यथार्थ संदेश
प्यारे जोगेन्द्र,
तुम्हारा पत्र मिला । तुमने लिखा कि मेरे और इटारसी निवासी सत्संगियों के सुधार के लिये कुछ लिखा जाय ।
सोचता हूँ क्या कहूँ, और क्या न कहूँ मेरे अज़ीज ।। अपने जीवन का जो अनुभव, वह ही दे सकता अजीज ।।
मनुष्य के अस्तित्व को जब होश आता है, संसार की लीला देखता है। वाह्य प्रभावों से प्रभावित होता है। उसी समय उसमें समझ-बूझ की योग्यता या स्वाहा स्वभावतः उत्पन्न Yो जाता है । मैं भी इसी सिद्धान्त के अनुसार प्रभावित हुआ। कल्पना हुई कि इस रचना का आधार बनाने वाला, मालिक, राम, ब्रह्म या किसी और नाम से पुकारो, कहाँ है । उसके होने का प्रमाण मेरे अन्तःकरण ने यह दिया कि सत् (हस्ती ) जब भी प्रगट रूप में आयेगा, सत् से प्रगट होगा। सारा जीवन इसी खोज और तलाश में व्यतीत किया । दिल में भावना थी कि जो कुछ अनुभव होगा, सचाई के साथ प्रगट कर जाऊँगा ।।
प्रश्न किया जायगा कि वह अनुभव क्या है ? ।
वह यह कि उस मालिक या स्वरूप की खोज करने वाले मनुष्य का मन, विचार और भाव अपने प्रेम या भक्ति के अधीन समय आने पर समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो कुछ बाक़ी रह जाता है और जिससे मनुष्य के विचार या मन की उत्पत्ति होती है, उसी का नाम स्वस्वरूप, मालिक या आधार है। शास्त्रों, उपनिषदों और संतों के अनुभव के अनुसार जब तक निर्विकल्प समाधि को अवस्था प्राप्त नहीं होती अथवा दसवाँ द्वार नहीं आता, उस समय तक खोज का क्रम चालू रहता है, समाप्त
[ ४] नहीं हो सकता। खोज के समाप्त होने पर जो वस्तु बाकी रहती है, मेरी समझ या अमुभव के अनुसार वह प्रकाश या नूर
और शब्द है ! । ख्याल रहे कि सुन्न अवस्था और बेहोशी में अन्तर है । मुझे ऐसी होलत का भी अनुभव हुआ है कि विचार ने निर्विचार ( बेख्याली ) का रूप धारण किया । शून्य अवस्था आई मगर वह बेहोशी की अवस्था थी; चूंकि इसमें चैतन्यता का अभाव होता है, इसलिये वह हालत अच्छी नहीं समझी जा सकती ।।
बुद्धिवाद वाला मनुष्य शून्य अवस्था को नेस्ती ( नेति ) । समझेगा, मगर यह गलत है । वह ( नेति ) नेस्ती नहीं है।
यद्यपि उस समय व्यक्ति में संकल्प-विकल्प का अभाव होता है, मगर उस हालत में प्रकाश या नूर और शब्द का अस्तित्व रह जाता है और नूर तथा शब्द को देखने व सुनने वाला कोई साक्षी होता है। मैंने उसकी खोज की । अन्त में क्या हुआ
वह अरंग अरूप होकर विस्माधि होकर,
लामुहीत हो जाता है। क्या होता है कौन कहे वह,
कहने सुनने में नहीं आता है । इस निज अनुभव के आधार पर मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि मजहबी दुनियाँ में जो ढंग पूजा-पाठ, उपासना, योग और ज्ञान-ध्यान आदि के बताये गये हैं, वह सब-के-सब बीच की अवस्था या स्थान हैं, मगर अनावश्यक नहीं। यह लाजिमी हैं। हाँ, उनके आगे मानवीय अस्तित्व या कोई व्यक्ति बिना सतगुरु की सहायता के नहीं जा सकता। वह मनुष्य को विश्वास करा देता है
[५ ] वह मिला हुआ है हम में, हम उसमें रहते हरदम । जैसे पानी में है मछली, जो पानी का रूप है हरदम् ।।
अतः पूजा का कोई सच्चा ढंग जो मनुष्य की कुरेद् को मिटा सकता है तो वह केवल किसी ऐसे पूर्ण पुरुष की संगत या सत्संग है जो स्वयम् भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग के बन्धनों से स्वतन्त्र हो चुका है। चूकि उसको शारीरिक, मानसिक और आत्मिक हर प्रकार के भान और बोध का अनुभव होता है और स्वयं निर्द्वन्द अवस्था में रहता है। इसलिए जिज्ञासू को वह खास युक्ति या तदुबीर और अपने संकल्प की सहानुभूति के द्वारा निर्द्वन्द अवस्था में पहुँचाकर मुक्ति या
कारे की सूरत दिला देता है । (ऐ जोगेन्द्रसिंह ! जिस समय तू मेरे पास, होशियारपुर आया, मैने देखा कि तू भी उसी दीवानगी में फँसा है जिसमें कि मैं स्वयम् रह चुका था। तेरे रोने ने मेरे दिल को चलायमान किया । ख्याल आया कि तेरे भ्रम और संशय दूर होकर जीवन को सच्चा भेद मिल जाये और मेरी तरह स्वतंत्र होकर निर्द्वन्द अवस्था में जीवन व्यतीत करे। दूसरों के लिए अपनी शक्ति के अनुसार सुख और शान्ति देने वाला सिद्ध हो सके । दुनियाँ में सबसे श्रेष्ठ सुधार जिसकी वास्तव में मनुष्य को आवश्यकता है वह यह है कि मनुष्य को इस बात का ज्ञान हो जाय कि वह कौन है ?
मैं तुमको बुद्धिवाद के चक्र और फिलोसफी (दर्शन-शास्त्र) के तर्क-वितर्क में फँसाना नहीं चाहता। वाणी-जाल महा-जाल है। निज अनुभव के प्रकाश में तुम्हारे भ्रम और संशयों का अन्त करना चाहता हूँ। मुझे याद है कि चार वर्ष पहले जब तू मेरे पास होशियारपुर आया, तेरी क्या दशा थी । तू दुखी
[ ६ ] था, अशान्त था, रोता था और जो चादर तू मेरे लिये लाया था, तेरे प्रेम और दुख की भावनाओं से परिपूर्ण थी। मैंने तेरी दशा को महसूस किया और सहारा दिया । तुम इस बात से दुखी थे कि गुरु कौन है । वह ( मेरे ) अन्दर प्रगट क्यों नहीं होता । इसका कारण वह शिक्षा थी जो तुमको मिली थी और वह अज्ञान था जिससे प्रभावित तुम शिक्षा के सारांश को न समझ सके कि असलियत के दृष्टिकोण से गुरु कौन है ।
गुरु किया है देह को, सतगुरु चीन्हा नाहिं ।।
इसीलिये वय ताप से, तू छूटा था नाहिं ।। मैंने तुम्हारे साथ खेल खेला, और इटारसी निवासी उसू स्त्री के द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि सचाई क्या है, जो र कहती थी कि दयाल फकीर मेरे अन्दर प्रगट होता है, बं: करता है, हालांकि मुझे इन बातों की कोई जानकारी न थी।
जो अज्ञान तुम्हारे दुःख का कारण था, उसी के कारण भिन्न-भिन्न मजहब, पंथ और सम्प्रदाय दुनियाँ के अन्दर प्रगट हुए। राम-उपासक, कृष्ण-उपासक, शिव-उपासक और शक्ति आदि के उपासक अपने ही संकल्प और विश्वास से अपना उपास्यदेव बनाकर और उसे सच्चा मानकर चक्कर खाते रहे और उनके अनुयायी धार्मिक पक्षपात के शिकार होकर सिर-फुटौल करने लगे। किसी किसी समय धार्मिक उन्मत्तता ने, जिसका कारण असलियत से अनभिज्ञता है, दुनियाँ के अन्दर वह निर्लज्ज खूनी ( रक्तपात ) ड्रामा खेला कि इंसानियत खून के आँसुओं से रोने लगी । देख-देखकर
आश्चर्य होता है कि इस सिर फुटौल का नाम धर्म रक्खा गया है और वह लोग जो मनुष्यता के शत्रु थे शहीद और गाजी कहलाये ।।
[ ७ ] । जग में घोर अंधेरा भारी, ऐ जोगेन्द्र भाई । इसी दशा को देख के प्रगटे, कछुक संत जग माहीं। इनके चेले भूले राज़ को, धन अरु मान में धसते जाहीं ॥ उसी धार्मिक पक्षपात को मिटाने के लिये, जिसकी उत्पत्ति अज्ञान से है, वह परम तत्व सन्त कबीर, गुरु नानक, राधास्वामी दयाल और दाता दयाल के रूप में संसार में आया
और लोगों को सत मार्ग दिखाया । मगर अफ़सोस है कि डेरा बन्दियों और गलत गुरुआई की चाह ने फिर पर्दा डाल दिया । यही अज्ञान तुम्हारी अशान्ति और दुख का कारण
था। चूँकि तुम में सचाई की चाह थी, मौज मेरे पास ले । आई। मुझे खुशी है कि तुम्हारे अज्ञान का एक अग टूट । गया है।
अब फिर वही प्रश्न आता है कि तुम कौन हो। इस बात का पूर्ण ज्ञान पूर्ण अनुभव के पश्चात् आता है । अश रूप में तुम समझ लो कि तुम मन थे। अज्ञान से प्रभावित होकर मानसिक रूप से दुखी थे। अज़ीज ! अब एक काम करो। अपने मन में सचाई, प्रेम, प्रीति और सहानुभूति के भावों को स्थान दो ताकि तुम्हारे अपने भाव व विचार तुम्हारे लिए सुखदाई सिद्ध हों ।। । यह एक सचाई है कि जो आदमी अपने इष्ट के सम्बन्ध में जिस प्रकार के विचार परिपक्व करता है, समय आने पर उसके विश्वास अनुसार उसका अपना भाव और विचार ही इष्ट का रूप धारण करके उसके सामने आता है और उसके अपने ही भाव के अनुसार अपना कर्त्तव्य पूरा करता है । यदि मन में सचाई और प्रेम का भाव है तो साधारण दशा में वह आदेश और पथ-प्रदर्शन या रहनुमाई मनुष्य को सुख और शान्ति देने वाली सिद्ध होती है। दो वर्ष पहले की बात
[ ६ ] तुमको याद होगी जबकि सत्संग के लिये दयाल धाम में आये थे और यह प्रार्थना की थी कि मुझे अन्तिम स्थान पर पहुँचा। दिया जाय । मैंने उत्तर दिया था कि दस वर्ष के बाद यह काम पूरा होगा। तुमने बड़े आश्चर्य में पड़ कर यह बताया था कि ६ महीने हुए जब आप मेरे अन्दर प्रगट हुए, कुछ साधन कराया और हिदायत दी कि काम पूरा होने में अभी दस वर्ष लगेंगे। प्रियवर ! मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि मुझे उस समय तुम्हारी अन्तरीय दशा की कोई जानकारी न थी, इसलिए सचाई के प्रगट करने के लिए एक लेख मैंने ‘मनुष्यबनों में दिया था, तथा इस प्रकार की कुछ घटनाओं का वर्णन्‘निष्कलंक अवतार’ नामी पुस्तक में दिया गया है । इसे ध्यान पूर्वक पढ़ो और सच्चाई के समझने का प्रयत्न करो। । मेरे इन निज अनुभवों के आधार पर तुमको विश्वास हो जाना चाहिए कि मनुष्य के अपने भाव और विचार जिस प्रकार के होते हैं और उनमें जितनी अधिक सचाई होती है, उसके अनुसार उसका अपना विश्वास और भाव ही उसके अन्तर में प्रगट होकर उसकी सहायता करता है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपने भाव, विचार और विश्वास में परिवर्तन करके अपनी मानसिक अवस्था को जैसा चाहे बना सकता है । इसलिये मैं बहुधा कहा करता हूँ कि अपने आप में सच्चे बनो (Be true to your self ) । तुम अज्ञान और भ्रम के कारण दुखी थे। सचाई की खोज में काफ़ी रुपया भी तुमने खर्च किया तथा और भी बहुत से खेल खेले । मैंने जान बूझकर तुम्हारी मानसिक अवस्था का बहुत सुधार कर दिया है।
प्रियवर याद रखो ! अज्ञान से तथा भावुकता से मान और बड़ाई के प्रभाव में आकर दिया हुआ दान कल्याणकारी
[ ६ ] नहीं होता। देने वाले को तो कुछ फ़ायदा होता नहीं है, हाँ, लेने वाला भी डूब जाता है। अपने जीवन और साधारण सत्संगियों की जाँच-पड़ताल करो । मेरी बात मैं सचाई पाओगे ।।
लालची गुरू और अज्ञानी चेले । नरक कुड में दोनों खेले ।।
गलत गुरु इज्म का भाटा आया ।। !teb!
जीवों को बुरी तरह फँसाया । दर्द उठा मैं हूं प्रगटाया। सत्य कहूं तो कोई न पतियाया ।। राधा-स्वामी मत में आकर, सार-सार है हमने पाया । बिन दयाल अब हम हेला मारे,
मित्रो तुमको मन ने धर खाया ।। तुम कौन हो ? अब इस सवाल का दूसरा अग लो। मैं तुमंको यह बताऊँ कि सहानुभूति के प्रभाव से मेरा मन्तव्य तुम्हारे अज्ञान को दूर करना है। किसी निजी स्वार्थवश मैं तुमको धोखे में नहीं डालता । एक शब्द पढ़ो
हम आये आये आये हैं। तुमको दुखी देख आँखों से, मन में दया समाई।। दया रूप धर प्रगटे जग में, दया यहाँ ले आई ।।हम०। मरज दया का गगन प्रकाशा. किरणें दया की धारा..
[ १० ] मांगें भीख ज्ञान की गम नहिं, तुम उनके विश्वासी ।।हमः।। भूल-भरम तज कर सतसंगत, हिय की आँख खुलाओ।।
राधास्वामी रूप निरख कर, दया से काज बनाओ ।।हम०।। | प्रगट रूप में तुम ५३ फुट लम्बे कद के मनुष्य हो। चेहरा सुन्दर मस्ती लिये हुए है। यह शरीर है। इसके अन्दर तुम्हारा मन है जो तुम्हारी हर प्रकार की कल्पनाओं और भान-बोध की रचना का आधार है। इसका कुछ वर्णन मैं कर चुका । इसके परे तुम्हारा आत्मा है जो प्रकाश या नूर है। चूंकि
आत्मा का रूप प्रकाश या नूर है, इसलिये प्राचीन ऋ ने गायत्री मन्त्र में आदेश दिया है कि अपने अन्दर सा रूपी सूर्य या प्रकाश को दर्शन करो। प्रियवर ! वह प्रका अथवा वह सूर्य तुम्हारा अपना रूप है और वह तुम स्वयम् हो।
आगे गायत्री मन्त्र बताता है कि दर्शन से क्या लाभ होगा। – वह तुम्हारी बुद्धियों का प्रेरक होगा ।। | उसको हासिल वह वरे, जिसमें न हो कोई असि । बिन बेआस हुए न कोई, पा सकता वह प्रकाश । कहता हूँ कह जात हूँ, अपने जीवन की तलाश । देह मन के बन्धन न छुटें तब तक, कहन-सुनन बकवास ।
तुमको जो शिकायत है उसका कारण यह है कि अभी आस बाकी है और यह अभी रहेगी। प्रारब्ध कर्म अटल हैं। बिना भोगे गुजारा नहीं। यही कारण है कि तेरे अन्दर तेरे
अपने ही आत्मा ने मेरे रूप में यह कहा था कि अभी दस ।
|!|Tuयु उमे।। ऑर बाढ़ा, दया भाव विस्तारा ।।हमे।। सुर, नर, मुनि की यह है रीती, स्वारथ लाग करें सब प्रीती । हम में नहीं है स्वास्थ किंचित, लख-लख करो प्रतीती॥हम०॥ उदर निमित्ति धरें सब भेषा, जोगी जती उदासी ।
वर्ष लगेंगे । दो वेष व्यतीत तुमको दे आया हूँ निष्काम भाव से किये जाअ ताप कट जायें।
सत्संग का पैसा सत्संग के काम में आये । जो देना नहीं उसे मिलता नहीं । तुमने अज्ञानवश प्रेम से दिया था। दिल
[, ११ ] । में सचाई थी। मौज ने तुमको बदला दिया । जानते हो सत्संगियों के पैसे के अधिकारी कौन हैं ? दुःखी, अशान्त
औरं भ्रम में फंसे हुए जीव ।।
गुरु और सतसंगी दोऊ मीत । ( स्वामी जी ) * गुरु ज्ञान देता है । सतसंगी सांसारिक और मानसिक सुख देते हैं और दिलाते हैं। असली और सच्चा गुरु शब्द और प्रकाश के रूप में प्रत्येक मनुष्य के अन्तर में है। वही निज स्वरूप है। वही सच्चा हितकारी है मगर उसकी समझ बिना साधन, अनुभव और पूर्ण पुरुष के सत्संग के नहीं ॥ सकती। तुम स्वयम् साधन द्वारा अपने आपको शब्द और प्रकाश का रूप बना लो ताकि तुम्हारे दर्श-पर्श से दूसरों को लाभ पहुँचे । जो मनुष्य अपने आपको शब्द और प्रकाश का रूप बना लेता है, उसमें यह गुण होना चाहिए कि वह उस अवस्था से उठकर जो कुछ कहे वह सत्य हो। यदि ऐसा नहीं होता तो समझ लो कि वह साधू या महात्मा पाखंडी है। . शास्त्रों में भी कहा है-‘ब्रह्म वाक्यम् जनार्दनम् ।’ गुरुनानक भी ऐसा ही कहते हैं
साध बचन पलटे नहीं, पलट जाय ब्रह्मण्ड । जानते हो साध और संत किसे कहते हैं-उसे कहते हैं। जो अपने अन्दर शब्द और प्रकाश का रूप हो चुका है । ज्ञान ध्यान की बातों से अथवा अच्छे व्याख्यान देने से कोई साध-संत और ब्राह्मण नहीं हो सकता। असलियत और सतपद् साधु और संतगति से भी आगे आता है। कभी-कभी साध और संत भी, यदि उनको पूर्ण ज्ञान और अनुभव प्राप्त नहीं है, गिर जाते हैं। कबीर की वाणी है :-
संत तब तक भय करे जब तक पिंजर साथ ।
|| १२ ] मैं जाना मन मर गया, मर कर हुआ भूत ।
मेरे पीछे लग पड़ा, ऐसा मेरा पूत । शीघ्रता मत करो । चले-चलो। इसी जीवन में काम बन जायगा अर्थात्, निर्द्वन्द अवस्था आ जायगी और अपने व्यक्तित्व को मिटा दोगे। कहा है उतावला सो बावला । दूसरों को वह साथ ले जा सकता है, जो मुसाफ़िर है । जिसकी यात्रा पूर्ण हो चुकी है वह दूसरों की क्या सहायता कर सकता है ।
साधन जोगेन्द्र ! अभी तुम्हारी बुद्धि इतनी सूक्ष्म नहीं हुई कि भेद को पूर्ण रूप से समझ सको । फिर भी मुझे आशा है कि समयं आने पर पूर्ण अनुभव हो जायगा ।।
सोचो ! मनुष्य के जीवन का असली ध्येय क्या है। जीवन को एकमात्र ध्येय बेग़मी, बेफिक्री, पूर्ण अनुभव और आनन्दं प्राप्त करना है। गुरु नानक ने जीवन भर की खोज के पश्चात् उस मालिक का रूप निर्भय, निर्वैर, अकाल और अडोल माना है। और इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये सतगुरु की मुख्यता को स्वीकार किया है। मनुष्य हज़ार कोशिश करे, सतगुरु की सहायता के बिना यह अवस्था उत्पन्न नहीं हो सकती । प्रत्येक मनुष्य की अशान्ति और दुख के कारण भिन्न होते हैं । सबको एक ही उपदेश काम नहीं दे सकता । गुरु चूंकि सार भेद का ज्ञाता होता है वह मनुष्य की रुचि की जाँच-पड़ताल करके उसको तजुर्बा कराता हुआ शान्ति दिला सकता है। प्रियवर ! यह वह रहस्य है जो मुझे जीवन भर की खोज के बाद मिला है ।
मानवीय स्वभाव की भिन्नता और समय की आवश्कता को दृष्टि में रख कर संतों के मार्ग में वक्त (सामयिक ) गुरु की जरूरत को महसूस किया गया है। हिन्दू शास्त्रों ने भी इसी
|| १३ ] । बात को स्वीकार किया है मगर अफ़सोस है कि कोई उनको समझने का प्रयत्न नहीं करता।
शास्त्रों में मानव जीवन को ४ भागों में बांटा है। शारीरिक या दुनियाँ की दृष्टिकोण से इनके नाम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ । वानप्रस्थ और सन्यास हैं। मानसिक दृष्टि से भी जीवन की चार ही अवस्था हैं जिसको जिस अवस्था में निर्भयता, निर्बरता और अडोलपना प्राप्त हो जाता है वह स्वाभाविक रूप से दूसरी अवस्थाओं की ओर ध्यान नहीं देता।
सनक, सनन्दन, संतकुमार आदि चार ऋषि हुये हैं जिनका वर्णन हिन्दू ग्रन्थों में आता है। वह जीवन भर ब्रह्मचर्य अवस्था में रहे। ध्यान रहे कि यहां ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल स्थूल कामांग से ही नहीं है बल्कि किसी प्रकार की चाह या वासना में
आसक्त न होना ही असली ब्रह्मचर्य है।
दूसरा उदाहरण राजा जनक का है। जिनका गृहस्थ में रहते और शासन कार्य करते हुये ज्ञान हो गया । इसी अवस्था । में उनको बेरामी बेफिक्री और अचिन्तपना प्राप्त हो गया । फिर उनको वानप्रस्थ और सन्यास अवस्था में जाने की आवश्यकता न पड़ी।
गौतम बुद्ध, गुरु नानक देव आदि संतों को इस बात की खोज में कि मनुष्य का दुख कैसे दूर हो सकता है और पूर्ण सुख कहां है, गृहस्थ का त्याग करके वानप्रस्थे अवस्था में जाना पड़ा और अनुभव के पश्चात् पूर्णता प्राप्त हुई । वे अपने आत्मज्ञान से करोड़ों जीवों में संस्कार डाल गये ।।
स्वामी जी महाराज और संत कबीर आदि संतों को सन्यास धारण करना पड़ा। स्मरण रहे कि सन्यास से मेरो अभिप्राय वह नहीं है जो प्रगट रूप से लगाया जाता है। यह रहस्य उस
[ १४ ] समय खुला जब व्यक्तित्व लय हो गया अर्थात् मन और जीवन का बोध अमनपने और निर्बोधता की अवस्था में बदल गया चूंकि स्वामी जी महाराज और सत कबीर आदि का अनुभव बहुत अधिक था इसलिये उनकी वाणी भी बड़ी अनुभव पूर्ण है।
आज कल कलियुग का दौर है । बुद्धि वाद का समय है । वाह्य प्रभाव मानव स्वभाव को इतना अधिक प्रभावित कर रहे हैं। कि शान्ति मिलना कठिन है। अतः वर्तमान समय में केवल संतों की शिक्षा ही लाभदायक हो सकती है। वह शिक्षा क्या है ? पहले अपनी मानसिक कल्पनाओं और अपने भान को मिटा दो । निर्विकल्पता की दशा में आओ। मन अमन हो जाये। फिर पूर्ण ज्ञान की प्राप्ती होगी। इससे पहले शान्ति मिलना कठिन है । क्षर-अक्षर निःअक्षर पारा ।।
मैंने बताया कि जीवन का असली ध्येय निर्भय निर्वैर और अडोलपना है। और सब बातें अशमात्र और ऊपरी है, मगर मन ऐसा मानने नहीं देता । इसलिये वक्त ( सामयिक ) गुरु के आदेशानुसार जीवन को अमली बनाने की आवश्कता है। मैं स्वयं महा चंचल वृति का मनुष्य था। दातादयाल ने मेरे लिये बड़े-बड़े कष्ट उठाये । इसलिये मेरी समझ में यह आया है
ध्यान मूलम् गुरु मूर्ति, पूजा मूलम् गुरु पदम् ।
मंत्र मूलम् गुरुवाक्यम् मोक्ष मूलम् गुरु कृपा ।। इसलिये असली साधन यह हैगुरु जो कहें सो हितकर मान, गुरु जो कहें सो चित धर ध्यान ।।
लेख में किसी विशेष साधन का वर्णन करना जन साधारण को पथ-भ्रष्टता ( गुम रही ) में डालना है। मेरे विचार से किसी पूर्ण पुरुष की संगत में उनके वचन को सुनना ही असली
साधन या असली सुरत शब्द योग है।
। । १५ ] । यदि वह आज्ञा दें तो साधन किया जाय वर्ना नहीं । उनकी आज्ञा का पालन ही असली साधन है।
प्रियवर ! पंथ को चलाने, सोसायटी बनाने और डेरों के चमकाने का और ढंग है और निभयता, निर्बरता और अडोल पनी प्राप्त करने का दूसरा ढंग । सत्पुरुष हुजूर बाबा साँवलेशाह कहा करते थे कि संत किसी धर्म, पंथ या सुसाइटी को स्थापित नहीं करते। उनका मन्तव्य केवल जीवों को सुखी बनाना है और बस ।।
मगर मेरे इन वचनों से केवल विशेष-विशेष सत पद के जिज्ञासुओं को ही लाभ होगा। जन साधारण के हृदय पर मेरे लेख से उदासीनता पैदा होगी, क्योंकि वे गुरुमत के दिखावे की क्रियाओं और शब्दों के टेकी हैं। शब्दों के तत्व के समझने के योग्य नहीं हैं। इसलिये नीचे की अवस्था में आकर राय देता हूँ कि प्रत्येक दुखी, अशान्त और सतपद के इच्छुकों को जैसा कि नियम बताता है, ऐसे पुरुष का ध्यान और प्रेम आवश्यक है जो स्वयं शान्त, सुखी और वासना रहित है।
तन मन वाको दीजिये, जामें विषया नाहिं । | अनुभव के पश्चात् अन्त में मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति न गुरु कहलाने का अधिकारी है और न हो सकता है। जो गुरुआई का काम करते हैं वे अपने हृदय को टटोल कर देखें कि क्या उनको दुख, अशान्ति और भ्रम नहीं सताते । क्या वे वासना रहित हो गये हैं ? क्या वे अडोल गति को प्राप्त कर चुके हैं। यदि नहीं, तो फिर उनको अपने आप को गुरु या महात्मा के रूप में जनता के सम्मुख पेश करने का कोई हक़ नहीं है। इनके द्वारा जीवों को कल्याण कदापि नहीं हो सकता।
[ १६ ] अब प्रश्न यह है कि यदि किसी को ऐसा पूर्ण पुरुष न मिले तो वह क्या करे। इसको चाहिये कि अपने संकल्प से किसी रूप में पूर्णता माने। उस पूर्णता के रूप से अपने अन्तर में प्रेम करे और चला चले । मानसिक और आत्मिक विज्ञान (साइंस) के सिद्धान्त के अनुसार समय आने पर वह स्वयं पूर्ण हो जायगा और इष्ट पद को प्राप्त कर लेगा। यह सचाई है ।
मगर ध्यान रहे कि केवल किसी रूप को पूर्ण मान लेने से ही काम न चलेगा बल्कि उसको अपने अन्तर प्रगट करो। अब सोचो कि वह कौन है जो पूर्ण है, वह वह है जिससे संसार की रचना होती है अर्थात् प्रकाश और शब्द। राधास्वामी दयाल सतकबीर और गुरुनानक की भी तालीम यही है। प्राचीन काल के ऋषि और पूर्ण पुरुष भी ऐसा ही कहते हैं। इसलिये पहले अपने अन्तर सेत सिंहासन अर्थात् पूण पुरुष को इष्ट बनाओ। फिर उस सेत रंग के प्रकाश को अपने अन्तर में प्रगट करो। याद रहे कि केवल मन से या ख्याली रूप से किसी को इष्ट बना लेना काम न देगा बल्कि अपने अन्तर में नूर (प्रकाश)
और शब्द को प्रगट करके खुशी, मस्ती और आनन्दं प्राप्त करो। मैंने दाता दयाल के रूप में पूर्ण मालिक का इष्ट मानकर प्रेम किया था । आज न पुरण रहा न अपूरण रहा, दोनों का मैं रूप होगया। सब कुछ मुझमें मैं सबमें, कहूँ कैसे क्या से क्या होगया ।। भरम संशय मिट गये सब, कुदरत का खुद रूप होगया । वह हुआ हूँ जहाँ होना न होना, दोनों ही नदारद होगया। है होश अभी जो हूँ लिख रहा,बाद कुछ दिन मुहीत आम होगया । दुग्रा है मेरी ऐ जोगेन्द्र अजीज, तू पहुचे वहाँ जहां से आगया ।
[ १७ ] इसलिये तेरे लिये यह साधन हैप्रेम करे मुझ से मैं, तेरे घट का बासी हूँ। मैं न रहता हूँ होशियारपुर, नं आसमान का बासी हूँ ।। दिल हूँ तेरा मन हूँ तेरा, आत्म रूप अविनाशी हूँ।।
यह खबर देने को प्रगटा, दयाल फक़ीर सुख राशी हूँ ।। | मैं हमेशा सत्संग में कहा करता हूँ कि जो मनुष्य मेरे सत्संग में आता है और उस सत्संग कराने की अवस्था में पूर्ण ध्यान से मेरे दर्शन करता है और उस रूप को अपने अन्तर में बनाने का अमल करता है तो जो इच्छा या कामनों उसके हृदय में है पूर्ण होगी। यदि पूर्ण नहीं होती तो मैं दोषी और दण्ड योग्य हैं।
आखिर यह सत्संग का सिलसिला जो मैंने जारी किया है, उसकी कोई गरज़ होनी चाहिए । गरज है। वह क्या है ? दुखी, सुखी हो, अशान्त, शान्त हो और भ्रान्त, निर्भ्रान्त होना
चाहिए ।
जीवन के अनुभव ने सिद्ध किया है कि कुछ मित्रों को लाभ पहुँचा है। उनके भ्रम और संशये चले गये हैं । इसलिए यह सत्संग का कार्य करता हूँ। मगर अब यह कार्य करने को मन नहीं चाहता ।।
पुकार ऐ दयाल, कृपाल।
अंकोल दाता । ऐ सच्चे साहब सांवलेशाह संसार के पितु और माता ।। मैं तेरा हूँ तुम मेरे हो तू ने मुझे यह खेल खिलाया। बन्द करादे गलत काम यह तूने गर पाया ।। नहीं थी ख्वाहिश यह मुझे, मैं बनू गुरू या महात्मा । थी यह ख्वाहिश मिलू मैं उसको जिसको कहते हैं परमात्मा ।।
| [ १८ ] जिन्दगी गुजरी मेरी इस खोज और तलाश में । वह हूं कहता रहता जग में जो अनुभव में मेरे आवता ।। पार कुदरत का न पाया किसी ने सब थक गये। थक गया जब मैं भी तब रह गया बस आत्मा । आत्मा को ढूढ़ता था बनकर नृर और प्रकाश हो । है कहां मंबामेरा जिसको कहते हैं परमात्मा ॥ मैं रहा न वह रहा अब हो रहा हूँ चुप । लिखना लिखाना वहम था खतम हुआ पाया जब परमात्मा ।
अभ्यास के स्थान । धार्मिक ग्रन्थों विशेषकर हिन्दू शास्त्रों में मनुष्य की बनावट का जो क्रम दिया गया है वह यह हैः
| देह मन
अत्मिा । २. स्थूल सूक्ष्म
कारण
यते
सूक्ष्म
अन्नमय कोष मनोमय कोष आन्नदमय कोष प्राणमय कोष विज्ञानमय कोष ।
संतों की बाणी में जिन श्रेणियों या चक्रों का वर्णन आता है उनका विवरण यह हैः(१) शारीरिक-शारीरिक चक्रों को संतों ने समय का ध्यान
रखते हुये मसलहतन छोड़ दिया है। मानसिक चक्र-सहस दल कँवल, त्रिकुटी, सुन्न, महासुन्न, भंवर गुफा ।।
आत्मिक चक्र-सत लोक, अलख लोक, अगम लोक
अनामी लोक या पद् । । (१) निकास ।
(३)
[ १६ ] मैं नहीं कह सकता कि इन चक्रों (दर्जी) के विषय में संतों का असली सारांश क्या रहा है। बुद्धि द्वारा अपनी युक्ति से। किसी बात की सचाई को हृदयांकित कराना मुझे पसन्द नहीं है। मेरा अपना अनुभव यह है कि मन, चूकि सूक्ष्म प्रकृति है, मिश्रित वस्तु है, इसलिए मन की बनावट में नूर (प्रकाश) और स्थूल प्रकृति के प्रभाव रहते हैं। साधन अवस्था में मनुष्य के अपने ही भाव, विचार और वासनायें भिन्न-भिन्न प्रकार के रंग और रूप धारण करके उसके अन्तर में प्रगट होती रहती हैं ।
। जिस-जिस प्रकार के भाव, विचार और इच्छायें मनुष्य की होती हैं, उसी के अनुसार दृश्य उसके सामने आते रहते है और ज्यों-ज्यों उनमें घनापन आता जाता है दृश्यों के रंगरूप में परिवर्तन होता रहता है। मानसिक दुनिया के खेल में परिवर्तन की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को भिन्न-भिन्न नामों से प्रगट किया गया है । उदाहरण के रूप में अनेकवाद, त्रिपुटीवाद्, द्वैतवाद अद्वैतवाद आदि-आदि। पिंडे सो ब्रह्माण्डे । जैसा बाहर वैसा भीतर, मगर जहाँ विचार और मन समाप्त हो जाता है (या विचार नहीं उठता),. मिश्रित पना जाता रहता है, वहाँ केवल अकेली आत्मा, सुरत या रूह रह जाती है। रंग उसका बिल्कुल सफेद है। मगर याद रहे जब मनुष्य की तवज्जह द्वैत या अद्वैत की अवस्था से ऊपर नहीं जाती, यह अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। गुरू और चेले का सम्बन्ध द्वैत के मंडल में है।
आत्म रूप प्रकाश तुम्हारा, जहाँ नहिं गुरु चेला व्यौहारा । ने रामरहीम नहिं कोई गैरा, जोगेन्द्र वह असली रूप तुम्हारा। तू है सत्-सत् तेरा रूपा, तू ही है असली सत भूपा । जब तक मन और तन से बंधाना, रूप न अपना किसी ने जाना ।
[ २०] तातें करनी मुख्य बताई, संत मते का दियां भेद बताई।
मूगर प्रियवर ! याद रहे कि यहाँ तक पहुँचना सुगम कार्य नहीं है। जव तक आस-आस है कोई, ख्वाह वह किसी किस्म की होई । सुरत न पावे निज रूप भोई, बिन बेआस न कोई पतियायी ।। जीव विचारे सारी जिन्दगी, गुरु-गुरु चिल्लावे ।
आयु खोवें भ्रान्ति में, मन के चक्कर आवें । । गुरु नाम है। समझ का, गुरु नाम है। भेद । बिन सत्संग कामिल इंसान के, मिटे न भरम का खेद ।।
जोगेन्द्रियाँ ! मैं तुम्हारी आखों पर पट्टी बांधना नहीं चाहता। भाई बनकर हित से सत् पद के भेद का पता दे रहा हूँ। अब प्रश्न उठता है कि इस जीवन में जिस मनुष्य को शब्द और प्रकाश प्राप्त नहीं हुआ उनका परिणाम क्या होगा ? मेरा उत्तर स्पष्ट है, सीधा-सादा है । हेर-फेरकर बात करना मेरा स्वभाव नहीं है। वह यह कि अन्त मता सो गता । जैसी आसा वैसी वासा । कई सत्संगियों ने शरीर छोड़ते समय में कहा कि दयाल फ़कीर पालकी लेकर उनको लेने आ रहे हैं। चूकि मुझे इस बात का कोई ज्ञान नहीं, इसलिये ऐसी बातें सुन-सुनकर हैरान होता हूँ । सम्भव है कोई और महात्मा या साधू अपने विश्वासियों को लेने जाता हो, मगर मैं नहीं जाता। यह सचाई है।
इन्सान का अपना मन ही है जैसी आसा धरता । जैसी आसा वैसी वासा जन्मता है और मरता ।। इस अनुभव के आधार पर मेरा वह भ्रम और संशय दूर हो गया जिसने सारे जीवन मुझे परेशान किया था। वह क्या है ? राधास्वामी दयाल ने राम, कृष्ण, जैन, बुद्ध और हजरत मुहम्मद आदि को और उनके अनुयायियों को काल मत के
[ २१] अन्दर बताते हुए यमराज के लोक से निकलने का उपाय बताया।
सचाई यह है कि जो जिस को लेने आता है वह उसका अपना मन है । मनुष्य के अपने संकल्प-विकल्प और विश्वास ही दृश्यों के रूप में उसके अपने विश्वास के अनुसार उसके सामने आते हैं। असल वस्तु मनुष्य की अपनी आत्मा है जो प्रकाश और शब्द है। इसलिये प्रियवर इसी जीवन में अपने अन्दर शब्द और प्रकाश को प्रगट करो । मानसिक अवस्थाओं का त्याग करते चलो ताकि सत् पद में वासा पाकर आवागवन से रिहाई पा सको।
नीचे के मंडल या लोक में आकर किसी ख्याल का सहारा लेकर बात समझाई जाती है वर्ना सचाई यह है कि आवागवन से छुटकारा यहाँ भी नहीं है क्योंकि यह अवस्था सदा एक रस नहीं रहती । कहना और बात है, रहना दूसरी बात है । चूंकि मुझे स्वयं इस अवस्था से नीचे आना पड़ता है, इसलिये विवश होकर किसी ऐसी अवस्था का लालायित हुआ जहाँ आने-जाने का गुमान तक न हो । नूर और प्रकाश में सुरत को टिका-टिकाकर देखा कि आगे क्या है । शब्द और प्रकाश का प्रत्येक अणु अलग-अलग हुआ । जो वस्तु बाकी रही, क्या बताऊ, एक अनन्त अपार तत्व है। वह सब का आधार है । क्या है वह, कुछ पता नहीं । इस अनुभव के आधार पर विश्वास हो गया कि देह, मन, कल्पना, प्रकाश और शब्द सब-के-सब रिली-मिली रचना हैं।
हमारी जात मुफरद है गो हम हैं मुरक्कव यहाँ। वहम में फँस करके कहलाते हैं हम इंसा ।। इसी अनुभव के आधार पर संत कबीर ने कहा हैः–
[ २२ ] दूर गवन तेरा हंसा हो, घर अगम अपार ।टेक।। | नहिं वहाँ काया नहिं वहाँ माया,
नहिं वहाँ त्रिगुन पसार । चारों वरण वहाँ हैं नाहीं,
नाहीं कुल व्यवहार ॥दूर।। नौ छः चौदह विद्या नाहीं,
नहिं वहाँ वेद विचार।। जप तप संजम तीरथ नाहीं, ।
नाहीं नियम अधार दुरा। पाँच तत्व नहिं उतपति होई,
सो परलय के पार । तीन देवता तेंतिस कोटी,
नाहीं दस अवतार दूर। सोलह शंख के आगे होई,
समरथ का।
दरबार । सेत सिंहासन आसन बैठे,
झनकार ॥दूर।। पुरुष रूप क्या बरनू महिमा,
तिन गति ।
अपरम्पार ।। कोटि भानु की शोभा जिनकी,
यक-यक रोम उजार दूर॥ क्षर अक्षर दोनों से न्यारा,
सोई नाम ।
हमार ।। सार शब्द को लेकर आयो,
मृत्यु – लोक ।
मंझार दूर॥ चार गुरु मिल थापल हो जग के,
सोई काढ़नहारे ।
[ २३ ] उन कर बहियाँ पकड़ रहो तुम,
हँसा उतरो पार दूर॥ जम्बू द्वीप के तुम सब हँसा,
- गहलो शब्द हमार।। दास कबीरा अबकी देहल,
निरगुन को टकसार दुरा। यह शब्द मेरी खोज के परिणाम को पूर्णतया पुष्टि करता है। इस अनुभव में आये हुए मनुष्य को संसार का सारा खेल एक तमाशा प्रतीत होता है, जिसका आधार जात (स्व-म्वरूप) है। दाता दयाल का एक शब्द सुनोः ।
यह जग नाटक शाला सावो, यह जग नाटक शाला ।।टेक।।
राजा, रंक, फ़कीर, औलिया,
दृश्य विचित्र निराला ।। कोई तो ओढ़े शाल-दुशाला,
कोई सिर कम्बल काला ।।यह।। सुरत ने अद्भुत भेष बनाये,
नाचें नाच रसाला । गावें भाव दिखावें छिन-छिन,
खेलें खेल। निराला ।।यह। ब्रह्मा वेद से रची जगत को,
| विष्णु गदा ले पाला । शिव संहार का साज सजावे,
साथ भूत वैताला यह।। नाचे दुर्गा, कमला, शारद,
काली छवि विकराला । सावित्री का राग गायत्री,
सैन बैन का जाला ।यह॥
[ २४ ] शंख नाद की धूम मची है,
डमरू शोर · कराला । रारंग सारंग बजे सारंगी, ।
बीन सितार सुहाला । यहः। ऋति धुन है उगीत की बानी,
| ओ३म ओ३म का ताला ।। श्रोतागण सब सुनने आये,
मन में भये निहाला |यह।। साधू दृष्टा साक्षी रूप है,
सुख दुख मन से टाला । जिसने अपना रूप विसारा,
उरे उपजा दुख शाला ।।यह॥ साक्षी देखे विमल तमाशा,
चित रहेसुखी सुखाला । भूल भरम में जो कोई आया,
सहे करम, का भाला ।यह॥ . रैन का सपना जग की लीला,.
सपना धन और माला । आँख खुली तब कुछ नहिं दरसा.
गुप्त जो देखा भाला ।।यह।। राधास्वामी सन्त रूप धर आये,
दीन बन्धु सुद्याला ।। प्रेम पियाला हमें पिलाया,
सहज किया मतवाला ।।यह॥ इस अवस्था में वह जा सकता है जो केवल असलियत, सत् पद या सचाई और परमार्थ का जिज्ञासु हो। इस अवस्था में पहुँच जाने पर वह पुरुष और प्रकृति ( सत् और सत्ता ) का
हैं
। २५ ] पुण आदर्श बन जाता है। ऐसे पुरुष को ही पूर्ण मनुष्य कहा जाता है और इस अवस्था का नाम ही राधास्वामी है । मैंने अपना अनुभव प्रगट कर दिया । मुझे नहीं ज्ञात है कि इन बाणियों के रचने वालों का मन्तव्य क्या था ।
हाँ, समय की मसलहत का ध्यान रखते हुए सब ने पर्दादारी से काम लिया ।। । कबीर साहब ने कहा है:-
धर्मदास तोहि लाख दुहाई । सार भेद बाहर नहिं जाई । ।
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये कबीर की वाणी के अनुसार मनुष्य को ४ प्रकार के गुरुओं से सम्बन्ध पैदा करना अत्यन्त आवश्यक है। ( इनका वर्णन पिछले शब्द में है)। यह चार गुरु कौन हैं ? मैंने अपनी पुस्तकों और लेखों में कई जगह इसकी व्याख्या की है।
मुझे बचपन से जो ख्याल मिले वह इस प्रकार के थे कि सन्त में यह शक्ति होती है, वह शक्ति होती है। स्वामी जी ने तो अपनी वाणी में ईश्वर और परमेश्वर को पैदा करने वाला सन्त को माना है और कहा है:-
सन्त बचन को कोई न टारे। ईश्वर परमेश्वर सब हारे । । . दुनियाँ इसका अर्थ कुछ-का-कुछ लगाती है क्योंकि वह अज्ञानी है, अनसमझ है, अनुभव हीन है, मगर मैं कुछ और समझता हूँ। वह यह कि सन्तं प्रकृति के क़ानून या नियम को जानने वाला होता है । वह जो कुछ कहता है, उसके अनुसार कहता है। जब तक कोई उसके वचन को नहीं मानता, उसके जीवन में परिवर्तन नहीं आ सकता। इसलिए गुरु आज्ञा ही मुख्य है।
मन में एक उन्मत्तता थी कि मैं सन्त बनू। मालूम नहीं किं सफल हुआ या नहीं। हाँ, यह इच्छा रखता हूँ, मानव
तौ अपनी वाता है, वह शक्ति होती है। स्वामी जी ने
[ २६ ] जाति को सुख-शान्ति मिले । (Peace to humanity) और संसार में अमन-चैन रहे ।
अपने अनुभव के आधार पर अब मैं उन आवश्यक बातों की व्याख्या करता हूँ जिन पर चलना प्रत्येक सत् पद के जिज्ञासू और सुख-शान्ति के इच्छुकों के लिए आवश्यक है। | १. शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य-.याद रहे कि मनुष्य की मानसिक अशान्ति का सबसे बड़ा कारण विषयविकार का जीवन है । विषय-विकार से मेरा अभिप्राय केवल कामांग (स्त्री भोग) से ही नहीं है बल्कि हर प्रकार की प्रबल इच्छा भी इसमें सम्मिलित है।
। काम-काम सब कोई कहे, काम न चोन्हे कोय ।
जेती मन की कामना, काम कहावे सोय ।। – अशुभ या अनुचित इच्छायें, स्त्री-सम्भोग के संकल्प और वीर्य को बहुतायत से खर्च करना मनुष्य के जीवन को नष्टभ्रष्ट कर देते हैं। प्रत्येक विषय में समता की आवश्यकता है। उचित वासनायें और मुनासिव हद तक सन्तान-उत्पत्ति जीवन की आवश्यक वस्तुयें हैं मगर एहतियात को कभी हाथ से न जाने दिया जाय ।।
मैं जो कुछ कहता हूँ, वह मेरा अन्तरीय ज्ञान (Tntuition) होता है और वह ठीक होता है। एक घटना सुनाता हूँ। मैं एक जगह नौकरी पर था। महकमे का एक बड़ा अफसर निरीक्षण के लिये आया । जाँच-पड़ताल करने के पश्चात् उसने मुझे एकान्त में बुलाया और हाथ बाँधकर कहने लगा कि पंडित जी आपकी बावत बहुत कुछ सुन रक्खा है। मुझे काफी तनख्वाह मिलती है। जीवन की आवश्यकतायें सरलता से पूरी हो जाती हैं। मान-सम्मान भी बढ़ गया है। प्रत्यक्ष
[ २७ रूप से कोई कष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता । मगर तबियत में बेचैनी और व्याकुलता की यह दशा है कि कभी-कभी आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता हूँ। मैंने उसे ध्यान पूर्वक देखा
और कहा कि साहब गुस्ताखी माफ हो तो कहूं, उसने स्वीकृति दे दी कि निडर होकर कहिये। मैंने कहा कि मेरा यह कहना है कि आपने अपना ब्रह्मचर्य ऐसे ढंग से नष्ट किया है कि विषय भोग के समय तुम पर मानसिक भय सवार रहा है। वही तुम्हारे कष्ट और अशान्ति का कारण है । ख्याल रहे कि वह अफ़सर एक ऐसे गुरु का शिष्य था जो बहुत प्रसिद्ध थे
और उनके यहाँ शान से रहते थे मगर उसकी अशान्ति को दूर न कर सके । कुछ देर के लिए वह अफ़सर चुप हो गया । कुछ सोचकर कहने लगा कि आपका विचार बिल्कुल ठीक है । मेरा अनुचित सम्बन्ध वर्षों तक एक ऐसी स्त्री से रहा है, जो खानदानी रिश्तेदार थी। जिस समय मैं सम्भोग में लिप्त होता था, मेरे हृदय पर भय छाया रहता था कि कहीं यह भेद खुले न जाय । मुझे इस प्रकार के और भी बहुत से अनुभव जीवन में हुए, जिनको मैं अपनी पुस्तकों और लेखों में कई जगह लिख चुका हूँ।
इन निज अनुभवों के आधार पर मैं साहस के साथ कहता हूँ कि जब तक मनुष्य पूर्ण गुरु, पूर्ण समझ या पूर्ण ज्ञान के सहारे जीवन में अमल नहीं करता या नहीं चलता वह सुख-शान्ति और ढाढ़स प्राप्त नहीं कर सकता। उस ज्ञान या समझ का देने वाला वह हो सकता है जो जीवन के हर प्रकार की अवस्थाओं से गुज़र कर अनुभव प्राप्त कर चुका है। यह समझ, सार, ज्ञान किसी मनुष्य को ईश्वर, परमेश्वर, खुदा या ब्रह्म से नहीं मिल सकता। इसका देने वाला पूर्ण मनुष्य है । इसलिये गुरु की मुख्यता सर्व श्रेष्ठ है।
[ २८ ] इन अनुभवों से प्रभावित होकर मैं बार-बार पुकार कर कहने को विवश हूँ कि किसी ऐसे पूण’ पुरुष के सत्संग में बैठो जो जीवन की हर अवस्था का अनुभव रखता है, सार-भेद का ज्ञाता है। सामयिक गुरु के वचनों को सुनना, विचारना और उस पर चलना ही सच्चा सत्संग है।
तुलसीदास ने भी कहा है:- बिन सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिन सुलभ न सोई ।
चूकि दाता दयाल ( महर्षि शिवव्रतलाल जी महाराज) ने मेरे जिम्मे जग कल्याण के लिये सचाई को प्रगट करना मेरा कर्त्तव्य ठहराया था, इसलिए अपने कर्तव्य को स्पष्ट और निःस्वार्थ ढंग पर पूरा करता हुआ कहता हूँ कि मेरी समझ में मनुष्य की मानसिक अशान्ति का कारण अनुचित विषय विकार को जीवन है।
दुनिया के हर एक काम में निर्भयता, निडरतो की आवश्यकता है । यह अवस्था उसमें आ सकती है जो सदाचारी, ढंग पर बहुत ऊँचा रहता है। सचाई जिसके जीवन की विशेषता है। दुनियावी जीवन में मक्कारी और छल-कपट का खेल खेलने वाले, चार सौ-बीस करने वाले और अनुचित विषय-विकार का जीवन व्यतीत करने वाले ही यदि अशान्ति
के वारिस ( उत्तराधिकारी ) न होंगे तो और कौन होगा ।
पर्दादारी या भेद को छिपाकर रखना अत्यन्त आवश्यक है मगर ध्यान रहे कि दूसरों के कामों पर पर्दादारी रक्खो, मगर अपने आपको शुद्ध, पवित्र रक्खो। सचाई पसन्द बनो। भाव और विचारों को कंट्रोल करो। मानसिक अवस्था ठीक रहेगी। यदि किसी कारण से मानसिक अवस्था बिगड़ चुकी है।
| २६ ] तो सुमिरन और ध्यान का सहारा लो। विशेष व्याख्या के लिए मेरी पुस्तक ‘मानव धर्म प्रकाश’ पढ़ो ।।
| २ दूसरी बात-जीवन की आवश्यकताओं से सन्बन्धित है। मैं एक निर्धन सिपाही का लड़का था। मैंने हक हलाल की कमाई से गुज़र की । जब नौकरी के काम से छुटकारा मिलता, ईटों के भट्ट पर काम करने चला जाता । इस छोटी-सी रकुम से जो मुझे मिलती थी, अपने कुटुम्ब का खर्च चलाया और कुटुम्बियों के साथ प्रेम का व्यवहार किया। जब कभी मेरे छोटे भाई सुरेन्द्रनाथ ( जो अब राय साहब हैं) कुछ माँगने के लिए आते तो मैं उनकी सहायता न कर सकता था । मगर प्रेम से उनको गले लगाकर कह दिया करता था कि बच्चा तू किसी समय लखपती होगा। मालिक ने दया की । वह समृद्धिशाली हो गये। चूँ कि मैंने उनसे तथा अन्य रिश्तेदारों से सचाई के साथ प्रेम किया था, कोई स्वार्थ दृष्टि में नहीं था, समय आने पर उन्होंने भी थोड़ी-बहुत मेरी सहायता की । मेरे भाई ने दस हजार रुपया खर्च करके मेरे लड़के को उच्च शिक्षा दिलाई। अतः इन निज अनुभवों के आधार पर मैंने आवाज उठाई कि जीवन में Home peace ( घरेलू शान्ति ) की बनाये रक्खो। तुम्हारे भाई जो धनहीन हैं उनकी सहायता करो। मनुष्य साथ कुछ नहीं ले जाता है। यदि प्रत्येक सत्संगी यथा शक्ति अपनी तथा । अपने घरवालों की निःस्वार्थ भाव से सहायता करे तो जीवन की आवश्यकतायें पूरी होने से, होने वाली अशान्ति बहुत कुछ दूर हो सकती है। इसके उपरान्त विचार
[ ३० ] शक्ति के कानून के अनुसार घरेलू शान्ति जीवन को सुखी बनाने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। इसकी व्याख्या मैं अपनी पुस्तकों में बार-बार कर चुका हूँ।।
याद रहे मालिक या सतगुरु प्रेम रूप है । यदि मनुष्य के हृदय में प्रेम भाव नहीं है तो वह लाख अपने आपको मालिक या सतगुरु का सेवक कहे, वह वास्तव में मक्कार और कपटी है । समय बदलता रहता है। समय और समय के बदलाव के अनुसार अपने में परिवर्तन करने की टेव डालो। नीयत ठीक रक्खो । जीवन सादा हो। जीवन की आवश्यकतायें सीमित हों। फिजूलखर्ची से बचो। आय-व्यय का हिसाब रक्खो । जितनी चादर हो उतने पैर फैलाओ। लोक-लाज के प्रभाव में न आो ।
दाता दयाल महर्षि शिवव्रतलाल जी महाराज ने अपने अमली जीवन से मुझे काम करने का पाठ पढ़ाया था। एक बार वे सुनाम में मेरे पास पधारे थे। उस समय मैंने यह देखा कि वे किसी समय भी बेकार नहीं रहते थे। पिछली उम्र में जब वे गिडरबाहा में पधारे थे, तब शरीर कॅप-कँपाने लगा था। वे प्रातः काल पाँच बजे उठे और कागज़, कलम दवात लाने को कहा। मैंने कहा कि हुजूर अब काम छोड़ दीजिये । वे हँसकर बोले-‘‘फकीर की दुम ! तुमको किसने फकीर बनाया है। यदि मुझे यह ज्ञात हो जाय कि पाँच मिनट के पश्चात् शरीर छोड़ देना है तो मैं तीन मिनट तक अवश्य काम करता रहूँगा।”
यद्यपि मेरे पिता प्रत्यक्ष में नाम-दीक्षा लिये हुए नहीं थे, मगर दाता दयाल पर उनका विश्वास बड़ा भारी था। जब मैं बचपन में बैरागी होकर घर से चला गया तो वह दुखी
हैं
[३१ ] होकर दाता दयाल के दरबार में लाहौर पहुँचे और एक गंडास उनके सामने रखकर मत्था टेका । दाता दयाल ने पूछा कि मस्तराम यह क्या लाये हो। पिताजी कहने लगे कि यह छ। है। इसलिये लाया हूँ कि आप अपने हाथ से मेरे पेट में भोंक दें और मैं मर जाऊँ । दाता दयाल ने पूछा कि कहो बात क्या है। पिताजी ने मेरी शिकायत की। दाता दयाल ने पूछा-“तुम चाहते क्या हो ?’ पिता जी कहने लगे–“रोटी कपड़ा । फक़ीरचन्द हमारी सेवा करे । अपने वाल बच्चों और स्त्री से प्रेम करे ।” दाता दयाल ने कहा कि जाओ सब-कुछ मिल जायगा । वास्तव में सब-कुछ मिल गया। उन्होंने अपना जीवन बड़ी इज्जत और खुशी से व्यतीत किया। पिताजी की पिछली उम्र में मैंने दाता दयाल से कहा और इच्छुक भी था कि वह उन ( पिताजी ) को कोई आदेश दें । दाता दयाल ने आंखें बन्द कीं और पाँच मिनट पश्चात् कहा कि फकीर ! अपने पिता को कह दो कि अन्तिम श्वास तक काम करें। यह रहम्य. अब मेरी समझ में आया है। लोग नाम के पीछे दीवाने हुए फिरते हैं, मगर यह किसी को समझ नहीं कि नाम क्या वस्तु है। असली नाम है मन का लगाना । अन्तर में और बाहर में । वाह्य जगत में काम में लगे रहने से बढ़कर और कोई उपाय मेरी समझ में नही आया। मुझे देखो, बूढा हो गया हूँ मगर काम करता हूँ। ऐ जोगेन्द्र ! तुमने अपने और संगत के सुधार के लिये कुछ लिखने को कहा है। मुझे जो कुछ सतगुरु ने बताया और जिसे जीवन में क्रियात्मक रूप में मैंने सच्चा पाया वही तुम्हें बताता हूँ। काम करो ! काम करो !! काम करो !!! कमी दूर हो जायगी । जीवन का अर्थ है काम और काम का अर्थ है जीवन ।
{ ३२ ] ३. अज्ञान को दूर करना-मनुष्य की अशान्ति का तीसरा कारण अज्ञानता है । मनुष्य स्वयं पूर्ण है । शान्ति और आनन्द का भंडार उसके अपने अन्दर है । वह स्वयं शान्ति की मूर्ति है, मगर ग़लत शिक्षा, अज्ञान और भ्रम के अधीन उसी प्रकार इन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये बाहर दौड़ धूप करता है, जिस तरह कस्तृरिया हिरन अपनी नाभि में कस्तूरी रखता हुआ जंगल में मारामारा फिरता है। मगर याद रहे कि यह भ्रम और अज्ञान सरलता से दूर नहीं होता। इसलिये–
पूरा सतगुरु खोज रे भाई। जो तुम्हरे वहम भ्रम दे उड़ाई ।। ग्रन्थ और बाणी में जग भर माई । चोला लिया दयाल फकीर जग प्रगटाई ॥ निष्कलंक और यथार्थ सन्देश सुनाया। जिन्होंने समझा हृदय से भरम मिटाया ।। न धनधाम की इच्छा न कोई बड़ाई की ।
नहीं चेला बनाने की, नाहिं गुरुआई की । साँवलेशाह और दाता दयाल की आज्ञा अनुसारी । हमने यह खेल खिलाया, बन के खिलाड़ी ॥ बाणी मेरी सत् है, सत को देऊ सन्देश । बचन मान मन थिर करो, फेर नहीं अन्देश । ४. आवागमन से छुटकारा-चौथा कारण है। बिना ज्ञान चौरासी न छूटे, कहता हूँ ढोल बजाई । ज्ञान नहीं है मन का विचार, अपने अन्तर बँस भाई ॥ सुरत जब निरत होकर, अणु-अणु का रूप हो जावे । सब अनुभव सम्पन्न हो करके, आवागवन नसावे ॥
[ ३३] सुरत शब्द यह योग सुहेला, घट में करो शब्द संग मेला।। शब्द संग प्रकाश रुपहला, तब कोई ज्ञान को पाई । ।
५. पोलीटिकल लाइन के प्रभाव-यह मनुष्य के दुखों का पाँचवाँ कारण है।
चूंकि अपना राज्य है, तुम ( Neutral ) उदासीन रहना । भी चाहो तो वाह्य प्रभाव नहीं रहने देते । इसलिये सुनो
मैं ने नेहरू जी के घर का न कुछ खाया, न कुछ लेना न देना ।।
उनको समझा इंसानियत का सिपाही।।
इसलिए कहता निपट सचाई ॥ उनके भाव और सिद्धान्तों पर चलो। क्यों ?
बचपन से मेरी यह इच्छा थी कि भारत में ऐसा शासन हो जो धर्म-पंथ और सम्प्रदाय से ऊपर रहे। इसी भाव से प्रभावित सन् १९३३ई० में शाहानाताज लेकर दाता दयाल के दरबार में गया था और उनको पहनाया था। मौज ने प्रबन्धे कर दिया । आज भारत के शासन की बागडोर ऐसे पुरुष के हाथ में है जो मेरी विचारधारा और संतों के भावों की अमली सूरत है। क्यों, उदाहरण के रूप में सुनो। काश्मीर के विषय में उन्होंने कहा है कि Cease fircline तक जो फैसला हुआ है। वह कायम रहे ताकि जनता को Migration आदि का कष्ट न हो । चुनाव आदि की कोई आवश्यकता नहीं है ताकि जनता अमन-चैन से रहे । जनसंघी आदि-आदि यद्यपि क्रुद्ध हैं मगर श्री नेहरू की विचारधारा इन्सानियत के सिद्धान्त पर है। इसलिये मेरी निजी राय यह है कि जिस ओर श्री नेहरू हों उसी ओर वोट दिया जाय । नहीं कह सकता काल चक्र क्या परिवर्तन लाये। दुनियां ने कभी किसी भले पुरुष और मनुष्यता
| ३४ ] ( इंसानियत ) की सहानुभूति करने वाले का साथ नहीं दिया । यहाँ स्वार्थ का जोर है । जो कुछ मौज ! समय निर्णय करेगा। हां, इतना अवश्य कहूँगा कि देश उनके साथ सहमत न रहा तो परिणाम अच्छा न होगा । कर्म का भोग भोगना अनिवार्य है।
संसार का सुधार करके हौसला हाथ बाँधकर करता हूँ इल्तजा ।। संसार के महात्माओ आओ तुम एक राह । सुरत शब्द योग असली घट का साधन दोस्तो। इसके साथ इन्सान बनना भी लाजिम है दोस्तो ।। काम जो सौंपा गुरू ने काम अपना कर दिया । राज़ जो जीवन में मिला, उसको हमने अफ़शा कर दिया। जो मिला कुछ किसी को वह उसका अपना कर्म है। कर्म अपना ठीक करना यह ही असली धर्म है ।। ऐ जोगेन्द्र काम कर, काम कर, काम कुछ करके दिखा। दुखी अशान्त जीवों को अग लगाकर सुख पहुँचा । राधा स्वामी मत में आकर, राज जो हम को मिला। साफ करके हमने उसको सत सत बता दिया ।।








Hits Today : 38
Total Hits : 1713016