R.S
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरुर्देव महेश्वरः। गुरु साक्षात् परम ब्रह्मः तस्मै श्री गुरुवेनमः ।।
शिव
वर्ष २ } मई १९५६ ई० तरंग ३
धन्यवादे का शब्द है।
भव सागर अगम अथाह से, पार करा दिया सतगुरु दाता ने । मुझ दीन अधीन को ठौर ठिकाने, लगा दिया सतगुरु दाता ने ॥ संसार महा दुखदाई था, नहिं अपना कोई सहाई थी। निज दया से मेरा बिगड़ा काम, बना दिया सतगुरु दाता ने ॥ मन चंचल था अज्ञानी था, अभिमानी मानी गुमानी था। सुरति शब्द योग विधि से, निश्चले कर दिया सतगुरु दाता ने ॥ घट अघद का भेद दिया मुझको, चरणों में अपने लिया मुझको। सतसङ्ग के अमृत वचन सुनी के, चिता दिया सतगुरु दाता ने ॥ अब मैं चरणों का दास बना, सुख पाय अब सुखं रास बनी। राधास्वामी धाम को देके पता, पहुँचा दिया सतगुरु दाता ने ।
। शिव ति क्यों कहा है एती भाव को चित् दे सदा।। नति” वैसग “एती, भाव में अनुराग कर ॥३॥ ४. नेति‘ ती दौनों कल्पित, इनका तो उत्थान है।
त्यागना ही न्यारा दोनों, नींद भव से जाग कर ।।४।। ५. राधा स्वामी संत सतगुरू, के बचन सुन प्रेम, से। पद कमल में सर झुका, भक्ती‘ अदल वर माँग ॥
तीसरी कथा ” , मनुष्य, और उसको छायां: ईश्वर ने मनुष्य को बनाया। देखा कि वह अंकेला है, सोचा क्या करूँ ” मनुष्य कार्य के प्रकाश में धूम फिर रह था। उसके शरीर की छाया पांव से लगी हुई नाच रही थी कभी छोटी होगई। कभी वही कभी ये गई कभी बायें ! कभी इतनी घटी कि मनुष्य के पंजे से भी छोटी बन गई! और कभी इतनी बढ़ी कि मनुष्य उसके सामने बच्चा प्रतीत होने लगा जिथे वह छाया को पकड़ने जात्रा छाया फुदकती हुई आगे की ओर लम्बैभडगभर कर भाग निकलती और जब यह. उससे पीठ फेर कर भागता तो यह उसपीछे दौडने होगी ।
ईश्वर दृश्य देखकर हँसा । यात समझ में आगई। बोला। क्या तू चाहा है कि मैं तेरे लिये इसे पकड६१ उसने कहा हां! मैं अकेला हू । यदि यह साथ रहे और बोले तो मुख मिलेगा। यह सामियी इकट्ठा करेगी। उसकी संभाल रखेगी और में अचिन्ते रह गए।
ईश्वर ने कहा समझ बूझ कर बार कहो। बहे तुझ से तपटेगी वह बोला मैं इसे लिपटा एक्लूगा ।
और मुसकराया “यह तुझे हंसी कलायेगी।“यह गोता.
$ क्षमा याचना छ इस अङ्क के छपने में प्रेस के कार्यकर्ताओं की असुविधा के कारण देर होगई अतः समय पर न छप सका । पाठकगण इसके लिए क्षमा करेंगे । भविष्य में समय पर भेजने का। | यथाशक्ति प्रयत्न किया जायगा ।।
निवेदन है। कुछ ग्राहक महोदयों का गतवर्ष का वार्षिक मूल्य अभी तक नहीं आया है अतः वे इस वर्ष के मूल्य सहित तुरन्त भेजने की कृपा करें ।।
-::- इस से अगले अङ्क में अध्यात्म विद्या के प्रेमियों के लिये नित्य प्रति सोचने समझने, मनन करने और अमल करने की पूरी सामिग्री होगी । जिनकी पूरी जानकारी न होने अथवा अमल न होने से साधन में आगे बढ़ने में कठिनाइयां आती हैं। और लोग या तो गुरुओं को दोष देते हैं या निराश हो बैठते हैं। आशा है पाठकगण इससे लाभ उठावें। | प्रेमी पाठकों से यह भी प्रार्थना है कि वे निष्काम भाव से ऐसी अमूल्य पुस्तकों का पठन पाठन दूसरे सज्जनों से भी करायें ताकि वे भी इनसे लाभ उठा सकें । यदि उनकी रुचि होगीं तो फिर वे स्वयं भी इनके ग्राहक हो जायेंगे।
विनीतदेवीचरन मीतल.
भूमिका – नन्दू भाई का विवाह गतवर्ष गदवाल (समस्तान) राज हैदराबाद में हुआ। मैं भी बरात में गया हुआ था । विवाह के पीछे दूल्हा दूल्हन दोनों मेरे चरणों में गिरे, मैं बहुत प्रसन्न हुआ। दुल्हन की आयु नव वर्ष से अधिक न रही होगी । भोली भाली ! सीधी साधी ! मैंने कहा “क्या तू रानी है ?” वह बोली “मैं रानी हूँ।” मैंने पूछा “तू मेरे घर चल कर रहेगी और गदवाल की चिन्ता तो न करेगी ?” उसने उत्तर दिया “मैं चलेंगी। वहाँ चलकर रहूँगी। मुझे चिन्ता न होगी ।” मैं प्रसन्न हो गया। , इस साल मैं भाई जी के साथ उसे धाम में लेजाने के लिये हैदराबाद आया । लड़की अभी बहुत छोटी है। साहसी और उत्साही तो अवश्य है किन्तु लड़की है। देखें साथ चलती है या
अब के भी उसके माँ बाप रोकते हैं। । एक दिन भाई जी एक सुंदर छोटी सी नोटबुक लाये । उसमें सुनहरे बेल बूटे बने थे। मैंने अपना फ़ोटो उस पर लगा दिया । फिर सोचने लगा इसमें क्या लिखू। सोचते सोचते यह बात समझ में आई कि नई और छोटी दुलहन के लिये छोटी छोटी कहानियाँ शब्दों के साथ लिख दू । लेखनी उठाई । लिखना
आरम्भ दिया ।।। । आशा है दुल्हन इसे प्रेम से पढ़ेगी और जब यह छप जायगी पढ़ने वाले भी इसे लाभदायक पायेंगे।
कहानियों की इस छोटी गुटका बनाने की यह छोटी कहानी, हैं। यह मेंडचल में लिखी गई थी नई नवेली दुलहन के हितार्थ !
५ फर्वरी । सन् १९२४ |
–शिव हितोपदेश
पहली कथा
ईश्वर ने कुटुम्ब रचा । जीव जन्तु बन गये । मनुष्य कुल उत्पन्न हुआ और सब रहने सहने लगे । ईश्वर देखने आया । वह लड़ रहे थे। मिल जुल कर रहने की शिक्षा देकर चला गया ।
यह मिलने को तो मिले परन्तु लड़ाई बन्द नहीं हुई।
ईश्वर फिर आया । इनकी दशा देखकर प्रसन्न नहीं हुआ। बोला “मिलजुल कर रहों ।‘…
एक बोला “इसे निकाल दो शान्ति आजाये।” ईश्वर ने कहा किसे निकालें ! किसे रक्खू । कुटुम्ब तो कुटुम्ब है।” कोई न समझ सका वह लौट गया। | फिर आया और वही दृश्य आखों में आया। फिर वही उलहना और निकालने की प्रार्थना !
ईश्वर बोला “कहाँ निकालू १. यह कहाँ रहे १: कुटुम्ब से बाहर कुटुम्ब तो नहीं रह सकता ?
फिर भी समझ नहीं आई और वह चला गया । . :
कुछ दिनों पीछे फिर आया और वही लड़ाई झगड़ा ! और वही बात !
ईश्वर बोला “निकालने में निर्बलता और साथ रहने में बल रहता है।“
शिव किसी ने नहीं समझा और वह चला गया। ..फिर आया। इस बार बहुत से मनुष्यों ने मिलकर उस एक की निन्दा की । ईश्वर बोला “तुम को समझ नहीं है । सब बुन्द मिलकर समुंद्रर होते हैं। एक के निकल जाने से समुद्र समुद्र न रहेगा।” यह कहकर वह फिर चला गया। किसी ने भी बात न समझी । ‘ –.” ” जब आया फिर वही ऊधम तब उसने सब को मिलाकर
कहा “सत्सङ्ग करो। सत् जीवन है,” और चला गया, किसी ने | फिर नहीं समझा। . .
, सातवीं बार आकर वहीं उत्पात देखा और निकालने की ।
प्रार्थना सुनी । बोला ” शब्द का साधन करो, मेरा रूप देखो, | मेरा नाम लो । ……….
। सब घबराये हुये थे। बात–मानी । उसकीं सुनी । ईश्वर का ।। रूप देखा और जिसकी निन्दा. वह करते थे उसैं ईश्वर में गुथा। हुआ पाया। सोचा “यह तो उसी में है। उसी का है। उसी से । है। उसके निकाल देने से ईश्वर को एक अंङ्गे निकल जायेगा।
और हानि पहुँचेगी तय ऊनके हृदय में प्रेम उत्पन्न हुआ । एक
• दूसरे को प्यार करने लगे और सहज में शान्ति आगई । अब ईश्वर का कुटुम्ब सुख और आनन्द से रहने लगा और निन्दा
और आपस की खटपट जाती रही।
शब्द १. प्रेम औषध, ईष और, द्वेष मनके रोग हैं। ६ रोग जबै हौं दुख बिपत, अपित कलेश और सोग हैं ।। १ ।।
२. सब हैं उसके वह है सबका, उससे न्यारा कौन है !
भूल में कैसे पड़े ! भुरमे हुये सब लोग हैं ॥ २ ॥ ३.कुट का फल दुख है दुखें, में सत्त का जीवन नहीं।
शिव छ। सङ्ग सत् का फलं चखो, उस ही में सुख के भोय हैं ॥३॥ ४.राधास्वामी ने दिखाया, प्रेम का रास्ता हमें। । प्रेम में सुख शान्ती, आनन्दं के संयोग हैं ॥४॥
-:–दूसरी कथा १. जगत् वाटिका ईश्वर ने जगत् को वाटिका बनायो । नानी प्रकार के फूल बूटे और पौधे लगाये। घास पात कांटे कटीले उगाये । वाटिका रमणीक ! देखने में मनोरंजक और मनोहर ! इसमें जहाँ देखो
सुन्दरलाई का दृश्य आँखों को आकर्षित करता था। उसमें सब कुछ था । वाटिका सुन्दर ! शोभा धाम ! और सब विधि से पूर्ण थी कोई उसे देखकर यह नहीं कह सकता था कि इसमें यह है।
और यह नहीं है । बहुभाँति के पक्षी–पखेरू बृक्षों की शाखाओं पर । कुलेल किया करते थे। फूलों पर मक्खी..और भंवरे मॅडलाते ” में रहते थे! जीव जन्तुओं ने उसे सुखदायक समझ कर उससे जी
लगाया । उसमें पाँच प्रकार के पदार्थ शरीरधारी होकर अपनी : अपनी शोभा दिखाते रहंते थे। यह शब्द, स्पर्श, रूप, रस और
६५., गन्ध थे।
ईश्वर ने मनुष्य से कहा “जा! इस वाटिका को देख । और । उसको देखकर जीवन, बुद्ध और सुख का भोग प्राप्त कर ।” . मनुष्य आया। कुछ दिनों तक तो वहाउसका सुख भोगता रहा। फिर संग्रोश वश वह उसके दोष निकालने लगा और आप ही
अपि दुखी हो गया । । – ईश्वर ने मनुष्य की दशा देखी। पूछा “इस सुख की वाटिका
में आकर तू दुखी क्यों हो गया ? यहां तु दुख भोगने के लिये तो । नहीं आया था ! तुझे हो क्या क्या ?
१० ]
शिव , मनुष्य बोला तेरी बाटिका बहुत अच्छी है परन्तु तू ने समझ बूझकर काम नहीं किया। मुझसे सम्मति ली होती तो मैं सुमति देकर इसे और भी अच्छा बनवाता ।”
ईश्वर हँसा “अब क्या हुआ है ? यदि तू इसे और अच्छा बना सकता है तो अब काम में लग जा । मैं तुझे आज्ञा देता हूँ। परन्तु यह तो बता दे कि इसमें त्रुटी क्या है ? । मनुष्य ने कहा “ बाटिका में फूल हीं फूल होने चाहिये । काँटे का नाम न रहना चाहिये।
ईश्वर मुसकराया “अच्छा ! काँटों को काटकर निकाल दे !
मनुष्य ने ऐसा ही किया । कुछ दिनों तक तो वह फूलों की शोभा देख देख कर मन में फूला न समाया । फिर उससे जी भर गया । घबराया, उकताया और दुखी हुआ ।
ईश्वर आया । उसकी दशा देखी और पूछा “क्या है ?
यह बोला “वाटिका बिगड़ गई। . ईश्वर ने कहा “फूल की शोभा काँटों ही से थी। तू ने कॉटे कॉट डाले । अब एक ही पदार्थ के रहने से तेरे विचार बुद्धि में बिकलता आगई। वाटिका की शोभा यही है कि उसमें सब कुछ हो तब तो वह पूर्ण है नहीं तो अधूरी और अपूर्ण ! यह वाटिका तो नहीं रही। अब फुलवारी रह गई। | मनुष्य ने कहा “फूल इतने लाभदायक नहीं होते। केवल सुगन्ध देते हैं। मैं फूल के वृक्ष लगाना चाहता हूं।”
.. ईश्वर हँसा “फिर तुझे रोकता कौन है ! वह भी कर देख !! । मनुष्य ने वैसा ही किया। फल खाये । घूमा फिरा । ज़िनं बृक्षों में फल नहीं लगते थे सब क ट गिराये । अन्त में उससे भी उकता गया और दुखी हुआ।
ईश्वर फिर आया । पूछा “अब तो तु सुखी है १३३। यह बोला “नहीं !”
( ११
शिव के ईश्वर ने फिर प्रश्न किया“क्यों ? यह कहने लगा “फल ही फल रह गये हैं।”
ईश्वर ने कहा “तू ने भूल की। यह वाटिका नहीं रही। फुलवारी हो गई । फुलवारी भी नहीं ! पतवारी भी नहीं ! कटवारी भी नहीं ! अधूरी वस्तु सुखदायी नहीं होती।
यह कहक़रे ईश्वर चला गया।
मनुष्य ने काट छांट से बहुत काम लिया परन्तु उसे सुख नहीं प्राप्त हुआ। तब महा दुखी और व्याकुल हुआ।
ईश्वर ने आकर उस की दशा देखी। पूछा “क्यों ! अब तो तू सुखी है ?”
इस ने उत्तर दिया “मैं भ्रम में पड़ गया। जो कुछ तू ने किया था वही ठीक था।”
ईश्वर ने प्रसन्न हो कर कहा “मुझे देख ।”
उसने उसे देखा । ईश्वर वाटिका स्वरूप प्रतीत हुआ और उसमें सब कुछ था । चकित हुआ। फिर ईश्वर ने कहा “अपने को देख ।” उसने दृष्टि फेर कर अपने अन्त में देखा। वह भी
आप वाटिका के रूप का निकला। तब तो वह और भी चकित हुआ। ईश्वर बोला “यहाटिका तेरा ही रूप अथवा तेरे रूप की छाया है। इसका तिरस्कार न कर । न इसके किसी पदार्थ से घृणा कर । जैसा है वैसा रह और तू सुखी रहेगा। यदि वहाँ एक की आवश्यकता है तो सब की आवश्यकता है।”
तब मनुष्य को पूर्ण सुख प्राप्त हुआ । १, प्यार कर सब से, भरम की, द्वेष दृष्टी त्याग कर।
रूप है यह जग्त तेरा, इसी से अनुराग कर ॥ १॥ तू यहाँ है । वहाँ है, लोक में, परलोक में । किस जगह जायगा, इस रचना की कह दे भाग कर ॥२॥
। शिव ति क्यों कहा है एती भाव को चित् दे सदा।। नति” वैसग “एती, भाव में अनुराग कर ॥३॥ ४. नेति‘ ती दौनों कल्पित, इनका तो उत्थान है।
त्यागना ही न्यारा दोनों, नींद भव से जाग कर ।।४।। ५. राधा स्वामी संत सतगुरू, के बचन सुन प्रेम, से।
पद कमल में सर झुका, भक्ती‘ अदल वर माँग ॥
तीसरी कथा ” , मनुष्य, और उसको छायां:
ईश्वर ने मनुष्य को बनाया। देखा कि वह अंकेला है, सोचा क्या करूँ ” मनुष्य कार्य के प्रकाश में धूम फिर रह था। उसके शरीर की छाया पांव से लगी हुई नाच रही थी कभी छोटी होगई। कभी वही कभी ये गई कभी बायें ! कभी इतनी घटी कि मनुष्य के पंजे से भी छोटी बन गई! और कभी इतनी बढ़ी कि मनुष्य उसके सामने बच्चा प्रतीत होने लगा जिथे वह छाया को पकड़ने जात्रा छाया फुदकती हुई आगे की ओर लम्बैभडगभर कर भाग निकलती और जब यह. उससे पीठ फेर कर भागता तो यह उसपीछे दौडने होगी ।
ईश्वर दृश्य देखकर हँसा । यात समझ में आगई। बोला। क्या तू चाहा है कि मैं तेरे लिये इसे पकड६१ उसने कहा हां! मैं अकेला हू । यदि यह साथ रहे और बोले तो मुख मिलेगा। यह सामियी इकट्ठा करेगी। उसकी संभाल रखेगी और
में अचिन्ते रह गए।
ईश्वर ने कहा समझ बूझ कर बार कहो। बहे तुझ से तपटेगी वह बोला मैं इसे लिपटा एक्लूगा ।
और मुसकराया “यह तुझे हंसी कलायेगी।“यह गोता.
शिव के “मैं हँस लूगा । रोलगा ।” | ईश्वर ने कहा “ यह चञ्चल होगी । तुझे भी चञ्चल बनायेगी।
वह बोला मैं चञ्चल होगा ।” , | ईश्वर ने हँस कर उसे हाथ लगाया और वह स्त्री के रूप की होगई। ईश्वर ने उसे पकड़ कर मनुष्य को दिया और आप
अन्तर्ध्यान होंगया । | स्त्री को पाकर मनुष्य मन में बड़ा प्रसन्न हुआ। साथ लाया, घर बनाया और रहने लगा परन्तु थोड़े दिनों पीछे वह उससे । घबरा गया । ईश्वर को स्मरण किया । ईश्वर ने प्रगट होकर पूछा
अब क्या चाहता है ?” उसने उत्तर दिया “यह बड़ी बातूनी है। रात दिन बकबक करती रहती है। मैं इसके बकवास से उकता गया, इसे फिर छाया बना दे।” ईश्वर ने हाथ लगाया । वह फिर छाया हो गई। यह प्रसन्न होकर आया । घर में उदासी छायी हुई थी। घबराया और दुखी हुआ । एक से दो अच्छे थे। बात चीत तो कम से कम होती थी। । ईश्वर का ध्यान किया । वह प्रगट होकर कहने लगा अब क्या है ? यह बोला “ छाया को पकड़ दे । उसके बिना सुख नहीं ।” उसने पकड़ दिया । अब यह दोनों फिर साथ साथ रहने लगे।
कुछ दिनों पीछे स्त्री के गर्भ से कई पुत्र पुत्री उत्पन्न हुये। इनके पालन पोषण के लिये पुरुष को उद्यम करना पड़ा । दुःख और कष्ट सहना पड़ा। फिर ईश्वर को बुलाकर कहा “यह तो महा दुखदायी हुई । ले जा ! मैं इसे नहीं चाहता ।
ईश्वर को अब की बार क्रोध आयो “मूर्ख ! मैंने पहले ही तुझे बता दिया था। यह बढ़ेगी, घटेगी, दौड़ेगी, रुकेगी और तेरे पीछे पड़ेगी। अब मैं तेरी न सुनँगा । मुझे और भी काम काज करने हैं। वह करू या कि स्त्री और पुरुष के नित्य के झगड़ों को
१४ ]
शिव सुना करू । दूर हो ! जा, जो तेरी समझ में आवे कर । मैं अब कुछ न सुनूंगा।” “गले पड़ा ढोल बजाये सिद्ध ।”
। तब से वह निराश हो गया। कुछ दिनों तो जिया । फिर बुढ़ापा आया रोगी हुआ और रोते हुये चल बसा ।
ईश्वर हँसा “मूर्ख को छाया के वश रखने की भी बुद्धि नहीं थी। मैं क्या करू ! मेरा कोई दोष नहीं था । उसने जैसा । किया वैसा पाया !” और ईश्वर चुप हो रहा ।
शब्द । १. प्रेम छाया से किया, छाया का गुण जाना नहीं ।
तू ने अपना और उसका, रूप पहिचाना नहीं ।।१।। २, ब्रह्म में माया है शक्ती, शक्ति दुखदायी नहीं ।
भरम से बलवान ने, बल पाके बल माना नहीं ।।। ३. माया छाया एकसी, दौड़ो तो दौड़े और चले।
रुकने से रुकती है, इससे भय कभी खाना नहीं ।।३।। ४. जान लो पहँचान लो, और अपनी शक्ती मानलो ।।
मानकर पहिचान कर, भ्रान्ति चित् लाना नहीं ।।४।।। (५) राधास्वामी सङ्ग कर, कुछ दिन, कि तुझको ज्ञान हो । ज्ञान पाकर भूल के चक्कर, में फिर आना नहीं ॥५॥
चौथी कथा
रचना की सम्मिलित अवस्था । ईश्वर की दया से मनुष्य ने अपनी आँख खोली। ईश्वर की रचना की वाटिका देखी। प्रसन्न हुआ । वाह ! वाह क्या कहना है । कमल का फूल खिला है। भंवरे मॅढला रहे हैं मक्खियां भिना भिना रही हैं। कोयल चहक रही है। चकोर घूम रहे हैं कबूतर
गुटर गू कर रहे हैं। वाटिका से निकल कर चीते, हाथी, गेंडे. हिरन, बारह सिंहे, मोर, बकरी, गाय भैंस सब कुछ देखे । बहुत सुखी हुआ।
शिव
[ १५ इस सुख की दशा में उसे ईश्वर मिला। पूछा “कैसे है ? यह बोला “अनद ही आनन्द है। तू बड़ा कारीगर है । कैसी अच्छी रचना की है ! वाह री तेरी चतुराई ! धन्य है तेरी प्रभुताई ! तेरी महिमा का गीत कौन गा सकता है! “
| ईश्वर प्रसन्न होकर बोला “जो तू कहे तो मैं इसे विचित्र रचना की सम्मिलित अवस्था को पकड़ कर तेरे साथ कर दें। यह बोला “भलाई और पूछ पूछ ! इससे बढ़कर और क्या हो सकता है !
ईश्वर ने हाथ बढ़ाया । सारी रचना को अपनी मुट्ठी में किया। कमल की सुन्दरताई, चकोर की चोल, मक्खी की भिनभिनाहट, कबूतर का गला, चीते की कटि (कमर), हाथी की गम्भीरता, बारहसिंहा की सुन्दरताई का घमण्ड, मोर की स्वप्रशंसा, हिरन की अाँख, गेंडे का बड़प्पन ,बकरी की मैं, मैं कोयल की ‘तू तू‘ गाय की सहन शक्ति, चन्द्र की स्वरूपता, सूय्य की चमक ली और सब को मिला जुलाकर स्त्री के रूप में बनाकर खड़ी कर दी । मनुष्य से कही ! “ले जा ! यह तेरे साथ रहेगी ।”
उस ने धन्यवाद देकर उसे अङ्गीकार किया । घर बनाया हैं और उसके साथ रहने लगा ! भोग विलास किया ।
| स्त्री तो स्त्री है। जैसा उसका स्वभाव वैसे उसके काम ! कभी मक्खी की तरह भिनभिनाती । कभी कोयल जैसी ‘तू तू
और बकरी जैसी ‘मैं मैं करती। चीते जैसी कमर लचकाती। हिरन जैसी आँख दिखाती । मनुष्य उसकी चाल ढाल देखा करता । मुह को बन्द रखता । आँख और कान फेर लेता ।।
स्त्री ने मन में विचारा–“यह अच्छा पुरुष मिला । मेरा मन्त्र इस पर नहीं चलता और न यह दाव में आता है ।” सब कुछ कर बैठी। उस की कुछ न चली।
१६]
शिव तब एक दिन निराश होकर अपने पति से कहा “मैं तेरी अद्धाङ्गिनी हूं तू क्यों इस प्रकार रहता है ?
मनुष्य हँसा “सुन सुन्दरी ! मैं तेरा पति हूँ । तू मेरी स्त्री । है । मैं रूप और तू छाया है। तू मेरे प्रेम की भूखी है । मुझ से प्रेम ले। मैं तुझे प्यार करता हूँ । बस इतना हो बहुत है । इस से
अधिक तू क्या चाहती है ?
यह बोली “तू मेरी सुनी बात अनसुनी क्यों कर देता है ? तू देखता हुआ अनदेखता बना रहता है । बोलता हुआ अन बोला रहता है । यह बात मेरी समझ में नहीं आती ।”
। मनुष्य ने कहा “तू इसे जानकर क्या करेगी ? अपना काम कर और जैसी है वैसा व्यवहार किया कर। मैं तेरे रूप को जानता हूं और अपना रूप भी पहिचानता हूँ । चल घर का काम काज कर । बाल बच्चों की रक्षा और सँभाल कर। जितना घर बार बढ़ाते बने बढ़ा । मैं तेरे साथ हूं और साथ कभी न छोड़गा तेरा मेरा साथ ईश्वर ने किया है !
स्त्री ने चकित होकर पूछा “मेरा रूप क्या है ? और तेरा रूप क्या है ?
यह हँसा “प्यारी ! इसको जान कर क्या करेगी ! द्रौपदी का चीर ढका रहे तब ही अच्छा है । क्या मैं दुश्शासन हूँ ?”
वह बोली “दुश्शासन द्रौपदी का चीर नहीं खींच सका परन्तु द्रौपदी तो अर्जुन के सामने नङ्गी रहती थी। वह उसका पति था ।”
इसने थोड़ी देर सोचा “सच है परन्तु अर्जुन ने द्रौपदी । को चीर कभी नहीं उतारा । काम से काम रक्खा । क्या तू इसे नहीं जानती ?”
यह हँसी ‘ठीक है परन्तु मैं स्त्री हुँ । तू तिरियाहट को
शिव
[ १७: जानता है। अपने और तेरे रूप समझे बिना मैं चैन न लेने देंगी।
पुरुष अपनी बारी पर हँसा ‘मैं तुझे तेरा रूप न बताऊ तो तू क्या करेगी ?
स्त्री बोली जान दे देंगी। यह और भी हँसा ‘तुझ में जान कहां है जो जान दे देगी ! जान तो मुझमें है । तू मेरी जान से जीती, मेरे बल से बलवन्ती, मेरे धन से धनवन्ती और मेरी बुद्धि से बुद्धिवती है। तेरा तुझ में क्या है ? कुछ भी नहीं ! तूने मुझसे संयोग किया। मेरे रूप को अपने गर्भ में ढाल कर पुत्र बनाया । तेरा तो यहां कुछ भी नहीं । सोच तो सही ! तू कसे जान देगी ?
। …। | वह घबड़ाई ‘तुझे बातें बहुत आती हैं। अच्छा यह सब सही । मेरा रूप मुझे समझा दो फिर मैं चुप रहूँगी ।।
यह बोला ‘सुन ले ! तू जीव जन्तु सबकी छाया लेकर बनाई गई है। तेरी भिनभिनाहट मक्खी की है। मक्खी के भिनभिनाने से मुझे क्या ! तेरी मैं मैं बकरी के बोल की छाया है । जितना जी में आवे “मैं मैं किया कर। मुझे क्या ! तेरी चतुराई लोमड़ी के धोके की छाया है। तेरी अपनी प्रशंसा करना मोर की सुन्दरताई की छाया है:::::::::::: | वह इतना ही कहने पाया था कि स्त्री की दशा बिगड़ गई बोली “बस बस ! अब अधिक बात न कर ।”
इसने कहा “तेरा चंचलपना बादल की छाया है। तेरी आँख हिरन की आँख की छाया से बनी है::::::::::::::
स्त्री ने कहा “बस बस ! अब मुंह बन्द करले । मैं अब सुनना नहीं चाहती ।”
: यह बोला “अपना रूप आज समझ ले कि तू क्या है ! फिर तुझे पूछने की आवश्यकता न रहै ।”
१८ ]
शिव | इस से लज्जित होकर सर झुका लिया मन ही मन कहने लगी कि “इस पुरुष ने तो मेरा पता पा लिया। अब चुप के रहने ही में भलाई है। फिर पाँव पर गिरकर उससे क्षमा मांगी और बुरे भले सब दशाओं में उसका में है देखकर तब उसके साथ रहने लगी और उनके बीच फिर अनबन नहीं हुई। वह उसे प्यार करता परन्तु वह पुरुष का प्यार था । अनाड़ी को नहीं । फिर तो वह भी आज्ञाकारी हो गई और यह आज्ञा पालना नारी का था। नर नारी दोनों प्रसन्न चित्त सुख भोगने और मङ्गल जीवन जीने लगे।
| शब्द । १. ब्रह्म में माया है यह, उस से अलग होती नहीं। | चाँद और सूरज से न्यारी, दोनों की जोती नहीं ।।। २. जागता है ब्रह्म तब, माया है उसकी जागती। : भिन्न होकर ब्रह्म से, माया कभी सोती नहीं ।।२।। ३. बल सदा बलवाने में, और शक्ति शक्तीवान में ।। शिव से शक्ती न्यारी होकर, हँसती और रोती नहीं ॥३॥ ४. सन् में जो सत्ता है वह, सत्ता नहीं सत् से पृथक ।
सत् की सत्ता साथ है, और साथ से खोती नहीं ।।४।। ५. राधास्वामी सङ्ग में, आई समझ अब रूप की ।
भिन्न सागर से कभी, मूंगा नहीं मोती नहीं ॥५॥
पांचवीं कथा
| गुरु महात्म | ईश्वर ने देखा कि मनुष्य में ममता बड़ी है। और वह अहँकार का पुतला बना है, जिस कारण से संसार में वह दिन प्रतिदिन बड़ा उत्पात मचाता रहता है सोच समझ कर उसने
…।
शिव के
[ १६ परिणम यह निकाला कि मनुष्य मनमत है। यह मनमता ही उसके कुराह चलने का मुख्य कारण है । तब उसने गुरुमत की प्रणाली चलाई । उससे बहुत मनुष्य सुधर गये । परन्तु उनमें ऐसे भी लोग थे जो गुरुमत के अनुयायी नहीं थे। उनमें केवल साधारण बुद्धी ही वाले नहीं थे किन्तु ऋषी मुनी भी थे । नारद् ऋषी भी जिनकी भक्तों में बड़ी श्रेष्ठता और मुख्यता मानी जाती है। इसी प्रकार के थे।
। नारद आदि भक्त कहलाते हैं। उनके विषय में कहा जाता है कि यह अपने तपोबल से सदेह ईश्वर धाम को चले जाते थे और उसका दर्शन कर आते थे । ईश्वर की दृष्टी नारद की ओर गई और सबसे पहले इन ही का उद्धार करना चाहा ।।
| दैव संयोग ! जिस दिन ईश्वर के मन में यह संकल्प उत्पन्न हुआ, उसी दिन नारद जी देवलोक में ईश्वर के पास पहुंचे। ईश्वर ने इनकी आवभगत की, आसन दिया, बिठाया प्रसन्न चित्त होकर बातचीत की, परन्तु ज्यों ही नारद नमस्का करके बिदाहुये उनके पीठ फेरते ही देवगण को आज्ञा दी कि जहाँ नारद जी बैठे थे उस जगह को गोवर से लीप दो, ऐसा ही किया गया । नारद अभी दूर नहीं गये थे इस. आज्ञा को सुन लिया पीठ फेरी फिर ईश्वर के सन्निकट आये, देखा कि इनके बैठने की जगह लिपी हुई है, चकित हुये कुछ देर चुप चाप रहे फिर पूछा “प्रभो ! मेरे बैठने की जगह क्यों लिपाई गई।
| ईश्वर बोला सुनो नारद ! तुम ज्ञानी ध्यानी पंडित शास्त्रज्ञ सब कुछ हो, परन्तु मन मत हो, गुरुमत नहीं हो, अपनी दिलकश बुद्धी से तुम ज्ञान को प्राप्त हुये हो तुम भक्त भी हो, सच्चे तपस्वी भी हो अपने तप के पराक्रम से जब तुम्हारी इच्छा होती है मुझे प्राप्त कर लेते हो, यह मैं मानता हूँ, पर गुरुमत न होने के कारण मैं तुमको पवित्र नहीं समझता, तुम जहाँ बैठते वह ही जगह अपवित्र हो जाती है, इसलिए मैंने उसे लिपा कर पवित्र कर दिया ।
२० ]
शिव | नारद जी को आश्चर्य हुआ, पूछा, “भगवन् ! यह सच है कि मैंने किसी को गुरु नहीं धारण किया है, क्या आपकी भक्ती मुझे पवित्र नहीं कर सकती ?” | ईश्वर ने उत्तर दिया, “नारद ! तुम समझदार होते हुये कैसी अन समझी की बात करते हो, तुम किसकी भक्ति करते हो, मेरी या और किसी की ? यदि मेरी भक्ती करते हो तो समझ लो मैं सूक्ष्म तत्व हूँ, और तुम स्थूल तत्वों से बने हो, सूक्ष्म और स्थूल में भेद रहता है और उनमें परस्पर प्रेम भाव नहीं हो सकता, भक्ती प्रेम का नाम है, मनुष्य मनुष्य में प्रेम सम्भव है परन्तु देवता और मनुष्य में प्रेम वैसा ! यह प्राकृतिक नियम है, इसके विपरीत कहीं भी न देखोगे, इसलिये जीव
और ईश्वर का प्रेम कल्पित, मिथ्या और झूठा है तुम सोचो जब तक स्त्री पुरुष मनुष्य दशा में हैं, तब तक उनमें परस्पर प्रेम है यदि इनमें से कोई मर जाय और किसी पर प्रगट हो तो वह डर के मारे भाग जायगा । इसी प्रकार और बातों को भी जान लो ।
नारद की आँखें खुलीं, पूछा, “यह तो सच है, आपका कथन असत्य कदापि नहीं होता, फिर मनुष्य किसकी भक्ती करे ।” | ईश्वर बोला, “सुनो नारद ! मनुष्य को गुरु की भक्ती करनी चाहिये, और केवल यही भक्ती लाभदायक होगी, दूसरे की भक्ती से कोई प्रयोजन सिद्ध न होगा ।”
• नारद ने पूछा, तो क्या देवताओं और ईश्वर ब्रह्म की भक्ती को तिलांजली देना चाहिये ? देव पूजा की प्रणाली चल गई है, उसे कैसे मिटाया जायगा ।”
ईश्वर हँसा, गुरु ही को सब कुछ समझ ले । प्रणाली चाहे रहे अथवा न रहे, गुरू में सबको आरोपण कर लेने से प्रणाली को – भी धक्का नहीं पहुचत, कहा गया है :- , . . . .
[ २१
शिव
• (१) अखण्ड मण्डलाकारम् व्यातम ये न चराचरम्
तत्पदम् दृष्टितम ये न तस्मै श्री गुरुवे नमः (२) गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरूदेव महेश्वरः ।
गुरु र्साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः । | नारद बोले “ज्ञान द्वारा आप मुझको प्राप्त हुये हो, ज्ञान दृष्टी सूक्ष्म है इसलिये सूक्ष्म सूक्ष्म का मेल हो सकता है।”
ईश्वर ने कहा यह बात ही बात है, जिस ज्ञान की तुम बड़ाई कर रहे हो वह मनमता, अहंकार सम्मिलित है, यह तुम्हारी युक्ती भी उसी के अनुसार है । यदि तुम मेरे भक्त होते तो तुममें श्रद्धा होती, मेरी बात मानते, वाद विवाद अथवा सम्वाद में नहीं पड़ते । तुम आप अपनी युक्ती से अपनी भक्ती का खण्डन कर रहे हो। | नारद चकित हो कर बोले, “आप ही को मैंने गुरू मान रक्खा है।”
ईश्वर मुस्कराया, “मनुष्य का गुरू तो जब होगा मनुष्य ही होगा, मैं मनुष्य को गुरू नहीं हो सकता, जो लोग पोथी पढ़ कर मुझे गुरू मानते हैं वह भूल में पड़े हैं, मैं उन्हें यथार्थ दृष्टि से प्राप्त नहीं होता हूँ; और तुम अपने विषय में भी ऐसा ही समझो। निगुरे को मेरी सभा में जगह नहीं मिलती। तुम मनमता के तपोबल से लाख मुझे प्राप्त समझो परन्तु मेरे और तुम्हारे बीच में सदा भेदभाव रहेगा, जैसा अब भी है। यदि तुम मेरे भक्त होते तो मेरे और तुम्हारे रूप में भेद न होता, और न इस बकवास की आवश्यकता होती ।
कबीर निगुरा ना मिले, पापी मिले हजार।।
यक निगुरे की पीठ पर, लख पापी का भार ॥
नारद बोले, “भगवान ! फिर क्या करू कि पवित्र हो जाऊँ ?
२२ ।
शिव ईश्वर ने कहा, “जाओ मनुष्यों में गुरू खोजो, मनमता छोड़ो । गुरु मता धारण करो, तब काम चलेगा”
नारद बोले, मैं कैसे और कहाँ ढूढू“
ईश्वर ने कहा, “प्रातः काल उठ कर गंगा के तट पर जाओ जो पहली मनुष्य तुम्हारी दृष्टि में आवे, उसी से गुरु दीक्षा लो”
यह कह कर ईश्वर उसी समय अन्तर्ध्यान हो गया और ” नारद लज्जित हो कर पृथ्वी मंडल पर चले आये ।।
( २ ) । नारद के मन में ग्लानि आई, ज्यों, त्यों सोच बिचार में रात्रि व्यतीत की, गजरदम प्रातःकाल उठे, और आँखें मलते हुये गंगातट की ओर चले, देखते क्या हैं एक मछुआ माझी कंधे पर जाल रखे हुये सामने से आ रहा है, इनके चित्त में घृणा उत्पन्न हुई, सोचा, “बुरा शगुन हुआ, यह मछुआ अपढ़ और असभ्य मुझ जैसे ज्ञानी का गुरू कैसे हो सकेगा ?” पीठ फेरी, उलटे पाँव चल खड़े हुये ।।
पीछे से कान में भनक पड़ी, “यह नारद कैसा मूर्ख और अज्ञानी है जिसे ईश्वर के बचन पर भी विश्वास नहीं है, आया था गुरू धारण करने और मनमता के संस्कार दग्ध करने और यही लौटा चला जा रहा है।” | नारद को आश्चर्य हुआ, मुह फेरा, मांझी के पाँव पर गिरे अपराध की क्षमा चाही, पूछा, आप कौन हैं ?
| मांझी बोला, “मैं प्रश्नोत्तर के लिए इस समय उद्यत नहीं हूं।”
नारद ने कहा, “मुझे अपना दास बनाइये ।”
और उसी समय उस मांझी ने उन को दीक्षित कर मुसकराते हुये कहा, “ऐ नारद ! तू ने गुरू धारण कर लिया,
शिव
[ २३ अब गुरू मत हो कर जो प्रश्न करना है कर । अब उत्तर देने से मैं न कतराऊगा ।”
नारद बोले, इस गुरुमता से लाभ क्या है ?”
मांझी ने कहा, “मनमता और अहंकार को तोड़ना, जिस , से इसका किंचित दोष मन में न रहे, नहीं तो मनुष्य आत्मिक अवस्था को प्राप्त न कर सकेगा ।”
नारद ने कहा, “सच है, किन्तु क्या ज्ञानी को गुरु कोई ऐसा मनुष्य भी हो सकता है जो शास्त्रज्ञ न हो ?”
मांझी हँसा, “तू शास्त्र के ज्ञान की दृष्टी से गुरू धारण करने आया है या गुरू को गुरू की दृष्टि से ? ऐसी दशा में कोई गुरू का सेवक नहीं हो सकता, वह तो शास्त्र का भक्त है, गुरू भक्ती इस से न्यारी है, जो किसी को अन्य दृष्टी से गुरु धारण
करता है वह उस अन्य पदारथ का भक्त है,गुरू का भक्त कदापि नहीं हो सकता।
(१) मान बड़ाई देखकर, भक्ति करे संसार ।
जब कुछ देखे हीनता, अवगुन धरे गॅवार । (२) गुरु भक्ती अति कठिन है,ज्यों खाँडे की धार ।
डगमगाय तो गिर पड़े, निश्चल उतरे पार ।। (३) कबीर गुरु की भक्ति का,मन में बहुत उचास ।
मन मनसा माँजे नहीं, होन चहत है दास ॥ | नारद उस माझी के पाँव पर गिरे, फिर क्षमा माँगी, माझी हँसा, नारद से कहा, “बैठ जा, अन्तर में ध्यान कर” और जब नारद ने आँख बन्द की अन्तर के पट खुल गये, प्रकाश और ज्योति का चमत्कार देखा, ज्योति स्वरूप गुरू का दर्शन मिला, अन्तरी शब्द की गुजार सुनी । “नारद ! अब तेरे निगुरे होने का पाप जाता रहा, तू तो मुझे.अनपढ़ माझी समझता था, मैं परम तत्व, मुख्य तत्व और सत्पुरुष हूँ। मेरी ही भक्ति सच्ची भक्ती
२४ ]
शिव है । अब तेरे बैठने की जगह न लीपी जायगी और न वह अशुद्ध होगी, किन्तु जहाँ तू जायगा तेरे लिये पहले ही से चौका लग कर भूमि पवित्र की जयेगी और तेरी आरती उतारी जायगी आज से तू गुरूमुख हुआ, मन मुख नहीं रहा ।‘ . नारद की आँख खुली, माझी खड़ा हुआ था, चरनों में मत्था टेका।।
बन्दों गुरु पद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि ।।
महा मोह तम पुज, जासु बचन रवि कर निकर।। इस प्रकार उपदेश दे कर वह माझी उलटे पाँव जहाँ से आया था चला गया और नारद गुरू का गुन गाते हुये अपने स्थान में गये और मनमता का दोष जाता रहा।
शब्द (१) (१) गुरु की महिमा कौन गाये, उसका गाना है कठिन । | पहुँचने वाले कहाँ तुझ तक हैं, बानी और बचन ।। (२) बुद्धि निर्णय कर नहीं सकती, न चित चिन्तन के योग | सोचने और समझने की, शक्ति पाता है न मन ।। (३) ज्ञानी अपनी युक्ति भूले, ध्यानी भूले ध्यान कर।
योगी थक कर हार बैठे, कर चुके जब सब जतन ।।। (४) तू नहीं काशी न मथुरा, द्वारिका में तू कहाँ ।।
दृढने बनखंडी और तपसी, चले हैं सूना बन ।। (५) मेरे हृदय में बसा रहता, निस्सन्देह तू ।।
राधास्वामी भेद बतलाया, लगी तुझ से लगन ॥
| शब्द (१) (१) जन्म नर का पाके सत् जीवन, का भागी बन के रह।
भोग ज्ञान आनन्द को और, तू न त्यागी बन के रह ।। (२) बैल गदहा कुत्ता बन्दर, बन ने की इच्छा को छोड़ ।‘ इच्छा माया फाँस है इससे बिरागी बन के रह ॥२॥
शिव के
[ २५ (३) भक्त बन हो ज्ञानी ध्यानी, और विवेकी पारखी ।
• कौन कहता है तुझे जग, में अभागी बन के रह ।। ३ ।। (४) करके सत् सङ्गत गुरू की, रूप : अपनी जान ले ।
सच्चिदानन्दम् अखडएम्. तू न साँगी बन के रह ॥ ४ ।। (५) राधास्वामी की दया ले, जग में तू है सबसे श्रेष्ठ ।। शब्द का अभ्यास कर, और शब्द रागी बन के रह ।। ५ ।।
छटवी कथा
आय जाति । ईश्वर ने जगत् के मनुष्यों में आर्म्य जाति को सबसे श्रेष्ठ बनाया और उसको धर्म कर्म फैलाने और सभ्य रीति के व्यवहार और परमार्थ का काम सौंपा । वेद भी उसे दिये और ऋषि मुनि, देवता आदि आर्यों में उत्पन्न किये। उनके रहने के लिये आवत्त की सुवर्ण भूमि भी प्रदान की जो हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में है और जहाँ गङ्गा यमुना सरस्वती पवित्र नदियाँ बहती हैं । अयोध्या नगर को उसकी राजधानी बनाई । आय जाति के लोग पहिले बहत अच्छे थे । संसार में इनसे श्रेष्ठ कोई नहीं था कुछ दिनों यह सत् जीवन जीते थे फिर बिगड़ गये ।।
ईश्वर को यह अच्छा नहीं लगा । तब उनके धमकाने डराने की इच्छा से उसने दस्यु जाति को बनाया । आशा थी कि दस्यु के भय से यह अपनी दशा को सुधार रखेंगे। कुछ दिन यह, दाँव चला परन्तु काल के परिवत्तन से यह फिर बिगड़े साम (धमकाने की नीति) काम नहीं आई।
तब ईश्वर ने सोचकर आयर्थ जाति के चार विभाग इस अभिप्राय को लेकर किये कि यह विद्या, बल, वणिज और कला कौशल द्वारा चार प्रकार के धन प्राप्त करके सुखी रहेंगे और यह
२६ ]
शिव चार वर्ण ब्राह्मण क्षत्री वैश्य और शूद्र कहलाये। कुछ दिनों तो यह सँभल कर रहे । फिर आपस ही में बैर भाव रखकर एक दूसरे से घृणा करने लगे और बिगड़ खड़े हुये । दाम नीति भी निष्फल हुई।
| तब ईश्वर ने जान बूझकर इन को दण्ड देना चाहा और मुसलमानों को आर्यावर्त्त में भेजा । इन्हें बड़े बड़े दण्ड दिये । गये । मन्दिर मण्डप ढाये गये और यह महा दुखी हो गये। आशा थी कि इस दण्ड से यह सुधरेंगे पर न सुधरे । दण्ड नीति से भी कोई लाभ न हुआ।।
तब ईश्वर ने अंग्रेजों को इस देश में राज्य करने की दृष्टि से भेजा और उन को प्रेरणा की कि आर्यों में भेद फैला दो । जब सब पृथक् पृथक अपने आप को देखेंगे तो एक दूसरे को देखकर अपनी अवस्था का संशोधन कर सकेंगे परन्तु भेद नीति भी काम नहीं आई। राज पाट धन प्रतिष्ठा खोने पर भी वह आपस में कुत्तों के समान लड़ते ही रहे । ईश्वर को इनकी यह बुरी दशा देख कर दुःख हुआ “कैसे शोक की बात है कि यह श्रेष्ठ जाति दिन प्रति दिन बिगड़ती ही चली जाती है और सँभलने में
नहीं आती ।।
तब ईश्वर ने अँग्रेजों से कहा “यह मूर्ख अज्ञान वश न सुधरेंगे। तुम इन पर राज करो । इनको जैसे हो भेदभाव की प्रणाली में डाल कर शिक्षा देते चलो । मैं और उपाय सोच रहा हूं । न यह साम से मानेंगे न दाम से न दण्ड से मानेंगे न भेद से। यह राज काज धन सम्पत्ति बल पराक्रम और कला कौशल के अधिकारी नहीं बनते । अब ऐसे लोगों को इनके सुधार का काम दूंगा जो राज आदि का आदर्श नहीं रखते । केवल प्रेम के प्रचार से इनको सुधारेंगे।” यह कह कर ईश्वर अन्र्ताध्यान हो गया।
[ २७।
शिव के और सत् पुरुष राधास्वामी दयाल ने दया और करुणा का परम संत अवतार धारण करके आर्यों के कुल में अपने आप को प्रगट किया और सुरत शब्द मत और शब्द योग का साधन सिखाना आरम्भ किया ।
| आशा है इस शिक्षा को पाकर सुधर जायेंगे और राज पाट धन द्रव्य के न रखते हुये भी फिर मनुष्यों में श्रेष्ठ पदवी प्राप्त कर लेंगे।
| .::
शब्द १–राधास्वामी ये जग में, संत का अवतार धार ।
शब्द मत सिखला के जीवों, का किया सच्चा सुधार ।। १ ।। २–दुर्मती को त्याग दो, द्वेष ईष अच्छी नहीं ।
मन में हो परतीत प्रीत और, प्रेम भक्त से प्यार ।। २ ।। ३–साम दाम और भेद से और, दण्ड से निकला न काम।।
प्रेम के मारग में आओ, प्रेम का करके बिचार ।। ३।। ४–प्रेम में शक्ती है रहती, और निबलता द्वेष में ।
प्रेम का बल लेके अब हो जाओ, भव सागर से पार ।। ४ ।। ५–राधास्वामी योग सीखो, राधास्वामी योग पढ़ा
• योग का संयोग हो, इसका करो निशः दिन प्रचार ।।५।।
सातवीं कथा
देवासुर संग्राम और उदगीत ईश्वर ने सृष्टि रचते समय दो प्रकार के जीव उत्पन्न किये । एक देवता थे और दूसरे दैत्य । इनको सुर और असुर भी कहते हैं। एक का स्वभाव दूसरे से भिन्न है और दोनों आपस में नित्य ही हर जगह और हर वस्तु में हाथा पाई करते रहते हैं। देवता तो
२६ ]
शिव शुभ आचणों वाले सतोगुणीहोते हैं और दैत्य अशुभ आचरणवाले तमोगुणी होते हैं । इनकी लड़ाई देवासुर संग्राम कहलाती है। यह हमारे तुम्हारे शरीर में भी हैं और पत्त पत्ते, बुन्द बुन्द और रेत के छोटे छोटे परमाणु में भी हैं। कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ यह रह कर मुठ भेड़ न करते हों। कुत्ते बिल्ली जैसी इनकी तशा है । यह लड़े । लड़ते रहे। कभी देवता जीते और असुर हारे ।। कभी असुर जीते और देवता हारे। देवता घबरा गये । असुर फिर भी बड़े बलवान थे।
तब देवताओं की समझ में यह बात आई कि यदि उदगीत ( उधर का राग, अन्तर का राग, प्रणव, अथवा अनहद धुन ) गाया जाये तो असुर सदैव के लिये हार जायेंगे।
। तब वह आँख से बोले “तू हमारे लिये उदगीत गा कि देवताओं को विजय मिले । अखि नै उद गीत गाया । अपने लिये अच्छा अच्छा और दूसरों के लिये बुरा गाया। असुर पहुंचे । आँख को पाप से छू दिया। वह निबल हो गई। तब देवता हारे और असुर जीते और वह भाग निकले ।
तब इन्होंने कान से उद गीत गाने की प्रार्थना की। कान ने अच्छा अच्छा अपने लिये और बुरा बुरा दूसरों के लिये गाया। असुरों ने पाप से उसे छू दिया और देवता भाग निकले।
फिर देवताओं ने जिह्वा से उदगीत गवाया उसने भीअच्छार अपने लिये और बुरा बुरा औरों के लिये गाया । असुरों के पाप से छुये जाने पर इसका भी वही परिणाम हुआ । देवता हारे और असुर जीते ।। | तब मन, नाक, हाथ सबसे बारी बारी पर उद् गीत गवाया । इन सब ने भी अच्छा अच्छा अपने लिये और बुरा बुरा औरों के लिए गाया । असुर पहुंचे। सबको एक दूसरे के पीछे पाप से छू दिया और यह नष्ट भ्रष्ट हो गये । देवताओं की हार ही होती रही ।
शिव
[ २६ . अन्त में यह प्राण के पास गये और कहा “तुम उगीत गाओ ।” प्राण में बुराई भलाई, अपना पराया और राग द्वेष का भाव नहीं होता। ( क्या तुम नहीं देखते कि प्राण सब के सोते समय चलते रहते हैं। चाहे चोर चोरी करे या साधू भलाई करे, यह किसी की ओर ध्यान नहीं देते ) असुर पहुँचे । षाप से छूना चाहा और छूते ही ऐसे भ्रष्ट हुये कि फिर उनका ठिकाना न रहा और देवताओं की जीत हुई। असुर हार कर भाग निकले।
प्राण से जो उद्गीत गाते हैं उनको सच्ची विजय प्राप्त होती है और शत्रु ऐसे नष्ट हो जाते हैं कि जैसे मिट्टी का ढेला किसी चट्टान से टक्कर खाकर पिस जाता है और फिर उसमें टक
राने की शक्ति नहीं रहती।
| यदि मनुष्य प्राण के इस भाव को लेकर अनहद वाणी का साधन करे तो जगत् के संग्राम में उसे भी ऐसी ही विजय मिले । ( यदि यह बात समझ में न आये तो राधास्वामी धाम के
सतसङ्ग में आकर पूछ देखो और काम करो ।)
शब्द । १. राग अनहद का सुनो, अन्तर में अपने आन कर ।। | चित् की वृति रोक लो, सुमिरन भजन और ध्यान कर ॥१॥
२. आँख कान और मुख को मू दो,यह सुगम साधन करो।
चढ़ चलो घट के गगन में, पुतलियों को तान कर ।।२।। ३. गुरु से गुरु गम लेके, सत् सङ्गत में सीखो यह यतन ।
काम में लग जाओ फिर, उपदेश को सत् जानकर ।।३।। ४. बाहरी बातों को छोड़ो, अन्तरी साधन करो।
शब्द का लो आसरा, तुम उसकी महिमा जानकर ।।४।। ५. राधास्वामी ने कहा गुरु करना गुरु को जान कर ।।
पानी पीना पीछे पहिले, पानी लेना छान कर ॥५॥
–
३० ]
शिव
आठवीं कथा | पिण्ड देश और हड़ताल । | ईश्वर ने जब पिण्ड (मनुष्य के शरीर) को रचा तो हाथ पाँव, कान, नाक, दाँत, जिह्वा, मन, आँख, पेट सब को एक एक काम सौंप कर कहा “तुम सब मिले जुले रहकर अपना काम करो
और तुमको सुख और शान्ति प्राप्त रहेगी।”
ईश्वर तो सबको समझा बुझाकर चला गया ।
कुछ दिनों तक यह सब अच्छे रहे। फिर इनमें अनबन हुई । सबके सब पेट के पीछे पड़ गये और लगे उसे कोसने ! तब इन्होंने मिल जुल कर पंचायत की ।
| पाँव बौला “इसी पेट के लिये मुझे बहुत जगह दौड़ना धूपना पड़ता है और मैं थक जाता हूँ। “झगड़े बखेड़े मचते हैं। सब पेट के लिये ।
हाथ ने कहा “इसी पेट के निमित्त मुझे काम काज करने पड़ते हैं और मेरा बल जाता रहता है । “कारण है पेट दुख का विपति का यहाँ सदा ।”
जिह्वा बोली, “तुम तो एक एक काम करते हो। मुझे दुहरा काम करना पड़ता है। इसीके लिये मैं बातें बनाती हूँ। खाने पीने को चुवला कर इसे भरती हूँ। मैं अब इससे तङ्ग आ गई ‘इस पेट ने किया है मुझे देख लो दुखी । ।
दाँतों ने कहा “तुम तो फिर भी अच्छे हो । मैं इस पेट ही के लिये चक्की पीस पीस कर इसका पालन पोषण करता रहता हूँ । दाढ़ में पीड़ा हो जाती है । इस पेट के बखेड़े से उकता गया हूँ मैं ।‘
“आँख ने कहा “इस पेट के लिये मुझे बुरा भला देखना पड़ता है यह न होता तो क्यों मैं ऐसे काम करती ! इस पेट ही ने मुझ को किया नष्ट और भ्रष्ट ।”
शिव ।
[ ३१ । कान बोला “यह पेट बुरा है। इसके लिये मुझे बुरा भला उलटा सीधा, सब कुछ सुनाना पड़ता है। इसके साथ मैं रहना नहीं चाहता । ‘अच्छा बुरा तो मैं सुनें और यह सुखी रहे ।।
| मन ने कहा “मुझे भी तो इसी निर्दयी के लिये बुरा भला सोचने और बन्दर के सामन सौ सौ प्रकार के नाच नाचने पड़ते हैं। यह कैसा कृतघ् है ! सब की कमाई हड़प जाता है । कभी डकार लेता है और कभी नहीं भी लेता । अब मैं भूल कर भी इसका साथ न दूंगा।
दुख बिपद की जाल में, मुझको हँसायो पेट ने । । रात दिन चिन्ता ग्रसित, मुझको बनाया पेट ने । ।
सब इन्द्रियाँ एक एक करके पेट का रोना रोई । अन्त में सब ने यह सम्मति दी कि “हड़ताल कर दो । पेट के लिये कोई भी काम न किया जाये ।” सब ऐसा ही करने के लिये उद्यत हो गये।
| पेट ने सबकी सुनी। कुछ नहीं बोला । इन सबको मूर्ख और अज्ञानी समझकर चुपका हो रहा । यह सब आलसी बनकर बैठ रहे ।
एक दिन दो दिन बीते । अब तो सब की अवस्था बुरी होने लगी । सब एक एक करके निबल और रोगी बन गये । जब यह दशा होगई सब ने फिर पंचायत की। चौकन्ने होकर उठ बैठे और सभी की परन्तु सब की अवस्था शोचनीय थी। बोलना चाहा। पर बात न निकली। जिव्हा लड़खड़ाई । कान फटफटा न सका। न हाथ हिला न पाँव। आँख पथरागई । नाक सिकुड़ गई । मन बेवश होगया। दाँत खट खटाने लगे। यह क्या हो गया ! हड़ताल करने को तो कर दी परन्तु उस का परिणाम दुख ही हुआ।
तब अन्त में पेट ने आप ही उन सब को कहा “मूख ! तुम निपट अज्ञानी हो। तुम ने समझा मेरे लिए काम करते हो और मैं सब के कर्म और श्रमको फल अकेला खाजाता हूं। यह तुम्हारी
३२ ]
शिव भूल है । सोचो ! मैं तो केवल तुम्हारे लिये भण्डारी का धर्म पालता हूं। जो कुछ तुम लाते हो तुम्हारे ही लिए मैं अपने भण्डार में रख लेता हूं और तुम सब से अधिक मुझे तुम्हारे ही लिए काम करना पड़ता है । आहार को अपने भीतर रखकर मैं उसे पकाता रहता हूँ । लेई बनाकर रस, लुहू मज्जा धातु, वीर्य और ओजस् बना बना कर तुम को बाँट दिया करता हूं । तब तुम में शक्ति और बल आता है। एड़ी से लेकर चोटी तक सब को सब कुछ दे दिला कर बलवान बना रखता हूँ। तब ही तो तुम काम करने के योग्य होते हो। तुमने यह नहीं समझा । मुझे कोसने लगे और उलटा बुरा भला सुनाने लगे। मैं अकेला तुम सब का काम करता हूं। देखो ! मैं कृतघ्न हूं या तुम सब कृतघ्न हो ! जो होना था हो चुका । अब उठो काम में लगो । ऐसी भूल फिर कभी न करना ! नहीं तो पछताना पड़ेगा ।”
सब लज्जित हुये। पेट से क्षमा माँगी। काम में उद्यत हुये और जब पेट ने अपनी बारी पर सब को आहार दिया तब फिर वह बल पौरुष और पराक्रम वाले बने ।
| ईश्वर दूर खड़ा हुआ उन की लीला देख देख कर मुसकराता रहा और बोला “यह हड़ताली कैसे मूर्ख थे ! हड़ताल से अपनी ही हानि कर बैठे और अन्त में इन ही को पछताना पड़ा ।”
बिना समझे बुझे हड़ताल का यही परिणाम होता है।
शब्द १. सब रहो मिल जुल के मि लजुलकर, करो सब काम को ।
देखना अनबन न होने पावे, तुम में नाम को ॥१॥
शिव
| [ ३३ २. तज के आलस और निद्रा, त्याग दो परमाद को ।
काम में लाओ सदा तुम, दिनके आठों याम को ।।२॥ ३. एक छिन बेकाम रहना भी, कभी अच्छा नहीं ।
काम से पाते हैं निर्धन, अर्थ मुक्ती धाम को ॥३॥ ४. राधास्वामी योग साधो, राधास्वामी योग पढ़ ।।
जीते जी सुख अन्त में लो, सत् का पद सत्धाम को ।।४।।
नवी कथा
| प्राण की मुख्यता । | ईश्वर ने जब पिण्ड ( मनुष्य के शरीर ) को बनाया तो उसमें नाना भाँति की प्रकृतियाँ और इन्द्रियाँ भर दीं और उन्हें अपना अपना काम समझा कर चला गया ।
जब यह शरीर हृष्टपुष्ट और बलवान हुआ तब एक दिन इन सब इन्द्रियों में अभिमान उत्पन्न हुआ । यह सब कहने लगीं कि “यदि मैं न रहूँ तो शरीर जीवित कभी न रहे । मुझे इस देह में प्रधानता की पदवी दो ।” आँख, कान, नाक, हाथ, पांव, जिह्वा आदि सब डींग मारने लगे प्राण इनकी डींग में सम्मिलित नहीं हुआ। वह चुप रहा ।।
अन्त में सब ने मिल जुल कर पंचायत की । फिर यह निश्चय हुआ कि जिस के चले जाने से शरीर बेकाम हो जाये वही सव में श्रेष्ठ है ।। |सव से पहिले पाँव गया और ६ महिने पीछे आया शरीर
को जीवित पाकर पूछा “तू बिना मेरे कैसे रहा ?” उसने उत्तर दिया “जैसे लँगड़े रहते हैं।”
फिर हाथ गया और ६ महीने पीछे आया । शरीर को जीता जागता पाकर पूछा “तुम सब लोग बिना मेरे कैसे रहे ?” उन्होंने कहा “जैसे लूले रहते हैं।”
३४ ]
शिव | तब आँख गई और ६ महीने पीछे लौट कर आई। पूछा। ‘मेरे बिना तुम सब कसे रहे ?? वह बोले जैसे अन्धे रहते हैं । | फिर कान गया और आया। पूछने पर सवने कहा ‘तेरे बिना हम सब बहिरे के समान रहे ।।
तब जिव्हा (वाणी) गई। लौटने पर शरीर को जीता पाकर चकित होकर पूछने लगी “ मेरे न रहने पर तुम सब के से रहे ?” यह बोले ‘जैसे गूगे रहते हैं।
फिर नाक गई और लौट आई । देह काम कर रहा था । पूछा “मेरे बिना कैसे जी सके ?” सब ने कहा “नकटों और घ्राण शक्ति हीन मनुष्यों के सदृश ।”
तब मन गया और फिर आया । पूछा “मेरे बिना कैसे रहे ? उत्तर मिला “उन्मत्त और अमन मनुष्यों जैसे ।”
इसी प्रकार सब गये और लौटे । इनके बिना शरीर जीवित रहा।
“” अन्त में प्राण जो अब तक चुप बैठा था बोला “लो ! अब मैं जाता हूं । शरीर को सँभालो।” अभी उसने अपना पग भी बाहिर नहीं रक्खा था कि सारा शरीर अकड़ने और ऐठने लगा । आँख, कान, हाथ, पांव, मन, वाणी सबके सब बेजान होने लगे और उससे बोले “तूही सब का राजा है। बिना तेरे कोई नहीं रह सकता । तू न जा शरीर में बना रह और हम सब तुझ को अपनी अपनी सेवा की भेंट देते रहेंगे। तेरे बिना जीना असम्भव है । तब प्राण ठहर गया और उसके ठहरने से सब की जान में जान आई । इससे सिद्ध हो गया कि शरीर में प्राण ही की मुख्यता है और यही सब में श्रेष्ठ है यह रहे तो और सब भी रहें । यह निकल जाये तो सब के सब मर जायें । उनका घमण्ड टूट गया और सब प्राण की सेवा करने लगे।
शिव
| [ ३५
शब्द १. प्राण की है मुख्यता, और प्राण सब का सार है।
प्राण में बल शक्ति है, दोनों का यह भण्डार है ।। १ ।। २. प्राण को समझो समझ #र , शब्द साधो प्राण संग ।।
साधना से सहज में, भव जल से बेड़ा पार है ॥२॥ ३. प्राण का भी शब्द ही है, सार शब्द को लो परख ।
| यह परख आयेगी सत्संग, के वचन की धार से ।। ३ ।। ४. प्राण के समझे बिना, मत शब्द का अभ्यास कर।
फिर न छूटेगा कभी तू, जग के कारागार से ।। ४ । ‘ ५. राधा स्वामी गुरु का सत्संग, पहिले कर फिर ले दया ।।
| इस के पीछे शब्द साधन, मुक्ति दे संसार से ।।५।।
दसवीं कथा ।
ईश्वर के अनेक रूप । ईश्वर ने मनुफय को बनाकर उसे बुद्धि, ज्ञान और विवेक दिया । हर बात की समझ बूझ प्रदान की । उसे नाम और रूप की समझआई। उसने सब कुछ जान लिया । नहीं जाना तो केवल ईश्वर को नहीं जाना । उसने उसे अपने चारों ओर चलते फिरते बैठते उठते देखा भी परन्तु पहिचाना नहीं। रात दिन ईश्वर ईश्वर करने लगा। बातचीत में ईश्वर ! लेन देन में ईश्वर ! सौगन्द खाते समय ईश्वर ! यह सब कुछ था पर उसे खुली आँखों से ईश्वर का दर्शन नहीं मिला । तीर्थ गया. मूर्ति पूजी, मन्दिरों की परिक्रमा की, वेद पढ़े, योग का साधन किया, जप तप सब कुछ किया, आयु भी बहुत बीत गई, पर ईश्वर नहीं मिला । बात पड़े वह कह भी देता था कि सब कुछ मैंने किया और करता रहता हूँ ईश्वर
३६ ]
शिव मुझे नहीं मिलता । समझ में नहीं आता अब क्या उपाय करू कि वह मुझे मिले !‘
| ईश्वर उसकी बातों को सुन सुन कर हँसता और कहता कि “यह मूर्ख मुझे देखता है और पहिचानता नहीं। समझ भी रखता है और जानता नहीं) मैं इसे कैसे बताऊँ कि मैं कौन हूँ
और कहां रहता हूँ ? इसके मन में भ्रम बसता है। यह बताने पर भी मुझे न जानेगा । अच्छा ! आज प्रातःकाल से सन्ध्या समय तक इसे दर्शन देता रहूँगा देखें अब भी यह मुझे देखता है। कि नहीं । यदि इसने इस पर भी न समझा तो मूर्ख और अज्ञानी तो यह अवश्य है परन्तु प्रेमी है। उसके प्रेम का आदर सत्कार करके मैं इससे मिलेगा और अपना दर्शन देकर नर स्वरूप में बात चीत अरूगा तब तो यह अवश्य ही मुझे मान जायेगा, जान जायेगा और पहिचान जायेगा ।”
| यह मन में सोच कर वह चुप हो रहा ।।
उस दिन सूर्य निकलने से सूर्य डूबने तक मनुष्य की दृष्टि में कई आश्चर्य जनक घटनायें आई। मनुष्य ने सबको अपनी आँखों से देखा और चकित हुआ, परन्तु उसे उस में ईश्वर का दर्शन नहीं हुआ।
“रौत हुई जाड़े का दिन था। सब लोग आग सेकने के लिये बैठे थे । वह मनुष्य भी उनके बीच में था। सब लोग बैठे हुए दिन की बातों की चर्चा करने लगे। संयोग की बात एक और पुरुष भी वहाँ उनके साथ आकर बैठ गया।
मनुष्य कहने लगा ‘‘आज की बातें तो ऐसी विचित्र हुई हैं। कि जो समझ में नहीं आतीं । कोई क्या समझे ! और क्या न समझे !” ।
यह नया पुरुष पूछ बैठा “मुझे भी सुनाओ मैं भी तो सुनें “”
उस मनुष्य ने कहा “कठे पर से एक लड़का गिर पड़ा। यहीं वह लद से गिरा। नीचे दो तीन गायें अकस्मात् ॥
है उनकी पीगि थोड़ी सी चोट आई।
शाई होती तो अवश्य और गया होता की जगह पथरीली हड्डी पसलोथ सब चूर हो गई होती क्या यह नवर और अनोखी बात नहीं थी।
एषु बोला वह गाये चही थी। गायों के रूप में ईश्वर आपः उस नई बालक को बचाने आया था।
मनुष्य ने कहा “दूसरी बात यह हुई कि गांव के एक घर में आग लगी । लोड पर एक सुमारी लड़की सो गई थी। और सब प्राणी तो किसी न किसी विधि से निकल आये थे परन्तु सोई हुई। तडका ने निकले सकी । जब आम अचसड हुई उसकी आंखें वैली पर वह न तो सीढ़ियों से नीचे उतर सकती थी न ऊपर से
द. सकती थी। उसके जल मरने में कोई संदेह नहीं था। उसी समय एक परदेसी आया। परदेसी क्या था । दया का रूप था! दया ही दहे धारण कर आग हो । उसने झटपट खिड़की से कॉस की सही लगाई। अपनी जान पर खेल कर ऊपर चढ़ा लड़की को अपनी कमर से बाँधा और सब के देखते देखते उतार लाया। वह कई जगह आप जल भी गया था परन्तु लड़की को बाल बाल बचा लाया । उस पर आँच तक न आने पाई और फिर वह
हि चला गया।” पुरा बाल उठा ‘वह परदेसी नहीं था। साक्षात् ईश्वर था । शोर कुया बात हुई ?
मनुष्य ने कह“तीसरी बात यह हुई कि एक साँप ने एक की ती राह रोक ली थी और वह अवश्य कहा। रानी झपटी। अपना जो उसके पण पूर: मारा सामने
की तो छोड़ दिया। वह भाग गई बिरलीस गया। होना बताया। जने यह उठता
सेती







Hits Today : 607
Total Hits : 1720023