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[2-600 ] दाता ज्ञाता पितु और माता, छिन छिन तेरा ध्यान रहे
[2-600 ] दाता ज्ञाता पितु और माता, छिन छिन तेरा ध्यान रहे ।
जग त्राता भ्राता सतराता, तेरे नाम का गान रहे ।।
सुमिरन तेरा ध्यान हो तेरा, तेरा भजन हर आन रहे ।
तेरी बानी अगम निशानी, उसी ओर मेरा कान रहे ।।
तुझको ध्याऊ तुझको गाऊँ, तेरा ही अरमान रहे ।
सुमिरन भजन ध्यान सेवा में, मेरी जान और प्रान रहे ।
सुरत निरत तेरे रंग राती, तेरे रूप का ज्ञान रहे ।
जहाँ जहाँ देखू तेरी लीला, तेरा ही अभिमान रहे ।।
जो जो सुनू सो तेरा बचन हो, मन से दूर मदमान रहे।
राधा स्वामी चरन शरन बलिहारी, भव से सुरत अलगान रहे ।
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[3-601 ] जगत में आये बहुत दुख पाया, प्रेम का नगर दिखादो जी
[3-601 ] जगत में आये बहुत दुख पाया, प्रेम का नगर दिखादो जी।
भरमत भरमत चहुँ दिस डोलू, सच्ची डगर बता दो जी ।
मोह नींद में निस दिन सोये, बाँह पकड़ के जगा दो जी ।
मैं तो अचेत चेत नहीं किंचित, चित से अपनी चेता दो जी ॥
ज्ञान भक्ति का सार न जानू, मेरा अज्ञान मिटा दो जी।
चित चकोर निरखे गति चंदा, ऐसी लगन लगा दो जी ।
सुध बुध मन की सब ही भूलू , प्रेम का प्याला पिला दो जी।
मतवारों की चाल चलू नित, प्रीत की चाल चला दो जी ॥
आँख न मृदू कान न रूधू, सहज समाधि लगा दो जी।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, घट में सूर उगादो जी ।।
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[4-602 ] धन धन भव भंजन जन मन रंजन, काम निकंदन गुरु राई
[4-602 ] धन धन भव भंजन जन मन रंजन, काम निकंदन गुरु राई ।
धन सुरमुनि नायक जगत सहायक, सुखदायक धन प्रभुताई ॥
धन करुणा सागर सब गुण आगर, गुनातीत गदि हरी ।
धन घटघट बासी प्रभु अविनाशी, सुखरासी दुख नास करी॥
धन ज्ञानी ज्ञाता विश्वविधाता, सर्व जनन के पितु माता।
धन करता धरता नेह की सरिता, मुक्ति भक्ति के निजं दाता ।
धन परम सियाने वेद बखाने, ऋषि मुनि नहीं जाने चतुराई ।
धन दीन दयाला सहज कृपाला, बार पार नहीं कोई पाई ।।
चरन शरन दे अपना कीजे, भक्ति भाव राधास्वामी दीजे ।
मैं अति नीच निकाम अनारी, पद सरोज में ले लीजे ॥
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[5-603 ] धन धन धन दाता सुर मुनि त्राता, व्यापक परमा नन्दा
[5-603 ] धन धन धन दाता सुर मुनि त्राता, व्यापक परमा नन्दा ।
धन धन अविनाशी घट घट बासी, माया रहित मुकुन्दा ।
धन अपरम्पारा जगत अधारा, पार न पावे कोई ।
धन परम कृपाला दीन दयाला, करहु अनुग्रह सोई ।।
आदि अनादि अनन्त अमाया, निःकाया महिमा भारी ।
देव दनुज नर किन्नर करता, सन्त जनन के हितकारी ।
क्या कोई जाने तुम्हरी लीला, अगम अपार अरूप हो तुम ।
भेद न पावे ऋषि मुनि कोई, सारे जगत के भूप हो तुम ॥
सुनत कान बिन लखत नैन बिन, चलत बिना पद निस वासर ।
बिन जिभ्या बोले बहुबानी, ग्रहण करत सब कुछ बिन कर ॥
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[9-604 ] प्राणों का है प्राण पिता तू , जीवन का है आधारा
[9-604 ] प्राणों का है प्राण पिता तू , जीवन का है आधारा ।
निर्भर यह ब्रह्मांड है तुझ पर, तू है सब का रखवारा ॥
तू है जोत नेन की सब के, तू है घट घट का वासी।
अन्तरयामी प्रीतम प्यारा, अजर अमर विभु अविनासी ।।
जल में तेरी शीतलता है, तेज में है प्रकाश तेरा ।
वायु में है तेरी शक्ति, और आकाश में भास तेरा ।।
तू है एक अनेक रूप में, अगम अगोचर निर्माया ।
यह ब्रह्मांड तेरी है काया, फिर भी तू है निरकाया ॥
बिन पग चलत सुनत बिन काना, मिन जिभ्या बाचाल है तू।
माया मोह से रहित निरन्तर, सब जग का प्रतिपाल है तू ॥
तू है देस निमित भी तू है, और कहूँ क्या काल है तू ।
जड़ चेतन है कारन कारज, करुणा मय कृपाल है तू ॥
फूल फूल में बास है तेरी, मेंहदी में है तू लाली ।
चकमक में ज्यों आग छुपी है,एक तिल नहीं तुझसे खाली।
दया सिंधु है दीनबन्धु है, भक्त जनन का हितकारी ।
सृष्टि प्रलय लीला है तेरी, तू है हलका तू भारी ।।
तू व्यापक तू अविच्छिन्न है, तू सब में सब हैं तेरे ।
सब में रमा अलग है सब से, सब से दूर सब से नेरे ॥
रोम रोम में गुप्त हुआ है, अणु अणु में प्रगट है तू ।
हृदय गुफा में बास है तेरा, जीव जन्तु का घट है तू ॥
महिमा अनिमा लधिमा गरिमा, हैं अनेक यह तेरे रूप ।
तू सेवक है तू स्वामी है, तू है परजा तू है भूप ॥
क्या माँगू तुझसे मैं स्वामी, तू मेरा मैं हूँ तेरा ।
खोजूं क्यों मैं देस देस में, हिये में है तेरा डेरा ॥
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[ 7-605 ] सबका आदि अन्त तू दाता, धन्य धन्य तेरी माया
[ 7-605 ] सबका आदि अन्त तू दाता, धन्य धन्य तेरी माया ।
व्यापक सत चित आनन्द स्वामी,कर निज दासों पर दाया।
तेरी थाह न पावे कोई, अगम अपार से पार है तू।
लीला तेरी सब से अद्भुत, एक तीन दो चार है तू ॥
जड़ चेतन में तेरी छाया, क्या कोई भेद तेरा जाने ।
योगी ऋषि मुनि ध्यान लगावें सबमें विभो तुझको मानें।
हम सब तेरे बाल बाल हैं, तू पितु मात सखा स्वामी ।
सबमें रमा सकल से न्यारा, घट घट का अन्तरयामी ।
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[8-606 ] मन मोहन चित चोर छबीला, अलबेला प्यारा है तू
[8-606 ] मन मोहन चित चोर छबीला, अलबेला प्यारा है तू ।
मेरे मन में आन विराजा, इन आँखों का तारा है तू ॥
तुझपर छिनछिन बलि बलि जाऊँ,निसदिन तेरा गुन गाऊँ।
तुझको सुमिरूँ तुझको ध्याऊँ, सच्चा करतारा है तू ॥
योग कठिन वैराग कठिन है, ज्ञान का दान मिले मुझको ।
प्रेम बसा जब मन में आकर, प्रान का अपने आधारा है तू ॥
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[9-607 ] घट में चली सुरत मतवारी, छोड़ जगत की माया हाँ
[9-607 ] घट में चली सुरत मतवारी, छोड़ जगत की माया हाँ ।
मन को साधा गुरु आराधा, गुरु गम चित्त बसाया हाँ ।।
नाचत गावत धूम मचावत, तजी असार की छाया हाँ।
सहज विरागी पद अनुरागी, गुरु ने की है दाया हाँ ।
इत से तोड़ा उत से जोड़ा, भरम अज्ञान भिटाया हाँ ।
सुरत नवेली भई है रंगीली, राधास्वामी रंग रंगाया हाँ।
शम दम संयम नियम धरम सम, हानि करे नहीं काया हाँ।
ज्ञान न जाना मुक्ति न माना, भक्ति का साज सजाया हाँ।
जीवन बूटी सब विधि लूटी, आवागमन नसाया हाँ ।
राधास्वामी धामा अचल मुकामा, हरष हरष गुन गाया हाँ ।
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[10-608 ] आँखों का तारा सबका सहारा, हित चित से तू प्यारा है
[10-608 ] आँखों का तारा सबका सहारा, हित चित से तू प्यारा है ।
निर्मल शुद्ध बुद्ध हितकारी, सुख सम्पति परिवारा है।
घट घट बासी आनन्द रासी, अविनासी मंगलकारी ।
रोम रोम में रमता जोगी, रोग सोग से न्यारा है।।
गुणातीत गोविंद मुरारी, पुरुषोत्तम करुणा सागर ।
जन मन रंजन दोष विभंजन, प्रेम प्रीति भंडारा है ।।
नाम लेत भव सिंधु सुखावें, ध्यान धरत कलि मल जावे ।
भव दुख मेटन दोष नसावन, भक्ति रीति का सारा है।
करम धरम वैराग ज्ञान तत, विज्ञानी पूरा सच्चा ।
हे दयाल करो दृष्टि दया की, हृदय दुखी हमारा है ।।
अब तो शरन में आन पड़ा हूँ, एक आस तेरी मुझको ।
राधास्वामी चरन से प्रीति रहे नित,वही धुर इष्ट सहारा है।।
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[11-609 ] जग का स्वामी जग का दाता, जग का पालनहारा
[11-609 ] जग का स्वामी जग का दाता, जग का पालनहारा ।
जग त्राता जग पितु माता, जग का राखनहारा ॥
चरन कमल में सीस झुकाऊँ, निस दिन तेरा गुन गाऊँ।
काम क्रोध मद त्याग ईर्षा, तुझ से नेह लगाऊँ॥
निस दिन सुमिरूँ पल पल ध्याऊँछिन प्रतिछिन गुन गाऊँ।
दुख में सुख में हर्षे शोक में, चरनन पर बलि जाऊ ॥
सिंधु एक अति घोर गम्भीरा, नाव न बेड़ा भारी ।
दिन प्रतिदिन जपू नाम निरंतर, जाऊँ भव जल पारी ।।
भक्ति दीजे मुक्ति न दीजे, ज्ञान न दीजे स्वामी ।
लव लगि जाय लगन की लारा, तू पद कमल नमामी ।
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[12-610 ] सिरजन हारा पालन हारा, राखन हारा श्रुति सारा
[12-610 ] सिरजन हारा पालन हारा, राखन हारा श्रुति सारा ।
जानन हारा धारन हारा, मारन हारा रखवारा ॥
महिमा विमल अनूपम तेरी, सब में रमा सबसे न्यारा ।
ऋषि मुनि कोई भेद न पावे, वेद कहे अपरम्पारा ॥
कारन कारज कमें विधाता, हरता धरता करतारा ।
राता माता अपनी दशा में, परम तत्व का भंडारा ॥
तेरे बिना नहीं कोई रक्षक, सबका है तू आधारा ।
प्रीतम प्यारा भक्त सहारा, जन की आँखों का तारा ॥
भूल भटक से भरम मोह से, प्रभु दे सबको छुटकारा ।
जग की आस त्याग करुणामय, पहुँचादे भव जल पारा ॥
घट घट वासी सकल प्रकासी, हित सुत और संपत दारा ।
अन्तरयामी सबका स्वामी, धन यश मंगल परिवारा ॥
भक्ति दान दे शक्ति दान दे, बुद्धि दान दे दातारा ।
चरन कमल में सीस झुकाकर, रहूँ बसू चरनन लारा ॥
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[13-611 ] वह द्वत भी है अद्वत भी है, द्वत अद्वत के पार गुरु
[13-611 ] वह द्वत भी है अद्वत भी है, द्वत अद्वत के पार गुरु ।
संसार का सार असार नहीं, दोऊ सार असार के वार गुरु ॥
मति जेहि न लखे जो मति में रहे, मति सुमति कुमति को राह नहीं।
यहि सिंधु महा गम्भीर कहा, मरजीवा की वामें थाह नहीं ।
जब आप कहे सब कोइ लहे, बिन बानी कथे सब भेद सही।
नहिं देस विदेस अदेस कभी, संदेस बताये सुनाये कही ।
नहीं कर्म धर्म न मर्म भया, निःमर्म का मर्म कहे कोई क्या ।
निःअक्षर अक्षर क्षर जो नहीं, तज बुद्धि ताको कहे कोई क्या।
राधास्वामी ने रूप धरा गुरु का, तब भेदी को भेद दिया अपना ।
पद तुर्या नहीं तुर्या है वहीं, सुखनींद न जाग्रत नहीं सपना ॥
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[14-612 ] गुरु गुन गाना गुरु छबि ध्याना, गुरु मत ज्ञाना काम तेरा
[14-612 ] गुरु गुन गाना गुरु छबि ध्याना, गुरु मत ज्ञाना काम तेरा।
नहीं कहीं आना नहीं कहीं जाना, चित ठहराना जतन सदा ॥
कृपा सागर सब गुन आगर, नागर गुरु तेरे स्वामी ।
क्यों दुख पावे भरम भुलावे, मूरखता से अति हानी ॥
जन मन रंजन दोष विभंजन, भव खंजन गुरु हितकारी ।
धर विश्वासा चरनन आसा, राधास्वामी के बलिहारी ॥
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[ 15-613 ] संसार असार में सार नहीं, कर सार शब्द का निरवारा
[ 15-613 ] संसार असार में सार नहीं, कर सार शब्द का निरवारा ।
कोई साथी नहीं कोई यार नहीं, चल डगर अकेले मतवारा॥
संसार यह अगमापाई है, क्यों भरमा भूला फिरता है।
यह भरम हिंडोला भाई है, तू इसमें भूला फिरता है ।
तेरे मन में माल खजाना, चोरों से बचाले धन अपना ।
क्या मूरख है दीवाना है, ले सोध जतन कर मन अपना॥
तेरा साहब है घट के अन्दर, हित चित से कर दर्शन उसका ।
घट भीतर निरख रूप सुन्दर, ले देख अभी दरपन अपना ॥
मन दरपन सुन्दर रूप बसा, सुन दर में है प्रीतम प्यारा ।
अति अद्भुत छवि से आप हँसा, नौ द्वार से होजा तू न्यारा ॥
क्या खोल कहूँ तुझसे प्यारे, यह सैन बैन की बानी है।
आजा धंसजा इसमें आ रे, तिस परे धाम निरवानी है ।
घट अन्दर तूर तंबरा है, सुन सुनकर त्याग जगत काँचा ।
तू वीर धीर है सूरा है, जो सतगुरु का सेवक साँचा ।
कर गंग जमन अस्नान अभी, अपने घट तिरबेनी धारा ।
तज मान मनी अभिमान अभी, होजा राधास्वामी का प्यारा ॥
गुरु ने की मेरी रखवारी, मुझे मर्म लखाया सतगुरु ने ।
हुआ धुरपद का मैं अधिकारी, जब मेद बताया सतगुरु ने ॥
तिल भीतर जोत जले जगमग, घट सूर चन्द्र प्रकाश करें।
तिल फोड़ चलें जो गुरु के मग, वह सकल अविद्या नास करें।
कभी घंटा शंख सुनें अंदर, कभी सार शब्द झनकार सुनी ।
कभी सारंग किंगरी बजी भीतर, कभी ररंकार धुनकर सुनी ॥
मन गुफा में मुरली बाज रही, सतपद में बीना गाज रही।
मेरी गुरु की दया से लाज रही, घट मूरत उनकी विराज रही।
राधास्वामी चरन पर बलिहारी, गुरु ने अब काम किया पूरा ।
मेरी फाँसी कटी भारी भारी, हुआ काल करम का मद चूरा ॥
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[ 19-614 ] पढ़ा लिखा सोचा और समझा, कुछ भी हाथ न आया
[ 19-614 ] पढ़ा लिखा सोचा और समझा, कुछ भी हाथ न आया ।
सन्त ने आप ही परगट होकर, निज स्वरूप दिखलाया ।
मन बानी की गम नहीं जिसमें, क्या कोई भेद बतावे ।
ऋषि मुनि पंडित ज्ञानी ध्यानी, केहि विधि तेहि समझावें ॥
सत्त नहीं है असत से न्यारा, दरसे वह तो अगम अपारा ।
सार असार दोऊ से ऊँचा, क्या कोई बरने पारा ।।
तुर्या तुर्यातीत नहीं वह, वार पार से आगे ।
यह तो मर्म कोई गुरुमुख पावे, गुरु चरनन जब लागे ।
जब कोई पारख मिले विवेकी, नाम रतन अधिकारी ।
हीरा खोल दिखाऊँ उसको, राधास्वामी के बलिहारी ॥
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[ 17-615 ] गुरु चरन कमल में सीस झुका, दिन रात करूं पूजा सेवा
[ 17-615 ] गुरु चरन कमल में सीस झुका, दिन रात करूं पूजा सेवा ।
गरु स्तुति नित करू मन से, गरु सम कोई और नहीं दना॥
गुरुदेव दयाल ने की जो दया, भवसिंधु से पार किया मुझको।
नहीं वार रहा नहीं पार रहा, सब भाँति अपार किया मुझको।।
गुरु दाता दानी अार महा, याचक जग जीव हुये सारे ।
गरु अर्थ देत गरु धर्म देत, गुरु काम मोक्ष देने हारे ।
गुरु महिमा जाने न ऋषि मुनि,शिव शारद शेष की पार नहीं।
संसार असार की प्रीति छुटी, गुरु भक्ति सम कुछ सार नहीं ।
बहु बरत किये बहु दान दिये, बहु तीरथ में जाकर भटके।
गुरु चरन कमल से प्रीति नहीं,यम जाल में सो निसदिन लटके।
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[18-616 ] मन में समझ गुरु की महिमा, गुरु का ध्यान लगाओ
[18-616 ] मन में समझ गुरु की महिमा, गुरु का ध्यान लगाओ।
अन्तर बाहर सतगुरु व्यारे, निरख निरख गुन गाओ ।
बन परबत में नगर ग्राम में, गरु की परगट लीला।
मंगल में मंगल है चहुँदिस, समझे कोई सुशीला ॥
छिन छिन पल पल नाम दिवाना, नाम से सूरत लागी ।
नाम सनेही जो नर प्रानी, सो सहज ही वैरागी ।।
शब्द सुरत का साधन करना, दिन प्रतिदिन गुन गाना ।
सुमिरन भजन ध्यान निस बासर, जो कोई करे सियाना ।
गुरु की मूरत बसी हिये में, अंग संग गुरु देवा ।
अन्तर में रहे भजन ध्यान नित, अन्तर मानस सेवा ।।
तूने गुरु को बाहर जाना, किसने तुझे बताया ।
मूरख सोच समझ मन अपने, सब कुछ गुरु की माया ।
चेत सवरे अवसर पाया, सुरत शब्द नहीं भूले।
सेवक अब तो भया बड़भागी, सुरत हिंडोले भूले ।
राधास्वामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना ।
मन की दुर्मति दूर निकारो, तब प्रगटे गुरु ज्ञाना ।।
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[19-617 ] मन की आस भरोस है मन में, आठ पहर गुरु सेव करूं
[19-617 ] मन की आस भरोस है मन में, आठ पहर गुरु सेव करूं ।
आवागवन का संकट मेटू, नहीं जन्मू नहीं जन्म मरू ।
लव लगी रहे चरन की लारा, साँस साँस गुरु का ध्याना।
यही विवेक है यही चतुराई, यह विद्या है यह ज्ञाना ।।
गुरु मेरे परम पुरुष करतारा, व्यापक घट घट के बासी ।
सत चित आनन्द ज्ञान की मूरत, सहज सार अति सुखरासी ॥
चेतन की छवि छाई नयन में, छबि की छाया संसारा ।
अन्तर गुरु है बाहर गुरु है, सार सार के निज सारा ॥
शब्द गुरु हैं सुरत गुरु हैं, परम तत्व गुरु रूप लखू ।
पीऊँ गुरु का भक्ति सुधा रस, प्रेम विवेक प्रसाद चखू ॥
नयनों में गुरु मन में गुरु हैं, तन में गुरु का विस्तारा ।
साँस गुरु मेरे जान गुरु मेरे, प्रान के गुरु हैं आधारा ॥
मैं हूँ चरन कमल का भँवरा, बास सुबास की प्यास घनी ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, गुरु हैं पूरन पुरुष धनी ॥
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[ 20-618 ] किसी पुरुष ने बन्दर पाला, अपना मीत बनाया
[ 20-618 ] किसी पुरुष ने बन्दर पाला, अपना मीत बनाया।
पाला पोसा प्रेम प्रोति से, जग व्यवहार सिखाया ।
बन्दर करता काम सब उसके, रात दिवस का संगा।
संग साथ रह सेवा करता, कभी न मोड़त अंगा।।
आग जलाता पानी लाता, और पकाता खाना ।
खाट बिछाता पाँच दबाता, अपनी बुद्धि, अनुमाना ॥
बिना दाम का सेवक साँचा, पल पल की रखारी ।
चकित हुये सब लीला देखें, बन्दर की हुशियारी ।।
लकड़ी काट पेड़ से लाता, घर को खूब सजाता ।
बन से फूल पात फल लाकर, निज स्वामी को खिलाता ।।
एक दिन सोया पुरुष खाट पर, देह की सुधबुध भूला ।
वह अचेत निद्रा बस माता, यह सेवा बस फूला ॥
आया साँप पीठ पर बैठा, बन्दर देख डराना ।
हाथ से अपने पकड़ कुल्हाड़ी; चाहा मार गिराना ॥
भय बस चेत न आया उसको, पशु में रहे न ज्ञाना ।
साँप के संग में स्वामी मरता, यह उसने नहीं जाना ।
चोर ने उसकी गति मति देखी, हाथ पकड़ के बिठाया ।
शोर मचाया उसे जगाया, सांप देख घबराया ।
वह तो अपने बिल में समाना, पुरुष सुनाई बानी ।
तू है कौन कहाँ से आया, दे कुछ अपनी निशानी ।।
बोला चोर चोर हूँ तेरा, चोरी करने आया ।
देख देख लीला बन्दर की, जी में अधिक डराया ।।
यह बंदर है निपट अनाड़ी, इसमें नहीं चतुराई ।
इसकी संगत भूल न प्रानी, यह नहीं तेरा सहाई ।।
साँप मारकर यह अज्ञानी, तुझको मार खपाता ।
बंदर की गति समझ सियाने, यह नहीं प्रान का दाता ॥
छोड़ कुसंगत पशु की भाई, पशु में कहाँ भिताई ।
इसकी संगत है दुखदाई, तामे कौन भलाई ।
संगत तो कीजे ऊँचे की, नीच की संगत त्यागी ।
जो कोई पड़ा नीच की संगत, दह मति मंद अभागी ।।
समझ बूझ कुछ तू नर चौरे, पशु सों हित न होई ।
पशु ले जाये मौत के मुंह में, शत्रु मीत लग्व सोई ।।
पुरुष विवेकी चतुर पारसी, सोचे मन में अपने ।
पशु के साथ मृत्यु भय उपजे, सुख सम्पति नहीं सपने ॥
पुरुष ने पाँव चोर का पकड़ा, तू मेरा हितकारी ।
तूने मौत से मुझे बचाया, भया साँच उपकारी ॥
इस बन्दर का कौन भरोसा, अब नहीं भूलू भाई ।
इसके गुन सब अगुन रूप है, अवगुन काह भलाई ।
“व्याख्या मन है बन्दर मन पशु चंचल, मन है मूढ़ अज्ञानी ।
मन को साध साध नहीं भूले, मन में विष की खानी ॥
मन के मत कोई नहीं चाले, मन का नहीं भरोसा ।
गुरु के मत जो चले न प्रानी, करे अन्त अफसोसा ॥
एक ही मन से सब कुछ उपजे, भाव अनेक पसारा ।
मन का मारा कभी न जीवे, मन मृत्यु भंडारा ॥
मन के मारे बन तज जावे, बन तज घर को आवे ।
कभी बन और कभी घर भरमे, ठौर ठिकान न पावे ॥
मन को चेत चेत नर मूरख, मन नहीं मीत है तेरा ।
मन की रीति में तू क्यों भूला, मन में काल का डरा ॥
ले गुरु मत को तज मन मत को, सत मत सार न सूझे ।
जो कोई गुरु मत से लव लावे, शब्द अगम गति बझे ॥
मन मलीन तन में रहे निस दिन, विषय वासना लागी ।
साध साध इस मन को अपने, हो गुरु पद अनुरागी ।
घोड़ा है यह मन अति चंचल, ज्ञान का कोड़ा लीजे ।
दे लगाम को उसके मुंह में, पग आगे को दीजे ।।
घोड़ा तो घोड़ा है पशु सम, घोड़े से क्या प्रीती।
घोड़े चढ़ असवारी कीजे, यह सियाने रीती ॥
पकड़ पूँछ ऐंठो घोड़े की, साधन एड़ लगाओ।
सरपट दौड़ो प्रेम नगर में, तब गुरु पद को जाओ ।
देस गुरू का अधिक सुहेला, अमृत खंड अनूपा ।
झलके जग मग जोति अपारा, दरसे चेतन रूपा ।।
बरसे अग्नी अखंडित धारा, नहीं मीठा नहीं खारा ।
कोई कोई साध स्वाद रस पावे, जो सतगुरु का प्यारा ॥
बिना नयन के देखे लीला, बिना श्रवण सुन बानी ।
बिन जिभ्या चखे अमृत रस को, बिन कर कर्म करानी ।।
बिन पानी के सुधा कुंड में, करे हँस अस्नाना ।
मान सरोवर अमृत झलके, करे रात दिन पाना ॥
नहीं वहाँ पुरुष प्रकृति का वासा, नहीं ब्रह्म नहीं माया ।
मैं तोहि पू पंडित ज्ञानी, भेद कहाँ से पाया।
मन तो माया रहा समाना, बानी मुह में अटकी ।
कान दशा के लोक समाया, घान पृथ्वी जा लटकी ।
बुद्धि बुद्धि तत गई हराई, केसा ज्ञान विचारा ।
नहीं वहाँ मान नहीं अपमाना, मिटा सकल हंकारा ॥
कैसे जाना केहि विधि माना, किस का गया अनुमाना।
जो कोई समझे इस बानी को, पावे गुरुमत ज्ञाना ।
सैन बैन में सन्त लखावें, सुरत शब्द की रीती ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, उपजी घट में प्रीती ॥
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[21-619 ] एक वृक्ष में दो हैं पक्षी, एक छोटा एक भारी
[21-619 ] एक वृक्ष में दो हैं पक्षी, एक छोटा एक भारी ।
वह खाता मीठा कड़वा फल, यह रहता निरहारी ।।
एक सुनहिले पर वाला है, दूजा रंग बिरंगा ।
कहने को वह जुदा जुदा हैं, निस दिन रहते संगा ॥
फल वाले को दुख सुख का भय, निश्चल अभय बिलासा ।
डाली डाली फिरता डोले, काल का सहे त्रासा॥
आँख खुली तब जग व्यौहारा, जब सोया तब सपना ।
भोग रोग में लम्पट रहता, तीन ताप का तपना ॥
ऊँची शाखा नीची शाखा, फल उत्तम और मध्यम ।
फुदुक फुदुक कर दोनों खाता, करता रहता उद्यम ॥
ऊँचे चढ़ा चैन कुछ पाया, नीचे भया दुखारी ।
चिन्ता उपजी शोकातुर हुये, मन संकल्प बिचारी ॥
मन मलीन तन सोचे पक्षी, वृक्ष महा दुखदाई।
डाल डाल में पात पात में, मोह बेल लपटाई ॥
कभी मीठा कड़वा फल चाखू , कभी निरस की बारी ।
तणा मोह काम का फंदा, कठिन भई छुटकारी ॥
मिले कोई ऐसा पुरुष विवेकी, मुझको आन छुड़ावे ।
भोग वासना से मैं छूटू, भव भय फिर न सतावे ।।
तब आकाश बानी हुई ऐसी, दृष्टि ऊँच कर भाई।
देख मुझे मैं तेरा हूँ साथी, संगी सहज सहाई ॥
मेरा रूप है अगम आरा, अजर अमर अविनासी ।
एक अस्थानी सर्व अस्थानी, घट घट का मैं बासी ।।
जो कोई लखे रूप निज मेरा, शब्द सुने सुख रासी ।
तुरत छुड़ाऊँ तोहि बंध से, काटू’ यम की फाँसी ।।
शब्द रसीला पक्षी सुन कर, ऊँचे सीस उठाया।
देख देख वह अचरज मूरत, मन में अति हर्षाया ।
तुम हो कौन कहाँ से आये, कौन धाम में बासा।
दया रूप धारा यह कसा, सहज प्रकाश उजासा ॥
बोला पक्षी सुन मेरे भाई, मैं हूँ अगम अपारा ।
जो कोई शरणागत आवे, ताको , मैं सहारा ।।
अविनासी पद को पहुँचाऊँ, भेद बताऊँ न्यारा ।
परम अवस्था ताहि दिखाऊँ, करूँ आप निस्तारा ।।
तू तो पड़ा मोह के फन्दे, आसा तृष्णा लागी ।
राग वासना त्यागदे मन से, हो चित से वैरागी ।
यह तो वृक्ष काल की माया, जान इसे परदेसा ।
तेरा धाम अधर में प्यारे, चल चल कर प्रवेसा ॥
बोला पक्षी दीन अधीना, मैं हूँ विकल निदाना ।
केहि विधि चलू धाम को तेरे, मैं नहीं चतुर सुजाना ॥
दया दृष्टि कर तब वह बोला, चिंता तज दे भाई ।
मैं तो आया तोहि उबारन, दे अपनी शरनाई ॥
मेरी ओर देख तू हरदम, बल पौरुष तब आवे ।
मेरा बल ले चढ़ अन्तर में, शब्द स्वाद घट पावे ॥
पिंड में तेरे खंड ब्रह्मांडा, तू है आप अविनासी ।
सोच सोच कुछ मन में अपने, भरम अविद्या नासी ॥
पक्षी ने तब तासों सीखा, सुरत शब्द विधि सारा ।
अनहद साधन कर घट अपने, मेटा जगत विकारा॥
ज्योती देखी परम सुहेली, सुन अनहद झनकारा।
पर फैलाये उड़ा तब पक्षी, छोड़ा वृक्ष संसारा ।
सहस कमल त्रिकुटी के ऊपर, सुन्न महासुन्न आया ।
भवर गुफा के पार ठिकाना, सतपद बीन बजाया ॥
अलख अगम पद को जब परसा, राधास्वामी पद में बासा।
अब नहीं दुख दारुण की चिंता, किया निर्वाण निवासा ।।
धन्य धन्य गुरु परम सहायक, जीव अजान चिताया।
साँचे धाम मिले जब बेठक, व्यापे काल न माया ॥
Hindi
[ 22-620 ] सहस कमल में डेरा डालो, ज्योति में ज्योति मिलाओ
[ 22-620 ] सहस कमल में डेरा डालो, ज्योति में ज्योति मिलाओ ।
ज्योति निरंजन ज्योती झलके, घंटा शंख बजाओ ।
ज्योति शब्द की निरख परख में, गुरु का ध्यान लगाओ।
मेघा बरसे बिजली चमके, अमृत धार नहाओ ॥
बिन जल चूद पड़े जहाँ भारी, न्हाय न्हाय तृप्ताओ ।
रिमझिम रिमझिम बादल बरसे, मेघनाद चित लाओ ॥
चाँद सूर बिन जहाँ उजियारा, सो प्रकाश लख धाओ।
मोती पोहो गगन मंडल में, बिन सुर शब्द सुनाओ ॥
त्रिकुटी जाय सोमरस पाओ, पियो अमी रस सारा ।
यह निज वेद श्रुति अस्थाना, मूल कलाम विचारा ।।
यह पद जब कोई साधू परसे, दरसे सत ओंकारा ।
प्रणव शब्द सुन मंगल गावे, यह है गुरु दरबारा ।।
सेत बन्ध रामेश्वर सागर, ब्रह्मा नाद चिकारा ।
मेघनाद इन्द्रीजित रावन, मार करा संहारा ।।
त्रिकुटी छोड़ चले आगे को, सुन्न महासुन्न झारा ।
अटल समाधि की तारी लागी, सो पद दसवाँ द्वारा ॥
गढ़ केलाश ब्रह्मरेन्द्र चोटी, मानसरोवर धारा ।
हंस निरन्तर मोती चूगे, पुरुष प्रकृति धारा ॥
सुन्न छोड़ सोहंग पद आवे, भंवर गुफा की खिड़की ।
मुरली बजी सोहंगम धुन में, सहज ही बिजली कड़की ।।
सोहंग सोहंग हंस की बानी, सोहंग उलटा हंसा ।
जो कोई मरम गुरु का पावे, सुफल तासु शुभ बंसा ॥
सत पद बीन सुनी लब लाई, सत्त पुरुष घर बासा ।
देखा रूप अगाध अपारा, अद्भुत अजब तमासा ॥
अलख अगम के पार ठिकाना, राधास्वामी धाम सिधाये ।
मन बानी की गम नहीं जामें, समझ समझ हर्षाये ॥
जा पर दया गुरु की होई, सो पहुँचे दरबारा ।
राधास्वामी छिन छिन भाखे, राधास्वामी अगम अपारा ।।
Hindi
[ 23-621 ] सात समुन्दर गोता मारा, सात लोक चढ़ आया
[ 23-621 ] सात समुन्दर गोता मारा, सात लोक चढ़ आया ।
सात दिनों की सात चढ़ाई, चढ़ धुर आसन लाया ।।
सात शब्द और सात राग है, अनहद सात सुहानी ।
सात ज्योति की लीला निरखी, सात ही सात बखानी ।।
सात अवस्था ऊच नीच की, समझे कोई गुरु ज्ञानी ।
छः को त्याग सात को धावे, पावे पद निरवानी ।।
गावे राग अनूप अपारा, निरखे रूप गोसाई ।
सरगम के सुर सात हैं जो जो, सो घट नाद की झाई ।।
सात द्वीप में सात हैं तारे, सप्त ऋषि रखवारा ।
सात प्रकार की रचना अद्भुत, क्या कोई बरने पारा ।
तिल पहिला सहस्त्रार दूसरा, त्रिकुटी तीजा जानो।
सुन्न चौथा महासुन्न पाँचवाँ, गुफा छटा पहिचानो।
सतपद सप्तम अपर अपारा, सुर घुन जहां बिसराई ।
अपने घट में लखो निरन्तर, बिगड़ी सब बन जाई॥
आगे शब्द है अगम अलेखा, राधास्वामी पद तिस ऊपर ।
शब्द अशब्द का भेद मिले जब, गुरु दयाल हो जिनपर ।।
घंटा शंख मृदंग सारंगी, बजा सितार अनूपा ।
बंसी मधुर मनोहर बाजी, सातवाँ बीन का रूपा ।
सुरत शब्द का साधन करके, पाया भेद अपारा ।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, खोजा निज दरवारा ।।
Hindi
[24-622 ] रूप अरूप सरूप अनूप, कथे कोई महिमा क्या तेरी
[24-622 ] रूप अरूप सरूप अनूप, कथे कोई महिमा क्या तेरी ।
आनन्दघन सत चित्त अगोचर, बुद्धि लहै कसे गति तेरी ।।
सिंधु अपार महिमा अति निर्मल, अमल विमल से पार गुरु ।
पार अपार की गम नहि तुझमें, अपरम्पार से पार गुरु ।।
माया गोतीता चरित पुनीता, व्यापक विरज महान है तू ।
सर्व स्वरूपी सर्व व्यापी, मंगल मय निज ज्ञान है तू ॥
सर्व आधारा रहित विकारा, सब का सब से न्यारा है।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,तेरा ही मुझको सहारा है।
Hindi
[ 25-623 ] मेरा इष्ट बहुरंगी साँई, घट घट करे निवासा
[ 25-623 ] मेरा इष्ट बहुरंगी साँई, घट घट करे निवासा ।
नाचे नाच नचावे बहुविधि, खेले खेल तमाशा ।।
चन्द्र सूर तारागन मध्ये, ज्योत प्रकाश उजासा।
मेंहदी बीच लाली हुये झलके, फूल बीच ज्यों बासा॥
रमता जोगी भोग अभोगी, सोगी सोग उदासा ।
रूप स्वरूप अनूप दिखावे, रहे निरन्तर पासा ।।
आवे जाये न गुप्त प्रगट होय, बख्शे प्रेम बिलासा ।
सिंध अगाध अगम जल भरिया, पीवे तृप्त पियासा ॥
चैतन धन आनन्द धन अद्भुत, सत्त भाव में भासा ।
जो कोई उसका ध्यान लगावे, काटे कर्म का फाँसा ॥
अजर अमर अविनासी प्यारा, न्यारा प्रेम हुलासा ।
चर और अचर में आप बिराजे, रचे भक्ति निज रासा ।।
नहीं वह ज्ञान योग तुरियातित, नहीं प्रगटा नहीं नासा ।
आसा त्याग जगत माया की, कोई कोई पावे दासा ॥
Hindi
[29-624 ] तीन ताप से जगत दुखारी, सुख आनन्द नहीं पाये
[29-624 ] तीन ताप से जगत दुखारी, सुख आनन्द नहीं पाये ।
ज्ञान विवेक की गम नहीं वाको, भरम अज्ञान भुलावे ।।
मतवारों ने मति गति गाई, मति माया की दासी ।
बुद्धि चतुरता छल और धोके, यम के गले बिच फाँसी ।।
भरम भरम भरमे निस बासर, भरम में आन भुलाने ।
भर्म हिंडोले भूले सारे, ऋषि मुनि और सियाने ।
मानुष जनम का सार न जाना, नर तन बाद गवाया ।
जेहि देखा सो भूल भरम में, फिर फिर भटका खाया ।
राधास्वामी सन्त रूप जग आये, शब्द की डगर बताई।
जो कोई चरन शरन में आया, ताहि लिया अपनाई ॥
Hindi
[ 27-625 ] इस मन अन्दर बाग बगीचा, इसमें है फुलवारी
[ 27-625 ] इस मन अन्दर बाग बगीचा, इसमें है फुलवारी ।
नाना गाछ लता हैं अन्दर, नाना खेत कियारी ॥
इस मन अन्दर सात समुन्दर, मोती मूगा भारी !
ले जितना तेरा मन चाहे, बन सच्चा व्यौपारी ॥
मन के अन्दर असुर देवता, तीरथ सकल विराजें।
मन के अन्दर बजे बाँसुरी, शंखनाद धुन गाज ।
मन ही कुरुक्षेत्र है तेरा, अर्जुन बान चलावे ।
जो कोई इस मन को समझे, समर विजय फल पावे ॥
रावण राम लड़ें मन अन्दर, नित ही होत लड़ाई ।
सीता सती अशोक बाटिका, सब मन की प्रमुताई ॥
मन ही विष्णु आदि शिव शक्ति, ब्रह्मा वेद बखाने ।
मन ही साम यजुर ऋग बानी, जो जाँचे सो जाने ।
मन ही आग पवन जल पृथवी, मन अकाश का रूपा ।
मन निर्वाण मुक्ति का हेतू, मन अन्दर भव कूपा ॥
Hindi
[28 626 ] भक्ति का सन्देश सुनाने, साधू जग में आया है
[28 626 ] भक्ति का सन्देश सुनाने, साधू जग में आया है।
सत असत का निर्णय करके, सत मारग दरसाया है ।।
साधु साधन सिखलाता है, प्रेम भाव जतलाता है ।
दया धरम का मूल है भाई, यह सबको बतलाता है।
किसी से राग द्वेष नहीं उसको, सबका सबसे न्यारा है।
जिनमें श्रद्धा प्रीति है उसकी, उनका वह अति प्यारा है।
तरुवर सम हैं साधु सन्त जन, चौथे बरषा का पानी ।
परमारथ के साथी हैं यह, सहित कर्म और मन बानी ॥
साधु संग की महिमा उत्तम, भव के पार लगाती है।
जो कोई साधु संग में आया, भक्ति उसको भाती है ।
भवसागर अति अगम पन्थ है, बिन जल बड़ मरे प्रानी।
जो कोई साधु शरन में आया, सतसंग की महिमा जानी ॥
सुख देवें दुख खोयें निस दिन, बख्शे पाप से छुटकारा ।
परम सनेही साधु हैं भाई, उनसे मिलेगा निस्तारा ॥
एक घड़ी या आध घड़ी जो, सतसंगत में आता है।
काल कमे के फंद से छुटकर, फल जीवन का पाता है ।
भाव से आवे कुभाव से आवे, साधु है सबको प्यारे ।
दीन दुखी प्रानी हैं साधु के, दोउ आँखों के हैं तारे ॥
साधु संग को यू तुम समझो, ज्यों गंधी की है दुकान ।
चास सुबास मिले नित आये, यह साधू की है पहचान ॥
छोड़ कुसंग संग कर इनका, यह भव फंद कटावंगे।
दाग करम का अपनी दया से, सहज ही सहज हटावेंगे।
कल्पवृक्ष साधू की संगत, मन माना फल देता है।
दुख कलेश संसार के सारे, यह छिन में हर लेता है ।।
मानुष जनम वृथा मत खोओ, जनम नहीं यह बारम्बार ।
पात सूखकर गिरे वृक्ष से, नहीं फिर लगे वृक्ष की डार ।।
पोथी पढ़ो न पुस्तक बाँचो, हित चित से करो साधु संग।
फिर देखो कैसे चढ़ता है, नित नया परमारथ का रंग ।।
माहब मिला न स्वर्गलोक में, नहीं वह बसता चारों धाम ।
वह बसता है साधु में निसदिन, साध संग में है सतनाम ।।
साधु दरस से मिले सुक्तगति, साधु दरस से सुख पाओ ।
साधु वचन सतसंग में सुन सुन, सतनाम से चित लाओ।
साधु सरल चित जगत हितैषी, दयासिंधु हैं प्रेम स्वरूप ।
जो कोई चरन शरन में आवे, नहीं वह पड़े कभी भवकूप ।
सार भेद है साधु की पूजी, साधु से मिले तत्व का ज्ञान ।
साधु संग से सहज ही छूटे, काम क्रोध मोह अभिमान ।
सिंह साधु की रहनी न्यारी, जीवत नर का करे अहार ।
जीवत मारें बान बचन से, जीतेजी करदें उद्धार ॥
पलट जाय ब्रह्मांड निकाया, पलटे चन्द सूरज की चाल ।
साधु बचन पलटे नहीं भाई, साधु शरन लो चित्त संभाल ।।
नारद वाल्मीकि घट योनी, गनिका पीपा और रैदास ।
सुधरे साधु संग में यह सब, साधु संग नित करो विलास ॥
साधु की महिमा सब कोई जाने, बरन सकें नहिं विष्णु महेश ।
शेष नाग थके ऋषि मुनि थकरहे, थकरहे शारद और गणेश ।।
मन मारो छाँडो चतुराई, साधु शरण दृढ़ कर लीजे ।
त्याग कपट छल बुद्धि बिलासा, चित सतसंग में दीजे ॥
Hindi
[29-627 ] आपही माली बाग लगावे, सींचे आप फुलवारी
[29-627 ] आपही माली बाग लगावे, सींचे आप फुलवारी ।
आपही फूल कली है आपही, आप बना बनवारी ॥
कोयल बनकर कूक सुनावे, बैठ आम की बारी ।
बौर देख बौरा हो जाये, पौरापन से न्यारी ॥
आपही बौर आप अमृत रस, आप आम रस धारी ।
आपही चखे आम रस रसना, आप करे रखवारी ॥
फूल मध्य है बास सुबासा, रंग रूप गुलकारी ।
आपही निरखे अपनी शोभा, निरखत होय सुखारी ॥
यह तो भेद कोई गुरुमुख पावे, गुरुपद होय भिखारी ।
हम तो सार मरम लख पाया, राधास्वामी के बलिहारी॥
Hindi
[ 30-628 ] मैं क्या कहूँ खोलकर तुम से, तुम सब के आधारा
[ 30-628 ] मैं क्या कहूँ खोलकर तुम से, तुम सब के आधारा ।
तुमसे स्वारथ और परमारथ, तुम में सार असारा ॥
तुम चन्दा सूरज की ज्योती, तुम में नौ लख तारा ।
तुममें ज्ञान ध्यान है तुममें, तुम सबके भंडारा ॥
तुम उत्तम हो तुम मध्यम हो, जैसा करो विचारा ।
तुमसे गेह दह सब प्रगटे, कुल कुटुम्ब परिवारा ॥
अपनी लीला आप जो परखो, भेद मिले निज सारा ।
जब लग और की लीला अटके, भटक भटक झकमारा।
अपने अन्तर धसो पियारे, अपना रूप पहचानो।
अपनी आप निरख का होना, यही है उत्तम ज्ञानो॥
आप आपको आप पह वानो, राधास्वामी ने समझाया।
कहा और का नेक न मानो, यह उपदेश सिखाया ।
सुनो बात तुम गुरु पूरे की, छोड़ो भरम कहानी ।
अपनी निरख परख करो आपही, तब छूटे भव खानी ॥
Hindi
[31-629 ] मेरा तेरा दोनों मिथ्या, तू मैं भरम पसारा
[31-629 ] मेरा तेरा दोनों मिथ्या, तू मैं भरम पसारा ।
सत असत में भेद कहाँ है, क्यों कोई करे विचारा ।।
नहीं कहीं बंध नहीं कोई मुक्ति, स्वर्ग नर्क कोई नाहीं ।
यह तो मन की सकल कल्पना, उपजे मन के माहीं।
उपजे बिनसे पल छिन मध्ये, ज्यों सपना रैनाई ।
उपज बिनस कर गुप्त प्राट हुये, इनसों कौन भलाई ॥
एक में प्रगट अनेक की लीला, मिथ्या एक अनेका ।
है कोई गुरुमुख गुरु का ज्ञानी, सांचा करे विवेका ।।
एक नहीं और नहीं अनेका, जैसा तैसा रहता।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी, साधु निरख यू कहता ।।
Hindi
[ 32-630 ] तू फकीर है कैसा भाई, भूल भरम चितलाया क्यों
[ 32-630 ] तू फकीर है कैसा भाई, भूल भरम चितलाया क्यों ।
तज अज्ञान की बातें जल्दी, ज्ञान ध्यान अलसाया क्यों।
अँखियाँ उलट तमाशा देखें, अन्तर की लीला न्यारी ।
सब कुछ अन्तर तेरे भरा है, इससे आँख हटाया क्यों ।
गुरु तो तेरे घट के बासी, तू गुरु घट में रहता है।
मैं तू भूल भरम है प्यारे, यह सिद्धान्त भुलाया क्यों ।
बाहर भीतर गुरु हैं व्यापक, कहीं राजा कहीं परजा है ।
चेले में गुरु गुरु में चेला, नहीं तो उसे चिताया क्यों ।
आप आपको आप पिछानो, राधास्वामी की है बानी ।
कहा और का नेक न मानो, यह बानी बिसराया क्यों ॥
Hindi
[33-631 ] प्यारी तू है प्रेम की मूरत, जग दुख से घबरानी क्यों
[33-631 ] प्यारी तू है प्रेम की मूरत, जग दुख से घबरानी क्यों ।
तुझमें ज्ञान ध्यान की शक्ति, भरम से यू भरमानी क्यों।
सुमिरन भजन ध्यान में लगजा, ध्यान रहे गुरु पूरे का ।
समझ बूझ कर तू नहीं पढ़ती, प्यारी गुरु की बानी क्यों।
सतगुरु राधास्वामी दया करेंगे, भव कलेश मिट जावेंगे ।
मान बचन यह दृढ़ निश्चय से, व्यापी है हैरानी क्यों।
Hindi
[ 34-632 ] तू सच्चा है मुझे सचाई, बख्श बख्श सतगुरु प्यारे
[ 34-632 ] तू सच्चा है मुझे सचाई, बख्श बख्श सतगुरु प्यारे ।
तू प्रकाश है तेरी दया से, प्रगटे घट रवि शशि तारे ।।
तू दाता है दान दे मुझको, नाम रतन धन का स्वामी ।
मेरे मन में आके समाजा, जो तू है अन्तरयामी ॥
तू है ज्ञान ज्ञान मुझको दे, मेट तिमिर अज्ञान मेरा’
तेरे रूप का दर्शन पाऊँ, छिन प्रतिछिन रहे ध्यान तेरा ॥
तू सत है अपनी सत्ता दे, जीवन मेरा सुपर जावे ।
तूं चित है निश्चल कर चित को, निश्चित ज्ञान मुझे भावे ।।
सतचित आनन्द रूप है तेरा, दे आनन्द मुझे सतगुर ।
नाम रूप के तेरे सहारे, जीते जी जाऊँ सतपुर ।
राधास्वामी परम पुरुष करतारा, तू दुखियों का सहारा है।
दुख दरिद्र को मेटदे मेरे, दुखदाई संसारा है ।।
चरन शरन की ओट गहूँ मैं, आनन्द मंगल साज सजू ।
राधास्वामी राधास्वामी हित से सुमिरूँ,राधास्वामी राधास्वामी नित भजू
Hindi
[35-633 ] चेत चेत चल सत की डगर में, चेत ले अभी सवेरा है
[35-633 ] चेत चेत चल सत की डगर में, चेत ले अभी सवेरा है।
पीछे क्या चेतेगा प्रानी, फिर यह समय न बेरा है ॥
नर जीवन को वृथा न खो तू , हाथ तेरे क्या आवेगा।
कोई संग न साथी सच्चा, भूठा मेरा तेरा है।
दो दिन का व्यौहार जगत का, दो दिन खेल तमाशा है।
खेलकूद में काम कर अपना, काम तुझे बहुतेरा है ।
महल मकाँ पर भूल न भाई, धन दौलत है दो दिन का।
जो आया सो जाये यहाँ से, चिड़िया रैन बसेरा है ।।
राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी गाले,सुमिरन भजन ध्यानकर नित ।
नहीं फिर जनम मरन का फन्दा, काल का हेरा फेरा है।
Hindi
[39-634 ] रमता जोगी रम रम मन में, मेरे मेरा काम बने
[39-634 ] रमता जोगी रम रम मन में, मेरे मेरा काम बने ।
मुझे वीर हनुमान बनाले, आप तू मेरा राम बने ।
लंक अविद्या का गढ़ दुर्गम, जीतू रावन को मारू।
दुख कलेश के विजय से सुख हो, और मेरा विश्राम बने ।
भर्म मिटादे कर्म नसादे, माया फंद से हो मुक्ति ।
ज्ञान ध्यान का मर्म लखा दे, आनन्द आठों याम बने ।
सकल जगत अज्ञान पसारा, सूझे हाथ से हाथ नहीं।
हिये अकास में सूर उगादे, करम धरम निष्काम बने ।
राधास्वामी सतगुरु दया मेहर से, जीवन सुफल करा मेरा।
यह भव अगमा पाई फिर तो, सुख का सच्चा धाम बने।
Hindi
[37-635 ] मैं आया हूँ ज्ञान बताने, ज्ञान महा है सुखदाई
[37-635 ] मैं आया हूँ ज्ञान बताने, ज्ञान महा है सुखदाई ।
ज्ञान सहज है सहज का साधन, सहज में कैसी कठिनाई ।
बात बात में तत्व सुझाद, खेल खेल में दरसा हूँ ॥
हँसी हँसी में सार लखा दूँ, चुटकी बजाकर समझाइँ ॥
नहीं भयानक कथन है मेरा, रोचक है बानी मेरी ।
सुलझा, जड़ चेतन ग्रंथी, युक्ति है जानी मेरी ॥
मेरी संगत में जो आत्रे, तीरथराज स्नान करे ।
काम अर्थ और धर्म मोक्ष के, तत्वों की पहचान करे ।
सतगुरु ने जो मुझे बताया, वही बताऊँगा तुमको।
राधास्वामी की करुना से, सन्त बनाऊँगा तुमको ॥
Hindi
[38-636 ] मैं हूँ भूली भरमी भटकी, आय पड़ी हूँ संसारा
[38-636 ] मैं हूँ भूली भरमी भटकी, आय पड़ी हूँ संसारा ।
गले में फाँसी यम की पड़ गई, कैसे पाऊँ छुटकारा ॥
काम क्रोध मद लोभ फसानी, व्यापा मन हंकारा ।
पर निन्दा और द्वष ईर्षा, मेरे गले के हारा ।।
मैं अज्ञान के बस में आई, अपना रूप बिसारा ।
मैं हूँ कौन मेरा कुल क्या है, कभी न चित से विचारा ॥
दुखी हूँ चैन शान्ती खोकर, काल करम ने है मारा।
केसी करू उपाय न सूझे, सोचू मैं बारम्बारा ।।
विलपत तलपत दौड़ कर आई, सतगुरु के मैं दरवारा।
राधास्वामी मुझे बचाओ, देकर अपना सहारा ।।
Hindi
[39-637 ] गुरु का भाव हिये में आया, सतसंगी का नियम हुआ
[39-637 ] गुरु का भाव हिये में आया, सतसंगी का नियम हुआ ।
छोड़ दिया अनेक का झगड़ा, यह यम सोच समझ के किया।
तीजे तिल पर बैठक ठानी, यह आसन चितको भाया ।
साँस साँस राधास्वामी का सुमिरन,प्राणायाम यह ठैराया।
मैं हूँ कौन रूप गुरु कैसा, गुरु सेवक में भेद है क्या ।
बारम्बार रूप का सुमिरन, प्रत्याहार अभ्यास बना ॥
गुरु का रूप हिये में धारा, वही धारना तुम जानो।
धनी धारना ध्यान हुई, अब गुरुमुख ध्यानी मानो ॥
ध्यान में तन मन की सुध भूली, बुद्धि अहंकार भूले ।
यही समाधी धने ध्यान की, पाकर सतसंगी फूले ॥
नहीं घमंड न ममता इसकी, यह भी नहीं स्वरूप मेरा ।
सहज भावना मन को भाई, सहज सहज में सहज बना ।।
सहज था पहले अब भी सहज है, सहज समाधि सहज हुई।
जहाँ जहाँ मन जाकर ठेरा, वहाँ हो सहज समाधि लगी।
आँख न मूदू कान न रोंधू, जिभ्या होंठ न बन्द करूँ।
खुली आँख से सबको देखू, गुरु लीला चित चेत धरू ।
जहाँ जहाँ जाऊँ वही है तीरथ, जो खाऊँ सो पूजा है।
आत्मदेव को अपन सब कुछ, मन में भाव न दूजा है ।
जग जागू चैतन व्यौहारा, जब सोऊँ सम साध रहूँ।
सुषप्ति गहरी नींद में आकर, निज स्वरूप का सुख भोगू॥
जाग्रत स्वप्न सुषप्ति तीनों, सृष्टि स्थिति प्रलय हैं।
यह सब काल के घेरे में है, इनसे बचकर आगे चलू ॥
चौथा पद तुरिया जब आवे, तब हो कुछ कुछ रूप का ज्ञान ।
तुरियातीत है पंचम का पद, इससे उदासीन मन मान ।
यहाँ तक ज्ञान की त्रिपुटी देखी, ज्ञेय ज्ञाता और ज्ञान विचार ॥
इसे छटा पद समझो भाई, यह सब है सत के आधार ।
इनके परे सातवाँ पद है, सतपद धुरपद पद निरवान ।।
सत सत सत सत सत है सोई, ज्ञान ध्यान पद मूल बखान ।।
अलख अगम अनाम की गति फिर, नाम रूप से हैं न्यारे ।
राधास्वामी गुरु ने भेद बताया, समझेंगे गुरुमुख प्यारे ।
Hindi
[40-638 ] नर शरीर सुर को भी दुर्लभ, क्या नहीं वेद ने तुझे कहा
[40-638 ] नर शरीर सुर को भी दुर्लभ, क्या नहीं वेद ने तुझे कहा ।
भरम अज्ञान के फाँस में फसकर, नाना विधि के कण्ट सहा ।।
नर का जनम पाय यह प्रानी, भव निधि बहता रहता है।
उसको समझ बूझ नहीं अपनी, दुख नित सहता रहता है ।।
विद्या पढ़ी प्रपंच मचाया, पाखंडी हो भरमाया।
आप फसा औरों को फसाया, अपना भेद नहीं पाया ।
यह विद्या है सकल अविद्या, मोह भरम की फाँसी है ।
कर सतसंग सार को पाले, जग में तेरी हाँसी है।
राधास्वामी सतगुरु दाता, सन्त रूप धर कर आये।
नर जीवन का सार बताया, गुर समझाकर अपनाये ॥
Hindi
[41-639 ] योग युक्ति से क्या फल पाया, अपना चरित सुना जोगी
[41-639 ] योग युक्ति से क्या फल पाया, अपना चरित सुना जोगी।
जोग भोग का भेद है कैसा, मेद का भेद बता जोगी ।।
सेली पहनी भभूत रमाई, आसन मार के बैठा है।
किस आसन पर राम है तेरा, उस आसन को दिखा जोगी।
साँस को साधा प्रान को बाँधा, यम और नियम का यतन किया।
शम दम से मन इन्द्री को मारा, संयम रीति जता जोगी ।।
मृगछाला को बगल में मारे, फिरता रहता है बन बन ।
बिन हिंसा यह कैसे पाया, भाव अहिंसा दिखा जोगी।
अनिमा लघिमा गरिमा महिमा, आदि सिद्धि शक्ति नहीं है क्या
क्या नहीं माया सिद्धि शक्ति, यह कैसे उससे बचा जोगी।
ब्रह्मरेन्द्र और सहस्त्रार पर, मन की वृत्ती को रोक लिया।
लगी समाध सिमट कर बैठा, क्यों कर मुक्ति लिया जोगी।
निरपिकल्प से विकल्प अवस्था, से क्या तुझको लाभ हुये ।
लाभ के साथ हानी नित रहती, द्वन्द नहीं यह क्या जोगी।
जो बाहर भीतर वही लीला, कलपति देश काल वस्तु ।
बाहर मुखी रोककर विरती, अन्तरमुख क्यों बना जोगी ।
चाँद सूर तेरे भीतर प्रगटे, इसमें नहीं सन्देह कोई ।
यह भी तो बाहर थे तेरे, क्यों बाहर से हटा जोगी।
किसका ध्यान धारणा किसकी, क्या नहीं वह संकल्प तेरा ।
सब कुछ है यह मन की कल्पना, कलपित जाल फसा जोगी।
गुफा के भीतर बैठक ठानी, आके बिठाया है किसको ।
रमता राम गुफा में तेरे, कैसे आके रमा जोगी ।
केस बढ़ाया जूड़ा बाँधा, स्वाँग विचित्र बनाया है।
देखू राम फंसा क्या उसमें, खोल दे अपनी जटा जोगी।
ग्रहण त्याग वैराग राग की, समझ नहीं तुझको आई।
कछुवा जैसी तेरी समाधी, छुटी न मोह मया जोगी ।
गुरु का संग मिला नहीं तुझको, भरम की उलझन में उलझा ।
बिना ज्ञान मुक्ति नहीं होती, भूल के पन्थ चला जोगी।
जा कुछ दिन कर गुरु की संगत, गुरु के संग में ज्ञान मिले ।
योग युक्ति का फिर फल पावे, तब हो तेरा भला जोगी ।
राधास्वामी दीन दयाला, सतगुरु रूप धरा जग में ।
चरन कमल की ओट पकड़ ले, अपना सीस झुका जोगी।
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[ 42-640 ] अनहद बानी मंगल खानी, सत्त धाम सहदानी हो
[ 42-640 ] अनहद बानी मंगल खानी, सत्त धाम सहदानी हो।
आनन्द दानी सन्त बखानी, पद निरवान मिलानी हो ।
अमृत धारा संत मत सारा, कोई कोई बिरला जानी हो ।
अविनासी घट घट के बासी, सुखरासी अनुमानी हो ।
कथनी बदनी तज कर पावे, करनी गुरुमुख ज्ञानी हो ।
घट के खटपट चटपट विनसे, अटपट सकल नसानी हो।
खोले हिरदा फाड़े परदा, रूप अनूप दिखानी हो।
जगमग ज्योत जगे तिल भीतर, देख देख हरषानी हो ।
त्रिकुटी सुन्न महासुन्न लेखे, ओंकार गति जानी हो ।
सूरज चाँद कोटि छवि छाजे, अद्भुत अकथ कहानी हो ।
भंवर गुफा में सोहंग वंशी, सत पद बीन बजानी हो ।
अचरज शोभा बरनी न जाई, माया मोह सकुचानी हो ।
घट चढ़ सुरत बिमल हुई भारी, अब नहीं आनी जानी हो।
राधास्वामी चरन शरन बलिहारी,मिल गई अगम ठिकानी हो ॥
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[43-641 ] मैं कैसे करूँ भूली हूँ डगर, बहु दूर पड़ी अपने घर से
[43-641 ] मैं कैसे करूँ भूली हूँ डगर, बहु दूर पड़ी अपने घर से ।
व्याकुल होय भूमि गिरी तड़पू, हरि आन छुड़ाओ अब करसे ।।
रैन अंधेरी न सूझे पन्थ, मिझिम रिमझिम बरसा बरसे ।
को आके खबर ले जल्दी मेरी घर जाने को जियरा तरसे ।
जल बरसे अखं: प्रचंड महा, बन ऊसर देख परस सरसे ।
पुरवाई यार झकोले सहे, हटके उखड़े बट सब जर से ॥
सुध बुध बिसी भरमी भटकी, मैं तो काँप उठी हूँ झरझर से।
मेरे हिया जिया में दुख ताप बसे, तन वायु की बेग लगे सर से।
हिया पीर घनी तलफ छिन छिन, कैसे जाके मिलू प्रतम हर से ।
कोई साथी नहीं कोई संगी नहीं, थर थर अब काँप रही डर से ।।
मेरे घट में आनन्द चैन कहाँ, नहीं सुख पाऊँ बिन पद परसे ।
अवसर जो मिले मिल जाऊँ अभी, पद कमल गहूँ लागू गुरु से ।।
गुरु आन मिलो दुख दूर हरो, केहि विधि मैं छूटू अपडर से ।
राधास्वामी दया की अब हो नजर, तुम आये निकारो भव सर से ॥
[44-642 ] मैं उपदेश बताऊँ आ तू , मेरे पास फकीरा ।
यह उपासना तत्व है भाई, सत मत गहर गम्भीरा ॥
गुरु ने मुझे चिताया जेहि विधि, वही भेद बतलाऊँ ।
मैं नहीं अटका पोथी पत्रा, तुझे कैसे अटकाऊँ।
नहीं उपदेश और है कोई, यह उपासना जानो ।
उप है निकट तो देश स्थाना, यह उपदेश पिछानो ।
यही तत्व है यही सार है, यह गुरु ज्ञान विचारा ।
एक शब्द में भेद बताकर, मेटू भरम विकारा ।।
सत का संग करे जो कोई, सत की लीला धारे ।
गुरु है जग में सत की मूरत, अगम अथाह अपारे ।
और नहीं कोई सत है जग में, समझ विचार फकीरा ।
सत के संग मार ले आसन, मेट द्वन्द की पीरा ।।
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[45-643 ] उप है निकट देश स्थाना, यह उपदेश का सारा
[45-643 ] उप है निकट देश स्थाना, यह उपदेश का सारा ।
पंडित कोई भेद न जाने, जाने गुरुमुख प्यारा ॥
जो कोई निकट में जिसके बैठे, उसका रूप संभारे ।
उसका रूप बसे नैनन में, अपना रूप बिसारे ।
संग प्रभाव न कोई बाँचे, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी ।
हमने तो यह समझ विचारा, सतगुरु की सहदानी ॥
भव की संगत करे जो प्रानी, भव भय चित्त बसावे ।
गुरु की संगत में जब आवे, अभय भाव पा जावे ॥
पशु की संगत पशु बन जावे, नर पदवी को खोकर ।
भरत हिरन की मोह मया से, पछताया था रोकर ।।
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[49-644 ] शब्द सार गह शब्द सार गह, शब्द सार गह लीजे
[49-644 ] शब्द सार गह शब्द सार गह, शब्द सार गह लीजे ।
त्याग कुसंगत त्याग कुसंगत, सत संगत चित दीजे ॥
सतसंग केवल गुरु की संगत, यह उपदेश हमारा ।
जो कोई देश हमारे आवे, सूझे अगम अपाराः ।।
पहिला देश तीसरा तिल है, सहसकमलदल भाई ।
ज्योति निरंजन ज्योती झलके, सो उसकी प्रभुताई ॥
दूजा देश ओ3म् अस्थाना, त्रिकुटी मृदंग गाजे ।
तीजा सुन्न महासुन्न प्यारे, साज समाधि का साजे ॥
चौथा देश है गुफा भँवर की, काल बली ठकुराई ।
पंचम देश सत्त अस्थाना, सत्त नाम सुखदाई ॥
यह उपदेश देश का सुनकर, ले गुरु का उपदेशा ।
राधास्वामी ने मुझे लखाया, सोई सार संदेशा ॥
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[47-645 ] अलख को लखले अगम की गम ले, परख गुरु की बानी
[47-645 ] अलख को लखले अगम की गम ले, परख गुरु की बानी।
राधास्वामी पद जब परसे, छूटे आना जानी ।
गुरु में देश है गुप्त प्रकट सब, गुरु सबके आधारा ।
गुरु के देश की लीला अद्भुत, गुरु संगत निस्तारा ॥
सुरत शब्द की सुगम कमाई, सहज ही काम बनाले ।
इसी जनम में धुरपद बासा, सार ज्ञान मत पाले ॥
गुरु की संगत पाँच दिना की, पाँच देश की खानी ।
पाँच ही दिन में काम बनेगा, सहज सुगम मुख दानी ॥
राधास्वामी नर शरीर में, धरा सन्त अवतारा ।
सालिगराम गुरु की किरपा, मुझे निला सत सारा ॥
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[18-646 ] उप है निकट तो आसन बैठक, सच्ची बात परखले
[18-646 ] उप है निकट तो आसन बैठक, सच्ची बात परखले ।
उप आसन है गुरु की संगत, गुरु संग बैठ निरखले ॥
प्रेम भाव नहिं उपजे मन में, बिन गुरु संग न भाई ।
शब्द जाल में पड़ी है दुनियाँ, सच्ची समझ न आई ।।
ईश जीव दोउ भिन्न भिन्न हैं, भिन्न की कैसी भक्ति।
प्रेम प्रीति अपने जैसे की, यह उत्तम है युक्ति ।
मैं कहता हूँ बात निराली, सच्ची खरी सुहानी।
लखे मरम कोई साधु सुजाना, लखकर चित मनमानी।
गुरु ने रूप धरा मानुष का, सार शब्द समझाया।
राधास्वामी की बलिहारी, भरम मिटा सत पाया ।
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[49-647 ] कहना सुनना सब है निष्फल, बात मान एक मेरी
[49-647 ] कहना सुनना सब है निष्फल, बात मान एक मेरी ।
एक बात जो मेरी माने, सौ सौ सुनू गा तेरी ॥
कोटि ग्रन्थ पढ़कर क्या पाया, गुरु गम ज्ञान न सूझा।
एक सैन से अनुभव जागे, गुरु मत जिसने बूझा ॥
नहीं वह करम धरम जप तप है, नहीं वह साँख्य का ज्ञाना।
नहीं संयम नहीं नियम है प्यारे, नहीं वेदान्त का ध्याना॥
वाद विवाद है दन्त कहानी, बात का बने बतंगड़ा।
शब्द जाल में जो कोई जकड़ा, बुद्धि टाँग नहिं लँगड़ा ।
कान इधर ला कहदू तुझसे, कर गुरु का सतसंगा।
राधास्वामी की कृपा से, मन उपजे नहीं शंका ।।
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[50-648 ] जो मेरे प्रतम का प्यारा, मेरा भी वह प्यारा
[50-648 ] जो मेरे प्रतम का प्यारा, मेरा भी वह प्यारा ।
जो सतगुरु का नाम दिवाना, आँखों का है तारा ।।
पाप पुण्य का भेद न परखू , ऊँच नीच नहीं जानें ।
बुरा भला नहिं दृष्टि में मेरे, भाव का नाता मानू ॥
मेरा स्वामी पतित उद्धारन, पतित हेत जग आया ।
पतित को अपने चान लगाया, पतित सुधार कराया ॥
पतित से पतित जो भाव भेंट ले, सतगुरु पद को परसे।
मैं उस भाव के सदके जाऊ, प्रेम प्रसाद को तरसे।
धोबी घाट है गुरु सतसंगत, मेले कपड़े आवे ।
साबुन गुरु के प्रेम का पाकर, सो उजले बन जावें ॥
उजले धोबी घर नहीं आवें, उनको कोई क्यों लावे ।
धोबी मैल को धो निस दिन, मैले शुद्ध बनावे ॥
डाकू चोर उचक्का क्रोधी, कामी लोभी मानी ।
परमारथ हित गुरु ढिंग आवे, उपजे न मुझे गलानी ॥
मैं नहीं पू तू है कैसा, कैसी करे कमाई ।
फूल प्रसाद कहाँ से लाकर, गुरू के भेंट चढ़ाई ।।
गुरु जब प्रेम भाव के भूखे, प्रेम है मुझे पियारा ।
जो मेरे प्रीतम का प्यारा, सो आँखों का तारा ॥
गणिका रामानन्द चरन लग, भक्ति भेट जब लाई ।
मिला प्रसाद कबीर को उसका, प्रेम स्वाद लग खाई ।।
तर गई गणिका तर गये पीपा, तरे चमार रैदासा ।
उनके चरन कबीर के सिर पर, गुरु के प्यारे दासा ।।
कोढ़ी तरगये तरे पातकी, गुरु के चरनन लागी ।
ऐसे पापी मुझे पियारे, भक्ति प्रीति हिय जागी ।
मैं हूँ पापी पाप की मुस्त, पाप की दृष्टि धारी ।
पापी संग तरा मैं गुरूबल, पापी की बलिहारी ।।
भाव कुभाव सुभाव न परखू , नहीं द्वेष नहीं रागा ।
मेरा तो वह सदा सनेही, जो गुरु चरनन लागा ।।
निज स्वारथवश भूल करू मैं, हिंसा पाप कमाई ।
हिंसक जब गुरु के डिंग आवे, थारा मुझको भाई॥
पापी तारन आये सतगुरु, शब्द जहाज बनाया।
मैं पापी पापी संग तर गया, पापो पर गुरु दाया ।।
जात न पू पाँत न पूछ, नाहीं कुल परिवारा ।
प्रेम प्यार का नाता मानूं, प्रेम का सकल पसारा ॥
सुन फकीर यह भेद अनूया, अचरज अगम अमाना।
जिस पर दयाटि सतगुरु की, तेहि बड़भागी जाना ।।
मैं मर जाऊँ भीख न माँगू, अपने तन के काजा ।
परस्त्रारथ के काम में प्यारे, मोहि न आवे लाजा ॥
कैसा पाप पुण्य है कैसा, नाम से लगन जो लागी।
पूले लाख घास के जर गये, एक चिनगी थी आगी।
नाम गुरु का आग तुल्य है, पाप लाख मन पूला ॥
रत्ती नाम जरावे सबको, दया मेहर अनुकूला।
कुत्ते बिल्ली रहें परस्पर, बैर भाव सब छोड़ें।
निज मालिक के प्रेम को परखें, प्यार का नाता जोड़ें।
तैसे मुझको पापी प्यारे, गुरु की शरन जो आये ॥
प्यार करूं नहीं उनको कैसे, गुरु जब चरन लगाये ।
साधन प्रेम का सुगम सुहावन, भक्ति भाव सुखदाई।
पापी भक्ति के अधिकारी, समझ में मेरी आई।
राधास्वामी नाम भजो नित, नाम से लव रहे लागी ।
जो कोई नाम से गखे प्रती, सो मेरा अनुरागी ॥
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[ 51-649 ] कालचक्र का सहज हिंडोला, भूला अचरज न्यारा
[ 51-649 ] कालचक्र का सहज हिंडोला, भूला अचरज न्यारा ।
सब कई भूले भूला चढ़कर, काल मुलावन हारा॥
चन्द्र सूर दोऊ गगन में भूलें, भूलें नौ लख तारे ।
जीव जन्तु पृथ्वी में भूलें, नर पशु सकल विचारे ।।
राजा भूला रानी भूली, और प्रजा समुदाई।
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर भूलें, भूली सब दुनियाई ॥
लक्ष्मी भूली दुर्गा भूली, गायत्री महारानी ।
देवा भूले देवी भूले, जल थल अग्नी पानी ॥
काल भी झूला अपने झूला, सृष्टि प्रलय कर प्यारे ।
वह भी बचा न चक्र से अपने, भूला झूले सारे ॥
चढ़ी पेंग तब ऊचे आये, उतरी नीचे ठहरे।
कभी मिले तो जमघट देखी, विछड़ के होगये न्यारे ।।
एक दशा में नित जो बरते, कोई नजर न आया ।
पीर पैगम्बर कुतुब ओलिया, ऋषि मुनि बचन न पाया।
पानी भया भाप की सूरत, धाया गिरि केलासा ।
बरफ बना धारा बह निकली, नीचे किया निवासा ।।
नीचे भी रहने नहीं पाया, फिर ऊचे की आशा ।
हम तो देखें खुली दृष्टि से, अचरज अजब तमासा ॥
लकड़ी जल कर कोयला होगई, कोयला राख और माटी।
माटी माटी में नहीं ठहरी, बनी काठ और लाठी ॥
विष्टा अन्न अन्न भया विष्टा, सोई सब कोई खावे ।
यह प्रपंच है अद्भुत न्यारा, कोई विरला लख पावे ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ती लीला, कभी ऐसी कभी वैसी।
यह सब कालबली की माया, कभी जैसी कभी तैसी ॥
पंडित कभी अनाड़ी होते, कभी अज्ञानी ज्ञानी।
कभी जड़ मिल जुल चेतन ठहरे, कभी चेतन जड़ जानी।
समझत बने कथन नहीं आवे, मन बानी अलसानी ।
कसे कोई समझावे किसको, समझे कोई गुरु ज्ञानी ॥
एक दशा में कोई न बरते, कभी बैठा कभी दौड़ा।
कभी थका कभी सोया लेटा, काल चक्र अति चौड़ा।
मले की है विचित्र कहानी, कथा वारता न्यारी ।
नर को हम समझावन आये, सुने न बात हमारी ।।
दुख सुख दुख सुख द्वन्द पसारा, द्वन्द से प्यार बढ़ाया ।
द्वन्द भाव ले जगत रचाना, द्वन्द के फाँस फसाया ॥
मन बुद्धि और चित हंकारा, सो भूले की रसरी ।
दो लड़ बयलड़ चौलड़ बन आई,जीव निवल को जकड़ी।
जकड़े माया के फंदे में, रोये और चिल्लाये।
शोर मचाये बहु चिल्लाये, छूटन विधि नहीं पाये ॥
तब दयाल को दाया लागी, सन्त रूप धर आया ।
गधास्वामी अचल मुकामी, शालिग्राम कहाया ।
नर शरीर में प्रगटा आकर, जीवन बहुत चिताया।
जो कोई जीव शरन में आया, अपना कर अपनाया ।
सुन फकीर यह गुरु उपदेशा, मैं भी तुझे सुनाऊ।
बात जो मेरी मन से माने, इस भूले से बचाऊँ ।
खेल खेलाऊँ सुगम सुहेला, सुरत शब्द मत गाऊँ।
काल हिंडोले से तू बाचे, विधि विचित्र समझाऊँ ।।
कर सतसंग विवेक से गुरु का, गुरु दयाल हितकारी ।
साधु बनकर साधले युक्ति, जा झूले के पारी ॥
नर शरीर मुर दुर्लभ पाया, सतसंगत में आया।
तेरा दाँव पड़ा है पूरा, सोच समझ तज माया ॥
अब की चूक मौज न ऐसी, त्याग काल की आसा ।
आज का साधन आज ही करले, कल को होगा उदासा ।।
बार बार नहीं अवसर प्रानी, काल महा दुखदाई।
जो कोई करे काल की आसा, सों पाछे पछताई ।।
राधास्वामी दया के सागर, तेरे कारन आये।
सीस चरन में उनके मुकाकर, अपना काज बनाये ॥
गधासामी राधास्वामी, राधास्वामी गाना।
मन बच कर्म से भक्ति कमाना, झूले बाहर आना ।।
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[ 52-650 ] तू फकीर है मेरे प्यारे, सुन फकीर की बानी
[ 52-650 ] तू फकीर है मेरे प्यारे, सुन फकीर की बानी ।
साधु कहें फकीर को भाई, साधु जग सुखदानी ।।
पर उपकारी जन हितकारी, गुरु के आज्ञाकारी ।
अवगुन त्यागी गुन के ग्राही, दया भाव चितधारी ॥
निज चित सोधे मन परबोधे, जीव दोष नहीं दृष्टि ।
अपने भाव में बरतें निस दिन, करें दया की दृष्टि ।।
मोह मया और छल चतुराई, छोड़ें मूल विकारा ।
पर हित लागी सहज विरागी, ज्ञान बुद्धि भंडारा ॥
दुख कलेश सह अपने सिर पर, जीव का करें सुधारा ।
भव दुख भंजन काम निकंदन, यम से छुटकारा ॥
धर कपास की गति बिमलचित, निरस विशुद्ध कहायें।
सहें विपति कठिनाई जगकी, और का दोष छुपावें ।
सरल स्वभाव रहे जग माहीं, अपना रूप संभारें ।
औरन के अश्गण नहीं देखें, दया का मर्म विचारें ।
सुख देवं दुख हरें निरंतर, छमा करें अपराधा ।
हँसी खुशी आनन्द प्रेम गति, अगम अलेख अबाधा ।
नाम फकीर धराया तूने, हो फकीर अब साँचा ।
जैसा नाम तो गुण भी वैसा, मन कर्म सहित सुबाचा ।।
है फकीर का नाम पियारा, मैं फकीर का दासा ।
तन मन धन फकीर पर वारूँ, बस् सुसंग सुवासा ।।
कठिन नाम है कठिन काम है, कठिन फकीर कमाई।
जग के भव दुख नासें पल में, जब फकीर जग आई ॥
जो फकीर मोहे दरशन देवे, अपना भाग सरा हूँ।
अपने तन के चाम की जूती, पग फकीर पहनाऊँ॥
मैं नहीं रामकृष्ण का सेवक, ईश ब्रह्म नहीं जान ।
मैं फकीर का नाम दिवाना, सबसे बढ़कर मानू ॥
मेरे साध है शब्द विवेकी, सन्तवंश कुल शोभा ।
चरन कमल मस्तक पर धारूं, प्रेम मगन मन छोबा ॥
एक घड़ी साधु की संगत, कटे मोह यम फाँसी ।
मेरी नजर में साधु फकीरा, सत चित आनन्द रासी ॥
जो फकीर का दर्शन पाऊँ, चरन सरोज पखारूं ।
आप तरू उसकी शरनाई, औरों को संग तारू ।
साधु की संगत गुरु की सेवा, सहज ही काम बनावे ।
जिस पर साध की दृष्टि पड़गई, फिर जग योनि न आवे ॥
तरवर सरवर मेघ का पानी, औरों को सुख कारी ।
तेसे ही सुन मेरे फकीरा, साधु पर उपकारी ॥
तू फकीर बन तू फकीर बन, तू फकीर बन भाई ।
मैं भी तरू फकीर चरन लग, ऐ फकीर ! सुखदाई ॥
सुनले कथा सुनाऊँ तुझको, प्रगटे बिमल विवेका ।
जीव अनेक रहें जग अन्दर, पर फकीर कोई एका ॥







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