अनमोल विचार
प्रथम तरङ्ग
प्रार्थना |
मैं तुम से क्या माँगू ! तुम्हारे पास है क्या ! तुम सब दे दिलाकर खाली हाथ दिखलाई देते हो । कहते हैं तुम सब कुछ हो और कुछ भी नहीं । तुम मन और बुद्धि की पहुँच से बहुत दूर हो । फिर मैं माँगू भी तो कैसे माँगू ? और क्या माँगू ? मुक्त और स्वतन्त्र से उसकी मुक्ति और स्वतन्त्रता माँगना अच्छा नहीं । धनवान से उसके धन के लेने की इच्छा रखना व्यर्थ ही है। इसके सिवा जब मैं विचार करता हूँ तुम में धन, द्रव्य, बल, और शक्ति कुछ नहीं पाता। तुमने लक्ष्मी विष्णु को दे दी । लक्ष्मी विष्णु की अद्धांगिनी है। मैं कैसे कहूँ कि तुम मुझको लक्ष्मी दो ! मैं विष्णु के साथ युद्ध करना नहीं चाहता । तुमने शक्ति और बल शिव भगवान को दे दिया है। शक्ति उनकी स्त्री है। मैं कैसे कहूँ कि मुझको शक्ति दो ! यह बहुत बड़ी ढिठाई और असभ्यता होगी । मैं कैसे कहूँ कि तुम मुझे को विद्या और बुद्धि दो ! विद्या और बुद्धि का नाम गायत्री और सावित्री है । यह ब्रह्मा की स्त्रियाँ हैं। ब्रह्मा यों ही चार मुंह की आंठों आँखों से चारों ओर देखते रहते हैं। उन को क्रोध दिलाना मूर्खता है। और फिर वह बड़े बूढ़ भी ठहरे । इसका भी तो ध्यान रखना ही पड़ता है। मैंने बहुत अच्छी तरह से सोच लिया तुम कि सब कुछ औरों को दे दिलाकर आप सबसे अलग थलग हो गये हो। तुम्हारे पास कुछ नहीं है इसलिये तुम से माँगना भी अनसमझी की बात है । ढिठाई और अपराध क्षमा करो। मैं कुछ नहीं माँगता और न माँगने के अभिप्राय से तुम्हारे.पास आया हूँ । हाँ, यदि तुम यह समझते हो कि मेरे पास कुछ है तो वह लै लो। यह सब तुम पर न्योछावर हैं। मैं स्वयं तुम पर न्योछावर होता हूँ। मेरी निर्धनता, मेरी बेबसी, मेरी मूर्खता और दीनता यदि तुम्हारी दृष्टि में कुछ भी मूल्य रखती हूँ तो इन्हें मैं प्रसन्नता से तुम्हारे पवित्र चरणों में अर्पण करता हूँ। इनको स्वीकार करो। मेरे मन के भावों को, पुरुषार्थ और उत्साह को, मेरे देखने, सुनने, बोलने और समझने बूझने की शक्तियों को और इनके सिंबा और भी जो कुछ है वह लेकर अपना बना लो ।। मुझको इनकी आवश्यकता नहीं है । यदि यह तुम्हारे अपर्पण
और समर्पण हो जायें तो मैं अपने आपको बड़ा ही भाग्यवान समझेगा। धन, द्रव्य, बल शक्ति, विद्या बुद्धि यह मेरे पास नहीं हैं परन्तु यदि इनके लिये कुछ भी इच्छा मन में हो तो वह भी तुम ही ले लो । सुझको इनकी भी आवश्यकता नहीं है।
लोग कहते हैं तुम सत्, हो,चित् ही, आनन्द हो, शुद्ध हो, मुक्त हो, बुद्ध हो । इन सारे गुणों को भी अपने पास रक्खो । शुद्धती मुक्तपना, बुद्धपना, इनमें से भी मुझको किसी की इच्छा नहीं है । जो तुम्हारा है वह तुम्हारे ही पास रहे और यदि मैं भी तुम्हारा ही हूँ तो जानते ही हो कि जो जिसका है वह उससे दूर कब रह सकता है। इसलिये मैं नहीं समझता कि
शिव के तुम से माँगू भी तो क्या माँगू ! परन्तु न माँगना भी ढिठाई । और अनुचित है। इन बातों को विचार कर मैं तुम से माँगता हूँ :-
भिक्षा .. .. . . हम आये! आये !! आये !! : आज तुम्हारे द्वार पर‘ प्रभु भिक्षा माँगन आये (टेक) क्या माँगू कुछ थिर न रहाई । सुत दारा धन अगमा पाई ॥ इनसे रहुँ नित चित्त हटाई । माँगत मन अति रहत लजाई।। * : यह हृदय, नहिं भाये ॥१॥ रूप अनूप तुम्हारा देखा । मिट गया काल कर्म का लेखा ।। सब का सब बिधि किया परेखा । प्रेम प्रीत का यही बिसेखो।
| नयनों जल भर लाये ।।२।। माँगन गये, सो लौटे, नाहीं । भर्म रहे माया परछाई ।। मन में पड़ गई काल की झाई । बिनती सुनो हमारी साई ॥
इम तो रहे सकुचाये ॥३॥ जिह्वा थकित थकित मन काया। दर्शन पायजिया ललचाया ॥ पद सरोज की दीजे छाया । व्यापे काम क्रोध नहिं माया ।।
निस दिन रहें लौ लाये ॥४॥ हित चित. से रहूं अज्ञाकारी। निख सिख उर में बसो हमारी ।। तुम हो दीनबन्धु हितकारी। राधास्वामी चरन शरन बलिहारी ।।
– लो अब अंग लगाये ।।५।।
दूसरी तरंग
(१) म ख किसी गाँव में एक सीधा साधा आदमी रहता था। सब उसको नादान और भोला भाला समझते थे और उसका नाम मूर्ख
* अनमोल विचार के, रख छोड़ा था। चाहे वह कुछ ही क्यों न कहा जाता परन्तु वह सदैव प्रसन्न चित्त रहता था। उसके रूप से शान्ति बरसती । थी। वह हवा के पक्षियों और पानी की मछलियों की तरह इधर से उधर फुदकता रहता था । संसार के दुख अऔर चिन्ता की उसे हवा भी नहीं लगती थी। और लोंग दुखी थे । उनको चिन्ता और बेचैनी रहती थी । न दिन को चैन, न रात को नींद ! जिसको देखिये वही सुबह से शाम तक अपने भाग्य के दुखड़े ही सुनाया करता था। यह सब के सब उस मूर्ख को न केवल
कोसा करते किन्तु बहुत ही अपमान की दृष्टि से देखा करते थे। : उनकी समझ में वह मूढ़ और विचार हीन था। मुर्ख में सचमुच इन जैसे आदमियों की सोच समझ की योग्यता कहाँ थी । वह तो यह भी नहीं जानता था कि दुख बेचैनी किस जानवर का नाम है !
किसी को क्या पता था कि यह क्यों इस तरह का मूर्ख बना हुआ है और जीवन की किस घटना ने उसकी यह दशा बना रक्खी है। वह लोगों में ‘मूर्ख‘ के नाम से प्रसिद्ध था। मूर्ख होने से न किसी को उसकी परवाह थी और न कोई उससे मिलता था। हाँ, इतना सब जानते थे कि वह दिल का नेक
और भोला भाला था और किसी को किसी प्रकार दुख नहीं पहुंचाता था। वह रात दिन गाँव में इधर उधर फिरा करता था । जी में आता तो गाय और भैसों से पागलों की तरह बात चीत करता था। उसके साथी पशु और पक्षी थे। लड़के
भी उससे बहुत ही हिले मिले थे। वह उससे अभय होकर, मिलते जुलते थे और उसकी भोली भाली बातें सुनकर खूब हँसते थे। मूर्ख में एक बात विचित्र थी। जब वह किसी बुद्धिमान या विद्वान मनुष्य को देखता तो उँगलियों को नचाता और आँखें दिखाता हुआ इस तरह उनसे दूर भागता
शिव था जैसे आदमी कीड़े मकोड़े और साँप कनखजुरों की छाया से बचना चाहते हैं। एक दो बार लोगों ने उसको कहते हुये सुना था ”आह ! मैं तुमको जानता हूँ। मैं तुम्हारे रग रंग को पहिचानता हूं। तुमको वाद विवाद और शास्त्रार्थ से काम रहता है। तुम बाल की खाल निकालते और हिन्दी की चिन्दी करते रहते हो। मैं मूर्ख हूँ। मुझको इनसे क्या काम है ? मैं तुम्हारी छाया से दूर भागता हूँ।” वह यही कहता हुआ और जोर से हँसता हुआ यह जा वह जा नौ दो ग्यारह हो जाता था। उनकी ओर कभी ध्यान भी नहीं देता था और इन बुद्धिमानों को भी क्या पड़ी थी जो एक मूर्ख को छेड़कर दर्द सर . मोल लेते ।।
। (२) फिलास्फर . एक दिन उस गाँव में एक आदमी आया जो बहुत दूर दूर का सफर करके वहाँ पहुँचा था। सर्व साधारण यही जानते थे कि यह सचाई का खोजी और फिलोसफी का प्रेमी है । बहुत दिनों से वह इसी खोज में मारा मारा फिरता रहा। रात दिन इसी उधेड़ बुन में लगा रहता था परन्तु सच्चाई नहीं मिली। वह अब तक कोरे का कोरा ही रहा। यह सचाई क्या है ? यह ऐसी सुन्दरी के सदृश है जो अपने प्रेमियों को नाच नचाती रहती है और फिर भी उनके हाथ नहीं आती । उसकी झलक दिखाई पड़ी और प्रेमी ने समझ लिया कि अब कहाँ जाती है, परन्तु नहीं वह तो बिजली को कौंधा थी जो चमक दमक दिखाकर देखते देखते आँखों से ओझल होगई । यही इस मुसाफिर फिलास्फर का हाल था। इसने उसकी खोज में घर बार छोड़ा, सुख चैन से मुंह मोड़ा, नाना प्रकार के दुख और कष्ट उठाये, धर्म कर्म को उसके लिये न्योछावर कर दिया परन्तु हाथ क्या आया है
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* अनमोल विचार के कुछ भी नहीं ! * असलियत सचमुच दिल लुभाने वाली सुन्दरी है। यह दिलों को छीन कर बेदिल बना देती है। फिलास्फर ने कहीं सुना था कि सचाई का दर्शन किसी को प्राप्त होगया है और सम्भव है उसकी संगत से दूसरे भी उसे देख सकें। फिर क्या था यह गिरते पड़ते वहां जा पहुँचा। आशा मनुष्य को नई नई शक्तियाँ देकर उसके उत्साह को बढ़ाती है । जाने को तो यह बेचारा गया परन्तु सचाई का कहीं भी पता ने लगा।
| पूछा गछा “भाई ! असलियत कहाँ है ?” किसी ने कहा फ्रान्स विद्या का भण्डार है वहाँ जाकर पता लगाओ।” यह वहाँ भी गया परन्तु सुनता क्या है कि फ्रान्सीसियों ने अपनी विद्या के घमण्ड में असलियत के साथ ढिठाई का सलूक किया। उसके अस्तित्त्व (होने) से इनकार कर गये और वह पर झाड़ कर वहाँ से उड़ गई । फ्राँसीसी कहते हैं कि वह
और वस्तुओं की तरह पृथ्वी के परमाणुओं से पैदा होती है । यह बात सच्चाई को बुरी लगी और वह वहाँ से नौ दो ग्यारह होगई । तब यह फ़िलाफर जरमनी में आया । जरमन उसकी तका बोटी करने का विचार कर रहे थे इसलिये सच्चाई ने वहां से भी अपना डेरा डंडा उखेड़ लिया। तब यह दुख का मारा हुआ इंग्लैंड में आया और यूनीवर्सिटियों के कालिज के दरवाजे खटखटाने लगा। जब अँग्रेजों ने सुना कि वह सचाई की खोज में मारा मारा फिर रहा हैं तो उसकी हँसी उड़ाने लगे“वाह ! अन्धे को अँधेरे में बहुत दूर की सूझी ! कैसी सचाई ! मनुष्य जीवन ही सब कुछ है। खाओ, पियो, चैने उड़ाओ। साईन्स का बोल वाला है। केवल साइन्स ही मनुष्य जीवन को सुखी बनाने का आधार है। कैसी सच्चाई !
फिलास्फर को उनके रहन सहन । बार्तालाप और व्यवहार से
शिव । घृणा पैदा हुई । जी में तो आया कि इस विचार को छोड़ दे परन्तु उसी समय दिल ने कहा “हारिये न हिम्मत बिसारिये न हर नाम ।“
दोहा “जिन ढूढा तिन पाइयां, गहिरे पानी पैठ ।
मैं बौरी खोजन गई, रही किनारे बैठ । दिल की आवाज को कौन चुप कर सकता है ! किस में यह शक्ति है ! वह इंग्लैंड से भागा तो उसी गाँव में आकर दम लिया जहाँ यह प्रसिद्ध मूर्ख रहता था। ..
(३) फिलास्फर और मूर्ख का मिलाप | गांव में सचाई कैसी ! यहां सचाई का नाम कहाँ ! जब फ्राँन्स, जरमनी और इंग्लैंड ऐसे सभ्य देशों में उसका पता नहीं है तो गाँव में उसका दर्शन कैसे मिल सकता है ! यही सब बातें सोचकर वह फिलास्फर गांव से भी किसी । दूसरी जगह जाना चाहता था। चलते फिरते एक पहाड़ी ‘टीले के पास जा निकला । दिन डूबना ही चाहता था।
आवाज़ आई ‘राह में भूले भटकों पर मालिक दया करे ! तुम सर नीचा किये हुये किधर जोरहे हो ? सर क्यों नहीं उठाते ? सूरज के प्रकाश और चमक दमक को क्यों नहीं देखते ? वह देखो ! पहाड़ की आड़ में सूरज किस आन वान से डूबता हुआ चला जा रहा है ! यह दृश्य देखने ही के योग्य है। | फिलास्फर ने सर ऊँचा किया। ऊँचे चट्टोन पर एक विचित्र मनुष्य बैठा हुआ दिखलाई दिया । शान्ति के साथ पाँव पर पांव धरे हुये वही मूर्ख बैठी हुआ मुस्करा रहा ; था उसेकी मुरवराहट से भी सादगी टपकती थी।
अनमोल विचार के फिलॉस्फर–“हाय ! पता नहीं मैं किधर जा रहा हूँ !”
म खे–“क्यों ! तुम गांव को जा रहे हो जो इस पहाड़ी के पीछे है ।
फिलास्फर–“किस अभिप्राय से ?” ।
मुं–‘‘सोने के लिये । सोने से बढ़कर और क्या सुख होगा ! तुम उतावले जान पड़ते हो। इस जल्दी से काम ही क्या निकलता है ? बड़े अश्चर्य की बात है कि लोग बिना समझे बूझे जल्दी जल्दी पांव उठाते हुये चले जा रहे हैं परन्तु उनको पता नहीं है कि वह कहाँ और किस लिये = जा रहे हैं!“
मूर्ख ने तो बात बात में फिलास्फर के सोचने के लिये एक बारीक बात कह दी थी परन्तु बारीक बातों को समझता कौन है ! कोई ऐसा ही विवेकी पुरुष मिल जाये तो सैन बैन को समझ। यह हर बुद्धिमान का काम नहीं है। यही कारण है कि बोलने वाले चुप और सच्चे बुद्धिमान मूर्ख बन रहते हैं। मूर्ख ने पूछा क्या तुम यहाँ नहीं सो सकते ?”
| फिलास्फर को क्रोध आया। वह कहने वाला हीं था कि ‘‘तुझ को मेरी क्या पड़ी है ! तू अपना काम कर“, परन्तु मूर्ख की सादगी देखकर उसका क्रोध जाता रहा और वह नर्म दिल बन गया, उसने जवाब दिया “दूर से आया हूँ और दूर
ही जाना है ।“
मूर्ख–‘‘कुछ सुनँ तो सही कि किधर जाने का विचार है। फिलास्फ़र घबराया । उसने आँखें खोलकर मूर्ख को सर से पाँव तक देखा—‘‘यह कौन है जो मुझसे प्रश्न करता चला जा रहा है ! आज कल की सभ्यता के अनुसार किसी अनजान
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शिव के । आदमी से ऐसी बातें पूछना मा अनुचित उन का जाता है। ‘मान न मान मैं तेरा मिहमान‘ ऐसी छेड़ छाड़ अच्छी नहीं होती परन्तु इसकी बातों में आँवारपन नहीं है। यह बच्चे की तरह सीधा सादा और भोला भाला है। इसके प्रश्न में सचाई है। फिर क्यों न मैं इससे अपना हाल साफ साफ कह दें ! आज तक किसी पढ़े लिखे आदमी से मेरा काम नहीं निकला। सम्भव है यह मेरी गुत्थी को सुलझा सके। इसके साथ बात चीत करने में हजे, ही क्या है ?” फ्रिलास्फर यह सब बातें सोच कर मुखं से कहने लगा “भाई ! मैं तुम से क्या कहूं । मैं ‘सचाई की खोज में सालों से चक्कर लगा रहा हूँ ।”
मूर्ख– जोर से हँसा । उसकी हँसी की आवाज उस पहाड़ी में गूंज उठी । वह हँसते हँसते लोट पोट होगया परन्तु थोड़ी ही देर में सँभल कर बैठा–“तुम यह तो बताओ कि तुम सचाई को जानते भी हो या यों ही उसकी खोज में लगे हुए हो ? सम्भव है कि तुम यों ही बिना जाने बूझे और पहिचाने हुये सचाई को ढूढ़ रहे हो और वह तुम्हारे पास ही हो और तुम उससे आप ही दूर निकल जाते हो । भाई मुझको तो सन्देह है। यदि तुम्हें कुछ भी सचाई की पहिचान होती तो इतनी दूर भटकते हुये क्यों निकल आते ! और क्यों इतना दुख उठाते ! मुझे तुम्हारी खोंज में भी सन्देह है।”
मूख–यह कह कर चुप हो रहा और फिलोस्फर को गहरी नजर से देखने लगा। ऐसा जान पड़ता था मानो उसकी आँखें दिल के परदों में घुस कर उसके सच्चे भाव का तमाशा देख रही हैं। फ़िलाफर चुपचाप हुक्का बक्का खड़ा है। कहै भी तो क्या कहे ! देखो मूर्ख ने कैसा सवाल किया जिसके जबाब देने की योग्यता इतने बड़े विद्वान फिलास्फर
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* अनमोल विचार के में भी नहीं थी।
(४) सचाई को पता । म खे ने नाक सिकोड़ी, हाथों को फैलाया, अँगड़ाई ली और उठ खड़ा हुआ । “वाह वाह ! सन्ध्या का समय भी कैसा सुहाना है ! ठंडी ठंडी हवा बह रही है। फूलों की बास की लपटें आ रही हैं। मेरे प्यारे मित्र ! तुम कहाँ सचाई की खोज में मारे मारे फिर रहे हों ! सचाई कुछ शैतान की जायदाद तो नहीं है जो वह उसको छुपा रखता ? इधर देखो ! सचाई यहाँ है। सचाई वहां है। सचाई ऊपर है। सचाई नीचे है । सचाई हमारे सामने है।”
फिलोस्फर–“जो तुम कहते हो सच ही है परन्तु बड़े शोक की बात है कि फिर भी सचाई को पाना मुझे महा कठिन जान पड़ता है। उदाहरण के लिये मुझ ही को न देखो। मैं कितने दिनों से उसकी खोज में मारा मारा फिरता। हूँ परन्तु जहाँ देखता हूँ द्वन्द ही द्वन्द दिखाई देता है।”
म –“तब फिर तुम उसकी खोज क्यों करते हो ?’ फिलोस्फर की तिउरी बदल गई । “फिर क्या किया। जाता ! तुम्हारी बातों से तो ऐसा जान पड़ता है जैसे तुमने सचाई को पा लिया है ! बातें तो इसी तरह की करते हो । क्या तुमको यह सचाई मिल गई है ?”
म –मुसकराया, “हांजी ! तुम्हारा विचार ठीक है। मैंने सचाई को देख लिया, सुन लिया, परख लिया और पा लिया है। जिस दिन से मुझको सचाई मिल गई है उस दिन से फिर मैं मनुष्य नहीं रहा । मनुष्य है क्या ? मनुष्यत्व का चिन्ह क्या है ? सदा ही लालची बना रहना, सन्तोष का न आना, यही
शिव मनुष्य का गुण है। मुझसे यह बात सदैव के लिये जाती रही । पाँव के नीचे खजाना है। आदमी पांव उठाये हुये भागा जा रहा है। उसकी दृष्टि खजाने पर नहीं पड़ती। वह भूल भ्रम, सोच विचार और व्यर्थ बातों में बुरी तरह फँसा रहता है। यह मनुष्य अज्ञानी और मूर्ख है। मेरी बातों को सुनकर तुम आश्चर्य करते होगे। ऐसे ही लोगों ने मेरा नाम म खं रख छोड़ा है। मैं इसी नाम से गांव में प्रसिद्ध हूँ । मैं भी पहिले मनुष्य था। मैंने तरह तरह के दुख उठाये। बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना किया। मैंने बहुत कुछ सोचा विचारा और फिर इसी सचाई के अथाह सागर में डुबकी लगाकर उसी का हो रहा::“:”””” । म र्ख आनन्द में मग्न था । उसकी अांखें मस्ती से चमकने लगीं। उसके ललाट पर एक विचित्र झलक थी। फिलोस्फद ने अपनी खुली आंखों से देखा और मूर्ति की तरह टकटकी बाँध कर ताकता रह गया।
। दोहा
गुरु का निरखं आँख और माथा ।।
सत् का नूर रहै जिस साथा ।।। फिलोस्फर चुप है। वह कहता भी तो क्या कहता ! एक मूर्ख को सचाई के जानने का अभिमान है। जिस तक मन और बुद्धि की पहुँच नहीं है वह उसको अपने हाथ की वस्तु बतलाता है ! अन्धेर है या नहीं !”
| (५) सचाई की असलियत मूर्ख दो चार मिनिट तक चुप रहा । फिर बोल उठा। “आज बहुत दिनों के पीछे मैंने आदमी से बातचीत की है।
।
अनमोल विचार । कितना समय हुआ यह मुझको याद नहीं है क्योंकि मैं समय का हिसाब घंटे, दिन, सप्ताह,महीने या साल से नहीं करता। तुम सैकड़ों साल का हिसाब लगाते रहते हो ! भाई ! अपने सर की टोपी उतार कर नीचे रख लो। इससे तुम्हारे दिमाग पर बोझ है। क्या तुम नहीं जानते सभ्यता और सचाई से बैर है। मनुष्य का रहन सहन सचाई के जानने और उसके प्राप्त करने में बाधक है । तुम घरों में घिरे रहते हो कपड़ों के रस्सों से बँधे हुये हो। ऐसी दशा में कैसे सम्भव है कि तुम सचाई तक पहुँचो या सचाई तुम तक पहुँचे। तुम प्रकृति से जो वास्तव में सचाई है दूर भाग रहे हो। सचाई शारीरक जगत् से दूर और अलग कब है ! तुमने आप अपने भ्रम और अज्ञान से बीच में परदा डाल दिया है। तुम्हारे विचारों की गुत्थियाँ फाँसी और सूली से कम नहीं हैं। इनमें तुमने अपनी गरदन दे रक्खी है। यही कारण है कि आँखों के सामने अँधेरा है। आँखें पथराई हुई हैं। सर में चक्कर है। मन डाँवाँडोल होकर द्वचिताई में पड़ा हुआ है । भ्रम, भ्रान्ति और बुरे विचारों को मन से दूर करो । फिर सम्भव है सचाई तुम्हें आप दर्शन दें। जब तक यह दशा है तब तक तुम कैसे आशा कर सकते हो कि सचाई तुमको मिलेगी ! या यह या वह ! दोनों एक साथ नहीं रह सकतीं ।”
दोहा जहाँ काम तहाँ नाम नहि, जहाँ नाम नहिं काम ।। दोनों कबहूँ ना मिलें, रवि रजनी इक ठाम ।।
(परम संत कबीर साहिब) “शान्त हो जाओ। भूमण्डल के इस सिरे से उस सिरे तक का चक्कर लगाना छोड़ दो। तुम तो मजबूत चमड़े का बूट
शिव के पहिन कर सचाई का शिकार करना चाहते हो । उसका पीछा । करके अपना समय नष्ट कर रहे हो । मूर्ख ! वह तुमसे दूर नहीं भोगती । तुम आप ही उससे भागे भागे फिर रहे हो । यदि तुम चाहते हो कि सचाई अपनी जुबान खोले तो तुम पहिले अपनी जुवान को बन्द करो । यदि तुम चाहते हो कि सचाई की धुन कानों को सुनाई दे तो फिर भ्रम के राग का सुनना बन्द करो। यदि तुम्हारी इच्छा है कि सचाई का दर्शन मिले तो फिर आँखों को भ्रम और भ्रान्ति के दृश्य से
हटा लो‘:•• }
दोहा तीन बन्द लगाय कर, सुन अनहद टंकोर । नानक सुन्न समाध में, नहीं साँझ नहिं भोर ।। (गुरु नानक)
“मनुष्य अहङ्कारी है–विद्या का अहङ्कार, बुद्धि का अहङ्कार, जाति कुल और धर्म का अहङ्कार। मुझको देखो। मेरे रहने के लिये, जमीन का फर्श और आसमान की छत है। मैं न कुछ पढ़ता हूँ न लिखता हूँ । आकाशवाणी सुनता रहता हूँ। प्रकृति बक बक नहीं करती, न उसमें शास्त्रार्थ की आदत है। वह सादी है और चुप रहना पसन्द करती है। मैं प्रकृति हूँ। मैं साक्षात प्रकृति हूं । दुनियाँ मुभको मूर्ख कहती है। प्रकृति या प्रकृति की सच्ची तसवीर को जो मूर्ख कहेगा वह सिवाय मूर्ख बनने के और क्या बनेगा ! प्रकृति को अन्धी कहने वाले आप अन्धे हैं। प्रकृति को जो लोग अनसमझ और धोका देने वाली कहते हैं वह स्वयं मूढ़ हैं और वैसा ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं।“
दोहा कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय । आप ठगे सुख ऊपजे, और ठगे दुख होय ॥
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अनमोल विचार के “अब तुम सोचो ! आदमी क्या करता है ! वह औरों को धोका देता है । दुसरे का देश धन मान छीनता है। औरों को स्वार्थ साधन के लिये हानि पहुंचाता रहता है। फिर क्यों न । वह आप भ्रम में रहे ! क्यों ने उसे दुख उठाना पड़े! और फिर वह क्यों न मौत के पंजे में फंसे ! इसी को लोग आज कल सभ्यता समझ रहे हैं। यह तुम्हारे पढ़ने लिखने का फल है। इस पर भी तुम्हारी यह इच्छा है कि सचाई मिल जाये ! जो जैसा करता है वैसा पाता है ! जैसा कहता है वैसा सुनता है ! जैसा सोचता है वैसा होता है ! मन बुद्धि और हाथों को पहिले पवित्र करलो, पीछे सचाई की मूर्ति का दर्शन करो । वह बराबर आंखों के सामने है।”
दोहा । जिन पावों भुई’ बहु फिरे, घूमे देस बिदेस ।। पिया मिलन जब होइया, आँगन भया बिदेस ।।‘
( परमसंत कबीर साहिब ) मूर्ख दो चार मिनट के लिये चुप हो गया। फिलोस्फर की दशा कुछ न पूछि ये। वह विचार सागर में गोते खाने लगा ।।
(६) सचाई का दर्शन । । म ख ने कहा–“धन्य है मनुष्य की बुद्धि ! गुलाब की पंखड़ियों को नोंच कर उससे शकुन (शगुन) विचारे जाते हैं। पढ़े लिखे विद्वान और फिलोस्फर भी मनुष्य के विश्वास के. साथ यही सलूक करते हैं। सबको तोड़–मरोड़ कर रख देते हैं और उनके मुर्दो का अपने घरों और पुस्तकालयों में ढेर लगा देते हैं। यही आज कल की सभ्यता का आदर्श है कि
शिव । धार्मिक पुरुषों और आचार्यों को गालियाँ सुनाते फिरें, हर एक धर्म और पन्थ को बुरा भला कहते हैं । यह मनुष्य हैं। या हत्यारे हैं ! इनके दिल में सचाई कैसे बस सकती है ! वहाँ तो बुरी भावनायें, बुरे विचार और सैकड़ों वर्ष की सड़ी हुई लाशों की दुर्गन्ध भरी रहती है। पुस्तकालयों में इन मुर्दो की ठटरियों के सिवा और क्या है ? तुम सच्चे और खिले हुए गुलाब से काम नहीं लेते, कागज की तसवीर के गुलाब से कमरे सजाते हो । जीवित महान पुरुषों की इज्जत नहीं करते, मुर्दो की कब्रों से सर टकराते रहते हो ! जीती जागती किताब तो कभी पढ़ते नहीं, न हाथ ही लगाते हो। जब देखो मर्दो की किताब और मुर्दा किताबों से सम्बन्ध रखते हो । तुम आप सोचो मुर्दो के पूजने वालों को सचाई कब मिल सकती है ? सचाई तो जीती जागती वस्तु है जिसे मृत्यु का भय ही नहीं है। मुर्दो की हड्डियाँ सड़ती हैं। उनके सड़े गले माँस से दुर्गन्ध आती है और तुम न केवल उसी को सूघते हो किन्तु उसी से अपना पेट भी भरते हो। कहो आजकल की सभ्यता इन्हीं बातों में है या नहीं ?”
फिलोस्फर–यह खरी खरी बातें सुन कर दंग रह गया। ‘फिर बतलाइये सचाई क्या है ?”
मख‘–“क्या तुमने अब भी नहीं समझा १ प्रकृति की जीती जागती तसवीर में तुम्हें प्रकृति का भेद बतलाया। अब तक भी वह तुम्हारी समझ में न आया । प्रकृति ‘सत्‘ है। तुम ‘सत्‘ बनो और ‘सत्‘ का जीवन ग्रहण करो। प्रकृति ‘चित्‘ है। तुम ‘चित्‘ बनो और ‘चित्‘ का जीवन ग्रहण करो। प्रकृति ‘आनन्द‘ है । तुम ‘आनन्द‘ बनो और ‘आनन्द‘ का जीवन ग्रहण करो। सचाई ‘सच्चिदानन्द‘ है। तुम भी उस
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अनमोल विचार के समय ‘सच्चिदानन्द हो जाओगे जब इस बुरो सभ्यता, बुरे विचार, भ्रम और भ्रान्ति को छोड़ कर प्रकृति के साथ साथ चलने लगोगे जिसको शाक्तिक ‘शक्ति‘ कहते हैं। तब समझोगे कि यह प्रकृति ही शक्ति है । अपना ब्रझाड आप रच और जीवित ब्रह्माण्ड की तरह रहो । फिर सचाई तुमसे कभी अलग न होगी । ।
(७) मस्ती की धुन । दोनों चुप हैं। बातचीत बन्द हैं। मूर्ख अपने आप में मस्त होकर गाने लगा:-
छन्द तेरी काया में सत् कर्तार, भटका क्यों खाबे ! ( टेक ) काया में रहे माया दाया, काया स्वर्ग दुआर । भटका० ॥ काया सोध सोध निज काया, काया का भेद अपार भटका०।। काया निगुन सगुन है काया, काया ब्रह्म विचार । मटका० ।। काया मह सहस्र कमल दल, कार्य में ओंकार । भटका० ॥ सुन्न महा सुन्न काया रहते, काया सोहं सार । भटका० ।। सत्त पुरुष काया के बामी, अलख अगम का द्वार । भटका०॥ राधास्वामी चरन–शरन बलिहारी, काया है टकेसार। भटका०।।
शब्द समाप्त होने के साथ ही मूर्ख उसी तरह हँसते हुये पहाड़ की किसी वादी में जाकर छुप रहा। फिलोस्फर की कुछ न पूछिये। इतना लज्जित हुआ जैसे उस पर सौ मन पानी पड़ गया था। फिर उस दिन से उसकी खोज का सिलसिला सदैव के लिये बन्द होगया । शक्ति माता ने आप प्रगट होकर मूर्ख के रूप में उसको उपदेश दिया। इसके पीछे उसके जीवन का क्या हाल हुआ न हम जानते हैं और न उसके जानने की आवश्यकता है।
शिव के
दोहा
कहना था सो कह चुके, अब कुछ कहा न जाय । सिन्ध समांना बुन्द में, दरिया लहर समाय।।
तीसरी तरंग तीन बन्द
( १ ) एक पारसी कवि का कथन है “चुप रहने से बढ़कर और कोई बात मुझे पसन्द नहीं आती । यह एक ऐसी अवस्था है जिसकी व्याख्या कहने और सुनने में नहीं आती।” वास्तव में यह बचन विचारने ही योग्य है।
मनुष्य बोलता हुआ पशु है। यहां सब बोलते हैं और बोलने ही को उपदेश सुनाते रहते हैं परन्तु यह कवि चुप रहने की शिक्षा देता है। बात क्या है ? किसकी सुनें और किसकी न सुने ? बोलना भी तरह तरह का है।
बोली तो अनमोल है, जो कोई जाने बोल ।। हिये तराज तोल कर, तब मुख अपना खोल ।। १ ।। ऐसी बानी बोलिये, मन की आपा खोय ।
औरन को सील करे, आपो सीतल होय ।। २ ॥ सहज तराज आनकर, सब रस देखा तोल ।। सब रस माहीं जीभ रस, जो कोई जाने बोल ।। ३ ।। शब्द बराबर रस नहीं जो कोइ जाने बोल । हीरा तो दामों बिकै, शब्द का मोल न तोल ॥ ४ ॥
२२ ।
अनमोल विचार की: बोलना इस तरह का कहलाता है । बुद्धिमान इस तरह के बोलने में हर्ज नहीं समझते । यह सुशिक्षित और सभ्य होने का प्रमाण है। ऐसी बात कभी भी नहीं बोलनी चाहिये जिससे दूसरों का दिल दुखे या विष की बुझाई हुई गाँसी की तरह कलेजे में घुस कर उसको जलादे । ऐसा बोलना जलती हुई
आग की चिगारियों के समान है जो पहिले बोलने वाले के हृदय में भड़कती हैं और फिर दूसरों के दिलों में आग लगा। देती हैं। गाली, निन्दा, दोषारोपण और दुर्वचन ही के कारण लड़ाई झगड़े की नौवत आती है, घर नष्ट हो जाते हैं और देश बरबाद हो जाते हैं। यह एक प्रचण्ड ज्वालामुखी है जो दूर निकट हर जगह की बस्तियों, बाटिकाओं और आबादियों
को जलाकर राख कर देती है।
गार अगारा क्रोध झल, धूआं निन्दा होय । इन तीनों को परिहरे,साध कहावै सोय ।। १ ।। अवत गाली एक है, उलटत होय अनेक । कहैं कबीर ना उलटिये, वही एक की एक ॥२॥ गाली सों सब ऊपजे, कलह कष्ट और मीच ।
हार चलै सो संत है, लाग मरै सो नीच ॥ ३ ॥ प्रिय और अप्रिय बचन दोनों की तसवीरें आँखों के सामने आ गई। एक से चित्त प्रसन्न होता है और दूसरा कलेजे में घाव करता है। एक में प्रेम और दूसरे में घृणा है। एक इतना बलवान है कि यदि चाहों तो उसकी सहायता से सारे संसार को जीत कर अपना बना लो और दूसरे में इतनी अबलता है कि अपने हाथ का माल भी जाता रहता है। उसके कारण अपने भी पराये हो जाते हैं।
(१) आग की लपट (२) छोड़ दे (३) मौत ।
शिव के
दोहा कागा का से लेत हैं, कोइल काको देइ । मीठे बैन सुनाय कर, जग अपना कर लेइ ॥
(परम संत कबीर साहिब) काय काय करने वाले कौवे न किसी से कुछ लेते हैं और न कोइल किसी को कुछ देती है, केवल मीठी बोली सुनाकर वह दुनिया को अपना बना लेती है। यह इन दोनों में भेद है। दोनों की बोलियाँ केवल शब्द ही हैं। वह शब्द से भिन्न नहीं हैं परन्तु दोनों के दो नतीजे देखते हो । दोनों ही मैंह से निकलती हैं। दोनों शब्द एक ही ढंग से निकलते हैं परन्तु भाव और नतीजों में भेद है।
दोहे ।। शब्द शब्द सब कोई क है, शब्द के हाथ न पाव ।। एक शब्द औषध करै, एक शब्द करे घाव ॥ २ ॥ एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास । एक शब्द बन्धन कद, एक शब्द गले फाँस ॥ ३ ॥
अब तुम क्या पसन्द करते हो ? अच्छा बोलना या बुरा बोजना ? सभ्य मनुष्य अच्छे बोलने ही को उत्तम समझेगा । मनुष्य कितना ही बुरा क्यों न हो फिर भी बुराई की अपेक्षा भलाई को अच्छा ही समझेगा। सभी कहते हैं कि अच्छा बोलो, बुरी बातें मुख से न निकलने पायें परन्तु कवि अपनी बेसुरी अलोपं अलाषते हुये स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि मुख को बन्द कर रक्खो, न अच्छा कहो न बुरा । क्या इसका यह अर्थ है कि अच्छा कहना भी सम्भव है किसी को बुरा लगे या किसी का जी दुखी हो। अजी नेकी और भलाई अच्छी ही सही परन्तु ऐसे भी तो हजारों मनुष्य मिलगे जो
अनमोल विचार छ तुम्हारी भलाई को देख कर जलेंगे। यदि तुम सच ही बोलते हो तो क्या इस सच से यदि किसी को लाभ होता है तो । दूसरे को हानि न पहुँचेगी । जहाँ लाभ है वहाँ ही हानि है । एक की सहायता करना दुसरे को हानि पहुंचाना है। यह संसार विचित्र स्थान है जिसकी सारी बातें सोचने और समझने के योग्य हैं। चुप रहने का उपदेश कवि इसीलिये कर रहा है कि चुप रहने से न किसी का बुरा होगा न भला होगा। नहीं ! नहीं !! तुम बहुत दूर निकल गये, भूले और बुरी तरह से भूले ।
आओ अब इस चुप रहने के विषय को तुम्हें अच्छी तरह से समझादें परन्तु सावधान रहना, भूल और भ्रम में न पड़ना क्योंकि यहां पग पग पर ठोकरों का भये है। केवल तत्व को । समझो, शब्दों के गोरख धन्दों में फंसने से बचते रहो । | प्राचीन काल से ऋषि मुनि, साधु, महात्मा सब कहते चले रहे हैं कि जीवन के तीन रास्ते हैं। एक बहुत ही अंधेरा है जिसमें केवल कीड़े मकोड़े चल सकते हैं। न तो इनका कोई आदर्श हैं और न आदेश के समझने की बुद्धि है इसलिये यह घूम फिर कर जहाँ के तहां पड़े रहते हैं। दुसरी राह बहुत खुली हुई है। उसमें प्रकाश और अन्धकार दोनों मिले जुले हैं। कहीं प्रकाश अधिक है और कहीं कम परन्तु राह के सुहावने दृश्य दिल को अपनी ओर खींच लेते हैं और मनुष्य उन्हीं में फँस जाता है। ज्यों ज्यों वह आगे बढ़ता जाता है त्यों त्यों वह राह न केवल तंग होती जाती है किन्तु प्रकाश भी धुंधला होता जाता है। आगे चलकर ऐसा समय जाता है जब घुप अँधेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता और राह चलने वाली घबरा जाता है। इस रहि को शास्त्रकार ‘प्रेय‘ मार्ग अर्थात् प्योरा रास्ता बताते हैं । यह भोग विलास का
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शिव के पन्थ है। तीसरा रास्ता ‘श्रेय‘ मार्ग है । यह पहिले पहिल तेरा
और अंधेरा दिखाई देता है परन्तु इस में यह विचित्र बात है कि यदि साहस और निश्चलतों के साथ एक बार इस में घुस जाओ तो फिर आगे बढ़ने में नित्य ही आनन्द मिलता जायेगा । तंगी दूर होती जायेगी और राह चौड़ी होती हुई मिलेगी । जितनी ही तुम आगे बढ़ते हुये चलोगे उतना ही सुख और आनन्द भी घना होता जायेगा। ऊपर की दो राहों को साधू पसन्द नहीं करते क्योंकि इनका परिणाम अच्छा नहीं होता! पहिले में तो चलने वाला पथिक घने जंगल में हँसा हँसाया रह जाता है। दूसरे में ऊपर चढ़ता है परन्तु राह की तंगी के कारण उसे नीचे उतरना पड़ता है और वह गिर पड़ता है। हां, तीसरी राह अच्छी है। जो एक बार कुछ साहस करके उसमें आया तो चाहे उसे पहिले कुछ दुख प्रतीत होता हो परन्तु शीघ्र ही उसे विशेष आनन्द मिलने लगता है। और इसी से उसका उत्साह नित्य ही बढ़ता जाता है । अन्त में वह मस्ती और प्रेम से झूमता हुआ किसी न किसी दिन अपने आदर्श तक पहुँच ही जाता है। यह अच्छी राह है। इस में कुछ भी सन्देह नहीं है परन्तु आपत्तियों से खाली यह भी नहीं है । भेद केवल इतना है कि पहिली राह में पहिले सुगमता है और फिर कठिनाइयाँ हैं। इस में पहले ही थोड़ी सी कठिनाई है फिर आनन्द ही आनन्द है और इसी कठिनाई को हम आपत्तियाँ कह रहे हैं। | यह आपत्तियाँ क्या हैं ? बोलना, सुनना और देखना। जिनमें यह बातें होंगी वह इस राह में आने के योग्य न समझे जायेंगे। यदि औरों को देखा देखी कोई इस राह में आना चाहेगा तो काँटेदार पगडंडी को देखकर उसकी हिम्मत जाती रहेगी और वह उसमें जाने का साहस न कर सकेगा। यदि
२६ ।
अनमोल विचार * तुम जुवान से बहुत बोलते हो तो तुम्हारी मानसिक शक्ति (दिली ताक़त) का पानी जिह्वा की राह से रस रस कर बाहिर निकल जायेगा और अन्त में कमजोर हो जाओगे। यदि तुम औरों की बातों को सुनते हो तो उनका प्रभाव तुम पर पड़ता जायेगा। अपना कुछ न रहेगा । हाँ, दूसरों के विचार तुम्हारे मन में मरते जायेंगे और तुम कहीं के भी न रहोगे। इसी प्रकार यदि बाहिरी दृश्य में फंसे रहोगे तो तुम्हारे मन का दर्पन उसकी छाया को ले ले कर धुंधला बन जायेगा। बुरीबुरी भावनायें मन में उत्पन्न होकर तुम्हारी सङ्कल्प शक्ति को धक्के दे देकर दुवा देंगी और तुम्हारा पैर उखड़ जायेगा। यह तीन वलाये हैं जो पन्थाइयों को डिगाती धमकाती और दुखी करती रहती हैं। अब तुम आप सोचो कि यह बातें सत्य हैं यो असत्य है जो बोला वह मारा गया। जिसने औरों की बात सुनी वह बहक गया। जिसने इधर उधर के दृश्य को देखा वह राह से बे राह होगया। नजर को सीधी रखना है और केवल नाक की सीध में चलना है। पन्थाई को दायें बाये मुड़ने की प्राज्ञा नहीं है। यदि उसने इस नियम का पालन किया तब तो वह सच्चा अधिकारी बना और यदि बहका तो भ्रम और भ्रान्ति के दल दुल में जा फंसा । फिर उसका ठौर ठिकाना नहीं रहता।
गुरु नानक साहिब की वाणी है
दोहा । तीन बन्द लगाय कर, सुन अनहद टंकोर ।।
नानक सुन्न समाध में, नहिं सांझ नहिं भोर ॥ इसलिये इन तीनों पर बन्द लगा । इनको रोक रक्खो। यदि तुम इतना कर लेते हो तो निश्चय रक्खो कि आदर्श तक
शिवं बेखट पहुँच जाओगे। यदि इस उपदेश को नहीं मानते तो फिर तुम भी उन्हीं पहिले कहे हुये दो राहों पर चलोगे जिनका परिणाम अच्छा नहीं होता।।
हमने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में तुमको देखने, सुनने और बोलने के दोष समझा दिये। सम्भव है इतनी सफाई के साथ आज तक यह बातें किसी ने तुमसे न कही हों । अब सुनलो और सुन कर उनको दिल में जगह दे लो। यदि तुम अपने पहले जन्म के पुण्य प्रताप से संत मत में आ गये हो तो यह फिर भी तुम्हारे लिये लाभदायक होंगी और यदि अब तक ऐसा अवसर नहीं मिला है तो यह कान में पड़ी हुई बातें कभी । न कभी काम आ जायेंगी।
इन तीन इन्द्रियों के. रोक रखने को पन्थाइयों के यहां तीन बन्द लगाना कहा जाता है।
( ३ ) परम संत कबीर साहिब की बाणी है
दोहा चलो चलो सब कोइ कहै, विरला पहुँचे कोयः ।
एक कनक और कामिनी, दुर्गम घाटी दोय ॥ हम क्या सुनते हैं, क्या देखते हैं और क्या बोलते हैं? इस पर क्या कभी तुमने विचार भी किया है ? हम धन और विषय भोग की बातें सुनते हैं। हम धन द्रव्य और स्त्री के रूप को देखते रहते हैं और दिन रात इन्हीं के सम्बन्ध में बातचीत भी किया करते हैं। यही दोनों मुख्य और मूल हैं बाकी और सब इसकी शाखायें हैं। सारी बुराइयों की जड़ यही दो वस्तु हैं। सोचो समझो और विचारो कि हम सच कह रहे हैं या झूठ ।
* अनमोल विचार के
दोहा एक कनक और कामिनी, बहु फल किये उपाय ।। देखे ही ते विष चढ़, चाखत ही मर जाय ॥ १ ॥ एक कनक औरं कामिनी, तजिये भजिये दूर ।। गुरु बिच डारै अन्तरा, जम देवे मुख धूर ॥ २ ।। तजो कनक और कामिनी, यह सत्गुरु की साख । विष फलं फले अनेक हैं, मत कोई देखो चाख ।। ३ ।। यह काम क्या है ? यह भोग विलास क्या है ? बड़े ही शोक की बात है कि इस पर कोई विचार नहीं करता ! और विचार न करने के कारण सब कुयें में मुंह के बल गिरते चले
जा रहे हैं।
दोहा काम काम सब कोइ कहै, काम ने चीन्है कोय ।
जेती मन की, कल्पना, काम कहावै सोय ।। मर गये वह लोग जो इस गढ़ में आकर गिरे । उनकी इड़ियाँ चुर चूर हो गई और नाम मात्र के लिये भी उनका पता नहीं रहा ।।
दोहा . नारी नदी अथाह जल, वूड़ मुआ संसार ।
ऐसा साधू ना मिला, जा सँग उतरु पार ।। इसी काम के वशीभूत होकर रावण ने अपने दस सर और बीस भुजायें कटवादीं । कुल का नास करा दिया। सोने की लङ्का राख होगई । इसी काम के पीछे बालि जैसा महाबलवान पुरुष राम के तीरों से मारा गया।
दोहा पर नारी पैनी छुरी, मत कोइ करो असंग। दुस मस्तक ‘रावण गये, पर नारी के संग ॥१॥
शिव कामी कबहुँ न गुरु भजे, मिटै न संशय सूले । और गुनाह सब बखशिहों, कामी डाल न मूल ।।२।। नारी निरख न देखिये, निरख न कीजै दौर।। देखे ही ते विष चढ़, मन आवै कुछ और ॥३॥
यह काम है। अधिक क्या कहें। हर मनुष्य इसे कुछ न कुछ जानता है । अब द्रव्य के विषय में सुनिये । यह बहुत ही बुरी बला है। जो इसके झटके में था वह रसातल को चला गया और फिर उसका पता न लगा ।
| दोहा माया दीपक नर पतंग, भ्रम भ्रम माँहिं परन्त । कोई एक गुरु ज्ञान से, उबरे साधू सन्त ।।
धन के लिये जान देने वाले छोटे छोटे आदमियों से डरते रहते हैं–चोर का डर, पुलिस का भय, सम्बन्धियों की नोच खसोट, पड़ोसियों का द्वेष, तरह तरह के दुख और कष्टस्वप्न में भी शान्ति नहीं मिलती ।।
। माया तरुवर त्रिबिधि का, दुख सुख और सन्ताप ।।
सीतलता संपने नहीं, फल फीका तन तप ।।१।। कबीर जग को क्या कहूँ,भव जल बूड़े दास । सत्तनामे पद छोड़कर, करें मनुष की आस ।।२।।
दूर क्यों जाते हो अपनी हालत और अपने पड़ोस में रहने वाले धनवाने मेनुष्यों की दशा को देखो । आप ही समझ जाओगे। धन इसलिये है कि उससे काम निकाला जाये न । कि उसको अपनी गेलो फँसाने की जुजीर बनाई जाये।
यह दो गहरी घाटियाँ हैं ज़िन में आदमी गिरकर कुत्ते की मौत मरता है और जीवन के आदर्श से हाथ धो
बैठता है।
अनमोल विचार की।
(४)
इन दोनों से चित्त की वृत्ती को हटा कर तब इस राह में आओ । जब तक यह वासनायें रहेंगी तब तक, सचाई का पर दो कभी न उठेगा और न उसकी असलियत समझ मैं
आयेगी । . इनके दूर करने का उपाय है कि इन तीन इन्द्रियों पर बन्द लगाया जाये । यह नहीं कहा जाता कि कोई अन्धा बन जाये, आँखों को फोड़ ले, कानों में ठेठी भर ले और जुबान को कटा ले । पहिले यह बात समझ लेनी चाहिये कि हम इस संसार में केवल इन्हीं तीन इन्द्रियों के कारण फँसे हैं। यह मुख्य हैं। दूसरी इन्द्रियाँ गौण हैं। वह इतनी दुखदाई भी नहीं हैं। इन्हीं तीनों इन्द्रियों के कारण उन में क्रिया शक्ति आती है। आँख देख कर, कान सुन कर, जुवान बोल कर दिल के लिये उभारने का सामान पैदा करती है। बाहिर के भाव इन्हीं के द्वारा मन में भरते जाते हैं। बस इतना ही करना है। कि यह बहुत बहकने न पायें । यह न बहकेंगी तो मन भी न बइकेगा । इन्हें वश में लाने को संस्कृत में “दुम‘ कहते हैं। ‘दम‘ का अर्थ है– वश में करना। इनको वश में करलो तो मन में शान्ति आजायेगी। मन की शान्ति को संस्कृत में ‘शम‘ बोलते हैं। यों समझो–मन एक तालाब है और यह तीनों इन्द्रियां उसके सूराख (छेद) हैं जिनका मुंह बाहर की ओर खुला हुआ है। इन छेदों से बाहर की हवा उसके अन्दर लगती है और मन के तालाब के पानी में हिलोरे उठने लगते हैं । यही हिलकोरे वृतियां कहलाती हैं और अवसर पाकर । बाहर की ओर दौड़ती हैं। यदि छिद्र बन्द होजाये तो फिर यह दशा न हो और न मन इतना चंचल हो । जब उसमें चंचलता न होगी तो आप ही आप शान्ति प्रजायेगी और
शिव के शान्ति आने के साथ ही उसमें सचाई की झलक पड़ने लगेगी । जहाँ यह अवस्था हुई फिर यह मन कुछ और ही बन जायेगा और सचाई का परदा भी उठ जायेगा। तब फिर क्या होगा ? मरने जीने की गुत्थी सदैव के लिये सुलझ जायेगी
और मनुष्य को जन्म मरन के दुख और संसार के तीन तापों से छुटकारा मिल जायेगा। दुखों से सदैव के लिये मुक्ति पाना ही परम पुरुषार्थ और जीवन का सच्चा आदर्श है । यही निर्वाण है, यही कैवल्य है, यही परम पद है जिसकी व्याख्या हम ने बहुत ही संक्षेप परन्तु स्पष्ट रूप से की है।
(५). अब सवाल यह है कि यह तीन बन्द कैसे लगाये जायें। बहिमुखी होना . मनका स्वभाव हो गया है । उसको बाहर के जगत में रस मिलता है। वह रसिया है। कोई रसिया रस की चाट को सुगमता से कैसे छोड़ने लगा ! कहने को तो चाहे रात दिन बातें बनाया करे परन्तु पता उस समय लगता है जब मन को बश में लाने का सवाल आता है । ज्ञानी ज्ञान के कथन में लगा । मन अपने स्वभाव के अनुसारं इन्द्रियों के विषय की ओर लेगया। ध्यानी ध्यान लगाने बैठा। मन में विषय की तरंगें उठने लगी । कहाँ का ध्यान ! कैसा ज्ञान ! सब धरे का धरा रह गया। मेन चढ़ा था आसमान पर और गिरा तो नीचे कीचड़ में लथपथ हो। गया । यह एक साधारण बात है जिसे थोड़ी समझ बूझ का आदमी भी समझ सकता है। इसलिये पहिले इसे मन को समझा बुझाकर तब इस काम की ओर ध्यान देना चाहिये।
* दोहा, बात बनाई जग ठग्यो, मन परबोध्यो नाहि। कबीर यह मन ले गया, लख चौरासी महि ॥
अनमोल विचार न दम‘ हुआ न ‘शम’ हुआ। परिश्रम निष्फल गया । ज्ञानी जिन्होंने योग का साधन नहीं किया है ब्रह्म ब्रह्म चिल्लाते रहते हैं। कोई कोई खयाली मस्ती के नशे में थोड़ी देर के लिये चूर भी होजाते हैं परन्तु इनका भी परिणम वही होता है। और मन किसी समय ऐसा धक्का दे बैठता है कि यह नाच उठते हैं और किसी के सँभाले नहीं सँभलता ।
• दोहा अलमस्त फिरे क्या होत है, सुरत लीजिए धोय । चतुराई नहि छूटसी, सुरत शब्द में पोय ॥ १ ॥ चतुराई क्या कीजिये, जो नहिं ‘शब्द समाय ।। कोटिन गुन सुआ पढ़, अन्त बिलाई खाय ॥ २ ॥
तो बात बात में युक्ति भी बता दी गई । सुरत शब्द योग का अभ्यास करो। अाँख कोन जुबान को बाहर की ओर से बन्द करो। पहिले उनको अन्दर की ओर खोलो। यहाँ मन को अन्तर में अपूर्व सुख और आनन्द मिलेगा। यदि वह रसिया है तो अन्तर जाकर रस ले। रोकता कौन है ? अन्तर में तो और भी विचित्र रस है। बाहर की ओर से इन्द्रियों के द्वार बन्द और अन्तर की ओर खुल गये। आँख अन्तर में प्रकाश देखती है। कान अन्तर के शब्द सुनते हैं। जिह्वा अन्तर का नाम ज़पती है। तीनों के लिये तीन काम मिल गये। अब तो मानेगा कि अब भी नहीं ? इधर से हटे। उधर को लगे । अहा हा ! कैसे विचित्र दृश्य दिखलाई दे रहे हैं ! कैसा अच्छा तमाशा है ! साथ ही कैसे सोहावने बाजे बज रहे हैं कि दिल आनन्द में मग्न होकर बल्जियों उछल जाता। है और फिर किस आनन्द और चैन के साथ अजपा जाप । – हो रहा है। सुरत सनसनाती हुई ऊपर की ओर उठी और
आसमान पर जा पहुँची। सच तो यों है कि आसमान
शिव के को भी पैरों के नीचे दबा लिया और ऊँचे ऊँचे मण्डलों की सैर करती हुई ऊपर को चली ।।
दोहा । सहजे ही धुन होत है, हरदम घट के महि ।
सुरत शब्द मेला भया, मुख की हालत नहि ॥ . इसे कर तो देखो फिर पीछे कहना। यह सिड़ी सौदाई की बात नहीं है। साधु संत, पीर पैगम्बर, वली नबी सब ही ऐसा कर रहे हैं। इस विषय में सारे पन्थाई सहमत हैं। हम भी सुनी सुनाई बातों से सम्बन्ध नहीं रखते। अपना अनुभव तुम से कह रहे हैं परन्तु जब तक तुम आप करके न देखो तुमको विश्वास कैसे आये ! | सुनो! स्वप्ना अवस्था में जो कुछ तुम देखते हो अपने अन्दर ही तो देखते हो। तुम उस समय बाहर कब जाते हो ! हां, वह हालत बेबसी की है । हम तुम से कहते हैं कि अभ्यास द्वारा तुम स्वाधीनता के साथ सचेत होकर वहां चले जाओ
और वहां के अपूर्व दृश्यों को देखो। कौन जाने स्वप्न में बेबसी तुम को कहाँ ले जाती है। स्वाधीन बनो और राह रिकाना का पता लेकर अपने अन्तर में पॅसो । जागृत में स्वप्ने का और स्वप्न में जागृत का तमाशा देखो । | जब कुछ ऊपर की ओर चलोगे दूसरी आवाज़ सुनाई देगी और वह तुम्हारे स्वागत के लिये आगे बढ़ेगी। तुम भी खुशी खुशी पाँव बढ़ाते और लम्बे लम्बे डग भरते हुये उससे मिलने के लिये आप आगे बढ़ोगे ।
यह हमने तुमसे पहले ही कह दिया है कि इसे ‘श्रे थे। मार्ग में जो आया वह फिर वापस नहीं जाती और न फिर उसको जन्म मरन का खटका रहता है । हां, आने, घुसने और
अनमोल विचार के धेसने की देर है ।
(६) जिज्ञासू सवाल करता है कि “जब अन्तर में तीन इन्द्रियां काम करने लग गई तो फिर उन पर बन्द कहां लगा ? हालत तो जैसी पहिले थी वैसी ही अब भी रही । केवले स्थान बदल गया।’’ यह बात ठीक है । पहिले तो जिज्ञासू को यह विश्वास कराना आवश्यक है कि अन्दर में यह हालतें पैदा होती हैं। प्रमाण, अनुमान और शब्द तीन प्रकार के ज्ञान संसार में होते हैं। प्रमाण तो इन्द्रियों का ज्ञान है। देखनो सुनना, चलना, यह प्रमाण ज्ञान हैं। अन्दाजा लगाना, नतीजे को देखकर कारण को सोचना या विचारना अनुमान कहलाता है। इसका सम्बन्ध मन से है । शब्द है गुरू का बचने और आप्त पुरुष का कथन जो हर दशा में मानने के योग्य है। बाहरी जगत् में तो ज्ञान इस तरह प्राप्त होता है। अन्तरीय जगत् में इनके संस्कार मन में रहते हुये अपना काम करते हैं। अन्तरीय जगत में दूसरी इन्द्रियों का अभाव तो नहीं होता परंतु तीन इन्द्रियाँ आँख, कान और जिभ्या सब से प्रबल रहती हैं। वहाँ भी उनका वही स्थूल रूप रहता है जो यहाँ है। आँख कान और जिभ्या तीनों अपना काम करते हैं। ऊँचे मंण्डलों और देव लोक में भी इनकी प्रबलता रहती है। साथ ही मन अनुमान करता रहता है । भेद इतना ही है कि कान जहां और शब्दों को सुनता है साथ ही उस शब्द को भी सुनता है जो गुरू या आप्त पुरुष ने बताया है। आंख जहां और दृश्यों को देखती है, साथ ही उस प्रकाशमय वस्तु को भी देखाती है जिस की आंशा दिलाई गई है । जुबान सिवाय अजपाजाप. के किसी से सम्बन्ध नहीं रखती । धीरे धीरे इधर से चुप हो जाती है। और उधर एक काम करती रहती है और मन में लय हो जाती
शिव * है । आँख और कान वही देखते और सुनते हैं जिसका उपदेश दिया गया है। जुबान बन्द है। आँख को दूर से चिराग की रोशनी दिखलाई दे रही है। कानों को घंटे की ओवाज दूर से सुनाई दे रही है । जुबान तो मन के साथ मिली हुई किसी विशेष काम में लीन है। सुरत की धार बताये हुये स्थान की
ओर जा रही है। तुमने देख़ा होगा सन्ध्या समय जब मन्दिर में आरती होती है तो मन्दिर का चिराग ही दिखाई देता है और घंटे का शब्द ही सुनाई देता है । चिराग की रोशनी पर टकटकी लगाकर देखो । वह क्या है ? हजारों रोशनी की धारों का केन्द्र है। दूर से दृष्टि जमाने पर उसकी बिखरी हुई धारें प्रतीत होती हैं क्योंकि हर समय धारों ही की रचना है। घंटे या शंख की आवाज भी इसी तरह लगातार सुनाई देती है। तुम चले और चिराग की रोशनी तुम को बुलाती हुई आनन्द के साथ तुम्हारा स्वागत भी कर रही है। तुम फाटक पर पहुँच गये । लो पहिली मंजिल तै होगई । अब तुम आगे के स्थानों में जाने के अधिकारी बन गये। जिस तरह कालेज में जाने के लिये एन्ट्रन्स पास करना आवश्यक है वैसे ही यहाँ भी है। एन्ट्रेन्स का अर्थ ही दाखिल होने का फाटक है। जुबान गगी बनी हुई बिसूर में है परन्तु देखने ही में चुप है और उस पर बन्द लगा हुआ है। अन्तर में वह अपना काम कर रही है। अब मन्दिर में घुसो । मन्दिर क्या है ? यह तुम्हारा सर ही तो मन्दिर है। क्या तुम नहीं देखते कि शिव जी के मन्दिरों के गुम्बद (मन्दिर का ऊपरी और गोला हिस्सा) आदमी के सर की तरह पोले, खोखले और पूजन के सामान से भरे रहते हैं। यह मन्दिर असली मन्दिर की नकल हैं। सच्चा और असली मन्दिर तो तुम्हारा सर है जहाँ असली विशेश्वरनाथ बिराजमान हैं। नकली मन्दिर ईट और पत्थरों के हैं जहाँ
* अनमोल विचार * विशेश्वरनाथ की नकली मूर्ति गोलाकार और लिङ्गाकार स्थापित की गई है । मन्दिर के बीच में एक तिरकोनी वस्तु तुम्हें मिलेगी। इसको ‘त्रिकुटी‘ कहते हैं। विशेश्वरनाथ गुरू की प्रकाशमय और लाल रंग की दमकती हुई प्रतिमा दिखाई दे रही है। उसका दशन करो । साथ ही जहाँ तुम दूर से घंटे और शंख की आवाल सुन रहे थे अब मृदंग या पखावज या मेघनाथ के शब्द को दिल दी । यह अन्तरीय शब्द हैं। कोई इसको ‘ ‘ कहता है । कोई ‘बम’ ‘बम’ बोलता है । मुसलमान फकीर इसको ‘हू‘ ‘हू‘ कहते हैं और गुरु नानक साहिब के अनुयाइयों ने इसी को ‘वाह गुरू‘ कहा है। यह गुरु ही का स्थान है। यही ब्रह्म है। जो यहाँ
आया वह सच्चा गुरु मुख बना । जो नहीं पा उसने अभी तक सय अर्थों में गुरु का दर्शन नहीं प्राप्त किया । वह अब तक मैनसुख है। यहाँ आते ही ध्यान ज्ञान की समाधि की अवस्था प्राप्त होती है । इस समाधि में एक प्रकार का अन्धकार है। घटा टाप अँधेरा है। हाथ को हाथ नहीं सूझता। इस अवस्था का नाम ‘सुन्न‘ है और महासुन्न‘ है। यह परब्रह्म पद है। यह शून्यवादी बौद्धों का धुरपद है।
आँखों पर भी बन्द लग गई। उस्साह से काम में लगने जिसमें आत्मपद की सच्ची सफेद रंग की झलकती हुई रोशनी तुम्हारे अन्दर से प्रगट हो। लो वह प्रगट भी हो गई । यहाँ न वछ जुवान रही न आँख ही रही। दोनों का शारीरक रंग रूप जाता रहा। अब वह आत्मिक (रूहानी हो गई। हाँ, कान खुले हुये हैं। उनको ‘ओ३म्, की आवाज़ से ऊपर कुछ और तरह के धा वाले शब्द सुनाई दे रहे हैं। उन पर शरीरक बन्द तो,लग गया रूहानी बन्द बाकी है। आगे बढ़ो । यह स्थान ‘अझ गुफा, है । यह ‘स्वस्तिक, है।
।।
शिव के स्वस्तिक संस्कृत शब्द ‘सु‘ (अच्छा) और ‘अस‘ (होने) से निकला है। हिन्दू अपने घर के दर दीवार , मन्दिरों, और पूजन के सामानों में ऐसा चिन्ह बनाया करते हैं। संस्कृत कोष देखो। वह तुम्हें बतायेगा कि चार सड़को के एक जगह मिलाप का नाम स्वस्तिक कहलाता है। ब्रह्म और परब्रह्म बिखरी हुई और फैली हुई हालत का नाम है। सुन्न के स्थान में चार तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। यदि तुमने अभ्यास के समय सुना है तो क्या कहना है ! और यदि नहीं सुना तो सन्तों की बाणी पर विश्वास करो । सत् पुरुष राधास्वामी की पवित्र वाणी है। “बानी चार गुप्त जहाँ रहती ।” यह स्वस्तिक चक्र है। यही ‘आँवर गुफा‘ है। यहां से भी अंतरीय शब्द निकलते हैं। ब्रह्म की उत्पत्ति यहाँ ही से होती है। जैसे इसका नाम ‘स्वस्तिक‘ और ‘भंवर गुफा‘ है वैसे ही इसके अन्दर से बांसुरी की आवाज के रूप में ‘सोहं ‘सोहं‘ शब्द निकलता रहता है। आगे बढ़कर ‘सत लोक‘ ‘सत मन्दिर‘
और ‘सत् धाम‘ आता है। यहां बीन की आवाज में ‘सत्‘ ‘सत्‘ ‘हक्’ ‘कृ’ की आवाज निकलती रहती है। यह पूर्ण स्थान है। यहां पूर्ण बीन अपना पूर्ण राग सुना कर कानों पर समाधि की मुहर लगा देती है। यह सबसे ऊँचा धाम है। यही सन्तों का धुर स्थान है। यहाँ न रंग है २ रूप है न रेखा है। सत् पुरुषं राधास्वामी दयाल की वाणी हैं
जो इतने पद ऊँचे ,चढ़। रंग रूप रेखा से टरै ।।
तीन बन्दों की व्याख्या कर दी गई है। जिस बात को कोई कहता तक नहीं, हमने उसे स्पष्ट शब्दों में खोल खोल कर
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अनमोल विचार की समझा दिया। जिसको तीन बन्द लगाकर आत्म उन्नति करने और संसार के जन्म मरन से छूटने का विचार हो वह इन तीन बन्दों के लगाने का साधन करे। यह संतों, बौद्धों और सूफियों ( मुसलमान संत और फ़कीरों ) का मार्ग है। और जगह यह इशारो इशारों में बताया गया है। संतों ने इसके अभ्यास का उपदेश बड़ी ही उत्तमता और पूर्ण रीति से बतलाया है। यह जुबानी जमा खर्च की बात चीत नहीं है। जो लोग इस अभ्यास का साधन करेंगे वह जन्म मरने के झगड़ों से मुक्त होकर धुरपद को प्राप्त कर लेंगे जो उनके अन्दर है। और उनमें है । जो बातें बनाया करेंगे उनके लिये यह उपदेश नहीं है।
दोहा
कौतुक देखा देह बिन, रवि शशि बिना उजास । साहिब सेवा मांहि है, बे परवाही दास । १ ।। पवन नहीं पानी नहीं, नाहीं धरन अकास। तहां कबीरा संत जन, साहिब पास खवास ॥ २ ॥ धुजा फड़क्कै सुन्न में, बाजै अनहद तूर। तकिया है मैदान में, पहुँचेगा कोई सूर ।। ३ ।। पिंजर प्रेम प्रकासिया, जागी जोत अनन्त ।
संशय छूटा भय मिटा, मिला पियारी कन्त ॥ ४॥ उनम न लागी सुन्न में, निस दिन रहै गलतान । तन मन की तौं सुध नहीं, पाया पद निर्वान ॥५॥ सुरंत समानी निरत में, अजपा माहीं जाप। लेख समाना अलख में, अपा मांहीं आप ।।६।। जामरै अजपा मरे, अनहद भी मर जाय ।। सरत समानी शब्द में, ताहि काल नहिं खाय ॥७॥
शिव *. संशय करून मैं डरू, सब दुख दिये निवार। सहज सुन्न मैं घर किया, पाया नाम अधार ।।८।। बिन पावन का पन्थ है, बिन बस्ती का देसं । बिना देह का पुरुष है, कहैं कबीर सन्देस ।।१।।
चौथी तरंग (शब्द) घट का मन्दिर
मेरे घट का मन्दिर खुल गया (टेक) गुरु मूरत का दर्शन पाया, जगमग जोत जगाया।
आरति साजी प्रेम भक्ति की, उमगा मन हरखाया ।।१।। घंटा शंख बजे मन्दिर में, धुन मृदङ्ग की गाजी । बीन बाँसुरी बजी सारंगी, सुन सूरत हुई राजी ।।। यो मूरत की महिमा भारी, उपमा कही न जाई । चाँद सूरज की चँवरी लेकर, प्रीति के हाथ डुलाई ।।३।। शेष सहस मुख अस्तुति गावे, ब्रह्मा वेद सुनावे । शिव के हाथ में डमरू सोहे, विष्नू शंख बजावे ॥४॥ रोम रोम में प्रगटे देवा, सरिद इन्द्र धनेशा ।
कहिं कमला कहिं दुर्गा नाचे, गावे शब्द गनेशा ॥५॥ * गुरु के चरन निरंजन बासा, हृदय ब्रह्म निवासा । परब्रह्म छबि अद्भुत सोभा, सोहं करै उजासा ॥६॥
सत्त पुरुष लेख अलख को देखा, अगम का किया परेखा । राधारवामी चरन शरन बलिहारी, मिट गया जम का लेखा ॥७॥
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अनमोल विचार * पाँचवी तरंग
प्रेम प्रम क्या वस्तु है ? यह बड़े से भी बड़ा और छोटे से भी छोटा है और फिर साथ ही न यह बड़ा है और न छोटा है। किसने इसकी असलियत का पता पाया ? क्या कोई छाती पर । हाथ रखकर कह सकता है कि मैं प्रेम के तत्व को अच्छी तरह से जानता हूं । मीठे बचन, प्रेम की दृष्टि और अखि के इशारे से आदमी जो चाहे कर ले । हाँ, केवल प्रेम होना
चाहिये।
एक प्रेमी कुत्ते के साथ रहता हुआ आदमी अपने आप को अकेला नहीं समझता परन्तु प्रेम से खाली हजारों श्रदमियों के साथ बैठा हुआ भी अकेला है। देखने को हजार दिखलाई दें परन्तु न कोई उसके आगे है न पीछे है। क्या कभी तुम में से किसी ने ऐसी हालतों पर विचार किया है !
बच्चे को एक फूल दे दो। वह तुम्हारा हो गया । किसी को बिना प्रेम के बहुत बड़े राज्य का मालिक बना दो परन्तु वह तुम्हारा नहीं है। अकबर बाहशाह बहुत दिनों तक अपने बजीर बीरबल के लिये रोया किया। बीरबल सिवाये बातों के उसको और क्या देता था ! परन्तु वही बादशाह राजा मानसिंह से डरता था और उससे जान बचाना चाहता था। उसने अपनी बहिन तक को दे दिया था। काबुल, दक्षिण और बङ्गाल के सूबों को उस के लिये जान लड़ाकर जीत लियाथा। अकबर के लिये अपनी जाति वालों से जीवन पर्यन्त लड़ता रहा। बात क्या थी ? उसमें अकबर के लिये बीरबल जैसा प्रेम नहीं था।
ऋषियों मुनियों ने भगवान रामचन्द्र की बड़ी बड़ी
शिव की स्तुति की परन्तु राम, उनके पास न ठहरे । शिवरी बातें बनाना नहीं जानती थी। सच्चे प्रेम के साथ जठे सड़े गले बेर खिला दिये और वह उसी के हो गये।
कृष्ण जी ने दुर्योधन का निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया। विदुर के घर में जाकर बिना नमक का उबाला हुआ साग
और केले के छिलकों से अपना पेट भरा । ऐसा क्यों हुआ ? प्रेम महा बलवान है । वह जो नाच चाहे नचावे।
धन्ना भक्त कृष्ण को तमाचे मारता था और वह उसकी गायें चराते थे। और लोग कृष्ण की रात दिन स्तैति और प्रार्थना करते रहते हैं परंतु किसी को दर्शन भी नहीं प्राप्त होता ।
विष्णु शेष नाग के सेज पर लेटते हैं। शिव अपने अङ्ग अङ्ग में विषधर साँप लपेटे रहते हैं। यह क्यों उनको नहीं काटते ? इनका विष क्यों इनमें ‘असर नहीं करता ? केवल प्रम के कारण
बच्चे साँप के मुँह में उँगलियां देते देखे गये हैं। हाथी के सूड़ को पकड़ते हुये सुने गये हैं । भेड़ियों और शेरनियों ने
आदमी के बच्चों को अपना दूध पिला कर पाला है। यह तुमने सुना होगा। यह सब प्रेम ही की लीला है।
लड़को बड़ा, अधेड़, और बूढ़ा हो जाये परन्तु माता की। दृष्टि में वह बच्चा ही बना रहता है । क्या प्रम अँधा है ? हां जी, प्रेम अँधा है और प्रेम बड़ा सुझाका है। प्रेम ही सनक और पागलपन है और प्रेम ही बुद्धि विवेक और समझ बूझ है।
मेरे हो जाओ और मैं तुम्हारा होकर रहूँगा। मेरे नहीं हो तो मैं तुम्हारा भी नहीं हैं। यह बनी बनाई बात है।
जब गुरु हैं. तब मैं नहीं, जब मैं हूँ गुरु नाहि ।
प्र म गली अति–सांकरी, ता में दो न समांहि । नाम देव जी के नाना कृष्ण की मूर्ति को भोग लगाया
अनमोल विचार * करते थे परन्तु मूर्ति प्रगट नहीं हुई। नाम देव ने दूध का भोग लगाया और मूर्ति गट पट दूध पीने लगी । इन्होंने एक घूसा तान कर मारा ‘बेदर्द ! सब पी जायेगा ! मेरे लिये प्रसाद भी न छोड़ेगा !” मूर्ति खिलखिला कर हँस पड़ी। यह क्या है ? प्रेम का तमाशा है।
राजा अपना राजपाट ले । ध्यानी ध्यान और ज्ञानी ज्ञान लैजाये। पंडित पोथी की सियाही चाटा करें। योगी योग की सिद्धी पर मरा करें, हम तो प्रेम के भूखे हैं। प्रम दो और हम जान माल सब तुम पर न्यौछावर कर देंगे।
काबा में एक गड़रिया आया। प्रार्थना करने लगा है मेरे प्यारे मालिक ! ऐ मेरे ईश्वर ! तू आजा मैं तेरा पाँव दबाऊँ, सर में तेल लगाऊँ, बीमारी में दवा पिलाऊँ और सर्दी में कम्बल ओढ़ाऊँ ।‘ मुजावर (चढ़ावा लेने वाले मुसलमान) बिगड़े । “दुष्ट ! ईश्वर के हाथ पाँव कहाँ हैं ?” और वह मारने दौड़े। हजरत मुहम्मद साहिब ने सुना, बीच बचाव कराया और बोले “यह सच्चा धार्मिक और मालिक का प्रेमी है, यह ईश्वर भक्त है। प्रेम, धर्म और पन्थ के बन्धन
से परे की वस्तु है।
जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहिं, तहाँ न बुधि व्यवहार । प्रेम मगन जव मन भया, कौन गिनै तिथि बार ॥
जो काम तलवार से भी नहीं हो सकता प्रेम उसको चुटकी बजाते हुये कर लेता है। थोड़ा सा मुसकरा दो और लोगों के दिलों को मुट्ठी में कर लो ।।
| हम तुमसे अपना अनुभव कहते हैं। ताँगे पर बैठे हुये शालीमार बाग से आरहे थे । घोड़ा अड़ने वाला था। कोचवान ने कोड़े फटकारे। उसने टस से मस नहीं की। हमने उसकी पीठ थपथपाई “चल बेटे ! अड़ना ठीक नहीं है।
शिव और वह हवा से बातें करने लगा। क्या घोड़े ने हमारी बात समझ ली ? क्यों नहीं। यहाँ प्रेम ने दुभाषिये का काम किया।
आप प्रेम करना और दूसरों के प्रेम का भूखा रहना–” पृथ्वी, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा केवल इन्हीं इने गिने शब्दों के अन्दर बसते हैं। क्या प्रेम ईश्वर है ? हम आप कुछ न कहेंगे।
प्रेम की मार भी मीठी होती है। बिना प्रेम का दुलार भी बहुत ही कडुआ होता है।
प्रेम की मौत भी अमर पद है। बिना प्रेम का जीवन मौत से कहीं बुरा है।
प्रेमी मनुष्य अकेला रहता हुआ भी अकेला नहीं है और जिस में प्रेम नहीं है वह हज़ारों और लाखों के साथ रहता हुआ भी अकेला ही है ।
प्रम देता है लेत्म नहीं । निष्काम सेवा करता है। इस गुप्त रहस्य का पता सूर्य के प्रकाश और चन्द्रमा की शीतलता
“ईश्वर हम तेरी भक्ति करते हैं तू हमको स्वर्गधाम दे । ईश्वर क्या ठहरा बनिया हुआ। दो पैसे दिया और सौदा मोल लिया। प्रेम में इस तरह लेने देने का व्यवहार नहीं होता। यह दुकानदारी नहीं है। ऐसे धार्मिक लोगों को हम क्या कहें १ जुबान नहीं खुलती क्योंकि हम इन को भी प्यार करते हैं।
बोलो –परन्तु प्रेम से बोलो। उचित अनुचित सब कुछ कह डालो, उसका प्रभाव बुरा न हो होगा परन्तु यदि रसना (चुबान) में प्रेम का रस नहीं है तो फिर वह रसना ‘रस‘–‘ना‘ ही है।
हमारे घर में एक बुढ़िया मजदूरिन थी । हम और हमारे भाई सब उस के सामने पैदा हुये। सब को उस ने गोद
से मिलता है।
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* अनमोल विचार * खिलाया। हमारे बाल बच्चे पैदा हुये। यह भी सब उसी की गोद में पलै । यह जुबान की तेज थी। जहाँ कोई अनुचित बात हुई बुरा भला सब कुछ कह डाला करती और गालियों की बौछाड़ लगा देती थी। हम और हमारी स्त्री दोनों हँसकर टाल देते थे। उसे कुछ नहीं कहते थे। थोड़ी देर पीछे वह
आप ही पश्चाताप करती और अपने अपराधों के क्षमा करने के लिये प्रार्थना करती थी। बड़े शोक की बात है यह गाली देने वाली मजदूरिन अब मर गई और हमारे कान उसकी गालियाँ सुनने को तरसते हैं। इस बात को लिखते समय भी हुम अपने आँसुओं को नहीं रोक सकते।
शादी ब्याह में गालियाँ कैसी मीठी लगती हैं। और समय तो कोई गाली दे फिर देखो क्या नतीजा होता है। यह प्रेम का जादू है जो विष को भी अमृत कर देता है। – ईश्वर क्या है ? प्रेम ही को नाम ईश्वर है। ईश्वर प्रेम मूर्ति है। ईश्वर प्रेम है और प्रेम ईश्वर है, यह तो हम जानते हैं। जिस ईश्वर की खोज धर्म ग्रन्थों में की जाती है उसको हम अब तक नहीं जानते हैं और न हमने अब तक उसका ज्ञान प्राप्त किया है और न कभी इस पुस्तकीय या कागजी ईश्वर के मिलाप की हमें इच्छा होगी।
बाँके सजीले जवान को एक कुरूपा स्त्री पर और रूपवती युवती को एक काले कलूटे पुरुष पर मोहित होते हुये देखकर तुमको आश्चर्य क्यों होता है। यह प्रेम ही के खेल और तमाशे हैं। प्रम जो चाहे वह कर दिखाये । इसके यहाँ असम्भव भी संभव हो जाता है।
लैला अँधेरी रात की तरह काली करूटी थी । मजनू मोरा चिट्टा और सजीला जवान था। वह उसका प्रेमी हो गया। क्यों ऐसा हुआ ? मजनू के हृदय के सौन्दुय्ये ने लैला
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शिव के की परियों और अप्सराओं से भी अधिक सुन्दर बना दिया। नयनों में मेरे कान्हा बिराजा, कान्हा की छवि पर मोही राम! रूष अरूप बसा मेरे उर में, रूप निरख अति मोही राम ! तिरछी चितवन नयना रसीले; तके तर्क मारे नजरिया राम ! छेद करेजे करती नजरिया, सही न जाय कष्टरिया राम ! गोपी गोपकृष्ण रस माले, सुंध बुधः तने की भूले राम ! मारै पेंग प्रेम के पल पल, प्रेम हिंडोले में झले राम!
कहाँका वैराग! कैसे जप तपः! और कैसा योग युक्ति ! प्रम! प्रेम । प्रेम !!! प्रेम ही सब कुछ है। न ‘ब्रह्मास्मि‘ कहते हुये ब्रह्म बनी और न ज्ञान के उलझन में फँसकर सर खपी करो। केवल प्रेम को दिल दो । जो होने को होगा आप समय पर हो रहेगा। यदि द्वौत और अद्वैत के झगड़े में पड़ते हो तो तुम जानी और तुम्हारा काम जाने !
छठवीं तरङ्ग
जीवन जीवन क्या है ? जीवपने का नाम जीवन है। सुख, दुख, प्रयत्न, राग, द्वेष, और ज्ञान यह जीव के लक्षण हैं। जिसमें यह सब गुण देख़ो उसको जीव समझों ।
जहाँ और जिसमें सुख है वहाँ उसी ही में दुख है । जहाँ और जिसमें राग है वहां और उस ही में द्वष है। इन द्वन्दों की समझ का होना ज्ञान और इनसे बचने के लिये परिश्रम करना प्रयत्न है।
प्रयत्न कर्म है। जिसमें प्रयत्न नहीं है उसमें जीवपना कैसा ? जीवन कर्म और परिश्रम के लिये हैं। सुस्त, अपाहिज
अनमोल विचार के और आलसी मनुष्य को जीवन का क्या अधिकार है ? जीवन का अधिकार तो केवल इसका है जो कर्म करता है। और प्रयत्न में लगा रहता है। : ‘प्रयत्न‘ का शब्दार्थ सुनो। ‘प्र‘ ( बहुत ) और ‘यत्न ( उद्योग ) से यह शब्द मिलकर बना है। बहुत उद्योग करना ही प्रयत्न है और यही प्रयत्न पुरुषार्थ है।
‘पुरुषार्थ‘ क्या है ? पुरुष के अर्थ और आदर्श का नाम । पुरुषार्थ है। । मनुष्य का परम पुरुषार्थ यह है कि वह दुख से बचने और सुख के प्राप्त करने का साहस करता रहे। दुख की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति ही को परम पुरुषार्थ और परम प्रयत्न करते हैं।
इस परम पुरुषार्थ आदर्श का दूसरा नाम ज्ञान है। जीव को सुख की और राग द्वेष की समझ है. और यही ज्ञान है जो दबा हुआ पड़ा है। इसको उभरने का अवसर दिया जाये। ज्ञान के होते ही वह दुख से बचकर पहिले माग्य प्राप्त कर लेगा फिर सुख और दुख दोनों मेट कर परम पद को प्राप्त करेगा। उस समय फिर वह कुछ और हो जायेगा, जीव न कहलायेगा । इसी तरह वह द्वेष पर काबू पाकर राग से सम्बन्ध पैदा कर लेगा। फिर राग और द्वेष दोनों को छोड़ कर ऐसी अवस्था में चला जायेगा जो जीवपने से बहुत
ची है।
प्रयत्न इसलिये जीवन का स्वभाव है। प्रयत्न के योग वह पुरुष होता है जो अपने मन पर काबू रखता है और यह बात मन की गढ़त करते रहने से आती है। इसलिये यह बहुत ही आवश्यक है।
• मन की गढ़त और सुधार के लिये यह अत्यन्त आवश्यक
ज्ञान है जो के होते ही वह दुख काट कर परम पद
* शिव के है कि खाने पीने की ओर से संतुष्टि रहे। भूखे आदमी से न लोक का काम होता है न परलोक का।
किसी की बुराई न देखो । यदि बुराई ही देखना है तो । अपनी बुराई देखो और अपने सुधार में लगो ।
हर आदमी में मालिक की निराली शान है। यही शान वास्तव में उसके जीवन का स्वभाव है। यदि यह न हो तो फिर वह जीवन ही कैसा ! यह जीवन मालिक का दिया हुआ है । वह ईश्वर की ओर से है इसलिये वह कभी उसकी शान से खाली नहीं रह सकता।
किसी मनुष्य के चंचल स्वभाव को देखकर क्रोध क्यों करते हो ? प्रकृति एक दशा में कब रहती है ? फिर जो उस में हैं वही संसार के जीवों में भी तो होगा । प्रकृति बदलती रहती है। इसीलिए आदमी का स्वभाव भी बदलता रहता है। हाँ एक बात तुम कर सकते हो। वह बुराइयों को जल्द भूल जाया करती है। तुम भी अपने सम्बन्धियों की भूल चूक की ओर से आँख बचाते रहो ।
काम करो और ऐसा काम करो जिस से औरों की भलाई हो । पानी की तरह मन के मैल को धो दिया करो। हवा की तरह प्रेम के साथ औरों को गले लगाना सीखो । आकाश । की तरह विशाल चित्त होकर सब को अपने हृदय के अन्दर जगह दो। पृथ्वी की तरह बुरी से बुरी वस्तु को भी अच्छे से, अच्छा रूप देना सीखो। आग की तरह गन्दगी को जलाकर सब को पवित्र कर दिया करो। यदि तुम में इस तरह के प्रयत्न या पुरुषार्थ की आदत है तो तुम अपने जीवन के आदर्श से दूर नहीं हो।
दिन के कामों पर सन्ध्या समय विचार कर लिया करो। यदि वह अच्छे हों तो मालिक को सच्चे हृदय से धन्यवाद दो
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अनमोल विचार के और तब सोने जाओ और यदि बुरे हों तो पश्चाताप कसे और दूसरे दिन प्रातःकाल मालिक से प्रार्थना करो कि आज तुम्हारे हाथों से भलै काम हो ।
सुख और दुख से परे भले कामों के नतीजे हैं। अच्छे काम का नतीजा सुख और बुरे काम का नतीजा दुख है। तुम केवल अच्छे कर्मों में प्रयत्न करो।
। जो समय चला जाता है वह फिर हाथ नहीं आता। इस लिये ध्यान रखो कि समय नष्ट न होने पाये गये हुये समय को वापस लाने की शक्ति ब्रह्मा में भी नहीं है। जो समय गया वह गया। जवान फिर न लड़के होंगे न बूढे जवान होंगे। जो समय मिला है इसे काम में लाओ और जौ कुछ करना धरना है अभी कर लो।
आने वाले दिनों की आशा में आदमी बुरी तरह सारे गये और मारे जा रहे हैं। आशा उत्तम वस्तु है परन्तु यही आशा धोखे में डाल देती है। इसलिये काम के सिलसिले में अशा रखना सीखो । किसान खेत में बीज ब्रोकर तब छसत और फल की आशा रखते हैं।
कुछ तो हम कर्म और कर्म के प्रयत्न से बनते हैं और कुछ प्रम भी हम को बनाया करता है। प्रेमबीज है जो मनुष्य के विचार में रहता है।
कल एक गरीब स्त्री का लड़का दरवाज़ा खटखटाने लगा। हम काम में थे । आदमी से कहा उसको जाकर–छाँट दो। लड़का अपनी मां के साथ चला गया। मालूम हुआ कि उसका पति बीमार है । वह भिक्षा मॉमने आई थी। जी दुखी हुआ। निर्धनता बुरी होती है। आदमी को दौड़ाया कि वह कुछ उसको दे आये और अपनी डाँट दृषद के लिये क्षमा माँगी।
‘.:-
शिव दुखियों के दुख पर आँसू बहाना सीखो। सब के साथ प्र म भाव रखो।
… ” घर बार को छोड़ कर जंगल में रहने से मन की निरख परख को अवसर नहीं मिलता। इसका अवसर जब मिलेगी संसार के बन्धन में रहने ही से मिलेगा।
रात के सितारों को देखो । चाँद की ओर दृष्टि करो । संघ अपना स्थान छोड़ते हुये चले जा रहे हैं। इम तुम भी पल पंत. में इसी तरह अपना अपना स्थान छोड़ रहे हैं। हाँ, हमको ज्ञान नहीं है परन्तु आयु व्यतीत होती चली जा रही है और हम में से किसको इ.पने सुधार का ध्यान है ?
संनसान रात है। रात ने सब पर अन्धकार का परदा डाल रक्खा है। यही कारण है कि किसी को कुछ सूझता नहीं और न किसी को अपने पराये का ज्ञान है। यही अच्छा होता यदि हम भी इसी तरह अज्ञान और बेदी पर परदा डाल कर उनकी ओर से आँख हटा लेते और दशा को प्राप्त कर लेते कि अपने पराये का ज्ञान न रहती।
बुढ़ापा आ गया। सर के बाल उजले देखकर और लोग तो ब्रावो कहते हैं परन्तु बाबा जी का दिल वैसा ही काला हैं। यह अपने आपको बूढ़ा नहीं मानते और न जवानी की तरंगों को दिल से दूर होने देते हैं। यदि यह आश्चर्य की बात नहीं तो क्या है !
पानी की बाढ़ आई। दिलों को हिला गई। ठंडी हवा चल्ली और सब कांप उठे। क्या इसी तरह तुम अपनी सच्ची सहानुभति और सच्चे प्रेम से संसार को नहीं हिला सकते. इंधी का नाम तो जीवन है ।संसार पर अपना प्रभाव डोलने ही को जीवन कहते हैं। सोचो तुम्हारे अपने जीवन की औरों घर कुछ असर भी है या नहीं।
* अनमोल विचार के बाहरी दिखावे और सामाजिक सभ्यता थोड़ी देर की धूप छांह हैं। इनको लोग जल्द भूल जाया करते हैं परन्तु प्रेम के व्यवहार का प्रभाव बहुत दिनों तक याद किया
जाता है।
अँधेरी रात है कुछ दिखाई नहीं देता। लैम्प जलाया। अब सब कुछ दिखलाई देने लगा। इसी तरह संसार में अब भी चारों ओर अँधेरा छाया हुआ है परन्तु जब प्रेम का चिरणि जले और सब पर उसकी रोशनी पड़े तो वह चमकती
और झलकती हुई दिखलाई देने लगे।
यदि तुम में सूरज चांद और सितारों जैसी चमक दुमक नहीं है न सही । जुगनू की तरह तुम में कुछ तो रोशनी है ! प्रेम की चमक से कुछ तो चमको जिसमें अधिक नहीं तो कुछ तो चमक लोगों को दिखलाई दे । तुम्हारे जुगनू होने में तो सन्देह ही नहीं है। मालिक का प्रकाश उसके सारे बाल बच्चों में कमी बेशी के साथ है। .. अशा प्रकृति की जान है । अच्छी अवस्था के प्राप्त करने की आशा रक्खो परन्तु यह याद रखो कि सबकी भलाई में तुम्हारी अपनी भलाई है। शरीर को उस समय सुख मिलता है जब उसके अंग अंग ठीक रह कर अपना अपना काम करते रहते हैं। तुम सब भी इस संसार में ऐसी ही हैसियत रखते हो । एक दूसरे से कभी किसी हालत में अलग नहीं हो ! हाँ भेद केवल इतना है कि तुम अपने आपको अंश मान रहे हो। फिर भी कोई चिन्ता नहीं। सारे अंश मिलकर कुल (पूर्ण) होते हैं।
यदि किसी को कुछ दे नहीं सकते तो कम से कम उस पर तरस खाओ और दया करो। यह भी कम नहीं है।
– यदि मनुष्य अपनी संसोरी भलाई का प्रयत्न करे तो वह
शिव पुरुषार्थी बन जायेगा । बौद्धों का धार्मिक सिद्धान्त यही है। और इसी एक बात को वह मुख्य समझकर अपने जीवन को अङ्ग संग बना लेते थे।
सातवीं तरंग शब्द विचार
दोही । शब्दहिं मारे मर गये, शब्द हि तजिया राजे ।
जो यह शब्द विबेकिया, ताका सरिया काज ।। कबीर ।। ‘शब्द अभ्यास’, ‘शब्द विद्या’, ‘शब्द योग’, ‘शब्द ब्रह्म‘, इत्यादि शब्द सैकड़ों वर्षों से लोगों की जुबान पर रहते हैं। परन्तु शब्द क्या है इस पर बहुत कम आदमी विचार करते हैं। बहुत ही थोड़े लोग हैं जो शब्द की असलियत को समझते हैं।
शब्द आवाज को कहते हैं। आवाज़ दुनियाँ में सब से बलवान शक्ति है। यह प्राणों का प्राण और जीवों का जीव भी है। चिउँटी से लेकर ब्रह्मा तक और पाताल से सत्य लोक तक यदि कोई वस्तु सर्व व्यापक है तो वह शब्द ही है। दर्शन शास्त्रज्ञ फिलास्फूरों ने आकाश का तत्त्वे शब्द ही को कहा है। परन्तु वह यहीं तक नहीं है । यदि वह एक ओर प्रकृति की जान है तो दूसरी ओर पुरुष की रूह भी है । – ‘प्रकृति‘ संस्कृत शब्द ‘प्र‘ ( बड़ी ) और ‘कृ‘ ( कर्म ) से बनी है। बड़ाई और कर्म की जान सिवाय शब्द के और क्या हो सकती है ? जहाँ कर्म है वहाँ क्रिया है। जहाँ क्रिया है वहाँ कोई वस्तु भी है जिस से वह क्रिया होती है। इस लिये यह प्रकृति भी क्या हुई ? शब्द ही तो हुई। इसी तरह पुरुष,
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अनमोल विचार हैजो शरीर में रहता है वही पुरैष है। शरीर में क्या रहती है? विचारने से पता लगता है कि वह शब्द ही तो है। शब्द के सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं । ‘बोलता‘ निकल गया उट्टरी पड़ी हुई है। ‘बोलता’ ‘पुरुष’ ही का नाम है। प्राण बोलता है। यह किसके आधार पर बोलता है ? शब्द के आधार पर, इस लिये मन, प्राण, बाणी, आत्मा, परमात्मा; ब्रह्म, ‘परब्रह्म, ओंकार पुरुष, सोहं पुरुष और सत् पुरुष यह सब के सब शब्द ही कहे जा सकते हैं। वह असल और नकल की दृष्टि से शब्द के सिवा और कुछ भी नहीं हैं।
मार्मिक पुस्तकों पर विचार करो। हर जगह शब्द ही शब्द है। वेद कहते हैं “पुरुष ने कहा ‘मैं हूं‘ और वह मैं हो गया; पुरुष ने सोचा मैं एक से अनेक हो जाऊँ‘ और वह एक से अनेक बन गया । इसमें कहना सोचना और होना सिवाय शब्द के तमाशों के और क्या कहा जा सकता है। यूनि की इन्जील कहती है ‘पहिले शब्द था। शब्द ईश्वर था। शब्द ही ने सब कुछ पदा किया।” इज़रत मूसा की तौरेत भी यही कहती है “ईश्वर ने कहा प्रकाश होजाये और प्रकाश होगया । । क्या इससे सिद्ध नहीं है कि शब्द ही पैदा करने वाला है। मुसलमान क्या बोलते हैं “खुदा (ईश्वर) ने कहा ‘कुन’ (हो जा)
और दुनियाँ बन गई।” सोचो और तुम समझ जाओगे कि जिसको ईश्वर व.हा जाता है वह वास्तव में शब्द मात्र है। शब्द के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। शब्द को साधारण वस्तु न समझो। उसके परदों के अन्दर घुसो तब पता लगेगा। पन्थु के आत्म ज्ञानी आचार्यों ने तो परदा देकर शब्द इन को सार तत्व बतलाया है परन्तु सत्पुरुष राधास्वामी दयाल नेः प्रगट होकर स्पष्ट शब्दों में उसकी व्याख्या करदी है। आप का बचन है:-
* शिव के ‘ शब्द गुप्त तब रहा अनाम ।
शब्द प्रगट तब धरिया नाम ।।” । अर्थात् जब तक यह शब्द प्रगट नहीं हुआ था तब तक वह अनाम और बेनाम वाला था और जब शब्द प्रगट हुआ तो वही नाम वाला हो गया। इससे उत्तम आज तक किसी ने भी शब्द की व्याख्या नहीं की ।
संत जगजीवन साहिब के शिष्य दूलम दास जी की बाणी है:–
• शब्द .
देख आयो मैं तो साई की डगरिया, साई की डगरिया, सत् गुरु की सेजरिया, देख आयो मैं: (टेक) . शब्द हि ताला शब्द हि कुन्जी, शब्द की लगी हुँजिरिया ॥
शब्द ओढ़ना शब्द बिछौना, शब्द की चटक चुनरिया ।। शब्द रूप स्वामी आप बिराजे, सीस चरन पर धरिया ।। दूलम दास के साई जगजीवन, अग्नि से अधिक उजरिया।। | यह शब्द ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का आधार है। यह सञ्च लोकों में ‘हिरण्य गर्भ‘, ‘अव्याकृत‘ और ‘विराट‘ है। यही मध्य लोक का ‘ब्रह्मा‘, ‘विष्णु’ और ‘महेश‘ है । यही शब्द इस निचले मण्डल में जीव रूप में ‘विश्व‘, ‘तेजस्‘ और ‘पराग्य‘ है। यदि शब्द ‘ब्रह्म‘ है तो ब्रह्म का प्रगट होना भी शब्द ही है। यदि ‘ब्रह्मा‘ शब्द है तो ‘ब्रह्मानी‘, ‘गायत्री‘, और ‘सावित्री‘ भी शब्द ही हैं। शब्द के सिवा और हो क्या सकता है ? सोचो और विचारो तो अभी असलियत का परदा उठ जावे और उसका दर्शन प्राप्त हो । विना बिचारे हुये कोई कैसे उसकी असलियत का पता पाये !
यह शब्द ही ‘ब्रह्माण्ड‘, ‘पिण्ड‘ और ‘वसुदेव‘ है और
* अनमोल विचार * इसी के पेट में ‘का शब्द, ‘जीव‘ का शब्द और ‘कृष्ण भगवान‘ की बाँसुरी बजती रहती है। गोपी और गोप कहते हैं। “बाँसुरी बाज़ी मधुबन में ।“
बहती हुई हवा उसी का गाना सुना रही है। चलता हुआ पानी सच्चाई का राग गा रहा है। जलती हुई आग हजारों लपलपाती हुई जुबानों से असलियत का अलाप अलाप रही है। वृक्षों के पत्ते एक दूसरे के साथ टक्कर खाकर झाँझ
की तरह बज रहे हैं।”
पशु पक्षी सब अपनी अपनी बोली में उसी की स्तुति गा रहे हैं। इसी शब्द या आवाज़ में जीवन है। इसी में मौत का भी तमाशा है। बच्चा पैदा होते ही आवाज करता है। यदि उसके मुंह से शब्द नहीं निकलता तो वह मृतक समझा जाता है। शरीर की फुर्ती, इन्द्रियों के कर्म और ज्ञान. शब्द ही के आधार पर हैं। कर्म के सिलसिले में हर जगह शब्द गूजा रहा है। तुम सुनो या नसुनो परन्तु इससे खाली कोई भी वस्तु या स्थान नहीं है। जलते हुये किंराग और पके हुये लकड़ी पत्थर के अणु अणु से शब्द :: हो रहा है. मेज
और कुरसी को एक जगह कुछ दिनों के लिये रख दो । उनका रंग रूप बदल जायेगा क्योंकि शब्द का नियम उनके परंमाण को चलाता हुआ तबदीली के लिये मजबूर करता रहता है और वह बन कर बिगड़ते और बिगड़ कर विशेष रूप से बनते रहते हैं। यदि तुम इनकी ओर से अपनी आँख न मीच तो इनके अन्दर भी आवाज को गूंजती हुई सुन सकते हो । । । ।
शब्द प्रकृति का गुप्त रहस्य है जिसका कार बार पल पल. होता रतहा है । कवि ने करुणा रस की कविता सुनाई। सुनने
लों का कुलैजा दहल गया, सर में चक्कर आ गया और
शिव आँखों से आँसू बहने लगे। उसने लहजा बदल दिया। उसी शब्द को वीर रस में दुहराया। रोंगटे खड़े होगये। आँखें अ‘गारों की तरह लाल हो गई। दिल बल्लियों उछलने लगा। अब उसने मस्ती का राग छेड़ा। सच मस्त होकर झूम रहे। हैं। जब आँखें हमदर्दी की नजर से पपोटों के अन्दर हरकत करती हैं टूटे हुये दिल जुड़ जाते हैं। उसकी हरकत में जादू । की आवाज है जिसको केवल विवेकी पुरुष सुनते हैं। हाथों के इशारों में जादू का असर हैं क्योंकि इनमें वही आवाज छुपी हुई काम करती है।
जुबान बोले या न बोलै वही काम आँखें करती हैं। आँखें देखें या न देखें दिल वही काम करता रहता है। दिल सोचे या न सोचे अन्तरी शब्द काम किये हुये बिना कब रहेगा ! यह बहुत ही गूढ़ विषय है जिसकी समझ किसी संत महात्मा ही को होगी। यही शब्द हाथ पाँव वाला है और इसके हाथ पाँव नहीं भी हैं। यही सगुण और निर्गुण ब्रह्म है। यह प्रगट होकर कहीं दवा और इलाज करता है और कहीं शरीर को घायल और दिल को चूर चूर भी कर देता है। फ़क़ीर की ,
आवाज दुनिया की ओर से बेपरवाह बना देती है और संसारी मनुष्यों की बात संसार के झमेले में फंसा देती है।
.:. दोहा
एक शब्द सुखेरास है, एक शब्द दुख रास । एक शब्द बन्ध कट, एक गले की फाँस ॥ १ ॥ शब्द शब्द सब कोइ कहै, शब्द के हाथ न पाँव । एक शब्द औषध करै, एक शब्द करे घाव ॥ २॥ एक शब्द के रंग रूप और हिसाब होते हैं और यही शब्द रंग रूप और हिसाब से खाली है। यह न समझो कि,शब्द
* अनमोल विचारे ।
का रंग रूप नहीं है और वह गिनती में नहीं आता। उसमें सब कुछ है, और कुछ भी नहीं । क्रोध के शब्द का रंग अगारे की तरह लाल है । प्रेम के शब्द का रंग नीला है। ज्ञान के शब्द का रंग उजाला है । क्रोध के शब्द का रूप डरावना है। प्रम के शब्द का रूप मनोहर है । ज्ञान के शब्द का रूप सूदर्भ
और पवित्र है। एक एक शब्द के हजारों प्रभाव हैं। वह एक होता हुआ अनेक भी है। तुम किस झगड़े में फंसे हो ! इसी । शब्द की ओर ध्यान दो और सब कुछ तुम्हरी समझ में आनायेगा। यही आत्मा और परमात्मा है । तुम किस अमा और परमात्मा के झमेले में जाकर अटके ! यही शरीर है। यही रूह (सुरत) है। यही दिल है । यही दिमाग है। राही बीमारी है। यही दवा है । कहाँ तक हम खोल कर कहैं ! यदि
आदमी चाहे तो केवल गाना सुना कर बड़े से बड़े रोग को दूर कर सकता है। यदि किसी को इसकी असलियत का पता लग जाये तो वह बुझे हुये चिरागों को दम के दम में जला दे। इसमें शक्ति, है कि पानी को पत्थर बनी. दे और पत्थर को पानी करके बहा दे । यह साइन्स की जान, विज्ञान की रूह * और फिलोस्फी का, इत्र है। आज सम्भव है तुम हगारी बातों पर हँसी उड़ाओ परन्तु समय आयेगा जब शब्द‘ की महिमा समझ में आयेगी। उस समय तुम हाथ मलोगे कि हाय ! हम ने सचाई की और से अांखें मीचे रक्खी थीं। अवसर था कि तुम हम से या किसी और से परमार्थ की कुजी प्राप्त कर लेते और अपना काम बनाते परन्तु पद्दपात और हठधर्मी कर रहे हो और संचाई के ग्रहण करने से
दोहा । शब्द हमारा इम शब्द के, शब्दहि लेय परख ।
भागते हो।
शिव । जो तू चाहे मुक्ति को, अब मत जाय सरक॥१॥ शब्दं हमारा आदि का, पल पल करिये याद । अन्त फलेगी माँह की, बाहिर के बरबाद ॥२॥ (१) अन्दर शब्द हमारा हम शब्द के, शब्द: ब्रह्म का कुफ् । जो चाहे दीदार को, परख शब्द का रूप ।।३।। दिल के ऊँचे बनो। किसी पन्थ या धर्म को बुरा भला क्यों कहते हो ? म को देखो । हम ने किसी धर्म की निन्दा करते हैं न बुराई । सब का इत्र निकाल कर तुमको सुघाते रहते हैं। बुराई से बुराई और भलाई से भलाई पैदा होती है । हम ने गुरू की अपार दया से शब्द का कुछ भेद प्राप्त किया। अब हम को संसार के सारे धर्मों में सचाई ही सचाई दिखलाई देती है। तुम भी ऐसा ही कर सकते हो। – शब्द बिना सुरत आँधरी, कहो कहाँ को जाय।
• द्वार न पावै शब्द का, फिर फिर भटका खाय ॥
शब्द का ज्ञान प्राप्त करके आवाज दो। फिर किस की मजाल है कि तुम्हारी आवाज को न सुने ! बिना शब्द के ज्ञान के क्या हो सकता है !
तुम्हारे दिमाग के आसमान में आवाजें गूज रही हैं, परन्तु म नहीं सुनते और सुनो भी कैसे ! पक्षपाती और कट्टर बन रहे हो । क्यों दिल से इन बुराइयों को दूर करके पवित्र हृदय होकर अन्तरी शब्द और गाने को नहीं सुनते ! अभी सारी बुराइयों से छुट जाओ और हठ धर्मी और तंग दिली जाती रहे। यही शब्द वास्तव में आकाश बाणी हैं। यही ईश्वरीय वाक्य हैं।
मुसलमानों में मौलाना रूम एक प्रसिद्ध महात्मा हो गये हैं। उनकी कविता फारसी में हैं। एक जगह वह लिखते हैं–“१. पैगम्बर ने कहा–खुदा (ईश्वर) की आवाज मेरे कानों में
१६ ।
| अनमोल विचार जोरों से आती रहती हैं । (२) सूरमा बनकर आसमान को पाँव के तले लाओ और असमान पर चढ़ कर राग सुनो । (३) जो आवाज तुमको ऊपर की ओर खींचती है समझ ली. कि गह ऊपर से आ रही है। (४) जिस आवाज़ से लोभ उत्पन्न हो, जान लो कि वह भेड़िये की आवाज़ है जो दुनिया को फाड़ डालेगी । (५) कानों को पास लाओ। वह दूर नहीं है परन्तु तुमसे स्पष्ट कहने का हमारा दस्तूर नहीं है । (६) यदि थोड़ा। सी भी हाल इन शब्द का सुनायें तो अभी कब्रों के मुर्दे जी उ । (s) इस राह में जीते जी आकर अपना काम बना लो और
अन्त समय तक बेसुध और अचेत मत रहो ।”
सम्भव है तुम कहो कि हम अपनी ओर से नई शिक्षा तुम्हें दे रहे हैं। तुम्हारा यह विचार असत्य है। नई और पुरानी कहने सुनने के लिये हैं। न कोई वस्तु पुरानी है न नई है। तुम नहीं देखते कि हम वेदों का इत्र, मसीही धर्म का तव और मुसलमान संतों का असली मतलब तुमको बता रहे हैं। हाँ, इनमें बारीकियाँ हैं। स्पष्ट व्याख्या नहीं है। यह काम इम कर देते हैं। पूर्ण धनी हजूर महाराज ने जो शिक्षा दी है गह हम सुनने वालों को निर्पक्ष होकर अनेक रूप से सुनाते और समझाते रहते हैं। हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान और यूनानी फिलोसफी का यही इत्र है। हम गुरू बनने की इच्छा से यह तुमको नहीं सुनाते । तुम इसको समझ लो और जहाँ से तुम्हारा जी भरे उपदेश लेकर काम में लग जाओ। यदि इतना कहने पर भी नहीं समझते तो तुम जानो और तुम्हारा काम जाने ।
हर आवाजे की तुम्हारे अन्दर हद है। उस हद में आज सनते हुये, बेहदीं की ओर चलने लगोगे और एक हैवी जगह में पहुँचोगे जहाँ रैग रूप और रेखा कुछ भी नहीं है।
शिव न एक अनेक का झगड़ा है। सच्ची शान्ति, असली सच्चाई – और अमर पद प्राप्त कर लोंगे। तुम संसारी झमेलों और बुराइयों से शुद्ध और पवित्र होकर उस स्थान के बासी हो जाओगे जिसको संत “राधास्वामी धाम” कहते हैं। यदि इस अकेली और सच्ची युक्ति से चूक गये तो यों ही औरों की तरह भटका खाते ग्होंगे। फिलोरफी से यह गुत्थी कभी न सुलझेगी क्योंकि वह कबीरं साहिब के बचनानुसार काल मत, झाई मार्ग और छाया की राह है।
इससे अधिक क्या कहें ? बहुत कह चुके। यदि जी में आये और मन माने तो सुरत शब्द योग के साधन में लगो।
…दोहा, १ १ – जैसे जल में कॅवल निरालम, मुर्गाबी नशानिये ।
सुरत शब्द भव सागर तरिये, नानक नाम बखानिये ।।
आठवी तरंग
समय समय की बातें सम्भव है तुम्हारी भलाई का यही समय हो। भलाई के भी अनेकों रूप हैं–हवा का झोंका आया, बच्चे की आवाज कान में पड़ी. वृक्ष से पत्ता टूट कर गिरा, बिजली का कौंधा कड़क कर चमका, बुरे भले समाचार सुनने में, आये। यह सब स्वर्ग के दूत हैं। यदि तुमने इनकी ओर कुछ भी ध्यान दिया तो दम के दम में जीवन सुधर जायेगा और यदि इनकी
ओर से बहिरे और अन्धे बन गये तो फिर समय जाता रहा। कौन जाने वह कब फिर आवे ? सम्भव है इस जन्म में न आये ।
बुद्ध भगवान ने बूढे, रोगी और मृत्यु के दृश्य देखकर
अनमोल विचार : संसार के असार होने का उपदेश ग्रहण किया और आत्म ज्ञानी होगये। दत्तात्रेय जी दुनिया की बहुत ही छोटी छोटी बातों को देख कर त्यागी और ऋषि बन गये। तुम भी रादि चाहो तो इसी तरह बुद्ध और दत्तात्रेय हो सकते हो ।
किताबें पढ़ते हो। यदि उसकी कोई पंक्ति दिल में कुछ प्रभाव करती है तो उसको ध्यान दो ।‘ कौन जाने यही तुम्हारी मुक्ति का कारण हो । .. तुम्हारा अपमान हुआ । नेकनामी जाती रही । बदाम हो गये। क्या इससे भी तुम्हें कुछ उपदेश नहीं मिलता है। । धन द्रव्प्र. जाता रहा। दिवाला निकल गया । कंगाल और निर्धन बन गये। क्या अब भी आँख नहीं खुलती है। । सन्तान मर गई। इष्ट मित्र जाते रहे। स्त्री चल बनी। यह सब बातें दिल के उभारने और सच्चाई की राह में जाने के लिये काफी हैं।
भूलो मत । चेत करो समय चला जा रहा है। उसके इशारों को समझो और अपना काम बनाओ । उपदेश नित्य ही। नहीं किया जाता। तुम दिल को कड़ा न करो। उसे मुलायम होने दो। इसीसे उसमें पवित्रता और सूक्ष्मता आयेगी। पानी भाप बनकर ऊपर की ओर चढ़ता है। मिट्टी पाँवों से दब‘ दुब कर गर्दै के रूप में आसमान से बातें करती है। लकड़ी जलकर धुआँ होजाती है। उसे मुट्ठी से पकड़ो तो सही। संसार की विचित्र घटनायें केवल जीवन के सुधार के लिये हैं। यदि नहीं समझते तो फिर और कोई गुरू तुम को क्या उपदेश सुनायेगा और तुम क्या और किस की सुनोगे ।
समय आ गया है। सोचो समझो और काम में लगो ।
शिव की नवीं तरंग
मृग तृष्णा मारवाड़े के रेतीले हिस्सों में मृगतृष्णा के दृश्य अधिकता से देखने में आते हैं किन्तु यों कहना चाहिये कि सारे राजपूताने के रेगिस्तान में अधिकतर यही हाल रहता है। यदि दिल्ली की जामा मसजिद् पर जेठं बैसाख के दिनों में दोपहर के समय चढ़ो तो पूरब की ओर उस जगह से भी कभी कभी सामने की ओर नदी के लहराने को धोको हुआ करता है। दिल्ली भी राजपूताने के रेगिस्तान में हैं। इस रेगिस्तान की फैलाव हिन्दुस्तान से लेकर अरब और अफ्रीका के जंगलों तक है। अरब की मृग तृष्णा से और भी धोका होता हैं । केही जाता है कि वह देखने में बड़े ही मनोहर प्रतीत होते हैं। आदमी प्यासी है। सामने उसको न केवल नदी दिखाई देती है किन्तु उस पर ऊँचे ऊँचे पुल, खम्भे, मेहराब सभी दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं किन्तु आबादी और बस्ती का धोका भी होता है। सामने ऊँचे ऊँचे मीनार खड़े हैं। पुलों की खिड़कियाँ खुली हुई जान पड़ती हैं। पुलों पर या इन मीनारों की चोटियों पर चील कौवे और बगुलें भी मॅडलाते रहते हैं। प्यासा पथिक कैसे समझे कि वास्तव में आंखों को धोका हो रहा है! वृह खुली अखि देख रहा है। फिर सन्देह क्यों करे। बढ़ता हुआ आगे की ओर कई कोस चला जाता है परन्तु न कभी दूरियों तक पहुँचता न बस्त में पैर रखने की नौबत आती है। यदि किसी ने उसकी इसे मृग तृष्णा का भेद ने बताया तो वह थक थकाकर राह में पड़ रहता है क्योंकि एक तो कोई आदमी अकेले राह नहीं, चलेता, दूसरे लोग जानते रहते हैं कि यह बस्ती नहीं है,
* अनमोल विचार * न नदी है, न पुल है, यह केवल मृग तृष्णा है । यह अनजान
आदमियों को समझा देते हैं।
जिस प्रकार इस का तमाशा हुआ करता है वैसा ही संसार में माया का खेल भी है। भृगे तृष्णा का दृश्य वास्तव में है नहीं परन्तु दिखाई देता है । माया भी अनहुई परन्तु भासती रहती है। ज्ञानी और मूर्ख दोनों को उसका भ्रम होता है। मूर्ख तो इस भ्रम में पड़कर जान दे देते हैं और बुद्धिमान अनुभव प्राप्त करके कभी कभी बच जाते हैं ।
सभी जानते हैं कि संसार में कोई किसी का नहीं है। लड़की लड़के, इष्ट मित्र, भाई सम्बन्धी, अपने पराये, धन द्रव्य किसी का विश्वास नहीं । सब स्वार्थी हैं और अपने मतलब के लिये घेरे रहते हैं परन्तु कौन ऐसा मनुष्य है जो उन के जाल में फँसा हुआ नहीं है ? समय पर और कामः पड़ने पर सब आँखें फेर लेते हैं परन्तु मनुष्य को देखो ! उसे कितना ही अनुभव हो फिर भी सम्भव नहीं कि वह इन की ओर न जाये और इन के हाथों दुख कष्ट न उठाये। दो चार से बीस बार को सताया हुआ आदमी भी इस जाल से नहीं निकलता और न निकलने का उपाय सोचना है। वह रोता है चिल्लाता है। रात दिन दुखी रहता है और साथ ही जानता भी है कि संसार ने आज तक किसी का साथ नहीं दिया। यह बालू की भीत है। जो यहां आया सब कुछ छोड़ कर चला गया। न कुछ अपने साथ ले गया न कोई उसके साथ गया । परन्तु क्या वह कभी विचार करके उससे बचने और सँभलने का यत्न भी करता है ? हम को ऐसा एक आदमी भी दिखलाई नहीं देता। औरों को क्यों कहें हम स्वयं अपने जीवन के कामों पर विचार करते हैं। परन्तु यह विचार क्या काम करता है। आज अभी विचार किया और आज ही उस
शिव के
६३ के प्रतिकूल काम करने लगे। विचार और बेविचार सब बराबर हो जाता है। कभी कभी हमने घरों की स्त्रियों को
आपस में लड़ते हुये देखी। बुरा भला सब कुछ इसे निकल गया। थोड़ी देर पीछे वह फिर वैसे ही बात चीत करने लगीं जैसे कुछ हुआ ही न था और फिर बात बात में लड़ बैठीं । यह खेल नित्य ही देखने में आता है। लाहौर शहर की साधु स्ट्रीट में मेरे दफ्तर के सामने कई पंजाबी रहते थे। दो घरों में मौतें हो गई। बिरादरी की स्त्रियां सियापा (मातम) करने के लिये आई‘, ‘रोई पीढीं और चिल्लाई‘। थोड़ी देर पीछे एक दूसरे से कहने लगीं “तू मेरे बहू के सियापे में नहीं आई थी मैं भी तेरे घर न आऊँगी।” इसी बात पर झगड़ा मैच गया, दूसरी स्त्रियों ने समझा बुझा कर बीच बचाव किया। फिर इनमें हँसी दिल्लगी होने लगी । कहां लड़ाई झगड़ा ! कहाँ हँसी ठठल !







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