[2-600 ] दाता ज्ञाता पितु और माता, छिन छिन तेरा ध्यान रहे ।
जग त्राता भ्राता सतराता, तेरे नाम का गान रहे ।।
सुमिरन तेरा ध्यान हो तेरा, तेरा भजन हर आन रहे ।
तेरी बानी अगम निशानी, उसी ओर मेरा कान रहे ।।
तुझको ध्याऊ तुझको गाऊँ, तेरा ही अरमान रहे ।
सुमिरन भजन ध्यान सेवा में, मेरी जान और प्रान रहे ।
सुरत निरत तेरे रंग राती, तेरे रूप का ज्ञान रहे ।
जहाँ जहाँ देखू तेरी लीला, तेरा ही अभिमान रहे ।।
जो जो सुनू सो तेरा बचन हो, मन से दूर मदमान रहे।
राधा स्वामी चरन शरन बलिहारी, भव से सुरत अलगान रहे ।
[3-601 ] जगत में आये बहुत दुख पाया, प्रेम का नगर दिखादो जी।
भरमत भरमत चहुँ दिस डोलू, सच्ची डगर बता दो जी ।
मोह नींद में निस दिन सोये, बाँह पकड़ के जगा दो जी ।
मैं तो अचेत चेत नहीं किंचित, चित से अपनी चेता दो जी ॥
ज्ञान भक्ति का सार न जानू, मेरा अज्ञान मिटा दो जी।
चित चकोर निरखे गति चंदा, ऐसी लगन लगा दो जी ।
सुध बुध मन की सब ही भूलू , प्रेम का प्याला पिला दो जी।
मतवारों की चाल चलू नित, प्रीत की चाल चला दो जी ॥
आँख न मृदू कान न रूधू, सहज समाधि लगा दो जी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर उगादो जी ।।
[4-602 ] धन धन भव भंजन जन मन रंजन, काम निकंदन गुरु राई ।
धन सुरमुनि नायक जगत सहायक, सुखदायक धन प्रभुताई ॥
धन करुणा सागर सब गुण आगर, गुनातीत गदि हरी ।
धन घटघट बासी प्रभु अविनाशी, सुखरासी दुख नास करी॥
धन ज्ञानी ज्ञाता विश्वविधाता, सर्व जनन के पितु माता।
धन करता धरता नेह की सरिता, मुक्ति भक्ति के निजं दाता ।
धन परम सियाने वेद बखाने, ऋषि मुनि नहीं जाने चतुराई ।
धन दीन दयाला सहज कृपाला, बार पार नहीं कोई पाई ।।
चरन शरन दे अपना कीजे, भक्ति भाव राधास्वामी दीजे ।
मैं अति नीच निकाम अनारी, पद सरोज में ले लीजे ॥
[5-603 ] धन धन धन दाता सुर मुनि त्राता, व्यापक परमा नन्दा ।
धन धन अविनाशी घट घट बासी, माया रहित मुकुन्दा ।
धन अपरम्पारा जगत अधारा, पार न पावे कोई ।
धन परम कृपाला दीन दयाला, करहु अनुग्रह सोई ।।
आदि अनादि अनन्त अमाया, निःकाया महिमा भारी ।
देव दनुज नर किन्नर करता, सन्त जनन के हितकारी ।
क्या कोई जाने तुम्हरी लीला, अगम अपार अरूप हो तुम ।
भेद न पावे ऋषि मुनि कोई, सारे जगत के भूप हो तुम ॥
सुनत कान बिन लखत नैन बिन, चलत बिना पद निस वासर ।
बिन जिभ्या बोले बहुबानी, ग्रहण करत सब कुछ बिन कर ॥
[9-604 ] प्राणों का है प्राण पिता तू , जीवन का है आधारा ।
निर्भर यह ब्रह्मांड है तुझ पर, तू है सब का रखवारा ॥
तू है जोत नेन की सब के, तू है घट घट का वासी।
अन्तरयामी प्रीतम प्यारा, अजर अमर विभु अविनासी ।।
जल में तेरी शीतलता है, तेज में है प्रकाश तेरा ।
वायु में है तेरी शक्ति, और आकाश में भास तेरा ।।
तू है एक अनेक रूप में, अगम अगोचर निर्माया ।
यह ब्रह्मांड तेरी है काया, फिर भी तू है निरकाया ॥
बिन पग चलत सुनत बिन काना, मिन जिभ्या बाचाल है तू।
माया मोह से रहित निरन्तर, सब जग का प्रतिपाल है तू ॥
तू है देस निमित भी तू है, और कहूँ क्या काल है तू ।
जड़ चेतन है कारन कारज, करुणा मय कृपाल है तू ॥
फूल फूल में बास है तेरी, मेंहदी में है तू लाली ।
चकमक में ज्यों आग छुपी है,एक तिल नहीं तुझसे खाली।
दया सिंधु है दीनबन्धु है, भक्त जनन का हितकारी ।
सृष्टि प्रलय लीला है तेरी, तू है हलका तू भारी ।।
तू व्यापक तू अविच्छिन्न है, तू सब में सब हैं तेरे ।
सब में रमा अलग है सब से, सब से दूर सब से नेरे ॥
रोम रोम में गुप्त हुआ है, अणु अणु में प्रगट है तू ।
हृदय गुफा में बास है तेरा, जीव जन्तु का घट है तू ॥
महिमा अनिमा लधिमा गरिमा, हैं अनेक यह तेरे रूप ।
तू सेवक है तू स्वामी है, तू है परजा तू है भूप ॥
क्या माँगू तुझसे मैं स्वामी, तू मेरा मैं हूँ तेरा ।
खोजूं क्यों मैं देस देस में, हिये में है तेरा डेरा ॥
[ 7-605 ] सबका आदि अन्त तू दाता, धन्य धन्य तेरी माया ।
व्यापक सत चित आनन्द स्वामी,कर निज दासों पर दाया।
तेरी थाह न पावे कोई, अगम अपार से पार है तू।
लीला तेरी सब से अद्भुत, एक तीन दो चार है तू ॥
जड़ चेतन में तेरी छाया, क्या कोई भेद तेरा जाने ।
योगी ऋषि मुनि ध्यान लगावें सबमें विभो तुझको मानें।
हम सब तेरे बाल बाल हैं, तू पितु मात सखा स्वामी ।
सबमें रमा सकल से न्यारा, घट घट का अन्तरयामी ।
[8-606 ] मन मोहन चित चोर छबीला, अलबेला प्यारा है तू ।
मेरे मन में आन विराजा, इन आँखों का तारा है तू ॥
तुझपर छिनछिन बलि बलि जाऊँ,निसदिन तेरा गुन गाऊँ।
तुझको सुमिरूँ तुझको ध्याऊँ, सच्चा करतारा है तू ॥
योग कठिन वैराग कठिन है, ज्ञान का दान मिले मुझको ।
प्रेम बसा जब मन में आकर, प्रान का अपने आधारा है तू ॥
[9-607 ] घट में चली सुरत मतवारी, छोड़ जगत की माया हाँ ।
मन को साधा गुरु आराधा, गुरु गम चित्त बसाया हाँ ।।
नाचत गावत धूम मचावत, तजी असार की छाया हाँ।
सहज विरागी पद अनुरागी, गुरु ने की है दाया हाँ ।
इत से तोड़ा उत से जोड़ा, भरम अज्ञान भिटाया हाँ ।
सुरत नवेली भई है रंगीली, राधास्वामी रंग रंगाया हाँ।
शम दम संयम नियम धरम सम, हानि करे नहीं काया हाँ।
ज्ञान न जाना मुक्ति न माना, भक्ति का साज सजाया हाँ।
जीवन बूटी सब विधि लूटी, आवागमन नसाया हाँ ।
राधास्वामी धामा अचल मुकामा, हरष हरष गुन गाया हाँ ।
[10-608 ] आँखों का तारा सबका सहारा, हित चित से तू प्यारा है ।
निर्मल शुद्ध बुद्ध हितकारी, सुख सम्पति परिवारा है।
घट घट बासी आनन्द रासी, अविनासी मंगलकारी ।
रोम रोम में रमता जोगी, रोग सोग से न्यारा है।।
गुणातीत गोविंद मुरारी, पुरुषोत्तम करुणा सागर ।
जन मन रंजन दोष विभंजन, प्रेम प्रीति भंडारा है ।।
नाम लेत भव सिंधु सुखावें, ध्यान धरत कलि मल जावे ।
भव दुख मेटन दोष नसावन, भक्ति रीति का सारा है।
करम धरम वैराग ज्ञान तत, विज्ञानी पूरा सच्चा ।
हे दयाल करो दृष्टि दया की, हृदय दुखी हमारा है ।।
अब तो शरन में आन पड़ा हूँ, एक आस तेरी मुझको ।
राधास्वामी चरन से प्रीति रहे नित,वही धुर इष्ट सहारा है।।
[11-609 ] जग का स्वामी जग का दाता, जग का पालनहारा ।
जग त्राता जग पितु माता, जग का राखनहारा ॥
चरन कमल में सीस झुकाऊँ, निस दिन तेरा गुन गाऊँ।
काम क्रोध मद त्याग ईर्षा, तुझ से नेह लगाऊँ॥
निस दिन सुमिरूँ पल पल ध्याऊँछिन प्रतिछिन गुन गाऊँ।
दुख में सुख में हर्षे शोक में, चरनन पर बलि जाऊ ॥
सिंधु एक अति घोर गम्भीरा, नाव न बेड़ा भारी ।
दिन प्रतिदिन जपू नाम निरंतर, जाऊँ भव जल पारी ।।
भक्ति दीजे मुक्ति न दीजे, ज्ञान न दीजे स्वामी ।
लव लगि जाय लगन की लारा, तू पद कमल नमामी ।
[12-610 ] सिरजन हारा पालन हारा, राखन हारा श्रुति सारा ।
जानन हारा धारन हारा, मारन हारा रखवारा ॥
महिमा विमल अनूपम तेरी, सब में रमा सबसे न्यारा ।
ऋषि मुनि कोई भेद न पावे, वेद कहे अपरम्पारा ॥
कारन कारज कमें विधाता, हरता धरता करतारा ।
राता माता अपनी दशा में, परम तत्व का भंडारा ॥
तेरे बिना नहीं कोई रक्षक, सबका है तू आधारा ।
प्रीतम प्यारा भक्त सहारा, जन की आँखों का तारा ॥
भूल भटक से भरम मोह से, प्रभु दे सबको छुटकारा ।
जग की आस त्याग करुणामय, पहुँचादे भव जल पारा ॥
घट घट वासी सकल प्रकासी, हित सुत और संपत दारा ।
अन्तरयामी सबका स्वामी, धन यश मंगल परिवारा ॥
भक्ति दान दे शक्ति दान दे, बुद्धि दान दे दातारा ।
चरन कमल में सीस झुकाकर, रहूँ बसू चरनन लारा ॥
[13-611 ] वह द्वत भी है अद्वत भी है, द्वत अद्वत के पार गुरु ।
संसार का सार असार नहीं, दोऊ सार असार के वार गुरु ॥
मति जेहि न लखे जो मति में रहे, मति सुमति कुमति को राह नहीं।
यहि सिंधु महा गम्भीर कहा, मरजीवा की वामें थाह नहीं ।
जब आप कहे सब कोइ लहे, बिन बानी कथे सब भेद सही।
नहिं देस विदेस अदेस कभी, संदेस बताये सुनाये कही ।
नहीं कर्म धर्म न मर्म भया, निःमर्म का मर्म कहे कोई क्या ।
निःअक्षर अक्षर क्षर जो नहीं, तज बुद्धि ताको कहे कोई क्या।
राधास्वामी ने रूप धरा गुरु का, तब भेदी को भेद दिया अपना ।
पद तुर्या नहीं तुर्या है वहीं, सुखनींद न जाग्रत नहीं सपना ॥
[14-612 ] गुरु गुन गाना गुरु छबि ध्याना, गुरु मत ज्ञाना काम तेरा।
नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, चित ठहराना जतन सदा ॥
कृपा सागर सब गुन आगर, नागर गुरु तेरे स्वामी ।
क्यों दुख पावे भरम भुलावे, मूरखता से अति हानी ॥
जन मन रंजन दोष विभंजन, भव खंजन गुरु हितकारी ।
धर विश्वासा चरनन आसा, राधास्वामी के बलिहारी ॥
[ 15-613 ] संसार असार में सार नहीं, कर सार शब्द का निरवारा ।
कोई साथी नहीं कोई यार नहीं, चल डगर अकेले मतवारा॥
संसार यह अगमापाई है, क्यों भरमा भूला फिरता है।
यह भरम हिंडोला भाई है, तू इसमें भूला फिरता है ।
तेरे मन में माल खजाना, चोरों से बचाले धन अपना ।
क्या मूरख है दीवाना है, ले सोध जतन कर मन अपना॥
तेरा साहब है घट के अन्दर, हित चित से कर दर्शन उसका ।
घट भीतर निरख रूप सुन्दर, ले देख अभी दरपन अपना ॥
मन दरपन सुन्दर रूप बसा, सुन दर में है प्रीतम प्यारा ।
अति अद्भुत छवि से आप हँसा, नौ द्वार से होजा तू न्यारा ॥
क्या खोल कहूँ तुझसे प्यारे, यह सैन बैन की बानी है।
आजा धंसजा इसमें आ रे, तिस परे धाम निरवानी है ।
घट अन्दर तूर तंबरा है, सुन सुनकर त्याग जगत काँचा ।
तू वीर धीर है सूरा है, जो सतगुरु का सेवक साँचा ।
कर गंग जमन अस्नान अभी, अपने घट तिरबेनी धारा ।
तज मान मनी अभिमान अभी, होजा राधास्वामी का प्यारा ॥
गुरु ने की मेरी रखवारी, मुझे मर्म लखाया सतगुरु ने ।
हुआ धुरपद का मैं अधिकारी, जब मेद बताया सतगुरु ने ॥
तिल भीतर जोत जले जगमग, घट सूर चन्द्र प्रकाश करें।
तिल फोड़ चलें जो गुरु के मग, वह सकल अविद्या नास करें।
कभी घंटा शंख सुनें अंदर, कभी सार शब्द झनकार सुनी ।
कभी सारंग किंगरी बजी भीतर, कभी ररंकार धुनकर सुनी ॥
मन गुफा में मुरली बाज रही, सतपद में बीना गाज रही।
मेरी गुरु की दया से लाज रही, घट मूरत उनकी विराज रही।
राधास्वामी चरन पर बलिहारी, गुरु ने अब काम किया पूरा ।
मेरी फाँसी कटी भारी भारी, हुआ काल करम का मद चूरा ॥
[ 19-614 ] पढ़ा लिखा सोचा और समझा, कुछ भी हाथ न आया ।
सन्त ने आप ही परगट होकर, निज स्वरूप दिखलाया ।
मन बानी की गम नहीं जिसमें, क्या कोई भेद बतावे ।
ऋषि मुनि पंडित ज्ञानी ध्यानी, केहि विधि तेहि समझावें ॥
सत्त नहीं है असत से न्यारा, दरसे वह तो अगम अपारा ।
सार असार दोऊ से ऊँचा, क्या कोई बरने पारा ।।
तुर्या तुर्यातीत नहीं वह, वार पार से आगे ।
यह तो मर्म कोई गुरुमुख पावे, गुरु चरनन जब लागे ।
जब कोई पारख मिले विवेकी, नाम रतन अधिकारी ।
हीरा खोल दिखाऊँ उसको, राधास्वामी के बलिहारी ॥
[ 17-615 ] गुरु चरन कमल में सीस झुका, दिन रात करूं पूजा सेवा ।
गरु स्तुति नित करू मन से, गरु सम कोई और नहीं दना॥
गुरुदेव दयाल ने की जो दया, भवसिंधु से पार किया मुझको।
नहीं वार रहा नहीं पार रहा, सब भाँति अपार किया मुझको।।
गुरु दाता दानी अार महा, याचक जग जीव हुये सारे ।
गरु अर्थ देत गरु धर्म देत, गुरु काम मोक्ष देने हारे ।
गुरु महिमा जाने न ऋषि मुनि,शिव शारद शेष की पार नहीं।
संसार असार की प्रीति छुटी, गुरु भक्ति सम कुछ सार नहीं ।
बहु बरत किये बहु दान दिये, बहु तीरथ में जाकर भटके।
गुरु चरन कमल से प्रीति नहीं,यम जाल में सो निसदिन लटके।
[18-616 ] मन में समझ गुरु की महिमा, गुरु का ध्यान लगाओ।
अन्तर बाहर सतगुरु व्यारे, निरख निरख गुन गाओ ।
बन परबत में नगर ग्राम में, गरु की परगट लीला।
मंगल में मंगल है चहुँदिस, समझे कोई सुशीला ॥
छिन छिन पल पल नाम दिवाना, नाम से सूरत लागी ।
नाम सनेही जो नर प्रानी, सो सहज ही वैरागी ।।
शब्द सुरत का साधन करना, दिन प्रतिदिन गुन गाना ।
सुमिरन भजन ध्यान निस बासर, जो कोई करे सियाना ।
गुरु की मूरत बसी हिये में, अंग संग गुरु देवा ।
अन्तर में रहे भजन ध्यान नित, अन्तर मानस सेवा ।।
तूने गुरु को बाहर जाना, किसने तुझे बताया ।
मूरख सोच समझ मन अपने, सब कुछ गुरु की माया ।
चेत सवरे अवसर पाया, सुरत शब्द नहीं भूले।
सेवक अब तो भया बड़भागी, सुरत हिंडोले भूले ।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना ।
मन की दुर्मति दूर निकारो, तब प्रगटे गुरु ज्ञाना ।।
[19-617 ] मन की आस भरोस है मन में, आठ पहर गुरु सेव करूं ।
आवागवन का संकट मेटू, नहीं जन्मू नहीं जन्म मरू ।
लव लगी रहे चरन की लारा, साँस साँस गुरु का ध्याना।
यही विवेक है यही चतुराई, यह विद्या है यह ज्ञाना ।।
गुरु मेरे परम पुरुष करतारा, व्यापक घट घट के बासी ।
सत चित आनन्द ज्ञान की मूरत, सहज सार अति सुखरासी ॥
चेतन की छवि छाई नयन में, छबि की छाया संसारा ।
अन्तर गुरु है बाहर गुरु है, सार सार के निज सारा ॥
शब्द गुरु हैं सुरत गुरु हैं, परम तत्व गुरु रूप लखू ।
पीऊँ गुरु का भक्ति सुधा रस, प्रेम विवेक प्रसाद चखू ॥
नयनों में गुरु मन में गुरु हैं, तन में गुरु का विस्तारा ।
साँस गुरु मेरे जान गुरु मेरे, प्रान के गुरु हैं आधारा ॥
मैं हूँ चरन कमल का भँवरा, बास सुबास की प्यास घनी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु हैं पूरन पुरुष धनी ॥
[ 20-618 ] किसी पुरुष ने बन्दर पाला, अपना मीत बनाया।
पाला पोसा प्रेम प्रोति से, जग व्यवहार सिखाया ।
बन्दर करता काम सब उसके, रात दिवस का संगा।
संग साथ रह सेवा करता, कभी न मोड़त अंगा।।
आग जलाता पानी लाता, और पकाता खाना ।
खाट बिछाता पाँच दबाता, अपनी बुद्धि, अनुमाना ॥
बिना दाम का सेवक साँचा, पल पल की रखारी ।
चकित हुये सब लीला देखें, बन्दर की हुशियारी ।।
लकड़ी काट पेड़ से लाता, घर को खूब सजाता ।
बन से फूल पात फल लाकर, निज स्वामी को खिलाता ।।
एक दिन सोया पुरुष खाट पर, देह की सुधबुध भूला ।
वह अचेत निद्रा बस माता, यह सेवा बस फूला ॥
आया साँप पीठ पर बैठा, बन्दर देख डराना ।
हाथ से अपने पकड़ कुल्हाड़ी; चाहा मार गिराना ॥
भय बस चेत न आया उसको, पशु में रहे न ज्ञाना ।
साँप के संग में स्वामी मरता, यह उसने नहीं जाना ।
चोर ने उसकी गति मति देखी, हाथ पकड़ के बिठाया ।
शोर मचाया उसे जगाया, सांप देख घबराया ।
वह तो अपने बिल में समाना, पुरुष सुनाई बानी ।
तू है कौन कहाँ से आया, दे कुछ अपनी निशानी ।।
बोला चोर चोर हूँ तेरा, चोरी करने आया ।
देख देख लीला बन्दर की, जी में अधिक डराया ।।
यह बंदर है निपट अनाड़ी, इसमें नहीं चतुराई ।
इसकी संगत भूल न प्रानी, यह नहीं तेरा सहाई ।।
साँप मारकर यह अज्ञानी, तुझको मार खपाता ।
बंदर की गति समझ सियाने, यह नहीं प्रान का दाता ॥
छोड़ कुसंगत पशु की भाई, पशु में कहाँ भिताई ।
इसकी संगत है दुखदाई, तामे कौन भलाई ।
संगत तो कीजे ऊँचे की, नीच की संगत त्यागी ।
जो कोई पड़ा नीच की संगत, दह मति मंद अभागी ।।
समझ बूझ कुछ तू नर चौरे, पशु सों हित न होई ।
पशु ले जाये मौत के मुंह में, शत्रु मीत लग्व सोई ।।
पुरुष विवेकी चतुर पारसी, सोचे मन में अपने ।
पशु के साथ मृत्यु भय उपजे, सुख सम्पति नहीं सपने ॥
पुरुष ने पाँव चोर का पकड़ा, तू मेरा हितकारी ।
तूने मौत से मुझे बचाया, भया साँच उपकारी ॥
इस बन्दर का कौन भरोसा, अब नहीं भूलू भाई ।
इसके गुन सब अगुन रूप है, अवगुन काह भलाई ।
“व्याख्या मन है बन्दर मन पशु चंचल, मन है मूढ़ अज्ञानी ।
मन को साध साध नहीं भूले, मन में विष की खानी ॥
मन के मत कोई नहीं चाले, मन का नहीं भरोसा ।
गुरु के मत जो चले न प्रानी, करे अन्त अफसोसा ॥
एक ही मन से सब कुछ उपजे, भाव अनेक पसारा ।
मन का मारा कभी न जीवे, मन मृत्यु भंडारा ॥
मन के मारे बन तज जावे, बन तज घर को आवे ।
कभी बन और कभी घर भरमे, ठौर ठिकान न पावे ॥
मन को चेत चेत नर मूरख, मन नहीं मीत है तेरा ।
मन की रीति में तू क्यों भूला, मन में काल का डरा ॥
ले गुरु मत को तज मन मत को, सत मत सार न सूझे ।
जो कोई गुरु मत से लव लावे, शब्द अगम गति बझे ॥
मन मलीन तन में रहे निस दिन, विषय वासना लागी ।
साध साध इस मन को अपने, हो गुरु पद अनुरागी ।
घोड़ा है यह मन अति चंचल, ज्ञान का कोड़ा लीजे ।
दे लगाम को उसके मुंह में, पग आगे को दीजे ।।
घोड़ा तो घोड़ा है पशु सम, घोड़े से क्या प्रीती।
घोड़े चढ़ असवारी कीजे, यह सियाने रीती ॥
पकड़ पूँछ ऐंठो घोड़े की, साधन एड़ लगाओ।
सरपट दौड़ो प्रेम नगर में, तब गुरु पद को जाओ ।
देस गुरू का अधिक सुहेला, अमृत खंड अनूपा ।
झलके जग मग जोति अपारा, दरसे चेतन रूपा ।।
बरसे अग्नी अखंडित धारा, नहीं मीठा नहीं खारा ।
कोई कोई साध स्वाद रस पावे, जो सतगुरु का प्यारा ॥
बिना नयन के देखे लीला, बिना श्रवण सुन बानी ।
बिन जिभ्या चखे अमृत रस को, बिन कर कर्म करानी ।।
बिन पानी के सुधा कुंड में, करे हँस अस्नाना ।
मान सरोवर अमृत झलके, करे रात दिन पाना ॥
नहीं वहाँ पुरुष प्रकृति का वासा, नहीं ब्रह्म नहीं माया ।
मैं तोहि पू पंडित ज्ञानी, भेद कहाँ से पाया।
मन तो माया रहा समाना, बानी मुह में अटकी ।
कान दशा के लोक समाया, घान पृथ्वी जा लटकी ।
बुद्धि बुद्धि तत गई हराई, केसा ज्ञान विचारा ।
नहीं वहाँ मान नहीं अपमाना, मिटा सकल हंकारा ॥
कैसे जाना केहि विधि माना, किस का गया अनुमाना।
जो कोई समझे इस बानी को, पावे गुरुमत ज्ञाना ।
सैन बैन में सन्त लखावें, सुरत शब्द की रीती ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, उपजी घट में प्रीती ॥
[21-619 ] एक वृक्ष में दो हैं पक्षी, एक छोटा एक भारी ।
वह खाता मीठा कड़वा फल, यह रहता निरहारी ।।
एक सुनहिले पर वाला है, दूजा रंग बिरंगा ।
कहने को वह जुदा जुदा हैं, निस दिन रहते संगा ॥
फल वाले को दुख सुख का भय, निश्चल अभय बिलासा ।
डाली डाली फिरता डोले, काल का सहे त्रासा॥
आँख खुली तब जग व्यौहारा, जब सोया तब सपना ।
भोग रोग में लम्पट रहता, तीन ताप का तपना ॥
ऊँची शाखा नीची शाखा, फल उत्तम और मध्यम ।
फुदुक फुदुक कर दोनों खाता, करता रहता उद्यम ॥
ऊँचे चढ़ा चैन कुछ पाया, नीचे भया दुखारी ।
चिन्ता उपजी शोकातुर हुये, मन संकल्प बिचारी ॥
मन मलीन तन सोचे पक्षी, वृक्ष महा दुखदाई।
डाल डाल में पात पात में, मोह बेल लपटाई ॥
कभी मीठा कड़वा फल चाखू , कभी निरस की बारी ।
तणा मोह काम का फंदा, कठिन भई छुटकारी ॥
मिले कोई ऐसा पुरुष विवेकी, मुझको आन छुड़ावे ।
भोग वासना से मैं छूटू, भव भय फिर न सतावे ।।
तब आकाश बानी हुई ऐसी, दृष्टि ऊँच कर भाई।
देख मुझे मैं तेरा हूँ साथी, संगी सहज सहाई ॥
मेरा रूप है अगम आरा, अजर अमर अविनासी ।
एक अस्थानी सर्व अस्थानी, घट घट का मैं बासी ।।
जो कोई लखे रूप निज मेरा, शब्द सुने सुख रासी ।
तुरत छुड़ाऊँ तोहि बंध से, काटू’ यम की फाँसी ।।
शब्द रसीला पक्षी सुन कर, ऊँचे सीस उठाया।
देख देख वह अचरज मूरत, मन में अति हर्षाया ।
तुम हो कौन कहाँ से आये, कौन धाम में बासा।
दया रूप धारा यह कसा, सहज प्रकाश उजासा ॥
बोला पक्षी सुन मेरे भाई, मैं हूँ अगम अपारा ।
जो कोई शरणागत आवे, ताको , मैं सहारा ।।
अविनासी पद को पहुँचाऊँ, भेद बताऊँ न्यारा ।
परम अवस्था ताहि दिखाऊँ, करूँ आप निस्तारा ।।
तू तो पड़ा मोह के फन्दे, आसा तृष्णा लागी ।
राग वासना त्यागदे मन से, हो चित से वैरागी ।
यह तो वृक्ष काल की माया, जान इसे परदेसा ।
तेरा धाम अधर में प्यारे, चल चल कर प्रवेसा ॥
बोला पक्षी दीन अधीना, मैं हूँ विकल निदाना ।
केहि विधि चलू धाम को तेरे, मैं नहीं चतुर सुजाना ॥
दया दृष्टि कर तब वह बोला, चिंता तज दे भाई ।
मैं तो आया तोहि उबारन, दे अपनी शरनाई ॥
मेरी ओर देख तू हरदम, बल पौरुष तब आवे ।
मेरा बल ले चढ़ अन्तर में, शब्द स्वाद घट पावे ॥
पिंड में तेरे खंड ब्रह्मांडा, तू है आप अविनासी ।
सोच सोच कुछ मन में अपने, भरम अविद्या नासी ॥
पक्षी ने तब तासों सीखा, सुरत शब्द विधि सारा ।
अनहद साधन कर घट अपने, मेटा जगत विकारा॥
ज्योती देखी परम सुहेली, सुन अनहद झनकारा।
पर फैलाये उड़ा तब पक्षी, छोड़ा वृक्ष संसारा ।
सहस कमल त्रिकुटी के ऊपर, सुन्न महासुन्न आया ।
भवर गुफा के पार ठिकाना, सतपद बीन बजाया ॥
अलख अगम पद को जब परसा, राधास्वामी पद में बासा।
अब नहीं दुख दारुण की चिंता, किया निर्वाण निवासा ।।
धन्य धन्य गुरु परम सहायक, जीव अजान चिताया।
साँचे धाम मिले जब बेठक, व्यापे काल न माया ॥
[ 22-620 ] सहस कमल में डेरा डालो, ज्योति में ज्योति मिलाओ ।
ज्योति निरंजन ज्योती झलके, घंटा शंख बजाओ ।
ज्योति शब्द की निरख परख में, गुरु का ध्यान लगाओ।
मेघा बरसे बिजली चमके, अमृत धार नहाओ ॥
बिन जल चूद पड़े जहाँ भारी, न्हाय न्हाय तृप्ताओ ।
रिमझिम रिमझिम बादल बरसे, मेघनाद चित लाओ ॥
चाँद सूर बिन जहाँ उजियारा, सो प्रकाश लख धाओ।
मोती पोहो गगन मंडल में, बिन सुर शब्द सुनाओ ॥
त्रिकुटी जाय सोमरस पाओ, पियो अमी रस सारा ।
यह निज वेद श्रुति अस्थाना, मूल कलाम विचारा ।।
यह पद जब कोई साधू परसे, दरसे सत ओंकारा ।
प्रणव शब्द सुन मंगल गावे, यह है गुरु दरबारा ।।
सेत बन्ध रामेश्वर सागर, ब्रह्मा नाद चिकारा ।
मेघनाद इन्द्रीजित रावन, मार करा संहारा ।।
त्रिकुटी छोड़ चले आगे को, सुन्न महासुन्न झारा ।
अटल समाधि की तारी लागी, सो पद दसवाँ द्वारा ॥
गढ़ केलाश ब्रह्मरेन्द्र चोटी, मानसरोवर धारा ।
हंस निरन्तर मोती चूगे, पुरुष प्रकृति धारा ॥
सुन्न छोड़ सोहंग पद आवे, भंवर गुफा की खिड़की ।
मुरली बजी सोहंगम धुन में, सहज ही बिजली कड़की ।।
सोहंग सोहंग हंस की बानी, सोहंग उलटा हंसा ।
जो कोई मरम गुरु का पावे, सुफल तासु शुभ बंसा ॥
सत पद बीन सुनी लब लाई, सत्त पुरुष घर बासा ।
देखा रूप अगाध अपारा, अद्भुत अजब तमासा ॥
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी धाम सिधाये ।
मन बानी की गम नहीं जामें, समझ समझ हर्षाये ॥
जा पर दया गुरु की होई, सो पहुँचे दरबारा ।
राधास्वामी छिन छिन भाखे, राधास्वामी अगम अपारा ।।
[ 23-621 ] सात समुन्दर गोता मारा, सात लोक चढ़ आया ।
सात दिनों की सात चढ़ाई, चढ़ धुर आसन लाया ।।
सात शब्द और सात राग है, अनहद सात सुहानी ।
सात ज्योति की लीला निरखी, सात ही सात बखानी ।।
सात अवस्था ऊच नीच की, समझे कोई गुरु ज्ञानी ।
छः को त्याग सात को धावे, पावे पद निरवानी ।।
गावे राग अनूप अपारा, निरखे रूप गोसाई ।
सरगम के सुर सात हैं जो जो, सो घट नाद की झाई ।।
सात द्वीप में सात हैं तारे, सप्त ऋषि रखवारा ।
सात प्रकार की रचना अद्भुत, क्या कोई बरने पारा ।
तिल पहिला सहस्त्रार दूसरा, त्रिकुटी तीजा जानो।
सुन्न चौथा महासुन्न पाँचवाँ, गुफा छटा पहिचानो।
सतपद सप्तम अपर अपारा, सुर घुन जहां बिसराई ।
अपने घट में लखो निरन्तर, बिगड़ी सब बन जाई॥
आगे शब्द है अगम अलेखा, राधास्वामी पद तिस ऊपर ।
शब्द अशब्द का भेद मिले जब, गुरु दयाल हो जिनपर ।।
घंटा शंख मृदंग सारंगी, बजा सितार अनूपा ।
बंसी मधुर मनोहर बाजी, सातवाँ बीन का रूपा ।
सुरत शब्द का साधन करके, पाया भेद अपारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, खोजा निज दरवारा ।।
[24-622 ] रूप अरूप सरूप अनूप, कथे कोई महिमा क्या तेरी ।
आनन्दघन सत चित्त अगोचर, बुद्धि लहै कसे गति तेरी ।।
सिंधु अपार महिमा अति निर्मल, अमल विमल से पार गुरु ।
पार अपार की गम नहि तुझमें, अपरम्पार से पार गुरु ।।
माया गोतीता चरित पुनीता, व्यापक विरज महान है तू ।
सर्व स्वरूपी सर्व व्यापी, मंगल मय निज ज्ञान है तू ॥
सर्व आधारा रहित विकारा, सब का सब से न्यारा है।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,तेरा ही मुझको सहारा है।
[ 25-623 ] मेरा इष्ट बहुरंगी साँई, घट घट करे निवासा ।
नाचे नाच नचावे बहुविधि, खेले खेल तमाशा ।।
चन्द्र सूर तारागन मध्ये, ज्योत प्रकाश उजासा।
मेंहदी बीच लाली हुये झलके, फूल बीच ज्यों बासा॥
रमता जोगी भोग अभोगी, सोगी सोग उदासा ।
रूप स्वरूप अनूप दिखावे, रहे निरन्तर पासा ।।
आवे जाये न गुप्त प्रगट होय, बख्शे प्रेम बिलासा ।
सिंध अगाध अगम जल भरिया, पीवे तृप्त पियासा ॥
चैतन धन आनन्द धन अद्भुत, सत्त भाव में भासा ।
जो कोई उसका ध्यान लगावे, काटे कर्म का फाँसा ॥
अजर अमर अविनासी प्यारा, न्यारा प्रेम हुलासा ।
चर और अचर में आप बिराजे, रचे भक्ति निज रासा ।।
नहीं वह ज्ञान योग तुरियातित, नहीं प्रगटा नहीं नासा ।
आसा त्याग जगत माया की, कोई कोई पावे दासा ॥
[29-624 ] तीन ताप से जगत दुखारी, सुख आनन्द नहीं पाये ।
ज्ञान विवेक की गम नहीं वाको, भरम अज्ञान भुलावे ।।
मतवारों ने मति गति गाई, मति माया की दासी ।
बुद्धि चतुरता छल और धोके, यम के गले बिच फाँसी ।।
भरम भरम भरमे निस बासर, भरम में आन भुलाने ।
भर्म हिंडोले भूले सारे, ऋषि मुनि और सियाने ।
मानुष जनम का सार न जाना, नर तन बाद गवाया ।
जेहि देखा सो भूल भरम में, फिर फिर भटका खाया ।
राधास्वामी सन्त रूप जग आये, शब्द की डगर बताई।
जो कोई चरन शरन में आया, ताहि लिया अपनाई ॥
[ 27-625 ] इस मन अन्दर बाग बगीचा, इसमें है फुलवारी ।
नाना गाछ लता हैं अन्दर, नाना खेत कियारी ॥
इस मन अन्दर सात समुन्दर, मोती मूगा भारी !
ले जितना तेरा मन चाहे, बन सच्चा व्यौपारी ॥
मन के अन्दर असुर देवता, तीरथ सकल विराजें।
मन के अन्दर बजे बाँसुरी, शंखनाद धुन गाज ।
मन ही कुरुक्षेत्र है तेरा, अर्जुन बान चलावे ।
जो कोई इस मन को समझे, समर विजय फल पावे ॥
रावण राम लड़ें मन अन्दर, नित ही होत लड़ाई ।
सीता सती अशोक बाटिका, सब मन की प्रमुताई ॥
मन ही विष्णु आदि शिव शक्ति, ब्रह्मा वेद बखाने ।
मन ही साम यजुर ऋग बानी, जो जाँचे सो जाने ।
मन ही आग पवन जल पृथवी, मन अकाश का रूपा ।
मन निर्वाण मुक्ति का हेतू, मन अन्दर भव कूपा ॥
[28 626 ] भक्ति का सन्देश सुनाने, साधू जग में आया है।
सत असत का निर्णय करके, सत मारग दरसाया है ।।
साधु साधन सिखलाता है, प्रेम भाव जतलाता है ।
दया धरम का मूल है भाई, यह सबको बतलाता है।
किसी से राग द्वेष नहीं उसको, सबका सबसे न्यारा है।
जिनमें श्रद्धा प्रीति है उसकी, उनका वह अति प्यारा है।
तरुवर सम हैं साधु सन्त जन, चौथे बरषा का पानी ।
परमारथ के साथी हैं यह, सहित कर्म और मन बानी ॥
साधु संग की महिमा उत्तम, भव के पार लगाती है।
जो कोई साधु संग में आया, भक्ति उसको भाती है ।
भवसागर अति अगम पन्थ है, बिन जल बड़ मरे प्रानी।
जो कोई साधु शरन में आया, सतसंग की महिमा जानी ॥
सुख देवें दुख खोयें निस दिन, बख्शे पाप से छुटकारा ।
परम सनेही साधु हैं भाई, उनसे मिलेगा निस्तारा ॥
एक घड़ी या आध घड़ी जो, सतसंगत में आता है।
काल कमे के फंद से छुटकर, फल जीवन का पाता है ।
भाव से आवे कुभाव से आवे, साधु है सबको प्यारे ।
दीन दुखी प्रानी हैं साधु के, दोउ आँखों के हैं तारे ॥
साधु संग को यू तुम समझो, ज्यों गंधी की है दुकान ।
चास सुबास मिले नित आये, यह साधू की है पहचान ॥
छोड़ कुसंग संग कर इनका, यह भव फंद कटावंगे।
दाग करम का अपनी दया से, सहज ही सहज हटावेंगे।
कल्पवृक्ष साधू की संगत, मन माना फल देता है।
दुख कलेश संसार के सारे, यह छिन में हर लेता है ।।
मानुष जनम वृथा मत खोओ, जनम नहीं यह बारम्बार ।
पात सूखकर गिरे वृक्ष से, नहीं फिर लगे वृक्ष की डार ।।
पोथी पढ़ो न पुस्तक बाँचो, हित चित से करो साधु संग।
फिर देखो कैसे चढ़ता है, नित नया परमारथ का रंग ।।
माहब मिला न स्वर्गलोक में, नहीं वह बसता चारों धाम ।
वह बसता है साधु में निसदिन, साध संग में है सतनाम ।।
साधु दरस से मिले सुक्तगति, साधु दरस से सुख पाओ ।
साधु वचन सतसंग में सुन सुन, सतनाम से चित लाओ।
साधु सरल चित जगत हितैषी, दयासिंधु हैं प्रेम स्वरूप ।
जो कोई चरन शरन में आवे, नहीं वह पड़े कभी भवकूप ।
सार भेद है साधु की पूजी, साधु से मिले तत्व का ज्ञान ।
साधु संग से सहज ही छूटे, काम क्रोध मोह अभिमान ।
सिंह साधु की रहनी न्यारी, जीवत नर का करे अहार ।
जीवत मारें बान बचन से, जीतेजी करदें उद्धार ॥
पलट जाय ब्रह्मांड निकाया, पलटे चन्द सूरज की चाल ।
साधु बचन पलटे नहीं भाई, साधु शरन लो चित्त संभाल ।।
नारद वाल्मीकि घट योनी, गनिका पीपा और रैदास ।
सुधरे साधु संग में यह सब, साधु संग नित करो विलास ॥
साधु की महिमा सब कोई जाने, बरन सकें नहिं विष्णु महेश ।
शेष नाग थके ऋषि मुनि थकरहे, थकरहे शारद और गणेश ।।
मन मारो छाँडो चतुराई, साधु शरण दृढ़ कर लीजे ।
त्याग कपट छल बुद्धि बिलासा, चित सतसंग में दीजे ॥
[29-627 ] आपही माली बाग लगावे, सींचे आप फुलवारी ।
आपही फूल कली है आपही, आप बना बनवारी ॥
कोयल बनकर कूक सुनावे, बैठ आम की बारी ।
बौर देख बौरा हो जाये, पौरापन से न्यारी ॥
आपही बौर आप अमृत रस, आप आम रस धारी ।
आपही चखे आम रस रसना, आप करे रखवारी ॥
फूल मध्य है बास सुबासा, रंग रूप गुलकारी ।
आपही निरखे अपनी शोभा, निरखत होय सुखारी ॥
यह तो भेद कोई गुरुमुख पावे, गुरुपद होय भिखारी ।
हम तो सार मरम लख पाया, राधास्वामी के बलिहारी॥
[ 30-628 ] मैं क्या कहूँ खोलकर तुम से, तुम सब के आधारा ।
तुमसे स्वारथ और परमारथ, तुम में सार असारा ॥
तुम चन्दा सूरज की ज्योती, तुम में नौ लख तारा ।
तुममें ज्ञान ध्यान है तुममें, तुम सबके भंडारा ॥
तुम उत्तम हो तुम मध्यम हो, जैसा करो विचारा ।
तुमसे गेह दह सब प्रगटे, कुल कुटुम्ब परिवारा ॥
अपनी लीला आप जो परखो, भेद मिले निज सारा ।
जब लग और की लीला अटके, भटक भटक झकमारा।
अपने अन्तर धसो पियारे, अपना रूप पहचानो।
अपनी आप निरख का होना, यही है उत्तम ज्ञानो॥
आप आपको आप पह वानो, राधास्वामी ने समझाया।
कहा और का नेक न मानो, यह उपदेश सिखाया ।
सुनो बात तुम गुरु पूरे की, छोड़ो भरम कहानी ।
अपनी निरख परख करो आपही, तब छूटे भव खानी ॥
[31-629 ] मेरा तेरा दोनों मिथ्या, तू मैं भरम पसारा ।
सत असत में भेद कहाँ है, क्यों कोई करे विचारा ।।
नहीं कहीं बंध नहीं कोई मुक्ति, स्वर्ग नर्क कोई नाहीं ।
यह तो मन की सकल कल्पना, उपजे मन के माहीं।
उपजे बिनसे पल छिन मध्ये, ज्यों सपना रैनाई ।
उपज बिनस कर गुप्त प्राट हुये, इनसों कौन भलाई ॥
एक में प्रगट अनेक की लीला, मिथ्या एक अनेका ।
है कोई गुरुमुख गुरु का ज्ञानी, सांचा करे विवेका ।।
एक नहीं और नहीं अनेका, जैसा तैसा रहता।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, साधु निरख यू कहता ।।
[ 32-630 ] तू फकीर है कैसा भाई, भूल भरम चितलाया क्यों ।
तज अज्ञान की बातें जल्दी, ज्ञान ध्यान अलसाया क्यों।
अँखियाँ उलट तमाशा देखें, अन्तर की लीला न्यारी ।
सब कुछ अन्तर तेरे भरा है, इससे आँख हटाया क्यों ।
गुरु तो तेरे घट के बासी, तू गुरु घट में रहता है।
मैं तू भूल भरम है प्यारे, यह सिद्धान्त भुलाया क्यों ।
बाहर भीतर गुरु हैं व्यापक, कहीं राजा कहीं परजा है ।
चेले में गुरु गुरु में चेला, नहीं तो उसे चिताया क्यों ।
आप आपको आप पिछानो, राधास्वामी की है बानी ।
कहा और का नेक न मानो, यह बानी बिसराया क्यों ॥
[33-631 ] प्यारी तू है प्रेम की मूरत, जग दुख से घबरानी क्यों ।
तुझमें ज्ञान ध्यान की शक्ति, भरम से यू भरमानी क्यों।
सुमिरन भजन ध्यान में लगजा, ध्यान रहे गुरु पूरे का ।
समझ बूझ कर तू नहीं पढ़ती, प्यारी गुरु की बानी क्यों।
सतगुरु राधास्वामी दया करेंगे, भव कलेश मिट जावेंगे ।
मान बचन यह दृढ़ निश्चय से, व्यापी है हैरानी क्यों।
[ 34-632 ] तू सच्चा है मुझे सचाई, बख्श बख्श सतगुरु प्यारे ।
तू प्रकाश है तेरी दया से, प्रगटे घट रवि शशि तारे ।।
तू दाता है दान दे मुझको, नाम रतन धन का स्वामी ।
मेरे मन में आके समाजा, जो तू है अन्तरयामी ॥
तू है ज्ञान ज्ञान मुझको दे, मेट तिमिर अज्ञान मेरा’
तेरे रूप का दर्शन पाऊँ, छिन प्रतिछिन रहे ध्यान तेरा ॥
तू सत है अपनी सत्ता दे, जीवन मेरा सुपर जावे ।
तूं चित है निश्चल कर चित को, निश्चित ज्ञान मुझे भावे ।।
सतचित आनन्द रूप है तेरा, दे आनन्द मुझे सतगुर ।
नाम रूप के तेरे सहारे, जीते जी जाऊँ सतपुर ।
राधास्वामी परम पुरुष करतारा, तू दुखियों का सहारा है।
दुख दरिद्र को मेटदे मेरे, दुखदाई संसारा है ।।
चरन शरन की ओट गहूँ मैं, आनन्द मंगल साज सजू ।
राधास्वामी राधास्वामी हित से सुमिरूँ,राधास्वामी राधास्वामी नित भजू
[35-633 ] चेत चेत चल सत की डगर में, चेत ले अभी सवेरा है।
पीछे क्या चेतेगा प्रानी, फिर यह समय न बेरा है ॥
नर जीवन को वृथा न खो तू , हाथ तेरे क्या आवेगा।
कोई संग न साथी सच्चा, भूठा मेरा तेरा है।
दो दिन का व्यौहार जगत का, दो दिन खेल तमाशा है।
खेलकूद में काम कर अपना, काम तुझे बहुतेरा है ।
महल मकाँ पर भूल न भाई, धन दौलत है दो दिन का।
जो आया सो जाये यहाँ से, चिड़िया रैन बसेरा है ।।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाले,सुमिरन भजन ध्यानकर नित ।
नहीं फिर जनम मरन का फन्दा, काल का हेरा फेरा है।
[39-634 ] रमता जोगी रम रम मन में, मेरे मेरा काम बने ।
मुझे वीर हनुमान बनाले, आप तू मेरा राम बने ।
लंक अविद्या का गढ़ दुर्गम, जीतू रावन को मारू।
दुख कलेश के विजय से सुख हो, और मेरा विश्राम बने ।
भर्म मिटादे कर्म नसादे, माया फंद से हो मुक्ति ।
ज्ञान ध्यान का मर्म लखा दे, आनन्द आठों याम बने ।
सकल जगत अज्ञान पसारा, सूझे हाथ से हाथ नहीं।
हिये अकास में सूर उगादे, करम धरम निष्काम बने ।
राधास्वामी सतगुरु दया मेहर से, जीवन सुफल करा मेरा।
यह भव अगमा पाई फिर तो, सुख का सच्चा धाम बने।
[37-635 ] मैं आया हूँ ज्ञान बताने, ज्ञान महा है सुखदाई ।
ज्ञान सहज है सहज का साधन, सहज में कैसी कठिनाई ।
बात बात में तत्व सुझाद, खेल खेल में दरसा हूँ ॥
हँसी हँसी में सार लखा दूँ, चुटकी बजाकर समझाइँ ॥
नहीं भयानक कथन है मेरा, रोचक है बानी मेरी ।
सुलझा, जड़ चेतन ग्रंथी, युक्ति है जानी मेरी ॥
मेरी संगत में जो आत्रे, तीरथराज स्नान करे ।
काम अर्थ और धर्म मोक्ष के, तत्वों की पहचान करे ।
सतगुरु ने जो मुझे बताया, वही बताऊँगा तुमको।
राधास्वामी की करुना से, सन्त बनाऊँगा तुमको ॥
[38-636 ] मैं हूँ भूली भरमी भटकी, आय पड़ी हूँ संसारा ।
गले में फाँसी यम की पड़ गई, कैसे पाऊँ छुटकारा ॥
काम क्रोध मद लोभ फसानी, व्यापा मन हंकारा ।
पर निन्दा और द्वष ईर्षा, मेरे गले के हारा ।।
मैं अज्ञान के बस में आई, अपना रूप बिसारा ।
मैं हूँ कौन मेरा कुल क्या है, कभी न चित से विचारा ॥
दुखी हूँ चैन शान्ती खोकर, काल करम ने है मारा।
केसी करू उपाय न सूझे, सोचू मैं बारम्बारा ।।
विलपत तलपत दौड़ कर आई, सतगुरु के मैं दरवारा।
राधास्वामी मुझे बचाओ, देकर अपना सहारा ।।
[39-637 ] गुरु का भाव हिये में आया, सतसंगी का नियम हुआ ।
छोड़ दिया अनेक का झगड़ा, यह यम सोच समझ के किया।
तीजे तिल पर बैठक ठानी, यह आसन चितको भाया ।
साँस साँस राधास्वामी का सुमिरन,प्राणायाम यह ठैराया।
मैं हूँ कौन रूप गुरु कैसा, गुरु सेवक में भेद है क्या ।
बारम्बार रूप का सुमिरन, प्रत्याहार अभ्यास बना ॥
गुरु का रूप हिये में धारा, वही धारना तुम जानो।
धनी धारना ध्यान हुई, अब गुरुमुख ध्यानी मानो ॥
ध्यान में तन मन की सुध भूली, बुद्धि अहंकार भूले ।
यही समाधी धने ध्यान की, पाकर सतसंगी फूले ॥
नहीं घमंड न ममता इसकी, यह भी नहीं स्वरूप मेरा ।
सहज भावना मन को भाई, सहज सहज में सहज बना ।।
सहज था पहले अब भी सहज है, सहज समाधि सहज हुई।
जहाँ जहाँ मन जाकर ठेरा, वहाँ हो सहज समाधि लगी।
आँख न मूदू कान न रोंधू, जिभ्या होंठ न बन्द करूँ।
खुली आँख से सबको देखू, गुरु लीला चित चेत धरू ।
जहाँ जहाँ जाऊँ वही है तीरथ, जो खाऊँ सो पूजा है।
आत्मदेव को अपन सब कुछ, मन में भाव न दूजा है ।
जग जागू चैतन व्यौहारा, जब सोऊँ सम साध रहूँ।
सुषप्ति गहरी नींद में आकर, निज स्वरूप का सुख भोगू॥
जाग्रत स्वप्न सुषप्ति तीनों, सृष्टि स्थिति प्रलय हैं।
यह सब काल के घेरे में है, इनसे बचकर आगे चलू ॥
चौथा पद तुरिया जब आवे, तब हो कुछ कुछ रूप का ज्ञान ।
तुरियातीत है पंचम का पद, इससे उदासीन मन मान ।
यहाँ तक ज्ञान की त्रिपुटी देखी, ज्ञेय ज्ञाता और ज्ञान विचार ॥
इसे छटा पद समझो भाई, यह सब है सत के आधार ।
इनके परे सातवाँ पद है, सतपद धुरपद पद निरवान ।।
सत सत सत सत सत है सोई, ज्ञान ध्यान पद मूल बखान ।।
अलख अगम अनाम की गति फिर, नाम रूप से हैं न्यारे ।
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, समझेंगे गुरुमुख प्यारे ।
[40-638 ] नर शरीर सुर को भी दुर्लभ, क्या नहीं वेद ने तुझे कहा ।
भरम अज्ञान के फाँस में फसकर, नाना विधि के कण्ट सहा ।।
नर का जनम पाय यह प्रानी, भव निधि बहता रहता है।
उसको समझ बूझ नहीं अपनी, दुख नित सहता रहता है ।।
विद्या पढ़ी प्रपंच मचाया, पाखंडी हो भरमाया।
आप फसा औरों को फसाया, अपना भेद नहीं पाया ।
यह विद्या है सकल अविद्या, मोह भरम की फाँसी है ।
कर सतसंग सार को पाले, जग में तेरी हाँसी है।
राधास्वामी सतगुरु दाता, सन्त रूप धर कर आये।
नर जीवन का सार बताया, गुर समझाकर अपनाये ॥
[41-639 ] योग युक्ति से क्या फल पाया, अपना चरित सुना जोगी।
जोग भोग का भेद है कैसा, मेद का भेद बता जोगी ।।
सेली पहनी भभूत रमाई, आसन मार के बैठा है।
किस आसन पर राम है तेरा, उस आसन को दिखा जोगी।
साँस को साधा प्रान को बाँधा, यम और नियम का यतन किया।
शम दम से मन इन्द्री को मारा, संयम रीति जता जोगी ।।
मृगछाला को बगल में मारे, फिरता रहता है बन बन ।
बिन हिंसा यह कैसे पाया, भाव अहिंसा दिखा जोगी।
अनिमा लघिमा गरिमा महिमा, आदि सिद्धि शक्ति नहीं है क्या
क्या नहीं माया सिद्धि शक्ति, यह कैसे उससे बचा जोगी।
ब्रह्मरेन्द्र और सहस्त्रार पर, मन की वृत्ती को रोक लिया।
लगी समाध सिमट कर बैठा, क्यों कर मुक्ति लिया जोगी।
निरपिकल्प से विकल्प अवस्था, से क्या तुझको लाभ हुये ।
लाभ के साथ हानी नित रहती, द्वन्द नहीं यह क्या जोगी।
जो बाहर भीतर वही लीला, कलपति देश काल वस्तु ।
बाहर मुखी रोककर विरती, अन्तरमुख क्यों बना जोगी ।
चाँद सूर तेरे भीतर प्रगटे, इसमें नहीं सन्देह कोई ।
यह भी तो बाहर थे तेरे, क्यों बाहर से हटा जोगी।
किसका ध्यान धारणा किसकी, क्या नहीं वह संकल्प तेरा ।
सब कुछ है यह मन की कल्पना, कलपित जाल फसा जोगी।
गुफा के भीतर बैठक ठानी, आके बिठाया है किसको ।
रमता राम गुफा में तेरे, कैसे आके रमा जोगी ।
केस बढ़ाया जूड़ा बाँधा, स्वाँग विचित्र बनाया है।
देखू राम फंसा क्या उसमें, खोल दे अपनी जटा जोगी।
ग्रहण त्याग वैराग राग की, समझ नहीं तुझको आई।
कछुवा जैसी तेरी समाधी, छुटी न मोह मया जोगी ।
गुरु का संग मिला नहीं तुझको, भरम की उलझन में उलझा ।
बिना ज्ञान मुक्ति नहीं होती, भूल के पन्थ चला जोगी।
जा कुछ दिन कर गुरु की संगत, गुरु के संग में ज्ञान मिले ।
योग युक्ति का फिर फल पावे, तब हो तेरा भला जोगी ।
राधास्वामी दीन दयाला, सतगुरु रूप धरा जग में ।
चरन कमल की ओट पकड़ ले, अपना सीस झुका जोगी।
[ 42-640 ] अनहद बानी मंगल खानी, सत्त धाम सहदानी हो।
आनन्द दानी सन्त बखानी, पद निरवान मिलानी हो ।
अमृत धारा संत मत सारा, कोई कोई बिरला जानी हो ।
अविनासी घट घट के बासी, सुखरासी अनुमानी हो ।
कथनी बदनी तज कर पावे, करनी गुरुमुख ज्ञानी हो ।
घट के खटपट चटपट विनसे, अटपट सकल नसानी हो।
खोले हिरदा फाड़े परदा, रूप अनूप दिखानी हो।
जगमग ज्योत जगे तिल भीतर, देख देख हरषानी हो ।
त्रिकुटी सुन्न महासुन्न लेखे, ओंकार गति जानी हो ।
सूरज चाँद कोटि छवि छाजे, अद्भुत अकथ कहानी हो ।
भंवर गुफा में सोहंग वंशी, सत पद बीन बजानी हो ।
अचरज शोभा बरनी न जाई, माया मोह सकुचानी हो ।
घट चढ़ सुरत बिमल हुई भारी, अब नहीं आनी जानी हो।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,मिल गई अगम ठिकानी हो ॥
[43-641 ] मैं कैसे करूँ भूली हूँ डगर, बहु दूर पड़ी अपने घर से ।
व्याकुल होय भूमि गिरी तड़पू, हरि आन छुड़ाओ अब करसे ।।
रैन अंधेरी न सूझे पन्थ, मिझिम रिमझिम बरसा बरसे ।
को आके खबर ले जल्दी मेरी घर जाने को जियरा तरसे ।
जल बरसे अखं: प्रचंड महा, बन ऊसर देख परस सरसे ।
पुरवाई यार झकोले सहे, हटके उखड़े बट सब जर से ॥
सुध बुध बिसी भरमी भटकी, मैं तो काँप उठी हूँ झरझर से।
मेरे हिया जिया में दुख ताप बसे, तन वायु की बेग लगे सर से।
हिया पीर घनी तलफ छिन छिन, कैसे जाके मिलू प्रतम हर से ।
कोई साथी नहीं कोई संगी नहीं, थर थर अब काँप रही डर से ।।
मेरे घट में आनन्द चैन कहाँ, नहीं सुख पाऊँ बिन पद परसे ।
अवसर जो मिले मिल जाऊँ अभी, पद कमल गहूँ लागू गुरु से ।।
गुरु आन मिलो दुख दूर हरो, केहि विधि मैं छूटू अपडर से ।
राधास्वामी दया की अब हो नजर, तुम आये निकारो भव सर से ॥
[44-642 ] मैं उपदेश बताऊँ आ तू , मेरे पास फकीरा ।
यह उपासना तत्व है भाई, सत मत गहर गम्भीरा ॥
गुरु ने मुझे चिताया जेहि विधि, वही भेद बतलाऊँ ।
मैं नहीं अटका पोथी पत्रा, तुझे कैसे अटकाऊँ।
नहीं उपदेश और है कोई, यह उपासना जानो ।
उप है निकट तो देश स्थाना, यह उपदेश पिछानो ।
यही तत्व है यही सार है, यह गुरु ज्ञान विचारा ।
एक शब्द में भेद बताकर, मेटू भरम विकारा ।।
सत का संग करे जो कोई, सत की लीला धारे ।
गुरु है जग में सत की मूरत, अगम अथाह अपारे ।
और नहीं कोई सत है जग में, समझ विचार फकीरा ।
सत के संग मार ले आसन, मेट द्वन्द की पीरा ।।
[45-643 ] उप है निकट देश स्थाना, यह उपदेश का सारा ।
पंडित कोई भेद न जाने, जाने गुरुमुख प्यारा ॥
जो कोई निकट में जिसके बैठे, उसका रूप संभारे ।
उसका रूप बसे नैनन में, अपना रूप बिसारे ।
संग प्रभाव न कोई बाँचे, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी ।
हमने तो यह समझ विचारा, सतगुरु की सहदानी ॥
भव की संगत करे जो प्रानी, भव भय चित्त बसावे ।
गुरु की संगत में जब आवे, अभय भाव पा जावे ॥
पशु की संगत पशु बन जावे, नर पदवी को खोकर ।
भरत हिरन की मोह मया से, पछताया था रोकर ।।
[49-644 ] शब्द सार गह शब्द सार गह, शब्द सार गह लीजे ।
त्याग कुसंगत त्याग कुसंगत, सत संगत चित दीजे ॥
सतसंग केवल गुरु की संगत, यह उपदेश हमारा ।
जो कोई देश हमारे आवे, सूझे अगम अपाराः ।।
पहिला देश तीसरा तिल है, सहसकमलदल भाई ।
ज्योति निरंजन ज्योती झलके, सो उसकी प्रभुताई ॥
दूजा देश ओ3म् अस्थाना, त्रिकुटी मृदंग गाजे ।
तीजा सुन्न महासुन्न प्यारे, साज समाधि का साजे ॥
चौथा देश है गुफा भँवर की, काल बली ठकुराई ।
पंचम देश सत्त अस्थाना, सत्त नाम सुखदाई ॥
यह उपदेश देश का सुनकर, ले गुरु का उपदेशा ।
राधास्वामी ने मुझे लखाया, सोई सार संदेशा ॥
[47-645 ] अलख को लखले अगम की गम ले, परख गुरु की बानी।
राधास्वामी पद जब परसे, छूटे आना जानी ।
गुरु में देश है गुप्त प्रकट सब, गुरु सबके आधारा ।
गुरु के देश की लीला अद्भुत, गुरु संगत निस्तारा ॥
सुरत शब्द की सुगम कमाई, सहज ही काम बनाले ।
इसी जनम में धुरपद बासा, सार ज्ञान मत पाले ॥
गुरु की संगत पाँच दिना की, पाँच देश की खानी ।
पाँच ही दिन में काम बनेगा, सहज सुगम मुख दानी ॥
राधास्वामी नर शरीर में, धरा सन्त अवतारा ।
सालिगराम गुरु की किरपा, मुझे निला सत सारा ॥
[18-646 ] उप है निकट तो आसन बैठक, सच्ची बात परखले ।
उप आसन है गुरु की संगत, गुरु संग बैठ निरखले ॥
प्रेम भाव नहिं उपजे मन में, बिन गुरु संग न भाई ।
शब्द जाल में पड़ी है दुनियाँ, सच्ची समझ न आई ।।
ईश जीव दोउ भिन्न भिन्न हैं, भिन्न की कैसी भक्ति।
प्रेम प्रीति अपने जैसे की, यह उत्तम है युक्ति ।
मैं कहता हूँ बात निराली, सच्ची खरी सुहानी।
लखे मरम कोई साधु सुजाना, लखकर चित मनमानी।
गुरु ने रूप धरा मानुष का, सार शब्द समझाया।
राधास्वामी की बलिहारी, भरम मिटा सत पाया ।
[49-647 ] कहना सुनना सब है निष्फल, बात मान एक मेरी ।
एक बात जो मेरी माने, सौ सौ सुनू गा तेरी ॥
कोटि ग्रन्थ पढ़कर क्या पाया, गुरु गम ज्ञान न सूझा।
एक सैन से अनुभव जागे, गुरु मत जिसने बूझा ॥
नहीं वह करम धरम जप तप है, नहीं वह साँख्य का ज्ञाना।
नहीं संयम नहीं नियम है प्यारे, नहीं वेदान्त का ध्याना॥
वाद विवाद है दन्त कहानी, बात का बने बतंगड़ा।
शब्द जाल में जो कोई जकड़ा, बुद्धि टाँग नहिं लँगड़ा ।
कान इधर ला कहदू तुझसे, कर गुरु का सतसंगा।
राधास्वामी की कृपा से, मन उपजे नहीं शंका ।।
[50-648 ] जो मेरे प्रतम का प्यारा, मेरा भी वह प्यारा ।
जो सतगुरु का नाम दिवाना, आँखों का है तारा ।।
पाप पुण्य का भेद न परखू , ऊँच नीच नहीं जानें ।
बुरा भला नहिं दृष्टि में मेरे, भाव का नाता मानू ॥
मेरा स्वामी पतित उद्धारन, पतित हेत जग आया ।
पतित को अपने चान लगाया, पतित सुधार कराया ॥
पतित से पतित जो भाव भेंट ले, सतगुरु पद को परसे।
मैं उस भाव के सदके जाऊ, प्रेम प्रसाद को तरसे।
धोबी घाट है गुरु सतसंगत, मेले कपड़े आवे ।
साबुन गुरु के प्रेम का पाकर, सो उजले बन जावें ॥
उजले धोबी घर नहीं आवें, उनको कोई क्यों लावे ।
धोबी मैल को धो निस दिन, मैले शुद्ध बनावे ॥
डाकू चोर उचक्का क्रोधी, कामी लोभी मानी ।
परमारथ हित गुरु ढिंग आवे, उपजे न मुझे गलानी ॥
मैं नहीं पू तू है कैसा, कैसी करे कमाई ।
फूल प्रसाद कहाँ से लाकर, गुरू के भेंट चढ़ाई ।।
गुरु जब प्रेम भाव के भूखे, प्रेम है मुझे पियारा ।
जो मेरे प्रीतम का प्यारा, सो आँखों का तारा ॥
गणिका रामानन्द चरन लग, भक्ति भेट जब लाई ।
मिला प्रसाद कबीर को उसका, प्रेम स्वाद लग खाई ।।
तर गई गणिका तर गये पीपा, तरे चमार रैदासा ।
उनके चरन कबीर के सिर पर, गुरु के प्यारे दासा ।।
कोढ़ी तरगये तरे पातकी, गुरु के चरनन लागी ।
ऐसे पापी मुझे पियारे, भक्ति प्रीति हिय जागी ।
मैं हूँ पापी पाप की मुस्त, पाप की दृष्टि धारी ।
पापी संग तरा मैं गुरूबल, पापी की बलिहारी ।।
भाव कुभाव सुभाव न परखू , नहीं द्वेष नहीं रागा ।
मेरा तो वह सदा सनेही, जो गुरु चरनन लागा ।।
निज स्वारथवश भूल करू मैं, हिंसा पाप कमाई ।
हिंसक जब गुरु के डिंग आवे, थारा मुझको भाई॥
पापी तारन आये सतगुरु, शब्द जहाज बनाया।
मैं पापी पापी संग तर गया, पापो पर गुरु दाया ।।
जात न पू पाँत न पूछ, नाहीं कुल परिवारा ।
प्रेम प्यार का नाता मानूं, प्रेम का सकल पसारा ॥
सुन फकीर यह भेद अनूया, अचरज अगम अमाना।
जिस पर दयाटि सतगुरु की, तेहि बड़भागी जाना ।।
मैं मर जाऊँ भीख न माँगू, अपने तन के काजा ।
परस्त्रारथ के काम में प्यारे, मोहि न आवे लाजा ॥
कैसा पाप पुण्य है कैसा, नाम से लगन जो लागी।
पूले लाख घास के जर गये, एक चिनगी थी आगी।
नाम गुरु का आग तुल्य है, पाप लाख मन पूला ॥
रत्ती नाम जरावे सबको, दया मेहर अनुकूला।
कुत्ते बिल्ली रहें परस्पर, बैर भाव सब छोड़ें।
निज मालिक के प्रेम को परखें, प्यार का नाता जोड़ें।
तैसे मुझको पापी प्यारे, गुरु की शरन जो आये ॥
प्यार करूं नहीं उनको कैसे, गुरु जब चरन लगाये ।
साधन प्रेम का सुगम सुहावन, भक्ति भाव सुखदाई।
पापी भक्ति के अधिकारी, समझ में मेरी आई।
राधास्वामी नाम भजो नित, नाम से लव रहे लागी ।
जो कोई नाम से गखे प्रती, सो मेरा अनुरागी ॥
[ 51-649 ] कालचक्र का सहज हिंडोला, भूला अचरज न्यारा ।
सब कई भूले भूला चढ़कर, काल मुलावन हारा॥
चन्द्र सूर दोऊ गगन में भूलें, भूलें नौ लख तारे ।
जीव जन्तु पृथ्वी में भूलें, नर पशु सकल विचारे ।।
राजा भूला रानी भूली, और प्रजा समुदाई।
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर भूलें, भूली सब दुनियाई ॥
लक्ष्मी भूली दुर्गा भूली, गायत्री महारानी ।
देवा भूले देवी भूले, जल थल अग्नी पानी ॥
काल भी झूला अपने झूला, सृष्टि प्रलय कर प्यारे ।
वह भी बचा न चक्र से अपने, भूला झूले सारे ॥
चढ़ी पेंग तब ऊचे आये, उतरी नीचे ठहरे।
कभी मिले तो जमघट देखी, विछड़ के होगये न्यारे ।।
एक दशा में नित जो बरते, कोई नजर न आया ।
पीर पैगम्बर कुतुब ओलिया, ऋषि मुनि बचन न पाया।
पानी भया भाप की सूरत, धाया गिरि केलासा ।
बरफ बना धारा बह निकली, नीचे किया निवासा ।।
नीचे भी रहने नहीं पाया, फिर ऊचे की आशा ।
हम तो देखें खुली दृष्टि से, अचरज अजब तमासा ॥
लकड़ी जल कर कोयला होगई, कोयला राख और माटी।
माटी माटी में नहीं ठहरी, बनी काठ और लाठी ॥
विष्टा अन्न अन्न भया विष्टा, सोई सब कोई खावे ।
यह प्रपंच है अद्भुत न्यारा, कोई विरला लख पावे ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ती लीला, कभी ऐसी कभी वैसी।
यह सब कालबली की माया, कभी जैसी कभी तैसी ॥
पंडित कभी अनाड़ी होते, कभी अज्ञानी ज्ञानी।
कभी जड़ मिल जुल चेतन ठहरे, कभी चेतन जड़ जानी।
समझत बने कथन नहीं आवे, मन बानी अलसानी ।
कसे कोई समझावे किसको, समझे कोई गुरु ज्ञानी ॥
एक दशा में कोई न बरते, कभी बैठा कभी दौड़ा।
कभी थका कभी सोया लेटा, काल चक्र अति चौड़ा।
मले की है विचित्र कहानी, कथा वारता न्यारी ।
नर को हम समझावन आये, सुने न बात हमारी ।।
दुख सुख दुख सुख द्वन्द पसारा, द्वन्द से प्यार बढ़ाया ।
द्वन्द भाव ले जगत रचाना, द्वन्द के फाँस फसाया ॥
मन बुद्धि और चित हंकारा, सो भूले की रसरी ।
दो लड़ बयलड़ चौलड़ बन आई,जीव निवल को जकड़ी।
जकड़े माया के फंदे में, रोये और चिल्लाये।
शोर मचाये बहु चिल्लाये, छूटन विधि नहीं पाये ॥
तब दयाल को दाया लागी, सन्त रूप धर आया ।
गधास्वामी अचल मुकामी, शालिग्राम कहाया ।
नर शरीर में प्रगटा आकर, जीवन बहुत चिताया।
जो कोई जीव शरन में आया, अपना कर अपनाया ।
सुन फकीर यह गुरु उपदेशा, मैं भी तुझे सुनाऊ।
बात जो मेरी मन से माने, इस भूले से बचाऊँ ।
खेल खेलाऊँ सुगम सुहेला, सुरत शब्द मत गाऊँ।
काल हिंडोले से तू बाचे, विधि विचित्र समझाऊँ ।।
कर सतसंग विवेक से गुरु का, गुरु दयाल हितकारी ।
साधु बनकर साधले युक्ति, जा झूले के पारी ॥
नर शरीर मुर दुर्लभ पाया, सतसंगत में आया।
तेरा दाँव पड़ा है पूरा, सोच समझ तज माया ॥
अब की चूक मौज न ऐसी, त्याग काल की आसा ।
आज का साधन आज ही करले, कल को होगा उदासा ।।
बार बार नहीं अवसर प्रानी, काल महा दुखदाई।
जो कोई करे काल की आसा, सों पाछे पछताई ।।
राधास्वामी दया के सागर, तेरे कारन आये।
सीस चरन में उनके मुकाकर, अपना काज बनाये ॥
गधासामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना।
मन बच कर्म से भक्ति कमाना, झूले बाहर आना ।।
[ 52-650 ] तू फकीर है मेरे प्यारे, सुन फकीर की बानी ।
साधु कहें फकीर को भाई, साधु जग सुखदानी ।।
पर उपकारी जन हितकारी, गुरु के आज्ञाकारी ।
अवगुन त्यागी गुन के ग्राही, दया भाव चितधारी ॥
निज चित सोधे मन परबोधे, जीव दोष नहीं दृष्टि ।
अपने भाव में बरतें निस दिन, करें दया की दृष्टि ।।
मोह मया और छल चतुराई, छोड़ें मूल विकारा ।
पर हित लागी सहज विरागी, ज्ञान बुद्धि भंडारा ॥
दुख कलेश सह अपने सिर पर, जीव का करें सुधारा ।
भव दुख भंजन काम निकंदन, यम से छुटकारा ॥
धर कपास की गति बिमलचित, निरस विशुद्ध कहायें।
सहें विपति कठिनाई जगकी, और का दोष छुपावें ।
सरल स्वभाव रहे जग माहीं, अपना रूप संभारें ।
औरन के अश्गण नहीं देखें, दया का मर्म विचारें ।
सुख देवं दुख हरें निरंतर, छमा करें अपराधा ।
हँसी खुशी आनन्द प्रेम गति, अगम अलेख अबाधा ।
नाम फकीर धराया तूने, हो फकीर अब साँचा ।
जैसा नाम तो गुण भी वैसा, मन कर्म सहित सुबाचा ।।
है फकीर का नाम पियारा, मैं फकीर का दासा ।
तन मन धन फकीर पर वारूँ, बस् सुसंग सुवासा ।।
कठिन नाम है कठिन काम है, कठिन फकीर कमाई।
जग के भव दुख नासें पल में, जब फकीर जग आई ॥
जो फकीर मोहे दरशन देवे, अपना भाग सरा हूँ।
अपने तन के चाम की जूती, पग फकीर पहनाऊँ॥
मैं नहीं रामकृष्ण का सेवक, ईश ब्रह्म नहीं जान ।
मैं फकीर का नाम दिवाना, सबसे बढ़कर मानू ॥
मेरे साध है शब्द विवेकी, सन्तवंश कुल शोभा ।
चरन कमल मस्तक पर धारूं, प्रेम मगन मन छोबा ॥
एक घड़ी साधु की संगत, कटे मोह यम फाँसी ।
मेरी नजर में साधु फकीरा, सत चित आनन्द रासी ॥
जो फकीर का दर्शन पाऊँ, चरन सरोज पखारूं ।
आप तरू उसकी शरनाई, औरों को संग तारू ।
साधु की संगत गुरु की सेवा, सहज ही काम बनावे ।
जिस पर साध की दृष्टि पड़गई, फिर जग योनि न आवे ॥
तरवर सरवर मेघ का पानी, औरों को सुख कारी ।
तेसे ही सुन मेरे फकीरा, साधु पर उपकारी ॥
तू फकीर बन तू फकीर बन, तू फकीर बन भाई ।
मैं भी तरू फकीर चरन लग, ऐ फकीर ! सुखदाई ॥
सुनले कथा सुनाऊँ तुझको, प्रगटे बिमल विवेका ।
जीव अनेक रहें जग अन्दर, पर फकीर कोई एका ॥
[ 53-651 ] पहली कथा गंगा तट कोई साधु आया, बिच्छू पानी मझारा ।
तड़प जो देखी इसकी उसने, हाथ से उसे निकारा ।
बिच्छू ने उसे डंक से मारा, हाथ में उपजी पीरा ।
साधु ने कुछ बुरा न माना, सत मन चित गम्भीरा ।।
बिच्छू फिर पानी में आया, इसने उसे बचाया।
फिर बिच्छू ने डंक से मारा, साधु नहीं पछताया ॥
तीजे वार गिरा वह पानी, इसने पकड़ निकारा ।
बिच्छू का स्वभाव सब जाने, डंक से फिर भी मारा ।।
साधू पकड़ किनारे लाया, हाथ सूज गया भाई॥
यह लीला कोई देखी नारी, साधू ढिंग वह आई ॥
बोली क्या तू है अज्ञानी, जो बिच्छू नहिं जानी॥
उसे उठाकर क्यों बाहर किया, बिच्छू विष की खानी॥
हँसा साधु सुन सुन्दर माई, मैं नहीं निपट अनारी॥
मैं हूँ साध साध मत मेरा, पर हित पर उपकारी ॥
बिच्छू तजे स्वभाव न अपना, मैं अपना क्यों त्यागू॥
वह जब निज स्वभाव में करते,क्यों परहित नहीं लागू॥
माई ने जब सुनी तो बोली, धन्य साध की लीला॥
सुबचन सुमन सुकर्म है साधू, सुरत सुभाव सुशीला ॥
पर दुख हरन विभंजन त्रय तप, हितकारी सुख देवा॥
धन्य जगत में वह नर प्रानी, करें जो साध की सेवा।॥
मैं हूँ पारवती परवत की, शिव की निज अरधंगी॥
तू है शिव का पुत्र गुसाई, सुचित सुसाध सुअंगी ॥
धन्य धन्य तू धन्य धन्य है, धन्य गनेश की मूरत॥
जो कोई तेरा दरसन पावे, घरे दया की सूरत ॥
अन्तरध्यान भई वह देवी, साधू मन हरपाया॥
पर उपकार की महिमा भारी, सती का दर्शन पाया॥
दूसरी कथा
[ ५४-६५२ ] दुजी कथा सुनाऊँ फकीरा, कान इधर ला भाई॥
मैं फकीर का प्रेमी सेवक, त्याग हृदय दुचिताई ॥
साधु कोई नौका चढ़ बैठा,. संग मैं नर बहुतेरा॥
दुष्ट अभागी देख के साधू, उपजा क्रोध गम्भीरा ॥
हँसी उड़ाया धूम मचाया, मारा सिर पर लाठी॥
फूटा सिर साधू का भाई, साजा साज कुठाठी ॥
हुई अकाश बानी तब ऐसी, साध है मुझको प्यारे॥
मैं साधु का सहज सनेही, छिल पल का रखबारा ॥
उलट नात्र डुबाऊ सबको, यह अनथे नहीं भावे॥
क्यों कोई अपराधी बनकर, मेरा साध सतावे ॥
बानी सुनकर साधु दुखी भया, बोला चतुर सुजाना॥
तू दयालु है मेरा साँई, अगम अनाम अमाना ।॥
जीव निबल अज्ञानी मूरख, माया फन्द फंसाने॥
यह नहीं समझ सार तत्व को, भूल भरम भरमाने॥
दया दृष्टि कर इन्हें चितादो, भाव जतादे अपना॥
मेरे जैसा उन्हें बनादे, दया का देकर किनका ॥
साधु संग का फल नहीं हानी, लाभ साध संग स्वामी॥
मेट भरम अज्ञान जीव का, चरन सरोज नमामी॥
फिर अकाश बानी भई दूजी, एवमस्तु सुन प्यारे॥
ले तेरे छिन मात्र की संगत, यह जावें भव पारी ।॥
दुष्ट हृदय पछताना आया, साधु चरन लग रोया॥
साध ने अपने अंग लगाया, पल में दुर्मति खोया ॥
सुन फकीर होजा फकीर अब, रूप संभारे अपना॥
जग में प्रानी तेरे रूप में, मेटदे उनका तपना ॥
तेरा रूप है अद्भुत अचरज, तेरी उत्तम देही॥
जग कल्याण जगत में आया, परम दयाल सनेही ॥
तीसरी कथा
[ ३१-६२६ ] तीजी कथा सुनाऊँ तुझको, सुन सुनकर चितलाना॥
कथा नहीं यह और की प्यारे, तेरी कथा सुनाना ॥
हरगोविंद को कैद में डाला, जहाँगीर ने भाई॥
ले गवालियर किले में फाँसा, हुआ निपट दुखदाई ॥
मियाँ मीर ने उसे चिताया, छोड़ फकीर को छिन में॥
नहीं तो उलटे राज यह तेरा, एक रात एक दिन में ॥
जहाँगीर ने हुकुम सुनाया, हरगोविंद को लाओ॥
यह बोले मैं कैद न छोड़, कितना करो उपाओ॥
मैं फकीर हूँ देह बंध में, जीवों के हित आया॥
सात हजार छोड़ दे केही, उपजी मन में दाया ॥
बादशाह ने सबको छोड़ा, जब यह बाहर आये॥
आप छुटे औरन को छुड़ाया, दया का साज सजाये ॥
यह इतिहासिक कथा पुरानी, चरित पुनीत सुहावन॥
मन रंजन मन चेत बढ़ावन, मन भावन मन पावन॥
देह के बंध फकीरा आवे, बंध निरबंधन सोई॥
बंधकर बन्धुवे जीव छुड़ावें, समझे यह गति कोई ॥
तू तो आया नर देही में, घर फकीर का भेसा॥
दुखी जीव को अंग लगाकर, लेजा गुरु के देसा ।॥
तीन ताप से जीव दुखी है, निबल अबल अज्ञानी॥
तेरा काम दया का भाई, नाम दान दे दानी ॥
नाम फकीर धरा जब तूने, काम फकीर का करले॥
गुरु की दया साथ ले अपने, भक्ति की झोली भरले ।॥
तू इराक से अब के आया, सत. संगत के कारन॥
ले प्रसाद यह सत संगत का, होजा भव निधि तारन॥
राधास्वामी दया के सागर, होंगे तेरे सहाई॥
फुक में उतरे साँच फकीरा, सब की करे भलाई ।॥
[५६-६५४ ] चुप रहने का फल है मीठा, बोले बाद विवादा॥
चुप का स्वाद रसीला अद्भुत, बोले मचे उपाधा ॥
कान हैं दो और एक जीभ है, देखलो अपनी आँखों॥
जब दो बार सुने कोई बानी, एक बार मुख भाखो ॥
बोली बोले सहे दुख पानी, बिन बोले निरबानी॥
तोता मैना बोल के चोली; पिंजरे बंध बंधानी ॥
बिन बोले कोई मुक्ति न माँगे, नहीं प्रमान मत भेदा॥
एक चुप लाख विपत्त को टारे, मिटे दुःख भव खेदा॥
मुख की थैली जिभ्या राखू , बिन कारन क्यों बोलू॥
बिना प्रयोजन कथन है निष्फल,क्यों मुख अपना खोलू॥
जो बोले सो हारे भाई, जीत जो मुख नहीं बोले॥
सोचे समझे मोल विचारे, बात हिये बिच तोले ॥
जो सुमिरे सो चिंतन साधे, सुमिरन ध्यान का मूला॥
सुमिरन विधि राधास्वामी नाम है,और बोल भव सूला ॥
[ ५७-६५५ ] सुन बानी उपजे मन हानी, हानी गिलानि महानी॥
चित में डाह ईर्षा जागे, सहज बने अभिमानी ॥
है अभिमान फंद का कारण, काल की यम की फाँसी॥
जो कोई सुने जगत की बातें, अपनी ही करे हाँसी ।॥
दोनों कान हैं नहरें न्यारी, बात है बहता पानी॥
मन का बरतन वृथा बचन से, भरता अपना प्रानी ।॥
पानी भरा बंधा घट आकर, प्रगटे भुंगा कीड़ा॥
इनसे दुख पावे नर मूरख, सहे त्रास दुख पीड़ा॥
सघन अंधेरा बानी का बन, जो आया भरमाया॥
वेद शास्त्र बानी की लीला, तत्व श्विक छुपाया ॥
यह गुरु का उपदेश फकीरा, बानी चित न बिसारे॥
बाहर. कान में बंध लगाकर, श्रुति उद्गीत विचारे॥
अनहद धुन है श्रुति उद्गीता, अन्तर साधी विरतो॥
राधास्वामी गुरु की कृपा, सहजे भई निवरती ।॥
[५८-६५६ ] बाहर की जब आँखें खोली, दृष्टि सृष्टि पसारा॥
बाहर मुखी हुआ जब प्रानी, अन्तर बिरती घिसारा ॥
जो देखे सो भरम दृश्य है, मरम भरम उत्पावे॥
भरम बसे जो हिय के अन्तर, भरम के खेल खेलावे ॥
भरम है बीज अज्ञान अखुवा, डाल कर्म और धंदे॥
फूल वासना काम क्रोध मद, फल सुख दुख के फंदे ॥
भरम की सृष्टि दृष्टि से उपजी, आवागवन की खानी॥
लख चौरासी योनी भरमे, भरम है अकथ कहानी ॥
गुरु ने मर्म जताया अद्भुत, सत संगत करवाई॥
सुरत शब्द की विधि बताया, अन्तर मुख की कमाई ।॥
उलटो आँख तीसरे तिल में, चित को ले ठराओ॥
बाहर के एट देकर अपने, हिय के नैन खुलाओ॥
सूक्ष्म लीला कारण लीला, ब्रह्म परब्रह्मांडा॥
देखो पहले निरख परख कर, फिर धाओ सच खंडा॥
विना नैन के मोती पोहो, बिना कान के बानी॥
बिन कर कर्म करो विधि नाना, बिन पग शिखर चढ़ानी ।॥
बिना देह की काया पाओ, बिन जिभ्या मुख बोलो॥
बिन सूरज के करो प्रकासा, बिना बुद्धि सब तोलो॥
यह गति अगम अपार अकथ है, कसे कोई बखाने॥
जो कोई घट में अपने आवे, लख लख तब मन माने॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, अचरज भेद बताव॥
उलट ब्रह्मांड को भेदे प्राणी, तुम निज सत पद पावें ।॥
[ ५६-६५७ ] तू अविनाशी अजर अमर है, तू सबका अधारा है॥
सब रहते हैं तेरे सहारे, तू ही सबका सहारा है॥
निराधार आधार जगत का, ममें न कोई लख पावे॥
जब तू अपना रूप दिखावे, समझ में तब कुछ कुछ आवे ॥
मन बानी की गम नहीं तुझ में, अगम अथाह अपारा है॥
अलख अगम अव्यक्त अनूपम, अगुण सगुण से न्यारा है ॥
तू है कौन कहाँ से आया, क्यों आया क्यों छाया है॥
क्यों आकर मुझे अंग लगाया, क्यों स्वरूप दिखलाया है॥
तू मैं हूँ या मैं ही तू है, क्या है केहि विधि मैं पाऊँ॥
तू अनाम है तू अरूप है, कैसे तेरा गुण गाऊ ॥
अचरज अचरज अचरज तू है, गुप्त प्रगट में व्यापा है॥
मायातीत अगोचर उनमन, छाँह न दिव्य प्रकाशा है॥
पात पात में तेरी लीला, फूल फूल का बास है तू॥
दूर बताता है कोई केसे, सबके सब विधि पास है तू ।॥
गुरु हुआ चेले के घट में, प्रगट होकर रहता है॥
बुरा भला लाखों कहे कोई; सबकी सुनता रहता है॥
नहीं गुरु नहीं चेला तू है, दोनों दशा से न्यारा है॥
हद बेहद से परे ठिकाना, तेरा सकल पसारा है ॥
आजा आजा मेरी सुन जा, मेरे हृदय में बस जा॥
प्रेम प्रीत की जाल बनाई, उसके फंदे में फंस जा॥
ऐ. अरूप तेरा मुखड़ा देखू, दर्शन की अभिलाष घनी॥
मैं निर्धन दीन शरणागत, तू है सबका आप धनी ॥
आरति कैसे करूं गुसाई, तेल दिया बाती है तू॥
फूल चढ़ाने से क्या होगा, कली फूल पाती है तू ॥
जहाँ जहाँ निरखू तेरी लीला, जो जो सुनूं तेरी बानी॥
जो जो कहूँ तेरी हो कहानी, रहूँ तेरा मैं अभिमानी ॥
मुझको शब्द तेरा हो सुमिरन, जो गाऊँ सो भजन तेरा॥
जो ध्याऊँ वही ध्यान तेरा हो, जो बोलू सो कथन तेरा ।॥
बलबल जाऊँ तेरी दया पर, जान प्राण तन मन अरपू॥
राधास्वामी चरन की महिमा गा गा,काल करम से नहीं डरपू॥
[६०-६५८ ] राधास्वामी चरन कमल पर, बार बार बल जाऊँ॥
तन मन की सब सुद्धि बिसारू, निसदिन गुरु गुन गाऊ॥
गुरु मेरे जान प्रान से प्यारे, गुरु आँखों के तारे॥
गुरु की दया साध की संगत, जाऊ भव जल पारे॥
गुरु रक्षक गुरु दाता दानी, गुरु का लेऊ सहारा॥
गुरु के चरन सीस पर धारे, काल करम थक हारा ।॥
गुरु मूरति हिय आन विराजी, घट मैं करू गुरु सेवा॥
तन मन धन और सीस अरप कर, जानू और न देवा ॥
छिन प्रति छिन गुरु आरती ठान, गुरु से नेह लगाऊँ॥
सुरत शब्द की करू कमाई, अन्त परम पद पाऊँ॥
पिन गुरु भक्ति विवेक न होई, गुरु बिन ज्ञान न पाये॥
करम धरम सब धोका जानो, जब लग गुरु न चिताये ॥
गुरु का रंग हृदय जब धारा, मिटा तिमिर अज्ञाना॥
घट से ज्योती सोत बह निकसी, प्रगटा तब विज्ञाना॥
गुरु के चरन प्रीत भई गाड़ी, समझ पड़ी गुरु बानी॥
मन प्रतीत प्रेम रस पागा, मिल गई शब्द निशानी ॥
योग विराग हृदय प्रकाशा, सूझा सकल पसारा॥
अलख अगम की गम जब पाई, मिटा मोह संसारा ॥
पढ़ पढ़कर बहु दिवस बिताये, बुद्धि विलास में भूले॥
दृष्टि खुली जब गुरु कृपा से, प्रेम हिंडोले भूले ॥
कोटि जनम से धोखा खाया, मिला न ठौर ठिकाना॥
धन्य धन्य गुरु महिमा तेरी, सत्य नाम दिया दाना ॥
मान न माँगू सिद्धि न मागू, ऋद्धि में चित्त न लाऊ॥
जनम जनम पद कमल की सेवा, यही पदारथ पाऊँ ॥
सुमिरन नाम ध्यान गुरु मूरति, भजन शब्द मत सारा॥
तुरिया तुरियातीत न चाहूँ, रहूँ सकल से न्यारा ॥
गुरु मेरे मात पिता सम्बन्धी, गुरु से नाता जोड़े॥
भव की लाज लोक सब त्यागू, जग से मुंह को मोड़ ॥
जो मैं दास तुम्हारा दयानिध, हित चित मन कर्म वानी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बख्शो पद निरवानी ॥
[६१-६५६ ] तू जगदीश जगत का करता, तेरा मन में ध्यान रहे॥
तेरी लगन लगे निस बासर, तेरा निस दिन ध्यान रहे ॥
तू अनाम तू मायातीता, गुणात त करुणा सागर॥
सुख सम्पति परलोक बड़ाई, तुझमें यश और मान रहे॥
चरन कमल की भक्ति मिले स्वामी,भक्तिभाव हिय में आवे॥
तेरी प्रीति प्रेम पद का प्रभु, छिन छिन प्रतिछिन गान रहे ।॥
दोऊ कर जोड़ करूं मैं विनती, क्षमा करो अपराध मेरा॥
तेरी सेवा तेरी पूजा, तेरा ही ज्ञान अनुमान रहे॥
रसना नाम जपे तेरा पल पल, दर्शन की अभिलाष बढ़ी॥
शब्द की ओर निरन्तर मेरे, सुरत निरत का कान रहे॥
जग की मान बड़ाई न माँगू, नहीं मागू धन परिवारा॥
भक्ति दीजे चरन कमल की, भक्ति से कल्यान रहे ।॥
छल चतुराई कपट कुटिलता, काल कर्म से सब हारे॥
शरणागत की सुध प्रभु लीजे, चरन शरन में आन रहे॥
[६२-६६० ] चरन कमल में सीस मुकाऊँ, नित सतगुरु गुन गाऊँ॥
तन मन सब अरपू हित चित से, निसदिन ध्यान लगाऊ॥
जागू तो गुरु का रहे सुमिरन, सोऊँ तो लव लाऊँ॥
गहरी नींद में लय चिंतन कर, आपा आप भुलाऊँ॥
तुरिया तुरियातीत रहूँ जब, मन में रूप बसाऊँ॥
सोबत जागत रूप न त्यागू, ऐसी ताड़ी लाऊं॥
गुरु मेरे अगम अपार अमाया, दान दया का पाऊ॥
भक्ति भाव नित बसे निरन्तर, और सकल बिसराऊँ॥
गुरु की बानी अगम ठिकानी, समझ समझ हरपाऊँ॥
जो कोई पूछे जिज्ञासू बन, प्रेम से ताहि सुनाऊँ॥
गुरु की कृपा साध की संगत, बुद्धि विवेक बढ़ाऊँ॥
निज स्वरूप का दर्शन पाकर, औरन को दरसाऊ ।॥
भेद भाव का संशय मेटू, भरम विकार नसाऊ॥
साँई मेहर कुछ ऐसी होवे, सबको मरम बताऊँ ॥
जीव दुखारी तीन ताप से, सुख का भेद लखाऊँ॥
सुमिरन ध्यान भजन की किरिया, जानू जान बताऊँ॥
बिनती सुनो दयानिधि मेरी, आऊ कहूँ न जाऊ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रेम प्रोति उमगाऊँ॥
[६३-६६१ ] आसा एक गुरु की चित में, और न मन अभिलाषा॥
जिसकी ऐसी सच्ची श्रद्धा, हुये न कभी निरासा ॥
काम न आवे छल चतुराई, यह सब भरम विकारा॥
एक गुरु के नाम की चिन्ता, कर जग से हो न्यारा ॥
जाके सिर पर हाथ गरु का, बाँका बाल न होई !
जो जग बैर करे बहुतेरा, हानि न तासे कोई ।॥
मौज में बरतूं मौज निहारूँ, मौज का धरूं सहारा॥
मौज की राह में पग को धारू, मौज से होय सुधारा ।॥
कष्ट कलेश विपत दुख आपति, पड़े सीस पर सहना॥
राधास्वामी मौज परखना, मौज की ओट में रहना ।॥
[६४-६६२ ] धन्य धन्य गुरु परम सनेही, धन्य दीन हितकारी॥
धन्य कृपाला सहज दयाला, भव भय मेटनहारी ॥
लीला अगम अपार अमाया, अद्भुत क्या कोई जाने॥
ऋषि मुनि जोगी पार न पावें, ज्ञानी नहीं पहचाने॥
अगुन सगुन के मध्य बिराजे, नहीं ब्रह्म नहीं माया॥
रूप अरूप के वरे परे तुम, नहीं प्रकाश नहीं छाया ॥
सब में व्याप्त तुम्हारी सत्ता, सत्त असत्त के पारा॥
मन बानी की गम नहीं तुममें, सब में सब से न्यारा ॥
क्या कह करू तुम्हारी स्तुति, अजर अमर अविनासी॥
निरालम्ब सब के आधारा, चेतन धन सुख रासी ॥
गो गोचर जहाँ लग मन जाई, सो नहीं देश तुम्हारा॥
माया काल के परे ठिकाना, क्या कोई बरने पारा ॥
तत्व अतत्व असार सार नहीं, शब्द सुरत नहीं होई॥
सन्त कहें तुम शब्द रूप हो, और अशब्द गति सोई ॥
ऊँची दृष्टि करे जो प्रानी, सार भेद कुछ पावे॥
भेद पाय शरणागत आवे, आवागवन मिटावे ॥
दया करो करुणा चित लाओ, दो मोहि भक्ति विवेका॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहूँ शब्द मिल एका ॥
६५-६६३ ] भेद का ग्राहक मिले तो उसको, तत्व का भेद बताऊँ॥
प्रेम भाव से हृदय लगाऊँ, घर की राह दिखाऊँ॥
रूप न रंग अकार न देखा, ऐसा देश हमारा॥
मन बानी की पहुँच नहीं है, कहन सुनन से न्यारा ॥
पिंड खोज ब्रह्मांड लखे जो कोई, सूझे ब्रह्म पसारा॥
पिंड ब्रह्मांड से न्यारा लखे, दरसे अगम अपारा ।॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके, बरसे अमृत धारा॥
विन जिभ्या के शब्द प्रगट हो, बिन सूरज उजियारा॥
शब्द अशब्द अलख लख लीला, समझे बिरला ज्ञानी॥
सुरत शब्द का साधन करके, पावे पद निरवानी ॥
नीचे से ऊँचे चढ़ जावे, ब्रह्मरेन्द्र की चोटी॥
दुर्मति खोवे कुमति न आवे, तजे भावना खोटी॥
राधास्वामी परम दयाला, शब्द भेद मत गाया॥
अधिकारी जब मिले विवेकी, धुरपद ले पहुँचाया॥
[६६-६६४ ] तन मन प्रान स्वामी के अरपन, स्वामी रंग रंग राता॥
सब को भूलूँ उसे न भूलू , फिरूं जगत मद माता ॥
आँखों में गुरु मूरति बसती, चित चिंता सतगुरु की॥
मन में गुरु हैं तन में गुरु हैं, यह निष्ठा है धुर की ॥
जिभ्या नाम गुरु का रहता, कानों में गुरु बानी॥
सुरत शब्द का साधन करके, पाया पद निरवानी ॥
सोये बेठे खड़े उताने, चलते और ठहराये॥
सकल दसा में एक अवस्था, प्रेमी एक ठिकाने ॥
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, भेद पाय हरपाना॥
मैं तो सब विधि गुरु का सेवक, सेवक भाव सियाना॥
[ ६७-६६५ ] सत गुरु का सच्चा जो सेवक, ज्ञानी चतुर सियाना॥
तन मन से गुरु आज्ञा पाले, प्रेम भाव दीवाना ॥
बुद्धि युक्ति से काम न राखे, छोड़े मान बढ़ाई॥
जो कोई ऐसा परम सनेही, करे अटल सेवकाई ।॥
करना धरना कुछ नहीं उसमें, गुरु मत में परवीना॥
कमल पत्र सम उसकी रहनी, गुरु के चरन अधीना ।॥
गुरु का हुकम सीस पर धारे, गुरु आज्ञा में चाले॥
त्यागे मोह वासना जीकी, प्रेम प्रीति पथ पाले ॥
मन में सुमिरे राधास्वामी नामा, तन से राधास्वामी कामा॥
मन बचन ध्यान से गुरु का, सतपद में विश्रामा॥
[६८-६६६ ] उमर बिताई समय गवाया, मिला न ठौर ठिकाना॥
प्रेम भक्ति की रीति न जानी, जग धन्धे भरमाना॥
दो दिन का रहना है भाई, दो दिन का ब्यौहारा॥
दो दिन का यह सकल पसारा, दो दिन कुल परिवारा।॥
जो आये हैं जायेंगे एक दिन, कैसा घर और डेरा॥
मूरख सोच समझ मन अपने, चिड़िया रैन बसेरा ॥
रात विषय में लम्पट रहता, दिन का खाना पीना॥
ऐसे प्राणी पशु हैं जग में, धिक धिक उनका जीना ॥
सतगुरु राधास्वामी पाये, सार भेद समझाया॥
अब नहीं पहुं, करम के धन्दे, भक्ति स्वाद रस पाया॥
[६६-६६७ ] सेवक मेरा मैं सेवक का, आदि अन्त तिहु काला॥
मैं सेवक से अपने राजी, सेवक करूं निहाला ॥
दास दुखी तो मुझे भी दुख है, दुखी दास हुआ कैसा॥
एक पलक में प्रगट होय कर, करदू अपने जैसा ।॥
माता का बालक है प्यारा, मछली को जल धारा॥
से ही सेवक मेरा दुलारा, और आँखों का तारा ॥
सेवक स्वामी एक मता के, प्रेम रंग रंग राते॥
छल चतुराई मुझे न भावे, प्रेम के दोऊ दिवाने॥
राधास्वामी समरथ दाता, मैं सेवक बिन दामा॥
उठत बैठत कभी न भूलू, जिभ्या रहे गुरुनामा॥
[ ७०-६६८ ] आप तरें औरों को तारें, यह साधु की महिमा॥
इनका पर उपकार है भारी, किससे कोई दे उपमा ।॥
कोई बाहर कोई भीतर देखे, लीला अगम अनूपा॥
बाहर भीतर एक समाना, एक विचित्र स्वरूपा ॥
राधा सूरत शब्द कन्हाई, दोनों का भया मेला॥
बंसी बाजी जब मधुवन में, मेटा द्वन्द झमेला ॥
ब्रह्म सनातन रूप कृष्ण का, समझे कोई नर ज्ञानी॥
भवर गुफा चढ़ सुने बाँसुरी, परखे शब्द निशानी ॥
राह रुकाना गुरु से पूछो, आगे अगम अगोचर॥
राधासामी चरन शरन बलिहारी, सत पद पहुँचो धुर धर ।॥
[७१-669] मन को सोच बुद्धि को दृढ़ कर, चित से ध्यान लगाओ॥
ममता गुरु के चरन में राखो, बिगड़ी अपनी बनाओ॥
आप तरो औरों को तारो, यह गुरु का उपदेशा॥
चिंता जग की सकल विसारो, तन दो द्वन्द अंदेसा ।॥
जो कोई ऐसा सेवक साँचा, भजन भाव की शोभा॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देख भक्ति मन मोहा॥
[ ७२-६७० ] गुरु के नाते सब का नाता, नाता और न मानू॥
मेरा प्रीतम जिसे पियारा, प्यारा उसको जानू ॥
गुरु हैं मात पिता सम्बन्धी, गुरु साथी संघातो॥
गुरु के चरन का ध्यान लगाऊँ, मैं पल पल दिन राती॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊँ॥
राधास्वामी नाम का सुमिरन, सुमिरू और सुमिराऊँ ॥
का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥
माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥
अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥
राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
[७३-६७१ ] गुरु ने हाथ सीस पर फेरा, और मुझको अपनाया॥
पहले जनम का रंग मिटाकर, भक्ति का रंग चढ़ाया ॥
काल करम का भय सब मेटा, अभय निडर करवाया॥
माया यम का खटका छूटा, मोह का फन्द कटाया॥
अब नहीं पड़े करम के धोखे, धन सन्मान न माँगू॥
राधास्वामी पद से नेह लगाऊँ, द्वन्द जगत तज भागूं॥
[७४-६७२ ] साधू मुझको सब से प्यारे, साधू मेरे सनेही॥
साधु चरन पर तन मन वारू, सुफल करू नर देही॥
साधू कुल में जनम मिला है, साधू मेरे भाई॥
गुरु की दया साधु की संगत, मेरी भई भलाई ॥
साधु गुरु के रूप हैं मेरे, महिमा अधिक अपारी॥
साधु सेवे आनन्द पाया, राधास्वामी की बलिहारी ॥
[७५-६७३ ] जिसने अपना जगत रचाया, वह है चतुर सियाना॥
तू बनता है करता धरता, क्यों मूरख दीवाना॥
सेवक है तो सेवा कर, और तज दे भरम कहानी॥
दुनियाँ को विश्वास नहीं है, दुनियाँ है दीवानी ।॥
गर्भवास में जिसने पाला, माँ की गोद मैं डाला॥
वही तेरा रक्षक है प्राणी, उससे होगा संभाला ॥
सेवक करे रात दिन सेवा, स्वामीपन नहीं धारे॥
सेवक तो सेवा का भूखा, स्वामी ओर निहारे ।॥
मेरा मुझमें नहीं है कुछ भी, जो कुछ है सो तेरा॥
सेवा ले मुझसे कर मुझको, राधास्वामी का चेरा ॥
[७६-६७४ ] मेरा साँई है बहुरंगी, अद्भुत नाच नचावे॥
नाच खेल के सैन जतावे, भक्ति पन्थ दृढ़ावे ॥
उसके घर में कमी नहीं है, पूरन है भण्डारी॥
उसे समझकर काम करो तब, समझो सत मत सारा ॥
बुन्द के पीछे सिंधु छुपा है, यह सब कोई जाने॥
बुन्द के साथ है सिंधु की शक्ति, बिरला ही पहचाने॥
विष्णु के पद में गंग की सोती, शिव की जटा में आई॥
देखो जग में फैली फिरती, गंगा है लहराई ॥
धर विश्वास त्याग जग आसा, गुरु चरन चित लाओ॥
राधास्वामी को किरपा ले, दो दो और दिलाओ ॥
[७७-६७५ ] मैं सेवक का सेवक मेरा, भेद भाव नहीं कोई॥
प्रेम प्रीति की महिमा भारी, सेवक प्यारा होई ।॥
जात पाँत पारखण्ड पसारा, एक भक्ति का नाता॥
जो कोई मुझको मन से चाहे, मैं उसके रंग राता॥
नाता प्रेम का सब से उत्तम, यही सार है भाई॥
प्रेम भक्ति की लीला अद्भुत, भक्ति है सुखदाई ।॥
बड़े बने सो नीचे आये, नीचा ऊँचे आया॥
पाँव की धूल गगन में पहुँची, जल पताल पहुंचाया॥
ऊँचा है सो प्यासा जावे, नीचा जल को पीवे॥
राधास्वामी मेहर करें जब, प्यारा जुग जुग जीवे ॥
[ ७८-६७६ ] तुम सेवक कसे हो भाई, सेवा चित नहीं लाते॥
बिन सेवा उद्धार कहाँ है, क्यों नहिं भक्ति कमाते ॥
अपनी सी तुम करनी करलो, सतगुरु जानें अपनी॥
अपने धरम करम का पालो, धारो ऐसी रहनी ॥
हर्प शोक व्यापे नहीं मन में, ममता मोह न आवे॥
हित से सेवा भाव में लागो, तुम्हें न काल सतावे ॥
करम करो करतापन त्यागो, यह सेवक की रहनी॥
कथनी बदनी काम न आवे, काम की वस्तु है करनी ॥
सेवक धर्म कठिन अति दुस्तर, चित बानी सब सोधो॥
राधास्वामी नाम को सुमिरो, निज मन को परबोधो॥
[ ७६-६७७ ] जिनको चाह राम की साधू, राम उन्हें मिल जाते हैं॥
राम दास के पास राम है, और नहीं कोई पाते हैं॥
बाद विवाद में राम नहीं है, राम न पूछा पेखी में॥
राम दास ने राम को पाया, सहज ही देखा देखी में॥
गम नहीं तीरथ में रहते, राम बरत के साथ नहीं॥
राम दास के हाथ राम है, औरों के वह हाथ नहीं॥
बुन्द में सिंधु सिंधु में बूदें, बुन्द सिंधु दोऊ एक हुये॥
बुन्द सिंधु का झगड़ा मन में, उनके लिये अनेक हुये ॥
राधास्वामी सतगुरु आये, भेद दिया पूरा पूरा॥
जो कोई भेद भाव को मेटे, सतगुरु का सेवक सूरा ॥
[ ८०-६७८ ] माया ब्रह्म का भेद है न्यारा, भेद वाद है भरम कथा॥
जो कोई उनका रूप पिछाने, भेद वाद है धरम कथा ॥
बिन गुरु ज्ञान की गम नहीं होती, ज्ञान गुरु के आधारा॥
गुरु की संगत करे जो प्रानी, पावे सार भेद सारा ॥
दृष्टि सृष्टि का सकल पसारा, जैसी दृष्टि वसी सृष्टि॥
भक्ति की दृष्टि जब आई, ईश्वर मय होगई सृष्टि ॥
गुन का ग्राहक कोई कोई होगा, अवगुण के ग्राहक हैं सब॥
गुणी मिले तो गुण बतलावे, अगुन सगुन समझे नर तब ॥
राधास्वामी परम दयाला, शब्द नाव लेकर आये॥
हाथ पकड़ कर सबहि बिठाया, तट के निकट खींच लाये॥
[८१-679] सेवक की सेवा बस होकर, स्वामी सेवक आप हुआ॥
उसका बोझ धरा सिर अपने, कारज सब चुपचाप हुआ॥
प्रेम भक्ति में सच्चा होजा, त्याग बुद्धि छल चतुराई॥
सहज ही मानुष जनम सुफल हो, छूटे जग अगमापाई ॥
ज्ञान पन्थ है खड्ग की धारा, कट कट गिरा जो पग धारा॥
भक्ति प्रेम में नहीं कठिनाई, सहज ही जा भव जल पारा॥
भक्त को माया नहीं सताती, भक्त गुरु के हैं प्यारे॥
ज्ञानी नेमी करमी धरमी, भक्तिभाव से हैं न्यारे ॥
राधास्वामी नाम सुमिर नित, राधास्वामी गुन गाले॥
शुभ अवसर पाया है साधु, भक्ति रतन धन को पाले॥
[८२-६८० ] साधु की संगत गुरु की सेवा, राधास्वामी दीजे॥
इसके सिवा और नहीं माँगू, चरन शरन में लीजे ॥
साधु संग गंगाजल निर्मल, न्हाये पाप कटावे॥
जो कोई साधु की संगत आवे, भक्ति पदारथ पावे ॥
गंधी की दुकान साधु संग, पिन माँगे शुभ बासा॥
जो चाहो तुम मुक्ति भक्ति को, रहो साध के साथा ॥
पाप हरें दुख दारुण मेटें, सुख देवें दिन माँगे॥
साहब का दीदार करावे, सहज ही भव निधि लाँघे ॥
राधास्वामी साध संग दो, और नहीं अभिलासा॥
चरन कमल की छांह रहूँ नित, बनू साध का दासा ।॥
[८३-६८१ ] साध मेरे हैं रूप अनूपम, अद्भुत अधिक सुहाने॥
मैं हूँ उनका रूप दिवाना, वह मेरे दीवाने ॥
भक्त और भगवंत में किंचित, भेद भाव नहीं होता॥
भक्तों को तुम धार समझलो, भगवत गंग का सोता।॥
स्वामी सूरज सेवक किरण, करते दिव्य प्रकासा॥
बुन्द सिंधु में रहे समाया, लहे आनन्द हुलासा ।॥
स्वामी गुप्त दास है प्रगट, यह सब कोई जाने॥
दास गुप्त बिन प्रगटे स्वामी, यह सब कोई जाने॥
प्रेमी प्रीतम प्रेम नगर में, पल पल करें विहारा॥
राधास्वामी भेद बतायें, सार सार का सारा ।॥
[८४-६८२ ] प्रेम की लीला अद्भुत न्यारी, प्रेम की अकथ कहानी॥
प्रेम दात का दान मिले गुरु, भक्ति करू मनमानी ।॥
मान न दो सम्मान न दो, धन दौलत नहीं देना॥
भक्ति रतन धन का अधिकारी, नाम तुम्हारा लेना ॥
तन मन धन सब तुम पर वारू, साँस प्रान के संगा॥
मनमोहन छबि रहे दृष्टि में, चित हो कभी न भंगा॥
मुक्ति ज्ञान की चाह नहीं है, एक तुम्हारी आसा॥
सेवक करलो दास बनालो, पूरन प्रेम विलासा ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊँ॥
राधास्वामी चित्त बसाऊ, गुन गा गा हरपाऊँ ।॥
[८५-६८३ ] जो मेरा मैं भी हूँ उसका, मानें प्रेम का नाता॥
जिनमें मेरा प्रेम नहीं है, उनके ढिंग नहीं जाता ॥
छल चतुराई काम न आवे, निश्चल बुद्धि दिलासा॥
प्रेम भाव जब घट में आवे, अन्तर होय उजासा॥
मेरा रूप नहीं है कोई, मेरे रूप हैं सारे॥
जो जिस रूप से जिसको माने, रहे उसी के सहारे॥
दर्शन दूगा उसी रूप में, उसी से पार लगाऊ॥
काल करम का दुख नहीं व्यापे, सहज ही बन्ध कटाऊ॥
राधास्वामी मुझे चिताया, करूं साध की सेवा॥
साध रूप का दर्शन निस दिन, साध हैं सच्चे देवा ।॥
[८६-६८४ ] साध हमारी आत्मा, साध को कोई न सताये॥
जो कल्पाये साध को, जग में कल नहीं पाये ॥
साध विकल तो सब विकल, साध सुखी सब सुख॥
साध राम की आत्मा, साध को समझो मुख्य ॥
निर्बल दीन की आह को, कैसे ईश सहे॥
साँस खाल की देख लो, लोहा भस्म करे॥
राधास्वामी सत पुरुष, सतगुरु सत करतार॥
तुम ही दीनानाथ हो, तुम ही दीन दयार ॥
[८७-६८५ ] जात न जानू पाँत न जानू, मानू भेद न कोई॥
जो कोई मेरी भक्ति कमावे, मुझको प्यारा सोई ।॥
जात न पूछो मेरे भक्त की, उसकी जात निराली है
यह सब फूल बाग के मेरे, मैं उनका हूँ माली॥
फल मुझे प्यारे बहु लागें, सिर पर. फल चढ़ाओ॥
जात पाँत की दुर्मति मेटो, साधु के गुन गाओ॥
पूछो ज्ञान न पूछो जाती, जात भरम की खानी॥
लो तलवार म्यान नहीं देखो, साध को लो पहचानी ॥
यह सब ही पाखन्ड पसारा, भक्ति महातम जानो॥
राधास्वामी चरन कमल पर, आपा अपनी डारो ।।
[८८-६८६ ] सुना पढ़ा समझा समझाया, ज्ञान हाथ नहीं आया॥
जब सतगुरु ने आन चिताया, सहज ही वह धन पाया ।॥
कथनी कथे सो दूर है हमसे, करनी करे तो साथी॥
रहनी रहे सो गुरु हमारा, रहनी हमको भाती॥
गुरु की खोज करो सतसंगत, फिर करनी चित लाओ॥
करनी का फल उदय हुये जब, रहनी जाये समाओ॥
सत संगत में श्रवन मनन है, अनुभव में है रहनी॥
यह निध्यासन समझो प्यारे, त्यागो मुख की कहनी ।॥
कहनी तो है भर्म कहानी, भर्म की समझो खानी॥
राधास्वामी भेद बतावें, करनी है सुखदानी ॥
[८६-६८७ ] बिन गुरु ज्ञान न उपजे साधु, लो गुरु की शरनाई॥
बानी सुन सुन मन में धारो, मिटे भरम दुचिताई ॥
गुरु हुये रूप धरा मानुष का, नर हुये जीव चिताया॥
जो कोई उनके शरन में आया, ताको अंग लगाया ।॥
गुरु चरित्र को देखो समझो, सुनो गुरु की बानी॥
बानी सुन सुन मन में धारो, मेटो द्वन्द गिलानी ॥
कैसे कहूँ खोलकर यह मैं, नहीं बैन कोई बुझे॥
जब सत संगत आवे प्रानी, तत्व सार तब सूझे ॥
धन्य धन्य गुरु की लीला अद्भुत, धन्य धन्य उपदेसा॥
राधास्वामी मेहर से मेंटा, कष्ट कलेश अन्देसा ।॥
[६०-६८८] महिमा अगम अपार अलौकिक, जो गावे सो जाने॥
करे कीर्तन ध्यान लगावे, मुक्ति पदारथ पावे ॥
सुरत शब्द है सबका टीका, योग सहज सुखदाई॥
गुरु से सीख करे कोई साधन, चित आनन्द रस पाई ।॥
गो इन्द्री और कर्ण है गोले, शब्द प्रभाव खुलावे॥
ग्रन्थी काटे जड़ चेतन की, परम धाम को धावे ।॥
बन्शी वाला कृष्ण मुरारी, राधा सुरत सिंयानी॥
शब्द सुरत की करे कमाई, सहज सहज हो ज्ञानी ।॥
सात दिनों में सात स्थाना, गगन मंडल को फोड़े॥
सुन्न के बाहर गुफा कोट को, सुन मुरली धुन तोड़े॥
सात सुरों का भेद पिछाने, सरगम की गति जाने॥
सातों तारा मंडल बेधे, सात निरख मन माने ।॥
सात दिना की सात कमाई, जो कोई करे सियाना॥
राधास्वामी की कृपा से, पाचे पद निरवाना ॥
[६१-689 ] धारो टेक गुरु की मन में, और टेक सब छोड़ो॥
जग दारुण से मुंह को मोड़ो, गुरु से नाता जोड़ो॥
गुरु का लिया सहारा जिसने, अपना काम बनाया॥
अपने साथ और को तारा, यम का फन्द कटाया ।॥
बने तो गुरु से बने तुम्हारी, किसी की ओर न आसा॥
राधास्वामी दया करे जब, क्यों दुख पावे दासा ।॥
690 तन मन धन कुल सम्पत त्यागू, गरु के पद नहीं छोड़॥
एक गुरु से नेह लगाकर, जग का नाता तोडू॥
गुरु समरथ जब अंग लगावें, गहें बाँह निज करसे॥
तब मेरे मन में ढारस आवे, चरन कमल रज परसे ।॥
जीते जी गुरु नाम जपू नित, प्रान तजे सोई भाखू॥
जनम मरन का संशय छूटे, चित गुरु मूरति राखू ॥
यही करनी है यही साधन है, यही योग जप ज्ञाना॥
यही नेम संयम शम दम है, यही तप यही सत ज्ञाना ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाऊ॥
राधास्वामी उर में धारूँ, जिभ्या नाम सुनाऊँ ॥
[६३-691 ] सत्य नाम का दान दिया है, गुरु को क्या मैं भेंट धरूँ॥
तन मन धन सब तुच्छ है दाता, अर्पन क्या फिर वस्तु करूँ॥
आपा मेरा सब से प्यारा, आपे को चरनन में लो॥
आपा गया गया फिर सब कुछ, हुआ तुम्हारा आपा खो ॥
राधास्वामी लगन लगी है, जित देखू हो रूप तेरा॥
मैं तेरा तू हो गया मेरा, मैं परजा तू भूप मेरा ॥
[६४-692 ] लिखू कलम से तेरी लीला, जिभ्या नाम तेरा गाऊँ॥
चित से तेरा चिंतन सतगुरु, मनमें ध्यान तेरा लाऊँ ॥
अहंकार चित मन और बुद्धि, चारों भेट धरू स्वामी॥
जो मैं तेरा सच्चा सेवक, ले इनको अन्तरयामी ॥
राधास्वामी चरन कमल की, छाँह बसू मैं सहित उमंग॥
त्यागू जग के रंग रूप सब, चढ़े सवाया गुरु का रंग॥
[६५-693 ] ब्रह्मरेन्द्र के पार जो पहुँचे, सो सुमेर गिरि जावे॥
हंस रूप की गति मति धारे, सत्य नाम धुन गावे ॥
धाम सुमेर विचित्र महाना, हंसन का स्थाना॥
जो प्रकाश सुनहरा देखे, अद्भुत अजब सुहाना ॥
व्यापे काल न कर्म न माया; निज स्वरूप को समझे॥
राधास्वामी की बलिहारी, द्वन्द जाल नहीं उरझे ।॥
[६६-694 ] सत में सत्ता चित में चेतन, आनन्द है मुख धामा॥
सत चित आनन्द एक अवस्था, समझ जपो सतनामा॥
देह गेह की सुध बुध भूलो, इष्ट धाम चित्त लाओ॥
आनन्द उपजे भव दुख भागे, सुगति अलौकिक पाओ॥
राधास्वामी गरु हम पाये, जनम सुफल कर लीना॥
राधास्वामी धामा की आसा, मन ताहि को दीन्हा ।॥
[६७-695 नाम रतन धन मन में रखना, मुह से कुछ न कहना॥
संसारी ज्यों जीवन रहना, दुख सुख सिर पर सहना॥
भक्ति मन का भाव है प्यारे, मन भक्ति रंग राता॥
गुप्त प्रगट में एक दशा है, रहे प्रेम मद माता॥
मुख से नाम का लेना केसा, जग को क्या दिखलाना॥
दिखलावे का काम है फूकट, अन्तर ताड़ी लाना॥
लव लगी रहे लगन मन व्याने, हरष शोक से न्यारा॥
जो कोई ऐसी रहनी धारे, वह सतगुरु का प्यारा ॥
राधास्वामी नर शरीर में, सन्त रूप धर आये॥
जीव दया ले भेद. बताया, सुरत शब्द मत माये ॥
[६८-696 जिनको मेरा सहारा साधु, मैं उनका रखवारा॥
एक पलक मैं उन्हें न छोड़े, दूं दुख से छुटकारा ।॥
मेरे भक्त मुझे हैं पारे, ज्यों आँखों के तारे॥
आँख पलक सम उनको सेऊ, भव दुख मेट्र सारे ॥
दास दुखी मेरा हो कैसा, मैं उसका रखवारा॥
मैं तो उसके साथ हूँ हरदम, मेरा जिसे सहारा ॥
[६६-697 चादर की छाई यह जग है, मिथ्या भोग विलासा॥
जो कोई उसकी आस बंधाना, सहे काल का गासा ॥
चालू की दीवार बनाई, पोचा दे चिकनाई॥
बही बयार पलक में बिनसी, भूली छल चतुराई ।॥
दो दिन का रनवास महज सब, जग दो दिन का डेरा॥
जो आये हैं एक दिन जा, चिड़िया रैन बसेरा ।॥
रावण मरा मरा दुर्योधन, कंस मरा उत्पाती॥
राज काज मद काम न आया, छूटे घोड़ा हाथी ।॥
कर सतसंग सुफल कर दही, शुभ असर यह प्रानी॥
गधास्वामी चरन ओट गह, मेट दे आना जानी ॥
[ १००-698 एक रूप के सकल रूप हैं, सकल रूप एक रूपा॥
जो कोई यह मर्म पिछाने, पड़े न भा जल कूपा ।॥
मैं जानू गुरु मेरे मन बसते, गुरु घट घट के बासी॥
अजर अमर अव्यक्त अनूपम, अद्भुत कौतुक रासो ।॥
सब में रमा अकेला सबसे, सब लिधि सबका संगी॥
कर गुरु भक्ति त्याग दे दुधा, मेट जगत छिन भंगी ।॥
एक अनेक है लीला उसकी, नहीं वह एक अनका॥
जिसकी जमी हुई भावना, वेसी धारे टेका ॥
गधास्वामी परम दयाला, चरन शरन मोहि दीज॥
एक अनेक का धोका मिथ्या, सेवक अपना कीजे॥
९-699 प्रेम के नाते सबको मानूं, प्रेम का नाता सच्चा॥
जग व्यौहार झूठ है सारा, जग का नाता कच्चा ॥
बिदुर शूद्र प्रहलाद राक्षस, कुबजा रूप कुरूपा॥
गज हाथी हनुमान नील कपि, प्रेम से मोहा भूपा ।॥
बाल्मीक और व्याध शुपच थे, शबरी नार अनारी॥
यह सब तेरे भक्ति हित लागे, भक्ति की बलिहारी ॥
जात न पूछे पाँत न पूछे, कुल नहीं पूछे कोई॥
जो कोई हरी को भजे भक्ति से, हरि भज हरि का होई ॥
राधास्वामी प्रेम सिखावें, प्रेम की राह दिखलावें॥
प्रेम नगर में ले पहुँचाय, सुरत शब्द मत गावे ॥
[१०२-700 ] धन दौलत की भेट न चाहूँ, मन की भेंट चढ़ाओ॥
जो कोई अपने मन को देवे, उसे मोहि बतलाओ॥
धन तन दिया तो दिया नहीं कुछ, इनसे काम न मेरा॥
जो मन चरन कमल में अरपे, वह सच्चा है चेरा ॥
धन नहीं दो तुम तन नहीं दो तुम, निज मन चरन में लाना॥
वह सबसे है प्यारा मुझको, सबसे चतुर सियाना ॥
उसके मन में रहता हूँ मैं, वह मेरा स्थाना॥
स्वर्ग लोक बैकुन्ठ लोक में, मेरा नहीं ठिकाना ॥
राधास्वामी सतगुरु पूरे, प्रेम का पन्थ चलाया॥
और यतन को मिथ्या माना, प्रेम को सार बताया ॥
[ १०३-७०१ ] जात पाँत और कुल व्यौहारा, भक्ति संग नहीं तुलते॥
जात पाँत हरि से करे बेमुख, हरी भक्ति से मिलते ॥
बाल्मीक और सदन कसाई, सैना हरी के प्यारे॥
ऊँचे कुल का मद है जिनको, वह उनसे है न्यारे॥
गंगा तर गई तरे रैदासा, और सुग्रीव विभीषण॥
नीचे कुल में जनमे फिर भी, बने भक्ति कुल भूषण ॥
हनुमान नल नील जाम्बवन्त, बानर रीछ कहाये॥
भक्ति के प्रताप महातम, राम ने अंग लगाये ॥
गोह भील की प्रीति निरखकर, भ्राता बन्धु बनाया॥
भरी सभा में रामचन्द्र ने, उसके गुन को गाया ।॥
दुर्योधन घर त्याग कृष्ण प्रभु, दासी पुत्र घर आये॥
भक्ति के प्रताप महातम, साग बिदुर घर खाये ॥
ऋषी मुनी से मुंह को फेरा, गये शबरी के पासा॥
झूठे बेर राम ने खाये, राम को प्यारे दासा ।॥
उत्तम और चंडाल के घर में; एक दीपक उजियारा॥
जात न पूछे कभी पतिंगा, ज्योत है उसको प्यारा ॥
राधास्वामी सतगुरु परे, भक्ति महातम थापा॥
भक्त रूप भगवान के ठैरे, त्याग आपनो आपा ॥
[१०४-७०२ ] योगी जी अब संभलो समझो, कुछ तो साधो योग जतन॥
निष्फल आयु अपनी बिताई, किये हैं जप तप बहुत कठिन ।॥
कठिन नहीं है घट की कमाई, पूरा गुरु नहीं हाथ आया॥
अब आओ मेरी संगत में, शब्द का समझादू साधन॥
नास्तिक भाव भुलाओ सारे, सच्चा नियम इसको जानो॥
आस्तिकता को हिये बसाओ, गुफा बनालो अपना मन ।॥
सतसंगत में आकर बैठो, दुचिताई दुविधा तजकर॥
चंचलता को निश्चल करके, बैठो लगाकर दृढ़ आसन॥
मेरे रूप पर आँख जमाओ, रोको थामो विरती को॥
यह नहीं कभी बहकने पावे, और सुने मेरे सच्चे बचन ॥
मन नहीं बहके चित नहीं भटके, एक भाव अन्तर आवे॥
इस विधि कुछ दिन करते रहना, मेरे बचनों का श्रवण ॥
कान तुम्हारे छाज बने, कूड़े को निकाल गहो इनको॥
सुनो तो बचन को गुनो भी, कुछ तुम समझ के उनको ।॥
काँट छाँटकर सार को गहना, वस्तु असार न चितलाना॥
सार में कुछ दिन विचरती जमाओ, यही यहाँ निध्यासन ।॥
दृढ़ता आये दुविधा जाये, साक्षात दिर सत का हो॥
इस प्रकार नित माँजो आकर, संगत में मन का दरपन॥
मन का दपन शुद्ध करो, जब बिमल अमल निर्मल हो वह॥
तब अधिकार तुम्हारा जगेगा, घट में पाओगे दर्शन ।॥
यह बाहर मुस्न की है कमाई, बहर मुखी अत्र नहीं रहना॥
अन्तर मुखी हने को तुम्हें, बताऊगा में तब साधन ।॥
तीन बन्द अब लगाओ प्यारे, होंट कान और नेन बधे॥
अन्तर विधि की कगे कमाई, शब्द अभ्यास की लगे लगन ।॥
तीन का अर्थ समझलो, बिन समझे नहीं काम करो॥
इन बन्दों से बनेगा अन्तर, सुमिरन ध्यान के साथ भजन ।॥
महसकमलदल बैठक ठानो, दृष्टि साध के शब्द सुनो॥
लख विराट की लीला घट में, ज्योति निरंजन का दर्शन ।॥
त्रिकुटी पद में ओंकार, सतगुरु का रूप वरूप लखो॥
अन्तरयामी से मेल मिले, तुम में तब आये साधनपन ।॥
सुन्न महासुन्न आसन मारो, सुन्न समाधि का रस पाओ॥
दृढ़ता आये ममता जाये, हिरण्यगर्भ को करो मथन ।॥
भँवर गुफा की खिड़की खोलो, पारब्रह्म गति को निरखो॥
कुछ दिन ऐसा यतन करो, सत पद का मिलेगा तुमको धन ।॥
अब सत धाम के बासी बनो, सुखरासी बनो अविनासी बनो॥
असत भावना दूर हटे फिर, कभी सतावे नहीं तन मन ॥
इसके आगे अलख अगम है, निरबानी कहना इसको॥
यही मुख्य निरवान की सद्गति, इसी का मन में रहे कथन ॥
जब इसमें दृढ़ता आ जाये, राधास्वामी धाम है यह॥
स्थानों का भेद तुम्हें दूँगा, मैं होकर के चित्त प्रसन्न॥
सुगम सहज है शब्द का साधन, बिन गुरु हाथ न आयेगा॥
साधु की संगत गुरु की दया ले, करे सदा उसका साधन ।॥
राधास्वामी सतगुरु आये, परम सन्त का भेस बना॥
जीवों को अपनाया दया से, शब्द अशब्द का किया मथन ॥
बिनती
[ ७०३ ] धन्य सतगुरु रूप है, और धन्य उसका ज्ञान है॥
धन्य भक्ति दया लीला, धन्य ध्यान अनुमान है॥
भरम के पीछे पड़े थे, भरम के थे साथ साथ॥
राह में सतगुरु मिले, दीपक दिया करुना से हाथ ॥
देखो कैसा है अन्धेरा, संस्कार अज्ञान का॥
ज्योति में लख लो, मिटे भय लाभ का और हानि का॥
घट है कच्चा ठेस से, जग के बचाकर ले चलो॥
काल का माया का यम का, द्वन्द भय पग से मलो ।॥
राधास्वामी नाम लेकर, दो पलट काया अभी॥
ध्यान से सुमिग्न भजन से, मुक्ति पाओ जीते जी ॥
[ ७०४ ] राधास्वामी गुरु दयाल, बलि बलि जाऊँ चरन पर॥
मुझको किया निहाल, दीन दुखी अति जानकर ॥
चरन कमल की ओट, आन गही जब गुरु की॥
मेटो कम सब खोट, धन्य धन्य गुरु दीन हित ॥
तुम तो चन्द्र स्वरूप हो, मैं हूँ चित चकोर सम॥
प्रभु तुम ब्रह्म के कूप हो, मैं तो हूँ घट के सदृश॥
सूर उगा बिगसे कमल, तिमिर विकार की गम नहीं॥
नहीं अज्ञान का भय कोई, तेरी दया अपार से॥
राधास्वामी परम कृपाल, नर शरीर गुरु धार कर॥
साँचे दीन दयाल, शब्द योग की रीति दी॥
सत्रहवीं धुन
[१-७०५ ] गुरु गम अगम अलौकिक अद्भुत, शोभा कही न जाय॥
महिमा अकह अपार सिंधुवत, अधिक अधिक अधिकाय ।॥
घट घट बासी प्रभु अविनाशी, चेतन सहज उदासी॥
रूप अरूप स्वरूप अनूपम, आनन्दधन सुखरासी ॥
नारद शारद शेष वरुण रवि, शशि को बरने पारा॥
परमतत्व शुभ सदन अयन छवि, रचना के आधारा॥
ज्ञान ध्यान का पन्थ चलाया, योग युक्ति बतलाई॥
भव भय जाल से जीव निकारा, यम की फाँस कटाई ॥
कलि मल दहन विभंजन त्रय दुख, दीन अधीन सहाई॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धन जिन यह गति पाई ॥
[२-७०६ ] स्वामी प्रीतम दाता दानी, गुरु तुम भूप हो मेरे॥
तन मन धन सब तुम पर वारू , रूप स्वरूप हो मेरे॥
मुक्ति धान धुरलोक निवासी, अन्तर घट के बासी॥
मतपद चेतन धन निरवानी, सुख आनन्द सुखरासी ।॥
करुणा सागर सब विधि आगर, नागर शोभा धारी॥
निराधार जग के आधारा, जीवन के हितकारी ॥
आप आर में आर समाने, आप में आधा दरसा॥
ज्ञान ध्यान अनुभव गति जानी,चरन कमल जब परसा ।॥
सिंधु गम्भीर धीर जल भरिया, लहर उठे अति भारी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सबके सबसे न्यारी ॥
[३-७०७ ] दाता दानी देता, दिव्य दृष्टि के रूप॥
सतमत सतगुरु सतकला, सत संकल्प स्वरूप ॥
तुम आये इस जगत में, दया धरम के कान॥
दया कीजिये दयामय, दया धरम के लाज ।॥
मैं तो सब विधि हीन हूँ, अगुन का भण्डार॥
शरण पड़ा प्रभु आयकर, मेरी करो संभार ।॥
मेरी और न देखिये, मैं तो कुटिल कुचाल॥
अपनी ओर निहारिये, दीनबन्धु सुदयाल ।॥
कामी क्रोधी लालची, हिया जिया सकल मलीन॥
यह सब मेरे चिन्ह हैं, तुम दाता परवीन॥
मैं माया बस भूल में, भरम रहा संसार॥
तुम समरथ मेरे साँइयाँ, मेटो मूल विकार ।॥
साध संग नित दीजिये, साधु सेव का दान॥
साधु प्रेम में रंग रहूँ, और न कोई ध्यान ॥
मो सम तेरे बहुत हैं, मेरे तुम हो एक॥
एक तुम्हारे रूप की, सदा रहे मन टेक ॥
अंध टेक नहीं चाहिये, ज्ञान टेक अभिलाख॥
राधास्वामी दया करो, मिले ज्ञान की आँख ।॥
[४-७०८ ] चरन कमल चित जोड़कर, स्वामी सनमुख आया॥
निज सेवक मोहि जानि, कीजे करुणा दाया ।॥
जनम जनम रहा भून में, माया लपटानी॥
काल करम के फाँस में, निस दिन उरझानी ॥
भक्ति भाव के सार को, किंचित नहीं जाना॥
भटक भटक भटकत फिरा, भरम माहिं भुलाना ॥
आसा मनसा बन्ध रहा, छूटा संसारा॥
काम क्रोध और मोह ने, गले फाँसी डारा ॥
अवगुन हारा गुन नहीं, पुरुषारथ हीना॥
मन प्रतीति नहीं प्रेम रस, सब विधि आधीना ॥
जगत पिता दाया करो, मैं दास तुम्हारा॥
प्रेम दान मोहि दीजिये, भक्ति रस सारा ॥
भव जल गहर गम्भीर अति, उठे लहर अपारा॥
तुम बिन समरथ सतगुरु, केसे जाऊँ पारा ॥
बाँह गहे की लाज, काज करो अन्तरयामी॥
तुम हो दीन दयाल पिता, प्रभु रक्षक स्वामी ॥
नाम रतन धन बख्शिये, शरनागति दीजे॥
और नहीं कुछ चाहिये, चरनन में लीजे ।॥
राधास्वामी सतगुरु, पूरन करतारा॥
दया दृष्टि से मेटिये, अज्ञान पसारा ॥
[ ५-709 ] भाग जगा गुरु पूरा पाया, बना आप बड़भागी॥
प्रेम हाट में सौदा कीन्हा, नहीं बना बैरागी॥
जोगी जंगम चतुर सियाना, ज्ञानी ध्यानी उदासी॥
इनके मारग चलू न कवहीं, भजू गुरु अविनासी ।॥
गुरु पूरे को समरथ जानू, समरथ का पद परसू॥
चरन कमल की पूजा सेवा, आसा लाग न तरसू ।॥
भाग सुहाग राग और ज्ञाना, गुरु के मारग पाया॥
प्रेम भक्ति का पंथ अनूपम, राधास्वामी आप लखाया॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी पल पल गाऊँ॥
राधास्वामी प्रीति बसी मन अंतर, कहूँ न आऊँ जाऊँ ।॥
710 शब्द राता मन भया, शब्द ही जाय समाना॥
निरखा शब्द स्वरूप, निरख हिय अति हरषाना ।॥
शब्द जीव सत शब्द, शब्द ब्रह्मांड रचाना॥
प्रणव ओ३म् सत शब्द में, यह सन्त बखाना ॥
शब्द भेद नहीं मिला, जगत में रहे अमाना॥
करम धरम पच पच मरे, चौरासी खाना ॥
शब्द भेद ले गुरु से, तब लगे ठिकाना॥
बिन गुरु शब्द न पावई, नर भरम भुलाना ॥
शब्द सुरत भण्डार है, सुरत शब्द कमाना॥
राधास्वामी चरन में, निज शब्द रहाना ।॥
[७-७११ ] गुरु की दया भेद सब जाना, घट में भान प्रकासा॥
तिमिर मिटा अज्ञान विनासा, सहज में भया उदासा ।॥
ब्रह्म राम से गुरु पद ऊँचा, कोई कोई भेदी जाने॥
लख लख अलख अगम लख पावे, तब कुछ सार पिछाने ।॥
बिन गुरु मर्म न पावे कोई, पंडित ऋषि मुनि ज्ञानी॥
यह तो भेद लहे घट अन्दर, जब समझे गुरु बानी ।॥
गुरु ने कच्छ मच्छ समझाया, रूप वराह बताया॥
नरसिंह वामन पद दरसाया, राम कृष्ण लखवाया ।॥
बुद्धमता का सार सुझाया, कलिकी की गति भाखी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,खुलगई हिय की आँखी ॥
[८-७१२ ] मन मन्दिर में ढूंढ़िये, मूरत अगम अपार॥
. मन्दिर सब बेकाज हैं, मन मन्दिर है सार ॥
छवि मूरत की अद्भुति, निरख निरख हरषाय॥
ऐसे दरस परस से, एक नि पूरा दाव ।॥
घट में गुरु मूरति बसी, को ढंढ़े केहि धाम॥
और सफल भ्रम जाल है, घट में गुरु का नाम ।॥
गुरु तो तेरे पास हैं, मन में देख विचार॥
आओ जाओ का कहूँ, घट में कर गुरु प्यार ॥
जो तू प्यारी गुरू की, अन्तर प्रेम जगाव॥
वही टेक को दृढ़ करो, बनत बनत बन जाव॥
नयनों अन्दर झाँप ले, नयनों कर दीदार॥
नयनों में तेरे गुरु बसें, अन्तर में कर प्यार ॥
[६-७१३ ] निंद्रा घोर सकल जग व्यापे, जागे कोई गुरु का प्यारा॥
जाग जाग के मर्म पिछाने, त्यागे मिथ्या संसारा ॥
भूल भरम में निस दिन भूले, करम धरम निज हंकारा॥
यम का जाल बिछा चहुँ अरा, कसे पाये छुटकारा ॥
मिथ्या मात पिता नर प्रानी, मिथ्या कुटुम्ब है परिवारा॥
साथ न तेरे कोई जावे, मान बड़ाई सुत दारा ॥
भज भज नाम गुरु हित चित से, त्याग त्याग यह संसारा॥
शब्द की सहज नाव चढ़ बोरे, चल चल चल भव के पारा ॥
गुरु समरथ गुरु दीनदयाला, गुरु ज्ञानी गुरु दातारा॥
गुरु का सतसंग गुरु की सेवा, गुरु सुमिर बारम्बारा ।॥
[१०-७१४ ] उठ जागो तुम सोये कैसे, यह जग माया की कल्पना है॥
नहीं गुरु चरन गहा उसको नित, भूल भरम में खपना है॥
काल करम ने जाल बिछाया, मूढ़ जीव को उसमें फंसाया॥
दुख सुख में वह रहे भरमाया, नहीं समझे यह सपना है ।॥
तीन ताप रहा चहुँदिस छाया, राह न सूझे नर घबराया॥
व्यापे काम क्रोध मद माया, मोह अग्नि में तपना है॥
जड़ चेतन की ग्रन्थी भारी, उरम उरम मरे बहु संसारी॥
केहि विधि छूटन होय तुम्हारी, गाँठ के बीच तड़पना है ।॥
राधासामी मेहर करें जब जन पर, दृष्टि पड़े तब जग विषधर॥
विना दया नहीं उबरे कोई नर, काल नाग को हड़पना है॥
[११-७१५ ] हम तो साँस पवन के ठरे, शब्द गम्भीर सुनाते हैं॥
सुख की चाह नहीं मन अंतर, सुख आनन्द नहीं पाते हैं॥
नर जीवन है पक्न झकोला, दो दिन जग का रहना॥
रोना तड़पना शोर मचाना, निस बासर दुख सहना॥
कहाँ से आये किधर जायेंगे, किंचित मरम न पाया॥
दो दिन का यह धन जोवन है, क्या है कहाँ से आया॥
हम तुम सब हैं अगमा पाई, ज्यों सपना रैनाई॥
पानी मध्ये आग विराजे, सुख में विपत समाई ॥
बालू की दीवार उठाई, रुचि रुचि ताहि बनाई॥
बही बयार बिनस गई पल में, तामें कौन भलाई ।॥
मोह माया है भरम की गाँठी, उरझ उरझ उरझानी॥
सार असार की सुधि नहीं पाई, भूले भरम में प्रानी ॥
इन्द्रजाल माया की रचना, नया नया रूप बनावे॥
रूप दिखाये जीव भरमावे, यम के फाँस फँसावे॥
भूठी काया भूठी माया, झूठा मेरा तेरा॥
झूठा महल मकान है झूठा, चिड़िया रैन बसेरा ।॥
भूठे सुख को सुख सब कहते, सहते विपत घनेरी॥
मरते खपते बारम्बारा, मिटी न हेरा फेरी ॥
बादर की छाया नर देही, रोक रुके ना भाई॥
यह धारा ठहराय न टहरे, कीतों करो उपाई ॥
सुन सुन शब्द चेत मन आने, होजा सहज उदासी॥
त्याग त्याग मद मोह मया को, अगमलोक का वासी ।॥
त्रिविधि ताप दुख व्यापा जग में, तू है बचावन हारा॥
भव सागर से पार लगादे, देकर अपना सहारा ॥
रक्षक साँचे सतगुरु स्वामी, आदि अनादि जुगादी॥
झुक झुक उनके चरन में निसदिन,खा नित सीत प्रसादी॥
आस छोड़ विश्वास जगत का, यह है चार दिना का॥
चारों दिन में धोखादाई, सर्व काल में मिथ्या ॥
[१२-७१६ ] राम ने तजी अयोध्या नगरी, लंक किया प्रवेशा॥
रावन कुमति को आग लगाया, तब लौटे निज देशा॥
मेघनाद को मार गिराया, राज विभीषण दीना॥
लोक परलोक बनाये दोनों, सुयश सुकीरति लीना ॥
नाम प्रभाव समझ मन अपने, कर जग में उपकारा॥
यह अवसर फिर मिले न पानी, जा भव सागर पारा ॥
गुरु का प्यारा गुरु शरणागत, गुरु का सेवक दासा॥
गुरु सों प्रीति रहे निस बासर, गुरुपद विमल विलासा ॥
गुरु प्रसाद तन अवध में रहकर, रावण दुर्मति मारो॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जनम जआ मत हारो॥
[१३-७१७ ] नाम भजन कर नाम भजन कर, नाम भजन कुछ पावेगा॥
नाम सुफल कर जनम सुफल कर, नहीं अन्त पछतावेगा॥
झूठी माया झूठी काया, ता संग नेह लगाया क्यों॥
सुन मन मूरख सुन मन मूरख, हाथ तेरे क्या आवेगा॥
भम भुलाना भर्म भुलाना, भर्म फाँस गले डाला है॥
प्रभु सुमिरन कर प्रभु सुमिरन कर, एक दिन यहाँ से जावेगा॥
संग न साथी संग न साथी, कोई नहीं अपना है जग में॥
गुरु सेवा कर गुरु सेवा कर, गुरु भव पार लगावेगा ॥
प्रीति हिये धर प्रोति हिये धर, प्रेम प्रीति रस में लगजा॥
छोड़ कुसंगत छोड़ बुसंगत, सतसंग काज बनावेगा॥
ज्ञान गंग बिच ज्ञान गंग बिच, कर स्नान ध्यान प्रानी॥
अब अवसर है अब अवसर है, फिर अवसर नहीं पायेगा॥
चेत सवेरे चेत सवरे, चलना बाट अकेला है॥
भोग विषय तज भोग विषय तज, भोग सोग उपजावेगा॥
काम क्रोध मद काम क्रोध मद, काम क्रोध मद क्यों भूला॥
नर अभिमानी नर अभिमानी, काल जाल फैलावेगा॥
[ १४-७१८ ] चिन्ता राधास्वामी नाम की, राधास्वामी आस॥
राधास्वामी चहुँदिसि बस, और न चितरे दास ।॥
राधास्वामी नाम की, रटन रहे दिन रात॥
मैं पपीहा का रूप हूँ, राधास्वामी बादल स्वाँति ॥
राधास्वामी कमल समान हैं, भँवर भाव मेरा चित॥
रैन दिवस अब रहत है, कमल बास से हित ।॥
राधास्वामी सिंधु अथाह हैं, मैं हूँ बूद स्वरूप॥
जीव अधीन मलीन मैं, राधास्वामी जग के भूप ॥
सागर बाढ़ा प्रेम का, मैं तो प्रेम जल मीन॥
राधास्वामी पद को परसकर, अब क्यों रहूँ मलीन ॥
राधास्वामी पूरण चन्द्रमा, मेरा चित्त चकोर॥
पल पल निरखू आम छथि, दृष्टि उन्हीं की ओर ॥
सोवत राधास्वामी का सपन, जाग्रत राधास्वामी ज्ञान॥
राधास्वामी के पद कमल में, अरपू तन मन प्रान ।॥
मेरे राधासामी एक है, उनके दास अनेक॥
चित में राधास्वामी धाम है, उपजा परम विवेक॥
मुख में राधासामी नाम है, मन में राधास्वामी ध्यान !
मस्तक राधासामी धाम है, रसना राधास्वामी गान ।॥
१५-७१६] धन धन गुरुदेव जी, जिन भेद बताया॥
आनी दया अपार से, भव पार कराया ॥
शरणागत की लाज कान, स्वामी जग में आये॥
जड़ चेतन की ग्रन्थी, सब निज युक्ति छुड़ाये ॥
माया काल कराल, कोई बचने नहीं पाये॥
करम धरम के जाल, जीव निस बासर आवे ॥
भोगे कष्ट आर, ताप त्रय दहे शरीरा॥
दारुण विपत कलेश, भया मन विकल अधीरा ।॥
द्वत भव जल माँहि, नहीं कहूँ ठौर ठिकाना॥
गुरु ने पकड़ी बाँह, दिया भक्ति धन दाना ।॥
चरन कमल का आसरा, हित चित्त बसाऊँ॥
निरखू रूप अनूप, ध्यान गुरु मूरति लाऊं ॥
गुरु की निस दिन बन्दगी, गुरु चरनन पूजा॥
गुरु सम लोक परलोक में, मानू नहिं दूजा ॥
गुरु मेरे जान व प्रान, गुरु मेरे रखवारे॥
रात दिवस मैं जिऊ, गुरु के चरन सहारे ।॥
भक्ति दान गुरु दीजिये, देवन के देवा॥
राधास्वामी दयाल, करूं मैं तुम्हरी सेवा ॥
[१६-७२० ] दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय॥
ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु कृपा से होय ॥
भव सागर अति गहर है, सूझे वार न पार॥
गुरु खेवटिया जब मिले, खेह लगावे पार ।॥
माया भरम और काल भय, जीवत कबहूँ न जाय॥
यह बन्धन तो तब कटें, सतगुरु होय सहाय ॥
जनम जनम कठिनाइयाँ, भव के विपत कलेश॥
गुरु ने पकड़ी बाँह जब, रहा न भव दुख लेस ॥
क्या सुख ले स्तुति करू, गुरु समरथ दातार |
तुम्हरी कृपा अपार से, पाई बुद्धि मति सार ॥
ढूँढ ढूँढ़ थक थक रहे, मिला न ज्ञान विवेक॥
चरन कमल की छाँह में, सूझा एक अनेक ।॥
प्रेम दान प्रभु दीजिये, पद सरोज की धूर॥
सत का नूर हृदय बसे, बाजे अनहद तूर ।॥
भर्म भर्म सब भ्रम फिरें, पढ़ पढ़ ग्रन्थ अनेक॥
परमारथ निधि तब मिले, पकड़े गुरु की टेक ।॥
गुरु चरनन पर वारिये, देह गेह और सीस॥
गुरु से निस दिन माँगिये, प्रेम प्रीति बख्शीस ॥
गुरु पर नित बलि जाइये, तजिये मान गुमान॥
गुरु से छिन छिन माँगिये, भक्ति भाव का दान ।॥
गुरु पद अरपो रात दिन, तन मन धन और प्रान॥
यही सार का सार है, और ज्ञान का ज्ञान॥
[१७-७२१ ] जो कोई हित से मुझे बुलावे, मैं ढिंग उसके जाऊँ॥
जो कोई मुझसे प्रेम लगावे, मैं सब विधि अपनाऊँ॥
नहीं पताल स्वर्ग में रहता, नहीं पृथवी में बासा॥
प्रेम प्रीति की रीति में न्यारी, रहूँ प्रेमी के पासा ॥
प्रेम भाव का मैं अभिलाषी, प्रेम की डगर दिखाऊँ॥
प्रेम का भूखा प्रेम का प्यासा, अमृत प्रेम चखाऊँ॥
धीरज धरो आस मन राखो, चिन्ता तुम्हारी मुझको॥
दुख का पर्वत दूर हटे तब, कहो गिरवरधारी मुझको॥
करम वासना राग द्वेष से, न्यारा रहूँ निरन्तर॥
भक्तों के हित साज सँवारूँ, भक्त भार लूँ सिर पर ॥
[१८-७२२ ] एक आस विश्वास गुरु का, मन में प्रेम प्रतीति॥
बहुत आस विश्वास बहु, चंचलता की रीति ॥
गुरुमुख के तो एक हैं, मन मत के हैं दोय॥
जो कोई मन मत भया, चैन न पावे सोय ॥
गुरुमुख में पतिव्रतपना, मन मत है व्यभिचार॥
पतिव्रता को सुख घना, व्यभिचारी मुख छार ॥
एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय॥
सबकी आस निरास है, एक आस हर्षाय ॥
पात पात का सींचना, अज्ञानी व्यौहार॥
ज्ञानी सींचे मूल को, पावे उत्तम सार ॥
पात पात के सींचते, वृक्ष को दिया सुखाय॥
माली सींचे मूल को, फूला फला अघाय ॥
तज दे दुचिताई पना, एक चित गुरु की सेव॥
गुरु सम सुनले साधुवा, और न कोई देव ॥
नारी बनी है पीव की, कैसा पीव से प्यार॥
घर के सम्बन्धी सकल, करें आप सत्कार॥
नारी आई पीव घर, पीव से किया न नेह॥
सास ससुर घिरणा करें, बिगड़ गया सब नेह ।॥
एक गुरू की बन्दना, करे भक्त का काम॥
जो सबकी आसा करे, चंचल आठों याम ॥
साँई यही है प्रार्थना, एक तुम्हारी आस॥
सबहिं छाँहि तुमको भजू, रहूँ तुम्हारा दास ।॥
दो मालिक का सेवका, क्यों पावे सुख चैन॥
वह गरीब भटका फिरे, इधर उधर दिन रैन॥
[ १६-७२३ ] प्यारी प्यारी तू है प्यारी, प्यारी क्यों दुख पावे॥
गुरु की दया से बन्धन काटे, अन्त परम पद पावे ॥
आना जाना कैसा प्यारी, गुरु तो पास है तेरे॥
मन की दुविधा त्याग निरन्तर, तू तो निकट है मेरे ॥
जब जागे तब ध्यान हो गुरु का, सपना सोई देखे॥
गहरी नींद सुषप्ति में प्यारी, आनन्द मिले विशेखे॥
शब्द योग की करे कमाई, प्यारी गुरु की है प्यारी॥
प्यारी प्यार से नाता जोड़े, राधास्वामी की बलिहारी॥
[ २०-७२४ ] तू तो होगई बावली, समझ न आवे वैन॥
मैं तुझसे कैसे कहूँ, जब तू लखे न सैन॥
मैं तेरे हृदय बसू, तू ढूँढ़े नभ माँह॥
कंगन तो ऊपर खसा, देख आपनी बाँह ।॥
हूँढ़ ढूँढ तू मन में निसदिन, राम पियारी प्यारी॥
तेरा हृदय कैलाश शिव का, जहाँ बसें त्रिपुरारी ॥
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाओ॥
राधास्वामी निसदिन गाकर, अपना जनम बनाओ॥
[२१-७२५ ] दया भई जो गुरु मिले, पकड़ी अपनी बाँह॥
बूड़त पार उतारिया, भव सागर के माँह ॥
दया भई जो गरु मिले, अपने मन में देख॥
औरों से क्यों पूछिये, निज मन अन्तर देख ॥
सदा पियारी राम की, रामपियारी नाम॥
एक दिना गुरु देवेगे, अपना सतपद धाम ॥
देख देख तू निज मन में, मन में रहते श्याम॥
राधास्वामी नाम ले, त्यागदे इनको धाम ॥
[२२-७२६ ] जग का खेल है मन की लीला, मन की समझ न आई॥
मन के विषय विकार में भूले, मन ही भया दुखदाई ।॥
मन से ऊचे चढ़े जो प्रानी, बूझे सतगुरु ज्ञाना॥
बूझ बूझ गरु ज्ञान की महिमा, सूझे पद निरवाना ॥
हद पर बैठ कहा सतगुरु ने, चढ़ बेहद की घाटी॥
चेला हद बेहद जब लाँघा, उड़ी भरम की टाटी ॥
हद में दुख बेहद में सुख है, अनहद पद निरवाना॥
हद बेहद अनहद जब लाँधे, मेटे आना जाना ॥
गुरु की दया साधु की संगत, उत्तम गति मति पावे॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भर्म भव जाल न आवे ।॥
[२३-७२७ ] आज का काम आज दिन करना, कल की आस न करना॥
पल पल साँस का आना जाना, पल हो जनम और मरना॥
पल में उपजे पल में बिनसे, पल माया व्यौहारा॥
पल का स्वारथ पल परमारथ, काल का पल संहारा ।॥
आज कहे मैं काल करूंगा, भक्ति भाव सतसंगा॥
आज काल के बीच ही प्रानी, काल का भया कुसंगा॥
क्या जाने क्या पल में होगा, काल का छोड़ बहाना ॥
जो कोई आज करे गुरु संगत, वही है पुरुष सियाना॥
कथा सुनो एक अद्भुत न्यारी, बढ़े बुद्धि चतुराई॥
नहीं भरोसा आज काल का, यह जग अगमा पाई ॥
राम ने रावण को जब मारा, कहा लखन से भ्राता॥
जा रावण से नीति बचन सुन, वह पंडित विख्याता॥
लक्ष्मण आये उसके सिरहाने, बोले अमृत बानी॥
रावण तू है परम सुजाना, योगी ज्ञानी ध्यानी ।॥
दे शिक्षा कुछ नीति सिखाजा, शिष्य भाव ले आया॥
राम ने तेरे पास है भेजा, कर कुछ मुझ पर दाया॥
रावण हसा देर से आये, मैं क्या भेद लखाऊ॥
काल शिकारी सिर पर गाजा, नीति राग क्या गाऊँ॥
एक बात तुम सुनलो मुझ से, मन में सदा विचारो॥
आज का काम काल नहीं छोड़ो, आज ही काम सुधारो ।॥
आज का अवसर मिला है तुमको, काल की क्या है आसा॥
जो काल का बन्धन काटे, काल से रहे उदासा ।॥
काल भरम है काल है धोका, काल महा दुखदाई॥
करना हो सो आज करो तुम, काल की आस भुलाई ॥
मैं तो काल के धोके आया, अपना काम बिगाड़ा॥
आज काल में अबसर बीता, सिर पर काल का आरा ॥
इच्छा थी सागर को मथकर, मीठा उसे बनाता॥
स्वर्ग लगाकर सीढ़ी ऊची, जीव तहाँ पहुँचाता ॥
आज काल का किया बहाना, काल यह दिन दिखलावे॥
जो कोई आज को कल पर टाले, क्या परमारथ पावे ।॥
तुम यह नीति सुनलो मुझसे, उसे न मन से भुलाना॥
जो करना हो आज करो तुम, पाओ उत्तम ज्ञाना॥
रावण मर गया देकर नीती, लखन राम ढिंग आये॥
जो कोई यह शिक्षा चितलाये, अमर लोक को जाये॥
[२४-७२८ ] चरन गुरु चित धार, जगत तज भागिये॥
मिथ्या सब व्यौहार, पाप पुन त्यागिये॥
राग द्वष सब छोड़, प्रेम हिये धारना॥
लख अन्तर उत्तम रूप, सहज मन मारना ॥
मानुष जनम सुधार, सार गह लीजिये॥
भोग विषय विष समझ, प्रेम रस पीजिये॥
भक्ति भाव सतसंग, संवारे काज को॥
मोह भरम मत भूल, त्याग जग लाज को॥
आया था किस कारने, क्या तूने किया॥
आप ही अमर स्वरूप है, क्यों भरमा फिरा ॥
भूले नर मुनि देव, न पाया सार को॥
भवसागर नहीं तरे, न पहुँचे पार को ।॥
करे गुरु से प्यार, यही उपदेश है॥
करम काल के परे, गुरु का देश है॥
[२५-729 ] क्यों फिरत भुलाना जगत में, कुछ सोच फकीरा॥
तेरा संगी कोई नहीं, क्या शाह फकीरा ॥
मेरा मेरा क्या करे, तेरा नहीं कोई॥
अपना रूप संभार ले, तेरा है सोई॥
भटके क्यों भरम जाल में, अब सोच सवेरा॥
ले सतगुरु के चरन में, दिन रात बसेरा ॥
छोड़ जगत की आस, आस सब जीव फसाने॥
आसा तृष्णा में पड़े, यह सकल दीवाने॥
लोकलाज मरयाद धान, धन धाम बड़ाई॥
यह सब बन्धन काल के, सुन ले मेरे भाई ॥
तेरा संगी सतगुरु, तेरे घट में बसता॥
आय पड़ा जग हाट में, कर सौदा सस्ता॥
लेना हो सो जल्द ले, अवसर नहीं ऐसा॥
सोच अंदेशा छोड़ दे, तू भूला कैसा ।॥
एक सतगुरु के नाम की, कर टेक पियारे॥
सतगुरु साँचे मीत हैं, पल छिन रखवारे॥
नाम फकीर धराय कर, दुर्मति को तज दे॥
राधास्वामी नाम तू, निस बासर भज ले ॥
[२६-७३० ] क्यों फिरत भुलाना भरम में, निस दिन नादाना॥
गुरु के चरन सरोज में, तेरा कल्याना ।॥
कभी तीरथ की परक्रमा, गंगा अस्नाना॥
जप तप संयम बहु किये, नहीं लगा ठिकाना ॥
पोथी पुस्तक बाँच कर, बाढ़ा अभिमाना॥
विद्या बुद्धि विलास में, मन अति हरषाना ।॥
सार मिला नहीं शब्द का, नहीं उपजा ज्ञाना॥
जड़ चेतन की ग्रंथि को, कहो कैसे खुलाना ।॥
प्रगटे सतगुरु आय, दिया शब्द निशाना॥
राधास्वामी की दया, पाया निरवाना ॥
[ २७-७३१ ] गूगा बोले मधुरी बानी, शब्द अशब्द विस्तारा॥
लंगड़ा चढ़े शिखर परवत पर, घाटी शैल अपारा ॥
बिन नैना का अंधा देखे, भाँति भाँति की रचना॥
मन नहीं बुद्धि नहीं कान नहीं, सुने अगम के बचना ।॥
बिना सूर के विमल प्रकासा, बिन बादल की बरसा॥
बिना रूप का सतगुरु व्यापा, चरन कमल निज परसा॥
कहीं बीन कहीं ढोल बाँसुरी, बाजे अद्भुत बाजे॥
ओम् ओम् सोहंग सत सत, शब्द अनाहद गाजे ॥
पन्थ अपन्थ का मिटा झमेला, कौन बने पन्थाई॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिली सतगुरु शरनाई।॥
[२८-७३२ ] सिंध रूप से बूद जो निकला, रूप देख डरपाना !
एक बुन्द में सिंध पसारा, जब जाना हरषाना॥
सिंध में बुन्द अनेकन दरसे, यह तो सब कोई जाने॥
बुन्द में सिंघ आप है व्यापा, बिरला कोई पहचाने ।॥
बुन्द में लहर बुन्द में सिंधु, सिंध बुन्द दोऊ एका॥
द्वैत भरम कहो केसे छूटे, जब नहीं चित्त विवेका ।॥
हम तो बुन्द सिंध के रूपा, बुन्द में सिंध समाना ।॥
लख लख दशा न्यारी अपनी, समझा गुरु मत ज्ञाना ।॥
आप आपको आप पहचानो, राधास्वामी की है बानी॥
कहा और का नेक न मानो, पाओ पद निरवानी ॥
[ २६-७३३ ] बीत गई मेरी उमर, मिला नहीं ठौर ठिकाना॥
सूझे आदि न अन्त, रहा भरम में भरमाना ॥
झूठा जग व्यौहार है, सब भूठी माया॥
झूठा कुल परिवार है, झूठी यह काया ।॥
झूठ साँच की परख, हाय मोको नहीं आई॥
कैसे करूँ उपाय; बात मेरी बन जाई॥
कभी जप तप कभी बरत है, कभी तीरथ पानी॥
निकसा काम न एक भी, मन उपजी गलानी ॥
करम धरम सब त्याग कर, तुम सम्मुख आया॥
राधास्वामी दया निधि, आप कीजिये दाया ॥
734 मन मन्दिर बैठ कर, जब लागे गुरु का ध्यान॥
तिमिर मिटे अज्ञान का, सूझे पद निरवान ।॥
करना धरना कुछ नहीं, करम धरम सब भने॥
घट के पट को खोल कर, तब पावे कुछ मर्म॥
अटपट लीला जगत की, खट पट रहे दिन रेन॥
ताके पट पट जो रमा, कैसे पावे चैन ।॥
बढ़ बढ़ कर सब घट गये, पढ़ पढ़ मुये गवार॥
घट घट कर सब मिट गये, बिना विवेक विचार ।॥
आपा चीन्हा आप में, आप आप में सार॥
अब संशय में ना पडू, राधास्वामी के बलिहार ।॥
[३१-७३५ ]| जो अद्ध त प्रकाश विभु, सगुन अगुन आधार॥
सत चित आनन्द रूप वह, मन बानी के पार ।॥
ताको निस दिन बंदना, कोटि कोटि परनाम॥
अलख अगम गति अमल अति, मोक्ष मुक्ति का धाम ॥
सिंध गम्भीर अथाह बहु, पार सो पावे कोय॥
लखि आवे जब साध संग, गुरु की कृपा होय॥
रूप स्वरूप अरूप नित, गम पावे कोई सन्त॥
अज्ञानी जाने नहीं, अति उतंत गुरु पन्थ॥
भीतर बाहर एक रस, सब विधि रहा समाय॥
खुली दृष्टि से देखिये, जब गुरु होंय सहाय ।॥
दशरथ राम वशिष्ठ अरु, विश्वमित्र तन धार॥
गुरु चेला सुत तीन पद, चौथे माहिं विचार॥
एक अनेक अनादि अज, अलख अगाध अभेद॥
गुरु मुख से कुछ पाइये, थाके ऋषि मुनि वेद ॥
[ ३२-७३६ ] दीन दयाल दीन हितकारी, दीन बन्धु सुख दाता॥
करुनामय करुना के सागर, करुना रूप विधाता ॥
जीव काज निज भवन छोड़कर, प्रगटे जन के लाजा॥
बाँह पकड़ भव पार निकाला, कीन्हा अचरज काजा ॥
महा गम्भीर सिंध भव दुस्तर, सूझे बार न पारा॥
पवन बहत दारुण दुखदाई, नजर न पड़े किनारा ॥
भंवर चक्र में डोलत नौका, सुध बुध तन की भूली॥
दुख द्वन्द हिंडोल की सूरत, छिन प्रति छिन बहुभूली ॥
देख दुखी प्रगटे राधास्वामी, शब्द जहाज बनाया॥
खेवटिया गुरु पूरे पाया, बड़त सब ही बचाया ॥
[३३-७३७ ] गुरु कीजे दया अपार, आस धर सन्मुख आया॥
अपना दास विचार, चरण की दीजे छाया ॥
यह संसार असार, सार कुछ इसमें नाहीं॥
मिथ्या है व्यौहार, जेसे बादर की छाँई ॥
स्वारथ के सब सगे, बिना स्वारथ नहीं डोले॥
स्वारथ के बस रहें, स्वारथी स्वारथ बोले॥
सुन नर देवी देवता, ऋषि मुनि सियाने॥
निज स्वारथ के कारने, सब भये दिवाने॥
प्रीति रीति व्यौहार, जगत प्रपंच अपारा॥
सब कुछ इनका रहे, सो स्वारथ के आधारा ।॥
देश दशा उपराम चित, व्याकुल रहूँ निसदिन॥
परमारथ की चाह बसी, मेरे हिय में छिन छिन॥
तुम साँचे परमारथी, जीवन हित लागी॥
सहज दयालु कृपालु, सहज त्यागी बैरागी ॥
धर कर सन्त स्वरूप, दिया परमारथ दाना॥
निबल जीव को आय, लगाया ठौर ठिकाना ॥
राधास्वामी सतगुरु, परमारथ वादी॥
बख्शो प्रेम की छाँह, मेट प्रपंच उपाधी ॥
[३४-७३८ ] चलो गुरू दरबार, आज दर्शन के कारन॥
दरस परस सुख सार, हुये प्रगट जग तारन॥
प्रेम प्रीति उमगाय, मुके पद कमल में माथा॥
सतसंत गंगा न्हाय, रहो सतगुरु के साथा ।॥
बचन सुनो चितलाय, तजो मन की दुचिताई॥
सतगुरु होंय सहाय, भरम संकट मिट जाई ।॥
मानुष जनम सुधार, काज अपना कर लीजे॥
भक्ति भाव हिय धार, दुविधि दुर्मति तज दीजे ॥
सुरत शब्द अभ्यास, साध लो गुरु का नामा॥
जीते जी विश्वास, जाओ राधास्वामी धामा ॥
बिन गुरु निष्फल करम सब, बिन गुरु निष्फल धर्म॥
बिन गुरु ध्यान न भक्ति कुछ, यह सत भेद का मम ॥
[३५-739 ] पड़ा चरन में आय, शरन में अपने लीजे॥
नहीं कोई संग सहाय, मुझे शरणागत कीजे ॥
माया मद से बचाय, दान भक्ति का दीजे॥
दीन को अंग लगाय, प्रभु अब अपना कीजे ।॥
जनम को दिया गँवाय, अवधि मेरी निसदिन छीजे॥
राधास्वामी आय, आज मेरी रक्षा कीजे ॥
[३६-७४० ] सखियो गाओ मंगल राग, भाग से गुरु दर्शन पाया॥
सुफल हुआ नर जनम, न मोहे काल न अब मोहे माया ॥
जनम जनम से भूल भरम लग, चौरासी योनि भटकी॥
अब गुरु हुये सहाय फोड़दी, सहज सहज माया मटकी॥
घट आनन्द दिन रात चैन से, सुख से समय बिताते हैं॥
घट सतगुरू से प्यार, कहीं नहीं हम अब आते जाते हैं॥
घट में अपने प्रीतम प्यारा, सदा विराजा रहता है॥
दुखी न परजा होय कभी जब, साथ में राजा रहता है॥
राधास्वामी दया के सागर, आगर नागर हितकारी॥
सहज स्वभाव कृपाल, करेंगे अपनी रक्षा रखवारी ॥
“प्रश्नोत्तरी उपदेश
[ ३७-७४१ ] प्रश्न: क्या देखा क्या सुना है घट में, मुझे सुना अपनी बानी॥
सोचूँ तेरा कथन है कैसा, गुरू मत है या मन मानी ॥
उत्तर: ज्योति में लखी निरंजन की छवि, ज्योति निरंजन ब्रह्म अपार॥
ब्रह्म में परब्रह्म को निरखा, परब्रह्म सोहंगम सार॥
सोहंग हंस के परे ठिकाना, सतगुरु सत्त पुरुष दरवार॥
यह सब मैंने देखा प्यारे, देख देख कर किया विचार ॥
घट में सुना शब्द जो अद्भुत, पहला शब्द महा टनकार॥
इस टनकार के ऊपर बानी, आई कानों में ओंकार ।॥
ओंकार पर रारंकारम्, रारंकार में सोहंकार॥
सोहंकार बाँसुरी की गति, बीन की धुन थी सत्याकार ।॥
यह सब देखा किया परेखा, यह सब कान से सुन पाया॥
__ अब आगे का भेद बतादे, सतगुरु ने जो है गाया ॥
उपदेश : कर सतसंग अगम की गम कर, लख लख अलख को लखले तू॥
अलख अगम के पार राधास्वामी, परख परख के परखले तू ॥
आप आपको आप परखकर, आप आपको ले पहचान॥
साधन अनुभव की मर्यादा, कहा और का नेक न मान॥
बिन साधन अनुभव नहीं जागे,बिन सतसंग विवेक न ज्ञान॥
बिन सतगुरु कोई राह न पावे, राधास्वामी कहा बखान ॥
[३८-७४२ ] नहीं मैं जानता था कौन हूँ, और क्यों यहाँ आया॥
पड़ा क्यों काल की फाँसी में, क्यों माया ने भरमाया॥
इधर भटका उधर भरमा, कोई यह भेद बतलाये॥
बहुत पूछा किसी ने मेरी यह, गुत्थी न सुलझाया ॥
पढ़ी पोथी गया तीरथ, किया जप तप रहा बन में॥
न सन्यासी उदासी, और न बनवासी ने समझाया॥
न निकला काम तब मन में, उदासी आगई मेरे ।
चरन राधास्वामी के पकड़े, गुरू ने जब यह बतलाया ॥
नहीं माया अलग तुझसे, यह माया तेरी बुद्धि है॥
समय है काल माया बस, समय से आप घबराया ॥
सुरत को साध घट में धस, किया कर शब्द का साधन ॥
तो यह समझेगा तू चेतन है, चेतन चेतना भाया ॥
सुलझ तब यह गई गुत्थी, समझ निज रूप की आई॥
मुखी हो राधास्वामी संगत में, सतगुरु के गुन गाया ॥
‘प्रश्नोत्तर’ [ ३६-७४३ ]
प्रश्न: इस संसार का रूप क्या, पूछे दास फकीर ॥
इसका उत्तर दीजिये, सुगम सुसूक्ष्म गम्भीर ॥
उत्तर: जहाँ पर निंदा सो संसार ॥
जगत है निंदा का व्यौहार ॥
निदा करे कोई संसारी ॥
निंदा तजे सो गुरुमत धारी ॥
गुन को गह औगुनको त्यागे ॥
गुन ग्राही हो गुन रस पागे ॥
परनिंदा से अपनी हानी ॥
सुख नहीं मिले रहे अज्ञानी ।॥
निंदा करे जो और की, सो नहीं गुरु का दास ॥
चित नहीं उसके गुरू बसें, सहे अन्त में त्रास ॥
प्रश्न : है उपासना भेद क्या ? सो कहिये समझाय ॥
___ मन की सब दुविधा मिटे, चित का भरम नसाय ।॥
उत्तर : ४ उप हैं निकट बैठना आसन ॥
मूल मनन श्रवण निध्यासन ॥
गुरू के पास करे जो बासा ॥
सो उपासना धारे दासा ।॥
[३६१ चित थिर करे हृदय सोधे ॥
बिरती न भरमे सहज निरोधे ॥
दृष्टि रहे गुरू रूप के संग ॥
लखे रूप धारे गुरू रंग॥
यह उपासना सार बताऊँ ॥
सैन बैन में भेद लखाऊँ ॥
यह सिद्धान्त है अद्भुती, बरनत बरन न जाय ॥
गुरू समीप का बैठना, उप आसन कहलाय ॥
प्रश्न ५: सतसंगत के मर्म को, सहज ही देउ बताय ॥
गुरू गम गति कुछ लख पड़े, चार पदारथ पाय ।॥
उत्तर ६: सतगुरु हैं गुरु सत के रूप ॥
सत्त लोक के साँचे भूप ।॥
उनका संग है सत सतसंग ॥
सतसंगत से चढ़े सुरंग ॥
संग प्रभाव रंग गुरु धारे ॥
चित को सोधे मन को मारे ॥
ज्योति संग ज्यों जले पतिंगा ॥
तेहि विधि करे गुरु का संगा।॥
अन्धकार अज्ञान बिनासे ॥
सत का नूर हिय बिच भासे ॥
सतसंग सत का संग है, सतगुरु सत सरदार ॥
सत रूपी सत भावना, सत शोभा भंडार ॥
प्रश्न ७: सुमिरन कैसे कीजिये, सुमिरन का क्या भाव ॥
केसे सुमिरन के किये, पड़े हमारा दाव ॥
उत्तर ८: सत्त नाम है सुमिरन सार ॥
सुमिरन सहज योग न्यौहार ।॥
जेहि विधि कामी सुमिरे नार ॥
तेसा हो आदर्श का प्यार ॥
जैसे लोभी संयम दाम ॥
तैसे ही व्यापे सत नाम ॥
घट पर घट सिर धर पनिहारी ॥
डोले हिले चले पग धारी ॥
सुरत रहे घट माँह पिरोई ॥
सुमिरन की गति ऐसी होई ।॥
चन्द्र ललाट तो कंठ विष, सिरसे बहती गंग ॥
भस्म विभूती तन मलें, लपटे कीट भुजंग ॥
जटा जूट सिर से.हते, सुरत निरत विस्माध ॥
अमन अमल अवगत दशा, लखे रूप कोई साध ॥
उमा रमण करुणा अयन, कुन्द इंदु सम देह ॥
मोह भरम व्यापे नहीं, अचित अगेह अदेह ॥
नन्दी वाहन साथ ले, लिये भूत बैताल ॥
डमरु और त्रिशूल कर, गले मुड की माल ॥
लख शिव की मूरत उमा, बोली दीन दयाल ॥
तुम क्यों ऐसा रूप धर, करो जगत प्रतिपाल ॥
शिव बोले सुन तू प्रिया, मैं कल्याण स्वरूप ॥
मेरा रूप विचित्र है, नहीं परजा नहीं भूप ॥
मानी अभिमानी महा, नहीं मान अभिमान ॥
माँगू मान न आप मैं, दे औरन सन्मान ॥
औरन के तो आँख दो, मेरे आँखें तीन ॥
धनी बली को सब चहें, मुझ को प्यारे दीन ॥
अमृत प्यारा सबन को, विष प्यारा है मोहि ॥
औरन के उपकार हित, तजू काम मद मोह ॥
औगुन देख के गुन लहूँ, अवगुन से नहीं प्यार ॥
मेरी दशा विचित्र है, अगुन सगुन व्यौहार ॥
पारवती अर्धाङ्गिनी, परबत के आकार ॥
यह निज शक्ति चित्त की, उपजे न विषय विकार ॥
नन्दी सुख को समझले, मेरा वाहन सोय ॥
सुखी रहूँ नहीं दुखी हूँ, मन की दुर्मति खोय ॥
एक कर में त्रिशूल ले, शूल का करू संघार ॥
अधि दैविक अधिभूत दुख, अध्यातम दू मार ॥
दूजे कर डमरू गहूँ, अन्तर शब्द की धुन ॥
शब्द रूप है निज मेरा, बिसमध शब्द को सुन ।॥
पर उपकार को चित्त दे, विष का किया अहार ॥
नील कंठ का नाम धर, इसी नाम से प्यार ॥
सृष्टि प्रलय उत्पति दशा, व्यापे नाहीं मोह ॥
मुन्डमाल भूषन बने, रह कैलाश की खोह ॥
जग मग चन्द्र ललाट में, तिसको ओजस जान ॥
मैं निःकाम रहता सदा, क्रान्ति शान्ति स्थान ।॥
गंग सीस धारा सुगम, सिर से निकसी धार ॥
सोई मेरा रूप है, निरमल शुद्ध विचार ॥
संग में मेरे भूत हैं, भूत में धरनि अकास ॥
जलवायु पावक सदा, मुझ में करें निवास ॥
और रमे बैताल नित, सो सुन प्यारी आज ॥
बैताली है राग धुन, गान से मुझको काज ॥
अनहद बानी अद्भुती, अगम निगम की खान ॥
श्रुति उद्गीत प्रणव कहो, साई ज्ञान मन मान ॥
आँख तीसरी सुन प्रिया, तीजे तिल भ्रमध्य ॥
जो पावे इस भेद को, रहे न जग में बद्ध ॥
मैं कैलाश बसू सदा, ‘कैल’ जान ‘आनन्द’ ॥
‘अस’ है ‘रहना’ सुन उमा, मेंट भरम का द्वन्द ॥
सत चित आनन्द रूप में, सत है मेरी देह ॥
चित परवत सम पारवती, रूप आनन्द सनेह ॥
मेरा अपना कुछ नहीं, जो कुछ है सब मोर ॥
कमल नीर को परख ले, मुझ में मोर न तोर ।॥
मोर तोर की जेवरी, बन्धे जीव समुदाय ॥
मोर तोर मुझ में नहीं, कैसे कोई फसाय ।॥
मोर तोर की जेवरी, बट बाँधे सब जीव ॥
यह बन्धन तो तब कटें, लखे जो मूरत शिव ।॥
मोर तोर की जेवरी, सोई जग व्यौहार ॥
यही तो यम का काल है, यही है मूल विकार ॥
मोर तोर की जेवरी, काल करम की फाँस ॥
काट दे दुख के फन्द को, भज गुरु साँसों साँस ॥
मोर तोर की जेवरी, दो लड़ त्रय लड़ जान ॥
त्रिगुनात्मिक जगत में, तीन ताप की खान ॥
मोर तोर की जेबरी, शिव संगत में काट ॥
ले जो भक्ति विवेक को, चमके चन्द्र ललाट ॥
पारवती चित साध कर, शब्द योग अभ्यास ॥
नन्दी आनन्द चढ़ चले, बिचरे कोई दास ॥
सिर से गंग की धार नित, बहे तरंग अपार ॥
ज्ञान ध्यान की गम लहे, उपजे विवेक विचार ॥
प्रेम भक्ति मन में बसे, डसे न काल भुजंग ॥
दुख नहीं व्यापे देह को, पिये जो आनन्द भंग ॥
सत्त देह मन चित्त है, आनन्द सुरत सुजान ॥
भेद सच्चिदानन्द का, अद्भुत अगम महान ।॥
यही ज्ञान का सार है, और ज्ञान अज्ञान ॥
शब्द सार मेरा परख, शब्द का कर नित ध्यान ॥
शब्द गुरु का रूप है, और गुरू नहिं कोय ॥
जो नहिं गुरु गम को लखे, जावे भव जल खोय ॥
‘शालिग्राम’ की दया से, पाया भेद अपार ॥
‘शालिग्राम’ के संग से, मेटा द्वन्द पसार ॥
गुरु मूरत हृदय बसी, शिव प्रगटा अवधूत ॥
जग की फाँसी कट गई, जैसे काँचा सूत ॥
धन्य धन्य गुरु धन्य तुम, धन्य दया व्यौहार ॥
राधास्वामी धन्य तुम, दीनन के हितकार ।॥
[ ४१-७४५ ] राधास्वामी नाम हित चित, प्रेम भाव से गाइये॥
जीते जी यश कीरती, निरवान सद्गति पाइये॥
घट में गाना नाम का हो, घट में हो सुमिरन मनन ॥
घट के अन्दर उसका श्रवन, घट में हो उसका भजन ॥
घट में अघट है घट में, घट के घाट का है पता ॥
बैठ अपने घट में निसदिन, घट ही में मन को लगा॥
घट में सुन धुन नाम की तू , श्रुति मत को साधकर ॥
नाम की है रागनी उलटी, इधर से मुड़ उधर ॥
सुरत के कानों से सुन, नित नाद अनहद राग की ॥
शब्द की डोरी पकड़, यह राग है अनुराग की ॥
है यही उद्गीत सच्चा, उसका प्रणव नाम है॥
प्राण गाता है इसे, और प्राण ही से काम है॥
कान आँख और मुख को, माने के समय में करले बंद ॥
राधास्वामी नाम गायाकर, छुटेगा खेद द्वन्द ।॥
है यही निज नाम, और इस नाम में चित को लगा॥
घट के परदे तब खुलंगे, घट के अनुभव को जगा ॥
राधास्वामी नाम का, साधन हो सोते जागते ॥
त्याग आलस नींद बन आवे, जो तुझसे त्यागते ॥
[४२-७४६ ] आओ सतसंग में, नर जन्म बनाने आओ॥
गुरु का उपदेश सुनो, चित को चिताने आओ॥
काम करना हो करो, बातें बनाना छोड़ो॥
अपने को औरों को, बन्धन से छुड़ाने आओ ।॥
शम से और दम से करो, चित की वृत्ति का निरोध ॥
योग की शक्ति से बल, अपना बढ़ाने आओ ॥
सुरत शब्द का अभ्यास, सुगम है प्यारे ॥
सीख लो युक्ति, कमाई को कमाने आओ ॥
राधास्वामी ने दया की, दिया सत मत का मरम ॥
चूको आलस न करो, ज्ञान को पाने आओ॥
[४३-७४७ ] काम करो चित से करो, दुचिताई से हान ॥
दुचिताई अच्छी नहीं, भूल भरम की खान ।॥
दुविधा से क्या बनेगा, दुविधा है बेकाम ॥
दुविधा ने दोऊ गये, माया पिली न राम ॥
दुविधा त्यागी साध चित को, मन का साजा साज॥
गोरस बेचत हरि मिले, एक पन्थ दो काज ।॥
एक रंग में रंग रहो, कभी न बनो कुरंग ॥
सूरदास की कामरी, चढ़े न दूजा रंग ॥
राधास्वामी गुरु किया, दुविधा मेटी आय ॥
क्यों नहीं पूरा काम हो, सतगुरु हुये सहाय ॥
[४४-७४८ ] तुम आप करो विश्वास करो, गुरु बेड़ा पार करेंगे जी ॥
दृढ़ निश्चय रहे मन में सदा, सच्चा उद्धार करेंगे जी ॥
जो शरन में उनके आया है, भक्ति के दान को पाया है॥
गुरु सुमिरन चित्त बसाया है, वह उसका सुधार करेंगे जी ।॥
मन में सच्ची प्रतीति रहे, गुरु चरन कमल में प्रीति रहे ॥
और प्रेम प्रभाव की रीति रहे, सच्चा उपकार करेंगे जी ।॥
बिन गुरु नहीं कर्म न ज्ञान मिले, गुरु बिन नहीं ज्ञान अनुमान मिले ॥
नहीं शब्द न साखी प्रमान मिले, वही विचार करेंगे जी ॥
राधास्वामी भजो राधास्वामी जपो,राधास्वामी सुमिरि
राधास्वामी कहो राधास्वामी सुनो राधास्वामी कहो, राधास्वामी संभाल करंगे जी ॥
[४५-749 ] आतम विरती सहज की, सहज भाव चित दे॥
सहज सहज में सहज है, सहज मुक्ति फल ले ॥
सहजा विरती आत्मा, मध्य धारना ध्यान ॥
अधम मूर्ति पूजा विषय, तीरथ नीचा जान ॥
जाकी जैसी प्रकृति, तैसा तिसका काम ॥
छेड़ छाड़ नहीं कीजिये, लीजे गुरु का नाम ॥
जो बन आये सहज में, सोई सहज का रूप ॥
जिसमें खींचातान हो, जान भरम का कूप ।॥
सहज सहज जो सहज विधि, सो फल मीठा होय ॥
और युक्ति से जो पके, सुन्दर मधुर न सोय ॥
साधन सुमिरन सहज का, सहज ही सहज विधान॥
सहज बुद्धि सहज आचरण, अन्त सहज निरवान ।॥
निरविकल्प सविकल्प नहीं, उत्तम सहज समाधि ॥
सहज समाधि सहज मिले, छूटे सहज उपाधि ॥
सहज में नहीं कठिनता, सीख सहज मत रीति ॥
साधन सहज की प्रबलता, उपजे सहज प्रतीति ।॥
प्रेम प्रतीति सहज विधि, कठिन न प्रेम का पंथ ॥
प्रेम बिना सब व्यर्थ है, भरम न छूटे ग्रन्थ ।॥
ग्रन्थ पढ़ा तो क्या भया, मिला न प्रेम का पन्थ ॥
प्रेम युक्ति सहजे खुले, जड़ चेतन का ग्रन्थ ।॥
सुरत शब्द अभ्यास से, वृत्ति सहज हो प्राप्त ॥
निज अनुभव साक्षात्कार, सहज शब्द मन आस ॥
सहज इन्द्री का ज्ञान है, सहज ज्ञान अनुमान ॥
सहज सहज निज ज्ञान है, यही है मुख्य प्रमान ॥
तुझमें ज्ञान प्रमान है, तुझमें ज्ञान अनुमान ॥
तुझमें शब्द की खान है, आप्त बचन सुन कान ॥
कठिन ग्रन्थ की जेवरी, बंध रहे चतुर सुजान ॥
निज अनुभव सूझा नहीं, पाया वाचक ज्ञान ।॥
वाचक ज्ञान को त्यागदे, महा कठिन व्यौहार ॥
प्रेम प्रतीति प्रभाव से, पावे उत्तम सार ।॥
सहज रीति सतसंग कर, सहज श्रवन और मनन ॥
सहज शब्द अभ्यास है, सुमिरन सहज भजन ॥
मिसरी जब जल से मिली, होगई जल का अंग ॥
जैसे ही गुरु के संग को, समझ सत्य का संग ।॥
नोन गला पानी भया, भरे कौन अब गौन ॥
सतसंगत परताप से, मन बानी चित मौन ॥
[४६-७५० ] हम बासी उस देस के, जहाँ न बुद्धि विचार ॥
द्वन्द भेद का भय नहीं, परम तत्व का सार ॥
हम बासी उस देस के, जहाँ आनन्द की खान ॥
सुख दुख कुछ व्यारे नहीं, एक रस भाव समान ।॥
कमल नीर की गति परख, समझे कोई साध ॥
सुरत शब्द अभ्यास कर, मेटे सकल उपाध ॥
नहीं वह एक न दो कभी, त्रिगुनात्मक वह नाँहि ॥
गुनातीत गति अगम छवि, देखा निज घट मांहिं ॥
राधास्वामी की दया, पाया अगम अपार ॥
कहते सुनते ना बने, नहीं विवेक विचार ।॥
[४७-७५१ ] सुमिरन करो तो जीभ बन्द हो, शब्द सुनो तब कान ॥
मन को बस करने की विधि, गुरु स्वरूप का ध्यान ॥
आँख से निरखो गुरु स्वरूप को, अन्तर घट में आन ॥
धीरे धीरे काम बनाओ, गुरु महिमा को जान ।॥
तीन बन्द जब लग नहीं लागे, केसे मिले ठिकान ॥
इन्द्री मन का शम दम साधन, समझ के करो विधान ।॥
निरख परख अपनी हो निस दिन,अपने रूप की हो पहचान॥
समय न खोना भरम न फसाना, ममता में है सबकी खान ।॥
सुरत शब्द की रहे कमाई, साधु संत को मन से मान ॥
राधास्वामी की कृपा से, मिलेगा एक दिन सच्चा ज्ञान ॥
[४८-७५२ ] चित चरनों में जोड़िये, साक्षी भाव समान ॥
तत्र सतगुरु का प्राप्त हो, सहज ध्यान अनुमान ॥
सहज सहज में सहज हो, सहज सहज का काम ॥
सहज भजन और ध्यान हो, सहज ही सुमिरन नाम ॥
सहज भाव को समझलो, कठिनाई को त्याग ॥
कठिनाई में विकलता, सहज में प्रेम अनुराग ॥
सहज सहज जो पग धरे, पहुँचे गुरु दरबार ॥
कठिन भाव हृदय बसे, फिर नहीं बेड़ा पार ॥
सहजे पके मिठास है, करो न खींचा तान ॥
सहज वृत्ति है नम्रता, खींचतान अभिमान ।॥
सहज मौज की रीति है, सहज चले जो कोय ॥
सहज भाव अन्तर बसे, घट में दरशन होय ।॥
सुमिरन साधन सहज का, सतगुरु दिया बताय ॥
सहज सहज सुमिरन करो, एक दिन गुरु मिल जाय ।॥
करम स्थूल है साधुआ, ज्ञान सूक्ष्म यौहार ॥
आनन्द कारन मात्र है, यह सिद्धान्त विचार ॥
नीचे सब करमी रहे, ज्ञानी अधर समाय ॥
आनन्द जिनको मिल गया, सो भव दुःख नसाय ॥
त्रिगुन जगत की यह दशा, तीन तीन का भेद ॥
सत चित आनन्द परखले, मेट भरम का खेद ।॥
करम बने अज्ञान से, ज्ञान से बने विचार ॥
आनन्द बने सो सुरत से, गुरु मत सार सुधार ।॥
ज्ञान बीच की कड़ी है, यह नहीं इष्ट फकीर ॥
समझ समझ मन आपने, चित करो धीर गंभीर ॥
त्रिकुटी की गम करम में, सो अनेक का रूप ॥
अंधकार अज्ञान सोई, डाले भव के कूप ॥
ज्ञान द्वत का पक्ष है, और नहीं कोई द्वत ॥
मन ही में दुविधा बसे, नहीं वह पद अद्व त ॥
सुरत निरत में एकता, एक भाव आनन्द ॥
सुरत शब्द के योग से, कटे मोह का फन्द ।॥
वेद मार्गी त्रिपुटिः पद, वेदान्ती सोई द्वत ॥
भक्त उपासक प्रेम रत, लहें सुगम अद्वत ।॥
तीनो तीनों में फंसे, अपने भरम की खान ॥
त्रिगुन जगत के जाल में, भोगें योनि निदान ॥
योगी भोगी चतुर नर, आवागमन न काट ॥
कभी जनमे और कभी मरे, साजा द्वन्द का ठाट ॥
नहीं यह अगुन न सगुन है, निराकार साकार ॥
इनके मारग ना चले, हो फकीर हुशियार ।॥
नहीं समाधि में निचलता, ताका होय उत्थान ॥
सृष्टि स्थिति प्रलय में, आवागमन फंसान ॥
युक्ति अनूपम गुरु की, समझ समझ चित धार ॥
सतसंगत कर साध की, सहज में जा भव पार ॥
सन्त मता ऊँचा बहुत, समझ तो उपजे चैन ॥
संस्कार ले गुरु से, सुन सुन उनके सैन ॥
यह करनी का भेद है, तज कथनी की बान ॥
करनी कर रहनी रहे, सोई साध सुजान ।॥
तीन अवस्था त्यागकर, चौथे पद चित लाव ॥
वही सन्तमत सार है, वही मुक्ति का दाव ।॥
सहस कमल दल बास कर, गह त्रिकुटी ओंकार ॥
सुन्न समाधि रचाय ले, गुफा से होजा पार ॥
सतपद आसन मारकर, अलख अगम को दौड़॥
तब राधास्वामी धाम में, छूटे मन की चौड़।॥
शब्द योग को सीखकर, कर कुछ दिन सतसंग ॥
त्याग जगत के रंग को, धार गुरु का रंग ॥
[ ५२-७५६ ] गुरु की भक्ति सदा सुखदाई, गुरु की भक्ति नित करना ॥
यह भव सागर की नौका है, बिना इसके नहीं तरना ॥
जगत की वासना झूठी, न उससे नेह कर प्यारे ॥
भरम में जो पड़े प्रानी, सहेंगे जनम और मरना ॥
समझले माया छाया है, किसी के हाथ कब आई॥
धुआँ का नापना मिथ्या, विपति का बोझ सिर धरना ।॥
समय अनमोल जो खोते, गुरु का संग नहीं करते ॥
पशु सम तुम उन्हें जानो, पशु हैं वह कभी नर ना ॥
रहे गुरु की लगन मन में, यतन सुमिरन भजन का हो ॥
दयासागर हैं राधास्वामी, चरन की दृढ़ करो शरना ॥
[ ५३-७५७ ॥मैं पतित ठहरा तभी, तू भी पतित पावन बना ॥
डूबा दुख सागर में मैं, तब तू तरन तारन बना ॥
जो न होता जग में रावण, कैसे आते रामचन्द्र ॥
कंस ने प्रगट किया, मथुरा में कृष्ण आनन्दकन्द ॥
जो सुखी हैं उनको तेरे, नाम की चाहत नहीं ॥
जो भले हैं उनको तेरे, काम की हाजत नहीं ॥
पाप जब मैंने किया तब, तू हुआ परगट यहाँ॥
मैं न करता पाप तुझको, जानता कोई कहाँ ॥
पापियों के तारने वाले, हमारा ध्यान कर ॥
करते हैं सब हमसे घृणा, हमको पापी जानकर ॥
अच्छे लोगों भागते हो, क्यों हमारे नाम से॥
कैसे कतराकर चले हो, तुम हमारे काम से ॥
ज्ञान का अज्ञानियों को, ही सदा अधिकार है॥
पापियों के ही लिये जग, सन्त का अवतार है॥
सुख के सिर पत्थर पड़, सुख ने भुलाया नाम को॥
दुख की बलिहारी है, दुख ने ही जपाया नाम को ॥
मेरे दाता दीन और, दुखियों की तुझको लाज है॥
दीन बन्धु दीन हित, करना ही तेरा काज है॥
अपनी निंदा क्या करें, निंदा के हम कब पात्र हैं॥
सच्चे अधिकारी दया के, जग के पापी मात्र है॥
पाप ही दरशन दिलाते, हैं तेरा संसार को ॥
पाप करके वह सुझा देते हैं, भक्ति सार को ।॥
द्वन्द में हमको फसाया, और पापी कर दिया॥
मन का बरतन वासनाओं, से हमारा भर दिया ॥
सारे पापी तर गये, आई है अब बारी मेरी ॥
देखता हूँ राह व्याकुलता, से आने की तेरी ॥
तर गये गनिका अजामिल, मुक्त शबरी भीलनी ॥
तर गये सैना सदन तक, और सुपच चर डाल भी ॥
मेरी बारी पर बता अब, देर क्यों करने लगा॥
इस अधम को तारदे यह, दुख से अब मरने लगा॥
ऐ पतित पावन पतित की, और दृष्टि हो तेरी ॥
ऐ तरन तारन नहीं, होती है चिन्ता क्यों मेरी ॥
राधास्वामी अब दया से, मेरा बेड़ा पार कर ॥
दुख सहा करता हूँ निसदिन, आके तू उद्धार कर ।॥
बिनती
[ ७५८ ] धन्य धन्य गुरु देव, ज्ञान सच्चा दिया॥
मिथ्या जग का द्वन्द सो, उसको मिटा दिया ॥
सत चित आनन्द रूप, अजर अमर विज्ञानमय ॥
उनकी कृपा महान, सूर ज्ञान का भया उदय ।॥
छूटा सब प्रपंच, दुख दारुन गया॥
भव के जाल से बच गये, हुई ऐसी दया ॥
भाग मेरा है धन्य धन्य, गुरु दीन हित ॥
धन्य ज्ञान और ध्यान है, धन्य धन्य हो अचल चित ।॥
शब्द जहाज चढ़ाय कर, कर लिया भव के पार |
राधास्वामी मेहर से, छूट गया संसार ॥
[ 759 ] राधास्वामी धनी जग में आये, धर सतगुरु अवतार ॥
जीव निवल की बाँह पकड़कर, किया भवसागर पार ।॥
दया सिंधु में लहर जो उमड़ी, लाई शब्द जहाज ॥
निवल जीव सब चढ़कर बैठे, सुख सम्पति रहे गाज ॥
हँसी खेल में पार लगाया, सुरत शब्द के लार ॥
धरम करम का बन्धन काटा, मेट दिया जम जार ।॥
राधास्वामी राधास्वामी छिन छिन गाऊ,प्रेम प्रीति उमगाय ॥
धन धन धन मेरे सतगुरु स्वामी, सबको लिया बचाय ॥
अठारहवीं धुन
[ १-७६० ] गुरु परम दीन दयाल प्रगटे, जीव तारन हार ॥
शब्द नाव चढ़ाय सुन्दर, लाये भव जल पार ।॥
कृपा मूरति दया सूरति, ज्ञान गम भण्डार ॥
भक्त रंजन जग विभंजन, सकल के आधार ।॥
जीव दीन अधीन स्वामी, दुखित अति दिन रैन ॥
शब्द सार चिताय जन को, सुरत दीजे चैन ।॥
मिटे कलि मल वासना, और छूटे मूल विकार ॥
चरन कमल लगाय सबको, कीजे बेड़ा पार ।॥
अपना कीजे प्रेम दीजे, दया दृष्टि संभार ॥
सहज में प्रभु आप कीजे, लीजे सकल सुधार ।॥
जीव निवल अचेत सब विधि, सहत विपत कलेश ॥
छोड़े यह परदेश भव का, जायें तुम्हरे देश ॥
शब्द नाम सुनाय घट में, शब्द डोर लखाय ॥
शब्द का रहे आसरा प्रभु, शब्द डगर चढ़ाय ॥
शब्द धाम दिखाइये, और शब्द चित्त बसाय ॥
शब्द रूप दिखाय सबको, शब्द दीजे मिलाय ॥
जहाँ मन की गम नहीं है, वह तुम्हारा देश ॥
भक्त जन को निज दया से, इसका दो उपदेश ॥
काल करम से विवश हैं जीव, माया मोह फसाय ॥
राधास्वामी दया सागर, कीजे इनकी सहाय ।॥
[२-७६१ ] भक्ति दाता भक्ति दीजे, भक्त पालन हार ॥
मुक्त कीजे भक्ति अपनी, बख्शिये करतार ॥
तुम हो ज्ञानी तुम हो ज्ञाता, ज्ञान गम भंडार ॥
मेट दो अज्ञान तम को, ज्ञान के आधार ॥
दीन तारन दीन बन्धु, हैं दीन दयाल ॥
दीन शरणागत पड़ा है, कीजे उसकी संभाल ।॥
मैं पतित सब विधि हूँ स्वामी, तुम हो पतित उद्धार ॥
मेरी ओर न देखियेगा, अपनी ओर निहार ।॥
राधास्वामी राधास्वामी, नाम दीजे दांन ॥
मान की इच्छा नहीं मोहे, आया तज अभिमान ॥
मैं हूँ बालक तुम पिता हो, मैं निपट अनजान ॥
चाल विनती सुनिये चित से, कीजे मेरा ध्यान ॥
भक्ति सेवा नहीं बने कुछ, मैं हूँ बाल स्वरूप ॥
गधास्वामी मैं हूँ घट सम, तुम हो ब्रह्म के कूप ।॥
में हूँ कमल दल भाव सम, तुम कीजिये परकास ॥
चित रहे चरनों में निसदिन, दीजे ऐसी उजास ॥
फेर कर दृष्टि को मेरी, कीजे मेरी ओर ॥
चन्द्र मुख तुम राधास्वामी, मैं हूँ चित्त चकोर ।॥
[३-७६२ ] अज्ञान बस नहीं तुमहि जाना, कैसे कोई जाने तुम्हें ॥
जहाँ बानी मन की गम नहीं, कोई कैसे पहिचाने तुम्हें ॥
रूपवान अरूप हो तुम, आप जगत स्वरूप हो ॥
तुम आप भव निधि कूप हो, तुम चर अचर के भूप हो ॥
अज्ञान भरम के जाल में, फसकर तुम्हें जाना नहीं॥
इस कठिन मोह की छाया में, प्रभु तुमको पहिचाना नहीं॥
पद कमल सीस बिराजिया, त्रय ताप सकल बिनासिया ॥
अघपाप पूरे नासिया, प्रभु कीन्हा सहज उदासिया ॥
मेरे अब तो अबगुन मेटिये, चरनों में मुझको लीजिये ॥
राधास्वामी निज जन जानकर, पद पद्म भक्ति दीजिये॥
[४-७६३ ] धन दुख हरन धन सुख करन, मंगल भवन पूरन धनी ॥
धन पतित पावन भव नसावन, ताप त्रय गंजन धनी ॥
त्रय लोकनाथ अनाथ बन्धू, दीन सुखदायक प्रभू ॥
धन प्रणतपाल दयाल मायातीत, सुरनायक प्रभू ।॥
तुम अपरम्पार अपार सतगुरु, ब्रह्म रूप अगोचरम् ॥
तुम दीनबन्धु दयाल स्वामी, जगत हित धरनी धरम् ।॥
तुम आदि कारन कर्म करता, दीन हितकारी प्रभू ॥
तुम आदि अन्त अनन्त रक्षक, हरहु दुख . भारी प्रभू ।॥
[५-७६४ ] धन भक्त वत्सल नाथ करुणा, पुज धन धरनी धरम् ॥
धन कमल नयन कपाल रूप, अनूप धन धन सद्गुरुम् ॥
कोई जाने माया तेरी क्योंकर, नेति नेति अगम कहे ॥
तेरा नाम गावे भक्त निस दिन, परम सुख आनन्द लहे ।॥
पतित पावन भव नसावन, भक्त मन भावन प्रभू ॥
संशय मिटावन नाम तेरा, धन सदा धन सतगुरु ॥
[ 6-765 ] हाथ जोड़ नवाय मस्तक, चरन कमल की बंदना ॥
शुद्ध मन से ध्यान सुमिरन, जनम को लूँ मैं बना ॥
नींद में हो दण्डवत, जाग्रत परिकरमा मेरा ॥
जब सुषप्ती का समय हो, हृदय में हो घर तेरा ।॥
देखू तेरा रूप पल पल, गाऊँ तेरे नाम को ॥
रूप नाम के आसरे गुरु, पाऊँ मैं बिसराम को॥
नाम का रसना में रस हो, कान अनहद धुन सुनें ॥
तेरी लीला की कथा को, बुद्धि मन चित सब गुर्ने ॥
बोलू जब तेरा कथन हो, चुप रहूँ तेरा मनन ॥
मेरा सब कुछ तुझपे अरपन, देह बानी चित्त मन ॥
दृष्टि दे ऐसी मुझे यह, जगत तेरा रूप हो ॥
गोते मारू तुझ में छिन छिन, तू अमी का कूप हो ॥
तृ हो मेरा मैं हूँ तेरा, और से क्या काम है॥
तेरा सेवक जब हुआ, होठों पे तेरा नाम है॥
तू है दाता तू विधाता, तेरी केवल आस है॥
हो गया भंवरा कमल पद का, चरन में बास है॥
देख अबगुन को न मेरे, मैं हूँ अवगुन से भरा॥
तू गुनागर है दयामय, दे चरन का आसरा ।॥
प्रम तेरा तेरी भक्ति, तेरी सेवा ध्यान हो॥
तेरा सुमिरन और भजन हो, तेरा अन्तर ज्ञान हो॥
राधास्वामी सतगुरु, करतार संकट काट दे॥
छीन ले सब सम्पदा, भक्ति का मुझको ठाठ दे ।॥
[7-766 ] कोट स्तुती बन्दना करूं, सीस चरन झुकाय ॥
हृदय भंवरा पद कमल स्वामी, छोड़ अन्त न जाय ॥
ऋद्धि सिद्धि न माँगू नौ निधि, चित्त नित्य उदास ॥
चरन शरन की सेव निस दिन, रहे मन की आस ।॥
भजन सुमिरन ध्यान पूजा, ज्ञान कर्म न जान ॥
प्रीत रीति का सार प्रभु क्या, जाने यह अनजान ॥
दीन हीन अधीन सब विधि, त्याग सबकी आस ॥
आय चरनन में पड़ा, तुम दीजो चरन निवास ॥
प्रेम धार बहाये खोलो, आज अमृत खान ॥
ज्ञान र प्रकाश पावे, मेटो तुम अज्ञान ॥
चढ़े सुरत आकाश मेरी, करे शब्द बिलास ॥
आस केवल गुरु चरन की, जग से सदा निरास ।॥
नाम रत्न का दान दीजे, साधु संग बिहार ॥
राधास्वामी दया कीजे, तुम हो पतित उधार ॥
[8-767 ] गुरु के पत में आयकर, गुरु मत ले पहचान ॥
यह अवसा और यह समय, बहुर न देखे आन ॥
गुरू मत. गुरू भेदी लखे, तासों मन पतियाय ॥
पढ़ा लिखा जाना बहुत, यह नहीं ठीक उपाय ॥
नाम तो तेरे घट बसे, नाम से तू रहे लाग ॥
राधास्वामी गुरू कृपा, पावे पूरन भाग ॥
-768 ] तू क्यों सोवे मोह नींद में, जाग जाग सूरत प्यारी ॥
निरख परख कर मन अपने की, आठ पहर की रखवारी ॥
यह संसार है दुख की खानी, सोच सोच मन में अपने ॥
चिड़िया रैन बसेरा है जग, कुल कुटुम्ब मिथ्या सपने ॥
एक आस विश्वास गुरू की, और सकल भ्रमजाल महा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक गुरु की शरन गहा ॥
mam बिनती
[ 769 ] दीन हीन शरन में आया, कीजे आप सहाय ॥
काल का भय सहज मेटो, अपने चरन लगाय ।॥
सिंधु भव अति अगम दुस्तर, सूझे वार न पार ॥
हो दया की दृष्टि साई, नाव है मंझधार ॥
पतित पावन तरन तारन, यह तुम्हारा नाम ॥
बाल विनती सुनो चित से, मन को दो विश्राम ॥
ज्ञान नहीं निरवान नहीं, अनुमान से नहीं काम ॥
शब्द का दे आसरा प्रभु, बख्श दीजे नाम ।॥
नाम दान प्रदान कीजे, नाम रतन महान ॥
राधास्वामी दया सागर, कीजिये कल्यान ॥
राधास्वामी सतगुरु, करतार संकट काट दे॥
छीन ले सब सम्पदा, भक्ति का मुझको ठाठ दे ।॥
प्रार्थना
[ 770 ] धन्य सतगुरु दीन बन्धु, धन्य जग हित सतगुरुम् ॥
धन्य कासी तेरी काया, धन्य काली विश्वेश्वरम् ।॥
धन्य चित शक्ति उमा और, धन्य बास हिमाचलम् ॥
धन्य नन्दी शिव सेवक, धन्य आसन निश्चलम् ॥
धन्य. यह कैलास मानस, धन्य हंसन ब्रथ है ॥
धन्य धन्य बैताल योगी, सिद्ध ऋषि जन जूथ है ॥
हम गनेश के रूप तेरे, बाल शरनागत हुये॥
धन्य तू बिस्माध मूरति, आये संगत किये ।॥
सुन्न सहज समाध साधी, धर्म की शिक्षा मिली॥
राधारानी की दया से, काल को आरत टली ।॥
उन्नीसवी धुन
[1-771 ] दर्शन की मैं प्यासी गुरु, मेरे दर्शन की मैं प्यासी ॥टेका॥
दर्शन दीजे अपना कीजे, बनू चरन की दासी ॥
गुरु मेरे दर्शन की रहे. आस घनेरी, सब से रहूँ निरासी ॥
गत अंधेरी पन्थ न सूझे.. कर दो सहज उजासी॥
सा. को देखा किया परेखा, ज्ञानी ध्यानी उदासी ॥
मेरी लाज तुम्हें है साई, करो न जग में हाँसी ॥
दुख से दुखित रहुँ निस बासर, तुम ही हो सुखरासी॥
महिमा अगम अपार तुम्हारी, अजर अमर अविनासी ॥
मेरे घट में आन बिराजो, तुम घट घट के बासी॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काटो यम की फाँसी ॥
[2-772 ] बाँह गहे की लाज, सतगुरु बाँह गहे की साज ।।टेक॥
आया दीन हीन चरनन में, परमारथ के काज ।॥
सतगुरु नाम दान दे अपना कीजे, माँगू मान न राज ।॥
सतगुरु ज्ञान ध्यान योग नहीं क्रिया, भक्ति साजन साज ।॥
सतगुरु शरनागत की लज्जा राखो, नहिं तो होवे अकाज ॥
सतगुरु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जग से आया भाज ।॥सतगुरु
773-शरनागत की लाज स्वामी, शरनागत की लाज ॥टेक।॥
तुम तो आये नरः देही में, शरनागत के काज ।॥
स्वामी मैं हूँ दीन अधीन तुम्हारा, तुम राजों के राज ॥
स्वामी ज्ञान करम की विधि नहीं जानू , नहीं भक्ति का साज ।॥
मामी भव भय अधिक सतावे मो. को, महा काल सिर गाज ॥
सामी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, दास को तारो आज ॥ स्वामी
[4-774 ] तुम मेरे प्रान अधारे दाता, तुम मेरे प्रान अधारे ।टेक।॥
तन मन धन चरनन पर अरपू, जीऊ तुम्हारे सहारे ॥
दाता तुम बिन मेरा और न कोई, कुल कुटुम्ब परिवारे ॥
दाता मुझको भी दो चरन निवासा, बहु जीवन को तारे ।॥
दाता हाथ पकड़ भव भवर से स्वामी, जल्दी करदो किनारे ।॥
दाता राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, तुम ही हो रखवारे ॥दाता
[ 5-775 ॥चरन कमल की धूर बन्दशो, चरन कमल की धूर टिक॥
यह धूरी जीवन की मूरी, करे रोग भव दूर ॥
बख्शो . माँज माँज मन मकुर का दरपन, देखू सतपद नूर ॥
आँख लगाऊँ अंजन निर्मल, मिटे तिमिर भरपूर ॥
“दिव्य दृष्टि की जोत अनूपम, ज्ञान ध्यान का सूर ॥
बख्शो0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, निरखू रूप हजूर ॥
6-776 ॥हम तो निस दिन गुरु रंग राते ॥टेक॥
गुरु की सेवा भजन बंदगी, कहीं नहीं आते जाते ॥
हम तो गुरु का बल ले गुरु की दया से, करम के फन्द कटाते ॥
उठत बैठत कबहूँ न बिसरें, ध्यान गुरु का लाते ।।
जब जागें तब गुरु का सुमिरन, नींद में गुरु संग पाते ॥
खुली आँख गुरु मूरत निरखें, बन्द तो मन बीच लाते ॥
छिन छिन पल पल दरस दिवाने, दरशन में मगनाते ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, बल बल गुरु पर जाते ॥
[7-777 ] प्रेम की डगर बता दो साई, तुमसे लगी मेरी नेह हो ॥टेक।॥
जग नहीं भावे सुख न सुहावे, भूले सुध बुध देह हो ॥
साई0 छूटे सकल कुटुम्ब परिवारा, छूटे माया गेह हो॥
तन मन अरपू तुम्हरे चरनन, मन न रहे सन्देह हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, ऐसा सिखावन देह हो॥
[8-778 ] प्रेम अधिक सुख दाई साधु, प्रेम अधिक सुखदाई ॥टेका॥
काम क्रोध मद मोह शोक सब, तज दे छल चतुराई ॥
साधु करम धरम का काट दे बन्धन, गुरु पद प्रेम जगाई ॥
साधु माया काल करे नहीं हानी, गुरु संगत जब पाई ॥
साधु धन सम्पत सुख दाम बड़ाई, अन्त काम नहीं आई ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु अलख लखाई।
[6-779 ] मैं तोरे रंग राती रे मोहना, मैं तोरे रंग राती ॥टेका॥
छिन छिन पल पल गुन तेरा गाती, बन बन फिरू मत माती रे मोहना
मेरे हिये तू निस दिन रहता, जैसे दिया में बाती रे मोहना तेरे
कारन सब बज डासै, भाई बन्धु कुल जाती ॥
रे मोहना मन मोहन की छवि अति अद्भुत, जिया को अधिक सुहाती॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, देख देख हरपाती ॥
[10-780 ] तुम ही प्रान आधारे सतगुरु, तुम ही प्रान आधारे ॥
सतगुरु हम तो दीन अधीन सकल विधि, साई तुम रखवारे ॥
भव जल नाव पड़ी मझधारा, लीजो काढ़ किनारे ॥
भजन बन्दगी भक्ति न जानी, जियें तुम्हारे सहारे ॥
जब जब विपत कष्ट दुख पाया, तब तब तुमही संभारे ॥
मात पिता भाई सुत बन्धु, कोई नाहिं हमारे ॥
तुम समान रक्षक नहिं कोई, देखे हृदय बिचारे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हम सों पतित उद्धारे ॥
[11-781 ] रटन लगी गुरु नाम की छिन पल पल में टेका॥
क्रोध न व्यापे मोह न मोहे, चिन्ता नहीं कुछ काम की ||
छिन इन्द्री थकत गलत तन मन सब, अब सूझे विश्राम की ॥
छिन मुरत निरत ने अखियाँ फेरी, दृष्टि नहीं है चाम की ॥
छिन घट में नाम रतन जब पाया, फिकर नहीं धन धाम की ॥
छिन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी आठों याम की || छिन
[12-782] मेरा पल्ला न पकड़ोजी, गुरु का दास बना ॥टेक॥
सोबत जागत कबहुँ न विसरू, नाम तो जीवन साँस बना ।॥
मेरा मान मनी अपमान नहीं मन, दीन हीन ज्यों घाँस बना ॥
मेरा राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, आम नहीं अब खास बना ॥मेरा
[13-783 ] गुरु प्यारे ने दिया, मोहे भक्ति दान ॥टेक।॥
छूटी जग की छल चतुराई, छूटे मान अपमान ॥
गुरु. सत्त असत्त का भेद पिछाना, समझा ज्ञान अज्ञान ॥
गुरु0 काम क्रोध और लोभ ईर्षा, होय न इनसे हान ॥
गुरु0 प्रेम प्रीति का मारग पाया, खुली ज्ञान की खान ॥
गुरु0 राधास्वामी गुरु पर बलि बलि जाऊँ,वारू जान और प्रान॥
[14-784 ] गुरु की दया से बन्ध छुट जावे ॥टेक॥
मन से नाम जपे निस बासर, ध्यान गुरु के पद में लावे ॥
गुरु0 अनहद शब्द सुने घट अन्तर, सुरत निरत को अधर चढ़ावे ॥
गुरु छोड़ कुसंग सुसंग करे नित, सतसंगत में भक्ति कमाये ॥
गुरु राधास्वामी दया परख हिये अपने, जनम को सुफल करावे ॥
गुरु
[15-785 ] गुरु की महिमा अगम अपार, नित सतसंगत जाना हो ॥टेक॥
सुन सुन बचन प्रीति हिय बाढ़ी, भक्ति भाव कमाना हो ॥
गुरु0 श्रवण मनन और निध्यासन कर तब,उपजा सत का ज्ञाना हो॥
भेद भरम की दुर्मति त्यागी, मूल तत्व दरसाना हो॥
सत्त असत्त का निर्णय कीना, निश्चय कर मन माना हो ॥
यह तो लीला अद्भुत अचरज, जाने साधु सुजाना हो ॥
तन मन धन अरपे गुरू चरना, तिमिर मिटे अज्ञाना हो ॥
गुरू मेरे परमदयाल कृपाला, नाम दान दिया दाना हो ॥
दान पाये निरधनता भागी, भया ज्ञान धनवाना हो ॥
गुरू की मूरत गुरू की मूरत, यह दर्पन प्रगटाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पाया पद निरवाना हो ॥
[16-786 ] गुरु पद सीस झुकाई, साधु गुरू पद सीस झुकाई ॥टेक।॥
सीस झुकावत डहा मानगढ़, ममता मोह गिराई ॥साधु0
भय बिसरा दारुण दुख विसरे, यम भूला चतुराई ।॥साधु0
जनम जनम का सोया मनुवा, गुरू ने आन जगाई ॥ साधु0
सिर पर हाथ दया का फेरा, अपने चरन लगाई ॥साधु0
कबहु न त्यागू कबहुँ न छोड़, पद सरोज लिपटाई ॥ साधु0
पल पल ध्यान ज्ञान रहे निस दिन, छिन छिन गुरु गुन गाई॥
… गुरु मेरे जान प्रान से प्यारे, मूरत हिये में बसाई ॥ साधु0
सेवा करू नित्य हित चित से, गुरू को लेऊ रिझाई ॥
साधु0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भक्तिसार अब पाई॥साधु0
[ 17-787 ] गुरु शरणागत आओ, साधु गुरू शरणागत आओगटेक॥
बिन गुरु दया विवेक न मुझे, ज्ञान गुरु संग पाओ ॥ गुरु0
तज अनेक को एक लखो तुम, एक में चित ठराओ ॥ गुरु0
एक को त्यागो ज्ञान दृष्टि से, सत पद ध्यान जमाओ ।॥गरु0
सत में एक अनेक कहाँ है, भरम मोह बिसराओ ।॥गरु0
द्वत अद्वैत में भूल भरम है, चित से भरम मिटाओ ॥ गरु0
भरम मिटे तब सार लखे कोई, सतसंग भरम मिटाओ ॥गुरु0
सुरत शब्द का साधन सीखो, घट मे नाद बजाओ ॥ गुरु0
झलके ज्योति की अन्दर धारा, देख देख हरषाओ ॥ गुरु0
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पद सीस झुकाओ ॥गुरु0
[18-788 ] बनत बनत बन जाई साधु, बनत बनत बन जाई ।।टेका॥
टेक न छोड़ो मुंह नहीं मोड़ो, प्रेम डगर में आई ॥
साधु0 निस बासर रहे गुरु का सुमिरन, प्रीति की रीति दृढ़ाई ।॥
साधु0 सेवा भजन में ज्ञान ध्यान में, गुरु के चरन लव लाई ॥साधु0
[26-796 ] करलो गुरु का ध्यान, साधु करलो गरु का ध्यान ॥टेक।॥
अखियाँ उलट तमाशा देखें, तिल का लिये निशान ||
साधु तिल में ज्योत ज्योत में जगमग, ज्योत देख हरषान ॥
साधु पचरंगी फुलवारी निरखी, भंवरा ताहि लुभान ॥
साधु चिल्ला चढ़ाओ सुरत निरत का, तोड़ो शिव की कमान ।॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, ध्यान रहा मन मान ॥ साधु
[27-797 ] पारख शब्द विचारे, साधु पारख शब्द विचारे ।।टेक॥
जौहरी ज्यू हीरे को परखे, साधु शब्द निवारे ॥
साधु निरख परख चले घट के मारग, जाय द्वन्द से पारे ॥
साधु अपनी करनी पार उतरनी, कथनी सब तज डारे ॥
साधु रहनी से जो ध्यान लगावे, काल करम नहीं मारे ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहे गुरु के सहारे ॥ साधु
[28-798 ] गुरु गन पल पल गाओ, फकीरवा गुरु गन पल पल गाओगटेक।॥
भव दारुण से बहु दुख पाया, भया कलेजे घाव ॥
फकीरवा रोग सोग की गरु प औषधि, उन शरनागत जाव ॥
फकीरवा मानुष देह मिली किरपा से, फिर नहीं ऐसा दाव ॥
फकीरवा वृथा जन्म मत खो तू अपना, भक्ति पदारथ पाव ॥
फकीरवा गरु खेवटिया पार लगावें, मँझ पड़ी तेरी नाव ॥फकीरवा
कंचन देह को कुन्दन करले, दे भक्ति का ताव ॥
फकीरवा सतसंग चेत करो सतगुरु का, उपजे प्रेम का भाव ॥
फकीरवा राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पद सरोज चितलाव ।॥
[26-799 ] क्यों भरमा फकीर क्यों भरमा फकीर, काहे दिवाना होगया।टेक।॥
गुरू चरन गहा गुरू चरन गहा, ले ठौर ठिकाना होगया ।क्यों नहीं होय अकाज नहीं होय अकाज, यम फन्द कटाना होगया क्यों क्यों विकल रहे क्यों विकल रहे, अब तो मस्ताना होगया ॥
क्यों तन विमल हुआ तन विमल हुआ, गंगा स्नाना होगया क्यों सतसंग में आ सतसंग में आ, जप तप और ध्याना होगया क्यों क्या नियम धर्म क्या नियम धर्म, जब सत का ज्ञाना होगया क्यों नित नित का कर्म नित नित का कर्म राधास्वामी गुनगाना होगया ।॥
[30 800 ] नर रूपी सुगना सत्त नाम रौं बोल ॥टेका॥
कर्म ज्ञान के तेरे पंख हैं, उड़जा पर को खोल ।॥नर0
तन के पिंजरे से बाहर हो, घट मैदान में डोल ।॥नर0
घट में निस दिन अनहद बाजे, बीन बाँसुरी ढोल ॥ नर;
सुरत शब्द के गगन मंडल में, नहीं ममता का झोल ॥ नर0
चुग चुग गुरू वचनों का दाना, होजा अब अनमोल ॥ नर0
तज असार जो सार गहे फिर, तेरा मोल न तोल ॥ नर0
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुगना भया अतोल ॥ नर0
[31 801 ] भजले सतगुरू नाम, सदा ही भजले सतगुरू नाम ॥टेक॥
आनन्द दायक सर्व सहायक, भज भज आठों याम ॥
सदा ही0 भव भय गंजन दोष निकंदन, व्यापे क्रोध न काम ॥
सदा ही नाम बिना नर जीवन सब विधि, निष्फल और बेकाम ॥ संदा ही
नाम प्रताप काम से बाचे, दोनों नहीं एक ठाम ॥
सदा ही सुमिर मुभिर भज भज गुरु नामा, चल सत गुरू के धाम ॥
सदा ही माया मोह पर कर असबारी, दे दे मुंह में लगाम ॥
सदा ही राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सेवक हुआ बेदाम ॥ सदा ही
[32 802 ] सय्याँ बेदरदी रे मेरी सुध लेत नहीं ॥टेक।॥
मैं तो बिरह अग्नि तन जारू, मेरी और चित देत नहीं ।
सय्याँ तर तड़पू पिया तुम कारन, तुमको मुझसे हेत नहीं ॥
सय्याँ अखियाँ आँसू बहे जल धारा, तन मन धन को चेत नहीं ।।
सय्याँ दरस दिवानी को दरशन दीजे, सब कुछ लीजे संत नहीं ॥
सय्याँ भव निधि राधास्वामी नाम का बेड़ा, तरने को कोई सेत नहीं।
[33 803 ] हम जैसा बन आया, साधु हम जैसा बन आया ।टेका॥
रूप स्वरूप धरी नर मूरती, नर बन जीव चिताया ॥ साधु0
नर की रूप की शोभा भारी, नरतन महिमा गाया ॥
घर में प्रेम प्रीत सिखलाया, भक्ति का पन्थ चलाया ॥
सहज ही काटी यम की फाँसी, मरम अज्ञान मिटाया।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरू पद सीस मुकाया ॥
[34 804 ] सुमिर मधुर गुरु नाम, साधु सुमिर मधुर गुरु नाम ॥टेका॥
तीन लोक सब काल पसारा, चौथे पद बिसराम ||
साधु भूल चूक में भरमे पानी, भोगे नरक निकाम ॥
“धन सम्पत और कुल परिवारा, सरे न इनसे काम ॥
श्री गुरु पद में ध्यान लगाओ, भक्ति करो, निष्काम ॥
छिन छिन अवध घटत निस बासर, त्यागो लोभ मद काम ॥
अन्तर में नौवत धुन झड़ती, सुनलो आठों याम ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जाओ धुरपद धाम ॥
[35 805 ] सुरत प्यारी अधर धुर धाम चली ॥टेक।॥
मिला अभय बल गुरु कृपा से, अबला से अब हुई बली ॥
सुरत0 दया क्षमा की खङ्ग हाथ ले, हिंसा की तोड़ी पसली ॥
सुरत माथे झूमर भक्ति का पहना, प्रेम की डाली गले हसली ॥
सुरत माया ठगनी ठगत जगत को, ठगनी को ठगनी ठगली ॥
सुरत सहसकमल धस त्रिकुटी आई, सुन्न की गोद में जाय पली ॥
सुरत भंवरगुफा में काल को जीता, सताद उमंग सहित उछली ॥
सुरत अलख अगम राधास्वामी धाम चल, सतगुरु चरन कमल मचली।
[36 806 ] तुझे कभी न बिसारूँ रे गुरु दाता ॥टेक।॥
बड़े भाग से दर्शन पाया, सब तन मन धन बारूँ रे गुरुदाता ॥
तुझे जनम जनम रहे तेरी आसा, सकल वासना जारूँ रे गुरुदाता ॥
तुझे मैं तो तेरे चरन लग स्वामी, कुल कुटुम्ब भी तारूँ रे गुरुदावा ॥
तुझे गुरु की टेक बसालू चित में, काम क्रोध मद मारू रे गुरुदाता ॥
तुझे प्रगटे ज्योत नयन में मेरे, प्रेम दीप घट बारू रे गुरुदाता ॥
तुझे घट में ध्यान जमाऊँ गाढ़ा, तृष्णा मोह निकारू रे गुरुदाता ॥
तुझे राधास्वामी राधास्वामी नाम का सुमिरन,चरन सरोज पखारू रे गुरुदाता
[ 37 807 ] तेरे रूप लुभानी रे मन मोहना ॥टेक॥
तेरा रूप लगे अति प्यारा, केहि विधि करूँ बखानी ॥
रे मन रूप की महिमा अकथ कहानी, अलसाने मन बानी रे
मन निरखू छवि एक टक नयनन से, गति मति भई दिवानी ॥
रे मन आँख बिचारी जनम की गूंगी, बिन बोले ललचानी ॥
रे मन बानी बिचारी जन्म की अन्धी, बिन देखे न बखानी ॥
रे मन मन मन्धा बहरा और गूगा, सोच समझ मन मानी गरे मन
बुद्धि विवेकी अटपट वाली, भूल भरम भरमानी रे मन
मोहना रूप अरूप स्वरूप एक हैं, अगुन सगुन की खानी ॥
निराकार साकार है क्या है, समझे कोई नर ज्ञानी ॥
रूप निरख घर परबत बन में, फिरू सदा मस्तानी ॥
योगी योग कर क्या फल पाया, ज्ञान कथे बहु ज्ञानी ॥
राधास्वामी रूप सुहाना लागा, तत्व विवेक निशानी ॥
[38 808 ] गुरु के रंग मदमाती रे गुजरिया ॥टेक॥
गुरु के चरन कमल में लग लग, मंद मंद मुस्काती रे
गुजरिया प्रेम पियाला पिया तो होगई, मतवारी मदमाती ॥
सुमिरन भजन ध्यान में रहती, पल पल और दिन राती ॥
दीपक ज्ञान हृदय में बारा, पूर प्रेम की बाती ॥
अमृत नाम बद जब पाया, हित चित से तप्ताती ॥
दुख दारुण का तागा तोड़ा, अब तो फिरे मगनाती ॥
राधास्वामी धाम में बासा पाया, अब कहीं आती न जाती।
[ 36 809 ] घट प्रगट शब्द की धुन, कानों क्यों न सुने ।।टेका॥
घंटा शंख बजे तेरे अन्तर, सुरत लगा कर मुन ।कानों
क्यों0 बाजे बीन पखावज बंसी, सुन गह शब्द का गुन ॥
भौतिक शब्द में चित न लगाना, गुरु के बताये चुन ॥
शब्द सुने जो नित प्रति घट में, चढ़ बैठे महासुन्न ॥
राधास्वामी दया से काज बनाले, भक्ति का बाना बुन ।॥
[40 810] नाम सुमिर तरजाना, भवनिधि नाम सुमिर तर जाना टेका
यह संसार बिपत की खानी, व्याप रहा दुख नाना ।॥
भवनिधि0 पार जो चाहो इसके जाना, नाम का सेत बनाना ॥
नाम से योग भक्ति का सारा, साधन सुगम सुहाना भवनिधि
सुमिरन सहज सहज है जपना, नाम से लव को लगाना ॥
, राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, नाम की भक्ति कमाना ।।,
[ 41 811 ] साधु साधन सहज करीजे ॥टेक।॥
बिन साधन कुछ हाथ न आवे, साधन भरम सुनी जे ॥
साधु0 जग व्यौहार न हो बिन साधन, परमारथ न बनीजे ॥
संस्कार और कर्म की लीला, फल के रूप पतीजे ॥
जैसी करनी वैसी भरनी, करनी सहित भरीजे ॥
कथनी बदनी काम न आवे, करनी को चित दीजे ॥
माना रूप प्राप्त है अपना, भर्म प्रभाव भुलीजे ॥
बिन साधन यह भर्म न जावे, साधन भर्म मिटीजे ॥
साधन सहज है शब्द योग का, उसकी रीति सिखीजे ॥
मन का मैल विकार मिटे जब, तब निज रूप लखीजे ॥
सहज ही सहज कमाई करना, भव जल पार चलीजे ॥
राधास्वामी की कृपा से, कारज सुफल करीजे ॥
[42 812 ] मंगल गुरु के चरन कमल में, मंगल साज सजाओ ॥टेका॥
सुमिरन भजन ध्यान रहे छिन छिन, सुरत निरत ठेराओ ॥
मंगल अन्तर में लख गुरु की मूरत, ज्योत में ज्योत मिलाओ ॥
मंगल ज्योत अपार देह है घट में, ज्योत निरख हरषाओ॥
मंगल अनहद शब्द गूज रहा अंतर, सुन सुन चित्त लगाओ ॥
मंगल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, धुरपद बासा पाओ ॥ मंगल
[ 43 813 ] चल कीजे गुरु संगत, जहाँ प्रेम अमी जल बरसे ॥टेक॥
जो पावे गुरु पद भक्ति, यम फंद कटावे जरसे ॥
जेहि मिले नाम की दौलत, निरधनता से नहीं तरसे ॥
चल भव भय की रहे न चिन्ता, गुरु चरन कमल के परसे ॥
चल मद मोह काम दल भागे, भक्ति श्रद्धा के डर से ॥
चल राधास्वामी धुरपद सत पद, सतसंग के फल से दर से ॥ चल
[ 44 814 ] गुरु समरथ दाता तारेंगे, गुरु समरथ ।टेक।॥
मन में सोच करे क्यों मूरख, बिगड़ी तेरी सुधारेंगे ॥
गुरु0 भूल चूक की चिंता क्यों है, करनी तेरी बिसारेंगे ॥
गोते खाते बहु दिन बीते, भव जल पार उतारेंगे ॥
दृष्टि नहीं तेरे करतब पर, अपनी ओर निहारंगे ॥
राधास्वामी शरन में जो नहीं आये, जीती बाजी हारेंगे॥
[ 45 815 ] मेरी सुन्दर नार सुहेली, पिया को रिझाले तू ॥टेक।॥
तेरा प्रीतम तेरे घट में, सुन्दर सेज बिछाले तू मेरी0
देख देख छवि अद्भुत पी की, प्रेम भाव उमगाले तू मेरी
गावत सुरत अनाहद मंगल, गाय गाय हरषाले तू ॥
मेरी शब्द गूंज घट में सुन प्यारी, अनहद नाद बजाले तू मेरी
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, जनम को मुफल कराले तू ॥
[46 816 ] साधु सहज साधन कीजे ॥टेक॥
कठिनाई का काम नहीं है, नाम न वा का लीजे ॥
साधु0 सहज ही सहज चढ़ी घट ऊपर, अमी नाम जल पीजे ॥
ब्रह्म सोचना और बढ़ना है, मुझ से अर्थ सुनीजे ॥
सोच सोच बढ़ते चलो पल पल, पग आगे को दीजे ॥
सतगुरु शब्द का सार परख कर, गुरु की बात पतीजे ॥
जो कुछ होगा सहज में होगा, कठिन काम नहिं कीजे ॥
साधु0 राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु नाम जपीजे ॥
[ 47 817 ] सुरत मेरी जागरी, तज नींद विकार टेक॥
कब लग सोवे मोह निशा में, मानुष जनम न बारम्बार ।॥
सुरत तरुवर से ज्यों पात झड़त है, फिर नहीं लागे डार ॥
सुरत तैसे ही यह अवसर प्रानी, फिर नहीं मिले गवार ।॥
सुरत चेत चेत सुध कर कुछ घरकी, रहन यहाँ दिन चार ॥
सुरत राधास्वामी दया काज कर अपना, कर मन सोच विचार ॥ सुरत
[48 818 ] राधास्वामी हैं रखवारे तेरे, राधास्वामी है रखवारे ॥टेका॥
छिन छिन प्रति छिन चित चरनन पर, रह सतगुरु के सहारे ॥
तेरे दया मौज की निरख परख कर, भज गुरु साँझ सकारे ।॥
तेरे भव सागर एक अगम पन्थ है, नाव पड़ी मझधारे ॥
तेरे खेवटिया गुरू पूरा पाया, पहुँची आन किनारे ॥
तेरे वह दयाल आपहि तोहि पोसें, क्यों तू होत दुखारे ॥
तेरे सुमिरन भजन ध्यान कर बन्दे, गुरू के चरन अधारे ॥
तेरे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चरन कमल में आ रे ॥ तेरे
[46 819 ] छाई अँधियारी भारी हो, कुछ नजर न आवे ॥टेक॥
काल करम के फाँस फसाना, यम की लगी कटारी हो ।कुछ0
राह न सूझे गैल न बूझे, इत उत बाट निहारी हो ॥
कुछ भूल भरम मे धोका खाया, कैसी दशा हमारी हो ।।
कुछ माया ममता से हित जोड़ा, तिरिया लागी प्यारी हो ॥
कुछ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सब से होगई न्यारी हो ।कुछ
50 820 ] मिला ओम् स्थान, साधु मिला ओम् स्थान ।।टेक॥
सूरज लाल लाल रंग बाना, लाल रंग दरसान ॥
साधु0 बाजत घोर मृदंग पखावज, ओम् ओम् धुन गान ॥
ब्रह्मा बैठ वेद समझावे, चौमुख भेद लखान ॥
त्रिकुटी चढ़ लंका गढ़ तोड़ा, घर सीता का ध्यान ।॥
, मेघनाद जहाँ गरज सुनावे, सामवेद मचान ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने बख्शा ज्ञान ॥
51 821 ] भजले गुरु अविनासी प्यारे, भजले गुरु अविनासी ॥टेक।॥
गुरु का सुमिरन भजन ध्यान कर, गुरु आनन्द सुखरासी ॥
प्यारे गुरु माया से आन छुड़ावें, गुरु काटें यम फाँसी ॥
प्यारे गुरु की दया अविद्या भागे, घट में सूर प्रकासी ॥
प्यारे मिटा अंधेरा भया सवेरा, चहुँ दिस छाई उजासी ॥
प्यारे गुरू महिमा हित चित में बसाले, होजा गुरु की दासी ॥
प्यारे गुरू पर बलि बलि जा निसि बासर, मोह कपट छल जासी ॥
प्यारे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मन भया सहज उदासी ॥ प्यारे
[ 52 822 ] __ रटन लागी मेरे हिया जिया से, पार लगादो साँवरिया ॥टेक॥
भवसागर एक अगम पन्थ है, बूड़त मेरी नावरिया ॥
रटन0 नाव पुरानी बहत बयारा, बीच में पड़ गई भाँवरिया ॥
रटन बरसत मेह अखंडित धारा, भारी बोझ भई काँवरिया ॥
रटन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेतगई सुरत गाँवरिया ॥ रटन
[53 823 ] जनम जुआ मत हार, भाई जनम जुआ मत हार ॥टेक॥
जब तू आया गुरू शरणागत, फिर क्यों सोच विचार ॥ भाई
तेरा काम करें किरपा से, मेटें भरम विकार ॥
भाई संस्कार अधिकार बढ़े जब, मिला परमारथ सार ॥
भाई प्रीति प्रतीति के मग में पग दे, तज संशय मोह विकार |
भाई सुमिरन भजन ध्यान कर चित दे, साधारण व्यौहार ॥
भाई सुगम सहज है शब्द का साधन, सतगुरु के आधार ॥
भाई राधास्वामी परम दयाला, नित तेरे रखवार ॥ भाई
[54 824 ] अमर फल बिरला गुरुमुख खाये ।टेक॥
अमरापुर में डेरा डाले, अमृत पी पी कर तुप्ताये ॥
अमरफल जिये न मरे न जग में आये, आवागमन के फन्द कटाये ॥
करम करे और बने न कर्ता, अहंभाव चित में नहीं लाये ।॥
बन्ध निबन्ध न मुक्त अमुक्ति, इसकी महिमा बरन न जाये ॥
हद बेहद दोनों से न्यारा, अगम अलख में बासा पाये ॥
बसे खिसे नहीं सगुन न निर्गुन, कोई कैसे कह समझाये ॥
रूप रंग रेखा नहीं उसमें, नाम अनाम का भेद मिटाये ॥
ऐसा गुरूमुख गुरु का प्यारा, बिन बानी नित गुरूगुन गाये॥
राधास्वामी दयापात्र सोई साँचा,साँच भूठ का भरम नसाये ॥
[55 825 ] काहे करे उत्पात, मनुआ काहे करे उत्पात ॥टेका॥
चरन में गुरू के चित्त लगादे, सिर पर उनका हाथ ॥
मनुआ0 तेरा बल कुछ काम न आवे, गुरू समरथ है साथ ॥
मनुआ तज चिंता दुविधा दुचिताई, बचा काल की घात ॥
मनुआ सुमिरन भजन ध्यान हो नित ही, यह कर तू दिनरात ॥
मनुआ चरन शरन में लगजा भाई, वहीं गहें तेरा हाथ ॥
मनुआ राधास्वामी सच्चे सहाई, वहीं हैं जग के नाथ ॥ मनुआ
[ 56 826 ] कहाँ तुझे पाऊँ रे मनमोहना मैं कहाँ तुझे पाऊँ ।टेका॥
घर घर बन बन देखा भाला, अब कहाँ मैं जाऊँ ॥
रे मनमोहना मेरी विपत की अकथ कहानी, किसको बीती सुनाऊँ॥
हार गई और थककर बैठी, अब कहीं जाऊँ न आऊँ॥
आना हो तो आपही आजा, सौ सौ बार मनाऊँ॥
, मेरे घट में लगन लगी है, घट ही में खींच बुलाऊँ ॥
घट के भीतर दरस दिखादे, दुख क्लेश विसराऊँ॥
घट का मन्दिर पड़ा है सूना, तू मिल जाय बसाऊँ॥
आरत साजू प्रेम भक्ति की, घन्टा शंख बजाऊँ॥
आनन्द मंगल चहुँदिश ब्यापे, आनन्द धुन नित गाऊँ॥
तिल पट मध्ये सेज पिछाऊँ, पलकों की चिकलाऊँ ॥
नहीं मैं देखू और किसी को, नयनों में तुझे छुपाऊँ॥
मैं तेरी और तू है मेरा, तुझ ही से नेह लगाऊँ॥
, राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, हिया जिया अब उमगाऊ
[57 827 ] | गुरुदाता ने सार समझा दिया ॥टेक॥
सहस कमलदल सहस रूप का, भेद भाव दिखला दिया ॥
गुरू0 त्रिकुटी त्रिकुटी ओंकार का, सच्चा अर्थ बता दिया ॥
सुन्न द्वत अद्वत महासुन्न, दोनों पद दरसा दिया ।
सोहंग भंवर काल माया गति, अपनी दया समझा दिया ॥
सत पद निज पद धुर पद सच्चा, अपनी कृपा पहुँचा दिया॥
अलख अनाम अगम राधास्वामी, सबका सब लखवा दिया ॥
तत्व में वाच लक्ष को जाना, जाना जान जना दिया ॥
भूल भरम भ्रान्ती नहीं मन में, मुझको शान्त बना दिया ॥
राधास्वामी नाम व्याप रहा मन में, निकट जो आया सुना दिया
[ 433
[58 828 ] मेरे मन में आजा सँवलिया, मेरे मन में आजा ॥टेक।॥
मन में आजा मन में समाजा, मन में रूप दिखाजा |सँवलिया
मन में ज्योत जगे दिन राती, जगमग ज्योति जगाजा ॥
सवालिया मन में स्तुति तेरी गाऊ, प्रेम की धूम मचाजा संवलिया मन में
घन्टा मृदंग बाजे, अनहद नाद सुनाजा सिबलिया मन मन्दिर में
डालके चौकी, सोया मनुआ जगाजा ॥
सवलिया मन में भोग लगाऊँ तेरा, सीत प्रसाद खिलाजा ॥
सवालिया मन का घाट है भारी भारी, दसवाँ द्वार खुलाजा ॥
सवलिया राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चरणामृत पिलाजा |सँवलिया
[56 829 ] तेरी गुदड़ी में लाल टका, क्यों नहीं नजर करे ॥टेका॥
बगल में लड़का शहर ढिंढोरा, मूरख भरम मरे ॥
क्यों नहीं हिरन के नाम रहे कस्तूरी, बन बन भटक फिरे ॥
मानुष तन में साहेब बसता, नर पाखान लखे ॥
बिन सतगुरु सब धोका खाया, कैसे कोई समझे ॥
राधास्वामी गुरु जब जीव चेतावें, तब भव सिंध तरे ॥
[60 830 ] निस दिन सत्त नाम धुन माते ॥टेका॥
जब से हृदय पड़ी गुरु मूरत, मन फूले न समाते ॥
जब सेवा भजन बन्दगी करते, कहीं आते नहीं जाते ॥
जब घट में राग रागनी सुनते, अनहद तूर बजाते ।॥
जब प्रेम पियाला पिया मस्त हो, छिन छिन गुरु गुन गाते ॥
जब नहीं अभिमान काम मद मोहा, सबको दूर भगाते ॥
जब राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पर बलि बलि जाते ॥
[61 831 ] मुझे अद्भुत रूप दिखादो जी ॥टेक।॥
प्रेम दिवानी भई मस्तानी, चरन कमल से लगा दीजो जी ॥
मुझे0 तन मन धन सब तुम पर वारूं, जनम को सुफल करा दीजो जी॥
बिरह अगन मेरा तन मन जारे, तपन की आग बुझा दीजो जी ॥
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा, हिया की पीर मिटा दीजो जी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अमी का प्याला पिला दीजो जी ॥
[62 832 ] रमैय्या तेरे रूप लुभानी रे ॥टेक॥
शोभा देख अनूप अगोचर, मन्द मन्द मुस्कानी रे ॥
रमैय्या तिरछी चितवन नैना रसीले, देख देख हर्षानी रे॥
बाँका सजीला रंगीला रमैय्या, लोभी मन कर्म बानी रे ॥
हिया जिया में मेरे बसा मोहना, ताहि के रंग रंगानी रे ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु चरनन लपटानी रे॥
[63 833 ] रसना प्रेम स्वाद अति मीठा ॥टेक॥
विषय भोग रस कड़वा लागे, त्याग जगत दे पीठा ॥
रसना0 भव भय से तोहि प्रेम छुड़ावे, करे निरन्तर ढीठा ॥
रसना राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रीति रीति में दीठा ॥ रसना
[64 834 ] तुझ बिन कोई नहीं अपना ॥टेक॥
तुझको सुमिरू तुझको ध्याऊँ, तेरे नाम का है जपना ॥
तुझ0 तेरी दया से सतगुरु प्यारे, तीन ताप का मिटे ताना ॥
तुझ तू है सच्चा अन्तरयामी, तेरे सिवा सब है सपना ॥
तुझ मेरे अन्तर दर्शन देदे, मन का खुले आज ढकना ॥
तुझ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भव के भय से न हो कपना ॥
[65 835 ] घट अद्भुत बाजे बाज रहे ।टेक।॥
पाजत बीन सितार बाँसुरी, घन्टा शंख धुन गाज रहे ॥
घट0 किंगरी ढोल मृदंग पखावज, अनहद शब्द समाज रहे ।॥
घट सुन सुन धुन सुरत हुई मस्तानी, प्रेम प्रीति का साज रहे ॥
घट शब्द सुनत मन अति हर्षाना, काम क्रोध मद भाज रहे ॥
घट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सूर चन्द्र दोऊ लाज रहे ॥
घट
[66 836 ] मैं तो प्रेम दिवानी होगई ॥टेक॥
रूप अनूप देख छवि अद्भुत, लो मस्तानी होगई ॥
मैं तो0 दुख दारुण की चिंता मेटी; चित हर्षानी होगई ॥
मैं तो माया काल के बन्धन काटे, अगम निशानी होगई ।॥
मैं तो राग द्वष से काम न रंचक, दर गिलानी होगई ।॥
मैं तो राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सहज निर्वानी होगई॥मैं तो
[67 837 ] गुरु तेरी शरन में आगया ॥टेक॥
दीन अधीन कुटिल खल कामी, परमारथ धन पागया ॥
गुरु0 दीनानाथ दीन हितकारी, मन में मेरे समा गया ॥
देखा रूप अरूप अगोचर, हित चित से सो भागया ॥
बन्धन छूटे मोह मया से, काल भी धोखा खागया ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरुगम बानी सुनागया ॥
[68 838 ] अन्तर सतगुरु की प्रीति बसी ॥टेक॥
अन्तर देखा रूप अनूपा, गुरू छवि देख हसी ॥
अन्तर अन्तर सुनी अनाहद बानी, बाहर से अन्तः खिसी ।॥
अन्तर अन्तर सहस कमल पद परसा, त्रिकुटी जाय धसी ॥ अन्तर
अन्तर का अन्तर जब निरखा, सुख आनन्द लसी ॥
अन्तर राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रहूँ न जगत फंसी ॥ अन्तर
[6९ 839 ॥हमारे मन सतगुरु प्रीति बसी ।।टेक।॥
प्रीति की राह चली तब सूरत, माया देख खिसी ॥
हमारे देख देख लीला घट अपने, मन में बहुत हँसी ॥
हमारे बाहर के पट बन्द भये जब, अन्तर माहिं धसी ॥
हमारे सुरत नवेली भई अलबेली, भूषण प्रेम लसी ॥
हमारे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अब तो बने तपसी ॥ हमारे
[70 840 ] बख्शा गुरु ने प्रेम पियाला ॥टेक।॥
ताहि पिया हित चित से जब ही, हुआ निपट मतवाला ॥
बख्शा मस्ती छाई रंग जमा है, अब क्या करहि है काला॥
इस मस्ती को क्या कोई जाने, निकला करम दिवाला ॥
तिमिर विनासक भव भय नासक, घट भीतर भान उजाला ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, फेलं गुरु की माला ॥
[71 841 ] घट में भानु खिला ॥टेक॥
रैन अंधेरी दूर भई जब, ज्ञान का सार मिला ॥
घट जोति जो फैली हट गई झाँई, सूझा फटक शिला ॥
घट अपनी सृष्टि दृष्टि गत निरखी, भव का नींव हिला ॥
घट आवागवन का संशय छूटा, माया का बिनसा फिला ॥
घट राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, रन की भूमि पिला ॥ घट
[72 842 ] दिल की सब दुर्मति दूर भई ॥टेक॥
भव का भय जब त्यागा छिन में, कायर से अब सूर भई दिल
क्या माँगू कुछ चित न रहाई, सकल कामना पूर भई ॥
दिल0 मान की दपेनी पटक दिया है, ठेस लगी तब चूर भई ॥
दिल माया की सामग्री सारी, मेरी दृष्टि में धूर भई ॥
दिल राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सतगुरु चरनन धूर भई ॥ दिल
[73 843 ] गुरु की अभिमानी हो गई ॥टेक॥
चाह मिटी चिन्ता दुख भागा, घट मगनानी हो गई ॥
गुरु0 तीरथ बरत नेम नहिं संयम, सतगुरु की दिवानी हो गई ॥
बन्धन काटा द्वन्द जगत का, सुरत सियानी हो गई ॥
त्याग मान मोह मद सबका, अब तो निरबानी हो गई ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, चेरी मन बानी हो गई ॥
[74 844 ] मेरे उर सतगुरु रूप बसा ॥टेक॥
देखा रूप अनूप तुम्हारा, हिया जिय हर्ष हँसा ॥
मेरे0 चिंता चित की दूर भई सब, मन आनन्द लसा ।॥
मेरे अन्तर प्रगटी ज्योति निरंतर, तिमिर विकार नसा ।॥
मेरे बाहर के पट दे दे पल पल, घट ही माँहि धंसा ॥
मेरे राधास्वामी मोह के बन्धन काटे, अब कहाँ रहा फंसा ॥ मेरे
[75 845 ] माया से न्यारी हो गई ।।टेक॥
काम क्रोध की चिन्ता बिसरी, गुरु मतवारी हो गई ॥
माया0 जगत का प्रेम भाव सब भूला, सतगुरु की प्यारी हो गई॥
माया आना जाना मिटा योनि का, धुर पद की त्यारी हो गई ॥
माया अब कैसे बन्धन में आऊ, यम की रखवारी हो गई॥
माया राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुरत शब्द संवारी हो गई ॥
[ 76 846 ] कहत न आवे बैन ॥टेक
कल नहीं पड़े विकल रहे तन मन, रात दिवस नहीं चैन ॥
कहत दर्शन की इच्छा घट छाई, नहीं कुछ लेन न देन ॥
कहत आँखों में भाई पड़ आई, रहत नाम दिन रैन ॥
कहत राधास्वामी खुलकर भेद बताओ, समझ न आवे सेन ॥ कहत
[77 847 ] मन लागत लागत लागा ॥टेक॥
सोया मनुआ जनम जनम का, जागत जागत जागा ॥
मन0 पहले तो यह भव में बहु भरमा, भरम देख अब भागा ॥
मन विषयों को तजकर अभिमानी, भक्ति भाव में पागा ।॥
मन संसारी से हुआ है सारी, हंसा बन गया कागा ॥
मन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, उपजा दृढ़ अनुरागा ॥ मन
78 848] सोच करे क्यों मन में ॥टेक॥
समरथ सतगुरु दीन दयाला, रक्षक घर और बन में ॥
सोच0 निरखो छिन छिन गरु की मूरत, अपने मन दरपन में ॥
सोच तिलके भीतर गरु विराजे, देखो अपने तन में ॥
सोच नैनों में तेरी साँवली सूरत, लागे चित दरशन में ||
सोच सोवत जागत ताड़ी लागी, रहो तुम इसी यतन में ॥
सोच पल पल सोधो नाम रसायन, सुमिरन ध्यान भजन में ॥
सोच बचन बिलास पाठ और पूजा, सब हो श्रवण मनन में ॥
सोच सूरा नाम फकीर ने धारा, लड़े काल के रन में ॥
सोच काम क्रोध मद मस्तक फोड़े, उदासीन रहे तन में ॥
सोच किसकी सोच करे नर बौरे, गुरु प्रगट निज जन में ॥
सोच राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु मिले याही पन में ॥ सोच
[7९ 849 ] सजनी चल सतगुरु के देस टेक।॥
यह तो सब ही काल पसारा, आये परे परदेस ॥
सजनी0 माया मोह की दुर्गम घाटी, भूल भरम का देस ।॥
सजनी वह तो देस अनूप अगम है, जहाँ न काल कलेश ॥
सजनी दुख सुख चिंता कभी न व्यापे, यह गुरु का उपदेस ॥
सजनी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुन लिया सार संदेस ॥
[80 850 ] मौज से होगा सारा काम ॥टेका॥
तू क्या सोचे क्या मन ठाने, सोच समझ बेकाम ॥
मौज प्रीति दृढ़ा प्रतीत बढ़ाये, भज गुरु आठों याम ॥
मौज सुख दुख भूल भरम की लीला, भरमे नहीं मिसराम ॥
मौज जग की चाह महा उत्पाती, भज ले गुरु का नाम ॥
मौज राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु ने बख्शा अचल मुकाम ॥मौज
[81 851 ] अन्त समय क्यों रोया है ।।टेक।॥
मानुष देह की जानी महिमा, सुख निन्द्रा में सोया है ॥
अन्त उठ उठ उठकर गुरु की संगत, जो सोया है सो खोया है ॥
अन्त प्रीतम बसते हिय बिच तेरे, दूध माँहि ज्यों खोया है ॥
अन्त अपनी करनी पार उतरनी, फल पाया जो बोया है ॥
अन्त राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, अमी चूद मन धोया है ।॥अन्त
[82 852 ] सतगुरु राजों के महाराजा ॥टेक॥
तुम्हरे महल में नौवत झड़ती, बाजे अनहद बाजा ॥
सतगुरु धन दौलत का कौन ठिकाना, दल बादल रहे साजा ॥
सुरत निरत जहाँ पानी भरते, शब्द हुकम करे काजा ॥
ईश्वर ब्रह्मा तुम्हारे सेवक, कोटि काम छबि लाजा ॥ सतगुरु0
शेष महेश गनेश शारद, जुड़ा जनन का समाजा ॥
, वेद भेद जाने नहीं ब्रह्मा, तुम हो सबमें विराजा ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, प्रगटे जन के काजा ॥
[83 853 ] सुरत प्यारी दुख से क्यों घबराये ।।टेका॥
तेरे अन्तर कूप अमीरस, क्यों नहीं पी तृप्ताये ॥
सुरत नाम निशान प्रगट घट भीतर, निस दिन रटन लगाये ॥
सुरत सुमिरन भजन ध्यान नित करना, नामे मत अलसाये ॥
सुरत जब दुख संकट आय पड़े सिर, गरु चरनन लिपटाये ॥
सुरत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, भवदुख सब मिटजाये |सुरत
[84 854 ] साधु मन की गति अति न्यारी ॥टेक।॥
ज्ञान ध्यान में कबहुँ सियाना, कबहुँ अझ अनारी ॥
साधु0 कबहुँ गगन मंडल बिच धावे, कबहुँ सिंधु मझारी साधु
पल में त्यागी जोग विरागी, पल ही में संसारी साधु
चंचल निश्चल कामी अकामी, राजा रंक भिखारी साधु
मन की सूझ समझ जब आई, राधास्वामी की बलिहारीसाधु
[85 855 ] मन तु काहे दिवाना हुआ ॥टेक।॥
मरकट मूठी भरम बन्धाया, ज्यों चरखी का सुआ ॥
मन0 अपनी प्रतिमा देख डराना, गज लड़ लड़ कर मुआ॥
मन नीचे दृष्टि करे क्यों मूरख, नीचे भरम का कुआ॥
मन गिरत पड़त कुछ देर न लागे, नहीं तहाँ माल पुआ ॥
मन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, फेंक गले का जुआ ॥ मन
[86 856 ] सुरत प्यारी चल सतगुरु के देस ॥टेक॥
अगम में ठौर ठिकाना तेरा, आन पड़ी परदेस ॥
सुरत0 काग दृष्टि तज विष्टा त्यागे, ले अब हंसा भेस ॥
सुरत सुख का धाम प्रेम जहाँ व्यापा, वहाँ कहाँ काम कलेस ॥
सुरत निरवानी धुरपद घर तेरा, माया नहीं लव लेस ॥
सुरत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,सुन लिया गुरु उपदेश ।।सुरत
[87 857 ] काहे बौराना हाय फकीरवा ।।टेक॥
तेरे घट में माल खजाना, भया दिवाना हाय फकीरवा ॥
काहे जाकी चाह में खोजत डोले, मन में समाना हाय फकीरवा ॥
काहे तीरथ बरत सभी तेरे भीतर, नहीं कहीं जाना हाय फकीरवा ।॥
काहे राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, नित गुन गाना हाय फकीरवा ।॥
[88 858] वह फकीर है साँचा ॥टेक॥
प्रेम प्रीति गले कफनी डाले, उमंग उमॅग कर नाचा ॥
वह0 विषय भोग की चाह न मन में, गुरु चरनन में राचा ।॥
वह लोभ मोह तृष्णा के कारण, जगत न कबहुँ जाँचा ॥
वह दर दर भक्ति को माँगत डोले, सो मारग में काँचा ॥
वह राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काट फंद यम बाँचा॥वह
[86 859 ] रे मन आज सुमिर गुरु नाम ॥टेका॥
क्या जाने क्या होयेगा पल में, सदा नहीं विश्राम ॥
रे मन0 माया मोह में भूला निसदिन, व्यापा मोह और काम ।॥
रे मन सावधान होय सुन गुरु बानी, तजदे मोह और काम ॥रे मन
काल करम की गति है न्यारी, भक्ति करे निष्काम ॥
रे मन राधास्वामी मूरत बसी हिये में, गुरु भजो आठों याम ॥रे मन
[60 860 ] __सैय्या बेदरदी दरस दिखा ॥टेक॥
स्वाँती बंद ज्यों रटत पपीहा, सहे निरन्तर कष्ट महा ॥
सेथ्याँ चित चकोर को चन्द्र पियारा, अब तो तेरा चरन गहा ।॥
सैंय्याँ मैं कमला तू सूर प्रकाशी, तेरी शरन में आन पड़ा ॥
सैंय्याँ तू समुद्र मैं तेरी लहरिया, सिंधु बुन्द तज कहाँ रहा ॥
सैंय्याँ राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सबकी त्यागी मोहुमया ॥
[ 61 861 ] तड़प रहा जिया मोर ।।टेक॥
काल और करम से जीतू केहि विधि, नहीं चले कुछ जोर ॥
तड़प0 पूँजी खोई सकल गँवाया, जित देखू तित चोर ॥
तड़प चित में काम क्रोध की रेखा, जैसे बन का मोर ॥
तड़प रात विरह की बहुत कठिन है, सोवत होगया भोर ॥
तड़प केहि विधि दर्शन पाऊँ तुम्हारा, करता नित उठ शोर ॥
तड़प तड़प तड़प तड़पू बिरहा दुख, दुख व्यापा चहुँ ओर ।॥
तड़प राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मिले मोहि बन्दी छोर ॥ तड़प
[62 862 ] बाँसुरी बाजी मधुवन में ॥टेक॥
या बंसी का राग तान सुन, सुध बुध भूली मन में ॥
बाँसुरी0 आपा बिसरो आप बिसारियो, ध्यान नहीं कुछ तन में ॥
बाँसुरी ज्ञानी ज्ञान रंग मतवारो, योगी भागे बन में ॥
बाँसुरी भूले भटके राह न पाई, उलझे लाख जतन में ॥
बॉसुरी गोपी गोप गोप में भूले, भक्ति रही नहीं मन में ॥ बाँसुरी
शिव सनकादिक मर्म न जाना, सार है नाम रतन में ॥
बाँसुरी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, सुनली अनहद धुन में ॥ बाँसुरी
863 साधु गुरु का रूप लखाऊँ ।टेक॥
जो कोई आवे मेरी सभा में, गुरु का रूप लखाऊँ ॥
साधु0 सत रज तम के हर से बाहर, गुरु मूरति दरसाऊ॥
साधु निर्गुन सगुन देह नहीं जाके, अद्भुत भेद जताऊँ ॥
साधु हाड़ मॉस नाड़ी नहीं जाके, वाके रूप न नाऊ ॥
साधु सबका सबमें सबसे न्यारा, मरम विचित्र जताऊ ।॥
साधु रूप अरूप स्वरूप अनूपा, निराकार ठहराऊ ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, पल पल गुरु गुन गाऊ॥
[64 864 ] तिरछी नजरिया माया ने मारा टेका॥
भव भरमाने रूप लुभाने, भटके बारम्बारा ॥
तिरछी0 ममता मोह में आन फंसाने, ठिठके सब नौ द्वारा ॥
तिरछी घायल हुये दुचिताई आई, सूझे वार न पारा ॥
तिरछी हिया जिया तड़फे कल नहीं आवे, कोई न देत सहारा ।॥
तिरछी राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, होगये भव जल पारा॥
[65 865 ] सब माया का खेल ॥
टेका यह ब्रह्माण्ड माया का अण्डा, जैसे बन की बेल ॥
सब0 वृक्ष में बीज बीज में अखुआ, खूब मिला है मेल ।॥
सब जड़ में चेतन बसे निरन्तर, ज्यों तिल माही तेल ।॥
सब मन माया दोऊ भये शिकारी, मारे जीव गुलेल ॥
सब राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, नहीं अब रहा दबेल ॥ सब
[66 866 ] मेरी बीती उमरिया भजन बिना ॥टेक।॥
पन्थ में आय बने पन्थाई, सूझी न डगरिया भजन बिना ॥
मेरी0 भक्ति का सौदा नहीं कीना, बन्द बजरिया भजन बिना ॥
मेरी0 मन हुआ टूक करेजा फाटे, माया की नजरिया भजन बिना ॥
मेरी0 अबहूँ सोच समझ अज्ञानी, जा गुरु की सेजरिया भजन बिना ॥
राधास्वामी चरन की ओट पकडले, नाम बिसरिया भजन बिना ॥
[67 867 ] निष्फल सब धन्धा भजन बिना ॥टेक॥
जप तप किरिया करम धरम से, कटे न फन्दा भजन बिना निष्फल
ज्ञान ध्यान से काम न निकले, डोले नर अंधा भजन बिना ॥
जो कोई पोथी पत्रा सोधे, बन्धे का बन्धा भजन बिना ॥
राधास्वामी प्रीति न मन में उपजी, सुमति का मन्दा भजन बिना ॥
[68 868 ] भजन बिना अबसर बीता जात ।।टेका॥
नर देही की सार न जानी, चित नहीं गुरू बसात ॥
भजन सुख निद्रा में रात गवाई, दिवस गवाया खात ॥
भजन देखत देखत बिनसेंगे सब, ज्यों तारा परभात ।॥
भजन अवसर पाय न चेते प्रानी, अन्त सहे यम लात ॥
भजन राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु यह भेद बतात ॥ भजन
[88 869 तेरे घट में बोले कौन ॥टेक॥
मिट्टी है जल है कि अग्नी, है आकास या पौन ॥
तेरे0 बोली बोले मधुरी कोमल, छिन भर भी नहीं मौन ॥
तेरे तेरा रूप वही है सच्चा, जो वह है तू तौन ॥
तेरे नीचे पता न पायेगा उसका, ऊँचे चढ़कर गौन ॥
तेरे राधास्वामी दया सार गम लखले, लख निज आपा जौन ॥ तेरे
[100 870 ] माई गुरु भक्ति चित लाना ।।टेक।॥
गुरु की भक्ति सदा सुख दाई, इसे न कभी भुलाना ।॥
माई वृथा जीवन समय न खोना, अपना जनम बनाना ॥
माई प्रेम प्रीत की राह में पग दे, नित प्रति गुरु गुन गाना ॥
माई जग में यह धन दुर्लभ माई, कठिन योग से पाना ॥
माई राधास्वामी गुरु की दया भई है, गुरु से लगन लगाना ॥ माई
[101 871 ] सुरत प्यारी अपना आपा जान ॥टेक।॥
आपा में तेरे सकल पसारा, चौदह भुवन की खान ॥
सुरत जीव में ब्रह्म परब्रह्म व्यापा, बुन्द सिंध लहरान ।॥
सुरत अपना आपा तज सब भरमे, परबत बन मैदान ॥
सुरत अपना सोध सोध निज आपा, गुरुगम ले पहचान ।॥
सुरत राधास्वामी सहज लखा आपा, सुरत शब्द मत ठान ॥सुरत
[102 872 ] सुरत प्यारी सुन सतगुरु का ज्ञान ।।टेक॥
माया में ब्रह्म ब्रह्म में माया, दोनों एक समान ॥
सुरत नहीं बलवान से बल है न्यारा, बल ही में बलवान ॥
सुरत एक में भया अनेक में धोका, धोके धोक रहान ॥
सुरत बीज में फूल पात फल लीला, समझे साध सुजान ॥
सुरत राधास्वामी घट का भेद बतावें, घट है सब की खान ॥ सुरत
[ 103 873 ] सखी खट पट में उमर गई ॥टेक।॥
ज्ञान गया और योग मिला नहीं, भक्ति विसर गई ।॥
सखी0 ज्ञान ध्यान मेरे हाथ में आया, इधर न उधर गई ॥
सखी अब तो राधास्वामी शरन मिली है, सँभल के ठहर गई ॥ सखी
[104 874 ] बिन नाम कुशल नहीं जग में ॥टेक॥
नाम बिना कोई पन्थ न चालो, गड़ें काँटे पग पग में ॥
बिना0 जो नर नाम से विमुख फिरत है, सो समझो है योनी खग में ॥
लूट पड़ी माया तेहि लूटे, चैन कहाँ डाकू और ठग में ॥
बिना नाम करनी सब निष्फल, काल करम भरमावे मग में ॥
राधास्वामी नाम है औषधि दुख की, नाम मिलेगा साध समग में ॥
[105 875 ] मौज की रचना न्यारी है ।।टेका॥
किसी को मौज बनावे राजा, किसी को रंक भिखारी ॥
मौज0 किसी को दे सुख चैन बिलासा, करे किसी को दुखारी ॥
मौज जो कुछ है सो मौज की लीला, मौज की गति मति भारी ||
मौज मौज मौज की मौज मौज की, लीला अगम अपारी ॥
मौज मौज निरख हमको मिली शान्ती, राधास्वामी की बलिहारी ॥
[106 876 ] सजनी सजन से नाता जोड़ टेक॥
काल करम के बन्ध से छुटजा, माया का सिर फोड़ ॥
सजनी प्रीति प्यार की करले कमाई, जग से नेह को मोड़ ॥
सजनी कलह कला के झगड़े मेंट कर, इनसे धागा तोड़ ॥
सजनी प्रेम भक्ति के मारग आजा, वह है सब का निचोड़ ॥
सजनी नू प्यारी राधास्वामी गुरु की, मन ले फटक पिछोड़ ॥ सजनी
[107 877 ] गुरु दाता लगा दो पार मुझे ॥टेक॥
टूटी नय्या भँवर पड़ी है, काढ़ निकारो किनार मुझे ॥
गुरु0 काल करम का बोझ पड़ा सिर, नहीं भावे यह भार मुझे ॥
तुम समान कोई नजर न आवे, खेवटिया हुशियार मुझे ॥
गुरु0 बन्धन में माया के उलझा, जग है कारागार मुझे ॥
राधास्वामी आन बताओ, परमारथ का सार मुझे ॥
[108 878 ] जगत में दो दिन का रहना ॥टेक।॥
हँसी खुशी से समय बिताओ, दुख कलेश को क्यों सहना ॥
जगत गुरु चरन से जोड़ो चित को, भव की धार नहीं बहना ॥
जगत है प्रपंच सब जगत की माया, उसकी ओट न तुम गहना ॥
जगत परमारथ का करो व्यौहारा, सत्त नाम का लहो लहना ॥
जगत राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,राधास्वामी राधास्वामी नित कहना
[106 879 ] माई चिन्ता चित्त न धार ॥टेक।॥
जब आई तू गुरु की शरनी, गुरु ही करेंगे सभार ॥
माई0 सुमिरन कर गा गुरु की बानी, तेरे सीस न भार ॥
माई मन में ध्यान रहे सतगुरु का, नहीं व्यापे संसार ॥
माई छोड़ आस जग की सुन माई, गुरु से करले प्यार ॥
माई राधास्वामी दया मेहर करें पूरी, एक दिन बेड़ा पार ॥ माई
[110 880 ] गुरु प्रेमी आनन्द पाते हैं ।।टेक।॥
घट में बैठक ठानी अपने, कहीं आते नहीं जाते हैं ॥
गुरु0 अनहद बानी मंगल खानी, की धुन अन्तर गाते हैं॥
गुरु गुरु से जब लगन लगी सच्ची नहीं, और से नेह लगाते हैं ।।
गुरु सुख जीवन की चूटी पाई, सुख चैन से समय बिताते है ॥
गुरु राधास्वामी के गुन गा गा, भव द्वन्द जाल कटवाते है ॥
111 881] बतादो साई परमारथ की पात ॥टेक॥
कौन देश से हंसा आया, कौन देश को जात ॥
बतादो0 कैसे बँधा आय माया संग, केसे छूटे साथ ॥
बतादो रात अधेरी नींद न आवे, कब होगी परभात ।॥
बतादो सुध बुध अपनी आय न बूझे, मन रह रहकर पछतात ।॥
बतादो राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पद चित ठैरात ॥ बतादो
[112 882 ] सुरत प्यारी कर सतगुरु का ध्यान टेक॥
सतगुरु तेरे घट में बसते, तू फिरे चारों खान ।॥
सुरत भों के मध्य में तिल है तीसरा, वहाँ है ठौर ठिकान ॥
सुरत जगमग ज्योत सुनहरी ज्वाला, ज्योत में ज्योत महान ॥
सुरत वह है बिम्ब और तू है प्रतिबिम्ब, एक में एक समान ॥
सुरत एक में दो का भाव कहाँ है, दुजा मिथ्या जान ॥
सुरत तिल को छोड़ गगन में धस चल, ॐ रूप दरसान ॥
सुरत सुन्न मंडल में प्रीतम ‘बसता, सुन्न सुन्न पहचान ॥
सुरत खिड़की खोल भंवर की तत छिन, सुन सोहंग धुन कान ॥
सुरत सो है गुरु अहं तू प्यारी, अपना रूप पिछान ॥
सुरत सोहंग परे सत्त का बासा, सत्त सत्त का भान ॥
सुरत सत है अलख अगम ये सत है, कैसे करू बखान ॥
सरत राधास्वामी संगत कुछ दिन करले, तब पावे गुरु ज्ञान ॥
सुरत
[113 883 ] सुरत प्यारी सुन अनहद धुन तान ॥टेक॥
शब्द है ब्रह्म शब्द परब्रह्म, ईश्वर शब्द प्रमान ॥
सुरत माया काल शब्द की मूरत, शब्द में शब्द समान ।॥
सुरत शब्द ने रची त्रिलोकी सारी, शब्द है सब का प्रान ॥ सुरत
सहस कँवल दल शंख घंट सुन, त्रिकुटी ओउम् निशान ॥
सुरत0 सुन्न महासुन्न रारंग सारंग, भवर सोहंगम जान ।॥
सत पद अलख अगम को परखा, व्यापा शब्द महान ॥
जो कोई शब्द की करे कमाई, फंसे न चारों खान ॥
नाम है शब्द अनाम शब्द है, समझे साधु सुजान ॥
गुप्त प्रगट में शब्द विराजा, सुरत शब्द पहचान ॥
बाच लक्ष सब शब्द रूप में, तत्व में तत्व सुजान ॥
ज्ञान अनुमान प्रमान समाना, यह सब शब्द न आन ॥
साधु सन्त और हंस शब्द है, क्षीर नीर के छान ॥
लगन लगे घट में तब प्रगटे, जीते जी निरवान ॥
शब्द ही मारे शब्द जिलावे, शब्द का कर अनुमान ॥
सतगुरु बानी शब्द की खानी, राधास्वामी किया बखान ॥
[ 114 884 ] मनुआ तू है बड़ा कठोर ॥टेक॥
कहा न माने मेरी सुने नहीं, अति चंचल चित चोर ॥
मनुआ0 खेल खिलावे खेल अनोखे, बुद्धि को दे झकझोर ॥
मनुआ कभी अकाश की ओर सिधाये, कभी समुद्र सिर जोर ।॥
मनुआ कबहुँ नये नित उत्पात मचावे, करे शोर घनघोर ॥
मनुआ राधास्वामी की ले शरनाई, गुरु है बन्दी छोर ॥ मनुआ
[115 885 ] करो चित देकर शब्द अभ्यास ॥
टेका सुमिरन भजन ध्यान हो प्रति दिन, मन में धर विश्वास ॥
करो0 गुरू का नाम रहे अन्तर घट, जाप हो साँसों साँस ॥
मन चंचल की दुविधा मेटो, हिया जिया हर्ष हुलास ॥
यहि विधि कुछ दिन करो कमाई, गुरू है अंग संग पास ॥
राधास्वामी की दाया से, दुख नहीं पावे दास ॥
116 886 ] भजन बिन जीवन है निष्फल ॥टेक।॥
मृग तृष्णा मरुदल भूमी, सार हीन निरजल ॥
भजन काल करम माया बरियाई, फाँसे जीव निरबल ॥
भजन संभल संभल कर पग का धरना, कहीं न जाना फिसल ॥
भजन भजन प्रताप बचे कोई प्रानी, शब्द के मारग चल ॥
भजन राधास्वामी दीन सहाई, अपना दे निज बल ॥ भजन
[117 887 ] मनुआ काहे मचावे रार ॥टेका॥
भरम भ्रान्ती में पड़ा निस दिन, जग भया कारागार ॥
मनुआ0 नहीं विश्वास न श्रद्धा भक्ति, नहीं चित प्रेम न प्यार ॥
घर में रहे तो अनबन ठाने, बन सिर दुख का भार ।॥
कैसी करूँ उपाय न सूझे, रहती हूँ मन मार ॥
राधास्वामी चरन में मुझको पटकू, तुझसे गई मैं हार ॥
[118 888 ] मनुआ तुझे मैं गया पहवान ॥टेक॥
पल में राजा पल में परजा, पल में निर्धन धनवान ।॥
मनुआ0 पल में ज्ञानी ध्यानी पक्का, पल मूरख अन्जान ॥
कबहुँ माटी से करे मैला, कबहुँ चढ़े असमान ॥
तेरी दसा अनौखी न्यारी, समझे कोई सुजान ॥
तुझसे जीत सका नहीं कोई, निबल सबल बलवान ॥
हार मान सब तुझसे हारे, सब का भया अपमान ।॥
राधास्वामी चरन में अरपू तुझको, लिया यह मैंने ठान ॥
[116 889 ] मनुआ तू समझ समझ पग धार ॥टेक॥
पन्थ में आया भया पन्थाई, चल चल डगर निहार ॥ मनुआ0
मारग कठिन भयंकर भूमी, काम क्रोध बट मार ॥
मनुआ0 लोभ मोह दोऊ प्रान के घातक, महा शत्रु हंकार ॥
माया ठगनी करे ठगेरी, बचा काल का वार ॥
तू है अकेला पाँच हैं बैरी, पाँचों बड़े बरियार ॥
गुरु को संग ले शरन में आकर, वह करे तेरी संभार ॥
शब्द रूप गुरु घट में विराजे, शब्द सुनो झनकार ॥
राधास्वामी दया चढ़ शब्द की नौका, जा भवसागर पार ॥
[ 120 890 ] मनुआ तू चंचल चित दे त्याग ॥टेक।॥
कुबुद्धि कुकरमी कुभाष कुकामी, कुटिल कुपन्थ कुभाग ॥ मनुआ0
अशुभ कमाई करे दिन राती, अशुभ वासना लाग ॥
दुख भोगे आपति नित झेले, नहीं धारे अनुराग ॥
जैसी करनी वैसी भग्नी, मोह नींद से जाग ॥
राधास्वामी गुरु की कर सतसंगत, जागे सोया भाग ॥
[ 121 891 ] गुरु चरन कमल की दासी बनी ॥टेका॥
सहस कमल दल सहस रूप हो, सहस्त्रार सहबासी बनी ।॥
गुरु0 त्रिकुटी तत्व में वाच लक्ष लख, ओंकार केलासी बनी ॥
सुन्न गई महासुन्न को निरखा, जग दारुण से उदासी बनी ।॥
, भँवर में भंवराकृत होय डोली, सोहंकार निवासी बनी ॥
सतपद सत्यामृत पी परखी, सचमुच मैं सुखरासी बनी ॥
अलख अनाम अगम को पाया, सुख स्वरूप दुख नासी बनी ॥
राधास्वामी गुरु ने मुझे चिताया, अब मैं ज्ञान प्रकासी बनी ॥
[ 122 892 ] आके बंधादे धीर प्यारे ॥टेक॥
मन में विकलता तन में विकलता, व्यापी कलेजे पीर ।॥
प्यारे0 फिरू निरासी चित में उदासी, लगा विरह का तीर ॥
बुद्धि न बूझे आँख न सूझे, काँपे सकल शरीर ॥
कोई न जाने गति न पिछाने, कैसे करूँ तदवीर ॥
दो शरनाई बनो सहाई, राधास्वामी धीर गम्भीर ॥
[123 893 ] बरसे गगन रस बूद, चुनरिया भीज रही ॥टेक।॥
चूनर पहर ओढ़ सुरत निकसी, माया निरख कर मींज रही ॥
बरसे0 सदा सुहाग गुरु ने दीन्हा, घट घर दूज और तीज रही ॥
सूत न बिखरे तार न बिगड़े, काल की गति मति छीज रही।
निरखा रंग चूनर का निर्मल, नहीं अंड बंड उदबीज रही ॥
राधास्वामी गुरु का रंग लगा है, चूनर उत्तम चीज रही ॥
[124 894 ] गुरु प्यारे के चरनों की दासी बनी, दासी बनी प्रेम प्यासी बनी॥टेक॥
सहस कमल दल निरख सहस छवि, सहसासन सहसासी बनी ॥
गुरु0 त्रिकुटी ततत्वम वाच लक्ष लख, ओमकार सहबासी बनी ॥
, सुन्न में द्वन्द आस्था मेटी, सहस समाधि उदासी बनी ॥
भँवर में भवराकृत हो डोली, सोहंगम आकासी बनी ॥
सतपद जाय मिली सतगुरु से, आनन्दित सुखरासी बनी ॥
, अलख अनाम अगम पद परसा, अजर अमर अविनासी बनी ।॥
राधास्वामी धाम में डेरा डाला, ज्ञान भक्ति प्रकाशी बनी ॥
[ 125 895 ] गुरु चरनन से मेरी लव लगी रहे ।।टेक॥
दुख कलेश नहीं मुझे सतावे, माया दुचिता भगी रहे ॥
गुरु0 मोह नींद आलस से उठकर, सुरत सुहागिन जगी रहे ||
मान मनी से नाता तोगुरु भक्ति मेरी सगी रहे ॥
सुमिरन ध्यान भजन चित लागे, सुरत प्रेम में पगी रहे ॥
राधास्वामी नाम धन पाया, दासी गुरु रंग रंगी रहे ॥
[ 126 896 ] कोई अवघट घाट भरे गगरी ॥टेका॥
औंधा कुआ अकास में पानी, हाथ पड़ा औंधी गगरी ॥
कोई0 पानी भरन जब निकसी घर से, कान्हा काल रोके डगरी ॥
मैं तो उड़ी चली नभ ऊपर, कान्हा ने पकड़ लिया पगरी ॥
मैं बोली जा अपना काम कर, अपनी संभाल आप मगरी ॥
मैं तेरे बस की नाहीं कान्हा, तेरी रोक वृथा सगरी ॥
सत की गगरिया चित से भरूँगी, जाऊँगी मैं आनन्द नगरी ॥
राधास्वामी बल से हुई बलवानी, सुरत शब्द से बनी नगरी ॥
[127 897 ] मनुआ सोच समझ ले नाम ॥टेक।॥
सुमिरन ध्यान भजन गुरू सेवा, इनसे मिले बिसराम ॥
मनुआ0 आलस छोड़ छोड़ कदराई, करले अपना काम ।॥
मनुआ चलते फिरते उठते बैठते, गुरू भज आठों याम ॥
मनुआ घट में नित हो भजन बन्दगी, घट राधास्वामी धाम ॥
मनुआ राधास्वामी तेरे साँचे रक्षक, उनके चरन को थाम ॥ मनुआ
[128 898 ] मन का झगड़ा मेटो, साधु मन का झगड़ा मेटो।टेक।॥
माया जीव ब्रह्म अविनासी, इनका टाट लपेटो ॥ साधु0
बन में गये तो मन से अनबन, घर उत्पात झोटो ॥
साधु0 झूठी माया झूठी काया, भूठ तिया सुत बेटो ॥
साधु मन को सोधो मन परबोधो, मन की गुफा में लेटो ॥
साधु जब लग मन में संशय दुविधा, सत से होय न भेटो ॥
साधु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मन करो अपना हेटो ॥ साधु
126 899 ] पीले तू प्याला मेरे प्यारे, पीले तू प्याला ॥टेक॥
प्याला नाम अमी का तू पीले, होजा मतवाला ॥
मेरे प्यारे काल कर्म को आग लगादे, करदे मुख काला ॥
मेरे प्यारे निस दिन माया भर्म भुलावे, यासों पड़ा पाला ॥
मेरे प्यारे राधास्वामी धाम में जाकर, काटो यह जंजाला ॥मेरे प्यारे
[130 900 ] बिरह का लगा कलेजे तीर, कसक की साले उरमें पीर ॥टेक।॥
दरस बिन चित नहीं शान्ती पावे, कोई इस मन को क्या समझावे॥
रात को नींद न दिन को चैन, सुनावे कोई धीरज के बैन ॥
गुरु से विनती है यह मेरी, दया से काटो दुख की बेरी ॥
परी त्रय दुख के मैं पाले, फसी माया के जंजाले ॥
विकल मन चहुँ दिस भरम रहा, बिपति के मारे सहम रहा ॥
दया अब कीजे राधास्वामी, शरन में लो अन्तरयामी ॥
[131 901 ] सुरत प्यारी अधर की ओर चली ॥टेक॥
तीन ताप से रही मुरझाई, अब तो खिल गई मन की कली ॥ सुरत0
ऊँचा महल सुहाना बंगला, झंझरी झरोका लागे भली ॥
नौबत झड़ती पिया के मन्दिर में, छिन छिन दम दम पली पली ॥
ज्योत में ज्योत ज्योत अति अद्भुत, ज्योत में ज्योत
की बाती बलीराधास्वामी चरन शरन बलिहारी, काल कर्म की बला टली ॥
[ 132-902 ] गुरु बिन पन्थ में पग नहीं धरना, मारग कठिन महान हो ॥टेक।॥
रस्ते में है काल का डेरा, भरम के जाल फैसना हो ॥
गुरु0 जो कोई गुरु का संग न कीन्हा, काल करम उरझाना हो ॥
गुरु के सतसंग पूछ निरन्तर, घट की राह रुकाना हो ॥
बिन गुरु हाथ न लागे कुछ भी, पाये न ठौर ठिकाना हो ॥
पिन गुरु ज्ञान कथे निस बासर, सो नर मूढ़ अज्ञाना हो ॥
गुरु की दया साध की संगत, उपजे निर्मल ज्ञाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, मैं गुरु चरन दिवाना हो।
[133 903 ] गुरु दरयाव बहा अति निर्मल, गुरु मुख आन नहाना हो ॥टेक।॥
जल प्रवाह बचन की धारा, सत संग घाट बिठाना हो ॥
गुरु0 प्रेमी जन नित गोते मारे, मन का मैल छुड़ाना हो ।॥
गुरु तीन ताप की तपन बुझाई, शान्त चित्त बन जाना हो ॥
गुरु चंचल से जब होगये निश्चल, सूझा अगम ठिकाना हो ॥
गुरु राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु पर बल बल जाना हो।
[134 904] गुरु दरयाव की महिमा भारी, कर अस्नान तर जाना हो ॥टेक।॥
प्रेमी जन सब जुड़ मिल आये, उत्सव परम महाना हो ॥
गुरु0 मंगल राग गुरु की अस्तुति, उमंग उमंग नित गाना हो ॥
चंदन फूल अरगजा चूवा, गुरु के चरनन चढ़ाना हो ॥
पूजा गुरु की सेवा गुरु की, हिया गुरु ज्योत जगाना हो ॥
प्रेम थाल में आरत लेकर, गुरु छवि निरख भुनाना हो ॥
अन्तर गुरु है बाहर गुरू है, और न कोई दरसाना हो ॥
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, कर स्नान मगनाना हो ॥
905 गुरू एक अनादि अनन्त महा, पद कमल में आन के शरन गहा ॥
तू श्रेष्ठ है श्रेष्ठ बना मुझको, निज भक्ति का पन्थ दिखा मुझको ॥
तेरा रूप है ज्ञान तो ज्ञान मिले, तेरे चरण सरोज का ध्यान मिले ॥
अविनाशी है तू सुखराशी है, तू घट घट का गुरूबासी है॥
विश्व विश्वम्भर जगधारी, सुर नर मुनि सब का हितकारी ॥
मेरे मन से दूर मदमान रहे, मुझे सदा तेरा अभिमान रहे ॥
सब के प्राणों का प्राण है तूदे प्रेम जो प्रेम की खान है तू ॥
घट तिमिर मिटे कर उजियारी, तेरे चरन शरन की बलिहारी ॥
राधास्वामी देवन के देवा, करूँ हित से सदा तेरी सेवा ॥







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