भूख प्यास सब दूर हों, रहे निश्चित शरीर ।
ऐसा मुझे पानी दाना मिले । गुरु
राधास्वामी आदि गुरु, दया क्षमा भंडार ।
दया दृष्टि अब कीजिये, मेरा हो उद्धार ।
तुम जैसा कोई सियाना मिले । गुरु
10-476 गुरु गहकर हाथ संभालो मुझे, भव जाल फैसा हूँ निकालो मुझे ।।टेक।।
पाँच शत्रु पीछे लगे, करें सदा उत्पात ।।
तुम मेरी रक्षा करो, देकर नाम का दान ।
समरथ गुरु उनसे बचालो मुझे ।। गुरु गह0
दीन अधीन मलीन चित, चंचल मूढ़ कुचाल ।
गुरु दात दुख भंजना, काटो यह जंजाल ।
हूँ मौत के मुंह में बचालो मुझे ।। गुरु गह
एक तुम्हारी आस है, ओस किसी की नाँह ।
शक्ति नहीं असक्त हैं, पकड़ो मेरी बाँह ।।
पद कमल की छाँह में पालो मुझे ।। गुरु गह
मेरे दिल में नित बसो, रख कर अपने संग ।
हिया जिया में बाढ़ सदा, प्रेम प्रतीत उमंग ।।
भव भय के भंवर से, उछालो मुझे ।। गुरु गह
विनती कब तक मैं करू, आयु बीती जाय ।
राधास्वामी दीन् हित, अब तो करो सहाय ।।
दुखदाई दसा से हटालो मुझे ।। गुरु गह
11-477 अज्ञान का फन्द कटा देना, गुरु ज्ञान की जोति दिखा देना ।।टेक।
क्या हूँ कहाँ हैं कौन हूँ, कहाँ से आया भाग ।।
तुम कैसे मिले अब मुझे, क्यों चित बड़ा अनुराग ।।
यह अकथ कहानी सुना देना । अज्ञान
विद्या अविद्या वस्तु क्या, जनम मरन क्यों होय ।
ईश जीव सम्बन्ध क्या, समझे क्योंकर कोय ।।
भली भाँति यह मरम समझा देना । अज्ञान
जनम न लेना हानि क्या, जनम लिया तो लाभ क्या ।
जनम मरन में दुख महा, कौन उसे है चाहता ।।
बस गुत्थी को तुम सुलझा देना ।। अज्ञान
परमारथं व्यौहार क्या, क्या है इसमें भेद ।
किस विधि बरतें यह विषय, शास्त्र स्मृति भेद ।।
जो तत्व हो उसे बता देना । अज्ञान
भरम जाल के फाँस में, हँस पाया बहु दुख ।
अब गुरु का संग मिला, मन कुछ पावे सुख ।।
राधास्वामी निज पंथ लखा देना ।। अज्ञान
12-478 दो दिन का मेला ठेला है, फिर क्या है तू आप अकेला है ।।टेक।।
तिरिया बोली पुरुष से, तू है जनम का मीत ।
अन्त समय नहीं संग हुई, यही यहाँ की रीत ।।
यह मिथ्या सारा झमेला है ।। दो दिन
माता बोली पुत्र से, पुत्र पुत्र है तू ।।
| घर को बसा व्यौहार कर, सुन्दर आवे बहू ।।
सबने इस खेल को खेला है ।। दो दिन
बाप कहे बेटा मेरा, स्वारथ बस लपटान ।
बिन स्वारथ बेटा नहीं, कर न उसका ध्यान ।।
फिर बेटा नहीं मिट्टी का ढेला है ।। दो दिन
धन दौलत सब हैं भरे, यह नर का अभिमान ।
चलते समय विचार कर, सब हैं धूल समान ।।
नहीं संग छदाम न धेला है ।। दो दिन
परमारथ व्यौहार में, देखा यह व्यौहार ।
बाप पुत्र चेला गुरु, इनमें कहाँ कुछ सार ।।
नहीं गुरु यहाँ कोई न चेला है ।। दो दिन
जहाँ स्वारथ तहां जगत है, कही सुनी मतं मान ।
अपनी आँखों देख लो, जान मान पहचानं ।।
नहीं समझ तो दुख नित झेला है। दो दिन
राधास्वामी संग में, तत्व को मरम को बूझ ।
शब्द योग अभ्यास कर, ले अनुभव की सूझ ।।
यह साधनं सुगम सुहेला है। दो दिन
13-479 जब चढे सुरत नभ के मंडल, नहीं चित भंग न मन चंचल ।।टेक।।
मन के तीन स्वरूप हैं, मूढ़ अबुद्धि कुचाल ।
यह सुधरे छिन में अभी, जब हों गुरु दयाल ।
फिर फंसे न माया के दल दल । जब चढ़े0
गुरु पद परस के शान्त हो, अब नहीं श्रान्ती न भर्म ।।
चाह मिटी चिंता गई, कटे जनम को कर्म ।।
चले सत की ओर हो सँभल संभल ।। जब चढ़े0
अलख लखा वो अगम गम, अकथ की कथा विचार ।
निज घट में बासा किया, सतगुरु की बलिहार ।।
अन्तर में धंसा, बाहर से मचल । जब चढ़े0
मैं क्या हैं और क्या तज़, नहीं गहन नहीं त्याग ।
इत्ते तोड़ा भात्र को, उतकी ओर को भाग ।।
यहाँ से वहाँ पहुँचा सहज निकल ।। जब चढे0
राधास्वामी की दया, सुफल भई नर देह ।
अब क्यों भरमावे मुझे, कुल परिवार और गेह ।
मिले गुरु भक्ति का यह है फल ।। जब चढ़0
आप ही आप मिले सकल, भक्ति मुक्ति सतज्ञान।
हो मस्त जो पिये प्रतीति भंग !
481
[19-486 ] तुमने सतसंग से क्या पाया, नहीं समझ में सार तत्व आया ॥टेका।
सुमिरन ध्यान भजन का, प्रगटा नहीं प्रभाव ।
फिर क्या लाभ भया तुम्हें, हाथ पड़ा नहीं दाव ।
यूँ ही भरमे और भरमाया ॥तुमने
सहसकमल भ्रमध्य की, समझ न आई बात ।
त्रिकुटी पद परखा नहीं, मन का मचा उत्पात ।
कहाँ सुन्न समाध में लव लाया ॥
तुमने शब्दार्थ के ज्ञान की, नहीं पाई कुछ गम ।
समय अमोलक खोगया, नहीं दम है नहीं शम ।
क्या हुआ जो शब्द भजन गाया ॥
तुमने0 आसन मारे क्या हुआ, नहीं समाहित चित ।
तुमने गुरु के संग में, किया न अपना हित ।
माया और काल ने अटकाया ॥
तुमने चेत चेत अब चेत ले, चेत के करले काम ।
सोच सोच कुछ सोच मन, सोच के जप गुरुनाम ।
राधास्वामी ने सब विधि समझाया ॥तुमने
[20-487 ] जब ओढ़ी सत की कामरिया, सुनी भँवर सोहंगम बाँसुरिया ॥टेक॥
सोहम् सोहम् धुन उठी, गूज रही चहुँ ओर ।
बंसी की धुन मधुर सुन, मगन हुआ मन मोर ।
सुरत नाहीं रही गांवरिया । जब0
जब माया काल की लख दशा, अब न पड़ अज्ञान।
सुन बंसी की तान को, सत के चलू मैदान ।
सतगुरु संग फिरे मेरी भाँवरिया ॥जब0
आँख खुली दर्शन मिला, चमका सत का नूर ।
निकट हुई गुरुदेव से, अब तो रही न दूर ।
दुविधा की भागी चामरिया ॥जब0
योग ज्ञान संजोग से, प्रगट भये गुरुदेव ।
चरन कमल चित जोड़कर, करुं निरंतर सेव ।
मिला मुझको मेरा साँवरिया ॥जब0
राधास्वामी भज सदा, मेटा मन का विकार ।
जहाँ देखू गुरुदेव हैं, महिमा अगम अपार ॥
हुई सूर सुरत मेरी पामरिया ॥जब ओढ़ी0
सुमिरन भजन न ध्यान में, मन चंचल ठहराये ।
फिर तू बतादे बाबले, कैसे आनन्द पाये।
करनी करो लो गुरु शरनी ॥
यह समझ गुरु के संग में जाय कर, सीख शब्द अभ्यास ।
आप ही प्रगटे हिये में, उज्जल विमल प्रकाश !
इस विधि भव सागर से तरनी ॥
यह समझ बिन गुर ज्ञान न भक्ति है, विन गुरु नहीं परतीत ।
बिन गुरु भरमत क्यों फिरे, यह नहीं अच्छी रीत ।
अब आओ राधास्वामी की चरनी ॥
यह समझ
[17-484 ] सीखो नित प्रेम का रंग ढंग, यह समझलो गुरु है अंग संग टेका।
धीरज समता में रहे, शान्ति रहे भरपूर ।
घट में उगे अनेक विधि, ज्ञान के चन्द्र और सूर ।
बाढ़े प्रतीति और उमंग ॥सीखो नित
नद नाले बह वह बहे, फूटी अटूटी धार ।
निर्मल होगये आप ही, मैल अशुद्धि टार ।
मिले आकर जब वह संग गंग ॥सीखो नित
आँखें ठहरी रूप में, लगे जो सच्चा ध्यान ।
अनहद धुन प्रगटे विमल, उसी ओर रहे कान ।
घट में लगे बजने मोर चंग ॥सीखो नित
सहस कमल के मध्य में, श्याम कंज भ्रमध्य ।
चित अपनी बैठक करें, फिर नर क्यों हो बद्ध ।
निरवान की शोभा दे तरंग ॥सीखो नित
राधास्वामी आदि गुरु, सदा करे कल्यान !
आप ही आप मिले सकल, भक्ति मुक्ति सतज्ञान।
हो मस्त जो पिये प्रतीति भंग !
[18-485 ] तुम्हें चिंता नहीं है क्या मेरी, जो दया में ऐसी हुई देरी ॥टेक।।
दिन को सुख आनन्द नहीं, नींद न आवे रात ।
दबा हृदय छाती फटे, कैसे कहूँ कुछ बात ।
चहुँ ओर से बिपता ने लिया घेरी ॥
तुम्हें रात गई दिन भी गये, बीते बरस और मास ।
पिया निर्दई न दया करे, किसकी राखू आस ।
मेरे पांव पड़ी दुख की बेड़ी ॥
तुम्हें आँखों से आंसू बहे, जैसे मेघ की धार ।
तड़प तड़प तड़पी बहुत, तड़प का वार न पार ।
कोई मुझसा दुखी नहीं जग हेरी ॥
तुम्हें तड़पे जल से निकल कर, जैसे निर्जल मीन ।
तैसे ही गति है मेरी, होगई दीन अधीन ।
हो विकल करूँ हेरा फेरी ।।
तुम्हें गीली लकड़ी आग में, पड़ी सदा धुदवाय ।
जली बरी जल बर मरी, बचन का कौन उपाय ।
हुई राख की भारी मैं ढेरी ॥
तुम्हें राधास्वामी परम हित, दया दृष्टि से देख ।
मेटो दुखदाई दशा, कटे करम का लेख ।
गुरु दर की अब तो बनी चेरी ॥तुम्हें
[19-486 ] तुमने सतसंग से क्या पाया, नहीं समझ में सार तत्व आया ॥टेका।
सुमिरन ध्यान भजन का, प्रगटा नहीं प्रभाव ।
फिर क्या लाभ भया तुम्हें, हाथ पड़ा नहीं दाव ।
यूँ ही भरमे और भरमाया ॥तुमने
सहसकमल भ्रमध्य की, समझ न आई बात ।
त्रिकुटी पद परखा नहीं, मन का मचा उत्पात ।
कहाँ सुन्न समाध में लव लाया ॥
तुमने शब्दार्थ के ज्ञान की, नहीं पाई कुछ गम ।
समय अमोलक खोगया, नहीं दम है नहीं शम ।
क्या हुआ जो शब्द भजन गाया ॥
तुमने0 आसन मारे क्या हुआ, नहीं समाहित चित ।
तुमने गुरु के संग में, किया न अपना हित ।
माया और काल ने अटकाया ॥
तुमने चेत चेत अब चेत ले, चेत के करले काम ।
सोच सोच कुछ सोच मन, सोच के जप गुरुनाम ।
राधास्वामी ने सब विधि समझाया ॥तुमने
[20-487 ] जब ओढ़ी सत की कामरिया, सुनी भँवर सोहंगम बाँसुरिया ॥टेक॥
सोहम् सोहम् धुन उठी, गूज रही चहुँ ओर ।
बंसी की धुन मधुर सुन, मगन हुआ मन मोर ।
सुरत नाहीं रही गांवरिया । जब0
जब माया काल की लख दशा, अब न पड़ अज्ञान।
सुन बंसी की तान को, सत के चलू मैदान ।
सतगुरु संग फिरे मेरी भाँवरिया ॥जब0
आँख खुली दर्शन मिला, चमका सत का नूर ।
निकट हुई गुरुदेव से, अब तो रही न दूर ।
दुविधा की भागी चामरिया ॥जब0
योग ज्ञान संजोग से, प्रगट भये गुरुदेव ।
चरन कमल चित जोड़कर, करुं निरंतर सेव ।
मिला मुझको मेरा साँवरिया ॥जब0
राधास्वामी भज सदा, मेटा मन का विकार ।
जहाँ देखू गुरुदेव हैं, महिमा अगम अपार ॥
हुई सूर सुरत मेरी पामरिया ॥जब ओढ़ी0
[ 21-488] सतगुरु की दया करे रखवारी, नहीं अब होता मैं संसारी ॥टेक।।
कमल नीर में ज्यों रहे, मैं बिचकै संसार ।
दुख सुख कुछ व्यापे नहीं, गुर के चरन अधार ।
गुर दरस की आसा चित धारी ।। सत गुरु की0
घर में रहकर भक्ति करू , नहीं विवेक विचार ।
गृह त्याग सब भर्म है, मन को रखू सँभार ।
उपदेश दिया गुरु हितकारी ॥सत गुरु की0
बाहर भीतर एक रस, व्याप रहा गुरुज्ञान ।
आनन्द सुख का जीवना, इसी में है कल्यान ।
मेरी दशा रहे सब से न्यारी ॥सत गुरु की0
सत्त नाम को सुमिर नित, बुद्धि मन ठराय ।
परख ले महिमा अगम की,नहीं माया भरमाय ।।
नहीं चिन्ता सतावेगी भारी ॥सत गुरु की0
राधास्वामी दीन हित, सच्चे दीन दयाल ।
रक्षक मेरे होगये, अब क्यों व्यापे काल |
__राधास्वामी चरन की बलिहारी । सत गुरु की0
[ 22-489 ] मुझे दीन दयाल शरन दीजे, गहुँ ओट चरन की शरन दीजे ॥टेक।।
तुम्हें न भूलू रात दिन, भूलू अपनी देह ।
नाम में लवलागी रहे, त्यागे जग का नेह ।।
करे सुमिरन ध्यान वह मन दीजे ॥मुझे दीन0
बल शक्ति से हीन हूँ, चित का महा मलीन ।
दया कीजिये दीन पर, आपके हैं आधीन ॥
सुधरे सँभले वह यतन दीजे ॥
आज तुम्हारी कृपा से, जग से हुआ निरास ।
नहीं भरोसा किसी का, आपका हुआ विश्वास ॥
भक्ति का दिव्य रतन दीजे ॥मुझे दीन0
आरत की यह बीनती, सुनिये दयाल कृपाल ।
संयम भरम को मेट कर, तन छिन करो निहाल ॥
निर्धन को प्रेम का धन दीजे ॥मुझे दीन0
एक तुम्हारी चाह हो, और न कोई चाह ।
सब विधि हो रहूँ आपका, सहित उमंग उत्साह ॥
मन सधे वही साधन दीजे ॥मुझे दीन0
मुझे दीन0 दृष्टि में आओ मेरे, दर्शन घट में नित ।
यही है सच्ची लालसा, इसी से मेरा हित ॥
दृढ़ प्रेम हो ऐसा बचन दीजे ॥मुझे दीन0
मुझे दीन0 राधास्वामी जगत के, तुम हो पितु और मात ।
बने काम एक दृष्टि से, मिटे सकल उत्पात ॥
सत पद का सत जीवन दीजे ।
[23-490 ] मेरे घट में गुरु अविनासी बसे, मन बुद्धि भक्ति के रस से रसे ॥टेक।।
बाग में फूल गुलाब का, खिल कर शोभा दे।
सिंध में मोती सीप हो, जो जिसका होले ॥
सब अपने अपने भाव लसे ॥मेरे घट में
बन में नाचे मोरगन, फूले फले बन राय ।
जिसकी जैसी गति रुचे, गति मति से हर्षाय ॥
प्राकृत दशा से सकल हँसे । मेरे घट में
चाह नहीं संसार की, भक्ति प्रेम की चाह ।
राधास्वामी की दया, गुरु के हाथ निबाह ॥
बरसा प्रेम की घट बरसे । मैं घट में
[24-491 ] तुम भूले भूले भूल गये, मन ममता में पड़ कर फूल गये ।।टेक।।
मन मत में गुरुमत रहे, मन मत है अहंकार ।
अहम् भाव हृदय बसा, अपना किया अपकार ।
माया के हिन्डोले भूल गये ॥तुम भूले0
दो दिन का रहना यहाँ, गुरु से करलो हेत।
भव दारुन से तरन का, यही सुगम है सेत ।।
यहाँ से प्रतिकूल अनुकूल गये । तुम भूले0
भूल भुलैय्याँ जगत है, भूले बहु विधि भूल ।
अन्त काल सिर सहेंगे, दुखदाई त्रिसूल ॥
लघु भूल गये बहु भूल गये । तुम भूले0
भव सागर उमड़े सदा, उठे लहर अपार ।
गुरु के साथ में मानुवा, सहज उतरजा पार ॥
नहीं जो समझे जड़ मूल गये ॥तुम भूले0
राधास्वामी दीन हित, दीन दयाल महान ।
कर उनका सतसंग नित, आनन्द का हो भान ।।
सतसंग से भव के मूल गये ।। तुम भूले0
[ 25-492 ] मैं आई सतगुरु की शरनी, नर जनम सुफल भया अब सजनी ॥टेक।।
नहीं सुख बाद विवाद में, पक्षपात सुख नाँहिं ।
द्वष ईर्षा सुख कहाँ, सुख भक्ति के माँहि ॥
तज सबको करूं प्रेम करनी ॥मैं आई0
ग्रंथी ग्रंथन की खुली, पच पच मरी पढ़ ग्रन्थ ।
गुरु मिले शीतल भई, लख सत पद का पन्थ ॥
नहीं भूल करूँ कथनी बदनी ॥मैं आई0
भाग जगा सोया मेरा, दया करी गुरु देव ।
सब की आसा त्याग कर, मेटा मन का मेव ।।
क्यों मृत्यु लोक में नित मरनी ॥मैं आई0
अवश्यमेव भोक्तव्यम्,, कृतकर्म शुभाशुभम् ।
गुरु चरणम् नमस्तव्यम्, सद्गुरुम सब परम् ॥
जैसी करनी वैसी भरनी ॥मैं आई0
विज्ञानं सद्प्रसादेना, गुरु बिन शब्द न कथ्यते ।
जपस्तपो ब्रतं तीर्थ, बिन गुरुपद न लभ्यते ॥
राधास्वामी नाम सदा भजनी ॥मैं आई0
[ 29-493 ] पहुँचादो प्रेम नगरियाजी, मैं तो भूल गई हूँ डगरियाजी ॥टेका।
चलते चलते थक गई, और न सूझे छोर ।
कहाँ को चली हूँ सुध नहीं, बहका मन चित चोर ।।
रस्ते में पाऊँ रगरिया जी ॥पहुँचादो
चलते चलते दिन गया, साँझ आई और रात ।
कहाँ ठहरूँ जाऊँ कहाँ, समझ न आई बात ॥
हो सके तो करदो उजरियाजी ॥पहुँचादो
मैं तुमको भूली नहीं, भूली अपनी देह ।
ऐसी भूली सुध नहीं, कहाँ ग्राम कहाँ गेह ।।
तुम कैसे मुझको बिसरियाजी ॥पहुँचादो
नाम तुम्हारा हॉट पर, मन में तुम्हारा ध्यान ।
देह पड़ी है पन्थ में, निकट तुम्हारे प्रान ॥
क्या कहूँ जो मुझ पे, गुजरिया जी ॥पहुँचादो
भूखी प्रेम के स्वाद की, प्यासी प्रेम के नीर ।
प्रेम ज्ञान गुरु दीजिये, जो तुम धार गम्भीर ।
भरो घट की प्रेम गगरिया जी ॥पहुँचादो
पन्थ में नंगे पांव हूँ, दुख से रही घबराय ।
काँटा लगा बिरह का, तड़प तड़प अकुलाय ॥
क्यों लेते नहीं हो खबरिया जी ॥पहुँचादो
राधास्वामी इष्ट पद, धुर पद सर्वाधार ।
कब पहुँचूगी चरन में, भव के दुख सुख टार ।।
भोगूगी सत की सेजरिया जी ॥पहुँचादो
[ 27-494 ] नहीं कर्मी हुई नहीं ज्ञानी हुई, मैं अपने गुरु की अभिमानी हुई ।।टेक।।
गुरु गम निगमागम मता, है रहस्य का भेद ।
जो कोई जाने भेद यह, सहे न भव का खेद ।।।
गुरु मिले सहज निर्वानी हुई ॥
नहीं कर्मी निश्चल जप तप यम नियम, संयम ज्ञान विचार ।
जब लग गुरु का संग नहीं, कठिन जीव उद्धार ॥
गुरु भक्ति विवेक की खानी हुई ॥
नहीं कर्मी गुरु मूरति हृदय बसी, ध्यान धारना पाय ।
समता आई चित्त में, यह समाधि समुदाय ।।
कर योग यतन गुरु ध्यानी हुई ।।
नहीं कर्मी समता गुरु के रूप में, लख लख गुरु का रूप ।
समदर्शी मैं होगई, तज चंचलता कूप ।
गुरु प्रेमी बनी मस्तानी हुई ॥
नहीं कर्मी गुरु अखंड है सिंधगति, जीव है बुन्द समान ।
राधास्वामी की दया, लिया रहस्य पहिचान ॥
पड़ सागर पानी पानी हुई ॥नहीं कर्मी
[ 28-495 ] निज दरस दिखादो अपना पिया, मेरा तरस रहा है बहुत जिया टेक॥
आँखों में भाई पड़ी, राह निहार निहार ।
जिव्हा में छाले पड़े, नाम पुकार पुकार ।
किसने कभी जप तप ऐसा किया ॥
निज दरस सहस्त्र नेत्र देखू तुम्हें, सहस कमल भ्रमध्य ।
सहस जोत निरखत रहूँ, दोऊ आँख कर बंद ।
दर्शन बिन नित अकुलाय हिया ॥
निज दरस त्रिकुटी चढ़ छवि को लखू, लाल का अपने रूप ।
अँखियन में लाली खुबे, ओम ओम कहूँ भूप ।
लाली जोती का बालू घट में दिया ॥
निज दरस सुन्न सरोवर स्नान कर, चन्द्रकार मुख लेख ।
तन मन बुद्धि चित खो रहे, रूप तुम्हारा देख ।
तब मानू गी दरस का चैन लिया ॥
निज दरस अँखियाँ एकटक घूम रहीं, अंशा अंशी समान ।
भंवर गुफा सोहंगमा, सोहंग सोहंग भान ।
अब दरस अमी रस घोल लिया ॥
निज दरस देख लिया भ्रान्ती गई, सत सरूप तुम पीव ।
भर्म मिटा दो एक का, नहीं ब्रह्म नहीं जीव ।
राधास्वामी ने मेरा उपकार किया ॥
निज दरस अलख अगम अद्वत तुम, अकह अपार अनाम ।
अकथ कथा विचार कर, चुप हुई सुरत सुजान ।
राधास्वामी हिये का टाँका सिया ॥निज दरस
[29-496 ] कहीं है यहां सत की बजरिया जी, मुझे लेनी है प्रेम चदरिया जी ॥टेका।
मोल तोल नहीं करूंगी, प्रेम वस्तु अनमोल । ॥ ॥
सीस काट दूंगी अभी, सुनकर प्रेम का बोल ।
__ मैं ओढ़ के बने गी गुजरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने भेद ।
सौदा करे जो प्रेम का, सहज मिटे भव खेद ।
माया की पड़े न नजरिया जी ॥कहीं है।
एक प्रेम की चाह है, और न दूजी चाह ।
प्रेम रतन जिसको मिले, जग में शाहन्शाह ।
कोई प्रेम के पन्थ न परियो जो ॥कहीं है।
बाढ़े पाकर भक्त जल, जैसे कमल की नाल ।
घटे न तिलभर वह कभी, प्रेम की ऐसी चाल ।
जिसे प्रेम मिले नहीं मरिया जी ॥कहीं है।
प्रेमी हूँढ़त मैं फिरू, प्रेमी मिले न कोय ।
प्रेमी से प्रेमी मिले, प्रीतम प्रगटे सोय ।
जप तप में आयु गुजरिया जी ॥
कहीं है घटे बढ़े रोये हँसे, उसे न कहना प्रेम ।
प्रेमभाव मन में बसा, नहीं तप संयम नेम ।
बसे छिन में प्रेम नगरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम पियाला जो पिये, काटे अपना सीस ।
तब प्रीतम का स्वाद ले, निकट हो विश्वा बीस ।
नहीं किसी को उसकी खबरिया जी ॥
कहीं है आपा अपना लख पड़े, घट जब प्रेम बसाय ।
राता माता नाम मद, नहीं कहीं आवे जाय ।
क्यों भरम के कूप में गिरिया जी ।। कहीं है।
एक रस प्रेम का स्वाद है, पीते करे निहाल ।
इसका पीना कठिन है, माँगे सीस कलाल।
नहीं माया की वह कलवरिया जी ॥कहीं है।
पन्थ सम्प्रदा बहुत हैं, मत और धर्म अनेक ।
प्रेम का रस्ता किधर है, जो नित परखे एक ।
बन्दू चलकर प्रेम नगरिया जी॥कहीं है।
वाद विवाद में प्रेम कहां, पक्षपात नहीं होय ।
प्रेम दिवानी हो रहूँ, मन की दुविधा खोय ।
तन मन धन को बिसरिया जी ॥
कहीं है पढ़ पढ़ कर मर मर गये, लाखन पोथी ग्रन्थ ।
लख नहीं पाया एक ने, प्रेम का सच्चा पन्थ ।
द्वष अग्नि में जर जर मरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम का मारा नहीं जिये, कितना करो उपाय ।
जनम मरन के टाट को, उलट दिया सिमटाय ।
किसे कभी लगी प्रेम कटरिया जी ॥कहीं है।
काम क्रोध मद लोभ सब, छिन में जावे भाग ।
भसम करे माटी करे, प्रेम प्रचन्ड की आग ।
दुविधा दुचिता सब टरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम प्रेम नित प्रेम हो, प्रेम की बन्धी टेक ।
प्रेम महा बलवान है, लखे न एक अनेक ।
इस प्रेम से कोई न लरिया जी ॥कहीं है।
सुरत शब्द में प्रेम है, शब्द सुरत में प्रम।
अन्धकार मेटे सकल, घट में जरे सब टेम ।
सब विद्या अविद्या विसरिया जी ॥
कहीं है ढूँढ़त हूँढ़त थक गई, मिला न प्रेम का घाट ।
घर बाहर की ना रही, हो गई बारह बाट ।
मिला प्रेमी पुरुष न तिरिया जी ॥कहीं है।
आई हूँ जाऊँ नहीं, रगर प्रेम की धार ।
जो होना हो हो रहे, मरूंगी तीन को मार ।
नहिं छोडूगी अब तो रगरिया जी ॥कहीं है।
प्रेम चदरिया ओढ़ कर, अब तो चली दरबार ।
सुरत सहेली सुहावनी, पायेगी दीदार ।
राधास्वामी नितनाम सुमिरया जी ॥कहीं है।
[ 30-497 ] गुरु का नहीं सीखा रंग ढंग, माया ने कर दिया चित को भंग ।।टेका
क्या करना था क्या किया, करता धरता बन ।
कहाँ से कहाँ को ले गया, बहका कर यह मन ।
सूझी उसे देखो क्या तरंग ॥
माया ने शुक आया गुरुदेव हो, सुनो परीक्षित बात ।
करले अपने काम को, नहीं यम करे उत्पात ॥
दिन सात में काटे फिर भुजंग ॥
माया ने0 पड़े परीक्षा कठिन है, पूरा उतरे जो।
वही परीक्षित शिष्य है, शुक का गुरु मुख सो॥
मन में रहे नित भक्ति उमंग ॥
माया ने समय मिला अवसर मिला, खोया समय अमोल ।
देख देख अचरज महा, मुखनहीं आवे बोल ।।
इस दशा को लख हुआ हृदय दंग ॥
माया ने भरमा भरमा भटक कर, जनम को दिया गवाय ।
अब पछताये क्या बने, हाथ न कुछ भी आय ॥
क्यों पीली भरम की घोल भंग ॥
माया ने0 चलना है दस दिवस में, रहना नहीं है मीत ।
तजो न माया उलझ कर, भक्ति भाव की रीत ॥
गुरु देव को करलो अंग संग ॥माया ने0
दरस परस मंजन करो; पियो प्रेम का नीर ।
राधास्वामी की दया, मन के बनो गम्भीर ।।
देखो देखो है बहती प्रेम गंग ॥माया ने
[31-498 ] घट में खुली प्रेम की क्यारी जी, निरखू नित छबि फुलवारी जी ॥टेक॥
श्रद्धा फूल गुलाब का, जूही दया का फूल ।
देख देख आनन्द लहूँ, तन मन की सुध भूल ॥
यह हृदय हुआ सुखकारी जी ॥
घट में खुली0 मन लोभी भंवरा बना, लोभा देख बिलास ।
रात दिवस हर्षत उड़े; त्याग जगत की आस ॥
यह दशा है अति ही भारी जी ॥
घट में खुली0 फली फली मैं फिरू, सदा मगन मन माँहि ।
अब किस की चिंता करू, चिंता कोई नाहि ॥
भक्ति लगी चित को प्यारी जी ॥
घट में खुली बास सुवास को पाल कर, अब क्यों रहूँ उदास ।
बसी बसी बस बस गई, बसी प्रेम की बास ॥
नहीं फिरूंगी मारी मारी जी ॥
घट में खुली0 सत चित आनन्द बाटिका, अन्तर शोभा दे।
नित सुख और मंगल लहूँ, प्रेम का सौदा ले ।
करूँ पल पल में रखवारी जी ॥
घट में खुली धन्य भाग सतगुरु मिले, दिया प्रेम का दान ।
दान पाय धनवान हूँ, खुली प्रीत की खान ।।
प्रगटी उभरी उजियारी जी ॥
घट में खुली राधास्वामी की दया, पाई बिमल बहार ।
सीचू क्यारी को सदा, दुर्मति दुर्गति टार ॥
बनवारी की हूँ दरवारी जी ॥घट में खुली0
[ 32-499 ] जग बहती है भक्ति की देखो गंग, तुम निर्मल करलो अपना अंग ।।टेक।।
दरस परस मंजन करो, पियो प्रेम का नीर ।
मेटो दुख प्रय ताप को, ठंडा करो शरीर ।
भूलो नहीं करलो सत का संग ॥जग बहती है।
आँखें हर्षी देख कर, चित बाढ़े अनुराग ।
सुमिरन ध्यान में मन लगे, दुचिताई को त्याग ।
उठे प्रेम प्रतीत की नित तरंग ।। जग बहती है।
गंगा के तट आय कर, बिन नहाये नहीं जाओ।
भव सागर के तरन का, यही है एक उपाओ।
रहे हिया जिया में सच्ची उमंग ॥जग बहती है।
नर शरीर के मल हैं, काम क्रोध अभिमान ।
छूटेंगे जब करोगे, गुरु संग गंगा स्नान ।
आलस का न आने पाये ढंग ॥
जग बहती है ढारस श्रद्धा भाव की, रहे हिये में छाय ।
राधास्वामी की दया, भव दारुण न सताय ॥
यह समझलो गुरु है अंग संग ॥जग बहती है
[33-500 ] मेरे घट की क्यारी हरी रहे, क्यों हरी अकेली भरी रहे ॥टेका।
खिले गुलाब प्रतीत का, शोभा क्यारी दे।
फले सुगंधी प्रेम की, सब कोई आनन्द ले ।
अँखियों को दृश्य की तरी रहे ॥
मेरे घट0 चंपा दया का फल दे, फूल दया के फूल ।
भरम का भंवरा सन्निकट, कभी न आवे भूल ॥
फूलों की निरंतर झरी रहे ॥मेरे घट0
सेवति केतकी मोतिया, शान्ती जूही कुन्द ।
एक रूप भासें सदा, मेट कुरंगी द्वन्द ।।
सम दृष्टि चमेली खरी रहे ॥
मेरे घट0 भक्ति अनार में फूल लगे, फूटी लाली नित ।
बिगसें कमल उमंग के, देख के उमगे चित ॥
माया की बेली मरी रहे ।
मेरे घटक सुरत मालिनी गूधकर, लाये भाव का हार ।
हरषे आनन्द सुख लहे, राधास्वामी गले डार ॥
दुष्कर्म कटेली जरी रहे ॥मेरे घट0
[34-501 ] अब दरस की चाह उठी भारी, मुझे दरस दे हरो विपता सारी ।।टेका।
दृष्टि जमाऊँ रूप में, रूप में चित ठैराय ।
करो दया से मेरी रखवारी ।
अब दरस आँखों में मेरे बसो, देखू तुमको नित ।
इसी दरस के आसरे, सच्चा मेरा हित ॥
हो दुखियों के तुम हितकारी ॥
अब दरस एक टक देखू आँख भर, पलक न कभी झपाय !
जीवन मेरा सुफल हो, सत गुरु करो सहाय ॥
सहज में जाऊँ पारी || अब दरस चित चकोर चन्दा बने, चन्द्र मेरे गुरु देव ।
देवी देव को त्याग कर, करूं तुम्हारी सेव ।।
लखू अन्तर में सुरत प्यारी ।
अब दरस खुली आँख देखू तुम्हें, घट की आँखें खोल ।
राधास्वामी दीन हित, चित को करो अडोल ।।
चरन शरन की बलिहारी । अब दरस
[35-502 ] मुझे तार दो मेरी है बारी, तुम हो गुरु सच्चे हितकारी ॥टेक॥
त्राहि त्राहि चरनों पड़ी, व्याकुल जिया घबराय ।
दीन दुखी की ओर लख, सतगुरु बनो सहाय ।
काटो जग का संकट भारी ॥
मुझे तार भव समुद्र का पार नहीं, उठे लहर अपार ।
साथी संगी कोई नहीं, नाव पड़ी मझधार ।
अब तक मैं फिरी मारी मारी ॥
मुझे तार किसी का नहीं है आसरा, नहीं कोई आधार ।
तुम बिन कोई सूझे नहीं, करे जो मेरी संभार ।
गुरु तुम हो सच्चे हितकारी ॥
मुझे तार सहजो तरी दया तरी, मीरा तर गई नाथ ।
शबरी तर गई भीलनी, पकड़ तुम्हारा हाथ ।
मेरी ओर करो दृष्टि न्यारी ।
मुझे तार राधास्वामी दीन हित, निहकामी निज देव ।
संकट काटो दुख हरो, मेटो मन का भेव ।
मैं जाऊँ सहज भव जल पारी ॥मुझे तार
[ 39-503 ] जब गुरु की बंधी मन में आसा, अज्ञान भरम घट का नासा ॥टेक॥
अखंड मंडलाकारम्, व्याप्तम् एन चराचरम् ।
अद्भुतम् एकम् केवलम्, गुरु चरणम् नित्यं बन्दनम् ।
नहीं जाऊँ सुमेरु और कैलासा ॥
जब गुरु0 सत्यम् चित्तम् आनन्दम्, अकथ अनीह अगोचरम् ।
अधिष्ठानम् आधारम्, कूटस्थ नमाम्यहम् ।
घट लख पड़े ज्ञान का परकासा ॥
जब गुरु0 माया रहितम् मंगलम्, अमलम् निर्मलम् सदा ।
नमो नमो पद पंकजम्, सेरितम् पद सर्वदा ।
गुरु चरन में मिला मुझे बासा ॥
जब गुरु0 विराटम् च हिरण्यगर्भम्, सबलम् शुद्धम् दुर्लभम् ।
ओंकारम् च सोहंगम्, सत्यम् सत्यम् वराननम् ।
राधास्वामी ने काटा यम फाँसा ॥जब गुरु0
[37-504 ] सुरत चढ़ गई आज अटरिया जी, खोली भ्र मध्य कुठरिया जी ॥टेक।।
सहसकमलदल ज्योति लख, ज्योति निरंजन बास ।
पचरंगी फुलवारी खिली, फैली बास सुवास ।
धुन घंटा शंख उचरिया जी ॥
सुरत0 त्रिकुटी गढ़ लंका चढ़ी, मेघनाद सुन कान ।
लाली ऊषा मध्य में, लाल सूर का भान ।
धुन ओ3म् मृदंग पकड़िया जी ॥
सुरत0 सुन्न सिखर कैलाश में, चन्द्र का दरसन पाय ।
आगे बढ़ी उमंग से, सारंगी धुन गाय ।
तिस परे थी घोर अंधिरिया जी ॥
सुरत गुरु बल अंधियारी मिटी, किया मानसर स्नान ।
चार गुप्त धुन मधुर बहु, पड़ी सुरत के कान ।
नहीं जाये वह लीला बिसरिया जी ॥
सुरत भँवर गुफा आई महल, सोहंगम् दरबार ।
महाकाल का निरखकर, सहज किया दीदार ।
यहाँ बाजी सुरीली बाँसुरिया जी ॥
सुरत0 घूमी फिरी विचार कर, पाया अद्भुत भेद ।
सोहं सोहं कह बढ़ चली, मेट करम का भेद ।
चौड़ी थी भवर झझरिया जी ॥
सुरत0 पहुँची सत मैदान में, चौड़ा उसका घाट ।
सत सत सत बानी प्रगट, सत सत सत का ठाठ ।
यहाँ बीन मधुर सुन तरिया जी ॥
सुरत0 अलख अगम का दरस कर, गुप्त भेद लिया चीन्ह ।
सुरत सखी हरषी बहुत, अब नहीं दीन अधीन ।
राधास्वामी चरन में परिया जी ॥
सुरत0 धन्य धन्य तुम धन्य हो, सतगुरु सर्वाधार ।
तुम्हरी महिमा दया का, कहीं नहीं वारापार ।
मिली ओढ़ के शब्द चुनरिया जी ॥सुरत
[38-505 ] पट अपट प्रेम की घटा छाई, भक्ति गुरु रिमझिम झरी लाई ॥टेक॥
तीन ताप का दुख मिटा, प्रीति लता रही छाय ।
ज्ञान कर्म जप तप क्रिया, के भोगे समुदाय ।
सुरत शब्द की वर्षा जब आई ॥
घट0 शीतल तन में आत्मा, प्रेम की ठंडक पाय ।
द्वेष ईर्षा अग्नि को, छिन में दिया बुझाय ।
मस्ती से फिरे सुरत मगनाई ॥
घट0 इन्द्री देह के भर गये, नद नाले और कूप ।
धार जो फूटी प्रेम की, होगई सिंधु स्वरूप ।
तब जीव को ब्रह्म दशा भाई ॥
वट सिंधु बुन्द दोऊ एक हैं, एक हैं एक समान ।
सिंधु में बुन्द अनेक हैं, बुन्द में सिंधु रहान ।
नहीं बुन्द सिंधु रहे बिलगाई ।
घट बुन्द समाना सिंधु में, यह जाने सब कोय ।
सिंधु बुन्द में है छिपा, नजर न आवे सोय ।
जब गुरु मिले ऐसी समझ पाई ।
घट0 बुन्द का भाव कहाँ प्रगट, बुन्द ही सिंधु रहाय ।
सिंधु में बुन्द की खान है, बुन्द में सिंधु समाय ।
बिरले जन को प्रतीत आई ।। घट
सिंधु बुन्द तू क्या करे, अनसमझे की बात ।
बुन्द अधार यह सिंधु है, देख के कर साक्षात ।
है बुन्द से सिंधु की प्रभुताई ॥
घट जीव ब्रह्म में है बसा, जब घट आवे प्रेम ।
ब्रह्म जीव में कहाँ रहे, क्या है उसका नेम ।
जा गुरु की ले अब शरनाई ॥
घट0 बुन्द में बुन्द और सिंधु है, सिंधु बुन्द है सिंधु ।
सोच समझ मन में भला, कहाँ दोनों की संधि ।
घट बैठ परख यह सच्चाई ॥
घट0 राधास्वामी गुरु मिले, भेद दिया भरपूर ।
सुरत शब्द शब्द सुरत है, भरम भया तब चूर ।
हरखत मन गुरु महिमा गाई ॥घट0
बिनती
[ 506 ] गुरु के चरन सरोज में, कोटि कोटि दंडोत ।
गुरु की दया अपार से, छूटे भव के खोट ।
तीन ताप के भवर में, बढ़े बारम्बार ।
गुरु समरथ ने दया की, बू ढ़त लिया निकार ॥
गुरु समान दाता नहीं, गुरु समान नहीं देव ।
गुरु की पल पल बंदना, निस दिन कीजे सेव ॥
गुरु आज्ञा में जायकर, तन मन सीस झुकाय ।
काल करम से बचन का, और न कोई उपाय ॥
गुरु से कुछ माँगू नहीं, उनसे माँगू यह ।
राधास्वामी दया करो, कर चरनन की खंह ॥
[ 507 ] दीन हित करुना निधान, कपाल सुख सागर महा ।
जान अपना दास दीजे, भक्ति प्रेम की सम्पदा ॥
आया शरणागत तुम्हारे, त्याग सब का आसरा ।
एक तुम्हारी आस है प्रभु, कीजिये मुझ पर दया ।
बुन्द केहि विधि सिंधु तजकर, पाये सुख अरु शांती ।
ज्ञान घन के रूप तुम हो, मेट दो सब भ्रांती ।।
है तुम्हारी सब में सत्ता, सत्त मुझको कीजिये ।
काल माया से छुड़ाकर, मुक्ति का पद दीजिये ।।
राधास्वामी सत्तगुरु, करतार गुन निगुन हो तुम ।
नाम सच्चा दान दीजे, सत्यनाम की धुन हो तुम ॥ग्यारहवीं धुन
[ 1-508 ] अपनी शरण में लेलो, मेरे कृपाल दाता।
चरनों की भक्ति देदो, मेरे दयाल दाता ॥1॥
दुख कष्ट के झमेले, दिन रात मैंने भेले ।
पापड़ इन्ही के बेले, मेरे दयाल दाता ॥2॥
बोझा है भारी सिर पर, फिरता हूँ मारा दर दर ।
है एक जैसे बन घर, मेरे दयाल दाता ॥3॥
भक्ति न ज्ञान पाया, भरमा भरम में आया।
अज्ञान घट में छाया, मेरे दयाल दाता ॥4॥
संकट में मैं फंसा हूँ, दुख कष्ट में बसा हूँ।
दलदल में मैं धंसा हूँ, मेरे दयाल दाता ॥5॥
दुखिया की लाज रखलो, चरनों की छाँह देदो ।
दृष्टि मेहर की करदो, मेरे दयाल दाता ॥9॥
राधास्वामी दीन हितकर, अपनी शरण में रखकर ।
निज धाम दो दया कर, मेरे दयाल दाता ॥7॥
[ 2-509 ] तुम बिन नहीं है कोई, मेरे दयाल दाता ।
रखना कृपा की दृष्टि, मुझ पर कृपाल दाता ॥1॥
जब से जगत में आया, दुख में बिताये दिन को।
शरनाई ली चरन की, अब कर निहाल दाता ॥2॥
माया का जाल भारी, चहुँ ओर में तना है।
हाथों को अपने फैला, निस दिन संभाल दाता ॥3॥
अपराध क्या किये थे, ऐसा जो जन्म पाया।
गहरी है भव की खाई, उससे निकाल दाता ॥4॥
रख लाज मेरी अब तू , तेरा ही आसरा है।
मुझको न अब सताये, बेपीर काल दाता ॥1॥
संकट में मैं घिरा हूँ, बुद्धि नहीं ठिकाने ।
आकर बचाले मुझको, तू बाल बाल दाता ॥9॥
दे पद कमल की छाया, तुझसे लगी रहे लव ।।
राधास्वामी तुम अकेले, हो प्रतिपाल दाता ॥7॥
[3-510 ] देखा है रूप बाहर, अंतर में अब दिखादो ।
बानी सुनी जो मुख से, अंतर में अब सुनादो ॥1॥
बाहर दिया सहारा, अंतर की अब है बारी ।
दोनों की करदो समता, ऐसी विधि मिलाहो ॥2॥
व्यापक हो सब जगह हो, सब वस्तु में मिले हो ।
आपे में मेरे प्रगटो, परदा अभी उठादो ॥3॥
तुम हो तुम्हारे सत का, सत्ता ही यह जगत है।
फिर भेद क्यों है स्वामी, मेरा भरम मिटादो ॥4॥
अज्ञान शान में क्यों, क्यों ज्योति में अंधेरा।
यह पूछता हूँ तुम से, अब यह मरम जतादो ॥॥
तुम हो तो कौन मैं हूँ, मैं तू का क्यों है झगड़ा।
जी चाहता है खुलकर, अंधेरा यह मिटादो ॥9॥
गुरु राधास्वामी प्यारे, आँखों के मेरे तारे ।
सेवक हूँ मैं तुम्हारा, चित से मुझे चितादो ॥7॥
[4-511 ] तुम कौन और क्या हो, अपना पता बतादो ।
क्या रूप नाम क्या है, कैसे हो यह जतादो ॥1॥
कहता है कोई निर्गुण, कोई सगुण बताता ।
मैं पूछता हूँ तुम से, तुम भेद यह सुनादो ॥2॥
सुनता हूँ नाम को नित, पर नाम रूप क्या है।
जब नाम है तो फिर अब, निज रूप को दिखादो ॥3॥
मन से मनन हो चिंतन, आँखों से पाऊँ दर्शन ।
बानी का मुख से श्रवण, ऐसी विधि मिलादो ॥4॥
जब हो तो आओ आगे, आँखों को खोल देखू ।
ऐसे न मानूंगा मैं, तुम आके अब मनादो ॥5॥
हट से यही प्रतिज्ञा, संकल्प दृढ़ है पूरा।।
बिनती यही है निसदिन, बिगड़ी को अब बनादो ॥9॥
गुरुदेव राधास्वामी, तुम से लगन लगी है।
तुमको न भूलू दाता, ऐसा मुझे चितादो ॥7॥
[ 5-512 ] लेता हूँ नाम तेरा, दाता दयाल है तू ।
कर अब संभाल मेरी, मेरा संभाल है तू ॥1॥
तेरी दया हुई जब, फिर काल का भरम क्यों।।
यह मैंने समझा मन से, सच्चा कृपाल है तू ॥2॥
संशय नहीं कि बहका, था जग की भ्रांती से।
व्यापक हृदय में स्वामी, अब बाल बाल है तू ॥3॥
दिन रात ध्यान सुमिरन, दिन रात का भजन है।
मेरा श्रवण मनन तू , और मेरी चाल है तू ॥
शा गुरु पूरे राधास्वामी, तुझसे लगन लगी है।
करदे निहाल मुझको, समझा निहाल है तू ॥5॥
[9-513 ] तेरी दया हो मुझपर, मेरे कपाल दाता।
रख कर शरण में अपने, करदे निहाल दाता ॥1॥
तेरी दया की दृष्टि, से पार जाऊँगा मैं ।
भव सिंधु में पड़ा हूँ, उससे निकाल दाता ॥2॥
लंपट हूँ मोह मद में, बुद्धि नहीं ठिकाने ।
फैला के हाथ अपना, मुझको संभाल दाता ॥3॥
बेपीर काल निस दिन, यू ही सता रहा है।
उससे बचालो मुझको, लू बाल बाल दाता ॥4॥
गुरु पूरे राधास्वामी, तेरा ही आसरा हैं।
चहुँ ओर में तना है, माया का जाल दाता ॥5॥
[7-514 ] आया तेरी शरण में, कर मेरी लाज प्यारे ।
तेरी दया से यूरा, हो मेरा काज प्यारे ॥1॥
भक्ति का आसरा हो, भक्ति दे अपनी मुझको ।
हित चित से मैं सजाऊँ, भक्ति का साज प्यारे ॥2॥
तुम में है सारी शक्ति, तुम में है योग युक्ति ।
दुख से दिला दे मुक्ति, तेरा है राज प्यारे ॥3॥
जब आगया शरन में, दुख दूर करदे मेरा।।
कल का भरोसा क्या है, कर काम आज प्यारे ॥4॥
गुरु दाता राधास्वामी, तेरा ही आसरा है।
आया शरण में तेरे, सब जग से भाज प्यारे ॥3॥
[8-515 ] सतगुरु फकत जगत में, दुख से छुड़ाने वाले।
भव सिंधु में जगत के, सब हैं डुबाने वाले ॥1॥
माता पिता तुम्हारे, तिरिया व सुत सखा रे।
स्वारथ से अपने सारे, नाता लगाने वाले ॥2॥
जितने सगे घनेरे, कहते हो जिनको मेरे ।
आखिर में कोई तेरे, नहीं काम आने वाले ॥3॥
यम की पड़ेंगी मारें, मुश्क जकड़ के ताने ।
कोई न उस ठिकाने, होंगे बचाने वाले ॥4॥
पाया मनुष्य तन को, करले पवित्र मन को ।
भूलो न देख धन को, दौलत कमाने वाले ॥5॥
राधास्वामी नाम सुमिरन, कर तुझको होगा दर्शन ।
कट जाय भव का बंधन, सतपद को जाने वाले ॥9॥
[9-516 ] ऐ शीलवन्त स्वामी, करदो मुझे सुशीला ।
व्यौहार में कुशल हो, मैं देखू उसकी लीला ॥1॥
है ज्ञान संग मेरे, रहता है तन में व्यापा।
मैं तुमसे पूछती हूँ, क्या मेरा है यह आपा ॥2॥
उत्तम है ज्ञान इसमें, संदेह कुछ नहीं अब ।
अनुभव बढ़े जो मन का, संशय रहित हूँ मैं तब ॥3॥
सत चित है रूप मेरा, सत देह ज्ञान मन है।
आनन्द आत्मा है, आनन्द की लगन है ॥4॥
आनन्द मेल से हो, सुलझा दो आके उलझन ।
गुत्थी यह मेरी सुलझे, सुन चैन पाऊँ ततछिन ॥
शा अज्ञान से भरम से, संशय से मैं दुखी हूँ।
ऐसी दया हो स्वामी, दुख दूर हो सुखी हूँ॥6॥
गुरु पूरे राधास्वामी, आई शरण तुम्हारे ।
रख लीजो लाज मेरी, मिनतो यही है प्यारे ॥7॥
[10-517 ] उसकी हो जुस्तजू क्या, जो अपने रूबरू है।
यह जस्तजू नहीं है, तोहीने जस्तजू है॥1॥
अंधे बने हैं आदि, आँखें नहीं हैं खुलतीं ।
क्या हूँढ़ते हैं उसको, जो अपने बद् है ॥2॥
दायें है अपने बायें, इसजा है और उसजा।
आँखें खुली तो देखा, वह अपने चारसू है ॥3॥
क्या खीलो खाल में है, क्या फरजी हाल में है।
जो है जबां पे बैठा, क्या उसकी गुफ्तगू है ॥4॥
दिलदार और दिलवर, दिलकश है दिलरुबा है।
खुरशीद रू अगर है, वह मेरा माहरू है ॥5॥
वह दिल में खुद है कायम, दिल घर है जिसका दायम ।
दिल को संभल के देखा, वह दिल में मूबमू है ॥9॥
राधास्वामी की मेहर से, कर शग्ल जिक्र सुल्तां ।
पहुँचेगा अपने मसकिन, जहां तेरी जुस्तजू है ॥7॥
बिनती
[ 518 ] सर्व समरथ साइयाँ, भव द्वन्द मेटनहार ।
अगुन सगुन अमोह अविचल, सकल जगदाधार ।
अजर अमर अपार अद्भुत, अगम अलख अमान ।
तुम्हरे चरन सरोज में, प्रभु ज्ञान गम की खान ॥
जीव निबल अनाथ आरत, सहत बिपत कलेश ।
अपनी मेहर से बन्ध काटो, ले चलो निज देश ।।
तरन तारन नाम धारा, आये जीव के काज ।
चरन शरन में सब पड़े हैं, राखो उनकी लाज ।
हाथ फेरो सीस पर, और पकड़ो उनकी बांह ।
राधास्वामी सतगुरु, यह पड़े भव जल माह ।। प्रार्थना
[ 519 ] धन धन सुखदाता जग पितु माता, आदि अनन्त अमाना ।
धन धन प्रतिपाला दीन दयाला, सार भक्ति अरु ज्ञाना ।।
पूरन काम अनाम अमाया, गुनातीत अविनासी ।
भव दुख भंजन कष्ट निकन्दन, जन रंजन सुखरासी ।।
महिमा गोतीता चरित पुनीता, गावे निस दिन जती सती।
शारद अज शेषा गौरि महेशा, ध्यावे पावें ज्ञान अती ॥
धन धन असुरारी जय हितकारी, दीन जनन के सुखकारी।
धन मंगलकारी भव दुखहारी, धन धन धन गुरु हितकारी ।।
बारहवीं धुन
[1-520 ] गुरु दाता चरण की धूर मिले ॥टेक॥
करूँ धरूँ आँखों का अन्जन, दिव्य दृष्टि भरपूर मिले ॥
गुरु0 सूझे अण्ड खण्ड ब्रह्माण्डा, निकट पदारथ दूर मिले ॥
खुले नयन सरूप निहारू, माया भरम सब दूर मिले ॥
सहज सहज में सहज सहज में, प्रेम भक्ति की मूर मिले ॥
राधास्वामी चरन की आस रहे नित, सतपद का सतनूर मिले।
[2-521 ] गुरु दाता करो मेरी आप संभार ॥टेक।।
मैं तो करम धरम का बंधुआ, चहुँ दिस व्याप रहा संसार ॥
गुरु0 मेरा दाव चले नहीं कोई, माया काल महा बरयार ॥
आसा तृष्णा बन्ध बन्धाना, मोह मया गले फाँसी डार ॥
अब तो आपकी शरण पड़ा हूँ, दया से कीजे मेरा सुधार ॥
राधास्वामी दीन दयाला, जान प्रान के तुम आधार ॥
[3-522 ] गुरु प्यारे दरस दो मोहि अपना ॥टेक॥
दरशन बिन मोहि चैन न आवे, रात दिवस का है तपना ।।टेक।।
बाहर भीतर दरशन दीजे, रहे नाम का नित जपना ॥
गुरु0 अनुभव ज्ञान की खोलदो दृष्टि, भरम का दूर करो टपना ॥
इन्द्रजाल संसार की लीला, जाग मिटे मेरा यह सपना ॥
राधास्वामी दया दृष्टि हो, काल के भय से न हो कपना ॥
[4-523 ] गुरु दाता मौज करो आज नई ॥टेक।।
अमृत बचन धार बरसादो, भूमण्डल हो सुधामई ॥
गुरु0 सहज तरें सब भव सागर से, मुझ सम पापी कई कई ॥
पतित उधारन पतित उद्धारो, नहीं नाम की लाज गई ॥
भाग जगा तब दर्शन पाया, गरु मिले अब भली भई ॥
राधास्वामी द्वन्द अवस्था मेटो, दृष्टि रहे नहीं प्रान रई ॥
[ 5-524 ] गरु स्वामी दया की दृष्टि करो ।।टेक॥
मेरे मन के पात्र में दाता, भक्ति प्रीति की वस्तु भरो ॥
गुरु0 माया काल की रणभूमी में, शस्त्र अस्त्र ले अधिक लरो॥
गुरु जब मिले जिलोवन हारे, मैं न मरूँ चाहे कोई मरो॥
अपना भाग सराहूँ कैसे, भव सागर से सहज तरो॥
राधास्वामी चरन ओट नहीं त्यागू, अब तो शरण में आन परो॥
[9-525 ] गरु दाता की छवि पर बलिहारी ।।टेक।।
व्यापक अव्यापक हद बेहद, कहनसुनन से वह न्यारी ॥
गुरु0 चरन पताल मध्य गगना पर, दिव्य सीस सोभा भारी ॥
गेम रोम कोटिन रवि चन्दा, देव दनुज आज्ञाकारी ॥
रूप अरूप स्वरूप अमाया, कौन कहे महिमा भारी ॥
अखिल ब्रह्मांड रोम एक रहता, निराधार जगदाधारी ।।
गुरु का चित्र लखे नहीं कोई, निराकार नहीं साकारी ॥
सगुन अगुन अव्यक्त व्यक्त नहीं, शारद शेष कहत हारी ।।
बुद्धि न बूझे मन नहिं सूझे, बानी अटकी मझधारी ॥
राधास्वामी रूप में दरस मिला जब, सेवक जान प्राण वारी ॥
[7-526 ] गुरु प्यारे दया करो दृष्टि संभार ॥टेक॥
मैं भूली भरमी मारग में, हिया जिया व्याप रहा संसार ॥
गुरु0 दुविधा छल चतुराई के बस, डूब रही भव सिंधु मँझार ॥
कोई जग में मीत न मेरा, मतलब के सब कुल परिवार ॥
मैं अनजान समझ नहीं मुझमें, अपनी मेहर से करो सुधार ॥
राधास्वामी जीव हितेषी, तुम हो रचना के आधार ॥
[8-527 ] गुरु प्यारे से प्रेम लगा मेरा ।।टेक॥
सबको त्याग चरन में लागी, छूट गया मेरा तेरा ।
गुरु0 अन्तर धस गई सुरत सुहागिन, शब्द रतन घट में हेरा ॥
सुन सुन धुन भई चरन दिवानी, सुन्न नगर में किया डेरा ॥
काल न व्यारे कर्म न मोहे, मिटा चौरासी का फेरा ॥
राधास्वामी दया से काज बना है, अब न पड़भव के घेरा ॥बिनती
[ 528 ] सिरजन हारा पालन हारा, करतारा जगदाधारा ।।
तेरी गति मति क्या कोई जाने, वेद कहे अरम्पारा ॥1॥
भव भय भंजन जन मन रंजन, सगुन अगुन मायाधीशा।
तू सुखरासी घट घट बासी, ज्ञान गुनातीत ईशा ॥2॥
गुनआगर नागर सुखसागर, अमल विमल निर्मल दाता।
निज सेवक पर दयादृष्टि हो, तू है सबका पितु माता ॥3॥
प्रार्थना
[ 529 ] दीन बन्धु कृपाल स्वामी, जगत के आधार ।
प्रेम भक्ति दान दीजे, कीजे बेड़ा पार ॥
मुक्ति की नहीं मन में इच्छा, भक्ति दीजे दान ।
प्रेमियों का साथ दीजे, साध संगत मान ।
तारलीजे अधम पापी, को दया से आज ।
राधास्वामी सतगुरु, अब मेरी तुमको लाज ।। तेरहवीं धुन
[1-530 ] सत संगत में अमृत बरसे, सत संगत ॥
टेका मूरख जन कोई भरम न जाने, यू ही तृष्णा से तरसे ॥
सत संगत ज्ञानी पिये सुधारस नामा, सतगुरु चरन कमल परसे ॥
सार तत्व भेद लख पावे, तत्व विवेक का गुर दरसे ॥
शठ सुधरहिं सत संगत पाई, सहज ही सहज काज सरसे।
राधास्वामी चरन पकड़ मेरे प्यारे, छोड़ो न यह सिधि निधि करसे ।।
[2-531 ] तेरा रूप अनूप अपार, दूजा क्या देखे ॥टेक।।
कर सतसंग विवेक सहित नित, होजा भवजल पार ॥
दजा0 तुझमें शब्द अनाहद गूंजे, तझ में नूर का सार ॥
देवी देव रहें तेरे काया, तुम में ब्रह्म पसार ॥
ज्ञान ध्यान का मरम है तझ में, तुझमें तत्व विचार ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तज दे भरम विकार ॥
[ 3-532 ] गुरु दाता सहज में तारगे, गुरु दाता ॥टेका।
सोच विचार त्याग मन बौरे, भव निधि पार उतारेंगे ॥
गुरु दाता0 सिर पर हाथ गुरु ने फेरा, आप ही आप संभारेंगे॥
तेरा बल कुछ पेश न जावे, काल करम को मारेंगे ॥
ममता मोह का बन्धन काटें, बिगरी तेरी सुधारेंगे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कलि कलेश सब टारेंगे।
[4-533 ] यह दुनिया गोरख धन्दा है, यह दुनिया ॥टेक।।
जड़ में चेतन चेतन में जड़, काल फाँस का फन्दा है यह दुनियाँ कहीं
अन्धे मिल दृष्टि पसार, कहा सुझा का अन्धा है ।यह दुनियाँ माया ब्रह्म ईश प्रकृती,
द्वन्दपने का रन्दा है।यह दुनियाँ तत्व विवेक बिना यह प्रानी, करम भरम से गन्दा है ।
यह दुनियाँ तिमिर हिंडोले ऋषि मुनि भूलें, भूलें सूर और चन्दा है ।यह दुनियाँ कल्प
विकल्प ज्ञान अज्ञाना, इनमें भरमा बन्दा है |यह दुनियाँ
राधास्वामी मेहर न हो जब जन पर,तब लग मति का मन्दा है।
[5-534 ] दो दिन का भोग बिलासा है, दो दिन का ॥टेक।
दृष्टि सृष्टि का सकल पसारा, अद्भुत अजब तमाशा है
दो दिन का स्वर्ग नर्क और लोक परलोका, पानी बीच बतासा है।
मिथ्या ब्रह्म धाम की आसा, मिथ्या गिर कैलासा है।
ब्रह्मा विष्णु नहीं है कल्पित, कल्पित आसा त्रासा है।
अनसूया अत्रय की रचना, दत्त चन्द्र दुरबासा है।
शत रूपा माया मनु है मन, जग जुवे का पाँसा है।
राधास्वामी गुरु जब होय दयाला,पल छिन में यह नासा है।
[ 9-535 ] करले निज उपकार, मानुष तन पाया ॥टेका।
नर शरीर दुर्लभ देवन को, मन में सोच विचार ॥
मानुष अब की चूक होय पछतावा, अवसर नहीं बारम्बार ॥
मानुष भक्ति भाव गह ले गुरु शरनी, तज दे विषय विकार ॥
मानुष रात दिवस रहे लम्पट जग में, भज ले सत करतार ।।
मानुष राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जा भवनिधि के पार ॥मानुष
[7-536 ] कर आपन घट उजियार रे, आपन घट ॥टेक।।
घट में माया ब्रह्म हैं दोऊ, ब्रह्म अग्नि उदगार रे ।।
आपन घट0 घट में गुरु घट ही में चेला, घट में शब्द है सार रे ।।
आपन0 घट में परमारथ स्वारथ सब, घट में कुल परिवार रे ।।
आपन0 घट में करम भक्ति सत ज्ञाता, घट है सहज विचार रे ॥
आपन0 घट में हाट दुकान हवेली, घट में कर व्यौपार रे ॥
आपन0 घट में उन्मुनि सुन्न समाधी, घट का हो व्यौहार रे ।।
आपन0 राधास्वामी चरन शरन बरिहारी, घट सतनाम पुकार रे ॥
आपन0
[8-537 ] तेरी काया में सत करतार, भटका क्यों खावे ॥टेक॥
काया में है माया दाया, काया स्वर्ग दुवार ॥
भटका0 काया सोध सोध निज काया, काया का भेद अपार ॥
भटका0 काया निरगुन सगुन है काया, काया ब्रह्म अपार ॥
भटका0 काया मध्ये सहस कमल दल, काया में ओंकार ॥
भटका0 सुन्न महासुन्न काया रहे, काया सोहंग सार ।
भटका0 सत्त पुरुष काया के बासी, अलख अगम का द्वार ॥
भटका0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काया है टकसार ॥भटका
[9-538 ] जब लागी सहज समाध, फिर क्या करम बने ॥टेक॥
तीरथ बरत नियम और धरमा, सब मन के हैं उपाध ॥
फिर क्या आँख खुली तब निकट वही देखा, सुरत भई बिस्माध ॥
फिर क्या द्वत अद्व त का झगड़ा छूटा सब, रहा न एक न आध ॥
फिर क्या राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तत समझे कोई साध ॥फिर क्या
[10-539 ] नर भूला भूला क्यों भटके, ले चेत सवेरा है भाई ॥टेक॥
आना जाना भरम है मनका, इसके झटके क्यों भटके ॥
ले चेत बन्धन मुक्ति अज्ञान की बातें, मूरख सब इनमें अटके ।।
ले चेत जा के हृदय अटक समाना, उन भटकन में वह लटके ॥
ले चेत ज्ञानी ध्यानी मरम न जाने, उनके पास न तू फटके ॥
ले चेत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुन भरम साध सत पद सटके ।।
11-540 । भरम में कैसे फंसी महाराजा ।।टेक॥
मैं सतवंती सत्तधाम की, या में आन धंसी महाराजा ॥
भरम सुरत सहेली अगम की बासी, मृत्यु लोक बसी महाराजा ॥
भरम जनम मरन के फंद कठिन हैं, इनमें हाय नसी महाराजा ॥
भरम आनन्द रस की निस दिन पागी, मोह स्वाद रसी महाराजा ॥
भरम राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,सुन गुरु बचन हँसी महाराजा ॥
[12-541 ] चलत दाई हमको सिंगारें अभागे ॥टेक।।
जीते बाप को लात न मारे, मरते अरथी संवारें ॥
अभागे इस जगत की है न्यारी लीला, कोई कोई मरम विचारें ।
अभागे गुरु की सेवा चित न धारी, पाछे समाध पखारें ।
अभागे मत गुरु खोज करो सत संगत, वह भव खेप उतारें ॥
अभागे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु दया से सुधारें ॥अभागे
[13-542 ] नर जनम गया बरबाद, मूरख ना चेते ॥टेक।।
मन इन्द्री के भोग भुलाना, इनमें कौन सवाद ॥
मूरख करम धरम पाखंड पसारा, भूठा वाद विवाद ॥
मूरख औरन को नित दोष लगावे, अपना अन्त न आदि ॥
मूरख बन्धे सकल माया की रसरी, लोक लाज मरजाद ॥
मूरख राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सत्तनाम कर याद ॥मूरख
[14-543 ] सतगुरु दीन अजब उपदेशवा ॥टेक॥
जब से सुनी गुरु की बानी, मिट गया मन का सकल अंदेसवा ॥
सत काल करम माया नहीं व्यारे, नासा जग का बिपत कलेसवा ॥
सत सत्त धाम से सतगुरु आये, धुरका दया से दीन संदेसवा ।।
सत शब्द योग का साधन सीखा, सुरत चली घट गुरु के देसवा ।।
सत देवी देव की गम नहीं वामे, वहाँ न ब्रह्मा विश्णु महेसवा ।
सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कागा भया हंस के भेसवा ॥सत
[ 15-544 ] जग जाल फैसा मेरा मन पानी ॥टेक॥
समझ न आवे जूझ न पाये, दया त्याग भया सन्तापी ॥
जग अन्त समय कुछ काम न आये, यम की जब सीस
पड़े थापी जग बिन कारज उत्पात मचावे, दंड सहे आपहि आपी ॥
जग भक्ति के पन्थ पग नहीं देवे, काम क्रोध की डगर नापी जग
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब तो छोड़ा आपा तापी ॥जग
[19-545 ] भक्ति बिन यमपुर जावेगा ।टेक।।
आया अकेला जाये अकेला, साथी संग न पावेगा
भक्ति बिन भव की धार कठिन अति भाई, फिर फिर गोते खावेगा ।भक्ति बिन
हाट आय सौदा नहीं कीना, यम के हाथ विकावेगा भक्ति बिन
अवसर बीता उमर सिराई, अन्तकाल पछतावेगा भक्ति बिन
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कब गुरु के गुन गावेगा ।भक्ति0
17-546 । सत सोत से अमृत धार बहे ॥टेक।
जो कोई सत की ओर सिधाये, तीन ताप दुख नाहीं सहे ॥
सत आस बुझे भव प्यास न लागे, माया की अग्नि नाहीं रहे ॥
सत उत से मोड़े इतसे जोड़े, सत्त पुरुष की दया लहे ॥
सत चाह मिटे चिंता हटे मन से, घट में सुख आनन्द रहे ॥
सत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, साध देख कर ऐसा कहे ॥सत
[ 18-547 ] मैं तेरी न मानूंगी बात बेदरदी, जा जा जा रे ॥टेका।
जब से पड़ी मन माया के पाले, बिलपी दुख पा पा पारे ।।
मैं तेरी काल नगर में कलेस है भारी, सही विपत आ आ आ रे ॥
मैं तेरी काल काग सम रार मचावे, नहीं भावे तेरा का का का रे ॥
मैं तेरी गुरु गुन गाय रहूँ हरषानी, सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सा, रे।
मैं तेरी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु का ध्यान हिये ला ला ला रे॥
[19-548 ] मैं होगई गुरु सत संगी हो, मैं होगई ॥टेक।।
ध्यान धरत आपा सब बिसरा, जैसे दीप पतंगी,
हाँ दीप पतंगी हो ॥
मैं होगई भजन में देह गेह सुध भूली, ज्यों गति कीट भृगी,
हाँ ज्यों गति कीट भृगी हो ॥
मैं होगई सुमिरन रंग गुरु का धारा, अब नहिं रहुँ कुरंगी,
हाँ नहिं रहूँ कुरंगी हो ॥
मैं होगई सुमिरन भजन ध्यान निस वासर, सुरत निरत भई चंगी,
हाँ भई चंगी हो ॥मैं होगई
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम की सहज उमंगी
हाँ सहज उमंगी हो ॥मैं होगई
[ 20-549 ] चल घट की ओर सुरत प्यारी, जहाँ नित अमृत जल बरसे ॥टेक॥
घट की लीला अगम अलौकिक, घट से काज सभी सरसे ॥
जहाँ0 घट में नूर सुरूर शब्द सत्र, घट का बासी नहीं तरसे ॥
जहाँ घट में राधास्वामी चरन निवासा, घट में चरन कमल परसे ॥जहाँ0
[21-550 ] पनिहारी पानी भरन निकरी, पनिहारी ॥टेक।।
औंधा कुवाँ अकाश में पानी, सहज ही सहज भरे गगरी ॥
पनिहारी कुआँ में तेज पुंज परकासा, जोत ही जोत में जोत जरी ॥
कुवाँ से अमी धार नित बरसे, रिम झिम रिम झिम लगी भरी॥
हरष हरष आनन्द धुन गाती, ऊँचे उड़ी ज्यों उड़े परी ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत शब्द में जाय अरी॥
[22-551 ] सरने की बात निराली है, सपने की ॥टेक॥
साना तोज तेव्हार का उत्सव, सपना होली दिवाली है ।सपने की
सपना तोप बन्दूक है सपना, सपना खड़ग भुजाली है ॥सपने की
यह संसार रैन का गड़वा, कभी भरा कभी खाली है ।सपने की
साना माया साना काया, साना लोटा थाली है ।सपने की
राधास्वामी गुरु मिल भेद बतावें, जग सपना जंजाली है ।सपने की
[23-552 ] तेरे घट में बिमल बहार, तू बाहर ना जारे ॥टेक।।
तेरे घट में खेत कियारी, घट में गुल गुलजार ॥तू बाहर
निरख परख लख घट की लीला, अन्तर सोच विचार ॥तू बाहर
बाहर मुख बन उमर गवाई, अन्तर मुख चित धार ।। तू बाहर
भीतर बाहर फिर साल करले, हो जीवन उद्धार ॥तू बाहर
अन्तर में तेरे सूरज चन्दा, झलके ज्योत अपार ॥तू बाहर
शब्दनाद गूंजे घट भीतर, अनहद धुन झनकार ॥तू बाहर
राधास्वामी योग की महिमा, कोई न बरने पार ॥तू बाहर
बिनती
[ 553 ] सहज में भव पार कर दो, नाव है मँझधार में ।
है तुम्हारे हाथ रक्षा, हूँ दुखी संसार में ॥
शब्द साखी क्या सुनू मैं, सुनते जी अब भर गया।
मुझको जीता तुम न समझो, जीते जी मैं मर गया।
तुमने मेरी बाँह पकड़ी, अब तुम्ही को लाज है।
राधास्वामी सतगुरु मेरे, मेरा अटका काज है ।।
प्रार्थना
[ 554 ] तुम आये इस जगत में, दीन जीव के काज ।
अब तो तारे हो बने, तुम्हें हमारी लाज ||
हम तो आप हो पतित हैं, तुम हो पतित उधार ।
आये पड़े भव सिंध में, कीजे भव जलपार ।।
शब्द जहाज चढ़ाय कर, सुरत निरत की डोर ।
बेड़ा कीजे पार प्रभु, निरख आपनी ओर ॥
दुरव भंजन मन रंजना, साज भक्ति का साज ।
दीन दुखी को तारिये, सन्तों के सरताज ।
तुम तो समरथ साईयाँ, सब जग के आधार ।
साध संग नित दीजिये, राधास्वामी परम दयार ॥
चौदहवीं धुन
[ 1-555 ] मन भजले गुरु करतार को नित, मन भजले ॥टेक॥
गुरु है आनन्दघन सुखरासी, अजर अमर घट घट के बासी ।
तेज पुञ्ज और सहज प्रकाशी, मायातीत अगम अविनासी ।
उनके चरन लगाले चित ॥मन भजले0
सत चित आनन्द अद्भुत मूरत, मुक्त बुद्ध शुद्ध प्रेम की मूरत ।
पाया मानुष जनम महूरत, हिये का त्याग विकार करत ।
गुरु से होगा तेरा हित ।।
मन भजले राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,गुरु दयाल हैं जग हितकारी ।
वही राम और कृष्ण मुरारी, वही ब्रह्म परब्रह्म सुरारी ।
भजन ही भक्त का उद्यम बित ॥मन भजले
[2-556 ] तेरा जनम अकारथ जाय, मन कुछ चिंता कर ॥टेक॥
खेल कूद में समय गंवाया, गुरु पद कमल न नेह लगाया।
सुमिरन ध्यान भजन बिसराया, बोरे हाथ तेरे क्या आया।
काम बने अब क्या पछिताय ।।
मन कुछ0 करम धरम सब भाम की खानी, तीरथ बरत अज्ञान कहानी ।
भेद न पायें ज्ञानी ध्यानी, सब मिल पिसे माया की घानी ।
भटके माया के जाल फसाय ॥मन कुछ0
भूल भुलैय्याँ जग व्योहारा, मिथ्या है प्रपंच पसारा ।
योनी जये में जनम को हारा, राधास्वामी नाम न सुमिर विचारा।
गुरु संग कोई बड़भागी पाय ॥मन कुछ0
[ 3-557 ] तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।
नीचे नीच नीच की संगत, नीच भात में नीच की रंगत ।
त्याग कुसंगत कर सतसंगत, भव के दुख सुख क्यों सहना ।।टेका
सीधा मारग जगत का, उलटा सन्त का पन्थ ।
जो कोई उलटे मग चले, सो पानिज कन्थ ।
तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ॥
नीचे माया नीचे काया, नीचे झाँई नीचे छाया।
इसके भरम में जो कोई आया, सो तो रहा यम बंध बंधाया।
भव के भरम में क्यों बहना ॥तुम उलट
ऊँचे गंग तरंग है, ऊँचे जमुन का नीर ।
ऊँचे सरस्ती धार है, सिंधु अथाह गम्भीर ।
तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।।
नीचे कष्ट कलेश है भारी, नीचे जाया करे दुखारी ।
करम भरम में पड़े संसारी, सार न पात्र माया धारी ।
तीन तार में क्यों दहना ।। तुम उलट0 ।
ऊँचे सूर्य प्रकाश है, ऊँचे चन्द्र की जोत ।
ऊँचे ज्ञान भण्डार है, ऊँचे सत का सोत ।
तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ॥
नीचे नीच क्रोध की घाटी, नीचे ताणा मोह कुठाटी ।
नीचे लोभ की जलती भाटी, नीचे भरम की पड़ी है टाटी ।
नीचे नीच का है लहना ॥तुम उलट
ऊँचे पुरुष विराट है, ऊँचे है ओंकार ।
ऊँचे शून्य का देश है, ऊँचे सौहंग सार ।
तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।।
नीचे इन्द्री भोग विलासा, नीचे आसा नीचे बासा ।
नीचे जो कोई करे निवासा; सो तो रहे दिन रात निरासा ।
नीची राह को क्यों चहना ॥तुम उलट0
ऊँचे सत पद धाम है, ऊंचे अगम अलेख ।
ऊचे राधास्वामी नाम है, ऊचे चढ़कर देख ।
तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमान, नीचे क्यों रहना ।
नीचे काल करम है व्यापा, नीचे भरम पाखंड का पापा ।
नीचे माया मारे छापा, भ्रान्ती से नहीं सूझे आपा ।
नीच कथा को क्यों कहना ॥तुम उलट0
[4-558 गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।
दीवाना क्यों घबराना है, क्यों भूला तू नादाना है।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।टेक।।
गुरु ही विषणु महेश हैं, गुरु ही वरुण गनेश ।
गुरु ही शेष सुरेश हैं, गुरु ही धनी धनेश ।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ॥
दीवाना0 गुरु ब्रह्मा गुरु जगपति, गुरु को समरथ जान ।
गुरु ब्रह्म परब्रह्म है, गुरु पद में कल्यान ।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।
दीवाना0 गुरु आये इस जगत में, धार सन्त अवतार ।
शब्द जहाज चढ़ाय कर, कर जीव भव पार ।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।।
दीवाना0 गुरु ही साँचे मीत है, हितकारी निजदेव ।
और सबन को त्याग दे, कर गुरु चरनन सेव ।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने ।
दीवाना0 राधासामी सतगुरु, सत्य पुरुष सत रूप ।
सतनामी सतधाम धुर, सतस्वामी सत भूप ।
गुरु चरन कमल की छाँह ले, तब काज बने । दीवाना
[5-559 ] भक्ति के मारग जो आवे, भक्ति के टेक।
जग जंजाल का नाता तोड़े, चित गुरु चरन कमल में जोड़े।
काल करम का माथा फोड़े, मन को सहज ही इत ते मोड़े।
आवागमन नसावे, हाँ आवागमन नसावे ॥
भक्ति के साधु की संगत गुरु की सेवा, करे भरम के त्यागे भेवा।
दुख से बचे रहे सुख लेरा, निज घट देखे देवी देवा ।
आत्म आनन्द पावे, हाँ आत्म आनन्द पावे ॥
भक्ति के0 ध्यान न लावे कथनी बदनी, निस दिन करे परमारथ करनी।
कमल नीर की धारे रहनी, पृथवी तज नभ मंडल चढ़नी ।
शब्द में सुरत लगावे, हाँ शब्द में सुरत लगावे ॥
भक्ति के0 उलट दृष्टि ताके ब्रह्मांडा, अन्तर लखे प्रकाश प्रचंडा।
लगी समाधि अगाध अखंडा, मारे भ्रान्ती के सिर दंडा।
सोया मनुआ जगावे, हाँ सोया मनुवा जगावे ॥
भक्ति के0 प्रेम डगर की अकय कहानी, बरमत अन साये मन बानी ।
दूर हुये चित की हैरानी, राधास्वामी चरन शरन सहदानी।
नर जनम सुफल करावे, हाँ नर जनम सुफल बनावें ॥भक्ति के0
[9-560 ] कोई माने न गुरु की बात, धोखे धार बहा ॥टेक॥
सौदा करने हार में आया, गाँठ की पू जी धूर मिलाया ।
माया मिली न रात हो पाया, दुविधा साथ रहा ॥
धोखे0 निस दिन भूठा वाद विवादा, लंपट मन इन्द्री के स्वादा।
मन नहीं मारा चित नहीं साधा, दारुण कन्ट सहा ॥
धोखे, नहीं विचार नहीं हिो विवेका, झूठो पन में धारी टेका।
सूझा एक न सूझ अनेका, राधास्वामी पद न गहा ॥धोखे0
[ 7-561 ] मेरा तेरा कहाँ हो मेल, तू भव धार बहा ॥टेका।
मैं तो देखू आँखों अपनी, तेरे हाथ ग्रन्थन की छपनी ।
मुझे नाम तुझे माया जपनी, भेद अपार महा ॥
तू भव0 तेरा इष्ट है जग की माया, मैं माँगू सतगुरु की दाया।
मैंने सुख से लगन लगाया, तूने कलेश सहा ॥
तू भव0 तू पढ़ता है विद्या थोथी, मैं पढ़ता हूँ मन की पोथी।
तेरे पीछ माया खोह थी, मैं गुरु चरन लहा ।। तू भव0
[8-562 ] शब्द कमाई कमावे, सोई मेरा साथी ॥टेक॥
चढ़ असमान गगन को धावे, विषय वासना चित से मिटावे ।
पृथवी छोड़ अधर धन पावे, सेवे गुरु की थाती ॥सोई मेरा0
नौ को त्याग दसम दर लागे, जग दारुण से पल पल भागे।
इधर से सोवे उधर से जागे, बाँधे न घोड़े हाथी ॥सोई मेरा0
आवे न जाय न पन्थ दिवाना, ज्ञान ध्यान तत्र सहज सियाना ।
राधास्वामी चरन शरन मस्ताना, साधे न पोथी पाथी॥सोई मेरा0
[9-563 ] सन्तों का मारग झीना है, सन्तों का ॥टेक॥
यह तो नित्य निवृति का रस्ता, मॅहगा नहीं बहुत है सस्ता ।
चल इस मग में हँसता हसता, तू क्यों लाचार अधीना है ।संतों0
सन्त शब्द का सार बतावें, हाथ पकड़ भव सिंधु तरावें।।
कलि कलेश से सहज बचायें, ले शरण जो तू परवीना है संतों0
सन्त दया के रूप हैं भाई, औरों में है कुटिल खुटाई।।
न्याग जगत यह अगमापाई, चार दिना का जीना ॥
संतों नूर कलाम शब्द प्रकाशा, पन्थ मैं होता सहज उजासा।
तिमिर अविद्या सभी विनासा अमी नाम रस पीना है ॥संतों0
सहसकमलदल घंटा बाजे, त्रिकुटी ओंकार धुन गाजे ।
भँवर गुफा में मुरली साजे, सत्त धाम सुख बीना है ॥
संतों0 गगन मंडल की ओर सिधारो, घट में लखो सवा लख तारो ।
सूर चाँद का होत उजारो, वहाँ एक न दोय न तीना है ॥
संतों0 कोई बड़भागी पन्थ में आवे, शब्द युक्ति से काज बनावे ।
सत्त लोक में बासा पावे, राधास्वामी पद में लीना है। संतों
[10-564 ] पी पी रे अभागे आय, गगन से बून्दा झरे ।।टेक॥
क्यों प्यासा मरे क्यों आह भरे, क्यों छाती जरे क्यों शोर करे ।
पी पी करते दिन गया, पिया न निर्मल नीर ।
पिया का प्रेम जल ना मिला, तन मन व्यापी पीर पी पी रे0
रात दिवस प्यासा रहा, तड़प तड़प अकुलाय ।
प्रेम बून्द से भेंट नहीं, व्याकुल तन घबराय ॥
पपीहा प्यासा स्वांति का, गहे न दूजा नीर ।
माँगे पिया का प्रेम रस, मन नहीं धारे धीर ॥
पिया पियाला प्रेम का, मन की बुझी पियास ।।
हिया जिया की तृष्णा गई, अब नहीं रहूँ उदास ॥
गुरु चरनामृत को चहूँ, चहूँ न गंगा का सोत ।
सुख दायनी मन भावनी, तासों तृप्ति होत ॥
पपीहा के कुल जनम ले, तनँ न कुल अभिमान ।
के पाऊ गुरु दरस चल, के मैं त्यागू प्रान ॥
राधास्वामी नाम ले, राधास्वामी गाय ।
राधास्वामी सुमिर मन, गुन गा गा हरषाय ॥
[ 11-565 ] पी पी सुधारस नाम, तेरा नर जनम बने ॥टेक॥
क्यों जन्मे मरे क्यों जग से डरे, क्यों त्रास करे क्यों गिरे परे ॥
राता माता नाम का, ले अमृत रस चाख ।
माया काल का संग तज, निश्चय गुरु की राख ॥
तेरा नर0 नाम जपत भव सिंधु तरे, पापी पतित अनेक ।
ज्ञान भक्ति सब नाम में, धार नाम की टेक ॥
तेरा नर0 कामी क्रोधी लालची, पापी तरे अनन्त ।
नाम ही के प्रताप से, पाई पदवी सन्त ॥
तेरा नर0 नाम नाम में भेद है, नाम नाम में भाव ।
सोई नाम को सुमिरिये, जो गुरु बतावें दाव ॥
तेरा नर0 धुनात्मक सोई नाम ले, वर्णात्मक तज डार ।
राधास्वामी की दया, भव से जावे पार ॥
[ 12-566 ] नहीं कोई तेरा यगाना है, नहीं कोई ॥टेक।।
आवत साथ नहीं कोई आवे, जाते समय कोई संग न जावे ।
तू क्यों इनसे नेह लगावे, क्या सचमुच दीवाना है ।।
नहीं चार दिना का यह जग मेला, करता है क्यों ठेलम ठेला ।
आया अकेला जाय अकेला, यह तो देश विराना है ॥
नहीं हाथी घोड़े माल खजाना, खेत मुल्क जंगल मैदाना।
इनका नहीं है ठौर ठिकाना, इनमें क्यों भरमाना है।
नहीं राम गये रघुकुल के पालक, रावण गया निशाचर घातक ।।
रहे वशिष्ट न ऋषि उद्दालक, भूठा सब मद माना है ॥
नहीं सतगुरु सन्त की महिमा भारी, वह तेरे साँचे हितकारी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, शरन में है जो सियाना है ॥नहीं
बिनती
[567 ] चरन शरन गुरु दीजिये, शरनागत आया।
सेवक सब विधि जानकर, गुरु कीजे दाया ।
अपराधी कामी कुटिल, दम्भी और मानी।
खोट भरा छल कपट का, क्रोधी अज्ञानी ।।
तारनहारा तारले, तू तारन आया।
मो सम पापी कौन है, दे चरन की छाया ।
हार हार कर हारकर, हारा मन अपने ।
और कहीं नहीं आसरा, कोई सूझे न सपने ॥
निज बालक प्रभु जानकर, लीजे चरन लगाय ।
चरन कमल मन छोड़कर, और कहूँ नहिं जाय ।।
प्रार्थना
[ 568 ] नाम दान दे अपना कीजे, गुरु निज सेवक जानी।
चरन शरन की ओट बख्शकर, दीजे शब्द सहदानी ॥
मान न मागू धन नहीं मागू, नहिं सुख चैन विलासा।
गुरु का अमृत नाम पायकर, करू गुरु की आसा ॥
गुरु मेरे पूरन परम सनेही, गुरु दाता गुरु ज्ञानी ।
गुरु के बल छूटे जम फंदा, मिले धाम निरवानी ।।
राधास्वामी पल पल गाऊँ, राधास्वामी लव लाऊँ।
राधास्वामी मेरे गुरु दयाला, गुरुपद नेह लगाऊँ।
पन्द्रहवीं धुन
[1-569 ] गुरु महिमा अगम अपार, गुरु गति कौन कहे ॥टेक॥
बिन गुरु धर्म न कर्म कुछ, विन गुरु भक्ति न ज्ञान ।
जनम जनम यम फाँस है, बिन गुरु नहीं निरवान ।
चरन धूर सिरधार, शुद्धमति सोई लहे री ॥
गुरु0 देवी देवा ऋषी मुनी, सुर नर साध सुजान ।
हंस बंस अातार सब, गुरु महिमा को जान ।
गुरु हैं सत करतार, बिन गुरु कौन रहे री ॥
गुरु0 राम कृष्ण के गुरु हैं, गुरु मत गुरु वसिष्ठ ।
सत्त कबीर ने गुरु किया, गुरु है सबके इष्ट ।।
बिन गुरु भव जल धार, निगरे सकल बहे री ।
गुरु0 दुख कलेश आपत विपत, चहूँ दिस जग में व्याप ।
जीव छुड़ावन सतगुरु, प्रगटे आप ही आप ।
सबका किया उद्धार, जो कोई शरण चहे री ॥
गुरु0 राधास्वामी आदि गुरु, परम दयाल प्रवीन ।
अभय करें पद भक्ति दे, तारें जीव अधीन ।
नहिं उसका वारा पार, जो गुरु भक्ति लहे री ॥गुरु0
| 2-570 ] मैंने सौदा किया न कोय, पूजी छीन गई ॥टेक।।
बनजारों को देख कर, आया जगत की हाट ।
ठग डाकू मग में मिले, होगया बारह बाट ।
मैं तो गया नींद में सोय, तासों लूट भई री ॥
मैंने सौदा घर का भया न बाट का, बाहर रही न साख ।
व्यौपारी कोई ना मिला, सके जो पति मेरी राख ।
सब विधि आपा खोय, चहुँ दिस भर्म मई री ॥मैंने सौदा
राधासामी दीन हित, मिले महाजन आय ।
भक्ति पारस बख्श कर, कीनी मेरी सहाय ॥
मैं पड़ा चरन में रोय, गुरु ने शरन दई री ॥मैंने सौदा
[3-571 ] गुरु कीजे आप सहाय, चरन में आन पड़ा ॥टेका।
कामी क्रोधी लालची, दम्भ कपट की खान ।
मान बड़ाई कुटिलता, यह सब मेरे निशान ॥
आप मेरे पितु मात, मैं भव खोह गड़ा री ।।
गुरु0 बिलपत तलपत रात दिन, कोई साथ न संग ।
निरख परख अपनी दशा, चित मलीन भया भंग ॥
रहूँ छिन छिन अति पछताय, भरम बस विकल खड़ारी ॥
गुरु0 काल करम के जाल में, उरझ उरझ उरझाय ।
सुलझावे मेरी कौन गति, मुख से निकसे हाय ॥
नहीं सूझे कोई उपाय, आप कीचड़ में सड़ा री ॥
गुरु0 कायर सम भयभीत हूँ, माया रन में हार ।
भागत बने न भागते, हाथ नहीं हथियार ॥
भरम पड़ा हूँ आय, सिर पर बोझ कड़ा री ॥
गुरु0 राधास्वामी दीन हित, अपना बल दे दान ।
संकट काटो दुख हरो, मेटो विपत महान ।।
दया से काल हटाय, चरन में आन पड़ा री ।। गुरु0
[4-572 ] गुरु कीजे मेरी सहाय, शब्द में चित मेरा लागे ।टेक।।
मेरी सोई सुरत अचेत, शब्द सुन घट में जागे ।
तुम दाता दीन दयाला, सुनिये मेरी बिनती ॥
मैं भूला चूका हाय, न इनकी कीजे गिनती ॥गुरु
व्याये क्यों मद मह, हुरे नब सतगुरु रक्षक ।
यम काल का भय मिट जाय, यह दोनों विषधर तक्क्षक ।।
गुरु0 राधास्वामी करुणा सिंध, आस करो मेरी पूरी ।
लो चरन शरन में आप, न हो अब चरन से दूरी ॥गुरु0
[5-573 ] कर सतसंग अस्नान, तीरथ राज यही ॥टेक॥
गंग भक्ति जमुना कर्म धारा, सरस्वती ज्ञान मई ।
न्हाये धोये सुरत भई निर्मल, चिन्ता चित न रही ।।
तीरथ ईडा पिंगला नील रंग छवि, सुखमन स्वेत कही।
केसर तिलक भाल दे न्यारा, प्रेम का रूप लही ॥
तीरथ सहस कमलदल मार ले आसन, ओम का मंत्र गही ।
सुन्न समाध अखंड रचाले, ध्यान का सार यही ॥
तीरथ भँवर गुफा चढ़ जीत काल को, माया मोह दही ।
सत पद अलख अगम राधास्वामी, धुर पद धाम वही ॥
तीरथ ऐसा तीरथ मिले भाग से, यम की फाड़ भई ।
राधास्वामी मौज निरख घट अन्तर, छाछ त्यागले मही। तीरथ
[9-574 ] सब भोगे बारम्बार, अवश फल कर्म किये का।।
यह सोच समझ चित धार, मरम जग जगत जिये का।टेक।।
सुर नर देवी देव महाऋषी, और ब्रह्म अवतारा ।
एक जो कहिये राम महाप्रभू, पुरषोत्तम मर्यादा ।।
गप्त घाट सरजू जल बू हे, रामायण सम्बादा ॥
यह सोच दूजे कहिये कृष्ण विवेकी, सोलह कला के पूरे ।
यदुकुल नाश भील की गाँसी, भये मान मद चूरे ॥
यह सोच तीजे युधिष्ठिर धर्मराज की, अकथ अपार कहानी ।
भाई भारजा संग गले सो, हिम सब कोई जानी ॥यह सोच
चौथे वशिष्ठ महा मुनि ज्ञानी, देखा कुल का नाता ।
विश्वामित्र के हाथ पलट गया, ज्ञान योग का पासा |
यह सोच पंचम दशरथ अवध नरेशा, श्रवण ऋषि को मारा ।
पुत्र वियोग प्राण को त्याग, मिला न राम सहारा ||
यह सोच छटे इन्द्र की करनी समझो, शाप वृहस्पति दीना।
भगमय देव राज की काया, करम का फल यह लीना
यह सोच चन्द्र कलंकित काम वेग से, जाने सब संसारा।
करम अटल है महाबली है, कोई कोई करे विचारा ॥
यह सोच रावण वाली भरत जड़ ज्ञानी, ऋषि के सुत दुर्वासा।
करम किया तैसा फल पाया, अन्त में भये उदासा ।
यह सोच सुन प्रसंग चित अपना साधो, सोधो मन कर्म बानी ।
शब्दयोग कर जनम बनाओ, राधास्वामी की सहदानी।यह सोच
[7-575 ] मन में बसे गुरु रूप, दरशन क्यों न बने ॥टेक॥
निकट दूर सब कल्पना, चित चंचल की रीति ।
चंचल मन कर थिर सदा, सीखले प्रेम प्रतीति ॥
दर्शन आपा तज नहीं गुरु भजे, रहे चिन्ता लवलीन ।
दर्शन रस तो वह लिये, गुरु चरनन आधीन ॥
दर्शन जो होना है हो रहे, मौज मौज की बात ।
दास रहे गुरु मौज पर, फिर नहीं कोई उत्पात ॥
दर्शन चिन्ता किसकी कीजिये, स्थिर नहीं संसार ।
चिन्ता तो एक नाम की, नहीं और में सार ।
दर्शन होनी अनहोनी नहीं, अनहोनी नहीं होय ।
ऐसा समझ विवेक से, रह गुरु चरनन सोय ॥
दर्शन करता धरता क्यों मिले, करतापन अभिमान ।
आगा मन का मेटकर, धर सतगुरु का ध्यान ॥दर्शन
दुचिताई दुविधा कठिन, दुरमति अटका मन ।
सेवक मौज अधीन है, नाहीं और जतन ॥
दर्शन दृढ़ प्रतीत भरोस से, जो रहे मौज आधार ।
हाजिर गायब हो सदा, सतगुरु के दरबार ।
दर्शन राधास्वामी मौज लख, मौन वृत्ती ले धार ।
पल पल सुमिरन नाम का, सुमिरन करे संभार ॥दर्शन
[8-576 ] प्रेम की महिमा कहे कौन, यह है अकथ कहानी ।टेक।।
प्रीतम प्रेमी एक रूप दोउ, अन्तर भेद न जानो।
शवरी राम की कथा बाँच लो, दोनों एक पिछानो ॥
यह है झूठे बेर स्वाद ले खाये, ऋषि मुनि घर नहीं आये।
मोहे देख भीलनी की गति, शबरी के प्रेम रिझाये ॥
यह है धृतराट की सभा को त्यागा, बिदुर के घर चल आये।
कृण प्रेम रस भाव के भूके, साग अलोना खाये ॥यह है
धर्मराज की सभा में लाखों, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।।
आये स्वपच बिना नहीं बाजा, घंटा सब कोई जानी ॥
यह है राधास्वामी दीन दयाला, प्रेम की रीति चलाई ।
जो कोई चरन शरन में आये, प्रेम पदारथ पाई ॥यह है
[9-577 ] बदला मन का रंग, प्रेम जब चित में बसा ॥टेक॥
पहले मन था हिंसक पूरा, जीव घात नित करता ।
अब तो प्रेम के रंग रंगाना, प्रेम प्रीत लख मितरा ॥
चित में पहले मन परबत कठोर था, लगी प्रेम की टाँकी ।
कंचन रतन की खान खुली घट, प्रीतम की बना झाँकी॥चित में
पहले मन था काग समाना, अनुचित बानी बोले ।
अब कोयल सम मधुर बोल है, प्रेम आम चढ़ डोले ॥चित में
दया क्षमा करुणा बसे, प्रेम प्रीत परतीत ।
यह घर मेरा रात दिन, यह भक्ति की रीत ॥
मन में जुड़े यह अद्भुत समाज ॥
मेरी0 कथनी बदनी त्याग कर, रहनी से चित लाय !
गुरु गम को ही गम लहूँ, अपना जनम बनाय ॥
यही करो मेरा तुम जल्द काज ॥
मेरी0 व्यापे कलह कलेश नहीं, रहे एक रस ध्यान ।
सम जीवन सम भावना, सम दृष्टि सम ज्ञान ।
राधास्वामी हो तुम राजों के राज ॥मेरी0
[10-578 ] प्रगटा प्रेम प्रभाव, लगन प्रीतम संग लागी ॥टेक॥
जोती जले प्रेम की घट में, मन मेरा भया पतिंगा।
जरत न मोड़े अंग वह अपना, न्हाये जोत की गंगा ॥
लगन धारा वही प्रेम की मन में, मैं मछली बन आया।
बिछड़त पल में प्रान को त्यागू, ऐसी लगन लगाया ॥लगन
भृगी गति लख ध्यान जमाया, कीट प्रेम अनुरागी।
भृगी बना ले पंख उड़ा सोई, सुरुचि सुभाव सुभागी ॥
लगन चन्द्र की छबि शोभा लख रहा, कोमल चित्त चकोर ।
आग में चन्द्र का टूढ़े दर्शन, मारे टूठ कठोर ॥
लगन राधास्वामी प्रीतम पूरे, आकर अंग लगाया।
प्रेम दान दे मोहि अपनाया, अपना आप बनाया ॥लगन
[11-579 ] कौन गिने तिथि वार, प्रेम जब मन में रमा टेक।।
प्रेम प्यार जब चित में समाना, तन मन की सुध भूली।
प्रेमी सुरत पिंड के अन्तर, रहती फूली फूली ॥
प्रेम जब प्रेम बाज जब मन की शाखा, पर फैलाय के बैठा ।
काम क्रोध पक्षी उड़ भागे, घोंसला एक न पैठा ॥
प्रेम जब मन में प्रेम का रंग जमा जब, जग का रंग भया फीका ।
प्रीतम बिन कोई और न सूझे, प्रेम का सच्चा नाता ॥
प्रेम जब एक भाव घट अन्तर आया, दुचिता दुर्मति भागी।
दुविधा का घर राख भया है, प्रेम ने देदी आगी ॥प्रेम जब
राधास्वामी सतगुरु आये, प्रेम का पन्थ चलाया।
प्यारे प्रीतम की लख सूरत; घट में दर्शन पाया ॥प्रेम जब
[12-580 ] गुरु मुख बिन जाने नहीं कोई, गुरु का भेद अपारा टेक।।
कहन सुनन की बात नहीं है, पोथी ग्रन्थ से न्यारा ।
नहीं यह ज्ञान न योग की किरिया, नाहीं विवेक विचारा।।
गुरु का घट में चढ़ कर सुने शब्द धुन, सहस कमल मझारा ।
फिर त्रिकुटी के महल में बासा, परसे पद ओंकारा ॥
गुरु का सुन्न शिखर पर आसन मारे, त्यागे भर्म विकारा ।
महासुन्न में लगी समाधी, सूझे अपर अपारा ॥
गुरु का भँवर गुफा सोहंगम दरसे, जगमग जोत उजारा ।
सत्त धाम में सतगुरु दर्शन, पावे गुरु मुख प्यारा ।
गुरु का अलख अगम की गति गम निरखे, लख अखंड पसारा ।
भक्ति युक्ति के प्रेम से पहुँचे, राधासामी के दरबारा ।।
गुरु का
[ 13-581 ] गुरु मिले मुलावनहार हिंडोला गगन पड़ा ।।टेक।।
इंगला पिंगला खम्ब है दोई, सुखमन पाट पड़ा।
मकर तार गत शब्द का कोमल, बाँधा दृढ़ सकड़ा ।
हिंडोला प्रेम भक्ति के कल में ताला, निश्चय भाव जड़ा।
चित की कुंजी ऐंठ जो दीनी, भूला भूल पड़ा ।
हिंडोला सहज समाध की पंग चली जब, सुरत निरत जकड़ा।
सुध बुध तन मन की सब भूली, यम का जाल सड़ा ॥
हिंडोला तीन ताप की बिपता नासी, काल अचेत खड़ा ।
माया ठगनी तोड़न लागी, मोह भरम छकड़ा ।
हिंडोला सुरत शब्द का झूला न्यारा, साधन का तकड़ा।
राधास्वामी दया भेद सब पाया, उलटा भव पलड़ा ॥हिंडोला
[ 14-582 ] तू भरम रहा संसार, तेरी बुद्धि गई ॥टेक।।
किसी का तू नहीं कोई न तेरा, क्यों करता है मेरा तेरा।
सोच सोच ले सोच सोरा, दुर्गति बहुत भई ॥तेरी बुद्धि
भरम हिंडोले भूला प्रानी, भरम से भरम भरम की खानी।
भरम से अपनी करता हानी, चहुँ दिस भर्म मई ॥
नौ को छोड़ द्वार दस सजा, सुन्न मंडल के धाम में बसजा।
भक्ति प्रेम के रस में रसजा, चोली पहर नई ॥
तीन गया चौथा पन आया, अब भी चेत न तुझको भाया।
मोह जाल में रहा फंसाया, बन्धन कई कई॥
राधास्वामी वैद बन आये, सतसंग औषधलय ठेराये।
क्यों नहीं औषधि अपनी कराये, तुझको रोग छई ॥
[15-583 ] मेरी सुध बुध करना आप, बिकल मन तड़प रहा ।।टेक।।
काल करम से बहु दुख पाये, असह कलेश सहा ।
अब तो दया का मिले सहारा, चरन की ओट गहा ॥
विकल मन भव की धार कठिन अति गहरी, जीव अचेत बहा ।
गोते खा खा निबल शरीरा, पाया कष्ट महा ॥
विकल मन अपना बल कुछ काम न आवे, नहीं सुख चैन लहा।
कौन उपाय करूँ नहीं जानें, क्या कहूँ बहुत कहा ॥
विकल मन कृपा करो मेरे प्रीतम प्यारे, प्रेम की गंग बहा ।।
तन मन में मेरे शान्ती आवे, त्रय दुख अग्नी रहा ।
विकल मन राधास्वामी आस करो मेरी पूरी, निर्धन भक्ति चहा ।
भक्ति रतन सम कुछ नहीं देखा, जग का सिंध थहा ।। विकल मन
[19-584 ] कर प्रेमी जन का संग, तेरा नर जनम बने ॥टेक।।
लोन की खान में वस्तु पड़े जब, लोन सहज हो जावे ।
प्रेमी जिसका संग करे जो, प्रेम प्रीति गति पावे ॥
तेरा नर0 पत्थर लोहा जल में बूड़े, काठ का बेड़ा तेरे ।
लदे लोह पत्थर जब बेड़ा, नीर के ऊपर है रे ।।
तेरा नर0 संगत कर उत्तम सज्जन की, सज्जनता चित आवे ।
पड़े असज्जन की जो संगत, विरथा जनम गवावे ॥
तेरा नर0 तोता मैंना भक्त के घर में, राम नाम नित गाते ।
वही अभक्त असाध की संगत, अनुचित बैन सुनाते ॥
तेरा नर0 यह विचार कर संग गुरु का, गुरु गम ले पहचानी।
राधास्वामी की शरनाई, होजा ज्ञानी ध्यानी ॥तेरा नर0
[17-585 ] गुरु कीजे मेरी सहाय, विपति से तड़प रही ॥टेक॥
रोग सोग से रही घबरानी, चित में छाई है हैरानी।
छूटन की कोई विधि न जानी, काल करम भरमाय ॥
विपत से0 ना जाने क्या कर्म कमाये, जीवन कष्ट कलेश बिताये।
छिनभर सुख चैन नहीं पाये, हिया जिया नित अकुलाय ॥
विपत से0 राधास्वामी दीन दयाला, काटो आपति का जंजाला।।
अपना बल दे करो निहाला, गुन गाऊँ लव लाय ॥विपत से0
[18-586 ] दुख सहा जगत में आय, न सत पद जान के भूलू गी ॥टेक।।
यह संसार है दुख की खानी, मन में उपजी मेरे गलानी ।
कैसे अपनी सुनाऊँ कहानी, तज दुख के डगर को सजनी ।
सुख के हिंडोले भूलू गी ।। न सत0
स्वारथ बस सबने है फंसाया, दुख में कोई काम न आया ।
अब ज्ञान अन्त में पाया, कर गुरु का संग दिन रात ।
उमंग आनन्द में फुलूगी ॥
न सत राधास्वामी भक्ति के दाता, तुम हो सच्चे पितु अरु माता ।
सम्बन्धी मीत विधाता, ले नाम तुम्हारा ज्ञान अंकुस से।
मन मतंग को हूलू गी॥न सत0
19-587 1 तूने सतगुरु किया न संग, काल से कौन बचावेगा ।टेक।।
परमारथ स्वारथ खोया; नहीं अशुभ वासना धोया।
दुष्कर्म बीज घट बोया, फल पाकर अन्त में रोया।
लिया बोझ सीस पर बड़ा, भार यह कैसे उठावेगा ॥
काल से0 खटपट में उमर गवाई, तीरथ बरत रहा भरमाई ।
पाखंडवाद चित लाई, नहीं सूझी अपनी पराई ।
आये दिन मल मल हाथ, कष्ट से बहु पछतावेगा ।
काल से0 जग माया अगमापाई, नहीं कोई सगा सहाई ।
मतलब के बन्धु भाई, झूठे बन्ध रहा बन्धाई ।
जब आया काल का समय, साथ तेरे कोई न जावेगा ।काल से0
धन दौलत माल खजाना, घर बार मुल्क मैदाना।
व्यौहार का ताना बाना, तूने भेद न इनका जाना ।
पड़ भरम फाँस के फंद गला,यम खड़ग से हाय कटावेगा।काल से
राधास्वामी जग में आये, भक्ति मत पन्थ चलाये ।
गत सुरत शब्द धुन गाये, दुखियों को अंग लगाये ।
ले चरन कमल की छाँह, जल्द नर देही सुफल करायेगा ।काल से0
[ 20-588] तेरा भेद न जाने हाय, जगत धोखे में रहा ।।टेक।।
बिन बानी का शब्द है, बिना अक्षर का ग्रन्थ ।
बिन मन बुद्धि विवेक है, बिना डगर का पन्थ ।
कोई कैसे आवे जाय, भरम की धार बहा ॥
तेरा भेद0 सत्त तत्व के सिखर पर, दूत अद्वत न कोय ।
मन चिउटा फिसला गिरा, बुद्धि माखी रही सोय।
चित पक्षी न उड़ाय, बहु दुख कष्ट सहा ॥
तेरा भेद0 बिन बादल पानी बरस, बिना बून्द का मेह ।
भीजे तन मन सहज में, नगर ग्राम और गेह ।
चहूँ ओर बरसाय, घटा छाई है महा ॥
तेरा भेद0 मन अलसाना अमन बन, बुद्धि बनी अबुद्ध ।
चित अचेत चेते नहीं, कैसे पावे सुद्ध ।
नहीं सूझे जतन उपाय, किसने मर्म लहा ॥
तेरा भेद0 ‘नेति नेति’ कोई कहे, ‘एति एति’ कहे कोय ।।
‘नेति एति’ कोई नहीं, चतुराई गई खोय ।
जब सतगुरु भये सहाय, राधास्वामी चरन गहा ॥तेरा भेद
[21-589 ] क्या है पद निर्वाण, नहीं कुछ समझ में आवे ॥टेक।।
कोई करे इस लोक की आसा, कोई परलोक बतावे ।
कोई कथे ज्ञान ध्यान की महिमा, भेद न कोई पावे ॥
नहिं कुछ मंत्र पढ़े संध्या जप तप करे, देवी देव मनावे ।
मन्दिर मूरत की परिकर्मा, बैठ के ध्यान लगावे ।।
नहिं कुछ मत का मतवाला बन देखे, पक्षपात उरझावे ।
झगड़ा ठान के करे लड़ाई, भरमे और भरमावे ॥
नहिं कुछ आसन मारे योग यतन किये, गहरी समाध में जावे ।
जड़ चेतन की गांठ खुली कभी, जड़वत रूप बनावे ।।
नहिं कुछ खोज खोज के खोज थके जब, गुरु की संगत जावे ।
राधास्वामी दया रूप लख आवे, सोई निर्वाह कहावे ॥नहिं कुछ
[ 22-590 ] तेरे मन में झाड़ झंकार, तू बन में ना जा रे ।
बन में क्या है सोचले भाई, बन अनबन तेरे मन में रहाई ।
क्रोध सिंह गीदड़ किदराई, लोभ लोमड़ी रीछ बुराई । यह बन साफ करा रे ॥
तू बन में हाथी अहंकार मतवाले, चीते द्रोह काल विकराले ।
इनके दाव को कौन संभाले, साधु संग मिल देखे भाले । संगत गुरु गम पारे॥
तू बन में बन जाना है मन के बन जा, दुर्मति अनबन त्याग के बन जा।
गुरुमत शस्त्र साज तन तनजा, माया काल करम के रन जा। विजय की धूम मचा रे ॥
तू बन में0 माया बन में काल शिकारी, निस दिन सो करे मारा मारी ।
जीव वस्तु नित रहें दुखारी, इनकी दशा को कौन सुधारी । दुख की चोट न खा रे ॥
तू बन में राधास्वामी सतगुरु की शरनाई, बन बनकर मेरी बन आई।
बिगड़ी बात गुरु ने बनाई, बन की करनी मोहि बताई। बनवारी संग चित ला रे ॥तू बन में
[ 23-591 ] गुरु रूप न समझे कोय, भरम में पड़े अज्ञानी ॥टेक।।
गुरु को मानुष जानकर, भक्ति का करें व्यौहार ।
सो पानी अति मूढ़ हैं, कैसे जायें भव पार ।
देह के बने अभिमानी ॥
भरम में? गुरु को मानुष जानकर, शीत प्रसादी ले।
सो तो पशु समान हैं, संशय में अटके ।
गुरु तत्व न जानी ॥भरम में
गुरु को मानुष जानकर, मानुष करो विचार ।
सो नर मूढ़ गवार हैं, भूल रहे संसार ।
मोह के फाँस फसानी ॥
भरम में गुरु को मानुप जानकर, भेड़ की चलते चाल ।
वह बन्धन को क्यों तजें, व्यापे माया काल ।
पड़े योनि की खानी ॥भरम में
गुरु नाम आदर्श का, गुरु है मन का इष्ट ।
इप्ट आदर्श को ना लखे, समझो उसे कनिष्ट ।
बात बूझे मन मानी ॥भरम में0
गुरु भाव घट में रहे, अघट सुघट की खान ।
जिसे समझ ऐसी नहीं, वह है मूढ़ समान ।
नहीं गुरु रूप पिछानी ॥भरम में
चेला तो चित में रहे, गुरु चित के आकास ।
अपने में दोनों लखे, वही गुरु का दास ।
रहे गुरुपद घट ठानी ॥भरम में0
सुरत शिष्य गुरु शब्द है, शब्द गुरु का रूप ।
शब्द गुरु की परख बिन, डूबे भरम के कूप ।, नर जनम गंवानी ॥भरम में
गुरु ज्ञान का तत्व है, गुरु ज्ञान का सार ।
गुरु मत गुरु गम लखे, फिर नहीं भव भय भार ।
कमल जैसी गति आनी ॥
भरम में गधास्वामी सतगुरु सन्त ने, कही बात समझाय ।
जो नहीं माने बचन को, उरझ उरझ उरझाय ।
कौन समझे यह बानी ।। भरम में
[ 24-592 ] गुरु दरस दिखादो जल्दी, विकल मन सोच रहा ।।टेक।।
चैत में चित्र तुम्हारा देखा, चेत हिये में आया ।
मास बैसाख में साख मिली, गुरु बानी ध्यान लगाया।
जेठ में श्रेष्ठ के लक्षण जाने, उमंग न चित्त समाया।
जब अषाढ़ की धुन झर लाई, जिज्ञासू बन आया। नयनों नीर बहा ॥
विकल मन0 सावन मास सुनी गुरु महिमा, श्रवण भक्ति जागी ।
भादों भद्र का रूप संभारा, सहज बना अनुरागी ।
कुआर में उपजी हिये में श्रद्धा, मोह माया सब त्यागी।
कातिक चन्द्र विवेक की जोती, लखत भया बड़भागी।
उपजा हर्ष महा ॥
विकल मन0 अगहन घर की आसा छोड़ी, जग से भया उदासी ।
पूस में शशि जिभि ज्ञान प्रकासा, आनन्द मंगल रासी ।
माघ मघा में जोत की लीला, सूझी घट अविनासी ।
फागुन फाग की इच्छा उपजी, राधास्वामी दरस की प्यासी ।
कष्ट कलेश सहा ॥विकल मन0
[ 25-593 ] क्यों तू टू हे देश विदेश, तेरा प्रीतम तेरे घट में ॥
कासी वासी मथुरा भटके, मथुरा वासी कासी ।
भरमत फिरे भरम के बस हो, मिला नहीं अविनासी ॥
तेरा0 बन में जा कोई आसन मारे, अंग भभूत रमाई ।
सॉग बनाया कफनी पहनी, घट का मरम न पाई ॥
तेरा0 तीरथ में क्या जाकर पाया, क्या सौदा कर लाया।
मूरत पूजी पानी नहाया, साँच बता क्या पाया ॥
तेरा0 बरत किया संयम बहु धारे, मन थिर भया न तेरा ।
समझ बूझ अब चेतके पग धर, खोया समय बहुतेरा ॥तेरा0
जप तप साधन योग युक्ति सब, मन माया के भरमा ।
जड़ चेतन की गाँठ खुली नहीं, कटा न एको करमा ॥
तेरा0 पोथी ग्रन्थ शास्त्र पढ़ देखा, लगा सार नहीं हाथा।
जिसको तू नित ढूँढत डोले, वह तो तेरे साथा ॥तेरा0
घट अन्तर गुरु दशन करले, सुरत शब्द चित लाई।
तेरा प्रीतम रूप है तेरा, राधास्वामी भेद बताई ॥तेरा0
[29-594 ] नहीं मन में सोच विचार, भटके संसारी मग में ॥टेक।।
आसन मारा ध्यान लगाया, मिटी न मन की आसा।
कोल्हू से तेली का बैल बंधा है, घर में कोस पचासा ॥
हाँ मगमें0 वायु विषय प्रचंड भये जब, घट सागर थिर नाहीं ।
कैसे पड़े रूप की अपने, महा सूक्ष्म परछाँई ।
अपने भूले सबको भूले, रूप का भेद न पाया।
कस्तूरी तो नाभि में अपने, मृग यू ही भरमाया ॥
मन के सागर लहर उठत है, छाई धरन अकासा ।।
जहाँ जहाँ जावे खाये थपेड़े, लग कर तृष्णा आसा ॥
घट के भीतर सात समुन्दर, चौदह भुवन पसारा ।
घट को परख मर्म कोई पावे, सतगुरु का निज प्यारा ॥
रूप सिंधु की लहरी समझो, ब्रह्मा विष्णु महेशा।।
देवी देव बुदबुदे छोटे, बुन्द सिन्धु के देशा॥
राधास्वामी जग में आये, धार सन्त औतारा।
सुरत शब्द विधि रूप लखाया, पहुँचाया भव पारा ।
[27-595 ] पी पी ले अमी रस धार, गगन से झरी लगी ॥टेक॥
बुन्द का चूका घड़ा भर पावे, सपने में वह स्वाद न आवे ।
कोई किसे कैसे समझावे, एक बूंद पी तरी लगी ॥पी पीले0
नीचा हुआ सो भर भर पिया, अमृत का जीवन नित जिया।
नर शरीर के फल को लिया, ऊँचे को रोये मरेगी ॥
पी पीले0 प्यास बिना क्या होये प्रानी, प्यासे ही के लिये है पानी ।
बिन अधिकार न कोई जानी, अमृत विष की झरी लगी ॥
अमृत पिये अमर पद पावे, भव योनी में कभी न आवे ।।
जनम मरन के दोष नसावे, घट की गगरी भरन लगी ॥
बद अमी की गुरु की बानी, जीवन रस का है यह पानी।
राधास्वामी संगत कर मनमानी, डाली प्रेम की हरी लगी ॥
[28-596 ] झूला झूले सुहागिन नार, पिया का धर हृदय में ध्यान ॥टेक।।
प्रेम की घटा गगन घट छाई, भक्ति झरी चहुँ दिस झर लाई ।
आनन्द शान्ती मन में आई, पिया का बड़ा अभिमान ॥
पिया का0 बिजली चमके दादुर बोले, पी पी करत पपीहा डोले ।
धरन अकास की नाड़ी टटोले, यही है सतगुरु ज्ञान ॥
सुरत शब्द का गढ़ा हिंडोला, प्रेम की पेंग से ले झकझोला।
सुखमन मध्य में इत उत डोला, आनन्द रस की खान ॥
शब्द ज्ञान अनुमान प्रमाना, गावे सुरत राग सुहाना ।
सुख पाया और हर्ष महाना, कोई करे कैसे बखान ॥
मधुर रसीली ओम की बानी, राग अनुराग विराग निशानी।
मंगल दायक और सुखदानी, छिड़ी मल्हार की तान ॥
अमी धार की बरखा न्यारी, हित चित जिया को लागे प्यारी।
पर कोई मिले जीव हितकारी, करले मोद से पान ॥
राधास्वामी काम की आसा मन में,भर सावन रहे इसी यतन में।।
सुमिरन ध्यान और शब्द भजन में, सहजे बने सुजान ॥॥
बिनती
[ 597 ] गुरु ने अस कृपा करी, दिया ठौर ठिकाना।
काल की फाँसी कट गई, मिला शब्द प्रमाना ।
गुरु मेरे समरथ साइयाँ, सच्चे दातारा ।
गुरु चरनन बल जाइये, गुरु परम उदारा ।।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हैं, गुरु हैं त्रिपुरारी ।
सतगुरु ब्रह्म स्वरूप हैं, गुरु की बलिहारी ॥
गुरु मेरे जान व प्रान हैं, गुरु ही मन बानी ।
राधास्वामी की दया, गुरु पद पहचानी ।।
प्रार्थना
[ 598 ] धन रूप भूप अनूप निगुन, सगुन गुनकारी प्रभु ।
धन अजर अमर अनन्त शोभा, सिंधु हितकारी प्रभु ॥
नहीं भेद तेरा कोई जाने, ज्ञान धन धरनी धरम् ।
तू मंत्र यंत्र है तंत्र गोप है, सन्त जन मन रंजनम् ।।
जो प्रगट गुप्त अशोच निर्मल, असम सम शीतल सदा ।
सोई नाथ करुना पुंज कीजे, दास सेवक पर दया ।
धन बार पार अपार मध्य, अनंत आदि विश्वेश्वरम् ।
तेरी वन्दना करें भक्त निसदिन, काम खलदल गंजनम् ।।
जेहि नेति नेति पुकार, अगम निगम न भेद को पावहीं ।
जप योग त्याग विराग संयुता, योगी ऋषि मुनि ध्यावहीं ॥
धन सन्त रूप कृपा विशेष, जो जीव निबल को तार ही।
भज राधास्वामी नाम सतगुरु, और सकल बिसार ही ॥
सोलहवीं धुन
[1-599 ] तू दयाल है दया की मूरत, तेरी दया का दान मिले ।
भक्ति मिले शुभ शक्ति मिले, सत संगत में गुरु ज्ञान मिले।
जग की सहज होय कठिनाई, सुख साधन का है अबसर ।
नाम मिले सत धाम मिले, साधु सेवा सन्मान मिले ॥
टेढ़े जतन को करदे सीधा, युक्ति निराली बतलादे ।
थोड़े ही में समझादे तू , सत मत की पहचान मिले ॥
ज्ञान के तीन रूप हैं स्वामी, अनुभव है उनकी चोटी ।
शब्द मिले अनुमान मिले, अनुमान के साथ प्रमान मिले ।।
राधास्वामी सतगुरु दाता, हम सब हैं तेरे सेवक ।
सहज योग की सहज समाध का, सुमिरन भजन और ध्यान मिले।
[2-600 ] दाता ज्ञाता पितु और माता, छिन छिन तेरा ध्यान रहे ।
जग त्राता भ्राता सतराता, तेरे नाम का गान रहे ।।
सुमिरन तेरा ध्यान हो तेरा, तेरा भजन हर आन रहे ।
तेरी बानी अगम निशानी, उसी ओर मेरा कान रहे ।।
तुझको ध्याऊ तुझको गाऊँ, तेरा ही अरमान रहे ।
सुमिरन भजन ध्यान सेवा में, मेरी जान और प्रान रहे ।
सुरत निरत तेरे रंग राती, तेरे रूप का ज्ञान रहे ।
जहाँ जहाँ देखू तेरी लीला, तेरा ही अभिमान रहे ।।
जो जो सुनू सो तेरा बचन हो, मन से दूर मदमान रहे।
राधा स्वामी चरन शरन बलिहारी, भव से सुरत अलगान रहे ।
॥
॥
[303
[3-601 ] जगत में आये बहुत दुख पाया, प्रेम का नगर दिखादो जी।
भरमत भरमत चहुँ दिस डोलू, सच्ची डगर बता दो जी ।
मोह नींद में निस दिन सोये, बाँह पकड़ के जगा दो जी ।
मैं तो अचेत चेत नहीं किंचित, चित से अपनी चेता दो जी ॥
ज्ञान भक्ति का सार न जानू, मेरा अज्ञान मिटा दो जी।
चित चकोर निरखे गति चंदा, ऐसी लगन लगा दो जी ।
सुध बुध मन की सब ही भूलू , प्रेम का प्याला पिला दो जी।
मतवारों की चाल चलू नित, प्रीत की चाल चला दो जी ॥
आँख न मृदू कान न रूधू, सहज समाधि लगा दो जी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर उगादो जी ।।
[602 ] धन धन भव भंजन जन मन रंजन, काम निकंदन गुरु राई ।
धन सुरमुनि नायक जगत सहायक, सुखदायक धन प्रभुताई ॥
धन करुणा सागर सब गुण आगर, गुनातीत गदि हरी ।
धन घटघट बासी प्रभु अविनाशी, सुखरासी दुख नास करी॥
धन ज्ञानी ज्ञाता विश्वविधाता, सर्व जनन के पितु माता।
धन करता धरता नेह की सरिता, मुक्ति भक्ति के निजं दाता ।
धन परम सियाने वेद बखाने, ऋषि मुनि नहीं जाने चतुराई ।
धन दीन दयाला सहज कृपाला, बार पार नहीं कोई पाई ।।
चरन शरन दे अपना कीजे, भक्ति भाव राधास्वामी दीजे ।
मैं अति नीच निकाम अनारी, पद सरोज में ले लीजे ॥
[5-603 ] धन धन धन दाता सुर मुनि त्राता, व्यापक परमा नन्दा ।
धन धन अविनाशी घट घट बासी, माया रहित मुकुन्दा ।
धन अपरम्पारा जगत अधारा, पार न पावे कोई ।॥
धन परम कृपाला दीन दयाला, करहु अनुग्रह सोई ।।
आदि अनादि अनन्त अमाया, निःकाया महिमा भारी ।
देव दनुज नर किन्नर करता, सन्त जनन के हितकारी ।
क्या कोई जाने तुम्हरी लीला, अगम अपार अरूप हो तुम ।
भेद न पावे ऋषि मुनि कोई, सारे जगत के भूप हो तुम ॥
सुनत कान बिन लखत नैन बिन, चलत बिना पद निस वासर ।
बिन जिभ्या बोले बहुबानी, ग्रहण करत सब कुछ बिन कर ॥
[9-604 ] प्राणों का है प्राण पिता तू , जीवन का है आधारा ।
निर्भर यह ब्रह्मांड है तुझ पर, तू है सब का रखवारा ॥
तू है जोत नेन की सब के, तू है घट घट का वासी।
अन्तरयामी प्रीतम प्यारा, अजर अमर विभु अविनासी ।।
जल में तेरी शीतलता है, तेज में है प्रकाश तेरा ।
वायु में है तेरी शक्ति, और आकाश में भास तेरा ।।
तू है एक अनेक रूप में, अगम अगोचर निर्माया ।
यह ब्रह्मांड तेरी है काया, फिर भी तू है निरकाया ॥
बिन पग चलत सुनत बिन काना, मिन जिभ्या बाचाल है तू।
माया मोह से रहित निरन्तर, सब जग का प्रतिपाल है तू ॥
तू है देस निमित भी तू है, और कहूँ क्या काल है तू ।
जड़ चेतन है कारन कारज, करुणा मय कृपाल है तू ॥
फूल फूल में बास है तेरी, मेंहदी में है तू लाली ।
चकमक में ज्यों आग छुपी है,एक तिल नहीं तुझसे खाली।
दया सिंधु है दीनबन्धु है, भक्त जनन का हितकारी ।
सृष्टि प्रलय लीला है तेरी, तू है हलका तू भारी ।।
तू व्यापक तू अविच्छिन्न है, तू सब में सब हैं तेरे ।
सब में रमा अलग है सब से, सब से दूर सब से नेरे ॥
॥
॥
[605 रोम रोम में गुप्त हुआ है, अणु अणु में प्रगट है तू ।
हृदय गुफा में बास है तेरा, जीव जन्तु का घट है तू ॥
महिमा अनिमा लधिमा गरिमा, हैं अनेक यह तेरे रूप ।
तू सेवक है तू स्वामी है, तू है परजा तू है भूप ॥
क्या माँगू तुझसे मैं स्वामी, तू मेरा मैं हूँ तेरा ।
खोजूं क्यों मैं देस देस में, हिये में है तेरा डेरा ॥
[ 7-605 ] सबका आदि अन्त तू दाता, धन्य धन्य तेरी माया ।
व्यापक सत चित आनन्द स्वामी,कर निज दासों पर दाया।
तेरी थाह न पावे कोई, अगम अपार से पार है तू।
लीला तेरी सब से अद्भुत, एक तीन दो चार है तू ॥
जड़ चेतन में तेरी छाया, क्या कोई भेद तेरा जाने ।
योगी ऋषि मुनि ध्यान लगावें सबमें विभो तुझको मानें।
हम सब तेरे बाल बाल हैं, तू पितु मात सखा स्वामी ।
सबमें रमा सकल से न्यारा, घट घट का अन्तरयामी ।
[8-606 ] मन मोहन चित चोर छबीला, अलबेला प्यारा है तू ।
मेरे मन में आन विराजा, इन आँखों का तारा है तू ॥
तुझपर छिनछिन बलि बलि जाऊँ,निसदिन तेरा गुन गाऊँ।
तुझको सुमिरूँ तुझको ध्याऊँ, सच्चा करतारा है तू ॥
योग कठिन वैराग कठिन है, ज्ञान का दान मिले मुझको ।
प्रेम बसा जब मन में आकर, प्रान का अपने आधारा है तू ॥






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