जैन-वृतान्त
( जैन महापुरुषों और देवियों की जीवनियाँ )
– लेखक—
महर्षि शिवब्रतलाल वर्मन एम. ए.,
सम्पादक
नन्दूभाई ( निज़ामाबाद दक्षिण )
सहायक सम्पादक
देबीचरन मीतल
(लेखराज नगर) अलीगढ़
प्रथम वार सर्वाधिकार सुरक्षित [ मूल्य ॥) प्रति
विषय अनुक्रमणिका
क्रम विषय विषय ।
१-प्राक्कथन
२–भूमिका ।
३-ऋषभदेव ( आदिनाथ )….
४-अर्हन जी
५-नेमिनाथ
६-पाश्र्वनाथ
७–महावीर स्वामी
८-हेमचन्द ( हेमाचार्य)
६-राजमती
१०–महारानी धारनी …
११-राजकुमारियाँ–धनवती, रत्नवती,
रूपवती, कुसुमवती
गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देव महेश्वरः ।।
गुरु साक्षात् पर ब्रह्मः तस्मै श्रीगुरवेनमः ।।
®®®®® ®® शिव ®®®®®®
* सतगुरु स्वरूप *
-( १ )
हम जैसा बन आया साधो ! हम जैसा बन आयो । रूप सरूप धरी नर मूरति, नर बन जीव चेताया। नर के रूप की शोभा भारी, नर तन महिमा गाया । घर में प्रेम प्रीत सिखलाया, भक्ति का पन्थ चलाया। सहज ही काटी यम की फाँसी, भरम अज्ञान मिटाया ।। राधास्वामी चरण शरण बलिहारी, गुरु पद मीस झुकाया । हम जैसा बने आया साधो ! हम जैसा बन आया ।।
| -:०:
आवश्यक निवेदन | ‘शिव’ का ६ वाँ अक ‘जैन वृतान्त’ आपकी सेवा में भेजा जा रहा है। इससे आपको प्रगट हो जायगा कि हमारा ध्येय सभी धर्म और सम्प्रदायों के महापुरुषों के उच्च-से-उच्च विचार और भावों को लोगों तक पहुँचाना है।
मगर | यह कार्य आप सत्र की सहायता पर ही निर्भर है। यदि आप थोड़ा-सा भी प्रयत्न करें तो १-२ ग्राहक बना देना कोई कठिन बात नहीं है। इससे हमारी साहस भी बढ़ेगा और हम अधिक-से-अधिक सेवा आपकी, देश की तथा संसार की कर सकेंगे।
आशा है आप हमारी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देंगे ।
–सः सम्पादक
एक गलती (१) गत अक, माह जुलाई १९५६ का अक था । उसमें ग़लती से माह जुलाई व अगस्त ५६ (तरंग ५ व ६) छप गया है। पाठक इसे नोट कर लें और ठीक कर लें ।
(२) अगस्त मास का यह ‘जैन वृतान्त’ है।
(३) सितम्बर ५६ को–‘राधास्वामी योग’ प्रथम भाग होगा । नोट–यदि सितम्बर अक ( ‘राधास्वामी योग’ प्रथम भाग)
की पृष्ठ संख्या अधिक हो गई और समय पर प्रकाशित न हो सका तो वह अंक सितम्बर और अक्टूबर दोनों महीनों का एक ही अंक होगा । पाठक समय पर अङ्क न मिलने पर इन्तज़ार न करें। -स० सम्पादक
प्राक्कथन
( सम्पादक द्वारा ) | सचाई के प्रेमी बहुत कम हैं। सचाई पर विचार करने वालों की संख्या अत्यन्त सीमित है। जो लोग सचाई का जीवन व्यतीत करने के इच्छुक हैं, अधिकता से दृष्टिगोचर नहीं होते। फिर भी दुनियाँ में जो कुछ है वह सचाई है। सचाई सर्वव्यापक है। सचाई सृष्टि की जान है और नित्य
और स्थायी है। | आदि में सचाई थी । अन्त में भी सचाई रहेगी। मध्य अवस्था की बाबत कैसी ही कोई राय निश्चय की जाय मगर वह भी सचाई से रहित न होगी । सूर्य का प्रकाश अपनी असलियत की दृष्टि से प्रकाशमान और तेजवान है। इसमें अन्तर नहीं है मगर जिस समय आकाश मंडल धुध और काले बादलों से घिर जाता है, प्रगट रूप में अधेरा छा जाता है और अधेरा दिखाई देने लगता है मगर जो वस्तु इस अधेरे का ज्ञान रखती है और उसका भान करती है वह ऐसी दशा में भी लुप्त नहीं होती, किन्तु अधेरे का भी आधार बनी रहती है। वह न हो तो अधेरे का ज्ञान भी नहीं हो सकता था । वह क्या है ? वह सूर्य के प्रकाश का अंश है और अपनी जात (स्वरूप) की दृष्टि से सूर्य है। सूर्य पहले था, अन्त में भी रहेगा । बादलों का समूह केवल एक बीच वाली दशा है । यह भी, चाहे जिस दृष्टि से देखो, सूर्य के आधार ही पर रहता है। यह सूर्य सचाई है।
इसी प्रकार आत्मा नित्य, मुक्त और शुद्ध है। वह जैसा है। वैसा ही रहता है। इसमें किसी प्रकार को घटाव-बढाव नहीं होता । न उसमें उन्नति है न अवनति । केवल बीच की हालत
–
शिव के में कल्पना और भ्रम की गंदी धारों के वेग से अज्ञानी इसको कुछ-का-कुछ समझने लगते हैं। अज्ञान का सिलसिला बढ़ जाता है और इसके बढने और घटने के उतार-चढ़ाव के क्रम में जन्म-मरण, बंध मोक्ष, दरिद्रता व धनाढ्यता और सुख-दुख प्रतीत होने लगते हैं। जहाँ कमी वहाँ बेशी होती है। जहाँ चढाव है, वहाँ ही उतार है। जहाँ आना है, वहाँ ही जाने का सवाल पैदा होता है। जहाँ इनमें से कोई भी नहीं है, वही अखण्ड आत्मा है। वही सब-कुछ है।
| आदि में मुक्ति की दशा थी । अन्त में भी मुक्ति है। केवल मध्यावस्था बन्धन की अवस्था है और वह भी भ्रमात्मक और कल्पित है। यदि इसकी भली प्रकार समझ आ जाय तो इस बीच वाली अवस्था के रहते हुए भी बन्ध मोक्ष के विषय स्वयं सुगमता से हल हो जाते हैं और समझ में आ जाता है कि जितनी दौड़-धूप तथा परिश्रम किया जा रहा था, वह केवल कल्पना मात्र था। इससे अधिक उसकी हैसियत नहीं थी ।।
अधेर है कि एक वस्तु जो असलियत से रहित या मिथ्या दिखाई दे रही है, मनुष्य उससे प्रभावित होकर तरह-तरह के पाप-पुण्य की जंजीरों से जकड़ा हुआ दुखी है। रस्सी वास्तव में रस्सी ही है। इसमें सॉप का भ्रम हो गया। हृदय पर भय सवार हो गया । नेत्रों में विशेष प्रकार के रूप का कल्पित नक्शा समा गया । कलेजा काँपता है। हाथ-पाँव थरथराते हैं। हृदय धड़क रहा है। घिग्घी बँध गई है। न साहस है कि वहाँ से भाग सके और न शक्ति है कि ध्यान पूर्वक उसे देख सके । न इधर जा सकता है, न उधर जा सकता है । कहे तो कठिनाई न कहे तो कठिनाई। ऐसी दशा में कोई किस प्रकार किसी से कहे कि यह साँप नहीं है, बल्कि रस्सी है और वह मानने कब लगा । वह तो साँप को देख रहा है। साँप उसको प्रत्यक्ष
जैन वृतान्त * दिखाई दे रहा है । दृष्टि भी विशेष प्रकार की बन गई है। वह किसी दृष्टि वाले की बात सुनने के लिये तैयार नहीं हो सकता। तैयार भी कैसे हो ? जो कुछ दृष्टि के सामने है, वह फुर रहा है। उसके अपने हृदय से काल्पनिक धारे क्षोभित होती हुई समुद्र के ज्वार-भाटे की भांति ऊपर-नीचे आ रही हैं। चित की वृत्तियाँ अन्य प्रकार की बन गई हैं। नेत्रों की राह से जो वृत्ति निकलती है, वह साँप के ख्याल को दृढ़ करती जा रही है। वही प्रभाव रग-रगमें धंस गया है। अफ़सोस ! ऐसे
आदमी को कोई समझाये भी तो कैसे समझाये।
| घट समुद्र लख ना पड़े, उट्ठ लहर अपार ।
दिल दरिया समरथ बिना, कौन उतारे पार ।। मगर साँप की असलियत क्या है ? क्या वह कल्पित और भ्रम उत्पादक नहीं है ? क्या अपने ही मन की कल्पना ने रस्सी में साँप को उत्पन्न नहीं किया है ? रस्सी आरम्भ में रस्सी थी और अन्त में रस्सी ही रहेगी, मगर बीच की हालत में साँप दिखाई दे रहा है। यदि दृष्टि थोड़ी सी सुक्ष्म हो जाय तो अभी भ्रम का पर्दा आंखों से उठ जाय और वास्तविकता ज्ञात हो जाय मगर कहे कौन और सुने कौन ?
यह संसार भी जो जीवों के दुःख का कारण बना हुआ है। पूर्णतया कल्पित और भ्रमात्मक है। हमारे अपने ख्याल ने इसको रचा है और उसको रच कर आप इसके भ्रम में फंस कर दुःखी हो रहा है । ऐ मनुष्य ! तू कैसा दुखी हो रहा है ! किसको तेरी परेशानी, हैरानी का पता है ? मनुष्य आप अपनी ग़लती से इसमें फंस रहा है और वह आप उपाय कर के इससे छूटेगा।
छुटकारा लो होना ही है। इसमें थोड़ा सा भी सन्देह नहीं है । जहाँ दुःख है वहाँ कभी न कभी आप सुख का सवाल
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शिव के . आवेगा । जहाँ मृत्यु है वहाँ जीवन की समस्या स्वयं किसी समय विवाद का विषय बनेगी। आवश्यकता को अविष्कार (ईजाद) की माँ कहा गया है । कैदी सदा छुटकारे की चिन्ता में है। भूके को रोटी की आप चिन्ता रहती है। प्यासा पानी की खोज में आप बाहर निकलेगा । यह मनुष्य के हृदय के स्वाभाविक भाव हैं। यह किसी के रोकने से रुक नहीं सकते । न यह दबाये जा सकते हैं। इसलिये सच्ची शुभ सूचना सुनाई जाती है कि कैदियों को रिहाई, बंधुओं को मोक्ष, दुखियों को सुख अवश्य मिलेगा । जहाँ एक की पहुँच है वहाँ दूसरे की भी पहुँच है। गति सदा वृत (दायरा) के रूप में हुआ करती है । जहाँ अश है वहाँ कुल रहता है । जहाँ रोग है वहाँ इलाज का सामान भी मिलता है। यह कल्पित रचना द्वन्द की रचना है। अग्नि-जल, गर्मी सर्दी, रात दिन, गुलाब काँटे, मधु और डस सब ही यहाँ विद्यमान हैं। मनुष्य आज दुखी है कल को सुखी होगा । वह स्वयं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की ओर आकर्षित होगा। इसके अनुभव जैसे-जैसे बढ़ते जायेंगे और दृश्यमान जगत में जितना अधिक ज्ञान उसको होता जायेगा “वैसे ही वह क्रमशः उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ सत
पद तक पहुंच जायगा । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। * दुनियाँ में न कहीं स्थायी स्वर्ग है न स्थायी नर्क है। यह विचार झूठे हैं। यदि मनुष्य थोड़ा सा भी ध्यान दे तो वह समझ सकेगा कि जो कुछ कहा जा रहा है वह अक्षरशः सत्य है ।
| क्यों ? क्योंकि यदि दुःख स्थाई होता तो फिर उसके दूर * करने का उपाय व्यर्थ होता । जो स्वर्ग परिश्रम से प्राप्त किया जातो है उससे विछोह हो जाने का भी डर रहता है। क्योंकि प्राप्त की हुई वस्तु नष्ट हो जाती है। जिन से मिलाप होता है वे हमेशा बिछड़ते हैं। जिन पर अधिकार मिलता है उन
जैन वृतान्त छ । , को एक समय छोड़ देना भी होता है। कर्म का भोग आवश्यक है । कर्म के क़ानून के साथ पारितोषिक और दंड भी रहते हैं। कर्म सीमित है, इसलिये पारितोषिक और दंड भी सीमित हैं। यह भूल कर भी ख्याल न करो कि सीमित कर्म को पारितोषिक और दंड असीमित होगा। तुम चाहे जितना कर्म करो वह सदा सीमित रहेगा और उसका फल भी सीमित होगा । सम्भव है किसी को कल्प तक का सुख या दुःख मिले मगर कल्प की भी तो सीमा है। ब्रह्मा तक की आयु सीमित है । ऐसी दशा में जो धर्म स्थायी स्वर्ग या नर्क की घोषणा करते हैं वह बड़ी ग़लती पर हैं। उनकी ग़लती स्पष्ट रूप से प्रगट है, उन के वर्णन की आवश्यकता नहीं है।
| मगर चलने दो । जो जिस तरह चलना चाहता है, चलता रहे। जिस प्रकार उसका जी चाहे साधन अभ्यास, योग-भोग, जप-तप, नियम-धर्म रोजा-नमाज़ किया करे । उसको आप तजुर्वा हो जायेगा कि यह सब अज्ञान धंधे हैं। जब यह बात भली प्रकार हृदयांकित हो जायेगी। वह स्वयम् आत्म-ज्ञान और निज स्वरूप की ओर आकर्षित होगा । जहाँ अनुभव शक्ति बढ़ी संसार का अभाव हो जायेगा और संसार के अभाव के साथ वह अपनी आत्मा में स्थित होगा। वह देख लेगा कि जिस तरह रस्सी में साँप का भ्रम हुआ था और इससे बचने के उपाय भ्रमात्मक और कल्पित थे इसी प्रकार संसार के जन्म-मरण, उन्नति अवनति, की इच्छा सब की सब भ्रम पूण और कल्पित हैं। जो अज्ञान के वश में हैं वह शीघ्र नहीं समझ सकते । इन पर अपने निज
- हिप्नोटिज्म ( Hypnotism ) का जादू सवार है । जैसा ख्याल बना है जैसी आँखें बनी हैं, वैसा ही दिखाई देता। रहेगा। वैसी ही कल्पित तस्वीरें निगाह के सामने खेलती हुई
के गोरख
* शिव * दिखाई देती रहेंगी । मगर समय आवेगा जब यह जादू कमजोर होकर लुप्त होने लगेगा।
सृष्टि, स्थिति और प्रलय का क्रम सिद्ध कर देगा कि इनमें से कोई भी हालत नित्य और स्थायी नहीं है। आदमी जब नोंद के समय स्वप्न देखता है, उसकी दृष्टि के सामने अगणित दृश्य रहते हैं। स्वप्न में उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है। उसी के आधार पर स्वप्न की दुनियाँ पैदा होती है, उसी में कुछ समय तक स्थिति रहती है और उसी में लय हो जाती है । जो कुछ है, वह आप ही है। इसके सिवाय और कुछ भी नहीं है । उसी की विचार-शक्ति ने स्वप्न के जगत की रचना की है । शत्रु-मित्र, अपने-पराये, गाँव और शहर उसी में पैदा हुए । वह उनको देखकर प्रसन्न होता है, शोक करता है और उदास होता है । यदि उस समय कोई व्यक्ति उससे यह कहे कि इस स्वप्न के जगत का उत्पत्तिकर्ता और उसका आधार तू आप है तो वह कभी विश्वास न करेगा। मगर आँख खुलने पर उस समय उसको कहने-सुनने की आवश्यकता न रहेगी। वह जान जायगा कि स्वप्न के समस्त दृश्य कल्पित थे और उसके मन की फुरना से उत्पन्न हुए थे। जिस प्रकार स्वप्न की दुनियाँ की दशा है वैसे ही जागृत की दुनियाँ का भी हाल है। जैसे स्वप्न कल्पित है, वैसे ही यह जगत भी कल्पित है। दोनों की दशा एक जैसी है । असलियत की दृष्टि से उनमें कोई अन्तर नहीं है। जागृत में स्वप्न की दुनियाँ लुप्त हो जाती है, क्योंकि उनमें कोई टिकाव नहीं है। गहरी नींद में इन दोनों का अभाव हो जाता है। जहाँ न स्वप्न है और न जागृत है। यह जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति वास्तव में सृष्टि, स्थिति और प्रलय के प्रतिदिम्बित नक्शे हैं। जब तक अनुभव नहीं हो लेता, वे किसी सच्चे मनुष्य की बात सुनने के लिये तत्पर नहीं हैं।
।
जैन वृतान्त दुनियाँ में ऐसे जीव भी मौजूद हैं जो इन रहस्यों की ग्रन्थी खोलना चाहते हैं। वह जानना चाहते हैं कि हम क्या हैं, इनसे हमारा सम्बन्ध क्या है और हम किस तरह शीघ्रता से बन्धन की जंजीर को काट कर मोक्ष की अवस्था में जा सकते हैं। संत मत ऐसे ही लोगों के भ्रमों को दूर करने का उपाय बताता है । जिनकी आँखें मूढ़ता और अन्धकार के गर्द-बार से साफ-सुथरी हैं और हृदय पक्षपात और संकीर्णता से रहित है, वह इन पृष्ठों को बार-बार पढेगे और उन पर ध्यान देंगे। यह लेख उन्हीं के लिये लिखा गया है ।।
‘शिव’ इन्हीं इने-गिने थोड़े से पवित्र हृदय वाले और अधिकारियों की विशेष रूप से सेवा करने के लिये जारी किया गया है, जिसमें क्रमशः उनकी दृष्टि उच्चे बनाने का प्रबन्ध ध्यान में रखा गया है । न किसी से छेड़-छाड़ है, न किसी पर दोषारोपण है। जहाँ सचाई प्रतीत होती है, उसकी ओर इशारा कर दिया जाता है और व्यर्थ बातों को छोड़कर केवल सिद्धान्त की ओर तवज्जह दिलाई जाती है।
जैनियों के वृतान्त आकर्षक और हृदय विदारक हैं और उनकी तपम्यायें भी ऐसी हैं जिनका उदाहरण नहीं मिलता । ‘जैन वृतान्त’ में उन महापुरुषों के चरित्र लिखे गये हैं जिन्होंने अपने अद्वितीय जीवन से मन और इन्द्रियों को संयम करने का जतन बतलाया है और यह अध्यात्म के उच्च शिखर पर बैठकर सचाई की घोषणा करते हैं। इसके अवलोकन से सच्ची शान्ति मिलती है । सिवाय उच्च कोटि के अधिकारी के हर एक को इसकी सच्च। समझ नहीं आ सकती ।।
इन थोड़े से पृष्ठों में उनके तप और योम बल को विदित करने का प्रयत्न किया गया है। जो उनको पढ़गे, अध्यात्म रूपी धन से परिपूर्ण होकर स्थिरता और शान्ति प्राप्त करेंगे।
सबसे अधम-नन्दुभाई
*
भूमिका जैन धर्म के आचार्यों के वृतान्त हिन्दुओं को साधारणतया ज्ञात नहीं हैं, जिसके कारण कभी-कभी वे व्यर्थ कुछ-का-कुछ समझ बैठते हैं। इसमें जैनियों और हिन्दुओं दोनों का दोष है। जैनी महाशय इसलिये दोषी हैं कि अपने धर्म की फिलोसफ़ी
और तत्व विचार के भावों का प्रचार नहीं करते । हिन्दुओं का दोष यह है कि वह पूछ-गछ से काम नहीं लेते और जैन धर्म को अपना विरोधी समझते हैं। देहली में एक बार जब जैन धर्म का जुलूस निकला था, मैं उसके साथ साथ था। हिन्दुओं के मुख से उस समय ऐसे अपशब्द सुनने में आये, जिनसे मेरे दिल को ठेस लगी। मैंने इसी कारण अपने मासिक पत्र ‘साधू’ में कुछ जैन महात्माओं के पवित्र जीवन-चरित्र लिखे ताकि जो ग़लत विचार उनके प्रति फैले हुए हैं, वे दूर हो जायें। मैं जैनियों से वैसे ही प्यार करता हूँ, जैसे हिन्दुओं से, और इसलिये मेरे हृदय में दोनों के लिये स्थान है।
जैन धर्म की जानकारी मुझे बहुत कम है। केवल थोड़ीसी पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं। इतना अवकाश नहीं मिलता कि मैं कुछ और अधिक पढ़। इसलिये सम्भव है कि मैंने उसके समझने में कहीं-कहीं त्रुटियाँ की हों । त्रुटियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है।
इन कुछ जीवनियों में यदि कहीं कोई बात ऐसी दिखाई पड़े जो जैन धर्म के नियमों के विरुद्ध पड़ती हो तो उसका
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शिव उत्तरदायित्व मेरी कम समझी होगी और मैं इसके लिए सदैव क्षमा प्रार्थी रहूँगा।
इनके लिखने से मेरा अभिप्राय यह कभी नहीं है कि मैं किसी को मानसिक पीड़ा पहुँचाऊँ अथवा किसी की धार्मिक श्रद्धा, विश्वास को धक्का पहुँचाऊँ। मेरा अभिप्राय जो कुछ है वह मैंने ऊपर वर्णन कर दिया है। यदि इसे पढ़कर किसी जैनी जानकार महाशय को अपने पंथ के आचार्यों के चरित्रों के एकत्र करने की लालसा हो जाय तो मैं समझ गा कि मेरा परिश्रम सुफल हुआ। मैं चाहता हूँ कि हर एक हिन्दू सम्प्रदाय के अनुयायी अपने-अपने आचार्यों के चरित्र सब को सुनायें, ताकि सब मैं प्रेम-भाव बढ़े । हृदय तथा विचारों की संकीर्णता दूर हों । मेरे इधर ध्यान देने का मन्तव्य ही यही है और कुछ नहीं । जो सज्जन चाहे किसी जाति या सम्प्रदाय के हों, यदि इस प्रकार काम करते हैं या करेंगे तो मैं उनको अपना हाथ बँटाने वाला समझेगा। विचारों के फैलाने का साधन केवल साहित्य की वृद्धि है। । अन्त में मैं एक बार फिर अपनी बेवशी की क्षमा याचना
करता हूँ।
मार्च सन् १९११
‘शिव’
ऋषभदेव ( आदिनाथ ) | इस आर्यावर्त में एक समय था, जब राजा ही देश व धर्म का मालिक और आचार्य समझा जाता था। वही जातीय और धार्मिक सरदार और वही राज्य के लिये क़ानून बनाने वाला और सबको मर्यादा पर चलाने वाला समझा जाता था।
केवल इतना ही नहीं किन्तु ब्रह्म विद्या का आचार्य राजा ही * हुआ करता था। जिन ऋषि, मुनियों को ब्रह्म-विद्या और
आत्म ज्ञान की इच्छा होती थी, वह राजाओं की सेवा में उपस्थित होकर जिज्ञासू बनकर शिक्षा पाते थे। इस विचार की पुष्टि न केवल उपनिषदों से होती है, किन्तु स्वयं स्वामी शंकराचार्य ने इसको स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है। इसलिए ब्रह्म-विद्या को राज-विद्या कहा जाता है। परन्तु समय में परिवर्तन हो गया। दशा बदल गई, कुछ-को-कुछ हो गया। इस उलट-फेर ने हमारे देश के इतिहास तक के पृष्ठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिये जिनसे उसका अधिक समर्थन हो सकता था। | यह दशा केवल आर्यावर्त ही की नहीं थी बल्कि आर्यावर्त के रहने वाले जहां-जहाँ जाकर बसे, वहां भी इसी नियम का पालन होता रहा । पारसियों के बादशाह जहां एक ओर राज्य शासन का कार्य करते थे, साथ ही वे नबी और रसूल भी कहलाते थे । इस पारसी जाति में २४ नबी हुये हैं। इनमें से जरदश्त नबी को छोड़ कर सब राजे थे। यही दशा कुछ
मिश्रियों की भी है। | जैनी तीर्थकर भी गिनती में २४ थे और यह भी क्षत्री थे । बुद्ध भी २४ ही हैं। यह भी सब-के-सब क्षत्री ही थे । हमारे यहां २४ अवतारों में क्षत्री और ब्राह्मण दोनों ही हैं। मगर इनमें भी
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शिव जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं, वे सब क्षत्री जाति के हैं, – जिससे प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि प्राचीन काल में क़ौमी व
धार्मिक पथ-प्रदर्शन केवल राजाओं के ही हाथ में था।
लोगों को अनुमान है कि जैनियों की उत्पत्ति महा भारत के पश्चात् हुई । यह विचार ठीक नहीं है। यदि जैनी बिलकुल नये होते तो मीमान्सा, साँख्य आदि शास्त्रों में इनके सिद्धान्तों का खंडन न मिलता । यह मत कब से है यह ठीक नहीं कहा जा सकता । | इसका कुछ पता ऋषभदेव से लगता है जो जैनियों में ,
आदिनाथ कहलाते हैं। यह महात्मा स्वयम्भू वंश के प्रियवर्त कुल के राजा नाभि के लड़के थे। माता मरूदेवी कहलाती थी इनका जन्मस्थान अयोध्या नगरी में बताया जाता है। किसीकिसी ग्रन्थ में इनकी जन्म-भूमि कैलाश देश और दशा नगरी भी कही गई है। यह हिन्दुओं के २४ अवतारों में आठवें अवतार हैं। वह महा आत्मज्ञानी परमहंस और धर्मात्मा हुये हैं। जैनियों के पहले तीर्थंकर के सम्बन्ध में कहावत है कि यह भी महर्षि कपिल के समान जन्म से सिद्ध थे। गर्भ ही से माया त्यागी थे और कैवल्य (निर्वाण) पद तक पहुँचे हुये थे । ‘नाभि
राजा इनको पाकर अपने आप को बड़ा भाग्यशाली समझते थे। लड़कपन में इन्होंने ऋषियों से वेद, वेदांग पढे । बुद्धि तीब्र थी, हाथ पाँव और शरीर के बली थे । सुन्दर, तेजवान, शान्तचित्त, न्यायप्रिय, अभिप्राय यह कि सर्व शुभगुण सम्पन्न थे । धनुर्विद्या अश्वारोहण शस्त्रविद्या में निपुण थे मगर साथ ही दयावान भी अधिक थे । जब यह युवा अवस्था को पहुँचे, ‘नाभि राजा राजपाट इनको देकर और मरूदेवी को साथ लेकर बद्रिकाश्रम पर तप करने चले गये।
ऋषभदेव ने जिस निपुणता से राज-काज किया उसकी प्रशंसा
न.
२… ……
…………….. –
* जैन वृतान्त आजतक की जाती है । यद्यपि यह सज्जन व दयालु थे मगर सेना की शिक्षा का उत्तमोत्तम प्रबन्ध रखते थे, ताकि दूसरे देशों को इनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस न हो। इन्होंने बहुत से यन्त्रों का आविष्कार किया। कृषिविद्या की ऐसी उन्नति की कि इससे अधिक इस देश में अब तक ऐसी उन्नति देखने में नहीं आई। कृषि के सब औजार जो अब तक इस देश में प्रचलित हैं, उन्हीं के समय से वैसे ही चले आते हैं। व्यापार के विषय को भली भांति समझते थे। यह कहा करते थे कि अय्येवर्त कर्म भूमि है। लेकिन यदि राजा चाहे तो इसको स्वर्ग भूमि बना सकता है । उन्होंने सचमुच इसको स्वर्ग भूमि बना कर दिखला भी दिया। प्रजा की जन संख्या तथा देश की समृद्धि को सारे कामों में सर्वोपरि समझते थे । ऋषभदेव का कथन है-“धर्म और आचरण केवल राज व्यवहार के ठीक होने पर ठीक रह सकता है । यदि राजा अच्छा नहीं है तो न तो धर्म कर्म चलेगा न कोई योग व तप का साहस करेगा। राज्य शासन जब तक अच्छा न होगा, विद्या तथा कला कौशल की उन्नति भी नहीं हो सकती; क्योंकि यह सब बातें केवल अमनचैन की दशा में ही सम्भव हैं ।” एक बहुत बड़ा गुण इनमें यह था कि यह देश में सामाजिक संगठन के प्रेमी थे। इन्होंने अपने जीवन में सौ बड़े बड़े यज्ञ किये थे । उनमें सब ऋषि-मुनि छोटे-बड़े सम्मिलित किये जाते थे। इस सामाजिक व धार्मिक सम्मेलन की सहायता से वह अपने राज्य को पुष्ट करते थे। एक बार उन्होंने महान यज्ञ किया था जिसमें कुल दुनियां के राजे बुलाये गये थे। इस यज्ञ के अवसर पर जहाँ इन्होंने धर्म की महिमा, सामाजिक संगठन का महत्व और मिलजुल कर रहने की आवश्यकता पर व्याख्यान दिया था, साथ ही ज्ञान का महत्व भी लोगों को समझाया था; क्योंकि बिना सच्चे ज्ञान के मुक्ति
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शिव के कठिन है। ज्ञान ही मनुष्य के जीवन का उच्चतम् उद्देश्य और
आदर्श है । इनकी रानी का नाम जयन्ती था। | इनके सन्तान अधिक थी उनकी संख्या सौ तक बताई जाती है। उनमें इक्यासी ब्रह्म कर्म करने वाले लड़के थे, जो सब के सब ऋषि कहलाते थे। भरत इनके लड़कों में अधिक प्रतिष्ठित समझा जाता है। शेष के नाम कवई, हरी, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पीपलायन, आवरहोत्र, द्रोहल, चम्स, करभाजन आदि हैं । यह सबके सब ब्रह्मनिष्ट योगाभ्यासी थे। इनमें नौ प्रसिद्ध योगेश्वर हुये हैं। इनमें से दस तो विभिन्न देशों में सैनिक पदों पर नियुक्त थे और शेष या तो ऋषियों की दशा में उपदेश दिया करते थे या ब्रह्मज्ञान की ओर लोगों को आकर्षित करते रहते थे। पुत्रों को आदेश था कि हर प्रकार के काम सीखें । हर काम में वृद्धि करके सबसे श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करें क्योंकि शासन कार्य केवल एक ही लड़के को मिल सकता है। ऋषभदेव यद्यपि बड़ी बुद्धिमता से राज-काज करता था मगर भोग-विलास से भी उसको घृणा नहीं थी । यह सब होते हुये भी वह दुनिया में दुनियाँ का होकर नहीं रहता था । वह सच्चा ज्ञानी था और संसार में इस अवस्था में रहता था जिस प्रकार कँवल का फूल पानी में रहता है । इसने अपने लड़कों को स्वयं ब्रह्मविद्या की शिक्षा दी थी।
| जब आयु अधिक हुई, बन में जाने से पहले उसने इस देश को नौ विभागों में विभाजित किया और फिर अपने पुत्रों को पृथक-पृथक उनका राजा नियुक्त किया । भारत, कुशावर्त, अलावर्त, बह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पर्क और कीकट उनके नाम थे। उन्हीं के नाम के कारण वे देश भी प्रसिद्ध हुये । सबसे अधिक देश भरत को दिया, जिसके कारण यह
न वृतान्त $ महाद्वीप भरत खण्ड कहलाया। इसके पहले यह देश भारतवर्ष नहीं कहलाता था।
इतिहास में कई भरत हुये हैं। एक जड़ भरत जो बहुत बड़ा प्रतापी राजा हुआ है, दूसरा दुष्यन्त और शकुन्तला का लड़का जो चक्रवर्ती राजा था। बहुत लोगों का विचार है कि भारतवर्ष का नाम इन्हीं दोनों में से किसी एक के नाम के कारण पड़ गया है । हमारा भी ऐसा विचार था किन्तु अनुमान यह कहता है कि इन राजाओं से पहले भी यह देश भारतवर्ष के नाम से विख्यात था। | चूकि ऋषभदेव का लड़का भरत सबसे प्राचीन है सम्भव है। कि यह नाम उसी के कारण रक्खा गया हो । यह चु कि जाँचपरताल का विषय है इस पर इस समय वादविवाद करना व्यर्थ है।
जब ऋषभदेव इस प्रकार राज्य बाँट चुका तो अपनी सन्तान को उपदेश दिया। उनमें से कुछ बातें ये हैं:-“राज धर्म सबसे बड़ा धर्म है। इस एक धर्म में सब धर्म जाते हैं जैसे हाथी के पांव में सब के पांव समां जाते हैं वैसे ही रोज धर्म में संसार के सारे धर्म :-गृहस्थ धर्म, वानप्रस्थ धर्म, ब्रह्मचय धर्म, सन्यास धर्म इत्यादि जाते हैं। राज अगर अच्छा है तो सब अच्छा रहेगा। राज अगर बुरा है तो सब धर्म बुरे हो जायेंगे । सामाजिक, आत्मिक और धार्मिक अवस्थायें ये राज धर्म की तीन टांगें हैं। अगर किसी राज्य के प्रजा की सामाजिक धार्मिक और वैयक्तिक दशा ठीक नहीं है तो फिर वह राज्य “बहुत दिन तक न चल सकेगा । जैसे आत्मा शरीर में रह कर “सब इन्द्रियों को अधिकार में रखता है और उन से काम लेता है। वैसे ही राजा को भी सब में व्यापक बन कर प्रजा को अपने वश में रखना व काम लेना चाहिये। किसी को बिगाड़ो मत बल्कि सब
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” शिव को नियम में रखो । ग़रीबों को कभी भूल कर भी न सताओ। अत्याचारियों को भयसहित दंड दिया करो । समय-समय का धर्म पृथक-पृथक होता है इसलिये राजा को विशाल दृष्टि वाला होना चाहिये । पक्षपाती और संकीर्ण हृदय वाला न बनना चाहिये। हृदय तथा विचार की संकीर्णता और धर्म की ग़लत समझ मृत्यु की ओर ले जाती है। याद रखो सब के धर्म भिन्न होते हैं। बच्चे का धर्म अधिक आयु वालों के धर्म से भिन्न है । क्षत्री धर्म और वैश्य धर्म में अन्तर है। समाज का धर्म व व्यक्तिगत धर्म एकसा नहीं होता । इन की समझ अनुभव तथा प्राचीन ग्रन्थों से आती है। विद्या प्राः; करने के लिये सदा तत्पर रहो, मगर ऐसा कभी न हो कि वह विद्या तुमको अपने अधीन बनाले बल्कि वह तुम्हारे आधीन रहे। किसी के घिराव या बन्धन में न आओ । अपनी स्थिति, अपना कर्तडेय और अपना काम सदा याद रखो। इन बातों के स्मरण से पग-पग पर तुमको असलियत का पता लगता रहेगा। किसी काम में जल्दी न करो हमेशा सोच-समझ कर काम किया करो ! जिस काम के करने से धर्म के साथ तुम्हारी श्रद्धा बढ़ती हो, उसके करने में कमी न करो । अधर्म की राह पर भूल कर भी न चलो ।” | इस प्रकार लड़कों को उपदेश देकर उसने उनको अपनेअपने राज्यों में जा कर रहने की आज्ञा दी और स्वयं पर्वत पर तप करने लगा । तप के बाद फिर पर्वत से नीचे उतरा और परमहंस के भेष में देश-विदेश फिरता हुआ दया, क्षमा व ज्ञान का उपदेश सुनाने लगा। इसने बहुत दिनों तक इस प्रकार प्रचार किया और जैन धर्म की नींव इसीसे पड़ी। फिर यह ब्रह्मवर्त में आया। ब्रह्मवर्त वह देश है जहाँ गंगा, जमुना और सरयू बहती हैं। आजकल जिसको हिन्दुस्तान कहते हैं वह प्राचीन काल में ब्रह्मवत्त कहलाता था और अधिकतर यहाँ के
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जैन वृतान्त मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हुआ करते थे। यह ब्रह्मवर्त संसार में सबसे । श्रेष्ठ है । यह पृथ्वी मण्डल की नाभि है । ऋषभ देव कुछ काल तक यहां रहे। बाद को शेतुरंजा पर्वत पर जाकर समाधिस्थ हो गये। अवधूत की तरह रहने लगे । न कोई अपना न कोई पराया । कुछ विचित्र दशा थी । जहाँ बैठ गये वहां बैठे रहे। ने खाने की परवाह न पीने की इच्छा । पानी बरस रहा है। इनको तनिक भी ध्यान नहीं, बड़े वेग से बाढ़ रही है यह अपनी जगह बैठे हैं। गर्मी सर्दी किसी का डर नहीं रह गया। आनन्द (मस्ती) और प्रेम मग्नावस्था थी । अपने आपको भूले हुये थे। अपनी व अपने व्यक्तित्व को समझ नहीं रही थी। अगर जागते हैं तो रातों जागते ही रहते हैं। यदि सोते हैं तो कांटों पर पड़े हुये हैं। यदि गाने का ध्यान आया तो घंटों भगवत राग गा रहे हैं। भूक प्यास थकावट नाम को भी नहीं । इनका जीवन कुछ ऐसा पूर्ण बन गया था कि इन की मिसाल संसार में ढूढने से भी न मिलेगी । यह लय अवस्था है । इस मस्ती की दशा में वह कोटन देश करनाटक में आये । वहां एक जंगल था जिस का नाम कटकाचल था । यहां वृक्षों की रगड़ से आग लग गई और वह देखते-देखते हर जगह फैल गई। आग की लपटें इतनी प्रचंड हुई कि सारा जंगल अग्नि-कुण्ड बन गया। ऋषभदेव ने दृष्टि उठाई । जोर से खिलखिला कर हंसे और इस अग्नि के बीच में बैठ कर इस प्रकार मस्ती के साथ गाने लगे जैसे कभी-कभी स्नान करते समय लोग ईश्वर की स्तुति गाते हैं। अग्नि ने इन के लम्बे-लम्बे केशों को जलाना प्रारम्भ किया। हड्डी मांस सब जलने लगे लेकिन यहां चेहरे पर नाम को भी बल नहीं था। ये शांत चित थे। अग्नि ने अपना काम किया और ये इस प्रकार हंसते खेलते हुये निदए । पद को पहुँच गये।
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शिव छ । संसार के इतिहास में इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन कठिनता से मिलेगा । इस प्रकार की विस्मृति किसी में नहीं देखी गई। यह स्थिति न मूढ़ता है न उन्मत्तता है। इसकी समझ केवल उस को आसकती है जो आत्मिक भेद को जानते हैं। | यह पुरुष अपने निज रूप में मग्न था। शुद्ध, मुक्त, सत् चित, आनन्द। जैनी इन को ‘जिन’ कहते हैं, जिस ने शरीर को पूर्णतया वश में कर लिया और आत्मानन्द में मग्न हो गया था। बौद्ध उस को बुद्ध और सर्वज्ञ बुद्ध कहते हैं। दोनों उसको अपना आचार्य मानते हैं। ऋषभदेव ने इस संसार में सुधार और अहिंसा का बहुत बड़ा प्रचार किया है। इस दृष्टि से यह पूज्य और माननीय हैं।
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अर्हन जी । अर्हन जी धर्म के महान प्रचारक हुये हैं। यदि सच्ची बात कही जाय तो वह यह है कि “जैन धर्म की नींव जिस महापुरुष ने रखी थी वह यही थे। यह सत्य है कि जैन धर्म का प्रारम्भ ऋषभदेव जी से बताया जाता है जो स्वयं एक बड़े महात्मा होगये हैं, मगर उन्होंने क्या शिक्षा दी, क्या नियम बतलाये, किस तरह धर्म का प्रचार किया, इस प्रकार के प्रश्न हैं जिनका संतोषजनक उत्तर किसी के पास नहीं है । ऋषभदेव जी संसार के महान ब्रतधारी, त्यागी, वैरागी और अन्तरनिष्ठ राजऋषि हुये हैं, मगर उनका जीवन वास्तव में, मस्ती और आनन्द का जीवन था। सम्भव है इस धर्म के सिद्धान्तों के बनाने वाले वही हों, इससे न किसी को विवाद है न विरोध है, मगर जैन धर्म की प्राचीनता को मानते हुये भी इस बात को स्वीकार करना
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® जैन वृतान्त # पड़ेगा कि इसको क्रियात्मक रूप देने वाले अर्हन जी थे।
जन्म – अर्हन जी प्रसिद्ध जैन आचार्य युधिष्टिरी सम्वत् के ११४४ में पैदा हुये थे। जन्म-भूमि बिहार प्रान्त का प्रसिद्ध शहर पटना है । संस्कृत और प्राकृत के बहुत बड़े विद्वान और पंडित थे। कुशाग्र बुद्धि और सूक्ष्म विचार के थे । छोटी ही अवस्था में विद्या प्राप्त करली समाज की दशा की ओर आपकी दृष्टि गई। जिन धार्मिक विचारों का देश में प्रचार था उनमें उनको कमी दिखाई दी और जैसा कि जैनियों के ग्रन्थों में लिखा है ऋषभदेव के सिद्धान्तों को पुनः भली भांति प्रचार करने का संकल्प किया
और इसके प्रचार में सारा जीवन अर्पण कर दिया।
| योगेश्वर भट्ट का प्रमाण आर्य विद्या सुधा नाम की एक संस्कृत की विख्यात पुस्तक है जिसका लेखक योगेश्वर भट्ट बताया जाता है। यह लेखक अपनी पुस्तक में लिखता है कि सबसे पहले चारवाक ने वेदों के प्रतिकूल अपने मत को जारी किया । इसका सिद्धान्त था कि आत्मा शरीर है। कोई आत्मा शरीर से भिन्न नहीं है। इसके खंडन का बीड़ा बुद्ध धर्म ने उठाया, जो यह सिखाता था कि
आत्मा क्षणिक विज्ञान है । क्षण-प्रति-क्षण परिवर्तन होने वाली बुद्धि ही आत्मा है। इसके अतिरिक्त और आत्मा कोई नहीं है। बुद्ध के खंडन के लिये जैन धर्म उठ खड़ा हुआ जो आत्मा को चैतन्य मानने वाला है। इस मत के दो भेद हैं। दिगम्बर व श्वेताम्बर । दिगम्बर नंगे रहते हैं। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र धारण करते हैं।
अर्हन जी का एक बौद्ध आचार्य के साथ शास्त्रार्थ । हिन्दुओं में यह बात परम्परा से चली आती है कि जब
शिव कोई नया मत प्रगट होता है, वह सब से शास्त्रार्थ करके अपने मत को सर्व श्रेष्ठ सिद्ध करता है। अर्हन जी के साथ और किन-किन पन्थ वालों के शास्त्रार्थ हुए इसका पता नहीं चलता । केवल बौद्धों से शास्त्रार्थ करने का हाल ज्ञात होता है और इसमें सन्देह भी नहीं है कि यह शास्त्रार्थ बड़े जोर का हुआ होगा । अर्हन जी कहते हैं “ऐ बौद्ध ! तुम कहते हो कि बुद्धि ही, जो क्षण-प्रतिक्षण बदलती है आत्मा है। यदि आत्मा ऐसा ही परिवर्तनशील है, तब एक जीव दूसरे . समय बदलकर जब दूसरा बन जाता है तो फिर कर्म का फल किसको होगा ? यदि * यह कहो कि एक व्यक्ति काम करता है और दूसरे को फल मिलता है तो यह बात कुछ असम्भव सी प्रतीत होती है। एक मनुष्य अपराध करे और दूसरा उसके बदले फाँसी पाये यह कैसे सम्भव है ? माना चेला कार्य है और गुरू का ज्ञान इसका कारण है। चेले का ज्ञान गुरू से आया है मगर यहां गुरू के व्यक्तित्व और उसके कर्मों का चेले के साथ क्या सम्बन्ध है ? कुछ भी नहीं। यदि इस क्षणिक विज्ञान रीति को मान भी लिया जाय तो यह तो बताओ कि ज्ञेय, ज्ञाता, ज्ञान की त्रिपुटी की सम्भावना कहाँ होगी। इसलिए ये आत्मा क्षणिक विज्ञान हैं नहीं है आदि-आदि ।”
अर्हन जी के सिद्धान्त अर्हन जी का सिद्धान्त है कि पाँच वस्तुयें अनादि हैं-(१) द्रव्य, (२) शक्ति, (३) पदार्थों का स्वभाव, (४) जड़ व चेतन बनाने का काल का स्वभाव, (५) ईश्वर कोई नहीं है; क्योंकि वह किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता । जो जीव कि मुक्त हो। गये हैं वही अठारह प्रकार के दोषों से रहित हैं। वे ही ईश्वर हैं और उन्हीं को जिन और अर्हण कहते हैं। वे सर्वव्यापक
लक्ष्य
जन वृतान्त छ । नहीं है मगर सर्वज्ञ हैं। जैनियों में सर्वव्यापक ईश्वर का भाव बिल्कुल नहीं है। ब्रह्म और माया को असत्य मानते हैं। यह ब्रह्म या आत्मा को एक नहीं मानते, अनेक मानते हैं। चैतन्य मय, ज्ञान स्वरूप, कर्म भोगने वाला, जन्म व मरण पाने वाला और मोक्ष का अधिकारी जीव है। जीव पदार्थ नित्य है। दूसरी वस्तुयें जड़ हैं जो जीवों से भिन्न हैं और अजीव कहलाती हैं। जैसे जीव पदार्थ अनन्त हैं ऐसे ही अजीव पदार्थ अनन्त हैं। एक-एक जीव के शरीर अलग-अलग हैं। जीव, अजीव ये जैन धर्म के दो परम तत्व हैं। इन्हीं दोनों तत्वों के विचार पर जैन धर्म की नींव पड़ी है। | इनके बाद जो शिष्य हुए वे सात अथवा नव तत्व मानने लगे जिनके नाम ये हैं। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रवे, स्वर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष । ये नव तत्व हैं। | इनके यहाँ जीव दो प्रकार के हैं। संसारी व मोक्ष । संसारी भी दो प्रकार के हैं-सम्यक और असम्यक । सम्यक के फिर दो भेद हैं—स्थावर और तरस । फिर स्थावर के पाँच भेद और तरस के चार भेद मानते हैं। स्थावर जीव एक इन्द्री वाला है। और दो इन्द्री वाले, तीन इन्द्री वाले, पाँच इन्द्री वाले, बहुत से जीव मानते हैं और इनके छप्पन भेद नियत करते हैं। इनमें कीड़े, मकोड़े, वृक्ष आदि आ जाते हैं। धर्म से मोक्ष और अधर्म से जन्म-मरण मानते हैं।
मोक्ष के साधन जैन धर्म के मोक्ष के तीन साधन हैं। पहला सम्यक दर्शन, दूसरा सम्यक ज्ञान, तीसरा सम्यक चरित्र ।। | सच्चे हदय से अहन गुरू का दर्शन करना, उनके बचन
पर सच्चा विश्वास लाना और जैन धर्म के तत्वों को उनके – मुख से सुनकर अंगीकार करना सम्यक दर्शन हैं।
* शिव । | जीव-मात्र पदार्थ जो संसार में हैं, उनका निज रूप ( ममत्व को छोड़कर ) इस तरह समझ लेना कि फिर संशय का भय न हो सम्यक ज्ञान कहलाता है। इस ज्ञान के पाँच भेद हैं। (१) ज्ञान (२) श्रुति ज्ञान (३) उदधि ज्ञान (४) मत प्रयाय ज्ञान (५) कैवल्य ज्ञान । ।
दोष और पातक उत्पन्न करने वाले कर्मों का त्याग सम्यक चरित्र है । मनुष्य का चाल-चलन और व्यवहार इस प्रकार का हो कि इससे किसी को दुःख न पहुँचे। इसके पाँच भेद वर्णन । किये जाते हैं -(१) अहिंसा (२) सुनृत (३) अस्तेय (४) ब्रह्मचर्य (५) अपरिग्रह ।।
| इन मुख्य साधनों से मोक्ष मिलता है। मन बाणी और शरीर से पवित्र रहकर, तपस्या करते हुए, ज्ञान में इस प्रकार चला जाय कि पहले समस्त कर्म और उनके संस्कार दग्ध हो जायें और अपने स्वरूप में स्थिति हो । यह मोक्ष कहलाती है। जब कम में फिर अंकुर जमने और फल देने का संस्कार न रहेगा, तब सदा के लिए जन्म-मरण से छुटकारा मिल जायगा और जीव उस समय शुद्ध ईश्वर, अर्हन, जिन और कैवल्य की अवस्था में चला जायगा। इस साधन के क्रम में इनके योग जप-तप धर्मा आदि सब आ जाते हैं।
२ . अर्हन जी की मृत्यु इस प्रकार देश-देशान्तर में घूम-फिर कर धर्म प्रचार करने के बाद अर्हन जी ने बहुत सी धार्मिक पुस्तकें लिखीं । स्थानस्थान पर अपने मठ बनाये, जिनमें से राजपुताना की ओर के मठ प्रसिद्ध थे। इस प्रकार काम करते-करते चालीस वर्ष व्यतीत हो गये । इसी समय में मगध का राजा महानन्दी मर
जैन वृतान्त छ गया । क्षत्रियों से राज जाता रहा और उनकी गद्दी पर नन्दराज शूद्र राज करने लगा । उसने ३५ वर्ष तक राज किया। उस समय अर्हन जी की आयु नव्वे वर्ष की थी । धर्म का डंका बज चुका था । बहुत से मनुष्य इनके मत में सम्मिलित हो चुके थे । अन्त में युधिष्ठिरी सम्वत् १५३३ में ज्येष्ट वदी द्वादशी शुक्रवार के दिन पुष्कर तीर्थ में जैनियों के निर्वाण पद में चले गये । आज इनको शरीर त्यागे हुये २४०० वर्ष से अधिक हुये मगर अब तक उनका नाम वैसा ही चला आता है।
यहाँ एक बात और सोचने के योग्य है । गौतमबुद्ध को गुप्त हुये २५०० वर्ष बताया जाता है । यह प्रश्न हो सकता है कि फिर अर्हन जी का उनके किसी शिष्य के साथ शास्त्रार्थ कैसे हो । सकता है। इस प्रश्न का उत्तर हम सन्तोषजनक नहीं दे सकते। हाँ! इतना कह सकते हैं कि जैसे जैनी अपनी परम्परा की दृष्टि से बहुत प्राचीन हैं वैसे ही बौद्ध भी प्राचीन हैं जो गौतमबुद्ध से पहले अपने धर्म का प्रचार करते रहे होंगे; क्योंकि गौतम बुद्ध जी से तो अर्हन जी पहले हो चुके हैं। हमारे विचार में तो यह आता है कि जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी
जी बुद्धदेव के समकालीन थे।
। जैन धर्म में मत भेद
अर्हन जी के मरने के बाद जैनियों में मतभेद होना प्रारम्भ हुआ। पहिले कोई ऐसी बात नहीं थी। बाद में साधू भिक्षा मांगने लगे। सर के बाल चिमटी से निकालने और हाथों में कमण्डल रखने लगे। फिर तो अधिकता के साथ भेदभाव फैलता गया । पहिले सब श्वेताम्बर थे फिर दिगम्बर हुये। यह दोनों शाखायें अब तक स्थान-स्थान पर मौजूद हैं। महाबीर स्वामी दिगम्बर थे और इस शाखा के लोग अपने आपको प्राचीन बताते हैं। अब दिगम्बर साधू रंगीन वस्त्र पहिनते हैं और
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* शिव के अंजलि से पानी पीते हैं। कुछ की तो यह दशा देखी गई है। कि अर्हन जी तक को नहीं मानते । श्वेताम्बर वाले सब कपड़े पहिनते हैं। यह भेद इनमें कैसे पड़ गये कहा नहीं जासकता । । सन् १८६७ में मैं होशंगाबाद गया था। मुझको जैनियों के हालात पूछने की बहुत दिनों से उत्कण्ठा थी । घूमते फिरते एक मन्दिर में जा पहुँचा । एक स्त्री वहाँ बैठी हुई थी। वह मुझको मन्दिर में ले गई । एक चबूतरा दिखलाया । जिस पर जैनियों की धर्म पुस्तकें रखी हुई थीं। वह स्त्री पढ़ी लिखी थी। मुझको अपने धर्म के नियम बताने लगी। मूर्ति पूजा का निषेध करने लगी, मुझे बहुत आश्चर्य हुआ; क्योंकि जैनियों में मूर्तिपूजा परम्परा से चली आती है। | बम्बई व अहमदाबाद में भी मैंने उनके कई मन्दिर देखे । साधारणतया जैनियों में शिक्षा प्रणाली इन दिनों सन्तोष जनक नहीं है। इनमें धर्म पुस्तकों को पढ़ने का रिवाज कम है। धार्मिक नियमों से बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं और जैन धर्म के सिद्धान्तों की सच्ची समझ कम रखते हैं।
नेमिनाथ नेमि नाथ जी जैनियों के बाईसवें तीर्थंकर हैं। यह शौरीपुरी नगरी (आगरा) में समुद्रविजय राजा क शिवा रानी के पेट से पैदा हुये थे। छोटी ही आयु से समाधि निष्ट व समाहित चित्त वाले थे । सारी आयु ब्रह्मचर्य व्रत पालन किया । लोगों से बहुत कम मिलते थे। ज्ञानी ध्यानी, धैर्यवान और नीतिवान थे। बचपन ही से इनके विचार और भाव बहुत ऊँचे थे। इनको ऋषभदेव जी को मुख्यावतार भी मानते हैं।
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| जैन वृतान्त
३६ जैनियों के ग्रन्थों में लिखा है कि पुराणों के आठवें अवतार श्री कृष्ण जी महाराज नेमिनाथ जी के नातेदार थे और किसी कारण उनमें परस्पर एक दिन रात बराबर लड़ाई होती रही जिसमें कृष्ण जी हार गये, मगर यह कुछ ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जहाँ तक पता लगता है कृष्ण जी महाराज नेमिनाथ या समुद्रविजय के सम्बन्धी सिद्ध नहीं होते, न इस लड़ाई झगड़े को कहीं वर्णन पाया जाता है।
चाहे जो कुछ हो । नेमिनाथ का जीवन, कम शिक्षाप्रद नहीं है । यद्यपि यह कम बोलते थे और योगी थे, तब भी देशविदेश घूम फिर कर आवश्यक्तानुसार उपदेश भी देते रहते थे। संसार से उनको मतलब नहीं था । न जीते जी कभी उसकी ओर आकर्षित हुये । उनका आदर्श आरम्भ ही से आध्यात्मिक था । यह साधु ही के रूप थे।
कभी कुछ दिनों के लिये एकान्त सेवन करते रहते थे, फिर भ्रमण करते हुये उपदेश सुनाया करते थे। इस प्रकार घूमते-फिरते हुये जब गिरिनार पर्वत पर पहुँचे, शरीर को कर्म करने के योग्य नहीं पाया । जन्म जन्मान्तर के कर्मों के संस्कार दग्ध हो गये थे। आवागमन के भय से मुक्ति मिल गई थी। गिरिनार पर आसन जमाया और समाधि की दशा में कैवल्य पद को प्राप्त किया । इनकी स्मृति में जैनी गिरिनार पर्वत को
अपना बड़ा तीर्थ समझते हैं।
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शिव
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पार्श्वनाथ । जिस प्रकार हिन्दुओं में विष्णु के २४ अवतार माने जाते हैं और जिस प्रकार बौद्धों के २४ बुद्ध हैं वैसे ही जैनियों के २४ तीर्थकर हैं। बौद्धों के २४ बुद्धों के नामों से मुझे जानकारी नहीं है । हिन्दुओं के २४ अवतार ये हैं। मच्छ, कच्छ, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुध, कल्कि यह दस अवतार मुख्य हैं । १४ और अवतार उप अवतार कहलाते हैं जैसे :-स्वयम्भू मनु, नारद, सन्कादिक, मोहिनी, कपिल व्यास, दत्तात्रेय, पृथु, हयग्रीव, बद्रीनारायण, हन्स, धन्वन्तरी, यज्ञ, ऋषभ । * जैनियों के २४ तीर्थकरों के नाम ये हैं:-(१) ऋषभदेव (२) अजितनाथ (३) सम्भवनाथ (४) अभिनन्दन (५) सुमति नार्थ (६) पद्मप्रभू (७) सुपाश्वनाथ (८) चन्द्रप्रभू (६) पुष्पदन्त (१०) शीतलनाथ (११) श्रेयांशनाथ (१२) वासुपूज्य (१३) विमलनाथ (१४) अनन्तनाथ (१५) धर्मनाथ (१६) शान्तिनाथ (१७) कुन्थुनाथ (१८) अरहननाथ (१६) मल्लीनाथ (२०) मुनिसुव्रतनाथ (२१) नमिनाथ (२२) नेमिनाथ (२३) पाश्र्वनाथ (२४) महावीर स्वामी ।। | इनमें ऋषभदेव बहुत प्राचीन काल में हुये हैं। पाश्र्वनाथ इनमें तेईसवें तीर्थंकर हैं। यह विख्यात् और उच्चकोटि के बुद्धिमान् महापुरुष शालिवाहन के नौ सौ वर्ष पहले हुये हैं। इनकी जन्मभूमि बेलपुर में थी जो बनारस के निकट है। यह अश्वसेन राजा के पुत्र थे। माता का नाम वामा रानी था। स्वभाव के गम्भीर, सहनशील संतोषी और सीधे सादे थे । पाँच महाव्रत धारण किये हुये थे-अहिंसा, सत्य, चोरी न
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* जैन वृतान्त
३१ करना, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह । इनका उपदेश सदा यह हुआ करता था, “काम, क्रोध, लोभ, माया, राग, द्वेष, कलह, हर्ष, शोक, छल कपट, निद्रा, वादविवाद, भय, अज्ञान से बचने के प्रयत्न में लगे रहना चाहिये । जो साधू हो जोय वह दूसरों के घर से भिक्षा मांग कर खाय। उसके पास माया का कोई सामान न रहे। जो गृहस्थी है वह अपनी जीविका उचित रीति से उपार्जन करे और जो कुछ उससे बच रहे उसका
भाग धर्म के कार्य में व्यय करे। साधू कभी स्त्रियों के साथ । न उठे बैठे । अपना समय ज्ञान ध्यान में व्यतीत करे। गृहस्थी
को सदा ध्यान रहे कि वह मनसा, वाचा, कर्मणा किसी की हिंसा नहीं कर रहा है । पराई स्त्री को कुदृष्टि से न देखे । भविष्य की आवश्यक्ताओं के विचार से धन इकट्ठा करने में कोई हरज नहीं हैं मगर इसका ध्यान रहे कि लालच के जाल में चित्त की वृत्ति न फंसने पावे । यदि किसी के यहाँ धन होते हुये भी अतिथि निराशे चला जाय तो वह धन निर्थक है। बरकत देने वाला नहीं है। साधू सेवा से सोया हुआ भाग्य जागता है। मर्यादा कई प्रकार की है कुलमर्यादा, देश मर्यादा धर्ममर्यादा आदि २। गृहस्थी का कर्तव्य है कि वह मर्यादा को भंग न करे। पारश्वनाथ जी ने गृहस्थियों के बारह ब्रतों की व्याख्या इस प्रकार की हैः-(१) हिंसा न करना (२) झूठ न बोलना (३) चोरी से बचना (४) पर स्त्री त्याग (५) उचित रीति से धनउपार्जन (६) धर्मशील होना (७) मिताहारी होना (८) बुरे कर्म के लिए किसी को सम्मति न देना । (६) मर्यादा का स्थिर रखना (१०) देश मर्यादा पालना (११) साधू के प्रेत का सत्कार करना (१२) अतिथि सत्कार करना ।
कुछ पुस्तकों में इन महात्माओं के हाल कुछ ऐसे अस्पष्ट और पेचीदा ढंग से लिखे हुये हैं कि उन के ठीक समय का पता
। शिव लगाना कठिन है। एक स्थान पर लिखा हुआ है कि पाश्र्वनाथ
जी के दो ढाई सौ वर्ष बाद महावीर स्वामी प्रगट हुये थे। । पाश्र्वनाथजी अन्तरनिष्ट अधिक रहते थे। उनके जीवन का अधिक भाग योगाभ्यास में व्यतीत हुआ। आयु के अन्त में कहीं आते जाते नहीं थे । जब यह ज्ञात हुआ कि अब निर्वाण पद में जाने का समय आ गया है तो आप एक पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गये और आसन जमाकर वहाँ ही समाधि में स्थित रहे। और निर्वाण पद को प्राप्त हुये। जिस पर्वत पर यह घटना हुई थी उसका नाम भी पाश्वनाथ शिखर हो गया और वहाँ जैन धर्म का मेला लगा करता है।
महावीर स्वामी गये दोनों जहान नजर से गुज़र,
| तेरे हुस्न की कोई बशर ने मिला । हिन्दुओं में ऐसे लोग कम दिखाई देंगे जो महाबीर स्वामी । के पवित्र और पावन नाम को जानते होंगे। यह जैनियों के
आचार्य गुरू थे। शुद्ध हृदय, शुद्ध विचार और अहिंसा के । साक्षात अवतार थे। यह किसी और देश के नहीं थे न किसी
और जाति से थे। हमारी ही जाति से थे। हम उनके नाम पर उनके काम पर और उनके अद्वितीय इन्द्रिय-निग्रह व तपस्या के उदाहरण पर जितना गर्व करें उचित है । हिन्दुओ ! अपने पूर्वजों को गौरव की दृष्टि से देखना सीखो। धार्मिक भेद-भाव के कारण उनकी शान में भूल कर भी कोई अपशब्द न प्रयोग करो। जैनी हमें से पृथक नहीं हैं। वे हमारे ही हाड़ व मांस हैं। हमारे ही जैसे विचार वाले हैं।
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जैन वृतान्त हमारे. ही भाई हैं। उन अनसमझों की बातों को न सुनो जो हठधर्मी के कारण से कहते रहते हैं कि–“हाथी के पाँव के तले दब जाओ मगर जैन मन्दिर में घुस कर अपनी रक्षा न करो।” इस पक्षपात का भी कहीं ठिकाना है ! हिन्दू धर्म उदारता सिखलाता है। वह तंगदिली या पक्षपात का समर्थक नहीं है । और पक्षपात भी किस से ? अपने ही से । क्या हुआ यदि इनसे कुछ मत भेद है ! कौन सब बातों में सबसे मिल सकता है ? तुम उनके गुणों को देखो। तुम उनके पवित्र रूपों का दर्शन करो। उनके भावों को प्यार की दृष्टि से देखो। यह धर्म की झलकती हुई प्रकाशवान मूर्तियाँ हैं। किसी के कहने-सुनने पर न जाओ । जो जैसा हो उसको वैसा ही देखो जो जैसे कहता है उसको । वैसे ही सुनो। इनके दिलों में घुस कर अपना घर करलो । उनका हृदय विशाल था । वह एक अथाह समुद्र था जिनमें दयाभाव की लहरें जोर-शोर से उठती रहती थीं । केवल मनुष्य ही के लिये नहीं बल्कि संसार के प्राणीमात्र की भलाई के लिये उन्होंने सर्वस्व को त्याग किया । जीवों की हत्या रोकने के लिये बड़े-बड़े कष्ट उठाये । यह अहिंसा की ज्योतिर्मय मूर्तियाँ हैं, और वेदों की श्रुति, “अहिंसा परमो धर्मः” कुछ इन्हीं पवित्र महापुरुषों के जीवन में असली सूरत धारण करती हुई दृष्टि गोचर होती है । यह दुनियां के बड़े रिफार्मर (सुधारक), उपकारक और बड़े ऊचे दर्जे के उपदेशक और प्रचारक हुये हैं। यह हमारे राष्ट्रीय इतिहास के बहुमूल्य रत्न हैं। तुम कहां
और किन में धर्मात्म। प्राणियों की खोज करते हो । इनको देखो ! इन से बढ़ कर उच्चकोटि के पुरुष तुम को कहाँ मिलेंगे। इनमें त्याग था। इनमें वैराग था। इनमें धर्म का सच्चा प्यार था । इनकी पदवी “जिन’ हैं, जिन्होंने मोहमाया
* शिव को और मन व काया को जीत लिया था। ये तीर्थंकर है । ये परमहंस है। इनमें दिखावा अथवा बनावट नहीं थी । जो बात थी साफ साफ थी। यह अद्वितीय व्यक्ति हुये हैं, जिनको शारीरिक कमजोरियों और दोषों को छिपाने के लिये किसी ऊपरी सजावट या वस्त्र की आवश्यकता नहीं प्रतीत हुई, क्योंकि उन्होंने तप करके तथा योग का साधन करके अपने आपको पूर्ण बना लिया था। तुम कहते हो ये नग्न रहते थे। इसमें क्या दोष है ? परम अन्तरनिप्ठ, परमज्ञानी, प्रकृति माता के सच्चे पुत्र इनको वस्त्र आदि की आवश्यकता कब थी ?
सुनो ! एक बार मुसलमानों का “सरमद” नामी फ़क़ीर देहली की गली-कूचों में नंग-धड़ेग घूम रहा था । औरंगजेब बादशाह ने देखा। शरीर ढकने के लिये कपड़े भेजे । फ़क़ीर अवधूत और वली था। कहकहा मार कर हँसा । लेखनी दवात और काग़ज़ पास थी। एक कविता लिखी और बादशाह के वस्त्रों को यों ही वापस कर दिया। कविता का भावार्थ इस प्रकार है। “ऐ बादशाह ! यह पोशाक तूने किसको दी है ? मुझको तो यह एक परेशानी का कारण हो गई । पोशाक तो ऐबों को छिपाने को होती है। जिनमें ऐब नहीं हैं उनको नंगेपन ही की पोशाक देनी चाहिये ।” | यह लाख रुपये के वचन हैं और वह इन जैनी महात्माओं के पवित्र जीवन-चरित्रों से मिलते-जुलते हैं। साधुओं की नग्नावस्था को देख कर तुम क्यों नाक-भौं सिकोड़ते हो ? उनके भावों को क्यों नहीं देखते । सिद्धान्त यह है कि आत्मा को शरीर के बन्धन और सम्बन्ध के पर्यों से निकाल कर एक दम नंगा कर लिया जाय ताकि इसका निज रूप देखने में आये। ये आत्मज्ञानी थे। आत्मा का साक्षात्कार कर चुके थे । यही कारण है कि वाह्य रसम व रिवाज से परे रहते थे। इसमें
जैन वृतान्त * ऐब की क्या बात है ! जो तुम्हारे लिये दोष हो, उनके लिये वह प्रशंसा की बात थी । बस इतनी ही बात पर तुम घृणा करते हो और सार वस्तु को नहीं समझते । तुमको क्या कहा जाय । तुम ईश्वर कोटि में रहने वालों को अपने जैसा मनुष्य समझते हो । यह तुम्हारी भूल है या नहीं ?
महावीर स्वामी जैनियों के अन्तिम चौबीसवें तीर्थंकर थे। जाति के राजपूत क्षत्री, इक्ष्वाकु वंश के भूषण, रघु कुल के रत्न । उनका प्राकट्य पाश्र्वनाथ से ढाई सौ वर्ष बाद चैत्र वदी १३ को हुआ था। जन्म का स्थान कुण्डलपुर नगरी बताई जाती है जिसका राजा सिद्धार्थ था । यह इसी के लड़के थे। माता का नाम त्रिशला था । धन्य थे वे माता पिता जिनके घर में ऐसा जगत विख्यात धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हो। यह अपने माता पिता के इकलौते बेटे नहीं थे परन्तु राजसिंहासन के उत्तराधिकारी होने की योग्यता रखते थे इनके जन्म लेने से राजवंश को जो प्रसन्नता हुई वह वर्णन से बाहर है। पिता ने प्रसन्न होकर इनका नाम “वर्द्धमान’ रक्खा । इन्हीं के नाम पर एक नगर बसाया गया जो अब बर्दवान के नाम से प्रसिद्ध है। धार्मिक जगत में ये “महावीर स्वामी के नाम से विख्यात हैं। गठीला और विशाल शरीर, हाथी के ऐसा बली, बैल के ऐसे कंधे, देह के सुन्दर अङ्गों के सुडौल । शरीर क्या था ? सौन्दर्य के सांचे में ढली हुई मूर्ति थी । शास्त्रों के ज्ञाता, शस्त्र विद्या में निपुण, अश्वारोहण में अद्वितीय, अखाड़े में कभी किसी ने उनकी पीठ नहीं लगाई। वीरों में वीर और पहलवानों में पहलवान थे। महाबीर स्वामी हर प्रकार से संसार में सम्पन्न होकर आये थे।
इनकी एक बहिन थी जिसका नाम “सुदर्शना” था। एक बड़ा भाई “नन्द वद्धन’ और एक छोटा भाई भी था ज
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शिव “सुपाश्व” कहलाता था । ऐसे नाम आर्यवंश में पहिले अधिकतर हुआ करते थे। जैसे ‘रोहिताश्व आदि । इसी प्रकार के नाम पहले पारसियों में भी होते थे जैसे गश्तास्प, लहास्प, तहमास्प इत्यादि जो वास्तव में संस्कृत भाषा के नाम हैं। इससे पता लगता है कि ईरानी और अय्यं लगभग एक ही वंश (नरल) से हैं। | महाबीर स्वामी संस्कृत और प्राकृतिक भाषा के धुरन्धर विद्वान् थे। पिता ने चाहा कि उनको राज-काज के योग्य बनाया जाय । परन्तु प्रकृति ने इनको धर्मराज बनाकर भेजा था। यह सिद्धार्थ के राज्य के उत्तराधिकारी बन कर नहीं आये थे बल्कि ऋषभदेव के धर्म देश के राजा होने के लिये प्रगट हुये थे । बचपन से ही चित्त में तीव्र वैराग था । साधुओं की संगत से प्रसन्न होते थे। योग और ज्ञान विषयों की गुत्थी कों खूब सुलझाते थे। राजा को भय हुआ कि इनको कहीं धर्म की हवा लग जाने से पुत्र हाथ से न जाता रहे। रुकावटें डालनी आरम्भ की । विवाह करा दिया । स्त्री का नाम यशोदा था। उसके पेट से एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई जो प्रियदर्शना के नाम से प्रसिद्ध है। जिसका विवाह महावीर स्वामी ने अपने एक शिष्य के साथ कर दिया था। इससे प्रगट है कि वह किस हद तक रसमी और दिखलावे की बातों के विरोधी थे । इस प्रियदर्शना के गर्भ से जो सन्तान हुई वह भी लड़की ही थी । जिसका नाम माता ने शेषवती अथवा यशुवती रखा।
महावीर स्वामी आजन्म महात्मा थे । हृदय के कोमल, स्वभाव के सरल । दया व क्षमा चित्त में कूट-कूट कर भरी थी । जब अट्टाईस वर्ष के हुये संसार से चित्त उपराम होगया। बड़ा भाई चाहता था कि राज इनको दिया जाय क्योंकि यह सर्वजन प्रिय थे। उसने वैराग होने पर भी दो वर्ष तक इनको
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* जैन वृतान्त विवश करके अपने साथ रक्खा । संसार का ऊँच-नीच समझाता रहा मगर पत्थर को जोंक नहीं लगती। उसके समझाने का उन पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा।
जाको गुरू ने रंग दिया, कबहूँ न होय कुरंग । दिन दिन बानी उज्जली, बढ़े सवाया रंग ॥ बड़े भाई ने कहा-“बद्धमान । क्षत्री का धर्म राज करना है। सबको वश में लाओ, राज को बढ़ाओ, ताकि हमारा घराना संसार में और भी प्रकाशवान हो ।’ यह हँसे, “भाई ! राज नाम है सबको अपने वश में लाना। तुम देश का राज करो। मैं और तरह का राज करूगा। तुम शत्रुओं से देश को सुरक्षित करो । मैं काम, क्रोधादिक शत्रुओं को मार कर शान्ति का नाद’ बजाऊँगा। तुम सिंहासन पर बैठो। मेरा सिंहासन संसार के प्राणियों का हृदय होगी । तुम भारतवर्ष का राज भोगो । मैं ‘जिन’ होकर सारे जगत को अपने वशीभूत कर लें गा । तुम अखंड राज करो । मैं प्राणियों को दुःखों से छुटकारा दिला कर संसार को स्वर्ग धाम बनाऊँगा । मेरा और तुम्हारा मुकाबला होगा। देखना है कि किसका राज अचल होता है ।” भाई चुप होगया । शब्दों में कुछ ऐसा आकर्षक प्रभाव था जिसका उत्तर उससे न बन सका। मां ने समझाया । स्त्री रोने लगी। मगर उन्होंने एक की भी नहीं सुनी । जब पूरे तीस वर्ष के हुये, एक दिन यों ही घर से उठ खड़े हुये ।।
न सुध बुध की ली, और न मंगल की ली ।
निकल घर से बस, राह जंगल की ली ।। . घर वाले दुखी होगये । स्त्री ने दामन पकड़ना चाहा, माँ बाप रोये चिल्लाये, भाई बहिन ने प्रेम के आँसू बहाये, मगर साधू ने किसी की भी न सुनी ।
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| शिव । हुआ प्रेम ईश का ख्याल मुझे,
तो न मन में किसी का ख्याल रहा । नहिं सुख आनन्द की मुझे परवा,
नहिं नाम को दुःख को भान रहा ।। जो कुछ करना है कर डालो । जीवन रोज रोज नहीं मिलता। चित्त के भाव यदि सच्चाई की ओर आकर्षित होते हैं तो उनको मत दबायो। खुल खेलने दो । प्रत्येक जीवन अपना मुख्य मिशन लेकर आता है। आगा-पीछा सोचने की। आदत बुरी होती है । “एक सर व हज़ार सौदा’ का विचार बुरा होता है:
जन्म मरन दुःख याद कर, कूड़े काम निवार। । जिन-जिन पंथों चालना, सोई पन्थ संवार ।। आज कहे मैं काल करूगा, काल कहे फिर काल। आज-काल ही करत में, अवसर जासी चाल ।। काल कहे सो आज कर, आज है तेरे हाथ । काल-काल तू क्या करे, काल है काल के हाथ ।। काल करै सो आज कर, आज करे सो अब । । पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब ।।। घर से निकले संन्यास धारण किया। एक सुनसान. स्थान में बैठकर दो वर्ष तक घोर तपस्या की, जिसके सुनने से रोंगटे । खड़े होते हैं। खाना-पीना दूभर हो गया। किसी दृढ व्रत को धारण करने की सूझी थी। इसके लिये तप करना आवश्यक था; क्योंकि तप ही वास्तव में महान कार्य की जड़ होती है। तप करने से चित्त की वृत्तियाँ एकाग्र होती हैं। लोग इस भेद को कम जानते हैं । काम से पहले तप नहीं करते, इस कारण वह काम फलदायक नहीं होता। पार्वती जी को शिवजी से विवाह करने का ध्यान हुआ मगर शंकर का मिलना सहज नहीं था।
जैन वृतान्त
३६ लोगों ने सम्मति दी कि पर्बत पर बैठ कर तप करो। उसने ऐसा ही किया। शिवजी का विचार मन में परिपक्व करने लगी। उनके ध्यान में लीन हो गई। ध्यान का घनापन और उसकी एकाग्रता एक स्थान पर टिकी । वहाँ से फिर आकर्षण शक्ति की धारे निकलने लगीं और उन्होंने शिवजी को पकड़कर खींच बुलाया । वह इस प्रकार पकड़े हुए चले आये जैसे हाथी रस्सों से बँधा हुआ खिंचा आता है। ब्रह्माण्ड में खलबली पड़ गई । कौन था जो पार्वती की तपस्या का सामना करता ! देवता, और ऋषि सब हार मान गये और शिवजी को प्रेरणा करके बुला लाये । यह तप की महिमा है। जिन प्रभावशाली शब्दों में इस सती को तप का उपदेश दिया गया था, वह हमारे व तुम्हारे सोचने योग्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी इसको इस प्रकार लिखते हैं:
तप बल रचे प्रपंच विधाता । । तप बल विष्णु सकल जग त्राता ।। । तप बल शम्भु करें संहारा।। तप बल शेष धरहिं महि भारा ।। तप अधार सब सृष्टि भवानी ।
करहु जाय तप अस जिय जानी ॥ पार्वती ने तप किया । ब्रह्मा ने वर दिया । सप्त ऋषि देखने आये । पार्वती का रूप वर्णन करते हुए कवि इस प्रकार लिखता है:
“ऋषिन गौरि देखी तहाँ कैसी ।
मूरतवन्त तपस्या . जैसी ॥” तप से बल व पराक्रम बढ़ता है। तप से चित्त में दृढ़ता और स्थिरता आती है। मनुष्य का मन अटल हो जाता है। जाँच और परीक्षा की आशंका से सदा के लिये छुटकारा पा
शिव जाता है। यह तप का प्रताप है। इसी कारण महावीर स्वामी ने कठिन तप किया। जिसको तप की गूढ़ फिलासफी समझनी हो वह इनके जीवन को गहरी दृष्टि से देखें । बहुत दिनों तक कुछ भोजन नहीं किया। नाक के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर बैठे रहे। चुपचाप न किसी से बोलना न चालना। न शरीर का ध्यान न देह का विचार । मूसलाधार पानी बरस गया । सूर्य उन पर अपनी कड़ी धूप की परीक्षा कर गये । कड़ाके की सर्दी ने भी अच्छी तरह जाँच लिया। यदि सूर्य इधर-से-उधर चला जाता, हिमालय की जगह समुद्र लहरें मारता तब भी यह अपने दृढ़ आसन से हिलने वाले नहीं थे।
जब सब कुछ हो गया और ज्ञान की प्राप्ति का समय आया, एक यक्ष ने आकर प्रार्थना की-“महा प्रभु ! अब देश को चिताइये और धर्म की मर्यादा की स्थापना कीजिये ।” यह उठे और कुछ दिनों बाद राज गृह में आये। एक गांव का रहने वाला पंडित जो स्वभाव का चंचल था मिला । उनको साधू समझकर वार्तालाप का इच्छुक हुआ। यह बोले-‘तू धर्म की खोज में चला है अथवा अपनी बुद्धि दिखाना चाहता है ?” उसने सोच-विचार कर कहा–“मैं धर्म का जिज्ञासु हूँ ।” महावीर स्वामी ने उत्तर दिया–“धर्म मुझ में है, मैं धर्म का । रूप हूँ। मेरा जीवन धर्म को जीवन है। मुझको देख और तुझको धर्म का दर्शन मिलेगा ।” उसको आश्चर्य हुआ मगर इन सीधी-सादी बातों में सच्चाई थी। दिल में घर कर गई
और वह उनका शिष्य बन गया।
जी खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि देवा । | कहें कबीर सुन साधवा, कर सत्गुरु सेवा ।।। । फिर यह दौरा करते हुए श्रवस्ति और वैशाली नगरी में आये। वहां प्रचार करके बहुत से मनुष्यों को सत् का मार्ग
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न्त
३ जैन वृतान्त
४१ । दिखाया । वहाँ से कुशान्ती नगर में पहुँचे। यहाँ शतानिक राजा राज्य करता था । उसको धर्म की प्यास थी। वह इनका चेला बना और फिर और लोग श्रद्धालु हुए । फिर तो धर्म का प्रचार बहुत बढ़ गया। ये थोड़ा सा समय उपदेश के लिये देते थे । शेष समय तपस्या में व्यतीत करते थे। उन्होंने पूरे बारह वर्ष तपस्या की थी और अपने जीवन से लोगों को दिखा दिया कि धर्म इस प्रकार का होता है। धर्म न पोथी में है न शास्त्र में है। धर्म केवल रहनी (अमली जीवन) में है। रहनी से ही मनुष्य तरता व तारता है। महावीर स्वामी में सबसे बड़ा गुण यह था कि उन्होंने अपने जीवन व्यवहार को आदर्श बनाकर दिखा दिया । बात कम करते थे, मगर जो कुछ कहते थे, आँची-तुली कहते थे और उसका अपना विशेष प्रभाव होता था। । मगध देश में वैदिक धर्म की चर्चा थी । उन्होंने ब्राह्माणों के साथ कई बार शास्त्रार्थ किये और ब्राह्माणों की एक बड़ी संख्या उनकी शिष्य हो गई। उनके शिष्यों में से इन्द्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति, व्यक्त, सुधर्म, मण्डितपुत्र, मौर्यपुत्र, अकंपित, अचल व्रत, मैत्रव्य और प्रभास मुख्य थे। इनमें से इन्द्र भूति और सुधर्म भगवान महावीर स्वामी के निवण पद में जाने के बाद गुरू के धर्म को बहुत समय तक प्रचार करते रहे ।
जैनियों का विचार है कि गौतम बुद्ध महाबीर स्वामी के शिष्य थे। यह विचार ठीक है या गलत मैं कुछ नहीं कह सकता। मगर यह अवश्य है कि यह दोनों महात्मा समकालीन थे और इनके बीच बहुत कुछ समानता व अनुकूलता दिखाई देती है। बौद्धों के ग्रन्थों में एक स्थान पर किसी जैनी और बुद्ध देव का सम्वाद् आया है। इससे भगवान् बुद्धदेव ने इतना
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४२ . शिव * कहा था, “जैनी तू नहीं है बल्कि मैं सच्चा जिन हूँ। मैंने इन्द्रिय निग्रह किया है, तुने नहीं किया है।” वह निरुत्तर होकर चला गया। इसके सिवा एक बात और भी देखने में आती है कि बौद्धों व जैनियों में सदा से प्रेम था और जहाँ जहाँ बौद्धों के मन्दिर मिलते हैं वहाँ साथ ही अधिकतर जैनियों के मन्दिर पाये जाते हैं। | महावीर स्वामी के सिद्धान्त भी अपनी विशेष फ़िलसफ़ी रखते हैं। इनका विचार है कि इन्द्रियों की निर्बलता से ज्ञान का नाश नहीं होता। कर्म की सत्ता अवश्य मानने योग्य है । पाप पुण्य के वश में आकर जीव जन्म मरण के फन्दों में आता है । पाप पुण्य कर्म के आधार पर रहते हैं। जीव का अलग अलग होना आवश्यक है अगर यह न हो तो पाप पुण्य का फल कौन भोगे । परलोक का सिद्धान्त ठीक है। परम धर्म केवल अहिंसा है। मनुष्य तप करे किन्तु तप ऐसा हो कि अधिक क्लेश न होने पावे। शरीर से व्यवहार करना चाहिये मगर इस प्रकार साधन करना चाहिये कि शरीर वश में रहे। वह वश से बाहर या स्वतन्त्र न होने पावें। झूठ बोलना महापाप है । सत्य बोलना पुण्य है। निन्दा करने वाले, चोर, निर्दयी मोक्ष के अधिकारी नहीं हैं। यही माया जाल है और इनके जाल से बचने के प्रयत्न में लगा रहना चाहिये । जो चोरी, निदा और निर्दयता करते हैं वे अधोगति को प्राप्त होते हैं। । जैनी अर्हन को आराध्य देव मानते हैं मगर उनकी पूजा नहीं करते। इनमें से कोई पाश्र्वनाथ की पूजा करता है कोई महाबीर स्वामी की । इन सब में बहुत कुछ मत भेद है। पाश्र्वनाथ के मानने वाले श्वेताम्बरी हैं जो वस्त्र धारण करते हैं। महाबीर स्वामी के अनुयायी दिगम्बरी हैं जो वस्त्र नहीं पहनते ।।
® जैन वृतान्त
४३ | महाबीर स्वामी ने ३० वर्ष संसार का सुख भोगा । १२ वष तपस्या की और तीस वर्ष तक धर्म का उपदेश दिया । उनकी आयु ७२ वर्ष की थी। अन्त में जब शरीर छोड़ने का समय आया, अपापपुरी अर्थात् पावागढ़ में विक्रमी संवत् से ४७० वर्ष और सन् ईसवी से ५२६ वर्ष पहले निर्वाण पद में चले गये। इनके पश्चात् तीन वर्ष आठ महीने पीछे जैनियों की पाँचवीं आरा का प्रारम्भ होता है । महाबीर स्वामी के अट्टानवे वर्ष पश्चात् ४६५ सूत्र रचे गये। | आज उस महापुरुष को निर्वाण पाये हुये लगभग २५०० वर्ष हुये मगर अब तक उनकी कीर्ति का झंडा धार्मिक जगत में लहराता है। | धन्य है। वे लोग जो धर्म का जीवन व्यतीत करते है। क्योंकि उन्हीं का जीवन सुफल होता है। शेष लोग तो कीड़ों मकोड़ों की तरह जन्मते मरते रहते हैं।
हेमचन्द–हेमाचार्य कहानियाँ सच्चे वीरों की,
आओ हम तुमको कुछ सुनायें । यह सच्चे जिन देवता थे, . हम उनके मंगल का राग गायें ।। यह नूर व ज्योति की मूरति,
। आसमान पर भारत के थी चमकती ।। अगर श्रद्धा है दिल में भाई,
– तो उनका दर्शन तुम्हें दिखायें ।
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छ शिव
पवित्रता भी खतम थी इन पर,
नाम को भी न था दिखावा । नमूना भक्ति के प्रेम के थे वह,
प्रेम के आगे सर झुकायें ।। संसार में प्रतिदिन करोड़ों मनुष्य जन्मते और मरते रहते हैं। कोई न उनको जानता है, न उनका नाम लेता है । न उनसे किसी को लाभ ही पहुँचता है न वह कुछ अपना ही काम करते हैं। सोचो तो सही कि यह मनुष्य हैं या कीड़ेमकोड़े हैं। सच्चा मनुष्य वह है जो सब का हित चाहता है। और जिसका हृदय ब्रह्माण्ड के समान विशाल होता है। वह अपने में सब को व सब में अपने को देखता है और इस दृष्टि से सारा जीवन औरों की भलाई के लिये समर्पित कर जाता है । जीते-जी कष्टों को सहन करता हुआ सब की सुनता और सब के दुःख-दर्द को बांट लेता है । मरने के पीछे ऐसी राह छोड़ जाता है कि भूले-भटके प्राणी उसके सहारे चलकर आत्म-ज्ञान के अधिकारी होते हुए अपने इष्ट पद तक पहुँच जाते हैं। ऐसे मनुष्य धन्य हैं !
सुख देवे दुःख को हरे, दर करें अपराध । कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही साध ॥ साध सन्तोषी सर्व दा, जिनके निर्मल बैन । इनके दरश व रस से, हिय उपजै सुख चैन ।। इस तरह के महान् आत्माओं में हेमाचार्य (हेमचन्द) भी हुए हैं। जिन्होंने अपनी तपस्या व इन्द्रिय-निग्रह के जीवन से दुनियाँ को मुक्ति की राह पर लगाया। ये काठियावाड़ के खटगटा गाँव में उत्पन्न हुए थे। बाप का नाम चाचक और माँ का नाम चीसी था। इसको कहीं-कहीं बाजम्बनी के नाम
जैन वृतान्त छ। से भी पुकारा गया है। चाचक अपने गांव में मिलनसार और धनाड्य व्यक्ति था। उनका जन्म कार्तिक सुदी १५ सम्वत् । ११४५ में हुआ था और यह जैन धर्म के बहुत बड़े प्रचारकों में गिने जाते हैं। पिता ने इनका नाम चंगदेव रखा। यह सुन्दर, तेजस्वी और दृढ़ प्रतिज्ञ थे। लड़कपन में ही ज्ञात होता था कि संसार में वह किसी बड़े काम के लिये अवतरित हुए हैं। स्वभाव में गम्भीरता थी । खेलने वाले सभी बालकों के साथ विशेष प्रकार का प्रेम रखते थे और सब के साथ आदर के साथ व्यवहार करते थे। बड़ा भारी गुण इनमें यह था कि वह अपने से छोटे बच्चों का भी आदर-सत्कार करते थे। । संयोगवश चाचक कहीं बाहर चला गया था। घर में केवल उसकी स्त्री रह गई थी। जैन मत के प्रसिद्ध पण्डित देवेन्द्र गुरू आये । पाँच वर्ष के छोटे बच्चे ने उनका सत्कार किया और देवताओं की तरह सादगी से हँसते हुए उसके प्रश्नों का उत्तर वह उचित रीति से देता रहा। पंडित इसकी बुद्धिमानी
और विवेक शक्ति देखकर दंग रह गया। चीसी भी गुरू से मिलने आई और जैसा कि गृहस्थियों का नियम है, उसने ३ भली भांति खान-पान का प्रबन्ध किया, लेकिन देवेन्द्र के मन
में और प्रकार के विचार हिलोरें ले रहे थे। वे बोले, “माई! मैं तेरा अतिथि अवश्य हूँ, परन्तु मैं तेरा आतिथ्य एक शर्त पर स्वीकार करूगा ।” उसने हाथ बाँध कर पूछा-“महाराज ! वह क्या शर्त है ?’ उसने उत्तर दिया-“शर्त यह है कि इस अपने पुत्र को यती-जती होने के लिये मुझे दे दो। इससे धार्मिक सेवा ली जायगी ।” यह संसार में प्रसिद्ध आचार्य होगा। दीन स्त्री धक सी रह गई। एक ही संतान थी । वह श्रद्धालु अवश्य थी और बालकों को उस समय यती बनाया जाना बड़ा गौरव समझा जाता था; किन्तु घर का मालिक उसका पति घर
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शिव * पर नहीं था। यह कारण उसको असमंजस को था । उसने सोचा, “यदि लड़के का पिता घर होता तो उसे कहने-सुनने की क्या आवश्यकता थी, जो वह चाहता कर डालता । यदि वह लड़के को पण्डित को दे देती है तो पति को क्या उत्तरे देगी और यदि नहीं देती है तो पण्डित गुरू देवेन्द्र की
अप्रसन्नता का भय है । इसलिये १५ मिनट तक विचार किया फिर चंगदेव का सर पकड़ कर देवेन्द्र के चरणों में झुका दिया
और हाथ जोड़कर बोली-लड़के के पिता घर पर नहीं हैं, मैं इसकी माता हूं। पिता का पुत्र पर सौ गुना अधिकार है। माता का हजार गुना है। मैं उनकी अप्रसन्नता झेल लेंगी। और प्रसन्नता पूर्वक चंगदेव को धर्म की सेवा करने के लिये आपके चरणों में अर्पण करती हैं। यह समझ लें गी कि चंगदेव के कारण मेरी कोख, मेरा कुल व सब कुटुम्ब पवित्र हो जायेंगे।” | धन्य हैं ऐसो मातायें ! जो धर्म को वेदी पर इस प्रकार अपने प्यारे लालों को निछावर करना जानती हैं। यह सच्ची देवियाँ हैं और जितना इनका मान-सम्मान किया जाये वह कम है। । देवेन्द्र केवल एक दिन उसके घर अतिथि रहा । पंडित ने । चंगदेव को दीक्षा दी और इस बच्चे को गोद में उठाकर तीर्थं यात्री को निकला । मुझको देबेन्द्र के जीवन के विषय में पता नहीं है। हाँ, इतना ज्ञात है कि चंगदेव के गुरू होने के कारण ये भी विख्यात हो गये । जैनियों में ये बड़े पंडित और विद्वान् माने जाते हैं। इसी एक घटना से सिद्ध है कि वह उच्चकोटि का बुद्धिमान और अनुभवी पुरुष रहा होगा। जैनियों के आचार्य बहुधा धर्मात्मा और नेक होते हैं और सांसारिक पदार्थों से बहुत कम सम्बन्ध रखते हैं। यही दशा बौद्ध भिक्षुओं की
| जैन वृतान्त
न्त भी देखी जाती है। जैनी व बौद्ध यद्यपि भिन्न सम्प्रदाय के हैं, किन्तु उनके आचार-व्यवहार में बहुत कुछ समानता व एकता पाई जाती है। यह परस्पर कुछ ऐसे मिले-जुले रहते थे कि दूसरी जाति के लोग इन्हें एक ही धर्म को समझते थे ।
देवेन्द्र इस प्रकार घूमती-फिरता हुआ गुजरात की करुणावती नगरी में आया । चंगदेव बहुत अल्पायु था। भ्रमण करने के योग्य नहीं था । इसलिये उसको उसने करुणावती
नगरी के प्रसिद्ध सेठ उद्यायन मन्त्री के घर पालन-पोषण के * निमित्त छोड़ दिया।
जब चाचक सेठ घर आया, उसने सुना कि चंगदेव यती हो गया। बाप में बेटे की ममता अधिक थी । वह चिन्तित हुआ । उसकी स्त्री ने समझाया–“सब के लड़के होते हैं, सब स्त्रियाँ बांझ नहीं होतीं, मगर सच्चा लड़का केवल वह स्त्री जनती है जिसका पुत्र धर्मात्मा होता है। तुम चिन्ता क्यों करते हो। यह प्रसन्नता की बात है कि पुत्र यती हो गया । गुरू ने लड़के को माँगा और मैंने दे दिया। वह धर्म की वेदी पर निछावर किया गया है।
बेटा, बेटी, स्त्री, साधु चहें सो देय । सर साधुन को सौंप कर, जन्म सुफल कर लेय ।। “यदि तुम होते तो तुम भी इन्कार न कर सकते। यदि खेद करते हो तो फिर दान निष्फल जायगा । खुशी से रहो। सब लोग धन, सम्पत्ति और धर्म के लिये दान करते हैं। तुमने अपना पुत्र दान दिया । तुमको इसका बड़ा फल मिलेगा। | इन बातों से चाचक को कुछ द्वारस हुआ, लेकिन उसने प्रण किया कि जब तक अपने यती पुत्र को न देख लू गा, तब तक अन्न जल ग्रहण न करूगा । स्त्री घबराई परन्तु पति के प्रण और व्रत का मान रखने के लिये उसको उसी समय यात्रा
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शिव के लिये विदा किया । उसका यात्रा में कितने दिन लगे इसका पता नहीं । करुणावती उसके ग्राम से कितनी दूर था हमको नहीं मालूम । वह वेचारा भूख प्यास सहता हुआ किसी प्रकार गिरते- पड़ते करुणावती में आया। मार्ग में देवेन्द्र मिला। उसने धर्म की गाथायें सुनाई और दोनों उद्यायन मन्त्री के घर आये। चंगदेव भूमि पर गम्भीरता पूर्वक बैठा हुआ था। उसने गुरू को प्रणाम किया और हँसकर अपने पिता से बातचीत करने लगा । पिता के नेत्र डबडवाये हुए थे। यह देखकर उस । असाधारण बुद्धि के लड़के ने कहा–“आप दुखी क्यों हैं ? मनुष्य का शरीर क्षण-प्रति-क्षण बदलता रहता है । मृत्यु सदा सिर पर नाचा करती है। चंगदेव गृहस्थ धर्म में फंसा रहे या धर्म का व्रत धारण करे ? आप ही इसका निर्णय कीजिये।” , पिता को आश्चर्य हुआ कि बालक और ऐसी बातें ! उसका विषाद उसी समय से कम होने लगा । मगर तब भी मन-ही-मन सोचता था—‘‘क्या अच्छा होता कि चंगदेव घर में ही रहता ! गोद खाली हो गई। अब लड़का कहाँ मिलेगा ।” चंगदेव ने पिता की दशा देखी । भूमि से उठकर उसकी गोद में जा बैठा। नन्हे-नन्हे हाथों से आँसू पोंछे। एक आध धर्म की गाथा सुनाई और उसको प्रसन्न कर दिया। । कोई इन बातों को आश्चर्य न समझे ? संसार में जब कभी महान् आत्मायें आती हैं, उनके चरित्र ऐसे ही असाधारण हुश्रा करते हैं। यदि हम ग़लती पर नहीं हैं तो पंजाब के
आठवें गुरू साहब ने पांच ही सात वर्ष की आयु में लोगों को दीक्षा भी दी और संसार से चल भी दिये। उनके चरित्र इनसे भी अधिक आश्चर्यजनक हैं। यह लोग साधारण मनुष्य नहीं होते । इनमें दैवी बल और दैवी शक्ति रहती है। इनके चरित्र अद्भुत होते हैं।
। जैन वृतान्त ६
४६ चाचक इतनी धनवान नहीं था । उद्यायन ने तीन वस्त्र और तीन लाख रुपये उसके जिन पुत्र के लिये भेट देना चाहा, परन्तु चाचक धार्मिक और समझदार था, उसने उद्यायन मन्त्री से कहा-“तुम निस्संदेह बड़े उदार हो, दानी हो परन्तु मैं रुपया लेकर पुत्र को धर्म के लिए न दूगा । यह लड़का धर्म पर निछावर किया गया है । उद्यायन प्रसन्न हुआ। कहने लगा–“यह गुरू का पुत्र है। यती है। अब यह हमारे और तुम्हारे आदर और सत्कार का पात्र है। ऐ चाचक ! धन्य हो तुम और तुम्हारा कुल जो धर्म के पन्थ में इस प्रकार अपनी सन्तान को भेंट देना जानते हो। जैन धर्म की जय होगी। जिस धर्म में ऐसे श्रद्धालु लोग हैं वह धर्म क्यों न उन्नति
करेगा।” | चाचक ने चंगदेव को देखकर फिर भोजन किया । उसका विषाद जाता रहा और वह उस दिन रात-भर धर्म-शास्त्रों की गाथायें सुनता रहा। प्रातःकाल नहा-धोकर देवेन्द्र ने चंगदेव को यती की दीक्षा दी और उद्यायन मन्त्री के घर उस दिन बड़ा उत्सव मनाया गया, जिसमें नगर के सब जैनी श्रावक और यती सम्मिलित हुए थे। गुरू ने चंगदेव का नाम सोमदेव मुनी रखा और वह शिक्षा पाने लगे। अकस्मात की बात थी कि जिस समय चंगदेव का संस्कार हो रहा था वह शुद्ध कुन्दन की भांति दमक रहे थे । एक सेठ वहाँ विराजमान था। उसने धीरे से कहा-“यह हेम ( सोना ) है और इसका नाम ही हेमचन्द्र या हेमाचर्य पड़ गया। उस समय में अन्हिलापुर हायन के दो प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज और कुमारपाल हुए हैं। यह दोनों हेमचन्द्र के बड़े श्रद्धालू थे। ये बराबर या करते थे और उनके उपदेश से लाभ उठाया करते थे। | हेमचन्द की शिक्षा साधारण रीति से हुई परन्तु उनमें
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शिव स्मरण शक्ति तीव्र और पूर्ण थी। थोड़ी शिक्षा पाकर भी प्रकाण्ड विद्वान हो गये । संस्कृत और प्राकृत के बहुत अच्छे पंडित हुए हैं । उपदेश देने की प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही थी । कुमारपाल राजा मुख्यतः उस समय में जैन धर्म का सहारा और संरक्षक बना हुआ था । वह गरीब लोगों को जैनियों के धर्मशालों में भिजवा दिया करता था । गुरू की शिक्षा के कारण उसने अपने राज्य में आदेश दे रक्खा था कि कोई व्यक्ति न तो पशु को मारे न मांस खाये और लोग उसकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करते थे। देखिये एक महात्मा या साधू अपने शुद्ध, पवित्र भाव को किस तरह संसार में फैला सकता है।
शाके सम्वत् १०६५ में राजा कुमारपाल हेमचन्द्र का श्रद्धालू होकर शिष्यों के वर्ग में सम्मिलित हुआ। उसका यह परिणाम हुआ कि सारा देश जैनी हो गया और आप-ही-आप लोग बिना कहे-सुने जैन धर्म के अनुयायी बनते गये। इस दशा को देखकर यती हेमचन्द्र को आचार्य की पदवी दी गई और उस समय से इसका नाम हेमाचार्य हो गया । ब्राह्मणों ने कभी-कभी इनका बड़ा विरोध किया। इनको कष्ट देने चाहे, परन्तु ये उच्च कोटि के धर्मात्मा और सच्चे थे, वह विरोध भी उनके विचारों के प्रचार का शक्तिशाली साधन सिद्ध हुआ। इनमें दीनता, सहनशीलता अधिक थी । धर्म के प्रति प्रेम अथाह था, अतः ऐसे पवित्र पुरुष के लिए अपने विचारों का प्रचार करना क्या कठिन बात थी। | आप ने वर्षों धर्म का प्रचार किया और साथ ही ग्रन्थों की । रचना भी करते रहे। उनकी अनगिनत पुस्तकें हैं। उनकी व्याकरण की पुस्तक अति प्रमाणित समझी जाती हैं। जहाँ तक हम जानते हैं उनकी रचित पुस्तकों की सूची निम्नलिखित है। । (१) व्याकरण सूत्र , (२) हेमचन्द्र कोष, (३) अनेकार्थ
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जैन वृतान्त । नाम माली, (४) विषय नाम माला, (५) साहित्य शास्त्र, (६) तर्क शास्त्र, (७) योग शास्त्र, (६) त्रिषिष्ट शलाका, (६) पुरुष चरित्र, (१०) सिद्ध हेम, (११) शब्द अनुशासन, (१२) अभयदान चिन्तामणि, (१३) परिशिष्ट प्रवाद, (१४) अध्यात्म उपनिषद, (१५) छन्द अनुशासन, (१६) अलंकार चूड़ामणि, (१७) कुमारपाल प्रबन्ध इत्यादि ।
इनमें से कोई-कोई ग्रन्थ बड़े विशाल हैं। शोक है कि अब देश में उनका प्रचार नहीं है, नहीं तो वह साधारण जनों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होते । ‘कुमारपाल प्रबन्ध’ में बड़ी विचित्र-विचित्र बातें लिखी हुई हैं। आजकल के जैनी यदि तनिक भी अपने पुराने ग्रन्थों के प्रचार की ओर ध्यान देते तो जो दशा जैन साहित्य की है, वह न होती । इनमें बहुत-सी पुस्तके इतनी मूल्यवान और अच्छी हैं कि सब मनुष्यों के पढ़ने योग्य हैं।
सारांश यह कि यह महात्मा, धर्म पालक, धर्म प्रचारक और धम रक्षक हुए हैं, ये सम्वत् ११४५ में पैदा हुए थे। सम्वत् ११५५ में यती पदवी धारण की । सम्वत् ११६६ में आचार्य पदवी पर सुशोभित हुए और सम्वत् १२२६ में चौरासी वर्ष की आयु में परलोक सिधारे. और अपने पीछे यश और कीर्ति छोड़ गये । इनको संसार छोड़े हुए ७५० वर्ष से अधिक हुए । परन्तु इनका नाम अब अमर है और सदा रहेगा।
ईश्वर आशीर्वाद दे कि लोग इनके पवित्र जीवन से धैर्य, साहस, उत्साह, त्याग और वैराग्य सीखें और जीवन अादर्श को प्राप्त करें।
शिव
राजमती राजमती सोरठ देश के रहने वाले एक जैनी सेठ की कन्या थी। वह ऊँचे कुल और अच्छे घराने की थी। आस-पास के रहने वाले उस घराने का बड़ा सम्मान करते थे। राजमती बड़ी सुशील और धर्मात्मा थी। जैसी कि जैनियों में प्रायः प्रथा है, इसको साधारण ढंग की शिक्षा भी दी गई थी। माँ-बाप ने इसका विवाह कर दिया। इसके पति का नाम नेमिनाथ था । वे भी बड़े ही धर्मात्मा, सुशीले और विद्वान थे। इस कारण इसके विवाह के अवसर पर बहुत खुशी मनाई गई।
जब विवाह हो चुका, वर-वधू के बिदाई का समय आया। संयोगवश नेमिनाथ विवाह के कपड़े पहने हुए अपने श्वसुर के घर के पिछले भाग की ओर होकर निकले । वहाँ वहुत से पशु बँधे हुए थे जो भूख से अति व्याकुल हो रहे थे। उसने पूछा“इन पशुओं की दशा बता रही है कि इनको घास-चारा नहीं दिया गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ ? इतने पशु एक स्थान पर क्यों बँधे हुए हैं ?”
जिस मनुष्य के देख-रेख में पशु रखे गये थे, उसने उत्तर दिया, “बर राज ! यह सब पशु दूर से मँगवाये गये हैं। सब आपको बिदाई में दिये जायँगे । चूकि विवाह के काम-काज में सन्न व्यस्त थे इसी से किसी को इनके चारा-पानी देने का ध्यान नहीं रहा, यह भूखे हैं। मैंने कई बार आपके श्वसुर से कहा । उन्होंने इस बार रुपये दिये हैं। मैं जाता हूँ शीघ्र प्रबंध कर दूंगा ।” बात तो कुछ भी नहीं थी परन्तु इसने नेमिनाथ के हृदय पर बड़ा प्रभाव डाला। वह बजाय जनवासे में जाने के चरवाहे से कहने जगे, “मित्र ! मेरे विवाह के आनन्द, उत्सव में ऐसे अनर्थ का होना प्रगट करता है कि यह विवाह
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र
* जैन वृतान्त सुखदायक न होगा। मेरे जीवन को धिक्कार है कि जिस कारण इतने जीवों को व्यर्थ का कष्ट दिया गया । धिक्कार है। उन आदमियों की समझ-बूझ को जो विवाह के तरंग में मस्त होकर इस प्रकार अपने धर्म को भूल जाते हैं। मेरे जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में यह अशकुन हुआ है। पता नहीं आगे जाने क्या-क्या संकट आयेंगे । इस कारण मुझको भय हो रहा है। तू कृपा करके इन सबों को अभी छोड़ दे, ताकि यह चारा चर कर अपनी भूख बुझा लें। उसने चरवाहे के उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और स्वयं अपने हाथ से गाय व बैलों के रस्से खोल दिये । चरवाहे ने भी इसमें सहायता दी ।।
| जब सब पशु एक-एक करके चरने लगे और नेमीनाथ की ओर प्रेम की दृष्टि से देखने लगे, वह वहाँ से जनवासे में वापिस आये और विवाह के कपड़े उतारकर साधारण वस्त्र पहन लिये । अपने मां बाप से साधू होने की प्रार्थना की। माँबाप ने रो-रोकर बहुत कुछ समझाया-बुझाया। मगर उसने किसी की नहीं सुनी और सब को रोता हुआ छोड़कर बन का रास्ता लिया और अपने धर्म के अनुसार किसी एकान्त स्थान में जप-तप करने लगे।
नेमीनाथ के साधू होने के समाचार ने राजमती के घर में कुहराम मचा दिया । नेमीनाथ का छोटा भाई भी उसी समय साधू हो गया। राजमती ने भी अब बाप के घर में रहना उचित नहीं समझा । उसने अपने देवर अर्थात् नेमीनाथ के छोटे भाई के साथ गिरिनार पर्वत की चोटी पर आकर योगिनियों का भेष धारण किया और वहां ही रहने लगी।
- राजमती का युवावस्था में तपस्या के लिये चला जाना नगर वालों के लिये बड़े खेद का कारण हुआ। वह सती पर्बत की चोटी पर कठोर तपस्या करने लगी।………..
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शिव .. एक दिन वह नगर में से भिक्षा माँग कर अपने पहाड़ी गुफा की ओर वापस आ रही थी। वर्षा की ऋतु थी। पानी खूब छम-छम बरस रहा था। आते-आते उसकी महीन धोती पानी से भीग कर शरीर से चिमट गई। उसका देवर दूसरी गुफा में बैठा हुआ बड़ी गहरी दृष्टि से देखता रहा। राजमती
अति सुन्दरी थी ।
उस युवा तपस्वी का मन डांवाडोल हो गया। वह उसके निकट आया। राजमती ने उसका मुख देखा और उसकी दुर्भावना को समझ गई, किन्तु मन को रोक कर उसने उसको उपदेश दिया। सिवाय इस उपदेश के इस सती को और कुछ चरित्र हमको नहीं ज्ञात है। इसका उपदेश छन्दबद्ध है। एक गुजराती कवि ने प्राकृत भाषा से अनुवाद किया है। पद्य का अनुवाद पद्य में नहीं हो सकता। कवि के सारगर्भित पदों को दूसरी भाषा में वर्णन करना भी सुगम नहीं है। इसलिये हम उसका सारांश देते हैं:
“वर्षा ऋतु में कोयल चहक रही है। चम्पा के फूल खिले हुए हैं। भूमि ने हरी चादर ओढ़ रखी है। संसार के व्यवहार करने वाले काम के वश हो जाते हैं; किन्तु खेद उनके लिये है जिन्होंने कोई विशेष व्रत धारण किया है । | “नेमिनाथ ने अपने जीवन व्यवहार से हमको दृढ़ और महान् व्रत धारण करने का मार्ग दिखलाया । जो पर्वत की चोटी पर बसता है, यदि वह नीचे गिर जाय तो फिर उसकी हड्डी तक का पता न चलेगा । तन के छोड़ने का दुःख नहीं है; किन्तु ब्रत का भंग होना बड़े खेद की बात है ।”
“जिस काम ने विश्वामित्र ऐसे यती को मार गिराया, जिसने श्रृंगी ऋषि को नाच नचाया, उससे डरते रहना चाहिए, यह वह वैरी है जिसने रावण की सोने की लंका को
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* जैन वृतान्त मिट्टी में मिला दिया। इसकी सन्ताने में एक भी जीवित न रहा जो घर में दीया-बाती जलाता। यदि मनुष्य इन कथाओं को पढ़कर संयमी नहीं बनता तो बड़े दुःख की बात है।’ | “तेल है, बत्ती है, दीया जल रहा है यदि काम की प्रचण्ड वायु उसको न लगे तो वह कितने भूले-भटकों को मार्ग दिखायेगा। अपने प्रकाश को प्रगट करेगा । शोक ! काम के हवा का झोंका उसको शीघ्र बुझा देता है।”
“घर छोड़ा। बार छोड़ा। धन छोड़ा । द्रव्य छोड़ा। ३ मगर किसके लिये ? यदि मनुष्य को संसार प्यारा था तो फिर
उसको स्वांग बनाने की क्या आवश्यकता थी। सच्चे मनुष्य संसार में कम हैं । धिक्कार है उन पर जो सच्चाई का पल्ला नहीं पकड़ते।”
यह सुन्दरता क्षण भंगुर है। यह यौवन थोड़े दिन का है। भंवरा घूम-फिरकर कंवल के चारों ओर मंडलाता है। दो दिन पीछे पंखड़ियाँ गिर जायेंगी। लाल रंग काला हो जायगा, जिन फूलों में रस है उनमें सूखापन और दुर्गन्ध आ जायगी।
नासमझ भंवरा ! तेरी बुद्धि पर धिक्कार है।” * “काम, क्रोध, लोभ, मोह सब दुखदाई हैं। जो इनके | फन्दे में आ गया वह बुरी तरह मारा गया। उसकी जड़ कट
गई। कौन है जो इस कष्ट से बचा सकता है। शोक ! मनुष्य स्वयं ही फँसता है और विधाता को दोष देता है ।। | “देवर ! तू अपने व्रत को याद कर । कुल की लाज कर । सच्चे जैनी की तरह अपने शत्रु को जीत ले, क्योंकि जो इनको जीत लेते हैं वही जिन हैं और वही जैनी हैं। वही भवसागर के पार जाते हैं और मुक्ति शिला पर आसन जमाते हैं।” | इस उपदेश ने अपना प्रभाव डाला । उसके देवर ने लज्जा से सिर नीचा कर लिया। राजमती के पांव पर गिरकर
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शिव रो-रोकर क्षमा मांगी । कहते हैं केवल राजमती की संगत से और उसकी हितकारी शिक्षा से यह मनुष्य महामुनि बन गया। जीवनपर्यन्त अपने धर्म से नहीं गिरा और अन्त में
नर्वाण पद को प्राप्त हुआ।
महारानी धारनी
- विशाला नगरी का राजा चेटक था जो बड़ा, साहसी, पराक्रमी, तेजस्वी और बली था। यह जैनमत का अनुयायी था, शिवा इसकी पुत्री थी। यह बड़ी धर्मात्मा और ज्ञानी थी। इसका विवाह उज्जैन नगर के राजा प्रचण्ड देवत्न के साथ हुआ था । इसने अपने राज्य में अनगिनत बिहार, पाठशालायें, धर्मशालायें, तालाब कुआं इत्यादि बनवाये और इन्हीं के द्वारा देश में धर्म का प्रचार किया । विवाह के कुछ समय पश्चात् इसके दो पुत्र उत्पन्न हुये। गोपाल और पालक । दोनों राम और लक्ष्मण के जोड़े के भांति थे। एक दूसरे को सच्चे हृदय से प्यार करते थे । ये दोनों नित्य ही साथ-साथ रहा करते थे। * दोनों ने एक ही आचार्य से शिक्षा पाई थी । अपने समय पर ये बड़े ही विद्वान् धर्मात्मा और नीति निपुण हुए हैं।
जब दोनों राजकुमार युवावस्था में पहुँचे, संयोगवश उस समय धर्मघोष सूर्य नामक ज्ञानी पंडित राजधानी में आया । राजा की आज्ञा से दोनों राजकुमार इस मुनि की सेवा में
आये। उसने उन्हें उपदेश दिया– | संसार में कर्म का अथाह सागर लहरें मार रहा है। एक लहर ऊपर उठती है, दूसरी नीचे गिरती है। मनुष्य लहरों के थपेड़ों से या तो डूब जाते हैं या कभी ऊपर आते हैं, कभी
® जैन वृतान्त छ
५७ नीचे जाते हैं। इस अशान्ति की अवस्था में किसी को भी असलियत का पता नहीं लगता है। इसलिये बार-बार जन्ममरण के बंधन में फँसना पड़ता है। तुम दोनों अपने को भाईभाई समझते होगे; परन्तु सच्ची बात यह है कि न कोई किसी का भाई है न बहिन । कर्म के संस्कार ने तुम दोनों को एक घर में, एक कुल में और एक देश में उत्पन्न किया है। तुम एक दूसरे के प्रेमी और शुभचिन्तक हो। बुद्धिमान वही है जो समय और अवसर से काम लेना जानता है। इस समय से लाभ उठाओ और ऐसा जीवन बनाओ कि यह संसार तुम्हें दुखदाई न प्रतीत हो । तुम देखते हो समय आता है, और जाता है। साँस आती है, और जाती है। किसी को शक्ति नहीं कि आने वाली साँस को आने न दे और बाहर वाली साँस को बाहर जाने से रोक दे। सुर्य निकलता है और डूबता है। संसार में प्रत्येक स्थान पर यही बात है । यही दृश्य प्रत्येक मनुष्य को दिखाई देता है। युवावस्था मनुष्य का बसंत ऋतु है । बसंत के दिनों में फूल खिलते हैं। फूलों की भीनी-भीनी सुगन्ध से चित्त प्रसन्न हो जाता है । यह ऋतुराज केवल दो महीने रहता है । फिर पतझड़ के दिन आते हैं, खिले हुये फूल मुरझा जाते हैं। और हरे-भरे वृक्ष नंगे हो जाते हैं। यदि युवावस्था में हो तो काम भी वैसा ही करो। सच्ची उमंग के साथ युवावस्था से लाभ उठा कर ऐसे काम करो जिस से दुख का खटका न रहे। गंगा बह रही हैं। बहती हुई गंगा में जो लोग हाथ नहीं धोते मूर्ख और कम समझ हैं । यह समय तुम्हें फिर न मिलेगा। देखो सूर्य प्रातः काल आकाश मंडल में उदय होकर तुम्हें कहता रहता है कि अपना काम उसके प्रकाश में करलो; परन्तु आँखों के अधे कानों के बहरे न आंखों से उस का प्रकाश देखते हैं न कानों से उसके उपदेश को सुनते हैं।
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शिव . वह दिन में चक्कर लगा कर अस्त हो जाता है और मनुष्य अंधकार में पड़ कर सो रहते हैं। दूसरे दिन वह फिर अपनी बातें सुनाता है और नित्य ही उन्हें स्मरण करता रहता है; परन्तु लोग उसके उदय अस्त को साधारण दृश्य समझ कर अपाहिज बने रहते हैं। जवानी ढल जाती है और किसी को कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता । सूर्य तो सदैव उदय होता ही रहेगा और उसके उपदेश से योहीं आकाश मंडल गूंजता रहेगा; परन्तु तुम अपनी गई हुई जवानी और उसकी उठती हुई उमंग को कहाँ पावोगे ! इस जवानी को व्यर्थ नष्ट न करो। इसे सार्थक करो। जब यह चली जायगी तो कुछ करते-धरते नहीं बनेगा । उस समय तुम महा दुखी होगे। – जिस प्रकार तपाये हुये सोने को सुहागा कुन्दन बना देता है वैसे ही धर्मघोष की शिक्षा ने राजकुमार गोपाल को दम के दम में कुछ को कुछ बना दिया। नश्वर जगत के भाव ने उसके हृदय पर गहरा प्रभाव डाला, संसार से चित्त उचाट हो गया। बाप से आज्ञा लेकर धर्मघोष से जैनियों के धर्म के अनुसार दीक्षा ली और तपस्या में अपना जीवन व्यतीत करने लगा। उसके वैराग और त्याग को देख कर राजा चन्डप्रदेवत्न ने भी तप के प्रभाव को समझा और घर बारे छोड़ कर बन में चला गया । | गोपाल का छोटा भाई राजसिंहासन पर बैठा और बाप की जगह राज करने लगा; परन्तु धर्मघोष की बातें उसके हृदय में पत्थर की लकीर हो गई थीं । जब इसके दो पुत्र दंतिबर्द्धन और राष्ट्रबर्द्धन सयाने हुये इसने दोनों को पास बुलाया और समझाया-बुझाया-“संसार नाशवान है जीवन आज है कल नहीं है। कौन जाने काल कब आ पहुँचे ! मनुष्य को अपना काम झटपट बनाना चाहिये। तुम दोनों मिल-जुल
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* जैन वृतान्त छ।
५६ कर रहना । मैं विरक्त होकर अपना जन्म बनाने के लिए जंगल की राह लेता हूँ। यह कह कर वह चला गया। उसकी जगह दन्तिवद्धन सिंहासन पर बैठा।” । दोनों भाइयों ने बाप की आज्ञा अनुसार राज-काज को सँभाल लिया। बड़े भाई ने छोटे भाई को अपना दीवान, बनाया; परन्तु शोक की बात है कि जिस घराने में ऐसे धर्मात्मा और प्रसिद्ध राजे हुये थे उसी कुल में ऐसा कामी पुरुष पैदा हुआ जिसकी काम वासना के कारण बड़ी-बड़ी बुराइयाँ उत्पन्न हुई। शास्त्रों ने सच कहा है कि बिजली की कड़क, मृत्यु के आगमन, बच्चे के रोने और मन के भाव बदलने के लिए कोई समय नियत नहीं है। क्या जाने किस समय क्या हो जाय । एक समय मनुष्य धन द्रव्य पर लात मार कर आप निर्धन और संतोषी बन जाता है। दूसरे समय साधारण मूल्य की वस्तु को देख कर उसके हृदय में बुरे भाव उत्पन्न होते हैं और वह उन्हें औरों की आँख बचा कर लेना चाहता है ।। | राष्ट्रवद्धन की स्त्री का नाम धारनी था। वह बड़ी ही रूपवती और साक्षात सौन्दर्य की प्रतिमा थी । सुन्दरता के साथसाथ उसमें सारे शुभ गुण भी थे । किसी मनुष्य में सारे शुभ गुण कठिनाई से एक साथ मिलते हैं। यह जितनी रूपवती थी,, उतनी ही धर्मात्मा, पवित्र और सुशीला भी थी। इसके गर्भ . से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जैनियों के इतिहास में उन्नत्तिसेन बतलाया जाता है । इसने अपने समय में जैन धर्म के प्रचार का बहुत बड़ा काम किया था। अभी यह पाँच वर्ष
का था, एक दिन अपनी माँ से पूछने लगा, “माँ सबसे मोटा ‘कौन है ? उसने उत्तर दिया, “चींटी सबसे मोटी होती है ।” लड़के ने चकित होकर प्रश्न किया-चांदी तो छोटी होती है।
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* शिव मोटा तो हाथी होता है । तू कैसी उल्ट-सुल्टी बातें करती है।” माँ मुसकराई, बोली- “बेटा ! मैं तुझ से झूठ नहीं कहती। संसार में सबसे बड़ा वह है जो सबसे छोटा बनता है। मोटा वह है जो सबसे दुबला होता है और बुद्धिमान वह कहलाता है जो अपने को अज्ञानी समझता है । तू देख ! हाथी बड़े डील-डौल की है। तू इसे मोटा कहता है मैं और ही कुछ समझती हूँ जो दूसरों के मुहताज हो वह मोटा कैसा ? चींटी को देख ? रात दिन परिश्रम करती है, कमाती है, न वह किसी के अधीन है न वह अपने को किसी का मुहताज समझती है। गर्मी में परिश्रम करके जाड़े में सुख चैन से रहती है ! परन्तु हाथी इतना भारी होते हुए भी उसके गले पर महावत बैठ कर उसे अपने आँकुस में रखता है. और पाँव की एड़ियों को रगड़-रगड़ कर अपने अधीन बना लेता है। राजा वी सवारी का हाथी जंजीरों में जकड़ा रहता है और बंधन में फंसा रहता है। उसमें चींटी जैसी सच्ची स्वतंत्रता नहीं है। बेटा ! तू , कभी हाथी जैसा मोटा होना पसन्द मत करना; किन्तु चींटी के दुबले पन को अच्छा समझना। क्षत्रिय को चाहिए कि किसी के सामने हाथ न फैलाये; किन्तु और लोगों को अपने अधीन रक्खे ।”
धारनी नित्य ही अपने पुत्र को उत्तमोत्तम उपदेश दिया करती थी परिणाम यह हुआ कि उन्नतिसेन बड़ा ही धम त्मिा
और तेजस्वी राजा बन गया ।
एक दिन रानी मन्दिर में पूजा करने जा रही थी। उस पर दन्तिबर्द्धन की दृष्टि पड़ गई। वह उस पर मोहित हो गया । अब क्या था, दिन-रात इसी सोच में रहने लगा कि रानी किसी प्रकार वश में आ जाय । उसने एक स्त्री को सिखापढ़ाकर उसके महल में भेजा । वह आई और इधर-उधर की
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* जैन वृतान्त के कही-“राजन् ! यह राष्ट्रबद्धन का दूसरा पुत्र है। तेरे कोई सन्तान नहीं है जिनेश्वर महाराज ने दया की है। ले, इसे अपना लड़का बना । अब लड़का न होने का दुख तुझे न सतावेगा । इसीसे तेरा वंश चलेगा। किसीको कानों-कान पता ने लगने पावे कि यह कौन और कैसे हाथ आया और कौन तुझको दे गया ।
राजा आनन्द में मग्न होगया । अन्धा क्या चाहे ? दो आँखें । उसकी इच्छा मालिक ने पूरी की। उसने भिजुनी को धन्यवाद दिया और नन्हे बच्चे को रानी की गोद में देकर उसका जन्मोत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया । लड़के का नाम : मणिप्रभ रक्खा गया। जब वह ग्यारह वर्ष का हुआ कुसुम्बी के राजा का देहान्त होगया। मंत्रियों ने मणिप्रभ को राज सिंहासन पर बिठाला और छोटा राजा मंत्रियों की सहायता
से राज्य करने लगा।
बुराई का परिणाम बुरा ही होता है। जो जैसा करता है। वैसा पाता है। कर्म के दंड को कोई महान शक्ति भी नहीं रोक सकती । दंतिवद्धन ने भाई की जान ली। जिस के लिए यह महा पाप किया गया वह भी हाथ नहीं आई। मन में लज्जित और दुःखी हुआ । धारनी की बहुत खोज की गई, परन्तु उसका पता तक न चला। पिंजरे से उड़ा हुआ पंछी कब हाथ अाता है और जाल से निकली हुई मछली फिर कब जाल में फैंसी है।
सिर पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा; परन्तु अब क्या हो सकता था। अपनी करनी अपने आगे आई। प्रायश्चित का ध्यान सताने लगा, अपने भतीजे उन्नतिसेन को पास बुलाया और कहा-“बेटा ! यह शरीर पापी होगया । पापी को लोक और परलोक में कहीं सुख नहीं मिलता। मैंने पाप किया है।
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शिवं % क्या पाप किया है यह तुझ को बताना नहीं चाहता। बस इतना ही समझले कि मैं महापापी हूँ। अब राजकाज सब दुखरूप प्रतीत हो रहे हैं। आज से तू इनका मालिक बन | तू जाने
और तेरा काम जाने । मैं तो बन को जाता हूँ। वहाँ कड़ी से कड़ी तपस्या कर के शरीर को त्याग दूंगा। तू प्रजा का पालन कर और देख ! भूल कर भी राह से बेराह न होना । बुराई का परिणाम सदैव बुरा होता है। | पाठक ! सोचो, यह कैसी शिक्षाप्रद कहानी है ! मनुष्य भूल कर भी पाप न करे। मरना अच्छा है लेकिन पापी बन कर जीना बुरा है। जो जन्म लेता है उसे अवश्य एक दिन मरना है। फिर क्यों बुराई को दिल दिया जाय ! दन्तिवद्धन ने जंगल की राह ली। उसके जीवन का क्या परिणाम हुआ जैन इतिहास में इसका पता नहीं चलता। अब उसकी जगह उन्नतिसेन उज्जैन का राजा हुआ । वह बुद्धिमान विद्वान, साहसी और मनचला था। उसने थोड़े ही दिनों में अपने आपको योग्य राजा सिद्ध कर दिखाया । उसका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध होगया । उसे अपने राज्यविस्तार की बड़ी इच्छा थी। कुसुम्बी का बूढ़ा राजा मर चुका था। उसकी जगह मणिप्रभ सिंहासन पर था ! इसने राजा को अबल देख कर कुसुम्बी पर चढ़ाई कर दी। जिस देश का राजा दसग्यारह वर्ष का हो उसकी सेना कहाँ तक साहस के साथ मैदान में ठहर सकती है ! नक्कारे पर चोट पड़ी, मैदान लाशों से पट गया, रक्त की नदियाँ बहने लगीं।
मणिप्रभ को क्रोध आया क्योंकि वह भी क्षत्री था। लड़ने के लिये मैदान में आ गया। हाथी और चींटी की लड़ाई थी। धारनी बिहार में थी। उसे सूचना मिली कि उसके दोनों लड़कों में घोर युद्ध हो रहा है। वह अपनी गुरुआनी से आज्ञा लेकर
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जैन वृतान्त केसरिया बाना पहने हुए संग्राम-भूमि में आ पहुँची। दोनों ओर लड़ाई की तैयारियाँ हो रही थीं । उसके मुख से तप का तेज प्रकट था। वह बीच में खड़ी होकर बोली-“पहिले इस भिक्षुनी का सिर धड़ से अलग करो, फिर आपस में लड़ो। मैं अपने जीते-जी तुम लोगों को कभी भी लड़ने नहीं देंगी ।” सब उसकी बातों को सुनकर दंग रह गये । उन्नतिसेन को भिजुनी के रोक-टोक की सूचना दी गई। वह उसके पास आया— “माई ! यदि तू भिक्षुनी है तो तुझे क्या अधिकार है कि इस प्रकार सांसारिक व्यवहार में रोक-टोक करे। लड़ना-भिड़ना राजाओं का काम है। तेरा बिहार में जाना अच्छा होगा । लड़ाई की रोक-थाम से अलग हो जा।” धारनी ने गहरी दृष्टि से उन्नतिसेन को देखा और बोली-“बेटा तू भूल गया । मैंने तुझको तेरे बचपन में यह शिक्षा दी थी कि हाथी मोटा नहीं है, चींटी मोटी होती है । तू हाथी है और मणिप्रभ चींटी है। तू ने बिना किसी अपराध के उस पर चढ़ाई की है। वह नादान और छोटा लड़का क्षत्रियों के स्वभाव के अनुसार तुझ से सामना करने आया है। क्या अपने सगे भाई को ही मारना चाहता है ? तू एकदम भूल गया, दन्तिबद्धन ने अपने भाई राष्ट्रबद्ध न की जान ली और इस महान् पाप से दुखी होकर उसे जंगल में भागना पड़ा। क्या तू भी अपने सगे और छोटे भाई को मारकर सुखी होना चाहता है ? ऐसा न कभी हुआ और न हो सकता है । पीछे तुझे पछताना पड़ेगा और तू महा दुखी होगा । जब तुझे पता लग जायगा कि मणिप्रभ तेरा ही सगा भाई है तो तुझे भी पश्चाताप करते हुए या तो आत्मघात करना होगा या राजपाट छोड़कर जंगल में भागना पड़ेगा ।” | उन्नतिसेन के आश्चर्य को कुछ न पूछो । उसने इस सती के रूप को गहरी दृष्टि से देखा और उसी समय घोड़े से उतर
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है
शिव * कर उसके पाँव पर गिरा-“माता ! मेरे अपराध को क्षमा कर । मैं नहीं समझता कि तू क्या कह रही है। यह तो मैं जान गया कि तू मेरी माता है। वही रंग रूप ! वही बातचीत ! परन्तु तू यह बता दे कि मणिप्रभ मेरा सगा भाई कैसे हुआ ?” भिजुनी बोली–‘दन्तिबद्ध न मेरे रूप को देखकर मोहित हो गया और काम के वश में आकर तेरे बाप राष्ट्रवद्धन को मरवा डाला । मैं अपना धर्म बचाने के लिये कुसुम्बी भाग आई और भिक्षुनी हो गई। उस समय मैं गर्भवती थी । बिहार में यह पुत्र उत्पन्न हुआ। कुसुम्बी के राजा का नाम भी उन्नतिसेन था। उसके कोई संतान नहीं थी। मैंने अपने पुत्र को उसके पास भिजवा दिया। इसलिये यह तेरा सगा भाई है। अब तू ने समझा या नहीं ?” । | उन्नतिसेन की दशा देखने योग्य थी । वह चाहता था कि माता की गोद में चिमट जाय । माँ भी चाहती थी कि लड़के को प्यार के साथ अग लगावे; परन्तु अब न वह उसकी माता रही न वह उसका पुत्र था । सांसारिक सम्बन्ध दूर हो चुका था। दोनों चुपचाप खड़े रहे। फिर साधुनी कुसुम्बी की सेना से बोली–“अपने राजा को मेरे पास लाओ। मैं अब उसकी माता नहीं हूँ; परन्तु वह मेरे ही पेट का लड़का है। यह राजा जिसने तुम पर चढ़ाई की है उसका सगा भाई है। उसको समझाओ । भय की कोई बात नहीं है। दोनों भाई संग्रामभूमि में आकर गले मिलें और शत्रुता के भाव को सदैव के लिए दूर कर दें ।”
| वह आया । माता ने उसे प्यार की आँखों से देखा— पुत्र ! देख यह तेरा भाई है। इसके पाँव से हाथ लगा ।” फिर उसने उन्नतिसेन को आज्ञा दी–“अपने छोटे और सगे भाई के सिर पर प्र म से हाथ फेर और इसे अपने गले से
जैन वृतान्त
६१ बातें करती हुई कहने लगी-“जहाँ सौन्दर्य का दीपक जलता है, वहाँ सौन्दर्य के प्रेमी पतंगों का आना जरूरी है। आपको प्रकृति ने महा सुन्दरी बनाया है। महाराजा दन्तिवद्धन आप पर मोहित हो गये हैं। वे चाहते हैं कि आप उन पर कृपादृष्टि करें जिसमें वे आपकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करें। इस अधर्म की बात को सुनकर धारनी एकदम झल्ला उठी। उसका मुख क्रोध से लाल हो गया । उसने बड़ी कठिनाई से अपने को
सम्भाला और आश्चर्य के साथ कहने लगी-“दासी ! ऐसी ६ बातें अधर्म समझी जाती हैं। तू मेरे पास कुटनी बनकर आई।
है । तुझको क्या कहूँ ? राजा को जाकर समझा दो कि मैं उनके छोटे भाई की स्त्री हैं और उनकी कन्या सदृश हूँ । माता-पिता का धर्म है कि अपनी संतान को सुधारने के लिये आप भी धार्मिक जीवन व्यतीत करें जिससे वे भी बुराइयों से बचे रहें । किसी पराई स्त्री को बुरी दृष्टि से देखना महापाप है। चन्द्रमा देवता था। उसने धर्म को छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि कलंक का टीका आज तक उसके माथे पर लगा हुआ है। रावण महाप्रतापी और तेजस्वी हुआ है । पराई स्त्री के ध्यान ने उसको और उसके कुले को नष्ट करा दिया । बालि जैसा बलवान उस समय कोई भी न था। छोटे भाई की स्त्री का प्रेमी था । इसी पाप से वह रामचन्द्र जी के हाथों मारा गया। कर्म का फल राजा और प्रजा सबको भोगना पड़ता है। देवता, यक्ष, किन्नर, राक्षस, गन्धर्व कोई भी इसकी मार से नहीं बचा । इसी कुल में बड़े-बड़े राजे-महाराजे हुए हैं। उनका नाम धम’ पुस्तकों में सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है। उनके गौरव का मुख्य कारण यही था कि वे भूलकर भी कभी अधर्म की राह नहीं चलते थे। मैं पतिव्रता हैं। मेरा पति, स्त्रीत्रत है। कमलिनी सूर्य को देखकर प्रसन्न होती है, परन्तु चन्द्रमा के
शिव के निकलते ही अपनी पंखड़ियों को समेट लेती हैं। इसी प्रकार कुमुदिनी चाँद के निकलने पर खिलती है और सूर्य के दर्शन से मुरझा जाती है। यह उनका प्राकृतिक स्वभाव है। मेरी बातें राजा को हाथ बाँध कर मेरी ओर से सुना देना और उनको समझा देना कि राष्ट्रबद्धन उनके लड़के के तुल्य है। छोटे भाई और बेटे में भेद नहीं होता। मैं उनकी बेटी और पुत्रबधू के बराबर हूँ ।”
दूती निराश होकर लौट गई । राजा को धारनी का संदेश सुना दिया। काम की अग्नि जिसके हृदय में उत्पन्न होती है, उसका सर्वनाश किये बिना नहीं बुझती । दन्तिबद्धन पर धारनी के उपदेश का उल्टा प्रभाव पड़ा। उसने समझा जब तक छोटा भाई राष्ट्रवद्धन जीवित है इस स्त्री का हाथ आना महा कठिन है। यदि यह किसी प्रकार राह से हटा दिया जाय। तो यह सुगमता से हाथ आ जायेगी।
सोचने की देर थी। नई-नई युक्तियाँ उसकी बुद्धि में आने लगीं । मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही कर्म करने लगता है। इसलिए अपनी भावनाओं को रोकना चाहिए जिससे इन्द्रियाँ वश में रहें। भावना जहाँ घनी हुई शरीर के सारे अंग उसके। प्रभाव में आकर आप-ही-अप काम करने लगते हैं। राजा के साथ स्वार्थी मनुष्य बहुत रहा करते हैं। ये लोग राजा के भाव को बराबर भाँपते रहते हैं और अपने उचित और अनुचित व्यवहार से उसे प्रसन्न रखना ही अपना मुख्य कर्तव्य समझते हैं। समय की बलिहारी है, दोनों भाई एक दूसरे को प्राण तक न्योछावर करते थे । पर आज बड़ा भाई छोटे भाई को मारने के लिये अनेकों उपाय सोच रहा है। यह काम की महिमा है । वह मनुष्य को अंधा बना देती है। यह जो न करे, वह थोड़ा है । पानी और दूध ऐसे मिले-जुले थे कि एक दूसरे
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जैन वृतान्त छ । को अलग करना असम्भव था । काम अंग ने कपट का नमक डाल दिया। पानी अब अलग और दूध अलग। किसी कामी पुरुष को धार्मिक जीवन व्यतीत करने की आशा रखना व्यर्थ है। यह धर्म का बलवान शत्रु है। अन्धकार और उजाला दोनों संग नहीं रह सकते । जहाँ काम है, वहाँ शुभ आचरण और धम नहीं रहते और जहाँ पवित्रता रहती है वहाँ काम का
अंग प्रबल नहीं होने पाता।
जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं काम। दोनों कबहुँ ना मिलें, रवि, रजनी एक ठाम ।।
राजा के नौकरों ने अवसर पाकर राष्ट्रवद्धन को जान से मार डाला । धारनी ने सुना। सारी बातें समझ गई। उसने सोचा अब यहाँ रहने में कुशल नहीं है । । जिस दिन यह घटना घटी उसके दूसरे दिन धारनी अपने महल से निकल भागी। चारों ओर उसकी खोज होने लगी। परन्तु कुछ पता न चला कि वह कहाँ है और कैसे चली गई। जैन-इतिहास के अनुसार वह कुसुम्बी नगर को चली गई जो उस समय इलाहाबाद के समीप था । इसी जगह बौद्धों और जैनियों के बिहार (मठ) थे । यहाँ वह एक भिक्षुनी के पास रहने लगी और अपना समय सत्संग, पूजा-पाठ और अभ्यास में व्यतीत करने लगी।
( ३ ) जिस समय पति मारा गया, धारनी गर्भवती थी, परन्तु उसने अपने गुरुआनी से यह बात नहीं कही; क्यों कि वह जानती थी कि ऐसी दशा में विहार में रहने की आज्ञा नहीं मिलेगी। यह जीवन भी कैसा है ? पग-पग पर भय लगा हुआ है। मनुष्य बेचारा करे भी तो क्या करे ! सच बोलना कठिन और झूठ बोलना बुरा है परन्तु आग को किस ने छिपाया है ? यदि धुआँ बाहर नहीं निकलता तो आग भीतर ही भीतर सुलगती
शिव रहती है उसकी लपटें प्रचंड होकर कभी न कभी प्रज्वलित हो जाती हैं। दो-तीन महीने पीछे गुरुआनी को पता लग गया। उसे एकान्त में लेजा कर पूछ बैठी-“अधम अबला ! यह क्या बात है ? तू भिक्षुणी हो गई। ऐसी दशा में तुझे गर्भ कैसे रहा ?” धारनी काँप उठी, कलेजा दहल गया, अखिों से आँसू बहने लगे, हाथ बाँधकर बोली–“दीक्षा लेने के पहले मैं गर्भवती थी। मैंने जान-बूझ कर इस बात को छुपा रखा था, क्योंकि मैं
ती थी कि ऐसा न हो कि आप मुझे धर्म की दीक्षा और शास्त्रों की शिक्षा न दें और विहार से बाहर निकल जाने की आज्ञा दें । मैं क्या करू ! महा दुखिया हूँ। धर्म और सतीत्व बचाने के लिए उज्जैन से यहाँ भाग आई हूँ। आप साधुनी और भिक्षुनी हैं। मेरी स्थिति पर विचार कर आप मेरे अपराध को क्षमा करेंगी ।” यह कह उसने अपनी दुःख भरी कहानी सुनादी ।।
सारी कथा सुन कर भिक्षुनी को उस पर दया आ गई। उसने उसके रहने के लिए अलग प्रबन्ध कर दिया । दिन पूरे होने पर उसके एक लड़का बड़ा ही सुन्दर उत्पन्न हुआ जिसे देख कर माता का कलेजा ठंडा हो गया; परन्तु उसी समय उसने अपनी । गुरुआनी से हाथ बाँध कर कहा-“माई ! मेरा पति मारा गया । मैं अपने एक लड़के को शत्रुओं के हाथ में छोड़ कर यहाँ भाग आई हूँ। अब मैंने भिक्षुनी का व्रत धारण कर लिया है। इसको भी पास रखना लज्जा की बात होगी । वैरागी होकर माया और मोह के जाल में फंसना भेष को लज्जित करना है। तू जैसे चाहे इसका प्रबन्ध कर दे । हम दोनों की प्राणरक्षा तेरे हाथ में है। भिक्षुनी का हृदय द्रवीभूत हो गया। लड़के को रेशमी कपड़ों के तहों में लपेटा और कुसुम्बी नगर के महाराजा के पास लाई। उसने राजा से एकान्त में मिलकर
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जैन वृतान्त छ । लगा ले । अब तुम दोनों भाई-भाई की तरह रहो।
दोनों भाई गले मिले। आँखों से आँसुओं, की धारा बह रही थी। बड़े ने छोटे से क्षमा प्रार्थना की और उसे सदैव सहायता देने को बचन दिया । । भिक्षुनी ने कहा–“बेटा ! मैं भिक्षुनी हूँ। मेरी जगह संग्राम भूमि में नहीं है। मैं तुम दोनों को आशीर्वाद देकर बिहार को जाती हूं; परन्तु इतना फिर भी समझा देती हूं कि मनुष्य जीवन तुम्हें इसलिए नहीं दिया गया है कि तुम लोगों का गला काटते रहो । ‘अहिंसा परमोधर्मः’ यह हमारा आदर्श है । यदि तुम मनुष्य हो तो भक्ति, ज्ञान और तप का जीवन व्यतीत करो । संसार में जो असहाय और बलहीन हैं, उनकी सहायता करो । ऐसा जीवन व्यतीत करो जिसमें लोग तुम्हारे अनुयायी होकर सच्चे, पवित्र, धर्मात्मा और अहिंसक बन जावें । यह तुम्हारी संसारी माता का जो वास्तव में अब तुम्हारी माता नहीं रही, अन्तिम उपदेश है।”
दोनों भाई धारनी के पाँव पर गिरे। वह उनको सच्चे हृदय से आशीर्वाद देकर बिहार लौट आई । इन दोनों राजाओं को फिर माता के दर्शन नहीं मिले; परन्तु उसकी शिक्षा का यह परिणाम हुआ कि दोनों सच्चे धमात्मा बने गये। मणिप्रभ अपने भाई को महल में लाया । उसका उचित आदर-सत्कार किया । जो शत्रु थे मित्र हो गये और यह प्रम जीवन पर्यन्त वैसा ही बना रहा । इसी समय से दोनों राजाओं ने श्रावक धर्म के प्रचार में बहुत कुछ प्रयत्न किया। सैकड़ों बिहार, हज़ारों मन्दिर और अनगिनत तालाब बनवाये ।। जगह-जगह पाठशालायें और धर्मशालायें बनवाई। अहिंसा का ऐसा प्रचार किया कि उज्जैन और कुसुम्बी उसी समय पृथ्वी पर स्वर्ग धाम बन गये ।।
* शिव | धारनी के विषय में हम इससे अधिक नहीं जानते। यह गाथा अत्यन्त उपदेशजनक और शिक्षाप्रद है। प्यारे पाठको ! तुम इस सती के चरित्र को श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ो और अपनी बहिनों, बेटियों, ग्त्रियों और माताओं को सुनाओ, जिसमें तुम सब का जीवन पवित्र हो और तुम जीते-जी मनुष्य
जन्म के फल को प्राप्त कर सको ।
राजकुमारियाँ–धनवती, रत्नावती, रूपवती ।
और कुसुमवती ।
( १ ) संघल द्वीप के एक राजा का नाम संगलेश्वर था, जिसकी रानी संघला कहलाती थी। उसके एक पुत्र था जो चाँद का टुकड़ा था। उसका नाम संघलसिंह था । वह इतना सुन्दर था कि जो कोई उसके रूप को देखता आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबाता । । जब सयाना हुआ, उसने राज्य की आवश्यक विद्यायें थोड़े ही दिनों में सीख लीं । वह पूर्ण विद्वान, नीति निपुण और धर्मात्मा था। नित्य ही प्रातःकाल उठकर माता-पिता के चरण । छूता । जब तक इनका दर्शन न मिलता न खाना खाता न पानी पीता । धन्य हैं वह माता-पिता जिन्हें मालिक की दया से ऐसे पुत्र मिल जाते हैं। । बसन्त ऋतु में जब जंगल हरे-भरे थे। राजकुमार अपने साथियों के साथ शिकार के लिये गया। प्राकृतिक दृश्य से उसके मन की कली खिल गई; परन्तु उसी समय रंग में भंग हो गया । एक दुःखिया की पुकार ने इसके कलेजे को हिला
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| जैन वृतान्त .
७१ दिया। वह दयालु वे कृपालु था। यह कब सम्भव था कि वह
सहायता के लिये उद्यत न होता !
एक लड़की काँटों-कटीलों में फंसी हुई देख पड़ी। शरीर नुकीले कांटों से चलनी हो गया था और सारा बदन लहूलुहान था । उसने प्रेम के साथ ढारस बँधाया, शरीर से काँटों को निकाला और अपनी पगड़ी फाड़कर उसके घावों को बाँध दिया। इतने में ही उस लड़की की सहेलियां वहां आ पहुंची
और उसको साथ ले गई, परन्तु इनमें से किसी-किसी ने राजपुत्र को पहचान लिया।
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( २ ) दूसरे दिन संघल द्वीप का जगत सेठ धन श्रेष्ठी दरबार में आया और बहुत से बहुमूल्य पदार्थ राजा को भेंट किये। | राजा–कहो सेठजी ! सब कुशल है ?” – सेठ–‘जिनेश्वर की कृपा है। आपके राज में सर्वत्र कुशल-ही-कुशल है।”
| राजा–“कहो, इस समय दरबार में कैसे आना हुआ ? । सेठ–‘महाराज ! राजकुमार ने मेरी कन्या की जान
बचाई है। वह अपना तन, मन, धन उसके चरणों में अर्पण करना चाहती है ।”
राजा–“अपने अभिप्राय को स्पष्ट शब्दों में कहिए ताकि समझ सकू ।। | सेठ-“मेरी कन्या धनवती राजकुमार की दासी होना
चाहती है।”
राजा–“क्यों ?
सेठ–“क्योंकि उसने उसकी जान बचाई है और अब वह अपने को उस पर न्यौछावर करना चाहती है।”
*
७२
शिव राजा–“मैं उस घटना को सुन चुका हूं, परन्तु मैं उसका विवाह किसी राज-कन्या से करना चाहता हूँ ।” | सेठ–“आपका विचार अति उत्तम है, परन्तु उस कन्या को भी स्वीकार कीजिये, नहीं तो वह तड़प-तड़प कर प्राण दे देगी । महाराज ! हम जैनी हैं। हिन्दुओं की तरह जैनियों में इतना भेद नहीं होता ।”
राजा-“यह सच है परन्तु राजकुमार की सम्मति भी आवश्यक है ।” । | सेठ-वे आज्ञाकारी पुत्र हैं। आपकी आज्ञा सिर आँखों पर रखेंगे। केवल आपके कहने की देर है ।”
राजा ने राजकुमार को बुलाया। सेठ की लड़की का सन्देश सुनाया। वह चुपचाप रहा। न ‘हां कही न ‘ना’ कही। उसके रंग-ढंग से पता चल गया कि उसे यह सम्बन्ध अस्वीकार नहीं है। । कुछ दिनों पीछे दोनों का विवाह हो गया और वे पति
पत्नी की तरह आनन्द से रहने लगे।
| -:०:–
( ३ ) . संघलसिंह बड़ा ही रूपवान और तेजस्वी था। नगर की सारी लड़कियाँ उसके सुन्दर रूप व स्वभाव पर मोहित थीं । संसार को क्या कहा जाय । राजकुमार के विरुद्ध उल्टी-सीधी बातें होने लगीं। माँ-बाप तक बात पहुँची । उन्होंने उसे डांटडपट किया । वह अपने को निर्दोष बताता रहा, लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया । बात बढ़ती गई। अन्त में राजकुमार और उसकी स्त्री ने देश को छोड़ देने का निश्चय किया और भेष बदल कर रात्रि में चल पड़े।
नगर से बाहर नदी के किनारे आये और नाव में बैठकर
जैन वृतान्त आगे बढ़े। बहुत दूर जाने पर जोर की आंधी आ गई और नाव उलट गई। दोनों एक दूसरे से बिछुड़ गये। सेठ की लड़की बहते-बहते कुसुमनगर के बन्दर के किनारे लगी। यहां प्रहमेलक नाम का कोई तीर्थ स्थान था। वह वहां आई और मौन व्रत धारण करके तपस्विनी के भेष में रहने लगी।
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राजकुमार संघलसिंह बहता-बहाता हुआ रत्नपुर की राजधानी के किनारे लगा। वहां की राजकुमारी रत्नवती को सांप ने डस लिया था। बहुत सी औषधियां दी गई। बहुत से मंत्र-जंत्र वाले भी आये परन्तु सब निष्फल हुआ । संघलसिंह। को भी साँप के झाड़ने का मंत्र आता था। यह भी वहाँ पहुँचा। और झाड़-फूक करना आरम्भ किया । पाँच ही सात मिनट में। रत्नवती ने आँखें खोल दी। राजा प्रजा सभी प्रसन्न हुए। राजा रत्नप्रभा की यही अकेली सन्तान थी। उसने राजकुमार से विवाह करना चाहा किन्तु वह इन्कार करता रहा । अन्त में रत्नवत ने रो-रोकर कहा–‘जिस जान को तूने बचाया है, उसको क्यों मृत्यु के मुंह में डालता है ? राजकुमार से कुछ कहते-सुनते न बना । उसे विवाह करना ही पड़ा । विवाह के पश्चात् वह पृथ्वी पर सोता और स्त्री से अलग रहता। रत्नवती ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया–“मेरा प्रण था कि जब तक माता-पिता का दर्शन नहीं कर लेता था, पलंग पर नहीं सोता था। मैं अब तक उस प्रण का निर्वाह कर रहा हूँ ।” राजकुमारी प्रसन्न हुई–‘धन्य हैं वे मातायें जिनके गर्भ से ऐसे रत्न उत्पन्न होते हैं। जो सच्चा पुत्र है, वही सच्चा पति भी हो सकता है।” । कुछ दिन दोनों रत्नपुर में रहे। फिर अपने देश की याद
* ७४
शिव * आई । राजा ने दोनों को बिदा करने की तैयारी की। जहाज़ मँगाया और उस पर सवार कराकर अपने मन्त्री रुद्र के साथ इनको भेज दिया। | यह मंत्री रत्नवती पर मोहित था। उसने अँधेरी रात में राजकुमार को समुद्र में फेंक दिया और कच्चा चिट्ठा रत्नवती से कह सुनाया। वह रोने और विलाप करने लगी । रुद्र ने कहा–“तू क्यों घबराती है ? मैं अपने प्राण तक तुझ पर निछावर करने को तैयार हूँ ।” वह बोली–“तूने बुरा किया। क्या करू विवश हूँ। कर्म से लड़ाई लड़ी नहीं जाती और न भाग्य से हाथापाई की जाती है। अब मुझे इतना अवसर दे कि समुद्र के किनारे पति को श्रद्धांजलि अर्पण कर ले।” वह मान गया। संयोगवश वे कुसुमनगर के बन्दर पर उतरे। मंत्री शहर चला गया था । रत्नवती: वहाँ से जान बचा कर भागी और प्रेहमेलक तीर्थ पर पहुँच गई । वहाँ साधुनी के भेष में मौन व्रत धारण करके रहने लगी । धनवती पहले से यहाँ रहती थी। दोनों प्रेम से रहती थीं । परन्तु किसी ने न किसी से कोई बातचीत की ने एक दूसरे को अपनी कहानी सुनाई।
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| ( ५ ) अब संघलसिंह का हाल सुनिये :- “वह समुद्र में गिरा। और लहरों के थपेड़ा खाते-खाते मूर्च्छित हो गया और वह बहते-बहते एक साधु की झोंपड़ी के पास किनारे आ लगा । उस तपस्वी का नाम कुलपति था। वह प्रातःकाल समुद्र के किनारे नहाने आया । उसने उसको लाश समझा किन्तु ध्यानपूर्वक देखने से उसको पता लगा कि यह मरा नहीं है। वह अपना स्नान ध्यान भूल गया । उसे झोंपड़े में उठा लाया । उसकी एक लड़की रूपवती थी । इन दोनों ने मिलकर उसको
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……………….
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जैन वृतान्त कुछ दवा पिलाई। उसकी मूछ दूर होगई। यह उठकर साधु के पाँव पर पड़ा । साधु बोला-“बेटा ! तू साधारण मनुष्य नहीं जान पड़ती । तू महा तेजस्वी और प्रतापी है। सच बता तू कौन है ? अपनी सच्ची कहानी मुझे सुनादे ।” उसने सब कुछ कह सुनाया । साधु प्रसन्न हुआ और अपनी कन्या रूपवती को उसको सौंप दिया। उसी समय दोनों का गान्धर्व विवाह हो गया। परन्तु वहाँ भी वह उसी ब्रह्मचर्य के साथ रहने लगा । साधु को आश्चर्य हुआ । अन्त में साधु ने कहा “मेरे पास उड़न खटोला है। तू अपनी स्त्री के साथ इसमें बैठ कर संघलद्वीप चला जा । माता पिता दुखी होंगे। उन्हें जाकर सुखी कर और आनन्द से जीवन व्यतीत कर ।” राजकुमार ने यह बात मान ली और वह रूपवती के साथ उस पर बैठ कर अपने देश की ओर चल निकला । बातकी बात में कुसुमनगर के राज में पहुँचा। यहाँ कुसुमावती को प्यास ने सतायो । उसे नीचे उतर कर पानी की खोज में जाना पड़ा; परन्तु जंगल में
पानी कहाँ ? ढूढ़ते ढूंढते एक कुआँ मिला। उसमें से शब्द : सुनाई दिया-“है कोई जिनेश्वर का भक्त ! जो मुझे कु ये से
निकाले ?” इसने साहस करके उसे निकाला। वह यती था । २ उसने आशीर्वाद दिया और उससे उसका हाल पूछा। उसने
सब कुछ सुनाया। साधु ने कहा-“मैं तेरा क्या उपकार करू १ ले यह दवा खा ले, तेरा भला होगा।’ दवा खाते ही उसका रंग एक दम काला हो गया। जब राजकुमार यह देख कर घबराया, तो यती ने कहा -“घबरा नहीं, इसी में तेरी भलाई है । यदि तेरा रूप पहले जैसा होता तो तू नाना प्रकार की आपत्तियों में फँस जाता। मैं तेरी कथा पहले ही से सुन चुका हूँ। तू सबसे अपना हाल मत कहना। यहाँ तेरा एक बलवान शत्रु है । यदि तू अपने पहले रूप में होता तो जान से
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”
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शिव मार डाला जाता। अब प्राणों को भय नहीं रहा। जा, मैं तेरी सम्हाल करता रहूँगा। जो होगा अच्छा होगा ।” | यह कह कर साधु चला गया। यह पानी लेकर रूपवती के पास गया। रूपवती ने पानी पीकर पूछा–“मेरा पति कहाँ गया ?” यह बोला, “मैं ही तेरा पति हूँ; परन्तु उसे विश्वास नहीं हुआ। यह उससे डर कर जान बचाकर भागी और प्रेहमे लक तीर्थ में पहुँच कर. पहिली दो स्त्रियों की तरह मौन व्रत धारण करके रहने लगी । यह विचारा इधर उधर घूमने फिरने लगा।
बेचारा राजकुमार भी घूमता-फिरता उसी तीर्थ स्थान पर पहुँचा । वसंत पंचमी का दिन था । लाखों की भीड़ थी । सब लोग तीर्थ में जिनेश्वर का दर्शन करने आये थे । यह मंदिर में गया । वहाँ इन तीनों साधुनी स्त्रियों को देखा और पहिचान लिया। आखें डबडबा आई’; परंतु चुप-चाप मंदिर से बाहर निकल आया। कुसुमनगर का राजा भी दर्शन के लिये आया हुआ था । उसने जब इन मौन व्रतधारी स्त्रियों को देखा चकित हो गया। बात करनी चाही; किन्तु वे कब बोलने वाली थीं।
| राजा को कुछ न सूझी । उसने हुक्म दिया, जो कोई इन तीनों स्त्रियों को बोला देगा, मैं राजकुमारी कुसुमावती का विवाह उसके साथ कर दूंगा। कई लोग आये, बहुत सर मारा मगर सुफल नहीं हुये । अन्त में एक काले-कलूटे मनुष्य ने साहस किया और राजा से कहने लगा-“मैं इनका मौन व्रत तोड़ दूंगा।” राजा ने कहा-“बहुत अच्छा ! तुम इन्हें बोला दो तो मैं अपनी कन्या तुम्हें अवश्य देंगा।” यह बोला-“बोलने को तो मैं बोला हूँगा परन्तु मैं विवाह करना नहीं चाहता। सब लोग ठट के ठट इसके चारों ओर खड़े हो गये । वह इस प्रकार
* जैन वृतान्त
कहने लगा।
एक राजा संधलेश्वर नामी बड़ा ही तेजस्वी व प्रतापी थी। | उसके एक ही पुत्र था जो माता-पिता का लाड़ला व प्रजा का प्यारा था । एक दिन वह जंगल में शिकार खेलने गया । वहाँ एक महा सुन्दरी लड़की कांटों में बुरी तरह से उलझी हुई थी । उसको कांटों से निकाला । लड़की उस पर मोहित हो गई। दोनों का विवाह हो गया । किसी कारण राजा से अन-देन हो गई। दोनों नाव पर सवार होकर विदेश यात्रा के लिये निकले।
आंधी आई, नाव पलट गई दोनों पानी में गिर पड़े किन्तु दोनों बच गये। स्त्री मन्दिर में मौन व्रत धारण करके रहने लगी।
इतना कहकर वह चुप हो गया । पहली स्त्री धनवती रोती हुई बोली-‘फिर राजकुमार की क्या दशा हुई ?
| वह फिर कहने लगाः
राजकुमार बहता हुआ रत्ननगर पहुँचा। वहां की राजकुमारी रत्नवती को सांप ने काट लिया था। राजकुमार ने झाड़फूक करके अच्छा किया । पिर क्या थी ! वह राजकुमार से विवाह करने के लिये प्रार्थना करने लगी । समय देख कर उसने विवाह तो कर लिया परन्तु ब्रह्मचर्य के साथ रहता था। जब राजा को पता लगा कि जब तक वह माता-पिता का दर्शन न कर लेगा, पलंग पर कभी न सोवेगी उसने अपने मन्त्री रुद्र के साथ दोनों को जहाज़ पर बिठा कर घर जाने की आज्ञा दी । रूद्र कपटो था। उसने सोते हुये राजकुमार को समुद्र में गिरा दिया । | इतना कहते-कहते उसने फिर चुपकी साधली । रत्नवती। चिल्ला उठी-“हाय ! मेरा प्यारा पति ! क्या वे सचमुच डूब गये ? ऐ देवता ! कुछ और हाल सुना। मैं तुझे सच्चे हृदय से
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शिव आशीर्वाद देती हूं । यदि वह मर गये तो मैं स्वर्ग लोक में अभी जाकर उनके दर्शन करूगी । बस मेरा जीवन तेरे ही हाथ में है।”
उसने अपनी कथा फिर प्रारम्भ कीः| राजकुमारी कुसुमनगर के मन्दिर में आकर तपस्विनी के भेष में रहने लगी। राजकुमार को लहरों ने किनारे डाल दिया। वह निर्जीव सा पड़ा हुआ था । एक साधु उसे अपने झोंपड़े में ले गया और दवा दारू कर के अच्छा किया। साधू ने उससे सब हाल पूछ कर अपनी पत्री का विवाह उसके साथ . कर दिया और उड़न खटोला पर बैठ कर देश जाने की आज्ञा दी । स्त्री को प्यास ने सताया । वह पानी के लिये नीचे उतरा ।। पानी की खोज में एक कुये पर पहुंचा। वहाँ पर एक यती मिला । उसने इस को दवा खिलाई जिससे उसका रंग काला पड़ गया। इस तरह वह अपना रंग रूप खो कर पानी लाया । रानी ने पानी पी लिया परन्तु इससे डर कर भाग छूटी और अन्त में साधुनी बन कर मन्दिर में रहने लगी ।।
इतना सुनकर के रूपवती रोने लगीहाय ! हाय !! मैंने बुरा किया । मैंने अपने पति को नहीं पहिचाना। मैं दिन रात उसके बिना तड़पा करती हूं।
तीनों स्त्रियां बोल उठी थीं । राजा की लड़की कुसुमावती हाथ में जयमाल लिये हुये आई और उसके गले में डाल दिया, और कहा-“ऐ भद्र पुरुष ! मैं यद्यपि तुझे जानती नहीं परन्तु अपने पिता के प्रण के अनुसार तेरी दासी हो चुकी । तू मेरा पति और देवता है तेरी सेवा ही में मेरा परम कल्याण है।” । सब के सब आश्चर्यजनक घटना को देखते रहे। किसी। की समझ में कोई बात नहीं आई। एक ओर “जय ! जय !!
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जैन बृतान्त का शब्द सुनाई दिया-जिनेश्वर की जय ! जिन धर्म की जय !! तीर्थकर की जय !!! कहता हुआ एक साधु आ पहुँचा— “संघलसिंह ! ले यह दवा खा ले तुझ को अपना रंग रूप फिर मिल जायगी। उसने दवा खाली और पहिले जैसा रूप हो गया। देखने वाले चकित ! सब बिछुड़े हुये मिले । एक दूसरे से मिलकर आनंद में मग्न हो गये।
| रूद्र पकड़ गया.। संघलसिंह ने उसे छुड़ा दिया और चारों रानियों को लेकर संघल द्वीप में आया। माता-पिता ने खोया हुआ धन पाया और सारे नगर में नौबत बजने लगी।
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शिव * © शब्द »
-( १ )जन्म अनमोल नसाय रहोरी । उत्तम करनी उत्तम रहनी, उत्तम कथनी भुलाय रहोरी।। सुमिरन ध्यान भजन नहिं कीन्हा, भूल भरम अटकाय रहोरी ।। चित्त मलीन है हिय व्याकुल, रात दिवस पश्चाताप रहोरी।।
जड़ चेतन की गाँठ न खोली, उरझ-उरझ उरझाय रहोरी ।। कर्म फाँस यम काल कठिन अति, छिनछिन अधिक फँसाय रहोरी। साज-साज कुसंग कुबुद्धि, मन को इन से लगाय रहोरी ।। । काल कराल व्याल इन्द्रन को, गल में हार पहिनाय रहोरी । । साधू संग तज-तज सत-संगत, माया में लटकाय रहोरी ।। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम्हरे द्वारे आय रहोरी।
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-( २ )– . पढ़ा लिखा सोचा और समझा, कुछ भी हाथ न आया । सन्त ने आपहि परगट होकर, निज स्वरूप दिखलाया ।। मन बानी की गम नहिं जिसमें, क्या कोई भेद बताये ।। ऋषि मुनि पण्डित ज्ञानी ध्यानी, केहि विधि तेहि समझाये ।। सत नहीं है असत से न्यारा, दरसे वह तो अगम अपारा।। सार असार दोऊ से ऊँचा, क्या कोई बरने पारा ।।। तुरिया तुरिया-तीत नहीं, वह वार पार से आगे। यह तो मरम कोई गुर मुख पावे, गुरु चरणन जब लागे ।। जब कोई पारख मिले विवेकी, नाम रतन अधिकारी ।। हीरा खोल दिखाऊँ उसको, राधास्वामी के बलिहारी ।।
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